इन्सेस्ट रिश्ता - Page 14 - SexBaba
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इन्सेस्ट रिश्ता

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अपडेट 72

जैसे hi आदित्य ने उसकी चुकी को दबाया तू संध्या की धड़कने तेज हो गे थी और उसने अपने हाथ को आदित्य के हाथ से हटा लिया था. आदित्य बहुत hi हलके से एक बार और दबाकर उस आनंद को फिर से पाना चाहा, लेकिन शर्म की वजह से बहुत हल्का दबाया. जैसे hi आदित्य ने ये किया तू संध्या की आँखों का रंग बदल गया था. Honṭh कुछ नशीले से हो गए थे. वह बड़े ही नशीले अदांज से आदित्य की आँखों में झाकने लगी. संध्या के शरीर के स्पर्श से आदित्य भी बहक गया. उसने एक पल के लिए संध्या की नशीली आँखों में देखा और उन आँखों में देखते हुए वो उस प्यार की गहराई को बर्दाश्त नहीं कर पाया और अपनी माँ की चुकी से अपने हाथ को उसकी बाजु के नीचे से निकलकर उससे अपनी बांहों में भर लिया और उसके मुंह से अनायास hi ये निकलने लगा

'chaḍhega जब मेरी चाहत का रंग‚ मेरी बाहों में आकर बिखरोगे आप,

यूं तू खूबसूरत हो आप बहुत‚ मिलकर मुझसे और भी निखरोगे आप'

संध्या को जैसे hi आदित्य ने अपनी बांहों में भरा तू उसकी चूचियों ने आदित्य की छाती पर स्पर्श किया. संध्या के मन में उथल पुथल मचने लगी और उसने कुछ जयादा न सोचते हुए अपनी बांयी बाजु से आदित्य को अपने साथ लिपटने लगी, जिससे उसकी चूचियां आदित्य की छाती में और जयादा दबने लगी. आदित्य के मन में भी खलबली मचने लगी और उसने अपनी भावनाओं को शब्दों के माध्यम से अपनी माँ को व्यक्त कर दिया.

संध्या आदित्य की बात सुनकर मन hi मन बहुत प्रसन्न हुई की उसका जवान बीटा उसके लिए ये सब भी बोल सकता है. उसने बनावटी गुस्सा दिखते हुए आदित्य से कहा 'यह क्या बोल रहा है'

आदित्य 'मैं तू आपकी खूबसूरती की तारीफ कर रहा हूँ'

संध्या 'मेरी तारीफ कर रहे हो या तना मार रहे हो की अगर मैं तुम्हारी बांहों में आउंगी तभी जयादा खूबसूरत लगूंगी, मतलब यही हुआ न की मैं अभी उतनी खूबसूरत नहीं हूँ जितनी तुम चाहते हो की तुम्हारी गर्लफ्रेंड खूबसूरत हो'

आदित्य उससे थोड़ा अलग होते हुए अपने हाथों से उसके चेहरे को पकड़ कर कहने लगा 'आप बहुत खूबसूरत हो, लेकिन आपने अपनी खूबसूरती का सही उपयोग नहीं किया, मैंने तू बस इतना कहा है की आप मेरी बांहों में आओगी तू आपकी खूबसूरती में चार चाँद लग जायेंगे'

संध्या आदित्य की आँखों में झांकते हुए 'मतलब की अगर मैं तुम्हारी बांहों में नहीं आउंगी तू मेरी खूबसूरती उतनी नहीं है जितनी तुम चाहते हो'

आदित्य अपने हाथों से उसके गलों को सहलाते हुए कहने लगा 'मेरी आँखों में झांक कर अपने आप को खुद hi देख लो की कैसे आप मेरी बांहों में आने के बाद निखार गयी हो'

मेरी बात का सीधा सा मतलब ये है की जब कोई आपकी खूबसूरती की तारीफ करेगा तू आप अपने आप को और जयादा खूबसूरत बनाने में लग जाओगी तू निखार आएगा hi. अगर कोई आपकी खूबसूरती की तारीफ न करे उससे नज़र अंदाज़ करेगा तू आप भी लापरवाह हो जाओगी, जो की आप ने इतने सैलून से किया है तू आपकी खूबसूरती अपने आप hi काम हो जाएगी'

संध्या 'मतलब मैं अभी तुम्हे काम खूबसूरत लगती हूँ न'

आदित्य उसके चेहरे को पकड़ कर इधर उधर घूमते हुए उसके चेहरे पर एक उंगली फिरते हुए 'मैंने जो भी कहा वो एक साधारण बात कही थी की आपने अपनी खूबसूरती पर इतना ध्यान नहीं दिया जितना देना चाहिए था. लेकिन ये भी एक सच है की अगर कोई पारखी हो मेरे जैसा तू उससे आप की खूबसूरती की वास्तविकता पता लगेगी'

संध्या 'मतलब की तुम अपने आप को खूबसूरती का पारखी समझते हो'

आदित्य 'मैं समझता नहीं हूँ, बल्कि मैं हूँ क्योँकि मुझे मालूम है की आप बहुत खूबसूरत हो'

संध्या शरमाते हुए 'अगर मैं इतनी खूबसूरत हूँ तू फिर ये क्या है की तुम्हारी बांहों में आने से मुझ में निखार आएगा'

आदित्य उसके गलों को सहलाते हुए 'आप को नहीं लगता की आप मेरी बाहों में आओगी तू और खूबसूरत हो जाओगी, विश्वास नहीं है तू खुद hi देख लो की आप कैसे चहक रही हो'

संध्या उसकी बात सुनकर शरमाते हुए उसके सीने पर मुक्का मरते हुए 'मुझसे मसखरी करता है'

आदित्य ' मैं आपसे मसखरी क्योँ करुणा. आप बताओ की मैंने क्या गलत कहा है? आप खुद सोचो की अगर आप मेरी बांहों में आओगी तू आप ऐसे hi तू नहीं आओगी. जब भी आप मेरी बांहों में आओगी या आने का मन करेगा तू अपने आप को संवर कर और अच्छे से अच्छा बनकर hi तू आओगी न'

संध्या उसकी बात सुनकर शरमाते हुए 'हाँ'

आदित्य 'तू फिर आप बताओ की मैंने क्या गलत कहा है की जब आप मेरी बाहों में आओगी तू और निखरेगी'

संध्या कुछ जायदा hi शर्मा गयी और अपनी आँखें नीचे कर ली और चुप हो गयी. आदित्य उसके चेहरे को निहारता रहा और फिर धीरे से उससे अपनी बांहों में लेकर 'क्या हुआ मेरी गर्लफ्रेंड चुप हो गयी'

संध्या चुप hi रही तू आदित्य ने कहा 'मुझे मालूम था की आप को गर्लफ्रेंड बनने में दिक्कत आएगी, इसलिए मेरी राइ है की आप धीरे धीरे अपने आप को गर्लफ्रेंड बनने के लिए तैयार करो, क्योँकि आप बहुत समय से घर से बहार भी नहीं गयी और एकदम से बदलाव से हमेशा परेशानी hi होती है'

संध्या 'तुम शायद सही कह रहे हो लेकिन मैं चाहती हूँ की जल्दी से जल्दी आजकल के ज़माने की गर्लफ्रेंड बन जॉन और मुझे इसमें तुम्हारी हेल्प भी चाहिए होगी'

आदित्य 'हाँ हाँ क्योँ क्यों नहीं हेल्प करूँगा और जरूर करूँगा. आप बताओ मेरी किस तरह की हेल्प चाहती हो'

संध्या 'मुझे यह जानना है आजकल की गर्लफ्रेंड लगने के लिए मुझे क्या क्या करना पड़ेगा या सीखना पड़ेगा'

आदित्य ने उसकी आँखों में झांकते हुए 'आप अभी सिर्फ अपनी पढ़ाई पैर ध्यान दो और एग्जाम ख़तम करने के बाद मैं आपको सब कुछ सीखा दूंगा'

संध्या 'लेकिन मुझे ये सब अभी जल्दी से जल्दी सीखना है'

संध्या 'लेकिन मैं नहीं चाहती की मेरे बॉयफ्रेंड को उसकी गर्लफ्रेंड की वजह से कुछ बुरा फील करना पड़ेगा तू मुझे अच्छा नहीं लगेगा'

आदित्य 'आपकी वजह से मुझे कभी किसी ने कुछ कह दिया तू उसकी खैर नहीं'

संध्या 'मुझे मालूम है की मेरी वजह से तुम किसी से भी लड़ लोगे, लेकिन मैं यह नहीं चाहती क्योँकि किसी को भी मौका क्योँ देना, इसलिए मुझे जल्दी से जल्दी सीखना है'

आदित्य 'देखो यह उन को सीखना पड़ता है जिन्हे बॉयफ्रेंड बनाना होता है आपके पास पहले से hi बॉयफ्रेंड है इसलिए आप सीखे या न सीखे से कोई फर्क नहीं पड़ता'

संध्या 'लेकिन आजकल के महल के हिसाब से चलने के लिए मुझे सब सीखना है, जल्दी से जल्दी'

आदित्य 'मैं कहाँ कर रहा हूँ. मैं तो सिर्फ यह कह रहा हूँ की एक्साम्स के बाद सीख लेना'

संध्या 'क्या ऐसा नहीं हो सकता की साथ साथ सीख पौन'

आदित्य 'सब पॉसिबल है, लेकिन आपको अभी सीखने की जरुरत नहीं है, पहले अपने एक्साम्स पर फोकस करो, फिर बहुत टाइम मिलेगा ये सब सीखने के लिए'

संध्या 'क्या तुम नहीं चाहते की तुम्हारी गर्लफ्रेंड जल्दी से जल्दी सीखकर आज के ज़माने की बन जाये'

आदित्य 'मुझे इस सब से कोई फरक नहीं पड़ता की आपको क्या आता है या नहीं आता है, आप जैसी भी जो बहुत अच्छी हो. आप एक बात बताओ की आप क्योँ चाहती हो की मैं आपका बॉयफ्रेंड बनु और आप जल्दी से जल्दी नए ज़माने की गर्लफ्रेंड'

