SAB KUCH JAYAZ HAI... - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

hotaks

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Dec 5, 2013
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Hello एवरीवन....


मैं यहाँ पर एक नई स्टोरी लिखने जा रहा हु. मैं आप सबको बता दू की मैं कोई राइटर नहीं हु. मैं इसके पहले एक साइलेंट रीडर hi था. सबको स्टोरी लिखते देखा तो मेरे मन में भी स्टोरी लिखने का विचार आ गया सो लिखने की कोशिश कर रहा हु. अगर कही कुछ गलत सलत हो जाये तो भाई लोग आप मुझे बेझिझक हो कर बता देना और मुझे गाइड करते रहना. मुझे तो ये भी पता नहीं था की स्टोरी पोस्ट कैसे करते हैं. भाई ने मेरी हेल्प की इसके लिए भाई को थैंक्स.....

भाई लोग स्टार्टिंग में मुझे थोड़ा जान्ने समझने में टाइम लग सकता है इस लिए मुझ पर दबाव न डालना अपडेट के लिए. मैं कोई प्रोफेशनल राइटर तो हु नहीं इस लिए जल्दी जल्दी अपडेट भी नहीं दे पाउगा. बूत i'll दो माय बेस्ट.....

ऑलवेज नीड योर हेल्प एंड सुप्पोर्टस.......
 
सब कुछ जायज़ है...

अपडेट = 01

ये स्टोरी पूरी तरह काल्पनिक है. इसका किसी की पर्सनल लाइफ से कोई लेना देना नहीं है. इस स्टोरी को लिखने का मकसद सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन करना है....

"आअह्ह्ह्ह ऐसे hi ज़ोर ज़ोर से छोड़ो mujhey...hayeee री vickyyy...aisi hi चुदाई के लिए तो तरस रही थी मैं." बंद कमरे में एक शानदार बीएड पर एक औरत ज़ोर ज़ोर से आहें भारतीय हुए सिसकारियां ले रही थी.

बीएड पर इस वक्त वो पूरी तरह नंगी लेती हुयी थी. उसकी दोनों टाँगे उसके ऊपर लाडे उस लड़के के कंधो पर थी जो उसकी छूट पर अपने दमदार लैंड से झटके पर झटके दिए जा रहा था.

"ले और ले मेरी raand...aaj तेरी साडी गर्मी निकाल दूँगा." लड़के ने ज़ोर का झटका मारते होते कहा और फिर से उसकी छूट को बजने लगा.

"आअह्ह्ह बहुत मज़ा आ रहा है vickyy...sach कहती हु इन दो सालो में एक दिन भी इतना मज़ा नहीं आया मुझे. उस साले हिजड़े में इतना डैम भी नहीं है की मेरी छूट की आग को बुझा sake...aaahhhhh uffff...uska लुंड तो तुम्हारे लुंड का आधा hi है vicky....aaahhhh....badi मुश्किल से ये दो साल काटे हैं मैंने." औरत मज़े से आहे भरते हुए बोले जा रही थी.

"तो अपने पति के पास से चले आना था न मेरी raand....dubai में साले को अकेला रहने deti...main भी तो तेरी इस मस्त छूट के लिए यहाँ तड़प रहा था." विक्की नाम के लड़के ने एक हाथ से औरत के राइट बूब पर ज़ोर से थप्पड़ मारा जिससे उसका वो बूब बुरी तरह हिचकोले खा गया.

"आह्ह्ह्हह कैसे आ जाती मेरी jaan...wo नामर्द साला मुझे छोड़ता hi नहीं tha...kah रहा था की दो साल बाद साथ में hi चलेंगे ghar...lekin तुम क्यों यहाँ तड़प रहे the...kya मेरी माँ ने तुम्हे मज़ा नहीं दिया??" औरत ने अपने नीचे वाले होठ को दांतो में दबाते हुए कहा और मुस्कुरा उठी.

"ारी तेरी माँ तो मुझे मज़ा देने की पूरी कोशिश करती है kiran...magar तू तो जानती है की एक जवान औरत में और एक बुद्धि औरत में फर्क होता hai...uski छूट तो अब चुद चुद के भोसड़ा बन गयी है इस लिए अब मुझे इतना मज़ा नहीं aata...waise एक बात तो है की तेरी माँ ने मुझे खुश रखने के लिए अपनी गांड भी मारने को देती है मगर अब तो उसका भी भोसड़ा बन गया है." विक्की ने कहा और औरत की छूट से अपना लुंड निकाल कर औरत को पलटा दिया. उसके पलटते hi वो औरत कुटिया के पोज़ में आ गयी.

कुटिया के पोज़ में जैसे hi वो आयी तो विक्की ने पीछे से उसकी छूट में फिर से अपना लुंड एक hi झटके में दाल दिया. जिससे किरण नाम की उस औरत की सिसकी निकल गयी. विक्की ने एक हाथ बढ़ा कर उसके बालो को मुट्ठी में जकड लिया और किसी घोड़े की तरह सवारी सा करने लगा.

