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सब कुछ जायज़ है....
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मैंने बड़ी मुश्किल से थोड़ा बहुत खाया और रचना की माँ से इजाज़त ले कर घर आ गया. अपने कमरे में बीएड पर पड़ा मैं रचना के बारे में सोचने लगा. क्या गुनाह किया था उस मासूम ने जो पिछले पांच सालो से मेरी चाहत की आस में खुद को तड़पा रही थी. क्या चाहती है वो मुझसे.? मैं तो अपनी माँ बहनो को ले कर यहाँ से दिल्ली चला जाउगा मगर उसका क्या होगा.???
मैं समझ नहीं प् रहा था की इस बारे में मुझे क्या करना चाहिए. अगर मैं रचना को यु hi छोड़ कर चला गया तो मैं जनता हु की वो साडी ज़िन्दगी यु hi मेरी चाहत में गुज़ार देगी. एक ऐसी चाहत में जो कभी उसे मिल hi नहीं sakti...main कभी उसका हो hi नहीं सकता. मुझे रचना के लिए ये सब सोच कर बहुत दुःख हुआ मगर मैं उसके लिए क्या कर सकता था.? उसने तो मुझसे कहा भी नहीं की मैं उसके लिए कुछ करू. शायद उसे अहसास था की अपने दिल से वो मेरे प्रति ये मोहब्बत नहीं मिटा सकती मगर खुद को पत्थर कर के उसने अपनी ख्वाहिशो का hi खून कर दिया था.
अब आगे पढ़िए....
अपने कमरे में बीएड पर पड़ा मैं रचना के बारे में जाने कब तक सोचता रहा. किस्मत भी बड़ी अजीब चीज़ होती है. किसी को चाह कर भी कुछ नहीं मिलता और किसी को बिना चाहे बहुत कुछ मिल जाता है. रचना ने जो चाहा उसे वो तो नहीं मिलने वाला था मगर जो नहीं चाहा था वो ज़रूर मिल गया tha...yaani ज़िन्दगी भर का दुःख.
मैं इस बात को सोच कर दुखी हो रहा था की मैंने रचना पर हमेशा शक किया था जबकि वो तो गंगा की तरह पवित्र थी और निर्दोष भी. ऐसा होता है की हम किसी को पहले समझ नहीं पते और जब समझ लेते हैं तब बहुत देर हो चुकी होती है. अब अगर मैं रचना को समझ भी गया तो क्या फर्क पद गया इससे.? उसको तो ज़िन्दगी भर के लिए मोहब्बत का गम मिल hi गया. किसी की यादो के सहारे साडी ज़िन्दगी गुज़ार लेना इतना भी आसान नहीं होता मगर शायद रचना में वो साहस और हिम्मत थी. उसने एक बार भी मुझसे ये नहीं कहा की उसे मुझसे कुछ चाहिए. बल्कि उसने तो खुद hi मुझसे ये कह दिया था की उसे पता था की उसका बाप उस घर में अपनी बेटी का ब्याह नहीं करेगा जिस घर में गांव का ब्राह्मण समाज पानी तक नहीं पीटा.
आज रचना का कद मेरी नज़र में बहुत बड़ा हो गया था. ज़िन्दगी ने उसके साथ कितना बड़ा छल कर दिया था. मेरी आँखों के सामने बार बार उसका हुलिया फ़्लैश हो जाता था. कितनी बदल गयी थी वो. पांच साल पहले आसमान से उत्तरी हुयी कोई पारी लगती थी वो मगर आज पारी जैसी कोई बात नहीं रह गयी थी उसमे. अपने आप पर ध्यान देना hi बंद कर दिया था उसने. उसे रूप श्रृंगार से जैसे कोई मतलब hi नहीं रह गया था. मेरा मन उसके बारे में सोच सोच कर बुरी तरह से भरी हो गया.
अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी मेरे कमरे का दरवाजा खुला और कुसुम दीदी कमरे में आ गयी. मुझे यहाँ आये हुए आज बीस दिन हो गए थे मगर इतने दिनों में आज ये पहली बार ऐसा हुआ था जब दीदी मेरे कमरे में आयी थी. सब के सामने वो मुझसे नार्मल hi बात करती थी मगर अकेले में मिलने का कोई अवसर hi न आया था. दूसरी बात ये भी थी की हमारे बीच तो पहले hi हर बात का करार हो गया था. इस लिए मिलने मिलाने का शायद सवाल hi नहीं था.
कुसुम दीदी मेरे कमरे में आयी तो मैं बीएड पर उठ कर बैठ गया. कुसुम दीदी के चेहरे को देख के ऐसा लग रहा था जैसे उनके मन में कुछ था. कमरे में आते hi उन्होंने दरवाजा बंद किया और फिर बीएड की तरफ आ कर बीएड के किनारे पर बैठ गयी. मैं उन्हें hi देखे जा रहा था. मेरा दिल जाने क्यों एकदम से ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे दीदी आज मुझसे कुछ कहने आयी हैं.
"क्या बात hai...aaj आप मेरे कमरे में.?" मैंने उनकी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए ये कहा तो दीदी ने मेरी तरफ देखा. उनकी आँखों में एकदम से आँशु भर आये.
"क्या मैं तेरे कमरे में नहीं आ सकती.?" दीदी ने दुखी हो के ये कहा तो मैंने कहा.
"ारी ये मैंने कब कहा की आप मेरे कमरे में नहीं आ सकती.? बेशक आप मेरे कमरे में आ सकती हैं. मुझे तो आपके आने से ख़ुशी hi हुयी है. खेर chhodiye...ye बताइये की अपने भाई के कमरे में आने में इतनी देर कैसे लगा दी आपने.?" मैंने ये कहा तो दीदी की जो आँखे भर आयी थी वो छलक पड़ी. ये देख कर मैं तड़प तो उठा मगर जाने क्यों इस बारे में मैं उनसे कुछ कह न सका.
"क्या लगता है तुझे.? मेरे सीने में दिल नहीं है.? मेरे अंदर कोई जज़्बात नहीं हैं.?" दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.
"कमाल hai....mujhe लगा की जो इंसान बेदर्दी से अपने जज़्बातो को कुचल चूका हो उसके अंदर अब कोई जज़्बात कहा रह गया होगा.?" मैंने ये कहा तो दीदी मुझे देखती रह गयी.
"क्या कहना चाहता है तू विक्की.? साफ़ साफ़ कह दे जो भी कहना हो तुझे. इस तरह तना मारने की कोई ज़रूरत नहीं है.?" दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.
"ारी मैं तो मज़ाक कर रहा था दीदी. आप बताइये मेरे पास किस लिए आयी thi...koi काम था क्या मुझसे.?" मैंने ये कहा तो दीदी फिर मुझे देखती रह गयी.
"मुझे तुझसे ये उम्मीद नहीं थी विक्की की तू शहर में रह कर इतना बदल जायेगा." दीदी ने अपने आप को सम्हालते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"ये हर इंसान की प्रॉब्लम है दीदी. हर इंसान को सामने वाले से ऐसी hi कोई उम्मीद नहीं hoti...mujhe आज तक समझ नहीं आया की इंसान किसी की उम्मीदों पर खरा क्यों नहीं उतरता.? क्यों हर इंसान को इस बात की शिकायत हो जाती है.?" मैंने ये सब कहा तो दीदी ने कहा.
"बहुत बड़ी बड़ी बाते सीख गया है तू. खेर अच्छी बात है ye...main तो तेरा हाल चाल पूछने आयी थी. मुझे नहीं पता था की मेरा भाई मुझे ताने मरेगा इस तरह." दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.
"अगर आपको मेरी बातो से चोट पहुंची है तो मैं आपसे हाथ जोड़ के माफ़ी मांगता हु दीदी. वैसे आप तो जानती हैं की मैं आपको चोट पहुंचने के बारे में सोच भी नहीं सकता. अगर भगवन मेरे सामने आ कर मुझसे कहे की मांग मुझसे जो भी तुझे मांगना हो तो मैं उससे बस यही मांगूगा की मुझे मेरी दीदी के सरे दुःख दे दो और उनकी झोली में साडी दुनिया की खुशिया भर दो." मैंने ये कहा तो दीदी की आँखे एक बार फिर से छलक पड़ी. मैंने देखा की उन्होंने अपने आपको बड़ी मुश्किल से सम्हाला फिर बोली.
"अच्छा मैं तेरे लिए चाय बना के भिजवाती हु पूजा से." दीदी ने ये कहा और मेरा कोई जवाब सुने बिना hi उठ कर कमरे से चली गयी. उनके जाने के बाद मैं मुस्कुराया और बीएड पर लेट गया. मैं जानता था की दीदी ये बोल कर क्यों चली गयी थी. मेरी बातो ने उनके अंदर तूफ़ान खड़ा कर दिया था. जिसे वो मेरे सामने सम्हाल नहीं सकती थी. मैं ये भी जनता था की अब वो अकेले में मेरी बातो को याद कर कर के रोयेगी.
थोड़ी देर में प्रिय पूजा मेरे कमरे में चाय ले कर आयी और मेरे पास hi बैठ गयी. पांच सालो में ये दोनों भी काफी बदल गयी थी. पहले ये दोनों चुलबुली नटखट हुआ करती थी मगर अब दोनों में गंभीरता आ गयी थी. दोनों भरपूर जवान दिख रही थी. वक्त और हालात सबको बदल देते हैं.
पिता जी की मौत के बाद हम सब दुखी थे मगर अब धीरे धीरे सब नार्मल होने लगा था. मैं जब भी कमरे में होता तो मेरी दोनों जुड़वाँ बहने मेरे पास आ जाती थी और मुझसे ढेर साड़ी बाते करती रहती थी. दोनों ने मुझसे मेरे पांच सालो के बीच के सारे किस्से जान लिए थे. मैंने उन्हें ये नहीं बताया था की मेरे दक्षिणा से कैसे रिलेशन्स हैं. मैंने सिर्फ यही बताया की मैं वह पर नौकरी करता हु. मैंने उन्हें ये भी बताया की मैंने एक घर भी ख़रीदा हुआ है.
दोनों में एक बात अभी भी वैसी hi थी और वो ये की रात में दोनों मेरे कमरे में hi सोने आ जाती थी. दो दिन बाद मुझे डालर का फ़ोन आया. उसने बताया की एक नया खरीदार मिला है और वो मेरी ज़मीने देखना चाहता है तो मैंने डालर से कहा की वो उसे यहाँ ले आये. डालर ने मुझसे हाँ कहा और मैंने कॉल कट कर दी. उसके बाद मैंने पटवारी की बीवी यानी गायत्री जी को फ़ोन लगाया और उन्हें भी बताया तो उन्होंने कहा की वो अपने बेटे के साथ आ जाएगी.
गायत्री देवी बहुत hi भली और नेक दिल औरत थी. हमारी कोई इतनी ज़्यादा जान पहचान नहीं थी मगर फिर भी वो मेरी बिना कोई स्वार्थ के मदद कर रही थी. ऐसे लोग दुनिया में बहुत काम hi मिलते हैं. दो घंटे बाद डालर उस खरीदार को ले कर मेरे घर पर आ गया. उसके थोड़ी देर बाद गायत्री जी भी आ गयी अपने बेटे के साथ. उनका बीटा मेरी hi आगे का था.
इन लोगो के आने पर मैंने उनका अच्छे से स्वागत सत्कार किया और फिर सबको ले के खेतो की तरफ चल दिया. आधे घंटे बाद हम खेत पहुंचे. मैंने उन सबको अपनी साड़ी ज़मीने दिखाई. मेरी ज़मीनो में एक तरफ ामो का बाग़ भी हो गए थे. ामो के बहुत सरे पेड़ लगे हुए थे. मगर वो ज़्यादा बड़े नहीं थे. खरीदार ने मेरी साड़ी ज़मीनो को अच्छे से देखा. ज़मीनो के पीछे से hi बड़ी सी नहर गुज़र रही थी.
मैंने देखा की खरीदार मेरी ज़मीने देख कर बड़ा खुश दिख रहा था. गायत्री देवी भी सब देख रही थी. सब कुछ देखने के बाद हम सब वापस घर आ गए. घर में आने के बाद ज़मीनो के सौदे की बात चीत हुयी. मैंने सारे कागजात भी दिखाए उस खरीदार को.
बहुत सोच विचार के बाद उस खरीदार ने कहा की वो साडी ज़मीन नहीं ले पायेगा. वो आधी ज़मीन ले सकता है और उसका तत्काल भुगतान भी कर सकता है. उसकी ये बात सुन कर मैंने कहा की आधी ज़मीन बेचने का तो कोई सवाल hi नहीं है. ज़मीन बिकेगी तो साडी hi वर्ण नहीं. मेरी बात सुन कर डालर ने कहा की एक काम हो सकता है और वो ये की आधी ज़मीन पुरसोत्तम जी ले लेंगे और आधी वो जिनके साथ पहले सौदा हुआ था.
