अपडेट-31
(आह्हः.. यह आवाज थी उस लड़के की जो अभी थोड़ी देर पहले चक्कर खाकर बेहोश हुआ था.. तुषार उसकी तरफ बढ़ा लकिन आरुषि ने उसका हाथ पकड़ रोक लिया...)
आरुषि- (न में सर हिलती हुई) नहीं तुषार.. बस कर अब.. वो हमे कुछ नहीं कर सकता.. जाने दे अभी...
तुषार- नहीं दीदी इसने सब देखा है.. यह मुझे अंदर करवाएगा...
(इतना बोल तुषार ने जो निचे पड़ा अपना खंजर था उससे पेअर से hi सीधा किया और एक कास के किक उसपे मार्डी.. खंजर एक स्पीड के साथ उस जमीन पे पड़े लड़के की गर्दन में घुस गया और एक छोटी सी चीख के साथ उसकी सासें रुक गयी...)
(तुषार की इस हरकत ने कुछ देर के लिए तीनो की सासें एक बार वापिस रोक दी...)
|अब आगे|
(तन्नो लड़कियां तुषार को ghur-ghur कर देख रही थी.. अभी एक लड़का जो थोड़े दिन पहले 3 आदमियों से पिट कर हॉस्पिटल पहुँच गया था आज उसने 15, 16 को आटे की तरह मसल दिया.. यही सोच कर सभी हेरैं थी, हलाकि आरुषि जानती थी की तुषार लड़ने की ट्रेनिंग ले रहा है लकिन वो इतना ज्यादा और इतनी जल्दी परफेक्ट कैसे हो गया.. लकिन तुषार अपने में मुस्कुरा रहा था. पता नहीं क्या सोच कर...)
आरुषि- तुषार..!
तुषार- (आरुषि की तरफ देख) हाँ दीदी...
आरुषि- चले घर..? मुझे बहुत साडी बाते करनी है अभी तुमसे...
तुषार- ठीक है चलो दीदी.. आप इस कार से ायो मैं शिवं की कार लेकर आता हु...
(तन्नो लड़कियां अपनी कार में बेथ रही थी और तुषार अकेला शिवं की कार की और जा रहा था तोह हरलीन तुषार को आवाज लगा के बोली...)
हरलीन- तुषार..!!!
तुषार- (पीछे मुद देखता हुआ) जी..?
हरलीन- आप कहा जा रहे हो अकेले.. (मुस्कुराती हुई हर्षिका को देख, जो अभी कार का दूर पकड़ बैठने को हुई थी) ऐसा करो हर्षिका को साथ ले जाओ.. कंपनी मिलेगी.. कहा आप बोर होते हुए आओगे...
हर्षिका- (गुस्से से उससे देख) क्यों.. तू. तू चली जा न.. तेरे साथ कंपनी नहीं मिलेगी क्या...?
हरलीन- (मुस्कुराती हुई) ठीक है मैं चली जाती हु.. (तुषार को देख) क्यों तुषार..?
तुषार- हाँ ा जाओ...
(हरलीन तुषार के पास जाने लगती है तोह हर्षिका थोड़ी उदास हो जाती है.. वो हरलीन से मन hi मन गुस्सा हो रही थी की थोड़ा और फाॅर्स नहीं कर सकती थी जाने के लिए.. कही तुषार इससे न पत्ता ले. फिर उसका क्या होगा.. एक कार में दोनों ladka-ladki अकेले है. यह हरलीन तोह पहले hi चालू किसम की है कही तुषार के साथ कुछ assa-waisa न करले.. उससे बहुत फ़िक्र हो रही थी.. वो अपने प्यार को किसी दुरसी लड़की के साथ नहीं देखना चाहती थी. चाहे फिर वो उसकी फ्रेंड hi क्यों न हो.. उससे अभी खुद पर hi बहुत गुस्सा ा रहा था की तू और शर्माती रह वो देख चली गयी तुषार के साथ.. आरुषि कब से हर्षिका के फेस पर आ रहे एक्सप्रेशंस को देख समाज चुकी थी की उसके दिल में अभी क्या चल रहा है.. वो जाना तोह चाहती थी लकिन बस शर्म के कारन मन कर दिया.. तोह आरुषि उसकी हालत को समझती हुई हरलीन को आवाज लगाती है...)
