इन्सेस्ट रिश्ता - Page 5 - SexBaba
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इन्सेस्ट रिश्ता

अपडेट 20



रस्ते में संध्या ने आदित्य से पूछा की पानी पूरी कैसी थी तू आदित्य जो अपनी सोचो में खोया हुआ था बोलै "माँ आपकी उँगलियाँ बहुत मीठी हैं" संध्या एक बार तू शर्मा गयी लेकिन फिर उसने कहा "मैंने पानी पूरी के बारे में पूछा था" तब आदित्य ने कहा "माँ मुझे तू पानी पूरी का पता hi नहीं चला, मैं तू आपकी उँगलियों की मिठास में खोया हुआ था" उसकी बात सुनकर संध्या एक डैम से शर्मा गयी और उसकी पीठ पर मुक्का मरते हुए "घाट" कहकर चुप होकर बैठ गयी और बिच बिच में ब्रेक लगने पर वो आगे को खिसक जाती थी जिससे उसकी चूचियां आदित्य की पीठ पर डाब कर उसका हाल बुरा कर रही थी. एक बार तो माँ ने झटका लगने पर अपने गाल को भी उसकी गर्दन पर दबा दिया था, जिससे दोनों के साँसों की गति बढ़ गयी थी. फिर वो दोनों घर पहुंच गए. घर में ए तो संध्या आदित्य को अजीब नजर से देख रही थी और मुस्कुरा भी रही थी.

घर पहुँच कर उन दोनों के मन में अजीब सी फीलिंग थी और वो दोनों hi एक दूसरे से नजरे चुराते हुए अपने अपने कमरे में चले गए.

इनको अपने कमरे में जाने देते हैं और हम चलते हैं मोहनलाल और रुचिका का हाल पता करने.

एयरपोर्ट पर पंहुच कर उनोहोने बोर्डिंग पास लिया और सिक्योरिटी चेक के बाद अंदर आ गए तू पता चला की फ्लाइट दो घंटे के लिए डिले कर दी गयी है. रुचिका ने पिज़्ज़ा खाने के लिए ज़िद की तू मोहनलाल मन करने लगा लेकिन वो मान नहीं रही थी तू मोहनलाल ने बहाना किया और कहा "अच्छा तुम बैठो मैं टॉयलेट होकर आता हु"

मोहनलाल वंहा से अलग हुआ और किसी से फ़ोन पर बात करता रहा, उसने रुचिका के हाल चल के बारे में बताया और कुछ पूछा तू उसका जवाब सुनकर मोहनलाल के चेहरे पर मुस्कान आ गयी और फिर वंहा से वो रुचिका के पास आकर बैठ गया.

रुचिका ने फिर से ज़िद की तू उसने कहा "जयादा मत खाना". उसने खुश होकर मोहनलाल के गले लगकर "थैंक्स बोलै" और फिर दोनों वंहा पिज़्ज़ा हूत पर चले गए और रुचिका की पसंद का पिज़्ज़ा आर्डर कर दिया और साथ में दो कॉफ़ी भी बोली.

आर्डर आने से पहले मोहनलाल ने रुचिका को दवाई खाने के लिए कहा तू उसने कहा की बाद में ले लेगी तू मोहनलाल ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए बड़े प्यार से कहा "अगर पिज़्ज़ा खाना है तू पहले दवाई खाओ, नहीं तू पिज़्ज़ा कैंसिल"

रुचिका ने थोड़ा सा ृथत्ते हुए कहा "जब देखो आप मुझे ब्लैकमेल करते रहते हो, अच्छी बात नहीं है" तू उसके जवाब में मोहनलाल ने उसके माथे को चूमते हुए कहा "ये तू मेरा प्यार है" उसकी बात सुनकर रुचिका मोहनलाल को बहुत प्यार से देखने लगी और कुछ कहती उससे पहले उनका आर्डर भी आ गया. मोहनलाल अपने हाथों से बड़े प्यार से रुचिका को खिलता है तू रुचिका बहुत खुश होती है और फिर उसके बाद रुचिका और मोहनलाल वंहा से आकर वेटिंग लाउन्ज में आ जाते हैं, जंहा उसे मोहनलाल आराम करने के लिए कहता है तू रुचिका मोहनलाल के कंधे पर सर रख कर आँखे बंद कर लेती है और थोड़ी देर में सो जाती है और मोहनलाल अतीत की यादों में खो जाता है.

ऐसे hi वक़्त बीतता रहा और मोहनलाल के मन में रुचिका की तरफ लगाव दिनों दिन बढ़ता hi जा रहा था लेकिन वो अपने आप से डरने लगा था की कनिह कुछ गलत न हो जाये, इसलिए वो कोशिश करता था की घर पर काम से काम जाये ताकि रुचिका से दूर रहे. दूर रहता था और मन hi मन में कहता था

दूर रह कर करीब रहने की आदत है

याद बनकर आँखों से बहने की आदत है

करीब न होते हुए भी करीब पाओगे

मुझे एहसास बनकर रहने की आदत है

उसकी ये बात वाक़ई में सच होती परतीत हो रही थी क्योंकि अब रुचिका के मन के किसी कोने में भी उससे अपने पापा से मिलाने की चाहत बढ़ रही थी. उससे नहीं पता लग रहा था की ये एहसास क्या है, लेकिन उसकी सहेली के द्वारा उससे बार बार छेड़ने और बीती यादों की वजह से उसका मन करता था की अपने पापा के साथ वक़्त बिताये और वो चाहने लगी थी की उनके साथ घूमे फायर और मस्तियाँ करे. जैसे hi वो पापा को याद करती तू उसके मन में एक मीठी चुभन होने लगती, ये क्योँ था उसकी समझ से परे था हो सकता है की उसके मन में उसकी सहेली के शब्द गूंजते थे "पर्सनल एंड साइकोलॉजिकल अदमीरेर". उससे कभी कभी लगने लगा था की उसके पापा के ऊपर ये डेफिनिशन बिलकुल फिट बैठते है.

वक़्त पंख लगा कर ुध रहा था और रुचिका अब फाइनल ईयर में थी तू एक दिन मोहनलाल को टूर पर फ्री कपल के लिए 3 दिन का पैकेज मिला था तू उसने संध्या को साथ चलने के लिए कहा तू वह मन करने लगी. मोहनलाल ने उसे कहा की बच्चों का ध्यान रखने के लिए उसने एक रिश्तेदार को कह दिया है इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है. उसने कहा "बात बच्चों की नहीं है और वैसे भी बच्चे अब बड़े हो गए हैं वह अपना ध्यान खुद कर सकते हैं लेकिन मैं नहीं जाना चाहती क्यूंकि की वहां पैर दूसरे लोग पातर पातर इंग्लिश बोलते हैं और मुझे कुछ समझ नहीं आता जिस वजह से मैं बेवकूफ बन जाती हूँ. बेवकूफ बनने से अच्छा है की मैं जॉन hi नहीं."

मोहनलाल ने उसको बहुत समझाया लेकिन वह तस से मास नहीं हुई. आखिर में हथियार डालते हुए मोहनलाल ने उससे कहा "ठीक है जैसे तुम्हारी मर्जी, चला जाऊंगा अकेले"

उसने कहा "ऐसा करो अपने साथ रूचि को ले जाओ तुम अकेले भी नहीं होंगे और उसको भी घूमने को मिल जाएगा और वैसे भी वो अच्छी खासी इंग्लिश बोल लेती है, इसलिए परेशानी की कोई बात नहीं है"

मोहनलाल ने कहा "तुम समझती क्योँ नहीं हो, मैं उसे नहीं ले जा सकता"

संध्या: क्योँ नहीं ले जा सकते

मोहनलाल: एक तू वो बोआर हो जाएगी

संध्या: क्योँ बोआर होगी, जंहा आप जाओगे वो आपके साथ जाएगी और कुछ सीख भी लेगी

मोहनलाल: उसे कैसे ले जा सकता हु

संध्या: जैसे मुझे ले जा सकता हो

मोहनलाल: ये मुमकिन नहीं है

संध्या: आप असल में अकेले जाना कहते हो और मुझे भी ऐसे hi बोल रहे हो की चलो, वार्ना मन से नहीं चाहते, इसलिए ये सब कह रहे हो

मोहनलाल: तुम समझती क्योँ नहीं हो, अगर उससे ले जाता हु तू उसका खर्चा भी अलग से करना पड़ेगा

संध्या: क्योँ करना पड़ेगा, अभी तू कह रहे थे की कपल के लिए सब फ्री है

मोहनलाल: हाँ 'कपल' के लिए फ्री है

संध्या: मतलब दो के लिए, उन्हें क्या फर्क पड़ता है, वो तू कोई भी दो हो सकते हैं

मोहनलाल: यंहा कपल का मतलब अलग है

संध्या: हाँ मैं सब समझती हु, आप मेरी नासमझी का फायदा उठाकर मुझे बेहला फुसला कर उसे न ले जाने का बहना ढूंढ रहे हैं.

मोहनलाल: अगर तुम्हे मेरी बात का विश्वास नहीं है तू अपनी लाड़ली, पढ़ी लिखी बेटी से पूछ लो की 'कपल' का क्या मतलब होता है

संध्या ने रूचि को आवाज़ देकर बुलाया और उससे कपल का मतलब पूछा तू उसने बताया 'तवो पीपल और थिंग्स ऑफ़ थे शामे सॉर्ट कन्सिडरेड टुगेदर'

संध्या: अरे हिंदी में बता

रुचिका: दो लोग या वस्तुअन जो एक जैसे हो और साथ हो

संध्या: कपल का मतलब दो hi है न तू फिर परेशानी क्या है

मोहनलाल: (परेशान होते हुए) तुम लोगों को समझाना मेरे बस की बात नहीं है, ठीक है तुम जैसा कहोगी मैं करूँगा.

संध्या: रूचि बीटा तुम पापा के साथ घूमने जाना चाहोगी

रुचिका: (मन hi मन में खुश होते हुए, उसके तू मन की मुराद पूरी हो रही थी) हाँ क्योँ नहीं, नेकी और पूछ पूछ

संध्या: फिर तयारी करो, तुम्हे कल hi जाना है पापा के साथ और देखना कुछ अच्छे वाले कपडे रख लेना.

रुचिका: पापा मुझे नए कपडे दिलवा देंगे, क्योँ पापा

मोहनलाल: (परेशानी से) हाँ जो आप दोनों कहोगे मैं करूँगा और चारा क्या है मेरे पास

रुचिका: (उदास होते हुए) पापा, अगर आप को मुझे ले जाने में कोई परेशानी है तो मैं नहीं जाना चाहती. मुझे लगता है की आप मुझे लेजाकर दुखी लग रहे हो. अगर ऐसा है तू आप मुझे ख़ुशी से नहीं ले जाना चाहते तू मैं नहीं जाउंगी, आप परेशान न हो.

मोहनलाल: (रुचिका की उदासी देखकर पिघल गया और अपने चेरे पर मुस्कुरहट लेट हुए) नहीं बेटे ऐसी बात नहीं है, जाओ तुम तयारी कर लो

अगले दिन वे दोनों सुबह सुबह hi कैब करके वंहा से निकलकर स्टेशन पर आये और प्लेटफॉर्म पर ट्रैन की वेट करने लगे. उनकी first-class में टिकट बुक थी और ट्रैन आने पर वे ट्रैन में चढ़े तू देखा की उन्हें एक कूप दिया गया था.

कूप वो होता है जिसमे सिर्फ दो सीट होती हैं ऊपर नीचे और आप दरवाजे को अंदर से बंद भी कर सकते हैं जिससे आप को पूरी प्राइवेसी मिलती है.

रुचिका तू उस ट्रैन और उसके केबिन को देखकर hi खुश हो गयी और कहने लगी "पापा ऐसी ट्रैन भी होती हैं जिसमे अपना अलग कमरा होता है"

मोहनलाल: हाँ बीटा होता है, जैसे की ये है, ऐसे hi चार लोगों के लिए भी होता हैं

फिर वे आराम से सीट पर बैठ गए, मोहनलाल तू ये सोच सोच कर परेशान था की वंहा पर कान्हा रुकेंगे क्योँकि जो रूम कंपनी की तरफ से बुक हुआ है वो कपल के लिए है न की बाप और बेटी के लिए.

कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करे और उधर रुचिका अपनी ट्रैन जर्नी का मज़ा ले रही थी और बहार के नज़ारे देख देख कर खुश हो रही थी. होती भी क्योँ नहीं, ऐसा सफर तू उसने पहले कभी किया hi नहीं था.

