इन्सेस्ट रिश्ता - Page 15 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

इन्सेस्ट रिश्ता

जंहा तक मेरी समझ है कोई भी राइटर कभी भी जानभूझकर कहानी को बिच में छोड़ेगा.

हो सकता है उस राइटर की कुछ पर्सनल मज़बूरी हो या कुछ और कमिटमेंट हो, हमें इन् बातों का भी ध्यान रखना चाहिए.

हम पाठक अपना हक़ समझते हैं की लेखक को अपडेट जल्दी से जल्दी देना चाहिए और कहानी को पूरा करना चाहिए, ये हमारा लेखक के प्रति प्यार और उस कहानी में हमारी गहरी रूचि है. ये एक स्वाभाविक संवेदना है, लेकिन कई बार कहानी ऐसे मोड़ पर आ जाती है की लेखक भी उलझन में आ जाता है की किस दिशा में कहानी को लेकर जाये क्योँकि एक तू उसकी खुद की सोच और दूसरा पाठकों के सुझाव और उनका दबाव, इतना hi नहीं उसकी खुद की पारिवारिक और व्यावसायिक जिम्मेवारियां उसको आगे बढ़ने से रोक देती हैं. ऐसे वक़्त में मेरा मन्ना है की लेखक को हमारा सहयोग उससे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगा और वो एक अच्छी कहानी प्रस्तुत कर पायेगा जिससे पढ़कर हम उसका आनंद उठा सकते हैं.

यंहा हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए की लेखक या पाठक जो भी इस फोरम पर हैं वो सब अपनी ख़ुशी से एन्जॉय करने के लिए आते हैं.

हम एक दूसरे को कुछ कहकर अपना और दूसरे का दिल नहीं दुखाना चाहिए बल्कि जंहा तक संभव हो कुछ बुरा भी लगा हो तू उससे भूलकर ख़ुशी से रहना चाहिए, ऐसा मेरा मन्ना है.

मेरी बात का अगर थोड़ा सा भी बुरा लगा हो तू मैं क्षमा प्रति हूँ

धन्यवाद
 
अपडेट 76

आदित्य ने अपने जिस हाथ से उसका हाथ पकड़ा हुआ था उस हाथ को धीरे धीरे हाथ से बाजु और कंधे की तरफ ले जाने लगा जिससे संध्या की भी भावनाएं भड़काने लगी. वो हाथ ऊपर होते हुए उसके गलों तक पंहुच गया और अपने हाथ से उसकी गर्दन और फिर गाल सहलाते हुए अपने अंगूठे से उसके होठों को मसलते हुए पूछने लगा 'एक बात बताओ जब पापा आ जायेंगे तब आपको अगर दोनों में से सिर्फ और सिर्फ एक को चुनना पड़े तू आप किसको चुनोगी'

संध्या ये प्रश्न सुनकर हंसने लगी और काफी देर हंसने के बाद वो आदित्य को निहारते हुए कहने लगी 'मेरे से तुम चुनने के लिए कह रहे हो, इससे बड़ा मज़ाक क्या हो सकता है. तुम जिन लोगों में से चुनने के लिए कह रह हो, उनमे से एक तू मुझे अभी छोड़कर चले गए हैं और पता नहीं कब वापिस आएंगे या आएंगे hi नहीं. दूसरे हो तुम, तुम्हारा तू अभी पता hi नहीं है की मुझे प्रेमिका मन्ना तू दूर अभी दोस्त भी मानते हो की नहीं, ये भी पता नहीं है, इसलिए मैं क्या जवाब दूँ' इतना कहकर वो सुबकने लगी.

आदित्य उसकी पीठ को सहलाते हुए सान्तवना देता रहा और उससे चुप हो जाने के लिए तू कहा लेकिन ये नहीं बताया की वो अपनी माँ से प्यार करता है की नहीं.

जब थोड़ी देर में संध्या शांत हो गयी तू वो कहने लगी 'मुझे समझ में आ गया है की मैं जो सोच रही हूँ वो काफी हद तक ठीक है'

आदित्य 'आप ऐसा क्या सोच रही हैं'

संध्या 'यही की तुम मुझे गर्लफ्रेंड भी अगर मानते हो तू वो सिर्फ और सिर्फ मज़बूरी में, अन्यथा नहीं, प्यार तू बहुत दूर की बात है'

आदित्य अपनी माँ की बात का जवाब न देकर कहने लगा 'आप एक बात बताओ की जब आप को पापा के अलावा किसी ओर से प्यार हो जाये और अगर वो भी आपको प्यार करने लगे तू पापा के आने के बाद उस प्यार का क्या होगा'

संध्या उसकी बात सुनकर सोच में पद गयी और फिर उसने कहा 'पहले तू मुझे ये पता नहीं की कोई मुझसे प्यार करता है की नहीं और दूसरा अगर कोई प्यार करता भी है तू वो किस हद तक प्यार करता है, उसके बाद hi कुछ सोचा जा सकता है'

आदित्य 'जैसा की मैंने कहा की अगर वो भी आपसे उतना hi प्यार करता हो जितना की आप उससे करती है, तब आप क्या करेंगी'

संध्या 'मैं अभी इस बारे में नहीं सोचना छथि, मैं बस इतना जानती हूँ की जिस से प्यार करती हूँ या मैं जिस से प्यार करुँगी, मेरा प्यार कभी भी काम नहीं होगा चाहे कुछ भी हो जाए'

आदित्य 'ऐसा कैसे हो सकता है आपका प्यार कभी काम नहीं होगा क्यूंकि जब आपको दो में से एक को चुनना पड़ेगा तब आप परेशानी में घिर जाएँगी, मैं इसलिए आपसे पूछ रहा हूँ की आप उसे वक़्त क्या करेंगी लेकिन मुझे लग रहा है की आप इस बात का जवाब देना नहीं छह रही हैं'

संध्या 'लेकिन तुम ये सब क्योँ पूछ रहे हो, जबकि तुम तू अभी मुझे दिल से गर्लफ्रेंड भी नहीं मानते हो'

आदित्य अपनी माँ को वंहा से उठाकर कंप्यूटर टेबल पर ले गया और कुर्सी पर बैठा कर कंप्यूटर में एक फोल्डर खोलकर बोलै 'आप इसको देखो जब तक मैं आपके लिए कॉफ़ी बनाकर लता हूँ' और वो किचन में चला गया.

आदित्य के जाने के बाद संध्या जैसे जैसे कंप्यूटर में वो सब देखती गयी वो हैरान हो गयी और वो गहरी सोच में पद गयी. तभी आदित्य कॉफ़ी और कुछ स्नैक्स बना कर ले आया और उन्हें टेबल पर रख दिया और अपनी माँ की सोचों में घिरा देखकर उसने पूछा 'अब आपने वो सब देख लिया या अभी कुछ और देखना है'

संध्या 'ये सब क्या है'

आदित्य 'ये मेरे खवाबों और ख्यालों की दुनिया है'

संध्या 'तुम किसी लड़की से प्यार करते हो'

आदित्य 'आपको क्या लगता है'

संध्या 'तुम अगर किसी लड़की से प्यार करते हो तू मुझे बता देते, काम से काम मैं ये सब देखकर दुखी तू न होती'

आदित्य 'आपको ये सब देखने से दुःख क्योँ हो रहा है'

संध्या 'जब तुम किसी ओर लड़की से प्यार करोगे तू मुझे क्या अच्छा लगेगा'

उसकी बात सुनकर आदित्य हंसने लगा और फिर उसने कहा 'आप दो दो लोगों से प्यार कर सकती हो और मुझे किसी एक से भी प्यार करने का हक़ नहीं है'

संध्या 'ठीक है तुम्हे जिससे प्यार करना है करो, लेकिन मुझे अब अकेला छोड़ दो, मैं अब अपने कमरे में जा रही हूँ'

आदित्य 'आपको जाना है तू चली जाना, लेकिन आप कॉफ़ी तू ले लीजिये'

संध्या 'मुझे कोई कॉफ़ी नहीं पीनी है'

आदित्य 'आप सिर्फ इस बात से मुझसे खफा हैं की मैं किसी लड़की से प्यार करता हूँ. अब आप सोचो की मैंने आपसे क्या गलत पूछ लिया था की आप शादीशुदा हैं, आपके दो जवान बच्चे हैं, फिर भी आप को हक़ है किसी से भी प्यार करने का, लेकिन आपने कभी सोचा है की इस प्यार का अंजाम क्या होगा. आप अपने साथ साथ उस शख्स की भी जिंदगी ख़राब कर देंगी जिससे आप प्यार करेंगी'

संध्या 'लेकिन तुम्हे इससे तकलीफ क्योँ हो रही है, तुम्हे क्या की मैं सुखी हूँ या दुखी'

आदित्य 'मुझे तू इससे बहुत फरक पड़ता है, लेकिन आप क्या सोचती हैं वो मुझे पता नहीं लग रहा'

संध्या 'तुम्हे मेरी दुखी होने से दुःख क्योँ हो रहा है'

आदित्य 'क्योँ नहीं होना चाहिए'

संध्या 'क्योँ तुम तू मेरे से प्यार करते नहीं'

आदित्य 'मतलब की जो किसी को प्यार करता है सिर्फ और सिर्फ उससे hi दुखी होने का हक़ है और किसी को नहीं'

संध्या 'दूसरा क्योँ दुखी होगा'

आदित्य 'चलो एक मिनट के लिए आपकी बात को मान लेता हूँ तू अब आप ये बताओ, जैसे आप के कहे अनुसार मैं आपसे प्यार नहीं करता तू फिर आप इस बात को लेकर दुखी क्योँ हैं'

संध्या 'मुझे नहीं पता'

आदित्य 'जिस तरह आपको नहीं पता की आप दुखी क्योँ हैं तू उसी तरह से आप के दुखी होने से मैं भी दुखी होता हूँ. मैंने आपसे इसलिए पूछा था की आप किसको चुनोगी', क्योँकि जंहा तक मैं समझता हूँ आप उस वक़्त जो भी फैसला लोगी, उससे आपको दुःख hi होगा और मैं नहीं चाहता की आपको कोई दुःख हो '

संध्या 'अब तू उस बात का सवाल hi नहीं रहा क्योँकि अब तुम तू मुझसे प्यार करते नहीं हो तू चुनने का मौका hi नहीं मिलेगा'

आदित्य 'अगर मौका मिला तू किसको चुनोगी''

संध्या 'पहले तुम बताओ की तुम मुझसे प्यार करोगे?'

आदित्य 'ऐसा करते हैं कफ पीते हैं, फिर इस बारे में बात करेंगे'

संध्या पहले तू मन करने लगी, फिर पता नहीं क्या सोच कर मान गयी और दोनों आमने सामने बैठकर कफ पीते हुए बातें कर रहे थे .

संध्या 'वो लड़की कौन है'

आदित्य 'आप क्या करोगी उसस्के बारे में जानकार'

संध्या 'मुझे उसके बारे में जानना है'

आदित्य 'क्योँ आपको ईर्ष्या हो रही है'

संध्या 'मुझे क्योँ ईर्ष्या होने लगी'

आदित्य 'फिर आप क्या करोगी जानकार'

संध्या 'मुझे दोस्त तू मानते हो न'

आदित्य 'हाँ बिलकुल मंटा हु'

संध्या 'दोस्त को भी नहीं बताओगे'

आदित्य 'दोस्त अब ईर्षालु हो गया है, इसलिए मैं सोच रहा हूँ की न hi बताऊँ'

संध्या 'प्लीज, कुछ बताओ न'

आदित्य 'क्या जानना चाहती हैं'

संध्या 'क्या तुम्हारे साथ पद्धति है'

आदित्य 'इससे जानकर आप क्या करोगी'

संध्या 'क्या वो बहुत सुन्दर है'

आदित्य 'वो तो आपने इतने सरे फोटोज और वीडियोस देख लिए हैं, फिर भी आप पूछ रही हैं'

संध्या 'किसी भी फोटो या वीडियो में उसकी शाखाल दिखाई hi नहीं दे रही थी'

आदित्य 'उससे क्या फरक पड़ता है, खूबसूरती का तू पता लग hi जाता है'

संध्या 'उसका नाम hi बता दो"

आदित्य 'नाम जानकर क्या करेंगी'

संध्या 'वो तुम से प्यार करती हैं'

आदित्य 'क्योँ आप उससे प्रतिस्पर्धा करना चाहती हैं'

संध्या 'तुम तू उसके बारे में कुछ बताना hi नहीं चाहते'

आदित्य 'बता तू रहा हूँ की वो मेरे खवाबों की शहजादी है और वो मेरे दिल में बस्ती है'

संध्या 'चलो अच्छा है, तुम अपने खवाबों की शहजादी के साथ रहो और मैं चली अपने कमरे में'

आदित्य 'क्या करोगी अपने कमरे में जाकर, अपने प्यार की नाकामी पर आंसू बहाने के लिए'

संध्या 'तुम्हे इससे क्या?'

आदित्य 'अगर आप चाहो तू यही रुको और अगर आप बुरा ना मने तू मैं उसके साथ साथ आपसे भी प्यार कर सकता हूँ'

संध्या 'तुम उसके साथ hi प्यार करो और मेरा पीछा छोडो'

आदित्य 'मैं कान्हा आपके पीछे पड़ा हूँ, ये तू आप hi कह रही थी की आप मुझसे प्यार करती हैं. मैंने तू इसलिए कहा था, बाकि आपकी मर्जी'

संध्या 'तुम अगर उस लड़की से प्यार करोगे तू फिर मुझसे प्यार कैसे करोगे'

आदित्य 'जब आप दो लोगों से एक साथ प्यार कर सकती हो तू मैं क्योँ नहीं'

संध्या 'मेरे लिए तू वक़्त मिलेगा hi नहीं'

आदित्य 'ये बात तू आप पर भी लागु होती हैं'

संध्या 'जब तुम दूसरी लड़की से प्यार करोगे तू तुम उसको अधिक महत्व डोज और मुझे काम'

आदित्य 'आपको ऐसा लगता है की मैं ऐसा कुछ करूँगा'

संध्या 'वो इसलिए की दूसरी लड़की जवान है और मेरी उम्र कुछ जयादा है, इसलिए'

आदित्य 'पहली बात तू प्यार में उम्र का कोई महत्व नहीं होता और दूसरी बात आप की उम्र का पता hi नहीं चलता, आप तू जवानो से भी जवान हैं और सबसे बड़ी बात अभी तू मैंने आपको बताया hi नहीं है की उस लड़की की उम्र क्या है. ये भी हो सकता है की उसकी उम्र आप के बराबर हो या आपसे जयादा हो'

आदित्य की बात सुनकर संध्या का मुंह खुला का खुला रह गया और पूछने लगी 'क्या मुझसे भी बड़ी उम्र की औरत के साथ प्यार करते हो'

आदित्य 'मैंने तू सिर्फ आपकी बात का जवाब दिया है, उसकी उम्र तू मैंने बताई hi नहीं'

संध्या 'तुम उससे प्यार करना छोड़ नहीं सकते'

आदित्य 'सिर्फ इसलिए की मैं आपसे प्यार करूँ'

संध्या 'चाहती तू मैं कुछ कुछ ऐसा hi हूँ'

आदित्य 'मतलब की मैं सिर्फ और सिर्फ आपसे प्यार करूँ'

संध्या 'हाँ'

आदित्य 'क्या आप ऐसा कर सकती हैं, अगर आपका जवाब हाँ है, तू मैं भी न चाहते हुए ऐसा कर लूंगा'

संध्या 'मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी'

आदित्य 'मतलब ये की अगर आप चाहती हैं की मैं सिर्फ और सिर्फ आपसे प्यार करूँ तू फिर आप भी अब के बाद पापा से किसी भी तरह का कोई सम्भन्ध नहीं रखेंगी'

संध्या 'ऐसा कैसे हो सकता है'

आदित्य 'अगर नहीं हो सकता तू फिर आप भी मुझसे ऐसी किसी तरह की उम्मीद न रखे'

संध्या 'मतलब अब तुम मुझे अकेला छोड़ डोज'

आदित्य अपनी कुर्सी से उठकर अपनी माँ की कुर्सी के पास जाकर उसके बांये कंधे पर हाथ रख कर कहने लगा 'मैंने आपको वादा किया है तू उससे मैं निभाउंगा और जिंदगी भर आपको अकेला नहीं छोडूंगा'

संध्या ने अपने बांये हाथ से आदित्य की बाजु को पकड़ कर अपनी आँखों को ऊपर उठाकर बहुत hi इल्तिजा वाले भाव से कहा 'मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए'

आदित्य ने अपनी माँ के हाथ को पकड़ कर अपने सामने खड़ा कर दिया और उसकी आँखों में झांकते हुए 'मैं आपको प्यार करने से मन कान्हा कर रहा हूँ'

संध्या 'मतलब तुम उस लड़की से प्यार करोगे और जो कुछ बच खींचा प्यार होगा, वो मुझे डोज'"

आदित्य ने उसकी बांये बाजु को पकडे पकडे अपनी ओर खींचते हुए उसको थोड़ा अपने नजदीक कर लिया और कहने लगा 'आपसे अगर मैं प्यार करूँगा तू दिल khol.kar करूँगा अन्यथ नहीं करूँगा'

संध्या थोड़ा ओर नजदीक आते हुए 'तुम जब अपना वक़्त उस लड़की को डोज तू फिर मुझे कैसे डोज'

आदित्य 'वक़्त की कोई कमी नहीं होगी, बल्कि आपको तू जो सुविधा है वो उस लड़की को कान्हा है, आप तू जब मर्जी मेरे साथ बैठकर वक़्त बिता सकती हैं'

संध्या 'मतलब तुम उस दूसरी लड़की से प्यार करोगे hi करोगे'

आदित्य अब उसको अपने आगोश में लेते हुए और उसके चेहरे को हाथ से पकड़ कर ऊपर करके उसकी आँखों में झांकते हुए 'मैं किस से प्यार कटा हूँ या नहीं, आप किस्से प्यार करती हैं या नहीं, इन सबसे हमें कोई मतलब नहीं होना चाहिए. हम दोनों एक दूसरे को प्यार करें ये महत्वपूर्ण है और हम दोनों apani.baat को ईमानदारी से पालन करें'

संध्या 'मुझे तुम्हारी शरत मंजूर हैं'

आदित्य 'शर्तो पर किया हुआ प्यार, मेरी नज़र में प्यार नहीं होता, इसलिए प्यार में कोई शर्त नहीं, हमें सिर्फ इतना ध्यान रखना है की दूसरे की भावना को ठेस न पंहुचे'

संध्या ने अपनी पलकों को झुकाते हुए 'हमारे प्यार की हद क्या होगी'

आदित्य 'प्यार को जैसा पहले भी कहा है शर्तो और हदों में नहीं बंधा जा सकता. अगर हम ऐसा करेंगे तू वो प्यार नहीं बल्कि समझौता होगा. हाँ हम जो भी करें एक दूसरे की भावनाओं की कदर करते हुए दोनों की सहमति से करें'

संध्या ने अपने बांये बाजु से आदित्य की पीठ को जकड लिया और सहलाते हुए 'मुझे सब मंजूर है, बस मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए'

आदित्य भी उसकी पीठ सहलाते हुए 'मैं हो सकता किसी ओर से भी प्यार करूँ, लेकिन आप नहीं पूछेंगी, हाँ ये भी वादा है की आपको प्यार करने में कोई कमी नहीं करूँगा' इतना कहकर उसने अपने होठों से उसके माथे को चुम लिया.
 