आरुषि- हरलीन.!! रुक...
हरलीन- (पीछे मुद देख) हाँ क्या हुआ...
आरुषि- ऐसा कर तू इधर आ मेरे साथ.. हर्षिका तू जा तुषार के साथ...
(हर्षिका बहुत तोह खुश हो जाती है उसकी बात सुनके. और मन hi मन आरुषि को थैंक्यू कहती है. लकिन तुषार तंग ा गया था. की क्या कर रही है यह पागल लड़कियां.. ऊपर से बारिश हो रही है और इन्हे कार पसंद नहीं ा रही की कोण किस्मे जायेगा...)
हरलीन- (साद होक) पर क्यों...
आरुषि- मुझे कुछ बात करनी है तेरे से.. (आखें दिखती हुई) बस कह दिया न.. चल अब आजा जल्दी से...
तुषार- देखो जिससे आना है जल्दी ायो.. मुझे और बिघ्ना नहीं है.. वर्ण मैं अकेला hi चला जायूँगा...
आरुषि- हर्षिका khadi-khadi मुस्कुरा क्या रही है जा जल्दी...
(तुषार जो अभी जाकर कार में बेथ चूका था.. हर्षिका भी जाकर उसकी कार में khushi-khushi बेथ जाती है.. वो बहुत मुस्कुरा रही थी...)
तुषार- (उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा देख) क्या हु हर्षिका जी.. इतना क्यों मुस्कुरा रही हो आप..?
हर्षिका- (थोड़ा मुँह बना कर, एकदम से उसकी और देख) यह जी, जी क्या कहते रहते हो मुझे आप.. मैंने पहले भी कहा है की दोस्तों में ji-vi कहना नहीं होता.. आप मुझे प्यार से.....
तुषार- (बिच में, अपने जज्बातो को खोता हुआ बोल hi पड़ा) हरु बुला सकता हु..?
(हर्षिका उसके ासे बोलने से मुस्कुराने लगी.. उसके प्यार का उसके लिए कोई पहली बार निक नाम रखना यह एहसास hi उससे एक लग सी ख़ुशी दे रहा था.. किसी दूसरे के लिए भले hi यह बाते मायने न रखती हो लकिन जब कोई प्यार में होता है तोह उससे उसके प्यार से जुडी हर छोटी बात भी बड़ी लगती है.. हर्षिका बस कार की विंडो से बहार देख मुस्कुराये जा रही थी और छः कर भी अपनी मुस्कराहट को रोक नहीं पा रही थी.. तुषार उसका कोई जवाब न सुन कर मायूस हो जाता है, लकिन उससे क्या पता था की उसकी हरु उसके हरु कहने से कितनी ज्यादा खुश है की अपनी ख़ुशी छुपा नहीं पा रही है...)
तुषार- (साद फेस करके) आपको बुरा लगा मेरा आपको इस नाम से बुलाना..? अगर ऐसा है तोह मैं आगे से आपको इस नाम से नहीं बुलाऊंगा.. (उसके कंडे पे हाथ रख) प्लीज ऐसे उदास मत हो.. I’m सॉरी...
हर्षिका- (जाहत से उसकी तरफ घूम के, मुस्कुराती हुई) अरे नहीं नहीं.. ऐसा क्यों बोल रहे हो आप.. मुझे बुरा नहीं लगा.. (स्माइल करके) आप मुझे हरु कह के बुला सकते हो.. मुझे ाचा लगेगा...
(इनकी बाते खतम नहीं हो रही थी और उधर आरुषि हरलीन के साथ कार लिए हर्षिका के विंडो साइड की और आकर रुक गयी...)