"आअह्हह्ह्ह्ह ऐसे hi विखयीय हई री बहुत मज़ा आ रहा hai...kaash तुम मेरे पति होते vickyy...sach में दिन रात तुमसे चुदवाती मैं." किरण मज़े से सिसकारियां भरते हुए बोली.

"मैं तो तेरा पति जैसा hi हु मेरी रांड. दो साल पहले तक तेरे बाप का दर रहता था. इस लिए छुप छुप के तुझे छोड़ता था. तेरा बाप साला शराबी मुझे नौकर hi समझता था. भला वो कैसे ये चाहता की उसकी बेटी की शादी उसके एक मामूली नौकर से हो जाये.?" विक्की ने किरण के बालो को ज़ोर से झटका दिया तो किरण को दर्द का अहसास हुआ मगर ये दर्द भी मनो मज़ा hi दे रहा था उसे.

"मेरा बाप ऐसा नहीं था विक्की ये तुम भी जानते ho...wo तो एक शरीफ इंसान था जो कभी शराब की तरफ देखता भी नहीं था. आअह्हह्ह्ह्ह ufffff....magar फिर बुरा वक्त आया और उसने गलत लोगो की सांगत कर ली. उन लोगो ने मेरे शरीफ बाप को शराब पिने का ऐसा चस्का लगाया की मेरा बाप दिन रात शराब में hi डूबा रहने laga...aaaahhh विक्की मेरा होने वाला hai...aahhhh और तेज तेज छोड़ो मुझे. अपने लुंड का पानी आज भर दो मेरी छूट में." किरण की साँसे बहुत तेज़ हो गई थी.

पुरे कमरे में सेक्स से भरी आहे और सिसकारियों का तूफ़ान चालु था. विकीय ने धक्को की रफ़्तार पहले काफी तेज़ कर दी थी. अचानक hi किरण मज़े के सातवे आसमान में पहुंच गयी. उसका जिस्म एकदम से ऐंठ सा गया. ज़ोर ज़ोर के झटके खाते हुए वो एकदम से शांत हो गयी. इधर विक्की ताबड़तोड़ धक्के लगाए जा रहा था. उसके मुख से अजीब सी हुंकार निकल रही थी. शायद वो भी झड़ने वाला था.

"अह्ह्ह्हह मैं भी अब झड़ने वाला हु किरण. तेरी छूट में मेरे लुंड का पानी अंदर तक जायेगा." विकीय हफ्ते हुए बोलै.

"जाने दो न vicky...mujhe अपने बचे की माँ बना दो. उस हिजड़े में इतना डैम नहीं है की वो मुझे कभी माँ बना सके." किरण ने पीछे मुद के देखते हुए कहा. उसकी ये बात सुन कर विक्की शॉक सा हो गया. उसके धक्के दो पल को रुके उसके बाद वो फिर से शुरू हो गया.

"सोच ले अगर उसे पता चल गया तो वो तुझे तलाक भी दे सकता है." विक्की ने मानो उसे चेताया.

"कुछ नहीं होगा मेरी जान. मैं कल hi जा रही हु अपने ससुराल. इस लिए तुम इस बात की फ़िक्र मत करो. मैं सब सम्हाल लूँगी. तुम अपना पानी मेरी छूट में hi छोड़ दो विक्की." किरण ने कहा.

किरण की बात सुन कर विक्की ने धक्के तेज़ कर दिए. कुछ hi देर में उसके लुंड से पिचकारियां निकलने लगी जो किरण की छूट में अंदर तक जा रही थी. ढेर सारा पानी किरण की छूट में लबालब भर गया. विक्की झड़ने के बाद किरण के ऊपर hi झुक कर ज़ोर ज़ोर से हाफने लगा था. कुछ देर तक दोनों ऐसे hi रहे फिर विक्की ने किरण की छूट से अपना मुरझाया हुवा लुंड निकाल लिया और बीएड पर एक तरफ लेट गया. किरण भी पेट के पल लेट गयी थी. उसकी छूट से सफ़ेद पानी रिसने लगा था.

रात में विक्की ने किरण को एक बार और छोड़ा उसके बाद दोनों एक दूसरे से लिपट कर सो गए. कमरे के दरवाजे के बाहर कड़ी किरण की माँ अंदर का तूफ़ान शांत होते hi अपने कमरे की तरफ चल दी थी. उसके चेहरे पर अजीब सी खुमारी छायी थी.

(Friends...aap सब लोग सोच रहे होंगे की बिना कोई इंट्रो दिए मैंने ये क्या गरमा गरम सन चिपका दिया है. सो don't वोर्री अबाउट आईटी. चलो इंट्रो दिए देता हु)



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MAHESH PANDEY......(Mere pita, inki age 48 saal hai. Zameeno me kheti baadi karte hain. Hamare paas lagbhag 20 ekad zameen hai jisme kheti baadi hoti hai aur usi se hamara kharcha chalta hai. Aay ka saadhan bhi yahi hai.



