SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 8 - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 31


अपने कमरे में बीएड पर लेता मैं आज के सरे दिन के बारे में सोच रहा था. रेखा चची काफी हसमुख स्वभाव की थी और मस्त मालदार औरत भी थी. उनका जिसम मस्त कैसा हुआ था. मुझे सबसे ज़्यादा उनकी बड़ी बड़ी चूचिया अच्छी लगी थी. जब वो मेरे पास hi बैठ गयी थी तो मेरी नज़र बार बार ब्लॉउज को फाड़ कर बाहर निकलने को आतुर उनकी छाहतियो पर पद जाती थी. चची ने ज़रूर महसूस किया होगा की मैं उनकी छतियो को देख लेता था.

रात काफी हो गयी मगर आज प्रिय पूजा मेरे कमरे में सोने के लिए नहीं आयी. मैं समझ गया की वो दोनों आज शाम को हुए इंसिडेंट से मेरे सामने आने से कटरा रही हैं. मैं उन दोनों से कल सुबह बात करने का सोचते हुए सो गया.

अब आगे पढ़िए....


सुबह मैं अपने टाइम पर उठा और नीचे बाथरूम में फ्रेश होने के लिए चला गया. फ्रेश हो कर वापस आया तो मेरी नज़र रसोई की तरफ गयी तो देखा वह लाइट जल रही थी. मैं समझ गया की दीदी रसोई में चाय बना रही हैं. मैं रसोई की तरफ बढ़ गया. थोड़ी hi देर में मैं रसोई के दरवाजे पर पहुंच गया. मेरे आने की आहात से दीदी ने पलट कर मेरी तरफ देखा.

"तुम यहाँ क्या कर रहे हो विक्की.?" दीदी ने ये कहा तो मुझे अजीब सा लगा. फिर मैंने कहा.

"ये कैसा सवाल है दीदी.? क्या मैं यहाँ नहीं आ सकता.?" मैंने थोड़ा दुखी हो के ये कहा तो दीदी ने कहा.

"हाँ आ सकते ho...magar." दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"फ़िक्र मत कीजिये दीदी. अगर आपको मेरे आने से किसी तरह की तकलीफ होती है तो आज के बाद अब कभी नहीं आउगा और ये मेरा वडा है आपसे. मैंने जब देखा की रसोई में आप चाय बना रही हैं तो बस चाय के लिए hi आ गया था यहाँ. मगर कोई बात नहीं." मैंने बड़ी मुश्किल से इतना कहा और पलट कर वापस चल दिया अपने कमरे की तरफ. मेरा दिल बुरी तरह दुःख गया था. मुझे रोना आने लगा था. मैंने दीदी का कोई जवाब सुने बिना hi अपने कमरे की तरफ चला आया था.

कमरे में आ कर मैं बीएड पर लेट गया. मुझे बहुत तेज़ रोना आ रहा था मगर मैं रोना नहीं चाहता था. इस लिए अपने आपको मजबूती से सम्हाला और आँखे बंद किये लेता रहा. थोड़ी hi देर में कमरे का दरवाजा खुला तो मैंने आँखे खोल कर देखा तो दीदी हाथ में ट्रे लिए दरवाजे के पास कड़ी थी. उनकी आँखों में आँशु साफ़ दिख रहे थे. वो कमरे के अंदर नहीं आयी बस दरवाजे पर hi ट्रे लिए कड़ी रही. मैं भी बीएड से नहीं उठा और फिर से अपनी आँखे बंद कर ली.

तभी मैंने दीदी के कदमो की आहात सुनी. शायद वो कमरे के अंदर आ गयी थी. मगर मैं आँखे बंद किये चुप चाप लेता रहा. तभी मेरे कानो में दीदी की आवाज़ पड़ी. वो मुझसे कह रही थी की विक्की चाय पि लो. उनके ऐसा कहने पर भी मैंने आँखे नहीं खोली और न hi कुछ बोलै. थोड़ी देर बाद मुझे दीदी के सिसकने की आवाज़ सुनाई दी तो मैंने आँखे खोल कर देखा.

कुसुम दीदी पास में hi रखे स्टूल पर बैठी सिसक रही थी. उनका सर नीचे झुका हुआ था और चाय का ट्रे कमरे के फारस पर रखा था. उन्हें इस तरह रट देख मुझे तकलीफ तो बहुत हुयी मगर मैं कुछ न बोलै बल्कि बीएड से नीचे उतरा और फारस पर रखे ट्रे से चाय का कप उठा लिया और फिर बीएड पर आ कर बैठ गया. उधर दीदी वैसी hi पोजीशन में सिसकती रही.

"मैंने तो अपनी तरफ से बहुत चाहा की आपके हर दुःख तकलीफ को अपने सीने से लगा लू और आपको दुनिया की हर ख़ुशी दू मगर आपने कभी ये चाहा hi नहीं की इन दुखो से आपको छुटकारा मिले. सच तो ये है की आप चाहती hi ये हैं की आप घुट घुट कर जिए. खेर chhodiye...jaiye didi..maine चाय का कप ले लिया है. अब jaiye...aur जो दिल करे वो कीजिये." मैंने ये सब कहा तो दीदी ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा.

दीदी का चेहरा आंशुओ से भीगा हुआ था. ये देख कर मेरी रूह तक तड़प उठी मगर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था. ये सब उन्होंने खुद चुना था तो अब ये दुःख तकलीफ तो उन्हें साहनी hi पड़ेगी.

"तुझे क्या लगता hai...main ये दुःख ये तकलीफ ख़ुशी से सह रही हु.? मेरा भी मन करता है की मैं सबकी तरह खुश राहु और सब की तरह हसी मज़ाक करू मगर ये मेरी किस्मत में है hi नहीं." दीदी ने रट हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"किस्मत को इस तरह दोष नहीं दिया जाता दीदी. किस्मत पहले से लिखी हुयी नहीं होती है बल्कि उसे बनाना पड़ता है. हम अपने कर्मो से अपना भाग्य बनाते हैं. आप चाहती hi नहीं हैं की आपका भाग्य ख़ुशी से भरा हो. बेवजह किस्मत को दोष दे रही हैं आप." मैंने ये कहा तो दीदी ने कहा.

"कहने में और करने में फर्क होता है विक्की मगर छोड़ जाने दे. तू मेरी मजबूरियों को नहीं समझेगा." दीदी ने ये कहा और स्टूल से उठ कर कड़ी हो गयी. फर्श पर रखा ट्रे भी उठा लिया था उन्होंने.

"आप जिन मजबूरियों की बात कर रही हैं न दीदी उन मजबूरियों को मैं बहुत पहले समझ चूका था और ये भी जनता हु की उन बजबूरियो को साथ में ले के चलने का कोई मतलब नहीं है और न hi उससे किसी का भला होगा. ज़िन्दगी में खुश रहना है तो वही करो जो दिल कहे." मैंने ये कहा तो दीदी ने कहा.

"मैंने कहा न की कहने और करने में बहुत फर्क होता है. खेर chhod...tu खुश रह यही मेरी कामना है बस." दीदी ने ये कहा और कमरे से बाहर चली गयी.

मैं सब समझ रहा था. वो अपने आप से भाग रही थी. वो हकीकत से भाग रही थी और हकीकत से दर भी रही थी. उनके जाने के बाद मैं काफी देर तक उनके बारे में सोचता रहा. उस वक्त मेरा मन दुखी हुआ था जिसकी वजह से मैंने उनसे वडा कर लिया था मगर अब लग रहा था की मुझे वडा नहीं करना चाहिए था. मगर अब तो कुछ नहीं हो सकता था. मैंने भी फ्यूचर पर छोड़ दिया सब कुछ.

जब सुबह के 6 बजे तो मैं उठा और प्रिय पूजा के कमरे की तरफ बढ़ गया. उनके कमरे के दरवाजे को मैंने हलके से अंदर की तरफ धकेला तो वो खुल गया. वैसे मुझे इस तरह उनके कमरे में बिना आवाज़ लगाए जाना तो नहीं चाहिए था क्यों की वो जाने किस हालत में पड़ी सो रही हो. मगर मुझे ये भी पता था की वो उस हालत में तो नहीं सो रही होंगी जिस हालत में कल शाम को मैंने उन्हें देखा था.

कमरे के अंदर आया तो देखा दोनों गहरी नींद में सोई हुयी थी. दोनों एक दूसरे की तरफ पीठ किये लेती होती थी और दोनों ने पुरे कपडे पहने हुए थे. मैं बीएड के पास पंहुचा और दोनों को ध्यान से देखा. दोनों hi सोते हुए छोटी बच्ची की तरह मासूम लग रही थी. मुझे दोनों पर बहुत ज़्यादा प्यार आया तो मैं बीएड के किनारे पर बैठ गया. प्रिय इस तरफ hi थी जिस तरफ मैं बैठा था जबकि पूजा उसके दूसरी तरफ थी. मैंने झुक कर प्रिय के कोमल गाल पर हलके से चूमा और फिर उठ कर मैं घूमते हुए पूजा की तरफ गया और उसके गाल पर भी चूमा. उसके बाद मैंने थोड़ा ुचि आवाज़ में गुड मॉर्निंग माय एंगेल्स कहा तो दोनों hi थोड़ा हिली मगर उनकी नींद न टूटी.

मैं दोनों को देख रहा था और तभी मेरी आँखों के सामने कल शाम वाला वो मंज़र घूम गया. उफ्फ्फ्फ़ एक पल में मेरा दिमाग खराब हो गया. मैंने अपने दिमाग को ज़ोर से झटक दिया और इस बार मैंने दोनों को हिलाते हुए उन्हें जगाने की कोशिश की तो थोड़ी hi देर में दोनों अंगड़ाई लेते हुए जाग गयी. मगर जैसे hi दोनों ने मुझे देखा तो दोनों की हालत अजीब सी हो गयी. शायद तभी उन्हें याद आ गया था की कल शाम मैंने दोनों को नंगी हालत में देख लिया था. ये याद आते hi दोनों बुरी तरह शरमाते हुए सिकुड़ गयी. मैं समझ गया की ये दोनों अभी नार्मल नहीं हो सकती मगर मुझे दोनों को नार्मल करना था.

"क्या hua....meri दोनों परिया इस तरह सिकुड़ क्यों गयी.? चलो utho....maine तो तुम दोनों को गुड मॉर्निंग भी किया और तुम दोनों के गालो पर किश भी किया और अब तुम दोनों भी गुड मॉर्निंग करो. उसके बाद मुझे गरमा गरम अपने हाथ की बानी चाय भी पिलाओ." मैंने ये सब कहा तो दोनों ने एक दूसरे को देखा. उनके चेहरे पर देख कर ऐसा लगा जैसे वो अपने आपको नार्मल करने की कोशिश कर रही हैं.

"और हाँ ये बताओ की कल रात तुम दोनों मेरे कमरे में आयी क्यों नहीं.? कितना इंतज़ार किया मैंने तुम दोनों ka...fir पता नहीं कब मैं सो गया था. खेर छोडो और जल्दी से गुड मॉर्निंग करो." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दोनों के चहरो पर चमक आयी और फिर दोनों थोड़ा सा मुस्कुरायी.

मैं चाहता था की दोनों नार्मल हो जाये और उनके दिमाग से कल शाम वाला किस्सा हैट जाये. मैं दोनों के पास hi बीएड के किनारे पर बैठा हुआ था और दोनों के गुड मॉर्निंग करने का इंतज़ार कर रहा था. कुछ hi देर में वो दोनों उठी और फिर मेरे पास खिसक कर आयी. दोनों के चेहरे पर शर्म की लाली अभी भी मैं साफ़ देख सकता था. मेरे करीब आ कर दोनों मेरे चेहरे पर झुकी और फिर दोनों ने मेरे गालो पर एक साथ किश किया और फिर गुड मॉर्निंग कहा.

"ये हुयी न बात. अब जा कर मुझे अच्छा लगा है. तुमको पता है कल रात अकेले मुझे बीएड पर बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था. तुम दोनों की आदत हो गयी है मुझे." मैंने ये कहा तो दोनों मुस्क़ुआई फिर पूजा ने कहा.

"भाई वो हम कल शाम को जो हुआ उसकी वजह से नहीं आये थे. हमारी हिम्मत hi नहीं हो रही थी तुम्हारे सामने आने की." पूजा ने ये कहा hi था उसके बाद प्रिय भी बोल पड़ी.

"भाई उसके लिए हम बहुत ज़्यादा शर्मिंदा हैं. उसके बाद तो हमें ऐसा लग रहा था जैसे की शर्म से कही डूब के मर जाये." प्रिय ने नज़रे झुका के ये कहा तो मैंने कहा.

"खबरदार मरने की बात की तो. देखो जो कुछ भी हुआ उसे भूल जाओ. उसमे किसी की कोई गलती नहीं थी. जो कुछ भी हुआ वो अनजाने में हुआ. अब वो सब भूल जाओ और जैसे पहले मेरे साथ हस्ते बोलते थे वैसे hi हसो बोलो. अब चलो जल्दी से फ्रेश हो लो और फिर मुझे चाय पिलाओ. मैं अपने कमरे में जा रहा हु. चाय ले कर वही आ जाना ठीक है.?" मैंने दोनों की तरफ बारी बारी से देखते हुए ये कहा तो दोनों ने हाँ में सर हिलाया और फिर ख़ुशी ख़ुशी बीएड से उतर कर कमरे से बाहर चली गयी. उनके जाने के बाद मैंने भी राहत की सांस ली और अपने कमरे में आ गया.

अपने कमरे में बीएड पर लेता मैं आज के दिन के बारे में सोच रहा था. आज रचना मेरे घर आने वाली है और माँ उससे जाने क्या क्या बात करेगी. फिर मुझे रेखा चची का ख़याल आया. आज दोपहर को सरपंच काका रेखा चची के घर जायेगे और उनकी गांड छोड़ेगे. ये ख़याल आते hi मेरे जिसम में झुरझुरी सी हुयी. मेरे मन में ये ख़याल आया की आज सरपंच को भी थोड़ा झटका देना चाहिए मगर सवाल था की कैसे.?

दोपहर को मैं कमरे से नीचे आया और बाहर की तरफ जाने hi लगा था की पीछे से माँ ने मुझे आवाज़ दी तो मैं रुक गया और पलट कर उनकी तरफ देखा. मेरे करीब आ कर माँ ने मुझसे पूछा की कहा जा रहा हु मैं तो मैंने उन्हें बताया की ज़रूरी काम से जा रहा हु. मेरी बात सुन कर माँ ने कहा की रचना आने वाली है और वो चाहती हैं की जब रचना से उनकी बात हो तो मैं भी उनके पास राहु.

मुझे माँ की इस बात ने परेशानी में दाल दिया. मैं तो रेखा चची के घर की तरफ जा रहा था. मैं चाहता था की जब सरपंच वह पहुंचे तो उसका मुझसे टकराव हो मगर यहाँ तो माँ मुझसे रुकने का कह रही थी. मैंने माँ से कहा की उन्हें रचना से जो भी बात करना हो वो कर ले. मेरा काम से बाहर जाना ज़रूरी है. मेरी इस बात से माँ ने मुझे कुछ देर तक देखा और फिर कहा ठीक है जाओ.

माँ की इजाज़त मिलते hi मैं अंदर से खुश हुआ और फिर घर से बाहर आ गया. बाहर आ कर जैसे hi मैं सड़क पर आया तो मुझे सामने से आती हुयी रचना दिखी. उसे देख कर मैं थोड़ा रुका और फिर आगे बढ़ने लगा. मैंने देखा की रचना कुछ सोचते हुए आ रही थी. उसका ध्यान कही और था. उसने मुझे देखा नहीं था जबकि मैं उसे hi देख रहा था. वो दूध की तरह गोरी थी. चेहरा आज भी बहुत सुन्दर था उसका जिसमे संसार भर की मासूमियत थी. उसकी गर्दन से नीचे का हिस्सा मोटा हो गया था. जो थोड़ा अजीब सा लगता था.

मैं जैसे hi उसके थोड़ा पास पंहुचा तो एकदम से उसकी नज़र मुझ पर पड़ी तो वो पहले सकपकायी फिर शायद उसने अपने आपको सम्हाला था. उसके गुलाबी होठो पर हलकी सी मुस्कान उभरी. मुझे समझ न आया की मैं उसकी उस मुस्कान पर कैसे रियेक्ट करू.? मगर मुझे इस बात का अहसास था की ये वो लड़की है जिसने मेरे लिए कितना बड़ा त्याग किया है और मेरे न रहने पर मेरे परिवार की रक्षा की है. मुझ में उसका निरादर करने की हिम्मत न हुयी बल्कि उसके लिए सम्मान जगा मेरे मन में.

जब वो मेरे बिलकुल करीब आ गयी तो उसने hi मुझसे पूछा कैसे हो विक्की तो मैंने धीरे से थोड़ा मुस्कुराते हुए जवाब दिया ठीक हु. उसके बाद मैं आगे बढ़ गया. सड़क पर रुक कर उससे बात करना ठीक नहीं था. उसे भी ये बात पता थी इस लिए उसने भी मुझसे रुकने को नहीं कहा और मेरे घर के दरवाजे की तरफ बढ़ गयी.

रचना के बारे में सोचते हुए मैं थोड़ी hi देर में रेखा चची के घर के पास पहुंच गया. उनके घर के बाहर बने मिटटी के चबूतरे पर आज वो बच्चा नहीं था जिसका नाम बबलू था. आस पास के घरो के बाहर भी कोई नहीं दिखा. मैं समझ गया की सरपंच के आने का टाइम सही है. इस वक्त आस पास के घरो के बाहर कोई था नहीं जिससे सरपंच को रेखा चची के घर के अंदर जाने में कोई प्रॉब्लम नहीं होनी थी.

मैंने सोचा रघुवीर काका तो खेतो पर होंगे इस वक्त. क्यों की अगर वो घर पर होते तो रेखा चची सरपंच को आने से मन कर देती. मतलब साफ़ था की रघुवीर काका खाना पीना करके खेत जा चुके थे. मुझे समझ न आया की अब मैं क्या करू. मैं चची के घर के अंदर जाओ या बाहर hi सरपंच के आने का इंतज़ार करू. घर के बाहर खड़े रहना भी ठीक नहीं था इस लिए मैं आगे की तरफ धीरे धीरे चल दिया. रघुवीर काका के घर के बगल से उनके बड़े भाई तेजवीर काका का घर था. रघुवीर काका दो भाई थे और दोनों hi खेती बाड़ी करते थे. मैंने अंदाज़ा लगाया की तेजवीर काका भी शायद खेतो पर hi होंगे. उनके घर के थोड़ा आगे एक बरगद का बड़ा सा पेड़ था जो सड़क के किनारे पर था और उसके नीचे पक्का चबूतरा बना हुआ था लोगो के बैठने के लिए. मगर इस वक्त वह पर कोई नहीं था.

मैं उस चबूतरे तक गया और आस पास के घरो की तरफ देखने के बाद वापस मुद आया. मुद कर जैसे hi मैं तेजवीर काका के घर के सामने आया तो मेरी नज़र उनके घर के दरवाजे पर पड़ी. उनके घर का दरवाजा उसी वक्त खुला था और दरवाजे से रेखा चची और उनका छोटा सा बीटा बबलू निकला था. रेखा चची अपनी जेठानी के घर आयी थी. ये देख कर मुझे कल की बात याद आयी की उन्होंने अपनी जेठानी को भी सरपंच से छुड़वाने के लिए तैयार कर लिया था. इसका मतलब कही ऐसा तो नहीं की आज उनकी जेठानी सरपंच से छोड़ने के लिए आने वाली है रेखा चची के घर में. मुझे मेरा ये ख़याल सही तो लगा मगर उनकी जेठानी तो बाहर निकली नहीं. शायद बाद में आये वो.

रेखा चची की नज़र जब मुझ पर पड़ी तो पहले तो वो चौंकी फिर मुस्कुराते हुए मेरे पास आयी और बोली कहा जा रहे हो विक्की.? उनके पूछने पर मैंने उन्हें झूठ मुठ का बताया की मैं आज अपने खेतो की तरफ गया था और अभी वही से आ रहा हु और अब घर जा रहा हु. मेरी ये बात सुन कर चची ने मुस्कुराते हुए कहा की खेती बाड़ी के काम में बहुत म्हणत लगती है विक्की और ये तुम्हारे बस का नहीं है. उनकी इस बात से मैंने कहा की हाँ ये मैं जनता हु और इसी लिए सोच रहा हु की दो चार मजदूर लगा लू जिससे काम आसानी से हो सके.

मैं उनसे बाते करते हुए hi चलते हुए उनके घर के सामने आया. जब मैं उनके घर के सामने आया तो मैं चाह रहा था की चची मुझसे अपने घर आने को कहे मगर ऐसा न हुआ. मैं समझ गया की वो मुझसे ऐसा कह भी नहीं सकती थी क्यों की आज सरपंच या तो उनकी गांड का उद्घाटन करने आने वाला है या फिर उनकी जेठानी की छूट मरने. जब मुझे लगा की चची मुझे आने को नहीं कहेगी तो मैंने hi कहा की चची बड़ी प्यास लगी है. मेरी ये बात सुन कर चची ने मुस्कुराते हुए कहा की आ जाओ मैं तुम्हे पानी पिलाती हु.

रेखा चची की इस बात से मैं मन hi मन खुश हो गया और फिर उनके साथ उनके घर के दरवाजे की तरफ चल पड़ा. मेरी नज़र उनके बेटे पर पड़ी जो मुझे hi देखे जा रहा था. मैं समझ गया की वो मुझे क्यों देखे जा रहा था. उसे पता था की मैं आज भी उसे पैसे दुगा और वो उन पैसो से गुड़ नमकीन दूकान से खरीद कर लाएगा और फिर खायेगा. मुझे मन hi मन उसकी मासूमियत पर और उसकी इस आस पर प्यार आया.

थोड़ी hi देर में मैं चची के साथ उनके घर के अंदर आया और फिर चची मुझे बैठक में बिठा कर अंदर पानी लेने चली गयी. उनके जाते hi बबलू ने मुझसे कहा की भैया मैंने माँ को नहीं बताया की कल तुमने मुझे पैसा दिया था. मैंने उसकी ये बात सुनी तो मुस्कुराते हुए उससे कहा की अच्छा किया जो नहीं बताया. मेरी इस बात से वो खुश हो गया और फिर बोलै की आज भी मुझे पैसा डोज तो मैंने अपनी पॉकेट से निकल कर उसे दस रूपया दिया और कहा की इसे छुपा कर रखे और बाद में जो खाना हो खरीद के खा लेना. बबलू ने मेरे हाथ से पैसा ले कर जल्दी से अपने हाफ पेंट की छोटी सी पॉकेट में छुपा लिया. उसका चेहरा ख़ुशी से चमकने लगा था.

तभी रेखा चची लोटा गिलास में पानी ले कर आयी और मुझे गिलास थमा दिया. मैंने पानी से भरा गिलास देखा और फिर रेखा चची की तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा क्या चची सिर्फ पानी पिलाएगी आप मुझे.? रघुवीर काका होते तो मुझे बिना खाना खाये न जाने देते. इससे ये साफ़ हो गया की काका मुझे ज़्यादा मानते हैं और आप काम. मेरी इस बात से चची हड़बड़ा गयी मगर फिर जल्दी hi खुद को सम्हाल भी लिया और फिर मुस्कुराते हुए बोली. नहीं विक्की ऐसी तो कोई बात नहीं hai...wo तुमने सिर्फ पानी पिने को कहा तो मैं पानी ले कर आ गयी. उनकी इस बात से मैंने मुस्कुराते हुए कहा की अपने से तो कोई भी ये नहीं कहता चची की मुझे खाना खिला दो. ज़्यादातर लोग पानी के लिए hi कहते हैं. अब ये तो सामने वाले की सोच पर निर्भर करता है की वो उसे सिर्फ पानी पिलाता है या और भी कुछ खिलता पिलाता है.

मेरी इस बात से चची मुस्कुराते हुए बोली अच्छा बाबा माफ़ करो मुझे. गलती हो gayi...chalo मैं तुम्हे खाना खिलाती हु. उनकी इस बात पर मैंने कहा अब रहने दीजिये चची. ये तो आपको पहले सोचना चाहिए tha...jab मैंने कहा तब आपने कहा तो क्या मतलब रह गया. चलिए कोई बात नहीं रघुवीर काका जब मिलेंगे मुझे तो उनसे कहुगा मैं की आप नहीं थे तो चची ने मुझे सिर्फ पानी पीला कर hi भेज दिया था.

मेरी इस बात से चची ने मुस्कुराते हुए कहा तुम भी कमाल करते हो विक्की. अब माफ़ भी कर दो न अपनी इस मासूम सी चची को. मैं कह तो रही हु न की चलो मैं तुम्हे खाना खिलाती हु. उनकी इस बात पर मैंने हस्ते हुए kaha...na अब तो मैं काका से ऐसा कह कर hi रहुगा. मैं उनसे कहुगा की आप तो मुझसे प्यार करते हैं मगर चची नहीं करती हैं. उन्होंने मुझे सिर्फ पानी पीला कर घर से भगा दिया है आज.

मेरी इस बात से चची मुझे हैरानी से देखती रह गयी जबकि मैं उनकी तरफ मुस्कुराते हुए देखता रहा. चची कुछ देर तक मुझे मुस्कुराते हुए देखती रही फिर कुछ कहने hi वाली थी की तभी घर का दरवाजा बाहर से खटखटाया गया. खटखटाने की आवाज़ सुनते hi चची के चेहरे का रंग उड़ता नज़र आया मुझे. उनके चेहरे पर घबराहट दिखी मुझे तो मैं समझ गया की बाहर शायद सरपंच आ पंहुचा है और वही दरवाजे को खटखटा रहा है. मगर मेरे रहते हुए चची दरवाजा खोल कर उसे अंदर कैसे आने दे सकती थी.?

रेखा चची हैरान परेशां सी कड़ी रह गयी तो मैंने चची से कहा की देखिये तो कौन आया hai...shayad काका होंगे. मेरी इस बात से चची हड़बड़ा गयी और मुझे अजीब तरह से देखने लगी तो मैंने कहा क्या हुआ chachi....aap मुझे इस तरह क्यों देख रही hain...ja कर दरवाजा खोलिये न. मैंने ये कहा hi था की दरवाजा फिर से खटखटाया गया. मैंने देखा की चची की हालत खराब होने लगी थी. उनके चेहरे का रंग उड़ गया था. मगर दरवाजा तो खोलना hi पड़ेगा उन्हें ये बात उन्हें भी पता थी. इस लिए जैसे hi वो बाहर की तरफ जाने लगी तो तभी बैठक में चची की जेठानी आती दिखी और उनके साथ बबलू भी. मैं समझ गया की दरवाजा बबलू ने खोल दिया था जबकि मैं और चची ने उसकी तरफ ध्यान hi नहीं दिया था की वो कब दरवाजा खोलने चला गया था.

अपनी जेठानी पर नज़र पड़ते hi चची के चेहरे पर राहत दिखी और फिर उनकी हालत भी ठीक हो गयी. मगर मैं मन hi मन ये सोच कर हसे जा रहा था की कुछ देर पहले इनकी हालत ये सोच कर खराब हो गयी थी की बाहर शायद सरपंच आ गया था. इधर चची की जेठानी के आने से मैं ये समझ गया की आज सरपंच इनकी जेठानी की चुदाई करेगा. उधर चची की जेठानी बैठक में आयी और फिर जब उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो वो हैरानी से कभी मुझे देखती तो कभी रेखा चची को. शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी की यहाँ मैं मौजूद होगा.

रेखा चची की जेठानी का नाम उर्मिला था. उनका रूप रंग रेखा चची से थोड़ा साफ़ था और दिखने में भी मस्त पटाखा लग रही थी. उनकी उम्र यही कोई 35 या 38 साल की रही होगी. मुझे देख कर वो हैरान तो हुयी थी मगर जल्दी hi खुद को सम्हाल भी लिया था. उसके बाद मुस्कुराते हुए मुझसे boli...kya बात है विक्की आज हमारे घर में.? उनके ऐसा कहने पर मैंने मुस्कुराते हुए कहा की क्या मैं यहाँ नहीं आ सकता चची.? मेरे ऐसा कहने पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा की बिलकुल आ सकते हो ये भी तो तुम्हारा hi घर है. उसके बाद मैंने उन्हें बताया की कैसे मैं यहाँ आया और कैसे रेखा चची मुझे सिर्फ पानी पीला कर यहाँ से तर्क देना चाहती थी. मेरी ये बात सुन कर दोनों चची मुझे हैरानी से देखने लगी. रेखा चची ने कहा की तुम भी न vicky...kyo मुझे तंग कर रहे हो.? मैं कह तो रही हु चलो मैं तुम्हे खाना खिला देती हु.

मैंने भी सोचा की अगर मुझे यहाँ रुकना है तो थोड़ा बहुत खाना खाने का नाटक करना hi पड़ेगा. मैं चाहता था की जब सरपंच की यहाँ एंट्री हो तो उसका सामना मुझसे ज़रूर हो. मैं देखना चाहता था की जब वो मुझे यहाँ देखेगा तो उसकी हालत क्या होती है.?

मैंने रेखा चची से कहा की ठीक है अब जब कह hi दिया है तो ले आइये कुछ खाने को क्यों की मुझे भूख भी लगी है. आखिर खेतो की तरफ से आया हु. मैंने ये कहा तो दोनों चाचियों के चेहरे पर परेशानी दिखने लगी. मगर वो मुझे यहाँ से जाने का कह भी नहीं सकती थी. मैं उनकी बहुत बड़ी आफत बन कर आ गया था यहाँ और वो दोनों अब बेबस सी हो गयी थी. खेर मेरे कहने पर रेखा चची को अंदर जाना hi पड़ा खाने के लिए कुछ लेन के लिए. उन्होंने सोचा था की मैं बस ऐसे hi कह रहा था. उन्हें क्या पता था की मैं सच में खाना खाने के लिए उनसे खाना मगाऊगा.

रेखा चची अंदर गयी तो उनके पीछे उर्मिला चची भी चली गयी. मैं समझ गया की अब दोनों अंदर कोई सलाह वगैरा करेगी. मगर मुझे इससे kya..main तो यहाँ सरपंच के आने का इंतज़ार hi करने वाला था. दोनों की हालत देख कर मुझे मज़ा भी बहुत आ रहा था. आखिर उनके लिए कबाब में हड्डी जो बन गया था मैं.

मुझे इंतज़ार करते हुए पांच मिनट से ज़्यादा हो गए थे मगर दोनों चचिया अंदर से नहीं आयी थी. मैं समझ सकता था उनकी हालत को मगर मैं उनको राहत देने का काम करने वाला नहीं था अभी. मैं ये सोच hi रहा था की तभी बाहर का दरवाजा एक बार फिर से खटखटाया गया और इस बार मैं पक्का सूरे हो गया की सरपंच ने दरवाजा खटखटाया था. ये सोचते hi मैं बहुत खुश हो गया मगर मेरा दिल भी ज़ोरो से धड़कने लग गया था.

उधर दरवाजा खटखटाने की आवाज़ शायद अंदर तक भी पहुंच गयी थी. तभी तो रेखा चची भागते हुए आयी थी. उनके चेहरे पर इस बार बारह बजे हुए थे और चेहरे का रंग एक बार से उदा हुआ दिखा मुझे. बैठक में आते hi उन्होंने मुझे देखा तो मैंने जल्दी से कहा क्या हुआ चची खाना नहीं ले आयी आप.? मेरी इस बात पर चची से कुछ कहते न बना. उधर दरवाजा फिर से खटखटाया गया तो इस बार मैंने चची से कहा की रुकिए मैं दरवाजा खोलता हु आप खाना ले कर आइये. मेरी इस बात से चची बुरी तरह घबरा गयी और फिर जल्दी से boli...nahi विक्की रुको. मैं जा के देखती हु कौन hai...tum बैठो यही. उनकी इस बात पर मैंने उनकी घबराहट को और बढ़ने के लिए pucha...kya बात है चची आप इतना घबराई हुयी क्यों लग रही हैं.? कोई परेशानी है क्या.?

मेरी इस बात से चची बुरी तरह हड़बड़ा गयी और फिर हकलाते हुए boli....nahi तो. मैं कहा घबराई हुयी हु vicky...tumhe ऐसे hi लग रहा है. तुम बैठो yahi...main दरवाजा खोल कर देखती हु की कौन आया है बाहर. चची ने ये कहा तो मैंने कहा ठीक है. मेरे ऐसा कहने पर चची बैठक से बाहर की तरफ बढ़ गयी तो मैं भी अंदर की तरफ एक बार नज़र दाल कर उनके पीछे चुपके से दबे पाँव बैठक से बाहर की तरफ चल दिया.

उधर रेखा चची दरवाजे के पास पहुंच चुकी थी और फिर उन्होंने कांपते हाथो से दरवाजा खोला. मैं दिवार के पीछे hi छिप गया था और मैं यहाँ से दरवाजे की तरफ साफ़ देख सकता था. जैसे hi दरवाजा खुला तो बाहर सरपंच खड़ा दिखा मुझे. सरपंच को देखते hi रेखा चची की हालत खराब हो गयी.

"क्या बात है मेरी rani....itni देर क्यों लगा दी दरवाजा खोलने में.?" दरवाजा खुलते hi सरपंच ने चची को देख कर धीरे से ये कहा तो चची बुरी तरह घबरा गयी और फिर जल्दी से पीछे पलट कर एक बार देखा और फिर सरपंच से बोली.

"तुम यहाँ से चले जाओ अभी. इस वक्त तुम्हारा यहाँ आना बहुत बड़ी मुसीबत खड़ा कर देगा." चची ने ये कहा तो सरपंच ने हैरानी से पहले चची को देखा फिर थोड़ा नाराज़गी से बोलै.

"तुम मुझे ऐसे कैसे यहाँ से जाने का बोल सकती ho...aur तुम कौन सी मुसीबत के खड़ा होने की बात कर रही हो.? तुम्हे शायद पता नहीं है की मैं खुद इस गांव के लोगो के लिए एक बहुत बड़ी मुसीबत हु. यहाँ कोई भी मेरे लिए मुसीबत नहीं बन सकता. अब हटो दरवाजे से और मुझे अंदर आने दो. मेरा दिमाग ख़राब हो गया तो तुम सोच भी नहीं सकती हो की मैं क्या कर सकता हु तुम्हारे और तुम्हारे पति के साथ." सरपंच ने रेखा चची को जैसे धमकी देते हुए ये कहा तो रेखा चची बुरी तरह दर गयी मगर वो भला कैसे सरपंच को अंदर आने दे सकती थी.?

"तुम समझ नहीं रहे हो मेरे राजा. इस वक्त तुम अंदर नहीं आ सकते." रेखा चची ने घबराते हुए ये कहा तो सरपंच ने इस बार कुछ सोचते हुए कहा.

"क्या बात hai...koi परेशानी है क्या.? कही तुम्हारा पति तो घर के अंदर नहीं है मगर वो तो इस वक्त खेतो पर होता है न.?" सरपंच ने ये कहा तो रेखा चची ने बेबसी से अभी कुछ कहना hi चाहा था की तभी मैं दिवार के पीछे से निकल कर उनके पीछे आ गया. असल में मैंने सोचा की ये सही टाइम है सरपंच को और चची दोनों को झटका देने का. यही सोच कर मैं एकदम से चची के पीछे आ कर खड़ा हो गया था और फिर इस तरह बोल पड़ा जैसे मुझे कुछ पता hi न हो.

"क्या हुआ chachi...kaun आया है बाहर.? कितनी देर लगा दी आपने.? मैं यहाँ खाने के इंतज़ार में बैठा हु और आप यहाँ किस्से बाते कर रही हैं.?" मैंने अनजान बनते हुए जैसे hi ये सब कहा तो दोनों के देवता कुछ कर गए. रेखा चची की हालत तो बदतर हुयी hi मगर मुझे देखते hi सरपंच की भी जैसे नानी मर गयी.

दरवाजे के दोनों पल्लो को पकडे खड़ा सरपंच मुझे देखते hi एकदम हड़बड़ा गया था. उसके पैरो के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक गयी थी. उसके चेहरे पर बुरी तरह घबरा जाने के निशाँ दिखे. फिर जैसे उसको होश आया तो वो एकदम से पीछे हैट गया और फिर अपने आपको बड़ी मुश्किल से सम्हाला उसने. मुझे देखते हुए वो मुस्कुरा कर बोलै.

"ारी विक्की बीटा तुम यहाँ.?" सरपंच इससे ज़्यादा कुछ बोल न पाया मगर मैं उसकी इस बात पर इस तरह मुस्कुराया जैसे वो मेरे सामने कोई बच्चा हो और उसने कोई बेवकूफाना हरकत कर दी हो. मेरे इस तरह मुस्कुराने पर सरपंच के माथे पर पसीना उभर आया.

"हाँ kaka...wo मैं खेतो की तरफ से आ रहा था तो चची मुझे यही पर मिल गयी. फिर मैंने इनसे पानी मांगा तो इन्होने सिर्फ मुझे पानी पकड़ा दिया. मैंने इनसे कहा की अगर काका होते तो मुझे बिना खाना खाये जाने नहीं देते. तब इन्होने मुझे बैठाया और कहा की ठीक है अब खाना खा कर hi जाना. इस लिए मैं यहाँ खाने का इंतज़ार hi कर रहा मगर चची इतनी देर से यहाँ आपसे बाते करने में लगी हुयी हैं और मुझे भूखा बिठा रखा है. ये तो हद है न काका.?" मैंने मुस्कुराते हुए सरपंच को ये सब बताया तो सरपंच के चेहरे पर राहत दिखी और फिर उसने मुस्कुराते हुए रेखा चची से कहा.

"क्यों रानी ये विक्की क्या कह रहा है.?" सरपंच ने चची को गलती से रानी बोल दिया तो चची हड़बड़ा कर सरपंच की तरफ देखा तो सरपंच भी हड़बड़ा गया. उसे अपनी गलती का अहसास हुआ. शायद उसकी आदत पद चुकी थी चची को रानी कहने की. इस लिए उसके मुँह से गलती से निकल गया था मगर अब क्या हो सकता था. मैंने देखा की सरपंच के चेहरे का रंग उड़ गया था. फिर उसने जल्दी से खुद को सम्हलते हुए कहा.

"ारी हाँ तुम्हारा नाम तो रघुवीर ने रेखा बताया था न. मुझे बार बार भूल जाता है. इस लिए मुँह से रानी कह दिया था मैंने. खेर chhodo....wo मैं रघुवीर से मिलने आया था. उससे कहना की मैंने उसे घर बुलाया है ठीक है na.....aur हाँ विक्की को खाना खिला देना. अच्छा अब चलता हु मैं." सरपंच ने ये सब कहा और फिर पलट कर जाने लगा. मैंने देखा की उसके कंधे पर जो सफ़ेद रंग का गमछा था उसने उसे एक हाथ पकड़ कर निकला और फिर अपने चेहरे का पसीने पोंछते हुए आगे बढ़ गया.

इधर हालत तो रेखा चची की भी बहुत खराब हो गयी थी. सरपंच का यहाँ आना और फिर एकदम से मेरा उसके पीछे से आ जाना इस सबसे उन दोनों की hi हालत खराब हो गयी थी. सरपंच के जाने के बाद भी रेखा चची वैसी hi कड़ी रह गयी थी. शायद उन्हें ख़याल hi नहीं रह गया था की सरपंच जा चूका है और वो अभी भी वैसे hi दरवाजे के पास कड़ी हैं.

"क्या हुआ chachi...ab आप कड़ी क्यों हैं इस तरह.? चलिए मुझे खाना नहीं खिलाना kya...ya मैं जाओ यहाँ से और अपने hi घर में खाना खाओ.?" मैंने मन hi मन मुस्कुराते हुए चची से ये कहा तो चची एकदम से हड़बड़ा गयी. उन्हें होश आ गया. उन्होंने जल्दी से दरवाजा बंद किया और फिर मेरी तरफ पलटी तो मैं थोड़ा पीछे हैट गया.

मैंने देखा की उनका चेहरा पसीना पसीना हो गया था मरे घबराहट के. उन्होंने अपनी साडी के आँचल से जल्दी से पसीना पोंछा और फिर मेरी तरफ मुस्कुरा कर देखा. मैं उन्हें hi देख रहा था. वो मुस्कुराने ज़रूर लगी थी मगर उनके चेहरे से घबराहट गयी नहीं थी. मैं तो उनकी हालत जनता hi था मगर वो ये दिखने की कोशिश कर रही थी की सब ठीक है.

उसके बाद मैं चची के साथ बैठक में आ गया. चची ने मुझसे अंदर चलने के लिए कहा तो मैं अंदर रसोई की तरफ आ गया. वैसे तो मैं अपने घर में खाना खा चूका था मगर इस सबसे जो ख़ुशी मुझे महसूस हो रही थी उस ख़ुशी में थोड़ा सा खा लेने में भी मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं थी. मैं मन hi मन ये सोच कर मगन था की मैंने आज रंग में भांग दाल दिया था. बेचारी दोनों चाचियों ने क्या आस लगा रखा था और मैंने उनके आस के अस्स व्होले पर अपना मोटा सा लौड़ा दाल दिया था आज. एक चची की गांड का आज उद्घाटन होना था और दूसरी चची को आज एक नया लुंड अपनी छूट में लेने के लिए मिलने वाला था. मगर मेरी वजह से सारा गुड़ गोबर हो गया था.

रसोई में आ कर चची ने एक चटाई मेरे बैठने के लिए बिछाई तो मैं आराम से बैठ गया. उर्मिला चची रेखा चची को बड़े ध्यान से देख रही थी. शायद वो समझने की कोशिश कर रही थी की उनके चेहरे पर जो अभी भी बारह बजे हुए हैं उसका रीज़न क्या है.? मेरे सामने तो वो चची से पूछ नहीं सकती थी. मैंने सोचा की चलो थोड़ा इनकी भी हालत खराब की जाये. ये ख़याल मन में आते hi पहले तो मुझे बहुत मज़ा आया फिर मैंने मुस्कुराते हुए बोलै.