अपडेट 77

कहानी अब वापिस मोहनलाल की यादों से. कहानी फ्लैशबैक में

मोहनलाल उससे समजहा बुझाकर वंहा से चला गया और थोड़ी देर बाद रुचिका को फ़ोन करके पूछा तू पता लगा की वो फ्री हो गयी है. मोहनलाल और संध्या ने फिर रुचिका को हॉस्टल छोड़ना और संध्या उस वक़्त बहुत hi भावुक थी. मोहनलाल फिर संध्या को घर छोड़कर अगले दिन वंहा से निकला और रुचिका को फ़ोन करके बताया की वो आ रहा है, लेकिन रुचिका ने कुछ कहा जिससे मोहनलाल दुविधा में आ गया.

असल में रुचिका ने मोहनलाल को दो बातें बताई. पहली तू ये की अवनि का फ़ोन आया था और वो उन दोनों को अपने यंहा गोवा बुला रही थी. दूसरा उसकी माँ को गलती से एक मैसेज चला गया था जिसमे लिखा था

'ी लव यू एंड मिस यू, बस जल्दी से आ जाओ'

उसकी माँ को पूरा मैसेज तू समझ नहीं आया और उसने रुचिका को फ़ोन करके पूछा 'रूचि, इस मैसेज का क्या मतलब है'

रुचिका पहले तू अपनी माँ की बात सुनकर घबरा गयी की कौनसा मैसेज चला गया है? उसने बड़ी हिम्मत करके अपनी माँ से पूछा 'कौनसा मैसेज'

संध्या 'भेजा तुमने है और पूछ मुझसे रही है?'

रुचिका 'माँ, मैं आपको वापिस फ़ोन करती हूँ'

फ़ोन काटने के बाद जल्दी से उसने मैसेज देखा तू उससे अपनी गलती का एहसास हुआ की जो मैसेज वो अपने पापा को भेजना छह रही थी वो उसकी माँ को चला गया. रुचिका ने जैसे hi यह मैसेज देखा उसके दिल की धड़कन बढ़ गयी और उससे लगा की उसकी माँ को उसके और पापा के बारे में पता चल गया.

वो घबराने लगी और सोच में पद गयी की अब क्या होगा? थोड़ी देर बाद जब थोड़ा सा उसने अपने आप को संयत किया और मैसेज को दुबारा खोल कर पढ़ा तू उसने पाया की उसने मैसेज में कहीं भी पापा का जीकर नहीं किया है, लेकिन इस मैसेज से उसकी माँ को तू पता लग hi जायेगा न की वो किसी लड़के से प्यार करती है और सोचने लगी की क्या करे. उससे ये भी लग रहा तह की अगर जल्दी से उसने अपनी माँ को फ़ोन नहीं किया तू पता नहीं वो उसके बारे में क्या क्या सोचेगी और पता नहीं क्या करेगी. उसने सोचा की अगर फ़ोन नहीं करती तू उसकी माँ शक करेगी और अगर करती है तू क्या जवाब दे. वो सोच सोच कर परेशान होने लगी और तभी फ़ोन की घंटी बजी. घंटी बजते hi उसके दिल की धड़कन भी बढ़ गयी. उसका मन नहीं कर रहा था की वो अपनी माँ से बात करे, लेकिन उसने सोचा की अगर नहीं करुँगी तू शक जयादा होगा, इसलिए फ़ोन उठाने की सोची. जैसे hi फ़ोन की तरफ देखा तू उसकी जान में जान आयी क्योँकि ये फ़ोन उसकी माँ का न होकर उसके पापा का था.

उसने अपने पापा को जल्दी से साडी बात बताई और पूछा की 'क्या करूँ' मोहनलाल भी उसकी बात सुनकर दुविधा में आ गया लेकिन अपने आप को संयत करते हुए उसने कहा की जल्दी से वो मैसेज उससे भेजे. रुचिका के मैसेज को जब मोहनलाल ने पढ़ा तू उससे हंसी छूट गयी.

मोहनलाल 'इस मैसेज से घबराने वाली कौनसी बात हो गयी'

रुचिका 'आप क्या बात कर रहे हो, मेरी तू जान hi निकल गयी है और आपको हंसी छूट रही है'

मोहनलाल 'ध्यान से सुनो, अपनी माँ को कहना की तुम उससे बहुत प्यार करती हो और उसके जाने के बाद मिस कर रही थी. तुम उससे इतना मिस कर रही थी की तुम्हारा मन छह रहा था की वो जल्दी से तुम्हारे पास आ जाये'

रुचिका 'आपने तू मेरी समस्या को चुटकी बजाते hi सुलझा दिया, लेकिन ऐसा कहने में अगर माँ आने के लिए तैयार हो गयी तू'

मोहनलाल 'तू तुम उसके साथ एन्जॉय करना और अपना प्रोग्राम फिर कभी'

रुचिका 'आपको बुरा नहीं लगेगा'

मोहनलाल 'मुझे तुम्हारी किसी भी बात का बुरा नहीं लग सकता और तुम बेख़ौफ़ होकर उससे बात करो और जंहा तक मैं उससे जनता हूँ वो नहीं आएगी और अगर आने के लिए कहे तू तुम कोई अच्छा सा बहाना बना कर रोक लेना'

रुचिका 'ठीक है अभी बात करती हूँ'

उसके बाद रुचिका ने बड़े hi आत्मविश्वास से अपनी माँ से बात की तू उसकी माँ भावुक हो गयी और उससे आने के लिए कहने लगी लेकिन उसने कहा की वो संभल लेगी क्योँकि अब उससे अकेले तू रहना hi पड़ेगा क्योँकि वो हमेशा तू उसके पास रह नहीं सकती. उसकी माँ मान गयी और रुचिका बहुत खुश हुई.

रुचिका ने अपने पापा को फ़ोन किया तू उसने कहा की वो ये बात पहले से जनता था और उससे ये हिदायत दी की अब से जब भी बात करनी हो या मैसेज करना हो तू नए नंबर और फ़ोन से करें, वो मान गयी.

मोहनलाल 'अब बताओ क्या िर्रादा है'

रुचिका 'मैं क्या बताऊँ, अब आप जैसा कहेगे'

मोहनलाल 'चलो तयारी कर लो, हम आज hi शाम को गोवा के लिए निकालेंगे' और इतना कहकर मोहनलाल ने गोवा की टिकट्स बुक करवाई और रुचिका को बोल दिया की वंहा से छुट्टी ले ले.

मोहनलाल ने रुचिका को उसके हॉस्टल से लेकर वंहा से एक शॉपिंग मॉल में गए और वंहा घूमने के बाद शाम को फ्लाइट पकड़कर गोवा पंहुच गए और वंहा पंहुचकर दीपक और अवनि जिन्हे पहले से इनफार्मेशन थी लेने आये हुए थे. वो उनके साथ उनके घर पर पंहुचे तू सूरज और दिया पहले से hi मौजूद थे. वनः सब बड़े hi जोर शोर से मिले और वो सब डिनर करके सोने का प्रोग्राम कर hi रहे थे की तभी वंहा दीपक और अवनि दोनों के माता पिता जो किसी टूर पर गए हुए थे तू आ गए. इसलिए उनका वंहा सोने का प्रोग्राम कैंसिल हो गया और दोनों जोड़ियां मोहनलाल, रुचिका और सूरज, दिया को वंहा से जाना पड़ा. वे सब एक कैब में बैठकर एक बहुत hi अच्छे होटल में शिफ्ट हो गए.

कमरे में जैसे hi पंहुचे तू मोहनलाल ने रुचिका को अपने आगोश में ले लिया और कसकर अपने से लिपटते हुए उसकी कमर को सहलाने लगा. उसकी कमर को सहलाते हुए अपने चेहरे को नीचे लेट हुए अपने होठों से उसके माथे को चूमते हुए कहा 'लव यू जान'

रुचिका ने अपनी पलकों को नीचे रखते हुए कहा 'लव यू तू'

मोहनलाल ने जैसे hi यह सुना तू उसने रुचिका को अपनी बांहों में ओर जयादा कास लिया जिससे रुचिका के उरोज मोहनलाल की चौड़ी छाती में डाब गए और रुचिका के मुंह से एक जोर की आवाज़ निकली 'आउच'

मोहनलाल ने रुचिका पर दबाव काम करते हुए पूछा 'क्या हुआ जान'

रुचिका बेचारी क्या जवाब देती, उसने कहा 'कुछ नहीं'

मोहनलाल ने उसके चेहरे को अपने हाथ की मदद से ऊपर उठाया और कहा 'जान मेरी तरफ देखो न'

रुचिका ने शर्म के मरे अपनी आँखों को नीचे hi किये रखा, तू मोहनलाल ने कहा 'मुझसे प्यार करती हो तू मेरी आँखों में देखो'

मोहनलाल की बात सुनकर रुचिका ने अपनी पलकों को थोड़ा सा ऊपर उठाया और अपने पापा की आँखों में देखने लगी जिसमे प्यार का सागर दिखाई दे रहा था. मोहनलाल ने उससे कहा 'देखो तुम मेरी जान हो और मैं तुम्हे किसी भी तरह का दुःख नहीं देना चाहता लेकिन साथ में यह भी है की अगर तुम्हे मेरी किसी भी बात का थोड़ा सा भी बुरा लगे या कोई दुःख या कोई दर्द पंहुचे तू खुलकर बताओ क्योँकि अगर तुम अपने दिल में कोई भी छोटी से छोटी बात रखोगी तू वो हमारे रिश्ता में दरार ला सकती है, जो की न तू तुम चाहोगी और न hi मैं, इसलिए जो भी बात हो खुलकर बातो'

रुचिका उसकी बात सुनकर सिर्फ इतना hi कह पायी 'जी' और अपनी पलकों को झुका लिया.

मोहनलाल 'तू बातो फिर क्या हुआ था'

रुचिका बेचारी क्या बताती वो मोहनलाल के गले लग गयी और उसकी छाती में अपने चेहरे को छुपा कर कहने लगी 'जरुरी है क्या'

मोहनलाल 'अगर तुम मुझे अपने से अलग समझती हो तू मत बताओ'

रुचिका ने एकदम से अपने चेहरे को ऊपर उठाया और मोहनलाल की आँखों में झांकते हुए उसके मुंह पर अपनी उंगली को रखकर 'आज के बाद आप ये कभी नहीं कहना की हम दोनों अलग अलग हैं'

मोहनलाल ने उसकी उंगली को अपने होठों से चुम लिया तू रुचिका के मुंह से एक हलकी सी सिसकी निकली और मोहनलाल ने कहा 'अगर हम अलग नहीं हैं तू तुम्हारा दर्द मेरा नहीं है क्या, जल्दी से बताओ की क्या हुआ था'

रुचिका ने अपने चेहरे को फिर से नीचे करते हुए 'आपको पता तू है hi की आपने कुछ जयादा hi जोर से दबा दिया था'

मोहनलाल 'अब क्या करूँ, तुम से अकेले में मिलाने में इतना वक़्त लग गया और इस जुदाई ने तुम्हारे प्रति मेरे प्यार को इतना बढ़ा दिया की उस प्यार में ऐसा हो गया, आगे से ख्याल रखूँगा'

रुचिका 'मैंने तू कोई शिकायत नहीं की है तू आप अपने आप को क्योँ दोषी मान रहे हैं'

मोहनलाल 'तुमने शिकायत नहीं की यही तू दुःख की बात है की तुम किसी भी दुःख को अकेले hi सेहन कर रही थी'

रुचिका 'कुछ दुःख दर्द अकेले hi सहने पड़ते है और उन् दर्द को सहने में hi तू असली ख़ुशी मिलती है, क्योँकि उस दर्द को सहने से hi पता लगता है की कितना प्यार है'

मोहनलाल 'तुम तू बड़ी दार्शनिक बातें करने लगी हो'

रुचिका 'आपकी सोहबत का असर है'

मोहनलाल ने फिर एक डंसे रुचिका को अपनी बांहों में उठा लिया तू रुचिका 'आउच' करने लगी और मोहनलाल उससे अपनी बांहों में उठाये उठाये वंहा पड़े एक सोफे पर जाकर बैठ गया और रुचिका को अपनी गोदी में बैठा लिया और उससे कहने लगा 'चलो आज की रात को यादगार बना दे'

रुचिका ने इस बार भी अपनी पलकों को झुकाते हुए सिर्फ इतना hi कहा 'जी, मैं अभी वाशरूम से होकर आती हूँ'

रुचिका वंहा से उसकी गोदी से उठकर वाशरूम चली गयी और मोहनलाल ने वंहा से इण्टरकॉम पर कुछ अर्जेंट आर्डर किया और कहा की 'जल्दी से जल्दी भेज दो'

रुचिका जब वाश रूम से वापिस आयी तू देखती है की टेबल पर एक बहुत hi सुन्दर केक रखा हुआ है और कुछ ड्राई फ्रूट्स और फ्रेश फ्रूट्स भी रखे हुए थे. एक चिम्पैंगे की बोतल और पता नहीं क्या क्या था. वो ये सब देखकर अपनी आँखों के इशारे से पूछा की 'ये सब क्या है' तू मोहनलाल ने उससे कहा 'ये उस रात को फिर से ताजा करने की कोशिश है, तुम्हे बुरा तू नहीं लगा'

रुचिका मोहनलाल के पास आकर उसके गले लग गयी और कहने लगी 'मुझे आपकी बात का बुरा लगेगा? क्योँ, आप ये कभी सोचना भी नहीं, बल्कि मैं तू ये देखकर इतनी खुश हूँ की बता नहीं सकती'

मोहनलाल ने उससे अपने आगोश में लिए हुए hi केक काटने के लिए कहा तू उन दोनों ने मिलकर केक कटा और एक दूसरे को खिलने लगे. मोहनलाल ने अपने केक को मुंह में पकड़ा और उससे रुचिका के मुंह की तरफ बाध्य तू रुचिका ने अपने होंठों से पकड़ कर डेंटन से एक टुकड़ा काट लिया तू केक थोड़ा छोटा हो गया. मोहनलाल ने फिर से उस बचे हुए केक को रुचिका की तरफ बढ़ाया तू वो मन करने लगी लेकिन मोहनलाल ने उससे लेने का इशारा किया और जैसे hi उसने मुंह आगे बढ़ाया तू मोहनलाल ने केक के टुकड़े को अपने मुंह में अंदर ले लिया जिससे रुचिका के होठों को मोहनलाल के होठों का स्पर्श का अनुभव हुआ. जैसे hi उससे यह बात समझ आयी तू वो पीछे हटने लगी, लेकिन मोहनलाल ने उसके होठों को अपने होठों में जकड लिया और उसके होठों का रसपान करने लगा.

रुचिका को इस बात का बिलकुल भी आभास नहीं था की मोहनलाल एक डैम से उसके होठों को जकड लेगा. जैसे hi उसके होठों को मोहनलाल ने जकड़ा तू उसके दिल की धड़कन बढ़ गयी और उसके हाथ अपने आप hi मोहनलाल के कन्धों पर पंहुच गए और उसने अपने हाथों का दबाव मोहनलाल के कन्धों पर बढ़ा दिया. मोहनलाल को ये समझ नहीं आ रहा था की वो उससे अपने से नजदीक कर रही है या दूर. थोड़ी देर उसके होठों का रास चूसकर मोहनलाल ने उसके होठों को छोड़ दिया जिससे रुचिका की साँसें बहुत तेज तेज चलने लगी.

मोहनलाल उससे पकड़कर चिम्पैंगे की बोतल के पास ले आया और उससे बोतल खोलने के लिए कहा तू उसने मोहनलाल की आँखों में देखकर ये पूछने की कोशिश की 'क्या वाकई इससे खोल दू' मोहनलाल ने उससे इशारे से खोलने के लिए कहा. रुचिका ने बोतल को पकड़ कर उसको खोलने की कोशिश की और उसने खोल hi दिया. अब चिम्पैंगे को डालने के लिए वो गिलास ढूंढने लगी तू देखा की टेबल पर सिर्फ एक hi गिलास रखा हुआ है. रुचिका ने प्रश्न भरी नज़रों से पूछा तू मोहनलाल ने कहा 'जब हम दो न होकर एक हैं तू फिर दो गिलास की क्या जरुरत है'

रुचिका को मोहनलाल की बात सुनकर चेहरे पर मुस्खरहाट आ गयी और वो उस गिलास में चिम्पैंगे डालने लगी. मोहनलाल तब तक जाकर सोफे पर बैठ गया और जब रुचिका आयी तू मोहनलाल ने उससे अपनी गॉड में बैठने के लिए कहा तू वो मन करने लगी. मोहनलाल ने कहा 'ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी' रुचिका मोहनलाल की बात सुनकर बिना कुछ कहे उनकी गॉड में आकर बैठ गयी और मोहनलाल ने उससे खुश होते हुए अपने से चिपका लिया और चिम्पैंगे का गिलास उठकर रुचिका के मुंह से लगा दिया.
 
अपडेट 78

रुचिका को मोहनलाल की बात सुनकर चेहरे पर मुस्खरहाट आ गयी और वो उस गिलास में चिम्पैंगे डालने लगी. मोहनलाल तब तक जाकर सोफे पर बैठ गया और जब रुचिका आयी तू मोहनलाल ने उससे अपनी गॉड में बैठने के लिए कहा तू वो मन करने लगी. मोहनलाल ने कहा 'ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी' रुचिका मोहनलाल की बात सुनकर बिना कुछ कहे उनकी गॉड में आकर बैठ गयी और मोहनलाल ने उससे खुश होते हुए अपने से चिपका लिया और चिम्पैंगे का गिलास उठकर रुचिका के मुंह से लगा दिया.