रेणुका PANDEY......(Meri माँ, इनकी आगे 45 साल है. ये एक घरेलु महिला हैं. थोड़ा बहुत सिलाई भी करती हैं. दिखने में काफी सुन्दर हैं. रंगत गोरी है और जिस्म पर ज्यादा मोटापा वाली कोई बात नहीं है.)

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कुसुम PANDEY......(Meri बड़ी बहन, इनकी आगे 27 साल है. इनकी अभी तक शादी नहीं हुयी है. स्टडी सिर्फ 12तह तक hi की है. इसके आगे पिता जी ने पढ़ाया hi नहीं था. ये बिलकुल मेरी माँ पर गयी हैं. स्वभाव में थोड़ी गंभीरता है. मुझसे बहुत लगाव रखती हैं.)



विकास PANDEY(Vicky)........(Main 25 साल का एक अच्छा खासा जवान लड़का हु और मैं प्रेजेंट में दिल्ली में रह रहा हु. दिल्ली मेरा होमटाउन नहीं है बल्कि मैं यहाँ पर नौकरी करता हु. नौकरी करने के लिए मुझे मेरे पिता जी ने कहा नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बहुत ख़ास कारण है जो स्टोरी में hi आगे बताउगा. स्टडी में मैंने बीएससी किया है.)

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प्रिय PANDEY......(Meri दूसरी बहन, ये मुझसे छोटी है. इसकी आगे 23 साल है. ये भी देखने में मेरी माँ की तरह hi सुन्दर है. इसने भी 12तह तक स्टडी की है.)

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पूजा PANDEY......(Meri सबसे छोटी बहन. ये और प्रिय दोनों hi जुड़वाँ हैं. ये प्रिय से सिर्फ 10 मिनट छोटी है. इसने भी 12तह तक स्टडी की है. दिखने में दोनों जुड़वाँ बहने शामे hi लगती हैं. दोनों में बड़ा गजब का ताल मेल रहता है. दोनों का हर काम साथ में hi होता है. इन दोनों का hi स्वभाव थोड़ा चुलबुलापन वाला है. मेरे लिए ये दोनों मेरी परियां हैं.)

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भारत BENIWAL.......(Mera मालिक, प्रेजेंट में मैं इन्ही के यहाँ रहता हु. भारत बेनीवाल 50 साल की आगे का आदमी था. दिल्ली के करोल बाघ में इसका अच्छा खासा बिज़नेस था और प्रॉपर्टी भी काफी थी. मगर शराब की लत ने मानो सब कुछ बर्बाद कर दिया. एक दिन इसी शराब की वजह से ये शख्स भगवन को प्यारा हो गया.)

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दाक्षीदा BENIWAL.......(Mere मालिक की बीवी. 47 साल की मालदार औरत. देखने में सुन्दर है और फिगर भी शानदार है. इसको एक बेटी है. एक बच्चा और हुवा था मगर वो ज़िंदा न रह सका था. उसके बाद कोई और बच्चा नहीं हुआ इसके. पति की शराब की लत की वजह से बेहद परेशां और दुखी रहती थी. हर रोज़ इसका पति शराब पि कर इसे और इसकी बेटी को बुरी तरह मारता था. उस वक्त अगर मैं यहाँ न होता तो शायद स्टोरी कुछ और hi होती. ये किस्सा भी आगे बताउगा.)

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किरण BENIWAL........(Mere maalik/Maalkin की इकलौती बेटी. आगे 27 saal..madmast कर देने वाला जिस्म. शुरू से hi दिलफेंक थी ये. मगर जब से बाप को शराब की लत लगी थी तब से मानो दोनों माँ बेटी का जीना मुहाल हो गया था. दो साल पहले इसकी शादी हुयी थी. इसका पति दुबई में रहता है. उसका नाम अमित बंसल है. मेरे साथ इन दोनों माँ बेटियों का सेक्स रिलेशन कैसे शुरू हुआ ये स्टोरी में आगे बताउगा.)

(सो friends....ye था इंट्रो. बाकी के जो भी करैक्टर आएंगे उनका इंट्रो उसी टाइम दूँगा)

फ्रेंड्स ये मेरी फर्स्ट स्टोरी है एंड मुझे लिखने का कोई अनुभव नहीं है सो आप सब भाई लोग मुझे गाइड करते रहना.....
 
सब कुछ जायज़ है...

अपडेट = 02


रात के किसी पहर मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मुझे हिला रहा है. ज़बरदस्त नींद आयी हुयी थी मुझे लेकिन किसी के द्वारा हिलाये जाने पर आखिर मेरी नींद खुल hi गयी. मैंने उनीदी आँखों से ऊपर की तरफ देखा.

कमरे में नाईट बल्ब का प्रकाश था. मैंने देखा की मेरे चेहरे के पास hi कोई अपना चेहरा झुकाये हुए मुझे अपने एक हाथ से बड़ी सावधानी से हिलाये जा रहा था. आँखों के सामने जब वो चेहरा साफ़ नज़र आया तो मैंने देखा की वो कोई और नहीं बल्कि किरण की माँ दक्षिणा थी.