आरुषि- (कार का हॉर्न बजती हुई, चिल्ला के) आयीये.. तुम दोनों को आना है या नहीं आना.. (गुस्से से) कब से देख रही हु की कब तुषार आगे कार लेकर जाये तोह मैं उसके पीछे अपनी कार लागू.. लकिन तुम दोनों हो की हिलने का नाम नहीं ले रहे.. क्या कर रहे थे अंदर..?
हरलीन- (हस्ती हुई) अरे करने दे जो भी कर रहे थे.. यही तोह उम्र है इनकी और क्या तेरी उम्र में करेंगे.. हाहाहा...
आरुषि- (आपकी कमर पे हाथ रख गुस्से से उससे देख) क्या मतलब है तेरा.. मैं क्या बुद्धि हो गयी हु, मेरी क्या उम्र निकल गयी है..? एक लाफ़्हा मृगी तेरे...
तुषार- दीदी यार आप लोग शांत हो जाओ.. क्यों लड़ रहे हो.. चलो अभी जल्दी यहाँ से...
आरुषि- वही बोलने के लिए तोह मैं यहाँ रुकी हु.. चल जल्दी गाड़ी मोड़...
(तुषार कार स्टार्ट करता है और आगे चल पड़ता है.. piche-piche आरुषि भी अपनी कार लगा देती है...)
तुषार- (कार ड्राइव करता हुआ, हर्षिका को देख) तोह हुआ एक्चुअल में हुआ क्या था. (झिझक के) आ.. हरु..?
हर्षिका- (मुस्कुराने लगी..)
तुषार- (उससे यू मुस्कुराता देख) क्या हुआ..?
हर्षिका- कुछ नहीं...
तुषार- तोह फिर बताओ की आखिर आप तीनो वह जंगल में कैसे पौंची.. और वो लड़के कोण थे.. कहा से ए वो..?
हर्षिका- (गुस्से वाला फेस बना के) वो सब उस हरलीन के कारन हुआ है...
तुषार- क्या मतब..? मैं समझा नहीं...
हर्षिका- आप एक काम करना यह सब आप हरलीन के मुँह से hi सुन्ना.. वही बटगी की आखिर उसकी वझे से कितना बड़ा कांत हो गया.. अगर आप वक़्त पर नहीं आते तोह..? (नाम आखों से) पता नहीं वो हमारा साथ क्या करते...
तुषार- (उसकी आँखों में बहते आंसूं को देख) अरे आप तोह रू रही हो.. (एक हाथ से उसकी गाल पर आ रहे आंसूं साफ़ कर) देखो मैंने आकर आप सभी को बचा लिया.. तोह फिर रोने वाली क्या बात.. जो बात हुई hi नहीं उससे सोच कर क्यों रोना भला.. हाँ..? (उसकी गाल को पकड़ खींचता हुआ) आप तोह इतनी प्यारी हो.. ऐसे रट हुए अछि नहीं लगती...
(हर्षिका बस हलकी सी है देती है तुषार का उससे ासे बचो जैसे ट्रीट करने पर.. पुरे रस्ते उसके फेस पर से मुस्कान नहीं गयी.. वो बैठी बस यही सोच रही थी की आज तक जिससे कभी किसीने हंसाया तक नहीं था, वही आज कोई उससे एक बूँद आंसूं तक नहीं बहाने देता...)
|बैक तो हवेली|
सिया- दीदी, भैया चलो न Mumma-Papa से मिलने जाना है मुझे.. मुझे लेकर चलो जल्दी...
सफल- हाँ ठीक है बीटा चलो.. हमे भी बहुत कुछ पूछना है उनसे...
(सिया, सफल और सवाना तीनो हवेली से बहार निकलते है तोह देखते है की कोई है hi नहीं बहार.. न तुषार, न शिवं, न गुरूजी...)
सवाना- यह बॉस, गुरूजी और शिवं कहा गए..?