दोपहर में दरवाजे पर नॉक हुआ तू जब मोहनलाल ने खोला तू वहां पैर एक वेटर खड़ा हुआ था जो उनके लिए खाना लाया हुआ था. वहां पैर खाना रखकर बोलै "प्लीज एन्जॉय योर लंच सर एंड मैडम"

रुचिका: पापा यह हमें सर और मैडम क्यों बोल रहा था

मोहनलाल: और क्या बोलता

रुचिका: नहीं पापा बात कुछ और hi है

मोहनलाल: अरे कोई बात नहीं चलो खाना खाओ और और बाकि की सब बातें बाद में करेंगे

उन दोनों ने चुप करके खाने खाया लेकिन मन अशांत था, इसलिए खाना अच्छा होते हुए भी मजा नहीं आ रहा था. जैसे कैसे खाना ख़तम हुआ और थोड़ी देर बाद वही वेटर आया और उन्हें इसक्रीम देकर पूछने लगा "सर और कुछ चाहिए" मोहनलाल ने ना में सर हिलाते हुए उसे टिप दी तू वो "थैंक यू सर, अब आपको कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा, आपको कुछ भी जरुरत हो तू मुझे याद कर लेना" इतना बोलकर चला गया. उसके जाने के बाद मोहनलाल ने कूप का दरवाजा बंद कर दिया और जैसे hi पलटा तू रुचिका उससे बड़े hi अजीब नज़रो से देख रही थी और बोली "अब आप बताइये की उसका क्या मतलब है"

मोहनलाल ने अनजान बनते हुए "किसका"

रुचिका: सर और मैडम का

मैं: वैरी सिंपल, सर मीन्स मैं और मैडम मीन्स तुम

रुचिका: वो तू मुझे भी समझ आ रहा है, लेकिन जिस तरह से वो कह रहा था वो हमें कुछ और hi समझ रहा था.

मैं: क्या समझ रहा था

रुचिका: जैसे की हम हस्बैंड वाइफ हो

मोहनलाल: (ठंढी सांस भरते हुए) तू क्या गलत समझ रहा था

रुचिका: मतलब

मोहनलाल: ये टिकट मरस. & मर. मोहन के नाम से है, मतलब की मैं और तुम्हारी माँ

रुचिका: आपने ये बात पहले क्योँ नहीं बताई

मोहनलाल: क्या नहीं बताई

रुचिका: की ये टिकट हस्बैंड और वाइफ के लिए है

मोहनलाल: चीख चीख कर बताया था की ये टूर कपल के लिए फ्री है

रुचिका: लेकिन कपल का मतलब हस्बैंड वाइफ थोड़े hi होता है

मोहनलाल: घर पर तुम दोनों माँ बेटी को बहुत समझाया था, लेकिन तुम्हारी माँ और तुमने अपनी इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके मुझे कपल का मतलब समझा कर चुप करा दिया था. तब तू मेरी बात समझ नहीं आ रही थी.

रुचिका: मैंने कपल का मतलब तू डिक्शनरी से पढ़ कर hi बताय था.

मोहनलाल: मेरी पढ़ी लिखी बेटी कपल के कई मतलब होते है, जिनमे से एक का मतलब तुमने बखूबी बताया, लेकिन इंग्लिश का वर्ड कान्हा उसे होगा उस हिसाब से उसका मतलब बदल जाता है. जैसे कपल का यंहा मतलब है "तवो पीपल हु अरे टुगेदर बिकॉज़ थे अरे मैरिड और इन ा रिलेशनशिप"

हिंदी में मतलब है "विवाहित होने अथवा किसी सम्बन्ध में होने के कारण दो व्यक्तियों का एक साथ रहना, दंपत्ति, pati-patni"

रुचिका: आपका मतलब है की वो हमें पति पत्नी समझ रहा है

मोहनलाल: हाँ

रुचिका: उसे हमारी उम्र का फरक समझ नहीं आया

मोहनलाल: पहली बात तू हमारी उम्र का जयादा फर्क लगता hi नहीं है, याद करो तुम्हारी सहेली ने तू तुम्हारे सच बोलने पर तुम्हारा मजाक उदय था और दूसरी बात अगर किसी को नज़र भी आये तू उम्र के फर्क का कोई मतलब नहीं हैं क्योंकि वो लिस्ट में से देख कर आया है की हम कपल हैं

रुचिका: क्या उम्र के फर्क होने से भी कपल हो सकते हैं.

मोहनलाल: पहली बात कोई नहीं कह सकता की हम दोनों की उम्र में जयादा फर्क है और दूसरा अगर किसी को उम्र का फरक पता भी चला तू वो कभी नहीं कहेगा क्योँकि ये आजकल नार्मल है.

रुचिका: लेकिन मैं तू आपकी बेटी हु

मोहनलाल: क्या हमारे चेरो पर लिखा हुआ है? जब तक हम किसी को नहीं बताएँगे तब तक कोई नहीं जान सकता की हमारा रिश्ता क्या है
 
अपडेट 21

रुचिका: लेकिन मैं तू आपकी बेटी हु

मोहनलाल: क्या हमारे चेरो पर लिखा हुआ है? जब तक हम किसी को नहीं बताएँगे तब तक कोई नहीं जान सकता की हमारा रिश्ता क्या है

रुचिका: पापा वो तू ठीक है लेकिन ये तू सही बात नहीं है न की लोग हमें हस्बैंड वाइफ समझे

मोहनलाल: मैं कब कह रहा हु की ये ठीक हैं. यही बात जानते हुए मैं तुम्हे लाना नहीं छह रहा था लेकिन तुम्हारी माँ और तुमने मेरी बात मणि hi नहीं

रुचिका: अब क्या करें

मोहनलाल: अब क्या करना है, भुगतो

रुचिका: हम उन्हें बता देते हैं की हम पति पत्नी नहीं बल्कि बाप बेटी हैं

मोहनलाल: तुम्हे बहुत आसान लग रहा है न, पहली बात ये कोई मानेगा नहीं और मान भी लिया तू दूसरे की टिकट पर यात्रा करने के जुर्म में हैवी जुरमाना या फिर जेल भी हो सकती है

रुचिका: क्यों टिकट तू है न हमारे पास

मोहनलाल: हाँ है लेकिन तुम्हारी नहीं बल्कि तुम्हारी माँ के नाम. अगर तुम अपने आप को मेरी बेटी बताती हो तू फिर तुम बिना टिकट हो और फिर फाइन या जेल

रुचिका: आप तू मुझे डरा रहे हैं

मोहनलाल: डरा नहीं रहा बल्कि हकीकत बता रहा हु

रुचिका: तू फिर क्या करें

मोहनलाल: कुछ नहीं बस दुसरो के सामने हमें पति पत्नी का नाटक करना होगा

रुचिका: (मुस्कुराते हुए) क्या पापा आप भी न, पहले गर्लफ्रेंड और अब पत्नी

मोहनलाल: न तू मैंने तुम्हे गर्लफ्रेंड बनने के लिए कहा था और न hi मैं तुम्हे पत्नी बनने के लिए कह रहा हु. ये सब तुम्हारी वजह से हो रहा है और मुझे अपनी बेटी का पति बनना पद रहा है.

रुचिका: (मुस्कराते हुए) मैं इतनी बुरी भी नहीं हु की आप की पत्नी न बन सकू.

मोहनलाल: (खीजते हुए) अब ट्रैन में सब के सामने चुप hi रहना और बाकि मैं संभल लूंगा

रुचिका: किसी ने फिर भी पूछ लिया की मैं आपकी क्या लगाती हु

मोहनलाल: पहली बात तू कोई पूछेगा नहीं और अगर पूछेगा तू तुम्हे अपने आप को मेरी पत्नी hi कहना पड़ेगा और वंहा पंहुच कर हम एक अलग होटल लेंगे जंहा पर हम बाप बेटी होंगे न की पति पत्नी.

रुचिका: लेकिन दूसरे होटल में तू पैसे देने पड़ेंगे और कुछ भी फ्री नहीं होगा

मोहनलाल: लेकिन जूथ तू नहीं बोलना पड़ेगा न और देखो तुम दोनों की मेहरबानी से भुगतना मुझे पड़ेगा.

रुचिका: (उदास होते हुए) मैंने क्या किया

मोहनलाल: नहीं मैंने किया है. मैंने कहा था न तुम्हे अपनी सहेली के सामने अपने आप को मेरी गर्लफ्रेंड कहने के लिए और मैंने hi बताया था न की कपल का मतलब क्या होता है. जब मैं मन कर रहा था तू तुमने hi अपनी माँ को बताया था न इसका मतलब, जिसको सुनकर उसने जबरदस्ती तुम्हे मेरे साथ भेझ दिया. मैंने कहा था की तुम जाओगी तू पैसे लगेंगे नहीं तुम्हारी माँ ने कहा की जब सब फ्री में है तू फिर क्योँ पैसे लगेंगे. मैं तू नासमझ हु, तुम दोनों hi समझदार हो.

मोहनलाल की ऐसी बातें सुनकर रुचिका की आँखों में आंसू आ जाते हैं और वो कहती है "मानती हु की सब गलती मेरी है, बस आप मुझे वापिस भेज दो और मैं आपको कभी नहीं कंहूगी की मुझे कनिह घूमने के लिए"

मोहनलाल: अब ये नया ड्रामा है की वापिस भेज दो

रुचिका: (रोटी हुए) मैं कोई ड्रामा नहीं कर रही, जब आपको मेरा साथ पसंद hi नहीं है तू और क्या करू, वापिस चली जाती हु

मोहनलाल: अब रोना क्योँ शुरू कर दिया, मैंने ऐसा क्या कह दिया, मैं तू सिर्फ हकीकत बयां कर रहा था.

रुचिका: (रोटी हुए) मैंने कब कहा था की मुझे लेकर चलो, मैं तू माँ के कहने पर आई हु. मुझे क्या पता था की मुझे माँ की टिकट पर ट्रेवल करना पड़ेगा

मोहनलाल रुचिका को रोटा हुआ देखकर पिघल गए और बड़े प्यार से उसके सर पर हाथ रखकर उससे चुप करने लगे "रौ मत न, अच्छा चलो चुप हो जाओ"

रुचिका: (सुबकते हुए) मेरी क्या गलती है न तू माँ ने बताया और न hi आप ने. अगर आप hi बता देते तू मैं आती hi नहीं

मोहनलाल उसकी आँखों से अपनी उँगलियों की मदद से आंसू पोंछते हुए बड़े प्यार से कहा "मैंने तू बस इतना hi कहा था की ये सब तुम्हारी कपल की डेफिनिशन की वजह से हुआ है और तुम इसमें अपने आप को जयादा दोषी मत मनो, बस शांत हो जाओ और सोचते है की आगे क्या करना है"

रुचिका: मैं वापिस चली जाउंगी तू सब ठीक हो जायेगा

मोहनलाल: (उसके चेरे को अपने हाथों में लेकर उसकी आँखों में झांककर) तुमने ये कैसे कह दिया की वापिस चली जाओगी और तुम जानती हो न की मैं तुम्हे सपने में भी अकेले नहीं जाने दूंगा तू तुमने ये कैसे कह दिया

रुचिका: मैं आपको परेशानी में नहीं डालना चाहती.

मोहनलाल: (उसके गाल को सहलाते हुए) परेशानी तब तक थी जब तक तुम्हे पता नहीं था, अब किस बात की परेशानी

रुचिका: वो हस्बैंड वाइफ वाला

मोहनलाल: (उसके गाल को बड़े प्यार से सहलाते हुए उसकी आँखों में झांकते हुए) क्यों मेरी पत्नी का नाटक करने में परेशानी है. ये सिर्फ ट्रैन के पंहुचने तक

रुचिका: (पलके झुककर) मुझे नहीं आपको परेशानी हो रही थी

मोहनलाल: (उसकी ठुड्ढी के नीचे उंगली रखकर उसके चेहरे को ऊपर उठकर) परेशानी तुम्हे थी तभी तू तुम बार बार पूछ रही थी की सर और मैडम का मतलब

रुचिका: ( अपनी पलकों को उठाकर मोहनलाल को देखते हुए) वो तू मुझे बड़ा अजीब लगा था तू पूछ लिया था.

मोहनलाल: (उसकी आँखों में देखते हुए और उसको चढ़ते हुए) अब तू पता लग गया न मेरी मैडम

रुचिका: (अपने चेहरे को मोहनलाल के चौड़े सीने में छुपाते हुए) पापा आप भी न

मोहनलाल: (उसके सर के पीछे हाथ फेरते हुए) वैसे कोनसे वाले पापा, तुम्हारी सहेली वाले या तुम्हारे वाले

रुचिका: मेरे वाले, लेकिन मेरी सहेली ने कुछ गलत नहीं कहा था. आप भी तू हमेशा मेरी तारीफ करते रहते हो

मोहनलाल: (हाथ को सर से पीठ और कंधे पर ले जाते हुए) अब मेरी बेबी डॉल है hi इतनी अच्छी है तू उसकी तारीफ क्यों नहीं करूँगा.

रुचिका: (अपने चेरे को ऊपर उठाते हुए) अभी मैं आपकी बेबी डॉल नहीं आपकी वाइफ हु.

मोहनलाल: (उसके कंधे को सहलाते हुए) तुम हमेशा मेरी बेबी डॉल पहले हो, बाकि सब बाद में और वाइफ नहीं हो बल्कि उसका नाटक कर रही हो

रुचिका: (अपने हाथ को मोहनलाल के सीने पर रखते हुए उसकी आँखों में झांकते हुए) नाटक असली तू लग्न चाहिए न

मोहनलाल: नाटक बाकियों के सामने करना है न की अकेले में और वो भी सिर्फ ट्रैन के पंहुचने तक

रुचिका: उसके बाद

मोहनलाल: उसके बाद किसी होटल में कमरा दुह्ढेगे और फिर 3 दिन बाद वापिस आ जायेंगे.