संध्या उसकी बात सुनकर एक बार तू चौंक गयी लेकिन फिर खुद को सँभालते हुए 'क्या तुम्हे अच्छा नहीं लग रहा की मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड हूँ'

आदित्य 'मैंने तू ऐसा कुछ नहीं कहा, लेकिन आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया'

संध्या 'तुम मुझे अच्छे लगते हो'

आदित्य 'आपको कोई भी अच्छा लगेगा तू आप उस को अपना बॉयफ्रेंड बना लोगी'

संध्या 'अगर मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड हूँ तू तुम्हारे साथ घूमने जा सकती हूँ'

आदित्य हंसने लगा और कहा 'उसके लिए तू आपको गर्लफ्रेंड बनने की भी कोई जरुरत नहीं थी, वो तू आप जब भी कहती मैं आपको घुमा देता'

संध्या 'उस तरह घूमने में तुम्हारी मिन्नतें करनी पड़ती, लेकिन गर्लफ्रेंड को तू ख़ुशी से घुमाओगे'

आदित्य ने अपनी माँ की आँखों में देखते हुए 'आप बताना नहीं चाहती तू आपकी मर्जी, चलो जब आपका मन करे आप बता देना'

संध्या 'मैंने बताया तू है'

आदित्य 'आपने जो भी कहा है उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि कोई भी माँ अपने बेटे को घूमने के लिए मिन्नतें नहीं करती बल्कि आदेश करती है. दूसरा अगर मैं आपकी बात मान भी लू तू ये बताओ आपने कितनी बार मुझे घूमने के लिए कहा और मैंने आपको मन किया हो. आप पर मेरा कोई दबाव नहीं है की आप मुझे बताओ, लेकिन अगर बता देती तू अच्छा होता'

संध्या 'मुझे लगा की कोई तू होना चाहिए जिससे मैं अपने दिल की बात कर सकू'

आदित्य बीएड से खड़ा हो गया और वंहा रखे जग में से गिलास में पानी डालकर अपनी माँ को देते हुए 'आप पानी पीजिये और परेशान होने की जरुरत नहीं है, मैं अब आप से नहीं पूछूंगा क्योँकि मुझे समझ आ गयी है की आप मुझे नहीं बताना चाहती'

संध्या ने गिलास ले लिया और पानी पिया और सोचने लगी की कैसे बताऊँ, लेकिन उससे ये समझ आ गया की आदित्य जाने बगैर मानेगा नहीं.

जब संध्या ने पानी पि लिया तू आदित्य ने गिलास साइड टेबल पर रख दिया और जाने लगा तू संध्या को झटका लगा. वो जल्दी से उठी और आदित्य को पीछे से एक hi हाथ को उसकी कमर से पकड़ कर उसकी पीठ पर अपने सीने को लगते हुए 'मुझे छोड़ कर जा रहे हो'

आदित्य को उसकी पीठ पर अपनी माँ की चूचियों का एहसास हुआ तू उसकी भावनाएं फिर से भड़काने लगी, लेकिन उन भावनाओं को नियंत्रण में रखते हुए 'मैं तू आपको सोने के लिए कह रहा हूँ, अब आप सोयेंगी तू तभी थोड़ा आराम मिलेगा'

संध्या 'तुम्हे जानना नहीं है की मैं क्योँ तुम्हारी गर्लफ्रेंड बनना चाहती हूँ'

आदित्य 'जानना तू चाहता हूँ लेकिन आपके आराम की चिंता मुझे जयादा है'

संध्या 'मैं आराम से हूँ, लेकिन अगर तुम नाराज़ होकर चले गए तू मैं दुखी हो जाउंगी'

आदित्य 'अरे मैं तू सिर्फ अपने कमरे में जा रहा हूँ, आपसे नाराज़ नहीं हूँ और आपको मेरे कमरे में जाने से भी आपको परेशानी हो रही है, यह तू मेरी समझ से बहार है'

संध्या ने अपने बांये हाथ को आदित्य की चाहती पर और जयादा कस्ते हुए और अपनी उँगलियों से उसकी छाती को कुरेदते हुए 'वो मैं तुम्हे काफी टाइम से कुछ बताना छह रही थी, लेकिन हिम्मत नहीं जूता पायी'

आदित्य 'अब अगर हिम्मत जूता ली है तू बता दो की क्या कहना छह रही हो'

संध्या 'मैं जो बताने जा रही हूँ उससे तुम बुरा तू नहीं मान जाओगे'

आदित्य 'आप बताओगी तभी तू पता लगेगा न की वो बुरा मैंने वाली बात है या खुश होने वाली बात'

संध्या 'लेकिन मुझे बताते हुए दर लग रहा है की अगर बता दूंगी तू कहीं तुम नाराज़ हो कर मुझे छोड़ कर चले गए तू मेरा पता नहीं क्या होगा'

आदित्य 'मैं आपसे वादा कर चूका हूँ की मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा तू फिर दर कैसा'

संध्या 'दर तू होगा hi न, आज मैं बिलकुल अकेली हो गयी हूँ और तुम नाराज़ हो कर चले गए तू फिर मेरे पास क्या चारा बचेगा'

आदित्य 'सबसे पहले तू आप अपने मन से इस दर को निकल दो की मैं आपको छोड़ दूंगा तू वो हो नहीं सकता क्योंकि मई अपने वाडे पर कायम हूँ'

संध्या 'मुझे एक दिन गर्लफ्रेंड बनाया और अगले दिन गर्लफ्रेंड को छोड़ कर माँ को अपना लिया'

आदित्य 'मैंने तू आपको दिल से गर्लफ्रेंड मान लिया था, सिर्फ मन hi नाहा था बल्कि आपको गर्लफ्रेंड होने का आभास भी कराया था. मैंने आपको कभी नहीं छोड़ा था, वो तू आपके अंदर की माँ जाग गयी तू मैंने आपकी इज़्ज़त करते हुए आपके माँ बनने का समर्थन किया. आप खुद कन्फ्यूज्ड हो की आप मेरी गर्लफ्रेंड जो या माँ, मुझे अभी भी समझ नहीं आ रहा है. मैं तू समझ hi नहीं पा रहा हूँ की आपको मेरी गर्लफ्रेंड क्योँ बनना है. अगर आप बता देंगी तू हो सकता है मैं आपकी कुछ मदद कर सकू'

संध्या 'मुझे अकेले नहीं रहना है'

आदित्य 'आप अकेली कान्हा हो, शादीशुदा हो, पति है, दो जवान बच्चे हैं'

संध्या की आँखों में आदित्य की बात सुनकर आंसू आ गए और बेख्याली में अपने दांये हाथ से अपने आंसुओं को पोछने लगी तू उसके हाथ में थोड़ी सी जलन हुई और उसके मुंह से निकला 'आउच' और उसने आदित्य को छोड़ दिया. आदित्य ने पलटकर देखा की उसकी माँ की आँखों में आंसू थे और उसने अपने बांये हाथ से दांये हाथ को पकड़ रखा था.

आदित्य 'क्या हुआ'

संध्या ने कोई जवाब नहीं दिया तू आदित्य ने उसके दांये हाथ को पकड़ कर देखते हुए 'लगता है कहीं छू गया है, बाकि कुछ नहीं है, अब जलन भी जयादा नहीं होगी. चलो मेरे कमरे में आपके हाथ को थोड़ी देर और ठन्डे पानी में दाल देते हैं, जिससे ये ठीक हो जायेगा'

आदित्य 'अगर आपका मन मेरे कमरे में जाने का नहीं है तू मैं पानी का बाउल यही ले आता हूँ'

संध्या 'अगर मुझे गर्लफ्रेंड समझोगे तभी मैं अपने हाथ का इलाज करवाउंगी'

आदित्य 'ठीक है मेरी गर्लफ्रेंड, अब ये बताओ की मेरे कमरे में चलना है या बाउल को यंहा लॉन'

संध्या 'जैसी तुम्हारी मर्जी'

आदित्य ने उससे बिना बताये फिर से अपनी बांहों में उठा लिया और चल पड़ा अपने कमरे की तरफ. संध्या ने अपनी बांयी बाजु को आदित्य के गले में दाल दिया जिससे उसकी चूचियां आदित्य के सीने से लगाकर उसकी भावनाओं को नृत्ये करने लगी. उसका मन कर रहा था की वो अपनी माँ की अर्ध नग्न चूचियों को चुम ले लेकिन ऐसा करने से वो नहीं चाहता था की उससे बुरा लगे, इसलिए नहीं किया'

आदित्य ने लेकर अपनी माँ को कुर्सी पर बैठा दिया और उसके दांये हाथ को पानी में दाल दिया. फिर उससे याद आया की उसके पास पेनकिलर है तू वो उससे अपनी माँ को खाने के लिए देने लगा, लेकिन रुक गया और किचन से बिस्कुट लाया और पहले अपनी माँ को दो बिस्कुट खिलाये और उसके बाद पेनकिलर दी.

आदित्य भी एक स्टूल लाया और अपनी माँ के बिलकुल पास उस स्टूल को रखकर उस पर बैठ गया.

आदित्य ने अपने दांये हाथ से अपनी माँ के बांये हाथ को लेकर उससे सहलाते हुए पहले तू ये पूछा की अब दर्द का क्या हाल है तू उसने बताया की पहले से काम हो रहा है लेकिन कंधे और बाजु पर अभी थोड़ी जलन है. आदित्य अपनी माँ के बांयी तरफ बैठा था.

आदित्य ने बाउल में हैंड टॉवल को गीला करके अपने दांये हाथ को उसकी गर्दन के पीछे से निकलकर उसके कंधे पर रख दिया जिससे वो टॉवल कंधे और बाजु दोनों को कवर करने लगा था और जलन को ठंडक पंहुचकर आराम देने लगा. आदित्य अपने दांये हाथ से तू कंधे को सहलाने लगा और बांये हाथ में अपनी माँ का बांया हाथ ले लिया जिससे आदित्य थोड़ा सा उनकी तरफ झुक गया और उसकी बाजु से उसकी चूचियां दबने लगी.