मैं जब किरण के साथ एक hi बीएड पर सेक्स करने के बाद सोया था तो हम दोनों hi एक दूसरे की तरफ मुख कर के सोये थे. मगर अब पोजीशन चेंज थी. मैंने चेहरा घुमा कर देखा तो किरण मेरे लेफ्ट साइड में दूसरी तरफ करवट लिए पड़ी हुयी थी.

"खुद तो मज़े ले कर सो रहे हो और मुझे यु hi तड़पता छोड़ diya...kya किरण के आने से तुम्हे मेरा ज़रा भी ख़याल नहीं आया विक्की.?" किरण की माँ ने मेरे कान के पास झुक कर धीरे से शिकायत भरे लहजे में कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा.

"आज hi बस की तो बात थी yaar...kal तो वैसे भी किरण को चले जाना था. इस लिए सोचा की इसकी प्यास बुझा दू आज रात. तुम्हारे साथ तो हर दिन और हर रात hi सोता हु." मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो दक्षिणा भी मुस्कुराई.

"हाँ तो आदत पड़ी हुयी है तो कैसे एक भी रात खाली जाएगी.? अब चलो बाते न बनाओ और मेरी भी छूट की आग को शांत करो. सोचा तो मैंने भी यही था की आज की रात hi बस की तो बात है मगर ये निगोड़ी छूट कहा मेरा कहा मानती है." दक्षिणा ने अपने एक हाथ से अपनी छूट को ज़ोर से मसल दिया. मेरी नज़र उसके चेहरे से हटी तो मैंने देखा की दक्षिणा इस वक्त पूरी तरह नंगी hi मेरे पास आयी थी.

"अब कही जाने की क्या जरुरत है yaar..tum कपडे तो उतार के hi आयी ho..idhar मैं भी नंगा hi हु. सो आ जाओ यही पर तुम्हारी छूट की आग को शांत कर देता हु." मैंने उसके झूलते हुए बड़े बड़े बूब्स में से एक को पकड़ कर मसल दिया. मेरे ऐसा करते hi दक्षिणा की सिसकी निकल गयी.

"Shhhh...aaahhhh यहाँ नहीं मेरे राजा. यहाँ पर किरण जाग जाएगी मेरी आवाज़े सुन कर. तुम तो जानते हो की सेक्स करते वक्त मेरे मुख से ज़ोर ज़ोर की आवाज़े निकलने लगती हैं." दक्षिणा ने धीरे से कहा.

"तो क्या हुआ yaar...kiran को तो सब पता hi है. फिर उसके सामने यही पर करने में क्या प्रॉब्लम hai...Meri कितनी ख्वाहिश थी की मैं तुम दोनों माँ बेटी को एक साथ एक hi बीएड पर छोड़ू मगर तुम पता नहीं क्यों इस बात के लिए राज़ी नहीं होती.?" मैंने इस बार रूठने वाले लहजे में कहा तो दक्षिणा संजीदा सी हो गयी.

वो एकदम से सीढ़ी हुयी और फिर बिना कुछ कहे कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ चली. मैं समझ गया की वो मुझसे नाराज़ हो गयी है. एक यही बात थी जिसके लिए वो हमेशा मुझे इंकार कर देती थी. जब की बाकी हर बात मान लेती थी वो. उसका कहना था की वो दोनों माँ बेटी कोई रंडियां नहीं हैं. वो भी शरीफ घर की औरते हैं. दोनों माँ बेटी को भले hi एक दूसरे का पता था मगर एक साथ करने में उसे प्रॉब्लम थी. कहती थी की माँ बेटी के बीच की मर्यादा और मान सम्मान को वो हमेशा बनाये रखना चाहती है.

हर बार की तरह इस बार भी मुझे उसकी इस नाराज़गी को दूर करने के लिए खुद hi उसके पास जाना hi था. सो मैं बीएड से बड़े आहिस्ता से उठा और फिर कमरे से बाहर आ कर दक्षिणा के कमरे की तरफ बढ़ चला.

दक्षिणा के कमरे में जब मैं पंहुचा तो दक्षिणा अपने बीएड पर लेती हुयी थी. उसके जिस्म पर अब साड़ी ब्लॉउज था. यानी यहाँ आते hi उसने अपने कपडे पहन लिए थे. मैं मुस्कुराते हुए उसके पास पंहुचा.

बीएड पर उसके बगल से लेट कर मैं उसे बड़े प्यार से मानाने लगा. हर बार की तरह मेरे मानाने पर दक्षिणा की नाराज़गी दूर हो गयी. वो मुझसे ज्यादा देर तक नाराज़ नहीं रह पाती थी. इस बात का वो हमेशा ज़िकर करती थी की वो मुझसे ज्यादा देर तक नाराज़ क्यों नहीं रह पाती.?