"ारी चची आपको पता hai...abhi सरपंच काका आये थे और पता है वो क्या कह रहे थे चची को.?" मैंने ये कहा तो उर्मिला चची के चेहरे का एकदम से रंग उड़ गया. उधर मेरी ये बात सुन कर रेखा चची ने भी घबरा कर देखा मुझे. दोनों ने बड़ी मुश्किल से सम्हाला अपने आप को. फिर उर्मिला चची ने मुझसे पूछा.

"क्या कह रहे थे रेखा को.?" उर्मिला चची ने मुझसे ये पूछा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाहाहाहा क्या बताओ chachi....wo चची को रानी कह रहे थे." मैंने ये कहा तो उर्मिला चची ने तो हैरानी से रेखा चची की तरफ देखा hi मगर मेरी इस बात से रेखा चची बुरी तरह घबरा गयी. एक बार फिर से उनका चेहरा पीने से तर हो गया. उधर उर्मिला चची ने हकलाते हुए उनसे पूछा.

"Rekha...ye विक्की क्या कह रहा है.? क्या सरपंच जी ने तुझे सच में रानी कहा था.?" उर्मिला चची ने उनसे ये पूछा तो रेखा चची ने बुरी तरह हड़बड़ाते हुए कहा.

"हाँ didi...magar ऐसा उन्होंने इस लिए कह दिया था क्यों की उनको मेरा नाम भूल गया था शायद. वो रेखा की जगह रानी कह दिए थे." रेखा चची ने सफाई देते हुए ये कहा तो उर्मिला चची हैरान रह गयी. इधर मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ऐसा गलती से हो जाता है चची और सब से हो जाता है. ये कोई बड़ी बात नहीं है और मुझे तो लगता है की रेखा चची का नाम रानी hi होना चाहिए था क्यों की रानी नाम चची पर ज़्यादा अच्छा लगता है. मैंने सही कहा न चची.?" मैंने मुस्कुराते हुए उर्मिला चची से ये कहा तो रेखा चची ने मुझे हैरानी से देखा जबकि उर्मिला चची इस बार मुस्कुरा कर बोली.

"सही कहा तुमने विक्की. रेखा का नाम रानी hi होना चाहिए था. वैसे भी मेरी देवरानी किसी रानी से काम है क्या.?" उर्मिला चची ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रेखा चची पता नहीं क्यों बुरी तरह शर्मा गयी. वो शरमाते हुए hi आयी और मेरे सामने खाने की थाली रख दी और जा कर फिर से अपनी जगह पर बैठ गयी.

"मगर मुझे एक बात समझ में नहीं आयी बड़ी चची." मैंने उर्मिला चची की तरफ देखते हुए ये कहा तो दोनों ने मेरी तरफ अजीब तरह से देखा फिर उर्मिला चची ने पूछा कौन सी बात समझ में नहीं आयी तो मैंने कहा.

"जब मैं छोटी चची के पीछे दरवाजे पर पंहुचा तो सरपंच काका मुझे देखते hi इतना घबरा क्यों गए थे.? ऐसा लगा जैसे उनकी कोई चोरी पकड़ी गयी हो." मैंने ये कहा तो वो दोनों बुरी तरह हड़बड़ा गयी. रेखा चची की तो हालत hi खराब हो गयी. बड़ी मुश्किल से दोनों ने खुद को सम्हाला और इस बार रेखा चची ने कहा.

"तुम्हे ऐसा क्यों लगता है की वो तुम्हे देखते hi घबरा गए थे या उनकी कोई चोरी पकड़ी गयी थी मुझे तो ऐसा कुछ भी नहीं लगा." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"क्या सच में आपको ऐसा कुछ नहीं लगा चची.?" मैंने रेखा चची की तरफ ध्यान से देखते हुए और मुस्कुराते हुए ये कहा तो रेखा चची सकपका गयी. वो अपनी नज़रे चुराने लगी. उर्मिला चची तो जैसे कुछ सोचे जा रही थी.

"H..haan मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगा. पता नहीं तुम्हे ऐसा क्यों लगा था.?" रेखा चची ने हकलाते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुरा कर कहा.

"बड़ी अजीब बात है. आप तो उनके पास में hi कड़ी थी फिर भी आपको ऐसा कुछ नहीं लगा. ये तो हैरानी की बात है चची. खेर chhodo....waise आप खाना बहुत अच्छा बनती हैं. कल शाम को जब मैंने खाया था तब भी मुझे खाना बहुत अच्छा लगा था. मगर मैंने खाने की तारीफ नहीं की थी." मैंने ये कहा तो रेखा चची ने राहत की सांस ली और मुस्कुराते हुए बोली.

"अच्छा ji...kal मेरी झूठ मुठ की तारीफ कर रहे थे और अब मेरे बनाये खाने की भी झूठ मुठ की तारीफ कर रहे हो." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अब आपको भरोसा hi नहीं तो क्या कहु मैं मगर मेरा तो मन करता है की रोज़ आपके घर आ जाया करू और आपके हाथो का बना स्वादिस्ट खाना खाया करू." मैंने ये कहा तो रेखा चची ने मेरी तरफ पहले हड़बड़ा कर देखा फिर मुस्कुराते हुए बोली.

"अच्छा ji...chalo ठीक है रोज़ आ जाना और मेरे हाथ का बना खा लिया करना." चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुरा कर कहा.

"सोच लीजिये chachi....main अब रोज़ाना आउगा आपके घर खाना खाने." मैंने ये कहा तो चची के चेहरे पर परेशानी नज़र आयी. मगर उन्होंने अपने आपको सम्हालते हुए और ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा.

"इसमें सोचना क्या है विक्की.? तुम्हारा घर hai...tumhara जब मन करे आ जाना." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"आप ये सच्चे मन से कह रही हैं या सिर्फ दिखने के लिए.?" मैंने ये कहा तो दोनों ने मेरी तरफ हैरानी से देखा फिर रेखा चची बोली.

"मैं मन से hi कह रही विक्की. तुम रोज़ आ जाना. मुझे ख़ुशी होगी की तुम मेरे हाथ का बना खाना खाने आओगे." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ठीक है चची. अब ये पक्का हो गया की मैं अब से रोज़ाना आपके यहाँ आउगा." मैंने हाथ मुँह धोते हुए ये कहा तो दोनों ने ज़बरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की.

खाना खाने के बाद मैं उठा और फिर दोनों से कुछ देर और बातचीत की मैंने. उसके बाद मैं वह से अपने घर की तरफ चल दिया. सच कहु तो मुझसे अपनी हसी रोकी नहीं जा रही थी. मुझे ये सोच कर बहुत मज़ा आ रहा था की दोनों चाचियों ने इसके पहले बड़ा ख्वाब सजाया रहा होगा. बड़ा टीम टॉम किया रहा होगा मगर मेरे आ जाने से सब पर पानी फिर गया था. उधर सरपंच का भी यही हाल हुआ होगा. आज ज़रूर उसने अपने लुंड को अच्छे से साफ़ किया रहा होगा और उसकी तेल लगा कर मालिश की रही होगी मगर उसके लुंड को छूट और गांड न मिल पायी थी.

सरे रास्ते मैं यही सब सोचते हुए मन hi मन हस्ता रहा. मेरे मन में ये भी ख़याल आया की कही ऐसा न हो की मेरे वह से आने के बाद सरपंच फिर से न रेखा चची के घर पहुंच जाये. ऐसा हो तो सकता था मगर मुझे इसके चांस काम hi लग रहे थे. क्यों की दोनों तरफ एक बात कॉमन हो गयी थी और वो थी घबराहट और दर जो उनको काम से काम आज तो ऐसा कुछ करने से रोके hi रखेंगे. कल का कल देखा जायेगा. मैं भी रेखा चची से कह आया था की अब से मैं रोज़ाना आउगा उनके घर. इस लिए वो दोनों भी ऐसा वैसा करने का नहीं सोचेगी. मैंने बाते भी ऐसी की थी जिससे उनके दिमाग में बात बैठ जाये की मुझे उन पर शक हो गया है. शक ऐसी चीज़ है जो उन्हें ऐसा काम करने से रोकेगा और यही मैं चाहता था.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

कामदेव भय आपके हर कमेंट से मुझे बहुत कुछ मिलता है. प्ल्ज़ आप हर अपडेट में अपना कमेंट दिया करो....

भय अपने जिन चरक्टेर्स के बारे में जो कुछ भी कहा वो सब सच कहा अपने. इन्सेस्ट रिलेशन कैसा होगा और कैसे होगा ये आपकी हेल्प से मैंने भी सोचा है. अब देखते हैं फ्यूचर में क्या होता है....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 32


सरे रास्ते मैं यही सब सोचते हुए मन hi मन हस्ता रहा. मेरे मन में ये भी ख़याल आया की कही ऐसा न हो की मेरे वह से आने के बाद सरपंच फिर से न रेखा चची के घर पहुंच जाये. ऐसा हो तो सकता था मगर मुझे इसके चांस काम hi लग रहे थे. क्यों की दोनों तरफ एक बात कॉमन हो गयी थी और वो थी घबराहट और दर जो उनको काम से काम आज तो ऐसा कुछ करने से रोके hi रखेंगे. कल का कल देखा जायेगा. मैं भी रेखा चची से कह आया था की अब से मैं रोज़ाना आउगा उनके घर. इस लिए वो दोनों भी ऐसा वैसा करने का नहीं सोचेगी. मैंने बाते भी ऐसी की थी जिससे उनके दिमाग में बात बैठ जाये की मुझे उन पर शक हो गया है. शक ऐसी चीज़ है जो उन्हें ऐसा काम करने से रोकेगा और यही मैं चाहता था.

अब आगे पढ़िए....


मैं ख़ुशी ख़ुशी घर आया तो घर में एकदम से सन्नाटा छाया हुआ महसूस हुआ मुझे. मैंने इधर उधर देखा मगर कोई न दिखा. फिर मुझे याद आया की उस वक्त रचना मेरे घर आयी थी जब मैं यहाँ से बाहर गया था. मतलब हो सकता है की रचना अभी भी मेरे घर पर hi हो. मैंने ये भी अंदाज़ा लगाया की रचना माँ के कमरे में hi हो सकती है इस वक्त.

मैं ये सोचते हुए माँ के कमरे की तरफ बढ़ता चला गया. जब मैं माँ के कमरे के पास पंहुचा तो मुझे माँ की आवाज़ सुनाई दी जो रचना से hi कुछ कह रही थी. मैं कमरे के अंदर नहीं gaya....bas बाहर से hi उनकी बाते सुनने की कोशिश की. तभी माँ ने ऐसा कुछ कहा जिससे मेरे पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी और मैं बुरी तरह हैरान रह गया. मुझे भरोसा न हुआ की माँ ऐसा भी कुछ कह सकती हैं. मैं तो सोच भी नहीं सकता था की माँ के मन में ऐसी कोई बात होगी और वो उस बारे में ऐसा कह सकती हैं.

कमरे के बाहर खड़ा मैं अचंभित था फिर मुझे एकदम से होश आया और मैं पलट कर अपने कमरे की तरफ चल दिया. वह पर ज़्यादा देर तक खड़े रहने की मेरी हिम्मत hi न हुयी. मेरे दिल और दिमाग में धमाके हो रहे थे. मैं अभी भी यकीन नहीं कर प् रहा था की माँ ऐसी बात कह रही थी. यही सब सोचते हुए मैं कमरे में आ गया.

कमरे में आया तो देखा प्रिय पूजा मेरे बीएड पर बैठी मोबाइल में गेम खेल रही थी. उन्हें देख कर मैंने अपनी हालत को ठीक किया और फिर मुस्कुराते हुए बीएड के पास आ गया. उधर जब उन दोनों ने मुझे देखा तो पहले तो वो दोनों मुस्कुरायी फिर उनके चेहरे पर शर्म की हलकी लाली उभर आयी. मैं समझ गया की उनको फिर से ये याद आ गया था की कल शाम मैंने उन्हें नंगा देख लिया था और इसी बात के याद आने से उनके चेहरे पर शर्म की लाली उभर आयी थी. मैंने सोचा चलो इनकी भी थोड़ा खिचाई करते हैं.

"क्या बात hai....aaj तुम दोनों मोबाइल में गेम खेल रही हो. मुझे लगा कही आज भी तुम मेरे कमरे में जीन्स वगैरा तो नहीं पहन रही." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दोनों बुरी तरह शर्मा गयी और दोनों की नज़रे झुक गयी. दोनों जाने क्या सोच कर मुस्कुराने लगी थी और दोनों के hi होठ कांप रहे थे.

"अच्छा ये बताओ की अपने सरे कपडे पहन कर देख लिया है न तुम दोनों ने.?" मैंने ये पूछा तो दोनों ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा फिर पूजा बोली.

"हाँ bhai...hamne देख लिया है." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"तो कैसे लगे कपडे.?" मैंने ये पूछा तो प्रिय ने कहा.

"कपडे तो बहुत अच्छे हैं भाई मगर दिक्कत यही है की हम उन्हें माँ के सामने पहन कर नहीं जा सकते." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"उसकी टेंशन न लो तुम. जब हम यहाँ से दिल्ली पहुंच जायेगे तब वह पर तुम ऐसे hi कपडे pahan'na. मैं माँ को समझा दुगा वो कुछ नहीं कहेगी." मैंने ये कहा तो दोनों खुश हो गयी. फिर पूजा ने ख़ुशी से कहा.

"भाई हम दिल्ली कब चलेंगे यहाँ से.?" पूजा ने ये पूछा तो मैंने कहा.

"बस एक दो दिन में चल hi देंगे." मैंने ऐसा इस लिए कहा क्यों की मुझे सरपंच और रेखा चची के रिलेशन को कुछ दिन के लिए रोके रखना था. मैं चाहता था की मेरे जाने के बाद ये दोनों एक दूसरे के करीब न आये और फिर जब मैं रचना को लेने वापस गांव आउगा तो मैं इनके साथ खुल कर कुछ कारनामा करुगा.

"लेकिन भाई अब तो यहाँ कोई काम नहीं रहा हमारा. हमारी ज़मीने और ये घर तो बिक hi गए हैं न. फिर यहाँ रुकने का क्या फायदा है.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ फायदा तो कुछ नहीं है मगर माँ शायद रचना को भी साथ ले जाना चाहती हैं. मगर अभी ये भी पता नहीं है की रचना हमारे साथ जाना चाहती है की नहीं. आज रचना हमारे घर आयी हुयी है और माँ उससे बात कर रही हैं. देखते हैं रचना का क्या फैसला होता है इस बारे में.?" मैंने ये सब कहा तो दोनों कुछ न बोली.

मैं बीएड के पास hi खड़े हो के ये बाते कर रहा था. फिर मैं बीएड पर आ कर लेट गया तो वो दोनों भी मेरे अगल बगल लेट गयी. मैंने देखा की दरवाजा खुला हुआ है इस लिए दोनों से कहा की दरवाजा बंद कर दो वर्ण अगर माँ यहाँ आ गयी और उन्होंने तुम दोनों को मेरे साथ इस तरह लेते हुए देख लिया तो हम तीनो को डाँटेगी." मैंने ये कहा तो दोनों मुस्कुरायी फिर प्रिय बीएड से उतर कर गयी और दरवाजे को अंदर से कुण्डी लगा कर बंद कर दिया. उसके बाद वो वापस मेरे बगल में आ कर लेट गयी.

दोनों ने शलवार कुरता पहन रखा था और इस वक्त दोनों ने hi दुपट्टा उतार रखा था. जिससे उनके सीने के उभार मैं साफ़ देख सकता था. उनके सीने के ये उभार पहले से बड़े दिख रहे थे. पांच साल पहले मेरी सोच इस तरफ नहीं जाती थी मगर जब से मैंने दक्षिणा और किरण के साथ सेक्स किया था तब से मेरी सोच बदल गयी थी और मैं तब से जब भी किसी लड़की या औरत को देखता तो मेरी नज़र सबसे पहले उनकी छतियो पर hi जाती थी. नज़र तो पांच साल पहले भी जाती थी मगर तब मेरे मन में गंदे ख़याल नहीं आते थे मगर अब तो देखने के बाद जल्द hi गंदे ख़याल आ जाते थे.

प्रिय पूजा मुझसे एकदम चिपक कर लेती हुयी थी और दोनों की छतिया मेरी बाजुओं से लगी हुयी थी जो मुझे अपनी कोमलता और अपनी गर्माहट का अहसाह करा रही थी. मुझे नहीं पता की उन दोनों के मन में क्या था. वो कभी इस बारे में सोचती भी थी या नहीं. मुझे इस बारे में अभी कुछ पता नहीं था. अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी पूजा ने धीरे से कहा.

"भाई एक बात बताओ." पूजा ने धीरे से ये कहा तो मैंने भी धीरे से hi कहा.

"कौन सी बात.?" मैंने ऐसा कहा तो पूजा ने कहा.

"Wo...wo..kya तुमने कल शाम को सच में हमें वैसी हालत में देखा था.?" पूजा ने हकलाते हुए ये पूछा तो पहले तो मैं हैरान हुआ फिर मेरे मन में जाने क्या आया की मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ देखा tha...magar इसमें मेरी क्या गलती थी. तुम दोनों तो खुद hi अपना सब कुछ खोले हुए कड़ी थी और जब मैं कमरे के अंदर आया तो मेरी नज़र सीधे वही पर पड़ी थी." मैंने ये कहा तो दोनों बुरी तरह शरमाते हुए सिकुड़ कर मुझसे ऐसे चिपक गयी जैसे मुझ में कही समां जाना चाहती हो. ये देख कर मैं मन hi मन हँसा फिर बोलै.

"क्या हुआ तुम दोनों को.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये पूछा तो प्रिय ने कहा.

"तुम बहुत गंदे हो भाई. भला कौन भाई ऐसी हालत में अपनी बहनो को देखता है.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"अच्छा जी तो मैं गन्दा हो गया इस बात se...aur अगर मैं ये कहु की कौन बहने हैं ऐसी जो अपने भाई को इस तरह अपना सब कुछ दिखा देती हैं to.....to क्या कहोगी तुम.?" मैंने ऐसा कहा तो प्रिय ने कहा.

"वो तो गलती से और अनजाने में हो गया था भाई. मांगाŕ तुम्हे तो दरवाजा खटखटा कर या आवाज़ दे कर आना चाहिए था." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"इसमें भी मेरी कोई गलती नहीं थी. क्यों की कमरा मेरा था और मैं जब चाहु तब अपने कमरे में आ जा सकता था. मुझे क्या पता था की उस वक्त तुम दोनों मेरे कमरे में उस हालत में होगी.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"बात तो तुम्हारी सही है भाई मगर तुम नहीं जानते की उसके बाद हमारी क्या हालत हुयी थी. हमारा तो मारे शर्म के बुरा हाल हो गया था. हमें ऐसा लग रहा था जैसे हमारा सब कुछ लूट गया हो." प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"अच्छा ji...kya लूट गया था तुम दोनों का.? ज़रा मुझे भी तो बताओ." मैंने ये कहा तो दोनों फिर से सिकुड़ गयी मगर इस बार पूजा ने कहा.

"हमें क्या पता bhai...hame तो बस ऐसा महसूस हो रहा था." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो जो हुआ सो hua...use भूल जाओ. तुम दोनों लूटने से बच गयी न.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो पूजा ने धीरे से मेरे सीने पर मुक्का मारा और फिर बोली.

"भाई ऐसा तो मत बोलो. तुम्हारी जगह कोई दूसरा होता तो क्या हम लूट जाने से खुद को बचा पते.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"दूसरा कोई यहाँ कैसे होता.?" मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"हाँ ये भी सही बात है भाई." पूजा ने ये कहा तो तभी प्रिय बोल पड़ी.

"वैसे भाई क्या तुम्हे भी हमें उस हालत में देखने के बाद हमारे जैसे शर्म आयी थी. हमारा तो बुरा हाल हो गया था." प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"शुरू शुरू में तो मुझे बड़ा मज़ा आया था तुम दोनों को उस हालत में देख कर मगर फिर शर्म भी आयी थी." मैंने ये कहा तो दोनों ने सर उठा कर मुझे हैरानी से देखा फिर दोनों hi मुझे हलके हाथ से मुक्के मरने लगी और कहने लगी की तुम बहुत गंदे हो भाई. तीन चार मुक्के लगाने के बाद दोनों फिर से वैसे hi लेट गयी.

मैंने ये महसूस किया की मैंने ऐसी बात भले उन दोनों से की थी मगर वो दोनों मुझसे नाराज़ नहीं हुयी थी और न hi मुझसे दूर होने के बारे में सोचा था. वो तो अभी भी मुझसे वैसे hi चिपकी हुयी लेती थी. इसका मतलब तो यही हुआ की उन दोनों को इससे कोई फरक नहीं पड़ा था. मुझे याद आया की दोनों ने मुझसे कुसुम दीदी वाले किस्से पर क्या कहा था. दोनों ने कहा था की मैं कुसुम दीदी को प्रेमी प्रेमिका वाला प्यार करू और उन्हें इससे कोई ऐतराज़ नहीं होगा. इसका मतलब ये था की अगर मैं कुसुम दीदी को वैसा प्यार करुगा तो उससे फ्यूचर में हमारे बीच और भी बहुत कुछ हो सकता था. जिसके बारे में उन दोनों ने भी बहुत कुछ सोच लिया होगा. दीदी वाले रिलेशन से वो मेरे इतना करीब हो गयी थी और उनके मन में ये हो सकता था की इससे वो भी मुझसे प्यार कर सकती हैं. ये सब मेरा अंदाज़ा hi था. इसमें सच्चाई कितनी है इसका पता तो आगे hi चल सकता है. मगर मेरी जिन बातो से उन्हें नाराज़ होना चाहिए था उसमे वो नाराज़ नहीं हो रही थी बल्कि मेरे साथ वैसे hi चिपकी हुयी थी. इसका मतलब कुछ तो था उनके मन में भी.

"अच्छा भाई क्या एक बात सच सच बताओगे हमें.?" पूजा ने अचानक ये कहा तो मैं सोचो की दुनिया से वापस आया और बोलै.

"कौन सी बात.?" मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"Wo...wo रचना दीदी से जब तुम्हारी दोस्ती थी तो तुम दोनों के बीच कुछ हुआ था या नहीं.?" पूजा ने ये कहा तो मैं मन hi मन उसके इस सवाल से हैरान हुआ. मेरी आँखों के सामने वो मंज़र घूम गए जिसमे मैं और रचना एक दूसरे के होठो को चूम रहे थे और मैं उसकी छतियो को भी मसल रहा था. फिर मैंने जल्दी से अपने दिमाग को झटका और बोलै.

"कुछ हुआ था से क्या मतलब है तुम्हारा.?" मैंने जान बुझ कर उससे ये पूछा तो पूजा ने कहा.

"वही bhai....jo आज कल लड़के लड़कियों के बीच होता है." पूजा ने बड़ी मुश्किल से ये बात कही तो मैंने फिर से अनजान बनते हुए कहा.

"क्या होता है लड़के लड़कियों के बीच.?" मैंने ये पूछा तो पूजा थोड़ी देर चुप रही फिर बोली.

"तुम बस समझ जाओ न भाई." पूजा ने ये कहा तो मैं मन hi मन हँसा मगर एक बार फिर से अनजान बनते हुए पूछा.

"अरे यार मैं क्या समझ जाओ.? तुम साफ़ साफ़ बताओ न मुझे." मैंने ये कहा तो इस बार प्रिय ने धीरे से कहा.

"भाई पूजा का मतलब है की क्या तुम दोनों के बीच कभी किश वगैरह हुआ था.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कुछ देर सोचा फिर बोलै.

"तुम दोनों ये सब क्यों पूछ रही हो.?" मैंने ये कहा तो दोनों एकदम से चुप हो गयी. कुछ देर बाद पूजा ने धीरे से कहा.

"भाई हम तो बस jan'na चाहते हैं. बताओ न भाई." पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ ऐसा हुआ था." मैंने ये कहा तो दोनों ने जल्दी से सर उठा कर मेरी तरफ हैरानी से देखा. फिर प्रिय बोली.

"क्या तुम सच कह रहे हो भाई.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए हाँ में अपनी पालक झपका दी तो पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मतलब तुम दोनों ने किश किया था एक दूसरे को मगर कैसे भाई.? अच्छे से बताओ न हमें." पूजा ने ये कहा तो मैंने सोचा की बता hi देता हु इन्हे. मैं भी तो देखु की दोनों ये जान कर क्या कहती हैं.?

"असल में हम दोनों शहर में जब पहली बार संकटमोचन मंदिर में मिले तो वह हम दोनों ने कुछ प्रेमी जोड़े देखे थे मगर एक प्रेमी जोड़े को देख कर हम दोनों hi बुरी तरह हैरान रह गए थे." मैंने ये कहा तो पूजा ने उत्सुकता से पूछा.

"ऐसा क्यों भाई.? तुम दोनों हैरान क्यों हुए थे.?" पूजा ने ये पूछा तो मैंने उसे साफ़ साफ़ बता दिया की वो प्रेमी जोड़ा एक दूसरे के होठ चूम रहे थे और उस लड़के का हाथ उसकी गफ की छाती पर था. मेरी ये बात सुन कर दोनों फटी फटी आँखों से मेरी तरफ देखती रह गयी. फिर कुछ देर बाद पूजा ने कहा.

"फिर क्या हुआ भाई.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने उसे बताया की उस दिन वो सब देखने के बाद जब मैं और रचना दूसरी बार शहर में एक गाढ़ी पर मिले तो उसने मुझसे वैसे hi किश करने को कहा. जब मैंने मन किया तो उसने कहा की वो बस महसूस करना चाहती है की होठो पर किश करने से कैसा लगता है. उसके बाद मैंने प्रिय पूजा को डिटेल में सब बता दिया और ये भी बताया की जिस दिन पिता जी ने मुझे घर से निकला था उस दिन भी मैंने रचना के बुलाने पर और उसके कहने पर उसके होठो पर किश किया था. फिर मैंने ये भी बताया की उस दिन जब मैं रचना को किश कर रहा था तो कैसे अनजाने में मेरा हाथ उसकी छतियो पर चला गया था. साडी बाते सुनने के बाद प्रिय पूजा मेरी तरफ आँखे फाड़े देखती रह गयी थी.

इधर मुझे भी ये सब बताने के बाद बहुत अजीब सा लग रहा था. मैंने ऐसी बाते अपनी बहनो को बताया था जो कोई भी भाई अपनी बहनो से नहीं बता सकता था क्यों की ये गलत था. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था ये सोच कर की मेरी इन बातो से ये दोनों मेरे बारे में क्या क्या सोच रही होंगी. मैंने दोनों की तरफ बारी बारी से देखा. दोनों hi कुछ सोचते हुए चुप चाप मुझसे चिपकी हुयी लेती हुयी थी.

"क्या हुआ.?" मैंने दोनों से ये कहा तो पहले तो वो दोनों कुछ न बोली फिर पूजा ने धीरे से कहा.

"Bhai...to क्या रचना दीदी ने बताया फिर की होठो पर किश करने से कैसा महसूस होता है.?" पूजा ने ये पूछा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा. उसने मेरे सीने में अपना चेहरा छुपाया हुआ था. प्रिय भी ऐसे hi लेती हुयी थी. दोनों को एक एक नज़र देखने के बाद मैंने कहा.

"हाँ जब मैंने उसे पहली बार किश किया था तभी बताया था की उसे कैसा लगा था. वो बता रही थी की किश करते वक्त उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी और hi दुनिया में पहुंच गयी हो. ऐसी दुनिया में जहा पर उसे सब कुछ बहुत ाचा लग रहा था. शायद यही वजह थी की उसने मुझसे उस दिन भी किश करने को कहा था जब मैं उसके भाई रुपेश के जन्म दिन पर उसके घर गया था." मैंने ये सब बताया तो दोनों कुछ न बोली. मुझे समझ नहीं आ रहा था की वो दोनों ये सब क्यों पूछ रही थी और अब ये सब jan'ne के बाद वो दोनों क्या सोच रही होंगी.?

"अच्छा भाई अभी क्या तुम रचना दीदी से मिले हो.?" पूजा ने मेरी तरफ देखते हुए ये पूछा तो मैंने हाँ में सर हिला दिया. ये देख कर पूजा ने कहा.

"तो क्या तुम अभी मिलने के बाद रचना दीदी को वैसे hi फिर से किश किया है.?" पूजा ने ये पूछा तो मैंने हस्ते हुए कहा.

"ये तू क्या पूछ रही है पागल.? ऐसे थोड़ी न कोई किसी को किश कर देता है और मैं अगर उसे मिला भी तो क्या किश hi करने के लिए.? कुछ भी पूछती हो तुम." मैंने ये कहा तो दोनों भी हसने लगी.

"वैसे भाई तुम्हे कैसा लग रहा था जब तुमने रचना दीदी को किश किया था.?" पूजा ने पूछा तो मैंने उसकी तरफ हैरानी से देखा फिर मुस्कुराते हुए कहा.

"मैं न तुम दोनों की अब पिटाई करुगा. ये क्या पूछ रही हो तुम दोनों मुझसे.? कुछ शर्म karo...bhai हु तुम्हारा." मैंने ये कहा तो दोनों ने मुस्कुराते हुए मेरे सीने में फिर से अपना अपना चेहरा छुपा लिया.

थोड़ी देर बाद वो दोनों मेरे कमरे से चली गयी तो मैं उनसे हुयी बातो के बारे में सोचने लगा. पता नहीं दोनों के मन में कैसे कैसे सवाल पैदा हो जाते थे और पता नहीं क्या क्या चलता रहता है दोनों के मन में. फिर मैं रचना के बारे में सोचने लगा. आज से पांच साल पहले हम एक दूसरे से मिलने शहर जाते थे और वह घंटो एकांत में बैठ कर बाते करते थे.

मुझे याद आया की रचना इस वक्त मेरे घर पर hi है. जब मैं रेखा चची के यहाँ से आया था तो मैं माँ के कमरे की तरफ गया था और दरवाजे के पास hi खड़े हो कर मैंने माँ की कुछ ऐसी बात सुनी थी जिसे सुन कर मैं बुरी तरह हैरान हो गया था. मेरे कानो में एकदम से माँ की वो आवाज़ और वो बाते गूंजने लगी. मुझे यकीन नहीं हो रहा था की माँ ऐसा कुछ बोल सकती हैं.

मैं अपने कमरे में hi लेता रहा. मुझे नहीं पता की रचना कब मेरे घर से गयी थी. सारा दिन ऐसे hi गुज़र गया. प्रिय पूजा एक दो बार मेरे कमरे में आयी और थोड़ी देर रुकने के बाद चली भी गयी थी. कुसुम दीदी से मेरी कोई बात hi नहीं होती थी. मैं उनसे अब खुद hi नाराज़ था. मुझे उनके दुःख दर्द से तकलीफ तो हो रही थी मगर उनके इस बेहेवियर से मेरा दिमाग ख़राब हो गया था.

शाम को माँ मेरे कमरे में आयी तो मैं समझ गया की वो मुझसे रचना के बारे में बात करने आयी हैं. माँ ने पहले कमरे का दरवाजा बंद किया उसके बाद वो मेरे पास आ कर बीएड के किनारे पर बैठ गयी. उन्हें देख कर मैं फिर से उनकी कही उन बातो के बारे में सोचने लगा. वो कुछ देर तक मुझे ध्यान से देखती रही फिर बोली.

"बीटा मैंने रचना से बात कर ली है और उसे सब कुछ समझा भी दिया है. पहले तो वो हमारे साथ जाने के लिए राज़ी नहीं हुयी मगर जब मैंने उसे सब कुछ अच्छे से समझाया तो वो मान गयी." माँ ने ये कहा तो मैं कुछ न बोलै. मुझे उम्मीद तो थी की रचना मान hi जाएगी. आखिर वो मुझसे बेहद प्यार करती थी. कौन ऐसा प्यार करने वाला होगा जो अपनी मोहब्बत को पाने की चाहत न करे.?

"मैंने उसे बताया की यहाँ से पहले हम सब जायेगे उसके बाद तू यहाँ वापस आएगा और फिर तू उसे ले कर जायेगा यहाँ से. मेरी इस बात पर उसने कहा की जैसा मुझे ठीक लगे वैसा करू." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"आपने कहा की पहले वो हमारे साथ जाने के लिए राज़ी नहीं हुयी थी. ऐसा क्यों.??" मैंने ये पूछा तो माँ ने कहा.

"ये बात मैंने भी उससे पूछा था. तब उसने बताया की वो अपनी माँ को छोड़ कर कैसे चली जाएगी हमारे साथ.? उसने कहा की उसे हमारे साथ चलने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन वो अपनी माँ की इजाज़त से hi जाना चाहती है." माँ ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उन्हें देखते हुए कहा.

"तो क्या रचना की माँ अपनी बेटी को हमारे साथ जाने देंगी.?" मैंने ये पूछा तो माँ ने कहा.

"उम्मीद तो यही है. वैसे इस बारे में बात करने के लिए मैंने रचना से कहा है की कल वो अपनी माँ को ले कर हमारे घर आये जिससे हम उसकी माँ से भी इस बारे में तरीके से बात कर ले." माँ ने ये कहा तो मैं सोच में पद गया.

मैं सोच रहा था की माँ तो ये सब चुप चाप तरीके से करना चाहती थी जबकि मैं रचना को डंके की चोंट पर यहाँ से ले जाने का सोचे बैठा था. मैं चाहता था की मैं रचना को उसके बाप की जानकारी में और उसके नाक के नीचे से निकाल कर ले जाओ. सारा गांव सरपंच की बेबसी का तमाशा देखता और सरपंच मेरा बाल भी बाक़ा न कर पता.

"कल रचना की माँ से बात करने के बाद हम दूसरे दिन hi यहाँ से चल पड़ेगे. अब यहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं है. वैसे भी मैं अब इस मनहूस गांव में रहना नहीं चाहती हु." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है माँ. आप रचना की माँ से कल बात कर लेना. फिर जैसा भी होगा हम कर लेंगे." मैंने ये कहा तो माँ ने थोड़ी देर सोचने के बाद कहा.

"बीटा कुछ और भी बाते हैं जिन्हे इस वक्त मैं तुझसे नहीं कहुगी. मगर हाँ ये ज़रूर कहुगी की दुनिया में जो कुछ भी होता है वो अच्छे के लिए hi होता है और उसके पीछे भगवन का कोई न कोई मकसद भी ज़रूर होता है. बाकी आने वाले वक्त में क्या लिखा है ये तो भगवन hi जनता है." माँ ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"आपकी इन बातो का क्या मतलब है माँ.?" मैंने ये पूछा तो माँ ने प्यार से मुस्कुराते हुए मेरे चेहरे को सहलाया और फिर कहा.

"वक्त आने पर मेरी बातो का मतलब तू खुद hi समझ जायेगा बीटा और अगर नहीं समझ पाया तो मैं हु na...samjhane के लिए." माँ ने अजीब तरह से ये कहा तो मैं उन्हें देखता रह गया.

उसके बाद माँ मेरे कमरे से चली गयी. मैं कुछ देर माँ की बातो के बारे में सोचता रहा. मैं समझ गया था की वो किस बारे में ऐसा कह रही थी और मैं उसी के बारे में सोच कर इतना हैरान हुआ जा रहा था. फिर मैंने घडी पर टाइम देखा तो शाम के 6 बज रहे थे. मैंने सोचा की चलो बाहर गांव की तरफ घूम लिया जाये. ये सोच कर मैं बीएड से उठा और कपड़ो को ठीक ठाक करके कमरे से बाहर निकल गया.

घर से बाहर आ कर मेरे मन में आया की रेखा चची के घर जाया जाये मगर तभी मेरे मन में ख़याल आया की क्यों न सरपंच काका की तरफ जाया जाये. मन में इस ख़याल के आते hi मैंने सोचा की वह रचना भी मिल सकती है. खेर देखते हैं क्या होता है. मैं घर से सरपंच काका के घर की तरफ चल दिया. पांच मिनट बाद मैं उस तरफ पंहुचा. सरपंच काका के घर से पहले उसके छोटे भाई का घर था.

अँधेरा हो तो गया था मगर इतना भी नहीं की बिलकुल hi न दिखे. मैं सरपंच के छोटे भाई के घर से दस कदम पहले hi था की मेरी नज़र रुपेश पर पड़ी. वो अपने घर से आया था और अब अपने चाचा के घर की तरफ जा रहा था मगर मुझे अजीब ये लगा की वो बार बार पीछे पलट कर अपने घर के दरवाजे की तरफ देख रहा था. मुझे कुछ समझ न आया की ये बार बार अपने घर की तरफ क्यों देख रहा था है. मैं भी अपनी जगह पर रुक गया था उसे देखते हुए.

थोड़ी hi देर में वो आगे बढ़ा और अपने चाचा के घर का दरवाजा खोल कर अंदर चला गया. उसके अंदर जाते hi मैं भी उसी तरफ बढ़ गया. मैं ये तो नहीं जनता था की रुपेश बार बार पलट कर अपने घर की तरफ क्यों देख रहा था मगर उसका जैसा करैक्टर था उसे सोच कर मुझे किसी गड़बड़ का अंदेशा हो रहा था. दरवाजे को मैंने धीरे से अंदर की तरफ धकेला तो वो खुल गया. मैं दरवाजे को थोड़ा सा खोल कर अंदर बढ़ गया. अंदर आ कर मैंने देखा की बैठक में एक लालटेन जल रही थी. शायद लाइट चली गयी थी.

बैठक में कोई न दिखा मुझे तो मैं चुपके से अंदर की तरफ बढ़ा. मेरा दिल तो ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था मगर मैं आगे बढ़ता hi जा रहा था. मुझे ये भी लग रहा था की अगर कोई मुझे मिल गया और उसने मुझसे इस तरह छुप के आने के बारे में पूछा तो मैं बता दुगा की मैं रुपेश को बुलाने आया हु.

मुझे पता चला था की रुपेश की चची को कुछ टाइम पहले लकवा मार दिया था. जिससे उसने बिस्तर पकड़ लिया था. रुपेश के चाचा को दो बच्चे थे. पहले एक बीटा था जिसकी शादी हो चुकी थी और दूसरी बेटी थी. बेटी की भी शादी हो चुकी थी. चाचा का बीटा अरुण उम्र में रुपेश से छोटा था.

मैं थोड़ा हैरान हुआ की घर में अब तक मुझे कोई मिला क्यों नहीं. मैं अंदर आ चूका था और अंदर भी एक लालटेन जल रही थी जिसकी धीमी रौशनी कुछ हिस्सों पर पद रही थी. अंदर जब मैं आया तो रुपेश मुझे कही दिखाई नहीं दिया जिससे मैं हैरान भी हुआ और ये सोचा की ये कहा गायब हो गया है. मुझे यु चोरी छिपे अंदर आने से दर भी लग रहा था मगर जाने क्यों अब मुझे लग रहा था की कुछ बहुत गड़बड़ है.

लेफ्ट साइड दो कमरे थे जिनकी खिड़कियों से मुझे अंदर कमरे में रौशनी का आभास हो रहा था. बीचो बीच बड़ा सा आँगन था. राइट साइड भी दो कमरे बने हुए थे और सामने लेफ्ट से राइट को बड़ा सा हॉल था. राइट साइड वाले कमरों में कोई रौशनी नहीं दिखी मुझे तो मैं लेफ्ट साइड वाले दोनों कमरों की तरफ बढ़ा. फर्स्ट में जो कमरा दिखा तो मैंने उसकी खिड़की से कमरे के अंदर देखा तो मुझे बीएड पर पड़ी रुपेश की चची दिखी जो एक तरफ को करवट लिए पड़ी थी. उसके शिव कमरे में कोई नहीं था.

मैं चुपके से आगे बढ़ा और दूसरे कमरे की खिड़की के पास आया hi था की मेरे कानो में अजीब सी आवाज़ पड़ी तो मैं खिड़की के पास hi रुक गया. मुझे दर भी लग रहा था क्यों की बाहर से कोई भी अंदर आ सकता था और मुझे यहाँ देख सकता था. वो तो अच्छा था की लाइट गयी हुयी थी मगर लाइट का भी कोई भरोसा नहीं था की कब आ जाये.

मैंने धीरे से खिड़की से कमरे के अंदर की तरफ झाँका तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी. अंदर कमरे में रुपेश था और वो अपने चाचा की बहु यानी की उसके बेटे की बीवी को पीछे से अपनी बाहो में पकड़ा हुआ था. रिश्ते में वो औरत रुपेश के छोटे भाई की बीवी यानी भयउ लगे. गांव में छोटे भाई की बीवी को छुआ नहीं जाता और न hi छोटे भाई की बीवी उसको अपना चेहरा दिखा सकती है. मगर यहाँ तो केस hi उल्टा था. रुपेश ने चाचा की बहु को ऐसे दबोचा हुआ था जैसे वो उसकी अपनी बीवी हो. सबसे ज़्यादा हैरानी की बात ये थी की वो औरत कोई विरोध नहीं कर रही थी बल्कि मुस्कुरा रही थी.

मैं ये सब देख कर बहुत ज़्यादा शॉक था. मेरे मन में ख़याल उभरा की वैसे तो ये सेल मेरे घर का पानी इस लिए नहीं पीते क्यों की मेरे दादा जी ने उल्टा पुल्टा काम किया था मगर ये लोग कौन सा सही काम कर रहे थे.? इनको ब्राह्मण समाज अपनी बिरादरी से बेदखल क्यों नहीं करता.?