संध्या को भी उसका इस तरह ख्याल रखना अच्छा लगने लगा और उसकी चुकी दबने से उसको भी मजा आने लगा. उसने अपने सर को आदित्य के दांये कंधे पर टिका लिया. आदित्य उसके हाथ को सहलाते हुए 'अब तू आप मेरी गर्लफ्रेंड हो तू बताओ न आप कुछ बताना छह रही थी'

संध्या उसकी बात सुनकर एक बार फिर सोच में पद गयी की क्या करूँ. वो अपनी सोचों में गम हो गयी और इस तरह 10 मिनट ऐसे hi बिना बोले निकल गए. आदित्य भी छह रहा था की वो अच्छे से अपनी हिम्मत जूता ले तभी बताये. जब आदित्य ने देखा की वो कुछ नहीं बोल रही तू उसने दांये हाथ को टॉवल से हटाकर उसके चेहरे को पकड़ कर अपनी तरफ घूमते हुए उसकी आँखों में झंकार कहने लगा 'अब बताओ न जो भी आप बताना छह रही थी' उसकी बात सुनकर संध्या फिर सोच में पद गयी तू आदित्य ने उसके माथे को चूमते हुए कहा 'आप जो भी कहेगी, मेरा वादा है की न तू मैं आपसे नाराज़ होऊंगा और न hi गुस्सा, आप खुलकर बताओ और मुझे अपना दोस्त समझ कर बताओ'

संध्या को उसकी बात सुनकर कुछ तस्सली तू हुई लेकिन फिर भी उससे अपने ऊपर विश्वास नहीं तह की वो ये बात उससे बता पायेगी और क्या भरोसा है की ये मुझसे गुस्सा नहीं करेगा या मुझे छोड़ कर नहीं जायेगा. लेकिन अब ये भी सच था की वो बिना जाने रहेग नहीं. संध्या ने बड़ी हिम्मत करते हुए एक बार आदित्य के चेहरे को निहारा लेकिन फिर अपनी पलके झुकाते हुए कहने लगी 'वो.... न... वो न.... '

आदित्य 'क्या'

संध्या 'ो.... न... वो न.... '

आदित्य 'ये क्या है वो न वो न, बताना है तू बताओ'

संध्या 'वो न .. मुझे... न .. तुम. से .. pa....a ..yaa...r. हो गया है' इतना कहकर वो आदित्य के गले लग गयी.
 
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अपडेट 73

मोहनलाल और रुचिका कमरे में आ गए तू मोहनलाल ने रुचिका को अपनी बांहों में भर लिया और उसके होठों पर अपने होठों को रखकर उसका चुम्बन लेने लगा तू रुचिका ने कहा 'लिपिस्टिक ख़राब हो जाएगी' तू मोहनलाल ने उससे कहा 'लिपिस्टिक की चिंता है, मेरी नहीं' और ये सुनते hi रुचिका ने भी उसके होठों को चूमने में साथ देने लगी. मोहनलाल उसकी कमर को पकड़ कर अपने से लिपटते हुए 'यू अरे माय लव' और उसके नितम्बों को दबा दिया तू वो फिर पीछे होने लगी तू मोहनलाल ने उससे पीछे नहीं होने दिया और एक हाथ तू उसका नितम्ब पर था और दूसरे हाथ को रुचिका के बूब्स को प्रेस करने लगा. रुचिका ने अपने हाथ को उसके हाथ पर रखते हुए 'चलें, नहीं तू फ्लाइट मिस हो जाएगी' मोहनलाल ने कहा 'इतनी सुन्दर बीवी बांहों में हो' तू एक क्या सौ फ्लाइट भी छूट जाएँ तू गम नहीं' तब रुचिका ने कहा 'चलते हैं नहीं तू आपके दोस्त पता नहीं क्या क्या सोचेंगे. फिर मोहनलाल ने बेमन से कहा 'ठीक है चलो' और वो दोनों फ्लाइट पकड़कर घर आ गए.

घर पंहुचने के बाद अगले दिन सुबह सुबह hi मोहनलाल चला गया. मोहनलाल के जाने के बाद रुचिका का मन नहीं लग रहा था. उससे लग रहा था की कुछ तू था ऐसा जिससे उससे खालीपन का एहसास होने लगता. सारा दिन उसकी माँ संध्या जो अब एक तरह से उसकी सौतन भी बन चुकी थी, उसके अड्मिशन की वजह से उस पर बहुत प्यार न्योछावर कर रही थी.

वो मन में सोच रही थी की उसकी बेटी अब हॉस्टल में चली जाएगी तू उसके साथ जयादा से जयादा वक़्त बिताऊं. उस बेचारी को क्या पता था की उसकी जान से जयादा प्यारी बेटी ने उसके पति पर hi डाका दाल दिया है. रुचिका उदास लग रही थी. उसकी उदासी को संध्या समझ रही थी की वो घर से दूर जा रही है, शायद इसलिए परेशान है, इस बात को सोचते हुए संध्या अपनी बेटी रुचिका को समझने में लगी हुई थी की उससे चिंता करने की जरुरत नहीं है और उसका जब मन करे घर आ जाये या किसी को बुला ले. उस बेचारी को क्या पता तह की वो अपने hi पेअर पर कुल्हाड़ी मार रही है.

रुचिका का मन बिलकुल नहीं लग रहा था और वो जल्दी से जल्दी मोहनलाल से बात करना छह रही थी लेकिन उसकी माँ उससे अकेले छोड़ hi नहीं रही थी. उधर मोहनलाल भी बात करना छह रहा था लेकिन उसके मन में दर था की कहीं बात करते हुए संध्या के सामने उनका राज खुल न जाये इसलिए उसने अपने मन को पक्का करके फ़ोन न करने की सोची.

रात को सोने के वक़्त रुचिका के नए नंबर के व्हाट्सप्प पर मोहनलाल का मैसेज आया

म : कैसी है मेरी जान

रुचिका ने जैसे hi मैसेज देखा उसके दिल की धड़कन बढ़ गयी और उसने अपने कमरे से बहार आकर देखा की बाकि सब शायद सो गए हैं, लेकिन उसने अपने कमरे की अंदर से कुण्डी लगाई और फिर बीएड पर लेत कर मोहनलाल को याद करते हुए

र: मैं ठीक हूँ, आप कैसे हैं

म: मैं अपनी जान के बिना कैसा होऊंगा

र: फिर मुझे अकेला क्योँ छोड़ कर चले गए

म: क्या करता, तुम्हारी माँ को तू मैंने कहा था की मैं तुम्हारे साथ नहीं जा पाउँगा और उसने साथ जाने के लिए जिद की थी, इसलिए गया था. अब अगर मैं रुक जाता तू उससे पता लग जाता की कुछ गड़बड़ है, इसलिए वंहा से यंहा आ गया.

र: आप मन कर देते जाने से और कोई बहाना बना देते

म: तुमने भी तू कहा था की अभी पांच दिन रुक जाओ

र: मैंने ये थोड़ी न कहा था की मुझसे दूर चले जाओ

म: मैं दूर कान्हा हूँ

र: मेरे पास भी तू नहीं हो

म: ये समझ का फेर है, वैसे तुम तू मेरे दिल में हो

र: अब आपसे दुरी बर्दाश्त नहीं हो रही

म: वैसे तू मैं तुम से दूर नहीं हु, फिर भी अगर तुम्हारी बात मान भी लू तू

दूरियों से Hi एहसास होता है की;

नज़दीकिया कितनी ख़ास होती हैं.

र: आँखों की ज़ुबान वह समझ नहीं पाते,

होंठ मगर कुछ भी कह नहीं पाते,

अपनी बे बसी किस तरह कहैं,

कोई है जिस क बिना हम रह नहीं पाते.

म: मेरी ज़िन्दगी मेरी जान हो तुम,


मेरे सुकून का दूसरा नाम हो तुम.

र: फिर भी मुझसे दूर हो

म: ये सोच है अपनी अपनी, तुम तू मेरे दिल में, तुम भी ज़रा अपने दिल को टटोलो, मैं मिल जाऊंगा.

र: आप कब आओगे

म: तुम जिस दिन अड्मिशन के लिए जाओगी, मैं आऊंगा और तुम्हारे साथ अकेले में वक़्त बिताऊंगा

र: मुझे इंतज़ार रहेगा

म: अब सो जाओ

र: मुझे नींद नहीं आएगी

म: आँखें बंद करो और मुझे देखो नींद आ जाएगी

र: कोशिश करती हूँ, नहीं तू फ़ोन कर दूंगी

म: जरुरत नहीं पड़ेगी, गुड नाईट.

ऐसे hi पांच दिन बीत गए और मोहनलाल वापिस आ गया और उसकी जरुरी चीज़ों की खरीददारी करवा कर उससे छोड़ने जाना था तू संध्या ने मोहनलाल से रुचिका के साथ जाकर उससे छोड़ने के लिए कहा. मोहनलाल ने ऐसा दिखाया जैसे वो जाने में असमर्थ है लेकिन संध्या की वजह से जा रहा है और वो सब सोने चले गए. मोहनलाल और रुचिका का मन तू नहीं लग रहा था सोने के लिए, लेकिन मज़बूरी थी तू सो गए और उन दोनों के मन में यही था की वंहा जाकर अकेले में वक़्त बिताने का मौका मिलेगा.

अगले दिन मोहनलाल और रुचिका जल्दी hi तैयार हो गए और जाने के लिए उन्होंने टैक्सी बुलवाई थी. जब वो जाने लगे तू संध्या भी तैयार होकर आ गयी और उन्हें कहने लगी की वो भी साथ जाएगी. उन दोनों के लिए तू ये सुन्ना किसी शॉक से काम नहीं था. रुचिका ने कहा भी की वो पापा के साथ चली जाएगी तू संध्या ने कहा 'क्योँ तू नहीं चाहती की मैं देखूं की मेरी बेटी वहां आराम से रह भी पायेगी या नहीं' उसने बात hi ऐसी कही थी की उन दोनों को मन मारकर चुप रहना पड़ा.

रुचिका तू बिलकुल hi उद्दस हो गयी. संध्या ने उसकी उदासी देखकर कहा की 'अभी घर से निकल रही हो तू उद्दस हो गयी और जब वंहा अकेली रहोगी तू क्या होगा, मैंने इसलिए तुम्हारे साथ जाने का फैसला किया है. मोहनलाल उससे क्या कहकर और कैसे मन करे, उसकी समझ से परे था, इसलिए बेमन से संध्या को भी साथ चलने के लिए बोल दिया.