दक्षिणा की जब नाराज़गी दूर हो गयी तो वो जंगली बिल्ली की तरह मुझ पर झपट पड़ी. उसने खुद hi तेज़ी से अपने सारे कपडे उतार दिए और फिर मेरे ऊपर आ कर मेरे होठो पर टूट पड़ी. दक्षिणा में सबसे अच्छी बात ये थी की वो हर काम बड़े तरीके से करती थी. उसने मुझसे बहुतो बार कहा था की वो मेरे बिना जी नहीं पायेगी. वैसे भी बेटी की शादी हो जाने के बाद वो अकेली hi थी. वो इस बात को भी जानती थी की मैं हमेशा उसके पास नहीं रहुगा. एक दिन अपने घर लौट जाउगा. उसे मेरे बारे में सब कुछ पता था. पिछले पांच साल से मैं यही था. इन पांच सालो में मैं कभी अपने गांव नहीं गया और न hi घर वालो से कभी कोई बात किया था.

मेरे होठो को जी भर के चूमने चाटने के बाद दक्षिणा ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और मेरी आँखों में बड़ी मोहब्बत से देखा. मैं उसके इस तरह देखने से हमेशा अपनी नज़रे चुरा लेता था. मैं जानता था की वो मुझे बहुत चाहती hai...uski मोहब्बत में कोई छल कपट नहीं था. मगर मैं ये नहीं चाहता था की मैं भी उसकी मोहब्बत में गिरफ्तार हो जाओ और उससे ऐसी मोहब्बत करने लग जाओ की फिर उसके बिना जी hi न पाउ. वो 47 साल की एक अधेड़ औरत थी और मैं 25 साल का जवान लड़का था. वो मेरी माँ की उम्र की थी और उसका मेरा कोई मेल नहीं था.

दक्षिणा ने कुछ देर मेरी तरफ देखा और फिर झुक कर मेरी नंगी छाती पर चूमते हुए नीचे की तरफ जाने लगी. उसकी इस हरकत से मुझ पर सुरूर सा छाने लगा और मज़े से मेरी आँखे बंद होने लगी.

छाती से होते हुए वो मेरी नाभि के पास रुकी और मेरी नाभि में अपनी जीभ दाल कर उसे कुरेदने लगी. मुझे बेहद गुदगुदी हो रही थी और मैं मज़े के सातवे आसमान में पंहुचा जा रहा था. मेरे दोनों हाथ अपने आप hi दक्षिणा के सर पर आ गए और उसके सर को दबाने लगे.

काफी देर तक दक्षिणा मेरी नाभि पर अपनी जीभ से कुरेदती रही. मैं पागल सा हुआ जा रहा था. मेरी साँसे उखड रही थी. जो काम मुझे दक्षिणा के साथ करना चाहिए था वो काम दक्षिणा खुद hi मेरे साथ कर रही थी. उसका हमेशा का यही नियम था. वो खुद hi मेरे ऊपर आ जाती और फिर शुरू हो जाती थी.

आखिर वो पल आ hi गया जब दक्षिणा ने मेरी नाभि से अपनी जीभ निकाल ली और फिर नीचे सरकते हुए मेरे अकड़े हुए लुंड के पास पहुंच गयी. मेरा लुंड बुरी तरह तन्नाया हुआ था. दक्षिणा ने उसे अपने एक हाथ की मुट्ठी में बड़ी नज़ाकत से पकड़ा और फिर मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई. मेरी तो आँखे मज़े में बंद थी.

तभी मुझे अपने लुंड पर ऐसा महसूस हुआ जैसे वो किसी लजीज़ और हलकी गर्म सी चीज़ से छू गया हो. मुझे समझते देर न लगी की दक्षिणा ने मेरे लुंड को अपने मुँह में भर लिया है और अपनी जीभ की नोक से अंदर hi अंदर मेरे लुंड के सुपाड़ी के छेड़ को कुरेदने लगी है. एक बार फिर से मैं मज़े की दुनिया में जाने लगा. मेरी रगो में दौड़ते हए खून में जैसे एकाएक hi उबाल सा आ गया था.

कुछ देर मेरे सुपाड़ी के छेड़ को अपनी जीभ से कुरेदने के बाद दक्षिणा मेरे लुंड को किसी लोल्लयपोप की तरह चूसने लगी. इस काम में उसे महारत हासिल थी. वो इतना तरीके से लुंड को चूसती थी की थोड़ी hi देर में मुझे ऐसा लगने लगता था की अब मैं गया.

मेरा लुंड तो पहले से hi बुरी तरह तन्नाया हुआ था और अब दक्षिणा के इस तरह चौपा लगाने से और भी ज्यादा फूलने लगा था और मुझे अब उसमे हल्का हल्का दर्द का एहसास होने लगा था. मेरे मुख से मज़े में डूबी सिसकारियां निकल रही थी. दक्षिणा ने कुछ देर तक और मेरे लुंड को चूसा उसके बाद उसने उसे अपने मुख से निकाल दिया.

मैं जानता था की अब वो मेरे लुंड को अपनी छूट में दाल कर उठक बैठक लगाएगी. ऐसा काम hi होता था की शुरुआत मुझे करनी पड़े. शुरुआत का सारा प्रोसेस दक्षिणा खुद hi करती थी. मुझे आराम से लेते रहने का बोल कर वो खुद hi अपने काम में लग जाती थी. पता नहीं उसे ऐसा करने में क्या मज़ा मिलता था.