मैं इसके लिए राज़ी तो हुआ मगर दिक्कत ये थी की पहले वाला खरीदार साडी ज़मीन के पांच करोड़ बोल रहा था. पुरसोत्तम नया खरीदार tha...isne कुछ सोचते हुए कहा की दो दिन का वक्त उसे चाहिए. वो साडी ज़मीन ले लेगा. उसकी इस बात से मैंने कहा की ठीक है. फिर दाम की बात हुयी तो उसने साडी ज़मीन का दाम नौ करोड़ रुपये बोलै. उसकी ये बात सुन कर गायत्री देवी ने कहा की नौ करोड़ क्या होता है आप पूरा दस करोड़ में बात ख़तम कीजिये.
काफी देर तक इस बारे में बात होती रही और आखिर फिर वो खरीदार दस करोड़ देने को राज़ी हुआ मगर उसने कहा की दस करोड़ में उसे ये घर भी चाहिए. उसकी इस बात से गायत्री देवी ने मुझे चुपके से इशारा किया की मैं हाँ कह दू. फिर क्या था.. बात पक्की हो गयी. पुरसोत्तम जी ने दो दिन का वक्त मांगा और डालर के साथ चला गया. गायत्री जी को मैंने और माँ ने रोकने की बहुत कोशिश की मगर वो न रुकी. उन्होंने कहा की वो दो दिन बाद फिर आ जाएगी.
ऐसे hi दो दिन गुज़र गए. मैंने गांव में भनक भी नहीं लगने दी थी किसी को की मैं अपनी ज़मीने और घर बेच रहा हु. दो दिन बाद मैं शहर गया. वह पटवारी के घर में hi हम सब मिले और वही पर ज़मीनो का सौदा हुआ. पटवारी ने कागजी कार्यवाही का जिम्मा अपने ऊपर लिया. दस करोड़ की रकम पुरसोत्तम ने मेरे बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दी.
कागजी काम में कुछ दिन का वक्त लग्न था जिसके लिए मैं रुक गया था. खरीदार के जाने के बाद मैंने पटवारी से उस ज़मीन को भी बेचने की बात की जिसे मणि शंकर ने कब्ज़ा किया हुआ था. मेरी बात सुन कर पटवारी ने हस्ते हुए मुझसे कहा की चिंता मत करो बेटे. मणि शंकर को तो ऐसा झटका दूँगा की वो सात जन्मो तक याद रखेगा. मैंने पूछा वो कैसे तो पटवारी ने कहा की उस ज़मीन को वो खुद खरीदेगा.
हमारे गांव से सात कम दूर दूसरा गांव था जहा पर वो ज़मीन थी और जिसमे मणि शंकर ने ज़बरदस्ती कब्ज़ा किया हुआ था. वो ज़मीन पांच एकड़ के आस पास थी. वो ज़मीन अब उपजाऊ हो गयी थी वर्ण पहले बंजर hi पड़ी थी. सींच का उसमे कोई साधन नहीं था. गायत्री जी ने खुद hi कह दिया की वैसे तो उस ज़मीन में कोई ख़ास बात नहीं है मगर वो सिर्फ मेरी वजह से उस ज़मीन के अच्छे दाम दे सकती है.
गायत्री जी ने उस ज़मीन को उसकी औकात से ज़्यादा दाम दिया मुझे. दस लाख ज़मीन के और दो लाख अपनी तरफ से मेरे लिए. मैंने भी सोचा चलो कोई बात नहीं. गेयटी देवी ने और उसके पति ने बताया था की मुझे मेरी गांव वाली ज़मीनो के दुगुने दाम मिले हैं. ये सौदा किसी भी तरह से घाटे का नहीं है.
ऐसे hi एक हप्ते और गुज़र गए. सब कुछ बेच दिया गया था. दक्षिणा ने मुझे फ़ोन पर बताया की उसने एक अच्छा सा घर देख लिया है. मैंने घर की कीमत पूछी तो उसने बात को ताल दिया. मैं समझ गया की वो मुझे उसकी कीमत नहीं बताना चाहती मगर मैं उसके ऊपर बोझ नहीं ban'na चाहता था और न hi उसका इतना बड़ा अहसान लेना चाहता था. मेरे ज़ोर देने पर उसने बताया की वो घर पांच करोड़ की कीमत का है
घर की कीमत सुन कर मेरे पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी. मैंने दक्षिणा से साफ़ कह दिया की मुझे इतनी महगी कीमत का घर नहीं चाहिए. मैं कोई राजा महाराजा नहीं हु जो महल में रहुगा. मुझे अपनी हैसियत के हिसाब से रहने के लिए एक ऐसा घर चाहिए जिसमे मैं और मेरी माँ बहने आराम से और ख़ुशी से रह सके.
पहले तो दक्षिणा न मानी मगर जब मैंने नाराज़गी के साथ कहा तो उसने मुझसे नाराज़ हो के पूछा की कितनी कीमत का घर मुझे चाहिए तो मैंने बता दिया की एक दो करोड़ से ऊपर का नहीं होना चाहिए. मेरी ये बात सुन कर दक्षिणा ने ok कहा और फ़ोन रख दिया.
शाम को मैं अपने कमरे में लेता हुआ था की तभी मेरे कमरे में माँ आयी और मेरे पास बीएड पर बैठ गयी. वो मुझसे ज़मीनो और घर के बारे में पूछने लगी तो मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया. ये भी की अब हम जल्द hi यहाँ से चले जायेगे और दिल्ली में रहेंगे. माँ मेरी इस बात से और तो ज़्यादा कुछ नहीं बोली बस यही कहा की हमने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा था मगर इसके बाद भी इस गांव के ब्राह्मण समाज ने हमारा कभी भला नहीं होने दिया. पता नहीं मेरी बेटियों से हम से क्या दुश्मनी थी उनकी.?
कुछ देर इसी बारे में माँ मुझसे बात करती रही फिर उन्होंने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए कुछ सोचने लगी. मुझे समझ न आया की वो क्या सोच रही हैं. तो मैंने उनसे पूछ hi लिया. मेरे पूछने पर उन्होंने कहा.
"रचना से तेरा क्या रिश्ता था जो तू उसके साथ पांच साल पहले शहर में घूमा करता था.?" माँ ने मुझसे ये पूछा तो मैं एकदम से कुछ बोल न सका. मेरी आँखों के सामने फिर से रचना का चेहरा घूमने लगा. मुझे कुछ न बोलता देख माँ ने फिर कहा.
"देख मुझे इतना पता है की मेरा बीटा किसी की लड़की के साथ कुछ भी गलत नहीं करेगा. मुझे ये भी भरोसा है की उस कमीने सरपंच की लड़की ने hi तुझे अपने रूप जाल में फसाया होगा. खेर तू मुझे सच सच बता हकीकत क्या है.?" माँ ने ये सब कहते हुए पूछा तो मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया. बस ये नहीं बताया की हमारे बीच चूमा छाती भी होती थी. मेरी बाते सुनने के बाद माँ चुप चाप मुझे देख के कुछ सोचती रही.
"क्या यहाँ आने के बाद तू उससे मिला है अभी.?" माँ ने पूछा तो मैं फिर कुछ न बोल सका तो माँ शायद समझ गयी फिर बोली.
"मतलब तू उससे मिला है. क्या ज़रूरत थी तुझे उससे मिलने की.?" माँ ने इस बार नाराज़गी से ये कहा तो मैंने कहा.
"मैं उससे मिलने नहीं गया था माँ. वो तो सरपंच काका ने कहा था घर आ के हिसाब किताब देख लेना की कितना पैसा पिता जी ने उससे उधार लिया था. इस लिए मैं उसके घर गया था. जब मैं उसके घर गया तो सरपंच था hi नहीं घर में. काकी ने बताया की वो रुपेश के साथ किसी काम से बाहर गया है. काकी के बताने से मैं उसके घर से वापस hi आने वाला था की काकी ने मुझे रोक लिया और मेरा हाल चाल पूछने लगी. फिर मुझे चाय नास्ता करने को कहने लगी तो मैंने मन कर दिया. मगर काकी न मानी और मुझे बैठक में बैठा कर चाय नास्ता लेने अंदर चली गयी. मुझे रचना के बारे में कुछ पता नहीं था की अब वो कैसी है और कहा है. हाँ मैं ये समझ रहा था की अब उसकी शादी हो चुकी होगी मगर मैं गलत समझ रहा था. जब काकी अंदर चली गयी तभी रचना किसी काम से शायद बाहर बैठक में आयी थी मगर जब उसने बैठक में मुझे बैठे देखा तो मुझे देख कर हैरान रह गयी. उसे ये तो पता चल गया था की मैं वापस आ गया हु मगर शायद उसे ये उम्मीद नहीं थी की मैं उसके घर में उस वक्त उसे मिल जाउगा. उसके बाद उसने मुझसे मेरा हाल चाल पूछा और मैंने भी. उसका हुलिया देख कर मैं हैरान था. उसने खुद hi बताया की उसका वैसा हुलिया कैसे बन गया है.?" मैंने ये सब माँ से बताया तो माँ ने बीच में मुझसे टोकते हुए पूछा.
"क्या बताया उसने?" माँ ने बड़े ध्यान से मेरी तरफ देखते हुए ये पूछा तो मैंने उन्हें रचना की साड़ी बात बता दी. साडी बात जानने के बाद माँ हैरान रह गयी.
"तो ये वजह थी की उसने अब तक शादी नहीं की अपनी.? उसके घर वाले उसकी शादी के लिए बहुत परेशां थे. गांव में भी ये बात सब जानते हैं की सरपंच की बेटी शादी नहीं करना चाहती मगर वो क्यों शादी नहीं करना चाहती ये आज तक किसी को पता नहीं चल सका. हमें तेरे और उसके बारे में उतना hi पता था इस लिए हम यही सोचते थे की शायद वो तुम्हारी वजह से शादी नहीं कर रही है. अभी जब तूने ये सब बताया तब साड़ी बात समझ आयी." माँ ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैं कुछ न बोलै.
"मैं समझती थी की सरपंच के घर परिवार में सिर्फ उसकी बीवी hi अच्छी इंसान थी मगर अब पता चला की उसकी बेटी रचना भी एक नेक दिल लड़की थी. उसने तेरे जाने के बाद इस बात को किसी से नहीं कहा वर्ण अगर उसने अपने घर में किसी से इस बारे में बता दिया होता तो शायद सरपंच हम सबको ज़िंदा hi ज़मीन में गाड़ देता." माँ ने सोचते हुए ये सब कहा तो मैंने कहा.
"अब से पहले मैं भी यही समझता था माँ की रचना ने मुझसे सिर्फ इसी लिए दोस्ती की थी की वो अपने भाई की मार का मुझसे किसी तरह से बदला लेना चाहती है और उसके लिए उसने मुझसे दोस्ती की. उसके अंदर क्या साजिश थी इस बारे में मुझे कुछ पता नहीं था मगर उस दिन जब उसने मुझे सब कुछ अपने बारे में बताया तो मैं भरोसा नहीं कर प् रहा था. मुझे समझ आया की कितना गलत सोचता था मैं उसके बारे में.?" मैंने ये सब कहा तो माँ ने कहा.
"मगर तूने उससे दोस्ती की hi क्यों थी.? साफ़ साफ़ मन कर देता उसे इसके लिए." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.
"मैं तो बस ये देखना चाहता था की वो दोस्ती की आड़ में मेरे साथ क्या करना चाहती है.? इस लिए उसकी दोस्ती को कबूल किया था. मगर अब जनता हु की उसके अंदर तो कभी कोई बदला लेने वाली बात थी hi नहीं. वो तो सच में मुझसे दोस्ती hi करना चाहती थी. क्यों की उसकी नज़र में मैं इस गांव में सबसे अच्छा लड़का था." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.
"बाप भाई के बुरे कर्मो की सजा बेटी भोग रही है. जब तू यहाँ से चला गया था तो मैं भी अपने सामने उसे हमेशा बुरा भला hi कहती थी. शायद मेरी बद्दुआ लग गयी उस मासूम को." माँ ने ये कहा तो मैं हैरानी से उन्हें देखने लगा.
"चल तू आराम kar....main भी खाना बनाने जा रही हु." माँ ने ये कहा तो मैंने हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद माँ नीचे चली गयी. उनके जाने के बाद मैं फिर से रचना के बारे में सोचने लगा.