रुचिका ने गिलास को मुंह से लगा कर एक सिप लिया और मोहनलाल की तरफ बढ़ा दिया. मोहनलाल ने गिलास से अपना मुंह लगाए लगाए अपने बांये हाथ को रुचिका की पीठ के पीछे से लेजाकर उसके बांये कंधे पर रख दिया और गिलास में से एक सिप लिया और कहने लगा 'जान तुमने तू इस चिम्पैंगे का मज़ा कई गुना बढ़ा दिया है, मज़ा आ गया' और अपने हाथ से उसके कंधे को भी सहलाते रहा.

रुचिका 'मैंने ऐसा क्या कर दिया है, जैसी ये आयी थी, मैंने तू वैसी hi गिलास में दाल दी थी'

मोहनलाल उसके कंधे पर रखे हुए हाथ से वंहा सहलाते हुए अपने नजदीक करके कहने लगा 'जान चिम्पैंगे को तुम्हारे होंठों ने छुआ तू तुम्हारे होठों से निकला प्यार भरा रास इस चिम्पैंगे में मिलकर इसके स्वाद और नशे को कई गुना बढ़ा गया है'

रुचिका मोहनलाल की बात सुनकर एक डैम से शर्मा गयी और अपनी पलकों को नीचे करके कहने लगी 'आप भी न'

मोहनलाल ने उसके चेहरे को उठाते हुए कहने लगा 'मैं सच कह रहा हूँ, अगर मेरी बात पर विश्वास नहीं है तू, मैं अपने होठों से उस रास को चख कर बता देता हूँ की चिम्पैंगे में तुम्हारे होठों का रास का नशा है की नहीं'

रुचिका ने एक बार फिर से अपनी पलकों को झुकाते हुए 'मुझे समझ आ रहा है की आप मेरी तारीफ क्योँ कर रहे हैं'

मोहनलाल 'क्योँ कर रहा हूँ'

रुचिका 'आप शरारत करना छह रहे हैं'

मोहनलाल 'शरारत, मैं तू अपनी जान से सिर्फ और सिर्फ प्यार करूँगा, हाँ अगर तुम नहीं चाहती तू कोई बात नहीं'

रुचिका ने एक बार फिर से पलकों को झुका कर 'मैंने ऐसा कब कहा है'

मोहनलाल 'तू तुम चाहती हो की मैं तुम्हारे लबों को चुम कर उनका रास पियून'

रुचिका मोहनलाल के गले लग कर अपने चेहरे को मोहनलाल की चाहती में चुफा कर 'आप मुझे बहुत सताते हो'

मोहनलाल 'मैंने तुम्हे कान्हा सताया है, बल्कि तुमने मुझे सताया है, मैंने तू कोई शिकायत भी नहीं की'

रुचिका ने अपने हाथ की उंगली से मोहनलाल की चाहती को कुरेदते हुए 'मेरी इतनी हिम्मत कान्हा है'

मोहनलाल को उसके ऐसा करने से गुदगुदी होने लगी तू उसने उत्तेजित होते हुए अपने हाथ से उसके गाल को सहलाने लगा और दूसरे हाथ में पकड़ी हुई चिम्पैंगे का एक सिप लेकर उससे टेबल पर रखकर वंहा पॉट में राखी हुई एक चेरी उठाई और उससे रुचिका के मुंह की तरफ ले जाने लगा तू रुचिका ने उससे जैसे hi लेना चाहा तू मोहनलाल ने चेरी को अपने मुंह में दाल लिया और उससे ऐसे पकड़ा की उसका आधा हिस्सा बहार की ओर था. उसने रुचिका को इशारा किया की अब लो तू वो मन करने लगी. मोहनलाल उससे प्यार दिखते हुए अपनी आँखों के इशारे से लेने के लिए कहने लगा. रुचिका ने लेने के लिए मन बनाया और अपने मुंह को आगे बढ़ाया तू मोहनलाल ने चेरी को छोड़ा तू नहीं लेकिन उससे अपने मुंह के अंदर भी नहीं लिया. रुचिका ने अपने डेंटन में चीर्य को दबाया तू दोनों के होंठ बहुत पास पास आ गए और इतने पास आकर भी अगर कोई इन लबों का रास न ले तू उसकी प्यास और भी बढ़ जाती है और यही हाल मोहनलाल का था लेकिन वो अपनी प्यास को काबू में रखकर रुचिका की प्यास को बढ़ाना छह रहा था. मोहनलाल ने यह सोच कर आराम से रुचिका को चेरी कहते हुए देखता रहा और उसकी गरम गरम साँसें अपने चेहरे पर महसूस करके उत्तेजित होता रहा. मोहनलाल के मुंह से भी गरम गरम साँसें रुचिका के चेहरे पर पद कर उसके दिल की धड़कन को बढ़ा रही थी.

मोहनलाल के हाथ का दबाव उसके कंधे पर बढ़ने लगा और दूसरे हाथ से चिम्पैंगे का गिलास उठकर रुचिका के मुंह से लगा दिया तू रुचिका ने चेरी को छोड़कर उसमे से एक सिप लिया और फिर मोहनलाल ने बची हुई चेरी को कहते हुए 'जान तुमने तू इस चेरी में चिम्पैंगे से भी जयादा नशा घोल दिया है, अब चिम्पैंगे लेने की जरुरत कान्हा है, लेकिन तुम्हारी नाराजगी का ख्याल रखते हुए ले लेता हूँ' और फिर एक सिप लिया और रुचिका की तरफ बढ़ा दिया. फिर मोहनलाल ने भी सिप लिया और इस तरह से वो गिलास खली हो गया.

मोहनलाल ने अपने होठों को उसके माथे पर रखकर उससे चुम लिया तू रुचिका को उसका चूमना अच्छा लगा. ये चिम्पैंगे का सरूर था या मोहनलाल के होठों के स्पर्श और उसकी नजदीकी का. रुचिका ने अपने हाथ से उसकी चाहती को कुरेदती रही और मोहनलाल का जो हाथ कंधे पर था वो कंधे से गर्दन तक और गर्दन से बाजु तक घूमने लगा जिससे रुचिका को हल्का हल्का सरूर होने लगा. मोहनलाल ने अपने होठों को रुचिका के माथे को चूमते हुए उसकी आँखों पर ले आया और उसकी बांयी आँख के ऊपर अपने होठों को रखा तू रुचिका की आँख तू पहले से hi बंद हो गयी थी वो अब फड़फड़ाने लगी और रुचिका की सांसें तेज़ होने लगी.

मोहनलाल अपने होठों से एक आँख को चूमकर दूसरी आँख पर ले जाने लगा और उसका एक हाथ तू कंधे और गर्दन पर घूम रहा था और दूसरे हाथ से उसने रुचिका की टांग पर रखकर उससे सहलाने लगा. अपने होठों को आँखों से अब गलों की तरफ लेन लगा और उसका हाथ टांग पर घुटने से थोड़ा ऊपर घूमने लगा जिससे रुचिका की साँसे तेज़ होती रही और उसका दिल अब तेजी से धधकने लगा. उसने भी अपना एक हाथ मोहनलाल की पीठ की तरफ ले गयी और उसकी पीठ को सहलाने लगी. मोहनलाल अब अपने होठों से उसके गलों को चूमते हुए उसने रुचिका के दांये गाल को अपने मुंह में भर लिया जिससे रुचिका की हालत ख़राब होने लगी और उसके बूब्स अब उसके दिल की धड़कन के साथ साथ ऊपर नीचे होकर मोहनलाल की चाहती पर रगड़ खाने लगे. मोहनलाल ने एकदम से रुचिका के गलों को छोड़ दिया और रुचिका के चेहरे को देखने लगा जिस पर शर्म के भाव थे और उसकी साँसे तेज़ तेज़ चल रही थी. रुचिका ने जैसे hi मोहनलाल को उससे देखते हुए पाया तू उसने अपनी नज़रे झुका ली. मोहनलाल ने अपने उस हाथ को जो रुचिका की टांग पर था उससे धीरे धीरे ऊपर की तरफ लेन लगा तू रुचिका की हालत ख़राब होने लगी, उसने जल्दी से अपने एक हाथ से मोहनलाल के हाथ को पकड़ लिया और उसको ऊपर की तरफ जाने से रोकने का भरषक प्रयास करने लगी.

मोहनलाल ने उसकी टांग पर ऊपर जाने की बजाये अपने हाथ को वंही रखकर दूसरे हाथ को उसकी गर्दन पर लेजाकर उसके कान के नीचे सहलाने लगा, इस क्रिया से रुचिका की उत्तेजना एकदम से बढ़ गयी और उसके मुंह से सिसकने की आवाज़े आने लगी. मोहनलाल ने अब अपने हाथ को जो टांग पर था उससे इसी जगह पर रखे हुए hi उसकी मांसल टांग को हल्का हल्का दबाने लगा और फिर दबा कर उस पर दबाव काम कर देता. रुचिका की हालत एकदम से ख़राब होने लगी तू उसने अपने हाथ से मोहनलाल के हाथ को पकड़ कर उसकी उँगलियों में अपनी उँगलियों को डालकर अपनी टांग से अलग करने की कोशिश करने लगी.

मोहनलाल ने सोचा की अभी जबरदस्ती करना ठीक नहीं है, इसलिए उसने भी उसकी उँगलियों में अपने हाथ की उँगलियों को कास लिया और अपने हाथ को उसके हाथ के साथ टांग से थोड़ा ऊपर कर लिया. मोहनलाल अब अपने अंगूठे से उसके हाथ के पिछली तरफ को हल्का हल्का सहलाने लगा जिससे रुचिका का रकत परवाह बढ़ने लगा. रुचिका उस गुदगुदी से बचने के लिए अपने हाथ को मोहनलाल के हाथ से निकलकर उसकी पीठ की तरफ लेजाकर उसके गले लग गयी. मोहनलाल भी अपने उस हाथ को उसकी पीठ पर ले जाकर उससे सहलाते हुए कहने लगा 'तुम बहुत प्यारी हो'

रुचिका उसकी बात सुनकर ओर जयादा जोर से उसके गले लग गयी जिससे उसके बूब्स मोहनलाल की चाहती में हलचल मचने लगे मोहनलाल थोड़ी देर उसकी पीठ को सहलाते हुए बिच बिच में उसकी पीठ पर दबाव बढ़ा कर अपने साथ दबा देता जिससे रुचिका के मुंह से सिसकी निकल जाती और फिर वो दबाव काम कर देता. मोहनलाल के ऐसा करने से रुचिका के बूब्स बार बार मोहनलाल की चाहती से दबकर उसके दिल की धड़कन को बढ़ा देते और उससे ऐसा लगने लगा जैसे रक्त का परवाह उसके शरीर की नदियों में बढ़ता जा रहा था और एक अजीब सी बेचैनी उसके मन में चल रही थी.

मोहनलाल ने रुचिका की पीठ से हाथ हटाकर टेबल पर रखे हुए गिलास में चिम्पैंगे डालने के लिए ठोढ़ सा झुका तू उसका वजन रुचिका पर आ गया जिससे उसके बूब्स तू बहुत जयादा डाब गए जिससे उसकी हालत अजीब सी होने लगी. मोहनलाल गिलास में चिम्पैंगे डालकर उससे रुचिका के मुंह के पास लेकर उससे पीने के लिए कहने लगा तू उसने देखा की रुचिका के गले में पड़ा हुआ दुप्पट्टा एक तरफ हैट गया था और रुचिका के कैसे हुए बूब्स का ऊपर का हिस्सा काफी हद तक उसके सूट में से उजागर हो गए थे और मोहनलाल तू उन बूब्स की खूबसूरती में खो सा गया और वो रुचिका को चिम्पैंगे पिलाना भूल गया. रुचिका ने जब उससे अपने बूब्स को देखते हुए पाया तू उसने अपने दुप्पट्टे को ठीक करने के लिए जैसे hi हाथ बढ़ाया तू मोहनलाल की तन्द्रा टूटी और उसके हाथ में पकड़ा हुआ गिलास थोड़ा सा छलका और रुचिका के दुप्पट्टे पर गिर गया तू रुचिका मोहनलाल की गोदी से उठकर दुप्पट्टे को हटा कर एक टिश्यू से अपने बूब्स के ऊपर पड़ी चिम्पैंगे को हटाना छह रही थी. तब तक मोहनलाल भी उठकर खड़ा हो गया और अपनी जेब में से रुमाल निकलकर उसने रुचिका के पीछे जाकर अपने हाथ को आगे लेजाकर उसके बूब्स के ऊपर जैसे hi हाथ लगाया तू रुचिका और मोहनलाल दोनों को करंट लगा. रुचिका की साँसें फिर से तेज़ हो गयी और उन साँसों की गति की वजह से उसके बूब्स ऊपर नीचे होने लगे. मोहनलाल के हाथ को उनका ऊपर नीचे होना इतना सुखद एहसास दे रहा था की शब्दों में ब्यान करना मुश्किल है.

मोहनलाल और आगे बढ़ता उससे पहले रुचिका का हाथ उसके हाथ के ऊपर आकर उससे रोकते हुए शर्माने लगी. मोहनलाल ने कहा 'साफ़ कर देता हूँ' तू रुचिका ने अपनी आँखों को नीचे करते हुए 'मैं कर लुंगी'

मोहनलाल 'मैं कर देता हूँ'

रुचिका 'प्लीज, मैं कर लुंगी न'

मोहनलाल ने जयादा जिद नहीं की और अपने रुमाल को उससे पकड़ा दिया. रुमाल लेकर रुचिका मोहनलाल की तरफ पीठ करके चिम्पैंगे को साफ़ करने लगी और तब तक मोहनलाल उससे पीछे से निहारता रहा और फिर वापिस चिम्पैंगे का गिलास उठाकर रुचिका की तरफ जाने लगा और जैसे hi उसकी तरफ पंहुचा तू रुचिका उसी वक़्त पलट गयी जिससे मोहनलाल के हाथों में पकड़ा हुआ गिलास रुचिका से टकरा गया और चिम्पैंगे उछाल कर उसके चेहरे और गर्दन पर चालक गयी.

रुचिका 'सॉरी, मुझे पता नहीं था की आप मेरे पीछे आ गए हैं'

मोहनलाल 'पहली बात तू तुम्हे सॉरी नहीं बोलना चाहिए और अगर किसी को बोलबना चाहिए तू वो मुझे, एनीवे लाओ मैं साफ़ कर देता हूँ'

रुचिका ने रुमाल दिखाया जो अब तक चिम्पैंगे से भीग चूका था. मोहनलाल ने आगे बढ़कर गिलास को उसके मुंह से लगाकर जो थोड़ी सी चिम्पैंगे बची हुई थी उससे सिप करने के लिए कहा और बाकि बची हुई चिम्पैंगे खुद पि ली. उसके बाद मोहनलाल ने कहा 'मुझे इस चिम्पैंगे को साफ़ करने के लिए रुमाल की जरुरत नहीं है'

रुचिका 'फिर'

मोहनलाल ने उसके दोनों कन्धों पर हाथ रखकर उससे अपने पास किया और अपने मुंह को उसके चेहरे के पास ले जाकर उसके चेहरे पर छलकी चिम्पैंगे को अपने होठों से चाटने लगा, जिससे रुचिका के मुंह से सिसकने की आवाज़ निकलने लगी. मोहनलाल उसके चेहरे को छत्ते हुए उसकी गर्दन पर आ गया तू रुचिका की गर्दन पर जैसे hi मोहनलाल के होठों का स्पर्श हुआ तू रुचिका से बर्दाश्त करना मुश्किल होने लगा और उसने अपने हाथों से मोहनलाल को दूर करते हुए कहने लगी 'बस ना, मैं साफ़ कर लुंगी'

रुचिका के चेहरे को दोनों हाथों में पकड़ते हुए मोहनलाल कहने लगा 'मैं क्या तुम से अलग हूँ'

रुचिका 'नहीं, मैंने ऐसा कब कहा'

मोहनलाल 'लेकिन मुझे अगर अलग नहीं मानती तू मैं hi साफ़ कर देता हूँ'

रुचिका उसकी बात सुनकर शर्मा गयी और शरमाते हुए 'जैसी आपकी मर्जी'

मोहनलाल ने अपने होठों को उसके गलों पर उसके होठों के बिलकुल नजदीक रखा और उसके गलों से चिम्पैंगे और उसके बदन की सुगंध का आनंद लेते हुए उसकी गर्दन की तरफ होठों को ले जाने लगा और अपने एक हाथ को उसकी कमर पर ले जाकर उससे अपने से नजदीक कर लिया. मोहनलाल उसकी गर्दन को चूमता रहा और रुचिका के मुंह से सिसकने की आवाज़े निकलती रही. उसके बूब्स उत्तेजना में ऊपर नीचे होकर मोहनलाल की चाहती पर रगड़ते हुए मोहनलाल के दिल में हलचल मचने लगे.

मोहनलाल ने अब अपने होठों को गर्दन से उसके कंधे की तरफ ले गया और वंहा पर भी कुछ बुँदे थी उन्हें चाट लिया. मोहनलाल के होठों का ब्राह्मण चलता रहा, कभी गर्दन पर तू कभी एक कंधे पर और कभी दूसरे कंधे पर. ऐसा करते मोहनलाल ने रुचिका को बहुत जयादा उत्तेजित कर दिया था. रुचिका के हाथ अपने आप hi मोहनलाल की पीठ पर पंहुच गए थे और उसकी पीठ को अपनी मुट्ठियों में भर रही थी. मोहनलाल उसकी गर्दन को चाटता हुआ अब नीचे की तरफ उसके बूब्स की तरफ जाने लगा और बूब्स के ऊपरी हिस्से पर जैसे hi अपने होठों से चाह्त्ता तू रुचिका मोहनलाल को दूर करने लगी. मोहनलाल ने पहले तू अपने चेहरे को ऊपर उठाया लेकिन फिर जल्दी से रुचिका को अपनी बांहों में पकड़ कर उसके बूब्स के ऊपरी हिस्से को छटने लगा. रुचिका ने अपने दोनों हाथों से मोहनलाल का सर पकड़ लिया और उससे अपने से दूर करने की कोशिश करने लगी लेकिन कर न पायी. मोहनलाल अब उसके बूब्स के उप्परि हिस्से को छत्ते हुए वंहा चूमने भी लगा. रुचिका को अब शर्म और दर के साथ साथ मजा आने लगा. उसकी धमनियों का रक्त परवाह बढ़ने लगा. मोहनलाल ने अब अपनी जीभ को निकलकर सूट की लाइन के साथ साथ अपनी जीभ फिरनी शुरू कर दी और अपनी जीभ को उसके सूट के अंदर डालने की कोशिश करने लगा. सूट टाइट तू था, लेकिन रुचिका के हिलने डुलने से उसकी जीभ सूट की लाइन के अंदर पंहुच hi गयी और उसके शरीर पर अपना हुनर दिखने लगी. रुचिका की उत्तेजना बहुत जयादा बढ़ गयी थी. उससे शर्म भी बहुत आ रही थी, उसके मुंह से बहुत साडी आवाज़े भी निकल रही थी. उत्तेजना के वशीभूत होकर रुचिका जो अब तक मोहनलाल के सर को अपने से दूर करने की कोशिश कर रही थी, अब अपने बूब्स के ऊपरी हिस्से पर दबाने लगी.