मैं अभी ये सोच hi रहा था की तभी मेरे कानो में रुपेश की आवाज़ पड़ी. मैंने देखा की वो उस औरत से कह रहा था की टाइम नहीं है ज़्यादा क्यों की चाचा और अरुण खेतो से कभी भी आ सकते हैं इस लिए हम जल्दी से अपना काम कर ले. रुपेश की इस बात से उस औरत ने कहा की तुम जब देखो जल्दी में hi रहते हो. उसकी इस बात से रुपेश ने अपने दोनों हाथो से औरत की छतियो को पकड़ कर ज़ोर से मसलने लगा तो औरत के मुख से मज़े में डूबी सिसकिया निकल गयी.

रुपेश ज़ोर ज़ोर से औरत की छतियो को ब्लॉउज के ऊपर से hi मसल रहा था. उस औरत के दोनों हाथ रुपेश के हाथो के ऊपर hi थे और उसकी गांड रुपेश के लुंड पर गोल गोल घिसाई सा कर रही थी. रुपेश ने पीछे से झुक कर उस औरत के गालो पर अपनी जीभ निकाल कर छठा तो औरत ने अपने एक हाथ से रुपेश के सर के बालो को पकड़ कर अपनी तरफ खींचा. मैं ये सब देख कर बुरी तरह हैरान था और इधर मेरा अपना लुंड जाने कब तन कर खड़ा हो गया था.

मुझे एकदम से ख़याल आया की मुझे इनकी वीडियो बना लेना चाहिए. ये सोच कर मैंने जल्दी से अपना मोबाइल निकला और फिर दोनों की वीडियो बनाने लगा. उधर रुपेश कुछ देर तक औरत की छाती को मसलता रहा उसके बाद उसने जल्दी जल्दी औरत के ब्लॉउज के बटन खोलने लगा. औरत ने कोई विरोध नहीं किया बल्कि वो वैसे hi मुस्कुराती रही. कुछ hi देर में रुपेश ने औरत के ब्लॉउज को उसके जिसम से निकाल कर बीएड की तरफ उछाल दिया. अब वो औरत ब्लैक कलर की ब्रा में थी. उसका दूधिया जिसम गजब का लग रहा था.

रुपेश अपने दोनों हाथो को पीछे ले जा कर उसके ब्रा के हुक को खोल दिया और फिर ब्रा को उसकी बाहो से निकाल कर उसे भी बीएड पर उछाल दिया. अब वो औरत ऊपर से पूरी तरह नंगी हो गयी थी. उसकी दूधिया चूचिया न ज़्यादा बड़ी थी और न ज़्यादा छोटी. पिंक कलर के निप्पल बड़े सुन्दर दिख रहे थे. जैसे hi ब्रा उस औरत के जिसम से हटी तो औरत ने शर्म के मरे अपने दोनों हाथो से अपनी चूचियों को ढंकने की कोशिश की तो रुपेश ने उसे पकड़ कर अपनी तरफ घुमा लिया और फिर झुक कर उसकी चुकी के एक निप्पल को अपने मुँह में भर लिया. जबकि दूसरी छाती को मुट्ठी में भर कर मसलने लगा. इस सबसे उस औरत का बदन थरथरा गया. मज़े से उसकी आँखे बंद हो गयी और उसने रुपेश के सर को पकड़ कर अपनी उस चुकी पर ऐसे दबाया जैसे उसे अपना बच्चा समझ कर अपना दूध पीला रही हो.

रुपेश बड़े मज़े से और बड़े ज़ोर ज़ोर से उसके निप्पल को चूसे जा रहा था. औरत के मुख से नशे में डूबी सिसकिया निकल रही थी जिन्हे वो अपने होठो को भींच कर दबाने की कोशिश कर रही थी. कुछ देर बाद रुपेश उससे अलग हुआ और फिर उसकी साडी और पेटीकोट को उसके बदन से निकलने लगा.

"कोमल डार्लिंग ज़्यादा टाइम नहीं है हमारे पास वर्ण कसम से आज तुझे तबियत से छोड़ता और तेरी छूट को फाड़ डालता आज." रुपेश ने धीरे से ये कहा तो कोमल ने शरमाते हुए धीरे से hi कहा.

"हे भगवन इतनी गन्दी बात मत बोलै करो मुझे शर्म आती है." कोमल ने ये कहा तो रुपेश ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मेरा लुंड लेने के बाद भी शर्मा रही है मेरी रानी. खेर छोड़ चल अब जल्दी से बीएड पर अपनी टाँगे चौड़ी करके लेट जा. हम जल्दी से चुदाई कर लेते हैं वर्ण तेरा वो गांडू पति और तेरा वो हिजड़ा ससुर आ जायेगा." रुपेश ने ये कहा तो कोमल जल्दी से बीएड पर सीढ़ी लेट गयी और फिर उसने अपनी टांगो को फैला लिया. ये देख कर रुपेश ने जल्दी से अपने पेंट और कच्छे को उतरा और फिर अपने तन्नाए हुए लुंड के साथ बीएड पर कोमल के ऊपर आ गया.

कोमल के ऊपर आते hi रुपेश ने पहले कोमल की चुकी को मसला फिर अपने एक हाथ से लुंड को पकड़ कर कोमल की छूट पर सेट किया और फिर झटके से उसे पूरा अंदर तक दाल दिया. लुंड जैसे hi झटके से अंदर गया तो कोमल को दर्द हुआ और उसकी चीख निकलने hi वही थी उसने जल्दी से अपने मुँह पर अपना हाथ कुकर के ढक्कन की तरह रख लिया.

मैं खिड़की के पास खड़ा ये सब अपनी आँखों से देख रहा था और इस सबकी वीडियो भी बना रहा था. मेरा लुंड अब बुरी तरह अकड़ गया था और दर्द कर रहा था. रुपेश का लुंड ज़्यादा बड़ा नहीं था बल्कि उसके लुंड से बड़ा उसके बाप का लुंड था मगर मेरा लुंड तो दोनों बाप बेटो के लुंड से बड़ा था. मेरे मन में ख़याल आया की कुछ ऐसा किया जाये की मेरे लुंड की भी तड़प निकल जाये. कुछ दिनों से बहुत न इंसाफ़ी कर रहा था मैं अपने लुंड के साथ. मगर सवाल था की इसके साथ इन्साफ कैसे करू.?

मैंने जल्द hi एक मस्त प्लान सोच लिया. मुझे रुपेश को यहाँ से भागना पड़ेगा. उसके बाद hi कुछ हो सकता है. मैंने अँधेरे का फायदा उठाने का सोचा. वीडियो तो मैंने बना hi लिया था. अब और ज़्यादा कुछ बनाने की ज़रूरत नहीं थी. ये सोच कर मैं वापस आया और इस तरफ वाले हिस्से पर आ कर मैंने इधर उधर किसी चीज़ की तलाश में नज़र घुमाई तो मुझे एक कोने में एक लट्ठ दिवार पर टिकाया हुआ दिखा. मैंने मुस्कुराते हुए उस लट्ठ को उठाया और फिर बैठक की तरफ आ कर मैंने पहले लट्ठ को ज़मीन पर ठोंक कर ज़ोर से बजाय फिर आवाज़ बदल कर रुपेश का नाम पुकारा. उसके बाद मैं जल्दी से अँधेरे में छुप गया.

मेरे ऐसा करने का बड़ा तेज़ असर हुआ था. चोर में जान hi कितनी होती है. थोड़ी hi देर में रुपेश भागता हुआ बाहर की तरफ आता दिखा मुझे. बहुत ज़्यादा डरा और घबराया हुआ दिख रहा था वो मुझे. मैंने देखा की वो अपनी पेंट की ज़िप बंद करते हुए बाहर आ रहा था. कुछ hi पालो में वो बाहर निकल गया. मैं भी अँधेरे से निकल कर उसके पीछे ये देखने गया की वो चला गया की नहीं. क्यों की हो सकता है वो वापस आ जाये. मगर बाहर रुपेश मुझे कही न दिखा. मैं समझ गया की वो दर के मरे अपने घर hi चला गया है और अब वापस नहीं आएगा. उसे लगा होगा की उसका चाचा और उसके चाचा का बीटा आ गए हैं. खेर इधर मैं जल्दी से वापस आया और दरवाजे को बंद कर दिया.

मैं समझ गया था की घर में इन दो औरतो के अलावा कोई नहीं है. रुपेश का चाचा और उसका बीटा खेतो में हैं. मैं दर तो बहुत रहा था मगर अब मैंने सोच लिया था की कोमल को चोदे बिना यहाँ से नहीं जाउगा. दरवाजा बंद कर के मैं दबे पाँव अंदर उसी कमरे की खिड़की की तरफ गया तो देखा अंदर कमरे में कोमल जल्दी जल्दी साडी लपेटने में लगी थी. मतलब उसने ब्रा ब्लॉउज और पेटीकोट पहन लिया था. मैंने ये देखा तो मुझे लगा कही ऐसा न हो की मैं लेट हो जाओ और इसे छोड़ भी न पाउ.

मैं एकदम से खिड़की से हटा और कमरे में दबे पाँव आ गया. कोमल की पीठ मेरी तरफ hi थी और वो अपनी साडी लपेट रही थी. मैं दबे पाँव आगे बढ़ा. मेरा दिल ट्रैन की स्पीड से भी ज़्यादा तेज़ धड़कते हुए भाग रहा था. कोमल के पीछे पहुंच कर मैंने उसे मजबूती से अपनी बाहो में भर लिया. मैंने जैसे hi उसे अपनी बाहो में लिया तो वो पहले तो एकदम से घबरा गयी फिर उसने मुस्कुराते हुए kaha....kaun आया था जी.? उसने जब ये कहा तो मैं समझ गया की ये मुझे रुपेश समझ रही है. ये देख मैं मन hi मन थोड़ा मुस्कुराया फिर धीरे से bola....koi नहीं था मेरी rani...aur जो था वो चला गया.

कोमल ने जैसे hi ये दूसरी आवाज़ सुनी तो वो बुरी तरह घबरा गयी और मुझसे छूटने की कोशिश करने लगी. मैं ये तो पहले से जनता था की ऐसा hi होगा और ये भी हो सकता है की वो चिल्लाये. इस लिए मैंने उससे धीरे से कहा की अगर उसने मुझसे छूटने की और चिल्लाने की कोशिश की तो मैं सबको बता दुगा की वो रुपेश से छुड़वा रही थी. मेरी इस बात ने उस पर असर किया. वो एकदम से कुछ पल के लिए शांत हुयी उसके बाद उसने मुझसे कहा ये सब झूठ है और कौन हो tum...tumhari हिम्मत कैसे हुयी मेरे साथ ऐसा करने ki....chhod दो मुझे वर्ण तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा.

कोमल की इस बात से मुझे गुस्सा आ गया. ये मुझे बिना मतलब की धमकी दे रही थी और खुद अभी रुपेश से छुड़वा रही थी. मैंने उससे थोड़ा गुस्से से कहा की मैंने मोबाइल में उसकी और उसके यार की साडी करतूत का वीडियो बना लिया है. मेरी ये बात सुनते hi उसकी हालत पतली हो गयी. मैंने उससे कहा की अगर उसने यहाँ पर शोर शराबा करने की कोशिश की तो मैं वो वीडियो सबको दिखा दुगा. मेरी इस बात से वो बुरी तरह घबरा गयी और कहने लगी की तुम ऐसा नहीं कर सकते. तुम्हारे पास ऐसा वीडियो कैसे आ गया तो मैंने उसे छोड़ दिया और अपना मोबाइल निकाल कर उसे वो वीडियो दिखाया. अपना ऐसा वीडियो देख कर कोमल बुरी तरह घबरा गयी. उसकी आँखों में आँशु आ गए. वो मेरे सामने हाथ जोड़ने लगी और कहने लगी मुझे माफ़ कर दो. अब दुबारा ऐसा कभी नहीं करुँगी.

कोमल की इन बातो से मैंने उससे पूछा की मुझे जानती हो तो उसने कहा नहीं. ये सुन कर मैंने सोचा की ये तो अच्छी बात है. अब ये रुपेश को बता भी नहीं पायेगी की किसने उसके साथ कुछ किया था. खेर मैंने उससे कहा की मैं उसकी वीडियो किसी को नहीं दिखाऊगा मगर उसके बदले में उसे अपनी छूट मुझे देनी पड़ेगी अभी. मेरी ये बात सुन कर वो गुस्सा करने लगी तो मैंने कहा ठीक है फिर मैं जा रहा हु सबको दिखने. मेरी इस बात से वो मजबूर हो गयी और बोली ठीक है मगर किसी को मत बताना.

मुझे उसके साथ ऐसा करना अच्छा तो नहीं लग रहा था मगर मैं भी अब मजबूर हो गया था. साले इन दोनों बाप बेटो की वजह से मेरा लुंड कई दिनों से तड़प रहा था. मैंने मोबाइल को अपनी पॉकेट में डाला और फिर कोमल की तरफ बढ़ा. वो दरी सहमी सर झुकाये कड़ी थी. मुझे उस पर तरस आ रहा था. मेरा दिल कह रहा था की मुझे उसके साथ ऐसा नहीं करना चाहिए मगर मैं बार बार अपने दिल की आवाज़ को दबा रहा था और फिर उसके पास पहुंच कर मैंने उसके चेहरे को अपने हाथो से पकड़ कर उठाया तो देखा उसके चेहरे पर दर और घबराहट थी. वो मुझसे नज़र नहीं मिला प् रही थी.

"क्या वो सब तुम अपनी ख़ुशी से कर रही थी रुपेश के साथ.?" मैंने उससे धीरे से ये पूछा तो उसने मेरी तरफ देखा मगर कहा कुछ नहीं तो मैंने फिर से उससे पूछा तो उसने कहा की मुझे इससे क्या मतलब तो मैंने इस बार गुस्से से कहा की बताओ वर्ण ठीक नहीं होगा. मेरी इस बात से उसने कहा.

"हाँ मैं ये सब अपनी ख़ुशी से कर रही थी क्यों की ये मेरी मज़बूरी बन गयी थी. मेरा पति मुझे इसका सुख नहीं दे सकता और न hi कभी मुझे माँ बना सकता है." कोमल ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा तो उसने कहा.

"सुहागरात को hi मुझे पता चला की अरुण बाप नहीं बन सकते. वो शुरू से ऐसे नहीं the...unhone hi बताया की एक बार वो खेतो पर एक पेड़ से नीचे गिर गए थे और उसी में कुछ ऐसा हो गया था जिससे उनके गुप्तांग पर असर हुआ था. उनकी इस बात का पता उनके घर वालो को आज भी नहीं है. जब मैंने उनसे कहा की जब उन्हें पता था की वो मुझे माँ नहीं बना सकते तो उन्होंने मुझसे शादी क्यों की थी.? क्यों मेरी ज़िन्दगी बर्बाद की? मेरी इस बात से अरुण ने कहा की वो नहीं चाहते थे की उनकी इस बात का पता उनके घर परिवार को चले वर्ण वो किसी को मुँह दिखने के काबिल न रहते." कोमल ने ये सब बताया तो मैंने कहा.

"उसके बाद क्या हुआ.? और तुम्हारा रुपेश से ऐसा सम्बन्ध कैसे बना.?" मैंने ये पूछा तो कोमल ने बताया.

"अरुण ने जब अपने बारे में वो सब बताया तो मैंने कहा की इससे मेरी ज़िन्दगी तो बर्बाद हो hi गयी और अगर तुम मुझे माँ नहीं बना पाओगे तो घर वाले क्या सोचेंगे.? मेरी इस बात से अरुण ने मुझसे हाथ जोड़ के कहा की अगर मैं चाहु तो माँ भी बन सकती हु और उन्हें बाप भी बना सकती हु. तब उन्होंने कहा की मैं अपनी ख़ुशी के लिए जिससे चाहे ऐसा सम्बन्ध बना लू. उन्हें इससे कोई ऐतराज़ नहीं होगा. मैं उनकी इस बात से गुस्सा तो हुयी मगर मुझे भी जल्द hi समझ आ गया की इसके शिव दूसरा कोई रास्ता नहीं था. अरुण ने hi कहा की मैं बाहर के किसी आदमी से सम्बन्ध न बनाओ बल्कि घर के hi किसी आदमी से बनाओ. ऐसा इस लिए क्यों की घर की बात घर में hi रहेगी. बाहर का आदमी हमें बदनाम भी कर सकता था. तब अरुण के hi कहने पर मैंने रुपेश जी को फसाया और उनके साथ ऐसे सम्बन्ध बनाये. अरुण ने मुझसे कहा था की मैं रुपेश जी को ये कभी न बताओ की ऐसा करने के लिए उन्होंने मुझसे कहा था. क्यों की इससे रुपेश के सामने उनकी इज्जत मिट्ठी में मिल जाएगी." कोमल ने ये सब बताया तो मैंने कहा.

"ओह्ह तो ये बात है." मैंने ये कहा तो कोमल ने कहा.

"हाँ अरुण को पता है की इस वक्त रुपेश यहाँ होंगे और इसी लिए वो पिता जी के साथ खेतो से आज देर से hi आएंगे. खेतो में आज पानी लगाया जा रहा है. इसी काम का बहाना लगा कर अरुण पिता जी को भी यहाँ आने से रोके rahege.....magar तुम कौन हो और ये सब क्यों पूछ रहे हो मुझसे.?" कोमल ने मुझसे ये पूछा तो मैं मुस्कुराया और फिर बोलै.

"चलो छोडो यार जाने do....agar ऐसी बात है तो मैं तुम्हारे साथ कुछ नहीं करुगा. पहले मुझे लगा था की तुम ये सब इस लिए करती हो क्यों की तुम चरित्रहीन औरत हो जो अपने घर परिवार के मान सम्मान का इस तरह से हनन कर रही हो. मगर अब समझ आया की ये तुम्हारी मज़बूरी है. मैंने सोचा था की बहती गंगा में मैं भी डुबकी लगा लगा और अपने छोटे उस्ताद की तड़प को दूर कर दुगा मगर ये सब jan'ne के बाद अब मैं ऐसा कुछ नहीं करुगा. अच्छा अब मैं चलता hu...aur हाँ मैंने तुम्हारे साथ ये जो ज़बरदस्ती की उसके लिए मुझे माफ़ कर देना." मैंने ये सब कहा तो कोमल ने आँखे फाड़ कर मेरी तरफ देखा. शायद उसे भरोसा नहीं हो रहा था की कोई इंसान इतने ज़बरदस्त मौके पर भी कुछ न करेगा और चला जायेगा. कोमल आँखे फाड़े मुझे देखने लगी थी. उसके मुख से कोई बोल न फूटा था.

"एक बात ज़रूर कहुगा भाभी ji....majburi में hi सही मगर जिस आदमी से तुमने ये सम्बन्ध बनाया है वो अच्छा आदमी नहीं है. जाने कितनी hi बहु बेटियों से उसके सम्बन्ध हैं. उसको तो ज़रूर एक दिन एड्स की बिमारी होगी. उसकी औलाद भी उसके जैसी hi होगी." मैंने ये कहा तो कोमल ने नज़रे झुका के कहा.

"हाँ मुझे पता है उनके बारे में मगर इसमें मैं क्या कर सकती हु.? घर परिवार में एक वही तो हैं जिनके साथ मैं ऐसा कर सकती थी. बाकी परिवार भी है मगर वो सब दूसरे हैं. दूसरी बात ये भी है की अगर मैं ऐसा नहीं करुँगी तो इस घर का वारिश कैसे आएगा.? इस घर का वंश कैसे चलेगा.?" कोमल ने इस बार नाम आँखों से ये कहा तो मुझे अजीब लगा. मगर मैं इसमें क्या कह सकता था. इस लिए मैंने उससे कहा की मैं जा रहा हु तो उसने एकदम से मेरा हाथ पकड़ लिया तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा.

"मैं नहीं जानती की तुम कौन हो मगर इतना कुछ देखने सुनने के बाद जो कुछ भी तुमने कहा और अब मेरे साथ बिना कुछ किये यहाँ से जा रहे हो उससे यही लगता है की तुम एक अच्छे लड़के हो. तुम्हे देख कर लगता है की तुम एक अच्छे ब्राह्मण के घर से hi होंगे. इस लिए अगर मैं खुद तुमसे ये कहु की तुम hi मुझे इस घर का वरिष्ठ दे दो तो क्या तुम ऐसा नहीं करोगे.?" कोमल ने ये सब कहा तो मैं बुरी तरह हैरान रह गया.

कहा मैंने क्या सोच के क्या किया और फिर क्या करने का मन बना कर यहाँ आया था मगर हकीकत जानने के बाद जब मेरा मन बदल गया तो अब ये कोमल मुझसे क्या कह रही थी. मुझे भरोसा नहीं हो रहा था की एक अजनबी आदमी से कोमल ऐसा कैसे कह सकती थी.? मेरी हालत देख कर कोमल ने मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"मैं जानती हु की तुम क्या सोच रहे हो मगर मैं इतना समझ गयी हु की तुम एक अच्छे इंसान हो. वर्ण इतना बड़ा मौका आज के वक्त में कौन मर्द छोड़ के जाने की बात करता है.? मैं तुम्हे मजबूर नहीं karugi...magar इतना ज़रूर कहुगी की अगर हो सके तो इतना उपकार मुझ पर ज़रूर कर दो और मुझे माँ का सुख दे डोज तो मुझे ख़ुशी hi होगी. मुझे ज़रा भी मलाल नहीं होगा की मैंने किसी अजनबी से ऐसा सम्बन्ध बनाया." कोमल ने ये सब कहा तो मुझे समझ में न आया की मैं अब क्या करू.? साला ये किस चक्कर में फास गया था मैं.?

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 33


कहा मैंने क्या सोच के क्या किया और फिर क्या करने का मन बना कर यहाँ आया था मगर हकीकत जानने के बाद जब मेरा मन बदल गया तो अब ये कोमल मुझसे क्या कह रही थी. मुझे भरोसा नहीं हो रहा था की एक अजनबी आदमी से कोमल ऐसा कैसे कह सकती थी.? मेरी हालत देख कर कोमल ने मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"मैं जानती हु की तुम क्या सोच रहे हो मगर मैं इतना समझ गयी हु की तुम एक अच्छे इंसान हो. वर्ण इतना बड़ा मौका आज के वक्त में कौन मर्द छोड़ के जाने की बात करता है.? मैं तुम्हे मजबूर नहीं karugi...magar इतना ज़रूर कहुगी की अगर हो सके तो इतना उपकार मुझ पर ज़रूर कर दो और मुझे माँ का सुख दे डोज तो मुझे ख़ुशी hi होगी. मुझे ज़रा भी मलाल नहीं होगा की मैंने किसी अजनबी से ऐसा सम्बन्ध बनाया." कोमल ने ये सब कहा तो मुझे समझ में न आया की मैं अब क्या करू.? साला ये किस चक्कर में फास गया था मैं.?

अब आगे पढ़िए....


मैं कोमल की इन बातो से बड़ी दुविधा में फास गया था. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं क्या करू. कहा इसके पहले मैंने कोमल को ज़बरदस्ती छोड़ने का ख़याल बना लिया था जिसकी वजह से बवाल भी हो सकता था मगर अब सिचुएशन ऐसी हो गयी थी की कोमल खुद hi मुझसे कह रही की मैं उसे छोड़ू और उसे माँ का सुख दू.

मैंने सुना था की भगवन जब भी देता है तो छप्पर फाड़ के देता है मगर जब लेता है तो सब कुछ फाड़ के ले भी लेता है. खेर यहाँ तो अभी दे hi रहा था. मैंने तो ख्वाब में भी ये नहीं सोचा था की ऐसा सन हो जायेगा. अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी कोमल ने कहा.

"ज़्यादा सोचने का वक्त नहीं है हमारे पास. मेरे पति और मेरे ससुर कभी भी घर आ सकते हैं. अगर तुम चाहते हो की मुझे माँ का सुख मिले तो फिर देर न करो. मैं खुद कह रही हु की तुम मेरे साथ वो करो जो इसके पहले मेरे जेठ जी मेरे साथ कर रहे थे." कोमल ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा.

मैंने सोचा की जब कोमल खुद hi कह रही है तो मुझे क्यों मन करना चाहिए.? इसने तो अपने जेठ से भी छुड़वा लिया तो मैं तो भला खून के रिश्ते से दूर hi हु. मेरे अंदर कही से आवाज़ आयी सब कुछ जायज़ है.

मैंने कोमल को पहली बार ध्यान से देखा. जैसा उसका नाम था वैसी hi थी वो. कद काठी ठीक hi थी उसकी और रूप रंग भी काफी साफ़ था. उम्र यही कोई 23 या 24 साल होगी उसकी. उसकी खूबसूरत छतियो को तो मैं देख hi चूका था मगर अब उसका चेहरा ध्यान से देख रहा था. गोर चेहरे पर हलकी लाली नज़र आयी मुझे और आँखों में एक आस. वो मुझे hi देख रही थी. मैं अच्छी तरह समझ गया था की अब अगर मैं उसके साथ कुछ भी करू तो वो मुझे रोकेगी नहीं. यही सोच कर मैं आगे बढ़ा और दोनों हाथो से उसके खूबसूरत चेहरे को थाम लिया. मेरे ऐसा करते hi उसके जिसम में झुरझुरी सी होती महसूस हुयी मुझे.

मैंने अपनी हथेलियों के बीच उसके चेहरे को लिया हुआ था और कभी उसकी आँखों में देखता तो कभी उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठो को. जबकि वो बस मेरी आँखों में देखे जा रही थी. उसकी साँसे भरी हो गयी थी.

"एक बार फिर से सोच लो तुम इस बारे में." मैंने ये कहा तो उसके होठो पर हलकी सी मुस्कान उभरी फिर उसने कहा.

"अगर मैं सोचने की हालत में होती तो मेरे इस जिस्म पर सिर्फ मेरे पति का hi अधिकार होता. दूसरे किसी मर्द की मेरे इस जिस्म पर छाया भी नहीं पड़ती. ये मेरी किस्मत है जिसने मुझे ऐसे हालात पर ला खड़ा किया है. खेर chhodo...tum आगे बढ़ो अजनबी. तुम जो भी करोगे या जो भी करने को कहोगे उसे मैं ख़ुशी ख़ुशी करुँगी." कोमल ने ये सब कहा तो मैं देखता रह गया उसे. सच hi तो कहा था उसने की ये उसकी किस्मत hi थी.

"ठीक है फिर. मैं नहीं जनता की इस सबका नतीजा क्या निकलेगा मगर मैं पूरी कोशिश करुगा की तुम्हारी मुराद पूरी हो जाये." मैंने ये कहा और फिर झुक कर उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठो पर अपने होठ रख दिए. उसके बाद मैंने उसके होठो को चूमना शुरू कर दिया. कितने सॉफ्ट थे उसके होठ और मीठे भी. दो तीन बार मैंने चूमा फिर उन्हें अपने मुँह में भर कर उनके रास को पीने लगा.

कोमल का जिसम एकदम से थरथरा कर रह गया. पहले तो वो एकदम पत्थर की मूरत की तरह कड़ी रही मगर कुछ hi पालो में उसने भी मेरा साथ देना शुरू कर दिया. जैसे मैं उसके होठो को चुम और चाट रहा था वैसे वो भी करने लगी थी. मैं जनता था की हमारे पास वक्त बहुत काम है. मुझे काम वक्त में बहुत बड़ा काम करना था.

मैंने कोमल के होठो को चूमते हुए उसकी राइट चुकी को अपने राइट हैंड से पकड़ा और उसे पहले धीरे से दबाया उसके बाद थोड़ा ज़ोर ज़ोर से मसलने लगा. कोमल की सॉफ्ट सॉफ्ट चूचिया मेरी हथेली में बड़ा hi सुखद अहसास करा रही थी. उधर कोमल की साँसे भरी होने लगी. उसकी सिसकारियां मेरे मुँह में निकलती महसूस हो रही थी. नाक से निकलती गरम गरम साँसे मैं अच्छी तरह फील कर रहा था.

कुछ देर बाद मैंने कोमल के होठो से अपने होठो को हटाया और उससे कहा की वो अपने कपडे उतार कर बीएड पर लेट जाये. मेरे कहने पर उसने वैसा hi किया. मैंने जीन्स का पेंट और ऊपर एक ब्लैक टीशर्ट पहना हुआ था. जब तक मैंने जीन्स का पेंट उतरा तब तक में कोमल ने अपनी साड़ी को निकाल लिया था और अब ब्लॉउज के बटन खोल रही थी. उसके चेहरे पर शर्म मैं साफ़ देख सकता था. मगर वो जैसे अपनी शर्म की कोई परवाह नहीं कर रही थी. कुछ hi देर में कोमल मेरे सामने ब्लैक ब्रा और पैंटी में कड़ी दिखी. इस हालत में आने के बाद उसकी शर्म और भी बढ़ गयी. वो एकदम से सिकुड़ी सिकुड़ी सी नज़र आने लगी थी और उसकी नज़रे नीचे झुक गयी थी.

मैंने कोमल को पकड़ कर बीएड पर सीधा लेता दिया और फिर अपने कच्चे को झटके से उतार दिया. जिससे मेरा छोटा उस्ताद पुरे जलाल पर उछलता हुआ बाहर आ गया. कोमल की नज़र जैसे hi मेरे लुंड पर पड़ी तो वो हैरान रह गयी. मैं वक्त बर्बाद न करते हुए आगे बढ़ा और बीएड पर कोमल के ऊपर आ गया. शर्म तो मुझे भी बहुत आ रही थी मगर मैंने खुद को सम्हाला हुआ था.

"ज़रा धीरे से अंदर डालना. तुम्हारा वो बहुत बड़ा hai...kahi ऐसा न हो की मेरी दर्द से चीख निकल जाये और उस चीख से बगल के कमरे में पड़ी मेरी सासु माँ को पता चल जाये." कोमल ने धीरे से मुझसे ये कहा तो मैं मुस्कुरा पड़ा और झुक कर उसके होठो को अपने मुँह में भर लिया.

उसके होठो को मुँह में भरने के बाद hi मैंने अपने लुंड को उसकी छूट में अंदर धीरे धीरे डालना शुरू कर दिया. वैसे तो मुझे भी एक hi झटके में लुंड को अंदर तक दाल देने की आदत थी और मुझे औरत की चीख sun'ne में मज़ा आ जाता था मगर यहाँ हालात अलग थे. मेरा लुंड कोमल की छूट को फैलता हुआ अंदर तक जाने लगा.

मैंने कोमल के होठो को मुँह में भरा हुआ था जिससे उसकी आवाज़ बाहर नहीं निकल सकती थी. मेरा लुंड उसकी छूट में हाफ चला गया और फिर जब मैं लुंड को और अंदर डालने लगा तो कोमल कसमसाने लगी. मैं समझ गया की इसकी छूट में यही तक दूसरे लुंड गए थे. कोमल की छूट मुझे दक्षिणा और किरण की छूटो से टाइट लगी. मेरा लुंड उसकी छूट में फास फास के जा रहा था. मैंने महसूस किया की कोमल को दर्द हो रहा है इस लिए मैं रुक गया और कोमल के होठो को आज़ाद किया तो कोमल ने हलके दर्द से कहा.

"क्या सारा अंदर चला गया.?" कोमल ने मुझसे ये पूछा तो मैंने मुस्कुराते हुए न में सर हिलाया तो कोमल ने हैरानी से मेरी तरफ देखा फिर बोली.

"अब और अंदर मत daalna...mujhe इतने से hi दर्द हो रहा है. मेरे पति का और रुपेश जी का तुमसे बहुत छोटा है." कोमल ने ये कहा तो मैंने झुक कर उसके कान में धीरे से कहा.

"जब तक पूरा लुंड अंदर तक नहीं जायेगा तब तक कैसे तुम्हे मज़ा आएगा और तुम माँ का सुख कैसे ले पाओगी.?" मैंने ये कहा तो कोमल ने अजीब तरह से देखा मुझे. फिर मैंने उसके कांपते होठो को फिर से मुँह में भरा और फिर ज़ोर का एक झटका दिया तो मेरा पूरा लुंड कोमल की छूट में अंदर तक समाते हुए उसके बच्चे दानी में जा लगा. इस झटके से कोमल बुरी तरह छटपटाने लगी थी मगर मैंने उसे मजबूती से पकड़ा हुआ था और उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकलने दी थी.

कुछ देर तक मैं रुका रहा और फिर जब मुझे लगा की कोमल का दर्द अब काम हो गया होगा तो मैं अपनी कमर को धीरे धीरे ऊपर नीचे करने लगा. लालटेन की रौशनी में मैंने देखा की कोमल की आँखों में आँशु भर आये थे. जब मैंने उसके होठो को दुबारा आज़ाद किया तो उसने कहा की बड़े जालिम हो तुम.

कुछ देर धीरे धीरे धक्के लगाने के बाद मैंने धक्को की स्पीड बढ़ा दी. बीएड पर लेती कोमल की छतिया मेरे हर धक्के पर उछाल रही थी. मैंने झुक कर उसकी चुकी के एक निप्पल को मुँह में भर लिया और उसे ज़ोर ज़ोर से ऐसे चूसने लगा जैसे मैं उसमे से दूध निकलने की कोशिश कर रहा हो. कोमल ने अपने दोनों हाथो से मेरे सर को पीछे से पकड़ लिया और अपनी छाती पर दबाने लगी. मैं अब तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगा था.

कमरे में कोमल की हलकी सिसकिया गूँज रही थी और मज़े से उसकी आँखे बंद थी. मैं अब पुरे जोश से उसकी छूट में अपने लुंड को अंदर बाहर करता जा रहा था. कोमल की छूट बुरी तरह गीली हो गयी थी जिससे अजीब सी आवाज़ आने लगी थी. जैसे जैसे मैं धक्को की स्पीड बढ़ा रहा था कोमल के सिसकियों की आवाज़ भी तेज़ होती जा रही थी जिसे वो अपने मुँह में अपना एक हाथ रख कर दबाने की कोशिश कर रही थी.

"हाय इतना मज़ा आज से पहले कभी नहीं आया मेरे राजा. कहा थे अभी तक तुम.? हाय मुझे ऐसे hi मज़े से chodo...mujhe अपने बच्चे की माँ बना दो. काश तुम मेरे पति होते. Aaahhhhh...tumhara वो जब अंदर तक जाता है तो मुझे बहुत ज़्यादा मज़ा आता है." कोमल धीमी आवाज़ में ये बोले जा रही थी. जिससे मुझे और ज़्यादा जोश आ रहा था.

"क्या तुम्हे रुपेश से ऐसा मज़ा नहीं आया कभी.?" मैंने ज़ोर ज़ोर से धक्के मारते हुए उससे ये पूछा तो उसने कहा.

"नहीं मेरे raja...ab जब तुम कर रहे हो तो यही लग रहा है की इसके पहले ऐसा मज़ा कभी नहीं आया मुझे. रुपेश जी पांच मिनट में hi फुसस्स हो जाते थे. आअह्ह्ह तुम सच में असली मर्द हो. काश तुम मुझे ऐसे hi रोज़ छोड़ो तो कितना अच्छा हो. उफ्फ्फ्फ़ आआह्ह्ह्हह ऐसे hi और ज़ोर se...aaahhhh." कोमल मज़े में बावली हुयी जा रही थी.

मैंने उसकी छूट से लुंड निकला और उसे उल्टा लेटने का इशारा किया तो कोमल जल्दी से पलट गयी. मैंने उसकी कमर को पकड़ा और ऊपर की तरफ खींचा तो उसकी गांड ऊपर की तरफ उठ गयी. कोमल भी समझ गयी थी की मैं क्या चाह रहा था. उसकी गांड जैसे hi ऊपर हुयी तो मुझे काले बालो के बीच उसकी छूट दिखी. मैंने एक हाथ से अपने गीले लुंड को पकड़ा और कोमल की छूट में धीरे धीरे करके अंदर तक दाल दिया. लुंड जैसे hi अंदर गया तो कोमल की सिसकी निकल गयी. उसने बीएड पर अपने सर को रख लिया था और दोनों हाथो से बीएड की चादर को पकड़ लिया था.

कोमल की छूट में लुंड डालने के बाद मैंने उसकी कमर को पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से उसे छोड़ना शुरू कर दिया. मेरे ऐसा करते hi कोमल की सिसकिया और आहे निकलने लगी तो उसने जल्दी से अपने एक हाथ की हथेली को मुँह में रख लिया. कोमल की छूट बड़ा मज़ा दे रही थी मुझे. कुछ देर इसी पोजीशन में उसको छोड़ने के बाद मैंने लुंड को उसकी छूट से बाहर निकला तो उसने सर को पीछे करके मेरी तरफ देखा तो मैं चुप चाप बीएड पर उसके बगल से सीधा लेट गया जरूर फिर उसे अपने ऊपर आने को कहा.

कोमल मेरे लुंड पर अपनी छूट को सेट करके धीरे धीरे बैठ गयी. जब मेरा लुंड उसकी गरम और गीली छूट में अंदर तक चला गया तो मैंने उसकी कमर को पकड़ा और नीचे से धक्के लगाने लगा. मेरे ऐसा करते hi कोमल मेरे ऊपर गिरने hi वाली थी की उसने जल्दी से मेरे सीने पर अपने दोनों हाथ रख कर खुद को सम्हाला. उसकी चूचिया बुरी तरह उछलने लगी थी. कोमल ज़ोर ज़ोर से सिसकिया ले रही थी. उसकी आँखे मज़े से फिर बंद हो गयी.

"आअह्ह्ह्ह ये कैसे कैसे तरीके से मुझे मज़ा दे रहे हो तुम. आअह्ह्ह कितना मज़ा आ रहा है मुझे. मुझसे वडा करो की तुम हर रोज़ मुझे ऐसे hi छोड़ोगे. तुम जहा कहोगे मैं वह आ जाओगी तुमसे छुड़वाने के लिए. उफ्फ्फफ्फ्फ़ ससससस आआह्ह्ह तुम्हारा वो मोटा तगड़ा सच में कमाल का है." कोमल ने ये कहा और फिर झुक कर मेरे होठो को चूमने चाटने लगी. कुछ hi देर में कोमल की सिसकिया और तेज़ हो गयी और वो खुद भी मेरे साथ एक रिदम में अपनी गांड को ऊपर नीचे करने लगी.

कोमल एकदम से पागल सी दिखने लगी मुझे. वो ज़ोर ज़ोर से अपनी गांड को मेरे लुंड पर पटकने लगी थी और जाने क्या क्या कहती जा रही थी. मैं समझ गया ये झड़ने वाली है और वही हुआ भी. कोमल के जिसम को तेज़ तेज़ झटके लगने लगे. उसके मुख से चीख निकलने hi वाली थी की मैंने अपनी कमर को हिलना बंद करके उसके मुँह को अपने हाथ से दबा दिया. कुछ hi देर में कोमल बेजान सी हो कर मेरे ऊपर hi लेट गयी. उसकी छूट का गरम गरम लावा मेरे लुंड को भिगोता महसूस हुआ मुझे. वो ऐसे हाफ रही थी जैसे मीलो दौड़ कर आयी हो.

जब वो शांत पद गयी तो मैंने फिर से अपनी कमर को हिलना शुरू कर दिया. कुछ देर बाद कोमल में फिर से जान आने लगी और वो थोड़ी hi देर में फिर से मज़े लेने लगी. वो मेरे चेहरे पर हर जगह चूमे जा रही थी. उसके बाद मैंने उसे पकड़ कर नीचे लेटाया और उसकी छूट में लुंड दाल कर फिर से तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगा. मुझे कोमल को छोड़ने में बहुत मज़ा आ रहा था. उसकी उछलती हुयी चूचियों को मैं पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से मसलता तो कोमल बुरी तरह सिसक पड़ती थी. कुछ hi देर में कोमल की साँसे फिर से भारी होने लगी. इधर मुझे भी महसूस हुआ की मैं अब झड़ने की कगार पर पहुंच रहा हु. मैंने धक्को की स्पीड तेज़ कर दी. कोमल बुरी तरह सिसकिया ले रही थी. उसने अपने मुँह पर फिर से अपनी हथेली को रख लिया था. मैंने जल्दी से कोमल को पकड़ कर बीएड पर लेटाया और फिर से उसकी पनियाई हुयी छूट में अपना लुंड दाल कर ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा.

थोड़ी hi देर में हम दोनों का मज़ा अपने चरम पर पंहुचा और फिर जैसे हम दोनों आसमान में पहुंच कर एकदम से धरती पर गिर पड़े. मेरे लुंड से बड़े फोर्स में वीर्य की पिचकारियां फूटी जो सीधा कोमल की छूट में अंदर तक जा रही थी. मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे जिसम से जान hi निकल गयी हो. मैं एकदम से कोमल के ऊपर बेजान सा लेट गया था. मेरे लुंड से जाने कितनी पिचकारियां निकली जिनका ताप कोमल सह न पायी थी और वो भी मेरे साथ hi झटके कहते हुए झड़ती चली गयी थी.

कुछ देर बाद जब मैं उठा तो मेरा लुंड कोमल की छूट से निकल आया. वो भी अब शांत पद गया था और उस पर हम दोनों का वीर्य लगा हुआ था. मैंने पास hi में पड़ी कोमल की साड़ी से अपने लुंड को साफ़ किया और फिर अपने कपडे pahan'ne लगा. कोमल अभी भी आँखे बंद किये बीएड पर लेती हुयी थी. शायद वो अभी भी इस ज़बरदस्त हुयी चुदाई के मज़े को महसूस कर रही थी. जब मैंने कपडे पहन लिए तो मैंने धीरे से कोमल को आवाज़ दे कर कहा की अब मैं जा रहा हु तो मेरी आवाज़ सुन कर कोमल ने जल्दी से अपनी आँखे खोल कर मेरी तरफ देखा.