रुचिका: कितना खर्चा हो जायेगा

मोहनलाल: कोई 15 से 20 हज़ार

रुचिका: क्या?

मोहनलाल: इससे जयादा भी हो सकता है

रुचिका: ये तू बहुत जयादा है

मोहनलाल: ये तू बहुत काम है और जिस होटल में हमारी बुकिंग है, उस लेवल के होटल के हिसाब से काम से काम 35-40 हज़ार

रुचिका: मतलब की हमें पैसा भी खर्चना पड़ेगा और होटल भी निचले दर्जे का होगा

मोहनलाल: इसके आलावा ये ट्रैन की टिकट के पैसे भी देने पड़ेंगे और जिस काम के लिए आया हु वो भी जायेगा.

रुचिका: काम का नुक्सान क्योँ होगा

मोहनलाल: जब मैं वंहा जाऊंगा hi नहीं तू बिज़नेस डील कैसे करूँगा

रुचिका: आप मुझे छोड़कर काम पर चले जाना

मोहनलाल: (हँसते हुए) ये मुमकिन नहीं है, क्योँकि अगर मैं डील के लिए जाऊंगा तू फिर मुझे उस होटल में रहना पड़ेगा और तुम्हे क्या अकेले छोड़ दू, ये पॉसिबल नहीं है

रुचिका: आप अगर नहीं जाते तू बिज़नेस डील नहीं होगी तू वो भी तू नुक्सान होगा

मोहनलाल: हाँ होगा कोई 1 से 10 लाख तक का नुकसान होगा

रुचिका: आप एक काम करो, आप मुझे किसी भी होटल में तेरा दो और आप वंहा जाकर रह लो और डील कर लो, मैं अकेली रह लुंगी

मोहनलाल: ये नहीं हो सकता और सोचना भी मत. ये समझ लो की हम घूमने आये हैं और अपने खर्चे पर घूम कर चले जायेंगे

रुचिका: लेकिन इतना बड़ा नुक्सान

मोहनलाल: तुम उसकी चिंता न करो, ऐसे बहुत से मौके आएंगे और अपने आप को इसके लिए दोषी मत मनो

रुचिका: आप मेरे लिए इतना कुछ खोने के लिए तैयार हो

मोहनलाल: (जो हाथ कंधे पर था उस से रुचिका को अपनी तरफ खींचते हुए) तुम मेरी जान हो, तुम्हारे लिए तू मैं कुछ भी कर सकता हु, ये नुक्सान तू कुछ भी नहीं है.

रुचिका: ऐसा करते हैं हम वापिस चले जाते हैं, कुछ नुक्सान तू बच जायेगा

मोहनलाल: (हँसते हुए) अपनी माँ को क्या बोलोगी क्योँ वापिस आ गए

रुचिका: बता देंगे की वो टूर कपल के लिए था और हम कपल नहीं हैं, इसलिए वापिस आ गए.

मोहनलाल: (हँसते हुए) तुम्हारी माँ कहेगी की हम दोनों की मिली भगत थी और जान बुझ कर तुमने कपल की डेफिनिशन गलत बताई ताकि हम दोनों उसको बेवकूफ बनाकर घूम सको. इसका परिणाम ये होगा की तुम्हे तुम्हारी माँ मेरे साथ जाना तू दूर कभी मुझसे मिलने भी नहीं देगी और हो सकता है की मैं फिर कभी तुम से मिल hi न पौन

रुचिका: (मोहनलाल के गले लगते हुए) नहीं नहीं वापिस नहीं जायेंगे और माँ को कुछ नहीं बताना है

मोहनलाल: (रुचिका की पीठ पर हाथ फेरते हुए) तुम तू माँ को सबकुछ बताने में विश्वास रखती हो तू बता देना मैं न चाहते हुए भी तुम से फिर कभी नहीं मिलूंगा. हाँ फ़ोन पर बात कर लूंगा

रुचिका: (और जोर से मोहनलाल के गले लगते हुए, अब उसके उभारों ने मोहनलाल के सीने पर दबाव डालकर उस की सोई हुई भावनाएं फिर से जगानी शुरू कर दी थी) नहीं मुझे आपसे दूर नहीं रहना, इसलिए वापिस नहीं जायेंगे, अब तू तीन दिन बाद hi जायेंगे

मोहनलाल: (उसकी पीठ को हलके हाथ से सहलाते हुए ताकि रुचिका को उसकी भावनाएं पता न लगे) जैसे तुम कहो, ठीक है फिर ट्रैन से उत्तर कर अलग होटल में जगह ले लेंगे और तीन दिन घूमकर वापिस आएंगे

रुचिका: (मोहनलाल के सीने में अपना चेरे को छुपाये हुए) अगर हम पति पत्नी का नाटक कर ले तू

मोहनलाल: (रुचिका की पीठ पर हाथ फेरते हुए) तब हम उस होटल में रह सकते हैं और वंहा की साडी सुख सुविधाओं को भोग सकते हैं, लेकिन ये इतना आसान नहीं है

रुचिका: क्यों आसान नहीं हैं

मोहनलाल: देख लो एक बार अगर ये कह दिया की हम पति पत्नी हैं तू फिर लोगों को कभी नहीं बता पाएंगे की हम बाप बेटी है, नहीं तू बहुत बदनामी होगी और हो सकता है की हम दोनों को जेल भी हो जाये.

मोहनलाल की बात सुनकर रुचिका जो अभी तक उसके सीने से लगी हुई थी और शर्म के मरे सर नहीं उठा पा रही थी, थोड़ी सी परेशान तू हो गयी और सोचने लगी की क्या करना चाहिए.

उसने सोचा की "अगर बेटी बन कर जाती हु तू काफी पैसे भी खर्च हो जायेंगे और उस दर्जे का होटल भी नहीं होगा तू मजा भी हो सकता है की न आये और हर वक़्त कुछ भी खाने या करने से पहले पैसे का पूछना पड़ेगा और उसके पापा को बिज़नेस में भी नुक्सान होगा.

अगर वो पत्नी बन कर जाती है तू होटल भी अच्छे दर्जे का और साडी सुख सुविधाओं के साथ बिना पैसे के और बिज़नेस डील भी तू नुक्सान क्या है. पत्नी बनकर लोगों के सामने अपनी आइडेंटिटी को भूलना पड़ेगा और जिन भी लोगों से मुलाकात होगी उनसे कभी भी जिंदगी में अपने एक्चुअल रिश्ते को किसी भी कीमत पर उजागर नहीं करना. लेकिन क्या मैं इनकी पत्नी लगती भी हु?

उससे अपनी सहेली की बात याद आने लगी की मैं इनकी गर्लफ्रेंड हु, सोचकर hi मुझे गुदगुदी होने लगती है. मतलब की अगर मैं गर्लफ्रेंड हो सकती हु तू पत्नी भी हो सकती हु. ये बात सोचते hi मुझे अजीब सी फीलिंग हो रही है. पापा की पत्नी! क्योँ मुझे ये सोचते hi अच्छा लग रहा है!

पत्नी बनने के लिए मुझे बहुत कुछ अपने आप को चेंज करना पड़ेगा, क्या कर पाऊँगी? मन के कोने से आवाज आयी कोशिश करने में क्या हर्ज़ है. तभी दिमाग़ ने चेतावनी दी जल्दीबाजी में अपने हाथ जला बैठोगे, ऐसी बेवकूफी न करो. मन ने कहा की क्या हो जायेगा तू दिमाग़ ने कहा तुम नासमझ हो और पत्नी बनना गुड्डे गुड़िया का खेल नहीं है और ये तुम्हारे लिए एक दलदल की तरह होगा जिसमे तुम निकलने की कोशिश करोगी तू और जयादा धंसती चली जाओगी"
 
अपडेट 22

उसने सोचा की "अगर बेटी बन कर जाती हु तू काफी पैसे भी खर्च हो जायेंगे और उस दर्जे का होटल भी नहीं होगा तू मजा भी हो सकता है की न आये और हर वक़्त कुछ भी खाने या करने से पहले पैसे का पूछना पड़ेगा और उसके पापा को बिज़नेस में भी नुक्सान होगा.

अगर वो पत्नी बन कर जाती है तू होटल भी अच्छे दर्जे का और साडी सुख सुविधाओं के साथ बिना पैसे के और बिज़नेस डील भी तू नुक्सान क्या है. पत्नी बनकर लोगों के सामने अपनी आइडेंटिटी को भूलना पड़ेगा और जिन भी लोगों से मुलाकात होगी उनसे कभी भी जिंदगी में अपने एक्चुअल रिश्ते को किसी भी कीमत पर उजागर नहीं करना. क्या मैं कर पाऊँगी? लेकिन उससे पहले क्या मैं इनकी पत्नी लगती भी हु?

उससे अपनी सहेली की बात याद आने लगी की मैं इनकी गर्लफ्रेंड हु, सोचकर hi मुझे गुदगुदी होने लगती है. मतलब की अगर मैं गर्लफ्रेंड हो सकती हु तू पत्नी भी हो सकती हु. ये बात सोचते hi मुझे अजीब सी फीलिंग हो रही है. पापा की पत्नी! क्योँ मुझे ये सोचते hi अच्छा लग रहा है!

पत्नी बनने के लिए मुझे बहुत कुछ अपने आप को चेंज करना पड़ेगा, क्या कर पाऊँगी? मन के कोने से आवाज आयी कोशिश करने में क्या हर्ज़ है. तभी दिमाग़ ने चेतावनी दी जल्दीबाजी में अपने हाथ जला बैठोगे, ऐसी बेवकूफी न करो. मन ने कहा की क्या हो जायेगा तू दिमाग़ ने कहा तुम नासमझ हो और पत्नी बनना गुड्डे गुड़िया का खेल नहीं है और ये तुम्हारे लिए एक दलदल की तरह होगा जिसमे तुम एक बार जाने के बाद अगर निकलने की कोशिश करोगी तू और जयादा धंसती चली जाओगी"

जब तक रुचिका अपनी सोचो में गम थी उन पालो में उसका सर मोहनलाल के सीने पर था और उसकी साँसों को मोहनलाल अपनी छाती पर महसूस कर रहा था और उन साँसों के उतर चढाव से उसका रकत परवाह भी बढ़ने लगा और उसकी भावनाएं भड़कने लगी और उसका मन कर रहा था की ये पल यही रुक जाये. उसका मन छह रहा था की उसको अपने से जकड कर लिप्त ले लेकिन उससे दर भी लग रहा था की कहीं रुचिका बुरा न मान जाये. अभी कुछ और सोचता उससे पहले hi रुचिका ने हलकी सी आवाज़ में कहा "हम पति पत्नी बनकर चलते हैं"

मोहनलाल ने पूछा "क्या कह रही हो"

रुचिका: अपने कहा था न की हमारे चेरो पर तू लिखा नहीं है की हमारा रिश्ता क्या है तू फिर क्योँ बिना बात के पैसे खर्च करे और बिज़नेस का भी नुक्सान झेले

मोहनलाल: एक बार फिर सोच लो, क्योँकि तुम जो भी फैसला लो अछि तरह से सोच समझ कर लो, ऐसा न हो की बाद में पछताना पड़े.

रुचिका: (अपने चेहरे को उठाकर) मैंने सोच लिया है, नाटक hi तू करना है वो भी बस तीन दिन

मोहनलाल: (उसके सर पर हाथ फेरते हुए) ठीक है अगर तुमने डीडे कर लिया है तू नाटक कर लेते हैं, लेकिन मैं अभी भी कहूंगा की हम ट्रैन से उत्तर कर दूसरे होटल में चले जाते हैं.