रचना के बारे में सोचने से पता नहीं क्यों मुझे उसके लिए बहुत बुरा लग रहा था. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं रचना के लिए क्या करू. उसने मेरी चाहत में खुद को ऐसा बना लिया था. उसके बारे में सोचते सोचते अचानक hi मुझे दीदी का ख़याल आया. मैं अपने मन में रचना की तुलना दीदी से करने लगा. मेरी दीदी भी तो मुझसे बहुत प्यार करती हैं. ऐसा मुझे लगता था जबकि उन्होंने कभी भी इस बात को मुझसे कहा नहीं था मगर जब हमारे दिल एक दूसरे से इतने गहरे जुड़े होते हैं तो हमारे दिल एक दूसरे का हाल महसूस कर hi लेते हैं.
कुसुम दीदी अंदर hi अंदर खुद को सजा देती थी और यही हाल रचना का भी हो गया था. उसने उस दिन मुझसे अपने दिल का हाल बता तो दिया मगर मुझसे ये नहीं कहा की उसे अपनी मोहब्बत का कोई खूबसूरत सिला चाहिए. उसके मन में बस यही बात बैठी हुयी थी की उसका मिलान या उसका ब्याह मुझसे नहीं हो सकता क्यों की उसका बाप एक ऐसे घर में अपनी बेटी का ब्याह नहीं करेगा जिसके यहाँ ब्राह्मण समाज पानी भी नहीं पिता. ये सब सोच कर उसने हालातो से समझौता कर लिया था. वो अब सिर्फ मेरी यादो के सहारे साडी ज़िन्दगी गुज़ार देने के फैसले पर कायम थी.
रात में खाना पीना करके मैं वापस अपने कमरे में आ गया था. कुसुम दीदी से उसके बाद मेरी कोई बात नहीं हुयी. मैं जनता था वो मुझसे नाराज़ हैं. मगर मैं उनकी नाराज़गी पर अभी कुछ करने की हालत में नहीं था. माँ और दीदी के सो जाने के बाद प्रिय पूजा मेरे कमरे में आ गयी. आते hi वो दोनों मेरे अगल बगल लेट गयी.
"एक बात बताओ भाई तुम बैग में क्या ले कर आये थे.? हमने तो अभी तक उन्हें खोल कर देखा hi नहीं. क्या उसमे हमारे लिए कुछ है.?" पूजा ने मुझसे ये पूछा तो मुझे भी याद आया की मैं दिल्ली से जब आया था तो मेरे हाथ में दो बड़े बड़े बैग थे. पिता जी की मौत के बाद कभी उन बैग्स का ध्यान hi नहीं आया था.
"अब ये तो तुम्हे उनके खुलने पर hi पता चलेगा." मैंने ऐसा इस लिए कहा क्यों की मुझे भी नहीं पता था की उनमे क्या है अंदर. क्यों की दोनों बैग दक्षिणा ने पैक किये थे. मैं तो बस उन्हें ले कर यहाँ आ गया था.
"फिर तो हम अभी उन्हें खोल कर देखेंगे भाई की उनमे हमारे लिए क्या है." पूजा ने इस बार मुस्कुराते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"हाँ पूजा सही कहा तूने. चल खोल कर देखते हैं. मुझे पूरा भरोसा है की भाई हमारे लिए कुछ न कुछ लाया hi होगा." प्रिय ने ये कहा तो पूजा जल्दी से उठ कर बीएड से नीचे आ गयी.
मैं दोनों की तरफ hi देख रहा था. वो दोनों कमरे में इधर उधर देखने लगी. मगर वो दोनों बैग उन्हें कमरे में कही न दिखे. तब दोनों ने मुझसे बैग के बारे में पूछा तो मैंने कहा की मुझे पता नहीं है की वो कहा रखे हैं. मेरी ये बात सुन कर दोनों के चेहरे लटक गए. फिर जैसे उन्हें कुछ याद आया तो प्रिय ने कहा.
"भाई उस दिन हम दोनों hi तो तुम्हारे हाथ से बैग ले कर बाहर से अंदर आये थे. मुझे लगता है माँ के कमरे में होंगे वो बैग." प्रिय ने ये कहा तो पूजा ने कहा.
"माँ के कमरे में अगर होंगे तो इस वक्त हम उनके कमरे में कैसे जायेगे.? वो सो रही होंगी." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.
"चलो chhodo...kal सुबह उन्हें देख लेना. अभी आराम से सो जाओ." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.
"न bhai...ham तो अभी देखेंगे. कल सुबह तक हम इंतज़ार नहीं कर सकते अब. चल प्रिय माँ के कमरे में चलते हैं." पूजा ने ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"माँ अगर डाँटेगी तो वो भी सह लगे मगर वो दोनों बैग ले कर सीधा यही आएंगे चल अब." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.
"और अगर माँ ने ये पूछा की बैग लेके कहा जा रही हो तो क्या जवाब डौगी तुम दोनों.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"बता देंगे की भाई ने मगाया है. उसमे कोई ज़रूरी चीज़ है जिसे अभी देखना चाहते हो तुम." प्रिय ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसे देखा. क्या बहाना बनाया था उसने.
मुझे हैरानी से देखता देख दोनों हसने लगी और कमरे से बाहर निकल गयी. उनके जाने के बाद मैं उन दोनों के बारे में hi सोचते हुए मुस्कुराता रहा. पता नहीं कैसे वो दोनों माँ के कमरे से वो दोनों बैग लाएगी.?
कुछ देर बाद जब वो दोनों वापस कमरे में आयी तो मैं उनके हाथो में बैग देख के हैरान रह गया. मुझे लगा था की दोनों जब सोती हुयी माँ को जगाएगी तो माँ ज़रूर उन्हें डाँटेगी और कमरे से ये कह के भगा देगी की कल देख लेना बैग. मगर ये तो बैग हाथ में ले के hi आयी थी.
दोनों मुस्कुराते हुए आयी और सबसे पहले कमरे का दरवाजा बंद किया उसके बाद मेरे पास आ कर बोली की भाई अब बैग खोलो. दोनों ने बताया की माँ अभी जाग रही थी और जब दोनों ने बैग के बारे में माँ से पूछ तो माँ ने बता दिया. तब दोनों वही पर बैग खोलने लगी थी मगर बैग खुला hi नहीं उनसे. क्यों की दोनों बैग नंबर से लॉक थे.
जब मुझे पता चला की बैग नंबर से लॉक हैं तो मैं भी हैरान रह गया. दोनों बैग दक्षिणा ने hi पैक किये थे और आते वक्त न मैंने उससे पूछा और न hi उसने बताया था नंबर लॉक के बारे में. जब दोनों ने मुझसे बैग खोलने के लिए कहा तो मैं हड़बड़ा गया की अब बैग कैसे खोलू. क्यों की मुझे भी पिन नंबर नहीं पता था. मैं उन दोनों से ये कह भी नहीं सकता था की मुझे इसका पिन पता नहीं है क्यों की उससे वो मुझसे हज़ारो सवाल करने लगती. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं अब क्या करू.?
दोनों कड़ी मुझे hi देखे जा रही थी. फिर मेरे मन में एक अड़िअ आया. मैंने दोनों से कहा की मैं बाथरूम करके आता हु. मैं बीएड से नीचे उतरा और मोबाइल ले कर नीचे बाथरूम की तरफ बढ़ गया. बाथरूम में आ कर मैंने दक्षिणा को फ़ोन लगाया. वो भी अभी जाग रही थी. मैंने उससे बैग के पिन नंबर का पूछा तो उसने मुझे पिन नंबर बता दिया. उससे और एक दो मिनट मैंने बात की और जल्दी से कमरे में आ गया.
कमरे में आ कर मैंने बैग के नंबर लॉक पर पिन डाला और दोनों बैग खोल दिए. बैग में बहुत सरे कपडे भरे थे और लेडीज लोगो के ज़रूरत का सामान भी. मैं ये सब देख कर हैरान रह गया.
प्रिय पूजा दोनों बैग में कपडे देख कर बहुत खुश हो गयी थी. दोनों बैग से सरे कपडे निकाल निकाल कर देखने लगी. उनके कपड़ो में जीन्स और तशीरतस थी. एक भी शलवार कुरता वाले कपडे नहीं थे. हमारे गांव में कोई भी लड़की जीन्स वगैरा नहीं पहनती थी. प्रिय पूजा ने जब जीन्स और टीशर्ट देखा तो बहुत खुश तो हुयी मगर फिर मायूस भी हो गयी.
"वाह भाई दिल तो खुश कर दिया तुमने ऐसे कपडे हमारे लिए ला कर मगर हम इन्हे पहन नहीं सकते. वैसे हमारा भी बहुत मन करता था ऐसे कपडे pahan'ne का मगर मज़बूरी थी की पहन नहीं सकते थे." पूजा ने ये कहा तो प्रिय बोली.
"एक तो माँ और पिता जी का दर और ऊपर से गांव वालो का. हमें पता है की शहर में लड़किया ऐसे hi कपडे पहनती हैं. मगर भाई तुम्हे तो यहाँ के बारे में पता था फिर ऐसे कपडे ले कर आने का क्या मतलब था.?" प्रिय ने ये कहा तो मैं कुछ बोल न सका. मैं खुद हैरान था की दक्षिणा ने ऐसे कपडे क्यों ख़रीदे थे.? अब मैं इन दोनों के सवालों के क्या जवाब दुगा.?
"क्या हुआ भाई चुप क्यों हो.? बताओ न की ऐसे कपडे हमारे लिए क्यों kharide..aur तो और दीदी के लिए भी ख़रीदे ऐसे hi कपडे. हम तो किसी तरह इन्हे पहन भी लगे मगर वो तो बिलकुल भी नहीं पहनेगी." प्रिय ने फिर से ये कहा तो इस बार मैंने कहा.
"अरे तो क्या हो गया देवियो.? मुझे लगा था की इन पांच सालो में यहाँ का माहौल भी कुछ न कुछ शहर की तरह हो गया होगा. इस लिए ख़रीदे थे ऐसे कपडे. अब मुझे क्या पता था की आज भी गांव में सब कुछ पहले जैसा hi है. खेर chhodo...ab हम सबको शहर तो जाना hi है इस लिए ये कपडे तुम लोग शहर में hi pahan'na." मैंने ये कहा तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा फिर पूजा बोली.
"मगर भाई ऐसा भी तो हो सकता है की माँ ये कपडे हमें शहर में भी न पहनने दे." पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"फ़िक्र मत करो. मैं सब सम्हाल लगा. अब चलो इन्हे वापस बैग में सेट करके रखो और सो जाओ." मैंने ने ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"वैसे भाई क्या हम ये कपडे अभी पहन सकते हैं.?" प्रिय ने ये कहा तो पूजा भी बोल पड़ी.
"हाँ bhai...ham एक बार इन्हे पहन कर देखना चाहते हैं की ये हम पर कैसे लगते हैं.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"अच्छा ठीक है पहन लो मगर जल्दी करो जो कुछ भी करना है." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"ठीक है bhai...magar तुम हमारी मदद करो न. वो क्या है की हमें पता hi नहीं है की किस कपडे के साथ कौन सा कपडा पहनना है.?" प्रिय ने कहा तो मैं बीएड से उतर कर नीचे आया और बैग से निकले हुए कपड़ो को ध्यान से देखने लगा.
फिर मैंने एक एक जीन्स और एक एक टीशर्ट छात कर उन दोनों को पकड़ा दिया और कहा की इन्हे पहन लो. कपडे लेने के बाद प्रिय पूजा ने कहा की अब हम इन्हे पहने कैसे तो मैंने कहा जैसे पहना जाता है और कैसे. मेरे ऐसा कहने पर दोनों हसने लगी फिर प्रिय बोली की भाई हम तुम्हारे सामने कपडे कैसे उतर कर इन्हे पहनेगे.? तब मुझे समझ आया तो मैंने कहा की मैं कमरे से बाहर चला जाता हु. जब पहन लेना तो दरवाजा अंदर से बजा देना. मेरे ऐसा कहने पर दोनों मुस्कुरायी और हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद मैं कमरे से बाहर आ गया.
करीब दस मिनट बाद दरवाजा बजा तो मैं कमरे के अंदर गया और जब मेरी नज़र उन दोनों पर पड़ी तो मैं हैरानी से देखता रह गया दोनों को. दोनों जीन्स और टीशर्ट पहने हुए थी और बहुत hi कमाल की लग रही थी. कासी हुयी जीन्स में उनकी जाँघे और टाँगे साफ़ साफ़ समझ में आ रही थी और ऊपर टीशर्ट में भी उनके सीने के उभार साफ़ नज़र आ रहे थे. मैं उन्हें आँखे फाड़े देखे जा रहा था और वो दोनों मुझे अपनी तरफ इस तरह देखते देख बुरी तरह शर्माए जा रही थी.