मुझे कपडे पहने देख वो बीएड से उठी और नंगी hi आ कर मुझसे लिपट गयी. वो मुझसे ऐसे लिपट गयी थी जैसे मैं उसका कोई प्रेमी था. मुझे समझ न आया की मैं उससे क्या कहु. तभी उसने कहा.

"क्या अब नहीं आओगे.?" कोमल ने मुझसे लिपटे हुए hi धीमी आवाज़ में ये पूछा तो मैंने कहा.

"पता nahi...shayad अब न आ पाउ." मैंने ये कहा तो उसने मेरे सीने से अपना चेहरा हटा कर मेरी तरफ देखा फिर बोली.

"Kyo...kyo नहीं आ पाओगे.?" कोमल ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अजनबी hu...har रोज़ कोई अजनबी कैसे किसी के घर आ जायेगा.?" मैंने ये कहा तो कोमल ने कहा.

"अब तुम अजनबी नहीं हो मेरे लिए. बल्कि मेरे लिए तो अब तुम hi सब कुछ हो. आज जो सुख तुमने मुझे दिया है उससे तो मैं तुम्हारी दासी बन गयी हु और तुम मेरे राजा. इस लिए अपनी इस दासी को भुला कर न चले जाना." कोमल ने ये कहा तो मैंने उसके चेहरे को पकड़ते हुए कहा.

"तुम दासी नहीं ho...tum तो मेरी भाभी हो. सही कहा तुमने की अब मैं अजनबी नहीं रहा तुम्हारे liye...magar दूसरे हिसाब से तो अजनबी हु hi. वैसे मैं तुम्हे बता दू की मेरा नाम विक्की है. मैं वही विक्की हु जिसने आज से पांच साल पहले सचिव का चुनाव जीता था और जिसने रुपेश को मारा भी था." मैंने ये कहा तो कोमल बुरी तरह हैरान रह गयी. वो फटी फटी आँखों से मुझे देख रही थी.

"क्या हुआ मेरी हकीकत जान कर तुम इतना हैरान क्यों हो गयी.?" मैंने ये कहा तो कोमल को जैसे होश आया फिर उसने कहा.

"मैं हैरान इस लिए हुयी की मैंने तो सुना था की तुम बहुत hi शरीफ इंसान हो मगर आज जो कुछ भी हमारे बीच हुआ है उससे ये नहीं लग रहा की तुम इतने ज़्यादा शरीफ हो." कोमल ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"सब वक्त वक्त की बाते हैं भाभी जी. वक्त ने उस शरीफ इंसान को थोड़ा सा बिगाड़ भी दिया है. वैसे अच्छा hi हुआ न वर्ण आज ये सब कैसे होता हमारे बीच.?" मैंने ये कहा तो कोमल ने एकदम से शर्मा कर अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया तो मैंने कहा.

"चलो अब मैं चलता हु. टाइम बहुत ज़्यादा हो गया है. कही ऐसा न हो की तुम्हारा वो रुपेश फिर से यहाँ आ जाये. वैसे मैंने बाहर का दरवाजा बंद कर दिया था." मैंने ये कहा तो कोमल ने मेरे सीने से अपना चेहरा हटते हुए कहा.

"अब यहाँ रुपेश नहीं आएगा मेरे राजा. उसने अब तक जो करना था वो कर लिया है. अब मैं उसे अपने जिसम को हाथ भी नहीं लगाने दूगी. अब से मेरे इस जिसम पर मेरे पति के बाद सिर्फ तुम्हारा हक़ है." कोमल ने ये कहा तो मैं हैरान तो हुआ मगर फिर बोलै.

"वो सब ठीक है मगर मैं इस गांव में बस एक दो दिन hi हु. उसके बाद चला जाउगा. तब मैं तुम्हारे पास कैसे आउगा.? इस लिए बेहतर यही होगा की तुम मेरे भरोसे न रहना. रुपेश पूरा न सही मगर कुछ तो जिस्मानी सुख देगा hi तुम्हे. मगर मेरी सलाह ये है की उसके साथ जब भी चुदाई करना तो बिना कंडोम के मत करना. उससे कहना की वो अपने साथ कंडोम ले के आया करे." मैंने ये सब कहा तो कोमल ने मुझे नाम आँखों से देखा फिर बोली.

"मतलब तुम मुझे माँ का सुख दिए बिना hi चले जाओगे यहाँ से.? क्या मैं ये समझू की सरे मर्द एक जैसे hi होते हैं.?" कोमल ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मज़बूरी है यार. मैं शहर में नौकरी करता हु. उसे कैसे छोड़ दूँगा.? मगर तुम फ़िक्र न करो क्यों की जब तक अभी मैं यहाँ हु तब तक मैं तुम्हारे पास आ जाया करुगा. मगर दिक्कत यही है की मेरे आने से कही तुम पर कोई बात न आ जाये. मेरा मतलब है की कही हम पकडे न जाये." मैंने ये कहा तो कोमल ने कहा.

"मैं अरुण जी को समझा दूगी की वो रोज़ाना शाम को देर से आया करे पिता जी के साथ." कोमल ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ठीक hai...tum आज hi उनसे बात कर लेना. मैं कल शाम को इसी वक्त आ जाउगा." मैंने ये कहा तो कोमल ने कहा.

"क्या दिन में नहीं आ सकते.? दोपहर को भी पिता जी और अरुण जी खेतो में रहते हैं आज कल. उस वक्त घर में मैं और सासु माँ hi होती हैं. अगर तुम उस वक्त आ जाओगे तो हम दिन में भी अपना ये काम कर सकते हैं." कोमल ने ये कहा तो मैंने कहा.

"दिन में किसी ने मुझे तुम्हारे घर आते हुए देख लिया तो बहुत बड़ी दिक्कत हो जाएगी." मैंने ये कहा तो कोमल ने कहा.

"कुछ नहीं होगा मेरे राजा. तुम बस आ jana...main सब देख लगी." कोमल ने ये कहा तो मैंने उसे हैरानी से देखा.

उसके बाद यही फैसला हुआ की मैं दिन में भी दोपहर को कोमल के पास आ जाया करुगा और फिर एक बार शाम को. कुछ देर बाद मैं कोमल के रसीले होठो का जाम पि कर अपने घर के लिए चल पड़ा. कोमल ने कपडे बहन लिए थे और वो मुझे छोड़ने के लिए बाहर तक मेरे साथ hi आयी थी. बाहर के दरवाजे के पास जैसे hi हम पहुंचे तो कोमल एक बार फिर से मुझसे लिपट गयी. मैं समझ सकता था की उसके दिल में कही न कही मैंने जगह बना ली है. फिर कोमल मुझसे अलग हुयी और खुद मेरे होठो को एक बार चूमा और फिर दरवाजे को खोल दिया.

दरवाजे को खोल कर कोमल पहले खुद बाहर गयी और आस पास का जायजा लिया उसके बाद वो अंदर आयी और मुझसे कहा की बाहर कोई नहीं है. उसकी बात सुन कर मैं मुस्कुराया और उसके होठो को एक बार मैंने भी झुक कर चूमा उसके बाद मैं घर से बाहर आ गया. कुछ hi देर में मैं अँधेरे में गम हो गया.

रास्ते भर मैं कोमल के बारे में hi सोचता रहा और कुछ hi टाइम में अपने घर आ गया. आज मेरे लुंड के साथ इन्साफ हो गया था और उसकी तड़प मिट गयी थी. मैं अंदर से बहुत ज़्यादा ख़ुशी फील कर रहा था. जब मैं घर आया तो माँ मुझसे पूछने लगी की मैं कहा गया था तो मैंने उन्हें बताया की ऐसे hi खेतो की तरफ घूमने चला गया था. उसके बाद माँ ने कहा की खाना बन गया है और मैं जल्दी से हाथ मुँह धो के आ जाओ.

खाना पीना करने के बाद मैं अपने कमरे में आ गया. कमरे में आया hi था की तभी मेरा मोबाइल फ़ोन बजा तो मैंने पेंट की पॉकेट से फ़ोन निकाल कर देखा तो दक्षिणा का कॉल था. मैंने कॉल उठा कर फ़ोन कान से लगा लिया. दक्षिणा मुझसे कह रही थी की उसे मेरी बहुत याद आ रही है और मैं कब वापस दिल्ली आउगा. मैंने दक्षिणा को बताया की एक दो दिन में यहाँ से निकलूंगा दिल्ली के लिए. कुछ देर तक मैंने दक्षिणा से बात की. उसने बताया की उसने मेरे लिए एक अच्छा सा घर ले लिया है. मैंने उससे पूछा की घर कहा पर है तो उसने बताया की गुडगाँव में hi है मगर उसके वाले घर से काफी दूर है. उसकी इस बात पर मैंने कहा अच्छी बात है.

दक्षिणा ने बताया की उसने घर के ज़रूरी सामान के लिए आर्डर भी दे दिया था. मैंने उससे पूछा कौन सा ज़रूरी सामान तो उसने बताया की जो घर उसने लिया था उसमे बीएड वगैरा सब खराब हो चुके थे और कुछ सामान घर का मालिक अपने साथ ले गया था इस लिए उसने ज़रूरत का सारा सामान नया लेने का सोच के आर्डर कर दिया था. दक्षिणा की इस बात से मैं खुश हो गया. ये सब तो मुझे वह जा के करना hi पड़ता मगर मेरे वह पहुंचने से पहले hi दक्षिणा ने सारा इंतजाम कर दिया था. मुझे दक्षिणा के इस काम से ख़ुशी हुयी और मैंने इसके लिए उसे ढेर साडी किस्सेस की. अगर मैं उसे थैंक्स कहता तो वो नाराज़ हो जाती और जब मैं उसे किश पर किश किया तो वो बहुत खुश हो गयी थी. वो कह रही थी अब उसका एक भी दिल नहीं लगता है उस घर में.

मैंने दक्षिणा से थोड़ी देर और बात की उसके बाद कॉल कट हो गया. मैंने कपडे उतरे और रात वाले कपडे पहन कर बीएड पर लेट गया. आज जो कुछ भी इसके पहले हुआ था वो बहुत बड़ा इत्तेफाक था. मैंने तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था की ऐसा कुछ हो जायेगा. मेरी आँखों के सामने बार बार कोमल का चेहरा और उसके साथ हुयी मज़ेदार चुदाई का सन घूम रहा था. मैं दो दिन और रुकने वाला था यहाँ और इन दो दिनों में मुझे कोमल की जैम के चुदाई करना था जिससे उसके पेट में मेरा बीज ठहर जाये और उसे माँ का सुख मिल सके. मैंने सोचा की जब मेरी वजह से कोमल को बच्चा होगा तब वो माँ बन जाएगी और मैं एक ऐसा पिता जिसके बारे में कोमल के शिव किसी को पता नहीं रहेगा कभी. इस बात को सोचते hi मेरे जिसम में झुरझुरी सी हुयी.

मुझे याद hi नहीं रहा की मैं कब तक इन्ही सब खयालो में खोया रहा. मुझे होश तो तब आया जब मेरे कानो में मेरी जुड़वाँ बहनो में से किसी एक की आवाज़ पड़ी. मैंने देखा वो दोनों मेरे चेहरे के एकदम पास hi झुकी हुयी थी. शायद मेरी हालत को देख कर समझने की कोशिश कर रही थी की मैं किस दुनिया में हु. जब मैंने उन्हें अपने चेहरे के पास इस तरह झुके हुए देखा तो मैं हड़बड़ा गया.

"क्या hua...tum दोनों इस तरह मेरे चेहरे के पास क्यों झुकी हुयी हो.?" मैंने खुद को सम्हालते हुए ये कहा तो दोनों सीढ़ी कड़ी हो गयी और फिर पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"किस दुनिया में खोये हुए थे भाई.? कही रचना दीदी के साथ तो नहीं थे और उनके साथ किश विस्स तो नहीं कर रहे थे.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा तो वो दोनों खिलखिला कर हसने लगी.

"तुम दोनों मुझसे ज़रूर पिताजी अब." मैंने बुरी तरह सकपकाते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"ये तो गलत बात है भाई. हमने क्या किया है.? अपने आपको देखो तुम जो खुद hi अकेले अकेले मज़े ले रहे हो." प्रिय ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसको देखा फिर बोलै.

"क्या मतलब है तुम्हारा.?" मैंने ये कहा तो पूजा ने हस्ते हुए कहा.

"अब मतलब भी हमें hi बताना पड़ेगा.? वाह भाई waah...dekho तो कितना शरीफ बन रहा है हमारा भाई." पूजा ने ये कहा तो प्रिय बोल पड़ी.

"कोई बात नहीं pooja...ab हम भी इन महानुभाव को अकेले अकेले मज़े नहीं लेने देंगे. आखिर थोड़ा बहुत मज़ा तो हमें भी मिलना चाहिए." प्रिय ने ये कहा तो मेरा दिमाग चक्र गया. दोनों पता नहीं क्या क्या बाके जा रही थी जो मेरे ऊपर से जा रहा था.

मैंने दोनों को किसी तरह चुप कराया तो दोनों बीएड पर आ कर मेरे अगल बगल लेट गयी और मुझसे चिपक गयी. मैंने महसूस किया की आज ये दोनों कुछ ज़्यादा hi मुझसे चिपक गयी थी. दोनों की कोमल कोमल छतिया आज कुछ ज़्यादा hi मुझे फील हो रही थी. आज कोमल के साथ मैं ज़बरदस्त सेक्स करके आया था और अभी भी मेरे दिल और दिमाग में वही सब घूम रहा था जिससे मुझ पर थोड़ी थोड़ी खुमारी सी छायी हुयी फील हो रही थी.

अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी मैं चौंका. मैंने महसूस किया की मेरी दोनों बहनो ने अपनी एक एक टांग मेरे टांगो के ऊपर रख लिया है. ये पहली बार था जब दोनों ने चिपकने के बाद अपनी टांगो को मेरी टांगो के ऊपर रखा था. मुझे बड़ी हैरानी हुयी और पता नहीं क्यों मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने भी लगा. मगर मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा इसके लिए बल्कि मैं अब ये देखना चाहता था आज ये चेंज क्या सोच कर आया था दोनों में.?

"भाई आज कुसुम दीदी बहुत रो रही थी." प्रिय ने मुझसे धीरे से ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"Kyo...unhe अब क्या हुआ.?" मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"ये तो हमें भी नहीं पता bhai...magar हमने ये देखा था की जब रचना दीदी माँ के कमरे में थी तब कुछ देर बाद माँ ने दीदी को भी अपने कमरे में बुला लिया था. उसके बाद दीदी जब माँ के कमरे से बाहर निकल कर आयी तो उनके चेहरे पर बहुत ज़्यादा दुःख तकलीफ दिखाई दिया था. वो सीधा अपने कमरे में चली गयी थी. ये देख कर हम दोनों भी चुपके से उनके कमरे के पास पहुंचे. दरवाजे को हल्का सा खोल कर हमने अंदर देखा तो दीदी बीएड पर औंधी पड़ी रो रही थी." पूजा में ये बताया तो मुझे माँ की वो बाते याद आयी जो मैंने आज दोपहर में उनके कमरे के बाहर से सुनी थी. उस वक्त मुझे ये पता नहीं था की दीदी भी उनके कमरे में हैं. मैं तो माँ की बात सुनने के बाद जल्दी hi अपने कमरे में आ गया था.

"हमें समझ नहीं आया भाई की दीदी इतना रो क्यों रही थी.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अब ये तो वही जाने. खेर छोडो ये सब. रोने धोने वाला काम उन्होंने खुद चुना है तो इसमें अब हम क्या कर सकते हैं.?" मैंने कुछ सोचते हुए ये कहा तो पूजा ने कहा.

"कुछ तो बात ज़रूर हुयी है भाई. माँ के कमरे में ऐसा क्या हुआ था जिसके बाद दीदी इतना रो रही थी अपने कमरे में.?" पूजा ने ये कहा तो मैं कुछ न बोलै. मुझे पता तो था मगर मैं इस वक्त उन्हें कुछ बताना नहीं चाहता था. मैं बस देखना चाहता था की आगे क्या और कैसे होता है.

कुछ देर हम तीनो के बीच ऐसी hi बाते हुयी और मस्ती मज़ाक भी. उसके बाद हम तीनो सो गए. पता नहीं उस वक्त कितना टाइम हुआ था मगर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरे होठो को छू रहा था और मेरी नाक और मुँह के पास गरम गरम सा फील हो रहा था. मेरी नींद एकदम से खुल गयी और मैंने आँखे खोल कर देखा तो कही कुछ नज़र न आया. मेरी आँखों के सामने एकदम से डार्क अँधेरा था. ये देख कर मुझे कुछ समझ न आया की मुझे हर तरफ इतना अँधेरा कैसे दिख रहा है.

मेरे होठो पर अभी भी मुझे ऐसा फील हो रहा था जैसे कोई मेरे होठो को छू रहा है और कभी कभी मेरे होठ किसी बहुत hi सॉफ्ट चीज़ के अंदर चले जाते थे. उस वक्त मुझे बहुत अजीब सा लग रहा था और गरम भी. मेरे दिमाग ने बड़ी तेज़ी से काम किया और फिर एकदम से मुझे समझ आया की ये सब क्या है. मैं बहुत ज़्यादा शॉक हुआ और फिर एकदम से मैंने अपने दोनों हाथो को हरकत दी.

मैंने अपने दोनों हाथो को अपने ऊपर किया तो कोई चीज़ मेरे हाथो में आ गयी जिसे मैंने पकड़ कर ऊपर किया. मेरे ऐसा करते hi मेरे आस पास बड़ी तेज़ हलचल हुयी और मेरे हाथ से वो बड़ी सी चीज़ छूट गयी. हलचल थोड़ी hi देर तक हुयी थी उसके बाद सब कुछ शांत हो गया था. मगर मैं अब सब कुछ समझ गया था.

मैंने अपने हाथो को बड़ी hi सावधानी से काम पर लगाया. थोड़ी hi देर में मेरे सर के पीछे मेरे एक हाथ में मेरा मोबाइल फ़ोन आया जिसे मैंने ठीक से पकड़ा और अंदाज़े से hi उसकी स्क्रीन को जलाया तो ऊपर की तरफ रौशनी हुयी और ऊपर मुझे पंखा घूमता हुआ दिखा. मैंने वक्त बर्बाद नहीं किया और बीएड से उठ कर नीचे उतरा. उसके बाद मैंने मोबाइल की रौशनी से लाइट के स्विच को तलाश कर कमरे की लाइट जलाई तो हर तरफ तेज़ रौशनी फ़ैल गयी.

लाइट जलने के बाद मैंने पलट कर बीएड की तरफ देखा तो मेरी दोनों बहने एक दूसरे की तरफ अपनी पीठ किये सिकुड़ी हुयी लेती नज़र आयी. दोनों के बीच में जो जगह खाली थी वह पर मैं लेता हुआ था. मैंने मोबाइल की फ़्लैश लाइट को बंद किया और अपने एक हाथ से अपने होठो पर हाथ फेरा तो मुझे अपने होठो पर और उसके आस पास गीला गीला फील हुआ. मुझे समझने में देर न लगी की इस गीले गीले का क्या चक्कर है.

मैं आगे बढ़ कर बीएड के पास आया और फिर अपनी जगह पर आ कर बैठ गया. मैंने दोनों की तरफ बारी बारी से देखा उसके बाद मैंने दोनों का नाम लेते हुए उनसे कहा की मुझे पता है की तुम दोनों जाग रही हो और मैं ये भी जान गया हु की तुम दोनों अभी कुछ देर पहले मेरे साथ क्या कर रही थी. इस लिए बेहतर होगा की तुम दोनों साफ़ साफ़ मुझे बताओ की तुम दोनों ने ऐसा क्यों किया मेरे साथ.?

मैंने ये सब कहा और दोनों की तरफ बारी बारी से देखने लगा मगर दोनों की तरफ से कोई जवाब तो क्या कोई हलचल भी नहीं हुयी. मैं समझ गया की वो दोनों बहुत ज़्यादा दर गयी हैं और अब उनमे हिम्मत नहीं है की मेरा सामना कर सके. दूसरी बात ये भी थी की वो मुझे ये दिखने की कोशिश कर रही थी की उन्होंने कुछ नहीं किया है और वो गहरी नींद में सो रही हैं. मगर मैं अच्छी तरह जानता था की दोनों ने क्या किया था और उसका सबूत मेरे गीले होठ और मेरा मुँह था. उन दोनों ने जब देखा की मैं गहरी नींद में सो रहा हु तो दोनों ने पहले कमरे की लाइट बंद की उसके बाद वो बारी बारी से मेरे होठो को चूमने की कोशिश करने लगी थी.

जब उन दोनों में कोई हरकत नहीं हुयी तो मैंने इस बार धमकी देते हुए कहा की अगर उन्होंने मेरी बात का जवाब न दिया तो मैं अभी जा कर सब कुछ माँ से बता दुगा. मेरी इस धमकी ने बड़ी तेज़ी से असर किया. दोनों एक साथ एकदम से पलटी और फिर उठ कर दोनों hi अपने अपने हाथ जोड़ कर मुझसे अपने किये की माफ़ी मांगने लगी. माफ़ी मांगते हुए वो रोये भी जा रही थी. जब मैंने पूछा की ऐसा उन्होंने क्यों किया तो उन्होंने कहा की वो भी देखना चाहती की थी होठो पर चूमने से कैसा लगता है.

उनकी इस बात से मैं समझ गया की कल रचना के किस्से ने इन पर असर किया था और इनके मन में भी ये ख़याल आया था की देखे ऐसा करने पर कैसा लगता है. मैं ये भी समझ गया की वो दोनों ऐसा किसी और के साथ कर hi नहीं सकती थी. एक मैं hi ऐसा था जिसके साथ वो ये सब कर सकती थी. उनके मन में भाई बहन के पवित्र रिश्ते वाली बात तो शायद उसी दिन खोखली हो गयी थी जब दोनों ने मुझसे कुसुम दीदी को प्यार करने के बारे में बात की थी. वो दोनों अभी भी मुझसे माफिया मांग रही थी. मुझे समझ न आया की मैं इस वक्त क्या करू.

मुझे माँ की बाते याद आ गयी. कुसुम दीदी का रोना याद आ गया. मेरा दिल और दिमाग एकदम से जहां झना गया. मैंने अपने आपको सम्हाला और फिर उनकी तरफ देखते हुए कहा.

"चुप हो जाओ तुम दोनों और मेरे सिर्फ एक सवाल का जवाब दो." मैंने ये कहा तो दोनों ने आँशु भरी आँखों से मुझे देखा और हाँ में अपना अपना सर हिला दिया तो मैंने पूछा.

"तुम दोनों के मन में मेरे लिए क्या है.?" मैंने ये पूछा तो दोनों ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मेरा सवाल उन्हें समझ न आया हो. ये समझ कर मैंने फिर कहा.

"मुझे सच सच बताओ की तुम दोनों मेरे बारे में क्या क्या सोचती हो.?" मैंने ये पूछा तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा फिर प्रिय ने धीरे से कहा.

"भाई हम दोनों को तुम बहुत अच्छे लगते हो. हमारा दिल करता है की हम दोनों हर वक्त तुम्हारे पास hi रहे और तुमसे खूब बाते करे." प्रिय ने ये कहा तो मैं बहुत ज़्यादा हैरान हुआ मगर फिर मैंने कहा.

"और क्या क्या लगता है तुम दोनों को. मुझे सब कुछ साफ़ साफ़ और सच सच बताओ." मैंने ये कहा तो इस बार पूजा ने धीमी आवाज़ में कहा.

"और भी बहुत कुछ लगता है bhai...magar हमें बताने में शर्म आती है." पूजा ने ये कहा तो मेरा दिल जाने क्यों ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा. फिर मैंने कहा.

"शर्म किस बात की..? मुझे सब कुछ साफ़ साफ़ बताओ. मैं सब कुछ jaan'na चाहता हु. आखिर मुझे भी तो पता चले की क्या है तुम दोनों के मन में.?" मैंने ये कहा तो दोनों ने एक बार फिर से एक दूसरे की तरफ देखा फिर प्रिय ने कहा.

"भाई गुस्सा मत होना मगर सच्चाई ये है की हम भी कुसुम दीदी की तरह तुमसे बहुत प्यार करते हैं. दीदी ने भले hi अपने दिल की बात को नहीं मन और उन्होंने खुद को दुःख दर्द में झोंक दिया मगर हम सच्चाई से भागना नहीं चाहते. अगर हमें पता चल गया है की हमारे दिल में क्या है तो उसकी ख़ुशी के लिए हमें सब मंजूर हैं. वैसे भी हम सभी बहनो की किस्मत में हमारा ब्याह होना तो लिखा नहीं है. इस लिए अगर हमारे दिल में तुम्हारे लिए प्यार है तो क्यों हम तुमसे दीदी की तरह दूरिया रखे.?" प्रिय ने ये सब कहा और चुप हो गयी. मैं उसकी बाते सुन कर हैरान था. थोड़ा थोड़ा तो मैं भी समझ रहा था मगर इतना कुछ होगा ये नहीं जानता था मैं.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 34


"शर्म किस बात की..? मुझे सब कुछ साफ़ साफ़ बताओ. मैं सब कुछ jaan'na चाहता हु. आखिर मुझे भी तो पता चले की क्या है तुम दोनों के मन में.?" मैंने ये कहा तो दोनों ने एक बार फिर से एक दूसरे की तरफ देखा फिर प्रिय ने कहा.

"भाई गुस्सा मत होना मगर सच्चाई ये है की हम भी कुसुम दीदी की तरह तुमसे बहुत प्यार करते हैं. दीदी ने भले hi अपने दिल की बात को नहीं मन और उन्होंने खुद को दुःख दर्द में झोंक दिया मगर हम सच्चाई से भागना नहीं चाहते. अगर हमें पता चल गया है की हमारे दिल में क्या है तो उसकी ख़ुशी के लिए हमें सब मंजूर हैं. वैसे भी हम सभी बहनो की किस्मत में हमारा ब्याह होना तो लिखा नहीं है. इस लिए अगर हमारे दिल में तुम्हारे लिए प्यार है तो क्यों हम तुमसे दीदी की तरह दूरिया रखे.?" प्रिय ने ये सब कहा और चुप हो गयी. मैं उसकी बाते सुन कर हैरान था. थोड़ा थोड़ा तो मैं भी समझ रहा था मगर इतना कुछ होगा ये नहीं जानता था मैं.

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"हम जानते हैं भाई की ये गलत है मगर तुम hi बताओ हम क्या करे.? तुम्हारे जाने के बाद हम सब बहुत दुखी हो गए थे. पिता जी की बीमारी से हम सबकी आस टूट चुकी थी. गांव का जैसा माहौल था उससे हम यही समझ गए थे की दीदी की तरह हम दोनों भी साडी ज़िन्दगी बिन ब्याही रह जाएँगी. दीदी के बारे में हमें शुरू से hi पता था की उनके दिल में तुम्हारे लिए बहन वाले प्यार से भी अलग एक प्रेमिका वाला प्यार है. हम ये भी जानते थे की ये गलत है और शायद यही वजह थी की दीदी ने कभी तुमसे अपने दिल की बात नहीं कही. हम दोनों इस बारे में बहुत सोचती thi...aur फिर यही सब सोच कर हमने भी सोच लिया की अब जैसा दीदी करेगी वैसा हम भी करेंगे. मतलब तुमसे प्यार karege...ek भाई बहन वाला प्यार नहीं बल्कि प्रेमी प्रेमिका वाला प्यार. हम शुरू से hi चंचल स्वभाव के थे इस लिए तुम्हारे साथ मस्ती करते थे और फिर जब तुम पांच साल बाद वापस आये तो हमने सोचा अब अपने प्यार को तुम पर ज़ाहिर करे. मगर हमें दर लगता था की कही तुम हम पर गुस्सा न हो जाओ." पूजा ने ये सब कहा तो मेरा दिल और दिमाग एकदम से सुन्न सा पद गया.

मुझे समझ नहीं आ रहा था की अब मैं अपनी इन दोनों बहनो का क्या करू.? हसी मज़ाक मस्ती अपनी जगह था मगर इस बारे में मैंने कभी नहीं सोचा था. अगर इस गांव में रह कर मेरी बहनो की शादी होना संभव नहीं था तो अब मैं दिल्ली में रहते हुए उनकी शादी करने में कोई कसार न छोड़ता मगर यहाँ तो केस hi ऐसा बन गया था की मेरा दिमाग काम hi नहीं कर रहा था. मैं फ्यूचर के बारे में सोच कर बुरी तरह घबरा रहा था.

"मैंने तुम दोनों की बाते सुन ली और समझ भी ली. तुम दोनों ने ये सोच कर ये सब किया क्यों की तुम ये समझती थी की तुम दोनों ज़िन्दगी भर कुसुम दीदी की तरह बिन ब्याही रह जाओगी. कुसुम दीदी के दिल में मेरे प्रति प्यार है तो तुम दोनों ने भी वही कर लिया. मगर इस सबका अंजाम क्या होगा इसके बारे में नहीं सोचा तुमने. माँ को जब इस बारे में पता चलेगा तो क्या होगा ये सोचा hi नहीं तुमने." मैं ये सब बोल hi रहा था की मेरी बात kaat'te हुए प्रिय ने कहा.

"हमने हर बात के बारे में हज़ार बार सोचा है भाई. कुसुम दीदी की हालत ऐसी है की अब अगर तुम कही भी रह कर उनका ब्याह करना चाहो तो वो नहीं करेगी. क्यों की उन्होंने तुम्हे hi अपना सब कुछ मान लिया है. भले hi वो ये बात खुल कर कभी न कहे तुमसे. खेर हम ये नहीं कहते हैं की अगर हमारा ब्याह हो सकेगा तो हम ब्याह नहीं करेंगे मगर प्यार तो हम भी करते हैं तुमसे और चाहते हैं की हमारे प्यार का कुछ तो हक़ हमें भी मिले." प्रिय ने ये सब कहा तो मैं बुरी तरह हैरान रह गया था. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं इन दोनों को क्या कहु इस बारे में.?

"भाई हमने सुना है की आदमी के हाथ में कुछ नहीं होता बल्कि सब कुछ ऊपर वाला hi करता है तो सोच लो की ये भी ऊपर वाले की hi मर्ज़ी से हो रहा है." पूजा ने ये कहा तो मैं अभी कुछ बोलने hi वाला था की तभी प्रिय ने कहा.

"एक बात और bhai...ham जानते हैं की यहाँ से दिल्ली जाने के बाद क्या होगा. माँ को रचना दीदी पसंद हैं और वो यहाँ से जाने के बाद उनसे तुम्हारी शादी ज़रूर करेंगी. हो सकता है की पहले वो दीदी का ब्याह करना चाहे मगर ये निश्चित है की दीदी अपना ब्याह करने से साफ़ इंकार कर देगी. उसके बाद तुम्हारा ब्याह रचना दीदी से होगा. फिर माँ हमारा ब्याह करेगी. भाई हमने मान लिया की हम दोनों ब्याह कर hi लगे माँ के कहने पर मगर कुसुम दीदी का क्या.? क्या वो ज़िन्दगी भर ऐसे hi घुट घुट कर जियेंगी.? उनके बारे में क्या कोई नहीं sochega...zarur सोचेगा भाई. यहाँ तो हमें सब जानते हैं की हमारा आपस में रिश्ता क्या है मगर वह पर किसी को क्या पता चलेगा हमारे बारे में.? हम जिसे जो बतायेगे वही जानेगे न लोग.? हो सकता है की माँ ऐसा hi कोई फैसला करे दीदी के बारे में." प्रिय अभी ये सब कह hi रही थी मेरा दिमाग खराब हो गया और मैं बीच में hi बोल पड़ा.

"ये सब तुम क्या बकवास किये जा रही हो.? ऐसा कुछ नहीं होगा समझी.?" मैंने थोड़ा गुस्से से ये कहा तो दोनों चुप हो गयी. दोनों की आँखों में फिर से आँशु भर आये थे. इधर मेरे दिल और दिमाग में तूफ़ान खड़ा हो गया था. मेरे दिमाग में माँ की बाते गूंजने लगी थी.

"अब तुम मुझे साफ़ साफ़ बताओ की तुम दोनों क्या चाहती हो.?" मैंने अपने आपको बड़ी मुश्किल से सम्हालते हुए ये पूछा तो प्रिय ने कहा.

"हम तुम्हे मजबूर नहीं करना चाहते भाई. अगर तुम्हे इस सबसे दुःख पंहुचा है तो हमें माफ़ कर दो. अगर तुम हमारे प्यार को कबूल नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं भाई. हम भी दीदी की तरह ऐसे hi रह lenge....aur हाँ चिंता मत karo...tum और माँ जिससे कहोगे उससे ब्याह कर लेंगे हम." प्रिय ने ये कहा और उसकी सिसकी निकल गयी. ये देख कर पूजा भी सिसकने लगी.

मैं दोनों को रट देख रहा था. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं क्या करू इस सिचुएशन में. मेरे दिल और दिमाग ने काम करना hi बंद कर दिया था. मैं जनता था की ये सब हर रूप में गलत है मगर जो लोग प्यार में फास कर खुद को दुखो में डुबाये दे रहे थे उनका मैं क्या करू.? मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाला और ठन्डे दिमाग से इस बारे में सोचने लगा. मेरे मन में बहुत सी बाते चलने लगी. जिनके बारे में मैं अच्छे तरीके से सोचने लगा था.

"शायद तुमने सच hi कहा है की ऊपर वाला hi सब कुछ करता है. उसी के इशारे पर इस दुनिया में सब कुछ होता है." मैंने ये कहा तो दोनों ने मेरी तरफ आँशु भरी आँखों से देखा मगर बोली कुछ न तो मैंने फिर कहा.

"कुसुम दीदी के बारे में भी जब तुमने वो सब पहली बार बताया था तो मैं उस सबके बारे में सोच सोच कर परेशां था. अभी तक मैं सिर्फ ये सोच रहा था की ये सब गलत है और पाप है. इससे हमारे अंदर के संस्कारो का हनन होगा जो हमारे माता पिता ने दिए थे. मगर अब लगता है की अगर मैं इन सब बातो को सोच कर चलुगा तो शायद कोई भी खुश नहीं रह पायेगा. इस लिए मैंने भी अब सोच लिया है की अगर भगवन यही चाहता है तो मैं उसकी चाहत में रोड़ा नहीं बनुगा." मैंने ये सब कहा तो उन दोनों ने हैरानी से मेरी तरफ देखा.

"अब से मैं सिर्फ एक hi उसूल के साथ चलुगा और वो उसूल hai....SAB कुछ जायज़ है." मैंने ये कहा तो प्रिय पूजा ने एक दूसरे की तरफ देखा फिर पूजा ने कहा.

"इसका क्या मतलब हुआ भाई.?" पूजा ने उत्सुकता से ये पूछा तो मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"इसका मतलब है की अब से हम जो भी करेंगे वो सब कुछ जायज़ hi होगा फिर भले hi वो सब दुसरो की नज़र में नाजायज़ हो." मैंने ये कहा तो दोनों के चेहरे खिल उठे. प्रिय ने अपने आंशुओ को पोंछते हुए कहा.

"इसका मतलब तुम हमारे प्यार को कबूल कर रहे हो न भाई.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने हाँ में अपनी गर्दन हिला दी. ये देख कर दोनों बहुत ज़्यादा खुश हो गयी और फिर दोनों एकदम से झपट कर मुझसे लिपट गयी. मैं देख रहा था की मेरी जो बहने थोड़ी देर पहले दुखो में डूबने लगी थी वो अब ख़ुशी से झूमने लगी थी. उन्हें इस तरह खुश देख कर मुझे भी अंदर से ख़ुशी हुयी.

मैंने भी सोचा की अगर ख़ुशी इसी बात से मिलती है तो यही सही. दोनों मुझसे कास के लिपटी हुयी थी. ऐसा लग रहा था जैसे वो दोनों मुझ में समां जाना चाहती थी. दोनों को अब किसी बात का रंज नहीं रह गया था. मैं नहीं जानता की ऊपर बैठा भगवन ये सब देख कर खुश था या हम पर लानत भेज रहा था.

"अब छोडो भी मुझे और चुप चाप सो जाओ अब." मैंने दोनों से ये कहा तो दोनों ने मुझे और भी ज़्यादा कास कर पकड़ लिया फिर प्रिय ने कहा.

"कैसे छोड़ दे भाई.? हमें तो अभी भी यकीन नहीं हो रहा है की तुमने हमारे प्यार को कबूल कर लिया है और अब से हम कुछ भी कर सकते हैं." प्रिय ने ये कहा तो मैंने हैरानी से कहा.

"कुछ भी कर सकते हैं का क्या मतलब है.?" मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"कुछ भी का मतलब कुछ भी bhai...bas तुम समझ जाओ." पूजा ने ये कहा तो मैं सोचने लगा इस बारे में और जैसे hi मुझे कुछ भी का मतलब समझ आया तो मैं बुरी तरह हैरान रह गया.

"भाई अब जब तुमने हमारे प्यार को कबूल कर hi लिया है तो रचना दीदी की तरह हमारे होठो पर भी वैसे hi किश करो न. हमें भी देखना है की किश करने से कैसा लगता है.?" प्रिय ने मुझसे लिपटे हुए ये कहा तो मैं हैरान रह गया और फिर एक झटके से दोनों को अपने से अलग किया.

वो दोनों मुझसे नज़रे नहीं मिला रही thi...bas सर झुकाये शर्माए जा रही थी. दोनों के होठ कांप रहे थे और चेहरे पर शर्म की लाली सी छ गयी थी.

"Achha....magar तुम दोनों तो जब मैं सो रहा था तब किश कर रही थी न.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दोनों ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा और फिर से शर्मा कर अपने सर को झुका लिया. सर झुकाये hi पूजा ने धीरे से कहा.

"मगर हमसे बन hi नहीं रहा था भाई. हम तो ऐसे hi कर रहे थे." पूजा ने ये कहा तो प्रिय भी बोल पड़ी.

"अब तुम करो bhai...ham भी सीख लेंगे की कैसे किश करते हैं.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"तो ये भी बताओ न की क्या क्या सीखना है तुम दोनों को मुझसे.?" मैंने ये कहा तो दोनों हड़बड़ा गयी और फिर मेरी तरफ हैरानी से देखते हुए प्रिय ने कहा.

"और क्या मतलब.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा.

"सिर्फ किश करना hi सीखना है या और भी कुछ सीखना है.?" मैंने ये कहा तो प्रिय बुरी तरह सकपका गयी. शायद उसे मेरा मतलब समझ आ गया था. उसने शर्मा कर फिर से अपने सर को झुका लिया. फिर उसी हालत में कांपते होठो से कहा.

"भाई अभी तो सिर्फ हमें किश करना hi सीखना है." प्रिय ने ये कहा तो मैंने देखा उसी वक्त पूजा ने उसे अपनी कुहनी हलके से मारी थी. मुझे समझ न आया की उसने क्या सोच कर उसे कोहनी मारी थी. मगर मैंने प्रिय की बात पर कहा.

"अच्छा ठीक hai...to सबसे पहले तुम दोनों में से कौन सीखना चाहेगा किश करना.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा.

मैं हमेशा सोचा करता था की इन दोनों में इतना गज़ब का कॉम्बिनेशन कैसे है.? दोनों को पता होता था की कब किस्से क्या बोलना है. दोनों का ताल मेल गजब का tha...jaise दोनों पहले से hi सब कुछ प्लान कर के रखती थी की कौन कब क्या बोलेगी और उसके बाद दूसरी क्या बोलेगी. खेर मैंने एक बार फिर से दोनों से वही सवाल किया तो इस बार पूजा ने कहा.

"प्रिय कह रही है की मैं सबसे पहले किश करना सीखू तो तुम मुझे hi सिखाओ पहले." पूजा ने ये कहा तो मैं मुस्कुराया फिर बोलै.

"ठीक है जैसी तुम दोनों की मर्जी." मैंने ये कहा और पूजा की तरफ घूम गया.

मुझे अपनी तरफ घुमते देख पूजा शर्म से तो मुस्कुरायी hi मगर उसके चेहरे पर हलकी घबराहट भी उभर आयी. मेरे दूसरी तरफ प्रिय बैठी थी जो एकटक मुझे और पूजा को hi देखने लगी थी.

मैंने पूजा के चेहरे को ध्यान से देखा. लाइट की रौशनी में उसका खूबसूरत चेहरा चमक रहा था और उसके चेहरे पर हलकी लाली छायी हुयी थी. पूजा ने बड़ी मुश्किल से अपनी नज़रे उठा कर मेरी आँखों में देखा. उसके लाल लाल होठ थरथरा रहे थे. मैं समझ सकता था की इस वक्त उसके दिल की धड़कने किस कदर भाग दौड़ कर रही होंगी.

मैंने पूजा के चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में लिया तो वो एकदम से कांप गयी और जल्दी से उसने मेरे दोनों हाथो के ऊपर अपने हाथ रख लिए मगर मुझे अपना चेहरा पकड़ने से रोका नहीं. मैं उसके एकदम पास hi था और मेरा चेहरा उसके चेहरे से बस ज़रा से hi फासले पर था. मैंने पूजा की आँखों में देखते हुए उसके थरथराते होठो की तरफ देखा और फिर धीरे धीरे उसके होठो की तरफ झुकने लगा.

मेरा दिल खुद भी बड़ी तेज़ी से धड़क रहा था. मैं महसूस कर रहा था की पूजा के पुरे जिसम में कम्पन हो रहा है. कुछ hi देर में मेरे होठ पूजा के बहुत hi सॉफ्ट होठो से छू गए. जैसे hi मेरे होठ पूजा के होठो से टच हुए तो पूजा के जिसम में एक झटका सा लगा मगर उसने कोई विरोध नहीं किया बल्कि वो अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही थी वो नार्मल रहे.