रुचिका: नहीं पापा, अब हम पति पत्नी बनकर hi उसी होटल में जायेंगे

मोहनलाल: अपने पति को पापा बुलाकर

रुचिका: (हँसते हुए) अभी तू हम अकेले हैं तू पापा कह सकती हु न

मोहनलाल: मुझे तू कोई आपत्ति नहीं, लेकिन अगर नाटक करना है तू अपने करैक्टर को भुला कर नाटक के करैक्टर को अपनाना पड़ेगा क्योँकि अगर कहीं गलती से भी कुछ और मुंह से निकल गया तू बहुत मुश्किल हो जाएगी. इसलिए अगर नाटक करना है तू वो किसीको भी ऐसा लग्न चाहिए जैसे की वो सबकुछ ओरिजिनल हो और शक की कोई गुंजाईश न हो

रुचिका: पापा, मैं आपकी बात अच्छे से समझ गयी हु

मोहनलाल: बात समझ गयी होती तू पापा नहीं बुलाती

रुचिका: Ok okay पापा, अब नहीं कंहूगी (और बोलकर खुद hi हंसने लगी और फिर सोचते हुए सीरियस होकर) पापा, फिर आपको क्या कहकर बुलाऊँ

मोहनलाल: बीटा ये तू तुम सोचो की क्या बुलाना चाहिए

रुचिका: (हँसते हुए) पापा आप भी मुझे बीटा बुला रहे हो

रुचिका की बात सुनकर दोनों hi हंसने लगे और मोहनलाल ने रुचिका को अपने आगोश में लेकर थोड़ा भींचते हुए उससे कहा "हम दोनों hi गलती कर रहे हैं और एक दूसरे को पापा और बेटी कह राजे हैं, अगर गलती से भी दुसरो के सामने हमारे मुंह से निकल गया तू बहुत बदनामी होगी. अब हमारे सामने दो रस्ते हैं, या तू हम बाप बेटी बनकर दूसरे होटल में चले जाते हैं नहीं तू हमें अपने इस रिश्ते को भूलकर पति पत्नी वाले रिश्ते के नाटक में अपने आप को समर्पित कर दे"

रुचिका जिसके उभारों का मोहनलाल की चौड़ी छाती में दबने के एहसास ने उसके मन में थोड़ी हलचल मचा दी थी उससे अजीब तू लग रहा था लेकिन नै नै जवान हुई रुचिका के मन के तारों में जवान होने की दस्तक दे दी और उसके दिल की धड़कन थोड़ी सी बढ़ गयी. उसने अपने मन में सोचा की ये क्या हो रहा है, एक बार तू उससे लगा की आगे बढ़ना ठीक नहीं है, लेकिन उसके मन ने कहा छोटी मोती तकलीफों से दरोगी तू फिर तुम्हारे निर्णय का क्या होगा. ये सोच आते hi उसने सोचा की जो होगा देखा जायेगा, एक बार उसके दिमाग़ ने फिर चेताया की दलदल से बचो लेकिन दिमाग़ की चेतावनी को नजर अंदाज करते हुए अपने चेरे पर दृढ निश्चय करते हुए उसने मोहनलाल से कहा "पापा अब से मैं सिर्फ और सिर्फ आप की पत्नी न की बेटी"

मोहनलाल ने उसकी बात सुनी तू उसके चेहरे पर मुस्कहरात आ गयी और कहा "पापा की पत्नी"

रुचिका: (बात समझ आते hi मुस्कराई और उसी अंदाज में) नहीं आप बेटी के पति

मोहनलाल उसकी बात सुनकर उसको और कास लेते हैं और उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहने लगे "मैं बेटी का पति और तुम पापा की पत्नी"

रुचिका को अपने उभारों के और जयादा दबने से इस बार झटका भी लगा और शर्म भी आने लगी और अपनी शर्म को छुपाते हुए "पापा आप सही कह रहे हो लेकिन आप hi बताओ की क्या करें ताकि किसी को हमारे एक्चुअल रिश्ते का पता न चले"

मोहनलाल उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसकी आँखों में झंकार कहने लगा "सबसे पहले तू हमें एक दूसरे को पापा और बेटी कहना छोड़ना पड़ेगा और ऐसा बेहवे करना पड़ेगा जैसे एक पति पत्नी करते हैं"

रुचिका: पापा आप जैसे कहोगे मैं वैसे hi करुँगी

मोहनलाल: सबसे पहले तू पापा कहना बंद करना पड़ेगा.

रुचिका: अकेले में भी

मोहनलाल: अब से लेकर जब तक हमारा टूर ख़तम नहीं होता तुम मुझे पापा नहीं कहोगी और मैं तुम्हे बेटी नहीं कहूंगा

रुचिका: मतलब अब आप मुझे वैसा प्यार नहीं करोगे जैसे पहले करते थे

मोहनलाल: (उसके माथे को चूमते हुए) तुम मेरी जान हो, अपने आप को बेटी कहो या पत्नी मेरे लिए तुम वही रुचिका हो और तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकता हु और कभी मत समझना की पत्नी बनने के बाद तुम लाड नहीं कर पाओगी. मेरे लिए तुम हमेशा वही गुड़िया रहोगी मेरी बेबी डॉल

रुचिका: थैंक्स पापा, लेकिन मैं आपकी पत्नी नहीं बल्कि उसका नाटक करने जा रही हु. इस नाटक को करने में आपको तू प्रॉब्लम नहीं है क्योंकि आप तू मुझे पहले भी और अब भी रुचिका कह कर बुला सकते हो, लेकिन समस्या तू मेरी है, इसलिए अब आप hi बताओ मैं आपको क्या कहकर बुलाऊँ

मोहनलाल: मेरे नाम से बुला सकती हो

रुचिका: (एकदम से शर्मा जाती है) नहीं नहीं मैं आपका नाम नहीं ले सकती

मोहनलाल: क्योँ नहीं ले सकती

रुचिका: पत्नी कोई अपने पति का नाम लेती है

मोहनलाल: क्योँ नहीं लेती

रुचिका: (शर्माकर अपने चेहरे को फिर से मोहनलाल की छाती में छुपा लेती है और अपने सर को इधर उधर करते हुए) नहीं कुछ और बताओ.

रुचिका के सर को इधर उधर करने से उसकी नाक मोहनलाल की छथि पर रगड़ने से उसकी भावनाओं को एकदम से भड़का गयी तू उसके हाथों ने उसकी पीठ पर पंहुचकर उसको सहलाते हुए अपनी तरफ खींच रहे थे जिससे रुचिका मोहनलाल के और निकट आ गयी और उसके ऊपरी शरीर के कई हिस्से अपने पापा के शरीर से रगड़ खाने लगे तू उसको भी एक अलग hi अनुभूति होने लगी. ये अनुभूति उसके लिए बिलकुल hi अलग थी लेकिन उससे सुखद लग रही थी. तभी मोहनलाल ने उसकी अनुभूति के पालो में खलल डालते हुए कहा "देखो आजकल ज़माना बदल गया है, पत्नी अपने पति का नाम लेती है और अगर तुम भी लोगी तू मुझे कोई दिक्कत नहीं है"

रुचिका के गाल अब मोहनलाल की छाती से लगे हुए थे और उसने धीरे से कहा "मैं आपका नाम नहीं ले सकती, आप मेरे पापा भी तू है"

मोहनलाल नहीं चाहता था की अभी कुछ और आगे बड़ा जाये क्योँकि उससे अब उसकी भावनाओं पर नियंत्रण छुटता जा रहा था इसलिए उसने अपने मन को समझाया और वो रुचिका के कन्धों को पकड़कर खड़ा हो गया और उसने रुचिका को भी खड़ा कर दिया और कन्धों को पकडे पकडे उससे पूछा "बीटा मैं आखिरी बार पूछ रहा हु की क्या तुम वाक़ई में मेरी पत्नी बनने का नाटक करना चाहती हो" रुचिका ने इसके जवाब में बस इतना hi कहा "हाँ"

तब मोहनलाल ने उससे कहा की "रुचिका अब से लेकर टूर ख़तम होने तक तुम मेरी पत्नी हो, बेटी नहीं और मैं अब से तुम्हे सिर्फ और सिर्फ पत्नी की तरह ट्रीट करूँगा और तुम मुझे मेरे नाम से बुला सकती हो"

रुचिका ने पलके झुकाये हुए कहा "मैं भी आप को पति hi मानूंगी लेकिन नाम नहीं ले सकती"

मोहनलाल ने कहा की "तुम नाम लेने से इतना परेहज कर रही हो तू फिर तुम्हारे लिए पत्नी बनना मुश्किल हो जायेगा, इसलिए पत्नी बनना है तू काम से काम एक बार तू मुझे नाम से बुलाओ"

रुचिका सोच में पद गयी और अपने आप से इस बात पर बहस करने लगी और फिर उसने धीरे से कहा "नहीं नाम नहीं"

मोहनलाल ने कहा "ठीक है फिर हम कपल बनकर नहीं चलेंगे और ट्रैन से उत्तर कर किसी नए होटल में जायेंगे और बाप बेटी बनकर जायेंगे"

मोहनलाल की बात सुनकर पता नहीं रुचिका क्या सोचने लगी और उसकी सोच की वजह से उसके सांस की गति बढ़ने लगी, जिससे उसके उरोज ऊपर नीचे होने लगे और बड़ा hi मनमोहक दृश्य उत्तपन कर रहे थे. कुछ देर और सोचने के बाद उसको पता नहीं क्या हुआ और बड़ी हिम्मत करके नज़र नीचे करके धीरे से "M..ooo..h.h.aa....n"

मोहनलाल ने मज़ा लेते हुए उससे कहा "थोड़ा तेज़ बोलो न, सुनाई नहीं दिया" रुचिका एक डैम से शर्मा गयी और एकदम से मोहनलाल के गले लग गयी और एक बार फिर से "M..o..o..h..aa..nn" और ये कहकर अपने चेरे को मोहनलाल की छाती में छुपा लिया और अपने हाथों को उसकी पीठ पर लेजाकर कास लिया और उसके उभारों ने मोहनलाल की छथि में धंस कर मोहनलाल के हृदये में उथल पुथल मच दी और उसके हाथ भी रुचिका की पीठ पर पंहुचकर उससे अपने से कास लिया और उसके माथे को चूमकर कहा "मेरी Jàan, मेरी बीवी रुचिका"
 
वेलकम तो थे थ्रेड.

कहानी पढ़ने उससे पसंद करने और बहुत अचे सुझाव देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.

आप चिंता न करें, आपके सुझाव बिलकुल सही हैं और कहानी में वो सब कुछ होगा जो आप चाहते हैं, बल्कि उससे भी जयादा होगा, लेकिन ये स्लो सेडक्टिव स्टोरी है, इसलिए अभी धीरे धीरे.

थोड़ा इंतज़ार और साथ बनाये रखिये.

धन्यवाद्
 
वेलकम तो थे थ्रेड.

आप इस कहानी पर आये, पढ़ा और पसंद किया, मुझे बहुत ख़ुशी हुई.

आपकी बात बिलकुल सही है की अपडेट जल्दी आने से मज़ा ज्यादा आता है. आपको एक बात बताना चाहूंगी की एक उम्दा अपडेट को लिखने में काम से काम 5 से 6 घंटे लगते हैं.

मैं कभी भी अपडेट को डिले करने में विश्वास नहीं रखती.

अगर जयादा जल्दी अपडेट दूंगी तू उस से न तू अपडेट में क्वालिटी आएगी और अपडेट भी छोटा हो जायेगा.

बाकि आप जैसा कहेगे वैसे hi होगा, लेकिन मैं क्वालिटी से कोम्प्रोमाईज़ नहीं करुँगी.

कोशिश होगी की और जयादा जल्दी आपको अपडेट दे सकू

साथ बनाये रखिये.

धन्यवाद्
 
आपका बहुत बहुत शुक्रिया की आपने मेरी बात समझी.

अगर आप देखेंगे तू मैं आपको डेली अपडेट देने की कोशिश करती हु, अगर नहीं दे पति तू एक दिन छोड़कर दिया है और आगे भी यही कोशिश रहेगी.

अब देखो कल hi एक अपडेट दिया है और आज रात को भी एक अपडेट देने की पूरी पूरी कोशिश है.

मुझे भी आप सब को इंतज़ार करने की कोई इच्छा नहीं.

बस थोड़ा सा पेशेंस और साथ बनाये रखिये, आप निराश नहीं होंगे.

धन्यवाद्
 
अपडेट 23

मोहनलाल ने मज़ा लेते हुए उससे कहा "थोड़ा तेज़ बोलो न, सुनाई नहीं दिया" रुचिका एक डैम से शर्मा गयी और एकदम से मोहनलाल के गले लग गयी और एक बार फिर से "M..o..o..h..aa..nn" और ये कहकर अपने चेरे को मोहनलाल की छाती में छुपा लिया और अपने हाथों को उसकी पीठ पर लेजाकर कास लिया और उसके उभारों ने मोहनलाल की छथि में धंस कर मोहनलाल के हृदये में उथल पुथल मच दी और उसके हाथ भी रुचिका की पीठ पर पंहुचकर उससे अपने से कास लिया और उसके माथे को चूमकर कहा "मेरी Jàan, मेरी बीवी रुचिका"

मोहनलाल को अभी अपनी सोचो में अपने और रुचिका के रिश्ते को याद करने देते हैं और हम चलते हैं वापिस घर और देखे की वंहा क्या खिचड़ी पाक रही है

रस्ते में संध्या ने आदित्य से पूछा की पानी पूरी कैसी थी तू आदित्य जो अपनी सोचो में खोया हुआ था बोलै "माँ आपकी उँगलियाँ बहुत मीठी हैं" संध्या एक बार तू शर्मा गयी लेकिन फिर उसने कहा "मैंने पानी पूरी के बारे में पूछा था" तब आदित्य ने कहा "माँ मुझे तू पानी पूरी का पता hi नहीं चला, मैं तू आपकी उँगलियों की मिठास में खोया हुआ था" उसकी बात सुनकर संध्या एक डैम से शर्मा गयी और उसकी पीठ पर मुक्का मरते हुए "घाट" कहकर चुप होकर बैठ गयी और बिच बिच में ब्रेक लगने पर वो आगे को खिसक जाती थी जिससे उसकी चूचियां आदित्य की पीठ पर डाब कर उसका हाल बुरा कर रही थी. एक बार तो माँ ने झटका लगने पर अपने गाल को भी उसकी गर्दन पर दबा दिया था, जिससे दोनों के साँसों की गति बढ़ गयी थी. फिर वो दोनों घर पहुंच गए. घर में ए तो संध्या आदित्य को अजीब नजर से देख रही थी और मुस्कुरा भी रही थी.

घर में दोनों अपने अपने कमरे में चले गए और दोनों के मन में एक अजीब सी कशिश थी. उनका मन कर रहा था की वो दोनों एक दूसरे के पास जाएँ और खूब बातें करते हुए निहारे लेकिन अपने रिश्ते की वजह से उन दोनों ने hi अपना मन मार लिया था.