मोहनलाल ने जैसे hi यह महसूस किया तू उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा. उसने अपनी जीभ से उसके सूट के अंदर उसके शरीर पर हलचल मचने लगा. तभी मोहनलाल को जीभ पर सूट के अंदर चाटने से कुछ सख्त सा टकराया. असल में उसकी जीभ से रुचिका की ब्रा का स्ट्राप टकराया. मोहनलाल ने जैसे hi यह महसूस किया तू जोश में आकर अपने डेंटन से सूट की लाइन को पकड़ कर एक तरफ किया और अपने होठों को ब्रा के स्ट्राप के पास उसकी कांखों की साइड में ले जाने लगा. अब रुचिका के लिए बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल हो गया था, वो अब मुंह से बहुत जोर से सिसकने की आवाज़े नीलकलती रही और मोहनलाल अपने कराये में लगा रहा.

मोहनलाल के हाथ जो उसकी पीठ पर थे वंहा पर सहलाते हुए पीठ पर ऊपर नीचे घूम रहे थे. आगे से मोहनलाल उसके स्ट्राप के पास चुम और छत्त रहा था और पीछे से उसका हाथ ब्रा के स्ट्राप पर पंहुच कर उससे खेलने लगा. रुचिका जोश में आकर अपने बूब्स को मोहनलाल के चेहरे पर गलों के पास रगड़ने लगी. मोहनलाल भी कान्हा पीछे रहने वाला था, उसने पीछे से ब्रा के स्ट्राप को पकड़ कर उसके शरीर से दूर खींचने लगा तू रुचिका को ब्रा टाइट होने की वजह से बूब्स पर थोड़ा दबाव बढ़ने से दर्द होने लगा, उसने अपने शरीर को मोहनलाल के शरीर से अलग किया. मोहनलाल ने ब्रा का स्ट्राप को एक डैम से छोड़ दिया, जिससे वो स्ट्राप जाकर बड़ी जोर से रुचिका की पीठ पर लगा जिससे उसके मुंह से एक जोरदार चीख निकली.
 
अपडेट 79

मोहनलाल के हाथ जो उसकी पीठ पर थे वंहा पर सहलाते हुए पीठ पर ऊपर नीचे घूम रहे थे. आगे से मोहनलाल उसके स्ट्राप के पास चुम और छत्त रहा था और पीछे से उसका हाथ ब्रा के स्ट्राप पर पंहुच कर उससे खेलने लगा. रुचिका जोश में आकर अपने बूब्स को मोहनलाल के चेहरे पर गलों के पास रगड़ने लगी. मोहनलाल भी कान्हा पीछे रहने वाला था, उसने पीछे से ब्रा के स्ट्राप को पकड़ कर उसके शरीर से दूर खींचने लगा तू रुचिका को ब्रा टाइट होने की वजह से बूब्स पर थोड़ा दबाव बढ़ने से दर्द होने लगा, उसने अपने शरीर को मोहनलाल के शरीर से अलग किया. मोहनलाल ने ब्रा का स्ट्राप को एक डैम से छोड़ दिया, जिससे वो स्ट्राप जाकर बड़ी जोर से रुचिका की पीठ पर लगा जिससे उसकमुंह से एक जोरदार चीख निकली.

मोहनलाल को जैसे hi आभाष हुआ की उसके स्ट्राप छोड़ने से रुचिका को बहुत जोर से उसकी पीठ पर लग गयी है तू उसने रुचिका को एक डैम छोड़ दिया और घूमकर उसके पीछे पंहुच गया और उसकी पीठ को सहलाते हुए 'सॉरी' बोलने लगा. रुचिका को वाकई में बहुत तेज लगी थी, इसलिए उसकी आँखों में पानी तक आ गया था. मोहनलाल रुचिका की पीठ को जब सेहला रहा था तू उसने रुचिका के बालों को उसकी पीठ से हटाकर एक तरफ कर दिए थे. उसके सहलाने से रुचिका को थोड़ा आराम मिलने लगा. फिर थोड़ी देर में रुचिका को सहलाते हुए मोहनलाल की नज़र उसकी बेदाग गर्दन और उसके नीचे नग्न हिस्से पर पड़ी तू उसके दिल में रुचिका को प्यार करने का मन करने लगा.

मोहनलाल ने थोड़ा रुचिका की तरफ होकर उसकी गर्दन के नीचे पीठ पर अपने होठों को रख दिया तू रुचिका के मुंह से निकला 'आह!' मोहनलाल को उस आवाज़ को सुनते hi जोश आ गया और उसने अपने होठों को उसकी पीठ को चूमते हुए ऊपर गर्दन की तरफ ले जाने लगा तू रुचिका के मुंह से कई तरह की आवाज़े आने लगी. मोहनलाल ने जैसे hi अपने होठों को उसकी गर्दन के पीछे रगड़ना शुरू किया तू रुचिका के मुंह से 'आ. .आठ... ीे ...ीे. Iii...iii ' की आवाज़े बीच बीच में निकलती रही और मोहनलाल का जोश बढ़ने लगा. मोहनलाल का जोश बढ़ने के साथ hi उसके होठों की गर्दन और पीठ पर घूमने की गति बढ़ने लगी. रुचिका के मुंह से आवाज़े तू निकल रही थी और उसके दिल की धड़कन भी बढ़ रही थी. उससे भी जोश आने लगा था लेकिन शर्म की वजह से कुछ कर नहीं पा रही थी, लेकिन जैसे hi मोहनलाल के होठों ने उसकी गर्दन के पीछे बिलकुल बीच में छुआ (जो की बहुत hi सवेंदन शील बिंदु होता है) तू रुचिका के हाथों ने अपने आप hi ऊपर होकर मोहनलाल के सर को पकड़ लिया.

मोहनलाल की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और उसने भी अपने हाथों को उसकी कमर से होते हुए उसके पेट पर ले गया और उसके पेट पर जैसे hi अपने हाथों से सहलाया रुचिका के मुंह से 'आए. . .आह, aa....aaahh... Iiiiii......iiiii..... aaaa......aaaa....hhhh' और फिर लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी. रुचिका ने मोहनलाल के सर को पकड़ कर अपनी गर्दन के पीछे से आगे लेन की कोशिश करने लगी और वो थोड़ा कामयाब भी हुई. मोहनलाल का चेहरा अब पीछे से उसके कंधे पर आ गया. मोहनलाल ने इसका फायदा उठाते हुए अपने होठों को उसके गलों के नीचे गर्दन पर रगड़ने लगा तू रुचिका की हालत पतली होने लगी उसका रकत परवाह बढ़ने लगा और वो इससे बचने के लिए थोड़ा आगे होने की कोशिश करने लगी. इससे हुआ यह की अब मोहनलाल के होठों ने उसके कान के नीचे गर्दन को छुआ और उसके हाथ ने रुचिका के बूब्स के बिलकुल नीचे उसके पेट को छुआ. यह दोहरी मार रुचिका के लिए भरी पड़ने लगी और उसके मुंह से बहुत तेज तेज सांसों के साथ उसके मुंह से 'aaa.....ii...hh,. n...aa...hhiii....n. न' निकलने से मौहाल को उत्तेजित करने लगी. मोहनलाल ने इस उत्तेजित महल का फायदा उठाते हुए आगे बढ़ना शुरू किया.

मोहनलाल का एक हाथ बूब्स के निचले हिस्से को सूट के ऊपर से hi कुरेदने लगा और दूसरे हाथ से उसके पेट को बड़े प्यार से सहलाते हुए उससे अपने साथ चिपकने लगा. उसके होठों का कान के नीचे से होते हुए जैसे hi उसके कान की लौ को छुआ तू रुचिका एकदम से पलट कर मोहनलाल के गले लग गयी और उससे अपने साथ जोर से भीचते हुए लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी.

मोहनलाल ने भी अपने हाथों को उसकी पीठ पर ले जाकर उससे कास लिया. उसने अपने हाथों को उसकी बगल से नीचे निकल कर उसकी पीठ पर ले गया जिससे उसके बूब्स मोहनलाल की बाजुओं से भी डाब गए और दबकर मोहनलाल की छथि पर और जयादा दबाव डालने लगे. अब मोहनलाल ने रुचिका के चेहरे को गलों पर चूमते हुए उसके लबों के पास अपने होठों को चलने लगा लेकिन उसके लबों को अपने होठों में नहीं लिया. ऐसा करने से रुचिका की उत्तेजना बढ़ती hi जा रही थी और वो दिल से चाहने लगी थी की उसके लबों को होठों की कैद में दे दे, लेकिन नारी लज्जा ने उससे रोक रखा था, परन्तु उत्तेजित तू वो हो चुकी थी, इसलिए अपने लबों को बार बार जान भुजकर मोहनलाल के होठों के पास ले जाने लगी ताकि वो इन्हे पकड़कर उसका रसपान करे.

मोहनलाल उसको उलझा कर अपने हाथों को उसकी पीठ पर चलता हुआ उसके नितम्बों की तरफ जाने लगा और जैसे hi उसने रुचिका के नितम्बों पर अपने हाथों को रखा तू रुचिका के मुंह से निकला 'uu....mmmm ... हहहह' . मोहनलाल ने जैसे hi उसके लैब खुले तू उन लबों को अपने होठों में लेकर उसकी आवाज़ों को अपने मुंह में hi दबा दिया.

मोहनलाल ने रुचिका के होठों को बहुत hi हलके हलके चूमना शुरू किया जिससे रुचिका की प्यास बढ़ने लगी. उसका मन कर रहा था की वो उससे जोर जोर से चूसे लेकिन शर्म के कारन कुछ कर नहीं पा रही थी. उसने अपनी तरफ से मोहनलाल की पीठ पर अपने होठों से उससे कसना शुरू कर दिया जो मोहनलाल के लिए एक इषारा था लेकिन वो अभी उसकी आग को ओर जयादा भड़काना चाहता था, इसलिए हलके हलके hi चुस्त रहा. रुचिका से अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था इसलिए उसने अपने लबों में उसके होठों को दबाना शुरू कर दिया. मोहनलाल इस बात का फायदा उठाकर उसके नितम्बों पर अपने हाथों को लेजाकर उन्हें सहलाते हुए अपने हाथों से उसके गुदगुदे नितम्बों का आनंद लेने लगा लेकिन वंहा भी कुछ जयादा नहीं दबाया.

रुचिका अब अपने पंजो पर ऊपर उठकर मोहनलाल के होठों को अपने लबों में खूब जोर से दबाना छह रही थी. जब वो यह कर रही थी तू मोहनलाल के हाथ उसके सूट के कटाव में से उसकी नंगी पीठ पर पंहुच गए और जैसे hi रुचिका को अपनी नंगी पीठ पर मोहनलाल के हाथों का स्पर्श हुआ तू उसकी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे. वो मोहनलाल के हाथों को वंहा से हटाना चाहती थी लेकिन अपने लबों से उसके होठों को छोड़ना भी नहीं चाहती थी. दोनों बातें संभव नहीं थी इसलिए उसने होठों का आनंद लेना जयादा जरुरी समझा जिससे मोहनलाल बिना रोक टोक के अपने हाथों को उसकी नंगी पीठ पर चला सकता था.

मोहनलाल ने अपने एक हाथ की उँगलियों से उसकी सलवार की लाइन के साथ साथ सहलाना शुरू किया और दूसरे हाथ से उसकी पीठ पर ऊपर नीचे सहलाना शुरू किया. मोहनलाल अपने दूसरे हाथ को आसानी से ऊपर नीचे करने में असमर्थ था क्योँकि सूट का कुरता बहुत टाइट था जिससे उसके हाथ ऊपर नहीं जा पा रहे थे. मोहनलाल उस हाथ को पीठ से पेट पर लेन लगा तू रुचिका की हालत ख़राब होने लगी और उसके लबों ने मोहनलाल के होठों को दबाया हुआ था अब वो उन् होठों पर उत्तेजना वश जोर डालने लगी.

अपने मुंह को ओर जयादा खोल कर उसके होठों को अपने मुंह में और अंदर तक लेने लगी जिससे मोहनलाल भी जोश में आने लगा. उसने भी रुचिका के लबों को अपने होठों में काफी अंदर तक भर लिया. अब उन् दोनों में होड़ लगी हुई थी, जयादा से जयादा अपने मुंह में दूसरे के मुंह को लेने की.

मोहनलाल ने इस तरह उसको उलझाए हुए अपने एक हाथ से उसके बूब्स के नग्न भाग को अपनी उंगली से छूने की कोशिश करने लगा. पहले तू वो कामयाब नहीं हुआ लेकिन रुचिका के हिलने डुलने से उसकी एक उंगली बड़ी मुश्किल से उसके बूब्स पर पंहुच कर उससे दबाने लगी तू रुचिका को बहुत जोर का करंट लगा. उसने मोहनलाल के होठों को छोड़ कर मोहनलाल के हाथ को वंहा से निकलना छह लेकिन मोहनलाल ने उससे ऐसा करने न दिया. मोहनलाल ने अपनी उंगली को उसके बूब्स पर हलके हेक दबाते हुए दूसरे हाथ से उसकी सलवार के पास उंगली घूमते हुए अपनी उंगली से उसके नितम्बों की दरार में सलवार के ऊपर से फेरना शुरू hi किया था की रुचिका बहुत गहरी गहरी साँसें लेती हुई मोहनलाल के गले लग गयी और अपने बूब्स को मस्ती में आकर मोहनलाल की छाती पर रगड़ने लगी. मोहनलाल भी जोश में आकर अब अपने एक हाथ से उसके नितम्ब को दबाने लगा और दूसरे हाथ की उंगली से बूब्स पर दबाव बढ़ने लगा तू रुचिका को बहुत उत्तेजना होने लगी और इस उत्तेजना में वो अपने गाल को मोहनलाल के गलों से रगड़ने लगी.

मोहनलाल ने अब अपने हाथ को उसके नितम्बों पर फिरते हुए उसकी टांगों के पिछले हिस्से पर जैसे hi फिराया तू रुचिका की उत्तेजना अपने चरम पर पंहुचने लगाई और इधर मोहनलाल भी उत्तेजित होने लगा और अपने हाथ को उसकी सलवार के अंदर डालने की कोशिश करने लगा तू रुचिका एकदम से मोहनलाल से अलग होकर लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी.

मोहनलाल उसके पीछे जाकर उसकी पीठ से सत्कार अपने हाथों को उसके पेट पर लेजाकर उससे कास लिया और उसके कानो को अपने होठों से रगड़ते हुए उसके कान में कहने लगा 'जान, लव यू' और उसके कान को चूमने लगा. रुचिका भी अपनी साँसों को सँभालते हुए एकदम से मुड़कर उसके गले लगते हुए 'लव यू' मोहनलाल ने उससे अपने से कास कर चिपटा लिया और कहने लगा 'सच्ची' तू रुचिका के चेहरे पर स्माइल आ गयी और अपने पंजो पर उचकते कहने लगी 'हाँ' और उसके गले में अपनी बांहे डालकर उससे चिपक गयी. मोहनलाल ने उससे जैसे hi अपने से चिपटाया तू उसका लिंग जो अब तक तन चूका था वो जाकर उसकी योनि पर टक्कर मरने लगा जिससे रुचिका के मुंह से निकला 'si.......iii.....i' जिससे मोहनलाल को तू मजा आने लगा और रुचिका थोड़ा सा पीछे हो गयी.

जैसे hi रुचिका पीछे हुई तू मोहनलाल ने अपने हाथों को उसकी कांखों के नीचे ले गया और उससे पकड़कर अपनी तरफ करने लगा जिससे उसके दोनों हाथों की चार चार उँगलियों ने तू कांखों से उसकी कमर को पकड़ा हुआ था और अंगूठे से उसके बूब्स डाब रहे थे जिससे रुचिका की भावनाएं भड़काने लगी. मोहनलाल ने अपने अंगूठे से दबाव डालते हुए एक हाथ को उसकी पीठ पर ले गया और दूसरे हाथ से उसके एक बूब के ऊपर रख दिया. रुचिका के मुंह से सिसकने की आवाज़ आयी तू मोहनलाल ने हलके से उसके बूब को दबा दिया. रुचिका के मुंह से निकला 'aa...ah' और अपने एक हाथ को मोहनलाल के हाथ के ऊपर रखकर उससे शायद रोकना छह रही थी, लेकिन ऐसा नहीं लगा की वो उससे हटाना छह रही हो.

मोहनलाल ने दुबारा बूब को दबाया तू रुचिका सीत्कार करने लगी. मोहनलाल को मजा आने लगा और अपने दूसरे हाथ को कुर्ते के कटाव से उसके नंगी पीठ पर सलवार की लाइन ले पास ले गया. जैसे hi मोहनलाल आगे से बूब दबाता तू वो थोड़ा पीछे होने की कोशिश करती जिससे उससे उल्टा झुकना पड़ता. मोहनलाल की उंगली को इतने में उसकी सलवार में उंगली डालने का मौका मिल गया. अब तू मोहनलाल ने रुचिका पर डबल अटैक करना शुरू कर दिया. वो आगे से उसके बूब को दबाता और पीछे से अपनी उंगली से उसके नितम्ब पर सलवार के अंदर से सहलाने लगा. उससे सलवार के अंदर रुचिका की पैंटी का आभास होने लगा तू यह सोचकर hi वो उत्तेजित होने लगा. उसके लिंग में रकत का परवाह बढ़ने लगा और वो टैंकर रुचिका की योनि के पास जैसे hi ठोकर मरता तू रुचिका पीछे की तरफ होने लगती.