मैंने पूजा का चेहरा दोनों हथेलियों के बीच लिया हुआ था और उसको थोड़ा सा टेढ़ा कर दिया था जिससे मैं आसानी से उसके होठो को चूम सकू. मैंने पूजा के होठो पर अपने होठ रखे और फिर उन्हें चूमने लगा. पूजा का जिसम थरथरा रहा था और वो कोई हरकत नहीं कर रही थी. मैंने तीन चार बार पूजा के होठो को चूमा उसके बाद मैंने उसके नीचे वाले होठ को मुँह में भर कर चूसने लगा.

पूजा के होठ किसी शहद की तरह मीठे थे. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. मैंने महसूस किया की इसके पहले मैं थोड़ा बहुत झिझक रहा था मगर अब मेरे अंदर कोई झिझक नहीं रह गयी थी. मैं बड़े आराम से पूजा के होठो को चूसे जा रहा था. मुझे लग रहा था की मैं क़यामत तक उसके होठो को यु hi चूसता राहु. पूजा की तेज़ तेज़ चलती साँसे मेरे मुँह पर पद रही थी. मुझे अब होश hi नहीं रह गया था की मैं कहा हु. मुझे तो बस ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी अलग hi दुनिया में पहुंच गया हु जहा पर आनंद के शिव कुछ नहीं है.

अभी मैं आनंद की दुनिया में hi था की तभी मुझे मेरे राइट कंधे पर कुछ महसूस हुआ तो मैं होश में आया और फिर एकदम से पूजा के होठो को आज़ाद करके उससे अलग हो गया. मैंने देखा की पूजा का चेहरा लाल सुर्ख पद गया था और वो तेज़ तेज़ साँसे ले रही थी. उसकी आँखे बंद थी. शायद मेरी तरह वो भी मज़े की दुनिया में खो गयी थी. फिर शायद उसे कुछ महसूस हुआ तो उसने अपनी आँखे खोल दी और जैसे hi उसकी नज़र मुझसे मिली तो उसने जल्दी से शर्मा कर अपना सर झुका लिया.

मैंने पीछे पलट के देखा तो प्रिय मुझे hi देख रही थी और उसका एक हाथ मेरे कंधे पर था. मुझे देखने के बाद उसकी नज़र पूजा पर पड़ी तो उसकी हालत देख कर उसे हैरानी हुयी.

"ाररी इसे क्या हुआ bhai...iska चेहरा इतना लाल कैसे हो गया.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ऐसा करने से ऐसा hi होता है प्रिय. अब जब तुम भी ऐसा करोगी तो तुम्हारा चेहरा भी इसकी तरह लाल सुर्ख पद जायेगा कुछ देर के लिए." मैंने ये कहा तो प्रिय शर्मा गयी.

"तो देख लिया न tumne....ab चलो तुमको भी सीखा देता हु किश करना." मैंने प्रिय से ये कहा तो वो मेरी तरफ देख कर मुस्कुरायी फिर बोली.

"पहले मुझे पूजा से तो पूछ लेने दो की उसे कैसा लगा है इससे.?" प्रिय ने ये कहा और फिर वो खिसक कर पूजा के पास गयी.

"क्या hua...tu इतना चुप चुप क्यों दिखने लगी है.? चल बता मुझे कैसा लगा तुझे जब भाई ने तेरे होठो पर किश किया तो.?" प्रिय ने मुस्कुराते हुए पूजा से ये पूछा तो उसने शरमाते हुए उससे कहा.

"मुझसे क्या पूछती hai...tu खुद hi पता कर ले न. तू भी भाई से सीख ले. तुझे खुद पता चल जायेगा की कैसा लगता है किश करके.?" पूजा ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो प्रिय ने उसे हैरानी से देखा फिर बोली.

"वो तो मैं सीख hi लगी मगर तू भी बता दे न." प्रिय ने ये कहा तो पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"कैसे बताओ प्रिय.? इस बात को मैं ठीक से बता hi नहीं sakti...ise तो बस महसूस hi कर सकती हु. अब तू भी महसूस कर ले." पूजा ने ये कहा तो प्रिय देखती रह गयी उसे. फिर उसने पलट कर मुझसे कहा.

"भाई ये कैसी बाते कर रही है.?" प्रिय ने मुझसे ये पूछा तो मैंने कहा.

"ठीक hi तो कह रही है वो. कुछ चीज़ो को शब्दों में नहीं बताया जा सकता बल्कि उन्हें तो बस महसूस किया जा सकता है. जैसे पूजा ने महसूस किया और मैंने भी." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"बड़ी अजीब बात है ये." प्रिय ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ अजीब तो hai...kher अब अगर तुम्हे भी सीखना है तो आओ वर्ण चलो सो जाते हैं. वैसे भी रात बहुत हो गयी है." मैंने ये कहा तो प्रिय हड़बड़ा गयी और फिर जल्दी से बोली.

"ये तो गलत बात है न भाई. तुमने पूजा को सीखा दिया और जब मेरी बारी आयी तो रात बहुत हो गयी है.?" प्रिय ने ये कहा तो मैं और पूजा दोनों hi धीरे से है पड़े. फिर मैंने कहा.

"अच्छा चलो आओ तुम भी सीख लो जल्दी." मैंने ये कहा तो प्रिय ने पहले पूजा की तरफ देखा फिर मुस्कुराते हुए मेरे पास खिसक कर आ गयी.

मैं प्रिय को hi देख रहा था. ये दोनों जुड़वाँ थी और काफी हद तक इनकी शकल एक दूसरे से मिलती भी थी. जब ध्यान से देखो तभी इनमे अंतर समझ में आता था. प्रिय जब मेरे पास खिसक कर आ गयी तो मैंने उसकी तरफ dekha...wo भी मुझे hi देख रही थी. उसकी हालत भी पूजा की hi तरह थी. जैसे hi उसे अहसास हुआ की अब मैं उसके भी होठो पर चूमने वाली क्रिया करने वाला हु तो उसकी हालत भी पूजा जैसी हो गयी.

मैंने प्रिय के चेहरे को बड़े प्यार से अपनी हथेलियों में लिया और फिर उसके होठो पर झुकता चला गया. कुछ hi पालो में प्रिय के सॉफ्ट और शहद जैसे मीठे होठो पर मेरे होठ टच हो गए. जिससे उसका जिसम कांप कर रह गया. तीन चार बार मैंने उसके होठो को ऐसे hi चूमा उसके बाद मैंने उसके होठो को मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया. प्रिय का जिसम कांप रहा था और उसकी साँसे पल पल बढ़ती जा रही थी. वो एकदम से पत्थर की बेजान सी मूर्ती में बदल गयी महसूस हुयी मुझे. मैं समझ गया की ये भी पूजा की तरह मज़े की दुनिया में पहुंच गयी है.

पूजा के बाद प्रिय के शहद जैसे मीठे होठो को चूस रहा था मैं. मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. मेरे जिसम में गर्मी बढ़ने लगी थी. मेरे पुरे जिसम में झुरझुरी हो रही थी जिसका असर ये हुआ की मेरा लुंड कुछ hi पालो में बुरी तरह तन कर खड़ा हो गया. यही हाल तब हुआ था जब मैं पूजा के होठो को चूस रहा था. मेरे मुँह पर प्रिय की गरम गरम साँसे मेरी गर्मी को और भी ज़्यादा भड़का रही थी.

मैं प्रिय के होठो को चूमने चूसने में इतना मगन हो गया की मुझे ध्यान hi नहीं रहा कब मेरा राइट हैंड प्रिय के चेहरे से हैट कर उसकी राइट छाती पर आ गया था और उसकी ठोस चुकी को अपनी मुट्ठी में पकड़ कर दबा दिया था. मुझे होश तब आया जब प्रिय के जिसम को झटका लगा और उसने अपने एक हाथ से मेरे उस हाथ को पकड़ कर दूर करने की कोशिश की जो हाथ उसकी छाती को दबा दिया था.

मैं प्रिय के होठो को आज़ाद करके उससे अलग हो गया. मुझे एकदम से ख़याल आया की जोश और मज़े में मैं ये भूल hi गया था की मैंने प्रिय की छाती को दबा दिया था. मुझे बड़ी शर्म सी आयी और मैंने उसकी तरफ देखा तो वो अपना सर झुकाये तेज़ तेज़ साँसे ले रही थी.

"तो अब तुझे भी पता चल गया न की कैसा लगता है.?" पीछे से पूजा ने प्रिय से मुस्कुराते हुए ये कहा तो प्रिय कुछ न बोली. मैंने देखा की पूजा के पूछने पर प्रिय सर झुकाये बस मुस्कुराये जा रही थी. उसकी मुस्कराहट देख कर मुझे राहत महसूस हुयी वर्ण मुझे लगा था की मेरी इस हरकत से प्रिय कही बुरा न मान जाये.

कुछ देर तक हम तीनो के बीच ख़ामोशी रही उसके बाद जब हम नार्मल हुए तो पूजा फिर से प्रिय से पूछने लगी तो प्रिय ने मुस्कुराते हुए उसे बताया की उसे कैसा लगा ये सब करके. पूजा को ये पता नहीं था की मैंने प्रिय को किश करते वक्त उसकी एक छाती को दबा भी दिया था और ये बात प्रिय ने भी पूजा से नहीं बताया. खेर उसके बाद हम तीनो लेट गए. वो दोनों मुझसे जोंक की तरह चिपक के लेती हुयी थी. उसके बाद हमें पता hi नहीं चला की कब हमारी आँख लग गयी.

सुबह सबसे पहले मेरी hi नींद खुली. मेरी नज़र दिवार पर लगी घडी पर पड़ी तो मैं एकदम से हड़बड़ा गया. सुबह के 6 बज रहे थे. इसके पहले मेरी 6 बजे के पहले hi नींद खुल जाती थी. मुझे याद आया की पिछली रात हम काफी देर से सोये थे. मैंने अपने अगल बगल देखा तो मेरी दोनों जुड़वाँ बहने अभी भी गहरी नींद में सो रही थी.

मैंने जल्दी से उन्हें जगाया और अपने कमरे में जाने को कहा तो दोनों बड़ी मुश्किल से उठी और फिर अपने कमरे में चली गयी. उनके जाने के कुछ देर बाद मैं भी नीचे बाथरूम में फ्रेश होने चला गया.

चाय नास्ता करने के बाद जब मैं अपने कमरे में आया तो देखा मेरा मोबाइल बज रहा था. मैंने मोबाइल में देखा तो गायत्री देवी का फ़ोन था. मैंने कॉल उठा कर मोबाइल कान से लगा कर hello किया तो मेरे कानो में गायत्री जी की आवाज़ पड़ी.

गायत्री देवी मुझे बता रही थी की मैंने जिन्हे घर बेचा था वो लोग इस घर को किराये पर किसी को देने की बात कर रहे थे. गायत्री देवी की ये बात सुन कर मैं सोच में पद गया. फिर मैंने उनसे पूछा की उन्होंने डायरेक्ट मुझे फ़ोन क्यों नहीं किया तो गायत्री जी ने बताया की उनके पास मेरा नंबर नहीं था. फिर उन्होंने मुझसे पूछा की कब तक में घर खाली कर डोज तो मैंने कहा की आज कल तक अभी हम गांव में रहेंगे और परसो सुबह यहाँ से निकलेंगे. मेरी बात सुन कर गायत्री देवी ने कहा की ठीक है वो पुरसोत्तम जी को बोल देंगी की परसो घर खाली हो जायेगा.

गायत्री देवी से कुछ देर और बात हुयी उसके बाद कॉल कट हो गया. मैंने आज और कल अभी यहाँ रहने की बात इस लिए कही थी क्यों की मुझे कोमल का काम करना था. परसो यहाँ से सुबह hi निकलना था मुझे. इस लिए मुझे उसके लिए सुबह hi एक टैक्सी का इंतजाम करना पड़ेगा. गांव में तो किसी के पास कोई टैक्सी थी नहीं इस लिए मुझे शहर से टैक्सी बुक करनी पड़ेगी. खेर देखते हैं अभी तो आज और कल का टाइम था मेरे पास.

कमरे में कपडे पहन कर मैं बाहर निकला. मैंने सोचा की एक चक्कर रेखा चची के घर की तरफ लगा लू. देखु तो सही की वह के हालात कैसे हैं. बात पुराणी हो जाएगी तो काम बिगड़ जायेगा. ये सोच कर मैं घर से बाहर आया और फिर रेखा चची के घर की तरफ चल पड़ा. इस वक्त सुबह के साढ़े दस बज रहे थे. मेरा प्लान था की रेखा चची के यहाँ के हालात का पता करने के बाद मैं कोमल के यहाँ जाउगा. अब देखना ये था की कोमल ने मुझसे छुड़वाने का रास्ता साफ़ कर रखा है की नहीं. वैसे मुझे पक्की उम्मीद थी की रास्ता साफ़ hi होगा क्यों की इसमें कोमल का hi फायदा था.

थोड़ी hi देर में मैं रेखा चची के घर के पास पहुंच गया. फिर मुझे याद आया की उनका एक छोटा सा बीटा है बबलू. मैंने सोचा की बबलू के लिए कुछ ले लेता हु. इससे एक बहाना भी हो कयेगा उनके घर जाने का. मुझे ये भी अंदाज़ा था की इस टाइम रघुवीर काका घर पर hi होंगे. खा पि कर वो खेतो की तरफ दोपहर में hi जायेगे.

मैं चलता हुआ पास की hi एक दूकान पर आया और दूकान से बबलू के लिए गुड़ नमकीन और बिस्कुट खरीदा. उसके बाद वापस रेखा चची के घर की तरफ आ गया. रास्ते में मुझे कुछ जान पहचान के लोग भी मिले जिनसे मेरी थोड़ी बहुत बातचीत हुयी. उसके बाद मैं सीधा रेखा चची के घर आ गया. घर के दरवाजे के पास आ कर मैंने कुण्डी बजायी तो कुछ hi देर में रेखा चची ने hi दरवाजा खोला.

मुझे दरवाजे के पास खड़ा देख कर रेखा चची मुस्कुरायी तो मैं भी मुस्कुराया. उसके बाद चची ने मुझसे अंदर आने का रास्ता देते हुए कहा की सही वक्त पर आये हो vicky....main इस वक्त तुम्हारे काका को खाना देने hi जा रही थी. अब तुम आ गए हो तो चलो तुम्हे भी दे दूगी. चची की इस बात पर मैं मुस्कुराया और अंदर आ गया.

थोड़ी hi देर में मैं चची के साथ अंदर रसोई की तरफ आ गया. रघुवीर काका रसोई के पास hi ज़मीन पर चटाई में बैठे थे. जब उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो वो खुश होते हुए बोले.

"ारी विक्की tum...aao aao...sahi वक्त पर आये हो बीटा तुम. चलो आओ हम दोनों काका भतीजा साथ में बैठ कर खाना खायेगे." रघुवीर काका ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैं भी उनके बगल से बैठ गया. मैं प्लास्टिक की पन्नी में जो सामान बबलू के लिए लिया था उसे मैंने चची की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

"चची ये बबलू के लिए लाया हु मैं. कहा है wo...dikh नहीं रहा कही.?" मैंने ये कहा तो चची और काका सामान देख कर हैरान हुए फिर काका ने कहा.

"बीटा ये सब क्यों लाये हो tum...kya ज़रूरत थी इसकी.?" काका ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं अपनी ख़ुशी से लाया हु काका. आखिर बबलू मेरा छोटा भाई है. उस दिन आया तो खली हाथ था मैं. उसे देख कर मुझे लगा था की मुझे बबलू के लिए कुछ तो लाना hi चाहिए था. आज जब इधर आया तो मुझे ध्यान आ गया बबलू का तो मैं ये सब ले आया." मैंने ये सब कहा तो काका बस मुस्कुरा कर रह गए.

चची के चेहरे पर भी ख़ुशी दिख रही थी. मैंने देखा की उनकी नाक में आज वो नाथ नहीं थी जो सरपंच ने चची को गिफ्ट किया था. मैं समझ गया की काका के सामने शायद वो उस नाथ को नहीं पहनती थी वर्ण काका उस नाथ के बारे में हज़ारो सवाल करते उनसे. खेर ऐसे hi हसी मज़ाक करते हुए मैं और काका दोनों hi खाना खा चुके. काका थे इस लिए मैंने चची को उस हिसाब से नहीं छेड़ा.

खाना खाने के बाद काका ने मुझसे कहा की विक्की आज खेतो में पानी लगवाना है मुझे. बड़ी मुश्किल से रमा शंकर अपनी मोटर देने को राज़ी हुआ है. फसल को पानी देना ज़रूरी है वर्ण सूख जाएगी. मैं तो बस खाना खाने hi आया था यहाँ. अब जाउगा तो रमा शंकर से उसकी मोटर लूँगा और खेतो में पानी लगाऊगा. तुम्हे अगर अपनी चची से दरबार करना है या अपने छोटे भाई के साथ खेलना कूदना है रुक जाना यहाँ. मैं तो अब जा रहा हु.

काका की ये सब बाते सुन कर मैं मन hi मन खुश हो गया. मैंने एक नज़र चची की तरफ देखा तो उनके चेहरे पर परेशानी नज़र आयी. मैं समझ गया की काका ने मुझे उनसे दरबार करने को कहा था इस वजह से वो परेशां दिखने लगी थी. मतलब वो नहीं चाहती थी की मैं यहाँ रुकू. कुछ तो गड़बड़ होने वाला था आज.

मैं समझ गया की बात बड़ी जल्दी पुराणी हो गयी है. सरपंच को या फिर चची को थोड़ा लम्बा झटका देना पड़ेगा. वर्ण ये दोनों सेल कुत्ते की पूछ की तरह टेढ़े hi बने रहेंगे. मैंने सोच लिया की अब थोड़ा अच्छा वाला झटका देना hi पड़ेगा.

कुछ hi देर में काका घर से चले गए. अंदर किसी कमरे से बबलू बाहर आ गया था तो मैं उसके पास चला गया. उसे मैंने बताया की आज मैं उसके लिए गुड़ नमकीन और बिस्कुट खुद ले के आया हु. मेरी ये बात सुन कर वो बड़ा खुश हुआ. फिर मैंने उसे बताया की गुड़ नमकीन और बिस्कुट मैंने उसकी माँ को दे दिया है इस लिए वो उनसे ले ले. मेरी ये बात सुन कर वो भागते हुए चची के पास गया और उनसे गुड़ मांगने लगा.

चची ने पन्नी से निकाल कर थोड़ा सा गुड़ नमकीन बबलू को दिया तो वो ख़ुशी ख़ुशी खाने लगा. मैंने देखा की चची अभी भी परेशां थी. मैं जनता था की वो मेरे यहाँ रहने से परेशान थी. उन्हें समझ नहीं आ रहा था की वो मुझे यहाँ से जाने के लिए कैसे कहे.? इधर मैंने भी सोचा की चलो इनकी भी हालत अब खराब कर hi देते हैं.

"क्या बात है chachi...aap कुछ परेशान सी दिख रही हैं.?" मैंने ये पूछा तो चची एकदम से हड़बड़ा गयी और फिर खुद को सम्हालते हुए बोली.

"Nahi...nahi तो. ऐसी तो कोई बात नहीं है विक्की." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"नहीं chachi....aisi वैसी बात तो ज़रूर है वर्ण आपके चेहरे पर ये परेशानी ऐसे hi नहीं दिखती मुझे." मैंने ये कहा तो चची ने हैरानी से मेरी तरफ देखा और फिर हकलाते हुए बोली.

"ारी मैंने कहा न vicky...aisi कोई बात नहीं है. बस ऐसे hi है. तुम तो जानते हो की घर ग्रहस्ती में बहुत सी परेशानिया होती हैं. बस यही बात है." चची ने बहाना तो बढ़िया बनाया मगर उनका ये बहाना मेरे सामने फ़ैल hi था.

"घर ग्रहस्ती की परेशानिया तो सबको होती हैं चची. मगर इस वक्त जिस चीज़ से आप परेशां हैं उसके बारे में मुझे पता है." मैंने ये कहा तो चची ने फटी आँखों से मेरी तरफ देखा और फिर कहा.

"क्या matlab....tumhe क्या पता है.?" चची ने ये कहा तो मैंने इस बार मुस्कुराते हुए कहा.

"इस वक्त आपकी सबसे बड़ी परेशानी मैं हु चची. आप चाहती हैं की मैं यहाँ से चला जाओ. सही कहा न मैंने.?" मैंने ये कहा तो चची एकदम से फटी फटी आँखों से देखती रह गयी मुझे. शायद उन्हें भरोसा नहीं हो रहा था की मैं उनके अंदर की बात कैसे जान सकता हु. फिर जैसे उन्हें होश आया तो उन्होंने जल्दी से खुद को सम्हालते हुए कहा.

"ये तुम क्या कह रहे हो विक्की.? भला मैं ऐसा क्यों चाहुगी की तुम यहाँ से चले जाओ.?" चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"छोड़िये इस बात को और एक बात bataiye...kya आप काका से खुश नहीं हैं.?" मैंने ये कहा तो चची ने हैरानी से मुझे देखते हुए कहा.

"ये तुम कैसी बात कर रहे हो मुझसे.?" चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"आपने देखा है न वो मेरे आने से कितना खुश हुए थे और जाते हुए मुझे कह गए की मैं आपसे दरबार करू या बबलू के साथ खेलु. सोचिये chachi...unhe मुझ पर और आप पर कितना भरोसा है. वो ये बात सोच भी नहीं सकते हैं की मैं आपके साथ कुछ गलत कर सकता हु या आप मेरे साथ कुछ गलत कर सकती हैं. उन्हें पता है की मैं कोई बच्चा नहीं हु बल्कि जवान मर्द हो चूका हु. फिर भी उन्होंने मुझे आपसे दरदबार करने के लिए कहा और खुद खेतो की तरफ चले गए." मैंने ये कहा तो चची बुरी तरह शॉक नज़र आयी फिर बोली.

"मुझे समझ नहीं आ रहा की तुम ये सब क्या कह रहे हो. साफ़ साफ़ बोलो आखिर क्या कहना चाहते हो तुम.?" चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"प्यार इज्जत सम्मान और भरोसा कितनी अनमोल चीज़े होती हैं न चची. खेर मैं आपसे पूछ रहा था की क्या आप काका से खुश नहीं हैं.?" मैंने ये कहा तो चची ने इस बार थोड़ा नाराज़गी से कहा.

"मैं खुश हु की नहीं ये हमारे अंदर की बात है मगर तुम ये बात क्यों पूछ रहे हो.? Kahi....kahi ऐसा तो नहीं की तुम्हारे मन में मेरे प्रति कोई गलत भावना है. कही तुम मेरे साथ कुछ...?" चची ये बोलने hi वाली थी की तभी मैं उनकी बात को बीच में kaat'te हुए पहले हँसा और फिर बोलै.

"कमाल है chachi....aapne तो मेरे बारे में ऐसा भी सोच लिया और कह भी दिया मगर chachi...mujhe ये सब बोलने से पहले खुद अपने बारे में सोचिये की आप क्या हैं और क्या करती हैं.?" मैंने ये कहा तो चची एकदम से हड़बड़ा गयी. उनके चेहरे पर बहुत सरे रंग उभरते दिखे मुझे. फिर उन्होंने जल्दी से खुद को सम्हाला और मुझसे गुस्से में कहा.

"ये तुम क्या बकवास कर रहे हो. क्या करती हु मैं.? आखिर किस बारे में बोल रहे हो तुम.?" चची ने गुस्से में ये कहा तो मैंने कहा.

"मुझ पर गुस्सा होने की ज़रूरत नहीं है चची. और haan...main जिस बारे में बात कर रहा हु उसे आप अच्छी तरह समझ गयी हैं." मैंने ये कहा तो चची ने कहा.

"मैं कुछ भी नहीं समझी हु. तुम साफ़ साफ़ मुझे बताओ. किस बारे में बोल रहे हो तुम ये सब.? उस दिन भी तुम बहुत अजीब बाते कर रहे थे. आखिर क्या है तुम्हारे मन में.?" चची ने परेशां हो के मुझसे ये पूछा तो मैंने कहा.

"अच्छा ठीक hai....to बताइये सरपंच काका यहाँ किस वक्त पहुचेगे.?" मैंने ये कहा तो चची बुरी तरह घबरा गयी. बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हालते हुए बोली.

"सरपंच..?? ये तुम क्या कह रहे हो.? वो भला यहाँ क्यों आएंगे.?" चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ज़्यादा अनजान बनने की कोशिश मत करो चची. मुझे सब पता है. मैं आपके घर अचानक क्यों आने लगा इस बारे में सोचना चाहिए आपको. सरपंच यहाँ कब आता है और क्यों आता है ये सब जनता हु मैं." मैंने ये कहा तो चची के ऊपर जैसे आसमान से बिजली गिर पड़ी. चेहरा फक्क पद गया था उनका. पूरा चेहरा पल भर में पसीना पसीना हो गया. मुँह से कोई बोल न निकला.

"ये सब मैं यु hi नहीं कह रहा हु चची बल्कि मेरे पास इसका पक्का सबूत है. उस दिन जब मैंने बबलू को बाहर रट देखा तो मैंने उससे पूछा की क्यों रो रहा है वो तो उसने बताया की अपने उसे डाट कर भगा दिया था. फिर मैंने उससे पूछा की क्या उसके पिता जी घर के अंदर हैं तो उसने बताया की नहीं मगर उसने ये बताया की सरपंच दादा अंदर हैं और आपने उसे डाट कर बाहर भगा दिया था. मैंने सोचा की घर के अंदर जब काका नहीं हैं तो सरपंच अंदर किस लिए है.? बस यही पता लगाने के लिए मैं घर के अंदर आने का रास्ता ढूढ़ने लगा. घर के सामने से तो रास्ता बंद hi कर दिया था आपने इस लिए मैं पीछे के रास्ते की तरफ गया और फिर उस तरफ बॉउंड्री से कूद कर घर के अंदर आया. अंदर आ कर मैं चारो तरफ देखने लगा मगर सरपंच और आप मुझे कही न दिखे. फिर मुझे कमरे से आप लोगो की आवाज़ आयी तो मैं कमरे की तरफ गया. कमरे की खिड़की से मैंने अंदर देखा तो अंदर का नज़ारा इतना ज़बरदस्त था की पूछो hi मत. कोई भी नहीं सोच सकता था की इस घर में सरपंच आपके साथ इतना बड़ा कारनामा कर रहा है और आप उसके कारनामे में उसकी बड़े ज़ोर से मदद कर रही थी. मैंने सोचा की वैसे को तो सरपंच और ये ब्राह्मण समाज हमारे घर का पानी भी नहीं पीटा और यहाँ रिश्ते में जो उसकी बहु लगती है और साले की बेटी भी तो उसके साथ ऐसा काण्ड कर रहा है. वाह रे सरपंच और वाह रे रेखा चची. खेर मैंने भी सोचा चलो इसका सबूत तो बना hi लिया जाये. इस लिए मैंने मोबाइल निकला और आप दोनों की मस्त वीडियो बनायी. उसके बाद जब आप दोनों की रासलीला ख़तम हो गयी तो मैं चुप चाप जहा से आया था वही से निकल गया." मैंने ये सब चची से बताया तो उनके मुख से कोई आवाज़ न निकली. उन्हें चक्कर आ गया और वो लहरा कर ज़मीन पर गिर पड़ी.

रेखा चची जब चक्कर खा कर गिर पड़ी तो मैं मुस्कुराया और सोचा की लगता है कुछ ज़्यादा hi ज़ोर का झटका दे दिया मैंने. तभी बबलू के रोने की आवाज़ से मैं उछाल पड़ा. मैंने देखा की वो जाने किधर से आया और अपनी गिरी पड़ी माँ से लिपट कर रोने लगा. वो बार बार चची से बोले जा रहा था की माँ क्या हुआ तुम्हे...???

घड़े से गिलास में पानी ला कर मैंने चची के चेहरे पर छिड़का तो थोड़ी hi देर में चची को होश आ गया और वो उठ कर बैठ गयी. अपनी माँ को सही सलामत देख बबलू का रोना बंद हो गया और वो अपनी माँ से पूछने लगा की उन्हें क्या हो गया था. चची ने मेरी मौजूदगी में ज़्यादा कुछ नहीं कहा. बस यही कहा की कुछ नहीं बीटा बस ऐसे hi थोड़ा सो गयी थी मैं.

बबलू को समझा बुझा कर चची ने कमरे में भेज दिया और फिर ख़ामोशी से वही पर बैठी रही. उनके चेहरे पर बारह बजे हुए थे. ऐसा लग रहा था जैसे उनकी दुनिया उजाड़ गयी हो. मैं भी कुछ नहीं बोलै और बाहर की तरफ बिना कुछ बोले चल दिया.

मुझे जाता देख रेखा चची हड़बड़ा गयी और जल्दी से उठी. मैं चलते हुए बैठक की तरफ आ गया. तभी चची भागते हुए मेरे पीछे आयी और मुझे आवाज़ दे कर रुकने को कहा तो मैं रुक गया.

"कहा जा रहे हो तुम?" रेखा चची ने धीमी आवाज़ में ये कहा तो मैंने कहा.

"अपने घर.." मैंने ये कहा तो चची ने कहा.

"मुझे माफ़ कर दो विक्की. मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी है. तुम इस बारे में किसी से कुछ मत बताना वर्ण मैं किसी को मुँह दिखने के काबिल नहीं रहूगी. तुम्हारे काका को इसका पता चला तो वो मुझे जान से मार देंगे." चची ने रट हुए ये सब कहा तो मैंने कहा.

"गलती एक दो बार होती है बार बार नहीं. आपने तो अपनी जेठानी को भी सरपंच के नीचे सुलाने के लिए राज़ी कर लिया है. उस सरपंच का क्या hai...use तो बस छूट से मतलब है फिर चाहे वो किसी की भी हो." मैंने चची के सामने डायरेक्ट छूट कह कर बात की तो वो हैरानी से मुझे देखने लगी फिर बोली.

"ये तुम कैसे गंदे शब्द बोल रहे हो विक्की.? शर्म करो मैं तुम्हारी चची हु." चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"आप मेरी चची हैं और सरपंच आपका खासम हो gaya..hai न.?" मैंने ये कहा तो चची ने सर झुका लिया. वो कुछ बोल न सकीय तो मैंने कहा.

"रिश्तो की बाते आपके मुँह से अच्छी नहीं लगती चची. आपकी नज़र में अब हर रिश्ता बेकार हो चूका है. आपके लिए तो बस सरपंच hi सब कुछ है. उस दिन उसी ने आपको वो सोने की नाथ दी थी न. याद है जब मैं आपसे उसके बारे में उस दिन पूछ रहा था. खेर छोड़िये ये sab...chalta हु मैं." मैंने ये कहा तो चची ने हड़बड़ा कर कहा.

"ऐसे तो न जाओ विक्की. तुम बता रहे थे की तुमने उस दिन उस सब का वीडियो बना लिया था तो उस वीडियो को अपने मोबाइल से मिटा दो. मैं वडा करती हु की आज के बाद अब ये सब नहीं होगा. तुम किसी से कुछ मत बताना. देखो तुम जो भी कहोगे मैं करुँगी." चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ठीक है fir...ab आपको वही करना पड़ेगा जो मैं कहुगा." मैंने ये कहा hi था की चची बोल पड़ी.

"हाँ पर अगर तुम ऐसा वैसा करने को कहोगे तो मैं नहीं कर पाओगी." चची ने पता नहीं क्या सोच कर ये कहा था मगर मैंने कहा.

"मैंने कहा न की आपको वही करना होगा जो मैं कहुगा. आप किसी काम को करने से इंकार नहीं कर सकती हैं और अगर आपने इंकार किया तो मैं वो वीडियो जा कर सीधा काका को दिखाऊगा और फिर सरे गांव वालो को भी." मैंने ये कहा तो चची बुरी तरह घबरा गयी फिर बोली.

"ठीक है विक्की तुम जो कहोगे मैं वो करुँगी. तुम बस वो वीडियो किसी को मत दिखाना वर्ण मैं सच में किसी को मुँह दिखने के काबिल नहीं रहूगी." चची ने रट हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"चिंता मत karo...main वैसा कुछ नहीं करने को कहुगा जिसके बारे में आप सोच रही हैं. मैं इतना गिरा हुआ नहीं हु की इस वीडियो के आधार पर आपको ब्लैकमेल कर के आपकी इज्जत लूटूँगा. न बिलकुल nahi...ye सब काम तो प्यार से और रज़ामंदी से होते हैं." मैंने ये कहा तो चची ने हैरानी से मेरी तरफ देखा तो मैंने फिर कहा.

"आपको बस एक hi काम करना होगा चची. अभी जब सरपंच आपके घर आएगा तो आपको उस पर गुस्सा होना है और खूब खरी खोटी सुनना है उसे और अगर वो आपसे ज़्यादा फ़ालतू की बात करे तो उसके गाल पर खींच के एक तमाचा भी मारना है." मैंने ये कहा तो चची के पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी. उसने घबरा कर मेरी तरफ देखा फिर बोली.

"नहीं nahi...nahi विक्की. ये मुझसे नहीं होगा. देखो मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हु. मुझसे ऐसा काम न करवाओ. मैं उस सरपंच को ये सब नहीं कह सकती और न hi उसे थप्पड़ मार सकती हु." चची ने गिड़गिड़ाते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"ये काम तो आपको करना hi पड़ेगा चची. इसके शिव आपको कुछ नहीं करना है. जब सरपंच यहाँ आये तो उसके साथ आपको यही सब करना है और लास्ट में ये भी कहना है की दुबारा वो अपनी शकल भी न दिखाए आपको." मैंने ये कहा तो चची वही बैठक में बैठ गयी और अपना माथा पकड़ कर रोने लगी.

"अच्छे से सोच लो chachi...agar आप ऐसा नहीं करोगी तो मैं वो वीडियो सब को दिखा दूँगा मगर सबसे पहले अपने काका को दिखाऊगा. उनसे कहुगा की देख लीजिये काका आपकी पीठ पीछे आपकी सटी सावित्री बीवी कैसे कैसे गुल खिलाती है." मैंने ये कहा तो रेखा चची ने झपट कर मेरे पेअर पकड़ लिए और फिर गिड़गिड़ाते हुए बोली.

"Nahi....nahi विक्की. भगवन के लिए मुझ पर रहम करो. ऐसा मत करना वर्ण मैं जीते जी मर जाओगी. तुम्हारे काका मेरी जान ले लगे या मुझे घर से निकाल देंगे. हर जगह मेरी ठु ठु हो जाएगी." चची ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"मैं भी ये नहीं चाहता चची की आपकी ठु ठु हो. इसी लिए तो बोल रहा हु की वही करो जो कह रहा हु. अगर आपने ऐसा कर दिया तो मैं वो वीडियो किसी को नहीं दिखाऊगा ये मेरा वडा है आपसे." मैंने ये कहा तो चची ने अपने आँशु पोंछते हुए कहा.

"और तुम वो वीडियो अपने मोबाइल से भी हटा डोज." चची ने मुझसे ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"बिलकुल chachi...wo वीडियो मैं आपके सामने अपने मोबाइल से हटाऊंगा. अब चलो अपना हुलिया ठीक कर लो. मुझे लगता है सरपंच आता hi होगा yaha....aur हाँ मैं यही पर छिपा रहुगा और छिप कर देखूगा की आप कैसे सरपंच के साथ वो सब करती हैं. एक बात aur...zyada होशियारी दिखने की कोशिश न करना वर्ण फिर सोच लेना की मैं क्या करुगा." मैंने ये कहा तो चची ने बेबस नज़रो से मेरी तरफ देखा और हाँ में सर हिला दिया.

उसके बाद मेरे कहने पर चची अंदर चली गयी अपना हुलिया सही करने के लिए. उनके जाने के बाद मैं सोच रहा था की ये जो मैं चची से करवा रहा हु वो सही है या गलत. मगर मुझे तो यही लग रहा था की ये सब तो ज़बरदस्त है. जब सरपंच के साथ ये सब होगा तो सरपंच को भरी दोपहर में तारे नज़र आएंगे. उसने तो ख्वाबो में भी नहीं सोच रखा होगा की आज उसके साथ क्या होने वाला है.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 35


"और तुम वो वीडियो अपने मोबाइल से भी हटा डोज." चची ने मुझसे ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"बिलकुल chachi...wo वीडियो मैं आपके सामने अपने मोबाइल से हटाऊंगा. अब चलो अपना हुलिया ठीक कर लो. मुझे लगता है सरपंच आता hi होगा yaha....aur हाँ मैं यही पर छिपा रहुगा और छिप कर देखूगा की आप कैसे सरपंच के साथ वो सब करती हैं. एक बात aur...zyada होशियारी दिखने की कोशिश न करना वर्ण फिर सोच लेना की मैं क्या करुगा." मैंने ये कहा तो चची ने बेबस नज़रो से मेरी तरफ देखा और हाँ में सर हिला दिया.

उसके बाद मेरे कहने पर चची अंदर चली गयी अपना हुलिया सही करने के लिए. उनके जाने के बाद मैं सोच रहा था की ये जो मैं चची से करवा रहा हु वो सही है या गलत. मगर मुझे तो यही लग रहा था की ये सब तो ज़बरदस्त है. जब सरपंच के साथ ये सब होगा तो सरपंच को भरी दोपहर में तारे नज़र आएंगे. उसने तो ख्वाबो में भी नहीं सोच रखा होगा की आज उसके साथ क्या होने वाला है.

अब आगे पढ़िए....


मैं अभी ये सब सोच hi रहा था की मुझे एकदम से ख़याल आया की रेखा चची कही सरपंच को फ़ोन कर के उसे आने से मन न कर दे. ऐसा हो सकता था क्यों की उनके पास मोबाइल फ़ोन तो होगा hi...aaj कल सबके पास होता है. वैसे भी मैंने उन्हें अपना हुलिया सही करने के लिए कहा था और वो अंदर की तरफ चली गयी थी. अगर चची ने सरपंच को फ़ोन करके सब कुछ बता दिया तो मेरा सारा प्लान मिटटी में मिल जायेगा.

मैं बैठक से अंदर की तरफ दौड़ते हुए गया और अंदर हर जगह चची को ढूंढने लगा. अंदर आँगन में के आस पास चची कही न दिखी मुझे तो मैं दौड़ते हुए सीधा उनके कमरे में घुस गया. कमरे में घुसते hi मेरी नज़र चची पर पड़ी तो मैंने राहत की सांस ली.

रेखा चची दिवार पर लगे एक बड़े से शीशे में देखते हुए अपना हुलिया सही कर रही थी. मुझे एकदम से अंदर आते देख वो बुरी तरह घबरा गयी. कमरे में hi राखी एक चारपाई पर बबलू पड़ा सो रहा था. मैं चची को देखने के बाद कमरे में हर जगह अपनी निगाह दौड़ा रहा था. मैं जानना चाहता था की चची के पास अगर कोई मोबाइल है तो कहा है मगर मुझे कमरे में कही भी मोबाइल नज़र न आया.

"क्या hua..tum इस तरह मेरे कमरे में क्यों आ गए.?" चची ने घबराये हुए लहजे से ये कहा तो मैंने कहा.

"वो मैं देखने आया था की आपने अपना हुलिया सही कर लिया की नहीं." मैंने ये कहा तो चची ने कहा.

"हाँ सही कर लिया है मैंने मगर मैं फिर कहती हु विक्की मुझसे ये सब नहीं होगा. भगवन के लिए मुझसे ये सब न करवाओ. बाकी तुम जो कहोगे मैं वो करने को तैयार हु." चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"और क्या कर सकती हैं आप.?" मैंने चची के मन की तोह लेने की सोचते हुए ये कहा तो चची ने कहा.

"तुम जो कुछ भी करने को कहोगे मैं करुँगी मगर भगवन के लिए ये करने को न कहो. मुझमे इतनी हिम्मत नहीं है की मैं सरपंच से वो सब कहु और उसे थप्पड़ भी मारु." चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं ये पूछ रहा हु की आप क्या क्या कर सकती हैं साफ़ साफ़ बताइये मुझे.?" मैंने ये कहा तो चची ने कुछ देर सोचा और फिर सर झुका कर थोड़ा धीमे स्वर में कहा.

"तुम चाहो तो तुम भी मेरे साथ वही कर सकते हो जो सरपंच यहाँ करने आता था मेरे साथ." चची ने ये कहा तो मैं मन hi मन पहले हैरान हुआ फिर मुस्कुराया. चची की नज़रे नीचे थी तो मैंने कहा.

"साफ़ साफ़ खुल कर बताइये चची की मैं क्या करू.?" मैंने ये कहा तो चची ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा. उनके चेहरे पर शर्म की लाली छायी हुयी दिखी मुझे. मेरी तरफ देखने के बाद फिर से उन्होंने अपना सर झुका लिया फिर बोली.

"मैं कैसे कहु विक्की मुझे खुल कर बोलने में बहुत शर्म आ रही है." चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"कमाल hai...sarpanch के सामने आपको ज़रा भी शर्म नहीं आती और मुझसे कहने में शर्म आती है.? खेर अगर शर्म hi आती है आपको तो फिर जाने दीजिये और haan...ab चलिए बाहर. सरपंच आने hi वाला होगा." मैंने ये कहा तो चची ने हड़बड़ा कर मेरी तरफ देखा और कहा.

"क्यों इतना मजबूर कर रहे हो मुझे.? क्या तुम्हे मुझ पर ज़रा भी तरस नहीं आता विक्की.? मैं कह तो रही हु की तुम भी मेरे साथ वो कर सकते हो. मगर भगवन के लिए वैसा करने के लिए मुझे मजबूर मत करो." चची ने रो देने वाले लहजे से ये कहा तो मैंने कहा.

"देखिये जब तक आप मुझसे खुल कर साफ़ साफ़ नहीं कहेगी तब तक मुझे समझ में hi नहीं आएगा की मैं क्या करू. वैसे भी जो काम करने के लिए मैं आपसे कह रहा हु उसे तो आपको करना hi पड़ेगा." मैंने ये कहा तो चची ने कहा.