संध्या अपने कमरे में आयी तू उसने जो सूट पहना हुआ था वो टाइट था, अपने आप को बदलने की वजह से पहन तू लिया था लेकिन टाइट होने की वजह से अब उससे दिक्कत हो रही थी. इसलिए उसने अपने कमरे का दरवाज़ा नन्द किया और कपडे बदलने के लिए उसने अपनी कमीज उतरी जो की बड़ी मुश्किल से उतरी थी और उसने फिर अपनी सलवार भी उतरी और आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर अपने आप को देखकर ये सोचने लगी "क्या आज भी मेरे जिस्म में वो बात है की जवान कड़का मुझे गर्लफ्रेंड बनाने पर तैयार हो गया है या मुझ पर तरस खा रहा है"

वो सोचने लगी की मेरे मन में ये बात क्योँ आ रही है तू उसने सोचा की "अगर वो मुझ पर तरस खा रहा है तू वो कोई जवान लड़की के मिलते hi मुझे छोड़ कर जा सकता है तू मैं क्या करुँगी" ये विचार मन में आते hi वो सिहर उठी लेकिन उससे एक तस्सली थी की आज मॉल में हुई आदित्य के दोस्त की गर्लफ्रेंड रिया की बात याद आने लगी की "आज तू रिश्तेदार है, अगली बार गर्लफ्रेंड बन कर आना" जब उसके मन में ये बात आयी तू उससे हंसी आ गयी की जवान लड़की को भी पता नहीं चला की "मैं आदित्य की माँ हु, बल्कि वो भी मुझे उसकी गर्लफ्रेंड समझ रही थी"

इसका मतलब की मैं अभी जवान लगाती हु, लेकिन कब तक, मुझे अपने आप को मेन्टेन करना पड़ेगा और आदित्य के साथ जयादा वक़्त गुज़ारना पड़ेगा ताकि उससे मौका न मिले किसी और के बारे में सोचने के लिए. लेकिन मन में ये विचार भी आया की वो कॉलेज तू जायेगा hi और वंहा पर इसकी कोई गर्लफ्रेंड हुई तू इसका झुकाव उसकी तरफ हो सकता है क्योंकि वो जवान भी होगी, पढ़ी लिखी भी होगी और सबसे बड़ी बात वो उसकी माँ नहीं होगी तू रिश्ते की शर्म भी नहीं होगी. मैं तू उम्र में बड़ी हु और माँ भी हु तू आदित्य कब तक मेरा साथ देगा, एक दिन अपने पापा की तरह मुझे अकेला छोड़ देगा.

नहीं नहीं आदित्य ऐसा नहीं है, उसने मुझे वादा किया है की वो मुझे अकेला नहीं छोड़ेगा और आज जब मेरे उरोज उसकी पीठ से डाब रहे थे तू उसकी उत्तेजना बढ़ रही थी तू क्या वो मेरी तरफ आकर्षित हो रहा है. हाँ वो बीच बीच में मुझे निहारता है और उसका नजरिया भी मुझे देखने का बदलने लगा है. उसने अपने आप को एक बार फिर देखा और उसका एक हाथ अपनी चूचियों पर चला गया और खुद hi उससे ब्रा के ऊपर से दबाने लगी तू उसने देखा की उसकी देइ चुकी थोड़ी लाल लग रही थी तू उससे याद आया की उसकी देइ चुकी बार बार आदित्य की पीठ से रगड़ खाने से làal हो गयी थी. उससे सोचकर hi शर्म आने लगी थी की उसके बेटे की वजह से उसकी चुकी लाल हो गयी है.

उसने पीठ के पीछे हाथ लेजाकर अपनी ब्रा को खोल दिया और अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को शीशे में देखकर उसे गुमान होने लगा की इस उम्र में भी वो किसी को भी अपने ऊपर लट्टू बना सकती है. उसने अपने दोनों चूचियों को आराम आराम से अपने हाथों से सहलाने लगी टी उससे नशा चने लगा और वो देइ चुकी को बड़े प्यार से सहलाती तू उससे लगता की आदित्य उससे सेहला रहा है और शर्म से अपनी आँखों को बंद कर लेती. फिर पता नहीं क्या हुआ की उसके दिमाग़ ने उससे चेतावनी दी आग से मत खेलो, पहले उसके काबिल बनो और पढाई पूरी करो.

ये याद आते hi उसने बिना ब्रा के ब्लाउज पहना और पेटीकोट पहनकर उसने एक हलकी सी सदी पहन ली और आराम से बीएड पर नैथ गयी और आँखें बंद कर ली और किसी गहरे चिंतन में चली गयी और उससे हलकी सी नींद आ गयी.

उधर जब आदित्य अपने कमरे में पंहुचा तू वो पहले से hi उत्तेजित था और वो सोच रहा था की उससे क्या हो रहा है. उसने आज तक इस तरह महसूस नहीं किया था, वो सोच रहा था की क्या वो अपनी माँ की तरफ अत्त्रक्ट हो रहा है तू उसके मन से आवाज आयी की 'हाँ'. उसने सोचा की ऐसा क्योँ हो रहा है क्योंकि वो अपनी माँ की बहुत इज़्ज़त करता था तू उसका इस तरह अत्त्रक्ट होना सही नहीं है.

जैसे उसके मन में ये आया तू उससे गलानि हुई की ये अट्रैक्शन क्यों हुई तू उससे याद आया की उसकी माँ ने उससे गर्लफ्रेंड बनने की बात कही थी. आदित्य ने आजतक किसी भी लड़की के बारे में इस तरह नहीं सोचा था क्योंकि वो अपनी पढ़ाई आउट खेलकूद में समय बिताया करता था. ये भी नहीं था की उसके कॉलेज में लड़कियां नहीं थी, बल्कि बहुत hi स्मार्ट स्मार्ट और खूबसूरत लड़कियां थी और ऐसा भी था की बहुत साडी उनमे से उसकी दोस्त बनना चाहती थी, लेकिन उसने कभी उन्हें घास नहीं डाली थी. फिर उससे अब अपनी माँ से क्यों अट्रैक्शन होने लगा तू उसके मन ने कहा की उसके मन में जिस लड़की का आकाश उसके सपनो में उभरता था वो और कोई नहीं उसकी माँ का hi होता था. उसके मन ने उससे समझा दिया की उससे अपनी माँ से अट्रैक्शन तू हो hi गया है बल्कि उससे भी कुछ जयादा एहसास होने लगा है.

उसके दिमाग़ ने उससे चेताया की वो तुम्हारी माँ है और आज वो तुम्हारी तरफ अत्त्रक्ट हुई है क्योंकि वो आज पहली बार अकेलापन महसूस कर रही है. उसका पति बहार चला गया है और अगले काम से काम 6 महीने बहार hi रेहगा, उसकी बेटी भी उससे दूर हो गयी है और तुम भी हो सकता है की जॉब मिलाने के बाद दूर चले जाओ, इसलिए ये अट्रैक्शन नहीं बल्कि अकेलेपन को दूर करने के लिए उसने अपने आप से समझौता कर लिया है. अगर ऐसा है तू उनका खुद को मेरी गर्लफ्रेंड कहना भी उस स्ट्रेटेजी का हिस्सा है. फिर तू हो सकता है की वो ये सब तक तक करेंगी जब तक पापा वापिस नहीं आ जाते या जब तक बो अकेली हैं.

ये तू बड़ी समस्या वाला काम है क्योंकि अब मैं अपने मन का क्या करूँ वो तू मुझे बहुत hi अच्छी लगने लगी हैं और मेरा दिल काट रहा है की उनको मैं सच्ची में गर्लफ्रेंड बना कर घूमने ले जॉन और जैसे मेरे दोस्त अपनी गर्लफ्रेंड के एन्जॉय करते हैं, मैं भी करूँ. दिमाग़ से आवाज़ आयी 'बेवकूफी न कर वो तुम्हारी माँ है' तू उसके जवाब में मन ने कहा 'मुझे तू वो सिर्फ एक लड़की नजर आ रही है और वो अब मैं उसके बगैर नहीं रह सकता'

दिमाग़ ने कहा 'जब तुमने खाई में गिरने का सोच लिया है तू मैं क्या कर सकता हु, सिर्फ समझा सकता हु, बाकि तुम्हारी मर्जी, लेकिन बाद में पछताना पड़े तो रोना मत की मैंने चरतया नहीं था'

आदित्य के दिल और दिमाग़ में लड़ाई चल रही थी, साथ में उसका दिमाग़ एक बात और भी समजहा रहा था की तुम तू अत्त्रक्ट हो गए अपनी माँ की खूबसूरती की वजह से लेकिन क्या तुम्हारी माँ भी तुम्हारी तरफ अत्त्रक्ट हो रही है या वो सिर्फ वक़्ती तौर पर तुम्हारे साथ के लिए ये कर रही है. अभी ये सोच hi रहा था की उससे याद आया की उसकी माँ ने अपनी चूचियों को उसकी पीठ पर कुछ जयादा hi जोर से दबाया था और वो भी एक बार नहीं बल्कि बहुत बार. अपनी माँ की चूचियों को अपनी पीठ पर होने के एहसास को याद करते हो उससे अपने अंदर एक नयी ऊर्जा का संचार होने लगा जिससे उसके लिंग में तनाव आना शुरू हो गया और उससे एक सुखद अनुभूति होने लगी और फिर उससे याद आया की उसकी माँ ने अपने गाल को उसके गाल पर अच्छे से रगड़ा था तू उसके शरीर से उठाने वाली खुस्भु ने उसके नथुनों से होकर उसके दिल और दिमाग़ में हलचल मचा दी थी. वापिस आने के बाद एक बड़ी अजीब सी स्माइल दी थी, ये सब सोचकर तू उसका लिंग झटके मरने लगा. उसने सोचा की ये क्या हो रहा है, उसके मन ने उससे समझा दिया की वो अब अपनी माँ की खूबसूरती में बह चूका है और अब इसका कोई इलाज नहीं बस उससे देखना है की अपनी माँ को कैसे पतये.

उसका लिंग लगातार झटके मार रहा था तू उसका हाथ अपनी जीन्स पर पंहुचकर उससे ऊपर से hi सहलाने लगा तू उसका लिंग और जयादा तन गया और जब उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था तू बो बाथरूम में चला गया और जीन्स का बटन और ज़िप को खोल दिया. जीन्स खोलकर अपनी जीन्स और अंडरवियर को नीचे करके लिंग को अपने हाथ में लेकर उससे सहलाने लगा. अपनी माँ के बदन को याद करने लगा, उससे लगा की उसकी माँ उसके पीछे आकर अपनी चूचियों को उसकी पीठ पर रगड़ रही है तू उसकी आँखें बंद हो गयी और फील करने लगा की उसकी माँ की बड़ी बड़ी नरम चूचियों ने उसकी पीठ पर रगड़ रगड़ कर उसकी उत्तेजना को बड़गा दिया.

उसने अपनी सोचो में माँ के हाथों को पकड़ कर अपने पेट पर रख दिए तू उससे लगा की उसकी माँ की चूचियों ने उसकी पीठ पर धंस कर उसके मन में खलबली मचा दी. जब उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था तू उसने ख्यालों में अपनी माँ को पकड़ कर आगे कर दिया तू वो क्या देखता है की उसकी माँ ने अपनी गर्दन नीचे की हुई है तू उसने माँ को पकड़ कर अपने गले से लगा लिया और उसका ब्लाउज खोलने लगा तू उसकी माँ ने थोड़ा विरोध किया लेकिन उसने जोर लगा कर उसका ब्लाउज खोल दिया और उसकी ब्रा भी एक झटके में उत्तर दी.

ख्यालों में अपनी माँ की चूचियों को इमेजिन करते हुए उन्हें चूमते हुए उनके निप्पल्स को पकड़ कर अपने मुंह में भर केता और उससे पहले चूमता और फिर बीच बीच में मुंह में भर लेता था. उसका लिंग अब टैंकर बिलकुल सीधा हो गया था तू उसने अपनी माँ का हाथ पकड़ कर अपने लिंग पर रखा तू उसने झटक दिया तू उसने फिर से अपनी माँ का हाथ पकड़ कर फिर से अपने लिंग पर रखा तू वो हटाने लगी तू उसने हटाने नहीं दिया और उसके हाथ से अपने लिंग के ऊपर उसका हाथ ऊपर नीचे करने लगा तू उसके लिंग की चमड़ी ऊपर नीचे होने लगी, जब उसने देखा की अब उसकी माँ अपना हाथ नहीं हटाएगी तू अपने हाथ को उठाकर उसकी चुकी को पकड़ लिया और उससे मसलने लगा.