मोहनलाल ने अब उसके बूब को सहलाते हुए दूसरे बूब पर अपने हाथ को ले गया और उससे सहलाने लगा. रुचिका से अब उत्तेजना बर्दाश्त नहीं हो रही थी तू वो मोहनलाल की बांहों से निकलने के लिए कोशिश करने लगी लेकिन निकल नहीं पायी. इस कोशिश में वो उसकी बांहों में उससे उलटी हो गयी. अब रुचिका की पीठ मोहनलाल के सीने से लगी हुई थी.

मोहनलाल ने अपने हाथ से उसके बूब्स को बारी बारी से दबाना चालू रखा और उसके लिंग ने उसके नितम्बों पर ठोकर मारनी शुरू कर दी. रुचिका की सिसकारियों की आवाज़े मोहनलाल की उत्तेजना में आग में घी का काम कर रही थी. मोहनलाल ने अब अपने हाथ को उसके कुर्ते के अंदर डालकर उससे पकड़ना छह तू रुचिका ने अपने दोनों हाथों से उसके हाथ को पकड़ लिया. रुचिका ने जैसे hi अपने हाथों से उसके हाथ को पकड़ा तू जल्दी से अपने दूसरे हाथ को कुर्ते के कटाव में से ले जाकर उसके पेट पर रख दिया जिससे रुचिका की आग भड़काने लगी. उस पर कई तरफ से हमला हो रहा था. उसके नितम्बों पर मोहनलाल का लिंग ठोकर मार रहा था. उसकी गर्दन पर मोहनलाल के हाथों ने उत्पात मचाया हुआ था और उसके पेट और बूब्स पर मोहनलाल के हाथ अपना हुनर दिखा रहे थे. रुचिका के लिए इतना सब बर्दाश्त करना उसके बस से बहार होता जा रहा था. उसके दिल की धड़कन बढ़ी हुई थी, उसके रकत का परवाह उसकी योनि की तरफ बढ़ने लगा और उससे अजीब सी बेचैनी होने लगी.

मोहनलाल का एक हाथ जो उसके पेट पर था उससे धीरे धीरे पेट पर फिरते हुए सलवार की लाइन के साथ साथ फिरते हुए अपने हाथ को उसकी सलवार के अंदर डालने की कोशिश करने लगा तू उसका हाथ सलवार के नदी से उलझ गया और रुचिका ने जैसे hi मोहनलाल से बचने के लिए उससे दूर जाना चाहा तू मोहनलाल के हाथ में उलझ गया नाडा खुल गया और उसकी सलवार नीची गिर गयी.
 
अपडेट 80

मोहनलाल का एक हाथ जो उसके पेट पर था उससे धीरे धीरे पेट पर फिरते हुए सलवार की लाइन के साथ साथ फिरते हुए अपने हाथ को उसकी सलवार के अंदर डालने की कोशिश करने लगा तू उसका हाथ सलवार के नदी से उलझ गया और रुचिका ने जैसे hi मोहनलाल से बचने के लिए उससे दूर जाना चाहा तू मोहनलाल के हाथ में उलझ गया नाडा खुल गया और उसकी सलवार नीची गिर गयी.

रुचिका अपनी सलवार को उठाने के लिए झुकी तू मोहनलाल उसकी टांगों की खूबसूरती में खोया हुआ था और रुचिका के बैठने से उसके ध्यान में व्यवधान पद गया क्योँकि रुचिका के बैठने से टांगों पर कुर्ती आ गयी. मोहनलाल इस बढ़ा से परेशान हो गया परन्तु दूसरे hi पल वो खुश भी हो गया.

असल में रुचिका के बैठने और झुकने की वजह से उसका पल्लू ज़मीन पर गिर गया और उसके सीना नग्न हो गया. मोहनलाल तू ये दृश्य देखकर अत्ति प्रस्सन हुआ. मोहनलाल को रुचिका के कैसे हुए बूब्स कुर्ती के अंदर तक दिखाई दे रहे थे. बूब्स इतने प्यारे थे की मोहनलाल तू दूधिया बूब्स को ब्रा में से झांकते हुए देखकर दूसरी दुनिया में hi पंहुच गया. उसकी नज़रे वंहा से हटने का नाम hi नहीं ले रही थी क्योंकि सिर्फ बूब्स hi नहीं बल्कि दोनों बूब्स के बीच के काफी गहरी घाटी के भी दर्शन हो रहे थे. मोहनलाल का मन कर रहा था की रुचिका ऐसे hi बैठी रहे और वो उससे निहारता रहे, लेकिन उसकी ये तम्मना पूरी नहीं हो पायी क्योँकि रुचिका अपनी सलवार को पकड़ कर कड़ी होने लगी.

मोहनलाल ने जैसे hi यह देखा तू उससे लगा की उसने मौका खो दिया, इसलिए मौके को हाथ से न जाने देने के लिए वो रुचिका को पकड़ कर अपने हाथों को रुचिका की सलवार पर ले जाकर उससे नीची करने की कोशिश करने लगा. रुचिका के चेहरे पर शर्म और भय साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था और उसके चेहरे पर ऐसे भावों को देखकर मोहनलाल को हंसी आने लगी और वो रुचिका की सलवार से हाथ हटाकर उसके चेहरे को पकड़ कर कहने लगा 'जान अब तुम क्योँ घबरा रही हो, अब तू तुम मेरी बीवी हो और यह सब नार्मल है'

रुचिका ने बिना कुछ बोले अपनी आँखें झुका ली और सलवार को कास कर पकड़ लिया. मोहनलाल ने उसके चेहरे को पकड़े हुए उसके लबों पर अपने होठों को रख दिया और धीरे से बोलै 'लव यू माय स्वीट हार्ट' और फिर उसके होठों को चूसने लगा. पहले तू रुचिका ने सोचा की वो उसको पकड़ ले लेकिन फिर सलवार के बारे में सोचकर अपने आप को सिथिर कर लिया.

मोहनलाल ने जब देखा की रुचिका को चूमने चाटने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही तू मोहनलाल को मजा आना बंद हो गया और उसने रुचिका से कहा 'क्या बात है, अच्छा नहीं लग रहा तू नहीं करते, जब कभी मन करेगा तू फिर कर लेंगे'

रुचिका को लगा की शायद वो उससे नाराज हो गए हैं तू जल्दी से उनको पकड़ने के लिए अपने हाथों को आगे बढ़ाया तू उसकी सलवार नीची जाने लगी. रुचिका ने जल्दी से अपनी सलवार को दुबारा पकड़ा और फिर एक हाथ से सलवार और दूसरे से मोहनलाल को पकड़ने लगी, साथ में यह कहा 'मैं आप से बहुत प्यार करती हूँ और आप प्लीज मुझसे नाराज न हो'

मोहनलाल ने पलटकर उस को अपने गले लगा लिया और उसकी पीठ को सहलाते हुए 'मैं तुमसे नाराज नहीं हूँ और होना भी नहीं चाहिए. देखो, यह जो भी हो रहा है, उसमे अगर किसी एक की भी मर्जी न हो तू जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए. उस से दोनों को hi मजा नहीं आएगा. रिलैक्स हो जाओ. ऐसा होता है की कभी मूड नहीं बन पता है और मैंने तुम्हे पहले भी कहा था की हम दोनों में कोई फरक नहीं है और जब तुम्हारा दिल होगा तभी आगे बढ़ेंगे'

रुचिका उसकी भावपूर्ण बातों को सुनकर उसके गले लगा गयी और अपने हाथों से उसकी पीठ को कास लिया. रुचिका के बूब्स ने मोहनलाल की चाहती पर कहर धना शुरू कर दिया. दोनों के हाथ एक दूसरे की पीठ पर अपने साथी को सेहला रहे थे. मोहनलाल ने अपनी जीभ निकलकर उसके लबों पर फिरकर उससे सुकून देने लगा. रुचिका भावनाओं में बहकर सब भूल चुकी थी और मोहनलाल इस बात का फायदा उठाते हुए अपने हाथों से उसकी पीठ को सहलाते हुए उसके नितम्बों पर ले गया और उससे अपने आगोश में ले कर उससे अपने शरीर का बहन करने लगा और जैसे hi मोहनलाल के लिंग का दबाव उसकी योनि के ऊपरी हिस्से पर पड़ा तू उससे याद आया की उसकी सलवार तू नीची गिर गयी है.

मोहनलाल ने उसके नितम्बों पर कुर्ती के ऊपर से hi अपने हाथों के दबाव को धीरे धीरे बढ़ने लगा तू रुचिका को लिंग के दबाव से बेचैनी होने लगी और वो थोड़ा दांये बांये होने लगी जिससे उसके बूब्स मोहनलाल की चाहती पर रगड़ खाकर उसकी भावनाओं को और भड़काने लगे. मोहनलाल के हाथ इस प्रक्रिया में फिसलकर उसकी कुर्ती के कटाव पर पंहुच कर रुचिका की नग्न टांगों का आभास हुआ तू उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा. उसके होठों ने जैसे hi रुचिका की मक्खन जैसी कोमल टांगों पर अपने हाथों को फेरा तू रुचिका के मुंह से निकला 'aa.....aa......hh' और उसके साँसें तीव्र गति से चलने लगी. मोहनलाल जैसे hi आगे बढ़ने लगा तू हांफती हुई रुचिका अपने हाथों से उसके हाथों को थामकर अपनी टांगों से दूर करने लगी.

मोहनलाल को अब जोश आने लगा था और उसने रुचिका के होठों को अपने होठों में लेकर उसकी उखड़ी हुई साँसों पर अपना कब्ज़ा कर लिया और उससे अब जोर जोर से चूसने लगा. रुचिका की हालत ख़राब होने लगी और उसने अपने हाथों को मोहनलाल के हाथों से हटाकर उसके सर पर ले गयी और उससे पकड़ कर पहले तू अपने से दूर और फिर अपने होठों पर दबाने लगी.

मोहनलाल अब अपने आज़ाद हुए हाथों को उसकी नरम मुलायम टांगों पर ले जाकर उन्हें सहलाने लगा तू रुचिका की उत्तेजना अब बहुत बढ़ गयी थी और वो मोहनलाल के सर को अपने होठों पर दबाव बढाती जा रही थी और उसके लिंग के दबाव से बचने के लिए इधर उधर नृत्ये करते हुए मोहनलाल को बूब्स की गर्मी का आनंद देने लगी.

मोहनलाल ने जैसे hi उसकी टांगों को सहलाने के लिए झुकना पड़ा तू रुचिका को अपनी सलवार का ध्यान आया और उसने भी मोहनलाल के होठों को छोड़कर और उससे थोड़ा अलग होते हुए झुकाने लगी ताकि अपनी सलवार को उठा सके. मोहनलाल ने उसको झुकते हुए देखा तू उसने रुचिका की टांगों के नीचे से एक हाथ को निकलकर उसकी कमर के नीचे ले गया और जैसे hi वो थोड़ा झुकी तू उससे अपनी बांहों में भरकर अपनी गॉड में ले लिया जिससे उसके मुंह से निकला 'aaau...cch'. अब रुचिका के पास अपनी टांगों की नगन्ता छुपाने का कोई मौका नहीं था तू शर्मा कर मोहनलाल की छथि में अपने सर को कर लिया और अब मोहनलाल उससे लेकर बीएड पर आ गया. मोहनलाल ने उससे बीएड पर लिटाया तू उसने बीएड से उठकर बीएड पर बैठे बैठे मोहनलाल की छथि में अपने सर को छुपा लिया और तेज़ तेज़ साँसें लेने लगी.

मोहनलाल उसके सर को सहलाते हुए 'जान घबराओ मत, प्यार करने के लिए यह तू जरुरी है न'

रुचिका उसकी बात सुनकर और जयादा शरमाते हुए उसकी पीठ को अपनी मुट्ठियों में भींचने लगी ताकि उससे मोहनलाल की नज़रों का सामना न करना पड़े, लेकिन कब तक.

मोहनलाल उसके सर को सहलाते हुए उसकी पीठ पर अपने होठों को लेकर उससे अपने से नजदीक करते हुए भींचने लगे और उसके कान के पास अपने होठों को लेकर बड़े प्यार से उसके कान में कहा 'मेरी जान इतनी खूबसूरत है की चुने से hi मैली हो जाये, अगर इसलिए दर रही हो तू मैं तुम्हारी खूबसूरती को कभी ख़राब नहीं होने दूंगा'

रुचिका उसकी बात सुनकर ऐसी शर्मायी की उसके मुंह में शब्द hi नहीं रहे और उससे समझ नहीं आ रहा था की क्या कहे, उसने बस बहुत शरमाते हुए अपने आप को मोहनलाल की छथि में अपने आप को ऐसे छुपा लिया की जैसे कभी वंहा से हटेगी hi नहीं. रुचिका ने अपने हाथ से मोहनलाल के हाथ को पकड़ कर अपनी टांग पर रखकर अपने हाथ को हटा लिया और इतना शर्मा गयी की उस कमरे में उसकी साँसों की आवाज़े इतनी तेज़ आ रही थी की उन आवाज़ों के आलावा और कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा था.

मोहनलाल को जैसे hi यह इशारा मिला तू वो बहुत खुश हुआ और अपने हाथ को उसकी टांगों से उठाकर रुचिका को अपने से अलग करने की कोशिश करने लगा लकिन वो मोहनलाल को बुरी तरह जकड़े हुई थी. मोहनलाल ने थोड़ा सा उससे गुड़गुजते हुए उससे अपने से थोड़ा अलग किया. मोहनलाल ने एक उंगली की मदद से उसकी ठोढ़ी से उसके चेहरे को ऊपर उठाया लेकिन उसने कसकर अपनी आँखें बंद की हुई थी. उसकी साँसों की गति बहुत तेज थी और उसकी पलके फड़फड़ा रही थी जैसे की वो पूरी कोशिश कर रही हो की उसकी आँखें खुल न जाएँ. मोहनलाल ने उसकी आँखों को चूमते हुए बस इतना hi कहा 'लव यू जान' इतना सुन्ना था की रुचिका ने अपनी बांहों के घेरे में मोहनलाल को ले लिया और मोहनलाल ने उससे बीएड पर लिटा दिया और खुद उसके ऊपर झुकना हुआ था.

रुचिका की साँसों की गति से उसके बूब्स ऊपर नीचे हो रहे थे. इतना hi नहीं, लेटने से उसके बूब्स का काफी बड़ा हिस्सा फैलकर कुर्ती में से झांक रहा था जो मोहनलाल को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा था की आओ और चुम लो. मोहनलाल ने अपने एक हाथ को उसके गाल को पकड़ कर सहलाते हुए उसकी गर्दन पर ले आया. उसकी एक उंगली बूब्स के उस फैला हुए हिस्से पर पड़ी तू रुचिका के मुंह से 'aaa....aa...hh' निकला तू मोहनलाल ने और जयादा उस हिस्से को दबाया जिससे रुचिका के मुंह से सिसकने की आवाज़े आने लगी, जो मोहनलाल की उत्तेजना को बढ़ाये जा रहे थे. मोहनलाल इस उत्तेजना के वशीभूत होकर अपने होठों को दूसरे बूब के फैले हुए हिस्से पर रखा hi था की रुचिका के मुंह से 'eeee......iii...hhhh' निकला और उसका हाथ अपने आप hi मोहनलाल के सर पर पंहुच गया. मोहनलाल ने अपने होठों को उसके बूब्स के ऊपरी हिस्से पर धीरे धीरे घूमना शुरू कर दिया. रुचिका के मुंह से काफी साडी आवाज़ों का संगम सुनने को मिल रहा था, वो आवाज़े थी

'ी.... iiiiii...hhh. Uuu.....nnn....hh. Iiiiii......hhhhhh. ोू.... ोोूह'

मोहनलाल अपने होठों से चूमते हुए अब अपनी जीभ को निकलकर उसके बूब्स को चाटने लगा और फिर अपनी जीभ को उसके बूब्स के बीच के हिस्से पर अंदर करने लगा तू रुचिका की हालत बुरी होने लगी. वो अपने सर को इधर उधर करने लगी.

मोहनलाल अपने एक हाथ को उसके पेट पर ले गया और उससे सहलाते हुए ऊपर की तरफ ले जाते हुए बूब्स के निचले हिस्से पर उंगली लगाई तू रुचिका के मुंह से 'ीी.... ीीी' निकला तू मोहनलाल ने अपने दांये हाथ को उसके बांये बूब पर लेजका रख दिया तू रुचिका के मुंह से निकला 'आ ...आ. ... हहहह'. मोहनलाल ने इस आवाज का सुन्ना था की दूसरे बूब को अपने मुंह में भर लिया. ऐसा करने से रुचिका 'आ. ...iii.....hhhh' करने लगी' वो मोहनलाल के सर के बाल सहलाने लगी.

मोहनलाल ने उसके बांये बूब को हल्का सा दबाया तू रुचिका का रकत परवाह एक डैम बढ़ गया और उसका रकत परवाह उसकी योनि की तरफ जाने लगा. उसने उत्तेजित होकर मोहनलाल के सर को अपने बूब्स पर दबाया तू मोहनलाल अब अपने हाथ और मुंह को एक साथ चलने लगा. जब वो एक हाथ से बूब दबाता तू दूसरे बूब को अपने मुंह में से थोड़ा आज़ाद कर देता और फिर जब हाथ का दबाव बूब पर काम करता तू दूसरे बूब को मुंह में भर लेता.

रुचिका को भी अब मजा आने लगा था, वो चाहती थी की मोहनलाल उससे जोर जोर से दबाये लेकिन नारी लज्जा उससे कुछ भी कहने से रोक रही थी. लेकिन मोहनलाल उसके हवासों से समझ रहा था की उससे क्या चाहिए. वो उसके साँसों की गति, उसकी सिसकारियों और उसके मुंह से निकलने वाली आवाज़ों से सब समझ रहा था. उसने अब बूब्स को दबाने और मुंह में लेने की गति को तेज कर दिया जिससे रुचिका उत्तेजित होकर अपनी एक टांग से दूसरी टांग को रगड़ने लगी. इधर मोहनलाल ने अपने एक हाथ से उसकी कुर्ती के कटाव के नीचे ले जाकर उसके कुर्ते को ऊपर करने लगा जिससे उसका पेट नग्न हो गया.