अब कई दिनों से मोहनलाल और रुचिका एन्जॉय करने का प्लान बनाते रहे और एक hi झटके में उनके प्लान की धज्जिया उड़द गयी, इसलिए वो दोनों परेशान हो रहे थे और परेशानी उन दोनों के चेरों पर साफ़ साफ़ झलक रही थी जो संध्या से छुपी नहीं रही. उसने मोहनलाल से इस बारे में पूछा तू उसने कहा की वो यह सोच रहा था की रुचिका को छोड़ने के बाद वंही से फ्लाइट पकड़कर चला जायेगा, लेकिन अब उससे संध्या को छोड़ने आना पड़ेगा. संध्या ने कहा की वो अकेली वापिस आ जाएगी तू मोहनलाल ने मन कर दिया और कह की वो छोड़ने आएगा.

टैक्सी आने के बाद तीनों ने टैक्सी में सामान रखा और मोहनलाल आगे बैठने लगा तू उन दोनों ने मन कर दिया और कहा की नहीं तीनों पीछे बैठेंगे और गप्पे मरेंगे.

सबसे पहले रुचिका, फिर संध्या और फिर मोहनलाल पिछली सीट पर बैठ गए. टैक्सी लिऊष्र्य थी, जिसमे ड्राइवर और पैसंजर के बीच के परदे को गिरा दिया जाने से पिछली सीट की प्राइवेसी बानी रहती है. मोहनलाल ने ये टैक्सी इसलिए बुक करवाई थी की वो रुचिका के साथ प्राइवेसी एन्जॉय कर सके, लेकिन यंहा तू संध्या के आने से उसके मंसूबो पर पानी फिर गया था. खैर उन्होंने पर्दा गिरा दिया और प्राइवेसी बना ली.

संध्या रुचिका की तरफ मुंह करके 'देख कुछ रह गया हो तू बता दे, या तू आज hi खरीद लेना नहीं तू पैसे दे देते हैं, तुम अपने आप ले लेना'

रुचिका 'नहीं अभी तू कोई ख़ास जरुरत नहीं लग रही, लेकिन जब जरुरत होगी तू आपसे मांग लुंगी, आप मन तू नहीं करोगी न'

संध्या 'तुझे पता है की तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ, तुम बिलकुल भी चिंता न करना, बेझिझक होकर मांग लेना'

रुचिका 'ऐसी कोई चीज़ जो आपको बहुत प्यारी हो और वो मुझे भी चाहिए हो तब मैं आपसे कैसे मांग पाऊँगी'

संध्या 'देख अगर ऐसी कोई चीज़ तुझे जरुरत है तू अभी बता अभी के अभी दे दूंगी और उफ़ भी नहीं करुँगी. कोई भी चीज़ चाहे मुझे कितनी भी प्यारी हो, वो तुम्हारी ख़ुशी से ज्यादा कीमती नहीं हो सकती'

रुचिका उनकी बात सुनकर उनके गले लग जाती है और कहती है 'आप बहुत महँ है' उसकी आँखों में थोड़ी नमी आ जाती है और मन में सोचने लगती है की मैंने सही किया या गलत. वो अपनी माँ के गले लगी होती है की मोहनलाल जो संध्या के बांयी साइड में बैठा होता है, वो रुचिका के गलों को अपने हाथों से सेहला देता है, जिससे रुचिका थोड़ी दर जाती है की कहीं उसकी माँ को पता न व्हाल जाये. वो अपनी आँखें ऊपर करके मोहनलाल को न करने का इशारा करती है तू मोहनलाल उल्टा और जोर से उसके गलों को सेहला देता है तू वो संध्या से दूर जाने लगती है तू मोहनलाल उसके हाथ को पकड़ कर अपनी तरफ खींचता है. संध्या को ऐसा लगता है जैसे रुचिका ने उससे छोड़ा और फिर भावुक होकर फिर से जोर से गले लग गयी हो. रुचिका की पीठ को सहलाते हुए संध्या ने कहा 'चिंता न करो, जब भी तुम्हे किसी चीज़ की जरुरत हो बस एक फ़ोन कर देना' तभी मोहनलाल ने उसका हाथ और जयादा खींचा तू संध्या को लगा की वो जयादा भावुक हो गयी है. संध्या ने उससे कहा 'चल चल बहुत हो गया चिंता न कर, मैं तुझे कभी भी कोई तकलीफ नहीं होने दूंगी, मुझसे जो बन पड़ेगा करुँगी'

रुचिका अपने हाथ को मोहनलाल के हाथ से छुड़ा कर सीढ़ी होकर बैठ गयी. उसके दिल की धड़कन बढ़ी हुई थी. उससे अच्छा भी लग रहा था की उसके पापा जो अब पति भी हैं उसकी माँ के होते हुए उससे छेड़ने में गुरेज नहीं कर रहे थे, लेकिन उससे ये दर भी लगा हुआ था की उसकी माँ को पता चल गया तू पता नहीं क्या होगा. अपने दिल की धड़कन को संयत करने के लिए उसने अपनी नज़रे नीचे कर ली ताकि उससे मोहनलाल की नज़रों का सामना न करना पड़े.

संध्या अब मोहनलाल की तरफ मुड़कर कहने लगी 'देखो जी रुचिका को कोई भी तकलीफ नहीं होनी चाहिए और हाँ इससे कुछ भी चाहिए तू आपको मुझसे कुछ भी पूछने की जरुरत नहीं है, बल्कि उसकी हर खवाहिश पूरी कर देना'

मोहनलाल 'तुम उससे इतना प्यार दिखाओगी तू ये बिगड़ जाएगी'

संध्या 'अगर आप मुझसे प्यार करते हैं तू उसकी हर बात मानोगे और उससे कोई भी तकलीफ न हो'

मोहनलाल ने अपनी दांयी बाजु उसकी गर्दन के पीछे से उसके कंधे पर ले जाकर उससे अपने आगोश में करते हुए कहा 'तुम जानती हो मैं तुम्हारी बात को मन नहीं करता लेकिन इसकी हर बात मानोगी तू इसके बिगड़ने के चान्सेस हैं' रुचिका ने ये बात सुनी तू उसने मोहनलाल के हाथ पर चिकोटी काट ली. मोहनलाल के मुंह से 'आह' निकली तू संध्या ने उसकी तरफ देखा तू मोहनलाल ने अपने चेहरे के भावों को छुपाते हुए कहा 'काश तुम इस तरह मेरे साथ घूमने जाया करती'

संध्या के कुछ कहने से पहले hi रुचिका ने एक चिकोटी और काट ली. मोहनलाल अपने ऊपर नियंत्रण रखते हुए रुचिका की तरफ गुस्से से देखता है तू वो उससे अपनी जीभ निकलकर चिढ़ाती है. इधर संध्या अपने सर को मोहनलाल के कंधे पर रख देती है और कहती है 'आप ये समझ लेना की अगर आप रुचिका की कोई बात मान रहे हो तू वो आप मेरी बात मान रहे हैं न की रुचिका की'

मोहनलाल उससे अपने पास करते हुए कहता है की 'अब तुम आराम कर लो, सफर लम्बा है और तुम्हे आदत भी नहीं है तू थक जाओगी' संध्या उसकी बात मानकर अपनी आँखें बंद कर लेती है. थोड़ी देर गुजरी होगी की मोहनलाल ने अपने हाथ को धीरे से रुचिका की तरफ बढ़ा कर उसके कंधे पर रखना चाहा तू रुचिका ने अपने आप को थोड़ा दूर कर लिया जिससे मोहनलाल का हाथ उस तक न पंहुच पाए.

मोहनलाल ने उससे आँखों के इशारे से पास आने के लिए कहा तू रुचिका ने गर्दन हिला कर मन कर दिया. मोहनलाल अब उससे रिक्वेस्ट करता रहा और रुचिका कब तक दूर रहती क्योँकि उसका मन भी तू मोहनलाल की बांहों में जाने का कर रहा था, लेकिन वो जगह ऐसी थी की उसकी माँ को पता चल गया तू उसका क्या होगा, इस दर से नज़दीक नहीं आ रही थी. फिर पता नहीं उसने क्या सोचा की वो नजदीक आ गयी तू मोहनलाल ने अपने हाथ को उसके कंधे पर रख कर उसकी गर्दन और कंधे के बीच की जगह को सहलाने लगा जिससे रुचिका को भी अच्छा लगने लगा.

मोहनलाल ने अब अपने हाथ को उसकी गर्दन से गाल पर ले गया और सहलाते हुए बीच बीच में मसल भी रहा था तू रुचिका के मुंह से सिसकारियां निकलने लगी, लेकिन रुचिका ने चुन्नी को अपने मुंह में लेते हुए इन सिसकारियों को दबा दिया ताकि उसके मुंह से निकलने वाली आवाज़े संध्या न सुन ले. मोहनलाल अपने हाथ को गाल को सहलाते हुए पिछले हिस्से में लेजाकर कान के नीचे के हिस्से को सहलाने लगा तू रुचिका से बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था और उसने मोहनलाल का हाथ पकड़ का उससे अपने से दूर कर दिया और खुद लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी.

मोहनलाल इंतज़ार कर रहा था की कब उसकी साँसें सम्भले और वो उससे अपने नज़दीक बुलाये. जब उसने रुचिका को अपने नज़दीक फिर से आने के लिए कहा तू वो मन करने लगी. तभी मोहनलाल की नज़र उसके बूब्स पर पड़ी जो दुपट्टे के हटने की वजह से काफी हद तक नग्न हो गयी थी. मोहनलाल उन्हें निहारते हुए रुचिका को नज़दीक आने के लिए मनाता रहा और इस बार वो जैसे hi पास आयी तू मोहनलाल ने सीधा उसके बूब्स को पकड़ कर मसल दिया जिसकी वजह से रुचिका के मुंह से जोर की आवाज़ निकली जिससे संध्या की भी कच्ची नींद खुल सी गयी और पूछने लगी 'क्या हुआ'
 
व्हाट ा डिटेल्ड एनालिसिस?