"भगवन के लिए मान जाओ न विक्की. मुझसे वो सब न करवाओ. Tum....tum उसके बदले में मेरे साथ वो सब कर लो जो सरपंच मेरे साथ करता है और तुम्हारे काका भी." चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ारी फिर वही baat...maine कहा न की खुल कर और साफ़ शब्दों में बताइये की क्या करू मैं.?" मैंने ये कहा तो चची ने फिर से मेरी तरफ देखा. वो बार बार अपने हाथो को आपस में भींच रही थी जैसे बेबसी का इज़हार कर रही हो. फिर उसी बेबसी से बोली.

"Tum....tum भी मुझे ch....cho...chod लो. हे भगवन ये तुम मुझसे क्या कहवा रहे हो. कुछ तो शर्म करो विक्की." रेखा चची का चेहरा एकदम से लाल पद गया था. ये सब कहने के बाद वो बुरी तरह शर्म से मरी जा रही थी.

"ओह्ह तो मतलब आप ये कह रही हैं की सरपंच को थप्पड़ न मरवाने के बदले में मैं आपको छोड़ लू.?" मैंने ये कहा तो चची कुछ बोल न सकीय बस सर को हिला कर हाँ कहा तो मैंने कहा.

"नहीं chachi....main ये नहीं करुगा. जिस छूट में सरपंच जैसे औरतबाज़ और हरामी टाइप के इंसान का लुंड गया हो उस छूट को तो मैं देखना भी पसंद नहीं करुगा. इस लिए इस बात को तो आप रहने hi दीजिये और अब चलिए बाहर. अब मैं कुछ नहीं सुन्ना चाहता." मैंने ये कहा तो रेखा चची ने एक झटके से मेरी तरफ देखा. उनकी आँखों से आँशु बाह चले थे. शायद मेरी बात से उनको ठेस लगी थी और उनका अपमान हुआ था मगर मैं इस वक्त किसी अपमान पर ध्यान नहीं देने वाला था.

रेखा चची बहुत गिड़गिड़ाई मगर मैं न मन और उन्हें ले कर बैठक में आ गया. मैंने अच्छी तरह देख लिया था की उनके कमरे में कही पर भी कोई मोबाइल फ़ोन नहीं था और न hi उन्होंने अपने पास कही छुपाया हुआ था. बैठक में आ कर मैं तखत पर बैठ गया जबकि रेखा चची एक कोने में चुप चाप सर झुकाये कड़ी थी. हम दोनों के बीच एकदम से सन्नाटा सा छ गया था.

करीब दस मिनट गुज़र गए. इस बीच चची ने एक दो बार और मुझसे ये सब न करवाने के लिए विनती की मगर मैं न मन. कुछ देर और गुजरने के बाद बाहर का दरवाजा खटखटाया गया तो हम दोनों की दिल की धड़कने एकदम से बढ़ गयी. चची ने घबरा कर मेरी तरफ देखा. उन्होंने मेरी तरफ आखिरी उम्मीद से देखा मगर मैंने उनकी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए दरवाजा खोलने के लिए इशारा किया और धीमी आवाज़ में कहा की वो वही सब करे जो मैंने कहा है.

रेखा चची बहुत ज़्यादा मजबूर और बेबस थी. खेर चेहरे पर बारह बजाये वो बैठक से बाहर की तरफ बढ़ चली. वो ऐसे चल रही थी जैसे उनके पैरो में मेहदी लगी हो. इधर मैं भी उठ कर उनके पीछे चल दिया. थोड़ी hi देर में चची दरवाजे के पास पहुंच गयी और पलट कर एक बार फिर से मेरी तरफ उम्मीद भरी नज़रो से देखा तो मैंने दरवाजा खोलने का इशारा किया और खुद मैं वही दिवार के पीछे छुप कर खड़ा हो गया.

रेखा चची ने कांपते हाथो से दरवाजे की कुण्डी खोल कर दरवाजा खोला तो दरवाजे के बाहर सरपंच खड़ा दिखा. सरपंच को देखते hi चची की हालत खराब हो गयी. उधर जैसे hi दरवाजा खुला तो सरपंच ने सबसे पहले चची के पीछे और आस पास का जायजा लिया फिर बोलै.

"क्या बात है मेरी rani...aaj तो मस्त दिख रही है तू.? मेरे लिए इतना श्रृंगार किया तूने. मैं तो तुझे देखते hi खुश हो गया यार. कसम से आज तो तुझे गाबियत से छोड़ूगा" सरपंच ने अपनी खीसे निपोरते हुए ये सब कहा तो रेखा के चेहरे पर एकदम से गुस्से उभर आया. उसका पूरा जिसम थार थार कांपने लगा और वो जैसे एकदम से गरज उठी.

"तेरी हिम्मत कैसे हुयी मुझसे इस तरीके से बात करने की.? चला जा यहाँ से वर्ण शोर मचा कर पुरे गांव को इकठ्ठा कर के बुला लगी और फिर बताऊगी की तू मुझसे कितने गंदे तरीके बात कर रहा था." रेखा ने ये सब एक hi सांस में कह दिया था जिसे सुन सुन कर सरपंच के पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी. वो इस तरह आँखे फाड़े रेखा चची को देखने लगा था जैसे रेखा चची कोई इंसान नहीं बल्कि भूत हो.

"अब आँखे फाड़ फाड़ के क्या देख रहा है रे नीच इंसान.? मैं कहती हु चला जा यहाँ से वर्ण अच्छा नहीं होगा तेरे लिए." रेखा चची ने जब फिर से गरजते हुए ये कहा तो इस बार सरपंच को जैसे होश आया और वो गुस्से में आ कर बोलै.

"ारी मादरचोद रंडी की औलाद साली तेरा दिमाग तो ठिकाने पर है न या माँ चुद गयी है तेरी. और ये तू क्या धमकी दे रही है मुझे गांव वालो को बुलाने की.? तुझे पता hi नहीं की नहीं इस गांव के लोग मेरी झाँठ का बाल भी नहीं टेढ़ा कर सकते समझी. और haan...tune मुझसे इस लहजे में बात की है न तो अब रुक मादरचोद मैं बताता हु तुझे. साली पुरे गांव के सामने तुझे नंगा दौडाऊंगा आज." सरपंच ये कहने के साथ hi आगे की तरफ बढ़ा hi था की रेखा चची के भूत मारे दर के भाग गए. वो बुरी तरह घबरा गयी.

मगर फिर जाने कहा से उनमे हिम्मत आ गयी की उन्होंने जैसे hi देखा की सरपंच दरवाजे के पल्लो में अपने दोनों हाथ रख कर अंदर आने वाला है तो चची ने पूरी ताकत से अपने दोनों हाथो को सरपंच की छाती में लगा कर ज़ोर का धक्का दिया तो सरपंच वापस पीछे की तरफ फिसलते हुए दो कदम चला गया. इधर चची एकदम से आगे बढ़ी और इससे पहले की सरपंच कुछ कर पता या सम्हाल पता चची ने आव देखा न ताव ज़ोर का एक थप्पड़ सरपंच के राइट वाले गाल पर जड़ दिया.

दर और घबराहट में चची को पता hi नहीं चला था की उन्होंने कितनी तेज़ी से सरपंच को थप्पड़ मारा था. मगर थप्पड़ की गूँज से hi पता चला की थप्पड़ में काफी वजन था. उधर जैसे hi सरपंच के गाल पर चची का थप्पड़ पड़ा तो सरपंच की आँखों के सामने अँधेरा सा छ गया. उसने जल्दी से अपने राइट गाल और राइट कान में हाथ लगाया. ऐसा लगा जैसे उसके कान के परदे भी झनझना गए थे. इधर चची ने थप्पड़ मारने के बाद सरपंच से कहा.

"तू मुझे धमकी क्या देता है कमीने.? मैं चाहु तो खुद सरे गांव वालो के सामने तुझे नंगा कर दू. मैं चीख चीख के सबसे कहुगी की तू हर रोज़ मेरे घर में ज़बरदस्ती घुस आता है और मेरी इज्जत loot'ta है. मैं सबको बताऊगी की तूने मुझे और मेरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी थी और ये कहा था की अगर मैं तेरे नीचे नहीं लेतुगी तो तू मेरे और मेरे परिवार के साथ कुछ भी बुरा कर सकता है." रेखा चची ने ये कहा तो सरपंच ने गुर्राते हुए कहा.

"तुझे इस सबका हिसाब देना होगा हरामज़ादी. तेरे इस घप्पड़ का जवाब तुझे देना होगा. बहुत महगा पड़ेगा तुझे तेरा ये थप्पड़. बहुत पछताएगी तू मादरचोद." सरपंच ने ये कहा तो रेखा चची ने कहा.

"चला जा यहाँ से और दुबारा कभी मुझे अपनी ये मनहूस शकल न दिखाना." रेखा चची ने भी गुर्राते हुए जब ये कहा तो सरपंच उन्हें आग उगलती आँखों से देखता रहा उसके बाद दांत पिस्ता हुआ चला गया वह से. सरपंच के जाने के बाद रेखा चची को होश आया.

उन्होंने घबरा कर इधर उधर देखा. आस पास कोई न दिखा उन्हें तो वो भाग कर अंदर की तरफ आयी. दरवाजा बंद करके वो रट सिसकते हुए बैठक की तरफ आ गयी. मुझे बैठक में बैठा देख वो मेरे ऊपर बिफर पड़ी.

"मिल गयी तुम्हारे कलेजे को ठंडक. मैंने कर दिया वो सब जो तुमने कहा था. मगर तुम शायद ये नहीं जानते की इस सबके बाद अब हमारा क्या होगा.? सरपंच को मैं अच्छी तरह जानती हु. वो मुझे और मेरे परिवार को अब चैन से जीने नहीं देगा. Agar....agar मुझे या मेरे परिवार के साथ कुछ भी बुरा हुआ तो उसके जिम्मेदार तुम होंगे विक्की और इसके लिए मैं तुम्हे कभी माफ़ नहीं करुँगी." रेखा चची ने रट हुए ये कहा तो मैंने पहले उन्हें शांत कराया उसके बाद कहा.

"ऐसा कुछ भी नहीं होगा चची. इस वक्त वो भले hi यहाँ से वो सब गुस्से में कह कर गया है मगर जब उसका गुस्सा शांत हो जायेगा तब वो इस सबके बारे में तरीके से सोचेगा. वो समझने की कोशिश करेगा की ऐसा आपने उसके साथ क्यों किया होगा.? आखिर ऐसी क्या वजह हो सकती थी की जिसकी वजह से आपने उसे इतना कुछ सुना दिया और उसे थप्पड़ भी मार दिया. वो इस बारे में बहुत सोचेगा chachi....use ये बात पता है की आप उसके साथ ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती हैं. इस लिए वो इस सबकी असली वजह के बारे में पता लगाने की कोशिश करेगा." मैंने ये कहा तो चची ने कहा.

"मैं ये सब कुछ नहीं जानती. मैं बस इतना जानती हु की तुमने मुझसे ये जो करवाया है उसका बहुत hi खतरनाक असर होगा. वो सरपंच अपना इतना बड़ा अपमान बर्दास्त नहीं करेगा और मुझे और मेरे परिवार को बर्बाद कर देगा." चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ऐसा कुछ नहीं होगा चची. मुझ पर भरोसा रखो आप. मुझे भी पता है की ऐसा करने का क्या अंजाम होगा इस लिए इससे बचने का प्लान भी है मेरे पास. जैसा की मैंने कहा था की सरपंच इस बारे में सोचेगा. उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा होगा की उसके साथ अपने ऐसा किया है. मगर उसे ये भी पता है की आपने उसके साथ ऐसा किया है तो इसके पीछे कोई बहुत बड़ी वजह रही होगी. अब वो आपके पास उसी वजह को जानने के लिए आएगा. तो मैं आपको ये कह रहा हु की जब सरपंच आपके पास इसकी वजह jan'ne आये तो आप उससे नार्मल होक hi कहना की आपके पति घर में hi थे और उन्हें आप दोनों के बारे में पता चल गया है. जिसके लिए काका ने आपको बहुत डाटा भी था. इसी लिए आपने गुस्से में आ कर उससे वो सब कहा था." मैंने ये सब चची से कहा तो चची मुझे हैरानी से देखने लगी फिर बोली.

"तुम मुझे ये सब कहने को बोल रहे हो उससे. जबकि मुझे लग रहा है की तुम मुझे किसी बहुत बड़े झमेले में फसा देना चाहते हो. तुम्हारे काका को पता चल गया तो वो मेरी जान ले लगे. नहीं विक्की nahi....ye सब बहुत खतरनाक बाते हैं. मैं ऐसा कुछ नहीं कर सकती." चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"इसके शिव कोई दूसरा रास्ता नहीं है आपके पास. सरपंच को भरोसा दिलाने के लिए ऐसा बोलना hi पड़ेगा आपको और तभी उसका गुस्सा भी शांत होगा. जब उसे पता चलेगा की आप दोनों के बारे में काका को पता चल गया है तो वो आपके पास दुबारा आने की हिम्मत hi नहीं करेगा." मैंने ये कहा तो चची सोच में पद गयी.

कुछ देर और मैंने चची को इस बारे में समझाया उसके बाद मैं उनके घर से बाहर आ गया. रास्ते में मैं सोच रहा था की अब ये और सरपंच एक दूसरे से इतना जल्दी नहीं मिलेंगे और न hi सेक्स करने का सोचेंगे.

रेखा चची के घर से आने के बाद मैं कोमल के घर की तरफ चल दिया. दोपहर हो गयी थी. मुझे ये तो पता नहीं था की कोमल का पति और ससुर इस वक्त कहा होंगे मगर मुझे उम्मीद थी की कोमल ने रास्ता साफ़ कर दिया होगा. खेर कुछ hi देर में मैं कोमल के घर के पास पहुंच गया. मैंने आस पास नज़र घुमाई तो सड़क के राइट साइड जो एक घर था उसके बाहर मुझे एक औरत दिखी जो बाहर hi एक लकड़ी के खूटे में रस्सी द्वारा बंधी गाय को भूसा दाल रही थी.

उस औरत को देख कर मैंने अपनी चाल धीमी कर ली. मैं नहीं चाहता था की उसकी नज़र मुझ पर पड़े और वो मुझे कोमल के घर में जाते हुए देख ले. कोमल के घर के बगल से सरपंच का घर था. उसके घर के बाहर जीप कड़ी थी. मतलब रुपेश घर पर hi था इस वक्त. तभी मुझे याद आया की कल माँ ने रचना से कहा था की वो आज अपनी माँ को हमारे घर ले के आएगी.

ये याद आते hi मेरे दिल की धड़कने बढ़ गयी. मुझे लगा की कही इस वक्त रचना और उसकी माँ अपने घर से निकल कर मेरी तरफ न आ जाये. वैसे ये भी हो सकता था की वो दोनों माँ बेटी मेरे घर चली गयी हो. मगर मैं सूरे नहीं था. तभी मैंने देखा की गाय को भूसा दाल रही वो औरत अपने घर के अंदर की तरफ चली गयी. उसके जाते hi मैं तेज़ तेज़ कदमो से चलता हुआ कोमल के घर के दरवाजे के पास पहुंच गया और फिर दरवाजे की कुण्डी बजायी.

घर का दरवाजा जल्दी hi खुला. मेरे सामने पिंक कलर की साड़ी पहने कोमल कड़ी नज़र आयी. मुझे देखते hi वो मुस्कुरायी तो मैं समझ गया की उसका पति और ससुर खेत जा चुके हैं. मैं जल्दी से दरवाजे के पार गया तो कोमल ने भी जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया. उसके बाद कुछ hi देर में हम दोनों चलते हुए अंदर कमरे में आ गए.

मैंने देखा की कोमल का चेहरा आज काफी खिला खिला नज़र आ रहा था. शायद वो मेरे आने से खुश थी. जैसे hi हम दोनों कमरे में पहुंचे तो कोमल ने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया. दरवाजा बंद करने के बाद वो मेरी तरफ आयी और फिर बोली.

"बिलकुल सही वक्त पर आये हो विक्की. मेरे पति और ससुर अभी कुछ hi देर पहले यहाँ से गए हैं." कोमल ने ये कहा तो मैं मुस्कुराया और फिर आगे बढ़ कर मैंने बेझिझक कोमल का हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया तो वो एकदम से मुझसे आ लगी. मेरे ऐसा करते hi उसके चेहरे का रंग बदलने लगा. शर्म की लाली से चेहरा सुर्ख पड़ता नज़र आया मुझे.

मैंने कोमल के चेहरे को अपने दोनों हाथो में लिया और फिर झुक कर उसके रसीले होठो पर अपने होठ रख दिए. कोमल का जिसम एकदम से कांप सा गया. मैंने कोमल के होठो को एक दो बार चूमा और फिर उसके होठो को मुँह में भर कर चूसने लगा. कोमल ने अपनी दोनों बाहो को मेरे अगल बगल से निकाल कर मुझे कास लिया.

दिन के वक्त में मैंने कोमल को अच्छे से देखा था. वो सच में सुन्दर थी. मुझसे वो कास के लिपटी हुयी थी. मैंने उसके होठो को चूसते हुए अपने एक हाथ से उसकी चुकी को पकड़ा और ज़ोर से दबाया तो कोमल की सिसकी मेरे मुँह में hi रह गयी. उसकी चुकी दबाने में मुझे बहुत मज़ा आ रहा था और मेरा लुंड पल भर में hi तन कर खड़ा हो गया. मैं कोमल की चुकी को कुछ देर मसलता रहा उसके बाद मैंने अपने उस हाथ से कोमल का एक हाथ पकड़ा और फिर उसे ला कर पेंट के ऊपर से hi अपने लुंड पर रख कर दबाया.

कोमल को जैसे hi ये पता चला तो उसने अपना हाथ हटाने की कोशिश की मगर मैंने उसे अपना हाथ हटाने नहीं दिया. बल्कि उसके होठो को मुँह से निकाल कर मैंने उसकी तरफ देखा. वो आँखे बंद किये गहरी गहरी साँसे लेने लगी थी.

"उसे भी प्यार करो न भाभी. उसी से तो सब कुछ है." मैंने धीरे से उसके कान में ये कहा तो कोमल ने आँखे खोल कर मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुराते हुए बोली.

"अच्छा जी मुझे तो पता hi नहीं था की उसी से सब कुछ है." कोमल ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"तो अब पता चल गया न.? तो चलो अब उसे भी प्यार दो." मैंने ये कहा तो कोमल ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा.

"उसे कैसे प्यार दू ये भी बताओ न." कोमल ने ये कहा तो मैंने कहा.

"वो तुम जानो की कैसे प्यार देना है." मैंने ये कहा तो कोमल मेरी तरफ देखती रही फिर बिना कुछ बोले नीचे घुटनो के बल बैठ गयी और अपने दोनों हाथो से मेरे पेंट के बेल्ट को खोलने लगी.

कुछ hi देर में उसने मेरा पेंट उतार दिया. पेंट के उतारते hi कच्चे में फुल तन कर खड़ा हुआ मेरा लुंड उसे दिखा तो उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा तो मैं मुस्कुरा पड़ा. फिर उसने कांपते हाथो से मेरे कच्चे के ऊपर से hi मेरे लुंड को छुआ और सहलाया उसे. उसके छूटे hi मेरे जिसम में झुरझुरी हुयी.

कुछ देर सहलाने के बाद कोमल ने कच्चे को धीरे धीरे करके उतार दिया. अब उसकी आँखों के सामने मेरा मोटा तगड़ा लुंड किसी सांप की तरह फुँकारते हुए खड़ा नज़र आया. मेरे लुंड को फटी आँखों से देखती रही कोमल.

"क्या हुआ पसंद नहीं आया क्या तुम्हे.?" मैंने धीरे से ये कहा तो कोमल को जैसे होश आया. उसने हड़बड़ा कर मेरी तरफ देखा फिर बोली.

"Ye...ye तो बहुत बड़ा है और मोटा भी. मैं हैरान हु की कल रात ये मेरे उसमे कैसे अंदर तक गया होगा.?" कोमल ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"इंसान का हथियार चाहे जितना भी बड़ा हो वो औरत की गहराई में समां hi जाता है. खेर छोडो ये baat...tum प्यार करना शुरू करो इसे." मैंने ये कहा तो कोमल ने कहा.

"तुम्हारा ये मोटा और लम्बा तो है hi मगर गोरा भी है. अरुण और रुपेश जी का तो कला है. मुझे तो उनके उसे देख कर hi घिन आती थी. मगर तुम्हारा तो सुन्दर दिख रहा है. अब देखो मैं कैसे इसे प्यार करती हु." कोमल ने ये कहा और झुक कर मेरे लुंड पर प्यार से चूमा. उसके चूमने से मुझे बहुत अच्छा फील हुआ.

कुछ देर लुंड पर इधर उधर चूमने के बाद कोमल उसे मुट्ठी में ले कर ऊपर नीचे करने लगी जिससे मेरे लुंड का सूपड़ा कभी ऊपर की चमड़ी से बाहर आ जाता तो कभी उस चमड़ी से धक् जाता. थोड़ी देर यही सब करने के बाद कोमल फिर से झुकी और इस बार उसने अपना पूरा मुँह खोल कर मेरे लुंड के सुपडे को अपने मुँह में भर लिया. मुँह की गर्मी का अहसास होते hi मेरे जिसम में करंट सा दौड़ गया और पुरे जिसम में एक मज़े की लहार दौड़ गयी.

कोमल बड़े आराम से मेरे लुंड के सुपाड़ी को मुँह में भरे उस पर अपनी जीभ फिर रही थी जिससे मैं पल भर में मज़े की दुनिया में पहुंच गया. मेरे दोनों हाथ अपने आप hi कोमल के सर पर आ गए और मैंने उसके सर को अपने लोड की तरफ धकेला. मेरे ऐसा करते hi कोमल ने अपने मुँह को और ज़्यादा खोला जिससे मेरा लुंड उसके मुँह में और अंदर जाने लगा. अभी आधा hi गया था की कोमल ने ज़ोर लगा कर खुद को रोका. मैं समझ गया की वो इससे ज़्यादा नहीं लेना चाहती है. मैंने भी ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया और उतने में hi कोमल के सर को पकडे अपनी कमर आगे पीछे करने लगा. जिससे ऐसा लगने लगा जैसे मैं कोमल के मुँह को छोड़ रहा हु.

थोड़ी देर बाद hi कोमल ने मेरे लुंड को मुँह से निकालने के लिए सर को ज़ोर दे कर पीछे किया जिससे मेरा लुंड उसके मुँह से बाहर आ गया. मुँह से लुंड निकलते hi कोमल तेज़ तेज़ साँसे लेने लगी. उसके थूक से मेरा लुंड गीला हो गया था.

"ये बहुत बड़ा है विक्की. मैं ज़्यादा नहीं कर सकती. मेरी साँसे चढ़ गयी इतने में hi." कोमल ने ये कहा तो मैंने कहा.

"कोई बात nahi...ab चलो अपने कपडे उतारो जिससे हम आगे का काम शुरू करे." मैंने ये कहा तो कोमल उठ कर कड़ी हो गयी और अपनी साड़ी निकलने लगी. थोड़ी hi देर में कोमल एकदम से नंगी हो गयी. इधर मैंने भी अपने कपडे उतार दिए थे.

मैंने महसूस किया की कोमल अब शर्मा नहीं रही थी. जैसे hi कोमल नंगी हुयी तो मैंने उसको बीएड पर ले जा कर लेता दिया और उसके ऊपर आ गया. कोमल की चूचियों को देख कर मेरा दिल मचलने लगा तो मैंने लपक कर उसकी एक चुकी को मुँह में भर कर ज़ोर ज़ोर से चूसने लगा जबकि दूसरी चुकी को मसलना शुरू कर दिया. मेरे ऐसा करते hi कोमल आहे भरने लगी. मज़े से उसकी आँखे बंद हो गयी. वो अपने दोनों हाथो से मेरे सर के बालो को खींचने लगी.

मैंने बरी बरी से कोमल की दोनों चूचियों को खूब चूमा छठा और चूसा. उसके बाद मैं नीचे उसके पेट और नाभि पर किश करने लगा. कोमल बुरी तरह सिसकारियां भर रही थी और उसका जिसम मछली की तरह मचल रहा था. नाभि पर किश करने के बाद जैसे hi मैं नीचे की तरफ आया तो मेरी नज़र कोमल की छूट की तरफ पड़ी तो मैं रुक गया. कोमल की छूट पर बाल थे जिससे छूट साफ़ नज़र नहीं आ रही थी. मैं समझ गया की कोमल शायद कभी अपनी छूट के बालो को साफ़ नहीं करती है. गांव में ज़्यादातर ऐसा hi था. मगर अब तो शहर की हवा गावो में भी बहने लगी थी और लड़किया अपने जइसन के प्राइवेट पार्ट्स के बाल साफ़ करने लगी हैं.

मैं कोमल के ऊपर से उठा और फिर उसकी दोनों टांगो को फैला कर मैं उसके बीच में आ गया. उसके बाद मैंने अपने लुंड को कोमल की छूट में सेट किया और लुंड के सुपाड़ी को छूट के अंदर डालने के बाद कोमल के ऊपर आ गया. ऊपर आ कर मैंने कोमल के मुँह में अपनी हथेली राखी और फिर ज़ोर का झटका दिया तो मेरा लुंड एक hi बार में पूरा अंदर तक सनसनाता हुआ चला गया. मगर मेरे इस झटके से कोमल तड़प कर रह गयी थी. मैंने उसके मुख पर हथेली का ढक्कन लगा दिया था. झटका देने के बाद मैं रुक गया था. इधर कोमल मुझे फटी आँखों से देखे जा रही थी. मैंने उसे मुस्कुरा कर देखा और फिर अपनी हथेली को हटा कर मैं उसके होठो को मुँह में भर लिया.

कोमल के होठो को चूसते हुए मैं एक हाथ से उसकी एक चुकी को भी मसलने लगा और इधर धक्के भी लगाने लगा. कुछ hi पालो में कोमल चुदाई का मज़ा लेने लगी. उसने अपने हाथो को मेरी पीठ पर कास लिया और नीचे से अपनी गांड भी उछालने लगी. मैं तेज़ तेज़ धक्के लगाए जा रहा था. कोमल की गरम गरम छूट एकदम से पानी छोड़ने लगी थी जिससे मेरा लुंड अब बड़े आराम से अंदर बाहर हो रहा था.

कुछ देर बाद मैंने कोमल को घोड़ी बनने को कहा तो वो बन गयी और मैं फिर से उसकी छूट में लुंड दाल कर उसकी चुदाई करने लगा. हम दोनों को अब किसी बात का होश नहीं था. मैं पूरी स्पीड से धक्के लगा रहा था. थोड़ी देर बाद मैंने कोमल को फिर से सीधा लेटाया और फिर से उसकी कुटाई शुरू कर दी. कोमल बुरी तरह सिसकिया ले रही थी. कमरे में अजीब सा माहौल बन गया था. थोड़ी hi देर में कोमल की आहे तेज़ तेज़ होने लगी और वो मुझे बताने लगी की वो झड़ने वाली है. मैंने और तेज़ धक्के लगाना शुरू कर दिया. कुछ hi देर में कोमल की कमर कमान की तरह तन गयी और फिर उसके जिसम को झटके लगने लगे. झड़ते वक्त उसके मुख से चीख निकलने वाली थी मगर मैंने जल्दी से उसके मुँह पर हाथ रख दिया था.

कोमल झड़ने के बाद शांत पद गयी थी. मैं अभी झाड़ा नहीं था. कोमल के झड़ने के बाद मैं रुक गया था. कुछ देर बाद जब मैंने देखा की कोमल की साँसे नार्मल होने लगी हैं तो मैंने फिर से धक्के लगाना शुरू कर दिया. कोमल का पानी निकलने से मेरा लुंड और भी ज़्यादा गीला हो गया था. ये देख कर मैंने कोमल की छूट से अपने लुंड को निकला और कोमल के पेटीकोट से उसे अच्छे से साफ़ किया. उसके बाद मैंने फिर से कोमल की छूट में लुंड दाल कर चुदाई शुरू कर दी.

मैं धक्के लगाने के साथ साथ कभी कोमल के होठो को चूमता चूसता तो कभी उसकी चूचियों को चूसने लगता. जोश में आ कर मैं उसकी चुकी पर काट भी लेता था जिससे उसकी गोरी गोरी चूचियों पर काटने का निशाँ भी पद जाता था. थोड़ी hi देर में कोमल फिर से रंग में आ गयी और वो भी नीचे से कमर उछाल उछाल कर ताल से ताल मिलाने लगी.

कमरे में थाप थाप की हलकी आवाज़ गूँज रही थी. कोमल जाने क्या क्या बोलती जा रही थी. कुछ hi देर में मुझे लगने की अब मैं झड़ने वाला हु तो मैंने धक्को की स्पीड बढ़ा दी. कोमल की साँसे और उसकी आवाज़ों से पता चल गया की वो भी झड़ने वाली है. मैंने अपने दोनों हाथो को कोमल के अगल बगल बीएड पर रखा और फिर पूरी ताकत से धक्के लगाने लगा. मेरी रंगो में दौड़ते खून में भयंकर उबाल शुरू हो गया. जैसे जैसे मैं झड़ने के करीब आ रहा था मेरी स्पीड और तेज़ होती जा रही थी. यही हाल कोमल का भी वो भी पुरे ज़ोर से अपनी गांड उछाल रही थी और तभी जैसे हम दोनों मज़े के आसमान में पहुंच गए और फिर हम दोनों के जिसम में झटके लगने लगे. मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी साडी जान मेरे लुंड के रास्ते निकलती जा रही थी.

कोमल की छूट में जड़ तक समाया हुआ मेरा लुंड वीर्य की पिचकारियां छोड़े जा रहा था और फिर थोड़ी hi देर में मैं बेजान सा कोमल के ऊपर गिर पड़ा. कोमल मुझसे पहले hi बेजान हो चुकी थी. कमरे में एकदम से सन्नाटा छ गया था जिसमे सिर्फ हम दोनों के तेज़ तेज़ सांस लेने की आवाज़ hi महसूस हो रही थी.

कुछ देर बाद जब हम दोनों में नयी जान आयी तो मैं कोनल के ऊपर से हैट कर उसके बगल से सीधा लेट गया. मेरे सीधा let'te hi कोमल ने मेरी तरफ करवट ली और फिर मेरे सीने में अपना सर रख कर और मेरी छाती पर अपने एक हाथ की ऊँगली को फेरते हुए कहा.

"तुम सच में असली मर्द हो विक्की. तुमने मुझे तृप्त कर दिया. मैं बता नहीं सकती की मैं अंदर से कितना खुश हो गयी हु. काश तुम हर वक्त मेरे पास होते तो मैं ऐसे hi हर वक्त खुश रहती." कोमल ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ये तो सिर्फ दो पल की ख़ुशी है मगर मैं तुम्हे वो ख़ुशी दे कर जाउगा जिससे तुम हमेशा के लिए खुश रह सको." मैंने ये कहा तो कोमल ने कहा.

"हाँ ये तो सच कहा तुमने. उससे बढ़ कर तो कोई ख़ुशी hi नहीं है मेरे लिए. मगर सोचती हु की क्या इतने से वैसी ख़ुशी मुझे मिल पायेगी.?" कोमल ने ये कहा तो मैंने कहा.

"कोशिश करना हमारा काम है बाकी भगवन की मर्ज़ी है." मैंने ये कहा तो कोमल कुछ न बोली. ऐसा लगा जैसे वो कुछ सोचने लगी थी. कुछ देर हम दोनों बाते करते रहे उसके बाद मैंने कोमल को एक बार और छोड़ा. दो बार की चुदाई में वो बुरी तरह पास्ट हो गयी थी. उसने खुद बताया की अब उसमे जान नहीं रह गयी है मगर वो उसे इससे असीम सुख का नुभव हो रहा है. उसके बाद मैं शाम में उसके घर फिर से आने का कह कर अपने घर आ गया.

घर आया तो सबसे पहले मैं बाथरूम गया. बाथरूम में मैंने अच्छे से साबुन लगा कर अपना हाथ मुँह धोया और फिर अपने कमरे में आ गया. कमरे में आये हुए मुझे अभी थोड़ी hi देर हुयी थी की तभी मेरे कमरे में प्रिय पूजा आ गयी. पूजा ने दरवाजे को अंदर से कुण्डी लगा कर बंद किया और फिर दोनों बीएड पर आ कर मेरे अगल बगल मुझसे चिपक कर लेट गयी.

"कहा से आ रहे हो भाई.? हम दो तीन बार तुम्हारे कमरे में आये मगर तुम्हारा तो पता hi नहीं था कही." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"क्या करू मेरी परियो दिन भर बीएड पर पड़े पड़े बोर हो जाता हु इस लिए मन बहलाने के लिए गांव की तरफ निकल गया था." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"गांव में ऐसा क्या है भाई जो मन बहलाने के लिए घूमने गए थे.?" प्रिय ने ये कहा तो पूजा बोल पड़ी.

"लगता है भाई को गांव में कोई ऐसी चीज़ मिल गयी है जो भाई के मन को बहुत अच्छे से बहला सकती है." पूजा ने ये कहा तो मैं मन hi मन हड़बड़ाया मगर फिर खुद को सम्हाल कर बोलै.

"तुम दोनों के मन में जाने क्या क्या चलता रहता है और जाने क्या क्या सोचती रहती हो तुम दोनों." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"भाई आज रचना दीदी और उनकी माँ दोनों साथ में हमारे घर आयी थी. माँ का कमरा तो बहुत देर तक बंद रहा. पता नहीं वो लोग अंदर क्या बाते कर रही थी. मगर जब वो लोग कमरे से बाहर निकली तो बड़ा है है के बाते कर रही थी. माँ और रचना दीदी दोनों hi खुश दिखाई दे रही थी." प्रिय ने ये कहा तो मैं सोच में पद गया. तभी पूजा ने कहा.

"रचना दीदी शायद इस लिए खुश दिखी की वो हमारे साथ hi अब जाएगी और इसी बात से माँ भी खुश थी मगर.." पूजा ने मगर कहने के बाद बात ख़त्म कर दी तो मैंने उसकी तरफ सवालिया नज़र से देखा तो उसने फिर कहा.

"मगर कुसुम दीदी का क्या.? उनके चेहरे पर तो कोई ख़ुशी hi नहीं दिखाई देती. भाई तुम कुछ करते क्यों नहीं.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं तो बहुत कुछ करना चाहता हु मगर उनकी वजह से hi कुछ नहीं कर पता. वो खुद hi खुश नहीं रहना चाहती तो कोई क्या कर सकता है.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"मुझे समझ में नहीं आता की वो क्या सोचती रहती हैं दिन रात.? हम भी तो तुम्हारी बहने हैं न भाई. हमारे दिलो में भी तो तुम्हारे लिए प्यार था मगर हमने तो अपने उस प्यार को तुम्हारे सामने उजागर कर दिया और तुमने भी तो उस प्यार को कबूल कर लिया. मगर दीदी इस मामले में अपने आपको सजा क्यों दे रही हैं भाई.? आखिर क्या वजह है की वो इस बारे में बात hi नहीं करना चाहती तुमसे.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मुझे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा यार. खेर chhodo...sab वक्त पर छोड़ दो. किसी न किसी दिन तो हालात बदलेंगे." मैंने ये कहा तो दोनों hi किसी सोच में गम होती दिखी मुझे.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 36


"मगर कुसुम दीदी का क्या.? उनके चेहरे पर तो कोई ख़ुशी hi नहीं दिखाई देती. भाई तुम कुछ करते क्यों नहीं.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं तो बहुत कुछ करना चाहता हु मगर उनकी वजह से hi कुछ नहीं कर पता. वो खुद hi खुश नहीं रहना चाहती तो कोई क्या कर सकता है.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"मुझे समझ में नहीं आता की वो क्या सोचती रहती हैं दिन रात.? हम भी तो तुम्हारी बहने हैं न भाई. हमारे दिलो में भी तो तुम्हारे लिए प्यार था मगर हमने तो अपने उस प्यार को तुम्हारे सामने उजागर कर दिया और तुमने भी तो उस प्यार को कबूल कर लिया. मगर दीदी इस मामले में अपने आपको सजा क्यों दे रही हैं भाई.? आखिर क्या वजह है की वो इस बारे में बात hi नहीं करना चाहती तुमसे.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मुझे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा यार. खेर chhodo...sab वक्त पर छोड़ दो. किसी न किसी दिन तो हालात बदलेंगे." मैंने ये कहा तो दोनों hi किसी सोच में गम होती दिखी मुझे.

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कुछ देर कमरे में सन्नाटा छाया रहा फिर मैंने अपने दिमाग को झटका और देखा की प्रिय पूजा भी किसी सोच में गम थी. ये देख कर मैंने उन दोनों को हिलाया तो दोनों सोच की दुनिया से वापस आयी और दोनों मेरी तरफ ध्यान से देखने लगी.

"क्या hua...tum दोनों मुझे इस तरह क्या देख रही हो.?" मैंने दोनों की तरफ बरी बरी से देखने के बाद ये कहा तो दोनों hi मुस्कुरा उठी फिर पूजा ने कहा.

"भाई wo...kya हम किश कर सकते हैं.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा फिर मुस्कुरा कर बोलै.

"क्यों किश करने का बहुत मन कर रहा है क्या तुम दोनों का.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मन तो कर hi रहा है bhai...aur वैसे भी हम अब खुद किश करके देखना चाहते हैं की हम दोनों को किश करना आने लगा है की नहीं.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ओह्ह तो ये बात है." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"हाँ bhai...tumne तो सीखा दिया मगर अब हम खुद करेंगे और फिर पता करेंगे की हमें किश करना आने लगा है या नहीं." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक hai...jaisi तुम दोनों की मर्ज़ी." मैंने ये कहा तो दोनों मुझसे अलग हुयी और फिर उठ कर बैठ गयी. उन दोनों के बैठते hi मैं भी उठ कर बैठ गया. मैं जैसे hi बैठा तो पूजा ने प्रिय से कहा.

"चल प्रिय पहले तू भाई को किश kar...tere बाद मैं करुँगी." पूजा ने ये कहा तो प्रिय ने मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिलाया और फिर मेरी तरफ देखा. हम दोनों की नज़रे मिली तो हम दोनों hi मुस्कुरा उठे.

"ये सब करने से पहले मैं एक बात कहना चाहता हु तुम दोनों से." मैंने ये कहा तो दोनों ने एक साथ कहा हाँ कहो न भाई तो मैंने कहा.

"तुम दोनों को अब इतना तो पता चल hi गया है की जब लड़का और लड़की एक दूसरे के होठो को चूमते हैं या एक दूसरे के होठो को लोल्लयपोप की तरफ चूसने लगते हैं तो उस वक्त दोनों को hi किसी बात का होश नहीं रह जाता. क्यों की वो दोनों मज़े की दुनिया में खो जाते हैं. उस हालत में हमारे हाथ एक दूसरे के किसी भी हिस्से पर जा कर कुछ भी करने लग जाते हैं. इस लिए मैं तुम दोनों से ये कह रहा हु की अगर वैसी हालत में तुम्हारा या मेरा हाथ हमारे जिसम के किसी हिस्से पर चला जायेगा तो उसमे किसी को कोई प्रॉब्लम तो नहीं होगी न.?" मैंने ये सब कहते हुए दोनों की तरफ देखा तो प्रिय पूजा दोनों ने न में सर हिला दिया. मतलब उन दोनों को इस बात से कोई प्रॉब्लम नहीं थी. मैं समझ गया दोनों हर तरह से तैयार हैं. जब दोनों की सहमति मिल गयी तो मैंने प्रिय से कहा की अब वो शुरू करे किश करना.

मेरे कहने पर प्रिय के चेहरे पर शर्म की लाली उभर आयी. वो झिझक रही थी शायद मगर किश करने का मन तो दोनों का hi कर रहा था. खेर प्रिय मुस्कुराते हुए खिसक कर मेरे एकदम पास आ गयी. मैं उसे hi देख रहा था और सोच रहा था की ये दोनों आज कैसे किश करेगी और फिर उसका असर क्या होगा.? मेरे दिल की धड़कन एकदम से बढ़ गयी थी.

प्रिय ने हिम्मत करके अपने दोनों हाथ उठाये और फिर मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में ले लिया. कुछ देर तक वो मुझे देखती रही फिर उसकी नज़र मेरे होठो पर पड़ी. उसने एक बार फिर से मेरी तरफ शर्म से मुस्कुराते हुए देखा. उसके बाद वो मेरे होठो की तरफ झुकने लगी. उसके होठ थरथरा रहे थे और उसकी साँसे भी बढ़ गयी थी. जैसे hi उसके होठ मेरे होठो के पास आये तो उसने अपनी आँखे बंद कर ली और तभी उसके होठ मेरे होठो से छू गए. हम दोनों के जिसम में झुरझुरी सी हुयी.

मेरे होठो पर जैसे hi प्रिय के होठ छुए तो उसने धीरे से मेरे होठो पर चूमा और ऐसा उसने कई बार किया. मैं महसूस कर रहा था की उसका पूरा जिसम हल्का हल्का कांप रहा था. धीरे धीरे चूमने के बाद प्रिय ने अपना मुँह हल्का सा खोला और फिर उसने मेरे निचले होठ को अपने होठो के बीच दबा लिया. मैं समझ गया की ये वैसा hi कर रही है जैसा कल मैंने किया था सिखाते वक्त. मतलब दोनों ने हर बात को अच्छे से ध्यान में रखा हुआ था की कब क्या और कैसे करना है.