मैंने महसूस किया की मेरा लुंड किसी गरम भट्ठी में अंदर तक समता चला गया है और फिर वही हुआ जिसका अभी मैंने ज़िकर किया था. दक्षिणा एक रिदम पर उठक बैठक लगाने लगी थी. वो ज़ोर ज़ोर से मेरे लुंड पर बैठती थी. जिससे थाप थाप की आवाज़े आने लगती थी. उसकी भारी गांड मेरे अंडकोस और जांघो पर पड़ती थी.

काफी देर तक दक्षिणा उठक बैठक लगाती रही. फिर जब वो थक गयी तो मेरे ऊपर लेट गयी. उसकी छूट में मेरा लुंड अंदर तक अभी भी समाया हुआ था. यही तक उसकी हद thi...yaha से मेरा काम शुरू होता था. शुरू में वो खुद hi अपने मन का करती थी उसके बाद वो कमान मुझे पकड़ा देती थी.

मेरे ऊपर लेती हुयी दक्षिणा कुछ देर तक हाफति रही उसके बाद वो उठ गयी. उसकी छूट से मेरा लुंड निकल गया. उसके उठते hi मैं भी उठ गया. अब लेटने की बारी दक्षिणा की थी सो वो लेट गयी और अपनी दोनों टांगो को दोनों तरफ फैला लिया उसने.

मैंने उसकी टांगो के बीच आ कर अपने लुंड को उसकी छूट के मुहाने पर सेट किया और फिर एक hi झटके में पूरा का पूरा लुंड अंदर तक पेल दिया. दक्षिणा के मुख से ज़ोर की सिसकी नकली. उसने अपने दोनों हाथो से अपने दोनों बड़े बड़े बूब्स को पकड़ लिया और उन्हें बुरी तरह मसलने लगी.

"आअह्ह्ह्हह vickyy....aise hi ज़ोर ज़ोर से छोड़ो मुझे. फाड़ डालो इस निगोड़ी छूट को. बहुत तड़पाती है मुझे." मेरे धक्का लगाने के साथ hi दक्षिणा ने आहे भरते हुए कहा तो मैं पूरी रफ़्तार से धक्के लगाने लगा. उसकी छूट में मेरा लुंड बहुत आसानी से अंदर बाहर हो रहा था. उसकी छूट ढीली हो चुकी थी जो की मेरे hi द्वारा हुयी थी और सच तो ये था की दक्षिणा पर ये सेक्स की आग भी मेरे hi द्वारा लगाई गयी थी.

काफी देर तक मैं उसी पोजीशन में धक्के लगता रहा. पुरे कमरे में दक्षिणा की सिसकारियां और आहे तेज़ तेज़ गूँज रही थी. थोड़ी देर बाद दक्षिणा के hi कहने पर मैंने अपना लुंड उसकी छूट से निकाल लिया. दक्षिणा ने अपना एक हाथ बढ़ा कर मेरे लुंड को पकड़ा और उसे खुद hi अपनी गांड के मुहाने पर सेट कर दिया. उसे पता था की मुझे अब उसकी छूट में पहले जैसा मज़ा नहीं आता था. इस लिए उसने अपनी कोरी गांड मेरे हवाले कर दी थी.

करीब आधे घंटे तक हमारा ये चुदाई कार्यक्रम चला उसके बाद मैं दक्षिणा की गांड में hi अपने लुंड का पानी निकाल कर उसके बगल से लेट गया. दक्षिणा के चेहरे पर संतुस्ती के भाव थे. वो मेरे सीने पर छुपक कर मेरे होठो पर किश कर रही थी. कुछ देर ऐसे hi चलता रहा उसके बाद दक्षिणा वैसी hi हालत में सो गयी. मगर मुझे अब नींद नहीं आ रही थी. जबकि आज की रात मैं तीन बार सेक्स कर चूका था. पहली नींद टूट जाने के बाद मुझे जल्दी नींद hi नहीं आती थी.

छत के बीचो बीच घूम रहे पंखे पर मेरी आँखे तिकी हुयी थी और मैं किसी खयालो में गम सा होता चला जा रहा था. पांच साल से मैं यहाँ था. घर से निकाल दिए जाने के बाद मैं बहुत दुखी हुवा था. मन में भयंकर तूफ़ान चल रहा था. ऐसा लग रहा था की अपनी लाइफ को एक hi पल में थे एन्ड कर दू मगर मेरी किस्मत में तो अभी कुछ और hi लिखा हुआ था जिसकी वजह से मैं अपनी लाइफ को थे एन्ड न कर सका था.