ख्यालों में उसकी माँ उसके लिंग पर अपना हाथ ऊपर नीचे कर रही थी और वो उसकी चुकी से खेल रहा था. उसके आनंद की सीमा नहीं थी और फिर उसने अपनी माँ के कान में कहा की थोड़ा स्पीड बढ़ाओ न. उसकी बात सुनकर उसकी माँ उसके लिंग पर हाथ बतेजी से आगे पीछे करने लगी और वो मजे में उसकी चूचियों को मसल रहा था जिससे उसकी माँ को भी मज़ा आ रहा था क्योंकि उसकी माँ की साँसे तेज हो रही थी और लिंग पर रखे हाथ की स्पीड भी बढाती जा रही थी और अब वो पल भी जयादा दूर नहीं था जंहा स्खलन होना था. हुआ भी यही की ख्यालों में उसकी माँ का हाथ तेजी से चल रहा था लेकिन हकीकत में उसका खुद का हाथ अपने hi लिंग पर काफी तेजी से चल रहा था और वो वक़्त भी आ गया की उससे ख्यालों में लगा की उसके लिंग से निकली धार उसकी माँ की सदी को ख़राब कर गया लेकिन हकीकत में उसके लिंग से निकली धार बाथरूम के फर्श पर काफी दूर जाकर गिरी और उसके लिंग से इतना वीर्य निकला जितना आज तक नहीं निकला था. उससे ऐसा लगा की उसके शरीर से जैसे जान hi निकल गयी हो लेकिन उसका मन इतना आनंदित हुआ की उससे ऐसा लगा जैसे की वो आसमान में उड़द रहा हो.
 
अपडेट 24

ख्यालों में उसकी माँ उसके लिंग पर अपना हाथ ऊपर नीचे कर रही थी और वो उसकी चुकी से खेल रहा था. उसके आनंद की सीमा नहीं थी और फिर उसने अपनी माँ के कान में कहा की थोड़ा स्पीड बढ़ाओ न. उसकी बात सुनकर उसकी माँ उसके लिंग पर हाथ बतेजी से आगे पीछे करने लगी और वो मजे में उसकी चूचियों को मसल रहा था जिससे उसकी माँ को भी मज़ा आ रहा था क्योंकि उसकी माँ की साँसे तेज हो रही थी और लिंग पर रखे हाथ की स्पीड भी बढाती जा रही थी और अब वो पल भी जयादा दूर नहीं था जंहा स्खलन होना था. हुआ भी यही की ख्यालों में उसकी माँ का हाथ तेजी से चल रहा था लेकिन हकीकत में उसका खुद का हाथ अपने hi लिंग पर काफी तेजी से चल रहा था और वो वक़्त भी आ गया की उससे ख्यालों में लगा की उसके लिंग से निकली धार उसकी माँ की सदी को ख़राब कर गया लेकिन हकीकत में उसके लिंग से निकली धार बाथरूम के फर्श पर काफी दूर जाकर गिरी और उसके लिंग से इतना वीर्य निकला जितना आज तक नहीं निकला था. उससे ऐसा लगा की उसके शरीर से जैसे जान hi निकल गयी हो लेकिन उसका मन इतना आनंदित हुआ की उससे ऐसा लगा जैसे की वो आसमान में उड़द रहा हो.

आदित्य थोड़ी देर के बाद अपने लिंग को साफ़ करने के बाद कपडे ठीक करके कमरे में आकर बीएड पर लेत जाता है और आँखें बंद करके उस आनंद को अनुभव करता है जो उससे अभी थोड़ी देर पहले प्राप्त हुआ था. वो सोचता है की क्या ये हकीकत में संभव है? तू उससे ये मुश्किल लगने लगता है और उससे एक हद तक गलानि का भी अनुभव होता है की अपनी सगी माँ के बारे में उसने क्या क्या सोच लिया, लेकिन इस विचार को झटक कर वो ये सोचता है की उसकी माँ एक लड़की भी है और उससे भी आनंदित होने का पूरा पूरा अधिकार है.

वो अपने आप को धिक्कारता है की उससे आन्दित होने का अधिकार का मतलब ये नहीं की तुम बेटे होकर उसका नाज़ायज़ फायदा उठाओ. वो अपने आप से लड़ता रहता है और अंत में फैसला करता है की ख्यालों में वो उससे एक लड़की की तरह प्यार करेगा और हकीकत में उससे माँ वाली इज़्ज़त देगा और आने वाले वक़्त पर छोड़ देगा की आगे क्या होगा.

संध्या काफी देर सोने के बाद उठती है और देखती है की काफी समय हो गया है तू वो किचन में जाकर खाना बनती है, लेकिन आज उसका मन बार बार आदित्य को याद करता है और खाना बनने के बाद आज पहली बार उसके मन में आदित्य का सामना करने से शर्म आने लगती है. बड़ी हिम्मत करके वो आदित्य को बुलाती है और खाना खाने के लिए कहती है तू आदित्य अपने ख्यालों से बहार आते हुए खाने की टेबल पर आकर खाना खता है. बिच बिच में कनखियोँ से वो माँ को देखता है, उसमे सीधा देखने की हिम्मत नहीं होती और संध्या भी आदित्य को खाना कहते हुए बड़े चाव से देखती है.

खाना ख़तम करके आदित्य उठकर अपने कमरे में जाने लगता है तू संध्या उससे रोक लेती और कहती है की उससे कोई जरुरी बात करनी है.

आदित्य वंहा से उठकर सोफे पर बैठ जाता है और संध्या किचन का काम निपटा कर आती है और आदित्य से कहती है की उसने दंसवी करने का फैसला किया है और ये भी बताया की वो जल्दी से जल्दी करना चाहती है. आदित्य उसकी बात सुनकर मोबाइल पर अपने एक दोस्त से फ़ोन पर बात करता है और उसके बाद वो संध्या को बताता है की एक महीने बाद एग्जाम हैं या तू उसमे बैठ जाओ नहीं तू अगले साल.

संध्या उसकी बात सुनकर उससे कहती है की वो अभी करेगी तू आदित्य उससे कहता है की बहुत म्हणत करनी पड़ेगी. वो उससे कहती है की कोई कोचिंग ज्वाइन कर लेगी लेकिन इस बार hi करना है और सफल होना है. उसका निश्चय देखकर आदित्य भी चकित हो जाता hai.Vo अपने दोस्त से फिर बात करता है और उससे साडी बात कर लेता है और कोचिंग की बात भी कर लेता है. फिर आदित्य उससे बताता है की कोचिंग के आलावा भी घर पर बहुत पढ़ना पड़ेगा तू वो कहती है की सब भूलकर वो अब सिर्फ दंसवी करेगी और उससे अंग्रेजी भी साथ साथ सीखेगी.

आदित्य उससे आश्वासन देता है की उसकी पूरी सहायता कटेगा और सुबह जल्दी जाने का कहकर उससे सोने के लिए कहता है और सोफे से उठकर जाने लगता है. तभी संध्या उठाने लगती है तू वो गिराने को होती है तू आदित्य उससे संभल लेता है और पूछता है की क्या हुआ?

संध्या उससे कहती है की घुटने में दर्द हो रहा है तू वो उससे सहारा देकर उसके बैडरूम में ले जाता है और उससे लिटा कर घुटने पर हाथ से हलकी हलकी मालिश करने लगता है. संध्या उससे कहती है की ये दर्द मलहम लगाने से जायेगा जो ालमिरह में पड़ी है.

आदित्य जाकर ालमिरह खोलता है और जैसे hi खोलता है तू एक ब्रा निकल कर उसके ऊपर गिरती है तू वो उससे देखकर उत्तेजित होने लगता है और चुपचाप वापिस ालमिरह में रख देता है और मलहम निकलकर ले आता है.

मलहम लेकर वो संध्या से कहता है "माँ मैं लगा देता हु" संध्या मन करने लगती है और कहती है की वो खुद hi लगा लेगी. आदित्य कहता है "आप बस लेत जाओ मैं लगा देता हु" और उससे जबरदस्ती लिटा देता है.

आदित्य धीरे धीरे पेटीकोट को सदी समेत ऊपर करने लगता है तू संध्या उठकर बैठ जाती है और अपने हाथों से अपनी सदी को पकड़ कर और अपनी टैंगो से सदी को भींचते हुए कहती है "ये क्या कर रहा है'

Aditya"Mom इसको ऊपर नहीं करूँगा तू मलहम कैसे लगाऊंगा"

संध्या कहती है "नहीं रहने दे, मैं खुद कर लुंगी, तू जा यंहा से"

Aditya"Mom आप खुद अच्छे से नहीं कर पाओगी, इसलिए मैं लगा देता हु"

संध्या "तू समझाता क्योँ नहीं है, मुझे शर्म आती है"

आदित्य "माँ मुझसे क्या शर्माना और आपकी तकलीफ में भी आपका साथ मैं नहीं दूंगा तू और कौन देगा. आप मुझसे शर्माना छोडो और अपने घुटने का इलाज करवा लो"

संध्या बहुत दुविधा में थी तू आदित्य ने उसके कंधे पर हाथ रखा तू उसने अपना चढ़ा ऊपर उठाया तू आदित्य ने आँखों से इशारा करते हुए उससे आश्वासन दिया की कुछ नहीं होगा तू संध्या ने अपनी टांगों को ढीला छोड़ दिया और अपने हाथों को सदी पर से हटा लिया. आदित्य ने उससे लेटने के लिए कहा तू वो लेत गयी.

आदित्य ने धीरे धीरे उसकी सदी और पेटीकोट को ऊपर उठाना शुरू किया तू वो अपनी माँ के गोर गोर पैरों और बेदाग पिंडलियों को देखकर उसके मन में कुछ कुछ होने लगा. थोड़ी सी सदी और ऊपर की तू उससे अपनी माँ की दूध जैसी रंगत वाली टांगों को देखकर उसका मन करने लगा की हाथ लगाकर देखे लेकिन वो उसका विश्वास नहीं तोडना चाहता था इसलिए धीरे धीरे सदी को ऊपर करते हुए घुटनो से ऊपर तक कर दी तू उसने पहली बार नोट किया की उसकी माँ की टाँगे इतनी खूबसूरत हैं की उसका मन हाथ लगाना तो छोड़िये उसका मन कर रहा था की उससे चुम ले चाट ले, लेकिन उसने अपने ऊपर बहुत नियंत्रण किया और ऐसा कुछ भी न करने का मन बना लिया.

उसने मलहम को थोड़ा सा अपने हाथ की मदद से निकला और संध्या के घुटने पर जैसे hi हाथ रखा तू उसके मुंह से निकला 'आह' तू आदित्य ने पूछा की दर्द जयादा है तू उसने कहा 'नहीं मलहम लगा दो'

आदित्य ने अपने हाथ की उँगलियों से अपनी माँ के घुटने की कैप पर धीरे से मलहम को फ़ैलाने लगा तू संध्या के मुंह से 'आह... उह .' की आवाजे आने लगी तू आदित्य अपने हाथ को रोककर उसको देखने लगा तू देखा की उसकी आँखें बंद थी और चेरे पर बड़े hi अजीब से भाव थे जो समझ नहीं आ रहे थे की दर्द के हैं या आनंद के और सांस की गति भी बड़ी हुई थी. आदित्य ने पूछा 'दर्द जयादा हो रहा है' तू संध्या ने आँखें खोल कर कहा 'नहीं ठीक है, मालिश कर दो'

आदित्य ने फिर से अपने हाथ की मदद से उसके घुटने के ऊपर मलहम से हलकी हलकी मालिश करने से संध्या के मुंह से हलकी सिसकारियां निकल रही थी, जिससे सुनकर आदित्य जोश में आता जा रहा था और उसकी भी उत्तेजना धीरे धीरे बढ़ने लगी थी.

जैसे जैसे उत्तेजना बढ़ रही थी उसके हाथ ने मालिश करने की स्पीड भी बड़ा दी तू संध्या उसकी मालिश करने से मदहोश होती जा रही थी और उसके साँसों की गति बढ़ने से उसके उरोज जो ब्लाउज में बिना ब्रा के थे उछाल कूद मचा रहे थे. आदित्य की नज़र जैसे hi अपनी माँ के उरोजोनो पर पड़ी तू ये दृश्य देखकर उसका हाथ जंहा था वंही रुक गया और उसका रक्त पतवाह बढ़ने लगा और उसके लिंग में तनाव आना शुरू हो गया था.

मालिश रुकने से संध्या की आँखें खुल गयी और उसने आदित्य को अपनी तरफ इस तरह देखते पाकर एक बार तू उससे गुस्सा आया लेकिन दूसरे hi पल उससे याद आया की आदित्य को किसी दूसरी लड़की का दीवाना बनने से रोकना है तू उसने अनजान बनते हुए उससे पूछा 'मालिश क्योँ रोक दी'

आदित्य 'वो मैं पूछ रहा था की आपको मालिश से दर्द तू नहीं हो रहा'

संध्या 'नहीं अच्छा लग रहा है, तुम जल्दी से इस घुटने की करके दूसरे घुटने की भी मालिश कर दो'

आदित्य 'ठीक है पहले दूसरे घुटने पर भी मलहम लगा देता हु, आप एक तरफ पलट जाओ'

संध्या ने वैसा hi किया तू आदित्य ने दूसरे घुटने पर मलहम लगाकर मालिश करनी शुरू की तू संध्या की आँखें एक अजीब से आनंद को महसूस करके फिर से मुंड गयी और मालिश के साथ साथ उसके साँसों की गति और सिसकारियां बढ़ती जा रही थी और उसकी सिसकारियां से आदित्य के मन में हलचल मची हुई थी और न चाहते हुए भी उसका ध्यान अपनी माँ की छथि पर गया तू उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था.