मोहनलाल अपने होठों को उसके पेट पर ले आया और उसके पेट और नाभि को चूमने लगा. जब वो चुम रहा था तू रुचिका कमान की तरह ऊपर की तरफ हो गयी और उसके मुंह से ' उउउ... ीीी. ऊऊऊऊ.... ऊऊऊऊ. ीीी.... ीीी, k....yyyaaa...aaa... Kk....aaaà...rrrrr .. er....aaaa ...हहहहहह. ...ीी..... hhhhhh....oooooo'

मोहनलाल ने अपना एक हाथ उसकी सख्त मगर मुलायम टांग पर ले जाकर जैसे hi सहलाना शुरू किया hi था की रुचिका से बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था और वो अपने सर को बांये दांये पटकने लगी और फिर एकदम से उठकर बैठ गयी और लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी. उसकी नज़रों का जैसे hi मोहनलाल की नज़रों से टकराव हुआ तू वो बुरी तरह से शर्मा गयी और अपने मुंह को अपनी हथेलियों से ढककर बीएड पर उलटी होकर लेत गयी. उसके शरीर में कम्पन हो रहा था.

मोहनलाल उससे इस तरह पेट के बल लेते हुए देखकर उत्तेजित होने लगा. रुचिका की टाँगे तू पहले hi नग्न हो गयी थी. उसका कुरता भी धींगामुश्ती में पीठ पर ऊपर हो गया था और अब उसकी ब्रा का स्ट्राप भी नज़र आ रहा था. उसके नितम्ब ऊपर की ओर उठे हुए थे जिन को उसकी पैंटी बड़ी मुश्किल से धक् पा रही थी. मोहनलाल इस नज़ारे को देखकर उत्तेजना की साडी हदों को पार करने लगा था.

मोहनलाल बीएड से नीचे उतर आया और अपनी शर्ट और बनियान को अपने शरीर से अलग कर दिया. जब वो ये सब कर रहा था तू रुचिका भी बहुत जयादा उत्तेजित हो चुकी थी, उसका मन कर रहा था की मोहनलाल उससे अब प्यार करे, लेकिन मोहनलाल तू बीएड से नीचे उत्तर गया था और उसने अपनी पेंट भी उतर दी. अब उसके शरीर पर सिर्फ एक छोटा सा अंडरवियर था.

वो रुचिका की संगमरी टांगों को देखकर बहक रहा था. उसने जब रुचिका के बेदाग पैरों को देखा तू उसको कुछ अजीब सा होने लगा. उसने इतने साफ़ और बेदाग पैरों की कभी कल्पना hi नहीं की थी.

मोहनलाल ने जैसे hi रुचिका के एक पेअर पर हाथ रखा तू रुचिका के मुंह से 'uuu.....uu...hhh' निकला. मोहनलाल ने जैसे hi अपनी एक उंगली उसके पैरों के टेल पर फिरयै तू रुचिका ने अपनी टांग को मोड़कर उसकी पंहुच से दूर होना चाहा. मोहनलाल अब बीएड के ऊपर आ गया और फिर से उसके पेअर को छुआ और इस बार उंगली उसके पेअर की लाइन के साथ चलायी तू रुचिका 'eeee.....eeeee. . हहहह' करने लगी और मोहनलाल से दूर जाने की कोशिश करने लगी, लेकिन इस बार मोहनलाल ने उसके दूसरे पेअर को थम लिया और उसके पेअर के टेल को चुम लिया तू रुचिका 'uuuu.....iiiiii' करने लगी.

मोहनलाल उसके तलवे को छत्ते हुए अब उसके पेअर को पूरा अपने मुंह में ले लिया तू रुचिका 'sss.....eeee....eeee' करने लगी. मोहनलाल ने एक पेअर को मुंह में ले लिया और दूसरे पेअर पर अपनी उंगली चलने लगा, रुचिका के लिए ये सब तापमान बढ़ने के लिए काफी था. उसका तापमान बढ़ता जा रहा था और उसकी आग में घी का काम मोहनलाल कर रहा था. वो धीरे धीरे उसकी टांगों को चूमते और छत्ते हुए ऊपर बढ़ने लगा. रुचिका से अब बर्दाश्त कर पाना बहुत मुश्किल हो रहा था. उसके दिल की धड़कन एकदम से बहुत तेज हो गयी थी, उसकी योनि में चींटियां चलने लगी थी और उससे लग रहा था की अब बर्दाश्त कर पाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है. जैसे जैसे मोहनलाल ऊपर की तरफ बढ़ने लगा और घुटनो पर hi पंहुचा होगा की रुचिका के मुंह से बहुत hi अजीब अजीब आवाजे निकलने लगी और वो अपनी टैंगो को एक दूसरे पर रगड़ने लगी. वो अपनी योनि को बीएड पर आगे पीछे करने लगी जैसे की वो अपनी योनि को बीएड से रगड़ कर उससे आराम देना छह रही हो, लेकिन यंहा आराम कान्हा बल्कि उसकी बेचैनी तू बढ़ती hi जा रही थी.

मोहनलाल ने जैसे hi घुटनो से ऊपर होकर उसकी जाँघों को पीछे से चूमा तू उसकी बर्दाश्त ख़तम हो गयी और अपनी शर्म को छोड़ते हुए मोहनलाल को पकड़ कर अपने ऊपर करने लगी. मोहनलाल भी ऊपर आकर उसको पीछे से अपने आगोश में ले लिया और उसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी और अपने हाथ को आगे लेजाकर उसके बूब्स को जोर जोर से मर्दन करने लगा. रुचिका के लिए अब असहनीय होता जा रहा था और उससे लग रहा था की उसकी योनि में रिसाव शुरू हो गया है तू वो पलटकर मोहनलाल के गले लग गयी. उसने अपनी बाहों का घेरा उसके गले में डालकर उसके होठों को अपने लबों में कैद कर लिया. उसने अपनी टांगों को मोहनलाल की टांगों के बीच कर लिया और मोहनलाल की जाँघों पर अपनी योनि को रगड़ने लगी. मोहनलाल का लिंग भी पुरे उफान पर था और जैसे hi उसके लिंग ने उसकी योनि के मुख को कपड़ों के ऊपर से hi छुआ तू रुचिका अपने चरम पर पंहुच गयी और मोहनलाल को अपनी बांहों में जकड लिया और बहुत तेज तेज आवाजे निकलने लगी. मोहनलाल ने भी उससे अपनी बांहों में कस्ते हुए अपने हाथों को उसकी पीठ से होते हुआ उसके नरम नरम नितम्बों को दबाकर उससे अपने लिंग का एहसास करने लगा.
 
अपडेट 81

मोहनलाल ने जैसे hi घुटनो से ऊपर होकर उसकी जाँघों को पीछे से चूमा तू उसकी बर्दाश्त ख़तम हो गयी और अपनी शर्म को छोड़ते हुए मोहनलाल को पलकड़ कर अपने ऊपर करने लगी. मोहनलाल भी ऊपर आकर उसको पीछे से अपने आगोश में ले लिया और उसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी और अपने हाथ को आगे लेजाकर उसके बूब्स को जोर जोर से मर्दन करने लगा. रुचिका के लिए अब असहनीय होता जा रहा था और उससे लग रहा था की उसकी योनि में रिसाव शुरू हो गया है तू वो पलटकर मोहनलाल के गले लग गयी. उसने अपनी बाहों का घेरा उसके गले में डालकर उसके होठों को अपने लबों में कैद कर लिया. उसने अपनी टांगों को मोहनलाल की टांगों के बीच कर लिया और मोहनलाल की जाँघों पर अपनी योनि को रगड़ने लगी. मोहनलाल का लिंग भी पुरे उफान पर था और जैसे hi उसके लिंग ने उसकी योनि के मुख को कपड़ों के ऊपर से hi छुआ तू रुचिका अपने चरम पर पंहुच गयी और मोहनलाल को अपनी बांहों में जकड लिया और बहुत तेज तेज आवाजे निकलने लगी. मोहनलाल ने भी उससे अपनी बांहों में कस्ते हुए अपने हाथों को उसकी पीठ से होते हुआ उसके नरम नरम नितम्बों को दबाकर उससे अपने लिंग का एहसास करने लगा.

मोहनलाल इस बात को याद करते करते थोड़ा भावुक हो गया और अपने पास में लेती हुई रुचिका के माथे को चूमते हुए 'लव यू जान, तुम मेरे दिल की रानी हो, मेरी मल्लिका हो, बस तुम जल्दी से जल्दी पहले की तरह मेरी जिंदगी में वापिस आ जाओ, मैं तुम्हे खोना नहीं चाहता. तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाना, हमेशा मेरे पास hi रहना'

मोहनलाल की भावपूर्ण बातों से रुचिका की नींद खुल गयी और वो बड़े ध्यान से मोहनलाल की बातों को सुन रही थी. उसकी बातें सुनकर उससे भी अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन वो कोई भी ऐसी बात करके उसका दिल नहीं दुखाना चाहती थी, इसलिए उसने अपने होठों पर एक स्माइल लेट हुए 'क्या बात है आज सुबह सुबह hi प्यार बरस रहा है'

मोहनलाल 'क्योँ नहीं बरसाना चाहिए'

रुचिका 'अगर आपको इस तरह प्यार बरसाने में ख़ुशी मिलती है तू बरसाइये'

मोहनलाल 'क्योँ तुम्हे इस से ख़ुशी नहीं मिलती क्या'

रुचिका 'ख़ुशी तू मुझे बहुत मिलती है लेकिन साथ hi साथ दुःख भी होता है'

मोहनलाल 'दुःख को भूल कर ख़ुशी को याद करो और एन्जॉय करो' इतना कहकर मोहनलाल ने रुचिका को अपने आगोश में ले लिया और उसकी पीठ को सहलाते हुए उसके माथे को चूमने लगे. पीठ पर पुरे हाथ को खोलकर उससे सहलाते हुए मोहनलाल को कहीं भी ब्रा का एहसास नहीं हुआ और उससे पता लग गया की रुचिका ने निघ्त्य के नीचे ब्रा नहीं पहनी है. जैसे hi उससे यह एहसास हुआ उसका रक्त अपनी गति से तेज दौड़ने लगा और उसका दिल करने लगा की रुचिका को चूमे, छत्ते, सहलाये और मसले. इस उद्देश्य से उसने अपने हाथ को उसकी पीठ से नितम्बों की ओर बढ़ाना शुरू hi किया था की उसको कोई ऐसी बात याद आ गयी और उससे अपने हाथ को वंही रोक दिया.

रुचिका को जैसे hi इस बात का एहसास हुआ की मोहनलाल ने अपनी भावनाओं को दबा लिया है तू उसने सोचा की मोहनलाल को थोड़ा सुकून देना चाहिए. इस आशय से उसने मोहनलाल की चाहती पर अपने हाथ से उससे सहलाते हुए वो ऊपर उसकी गर्दन की तरफ ले जाने लगी और जैसे hi उसका हाथ गर्दन पर पंहुचा तू उससे मोहनलाल ने पकड़ लिया और अपना दूसरा हाथ उसकी गर्दन के नीचे से लेकर उससे अपनी तरफ कर लिया और उससे कहा 'सो जाओ'

रुचिका 'काफी देर से सो hi तू रही हूँ'

मोहनलाल 'तुम जितना सोओगी उतना hi अच्छा है'

रुचिका 'क्योँ मैं जागते हुए अच्छी नहीं लगती क्या? या आपको मेरे जागने से परेशानी होने लगती है.'

मोहनलाल 'मुझे तुम्हारे जगाने से भला क्योँ परेशानी होने लगी, बल्कि मैं तू छत्ता हूँ की तुम सिर्फ जागो hi नहीं बल्कि मेरे प्यार की बरसात का आनंद भी लो'

रुचिका 'आपको प्यार के आलावा लगता है कुछ सूझता hi नहीं है'

मोहनलाल 'क्या करूँ, ये दिल तुम्हे देखकर और तुम्हारे बारे में सोचकर hi धड़कता है. इस दिल में बहुत आक्रमण हैं और मैं उन अरमानो को अपने प्यार में बदल कर उससे बरसात करके तुम्हे नहलाना छत्ता हूँ, लेकिन ये पता नहीं हो भी पायेगा या नहीं' इतना कहकर मोहनलाल फिर से भावुक होने लगा.

रुचिका 'आपको किसी ने प्यार की बरसात करने से रोका है है क्या?'

मोहनलाल ने उसके गलों को चूमते हुए 'मेरा प्यार तू तुम्हारे लिए हर वक़्त बरसता hi रहता है, लेकिन मुझे लगता है की तुम्हारी तरफ से प्यार का सूखा पद गया है, जिस वजह से मेरे प्यार की बरसात भी ऐसे गायब हो जाती है जैसे बारिश की बुँदे ताप्ती हुई धरती पर पढ़कर वाष्प बनकर गायब हो जाती हैं''

रुचिका भी उसकी बातें सुनकर भावुक हो गयी और बहुत जोर से मोहनलाल के गले लग गयी और कहने लगी 'आप शायद सही कह रहे हैं की वक़्त की ऐसी मार पड़ी है की मेरे पास बहुत hi काम प्यार की बुँदे बची हैं, लेकिन जितनी भी बची वो सब आपके लिए हैं'

मोहनलाल 'नहीं तुम सच नहीं कह रही हो, तुम्हारे पास तू प्यार का समुन्दर है, लेकिन लगता है की वो मेरे लिए है hi नहीं'

रुचिका 'आप ऐसा क्योँ सोच रहे हैं, मेरे पास जितना भी प्यार है वो सब आपके लिए hi तू है'

मोहनलाल उसको अपने ऊपर खींच लेता है जिससे रुचिका का सर मोहनलाल की छथि पर आ जाता है. वो आधी मोहनलाल के ऊपर और आधी बीएड पर लेती हुई थी. उसके बूब्स निघ्त्य में से बहार की तरफ चालक रहे थे, जिन्हे देखकर मोहनलाल को कुछ कुछ होने लगा. उसका मन कर रहा था की उन्हें सहलाये, मसले और पता नहीं क्या क्या करे, लेकिन कुछ सोचकर अपने मनोभावों को रुचिका से छुपा गया.

रुचिका को इस सबका ाबहस हो रहा था और मोहनलाल के मन की व्यथा को भली भांति जानती थी. उसका मन कर रहा था की वो उसकी व्यथा को हर ले परन्तु कुछ ऐसे कारन थे जिनकी वजह से वो अपने आप को ऐसा करने में असमर्थ पा रही थी. फिर भी बड़ी हिम्मत करके उसने अपनी भावनाओं को अपने अंदर दफ़न करते हुए चेहरे पर मुस्खरहाट लेट हुए मोहनलाल की चाहती को अपनी उँगलियों से कुरेदते हुए कहने लगी 'आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, मैं तू अपने प्यार की बरसात करने के लिए हर वक़्त तैयार हूँ और आप hi मुझे मन कर देते हो'

मोहनलाल भी फीकी हंसी अपने चेहरे पर लेट हुए 'मैंने यह कब कहा की तुम अपने प्यार की बरसात नहीं करना चाहती लेकिन मेरे लिए उस बरसात में कुछ होगा hi नहीं'

रुचिका ने अपने आप को मोहनलाल से चिपटा लिया और उसके होठों पर अपने लबों को रख दिया और अपने हाथों से उसके कंधे और गर्दन को सहलाने लगी. मोहनलाल की भावनाएं जो थोड़ी देर पहले तक जागृत थी उन्हें जबरदस्ती सुलाना छह रहा था, रुचिका के इस तरह करने से वो फिर से जागने लगी. मोहनलाल के हाथ स्वाट hi उसकी पीठ पर फिरने लगे और वो उसके होठों का रसपान करने लगा. उसके हाथ रुचिका की पीठ पर टहलते हुए उसकी बगल में से होते हुए उसके बूब्स पर आये और जैसे hi उन्हें थोड़ा सा सहलाते हुए दबाया तू रुचिका के मुंह से एक सिसकारी निकली. उसके सिसकने की आवाज़ ने जैसे मोहनलाल का स्वपन तोड़ दिया हो और उसने अपने आप को रुचिका से दूर करना चाहा और ढीला पद गया लेकिन रुचिका उसके ऊपर hi चढ़ी रही और उसके होठों को चुस्ती रही. रुचिका को आभास हो गया था की मोहनलाल अब सुस्त पद गया है तू उसने उसके होठों से अपने होठों को अलग करते हुए उसकी आँखों में झांकते हुए आँखों के इशारे से पूछा, जिसका जवाब मोहनलाल ने आँखों की भाषा में hi बताया की कुछ नहीं हुआ.

रुचिका ने मोहनलाल का हाथ पकड़ कर अपने बूब्स पैर रखते हुए कहा 'प्यार करो न'

मोहनलाल ने अपने हाथ को पीछे खींचना चाहा लेकिन रुचिका ने ऐसा न करने दिया तू मोहनलाल ने उससे वंही रहने दिया लेकिन उसने कुछ किया नहीं तू रुचिका ने कहा 'आप मुझे प्यार कीजिये न और आप अपने प्यार की बरसात कर दीजिये न'

मोहनलाल 'मुझे लगता है की हमारे प्यार को किसी की नज़र लग गयी है'

रुचिका 'आप शायद इसलिए कह रहे हैं की उस होटल वाली रात के बाद हम दोनों कभी भी िक्खत्ते उस तरह से नहीं सो पाए'

मोहनलाल होटल की उसी रात को अभी थोड़ी देर पहले hi याद कर रहा था और उन हसीं सपनो में खोया हुआ था और उसने नहीं सोचा था की रुचिका उससे उस रात के बारे में याद दिलाएगी. प्रत्यक्ष में उसने सिर्फ इतना hi कहा 'जो भाग्ये में लिखा हो, उससे कोई बदल नहीं सकता'

रुचिका 'आप की बात काफी हद तक सही है क्योंकि आज दो साल से जयादा हो गए हैं, फिर भी मैं आपको आपका हक़ नहीं दे पायी'

मोहनलाल 'इसमें तुम्हारी क्या गलती है, तुम अपने आप को बिलकुल भी दोषी नहीं मनो'

रुचिका 'मेरी आपसे गुज़ारिश है की आप सब कुछ भूलकर, अभी इसी वक़्त अपना हक़ ले लो और मुझपर अपने प्यार की भरपूर बारिश कर दो'
 
अपडेट 82

मोहनलाल 'इसमें तुम्हारी क्या गलती है, तुम अपने आप को बिलकुल भी दोषी नहीं मनो'

रुचिका 'मेरी आपसे गुज़ारिश है की आप सब कुछ भूलकर, अभी इसी वक़्त अपना हक़ ले लो और मुझपर अपने प्यार की भरपूर बारिश कर दो'

मोहनलाल और रुचिका को यही छोड़कर हम चलते हैं संध्या और आदित्य के पास

संध्या ने अपने बांये बाजु से आदित्य की पीठ को जकड लिया और सहलाते हुए 'मुझे सब मंजूर है, बस मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए'

आदित्य भी उसकी पीठ सहलाते हुए 'मैं हो सकता किसी ओर से भी प्यार करूँ, लेकिन आप नहीं पूछेंगी, हाँ ये भी वादा है की आपको प्यार करने में कोई कमी नहीं करूँगा' इतना कहकर उसने अपने होठों से उसके माथे को चुम लिया.