वोउल्ड से एनालिसिस नॉट ा रिव्यु.

यू हैवे डिटेल्ड एवरीथिंग विथ पॉसिबल फ्यूचर डिरेक्शंस, व्हिच मैक्स में स्कार्र्य तहत माय उपदटेस अरे बिकमिंग प्रेडिक्टेबल.

हैप्पी तो सी योर इन डेप्थ इन्वॉल्वमेंट.

वेल लेंथ वाइज अपडेट वास् लेंग्थी अस पैर थे नंबर ऑफ़ वर्ड्स, होवेवेर ी कैन अंडरस्टैंड तहत 'दिल मांगे मोरे' एंड वोउल्ड लिखे तो अपडेट सून.

थैंक्स सो मच फॉर सुच ा नीस एनालिसिस
 
अपडेट 74

मोहनलाल इंतज़ार कर रहा था की कब उसकी साँसें सम्भले और वो उससे अपने नज़दीक बुलाये. जब उसने रुचिका को अपने नज़दीक फिर से आने के लिए कहा तू वो मन करने लगी. तभी मोहनलाल की नज़र उसके बूब्स पर पड़ी जो दुपट्टे के हटने की वजह से काफी हद तक नग्न हो गयी थी. मोहनलाल उन्हें निहारते हुए रुचिका को नज़दीक आने के लिए मनाता रहा और इस बार वो जैसे hi पास आयी तू मोहनलाल ने सीधा उसके बूब्स को पकड़ कर मसल दिया जिसकी वजह से रुचिका के मुंह से जोर की आवाज़ निकली जिससे संध्या की भी कच्ची नींद खुल सी गयी और पूछने लगी 'क्या हुआ'

रुचिका एक बार तू दर गयी की क्या जवाब दे, लेकिन मोहनलाल ने भी पूछी 'क्या हुआ'. रुचिका को एक बार तू मोहनलाल पर गुस्सा आया लेकिन फिर उसने बड़ी हिम्मत दिखते हुए 'कुछ नहीं हुआ'

संध्या ने अपने आप को मोहनलाल से छुड़वाया और रुचिका की तरफ होकर उससे धीरे से पूछा की क्या हुआ तू उसने संध्या के कान में बहुत धीरे से कहा 'शायद कोई चींटी या कीड़ा घुस गया है और ऐसा लगा था जैसे उसने काट लिया हो'

संध्या 'ऐसा कर चुपके से चेक कर ले मैं ोोुत में हो जाती हूँ'

रुचिका ने मोहनलाल की तरफ इशारा किया तू संध्या ने उससे खिड़की की तरफ घूमकर चेक करने के लिए कहा. वो खिड़की की तरफ घूमकर अपनी ब्रा के अंदर हाथ डालकर अपने बूब्स को चेक करने लगी तू उससे वंहा पर हाथ लगाने से थोड़ा सा दर्द हो रहा था. ऐसा लग रहा था की मोहनलाल ने बहुत hi जयादा जोर से मसल दिया था. रुचिका थोड़ी देर सहलाती रही और फिर उसने अपने हाथ को बहार निकल कर संध्या की तरफ घूमी और उसके कान में बताया की 'लगता है शायद वो कीड़ा निकल गया या कहीं छुप गया है'

रुचिका जब संध्या के कान में बात कर रही थी वो मोहनलाल को देख रही थी और आँखों से शिकायत कर रही थी, जिसपर मोहनलाल मंद मंद मुस्कुरा रहा था. संध्या ने भी उसके कान में कहा 'आगे कहीं गाड़ी रुकवाते हैं और वाशरूम में जाकर ाचे से चेक कर लेना'

संध्या मोहनलाल की तरफ घूमकर उससे कहने लगी 'कोई अच्छा सा रेस्टोरेंट देखकर गाड़ी रुकवा दो, हमें फ्रेश होना है'

मोहनलाल ने ड्राइवर को बोलकर एक अच्छे से रेस्टोरेंट पर गाड़ी रुकवाई, उससे भी चाय पीने के लिए बोलकर रेस्टोरेंट में आ गए और वाशरूम से फारिग होकर एक टेबल पर बैठ गए. संध्या ने रुचिका की पसंद का आर्डर किया और नाश्ता करने लगे.

टेबल पर मोहनलाल के एक साइड में संध्या और दूसरी साइड में रुचिका बैठी थी. टेबल के नीचे से मोहनलाल ने हाथ बढ़ा कर रुचिका की टांग पर रख दिया तू बेचारी रुचिका सिहर उठी. उससे दर लग रहा था की संध्या को पता चल जायेगा, उसने अपनी माँ से नज़रे बचाकर एक बार आँखों से मोहनलाल से हाथ हटाने के लिए इशारा किया, लेकिन इसने ऐसे दिखाया जैसे की ये बहुत hi सामान्य बात है. मोहनलाल ने उन दोनों से कहा 'चलो नाश्ता करो' और उसने एक टोस्ट उठाकर संध्या के मुंह की तरफ लेजाकर उससे खिलने लगा और नीचे से दूसरे हाथ से रुचिका की टांग को अपने हाथ से सहलाने लगा. रुचिका को दर तू लग रहा था लेकिन मोहनलाल ने उसकी टांग पर पहली बार हाथ रखा था तू उसके दिल की धड़कन बढ़ गयी थी, उसकी धमनियों में रक्त परवाह तेज हो गया था. उससे दर के साथ साथ अच्छा भी लग रहा था. उसका एक मन कर रहा था की मोहनलाल वंहा से हाथ हटा ले, लेकिन उसका मन ये भी सोच रहा था की आगे क्या?

संध्या ने टोस्ट कहते हुए अपने मुंह से टोस्ट को निकलकर कहा 'आप भी तू लीजिये न' तू मोहनलाल ने उससे कहा 'पहले अपनी बीवी को तू खिला दूँ, फिर मैं कहांऊंगा'

मोहनलाल ने वही टोस्ट अब रुचिका के मुंह के पास ले जाकर उससे खाने के लिए दिया तू वो अपने में खोयी हुई थी, मोहनलाल ने उसकी टांग पर हाथ फेरते हुए खाने के लिए कहा. रुचिका ने टोस्ट को देखकर कहा 'ये तो माँ का है'

मोहनलाल कुछ बोलता उससे पहले hi संध्या बोल पड़ी 'जो तुम्हारी माँ का है, वो तुम्हारा है, इसमें सोचना क्या है, चल जल्दी से खा ले'

रुचिका को अपनी माँ की बात सुनकर हंसी आ गयी और मंद मंद मुस्कुराते हुए 'थैंक्स माँ' कहा और एक बाईट ले ली. फिर रुचिका ने वो टोस्ट वापिस अपनी माँ की तरफ किया तू संध्या बोली 'नहीं तुम खाओ, तुमने खाया, मतलब मैंने खाया'. रुचिका ने फिर से थैंक्स बोलै तू संध्या गुस्सा हो गयी और कहने लगी 'ये थैंक्स क्या होता है, मेरी किसी भी चीज़ को लेने के लिए न तू तुम्हे पूछने की जरुरत है और न hi थैंक्स की, समझी'

रुचिका बेचारी क्या बोलती वो तू बस 'जी' बोलकर hi रह गयी. मोहनलाल उन दोनों की बातों के मजे लेते हुए रुचिका की टांग को बहुत हलके हलके से सेहला रहा था जिससे रुचिका को नशा छाने लगा था लेकिन उसे दर भी लग रहा था की कहीं उसकी माँ को पता न लग जाये. नाश्ता ख़तम करने के बाद वो गाड़ी में पहले की तरह बैठ गए और चल दिए.

अभी थोड़ी दूर चले hi थे की संध्या का दिल घबराने लगा तू मोहनलाल ने उससे पानी दिया और उसकी पीठ सहलाने लगा, लेकिन उससे कोई जयादा फरक नहीं पड़ा तू गाड़ी को रुकवा दिया. सब लोग गाड़ी के बहार आ गए. संध्या का जी मिचलाना थोड़ा सा काम हुआ तू उसने चलने के लिए कहा. जब मोहनलाल ने उससे बैठने के लिए कहा तू उसने कहा की वो विंडो सीट पर बैठेगी.

अब मोहनलाल रुचिका और संध्या के बीच में बैठ गया. मोहनलाल को ऐसा लग रहा था की जैसे वो राजा है जिसकी दो रानियां उसके अगल बगल बैठी हैं. मोहनलाल जानभूझकर संध्या (जो उसके बांयी तरफ बैठी थी) की तरफ होकर उसकी पीठ सहलाते हुए उससे दिलासा दे रहा था की 'सब ठीक होगा'

संध्या 'मुझे अजीब सी बेचैनी हो रही है'

मोहनलाल 'ऐसे सफर में हो जाता है, मुझे लग रहा है की तुम्हे टैक्सी की खिड़कियां बंद होने की वजह से शायद घुटन सी हो रही है'

संध्या 'हाँ कुछ ऐसा hi लग रहा है'

मोहनलाल ने ड्राइवर को बोलकर एक बंद करवा दिय और विंडोज का शीशा नीचे कर दिया जिससे संध्या को आराम मिलाने लगा और उसने मोहनलाल से कहा भी 'खुली हवा का जो मजा है वो बंद जगह की हवा में कहाँ है, आपको बुरा तू नहीं लगा न की बहार की हवा को अंदर आने दिया'

मोहनलाल 'मुझे क्योँ बुरा लगेगा. हर इंसान को एक जैसे अच्छा लगा, ये तू हो hi नहीं सकता. मैं तू हमेशा से यही कहता हूँ की जैसे मन करे एन्जॉय करो'

संध्या 'कोई एन्जॉय कैसे कर सकता है जब उस पर जिम्मेवारियां हो'

मोहनलाल 'जिम्मेवारियों का मतलब ये नहीं होता की उन्हें अपने ऊपर इतना ूढ़ लो की जिंदगी का आनंद hi न ले पाओ. इन् दोनों में तालमेल बिठाते हुए एन्जॉय करो'