उसने देखा की उसकी माँ की सदी का पल्लू एक साइड हो गया था और ब्लाउज में से चूचियों का बहुत बड़ा हिस्सा नंगा हो गया था और उसके रक्त परवाह को बढ़ाने से अब कोई नहीं रोक सकता था और उसका रक्त परवाह बढ़ कर उसके लिंग में तेजी से पंहुच कर उधम मचने लगा. आदित्य जोश में आ गया तू उसने उसी जोश में घुटने को कसकर पकड़ लिया जिससे संध्या ने बड़ी जोर से 'आउछ' बोलै तू उसका ध्यान टुटा तू उसने अपने आप को सँभालते हुए पूछा 'क्या हुआ'

संध्या की आँखों में दर्द की वजह से आंसू आ गए थे और उसने कहा की 'तुमने बहुत जोर से दबा दिया था जिससे दर्द हो रहा है'

आदित्य 'सॉरी सॉरी' और फिर बड़े प्यार से करने लगा. अब आदित्य पुरे हाथ की बजाये एक उंगली से घुटने के चरों और बड़े प्यार से घूमने लगा. जैसे hi उसकी ऊँगली घुटने के निचले हिस्से में पंहुचती और टांग के पिछले हिस्से में घूमती तू संध्या को ऐसा लगता जैसे की वो स्वर्ग में पंहुच गयी हो, उसकी भावनाओं ने भी अब भड़काना शुरू कर दिया था और उससे संभल नहीं रहा था और वो पलट कर सीढ़ी हो गयी.

जैसे hi वो सीढ़ी हुई तू उसकी चूचियां जो की बिना सदी के पल्लू के काफी हद तक नग्न हो चुकी थी वो आदित्य के सामने आ गयी और ब्रा न पहना होने की वजह से उरोजोनो की घुंडियां तक नज़र आ रही थी. इतना hi काफी था आदित्य के मन में उफान मचने के लिए. वो इस को जयादा न सेह पाया और अपनी नज़रे वंहा से हटा ली और उंगली की मदद से संध्या के घुटने पर फिर से मालिश करने लगा लेकिन बहुत hi धीरे धीरे. ऐसा लग रहा था की वो मालिश न होकर उंगली की मदद से अपनी माँ को सडके कर रहा हो और उसकी माँ भी इस आनंद के सागर में गोते खा रही थी.

थोड़ी देर और इस तरह करने के बाद अब आदित्य से बर्दाश्त नहीं हो रहा था और उससे लग रहा था की कहीं इससे आगे बढ़ने पर कुछ गलत न हो जाये तू उसने कहा "अब आप सो जाओ और मैं भी जा रहा हु". संध्या ने उसकी तरफ देखा, उसका मन तू कर रहा था की आदित्य इस खेल को चालू रखे, लेकिन नारी लज्जा ने उससे चेताया और उसने कहा "थैंक्स" तब आदित्य ने कहा "आप मुझे भी थैंक्स कहोगी तू कैसे चलेगा, इसलिए No थैंक्स, आपका मुझ पर पूरा अधिकार है, जब आप कहोगी मैं हाज़िर हो जाऊंगा" और इतना कहकर वो कमरे से निकल गया.
 
वेलकम तो थे थ्रेड.

मुझे बहुत ख़ुशी हुई की ये जानकार की आपने सिर्फ मुझे जवाब देने के लिए रजिस्टर किया है.

अब इससे बड़ा क्या इनाम होगा की आप जैसी सीरियस पाठक यंहा पर मेरी वजह से है.

वैसे आपने ठीक hi किया है क्योंकि इस फोरम पर बहुत सरे अच्छे लेखक हैं जिनकी कहानियां आपको बहुत पसंद आएँगी.

मैं पूरी कोशिश करुँगी की आपका यंहा आना सफल रहे.

बहुत बहुत धन्यवाद्
 
अपडेट 25

थोड़ी देर और इस तरह करने के बाद अब आदित्य से बर्दाश्त नहीं हो रहा था और उससे लग रहा था की कहीं इससे आगे बढ़ने पर कुछ गलत न हो जाये तू उसने कहा "अब आप सो जाओ और मैं भी जा रहा हु". संध्या ने उसकी तरफ देखा, उसका मन तू कर रहा था की आदित्य इस खेल को चालू रखे, लेकिन नारी लज्जा ने उससे चेताया और उसने कहा "थैंक्स" तब आदित्य ने कहा "आप मुझे भी थैंक्स कहोगी तू कैसे चलेगा, इसलिए No थैंक्स, आपका मुझ पर पूरा अधिकार है, जब आप कहोगी मैं हाज़िर हो जाऊंगा" और इतना कहकर वो कमरे से निकल गया.

वंहा से निकलकर अपने कमरे में आकर बीएड पर लेत कर अपने और माँ के रिश्ते के बारे में सोचने लगा और सोचते सोचते सो गया.

इसको सोने देते हैं और हम चलते हैं मोहनलाल के पास.

मोहनलाल ने मज़ा लेते हुए उससे कहा "थोड़ा तेज़ बोलो न, सुनाई नहीं दिया" रुचिका एक डैम से शर्मा गयी और एकदम से मोहनलाल के गले लग गयी और एक बार फिर से "M..o..o..h..aa..nn" और ये कहकर अपने चेरे को मोहनलाल की छाती में छुपा लिया और अपने हाथों को उसकी पीठ पर लेजाकर कास लिया और उसके उभारों ने मोहनलाल की छथि में धंस कर मोहनलाल के हृदये में उथल पुथल मच दी और उसके हाथ भी रुचिका की पीठ पर पंहुचकर उससे अपने से कास लिया और उसके माथे को चूमकर कहा "मेरी Jàan, मेरी बीवी रुचिका"

रुचिका ने जब अपने माथे पर मोहनलाल के होंठों का स्पर्श महसूस हुआ तू उसे वो स्पर्श आज कुछ अलग सा लग रहा था. उससे लगा की हो सकता है यह उसका वहां हो लेकिन यह स्पर्श उसके मन के तारों को चढ़ गया. यह स्पर्श था तू कुछ सेकण्ड्स का लेकिन उसका असर बहुत गहरा था और रुचिका का मन छह रहा था की काश ये स्पर्श थोड़ा लम्बा होता. उससे लगने लगा की शायद उसके पापा ने वो चुम्बन ऐसा लिया था जैसे शायद वो अपनी बीवी का लेते होंगे. उसके मन में एकदम से आया की वो उनकी बीवी का रोले hi तू कर रही है, इसलिए वो चुम्बन उसके पापा ने उसका पति बनकर लिया है. बात समझ आते hi उससे शर्म आने लगी और उसके हाथों की पकड़ अपने पापा की पीठ से ढीली हो गयी और वो उनसे अलग होकर पीठ करके कड़ी हो गयी और उसकी साँसे एकदम तेज़ चलने लगी.

मोहनलाल को पहले तू कुछ समझ नहीं आया, लेकिन फिर उससे ध्यान आया की रुचिका उसकी बेटी भी है और नै नै जवान हो रही है तू उसकी भावनाएं भड़कने में उसके हुग और माथे पर किश की वजह से हुआ है. उसको लगा की कहीं बात बिगड़ न जाये तू उसने आगे बढ़कर हलके से उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा "क्या हुआ रुचिका"

जैसे hi मोहनलाल ने उसके कंधे पर हाथ रखा तू उसकी साँसों की गति एकदम इतनी तेज हो गयी की उसके सीने पर दोनों उभारों ने ऊपर नीचे होना शुरू कर दिया. मोहनलाल ने बड़े प्यार से उसे अपनी और घुमय तू देखा की उसके ुबहार ऊपर नीचे हो रहे हैं जो उसको अच्छे तू लग रहे थे लेकिन अपने आप को नियंत्रित करते हुए उसने कहा "रुचिका, मैं पहले hi जनता था की ये पति पत्नी की तरह बेहवे करना आसान नहीं होता चाहे वो नाटक hi क्योँ न हो"

रुचिका क्या बोलती उससे तू कुछ समझ hi नहीं आ रहा था उस बेचारी ने तू इस तरह की अनुभूति का कभी अनुभव hi नहीं किया था वो तू क्या कहती, बस अपनी पलकों को शर्म से झुका कर कड़ी थी. मोहनलाल ने उसकी ठोढ़ी के नीचे उंगली रखकर उसके चेहरे को ऊपर उठाते हुए कहा "देखो अभी कुछ नहीं बिगाड़ा है, अगर तुम्हे मेरी पत्नी जैसा बेहवे करने में दिक्कत है तू तुम जैसे पहले था वैसे hi बेटी बनकर रहो और उसमे तू कोई दिक्कत का सवाल hi नहीं है, क्योँकि उसमे न तू तुम्हे कुछ सोचना पड़ेगा और न hi अपने आप को बदलना पड़ेगा"

रुचिका ने अपनी पलके झुकाये हुए hi अपनी साँसों को थोड़ा नियंत्रित किया और कहा "मैं जानती हु की पत्नी की तरह बेहवे करने में दिक्कत आएगी, क्योँकि मैं कभी पत्नी नहीं बानी और न hi कभी आज से पहले नाटक किया है. दिक्कत तू है लेकिन इस टूर पर अब मैं आपकी पत्नी की भूमिका में hi रहूगी और कोशिश करुँगी की इस भूमिका को अच्छे से निभा पौन"

मोहनलाल ने उसकी बात सुनकर उससे बड़े प्यार से उसको पकड़ कर सीट पर बैठाया और उसके सर पर हाथ फेरते हुए "रुचिका, देखो बीटा मुझे लग रहा है की मेरी पत्नी का रोले निभाना तुम्हारे लिए मुश्किल है, इसलिए मेरी सलाह मान जाओ और हम दूसरे होटल में जायेंगे और तुम पैसे की चिंता बिलकुल भी ना करो"

रुचिका ने कुछ सोचा और फिर अपने चेरे को ऊपर उठाया और कहा "मैं अब आपकी बेटी नहीं पत्नी हु और अपनी पत्नी को बीटा नहीं कहते. थोड़ी सी मुश्किल तू है, लेकिन अब से लेकर चाहे कुछ भी हो जाये आप मुझे अपनी पत्नी hi मानेगे" और इतना कहकर उसने अपनी पलके झुका ली.

मोहनलाल ने रुचिका के चेरे पर एक दृढ निश्चय देखा था तू उससे भी लगा की अब उसकी बेटी रुचिका एकदम से बड़ी हो गयी है और उससे रुचिका पर बहुत प्यार आने लगा. उसका जो हाथ सर पर था वो सर के पीछे से होता हुआ उसके कंधे पर पंहुच गया और बड़े प्यार से उसके कंधे को हलके से सहलाते हुए "मेरी बेटी रुचिका अब बड़ी हो गयी है और उसने अब मेरी पत्नी बनने का दृढ निश्चय कर लिया है. मुझे तुम्हारे निश्चय से ख़ुशी भी हुई लेकिन साथ में दुखी भी हु की बिना वजह मेरी बेटी को अपनी आइडेंटिटी को भूलकर मेरी पत्नी बनाना पद रहा है. बीटा मैं तू इसलिए तुम्हे मन कर रहा था की तुम्हे अकेले में भी पत्नी की तरह बेहवे करने में दिक्कत हो रही थी तू सोचो की जब हम बहार वाले लोगों के साथ होंगे तू तब क्या होगा और अगर लोगों को थोड़ा सा भी शक हो गया तू बीटा हम दोनों के लिए बहुत बड़ी मुश्किल हो जाएगी"

रुचिका बड़े ध्यान से मोहनलाल की बात सुन रही थी और अपने चेरे पर एक हलकी स्माइल लेट हुए "आप मुझे बार बार बेटी बोलकर मुझे भटका रहे हो और इस वजह से मैं आपकी पत्नी बनने में गलती कर जाती हु और जैसा की आप कह रहे हैं की मैं अकेले में आपकी पत्नी का रोले निभाने में गलती कर रही हु तू दुसरो के सामने भी गलती के पुरे पुरे चांस हैं और मैं इससे बिलकुल सहमत हु, लेकिन अब से आप मेरे विश्वास को डगमगाने से रोकने के लिए आप भूल जाइये की मैं आपकी बेटी हु. मैं सिर्फ और सिर्फ आपकी पत्नी हु और जितना भी वक़्त अब हम ट्रैन में हैं वो हमारी रेहरसल का वक़्त मानकर जैसे की आप अपनी पत्नी के साथ बेहवे करते हैं, वैसा hi कीजिये ताकि मेरा कॉन्फिडेंस बड़े न की आप उससे बार बार मुझे बेटी बोलकर काम करें"

मोहनलाल तू उसकी बात सुनकर हक्का बक्का रह गया और वो रुचिका को ऐसे देखने लगा जैसे उसके सर पर सींघ उग्ग आये हो. चाहे जो भी हो लेकिन उससे बहुत अच्छा लगने लगा और उसके मन में गुदगुदी होने लगी की बैठे बिठाये रुचिका जैसी हुसैन पारी उसकी पत्नी का रोले अदा कर रही है. वो सोचने लगा की जब वो उसकी बेटी hi थी तू उसकी खूबसूरती में वो खो जाता था और उसके मन में उसके साथ समय बिताने को होता था, लेकिन कुछ गलत न हो जाये इसलिए वो जानभूझ कर उससे दूर रहने लगा था. अब वक़्त की धार देखो कैसे अनजाने में वो उसके साथ आ गयी और उसने खुद hi पत्नी बनने का निश्चय कर लिया है और मुझे भी कह दिया है की उससे बेटी न समझू. जब उससे अपनी बीवी समझूंगा तू अपने मन को कैसे समझूंगा और कोई गलती हो गई तू क्या वो बुरा नहीं मान जाएगी. इन सोचो में डूबा हुआ था और दोनों बाप बेटी चुप थे और कुछ नहीं बोल रहे थे की तभी कूप के दरवाजे पर नॉक हुआ तू मोहनलाल ने जाकर देखा तू वेटर चाय लेकर आया था और चाय और स्नैक्स रख कर चला गया.