संध्या 'लेकिन मुझे तू प्यार करोगे ना'

आदित्य 'आपको ऐसा क्योँ लग रहा है की मैं आपको प्यार नहीं करूँगा'

संध्या 'पता नहीं क्योँ ऐसा लगता है की तुम मुझसे प्यार सिर्फ और सिर्फ मज़बूरी में करोगे. इतना hi नहीं तुम्हे जैसे hi दूसरी लड़की अपने प्यार में बाँध लेगी तू मुझसे मुंह मोड़ लोगे'

आदित्य ने अपनी आँखें उठाकर अपनी माँ की आँखों में झांकते हुए 'मुझे ये तू पता नहीं की आपको क्या दर सत्ता रहा है और आपके दर को मैं अभी एकदम से ख़तम भी नहीं कर सकता क्योंकि ऐसा करना मेरे हिसाब से आप पर दबाव डालना हुआ, जो मैं बिलकुल नहीं चाहूँगा. मैं इस बात में विश्वास रखता हूँ की हर व्यक्ति को अपने हिसाब से सोचने और अपनी जिंदगी जीने का अधिकार है. मैं इस वक़्त सिर्फ अपने बारे में बता सकता हूँ की मैं आपसे जो भी बात कहूंगा उस बात पर हमेशा आपको खरा मिलूंगा, उसमे कोई लग लपेट नहीं होगी'

संध्या 'मुझे सिर्फ दो बातें जननी हैं पहली तू यही की क्या तुम मुझसे प्यार करना चाहते हो या मज़बूरी में कर रहे हो. दूसरा प्रसहन तभी पैदा होता है अगर पहले का जवाब हाँ है तू वो यह की तुम मुझसे किस तरह का प्यार करोगे'

आदित्य 'जैसा की मैंने पहले भी कहा है की आप मेरी माँ हो आप जिस तरह का प्यार मुझसे छाती हैं वो आप मुझे बता दीजिये, मैं आपको उसी तरह का प्यार करूँगा'

संध्या 'सबसे पहले तू मुझे माँ समझना बंद करो'

आदित्य 'आप मेरी माँ हो तू माँ सम्जहना कैसे बंद कर सकता हूँ'

संध्या उससे छिटककर दूर हो गयी और कहने लगी 'तुम मुझसे प्यार न करते हो और ना hi करना चाहते हो. मुझे माँ समझ कर तुम जिससे प्यार का नाम देना चाहते हो, वो असल में मज़बूरी में किया हुआ जिम्मेदारी का एहसास है. जिससे करके तुम मुझ पर एहसान करना चाहते हो. मुझे एहसान नहीं चाहिए, इसलिए मैं अपने कमरे में जा रही हूँ'

आदित्य ने अपनी माँ को पीछे से पकड़ लिया और कहने लगा 'आपने ये कैसे सोचा की मैं आप पर कोई एहसान कर रहा हूँ'

संध्या 'और तुम क्या जाताना छह रहे हो?'

आदित्य 'मैं तू सिर्फ यह कह रहा था की आप जैसा छंहेंगी मैं आपसे उस तरह से प्यार करूँगा'

संध्या 'मतलब यह की मेरे कहने से प्यार करोगे अन्यथा नहीं'

आदित्य 'मैं अगर अपने हिसाब से प्यार करूँगा तू आपको बुरा लग जायेगा, इसलिए मैं आपसे पूछ रहा था'

संध्या 'तुम इसलिए ये बात कह रहे हो न की मुझे तुम अपनी माँ समझते हो'

आदित्य 'इसमें समझना क्या है, आप तू मेरी माँ हो hi, इस बात को तू कोई बदल hi नहीं सकता'

संध्या 'सबसे पहले तू मुझे माँ समझना बंद करो और मुझे सिर्फ और सिर्फ अपनी गर्लफ्रेंड समझो'

आदित्य 'और अगर आपके अंदर की माँ जाग गयी तू'

संध्या 'नहीं जागेगी और अगर जग भी जाये तू उस तरफ ध्यान न देना, मुझे सिर्फ और सिर्फ संध्या समझो'

आदित्य 'चलो ठीक है जैसे आपकी मर्जी'

संध्या 'अब तुम्हारी मर्जी की तुम मुझे गर्लफ्रेंड मानकर प्यार करते हो की नहीं'

आदित्य 'और अगर मैं ना कह दूँ तू'

संध्या 'कोई बात नहीं उससे मैं अपनी किस्मत मान लुंगी और फिर सोचूंगी की मुझे क्या करना है' इतना कहकर उसकी आँखें नाम hi नहीं हो गयी बल्कि उसमे से दो बुँदे चालक आयीं'

आदित्य ने अपने हाथों को अपनी माँ के कन्धों से आगे ले जाकर उसके चेहरे को पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया तू उससे उसकी आँखों से निकट हुए आंसू दिखाई दिए तू आदित्य ने जल्दी से अपने होठों को उनके गालों पर बह रहे आंसुओं को पी गया और फिर गालों को अपने होठों से चूमते हुए कहा 'अब के बाद आप कभी भी अपनी आँखों से आंसुओं को नहीं गिराने डौगी. अपने सरे दुःख दर्द मुझे दे दो'

संध्या उसकी बात सुनकर पलट गयी और आदित्य के गले लग गयी और उससे अपनी बांहों में ले लिया और बांये हाथ को उसकी पीठ पर ले जाकर उससे सहलाते हुए कहने लगी 'मुझे बहुत तंग करते हो ना, अगर तुम मेरे दुःख दर्द हारना चाहते हो तू फिर अब मुझे अपनी गर्लफ्रेंड मानकर hi प्यार करो'

आदित्य ने जब उसके गलों से उसके आसुओं को पिया था तू संध्या सिहर उठी थी और जब उसने गलों को चुम लिया था तू उसके दिल की धड़कन बढ़ गयी. वो अपनी बेचैनी को काम करने के लिए hi पलटकर आदित्य के गले लग गयी. जैसे hi वो आदित्य के गले लगी तू उसकी चूचियां आदित्य की छथि में धंस गयी और इस से दोनों के hi दिल की धड़कन बढ़ गयी थी. इतना hi नहीं संध्या का आदित्य को गर्लफ्रेंड की तरह बर्ताव करने का कहने से उसके मन में हलचल मची हुई थी. वो मन में सोच रहा था की आगे बढे या नहीं. अभी वो सोच hi रहा था की संध्या ने उसकी पीठ पर अपने बांये हाथ का दबाव बढाकर आदित्य को अपने में समेटना छह रही थी. उसके ऐसा करने से आदित्य की भी हिम्मत बढ़ गयी और उसने अपने हाथों को उसकी बगल के नीचे से लेते हुए पीठ पर ले गया.

आदित्य के इस तरह से करने से उसके बाजुओं का दबाव उसकी चूचियों पर पड़ा तू संध्या का मन मचल गया और वो और जोर से उसके गले लग गयी. आदित्य के हाथ उसकी पीठ पर पंहुच कर उससे अपने में समेटना छह रहा था. उसके ऐसा करने से संध्या भी उससे बेल की तरह लिपट गयी. आदित्य के हाथों ने उसकी पीठ को निघ्त्य के पतले से कपडे के ऊपर से hi सहलाते हुए महसूस किया की उसकी माँ की पीठ बहुत hi जयादा नरम है और उसके हाथ उस पर बहुत अच्छे से फिसल रहे थे. उसको ऐसा करने में बहुत मजा आने लगा. धीरे धीरे सहलाते हुए आदित्य की भावनाओं ने भड़काना शुरू किया तू उसके हाथ भी अपनी माँ की पीठ पर कुछ जयादा hi चालकदामि करने लगे.

संध्या को भी उसके सख्त हाथों का एहसास उसको एक सुखद अनुभूति दे रहा था. उसका मन कर रहा था की आदित्य ओर जयादा जोर से सहलाये, लेकिन वो ऐसा बोलकर आदित्य को अभी नहीं बताना छथि थी की उससे इस एहसास की कितनी जयादा जरुरत है. वो बस उस एहसास की अनुभूति में खोयी हुई दूसरी दुनिया में ब्राह्मण कर रही थी.

आदित्य को उसके मनोभावों का पता नहीं था, वो तू अपने hi ख्यालों में खोया हुआ था और इस पल का भरपूर आनंद लेना छह रहा था. उसके हाथ निघ्त्य के ऊपर अब काफी तेजी से टहलने लगे. इसी प्रक्रिया में उन् हाथों ने संध्या की पीठ पर कंधे से नीचे निघ्त्य के ऊपर नग्न भाग को जैसे hi छुआ तू संध्या के मुंह से सिसकने की आवाज निकली, जिससे सुनते hi आदित्य का प्रेम नशा सर पर चढ़ कर बोलने लगा.

आदित्य का हाथ उस नग्न हिस्से पर चलते हुए गर्दन के पिछले हिस्से पर जैसे hi पंहुचा तू संध्या गहरी गहरी साँसें लेने लगी. संध्या के इस तरह सांस लेने से उसके मुंह से निकलने वाली गरम गरम साँसें आदित्य की गर्दन पर पढ़कर उसकी उत्तेजना को बढ़ावा देने का काम कर रही थी. आदित्य ने उत्तेजना के वशीभूत अपने हाथ से अपनी माँ की गर्दन के पीछे हाथ रख कर उससे पकड़कर उसके चेहरे को थोड़ा सा ऊपर उठाया और अपने चेहरे को नीचे लेट हुए उसके होठों के बिलकुल पास गलों पर अपने होठों को रखकर चूमा तू संध्या के मुंह से एक हिचकी निकली और उसका मुंह खुल गया.

आदित्य ने अपने होठों में उसके खुल चुके होठों को कैद कर लिया और गर्दन के पीछे से हाथ से उसके चेहरे को पकड़ रखा था ताकि वो पीछे न जा पाए. संध्या को तू आनंद की अनुभूति बहुत जयादा होने लगी और उसका दिल कर रहा था की वो भी इस खेल में खुलकर खेले, लेकिन अभी वो इंतज़ार करना छह रही थी, इसलिए उसने अपने मन को मार दिया. मन तू मार लिया लेकिन इस सब में वो काफी जयादा उत्तेजित हो चुकी थी और धीरे धीरे इस उत्तेजना में वो भूलती जा रही थी की उसने क्या सोचा था. उसने भी आदित्य के होठों को चूसना शुरू कर दिया. अब दोनों एक दूसरे के हाथों को बहुत hi तन्मयता से चूस रहे थे.

आदित्य के हाथ उसकी गर्दन के पीछे अपना कमल दिखा रहे थे और संध्या की कामाग्नि को भड़काने का काम कर रहे थे. आदित्य बड़े आराम आराम से उसकी गर्दन के पीछे अपने अंगूठे से वंहा सहलाते हुए बीच बीच में दबाव कभी बढ़ा देता और कभी काम कर देता. वो अपने हाथ की उँगलियों से कंधे के ऊपर कान के नीचे कुरेदने लगा, यह संध्या के लिए असहनीय हो चला था. धीरे धीरे उसके हाथ गर्दन से कंधे पर जाने लगा. जैसे hi उसका हाथ संध्या के कंधे पर पंहुचा तू उसके मुंह से निकला 'आउच' और वो एकदम से आदित्य से अलग हो गयी.

आदित्य को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उससे याद आया की वंहा पर थोड़ा सा जल गया था. आदित्य ने आव देखा न तव और अपने होठों को उसके कंधे पर जले हुए हिस्से पर रख दिया और अपनी जीभ से उस हिस्से को हल्का हल्का छत्ते हुए संध्या को आराम देने लगा. संध्या के मुंह से 'aa.....a...h....a...a...h.... aaa.....iiii.......eeee....' की आवाज़ निकलने लगी और आदित्य के इस तरह करने से संध्या उससे दूर होना छाती थी लेकिन आदित्य ने एक हाथ से उसकी कमर और दूसरे हाथ से उसके कंधे के पिछले हिस्से को पकड़ कर अपने से दूर नहीं होने दिया. थोड़ी देर इस तरह करने से संध्या को आराम आने लगा और अब आराम के साथ साथ आदित्य की जीभ का इस तरह कंधे के नग्न हिस्से पर घूमने से उससे नशा सा होने लगा था. अब वो छह रही थी की आदित्य उसको इस तरह करता रहे और वो इस सब के मजे लेती रहे. आदित्य की जीभ ने जैसे hi निघ्त्य के स्ट्राप को छुआ तू आदित्य ने बिना पूछे उस स्ट्राप को उसके कंधे से नीचे खिसका दिया जिससे संध्या की दांयी चुकी लगभग नंगी हो गयी थी और आदित्य इस नज़ारे को देखकर जैसे सबकुछ भूल गया था और एकटक उसकी चुकी को निहारने लगा.
 
अपडेट 83

आदित्य को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उससे याद आया की वंहा पर थोड़ा सा जल गया था. आदित्य ने आव देखा न तव और अपने होठों को उसके कंधे पर जले हुए हिस्से पर रख दिया और अपनी जीभ से उस हिस्से को हल्का हल्का छत्ते हुए संध्या को आराम देने लगा. संध्या के मुंह से 'aa.....a...h....a...a...h.... aaa.....iiii.......eeee....' की आवाज़ निकलने लगी और आदित्य के इस तरह करने से संध्या उससे दूर होना छाती थी लेकिन आदित्य ने एक हाथ से उसकी कमर और दूसरे हाथ से उसके कंधे के पिछले हिस्से को पकड़ कर अपने से दूर नहीं होने दिया. थोड़ी देर इस तरह करने से संध्या को आराम आने लगा और अब आराम के साथ साथ आदित्य की जीभ का इस तरह कंधे के नग्न हिस्से पर घूमने से उससे नशा सा होने लगा था. अब वो छह रही थी की आदित्य उसको इस तरह करता रहे और वो इस सब के मजे लेती रहे. आदित्य की जीभ ने जैसे hi निघ्त्य के स्ट्राप को छुआ तू आदित्य ने बिना पूछे उस स्ट्राप को उसके कंधे से नीचे खिसका दिया जिससे संध्या की दांयी चुकी लगभग नंगी हो गयी थी और आदित्य इस नज़ारे को देखकर जैसे सबकुछ भूल गया था और एकटक उसकी चुकी को निहारने लगा.

संध्या ने जब देखा की आदित्य अपनी सुध बुध भूलकर उसकी तरफ देख रहा है तू उसकी नज़रों का पीछा करते हुए उसने पाया की उसकी लगभग नग्न हो चुकी चुकी को एकटक निहारे जा रहा है तू उससे शर्म आने लगी और उसने अपने बांये हाथ को ऊपर लेजाकर अपनी चुकी को ढकने का प्रयास करने लगी की तभी आदित्य के मुंह से निकला 'बहुत hi खूबसूरत हैं'. उसके मुंह से इतना सुनकर संध्या और जयादा शर्मा गयी और अपने आप को पलट कर जाने लगी.

आदित्य को जैसे hi होश आया की उसकी माँ जा रही है तू वो जल्दी से उसके पीछे जाने लगा लेकिन तब तक वो वंहा से निकल कर अपने कमरे में पंहुच गयी थी और अंदर से दरवाजा बंद कर दिया था. उसकी साँसें बढ़ी हुई थी और अपनी साँसों को नियंत्रण में लेन का प्रयास कर रही थी. आदित्य ने दलवाजा खटखटा कर कहा 'क्या हुआ, नाराज़ हो गयी क्या'

संध्या 'नहीं मुझे इंस्टिट्यूट जाने के लिए तैयार होना है'

आदित्य 'आप ठीक नहीं हैं, काम से काम आज तू आराम कर लेती'

संध्या 'नहीं मैं क्लास मिस नहीं करुँगी, तुम भी तैयार हो जाओ और रस्ते में डॉक्टर को दिखा देंगे'

आदित्य के पास कोई चारा नहीं था और वो अपने मन को मार कर तैयार होने चला गया.

आदित्य ने तैयार होकर अपनी माँ के कमरे के बहार से कहा 'आए जाओ फिर चलते हैं' तब तक संध्या भी तैयार होकर आ गयी थी लेकिन आज वो आदित्य के सामने आने से शर्मा रही थी. आदित्य उसका हाथ पकड़कर दिंनिंग टेबल पर ले आया और उससे चेयर पर बैठकर नाश्ता करने के लिए कहा तू संध्या ने पूछा 'ये कान्हा से आया है' तब आदित्य ने बोलै 'मैंने अपनी गर्लफ्रेंड के लिए बनाया है, चलो अब जल्दी से सैंडविच और कॉफ़ी ले लो'

दोनों नाश्ता करने के बाद बाइक पर बैठ कर इंस्टिट्यूट के लिए चल दिए. रस्ते में एक डॉक्टर के पास चले गए और उस जले हुए हाथ के बारे में बताया तू उसने कहा 'कोई घबराने की जरुरत नहीं है, उसने एक ऑइंटमेंट और कुछ मेडिसिन दी और बताया की ये शाम तक ठीक हो जायेगा'

वंहा से निकलकर वो इंस्टिट्यूट पंहुचे और संध्या को छोड़कर आदित्य कॉलेज चला गया, जंहा पर आज एक कंपनी आयी हुई थी. प्लेसमेंट टेस्ट में आदित्य ने टॉप किया और इंटरव्यू के बाद उससे 10 लाख का पैकेज ऑफर हुआ. वो ख़ुशी से फुला नहीं समां रहा था और साथ hi उसकी ख़ुशी ये जानकार ओर बढ़ गयी थी की श्रुति को भी उसी कंपनी में जॉब ऑफर हुई थी. दोनों अपनी सफलता को कैंटीन में सेलिब्रेट कर रहे थे और फिर आदित्य वंहा से संध्या को लेने पंहुच गया. उसने संध्या का हाल चाल पूछा तू उसने कहा की अब तू पता भी नहीं लग रहा है की कुछ हुआ भी था. आदित्य ने इस बात पर ख़ुशी जताई और फिर घर की तरफ चलने लगे.