घर से खाली हाथ hi निकला था. कुछ भी नहीं था मेरे पास. जिसम में जो कपडे थे वही बस पहने मैं जाने कहा कहा से होता हुआ रेलवे स्टेशन आ पंहुचा था. रेलवे स्टेशन आते hi मुझे ध्यान आया था की ये मैं कहा आ गया हु. उसके बाद मेरे मन में बस यही आया की जो भी ट्रैन मिलेगी उसी में चढ़ जाउगा और फिर कही दूर चला जाउगा.

मेरे पास ज़हर खाने तक के लिए भी पैसे नहीं the...so बिना टिकट लिए hi ट्रैन में चढ़ गया था. दोपहर के बाद साडी रात मैं ट्रैन में hi रहा. पेट में भूख का बड़ा ज़ोर का अहसास हो रहा था मगर पेट में कुछ डालने के लिए भी पैसे चाहिए थे जो की मेरे पास थे hi नहीं. भूखा प्यासा साडी रात जैसे तैसे काटी मैंने. मैं जानता था की बिना टिकट लिए ट्रैन में बैठा हु तो अगर टी आया और मुझे पकड़ लिया तो कुछ भी हो सकता था. मगर मुझे इस बात का कोई दर नहीं था. क्यों की मन दुखी था और हर पल बस एक hi ख़याल आ रहा था की अपनी लाइफ को ख़त्म कर दू. इसको भगवन का शुक्र कहु या कोई इत्तेफाक की ट्रैन के उस डिब्बे में कोई टी आया hi नहीं और मैं दूसरे दिन ट्रैन से उतर भी गया था.

मुझे नहीं पता था की ट्रैन से जहा मैं उतरा था वो कौन सी जगह थी या वो कौन सा शहर था. किसी बात का ध्यान नहीं था मुझे. उधर पेट की भूख और भी बढ़ चली थी और मैं कुछ खाने के लिए तड़पने सा लगा था.

Friends....Next अपडेट से फ्लैशबैक आएगा.
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 03

फ्लैशबैक....


मेरी आँखों में नींद का कोई नामो निशाँ नहीं था. ऐसा मेरे साथ पहली बार नहीं हो रहा था बल्कि ऐसा तो पिछले पांच सालो से हो रहा था. मेरे बगल से मेरे सीने से छुपकी दक्षिणा बड़े सुकून से सो रही थी जबकि मैं छत पर घूम तहे पंखे में खोया हुआ था.

आज से पिछले पांच साल पहले क्या हुआ ये तो आप सबको पता चलेगा hi मगर मैं आपको अपने खानदान और अपने परिवार के बारे में शुरू से बताना ज़यादा ज़रूरी समझता हु. सो let's स्टार्ट.....

हम कास्ट से ब्राह्मण थे. हमारे गांव में हर कास्ट के लोग रहते थे मगर ज़्यादातर कास्ट ब्राह्मण की hi थी. गावो में इतर कास्ट के लोग ब्राह्मण की काफी इज्जत करते हैं. ब्राह्मण हमेशा से पूज्यनीय थे. मगर ब्राह्मण में बहुत से नियम भी बने हुए थे. ये नियम किसने बनाये इसके बारे में सबके विचार अलग अलग हैं. मैं तो बस इतना जानता हु की गॉड ने सिर्फ इंसान बनाया था जो की सब के सब एक जैसे hi थे. धरती पर इंसानो ने अपने अपने मतलब के लिए जातीय बना ली और उन जातियों के लोगो के लिए कुछ नियम बना दिए.

गावो में ब्राह्मण कास्ट के लिए एक नियम या ये कहिये की एक रिवाज़ ये है की वो किसी भी लौ कास्ट की लड़की से न तो शादी कर सकते हैं और न hi अपनी लड़की की शादी उनसे कर सकते हैं. ब्राह्मण की लड़की की शादी होने के बाद अगर लड़की एक बार अपने ससुराल चली जाये और इस बीच अगर उसका पति किसी कारण से मर जाये तो फिर उस लड़की को पूरी लाइफ विधवा बन कर जीना पड़ता है. इतर लौ कास्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है. वो लोग तो बड़ी आसानी से अपनी लड़की का दूसरा ब्याह कर देते हैं. ऐसा शायद इस लिए की वो पहले से hi लौ कास्ट से ताल्लुक रखते हैं उन पर इससे क्या फर्क पड़ेगा? मगर व्राह्मिन कास्ट में इसका बड़ा तगड़ा प्रभाव पद जाता है. हमारे बुजुर्गो का कहना था की अगर कोई उंच नीच हो जाती है तो हमारा ब्राह्मण समाज हमारे घर का पानी तक नहीं पीते और उसे अपने सभ्य ब्राह्मण समाज से बाहर कर देते हैं.

मैंने अपने दादा दादी को नहीं देखा. पिता जी से hi सुना था की जब मैं सिर्फ दो साल का था तब दादा दादी बिमारी के चलते गॉड को प्यारे हो गए थे. पहले दादा जी उसके 5 महीने बाद दादी जी. गांव में हमारे पास 20 एकड़ ज़मीन थी. जिस पर मेरे पिता जी खेती बाड़ी करते थे. पांडेय परिवार में हमारे खानदान का बस हमारा hi खानदान था. वैसे तो पांडेय और भी थे मगर वो हमारे सेज खून के नहीं थे.