"भाई ऐसे आँखे फाड़े क्यों देख रहे हो हमें.? क्या ये कपडे हम पर अच्छे नहीं लग रहे.?" प्रिय ने शरमाते हुए ये कहा तो मुझे होश आया और फिर मैंने अपने आपको सम्हालते हुए बोलै.
"मुझे यकीन hi नहीं हो रहा की तुम दोनों गांव में रहने वाली आम सी लड़किया हो. ऐसा लगता है जैसे तुम दोनों शहर में hi रही हो. बस एक hi कमी है अभी." मैंने ऐसा कहा तो दोनों जल्दी से बोली की कौन सी कमी है भाई तो मैंने बताया की वो दोनों इन कपड़ो में शर्मा रही हैं यही कमी है.
मैंने कमी बताया तो दोनों मुस्कुरायी और बोली की भाई पहली बार ऐसे कपडे पहने हैं इस लिए थोड़ा अजीब लग रहा है हमें इस लिए शर्म आ रही है और दूसरी बात ये भी है की इन कपड़ो में सब कुछ साफ़ साफ़ नज़र भी आता है इस लिए भी शर्म आ रही है.
जब पूजा ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा तो उसने शर्मा के सर झुका लिया. मैंने कहा की शहरो में लोग इनसे भी छोटे छोटे कपडे पहनते हैं और वो तुम्हारी तरह शरमाते नहीं हैं. इस लिए इस शर्म को निकाल लो अभी से वर्ण शहर में कैसे चलेगा.?
"भाई अब तुम बाहर जाओ हम इन कपड़ो को उतार कर फिर से अपने कपडे पहनना चाहते हैं." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.
"एक मिनट ruko....main तुम दोनों की इन कपड़ो में एक एक फोटो खींच लेता हु मोबाइल में." मैंने ये कहा तो दोनों मुस्कुराते हुए शर्मा गयी फिर पूजा बोली.
"नहीं न bhai...photo मत खींचो अभी. अभी हमें इन कपड़ो में शर्म आ रही है इस लिए फोटो अच्छी नहीं आएगी." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.
"तुम दोनों इन कपड़ो की तरफ ध्यान hi मत दो और ये सोचो की तुम अपने hi कपडे पहने हुयी हो. तब तुम्हे शर्म नहीं आएगी." मैंने ये कहा तो दोनों ने हाँ में सर हिला दिया.
उसके बाद मैंने बीएड पर रखा अपना मोबाइल लिया और दोनों के सामने आ कर उन दोनों की फोटो लेने लगा. वो दोनों अभी भी थोड़ा शर्मा रही थी. फोटो ले के जैसे hi मैं फुर्सत हुआ तो दोनों कहने लगी की हमें भी दिखाओ की हम कैसी लग रही हैं तो मैंने दोनों को फोटो दिखाई. अपनी फोटो देख कर दोनों हैरान भी हुयी और शर्मा भी गयी. उसके बाद मैं कमरे से बाहर आ गया.
कुछ देर बाद जब दरवाजा बजा तो मैं वापस कमरे में गया तो देखा दोनों ने फिर से अपने पहले वाले कपडे पहन लिए थे. सरे कपड़ो को सेट करके बैग में रखने के बाद दोनों बैग को एक तरफ रख दिया गया. उसके बाद हम तीनो बीएड पर आ कर लेट गए.
"भाई सच सच बताओ न हम दोनों उन कपड़ो में कैसे लग रहे थे.?" पूजा ने मुझसे चिपकते हुए मुझसे ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"बहुत hi सुन्दर लग रही थी तुम दोनों. तुम दोनों को देख के मुझे ऐसा लग रहा था जैसे तुम दोनों को अपनी बाहो में उठा लू और ख़ुशी से नाचने लागु." मैंने ये कहा तो दोनों हसने लगी फिर प्रिय बोली.
"तो भाई अपनी बाहो में हमें उठाया क्यों नहीं तुमने.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"वो इस लिए नहीं उठाया क्यों की तुम दोनों का भरी वजन मैं उठा hi नहीं पता." मैंने ये कहा तो दोनों के चेहरे पर नाराज़गी उभर आयी. दोनों hi मुझसे अलग हो गयी और फिर पूजा बोली.
"हमें तुमसे कोई बात नहीं करना भाई. हम क्या तुम्हे इतने भरी नज़र आते हैं.?" पूजा ने बुरा सा मुँह बनाते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"हम तो फूल सी कोमल और मासूम हैं. इतनी बड़ी तौहीन आज तक न हुयी थी हमारी. जाओ अब बिलकुल भी बात नहीं करना तुमसे." प्रिय ने ये कहा तो मैं मुस्कुराया. मैंने तो दोनों को छेड़ने के लिए hi ऐसा कहा था.
"ारी मैंने तो तुम दोनों से मज़ाक में ऐसा बोलै था मेरी प्यारी प्यारी बहनो. मुझे भी पता है की मेरी ये दोनों परिया कितनी कोमल और मासूम हैं. मैं तो साडी दुनिया से ये कह सकता हु की मेरी ये दोनों बहने सबसे सुन्दर और सबसे मासूम हैं." मैंने ऐसा कहा तो दोनों जल्दी से मुस्कुराते हुए वापस मुझसे चिपक गयी. फिर पूजा बोली.
"क्या सच कह रहे हो भाई.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"क्या तुम दोनों को कोई शक है मेरी बात में.?" मैंने ये कहा तो दोनों ने न में सर हिलाया और फिर दोनों ने मेरे सीने पर अपना अपना सर रख लिया.
मैं सीधा लेता हुआ था और वो दोनों मेरे से पेट के बल चिपकी लेती हुयी थी. दोनों के सीने के उभार मुझे साफ़ साफ़ महसूस हो रहे थे. मैंने ये भी महसूस किया की दोनों के वो उभार पहले से अब बड़े थे. मेरे मन में ये गन्दा ख़याल आया तो पता नहीं एकदम से मुझे नदामत सी फील हुयी. मगर जो चीज़ मेरे जिसम में धसी हुयी फील हो रही थी उनको मैं कैसे इग्नोर करता.
ऐसे hi कुछ देर में हम तीनो सो गए. सुबह मेरी आँख खुली तो देखा दोनों मुझसे वैसे hi चिपकी सोई हुयी थी. मैंने दोनों को जगाया तो दोनों ने पहले मेरी तरफ ध्यान से देखा फिर दोनों ने झुक कर मेरे दोनों गालो पर चूमा और फिर मुस्कुराते हुए गुड मॉर्निंग कहा तो मैं भी मुस्कुरा उठा. मुझे पांच साल पहले का सब कुछ याद आया. पहले भी ये दोनों ऐसा hi करती थी. दोनों मेरी तरफ hi देख रही थी. मैं समझ गया की दोनों क्या चाहती हैं इस लिए मैंने भी मुस्कुरा कर दोनों के गाल पर बरी बरी से चूमा और गुड मॉर्निंग कहा.
उसके बाद वो दोनों ख़ुशी ख़ुशी चली गयी कमरे से. उसके बाद दिन ऐसे hi गुजरने लगा. दोपहर को खाना पीना करने के बाद मैं माँ के पास उनके कमरे में गया तो पता चला की वो घर पर नहीं हैं. प्रिय ने बताया की वो किसी काम से किसी के घर गयी हैं. माँ ने बताया नहीं था की वो किसके घर गयी हैं.
माँ के कमरे से निकलने के बाद मैं वापस अपने कमरे की तरफ जाने के लिए सीढ़ियों की बढ़ा hi था की मुझे दीदी का ख़याल आया तो मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ चला. मैं जनता था की वो उस दिन की बातो से मुझसे नाराज़ हैं.
दीदी के कमरे का दरवाजा बंद था तो मैंने दरवाजा खटखटाया. कुछ hi पालो में दीदी ने दरवाजा खोला और बाहर मुझे देख कर कुछ न बोली और वापस मुद कर कमरे में चली गयी. मैं अंदर गया और दरवाजा बंद कर दिया.
"क्या बात hai...aaj इतने दिनों बाद अपनी बड़ी बहन के कमरे में आने का कास्ट कैसे किया मेरे भाई ने.?" कुसुम दीदी ने बीएड पर बैठने के बाद मुझे देखते हुए ये कहा तो मैं मुस्कुराया और जा कर उनके बगल से बीएड पर बैठ गया.
"बहुत कोशिश की मैंने की इस तरफ न औ मगर हर बार अपनी कोशिशों में नाकाम hi हुआ. आपकी तरह शायद मैं इतना पक्का नहीं हु की अपनी बात पर कायम राहु. माँ के बाद बचपन से जिसे देखा और जाना समझा है वो आप hi थी दीदी. अगर कोई मुझसे ये पूछे की माँ पिता जी के बाद किसने मुझसे सबसे ज़्यादा प्यार किया है तो मैं यही कहुगा की मेरी कुसुम दीदी ने. और अगर कोई मुझसे ये पूछे की मैंने सबसे ज़्यादा किस्से प्यार किया है तो मैं यही कहुगा की अपनी......!" मैं ये कह hi रहा था की तभी एकदम से दीदी ने मेरे मुँह पर अपनी हथेली रख दी और मेरी बात को पूरा होने से पहले hi रोक दिया. उनकी आँखों में आँशु थे. मेरी तरफ देखते हुए इंकार में सर हिला रही थी. जैसे कह रही हो की इसके आगे मैं उनसे कुछ न कहु.
मेरे अंदर भी तूफान सा उठ खड़ा हुआ था. आँखों में मेरे भी आँशु आ गए थे. दीदी ने मेरे मुँह पर हथेली रख दिया था जिससे मैं आगे अपनी बात पूरी नहीं कर सका था. कुछ देर तक कमरे में अजीब सी ख़ामोशी रही. दीदी ने अपनी हथेली मेरे मुँह से हटा लिया था.
"तू मुझसे दुनिया जहां की सब बाते कर विक्की मगर इस बारे में कुछ न बोलै कर मुझसे." दीदी ने अपने आपको सम्हालते हुए भरी आवाज़ में ये कहा तो मैंने कहा.
"क्यों न बोलै करू दीदी.? आखिर मेरे इस बारे में बोलने से क्या हो जायेगा.? पांच साल पहले भी आपने मुझे रोक दिया था और कसम दे दी थी मगर काम से काम मुझे ये तो बता दीजिये की मुझे बोलने से मन क्यों करती हैं आप.?" मैंने ये कहा तो दीदी ने मेरी तरफ देखा फिर बोली.
"कुछ सवालों के जवाब नहीं होते विक्की. तू मुझे किसी बात के लिए मजबूर मत कर बस." दीदी ने ऐसा कहा तो मैंने कहा.
"मैं आपको मजबूर करने के बारे में सोच भी नहीं सकता दीदी. मैं तो बस ये चाहता हु की मेरी दीदी मुझसे पहले की तरह बोले और मेरे सामने रहे. मुझे आज तक समझ नहीं आया की मैंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया था जिसकी वजह से आपने मुझसे इतनी बड़ी दूरी बना ली और मुझसे बात तक करना बंद कर दिया था.?" मैंने मायूसी से ये सब कहा तो दीदी ने कहा.
"तूने कोई गुनाह नहीं मेरे भाई और मैं ये भी जानती हु की तू मेरे साथ कोई गुनाह करने का सोच भी नहीं सकता. मगर कभी कभी ऐसा भी होता है विक्की की गुनाह न करने से भी गुनाह हो जाता है. मैंने तुझसे दूरी बना ली इसकी वजह वही गुनाह है जो हुआ hi नहीं है. खेर छोड़ ये सब और ये बता की हम इस गांव से कब चलेंगे शहर.?" दीदी ने बात को बदलते हुए ये पूछा तो मैंने कुछ देर तक उन्हें देखा फिर कहा.
"बस एक दो दिन में निकल लेंगे यहाँ से." मैंने बताया तो दीदी ने कहा.
"क्या शहर में हम सब के रहले के लिए तूने कोई इंतजाम किया है.?" दीदी ने ये पूछ तो मैंने उन्हें बताया की मैंने एक घर खरीद लिया है. हम सब आराम से उसी घर में रहेंगे. मेरी ये बात सुन कर दीदी के चेहरे पर थोड़ा राहत दिखी. उसके बाद कुछ देर और हम दोनों के बीच ऐसी hi बाते हुयी फिर मैं अपने कमरे में चला आया.
कुसुम दीदी ने आज फिर उस बात को दबा दिया था. मैं जनता तो सब कुछ था की ऐसा क्यों कर रही थी वो मगर मैं उनके मुख से साफ़ साफ़ sun'na चाहता था. खेर देखते हैं ऐसा वो कब तक करेगी. कभी तो ऐसा वक्त आएगा जब उनका साबरा टूट जायेगा और उन्हें खुद मुझसे चीख चीख के सब कुछ कहना पड़ेगा.
भाई लोग....