संध्या कुछ सोचने लगी और फिर उसने कहा 'शायद आप ठीक कह रहे हो'

मोहनलाल ने थोड़ी देर बाद 'aa..a.hh' कहा तू संध्या ने पूछा क्या हुआ तू वो बोलै 'मैं पूछ रहा था की अब कैसा लग रहा है'

संध्या 'बहार की खुली हवा खाने से थोड़ा ठीक लग रहा है'

असल में जब मोहनलाल संध्या से बात कर रहा था तू वो थोड़ा सा बांयी तरफ घूम गया था जिससे उसकी लम्बी चौड़ी बॉडी माँ और बेटी के बीच में एक दिवार का काम कर रही थी और दोनों hi एक दूसरे को बिलकुल hi नहीं देख पा रहे थे. रुचिका को काफी देर से उन दोनों की बातें सुन रही थी, उसके दिमाग़ में पता नहीं क्या आया और उसने अपनी एक ऊँगली मोहनलाल की पीठ पर राखी. थोड़ी देर बाद वो अपनी उंगली को मोहनलाल की पीठ पर फेरने लगी जिससे मोहनलाल को थोड़ी गुदगुदी लगने लगी, लेकिन उसने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया. रुचिका ने अब अपनी उंगली को थोड़ा तेज फिरते हुए बिच बिच में उसकी पीठ पर उंगली से दबाने लगी. जब मोहनलाल ने कोई रिस्पांस नहीं दिया तू उसने मोहनलाल की पीठ पर चिकोटी काट ली, जिसकी वजह से मोहनलाल के मुंह से निकला ' 'aa..a.hh' तू रुचिका के चेहरे पर मुस्कान आ गयी की जैसे उससे मोहनलाल को तंग करने में सफलता मिली हो. रुचिका ने जब देखा की उसकी शरारत रंग ला रही है तू उसने दो तीन बार फिर से चिकोटी काटी, लेकिन मोहनलाल इस बार पहले से hi तैयार था तू अपने मनोभावों को छुपा गया और संध्या से कहने लगा 'कई बार अंदर की हवा का रुख अपने हिसाब से करके भी घबराहट और चिंता को ख़तम किया जा सकता'

संध्या फिर सोच में पद गयी की इस बात का मतलब क्या है और फिर उसने कहा 'हो सकता है आप ठीक कह रहे हो'

उधर रुचिका मोहनलाल को चढ़ने में लगी हुई थी और बिच बिच में ऊँगली फिरते हुए चिकोटी भी काट लेती थी. एक बार रुचिका ने मोहनलाल की पीठ पर उंगली ऐसे फिरयै की ऐसा परतीत होता था की उसने लिखा हो

ी लव यू

मोहनलाल को जैसे hi समझ आया तू वो बहुत खुश हुआ और इस तरह हंसी मजाक करते हुए वो सब दिल्ली पंहुच गए और एडमिशन वाली जगह पर पंहुच कर सब परिक्रियानों को पूरा करने के बाद हॉस्टल में गए तू वंहा पर अंदर सिर्फ संध्या को साथ जाने दिया गया. मोहनलाल बहार वेट करता रहा था और कुछ देर के बाद संध्या और रुचिका आयी.

संध्या 'कहीं चल कर कुछ खा लेते हैं और रुचिका को कुछ ले भी देते हैं'

रुचिका 'मुझे कुछ नहीं चाहिए'

संध्या 'मैं पहली बार तुम्हारे साथ आयी हूँ तू कुछ तू लेना hi पड़ेगा'

रुचिका 'अब आप इतना प्यार दिखाओगी तू मैं कैसे मन कर सकती हूँ'

फिर तीनों एक अच्छे से मॉल में आ गए और वंहा पर उन्हें ऊपर एक फ़ूड कोर्ट में लिफ्ट से जाना था. संध्या तू वंहा की चकाचोंध देख कर hi चकित रह गयी. वो कहने लगी 'मुझे लगता है की जिंदगी पीछे रह गयी और दुनिया आगे निकल गयी'

रुचिका 'आप जो बीत गया है उससे सोचने की बजाये अब आप एन्जॉय करना शुरू कर दो'

संध्या 'चलो कोशिश करुँगी'

तभी लिफ्ट आ गयी और वो लोगों से पहले से hi भरी हुई थी तू उन्होंने उस लिफ्ट को छोड़ दिया और अगली लिफ्ट की वेट कर रहे थे. दूसरी लिफ्ट भी भरी हुई थी, लेकिन उन्होंने चढ़ने की कोशिश की. सबसे पहले संध्या चढ़ी और लिफ्ट ओवरलोड हो गयी तू मोहनलाल ने संध्या से कहा 'सिक्स्थ फ्लोर'.

लिफ्ट के जाने के बाद मोहनलाल रुचिका से रूबरू होते हुए 'गाड़ी में बहुत मस्ती छायी हुई थी'

रुचिका ने मासूम फेस बनाया और कहने लगी 'मैं तू आपके प्यार का जवाब दे रही थी'

मोहनलाल 'चिकोटी काटने को प्यार कहती हो'

रुचिका मासूमियत से 'वो तू आपको बता रही थी की मुंहे आप जितना नहीं, बल्कि थोड़ा बहुत प्यार करना मुझे भी आता है और वही मैं आपको प्यार करने की कोशिश कर रही थी'

मोहनलाल 'वैरी स्मार्ट'

रुचिका 'क्योँ आपको स्मार्ट वाइफ नहीं चाहिए थी, अगर ऐसा है तू मैं अब बिलकुल नहीं करुँगी' उसने नाराज होते हुए कहा.

मोहनलाल ने उसका हाथ पकड़ा और एक सुनसान से कोने में ले गया और उससे अपने आगोश में लेकर उसकी पीठ को सहलाते हुए उसके गलों को चूमने लगा और कहने लगा 'जान तुम मेरे दिल की धड़कन हो और मुझे बहुत hi स्मार्ट बीवी चाहिए जैसी की तुम हो' इतने कहकर उसने अपने हाथों को उसकी पीठ से उसके नितम्बों पर ले गया और उन्हें सहलाते हुए मसलना शुरू hi किया था की रुचिका ने बोलै 'जयादा रोमांटिक हो जाओगे तू माँ नीचे आ जाएँगी और सब रोमांस धरा रह जायेगा'

मोहनलाल ने अपने हाथों को उसके नितम्बों से उसके उरोजों पर लेकर उन्हें भी प्यार करते हुए उसके होठों पर एक हल्का सा चुम्बन लिया और कहने लगा 'तुम शायद सही कह रही हो, चलो चलते हैं' और दोनों वंहा से चलने लगे तू रुचिका ने मोहनलाल को रोक लिया और उसके होठों पर लगी लिपस्टिक को साफ़ करते हुए कहा 'निशानी छोड़ेंगे तू पकडे जायेंगे' मोहनलाल उसकी बात सुनकर हंसने लगा और कहने लगा 'चिंता न करो, मैं जाकर वापिस आऊंगा और फिर निशानिया hi निशानिया छोडूंगा, फिर कहना'

रुचिका उसकी बात सुनकर शर्मा गयी और फिर वो लिफ्ट से ऊपर पंहुच गए और संध्या के साथ फ़ूड कोर्ट में आ गया और वंहा खाना खाकर रुचिका के लिए गिफ्ट लेने चले गए. तभी मोहनलाल का फ़ोन आ गया और वो संध्या को अपना कार्ड देकर बोलै की जो डलवाना है, वो दिलवा दो, मैं तब तक फ्री हो जाऊंगा'

संध्या मोहनलाल से गुस्सा होने लगी की 'जब देखो काम, काम और काम, कभी हमारी तरफ भी ध्यान दिया करो'

मोहनलाल उससे समजहा बुझाकर वंहा से चला गया और थोड़ी देर बाद रुचिका को फ़ोन करके पूछा तू पता लगा की वो फ्री हो गयी है. मोहनलाल और संध्या ने फिर रुचिका को हॉस्टल छोड़ना और संध्या उस वक़्त बहुत hi भावुक थी. मोहनलाल फिर संध्या को घर छोड़कर अगले दिन वंहा से निकला और रुचिका को फ़ोन करके बताया की वो आ रहा है, लेकिन रुचिका ने कुछ कहा जिससे मोहनलाल दुविधा में आ गया.
 
पहले तू लगता है ऑटोकरेलशन मोड में नाम गलत टाइप जो गया है. अमिता की जगह नमिता.

आपकी शिकायत मैं दिल से स्वीकार करती हूँ, लेकिन किसी भी अच्छी कहानी को लिखने में वक़्त लगता है.

जल्दी बजी में उस कहानी का आनंद नहीं आएगा.

मैं आपके मनोभावों को ससमझ रही हूँ की दिल मांगे मोरे, लेकिन थोड़ा सा धैरयेरखिये.

आप को यह भी बताना चाहूंगी की मैं किसी को इंतज़ार करनी विश्वास नहीं रखती

धन्यवाद
 
अपडेट 75

मोहनलाल को एक बार फिर से उसकी यादों में छोड़कर हम चलते हैं आदित्य और संध्या के पास.

अब कहानी वर्तमान में

संध्या को उसकी बात सुनकर कुछ तस्सली तू हुई लेकिन फिर भी उससे अपने ऊपर विश्वास नहीं तह की वो ये बात उससे बता पायेगी और क्या भरोसा है की ये मुझसे गुस्सा नहीं करेगा या मुझे छोड़ कर नहीं जायेगा. लेकिन अब ये भी सच था की वो बिना जाने रहेगा नहीं. संध्या ने बड़ी हिम्मत करते हुए एक बार आदित्य के चेहरे को निहारा लेकिन फिर अपनी पलके झुकाते हुए कहने लगी 'वो.... न... वो न.... '

आदित्य 'क्या'

संध्या 'वो.... न... वो न.... '

आदित्य 'ये क्या है वो न वो न, बताना है तू बताओ'

संध्या 'वो न .. मुझे... न .. तुम. से .. pa....a ..yaa...r. हो गया है' इतना कहकर वो आदित्य के गले लग गयी.