संध्या ने आदित्य के पीछे बैठे हुए कहा 'अपनी गर्लफ्रेंड को घुमाओगे नहीं'

आदित्य 'मैं तू तैयार हूँ, बोलो कान्हा चलोगी'

संध्या 'जंहा तुम्हारा मन करे'

आदित्य 'ठीक है तू फिर चलो' यह कहकर आदित्य ने बाइक को हाईवे पर लेकर लॉन्ग ड्राइव पर जाने लगा. शहर से दूर एक बहुत बड़ा पिकनिक स्पॉट था, जंहा पर टिकट लेकर दोनों ने एंट्री की. आदित्य ने चिप्स, स्नैक्स, पानी और कोल्ड्रिंक की बोतल खरीद ली. वो पिकनिक स्पॉट प्राकर्तिक था. जंहा पर बहुत बड़े बड़े पत्थर पड़े हुए थे, बहुत सरे लैंडस्केप्स और फूलों की क्यारियां थी. एक तरफ बड़े बड़े पेड़ थे, जंहा बहुत hi शांति का वातावरण था. आज जयादा भीड़ नहीं थी. आदित्य ने चलते हुए अपनी माँ का बांया हाथ अपने दांये हाथ में थम रखा था और दूसरे हाथ में खाने का सामान ले रखा था. काफी दूर चलते रहने के बाद एक सुनसान सी जगह पर पंहुच कर जंहा बहुत सरे पेड़ो का झुरमुट था एक पेड़ की छाया में बैठ गए. आदित्य ने कोल्ड ड्रिंक की बोतल से दो गिलास भरे और एक संध्या की तरफ बढ़ा दिया और सिप लेते हुए चिप्स का आनंद लेने लगे.

आदित्य ने बातचीत शुरू करते हुए पूछा 'कैसा लग रहा है यंहा आ कर'

संध्या 'मैंने कभी सोचा भी नहीं था की ऐसी भी जगह हो सकती है, मैं तू बहुत खुश हूँ'

असल में जंहा वो बैठे थे उस जगह के चरों तरफ पेड़ hi पेड़ थे और आसानी से किसी को वो दोनों नज़र नहीं आ सकते थे. आदित्य ने सोचा की ये जगह अपनी माँ की शर्म को तोड़ने के लिए अच्छी है तू उसने कहा 'आप को ये जगह अच्छी लगी या मेरे साथ इस जगह पर आकर अच्छा लगा'

संध्या 'सच्ची बात तू यह है की मुझे तुम्हारे साथ आकर जयादा अच्छा लगा'

आदित्य 'मुझे ऐसा लगता तू नहीं है की आप को मेरे साथ आकर अच्छा लगा'

संध्या 'ऐसा क्योँ'

आदित्य 'अगर मेरे साथ आकर अच्छा लगता तू इतनी दूर नहीं बैठती'

संध्या ज़मीन की तरफ देखते हुए 'वो..... वो.... न मुझे समझ नहीं आ रहा था की क्या करूँ'

आदित्य 'आ जाओ न मेरे पास'

संध्या थोड़ा सा खिसक कर आदित्य के पास आ गयी तू आदित्य भी थोड़ा सा संध्या की तरफ खसियक कर उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर कहने लगा 'आप बहुत खूबसूरत हैं'

संध्या उसकी बात सुनकर थोड़ा सा शर्मा गयी और आदित्य ने साथ में लाये हुए स्नैक्स में से एक उठाकर उसके मुंह से लगा दिया और बड़े प्यार से खिलने लगा. आदित्य ने अब उस हाथ पर धीरे धीरे अपने हाथ से सहलाते हुए कहने लगा 'इस जगह पर कितनी शांति है न'

संध्या ने अपनी नज़र उठाकर अपने चारो और देखा और कहा 'तुम ठीक कह रहे हो'

आदित्य 'मेरा मन कर रहा है की इस शांति का फायदा उठाकर थोड़ा आराम किया जाये'

संध्या 'मेरा भी मन यही कर रहा है, लेकिन कैसे'

आदित्य संध्या के बिलकुल पास खिसक आया और अपने बाजु को उसकी गर्दन के पीछे से लेकर उसके दूसरे कंधे पर अपने हाथ को ले जाकर कहने लगा 'अब आप अपने सर को मेरे कंधे पर रख कर आँखें बंद कर के इस जगह का मजा लीजिये'

संध्या ने वैसा hi किया और कहने लगी 'मैं तू इस तरह से आराम कर लुंगी, लेकिन तुम'

आदित्य उसकी बाजु पर अपने हाथ को फेरते हुए 'मेरे पास इतना सुन्दर फूल है, मुझे तू उसकी सुगंध से hi नशा छाने लगा है'

संध्या 'लगता है कुछ जयादा hi रोमांटिक हो रहे हो'

आदित्य 'कान्हा हो रहा हूँ, मैं तू अभी उस नशे में खोया हुआ हूँ, रोमांटिक होने का मौका hi नहीं मिला' इतना कहकर उसने संध्या के चेहरे पर आ गए बालों को साइड में करते हुए कहने लगा 'आप बहुत hi प्यारी लग रही हैं और मेरा मन कर रहा है की इस्सस प्यारी सी गुड़िया को चुम लूँ'

संध्या उसकी बात सुनकर थोड़ा शर्म गयी और अपने आप को उसकी छथि में छुपाने लगी. आदित्य ने उसके चेहरे को पकड़ कर ऊपर उठाया और उसकी आँखों में झांकते हुए कहने लगा 'ये चेहरा तू प्यार करने के लिए है, छुपाने के लिए नहीं' और फिर उसके एक गाल को चुम लिया. संध्या के दिल की धड़कन बढ़ने लगी. आदित्य उसके गलों को चूमते हुए थोड़ा लेट सा गया और संध्या भी उसके साथ साथ लेटने वाली हालत में हो गयी. आदित्य उसके गलों को चूमते हुए उसके लबों को अपने होठों में लेकर उसका रसपान शुरू कर दिया. उसके ऐसा करते hi संध्या के दिल में कुछ कुछ होने लगा और उसका मन भी मचल रहा था आदित्य के होठों को चूसने के लिए, लेकिन शर्मा हाय में अभी कुछ नहीं कर रही थी, लेकिन आदित्य को रोक भी नहीं प् रही थी.

आदित्य उसके होठों को चूसते हुए पूरा लेट गया और संध्या उसके ऊपर आधी लेती हुई थी, ऐसा करने से उसकी चूचियों ने आदित्य की छाती पर डाब कर उससे उत्तेजित कर दिया और आदित्य अपने हाथ को उसकी बाजु पर सहलाते हुए नीची की तरफ लेन लगा और उसकी एक चुकी पर अपने पंजे से रख कर दबा दिया. उसके ऐसा करते hi संध्या एक डैम से होश में आयी और वो आदित्य से अलग होकर बैठ गयी और लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी.

आदित्य भी उठकर बैठ गया और जैसे hi वो उससे हाथ लगाने लगा तू संध्या ने उसके हाथ से अपने आप को छुड़ाना चाहा और कहने लगी 'चलो वापिस चलते हैं'

आदित्य 'क्या हुआ, इतनी अच्छी जगह आप को पसंद नहीं आयी क्या'

संध्या 'नहीं वापिस चलते हैं'

आदित्य उसके पास आकर उसके गलों को चूमने लगा तू संध्या उससे दूर हो गयी और एकदम से कड़ी होकर कहने लगी 'चलो वापिस चलते हैं'

आदित्य 'आपको क्या हो गया है, एक तरफ तू कहती हो की मुझे गर्लफ्रेंड बनना है, मुझे प्यार करो और जब करने लगता हूँ तू मुझसे दूर भगति हो. ठीक है चलो, लेकिन अब मत कहना की मुझे गर्लफ्रेंड बनना है'

उसकी बात सुनकर संध्या को जैसे होश आया और वो जाकर आदित्य के गले लग गयी और उससे कसकर अपनी बांहों में ले लिया और कहने लगी 'मुझे गर्लफ्रेंड बनना है, लेकिन दर लगता है'

आदित्य ने उससे अभी अपनी बांहों में नहीं लिया और खड़े खड़े कहने लगा 'आप बहुत कन्फुसिंग हो, कभी कहती हो गर्लफ्रेंड बनना है और फिर कहती हो दर लगता है. अब आप hi बताओ मैं क्या करूँ? आप के दर को दूर करने के लिए hi तू इतनी दूर ऐसी शांत जगह पर लाया था जंहा आप अपने दिल की बात खुलकर कर सको'

संध्या 'लेकिन तुम मुझे छेड़ने लगते हो तू मुझे दर लगने लगता है'

आदित्य 'मैं आप जैसी प्यारी गुड़िया को छेड़ नहीं रहा था बल्कि उससे प्यार कर रहा था. अब अगर आप चाहती हैं की इतनी खूबसूरत गर्लफ्रेंड को प्यार न करूँ तू यह उसके साथ बदतमीजी होगी'

संध्या 'क्या सरे बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड से ऐसे करते हैं'

आदित्य 'देखो ऐसी खूबसूरत गर्लफ्रेंड की सुंदरता की मैं तौहीन नहीं कर सकता. ऐसी गर्लफ्रेंड के साथ अभी तू शुरुआत है, आगे आगे देखो मैं कितना प्यार करता हूँ'

संध्या उसके मुंह से अपनी तारीफ सुनकर मन hi मन बहुत खुश होने लगी, लेकिन मन के किसी कोने में दर भी था की क्या वो ये सब कर पायेगी.

संध्या को चुप देखकर आदित्य कहने लगा 'चलो चलते हैं, जब आप मन से तैयार होंगी तभी आएंगे'

संध्या ने जैसे hi यह सुना तू उसने अपनी बाजुओं को उसकी कमर पर कास लिया और अपने चेहरे को उसकी छाती में छुपकर कहने लगी 'थोड़ी देर रुकते हैं'

आदित्य 'क्या करेंगे'

संध्या 'जो बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड करते हैं' इतना कहने में उससे बहुत जोर पड़ा था.

आदित्य ने अब उसको अपनी बांहों में कास लिया और कहने लगा 'आप फिर बुरा मान जाओगी और मैं यह सब प्यार और सहमति से करना चाहूंगा'

संध्या ने धड़कते दिल से अपनी नाक को उसकी छाती पर रगड़ते हुए कहा 'मैं तैयार हूँ'

आदित्य ने उससे अब अपनी बाजुओं में उठा लिया और पेड़ के पास ले जाकर उससे अपनी गॉड में बैठा लिया और फिर उससे गॉड में बैठाये हुए उसके चेहरे पर बालों की लातों को हटात्ते हुए कहने लगा 'आप बहुत hi प्यारी और मासूम हो' ऐसा सुनते hi वो शर्मा गयी और अपनी नज़रों को झुका लिया. आदित्य उसके चेहरे को पकड़ कर उससे निहारता रहा और काफी देर गुजर जाने तक उसने जब कुछ न किया तू संध्या ने बेचैन होकर अपनी नज़रों को थोड़ा सा ऊपर उठाया और वो आदित्य को देखने लगी जो एकटक उससे hi देखे जा रहा था तू उसने पूछा 'क्या देख रहे हो'

आदित्य 'अपनी गर्लफ्रेंड की खूबसूरती को निहार रहा हूँ और देख रहा हूँ की भगवन ने बनाने में कहीं कोई कमी तू नहीं छोड़ दी, लेकिन लगता है भगवन ने आपको बहुत hi फुर्सत से और प्यार से बनाया है'

संध्या उसकी ऐसी प्यार भरी बातें सुनकर बहुत जयादा शर्मा गयी और दिल के तारों में हलचल मच गयी थी क्योंकि उसकी आज तक कभी किसी ने इतनी तारीफ़ कभी नहीं की थी. आदित्य ने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में पकड़ते हुए उसके गलों पर जब अपने हाथों को फेरा तू उससे नशा सा छाने लगा, उसकी आँखें बंद सी होने लगी. आदित्य का हाथ उसके गलों को फेरते हुए उसके होठों पर पंहुचा और अपने अंगूठे से उसके होठों को जैसे hi सहलाया तू संध्या का दिल धक् धक् करने लगा. आदित्य का दूसरा हाथ उसकी गर्दन को सहलाने लगा. संध्या को नशा सा होने लगा और आदित्य का हाथ अब गर्दन से होता हुआ उसके गले पर आने लगा और चुकी के ऊपरी हिस्से को दबाने लगा.

संध्या का हाथ उसके हाथ पर पंहुच गया और उसके हाथ को पकड़ कर अपनी उँगलियों में कास लिया. आदित्य उस हाथ को अपने चेहरे के नजदीक ले आया और उसके हाथ को छटने लगा, जिससे संध्या के मुंह से सिसकारी निकली. आदित्य ने अब उसके हाथ को छत्ते हुए उसकी बाजु को छटने और चूमने लगा और ऊपर की तरफ बढ़ने लगा. इधर उसके होठों पर अपने अंगूठे से रगड़ रहा था तू संध्या ने जोश में आकर उसके अंगूठे को अपने डेंटन में दबा दिया तू आदित्य ने एकदम से अपने अंगूठे को छुड़ाया और उसकी तरफ देखने लगा. संध्या उससे सॉरी कहने लगी तू आदित्य ने कहा 'सॉरी का कोई काम नहीं है, ये तू प्यार को प्रदर्शित करने का तरीका है और आपके इस तरह करने से मैं बहुत खुश हूँ' जिससे सुनकर संध्या बहुत hi जयादा शर्मा गयी.

आदित्य ने उससे गले लगा लिया और उससे कमर से पकड़ कर अपनी तरफ खींचा जिससे संध्या अब पूरी तरह से आदित्य पर लड़ी हुई थी. आदित्य ने उसकी पीठ को सहलाते हुए अपने हाथ को पीठ से कमर की तरफ लेट हुए जैसे hi कमर और पीठ के जोड़ पर अपने हाथ से सहलाया तू संध्या की साँसें बढ़ने लगी. आदित्य का हाथ वंहा इस तरह सेहला रहा था की उसके हाथ की चार उंगलियां उसकी पीठ पर थी और अंगूठा आगे पेट की तरफ था. उसका हाथ जैसे hi ऊपर जाने लगा और उसके अंगूठे ने चुकी को छुआ तू संध्या का रकत परवाह बढ़ गया. इस बार उसने आदित्य के हाथ को हटाना छाते हुए भी नहीं हटाया ताकि वो नाराज़ न हो. आदित्य का अंगूठे ान उसकी चुकी को धीरे धीरे दबाता रहा था और संध्या की उत्तेजना को बढ़ता रहा.

संध्या ने जैसे hi अपने बांये हाथ को ऊपर उठाया तू आदित्य का दांया हाथ फिसलकर अब पूरा का पूरा उसकी बांयी चुकी पर आ गया और आदित्य ने उसको हल्का सा दबाया. उसको दबाते hi दोनों को करंट लगा. आदित्य तू उस नरम नरम चुकी को दबा कर जन्नत का मजा लेने लगा. संध्या को मजा तू बहुत आ रहा था लेकिन शर्म के मरे अपनी आँखों को बंद कर लिया. आदित्य ने आगे बढ़ कर उसकी फड़कती हुई आँखों की पलकों पर अपने होठों को रखकर उन्हें चुम लिया. संध्या ने अपने बांहों का घेरा उसके गले में दाल दिया और बांये हाथ से उसके सर को सहलाने लगी.

आदित्य को अपनी माँ की यह प्रक्रिया एक ग्रीन सिग्नल लगा. उसने उसकी चुकी को (जिससे सपने में कई बार दबा चूका था) को हकीकत में दबा रहा था, उसके आनंद का कोई ठिकाना नहीं था. वो खुश तू बहुत था, लेकिन वो अब इंसानी फितरत के अनुसार और जयादा पाने की चाहत करने लगा. इसी चाहत में आकर वो संध्या के पुरे चेहरे को धीरे धीरे अपने चुम्बनों से निहाल करने लगा.

संध्या ने सम्भोग तू बहुत किया था लेकिन इस तरह का प्यार उससे पहली बार मिल रहा था और वो इस प्यार की बरसात में सब कुछ भूलती जा राजी थी की कैसे वो अपने सेज जवान बेटे से प्यार कर बैठी और आज इतना आगे तक बढ़ गयी जंहा से वापसी काफी मुश्किल थी. आदित्य के चुम्बनों ने उसको दूसरी दुनिया में ला पटका था और इस आनंद में वो सब कुछ भूल कर उसका साथ दिए जा रही थी. उससे होश hi नहीं रहा की कब आदित्य ने उसकी छीनी को उसके गले से निकल कर बहार कर दिया है. वो तू आदित्य द्वारा उसके उरोजों को दबाये जाने और उसके चुम्बनों में खोयी हुई थी की उससे जैसे hi आदित्य के होठों का स्पर्श उसके उरोजों की घाटी पर पड़ा तू उससे होश में ला दिया और उससे समझ नहीं आ रहा था की क्या करें. आदित्य उसके उरोजों की घाटी को बड़े hi मजे से चुम और छत रहा था. मजा तू संध्या को भी बहुत आ रहा था लेकिन शर्म ने उसके मजे लेने पर ब्रेक लगायी हुई थी. आदित्य ने अपनी जीभ निकल कर जैसे hi संध्या के उरोजों की घाटी में डालनी चाही तू वो सिहर उठी. वो दोनों अभी और आगे बढ़ते की तभी उन्हें किसी के आने का एहसास हुआ तू दोनों अलग होकर बैठ गए.
 
ी कैन अंडरस्टैंड तहत ा ग्रेट राइटर लिखे यू वोउल्ड ऑलवेज हैवे ठोसँदस ऑफ़ क्वेरीज विथ रेगार्ड्स तो अन्य स्टोरी और इवन अपडेट.

ी वोउल्ड बे दलइतेद तो आंसर अन्य ऑफ़ योर क़ुएस्तिओन्स.

मिस्टेक्स अरे part ऑफ़ अन्य वर्क. यू हैवे गिवेन में क्रेडिट तहत ी won't कमिट अन्य मिस्टेक, वेल it's योर ग्रेटनेस.

No डाउट ी टेक एक्स्ट्रा केयर नॉट तो कमिट ओने, होवेवेर िफ़ it's तेरे ी वोउल्ड एक्सेप्ट आईटी विथ ग्रेस एंड वोउल्ड तरय तो रेक्तीफी.

थैंक्स सो मच
 
Back
Top