आज के लिए इतना hi....
रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....
कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
:थैंक्यू:
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मैंने बड़ी मुश्किल से थोड़ा बहुत खाया और रचना की माँ से इजाज़त ले कर घर आ गया. अपने कमरे में बीएड पर पड़ा मैं रचना के बारे में सोचने लगा. क्या गुनाह किया था उस मासूम ने जो पिछले पांच सालो से मेरी चाहत की आस में खुद को तड़पा रही थी. क्या चाहती है वो मुझसे.? मैं तो अपनी माँ बहनो को ले कर यहाँ से दिल्ली चला जाउगा मगर उसका क्या होगा.???
मैं समझ नहीं प् रहा था की इस बारे में मुझे क्या करना चाहिए. अगर मैं रचना को यु hi छोड़ कर चला गया तो मैं जनता हु की वो साडी ज़िन्दगी यु hi मेरी चाहत में गुज़ार देगी. एक ऐसी चाहत में जो कभी उसे मिल hi नहीं sakti...main कभी उसका हो hi नहीं सकता. मुझे रचना के लिए ये सब सोच कर बहुत दुःख हुआ मगर मैं उसके लिए क्या कर सकता था.? उसने तो मुझसे कहा भी नहीं की मैं उसके लिए कुछ करू. शायद उसे अहसास था की अपने दिल से वो मेरे प्रति ये मोहब्बत नहीं मिटा सकती मगर खुद को पत्थर कर के उसने अपनी ख्वाहिशो का hi खून कर दिया था.
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अपने कमरे में बीएड पर पड़ा मैं रचना के बारे में जाने कब तक सोचता रहा. किस्मत भी बड़ी अजीब चीज़ होती है. किसी को चाह कर भी कुछ नहीं मिलता और किसी को बिना चाहे बहुत कुछ मिल जाता है. रचना ने जो चाहा उसे वो तो नहीं मिलने वाला था मगर जो नहीं चाहा था वो ज़रूर मिल गया tha...yaani ज़िन्दगी भर का दुःख.
मैं इस बात को सोच कर दुखी हो रहा था की मैंने रचना पर हमेशा शक किया था जबकि वो तो गंगा की तरह पवित्र थी और निर्दोष भी. ऐसा होता है की हम किसी को पहले समझ नहीं पते और जब समझ लेते हैं तब बहुत देर हो चुकी होती है. अब अगर मैं रचना को समझ भी गया तो क्या फर्क पद गया इससे.? उसको तो ज़िन्दगी भर के लिए मोहब्बत का गम मिल hi गया. किसी की यादो के सहारे साडी ज़िन्दगी गुज़ार लेना इतना भी आसान नहीं होता मगर शायद रचना में वो साहस और हिम्मत थी. उसने एक बार भी मुझसे ये नहीं कहा की उसे मुझसे कुछ चाहिए. बल्कि उसने तो खुद hi मुझसे ये कह दिया था की उसे पता था की उसका बाप उस घर में अपनी बेटी का ब्याह नहीं करेगा जिस घर में गांव का ब्राह्मण समाज पानी तक नहीं पीटा.
आज रचना का कद मेरी नज़र में बहुत बड़ा हो गया था. ज़िन्दगी ने उसके साथ कितना बड़ा छल कर दिया था. मेरी आँखों के सामने बार बार उसका हुलिया फ़्लैश हो जाता था. कितनी बदल गयी थी वो. पांच साल पहले आसमान से उत्तरी हुयी कोई पारी लगती थी वो मगर आज पारी जैसी कोई बात नहीं रह गयी थी उसमे. अपने आप पर ध्यान देना hi बंद कर दिया था उसने. उसे रूप श्रृंगार से जैसे कोई मतलब hi नहीं रह गया था. मेरा मन उसके बारे में सोच सोच कर बुरी तरह से भरी हो गया.
अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी मेरे कमरे का दरवाजा खुला और कुसुम दीदी कमरे में आ गयी. मुझे यहाँ आये हुए आज बीस दिन हो गए थे मगर इतने दिनों में आज ये पहली बार ऐसा हुआ था जब दीदी मेरे कमरे में आयी थी. सब के सामने वो मुझसे नार्मल hi बात करती थी मगर अकेले में मिलने का कोई अवसर hi न आया था. दूसरी बात ये भी थी की हमारे बीच तो पहले hi हर बात का करार हो गया था. इस लिए मिलने मिलाने का शायद सवाल hi नहीं था.
कुसुम दीदी मेरे कमरे में आयी तो मैं बीएड पर उठ कर बैठ गया. कुसुम दीदी के चेहरे को देख के ऐसा लग रहा था जैसे उनके मन में कुछ था. कमरे में आते hi उन्होंने दरवाजा बंद किया और फिर बीएड की तरफ आ कर बीएड के किनारे पर बैठ गयी. मैं उन्हें hi देखे जा रहा था. मेरा दिल जाने क्यों एकदम से ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे दीदी आज मुझसे कुछ कहने आयी हैं.
"क्या बात hai...aaj आप मेरे कमरे में.?" मैंने उनकी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए ये कहा तो दीदी ने मेरी तरफ देखा. उनकी आँखों में एकदम से आँशु भर आये.
"क्या मैं तेरे कमरे में नहीं आ सकती.?" दीदी ने दुखी हो के ये कहा तो मैंने कहा.
"ारी ये मैंने कब कहा की आप मेरे कमरे में नहीं आ सकती.? बेशक आप मेरे कमरे में आ सकती हैं. मुझे तो आपके आने से ख़ुशी hi हुयी है. खेर chhodiye...ye बताइये की अपने भाई के कमरे में आने में इतनी देर कैसे लगा दी आपने.?" मैंने ये कहा तो दीदी की जो आँखे भर आयी थी वो छलक पड़ी. ये देख कर मैं तड़प तो उठा मगर जाने क्यों इस बारे में मैं उनसे कुछ कह न सका.
"क्या लगता है तुझे.? मेरे सीने में दिल नहीं है.? मेरे अंदर कोई जज़्बात नहीं हैं.?" दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.
"कमाल hai....mujhe लगा की जो इंसान बेदर्दी से अपने जज़्बातो को कुचल चूका हो उसके अंदर अब कोई जज़्बात कहा रह गया होगा.?" मैंने ये कहा तो दीदी मुझे देखती रह गयी.
"क्या कहना चाहता है तू विक्की.? साफ़ साफ़ कह दे जो भी कहना हो तुझे. इस तरह तना मारने की कोई ज़रूरत नहीं है.?" दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.
"ारी मैं तो मज़ाक कर रहा था दीदी. आप बताइये मेरे पास किस लिए आयी thi...koi काम था क्या मुझसे.?" मैंने ये कहा तो दीदी फिर मुझे देखती रह गयी.
"मुझे तुझसे ये उम्मीद नहीं थी विक्की की तू शहर में रह कर इतना बदल जायेगा." दीदी ने अपने आप को सम्हालते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"ये हर इंसान की प्रॉब्लम है दीदी. हर इंसान को सामने वाले से ऐसी hi कोई उम्मीद नहीं hoti...mujhe आज तक समझ नहीं आया की इंसान किसी की उम्मीदों पर खरा क्यों नहीं उतरता.? क्यों हर इंसान को इस बात की शिकायत हो जाती है.?" मैंने ये सब कहा तो दीदी ने कहा.
"बहुत बड़ी बड़ी बाते सीख गया है तू. खेर अच्छी बात है ye...main तो तेरा हाल चाल पूछने आयी थी. मुझे नहीं पता था की मेरा भाई मुझे ताने मरेगा इस तरह." दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.
"अगर आपको मेरी बातो से चोट पहुंची है तो मैं आपसे हाथ जोड़ के माफ़ी मांगता हु दीदी. वैसे आप तो जानती हैं की मैं आपको चोट पहुंचने के बारे में सोच भी नहीं सकता. अगर भगवन मेरे सामने आ कर मुझसे कहे की मांग मुझसे जो भी तुझे मांगना हो तो मैं उससे बस यही मांगूगा की मुझे मेरी दीदी के सरे दुःख दे दो और उनकी झोली में साडी दुनिया की खुशिया भर दो." मैंने ये कहा तो दीदी की आँखे एक बार फिर से छलक पड़ी. मैंने देखा की उन्होंने अपने आपको बड़ी मुश्किल से सम्हाला फिर बोली.
"अच्छा मैं तेरे लिए चाय बना के भिजवाती हु पूजा से." दीदी ने ये कहा और मेरा कोई जवाब सुने बिना hi उठ कर कमरे से चली गयी. उनके जाने के बाद मैं मुस्कुराया और बीएड पर लेट गया. मैं जानता था की दीदी ये बोल कर क्यों चली गयी थी. मेरी बातो ने उनके अंदर तूफ़ान खड़ा कर दिया था. जिसे वो मेरे सामने सम्हाल नहीं सकती थी. मैं ये भी जनता था की अब वो अकेले में मेरी बातो को याद कर कर के रोयेगी.
थोड़ी देर में प्रिय पूजा मेरे कमरे में चाय ले कर आयी और मेरे पास hi बैठ गयी. पांच सालो में ये दोनों भी काफी बदल गयी थी. पहले ये दोनों चुलबुली नटखट हुआ करती थी मगर अब दोनों में गंभीरता आ गयी थी. दोनों भरपूर जवान दिख रही थी. वक्त और हालात सबको बदल देते हैं.
पिता जी की मौत के बाद हम सब दुखी थे मगर अब धीरे धीरे सब नार्मल होने लगा था. मैं जब भी कमरे में होता तो मेरी दोनों जुड़वाँ बहने मेरे पास आ जाती थी और मुझसे ढेर साड़ी बाते करती रहती थी. दोनों ने मुझसे मेरे पांच सालो के बीच के सारे किस्से जान लिए थे. मैंने उन्हें ये नहीं बताया था की मेरे दक्षिणा से कैसे रिलेशन्स हैं. मैंने सिर्फ यही बताया की मैं वह पर नौकरी करता हु. मैंने उन्हें ये भी बताया की मैंने एक घर भी ख़रीदा हुआ है.
दोनों में एक बात अभी भी वैसी hi थी और वो ये की रात में दोनों मेरे कमरे में hi सोने आ जाती थी. दो दिन बाद मुझे डालर का फ़ोन आया. उसने बताया की एक नया खरीदार मिला है और वो मेरी ज़मीने देखना चाहता है तो मैंने डालर से कहा की वो उसे यहाँ ले आये. डालर ने मुझसे हाँ कहा और मैंने कॉल कट कर दी. उसके बाद मैंने पटवारी की बीवी यानी गायत्री जी को फ़ोन लगाया और उन्हें भी बताया तो उन्होंने कहा की वो अपने बेटे के साथ आ जाएगी.
गायत्री देवी बहुत hi भली और नेक दिल औरत थी. हमारी कोई इतनी ज़्यादा जान पहचान नहीं थी मगर फिर भी वो मेरी बिना कोई स्वार्थ के मदद कर रही थी. ऐसे लोग दुनिया में बहुत काम hi मिलते हैं. दो घंटे बाद डालर उस खरीदार को ले कर मेरे घर पर आ गया. उसके थोड़ी देर बाद गायत्री जी भी आ गयी अपने बेटे के साथ. उनका बीटा मेरी hi आगे का था.
इन लोगो के आने पर मैंने उनका अच्छे से स्वागत सत्कार किया और फिर सबको ले के खेतो की तरफ चल दिया. आधे घंटे बाद हम खेत पहुंचे. मैंने उन सबको अपनी साड़ी ज़मीने दिखाई. मेरी ज़मीनो में एक तरफ ामो का बाग़ भी हो गए थे. ामो के बहुत सरे पेड़ लगे हुए थे. मगर वो ज़्यादा बड़े नहीं थे. खरीदार ने मेरी साड़ी ज़मीनो को अच्छे से देखा. ज़मीनो के पीछे से hi बड़ी सी नहर गुज़र रही थी.
मैंने देखा की खरीदार मेरी ज़मीने देख कर बड़ा खुश दिख रहा था. गायत्री देवी भी सब देख रही थी. सब कुछ देखने के बाद हम सब वापस घर आ गए. घर में आने के बाद ज़मीनो के सौदे की बात चीत हुयी. मैंने सारे कागजात भी दिखाए उस खरीदार को.
बहुत सोच विचार के बाद उस खरीदार ने कहा की वो साडी ज़मीन नहीं ले पायेगा. वो आधी ज़मीन ले सकता है और उसका तत्काल भुगतान भी कर सकता है. उसकी ये बात सुन कर मैंने कहा की आधी ज़मीन बेचने का तो कोई सवाल hi नहीं है. ज़मीन बिकेगी तो साडी hi वर्ण नहीं. मेरी बात सुन कर डालर ने कहा की एक काम हो सकता है और वो ये की आधी ज़मीन पुरसोत्तम जी ले लेंगे और आधी वो जिनके साथ पहले सौदा हुआ था.