आदित्य तू अपनी माँ की बात सुनकर एक डैम से शॉकेड हो गया की ये क्या हुआ, वो सोचने लगा 'उसकी माँ ने ये क्या कह दिया की उनको मुझसे प्यार हो गया. माँ तू अपने बेटे से प्यार करती है, लेकिन ये कौनसे प्यार की बात कर रही हैं' उसकी माँ के गले लग जाने से उसकी चूचियों ने उसके सीने में हलचल मचा दी और उसका हाथ अपने आप hi उसकी माँ की पीठ पर पंहुच कर उससे सहलाने लगा. जैसे जैसे वो अपनी माँ की पीठ सेहला रहा था तू उसका मन कर रहा था की और जोर से सहलाये क्योँकि एक तू उसकी नरम नरम चूचियों का सीने पर दबना और उसकी माँ का प्यार करने की बात ने उसके दिल के तारों को छेड़ दिया

आदित्य प्रत्यक्ष में 'माँ आप क्या कह रही हो, मैं समझा नहीं'

संध्या ने उसको और जयादा जोर से गले लगते हुए 'मुझे तुमसे प्यार हो गया है' इस तरह करने से आदित्य का रक्त परवाह तेज होने लगा और उत्तेजना में उसकी आवाज लड़खड़ाने जैसी हो रही थी

आदित्य ने अपने आप को सँभालते हुए 'मतलब आपको अपने बेटे से पहले प्यार नहीं था?'

संध्या भी ये बात करते हुए और अपने बेटे के गले लगने से उत्तेजित हो रही थी और उस की भी आवाज़ लड़खड़ा रही थी 'मुझे tu..m..se पहले भी py..aar था जैसे एक माँ को अपने बेटे से होता है, लेकिन मुझे वो वाला py..aar हो ga...ya है जैसे एक la...dki और lad...ke में होता है'

आदित्य का मन तू नहीं था फिर भी दिखने के लिए अपनी माँ से थोड़ा अलग होते हुए 'ये आप क्या कह रही हैं'

संध्या ने शरमाते हुए अपनी पलकों को झुकाया हुआ था और इसी मुद्रा में लड़खड़ती जुबां से 'Ha...an mu..jhe तुम से py...aar हो gay....aa है'

आदित्य 'ये फीलिंग आपको कब से हुई'

संध्या 'ये fee...ling तू मुझे ba...hut पहले हो गयी थी'

आदित्य 'कब से'

संध्या ने एक ठंढी सांस ली और अपने आप को संयत करते हुए 'तुम्हे शायद याद होगा की मैं बीमार हो गयी थी और घर पर तुम्हारे आलावा कोई नहीं था'

आदित्य 'क्योँ दी नहीं थी क्या'

संध्या 'वो टूर पर गयी हुई थी, मैंने तुम्हे कॉल करके जैसे hi बताया तू तुम जल्दी से घर आये और मुझे डॉक्टर के पास ले गए और दवाई दिलवाई'

आदित्य 'क्या माँ, ये तू नार्मल सी बात है क्योंकि एक बीटा अपनी बीमार माँ को डॉक्टर के पास लेकर तू जायेगा hi, इसमें नया क्या है'

संध्या 'डॉक्टर से दवाई लेन से लेकर उसके बाद तुम चार दिन तक जब तक मैं ठीक नहीं हुई घर से बहार नहीं गए और दिन रात मेरी सेवा कैट रहे'

आदित्य 'वो तू मेरा फ़र्ज़ था, उसमे कौन सी नै बात हो गयी'

संध्या 'तुम पूरी रात जागते रहे, मेरे सर पर ठन्डे पानी की पट्टी बदलते रहे, फिर तुमने मेरे शरीर में जंहा भी दर्द हो रहा होता था, मालिश करते रहे. तुमने चार दिन तक घर से बहार कदम भी नहीं रखा. तुम्हारे पता नहीं कितने फ़ोन आये लेकिन तुमने सबको मन कर दिया. पुरे घर का काम खुद hi करते रहे. वक़्त पर खाना, फल, दवाई और मेरी सेवा, इसके आलावा तुमने कुछ नहीं किया. तुमने मेरे मन में एक अलग hi जगह बना ली'

आदित्य 'मैं तू इससे सब नार्मल समझता हूँ'

संध्या 'ये कोई नार्मल बात है की तुमने उन् चार दिनों में अपना एक पेपर मेरी वजह से छोड़ दिया और तुम्हारा इतना बड़ा क्रिकेट मैच था, तुम उसमे भी नहीं गए. ये सब मामूली बात नहीं है. बीटा तू कोई न कोई बहाना बनाकर न तू पेपर छोड़ता और न hi मैच. तुमने तू मेरे कहने के बावजूद भी नहीं गए. जो तुमने किया वो एक साधारण बात नहीं थी. ये सब कुछ मेरे दिल में अंदर तक बैठ गया. मुझे तुम्हारी सेवाभाव से बहन हुआ की मुझे तुम्हारे जैसे एक सच्चे दोस्त की जरुरत है जिससे मैं अपने दिल की बात कर सकू'

आदित्य 'आप जो भी बता रही हैं, वो मेरी नज़रों में सब साधारण बात है'

संध्या की आँखों में नमी आ गयी थी और वो कहने लगी 'ये सब तुम्हारे लिए साधारण हो सकती हैं, लेकिन मेरे लिए नहीं. उस बात ने मेरे दिल में एक अलग hi स्थान ले लिया, लेकिन मैं समझ नहीं पा रही थी की ये क्या है. वक़्त के साथ साथ तुम्हारी केयर करने की भावना ने मेरी सोच को एक अलग दिशा दे दी और मुझे लगने लगा की मैं तुम से प्यार करने लगी हूँ. मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई तुम्हे कुछ कहने की क्योँकि मैं खुद अपने आप में ुल्हि हुई थी. बहुत बार सोचा की तुमसे बात करू, लेकिन नहीं कर पायी. हर बार घर बार मेरी भावनाओं के बिच आ जाते थे. तुमने शायद नोट किया हो या न किया, उस वाकये के बाद मैं तुम्हे दिन में काम से काम एक बार फ़ोन करके तुम्हारे बारे में पूछती थी. तुम जब देर से आते तू मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था. मैं तुम्हारा इंतज़ार करती, तुम्हारे लिए अच्छी अच्छी डिशेस बनती. मुझे काफी वक़्त लगा समझने में की मुझे तुम से प्यार हो गया है. जैसे hi ये भावना मेरे मन में पनपी, एक बार तू मैं दर गयी की ये कैसे मुमकिन है और मैं अपने आप से लड़ने लगी और क्या सही है क्या गलत कुछ भी समझ नहीं आता था'

आदित्य 'अब आपने कैसे हिम्मत कर ली ये बात स्वीकार करने में'

संध्या 'ये हिम्मत भी तुम्हारी वजह से आयी है'

आदित्य 'मेरी वजह से कैसे'

संध्या 'तुम्हे याद होगा की जब हम किले में गए थे और वंहा पर चूबतरे पर बैठे थे तू तुमने कहा था की तुम मेरे दोस्त बनकर रहोगे और मुझे घुमाओगे. मेरी हर तरह से मदद करोगे. पहले तू मैं डर्टी थी, लेकिन अब अकेलेपन की वजह से और तुम्हारे साथ की वजह से मुझमे तुम्हे ये सब बताने की हिम्मत आ गयी है'

आदित्य 'आप अकेली कान्हा हैं'

संध्या की आँखों में नमी तू पहले hi थी लेकिन अब वो सुबकने लगी और सुबकते हुए कहने लगी 'अकेली, मैं तू शुरू से hi अकेली हूँ. जब से तुम्हारा जनम हुआ है तुम्हारे पापा तू बस साल में एक दो बार hi घर आते हैं और वो भी आने के बाद अपने कामों में उलझे रहते हैं. कभी कभी तू ऐसा होता है की रात को आये और अगले दिन सुबह सुबह जल्दी चले गए तू मैं अपने दिल का हाल किसको बताऊँ'

आदित्य 'क्या पापा आपसे प्यार नहीं करते'

संध्या 'अगर न करते होते तू मैं कबकी हिम्मत करके जो बात आज बताई है वो तुम्हे पहले hi बता देती'

आदित्य 'जब पापा आपसे प्यार करते हैं तू फिर समस्या क्या है. कहीं ऐसा तू नहीं की आप उनसे प्यार नहीं करती हो'

संध्या का सुबकना अब थोड़ा काम हो गया था और वो आदित्य की बात सुनकर सोच में पद गयी, लेकिन फिर उसने कहा 'तुम्हारे पापा बहुत अच्छे हैं, लेकिन उनकी अपनी मजबूरियां हैं, अगर वो काम नहीं करते तू हम भूखे मरते. एक बार जो उनको पैसा कमाने की धुन लगी तू वो घर को जयादा वक़्त नहीं दे पाए. घर को संभालने की जिम्मेवारी मेरे ऊपर आ गयी और घर सँभालते संभालते कब उम्र निकल गयी पता hi नहीं लगा. तुम लोग बड़े हो गए, तुम्हारे पापा अपने काम में कुछ जयादा hi व्यस्त हो गए और मैं इस सब में अकेली रह गयी. जंहा तक बात है की मैं तुम्हारे पापा से प्यार करती हूँ की नहीं तू इसके जवाब में बस इतना hi कहूंगी की उनसे बहुत प्यार करती हूँ, बल्कि उनकी इज़्ज़त करती हूँ'

आदित्य 'जब आप उनसे प्यार करती हैं तू फिर आप मुझसे प्यार कैसे कर सकती हैं'

संध्या 'ये मैं भी नहीं समझ पा रही हूँ. मैं उनसे प्यार करती हूँ, लेकिन तुमसे भी प्यार करती हूँ'

आदित्य 'जंहा तक मुझे समझ आ रहा है, आप पापा से प्यार करती हैं और क्योँकि आप अपने आप को अकेली महसूस करने लगी हैं, इसलिए अब आप एक ऐसा साथी छथि हैं जिससे आप दिल की बात कर सके और इस बात के लिए मैं आपके सामने हूँ तू आप मुझे बॉयफ्रेंड बनाना छह रही हैं और अब आप कहती हैं की

आप मुझसे प्यार करती हैं'

संध्या 'मैं तुमसे सच में प्यार करने लगी हूँ'

आदित्य 'देखो या तू आप पापा से प्यार नहीं करती हो, या फिर मुझसे नहीं करती हो'

संध्या 'मैं तुम्हारे पापा से और तुम से भी प्यार करती हूँ'

आदित्य 'ऐसा कैसे संभव है'

संध्या 'क्या एक व्यक्ति एक से जयादा लोगो से प्यार नहीं कर सकता'

आदित्य 'कर सकता है, लेकिन ऐसे प्यार में उस व्यक्ति को दुःख जयादा मिलेंगे और सुख काम'

संध्या 'लेकिन मैं क्या करून, मुझे तू अब प्यार हो गया है'

आदित्य 'देखो आप बेशक मेरी माँ हैं, मैं अब आप से एक दोस्त की हैसियत से कह रहा हूँ की आप सिर्फ और सिर्फ पापा से प्यार करो और जंहा तक मेरा सवाल है तू आपको चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है. मैं आपकी पूरी केयर करूँगा, बल्कि पहले से भी जयादा करूँगा और आपको कभी अकेला नहीं छोडूंगा'

संध्या 'मुझे सब समझ आ रही है की तुम मुझसे किसी भी तरीके से पीछा छुड़ाना चाहते हो ताकि तुम्हे मुझे न तू गर्लफ्रेंड बनाना पड़े और प्यार तू बहुत दूर की बात है' इतना कहकर वो उठकर सुबकते हुए जाने लगी.