अपने होठो के बीच मेरे निचले होठ को दबा कर प्रिय हलके हलके उसे चूमने चाटने लगी. मगर बार बार उसके होठो के बीच से मेरा निचला होठ निकल जाता था और वो फिर से उसे अपने होठो के बीच दबाने की कोशिश करती. मैं खुद कुछ नहीं कर रहा था क्यों की मैं देखना चाहता था की उसने कितना सीखा था और उसको कितना अच्छे से आता था.

कुछ देर इसी तरह प्रिय मेरे होठ को अपने होठो के बीच दबा कर चूमती chaaht'ti रही. फिर उसने एकदम से मेरे होठ को अपने मुँह में भर लिया. शायद उसे याद आ गया था की मैंने उसके होठो को मुँह में भर कर चूस रहा था. प्रिय ने ठीक वैसा hi किया था. अब वो मेरे निचले होठो को मुँह में खींच खींच कर चुभला भी रही थी और उसे चूस भी रही थी. उसकी साँसे काफी तेज़ तेज़ चलने लगी थी. जिसकी वजह से कमरे में अजीब सी आवाज़ गूंजने लगी थी.

जब मैंने महसूस किया की प्रिय अब अच्छे से कर रही है और वो इस सब में डूब चुकी है तो मैंने उसे अपनी बाहो में भर लिया और फिर मैं भी पुरे ज़ोर से उसके होठो को चूमने चूसने लगा. मैं उसकी पीठ पर अपने हाथ तेज़ी से फेर रहा रहा था. प्रिय अब एकदम से पागल टाइप की हरकते करने लगी थी. वो मेरी बाहो में मचलने लगी थी और मेरे होठो को खुद hi अपने होठो में भर कर ज़ोर ज़ोर से चूसने लगती थी. जैसे उसे मेरे होठो का स्वाद बहुत hi मीठा लग रहा था. शायद उसे बहुत ज़्यादा मज़ा आ रहा था इस सबसे.

मुझ पर भी अब प्रिय के होठो का नशा चढ़ गया था. हम दोनों को अब पास में hi बैठी पूजा का कोई ख़याल नहीं रह गया था. मगर मैं इतना समझ सकता था की पूजा आँखे फाड़े हमें देख रही होगी. मैं प्रिय की पीठ के हर हिस्से पर अपने हाथ फेरे जा रहा था. मुझे लग रहा था की मैं अब क्या कर दालु.? मेरा लुंड कच्चे के अंदर बुरी तरह अकड़ गया था और सीधा खड़ा नहीं हो प् रहा था क्यों की वो कच्चे के अंदर पहले से hi मुदा हुआ था.

हम दोनों की साँसे बुरी तरह चलने लगी थी. एक दूसरे का थूक अब हमारे मुँह के आस पास फ़ैल गया था. नथुनों से निकलती गरम गरम साँसे जैसे हमारे अंदर की आग को बुरी तरह भड़का रही थी. मैंने अपने एक हाथ को प्रिय की पीठ से हटाया और एक झटके से प्रिय के राइट दूध पर रख दिया और फिर उसे पकड़ कर थोड़ा ज़ोर ज़ोर से मसलने लगा. मेरे ऐसा करते hi प्रिय के जिसम को झटका लगा और उसने एकदम से अपनी हरकतों को करना बंद कर दिया. मगर ये सिर्फ कुछ hi पालो के लिए हुआ था. उसके बाद वो फिर से पहले की तरह मेरे होठो को चूमने चूसने लगी थी. उसने अपनी छाती से मेरे हाथ को हटाने की कोई कोशिश नहीं की थी.

मैं प्रिय की चुकी को बहुत तेज़ तो नहीं मगर ज़ोर ज़ोर से ज़रूर दबाये जा रहा था. कुछ देर उसकी चुकी को दबाने के बाद मैंने उसकी चुकी से हाथ हटा कर फिर से उस हाथ को प्रिय की पीठ पर रख लिया और फिर अपने लेफ्ट हैंड को ला कर उसकी लेफ्ट चुकी पर रख लिया और उसे ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा. मैं बता नहीं सकता की इस सब में मुझे कितना मज़ा आ रहा था. तभी मैंने महसूस किया की प्रिय अब पहले से ज़्यादा तेज़ हरकते करने लगी hai....wo बड़ी तेज़ी से और पुरे जोश के साथ मेरे होठो को चूमने चूसने लगी थी. उसने अपने एक हाथ को मेरे उस हाथ पर रखा जो उसकी चुकी को दबा रहा था. मेरे हाथ के ऊपर से अपना हाथ रख कर वो ज़ोर ज़ोर से अपनी चुकी की तरफ दबाने लगी थी. मैं मन hi मन हैरान था और फिर तभी प्रिय के जिसम को तेज़ तेज़ झटके लगने लगे. उसने एकदम से अपनी बाहो को मेरी पीठ पर रखा और मुझे ज़ोर से कास लिया. मैं साफ़ महसूस कर रहा था की उसके जिसम को झटके लग रहे हैं और उसके मुँह से ज़ोर ज़ोर से सिसकिया निकल रही थी. थोड़ी hi देर में प्रिय एकदम से निढाल सी हो कर मेरे कंधे में अपने आपको ढीला छोड़ दिया. मुझे एकदम से ख़याल आया की ऐसा तो तभी होता है जब लड़की या औरत चरम सुख को प्राप्त कर चुकी होती है. इसका मतलब प्रिय झाड़ गयी थी. शायद ये उसकी लाइफ का पहला िस्खलन था. ये दिमाग में आते hi मैं हैरान भी हुआ और फिर मुस्क्यरैया भी.

थोड़ी देर बाद जब प्रिय में नयी जान आयी तो वो एकदम से मुझसे अलग हो गयी. उसकी आखे जैसे hi मेरी आँखों से मिली तो वो बुरी तरह शर्मा गयी और फिर मुस्कुराते हुए पीछे hat'ti चली गयी. पूजा के पास पहुंचते hi उसने बीएड पर पड़े एक चद्दर को जल्दी से पकड़ा और उसे खींच कर अपने ऊपर दाल कर बीएड पर दूसरी तरफ को करवट ले कर लेट गयी. मैं समझ गया की वो इस सबसे इतना शर्मा गयी है की अब वो मुझसे नज़र नहीं मिला प् रही थी. इधर उसकी इस हरकत से पूजा आँखे फाड़े उसे hi देखे जा रही थी.

"भाई इसे क्या हुआ.?" पूजा ने मेरी तरफ देखते हुए ये पूछा तो मैंने कहा.

"कुछ nahi...bas उसे शर्म आ रही है. खेर उसे छोडो. चलो अब तुम्हारी बारी है." मैंने ये कहा तो पूजा के चेहरे पर शर्म की लाली उभरती दिखी. वो मुस्कुराते हुए मेरे पास आयी खिसक कर.

"भाई ये तुम प्रिय के साथ और क्या कर रहे थे.?" मेरे पास आते hi पूजा ने धीरे से ये कहा तो मैंने कहा.

"तुमने देखा क्या सब कुछ.?" मैंने ये पूछा तो पूजा ने हाँ में सर हिलाया और फिर नज़रे झुका ली.

"इस बारे में तो मैंने पहले hi तुम दोनों को बता दिया था. उस हालत में फिर कुछ होश hi नहीं रहता." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"तो क्या वही सब मेरे साथ भी करोगे भाई.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"तुम मेरे हाथो को पकडे रखना. अगर पकडे रहोगी तो कुछ नहीं कर पाउगा वर्ण तो कोई भरोसा नहीं है. मुझे खुद hi पता नहीं चलता की कब मेरे हाथ सही जगह पर पहुंच जाते हैं." मैंने ये कहा तो पूजा ने शरमाते हुए कहा.

"Bhai...wo मैं छुप के देख रही थी की तुम प्रिय की छाती को कितना ज़ोर से मसल रहे थे. मगर भाई मेरी इनको इतना ज़ोर से मत मसलना वर्ण मुझे बहुत दर्द होगा." पूजा ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा फिर मुस्कुराते हुए कहा.

"दर्द को प्रिय को भी हुआ होगा मगर उसने तो मुझे एक बार भी वैसा करने से नहीं रोका था. इसका मतलब उसको मज़ा hi आ रहा था." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"पता नहीं भाई." पूजा ने ये कहा तो मैंने उसे पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया और फिर उसके चेहरे को प्यार से अपने एक हाथ से सहलाते हुए कहा.

"तो चलो पता कर लो तुम भी." मैंने ये कहा और फिर झुक कर उसके होठो पर अपने होठ रख दिए. मेरे इस तरह खींच लेने पर पहले तो पूजा घबरा hi गयी थी मगर फिर नार्मल हो गयी. मैंने पूजा के गुलाब जैसे होठो को तीन चार बार अच्छे से चूमा फिर उससे धीरे से बोलै.

"तुम्हारे ये होठ बहुत सुन्दर हैं और बहुत मीठे भी." मैंने ये कहा तो पूजा शर्मा गयी फिर मुस्कुराते हुए धीरे से hi बोली.

"क्या प्रिय से भी ज़्यादा सुन्दर और मीठे हैं.?" पूजा ने ये पूछा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"तुम दोनों के होठ एक जैसे hi हैं. जैसे तुम दोनों एक जैसी hi दिखती हो. बाहर का कोई इंसान इतना जल्दी तुम दोनों में फर्क नहीं बता सकता." मैंने ये कहा तो पूजा ने कुछ सोचते हुए कहा.

"अच्छा भाई... क्या हमारे होठ रचना दीदी के होठो से भी ज़्यादा सुन्दर और मीठे हैं.?" पूजा ने ये कहा तो मैं पहले तो उसे देखता रहा फिर मुस्कुराते हुए बोलै.

"हाँ bilkul...tum दोनों के होठ रचना से भी ज़्यादा सुन्दर और मीठे हैं. दिल करता है हर वक्त इन्हे चूसता राहु." मैंने ये कहा तो पूजा ने मुस्कुरा कर कहा.

"तो तुम्हे रोका किसने है bhai...jab दिल करे तभी चूस लिया करो न." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा चलो ठीक है. मगर किसी वक्त अगर कुछ और भी चूसने का दिल किया तो..?" मैंने ये कहा तो पूजा सोचने लगी की मैं किस बारे में ऐसा बोल रहा हु. फिर जब उसे समझ न आया तो उसने पूछा.

"और क्या चूसने का दिल करेगा भाई.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने अपना एक हाथ झट से पूजा की एक चुकी पर रखा और फिर उसे हलके से दबा कर बोलै.

"इसे चूसने की बात कर रहा हु." मैंने ये कहा तो पूजा एकदम से मचल गयी. फिर शरमाते हुए बोली.

"ये क्या कर रहे हो bhai...mujhe शर्म आती है." पूजा ने ये कहा और अपनी चुकी पर रखे हुए मेरे हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया. उसने मेरे हाथ को हटाया नहीं.

"तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया.?" मैंने फिर से उसकी चुकी को दबा कर ये कहा तो पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"पहले तो बड़ा शरीफ बन रहे थे तुम और अब ये सब खुद hi कर रहे हो भाई." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"पहले में और अब में फर्क भी तो हो गया है. पहले मैं सिर्फ एक भाई था जबकि अब तुम दोनों ने उस भाई के रिश्ते को बदल कर बाद वाला कर दिया है. इस लिए अब जो सबसे पहले है वही तो कर रहा हु." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"अच्छा ji....to फिर अब से हम तुम्हे भाई नहीं कहा करेंगे बल्कि तुम्हे तुम्हारे नाम से पुकारेंगे. ठीक रहेगा न.? हाय कितना अच्छा लगेगा न जब हम दोनों तुम्हे नाम से पुकारेंगे." पूजा ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"मुझे इससे कोई प्रॉब्लम नहीं है मगर माँ के सामने अगर तुम दोनों ने मेरा नाम ले कर मुझे पुकारा तो समझो तुम दोनों की खैर नहीं. माँ तुम दोनों की अच्छे से पिटाई करेगी." मैंने ये कहा तो पूजा ने हस्ते हुए कहा.

"हम बेवकूफ थोड़े हैं भाई जो माँ के सामने तुम्हे नाम से पुकारेंगे. ऐसा तो तब करेंगे न जब हम अकेले होंगे." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो ठीक है. अब ये बताओ की अगर किसी वक्त मेरा दिल तुम्हारे इनको चूसने का किया तो क्या करोगी तुम.?" मैंने एक बार फिर से पूजा की चुकी को दबाते हुए ये कहा तो पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मैं तुम्हे किसी चीज़ के लिए मन कैसे कर सकती हु विक्की.? हम दोनों ने तो पहले hi ये सोच लिया था की हमारे जिसम पर सबसे पहला हक़ हमारे प्यार का होगा उसके बाद hi हमारे पतियों का होगा." पूजा ने ये कहा तो मैं हैरान रह गया. मतलब इन दोनों ने सब कुछ पहले से hi सोचा हुवा था. मुझे हैरान होते देख पूजा धीरे से हसी और फिर बोली.

"हाय तुम्हारा नाम पहली बार लिया मैंने तो सच में मुझे बहुत अच्छा लग रहा है." पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"क्या प्यार में ये सब ज़रूरी है.? मेरा मतलब जैसा की तुमने कहा की तुम दोनों ने सोच लिया है की तुम दोनों के जिसम पर पहला हक़ तुम्हारे प्यार का यानी की मेरा होगा तो क्या ये सही है.?" मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"क्या सही है क्या galat..isse हमें कोई मतलब नहीं है भाई. हम तो वही कर रहे हैं जो हमारा दिल कह रहा है. खेर छोडो ये सब बाते और अब मैं भी प्रिय की तरह तुम्हारे होठो को चूमती हु. देखु तो सही की ऐसा क्या हुआ है ऐसा करके जिसकी वजह से प्रिय चद्दर तान कर लेट गयी है.?" पूजा ने ये कहा तो मैं मुस्कुरा कर रह गया.

पूजा मेरी बाहो में hi थी. उसने अपने सर को घुमा कर एक बार प्रिय की तरफ देखा फिर पलट कर वो मेरी तरफ देखने लगी. उसका चेहरा ताज़े फूल की तरह खिला हुआ था. मैं उसे hi देख रहा था और सोच रहा था की दोनों ने क्या क्या सोच रखा था पहले से.

अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी मेरे होठो पर पूजा ने अपने होठ रख दिए. उसके कोमल कोमल होठ मेरे होठो को चूमने लगे थे. प्रिय की तरह hi पूजा भी ये सब कर रही थी. कुछ देर बाद उसने भी मेरे होठो को अपने मुँह में भर लिया और ज़ोर ज़ोर से चूसना शुरू कर दिया. उसकी साँसे तेज़ तेज़ चलने लगी थी. मेरा लुंड जो बैठ गया था वो फिर से एकदम अकड़ गया था. मेरे जिसम में गर्मी बढ़ने लगी तो मैंने भी पूजा को कास लिया और उसके होठो को चूमने चाहतने लगा. मेरे हाथ उसकी पीठ पर फिसल रहे थे.

पूजा का जिसम बहुत hi सॉफ्ट महसूस हो रहा था मुझे. मैंने उसके होठो को थोड़ी देर चूसा उसके बाद मैं उसके होठो को छोड़ कर उसके गालो को चूमते हुए उसकी सुराहीदार गर्दन पर आ गया. पूजा की गर्दन के हर हिस्से को चूमते हुए मैं उसके गले के नीचे चूमने चाटने लगा. पूजा मेरे सर के बालो में अपने हाथो की उंगलिया फसा राखी थी. उसकी साँसे तेज़ हो गयी थी और अब उसके मुख से सिसकिया निकल रही थी.

पूजा ने जो कुरता पहन रखा था उसका गाला ज़्यादा छोटा तो नहीं था मगर ज़्यादा बड़ा भी नहीं था. मैंने अपने एक हाथ से उसके कुर्ते को गले से पकड़ कर नीचे किया तो मेरी आँखों के सामने पूजा की छतियो की दरार साफ़ दिखने लगी. ये देखते hi मैंने उसकी छातियों की दरार पर अपने होठ रख दिए और फिर उसकी दरार पर चूमने चाटने लगा. मैंने कुर्ते को ज़ोर दे कर थोड़ा और नीचे किया तो पूजा की सफ़ेद रंग की समीज दिखी मुझे. मैंने कुर्ते के साथ उसे भी नीचे किया तो पूजा की दूध जैसी गोरी राइट चुकी का आधा हिस्सा दिखने लगा. उफ्फ्फ्फ़ एक भी दाग नहीं था उसमे. मैंने एकदम से उस बेदाग़ चुकी के हिस्से को मुँह में भर लिया. मेरे ऐसा करते hi पूजा बुरी तरह मचलने लगी और उसके मुख से निकलती सिसकिया और तेज़ हो गयी. वो अपने हाथो से मेरे सर को और तेज़ी से अपनी उस चुकी पर दबाने लगी.

मुझे पूजा की उस चुकी का स्वाद भी बहुत मीठा लगा. मैंने ज़ोर दे कर कुर्ते के साथ उसकी समीज को नीचे किया हुआ था मगर इससे ज़्यादा नीचे नहीं हो सकता था. चुकी का आधा हिस्सा hi बाहर दिख रहा था. उस हिस्से के थोड़ा hi नीचे उसका निप्पल था. मेरा बहुत दिल कर रहा था उसके निप्पल को देखने का और उसे मुँह में भर कर चूसने का. मगर कुरता नीचे नहीं हो सकता था.

मैं पुरे जोश से चुकी के उस हिस्से को चूम चाट रहा था. पूजा की हालत बिन पानी के मछली जैसी हो गयी थी. वो मज़े में डूबी हुयी तेज़ तेज़ साँसे ले रही थी और मेरे सर के बालो को खींचे जा रही थी. मैंने चुकी के उस हिस्से को डाट में फसा कर हलके से काटा तो पूजा ज़ोर से सिसकी. चुकी को काटने के बाद मैं हटा और फिर ऊपर आ कर पूजा के होठो को बुरी तरह से चूमने चूसने लगा. इधर अपने एक हाथ से मैंने पूजा की दूसरी चुकी को पकड़ कर मसलना शुरू कर दिया था. दोनों बहनो का साइज एक hi था.

मैं एकदम से पागल सा हो गया था. मेरा दिल कर रहा था की पूजा के कपडे फाड़ दालु और अपने भी. उसके बाद एक झटके से उसकी छूट में अपना बुरी तरफ तन्नाया हुआ लुंड जड़ तक दाल दू. मगर ऐसा करना मुमकिन नहीं था अभी. तभी मैंने महसूस किया की पूजा मुझे पागलो की तरह चूमने चाटने लगी है और फिर थोड़ी hi देर में उसके जिसम में झटके लगने शुरू हो गए. वो कास के मुझसे लिपट गयी थी. झटके जब बंद हुए तो पूजा मेरी बाहो में एकदम बेजान सी हो कर झूल गयी. मैं समझ गया की प्रिय की तरह ये भी झाड़ गयी है. दोनों बहने आज पहली बार झड़ी थी शायद.

दोनों बहने तो झाड़ कर शांत पद गयी थी मगर मेरा बुरा हाल कर दिया था दोनों ने. दो दो बार मेरे लुंड के साथ अन्याय हुआ था मगर इसके लिए मैं उन दोनों से क्या शिकायत करता. कुछ देर बाद पूजा मुझसे अलग हुयी और प्रिय की तरह उसकी भी कंडीशन हो गयी. वो मुझसे नज़रे नहीं मिला प् रही थी. बुरी तरह शर्मा रही थी वो. मैंने उससे कुछ नहीं कहा. वो मुझसे अलग हो कर प्रिय के साथ hi चद्दर में घुस गयी.

मैं कुछ देर अपने आपको शांत करता रहा उसके बाद मैंने मोबाइल पर टाइम देखा तो शाम के 6 बज रहे थे. टाइम का पता चलते hi मुझे कोमल का ख़याल आया. मुझे अभी कोमल के घर जाना था. कोमल का ख़याल आते hi मैं खुश हो गया. अब लुंड की तड़प कोमल से hi शांत होगी. अभी मैं ये सोच कर मुस्कुरा hi रहा था की तभी मेरे कमरे का दरवाजा किसी ने बाहर से खटखटाया.

दरवाजा खटखटाने की आवाज़ सुन कर मैं बीएड से नीचे उतरा और सबसे पहले अपने हुलिए को ठीक किया. दोनों बहनो ने मेरे सर के बालो को ऐसा बना दिया था की अगर कोई दूसरा देखे तो मुझे पागल hi समझे. मैं जल्दी से शीशे के सामने आया और कंघी से अपने बाल सही करने लगा. तभी बाहर से जो आवाज़ मुझे सुनाई पड़ी उसे सुन कर मैं उछाल पड़ा.

कमरे के बाहर कुसुम दीदी थी और वो प्रिय पूजा को नाम ले कर बुला रही थी. मैं समझ गया की उन्होंने इन दोनों को पहले इनके कमरे में देखा होगा और जब ये दोनों वह न मिली होंगी तो हर जगह ढूँढा होगा उसके बाद यहाँ भी ढूंढते हुए आ गयी थी.

इधर कुसुम दीदी की आवाज़ सुन कर प्रिय पूजा भी उछाल पड़ी थी और उठ कर बीएड पर बैठ गयी थी. दोनों के चेहरों पर घबराहट के भाव थे. तभी दीदी ने फिर से पूजा का नाम ले कर उसे पुकारा तो पूजा जल्दी से बीएड से नीचे उत्तरी और दौड़ते हुए दरवाजे के पास पहुंची. हुलिया तो इन दोनों बहनो का भी बिगड़ा हुआ था. मगर मुझसे काम hi था. दरवाजे के पास पहुंच कर पूजा जल्दी जल्दी अपने हुलिए को ठीक करने लगी.

इधर मेरे दिमाग में पता नहीं कहा से एक बात आयी की मैं जल्दी से आलमारी की तरफ गया और उसे खोल कर उसमे से लैपटॉप निकाल कर बीएड के पास hi रखे एक टेबल पर ला कर रख दिया और एक छोटे से स्टूल को टेबल के पास खिसका कर उसमे बैठ गया. बैठने के बाद मैंने लैपटॉप को ों कर दिया. ये वही लैपटॉप था जो मैं पांच साल पहले शहर से खरीद कर लाया था.

तभी पूजा ने दरवाजा खोला तो बाहर कुसुम दीदी कड़ी दिखी. उनके चेहरे पर गुस्सा साफ़ दिख रहा था. जैसे hi दरवाजा खुला और दीदी की नज़र पूजा पर पड़ी तो वो गुस्से से बोली.

"कितनी देर से चिल्ला रही हु मैं और तुमने अभी दरवाजा खोला. क्या कर रही थी अंदर.?" कुसुम दीदी ने गुस्से से चिल्लाते हुए ये कहा तो पूजा बुरी तरह दर गयी. उसने घबरा कर पीछे की तरफ देखा.

बीएड पर प्रिय बैठी थी और मैं बीएड के पास स्टूल पर बैठा था. मेरे सामने टेबल पर लैपटॉप रखा था. मैं कनखियों से दरवाजे की तरफ देखने की कोशिश कर रहा था. उधर जब पूजा ने कोई जवाब न दिया तो कुसुम दीदी का गुस्सा और बढ़ गया और वो चिल्लाते हुए फिर बोली.

"उधर क्या देख रही है.? जवाब दे क्या कर रही थी अंदर.?" कुसुम दीदी ने जब ये कहा तो पूजा ने घबराते हुए कहा.

"वो मैं और प्रिय सो रहे थे. इस लिए आपकी आवाज़ कानो में नहीं पड़ी थी. और फिर जब पड़ी तो दरवाजा खोलने आयी मैं." पूजा ने ये कहा तो दीदी ने गुस्से से कहा.

"तुम दोनों यहाँ क्यों सो रही थी.? अपने कमरे में क्यों नहीं सोई तुम दोनों.?" दीदी ने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"वो हम भाई के कमरे में उनके मोबाइल पर गेम खेल रहे थे और फिर हमें नींद आने लगी तो हम यही पर सो गए." पूजा ने धीमी आवाज़ में ये कहा तो दीदी ने कहा.

"गेम गेम game....tum दोनों अब बच्ची नहीं हो जो गेम खेलोगी. अब बड़ी हो गयी ho....kuch अपनी जिम्मेदारियों का भी ख़याल करना सीखो. अब चलो यहाँ से." कुसुम दीदी ने ये कहा तो पूजा कमरे से बाहर निकल गयी. उसके जाने के बाद दीदी ने बाहर से hi प्रिय को देखते हुए कहा अब तुझे क्या अलग से कहना पड़ेगा.?

दीदी के ऐसा कहने पद प्रिय जल्दी से बीएड से नीचे उत्तरी और फिर कमरे से बाहर की तरफ जाने लगी. तभी दीदी ने उन दोनों से kaha....Ab दुबारा ये सब न कहना पड़े मुझे वर्ण सोच लेना की क्या हाल करुँगी तुम दोनों का.

प्रिय के बाहर निकलते hi कुसुम दीदी दोनों को ले कर चली गयी वह से. इधर मैं सोच रहा था की दीदी के अंदर इतना गुस्सा किस बात का था.? वो दरवाजे के पास hi कड़ी थी और अंदर मुझे स्टूल पर बैठे साफ़ देख सकती थी. मैंने कनखियों से देखा था की उन्होंने कई बार मेरी तरफ भी देखा था और मैं चाहता भी था की वो मुझे देखे और यही समझे की मैं लैपटॉप पर कोई काम कर रहा था.

उन लोगो के जाने के बाद मैंने लैपटॉप को फिर से शट डाउन किया और आलमारी में रख दिया. कुछ देर कमरे में hi रहने के बाद मैं नीचे बाथरूम में हाथ मुँह धोने के लिए चला गया. हाथ मुँह धो कर मैं वापस कमरे में आया और अपने ये वाले कपडे उतार कर दूसरे कपडे पहने. शीशे के सामने आ कर मैंने अपने आपको थोड़ा बहुत टिप टॉप किया उसके बाद कमरे से बाहर आ गया.

नीचे आया तो माँ ने कहा की बीटा चाय बन गयी है तो पी ले. मुझे भी चाय पीना का मन था इस लिए मैं वही हाल में राखी कुर्सी पर बैठ गया. माँ भी वही पर बैठी थी और किसी कपडे को सुई धागे से सील रही थी. थोड़ी hi देर में प्रिय हाथ में ट्रे ले कर आयी और सबसे पहले उसने माँ को चाय दी उसके बाद मुझे. हम दोनों की जैसे hi नज़रे मिली तो प्रिय हलके से शर्मायी और फिर मुस्कुराते हुए चली गयी.

उसके जाने के बाद माँ ने चाय का एक घुट पिने के बाद मुझसे कहा की बीटा रचना की माँ ने रचना को हमारे साथ जाने की इजाज़त दे दी है. मैंने उनसे साफ़ कह दिया है की उनकी बेटी अब मेरी बहु है. यहाँ रह कर तो शादी नहीं हो पायेगी मगर शहर जा कर हम दोनों की शादी जल्द hi करेंगे. खेर अब तो सब ठीक hi है इस लिए अब यहाँ से चलने की जल्द hi तयारी करो तुम.

माँ ने ये सब कहा तो मैंने कहा ठीक है माँ मैं कल शहर जाउगा किसी वाहन का इंतजाम करने. आप यहाँ पर जो बहुत hi ज़्यादा ज़रूरी सामान हो उसे hi बस पैक कर लीजियेगा. मेरी इस बात से माँ ने कहा की ठीक है बीटा हम यहाँ से अपने कुछ कपडे और गहने जेवर पैक कर लेंगे.

माँ ने इसके बाद और कुछ नहीं कहा. मैं सोच रहा था की वो कुछ और भी बाते करेगी किसी बारे में मगर उन्होंने कुछ नहीं कहा. खेर चाय पिने के बाद मैंने माँ से कहा की थोड़ा गांव की तरफ जा रहा हु घूमने तो माँ ने इजाज़त दे दी. माँ से इजाज़त मिलते hi मैं कुर्सी से उठा और घर से बाहर की तरफ चल दिया.

इस वक्त 6:47 बजे का टाइम था. हर तरफ अँधेरा फ़ैल गया था. लोगो के घरो में लाइट जलने लगी थी. घर से बाहर आ कर मैं कोमल के घर की तरफ चल दिया. मैं आस पास का जायजा भी ले रहा था. मैं नहीं चाहता था की कोई भी आदमी या आदमी का बच्चा मुझे कोमल के घर के अंदर जाते हुए देख ले. अभी मैं सड़क पर चल hi रहा था की सामने से आती हुयी किसी जीप की हेडलाइट की रौशनी नज़र आयी मुझे तो मैं जल्दी से सड़क के किनारे एक घर को बॉउंड्री के पीछे छिप गया.

कुछ hi देर में सामने से जीप आयी. ये जीप रुपेश की थी और इस वक्त वही चला भी रहा था. उसके साथ जीप में एक आदमी और बैठा हुआ था. जीप के चले जाने के बाद मैं बॉउंड्री के पीछे से निकला और कोमल के घर की तरफ चल दिया. गांव में लाइट तो थी मगर बल्ब ज़्यादा तेज़ नहीं जलते थे. सड़क पर तो अँधेरा hi रहता था. लोग घर के अंदर hi लाइट का बल्ब लगा कर रखते थे.

कुछ hi देर में मैं कोमल के घर के पास पहुंच गया. मैंने आस पास अँधेरे में आँखे फाड़ फाड़ कर अच्छे से देखा और जब कोई न नज़र आया तो मैं कोमल के घर के दरवाजे के पास चलता हुआ आ पहुंच गया. मैंने जल्दी से दरवाजे की कुण्डी को बजाय तो थोड़ी hi देर में दरवाजा खुला. दरवाजा कोमल ने hi खोला था और मुझे देखते hi वो एक तरफ को हटी तो मैं जल्दी से अंदर आ गया. अंदर अँधेरा दिखा तो मैंने धीरे से कोमल से पूछा की अँधेरा क्यों है यहाँ तो उसने बताया की उसने जान बुझ कर अँधेरा किया है. ऐसा इस लिए क्यों की अगर यहाँ उजाला होता और बाहर से जब कोई आदमी इस उजाले में आता तो बाहर के किसी भी आदमी की नज़र मुझ पर पद जाती और वो मुझे पहचान लेता.

मैं कोमल की इस चतुराई को देख कर मुस्कुराया और फिर जब उसने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया तो हम दोनों अंदर की तरफ आ गए. कुछ hi देर में हम दोनों कोमल के कमरे में आ गए. कोमल ने आते वक्त hi बताया था की उसका पति और उसका ससुर खेतो पर hi हैं और वो 8 बजे के पहले नहीं आएंगे.

कोमल ने जैसे hi कमरे का दरवाजा बंद किया तो मैंने उसे दबोच लिया. मुझसे अब बर्दास्त नहीं हो रहा था. मेरी जुड़वाँ बहनो की वजह से दो दो बार मेरा लुंड तड़पा था. मैंने कोमल से कहा की वो अपने कपडे उतारे जल्दी और मैं खुद भी होने कपडे उतरने लगा. उधर मेरे कहने पर कोमल मुस्कुराते हुए अपने कपडे उतारने लगी. कुछ hi देर में हम दोनों पूरी तरह नंगे हो गए.

मैंने कोमल को अपनी बाहो में उठा लिया और फिर उसे ले जा कर बीएड पर लेता दिया. मैमे कोमल को खड़े खड़े hi ऊपर से नीचे तक देखा तो वो शर्मा गयी और दूसरी तरफ अपना चेहरा करके मुस्कुराने लगी. मैं एकदम से उसके ऊपर आ गया और उसके होठो को बुरी तरह से चूमने चाटने लगा. इधर मैं अपने एक हाथ से उसकी छाती को भी ज़ोर ज़ोर से मसलने लगा था. कोमल की सिसकिया एकदम से गूँज उठी. थोड़ी hi देर में हम दोनों रंग में आ गए और मिधर मेरा लुंड फिर से लूँ कर खड़ा हो गया.

मैंने कोमल को चूमने चाटने में वक्त बर्बाद करना सही नहीं समझा. वैसे भी मुझे लग रहा था की अब मेरे लुंड की तड़प कितना जल्दी शांत हो. इस लिए मैंने अपने दोनों हाथो से कोमल की टांगो को फैलाया और फिर उसकी टांगो के बीच आ कर मैंने अपने लुंड को उसकी छूट में सेट किया. छूट में लुंड का सूपड़ा जैसे hi घुसा तो मैं कोमल के होठो को तरफ झुका और उसके होठो को मुँह में भरने के साथ hi मैंने ज़ोर का झटका दिया तो मेरा लुंड सनसनाता हुआ कोमल की छूट में जड़ तक घुस गया. इस अचानक झटके से कोमल बुरी तरह दर्द से कड़ाही मगर उसकी आवाज़ मेरे मुँह में hi रह गयी.

कुछ पल रुकने के बाद मैंने ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाना स्टार्ट कर दिया. कोमल ने अपने हाथो को मेरी पीठ पर रखा और मुझे कास के अपनी तरफ खींचने लगी. मैं काफी तेज़ी से धक्के लगा रहा था. कोमल मज़े की दुनिया में पहुंच चुकी थी. कुछ देर इसी पोजीशन में उसको छोड़ने के बाद मैंने उसे कुटिया बनाया और फिर से उसे छोड़ने लगा. बीएड शीट को मुट्ठियों में पकडे कोमल बुरी तरह सिसकिया ले रही रही थी. नीचे उसकी चूचिया मेरे हर धक्के पर उछाल जाती थी.

कुछ देर बाद मैंने उसे फिर से सीधा लेता दिया और लुंड को उसकी छूट में दाल कर उसे छोड़ने लगा. चुदाई का ये तूफ़ान फिर रुका नहीं बल्कि चलता hi रहा. इस बीच कोमल एक बार झाड़ कर शांत पद गयी थी मगर मैं नहीं रुका. उसके बाद कोमल फिर से रंग में आयी और इस बार हम दोनों एक साथ hi झड़े. हम दोनों बुरी तरफ हाफ रहे थे.

कुछ देर में जब हम दोनों नार्मल हुए तो मैंने कोमल को बताया की अब मैं यहाँ से चला जाउगा. मेरी ये बात सुन कर कोमल उदास हो गयी और कहने लगी की अब ऐसा मज़ा और ऐसी तृप्ति उसे नहीं मिल पायेगी. उसके ऐसा कहने पर मैंने उसे समझाया की वो सिर्फ सेक्स के hi बारे में न सोचे बल्कि ये भी देखे की जिस चीज़ में उसे ख़ुशी और सम्मान दोनों मिलना है वो उसे मिल जाएगी.

मैंने कोमल को बताया की मैं यहाँ से जाने के बाद एक दो दिन के लिए फिर वापस आउगा. कोमल ने मुझसे फिर से वापस आने का कारण पूछा तो मैंने उससे यही कहा की मैं सिर्फ उसके लिए hi आउगा. मेरी ये बात सुन कर कोमल बहुत खुश हुयी और वो मुझसे लिपट गयी. कुछ देर बाद कोमल सरकते हुए नीचे गयी और अपने पेटीकोट को पकड़ कर मेरे लुंड के गीलेपन को अच्छे से साफ़ किया उसके बाद उसने उसे मुँह में भर लिया.

कोमल ये सब मेरे बिना कहे hi करने लगी थी. मैं समझ गया की वो बहुत खुश है और अब वो मुझे भी खुश करना चाहती है मगर मैं तो वैसे भी उससे खुश था. क्यों की वो मुझे अपनी छूट ख़ुशी ख़ुशी दे रही थी दोनों टाइम.

कोमल मेरे लुंड को मुँह में लिए उसे लोल्लयपोप की तरह चूसे जा रही थी. जिसका असर ये हुआ की मैं मज़े की दुनिया में पहुंच गया और मेरा मुरझाया हुआ लुंड फिर से बुरी तरह तन कर खड़ा हो गया. कोमल के मुँह में मेरा पूरा लुंड जा hi नहीं सकता था इस लिए वो आधे लुंड को hi मुँह में ले कर उसे चूस रही थी. कभी कभी उसके दांत मेरे लुंड पर लगते तो मेरे जिसम में हलके दर्द की मीठी लहार दौड़ जाती.

मुझसे जब बर्दास्त न हुआ तो मैं एकदम से उठा और अपने लुंड को कोमल के मुँह से निकाल कर उसे बीएड पर सीधा लेटाया और उसकी छूट में लुंड को दाल उसकी चुदाई शुरू कर दी. कोमल मज़े से आहे भरने लगी थी. वो कोशिश कर रही थी की उसके मुख से ज़्यादा आवाज़ न निकले. क्यों की उसकी सास उसके बगल वाले कमरे में hi थी.

कोमल को आज दो बार मैंने चुदाई का सुख दिया था और वो इससे बहुत खुश भी हुयी थी. उसके बाद मैं अपने घर आ गया. आज मैं भी बहुत ज़्यादा थक गया था. एक दिन में मैं चार चार बार झाड़ा था इस लिए थकान तो महसूस होगी hi. खेर रात में खाना पीना करने के बाद मैं अपने कमरे में आ कर लेट गया और इन कुछ दिनों से हो रहे कारनामो के बारे में सोचने लगा.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भाई लोग....

मैं आप लोगो से ये कहना चाहता हु की अगर मैं आप सबके कमैंट्स को लिखे करके रिप्लाई देता हु तो आप भी मेरे उस रिप्लाई को लिखे कर दिया करो....

मैंने देखा है की एक दो लोगो के शिव कोई मेरे रिप्लाई कमेंट को लिखे नहीं करता. इसका मतलब तो यही हुआ की आप लोग सिर्फ अपडेट रीड करने से मतलब रखते हैं. यारा अगर आप लोग मुझे अपना दोस्त भाई मानते हैं तो इतना सबूत तो दे hi सकते हैं की मेरे रिप्लाई कमैंट्स को भी लिखे करे. मुझे भी अच्छा लगेगा की मेरे भाई लोग मेरा और मेरे अपडेट का वेट करते हैं और लिखे करते हैं....

भाई लोग कहने को तो ये छोटी सी बात है मगर सोचो तो समझ भी आता है. मैं ये समझता हु की यहाँ पर मेरी स्टोरी के हर अपडेट में जो लोग हर बार लिखे कमेंट करते हैं वही मेरे रियल रीडर्स हैं जिन्हे मेरी स्टोरी पसंद आती है. बाकी तो बहुत से ऐसे हैं जो चुपके से अपडेट पढ़ कर निकल जाते हैं. उन्हें मैं कुछ नहीं कहुगा क्यों की उन्हें कुछ बोलने का कोई फायदा नहीं है. कुछ लोग सूखे हुए ट्री की तरह होते हैं जो किसी के लिए जखन नहीं जानते. बस अकड़ में खड़े hi रहते हैं....

मैं बस अपने रियल रीडर्स से ये बात कह रहा हु की आप सब मेरा ऐसे hi सपोर्ट करो और मुझे मोटीवेट करो. बाकी स्टोरी एन्ड तक ले जाने का काम मेरा है. आप अपनी तरफ से कोई कमी मत करो. अगर मैं कोई कमी करू तो आप लोग मुझे कुछ भी बोल सकते हो मैं कुछ नहीं कहुगा....

सो भाई लोग मेरी रिक्वेस्ट है की आप लोग मेरे रिप्लाई कमेंट को ज़रूर लिखे कर दिया करो. अब ऐसा तो होगा नहीं की आपके पास नोटिफिकेशन नहीं आता होगा. इस लिए अगर नोटिफिकेशन मिलता है तो एक सेकंड का टाइम लगा कर ये थोड़ा सा काम भी कर दिया करो....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ उस....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 37


मुझसे जब बर्दास्त न हुआ तो मैं एकदम से उठा और अपने लुंड को कोमल के मुँह से निकाल कर उसे बीएड पर सीधा लेटाया और उसकी छूट में लुंड को दाल उसकी चुदाई शुरू कर दी. कोमल मज़े से आहे भरने लगी थी. वो कोशिश कर रही थी की उसके मुख से ज़्यादा आवाज़ न निकले. क्यों की उसकी सास उसके बगल वाले कमरे में hi थी.

कोमल को आज दो बार मैंने चुदाई का सुख दिया था और वो इससे बहुत खुश भी हुयी थी. उसके बाद मैं अपने घर आ गया. आज मैं भी बहुत ज़्यादा थक गया था. एक दिन में मैं चार चार बार झाड़ा था इस लिए थकान तो महसूस होगी hi. खेर रात में खाना पीना करने के बाद मैं अपने कमरे में आ कर लेट गया और इन कुछ दिनों से हो रहे कारनामो के बारे में सोचने लगा.

अब आगे पढ़िए....


सोचते सोचते मुझे कब नींद आ गयी पता hi नहीं चला. रात में प्रिय पूजा मेरे कमरे में आज नहीं आयी थी. कुसुम दीदी ने शायद बाद में भी उन्हें डाटा था. यही वजह थी की वो दोनों आज अपने कमरे में hi सो गयी थी. मुझे कुसुम दीदी का कुछ समझ नहीं आ रहा था. आखिर क्या चाहती थी वो.? क्या था उनके मन में.? माँ से उनकी क्या बात हुयी थी जिसकी वजह से वो उस दिन उनके कमरे से आने के बाद अपने कमरे में रो रही थी.?

सुबह मैं अपने टाइम पर hi उठा. चाय नास्ता करने के बाद जब मैं फुर्सत हुआ तो माँ ने मुझसे कहा की उन्होंने सारा ज़रूरी सामान पैक कर लिया है. इस लिए अब हमें यहाँ से चलना चाहिए. माँ के ऐसा कहने पर मैंने कहा की मैं शहर जा रहा हु. वह पर मैं टैक्सी बुक कर लगा. माँ ने कहा की हमें आज रात में hi यहाँ से निकलना चाहिए. माँ की इस बात से मैं सोच में पद गया. मैं आज बस और रुकना चाहता था जिससे रेखा और सरपंच का कुछ हिसाब किताब कर सकू. इतना hi नहीं कोमल के साथ दो वक्त और सेक्स कर सकू. जिससे उसे वो मिल जाये जो वो चाहती है. बाकी भगवन की मर्ज़ी.