मैं इसके लिए राज़ी तो हुआ मगर दिक्कत ये थी की पहले वाला खरीदार साडी ज़मीन के पांच करोड़ बोल रहा था. पुरसोत्तम नया खरीदार tha...isne कुछ सोचते हुए कहा की दो दिन का वक्त उसे चाहिए. वो साडी ज़मीन ले लेगा. उसकी इस बात से मैंने कहा की ठीक है. फिर दाम की बात हुयी तो उसने साडी ज़मीन का दाम नौ करोड़ रुपये बोलै. उसकी ये बात सुन कर गायत्री देवी ने कहा की नौ करोड़ क्या होता है आप पूरा दस करोड़ में बात ख़तम कीजिये.
काफी देर तक इस बारे में बात होती रही और आखिर फिर वो खरीदार दस करोड़ देने को राज़ी हुआ मगर उसने कहा की दस करोड़ में उसे ये घर भी चाहिए. उसकी इस बात से गायत्री देवी ने मुझे चुपके से इशारा किया की मैं हाँ कह दू. फिर क्या था.. बात पक्की हो गयी. पुरसोत्तम जी ने दो दिन का वक्त मांगा और डालर के साथ चला गया. गायत्री जी को मैंने और माँ ने रोकने की बहुत कोशिश की मगर वो न रुकी. उन्होंने कहा की वो दो दिन बाद फिर आ जाएगी.
ऐसे hi दो दिन गुज़र गए. मैंने गांव में भनक भी नहीं लगने दी थी किसी को की मैं अपनी ज़मीने और घर बेच रहा हु. दो दिन बाद मैं शहर गया. वह पटवारी के घर में hi हम सब मिले और वही पर ज़मीनो का सौदा हुआ. पटवारी ने कागजी कार्यवाही का जिम्मा अपने ऊपर लिया. दस करोड़ की रकम पुरसोत्तम ने मेरे बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दी.
कागजी काम में कुछ दिन का वक्त लग्न था जिसके लिए मैं रुक गया था. खरीदार के जाने के बाद मैंने पटवारी से उस ज़मीन को भी बेचने की बात की जिसे मणि शंकर ने कब्ज़ा किया हुआ था. मेरी बात सुन कर पटवारी ने हस्ते हुए मुझसे कहा की चिंता मत करो बेटे. मणि शंकर को तो ऐसा झटका दूँगा की वो सात जन्मो तक याद रखेगा. मैंने पूछा वो कैसे तो पटवारी ने कहा की उस ज़मीन को वो खुद खरीदेगा.
हमारे गांव से सात कम दूर दूसरा गांव था जहा पर वो ज़मीन थी और जिसमे मणि शंकर ने ज़बरदस्ती कब्ज़ा किया हुआ था. वो ज़मीन पांच एकड़ के आस पास थी. वो ज़मीन अब उपजाऊ हो गयी थी वर्ण पहले बंजर hi पड़ी थी. सींच का उसमे कोई साधन नहीं था. गायत्री जी ने खुद hi कह दिया की वैसे तो उस ज़मीन में कोई ख़ास बात नहीं है मगर वो सिर्फ मेरी वजह से उस ज़मीन के अच्छे दाम दे सकती है.
गायत्री जी ने उस ज़मीन को उसकी औकात से ज़्यादा दाम दिया मुझे. दस लाख ज़मीन के और दो लाख अपनी तरफ से मेरे लिए. मैंने भी सोचा चलो कोई बात नहीं. गेयटी देवी ने और उसके पति ने बताया था की मुझे मेरी गांव वाली ज़मीनो के दुगुने दाम मिले हैं. ये सौदा किसी भी तरह से घाटे का नहीं है.
ऐसे hi एक हप्ते और गुज़र गए. सब कुछ बेच दिया गया था. दक्षिणा ने मुझे फ़ोन पर बताया की उसने एक अच्छा सा घर देख लिया है. मैंने घर की कीमत पूछी तो उसने बात को ताल दिया. मैं समझ गया की वो मुझे उसकी कीमत नहीं बताना चाहती मगर मैं उसके ऊपर बोझ नहीं ban'na चाहता था और न hi उसका इतना बड़ा अहसान लेना चाहता था. मेरे ज़ोर देने पर उसने बताया की वो घर पांच करोड़ की कीमत का है
घर की कीमत सुन कर मेरे पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी. मैंने दक्षिणा से साफ़ कह दिया की मुझे इतनी महगी कीमत का घर नहीं चाहिए. मैं कोई राजा महाराजा नहीं हु जो महल में रहुगा. मुझे अपनी हैसियत के हिसाब से रहने के लिए एक ऐसा घर चाहिए जिसमे मैं और मेरी माँ बहने आराम से और ख़ुशी से रह सके.
पहले तो दक्षिणा न मानी मगर जब मैंने नाराज़गी के साथ कहा तो उसने मुझसे नाराज़ हो के पूछा की कितनी कीमत का घर मुझे चाहिए तो मैंने बता दिया की एक दो करोड़ से ऊपर का नहीं होना चाहिए. मेरी ये बात सुन कर दक्षिणा ने ok कहा और फ़ोन रख दिया.
शाम को मैं अपने कमरे में लेता हुआ था की तभी मेरे कमरे में माँ आयी और मेरे पास बीएड पर बैठ गयी. वो मुझसे ज़मीनो और घर के बारे में पूछने लगी तो मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया. ये भी की अब हम जल्द hi यहाँ से चले जायेगे और दिल्ली में रहेंगे. माँ मेरी इस बात से और तो ज़्यादा कुछ नहीं बोली बस यही कहा की हमने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा था मगर इसके बाद भी इस गांव के ब्राह्मण समाज ने हमारा कभी भला नहीं होने दिया. पता नहीं मेरी बेटियों से हम से क्या दुश्मनी थी उनकी.?
कुछ देर इसी बारे में माँ मुझसे बात करती रही फिर उन्होंने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए कुछ सोचने लगी. मुझे समझ न आया की वो क्या सोच रही हैं. तो मैंने उनसे पूछ hi लिया. मेरे पूछने पर उन्होंने कहा.
"रचना से तेरा क्या रिश्ता था जो तू उसके साथ पांच साल पहले शहर में घूमा करता था.?" माँ ने मुझसे ये पूछा तो मैं एकदम से कुछ बोल न सका. मेरी आँखों के सामने फिर से रचना का चेहरा घूमने लगा. मुझे कुछ न बोलता देख माँ ने फिर कहा.
"देख मुझे इतना पता है की मेरा बीटा किसी की लड़की के साथ कुछ भी गलत नहीं करेगा. मुझे ये भी भरोसा है की उस कमीने सरपंच की लड़की ने hi तुझे अपने रूप जाल में फसाया होगा. खेर तू मुझे सच सच बता हकीकत क्या है.?" माँ ने ये सब कहते हुए पूछा तो मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया. बस ये नहीं बताया की हमारे बीच चूमा छाती भी होती थी. मेरी बाते सुनने के बाद माँ चुप चाप मुझे देख के कुछ सोचती रही.
"क्या यहाँ आने के बाद तू उससे मिला है अभी.?" माँ ने पूछा तो मैं फिर कुछ न बोल सका तो माँ शायद समझ गयी फिर बोली.
"मतलब तू उससे मिला है. क्या ज़रूरत थी तुझे उससे मिलने की.?" माँ ने इस बार नाराज़गी से ये कहा तो मैंने कहा.
"मैं उससे मिलने नहीं गया था माँ. वो तो सरपंच काका ने कहा था घर आ के हिसाब किताब देख लेना की कितना पैसा पिता जी ने उससे उधार लिया था. इस लिए मैं उसके घर गया था. जब मैं उसके घर गया तो सरपंच था hi नहीं घर में. काकी ने बताया की वो रुपेश के साथ किसी काम से बाहर गया है. काकी के बताने से मैं उसके घर से वापस hi आने वाला था की काकी ने मुझे रोक लिया और मेरा हाल चाल पूछने लगी. फिर मुझे चाय नास्ता करने को कहने लगी तो मैंने मन कर दिया. मगर काकी न मानी और मुझे बैठक में बैठा कर चाय नास्ता लेने अंदर चली गयी. मुझे रचना के बारे में कुछ पता नहीं था की अब वो कैसी है और कहा है. हाँ मैं ये समझ रहा था की अब उसकी शादी हो चुकी होगी मगर मैं गलत समझ रहा था. जब काकी अंदर चली गयी तभी रचना किसी काम से शायद बाहर बैठक में आयी थी मगर जब उसने बैठक में मुझे बैठे देखा तो मुझे देख कर हैरान रह गयी. उसे ये तो पता चल गया था की मैं वापस आ गया हु मगर शायद उसे ये उम्मीद नहीं थी की मैं उसके घर में उस वक्त उसे मिल जाउगा. उसके बाद उसने मुझसे मेरा हाल चाल पूछा और मैंने भी. उसका हुलिया देख कर मैं हैरान था. उसने खुद hi बताया की उसका वैसा हुलिया कैसे बन गया है.?" मैंने ये सब माँ से बताया तो माँ ने बीच में मुझसे टोकते हुए पूछा.
"क्या बताया उसने?" माँ ने बड़े ध्यान से मेरी तरफ देखते हुए ये पूछा तो मैंने उन्हें रचना की साड़ी बात बता दी. साडी बात जानने के बाद माँ हैरान रह गयी.
"तो ये वजह थी की उसने अब तक शादी नहीं की अपनी.? उसके घर वाले उसकी शादी के लिए बहुत परेशां थे. गांव में भी ये बात सब जानते हैं की सरपंच की बेटी शादी नहीं करना चाहती मगर वो क्यों शादी नहीं करना चाहती ये आज तक किसी को पता नहीं चल सका. हमें तेरे और उसके बारे में उतना hi पता था इस लिए हम यही सोचते थे की शायद वो तुम्हारी वजह से शादी नहीं कर रही है. अभी जब तूने ये सब बताया तब साड़ी बात समझ आयी." माँ ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैं कुछ न बोलै.
"मैं समझती थी की सरपंच के घर परिवार में सिर्फ उसकी बीवी hi अच्छी इंसान थी मगर अब पता चला की उसकी बेटी रचना भी एक नेक दिल लड़की थी. उसने तेरे जाने के बाद इस बात को किसी से नहीं कहा वर्ण अगर उसने अपने घर में किसी से इस बारे में बता दिया होता तो शायद सरपंच हम सबको ज़िंदा hi ज़मीन में गाड़ देता." माँ ने सोचते हुए ये सब कहा तो मैंने कहा.
"अब से पहले मैं भी यही समझता था माँ की रचना ने मुझसे सिर्फ इसी लिए दोस्ती की थी की वो अपने भाई की मार का मुझसे किसी तरह से बदला लेना चाहती है और उसके लिए उसने मुझसे दोस्ती की. उसके अंदर क्या साजिश थी इस बारे में मुझे कुछ पता नहीं था मगर उस दिन जब उसने मुझे सब कुछ अपने बारे में बताया तो मैं भरोसा नहीं कर प् रहा था. मुझे समझ आया की कितना गलत सोचता था मैं उसके बारे में.?" मैंने ये सब कहा तो माँ ने कहा.
"मगर तूने उससे दोस्ती की hi क्यों थी.? साफ़ साफ़ मन कर देता उसे इसके लिए." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.
"मैं तो बस ये देखना चाहता था की वो दोस्ती की आड़ में मेरे साथ क्या करना चाहती है.? इस लिए उसकी दोस्ती को कबूल किया था. मगर अब जनता हु की उसके अंदर तो कभी कोई बदला लेने वाली बात थी hi नहीं. वो तो सच में मुझसे दोस्ती hi करना चाहती थी. क्यों की उसकी नज़र में मैं इस गांव में सबसे अच्छा लड़का था." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.
"बाप भाई के बुरे कर्मो की सजा बेटी भोग रही है. जब तू यहाँ से चला गया था तो मैं भी अपने सामने उसे हमेशा बुरा भला hi कहती थी. शायद मेरी बद्दुआ लग गयी उस मासूम को." माँ ने ये कहा तो मैं हैरानी से उन्हें देखने लगा.
"चल तू आराम kar....main भी खाना बनाने जा रही हु." माँ ने ये कहा तो मैंने हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद माँ नीचे चली गयी. उनके जाने के बाद मैं फिर से रचना के बारे में सोचने लगा.