उसके जाने के बाद मोहनलाल ने कूप को अंदर से लॉक कर दिया और रुचिका के पास जाकर बैठ गया और उसके चेरे पर आयी लत को हटाकर उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसकी आँखों में झांकते हुए बड़े प्यार से उससे कहने लगा "तुम मेरी बेटी तू हो hi और रहोगी लेकिन मैं भी तुम्हारी बात मानते हुए अब से तुम सिर्फ और सिर्फ मेरी पत्नी और तुम्हे तब तक बेटी नहीं कहुगा जब तक तुम नहीं चाहोगी."

रुचिका 'थैंक्स की आपने मेरी भावनाओं को समझा और बात को मन'

मोहनलाल 'मैडम, पहले तू एक बात अच्छी तरह से अपने मन में बैठा लो की पति और पत्नी एक सिक्के के दो पहलु होते हैं, वो दो नहीं एक होते हैं और कोई भी अपने आप को थैंक्स नहीं कहता'

रुचिका 'सॉरी सॉरी आगे से ध्यान रखूंगी'

मोहनलाल ने हँसते हुए उसके चेरे को अपने हाथों में और अच्छे से पकड़ कर 'अपने आप को सॉरी भी नहीं बोलते'

रुचिका भी स्माइल करते हुए 'आपने भी तू मुझे सॉरी कहा था'

मोहनलाल 'अब लग रहा है की तुम मेरी पत्नी बन गयी हो, इसलिए बराबर की टक्कर दे रही हो, चलो अच्छा है'

रुचिका 'चाय पी लेते हैं' और ये कहकर वो वंहा से उठकर खिड़की के पास बानी टेबल पर राखी हुई थरमस से चाय को एक कप में डाला और जब दूसरे में डालने लगी तू मोहनलाल ने उसको रोकते हुए कहा 'मैडम चाय पति के साथ पीनी है या किसी और के साथ'

रुचिका 'पति के साथ'

मोहनलाल 'अच्छे पति पत्नी तू एक hi कप से पीते हैं, अब तुम डीडे करो की हम अच्छे पति पत्नी हैं की नहीं'

रुचिका तू मोहनलाल की बात सुनकर एकदम से शर्मा गयी और थरमस को वंही रख दिया और एक कप जिसमे चाय थी उठा लिया तू मोहनलाल ने उसका हाथ पकड़ कर अपने बांयी तरफ बैठा लिया और चाय का कप उसके मुंह के पास लेजाकर उससे पीने के लिए कहा तू उसने कहा 'पहले आप' मोहनलाल ने कहा 'लेडीज फर्स्ट' तू रुचिका ने कहा 'पहले पति फिर पत्नी'

मोहनलाल 'तुम मॉडर्न ज़माने की पत्नी हो और पहले पति वाला किस्सा अब नहीं चलेगा बल्कि जैसा की मैंने कहा था की पति पत्नी दो नहीं एक हैं और दोनों में किसी भी तरह का कोई फर्क नहीं है और मेरे मन में लेडीज फर्स्ट की भावना है क्योंकि मैं लेडीज की बहुत इज़्ज़त करता हु. मेरी पत्नी बनाना है तू मेरा माना है की मेरी पत्नी दब्बू नहीं बल्कि कॉंफिडेंट होनी चाहिए जो हर तरह की दिक्कतों का सामना कर सकती हो'

रुचिका 'मैं कॉंफिडेंट बनकर दिखाउंगी'

मोहनलाल 'That's लिखे माय वाइफ. चलो फिर पहले तुम पियो' तू रुचिका ने एक सिप लिया और सिप लेने के बाद उसने मोहनलाल की तरफ कप किया तू उसने देखा की कप के ऊपर लिपस्टिक के निशान आ गया तू उससे पुराण सन याद आ गया और उसने मुस्कराते हुए एक सिप लिया और फिर कप को रुचिका की ओर करके उससे सिप लेने के लिए कहा तू उसने भी शरमाते हुए सिप लिया, इस तरह एक दूसरे को सिप करते हुए उस कप की चाय ख़तम हो गयी.

मोहनलाल ने वंहा पर रखा हुआ एक सैंडविच उठाया और उससे रुचिका को खाने के लिए कहा तू उसने एक बाईट लिया तू सैंडविच में से थोड़ी सी क्रीम उसमे से निकल कर रुचिका के मुंह के पास लग गयी तू मोहनलाल रुचिका की तरफ हुआ और उस क्रीम को अपनी उंगली से उसके मुंह पर रखा तू रुचिका एकदम सिहर गयी लेकिन मोहनलाल ने उस उंगली की मदद से क्रीम को वंहा से लेते हुए अपने मुंह में दाल ली तू रुचिका ने कहा की 'टिश्यू से साफ़ कर लुंगी'

मोहनलाल 'में हु तू टिश्यू की क्या जरुरत है' तू रुचिका उसकी बात सुनकर शर्मा गयी और पलके झुकाये हुए बैठ गयी तू मोहनलाल ने बार बार उंगली उसके मुंह पर छुआ कर अपने मुंह में ले जाता और इस तरह से उसके मुंह से साडी क्रीम साफ़ कर दी.

अब रुचिका ने सैंडविच मोहनलाल की तरफ बढ़ाया तू वो जाकर मोहनलाल की नाक से टकरा गया और उस सैंडविच से क्रीम निकलकर रुचिका की उँगलियों पर लग गयी तू मोहनलाल ने कहा 'मैं सैंडविच नाक से नहीं मुंह से खता हु'

रुचिका ने नज़र उठा कर देखा की सैंडविच की क्रीम मोहनलाल के नाक पर लगी हुई थी तू उससे थोड़ी हंसी आने लगी तू मोहनलाल ने कहा 'चलो अच्छा है की मेरी वजह से तुम्हे हंसी तू आयी'

रुचिका ने टिश्यू उठाने के लिए हाथ बढ़ाया तू मोहनलाल ने उसका हाथ पकड़कर उससे ऐसा करने से रोक दिया तू रुचिका ने उसकी तरफ देखा तू उसने आँखों के िश्रा से टिश्यू के लिए न कहा तू रुचिका ने शरमाते हुए अपने हाथ से उसकी नाक साफ़ करने के लिए उसकी तरफ झुकी तू मोहनलाल को उसके उभारों को नजदीक से देखकर आनंद का एहसास हुआ और रुचिका ने जैसे hi नाक को हाथ से साफ़ करना छ तू वो साफ़ तू क्या होती बल्कि उस पर रुचिका की उंगली पर लगा हुआ क्रीम भी लग गया तू वो परेशान हो गयी की क्या करे तू फिर से टिश्यू उठाने के लिए हाथ बढ़ाया तू मोहनलाल ने उसका हाथ पकड़ लिया और मन कर दिया.

रुचिका को समझ नहीं आ रहा था की क्या करे, तभी उसके दिमाग़ ने काम किया और अपने बांये हाथ को मोहनलाल की नाक पर लेजाकर अच्छे से साफ़ कर दिया. मोहनलाल की नाक तू साफ़ हो गयी लेकिन अब उसके दोनों हाथों पर क्रीम लग गयी थी तू उसने फिर से टिश्यू उठाने के लिए हाथ बढ़ाया तू मोहनलाल ने उसका हाथ पकड़ लिया और धीरे से उससे अपने मुंह में दाल दिया और उससे चाटने लगा तू रुचिका के दिल की धड़कन एकदम से बढ़ गयी. मोहनलाल धीरे धीरे उसके हाथ पर लगी हुई साडी क्रीम खा गया और फिर दूसरा हाथ भी पकड़ कर अपने मुंह की तरफ ले जाने लगा तू रुचिका आँखों के इशारे से मन करने लगी लेकिन मोहनलाल कान्हा रुकने वाला था और उसने उसका हाथ मुंह में लेकर क्रीम को चाटने लगा और थोड़ी क्रीम उसकी हथेली पर भी लगी थी वो भी अपनी जीभ से चाट गया. रुचिका की तू हालत देखने वाली थी उसके उरोजोनो ने उसकी साँसों की ले में डांस करना शुरू कर दिया.

मोहनलाल की नज़र जाकर उसके उरोजोनो पर ठहर गयी और काफी देर तक उसने अपनी नज़र को वंहा से नहीं हटाया, जिसका एहसास रुचिका को भी हो गया तू उसने मोहनलाल से पूछा "आप क्या देख रहे हैं"

मोहनलाल ' अपनी पत्नी की खूबसूरती को देख रहा हु और ये देखा की मेरी पत्नी बहुत hi जयादा खूबसूरत है'

रुचिका अपनी तारीफ सुनकर शर्मा गयी और अपने चेहरे को उसकी नज़रों से दूर करने लगी. मोहनलाल ने उसका एक हाथ पकड़कर उससे अपने और जयादा पास करके बैठा लिया और धीरे से उसके हाथ को सहलाते हुए कहा 'मेरी बीवी बहुत खूबसूरत है और उसकी खूबसूरती का कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता'

रुचिका मन hi मन खुश भी हो रही थी और एक नए एहसास को भी अनुभव कर रही थी, क्योँकि किसी ने भी इस अंदाज में उसकी तारीफ नहीं की थी, तभी उसके चेहरे को मोहनलाल ने पकड़कर अपनी तरफ किया और अपने मुंह को उसके चेहरे के पास करने लगा तू रुचिका को घबराहट होने लगी की ये क्या हो रहा है और घबराहट में अपनी आँखों को बंद कर लिया.

मोहनलाल अपने मुंह को और पास करता गया और फिर उसने रुचिका को जैसे hi चूमा तू रुचिका जिसकी साँसे बहुत तेज चल रही थी और मोहनलाल के होंठों का स्पर्श पाकर अपनी आँखे एक पल के लिए खोल देती है और उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता जब उससे पता चलता है की मोहनलाल का चुम्बन उसके माथे पर था और वो रहत की सांस लेती है. उससे दर लग रहा था की मोहनलाल का चुम्बन उसके होठों पर होगा और वो न चाहते हुए भी उससे रोक नहीं पायेगी लेकिन माथे पर चुम्बन होने से उसके मन में मोहनलाल के प्रति आदर का भाव आ गया और ख़ुशी में उसने अपनी बांहे मोहनलाल के गले में दाल दी तू मोहनलाल हैरान रह गया.

मोहनलाल को उसके हाथों का सपर्श अपने गले पर एक अलग एहसास दे रहा था और उसके उरोजोनो की नरहट का एहसास अपनी छथि पर उसके लिए एक बहुत hi सुखद अनुभूति थी. मोहनलाल के हाथ भी रुचिका की कमर पर पंहुच कर उसकी पीठ को सहलाने लगे तू उसके हाथों ने रुचिका की ब्रा के स्ट्राप का स्पर्श का एहसास किया तू मोहनलाल का तापमान एक झटके में बढ़ गया और वो सपनो की दुनिया में पंहुच गया. रुचिका ने भी इस बात को महसूस किया की उसके पापा के हाथों ने उसकी ब्रा के स्ट्राप का एहसास किया है तू उसको बहुत जयादा शर्म आने लगी, लेकिन फिर अपने आपको सम्जहने लगी. अभी बाप बेटी और कुछ आगे बढ़ते तभी गेट पर नॉक हुआ तू मोहनलाल ने उठकर देखा तू वेटर था और उसने बताया की उनका स्टेशन आने वाला है.

मोहनलाल ने उससे टिप देकर विदा किया और फिर गेट बंद करके रुचिका से तैयार होने को कहा तू देखा की वो नज़र झुकाये बैठी है. मोहनलाल उसके पास गया और उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा 'नया रिश्ता निभाने में दिक्कत है तू पुराण रिश्ता'

रुचिका ने मोहनलाल को देखकर कहा 'मैं अब नए रिश्ते के लिए तैयार हु' और इस बात को पक्का करने के लिए उसने अपना हाथ मोहनलाल के हाथ पर रख दिया और उससे कहा की 'आप चिंता न करो किसी को भी नहीं पता लगेगा की मैं आपकी बीवी नहीं हु, बल्कि हर कोई आपकी और आपकी बीवी की तारीफ करेगा की दोनों बहुत अच्छा कपल हैं'

फिर रुचिका ने अपने पर्स में से कुछ कुछ निकलकर अपना मेकअप ठीक करने लगी. फिर ट्रैन रुकने के बाद दोनों ट्रैन से नीचे आये और रुचिका ने मोहनलाल के हाथ को इस तरह से पकड़ा हुआ था जैसे की नै नवेली दुल्हन अपने पति का हाथ पकड़ कर चलती हो
 
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