जैसे hi वो उठकर जाने लगी तू आदित्य भी अपनी जगह से खड़ा हुआ और अपनी माँ को पीछे से उसके कन्धों को पकड़ा तू संध्या के मुंह से निकला 'aa...uu..cc...hh' असल में आदित्य का एक हाथ उसके कंधे पर जले हुए हिस्से पर लग गया था और जैसे hi याद आया तू अपने हाथ को हटात्ते हुए 'सॉरी सॉरी', लेकिन उसने दूसरे कंधे को नहीं छोड़ा.

संध्या 'छोडो मुझे और तुम मेरी तरफ से किसी बंधन में नहीं हो, तुम्हारे जो मन में आये करो, मेरी जिंदगी में जो होगा वो मैं अकेले भुगत लुंगी' और वो सुबकने लगी.

आदित्य ने उसके कंधे पर दबाव डालकर अपनी ओर घूमते हुए उसकी आँखों से नमी को अपनी उँगलियों से पोंछने लगा तू संध्या ने कहा 'छोडो मुझे और ये सब करने की जरुरत नहीं है, मैं अपना ख्याल खुद hi रख सकती हूँ'

आदित्य ने उसको न तू छोड़ा और न hi उसकी आँखों की नमी को पोंछना बंद किया. वो अपना काम करते हुए कहने लगा 'आप ने ये कैसे सोच लिया की आप मुझसे अलग हो और आपने ये क्योँ सोचा की मैं आपको अकेले छोड़ दूंगा'

संध्या 'तुमने अभी तू कहा था की या तू मुझसे प्यार करो या तुम्हारे पापा से'

आदित्य ने उसको फिर से अपनी तरफ घूमने की कोशिश की लेकिन वो तस से मास नहीं हुई और आदित्य अभी जयादा जोर नहीं लगाना छटा था, इसलिए वो पीछे से अपनी माँ के ओर जयादा नजदीक हो गया, जिससे उसका सीना उसकी माँ की पीठ को स्पर्श करने लगा और वो अपने हाथ को कंधे से उसके चेहरे पर ले जाते हुए उसके गाल को पकड़ कर पीछे की तरफ घूमकर कहने लगा 'आप मेरी फ्रेंड हो और सच्चे दोस्त का काम होता सही सलाह देना और हो सकता है की सही सलाह देने में सलाह देने वाले दोस्त का नुक्सान भी हो सकता है लेकिन उससे अपने नुक्सान की परवाह किये बिना ये करए करना चाहिए. मैंने भी वही किया है. मैं आपसे दोस्ती निभाते हुए ये कह रहा हूँ. अगर मैं आपका दोस्त नहीं होता तू आपका फायदा उठकर आपको तड़पता हुआ छोड़ देता'

संध्या उसकी बात सुनकर एक डैम से घूम गयी और आदित्य के गले लग गयी 'नहीं मुझे दोस्ती चाहिए, मुझे अकेला नहीं छोडो नहीं तू मैं टूट जाउंगी'

आदित्य ने भी उससे अपने आगोश में लेते हुए अपना हाथ को उसकी पीठ पर लेजाकर सहलाते हुए कहने लगा 'आप मेरी दोस्त हैं और मैं आपसे वादा कर चूका हूँ की आपको अकेले नहीं छोडूंगा, इतना hi नहीं एक सच्चा दोस्त होने के नाते आपको कोई भी गलत सलाह नहीं दूंगा, चाहे आपको अच्छा लगे या बुरा'

संध्या 'अगर बुरा लगा और मैं नाराज़ हो गयी तू'

आदित्य उसकी पीठ पर अपने हाथ का दबाव बढाकर अपने से थोड़ा दबाते हुए 'अगर आप नाराज़ हो गयी तू या तू थोड़ी देर में आपको मेरी बात समझ आ जाएगी और आप अपनी नाराजगी छोड़ डौगी, नहीं तू मैं आपको मन लूंगा'

संध्या 'अगर मैं नहीं मणि तू'

आदित्य मुस्कुरा दिया और कहने लगा 'आप मेरी गर्लफ्रेंड हो और अब मुझसे प्यार भी करती हो तू फिर कैसे नहीं मानोगी. हाँ अगर प्यार नहीं करती तू बात दूसरी है'

संध्या 'लेकिन तुम तू मुझसे प्यार तू दूर, अभी पूरी तरह से गर्लफ्रेंड भी नहीं मानते'

आदित्य उसकी पकडे पकडे अपने बीएड के पास लेजाकर बीएड पर बैठा दिया और खुद भी उससे बिलकुल सत्कार बैठ गया और उसके एक कंधे पर अपने हाथ को रखा और दूसरा हाथ अपने दूसरे हाथ में ले लिया, जिससे संध्या की चूचियां आदित्य की बाजु के साथ दबने लगी और आदित्य की धमनियों में रक्त परवाह बढ़ने लगा. उसका मन कर रहा था की वो थोड़ा इस को ओर जयादा दबाये लेकिन उसके दिमाग़ में जो प्रश्न चल रहे थे, उनका समाधान वो पहले चाहता था. आदित्य ने अपनी माँ की तरफ थोड़ा घूमकर उसके हाथ को पकडे पकडे अंगूठे से उसके हाथ की पिछली तरफ को सहलाते हुए 'आप एक बात बताओ की अगर मैं आपसे प्यार करूँ और साथ में किसी और से भी करूँ तू आपको कैसा लगेगा?'

संध्या 'मुझे मालूम था की तुम किसी ओर से प्यार करते हो, इसलिए तुम मुझसे पीछा छुड़ा रहे हो. वैसे भी तुम्हे तू बहुत साडी जवान लड़कियां मिल जाएगी तू मुझ बुढ़िया को क्योँ अपने साथ रखोगे'

आदित्य ने अपनी बाजु को जो उसके पीछे थी उससे अपने आगोश में लेने की कोशिश करने लगा तू संध्या गुस्सा होने लगी की 'मुझे छोडो और जाओ किसी जवान लड़की के पास, मैं रह लुंगी अकेले'

आदित्य ने उससे नहीं छोड़ा और धींगा मुष्टि में उसकी चूचियां आदित्य से दबाने लगी और भावनाओं का भड़काना शुरू हो चूका था. आदित्य ने उससे कहा 'पहली बात तू अब के बाद आप अपने मन से निकल दो की आप बुढ़िया हो, अगर आपको विश्वास नहीं हैं तू मैं आपको किसी भी अनजान जगह ले चलता हूँ और वंहा पर ये बिलकुल भी मत बताना की आप मेरी माँ हैं तू वंहा पर जो लोग होंगे वो हमें इक्कठे देखकर लवर्स hi समझेंगे न की माँ बीटा. रही दूसरी बात की मैं किसी दूसरी लड़की से प्यार करूँ तू आपको कैसा लगेगा. मैंने ये इसलिए आप को कहा है की आपको जब ये सोचकर hi बुरा लगने लगा की मैं आपके आलावा किसी ओर से भी प्यार करने लगा हूँ तू हकीकत में क्या होगा.

आप जरा सोचो की आप वास्तव में दो लोगों से एक साथ प्यार करने की बात कर रही हो तू उन दोनों को जब ये पता लगेगा तू उन्हें कैसा लगेगा. आप की तरह बुरा नहीं लगेगा और बुरा लगते hi वो क्या करेंगे. वो या तू आपके साथ लड़ेंगे या आप को छोड़ भी सकते हैं

मैंने आपका सच्चा दोस्त होने के नाते hi यह बात कही थी की आप सिर्फ और सिर्फ पापा से प्यार करो न की मुझसे, बाकि आपकी मर्जी'

संध्या ने उसकी बात सुनी और आदित्य के साथ जोर से गले लग गयी और उसके गलों पर अपने तपते हुए होठों को रखकर एक चुम्बन लिया और पूछने लगी 'मुझे अकेला तू नहीं छोड़ोगे'

आदित्य 'मैं तू आपको अकेला नहीं छोडूंगा, लेकिन आप क्या करोगी'

संध्या 'मैं समझी नहीं'

आदित्य ने अपने जिस हाथ से उसका हाथ पकड़ा हुआ था उस हाथ को धीरे धीरे हाथ से बाजु और कंधे की तरफ ले जाने लगा जिससे संध्या की भी भावनाएं भड़काने लगी. वो हाथ ऊपर होते हुए उसके गलों तक पंहुच गया और अपने हाथ से उसकी गर्दन और फिर गाल सहलाते हुए अपने अंगूठे से उसके होठों को मसलते हुए पूछने लगा 'एक बात बताओ जब पापा आ जायेंगे तब आपको अगर दोनों में से सिर्फ और सिर्फ एक को चुनना पड़े तू आप किसको चुनोगी'
 
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