रचना के बारे में सोचने से पता नहीं क्यों मुझे उसके लिए बहुत बुरा लग रहा था. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं रचना के लिए क्या करू. उसने मेरी चाहत में खुद को ऐसा बना लिया था. उसके बारे में सोचते सोचते अचानक hi मुझे दीदी का ख़याल आया. मैं अपने मन में रचना की तुलना दीदी से करने लगा. मेरी दीदी भी तो मुझसे बहुत प्यार करती हैं. ऐसा मुझे लगता था जबकि उन्होंने कभी भी इस बात को मुझसे कहा नहीं था मगर जब हमारे दिल एक दूसरे से इतने गहरे जुड़े होते हैं तो हमारे दिल एक दूसरे का हाल महसूस कर hi लेते हैं.
कुसुम दीदी अंदर hi अंदर खुद को सजा देती थी और यही हाल रचना का भी हो गया था. उसने उस दिन मुझसे अपने दिल का हाल बता तो दिया मगर मुझसे ये नहीं कहा की उसे अपनी मोहब्बत का कोई खूबसूरत सिला चाहिए. उसके मन में बस यही बात बैठी हुयी थी की उसका मिलान या उसका ब्याह मुझसे नहीं हो सकता क्यों की उसका बाप एक ऐसे घर में अपनी बेटी का ब्याह नहीं करेगा जिसके यहाँ ब्राह्मण समाज पानी भी नहीं पिता. ये सब सोच कर उसने हालातो से समझौता कर लिया था. वो अब सिर्फ मेरी यादो के सहारे साडी ज़िन्दगी गुज़ार देने के फैसले पर कायम थी.
रात में खाना पीना करके मैं वापस अपने कमरे में आ गया था. कुसुम दीदी से उसके बाद मेरी कोई बात नहीं हुयी. मैं जनता था वो मुझसे नाराज़ हैं. मगर मैं उनकी नाराज़गी पर अभी कुछ करने की हालत में नहीं था. माँ और दीदी के सो जाने के बाद प्रिय पूजा मेरे कमरे में आ गयी. आते hi वो दोनों मेरे अगल बगल लेट गयी.
"एक बात बताओ भाई तुम बैग में क्या ले कर आये थे.? हमने तो अभी तक उन्हें खोल कर देखा hi नहीं. क्या उसमे हमारे लिए कुछ है.?" पूजा ने मुझसे ये पूछा तो मुझे भी याद आया की मैं दिल्ली से जब आया था तो मेरे हाथ में दो बड़े बड़े बैग थे. पिता जी की मौत के बाद कभी उन बैग्स का ध्यान hi नहीं आया था.
"अब ये तो तुम्हे उनके खुलने पर hi पता चलेगा." मैंने ऐसा इस लिए कहा क्यों की मुझे भी नहीं पता था की उनमे क्या है अंदर. क्यों की दोनों बैग दक्षिणा ने पैक किये थे. मैं तो बस उन्हें ले कर यहाँ आ गया था.
"फिर तो हम अभी उन्हें खोल कर देखेंगे भाई की उनमे हमारे लिए क्या है." पूजा ने इस बार मुस्कुराते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"हाँ पूजा सही कहा तूने. चल खोल कर देखते हैं. मुझे पूरा भरोसा है की भाई हमारे लिए कुछ न कुछ लाया hi होगा." प्रिय ने ये कहा तो पूजा जल्दी से उठ कर बीएड से नीचे आ गयी.
मैं दोनों की तरफ hi देख रहा था. वो दोनों कमरे में इधर उधर देखने लगी. मगर वो दोनों बैग उन्हें कमरे में कही न दिखे. तब दोनों ने मुझसे बैग के बारे में पूछा तो मैंने कहा की मुझे पता नहीं है की वो कहा रखे हैं. मेरी ये बात सुन कर दोनों के चेहरे लटक गए. फिर जैसे उन्हें कुछ याद आया तो प्रिय ने कहा.
"भाई उस दिन हम दोनों hi तो तुम्हारे हाथ से बैग ले कर बाहर से अंदर आये थे. मुझे लगता है माँ के कमरे में होंगे वो बैग." प्रिय ने ये कहा तो पूजा ने कहा.
"माँ के कमरे में अगर होंगे तो इस वक्त हम उनके कमरे में कैसे जायेगे.? वो सो रही होंगी." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.
"चलो chhodo...kal सुबह उन्हें देख लेना. अभी आराम से सो जाओ." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.
"न bhai...ham तो अभी देखेंगे. कल सुबह तक हम इंतज़ार नहीं कर सकते अब. चल प्रिय माँ के कमरे में चलते हैं." पूजा ने ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"माँ अगर डाँटेगी तो वो भी सह लगे मगर वो दोनों बैग ले कर सीधा यही आएंगे चल अब." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.
"और अगर माँ ने ये पूछा की बैग लेके कहा जा रही हो तो क्या जवाब डौगी तुम दोनों.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"बता देंगे की भाई ने मगाया है. उसमे कोई ज़रूरी चीज़ है जिसे अभी देखना चाहते हो तुम." प्रिय ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसे देखा. क्या बहाना बनाया था उसने.
मुझे हैरानी से देखता देख दोनों हसने लगी और कमरे से बाहर निकल गयी. उनके जाने के बाद मैं उन दोनों के बारे में hi सोचते हुए मुस्कुराता रहा. पता नहीं कैसे वो दोनों माँ के कमरे से वो दोनों बैग लाएगी.?
कुछ देर बाद जब वो दोनों वापस कमरे में आयी तो मैं उनके हाथो में बैग देख के हैरान रह गया. मुझे लगा था की दोनों जब सोती हुयी माँ को जगाएगी तो माँ ज़रूर उन्हें डाँटेगी और कमरे से ये कह के भगा देगी की कल देख लेना बैग. मगर ये तो बैग हाथ में ले के hi आयी थी.
दोनों मुस्कुराते हुए आयी और सबसे पहले कमरे का दरवाजा बंद किया उसके बाद मेरे पास आ कर बोली की भाई अब बैग खोलो. दोनों ने बताया की माँ अभी जाग रही थी और जब दोनों ने बैग के बारे में माँ से पूछ तो माँ ने बता दिया. तब दोनों वही पर बैग खोलने लगी थी मगर बैग खुला hi नहीं उनसे. क्यों की दोनों बैग नंबर से लॉक थे.
जब मुझे पता चला की बैग नंबर से लॉक हैं तो मैं भी हैरान रह गया. दोनों बैग दक्षिणा ने hi पैक किये थे और आते वक्त न मैंने उससे पूछा और न hi उसने बताया था नंबर लॉक के बारे में. जब दोनों ने मुझसे बैग खोलने के लिए कहा तो मैं हड़बड़ा गया की अब बैग कैसे खोलू. क्यों की मुझे भी पिन नंबर नहीं पता था. मैं उन दोनों से ये कह भी नहीं सकता था की मुझे इसका पिन पता नहीं है क्यों की उससे वो मुझसे हज़ारो सवाल करने लगती. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं अब क्या करू.?
दोनों कड़ी मुझे hi देखे जा रही थी. फिर मेरे मन में एक अड़िअ आया. मैंने दोनों से कहा की मैं बाथरूम करके आता हु. मैं बीएड से नीचे उतरा और मोबाइल ले कर नीचे बाथरूम की तरफ बढ़ गया. बाथरूम में आ कर मैंने दक्षिणा को फ़ोन लगाया. वो भी अभी जाग रही थी. मैंने उससे बैग के पिन नंबर का पूछा तो उसने मुझे पिन नंबर बता दिया. उससे और एक दो मिनट मैंने बात की और जल्दी से कमरे में आ गया.
कमरे में आ कर मैंने बैग के नंबर लॉक पर पिन डाला और दोनों बैग खोल दिए. बैग में बहुत सरे कपडे भरे थे और लेडीज लोगो के ज़रूरत का सामान भी. मैं ये सब देख कर हैरान रह गया.
प्रिय पूजा दोनों बैग में कपडे देख कर बहुत खुश हो गयी थी. दोनों बैग से सरे कपडे निकाल निकाल कर देखने लगी. उनके कपड़ो में जीन्स और तशीरतस थी. एक भी शलवार कुरता वाले कपडे नहीं थे. हमारे गांव में कोई भी लड़की जीन्स वगैरा नहीं पहनती थी. प्रिय पूजा ने जब जीन्स और टीशर्ट देखा तो बहुत खुश तो हुयी मगर फिर मायूस भी हो गयी.
"वाह भाई दिल तो खुश कर दिया तुमने ऐसे कपडे हमारे लिए ला कर मगर हम इन्हे पहन नहीं सकते. वैसे हमारा भी बहुत मन करता था ऐसे कपडे pahan'ne का मगर मज़बूरी थी की पहन नहीं सकते थे." पूजा ने ये कहा तो प्रिय बोली.
"एक तो माँ और पिता जी का दर और ऊपर से गांव वालो का. हमें पता है की शहर में लड़किया ऐसे hi कपडे पहनती हैं. मगर भाई तुम्हे तो यहाँ के बारे में पता था फिर ऐसे कपडे ले कर आने का क्या मतलब था.?" प्रिय ने ये कहा तो मैं कुछ बोल न सका. मैं खुद हैरान था की दक्षिणा ने ऐसे कपडे क्यों ख़रीदे थे.? अब मैं इन दोनों के सवालों के क्या जवाब दुगा.?
"क्या हुआ भाई चुप क्यों हो.? बताओ न की ऐसे कपडे हमारे लिए क्यों kharide..aur तो और दीदी के लिए भी ख़रीदे ऐसे hi कपडे. हम तो किसी तरह इन्हे पहन भी लगे मगर वो तो बिलकुल भी नहीं पहनेगी." प्रिय ने फिर से ये कहा तो इस बार मैंने कहा.
"अरे तो क्या हो गया देवियो.? मुझे लगा था की इन पांच सालो में यहाँ का माहौल भी कुछ न कुछ शहर की तरह हो गया होगा. इस लिए ख़रीदे थे ऐसे कपडे. अब मुझे क्या पता था की आज भी गांव में सब कुछ पहले जैसा hi है. खेर chhodo...ab हम सबको शहर तो जाना hi है इस लिए ये कपडे तुम लोग शहर में hi pahan'na." मैंने ये कहा तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा फिर पूजा बोली.
"मगर भाई ऐसा भी तो हो सकता है की माँ ये कपडे हमें शहर में भी न पहनने दे." पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"फ़िक्र मत करो. मैं सब सम्हाल लगा. अब चलो इन्हे वापस बैग में सेट करके रखो और सो जाओ." मैंने ने ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"वैसे भाई क्या हम ये कपडे अभी पहन सकते हैं.?" प्रिय ने ये कहा तो पूजा भी बोल पड़ी.
"हाँ bhai...ham एक बार इन्हे पहन कर देखना चाहते हैं की ये हम पर कैसे लगते हैं.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"अच्छा ठीक है पहन लो मगर जल्दी करो जो कुछ भी करना है." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"ठीक है bhai...magar तुम हमारी मदद करो न. वो क्या है की हमें पता hi नहीं है की किस कपडे के साथ कौन सा कपडा पहनना है.?" प्रिय ने कहा तो मैं बीएड से उतर कर नीचे आया और बैग से निकले हुए कपड़ो को ध्यान से देखने लगा.
फिर मैंने एक एक जीन्स और एक एक टीशर्ट छात कर उन दोनों को पकड़ा दिया और कहा की इन्हे पहन लो. कपडे लेने के बाद प्रिय पूजा ने कहा की अब हम इन्हे पहने कैसे तो मैंने कहा जैसे पहना जाता है और कैसे. मेरे ऐसा कहने पर दोनों हसने लगी फिर प्रिय बोली की भाई हम तुम्हारे सामने कपडे कैसे उतर कर इन्हे पहनेगे.? तब मुझे समझ आया तो मैंने कहा की मैं कमरे से बाहर चला जाता हु. जब पहन लेना तो दरवाजा अंदर से बजा देना. मेरे ऐसा कहने पर दोनों मुस्कुरायी और हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद मैं कमरे से बाहर आ गया.
करीब दस मिनट बाद दरवाजा बजा तो मैं कमरे के अंदर गया और जब मेरी नज़र उन दोनों पर पड़ी तो मैं हैरानी से देखता रह गया दोनों को. दोनों जीन्स और टीशर्ट पहने हुए थी और बहुत hi कमाल की लग रही थी. कासी हुयी जीन्स में उनकी जाँघे और टाँगे साफ़ साफ़ समझ में आ रही थी और ऊपर टीशर्ट में भी उनके सीने के उभार साफ़ नज़र आ रहे थे. मैं उन्हें आँखे फाड़े देखे जा रहा था और वो दोनों मुझे अपनी तरफ इस तरह देखते देख बुरी तरह शर्माए जा रही थी.