सफल- पता नहीं.. अभी थोड़ी देर पहले तोह इधर hi थे सब.. अचानक कहा गए.. रुको मैं फ़ोन करता हु बॉस को...
(सफल तुषार को फ़ोन करता है लकिन 2,3 बार तरय करने के बाद भी तुषार फ़ोन नहीं पिक करता. करता भी कैसे उसका फ़ोन तोह हवेली में पड़ा था.. फिर सफल शिवं को कॉल करता है. शिवं ने 5 लड़को को टपका दिया था. और अभी एक अधमरे लड़के की छाती पर अपना पेअर रख उससे और तड़फा रहा था.. शिवं उसकी गर्दन काटने वाला था की उससे सफल का कॉल ा जाता है.. 2,3 रिंग्स में शिवं फ़ोन पिक कर लेता है...)
शिवं- hello.. हाँ बोलो सफल...
सफल- भाई कहा हो तुम लोग..? हवेली में कही दिख hi नहीं रहे हो...
शिवं- वो एक प्रॉब्लम हो गयी थी भाई...
सफल- (चिंता से) कैसी प्रॉब्लम भाई..?
(शिवं उससे जो भी कुछ देर पहले हुआ सब sahi-sahi बता देता हाउ...)
सफल- तोह भाई मुझे भी साथ ले जाते.. वो इतने सरे लड़के थे अगर.....
शिवं- (मुस्कुरता हुआ) कही तुझे मुझ पर शक तोह नहीं है...
साफा- (हस्ता हुआ) हहह.. अरे नहीं नहीं भाई.. आप हो तोह कोई किसी का बाल भी बका नहीं कर सकता.. बस मैं यू hi बोलै था.. (मुस्कुराता हुआ) कितनी गर्दन कटी...
शिवं- (उस अड़मारे लड़के की गर्दन पर तलवार फेरता हुआ, मुस्कुराके) छाते की आवाज खुद सुन ले...
(आआह्ह्ह्हह्हह्ह्ह्ह)
सफल- (हस्ता हुआ) हाहाहा, भाई आपका कोई जवाब नहीं क्युकी आप लाजवाब हो.. चलो अभी मैं सवाना के साथ सिया के पेरेंट्स के पास जा रहा हु. पता लगाने की आखिर उनके साथ क्या हुआ था. जो रोड पर यू बेहोश पड़े थे...
शिवं- हम्म. ठीक है तुम लोग निकल लो मैं थोड़ी देर में हवेली पहुँच जायूँगा...
सफल- Okay भाई...
|Jagala’s हवेली|
(लाला अभी बहुत गुस्से में था. वो हॉल में idher-udher चाकर लगाए जा रहा था. उसके पास hi उसके 3 आदमियों की लाशे भी पड़ी हुई थी जो उसने गुस्से में आकर अपने hi 3 आदमी मर दिए थे.. उसका गुस्सा होना जायज भी था, एक ऐसा डॉन जिसके घर पर पुलिस जाने से डर्टी है वही एक पुलिस वाला आकर उसके दोस्त को उठा ले गया. उसके लिए यह बात उसकी इज्जत को दाग लगाने बराबर थी.. आखिर यह इंस्पेक्टर दया आया कहा से.? किसने बेजा था उससे. यह soch-soch लाला अपना दिमाग ख़राब कर रहा था...)
लाला- (गुस्से से) आये कोण था यह इंस्पेक्टर दया.. इसकी माँ छोड़नी है.. निकालो इसका पूरा बायो डाटा.. साला 300 पुलिस वाले लाया था.. जाओ jaha-jaha अपने आदमी है सबको इकठ्ठा करो.. सर्रे पुलिस स्टेशन जला के रख कार्डो.. और जग्गू को किसी भी कीमत पर 2दिन के अंदर यहाँ वापिस लाओ.. (सामने खड़े अपने 4,5 आदमियों को देख) जाओ मादरचोदो जाओ, मेरा मुँह क्या देखते हो......
《1861 -वर्ड्स》