मैंने माँ से कहा की आज रात में हम यहाँ से निकल भी जायेगे तो ट्रैन आज की नहीं मिलेगी. वो या तो सुबह 9 बजे मिलेगी या फिर दोपहर को. वैसे भी अभी टिकट्स वगैरा भी बनवानी है. मेरी इस बात से माँ ने कहा की ठीक है तो फिर कल की टिकट बनवा ले. हम यहाँ से भोर होते hi निकल जायेगे और हाँ रचना की टिकट भी बनवा लेना. माँ की इस बात से मैंने कहा की ठीक है.

माँ से बात करने के बाद मैंने मोटर सिक्ले निकाली और उसमे बैठ कर शहर के लिए निकल गया. मैं सोच रहा था की टिकट और टैक्सी का इंतजाम हो जाये तो इन दो चीज़ो से फुर्सत हो जाओ. उसके बाद जो टाइम मिलेगा उसमे बाकी के काम निपटाऊंगा.

शहर पहुंच कर सबसे पहले मैंने एक कैफे से सबके लिए ज़्यादा पैसे दे कर टिकट बनवायी और फिर टैक्सी की तलाश में लग गया. रेलवे स्टेशन में hi मैंने कुछ टैक्सी वालो से बात की. पहले तो सबने इतनी सुबह आने से मन किया मगर जब मैंने दुगना पैसा देने की बात की तो एक टैक्सी वाला आने के लिए राज़ी हो गया. मैंने टैक्सी वाले को अपने घर का पता दिया और अपना मोबाइल नंबर भी. मैंने उससे कहा की वो टैक्सी ले कर सुबह चार बजे हमारे घर पहुंच जाये.

टैक्सी और टिकट का इंतजाम होने के बाद मैं एक पल के लिए भी शहर में नहीं रुका. वह से सीधा गांव hi आया. इन सब कामो में मुझे दोपहर हो गयी थी. मतलब आधा दिन गुज़र गया था. मैंने सोचा की आज दोपहर वाला दोसे कोमल को नहीं दे पाउगा लगता है.

घर आया तो मैंने माँ को टिकट पकड़ाई और उनसे बताया की टैक्सी सुबह 4 बजे यहाँ पहुंच जाएगी इस लिए सब लोग तैयार रहना. मेरी इस बात से माँ ने कहा ठीक है. उसके बाद मैंने खाना खाया और फिर घर से निकल गया कोमल के घर की तरफ. मैं ज़्यादा लेट नहीं हुआ था मगर जब मैं उसके घर के पास पंहुचा तो मुझे उसके घर के बाहर hi उसका ससुर कुर्सी में बैठा हुआ दिखा. उसके पास दो तीन लोग और भी कुर्सियों पर बैठे हुए थे. ये सब देख कर मैं समझ गया की आज रास्ता क्लियर नहीं है. ये सोच कर मैं वापस मुद गया और रेखा चची के घर की तरफ चल दिया.

रेखा चची के घर के पास आया तो मेरी नज़र उनके घर के बाहर बने चबूतरे पर पड़ी. चबूतरे में बबलू बैठा खेल रहा था. घर का दरवाजा बंद था. ये देख कर मेरे दिमाग में बस एक hi बात आयी की कही घर के अंदर सरपंच तो नहीं है.????

मैं जल्दी से बबलू के पास गया और उससे पूछा की उसकी माँ कहा है तो उसने मुझे बताया की माँ अंदर है और सरपंच दादा भी हैं. बबलू की बात सुन कर मैं सोच में पद गया की सरपंच अंदर क्या कर रहा होगा.? रेखा चची उसको उस दिन की साडी राम कहानी न बता दे वर्ण मेरी तो वात hi लग जाएगी. सरपंच मुझे इस सबके लिए ज़िंदा नहीं छोड़ेगा. ये सब सोच कर मैं अंदर hi अंदर दर गया.

मैं किसी भी तरह से jan'na चाहता था की रेखा चची और सरपंच के बीच क्या बाते हो रही हैं और वो दोनों घर के अंदर क्या कर रहे हैं.? मैंने कुछ सोचते हुए बबलू को दस का नोट दिया और उससे कहा की वो दूकान जाये और उसे जो भी खाना हो खा ले. बबलू दस का नोट पते hi खुश हो गया और हवाई जहाज की तरह भागते हुए दूकान की तरफ चला गया. उसके जाने के बाद मैंने सोचा की दरवाजा तो बंद है और खुलवाना भी ठीक नहीं है. इस लिए मैंने पहले वाला ादी अपनाने का सोचा.

घर के बगल से जो एक पतली गली गयी थी मैं उसी तरफ आ गया. यही से मैं पहली बार रेखा चची के अंदर गया था. मैंने गली में इधर उधर देखा तो कुछ hi दूरी पर मुझे वही लकड़ी का मोटा सा थम्हा पड़ा दिखा जिसके सहारे मैं रेखा चची के घर के अंदर बॉउंड्री पार करके गया था. मैंने उस लकड़ी के थाम्हे को उठा कर फिर से वैसे hi बॉउंड्री की दीवार और नीचे सड़क से टिकाया और फिर उसमे चढ़ता हुआ बॉउंड्री के ऊपर आ गया.

मैंने बॉउंड्री से अंदर की तरफ झाँक कर देखा तो आँगन में कोई न दिखा मुझे. मैं समझ गया की वो दोनों कमरे में hi होंगे. मैंने देखा की जिस बॉउंड्री पर मैं था उस बॉउंड्री में अभी भी वो लकड़ी की सीढ़ी अंदर की तरफ से टिकाई हुयी राखी थी. मैं जल्दी से बॉउंड्री पर चढ़ा और फिर उस सीढ़ी को बिना आवाज़ किये अपने पास लाया और फिर उसी के सहारे आँगन में उतर गया.

आँगन में आ कर मैं दबे पाँव कमरे की तरफ बढ़ता चला गया. कमरे के पास पहुंच कर मैंने खिड़की पर अपने कान सत्ता दिए. जैसे hi मैंने खिड़की से अपने कान सताए तो मेरे कानो में रेखा चची की आवाज़ पड़ी.

"नहीं nahi....tum ऐसा नहीं करोगे. वो मेरे पति हैं." रेखा चची ने ये कहा तो सरपंच ने कहा.

"अब इसके शिव कोई रास्ता नहीं है मेरी रानी. अगर तेरे पति को हमारे बारे में पूरी तरह पता चल गया तो काम खराब हो जायेगा. अभी तो उसे सिर्फ शक है. इस लिए अच्छा यही होगा की उसे कुछ दिन के लिए अस्पताल पंहुचा दिया जाये. तुम फ़िक्र मत करो मैं अपने आदमियों को समझा दुगा की वो रघुवीर को बस उतना hi मारे जितने में वो काम से काम एक हप्ते तक हॉस्पिटल में रहे." सरपंच ने ये कहा तो मैं उसकी ये बात सुन कर शॉक रह गया. जबकि उसकी इस बात से रेखा चची गिड़गिड़ाते हुए बोली.

"नहीं nahi...bhagwan के लिए ऐसा कुछ मत करना. मैं कह तो रही hi न की जैसे hi मौका लगेगा मैं तुम्हे अपनी जेठानी की छूट दिलवा दूगी. वो तो उस दिन विक्की आया हुआ था इस लिए काम नहीं बन पाया था. वर्ण मैं तो जेठानी को पता कर अपने घर ले hi आयी थी." रेखा चची ने ये कहा तो सरपंच ने इस बार गुस्से से कहा.

"इस विक्की का तो अब कुछ करना hi पड़ेगा. साला मैं अपनी बेटी की वजह से इतना मजबूर हो गया की कुछ कर hi नहीं पाया कभी. मगर अब और nahi....maine सोच लिया है की सबसे बड़ी रुकावट को अपने रास्ते से हटा दुगा. उसके बाद मैं विक्की की माँ और उसकी बहनो को अपने खेत वाले घर पर ले जाउगा और वह महीनो तक उन सबके साथ पहले खुद मज़ा करुगा उसके बाद अपने आदमियों को भी मज़ा लेने को कह दुगा. मगर उसके पहले अपने रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट अपनी बेटी को ख़तम करना पड़ेगा. साली ने मुझे पांच साल से पिंजरे में बंद करके रखा हुआ है." सरपंच ने ये कहा तो रेखा चची आँखे फाड़े देखती रह गयी उसे जबकि उसकी ये बात सुन कर मेरा खून खौल गया. मेरा मन किया की अभी जाओ और इसकी माँ छोड़ दू. मगर मैंने खुद को रोका.

मैं ये समझ गया था की रेखा चची ने मेरे बारे में उसे कुछ नहीं बताया है. उसने बस यही कहा है उससे की उसके पति को शक हो गया है. मैं सरपंच की बातो से बुरी तरह तिलमिला गया था और इसको अब अच्छा खासा सबक सीखना चाहता था. मेरे दिमाग में बड़ा hi ज़बरदस्त प्लान आया. मैं वह से चला और वापस सीढ़ियों के द्वारा बॉउंड्री पर आ गया. बॉउंड्री पर चढ़ कर मैंने सीढ़ी को खींच कर इस पार गली में लगाया और फिर इस तरफ उतर आया. उसके बाद मैं सीढ़ी को उठा कर रेखा चची के घर के सामने की तरफ आ गया. सीढ़ी को मैं इस लिए ले आया था की सरपंच को उसके द्वारा भागने का मौका न मिले. बिना किसी सहारे के वो बॉउंड्री में चढ़ hi नहीं पायेगा और जब चढ़ hi नहीं पायेगा तो भागेगा कैसे.?

घर के सामने आया तो मेरी नज़र चबूतरे में बैठे बबलू पर पड़ी. वो बड़े मज़े से गुड़ और बिस्कुट खा रहा था. मुझे उस मासूम पर तरस तो बहुत आया मगर अब जो मैं करने वाला था वो बहुत ज़रूरी हो गया था. मैंने सीढ़ी को रेखा चची के घर के बाहर hi दिवार से टिका कर रख दिया और फिर दरवाजे के पास जा कर मैंने दरवाजे की बाहर से कुण्डी भी लगा दी. सरपंच के भागने का ये रास्ता भी बंद.

मैंने आस पास का जायजा लिया और फिर तेज़ी से अपने घर की तरफ आया. घर से मैंने मोटर सिक्ले निकली और चल दिया खेतो की तरफ. कुछ hi देर में मैं खेतो की तरफ पहुंच गया. मैंने खेतो में आस पास नज़र दौड़ाई तो खेतो में काम कर रहे काफी लोग दिखे मुझे. मैं उन लोगो को ध्यान से देखने लगा और फिर मेरी नज़र एक आदमी पर पड़ी तो मैं चलते हुए उसके पास पहुंच गया.

ये मंगल काका थे. मुझे देखते hi बड़ा खुश हुए और मेरा हाल चाल पूछने लगे. मैंने अपना हाल चाल बताया, उसके बाद मैंने मंगल काका के कान में कुछ देर कुछ कहा. मेरी बात सुन कर मंगल काका बड़ा हैरान हुआ मगर अगले hi पल खुश भी नज़र आने लगा. मैंने उसे कहा की काका जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी ये काम करो. मंगल काका ने कहा चिंता मत करो बीटा हम अभी काम पर लग जाते हैं.

उसके बाद मैं वह से बड़े आराम से अपने घर चला आया. अपने कमरे में बीएड पर लेता मैं सोच रहा था की कुछ hi देर में इस गांव में ज़बरदस्त हंगामा होने वाला है और मैं उसी हंगामे का इंतज़ार करने लगा. करीब बीस मिनट बाद प्रिय पूजा भागते हुए मेरे कमरे में आयी और मुझे बताया की गांव में बहुत हल्ला मचा हुआ है. मैंने अनजान बनते हुए पूछा किस बात का हल्ला तो उन दोनों ने बताया की गांव के बहुत सरे लोग रघुवीर काका के घर के बाहर इकठ्ठा हैं.

प्रिय पूजा को ज़्यादा पता नहीं था मगर मैं तो सब जनता था क्यों की सारा किया कराया मेरा hi था. मैं उठा और कमरे से बाहर आ गया. नीचे मुझे माँ मिली और मुझे बाहर जाते देखा तो मुझे आवाज़ दे कर रोक लिया. उन्होंने बताया की रघुवीर के घर में सरपंच घुसा हुआ था जिसका पता जाने कैसे लोगो को चल गया तो सबने हल्ला मचा दिया है.

माँ की बात सुन कर मैं मन hi मन खुश हुआ. माँ ने बताया की रघुवीर भी आ गया था और उसने सरपंच को बहुत मारा है. मैं माँ की बाते सुन कर खुश तो था hi मगर मैं ये सब अपनी आँखों से भी देखना चाहता था. इस लिए माँ के मन करने पर भी मैं घर से बाहर निकल गया. कुछ hi देर में मैं रघुवीर काका के घर के पास पहुंच गया.

रघुवीर काका के घर के बाहर भारी भीड़ जमा थी और बहुत ज़्यादा शोर शराबा हो रहा था. मैं किसी तरह लोगो के बीच से निकलते हुए भीड़ के अंदर की तरफ गया तो जो देखा उसे देख कर मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी. कुछ लोग रघुवीर काका को ज़बरदस्ती पकडे हुए थे जबकि नीचे ज़मीन पर अधमरी हालत में सरपंच पड़ा हुआ था. उसे इतना मारा गया था की उसको पहचानना मुश्किल था. उसकी नाक मुँह से खून बाह कर उसके अपने hi चेहरे पर पता हुआ दिख रहा था.

सरपंच की ऐसी हालत देख कर मुझे जाने क्यों बड़ी ख़ुशी हुयी. वैसे ख़ुशी की तो बात hi थी. ये वही इंसान था जिसने जाने कितनी बहु बेटियों की इज्जत लूटी थी और उनके साथ अत्त्याचार किया था. इसकी वजह से मेरी दीदी का हर बार रिश्ता टूटा था. तभी मेरी नज़र घर के दरवाजे पर पड़ी. वह पर रेखा चची औरतो से घिरी रोये जा रही थी. वो बार बार यही कह रही थी की इस आदमी ने उनकी इज्जत लूटने की कोशिश की है और बहुत दिनों से उन्हें परेशान कर रहा था. उनकी हालत देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उन पर किसी ने हाथ नहीं उठाया था. मैं समझ गया की रेखा चची ने सारा इलज़ाम सरपंच के ऊपर मैथ दिया है और इसी लिए सरपंच की इतनी बुरी हालत हुयी थी.

गांव में ऐसा हंगामा पहली बार hi हुआ था और सरपंच की ये हालत भी. मैंने देखा की इस भीड़ में हर कास्ट के लोग थे. ब्राह्मण समाज के कुछ लोग इस मामले को शांत करने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे. काफी टाइम बाद आखिर मामला शांत होता दिखा. रघुवीर काका की आवाज़ सबने सुनी. वो कह रहे थे की जिस आदमी को गांव के सब लोग इतना इज्जत देते थे उसने आज ये घिनौना काम किया है और इसका फैसला इसी वक्त होगा.

ये मामला hi ऐसा था की कोई भी सरपंच के हक़ में फैसला नहीं सुना सकता था. सरे गांव वाले जमा थे. मैंने देखा की इतर कास्ट के लोग जो ठाकुर थे वो तेज़ तेज़ बोल रहे थे की ऐसे आदमी को सरपंची के पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं है. इसने कभी किसी के साथ भला नहीं किया बल्कि बुरा hi किया है. इसके लिए इसे कठोर सजा मिलनी चाहिए. सरपंच के परिवार वाले भी आ गए थे. सब सरपंच का ये हाल देख कर दुखी थे. रुपेश अपने बाप की दशा को देख कर रो रहा था. उसकी माँ भी रो रही थी.

धीरे धीरे भीड़ छटने लगी. सरपंच की हालत बहुत खराब हो गयी थी. उसे उसका बीटा और उसके आदमी जीप में बैठा कर इलाज के लिए शहर ले जा रहे थे. जब सब लोग जाने लगे तो मैं भी अपने घर आ गया. घर आया तो माँ ने मुझे डाट लगाई की क्यों गया था मैं वह पर.? माँ की बात पर मैं मुस्कुराया और फिर उनसे कहा की ऐसे आदमी के साथ ऐसा hi होना चाहिए था. सरपंच की हालत ऐसी थी की लग रहा था की जैसे उसे काफी लोगो ने धोया था.

बीएड पर पड़ा मैं इस सबके बारे में सोच रहा था. मैं सोच रहा था की ये जो कुछ भी मैंने किया है वो ठीक किया या नहीं.? मगर जब मैंने गौर से सोचा तो मुझे इस सबसे फायदा hi लगा. सरपंच इस हालत में हॉस्पिटल पहुंच जायेगा. उसके चाहने वाले उसके आस पास hi रहेंगे. उसके आदमियों का सारा ध्यान सरपंच की देख भाल में hi रहेगा. इधर मैं अपनी फॅमिली को ले कर बड़े आराम से शहर पहुंच जाउगा और सरपंच या उसके आदमियों को पता भी नहीं चलेगा.

अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी प्रिय पूजा मेरे कमरे में आ गयी. दोनों ने बताया की माँ और कुसुम दीदी रचना के घर गयी हैं. सरपंच को तो शहर ले गए हैं मगर इंसानियत के नाते माँ और दीदी उसके घर गयी हुयी हैं. दोनों की बात सुन कर मैंने सोचा की इस सबसे कही ऐसा न हो की रचना की माँ अपनी बेटी को हमारे साथ न भेजे. मेरा प्लान तो पहले यही था की रचना को बाद में ले जाउगा. मगर माँ के कहने पर मैंने रचना की भी टिकट बनवा ली थी.

"भाई क्या तुमने देखा की उस सरपंच को क्या हुआ है.?" पूजा ने ये पूछा तो मैंने कहा.

"हाँ dekha...uski हालत बहुत खराब थी. ऐसा लगता है जैसे उसे काफी लोगो ने मारा है. बेचारा अधमरी हालत में पड़ा था. वैसे एक बात है अब वो फिर से ऐसा कुछ करने की कोशिश नहीं करेगा." मैंने ये कहा तो दोनों मुस्कुरा उठी.

"मुझे तो यकीन hi नहीं हो रहा भाई की वो रेखा चची के घर में घुसा हुआ था और उनके साथ कुछ गलत कर रहा था." प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"तुम्हे पता है इसके पहले जब मैं मोटर सिक्ले से बाहर गया था तो कहा गया था.?" मैंने ये कहा तो प्रिय पूजा दोनों ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए न में सर हिलाया तो मैंने कहा.

"मैं खेतो की तरफ गया था. वह पर मैं खेतो में काम कर रहे मंगल काका से मिला और उससे कहा की वो अपने लोगो को इकठ्ठा करे और ठाकुरो को भी इकठ्ठा करे. उसके बाद वो उन सबको लेके रघुवीर काका के घर पहुंचे." मैंने ये कहा hi था की प्रिय बोल पड़ी.

"ये तुम क्या कह रहे हो भाई.? तुमने उन लोगो को ऐसा करने के लिए क्यों कहा.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"क्यों की यही मैं चाहता था. असल बात ये है की मुझे पता था की सरपंच रेखा चची के घर में है. मैंने छुप कर उसकी बाते भी सुनी. उसके बाद मैंने सोचा की इसे सबक सिखाया जाये इस लिए मैं खेतो की तरफ गया और मंगल काका से कहा की वो सबको इकठ्ठा करे और वह ले आये." मैंने ये कहा तो दोनों बुरी तरह हैरान रह गयी.

"लेकिन हमारी समझ में ये नहीं आ रहा की तुम्हे कैसे पता चला की सरपंच रेखा चची के घर में है और तुमने सरपंच की बाते भी कैसे सुनी.?" प्रिय ने ये पूछा तो मैंने उसे शार्ट में साडी बात बता दी.

मैंने दोनों को ये बताया की मैं उधर से गुज़र रहा था तो रेखा चची के घर के बाहर उनका बच्चा अकेला बैठा हुआ मिला तो मैंने उससे पूछा की वो इस तरह अकेला क्यों बैठा है तो उसने बताया की माँ ने उसे डाट कर भगा दिया है और सरपंच दादा को ले कर अंदर चली गयी है. बच्चे की इस बात से मैं सोच में पद गया था. मैंने सोचा की रेखा चची बच्चे को घर से बाहर करके खुद सरपंच के साथ अंदर क्यों हैं. ये jan'ne के लिए मैं पीछे के रास्ते से घर की बॉउंड्री पार करके घर के अंदर पंहुचा. वह कमरे की खिड़की से मैंने दोनों को देखा और उनकी बाते भी सुनी." मैं ये सब कह hi रहा था की पूजा अचानक बोल पड़ी.

"हे bhagwan...kaha से कहा पहुंच गए तुम.? वैसे bhai...wo लोग अंदर कर क्या रहे थे.?" पूजा ने ये पूछा तो मैंने कहा.

"Wahi...jo एक मर्द और औरत अकेले में करते हैं." मैंने खुल के ये कहा तो दोनों बुरी तरह शर्मा गयी फिर प्रिय बोली.

"फिर क्या हुआ भाई.?" प्रिय ने ये पूछा तो मैंने कहा.

"अरे यार मैं ऐसा कुछ नहीं करता मगर उसने जब हमारे बारे में उल्टा पुल्टा बोलै तो मुझे गुस्सा आ गया." मैंने ये कहा तो प्रिय ने हैरानी से पूछा.

"हमारे में मतलब..?" प्रिय ने ये पूछा तो मैंने कहा.

"बातो बातो में उसने कहा की वो अपनी बेटी की वजह से हमारे साथ कुछ नहीं कर पाया था. मगर अब वो पहले अपनी बेटी को ख़तम करेगा उसके बाद वो मेरी माँ और बहनो को अपने खेत वाले घर में ले जा कर तुम लोगो के साथ गलत करेगा. यही बात थी priya...usne जब गंदे तरीके से तुम लोगो के बारे में ऐसा बोलै तो मुझे गुस्सा आया था. तभी मैंने सोचा की अब इसको ऐसा सबक सीखना होगा की ये ज़िन्दगी भर याद रखे. बस उसके बाद मैं वह से घर आया और मोटर सिक्ले ले कर खेतो की तरफ निकल गया. मैं जनता था की इस मामले में मेरी मदद इतर कास्ट के लोग hi करेंगे. आज से पांच साल पहले भी ये लोग हमारे साथ hi थे. आज जब मंगल काका मुझे मिले तो वो मुझे देख कर खुश हुए थे. मैंने उन्हें सब कुछ समझाया और फिर चला आया था." मैंने ये सब कहा तो मेरी दोनों बहने आँखे फाड़े मुझे देखती रह गयी.

"तो ये सारा किया धरा तुम्हारा है.? हमें तो लगा की तुम मज़ाक कर रहे हो." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ये मज़ाक नहीं है पूजा. ये सच है. उस साले सरपंच को सबक सीखना अब ज़रूरी था." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"मगर bhai...agar सरपंच को ये पता चल गया की ये सब तुमने किया है तो वो हमें ज़िंदा नहीं छोड़ेगा." प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"कुछ नहीं कर पायेगा वो. उसे तो अभी यही नहीं पता की ये सब हुआ कैसे.? कैसे इतनी बड़ी आफत उसके ऊपर आ गिरी है.? अभी तो वो इस हालत में hi नहीं है की कुछ कर सके. हम लोग तो वैसे भी कल सुबह 4 बजे यहाँ से चले जायेगे. बाद में अगर उसे पता चल भी गया तो वो क्या कर लेगा हमारा.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"हाँ ये तो सही कहा तुमने मगर भाई अगर ये सच है तो क्या रेखा चची भी दोषी नहीं हैं.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"इंसान की मज़बूरी इंसान से बहुत कुछ करवा लेती है. रेखा चची ने ये सब मज़बूरी की वजह से hi किया होगा और फिर जब उन्होंने एक बार सरपंच के साथ वो सब किया तो फिर हर बार वो सब करना उनकी और भी ज़्यादा मज़बूरी बन गयी. क्यों की ऐसा करने के बाद वो सरपंच जैसे हरामी इंसान को दुबारा ऐसा करने से मन नहीं कर सकती थी. सरपंच उन्हें गांव में बदनाम कर देता." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"सच में भाई ये सरपंच बहुत hi कमीना इंसान है. अच्छा हुआ जो आज उसे ऐसा सबक मिला है. बहुत अच्छा किया भाई तुमने. हम इस बात से बहुत खुश हो गए हैं." पूजा ने ये कहा तो मैमे मुस्कुराते हुए कहा.

"तो इस ख़ुशी में अगर मैं तुम दोनों से कुछ मागु तो मिलेगा क्या.?" मैंने ये कहा तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा फिर पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मांगते क्यों हो भाई.? हमारा सब कुछ तुम्हारा hi तो है. जो चाहे ले लो." पूजा ने ये कहा तो मुझे उसके ऊपर बहुत प्यार आया.

मैंने पूजा का हाथ पकड़ कर उसे अपने ऊपर खींच लिया तो वो मेरे ऊपर भरभरा कर आ गयी. ये देख कर प्रिय ज़ोर ज़ोर से हसने लगी. उसे हस्ता देख मैंने उसे भी खींच लिया. दोनों मुझसे लिपट गयी थी.

"अब बताओ क्या क्या है मेरा.?" मैंने ये कहा तो दोनों शर्मा गयी फिर मुस्कुराते हुए धीरे से बोली.

"सब कुछ." दोनों ने एक साथ ये कहा तो मैं दोनों के चेहरे की तरफ बड़े गौर से देखने लगा. दोनों एक जैसी hi दिखती थी. दूध की तरह साफ़ गोरी रंगत और कपास की रुई से भी ज़्यादा मुलायम जिसम. गुलाब की पंखुड़ियों जैसे थरथराते हुए होठ. मेरा दिल चाहा की दोनों के होठो को एक साथ मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दू.

"Bhai...jab तुम्हारी रचना दीदी से शादी हो जाएगी तो क्या तुम हमें भूल जाओगे.?" प्रिय ने सीरियस हो के ये कहा तो मैंने सर उठा कर पहले उसके सुर्ख होठो को चूमा फिर बोलै.

"तुम दोनों मेरी जान हो मेरी परियो. मैं तुम दोनों को कभी नहीं भूल सकता. तुम तीनो में मेरी जान बस्ती है." मैंने ये कहा तो दोनों ने मेरे सीने में अपना चेहरा छुपा लिया फिर उसी हालत में पूजा ने कहा.

"भाई क्या ऐसा नहीं हो सकता की हम हमेशा एक साथ रहे.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हम साथ hi तो हैं." मैंने ये कहा तो प्रिय ने चेहरा उठा कर कहा.

"ऐसे नहीं bhai....ham उस तरह के साथ की बात कर रहे हैं जिस रिश्ते में हम इस वक्त हैं." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"सब कुछ हमारे हिसाब से नहीं होता प्रिय. हम चाहते कुछ हैं और हो कुछ और जाता है. तुम्हारे कहने का मतलब यही है न की जैसे रचना मेरे साथ शादी के बाद हमेशा रहेगी वैसे hi तुम दोनों भी रहो.?" मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"हम दोनों hi नहीं भाई बल्कि कुसुम दीदी भी. वैसे उनका तो हमें यकीन है की वो कभी किसी से शादी नहीं करेगी और वो हमेशा तुम्हारे साथ या माँ के साथ hi रहेगी मगर हम दोनों की तो माँ ज़रूर शादी कर देंगी और तुमसे हमें अलग कर देंगी. इस लिए ये कह रही हु भाई की क्या ऐसा नहीं हो सकता की दीदी की तरह हम दोनों भी साथ रहे.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"देखो अगर तुम दोनों भी दीदी की तरह ज़िद करोगी शादी न करने की तो मैं या माँ कुछ नहीं कर पाएंगे. मगर तुम खुद सोचो क्या ये सही रहेगा.? हर माँ बाप यही चाहते हैं की वो अपने बच्चो की शादी करके उनका घर बसाये. हमारे पिता जी इसी दुःख में मर गए की वो अपने जीते जी इस गांव में रह कर अपनी बेटियों का ब्याह नहीं कर पाए. अब उनके बाद ये मेरा फ़र्ज़ बनता है की मैं उनके सपनो को पूरा करू. पिता जी ने इस गांव से कही दूर जाने के लिए कहा था हमें तो हम लोग जा भी रहे हैं. यहाँ से दूर जा कर अगर तुम लोगो का ब्याह हो सकेगा तो हमें तुम लोगो का ब्याह करना hi चाहिए. काम से काम पिता जी की आत्मा को इस बात से सुकून तो मिलेगा." मैंने ये सब कहा तो दोनों कुछ न बोली.

"प्रेम प्यार तो दिलो का एक अहसास है. हम चाहे जहा भी रहे वो हमारे दिलो में रहेगा. मगर उसके चक्कर में हमें अपनों के सपनो को भी टी अनदेखा नहीं करना चाहिए. खेर chhodo...tum फ़िक्र मत करो मैं तुम दोनों का ब्याह ऐसी जगह करुगा जहा से तुम दोनों हमारे आस पास hi रहो और तुम दोनों का आना जाना आसान रहे." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"ठीक है भाई तुम कहते हो तो हम तुम्हारी बात को टालेंगे नहीं. बस इतना hi कहेगे की हमारे प्यार को भूलना नहीं और न hi हमें किसी बात के लिए कभी मन करना." प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"बिलकुल मन नहीं करुगा मेरी जान. अब चलो मुस्कुराओ और मुझे अपने इन रसीले रसीले और शहद जैसे मीठे होठो का जूस पिलाओ." मैंने ये कहा तो दोनों मुस्कुराने लगी.

"कहने की क्या ज़रूरत है भाई. जो दिल करे वो कर लिया करो बस." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा ji....soch लो फिर." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"जो सोचना था वो पहले hi सोच लिया है हमने. अब कुछ सोचने के लिए बाकी hi नहीं है." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"एक बात हमेशा याद रखना तुम दोनों. मैं तुम दोनों को कभी भी उदास होते नहीं देखना चाहता. इस लिए तुम जैसी अभी हो वैसी hi बाद में भी बने रहना. किसी भी वक्त किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो मुझसे बेझिझक बोल लेना. ये मेरा वडा है तुम दोनों से की मैं तुम दोनों को कभी इंकार नहीं करुगा." मैंने ये कहा तो दोनों मुझसे कास के लिपट गयी.

मैं दोनों की पीठ पर प्यार से हाथ फेर रहा था. कुछ देर बाद दोनों ने अपना अपना चेहरा उठाया और खुद hi मेरे चेहरे पर और होठो पर चूमना चाटना शुरू कर दिया. देखते hi देखते हम तीनो के जिसम में गर्मी बढ़ने लगी. दो दो हुस्न की परिया मेरे ऊपर सवार थी और मुझ पर अपने प्यार की बरसात कर रही थी. मेरा लुंड थोड़ी hi देर में तन कर खड़ा हो गया जो दोनों की जांघो पर लग रहा था. इस बात का अहसास दोनों को भी हुआ होगा.

मैंने एक बात देखा था की वो दोनों एक साथ ऐसा करती थी मगर एक दूसरे से शर्माती नहीं थी. मुझसे बर्दास्त न हुआ तो मैंने दोनों को पलट कर बीएड पर सीधा लेता दिया और खुद उठ कर बैठ गया. दोनों के खूबसूरत चेहरे सुर्ख पद गए थे और दोनों तेज़ तेज़ साँसे ले रही थी. सांस लेने से दोनों की छतिया ऊपर नीचे हो रही थी.

मैं उन दोनों को hi देखे जा रहा था और मुझे इस तरह देखते देख दोनों शर्मा भी रही थी और मुस्कुरा भी रही थी. मुझे समझ न आया की मैं पहले किसको प्यार करू.? मगर प्यार तो करना hi था इस लिए मैं पहले पूजा के ऊपर hi आया.

पूजा के होठो को मुँह में भर कर मैं उसके होठो का रास चूसने लगा. पास में hi प्रिय थी तो मैंने हाथ बढ़ा कर उसे भी पास खींचा और फिर उसके होठो को हाथ की उंगलियों से hi सहलाने लगा. कुछ देर पूजा के होठो का रास चूसने के बाद मैं हटा और प्रिय के ऊपर झुक कर उसके होठो का रास चूसने लगा.

दोनों के होठो के रास का असर ये हुआ की मैं मदहोश हो गया. प्रिय के होठो को चूमते हुए मैं उसके गले पर आया और उसके गले के हर हिस्से पर चूमने लगा. प्रिय बुरी तरह मचले जा रही थी. मैंने एक हाथ बढ़ा कर उसकी ऊपर नीचे होती छाती को पकड़ लिया और उसे मुट्ठी में ले कर ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया. मेरे ऐसा करते hi प्रिय ने झट से अपना एक हाथ मेरे उस हाथ के ऊपर रख लिया मगर मेरे हाथ को हटाया नहीं.

तभी पीछे से पूजा आयी और वो भी प्रिय के ऊपर झुक गयी. उसने प्रिय के कांपते होठो को अपने मुँह में भर लिया और मज़े से चूमने चाटने लगी. मैंने सर उठा कर ये देखा तो हैरान रह गया. मगर फिर से झुक कर मैं प्रिय के गले और छाती के ऊपर वाले हिस्से पर चूमने लगा.

मैं प्रिय की चूचियों को बरी बरी से दबा रहा था. प्रिय बुरी तरह मचल रही थी. मैंने हाथ नीचे ले जा कर उसके कुर्ते को पकड़ा और उसे ऊपर करने लगा. मेरे ऐसा करते hi प्रिय मछली. इधर मैंने उसके कुर्ते को उठाते हुए ऊपर उसकी छाती तक ले आया. अब प्रिय का पेट से छाती तक का हिस्सा नंगा हो गया था. उसका दूध जैसा बेदाग़ गोरा जिसम बेपर्दा था.

मैं एकदम से नीचे की तरफ आया और उसके चिकने पेट पर अपना हाथ फेरते हुए चूमने लगा. प्रिय गहरी गहरी साँसे ले रही थी जिससे उसका पेट भी ऊपर नीचे हो रहा था. जैसे hi मैंने उसके पेट पर चूमना शुरू किया तो प्रिय के जिसम में झटका लगा और वो ज़ोरो से मछली.

उधर पूजा भी प्रिय के ऊपर लगी हुयी थी. मैंने देखा की उसने अपने एक हाथ से प्रिय की लेफ्ट चुकी को पकड़ा हुआ है और उसे हलके हलके दबा भी रही है. प्रिय पूरी तरह मदहोश हो चुकी थी और वो दोनों हाथो से पूजा के सर को पकडे खुद भी उसके होठो को चूम रही थी.

इधर मैं प्रिय के पेट और नाभि को चूमते हुए ऊपर की तरफ आने लगा और उसकी छाती के निचले हिस्से पर आ गया. मैंने अपने एक हाथ को प्रिय के कुर्ते में डाला तो मेरे हाथ में उसकी समीज लगी. मैंने समीज के अंदर हाथ डाला और उसे ऊपर की तरफ बढ़ाया तो एकदम से प्रिय ने मेरे हाथ पर अपना एक हाथ रख कर दबाया. वो मुझे ऊपर अपनी चुकी की तरफ बढ़ने से रोक रही थी.

मगर मैं रुका nahi...aur अपने हाथ को ज़ोर दे कर ऊपर किया तो तभी मुझे उसकी बहुत hi सॉफ्ट और गरम चुकी का आभास हुआ. मैंने एकदम से अपनी हथेली को फैलाया और प्रिय की राइट चुकी को मुट्ठी में ले लिया. प्रिय की समीज के अंदर उसकी चुकी नंगी थी और चुकी का निप्पल मेरी हथेली के बीच में था जो छोटा सा था और अकड़ा हुआ था. मैंने पहले हलके से उसकी छाती को दबाया फिर थोड़ा ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया.

"उफ्फ्फ्फ़ आअह्हह्ह्ह्ह bhai....ssshshs ये क्या हो रहा है मुझे. हाय मुझे बचा लो bhai....main आस्मां में उडी जा रही हु." मेरे कानो में एकदम से प्रिय की ये आवाज़ पड़ी तो मैंने चेहरा उठा कर उसकी तरफ देखा.

पूजा बैठ गयी थी जिससे प्रिय के होठ अब आज़ाद थे और वो बुरी तरह सिसकिया ले रही थी और हाफ भी रही थी. मैंने उसकी तरफ देखने के बाद पूजा की तरफ देखा तो उसका हाल भी वैसा hi था. उसकी आँखे तक सुर्ख पद चुकी थी. जैसे hi उसकी नज़र मुझसे मिली तो उसने अपने निचले होठ को अपने दांतो में दबा लिया.

अभी मैं उसे देख hi रहा था की तभी नीचे घर का दरवाजा ज़ोर से बजा. हम तीनो को एकदम से होश आ गया और हम तीनो hi घबरा गए. शायद माँ और कुसुम दीदी रचना के यहाँ से आ गयी थी.

"तुम दोनों जल्दी से अपने कमरे में जाओ और बीएड पर लेट जाना. मैं दरवाजा खोलने जाता हु." मैंने दोनों से कहा तो पूजा के साथ प्रिय भी उठ कर बीएड से नीचे आ गयी और फिर अपना हुलिया सही करते हुए कमरे से बाहर चली गयी.

दोनों के जाने के बाद मैं भी जल्दी से उठा और पहले शीशे के सामने आ कर अपना हुलिया सही किया और फिर भागते हुए नीचे आया. मेरा लुंड जो अकड़ गया था वो घबराहट की वजह से जल्द hi बैठ गया. मैं जल्दी से नीचे आया और बाहर वाले दरवाजे को खोला.

बाहर माँ और दीदी कड़ी थी. मुझे देखते hi माँ ने मुझसे पूछा की प्रिय पूजा कहा हैं तो मैंने कहा की लगता है सो रही हैं अपने कमरे में. मेरी इस बात से माँ ये कहते हुए अंदर आ गयी की ये दोनों जब देखो सोती hi रहती हैं. माँ के पीछे पीछे दीदी भी आ गयी थी. उन्होंने मेरी तरफ ध्यान से देखा ज़रूर था मगर कहा कुछ नहीं.

दरवाजा बंद करके जब मैं अंदर आया तो माँ ने बताया की आज सरपंच के साथ जो कुछ भी हुआ है उससे रचना की माँ और उसके परिवार वाले काफी दुखी और परेशां हैं. माँ ने ये भी बताया की रचना की माँ ने उनसे कहा है की रचना को वो अभी हमारे साथ नहीं भेज सकती हैं. जब सरपंच की हालत में सुधार आ जायेगा तो वो भेज देंगी. मगर उसके लिए तुम्हे यहाँ वापस आना होगा.

माँ की इस बात से मैंने कहा ठीक है मैं वापस आ जाउगा. उसके बाद माँ ने कहा की पता नहीं किसने इस बात की जानकारी गांव वालो को दे दी थी की रघुवीर के घर में सरपंच घुसा हुआ है और उसकी बीवी की इज्जत लूट रहा है. पता चला की दरवाजा बाहर से बंद था और गांव के लोग जब आये तो उनमे से hi किसी ने दरवाजा खोला था. अंदर जब पहुंचे तो कमरे से सरपंच को आँगन की तरफ भागते हुए पाया था. उसके बाद कुछ लोगो ने उसे पकड़ लिया. रेखा ने चीख चीख कर बताया था की वो उसके साथ ज़बरदस्ती कर रहा था. बस फिर क्या था जो लोग अंदर सरपंच को पकड़ रखे थे वो लोग पहले अंदर hi उसकी कुटाई की उसके बाद उसे घसीट कर बाहर ले आये थे. किसी ने तब तक रघुवीर को भी ये खबर दे दी थी और जैसे hi सरपंच को बाहर लाया गया तो रघुवीर उस पर पिल पड़ा था. लोगो ने अगर उसे पकड़ न लिया होता तो रघुवीर उसे जान से मार देता.

माँ ने ये सब बताया तो मैं ज़्यादा तो कुछ न बोलै बस यही कहा की ऐसे आदमी के साथ ऐसा hi होना चाहिए था. दुसरो की बहु बेटियों के साथ हमेशा hi गलत किया था उसने. मैंने माँ को ये नहीं बताया की ये साडी आग मेरी hi लगाई हुयी थी. माँ ने ये भी बताया की पुरे गांव में इसी बात की चर्चा है. लोग तो ये भी कह रहे हैं की सरपंच को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए.

मैंने माँ से कहा की कल सुबह आप सब तैयार रहिएगा. हम यहाँ से सुबह चार बजे निकलेंगे. मेरी इस बात से माँ ने कहा की ज़रूरी सामान जो भी था उसे उन्होंने पैक कर लिया है. सुबह नाहा धोकर हम सब तैयार रहेंगे और जैसे hi टैक्सी आएगी हम सब उसमे सामान रख कर चल देंगे.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

थैंक्स भय इतने अच्छे रिव्यु के लिए....

भय छोटा अपडेट देने का क्या फायदा जब अपने भाई लोगो को पढ़ कर मज़ा hi न आये तो. मैं भी स्टोरी पढता था पहले और छोटे अपडेट पढ़ कर गुस्सा भी आता था. इस लिए भाई मैं हर बार यही कोशिश करता हु की हर अपडेट लॉन्ग हो और अपने भाई लोगो को पढ़ने में मज़ा भी आये....

यारा स्टोरी तो ज़रूर कम्पलीट होगी बस आप लोग मेरा साथ बनाये रखो. मैं इसे कम्पलीट करने के बाद दूसरी स्टोरी भी लिखुगा....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 155....

रीड & एन्जॉय....
 
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