"भाई ऐसे आँखे फाड़े क्यों देख रहे हो हमें.? क्या ये कपडे हम पर अच्छे नहीं लग रहे.?" प्रिय ने शरमाते हुए ये कहा तो मुझे होश आया और फिर मैंने अपने आपको सम्हालते हुए बोलै.
"मुझे यकीन hi नहीं हो रहा की तुम दोनों गांव में रहने वाली आम सी लड़किया हो. ऐसा लगता है जैसे तुम दोनों शहर में hi रही हो. बस एक hi कमी है अभी." मैंने ऐसा कहा तो दोनों जल्दी से बोली की कौन सी कमी है भाई तो मैंने बताया की वो दोनों इन कपड़ो में शर्मा रही हैं यही कमी है.
मैंने कमी बताया तो दोनों मुस्कुरायी और बोली की भाई पहली बार ऐसे कपडे पहने हैं इस लिए थोड़ा अजीब लग रहा है हमें इस लिए शर्म आ रही है और दूसरी बात ये भी है की इन कपड़ो में सब कुछ साफ़ साफ़ नज़र भी आता है इस लिए भी शर्म आ रही है.
जब पूजा ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा तो उसने शर्मा के सर झुका लिया. मैंने कहा की शहरो में लोग इनसे भी छोटे छोटे कपडे पहनते हैं और वो तुम्हारी तरह शरमाते नहीं हैं. इस लिए इस शर्म को निकाल लो अभी से वर्ण शहर में कैसे चलेगा.?
"भाई अब तुम बाहर जाओ हम इन कपड़ो को उतार कर फिर से अपने कपडे पहनना चाहते हैं." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.
"एक मिनट ruko....main तुम दोनों की इन कपड़ो में एक एक फोटो खींच लेता हु मोबाइल में." मैंने ये कहा तो दोनों मुस्कुराते हुए शर्मा गयी फिर पूजा बोली.
"नहीं न bhai...photo मत खींचो अभी. अभी हमें इन कपड़ो में शर्म आ रही है इस लिए फोटो अच्छी नहीं आएगी." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.
"तुम दोनों इन कपड़ो की तरफ ध्यान hi मत दो और ये सोचो की तुम अपने hi कपडे पहने हुयी हो. तब तुम्हे शर्म नहीं आएगी." मैंने ये कहा तो दोनों ने हाँ में सर हिला दिया.
उसके बाद मैंने बीएड पर रखा अपना मोबाइल लिया और दोनों के सामने आ कर उन दोनों की फोटो लेने लगा. वो दोनों अभी भी थोड़ा शर्मा रही थी. फोटो ले के जैसे hi मैं फुर्सत हुआ तो दोनों कहने लगी की हमें भी दिखाओ की हम कैसी लग रही हैं तो मैंने दोनों को फोटो दिखाई. अपनी फोटो देख कर दोनों हैरान भी हुयी और शर्मा भी गयी. उसके बाद मैं कमरे से बाहर आ गया.
कुछ देर बाद जब दरवाजा बजा तो मैं वापस कमरे में गया तो देखा दोनों ने फिर से अपने पहले वाले कपडे पहन लिए थे. सरे कपड़ो को सेट करके बैग में रखने के बाद दोनों बैग को एक तरफ रख दिया गया. उसके बाद हम तीनो बीएड पर आ कर लेट गए.
"भाई सच सच बताओ न हम दोनों उन कपड़ो में कैसे लग रहे थे.?" पूजा ने मुझसे चिपकते हुए मुझसे ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"बहुत hi सुन्दर लग रही थी तुम दोनों. तुम दोनों को देख के मुझे ऐसा लग रहा था जैसे तुम दोनों को अपनी बाहो में उठा लू और ख़ुशी से नाचने लागु." मैंने ये कहा तो दोनों हसने लगी फिर प्रिय बोली.
"तो भाई अपनी बाहो में हमें उठाया क्यों नहीं तुमने.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"वो इस लिए नहीं उठाया क्यों की तुम दोनों का भरी वजन मैं उठा hi नहीं पता." मैंने ये कहा तो दोनों के चेहरे पर नाराज़गी उभर आयी. दोनों hi मुझसे अलग हो गयी और फिर पूजा बोली.
"हमें तुमसे कोई बात नहीं करना भाई. हम क्या तुम्हे इतने भरी नज़र आते हैं.?" पूजा ने बुरा सा मुँह बनाते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.
"हम तो फूल सी कोमल और मासूम हैं. इतनी बड़ी तौहीन आज तक न हुयी थी हमारी. जाओ अब बिलकुल भी बात नहीं करना तुमसे." प्रिय ने ये कहा तो मैं मुस्कुराया. मैंने तो दोनों को छेड़ने के लिए hi ऐसा कहा था.
"ारी मैंने तो तुम दोनों से मज़ाक में ऐसा बोलै था मेरी प्यारी प्यारी बहनो. मुझे भी पता है की मेरी ये दोनों परिया कितनी कोमल और मासूम हैं. मैं तो साडी दुनिया से ये कह सकता हु की मेरी ये दोनों बहने सबसे सुन्दर और सबसे मासूम हैं." मैंने ऐसा कहा तो दोनों जल्दी से मुस्कुराते हुए वापस मुझसे चिपक गयी. फिर पूजा बोली.
"क्या सच कह रहे हो भाई.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"क्या तुम दोनों को कोई शक है मेरी बात में.?" मैंने ये कहा तो दोनों ने न में सर हिलाया और फिर दोनों ने मेरे सीने पर अपना अपना सर रख लिया.
मैं सीधा लेता हुआ था और वो दोनों मेरे से पेट के बल चिपकी लेती हुयी थी. दोनों के सीने के उभार मुझे साफ़ साफ़ महसूस हो रहे थे. मैंने ये भी महसूस किया की दोनों के वो उभार पहले से अब बड़े थे. मेरे मन में ये गन्दा ख़याल आया तो पता नहीं एकदम से मुझे नदामत सी फील हुयी. मगर जो चीज़ मेरे जिसम में धसी हुयी फील हो रही थी उनको मैं कैसे इग्नोर करता.
ऐसे hi कुछ देर में हम तीनो सो गए. सुबह मेरी आँख खुली तो देखा दोनों मुझसे वैसे hi चिपकी सोई हुयी थी. मैंने दोनों को जगाया तो दोनों ने पहले मेरी तरफ ध्यान से देखा फिर दोनों ने झुक कर मेरे दोनों गालो पर चूमा और फिर मुस्कुराते हुए गुड मॉर्निंग कहा तो मैं भी मुस्कुरा उठा. मुझे पांच साल पहले का सब कुछ याद आया. पहले भी ये दोनों ऐसा hi करती थी. दोनों मेरी तरफ hi देख रही थी. मैं समझ गया की दोनों क्या चाहती हैं इस लिए मैंने भी मुस्कुरा कर दोनों के गाल पर बरी बरी से चूमा और गुड मॉर्निंग कहा.
उसके बाद वो दोनों ख़ुशी ख़ुशी चली गयी कमरे से. उसके बाद दिन ऐसे hi गुजरने लगा. दोपहर को खाना पीना करने के बाद मैं माँ के पास उनके कमरे में गया तो पता चला की वो घर पर नहीं हैं. प्रिय ने बताया की वो किसी काम से किसी के घर गयी हैं. माँ ने बताया नहीं था की वो किसके घर गयी हैं.
माँ के कमरे से निकलने के बाद मैं वापस अपने कमरे की तरफ जाने के लिए सीढ़ियों की बढ़ा hi था की मुझे दीदी का ख़याल आया तो मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ चला. मैं जनता था की वो उस दिन की बातो से मुझसे नाराज़ हैं.
दीदी के कमरे का दरवाजा बंद था तो मैंने दरवाजा खटखटाया. कुछ hi पालो में दीदी ने दरवाजा खोला और बाहर मुझे देख कर कुछ न बोली और वापस मुद कर कमरे में चली गयी. मैं अंदर गया और दरवाजा बंद कर दिया.
"क्या बात hai...aaj इतने दिनों बाद अपनी बड़ी बहन के कमरे में आने का कास्ट कैसे किया मेरे भाई ने.?" कुसुम दीदी ने बीएड पर बैठने के बाद मुझे देखते हुए ये कहा तो मैं मुस्कुराया और जा कर उनके बगल से बीएड पर बैठ गया.
"बहुत कोशिश की मैंने की इस तरफ न औ मगर हर बार अपनी कोशिशों में नाकाम hi हुआ. आपकी तरह शायद मैं इतना पक्का नहीं हु की अपनी बात पर कायम राहु. माँ के बाद बचपन से जिसे देखा और जाना समझा है वो आप hi थी दीदी. अगर कोई मुझसे ये पूछे की माँ पिता जी के बाद किसने मुझसे सबसे ज़्यादा प्यार किया है तो मैं यही कहुगा की मेरी कुसुम दीदी ने. और अगर कोई मुझसे ये पूछे की मैंने सबसे ज़्यादा किस्से प्यार किया है तो मैं यही कहुगा की अपनी......!" मैं ये कह hi रहा था की तभी एकदम से दीदी ने मेरे मुँह पर अपनी हथेली रख दी और मेरी बात को पूरा होने से पहले hi रोक दिया. उनकी आँखों में आँशु थे. मेरी तरफ देखते हुए इंकार में सर हिला रही थी. जैसे कह रही हो की इसके आगे मैं उनसे कुछ न कहु.
मेरे अंदर भी तूफान सा उठ खड़ा हुआ था. आँखों में मेरे भी आँशु आ गए थे. दीदी ने मेरे मुँह पर हथेली रख दिया था जिससे मैं आगे अपनी बात पूरी नहीं कर सका था. कुछ देर तक कमरे में अजीब सी ख़ामोशी रही. दीदी ने अपनी हथेली मेरे मुँह से हटा लिया था.
"तू मुझसे दुनिया जहां की सब बाते कर विक्की मगर इस बारे में कुछ न बोलै कर मुझसे." दीदी ने अपने आपको सम्हालते हुए भरी आवाज़ में ये कहा तो मैंने कहा.
"क्यों न बोलै करू दीदी.? आखिर मेरे इस बारे में बोलने से क्या हो जायेगा.? पांच साल पहले भी आपने मुझे रोक दिया था और कसम दे दी थी मगर काम से काम मुझे ये तो बता दीजिये की मुझे बोलने से मन क्यों करती हैं आप.?" मैंने ये कहा तो दीदी ने मेरी तरफ देखा फिर बोली.
"कुछ सवालों के जवाब नहीं होते विक्की. तू मुझे किसी बात के लिए मजबूर मत कर बस." दीदी ने ऐसा कहा तो मैंने कहा.
"मैं आपको मजबूर करने के बारे में सोच भी नहीं सकता दीदी. मैं तो बस ये चाहता हु की मेरी दीदी मुझसे पहले की तरह बोले और मेरे सामने रहे. मुझे आज तक समझ नहीं आया की मैंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया था जिसकी वजह से आपने मुझसे इतनी बड़ी दूरी बना ली और मुझसे बात तक करना बंद कर दिया था.?" मैंने मायूसी से ये सब कहा तो दीदी ने कहा.
"तूने कोई गुनाह नहीं मेरे भाई और मैं ये भी जानती हु की तू मेरे साथ कोई गुनाह करने का सोच भी नहीं सकता. मगर कभी कभी ऐसा भी होता है विक्की की गुनाह न करने से भी गुनाह हो जाता है. मैंने तुझसे दूरी बना ली इसकी वजह वही गुनाह है जो हुआ hi नहीं है. खेर छोड़ ये सब और ये बता की हम इस गांव से कब चलेंगे शहर.?" दीदी ने बात को बदलते हुए ये पूछा तो मैंने कुछ देर तक उन्हें देखा फिर कहा.
"बस एक दो दिन में निकल लेंगे यहाँ से." मैंने बताया तो दीदी ने कहा.
"क्या शहर में हम सब के रहले के लिए तूने कोई इंतजाम किया है.?" दीदी ने ये पूछ तो मैंने उन्हें बताया की मैंने एक घर खरीद लिया है. हम सब आराम से उसी घर में रहेंगे. मेरी ये बात सुन कर दीदी के चेहरे पर थोड़ा राहत दिखी. उसके बाद कुछ देर और हम दोनों के बीच ऐसी hi बाते हुयी फिर मैं अपने कमरे में चला आया.
कुसुम दीदी ने आज फिर उस बात को दबा दिया था. मैं जनता तो सब कुछ था की ऐसा क्यों कर रही थी वो मगर मैं उनके मुख से साफ़ साफ़ sun'na चाहता था. खेर देखते हैं ऐसा वो कब तक करेगी. कभी तो ऐसा वक्त आएगा जब उनका साबरा टूट जायेगा और उन्हें खुद मुझसे चीख चीख के सब कुछ कहना पड़ेगा.
भाई लोग....
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