जब मैं कुछ बड़ा हुआ और थोड़ा वहुत जान्ने समझने लायक हुआ तो मैंने अक्सर ये बात देखि थी की हनारे घर में या गांव में किसी भी ब्राह्मण समाज के घर पर कोई ख़ास कार्यक्रम होता तो हमारे घर का कोई भी ब्यक्ति उनके घर नहीं जाता था और न hi उस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए वो लोग हमें बुलाते थे. इसकी वजह तो बहुत बाद में पता चली थी मुझे. गांव के hi लोगो से सुना था की अगर जयराम पांडेय एक लौ कास्ट की लड़की से ब्याह न करते तो आज ब्राह्मण समाज में हमारा भी उठना बैठना होता. जयराम पांडेय मेरे दादा जी का नाम था. उन्होंने एक लौ कास्ट की लड़की से ब्याह किया था. उनके घर वालो ने इसके लिए उनसे हर रिश्ता तोड़ दिया था और अपनी चल अचल संपत्ति से भी बेदखल कर दिया था.

मेरे दादा जी गोवत सर्विस में थे. घर से बड़खल कर दिए जाने के बाद वो बहुत दूर इस गांव में आ कर बस गए. इसी गांव में उन्होंने धीरे धीरे कर के 20 एकड़ ज़मीन खरीद ली और एक बढ़िया सा घर भी बनवा लिया था. कहते हैं की कोई भी ब्यक्ति अपने अतीत से भाग कर ज़्यादा दिन बचा नहीं रह सकता. यानी उसका अतीत उसके पास ज़रूर आएगा और सबको बता भी देगा की उसकी सच्चाई क्या है.

जब इस गांव के ब्राह्मण समाज को मेरे दादा जी के इस कारनामे का पता चला तो उन ब्राह्मण समाज के लोगो ने हमारे घर को और घर के लोगो को पुरे गांव के बीच तनहा कर दिया. मेरे पिता जी को इससे काफी दुःख भी हुआ और मायूसी भी हुयी. मगर वो ब्राह्मण समाज के लोगो को न मन सकते थे और न hi समझा सकते थे.

ऐसे hi दिन गुज़रते गए और दादा जी ने मेरे पिता जी की शादी कर दी. मेरे पिता जी अपने माँ बाप के अकेली hi संतान थे. शादी में थोड़ा मुश्किल तो हुयी मगर फिर आखिर शादी हो hi गयी. मेरी माँ के माता पिता भी ब्राह्मण थे. मगर उनकी गिनती ब्राह्मण कटगरी के हिसाब से 13 से भी नीचे आते थी. ब्राह्मण में 3 और 13 तक की कटगरी के ब्राह्मण अच्छे मने जाते हैं. मगर क्यों की हमारी वैल्यू दादा जी की वजह से काम थी इस लिए 3 और 13 वाला ब्राह्मण अपनी लड़की का ब्याह हमारे घर में नहीं कर सकता था.

ऐसा नहीं था की गांव में किसी से हमारा कोई बोल चाल नहीं था बल्कि वो तो वैसा hi था जैसे नॉर्मली होता है. लेकिन किसी ख़ास प्रोग्राम में कोई हमें इन्विते नहीं करता था. हमारे यहाँ अगर कोई ख़ास प्रोग्राम हो तो हम तो चाहते थे की गांव का सभी ब्राह्मण समाज हमारे घर आये और हमारे प्रोग्राम में शरीक हो. मगर ऐसा होता नहीं था. स्टार्टिंग से hi ऐसा था. मेरे पिता जी ने ब्राह्मण समाज के बीच खुद को इज्जत से इस्थापित करने की बहुत कोशिश की थी मगर वो कभी कामयाब नहीं हो सके. धीरे धीरे उन्होंने कोशिश करना hi छोड़ दिया. इतर कास्ट के लोगो से कोई प्रॉब्लम नहीं थी. वो हमारे यहाँ हर प्रोग्राम में आते रहते थे और हम भी उनके यहाँ जाते थे. मगर जो बात ब्राह्मण समाज के बीच हो कर हो सकती थी वो नहीं होती थी.

दादा जी ने काफी ज़मीने बनायी हुयी थी इस लिए उन ज़मीनो में अच्छी खासी खेती बाड़ी होती थी जिससे घर में किसी चीज की कमी नहीं हो पाती थी. हम अगर बहुत अमीर नहीं थे तो बहुत गरीब भी नहीं थे. इतर कुछ ब्राह्मण लोगो से हमारे घर के हालात अच्छे hi थे.

गांव में हमारा पक्का मकान बना हुआ था जो की दो फ्लोर का था. घर काफी बड़ा था. घर के सामने काफी लम्बी चौड़ी जगह भी थी जिसके चारो तरफ से बॉउंड्री वाल बानी हुयी थी. नीचे के फ्लोर पर आठ कमरे थे. एक किचन एक बड़ा सा हाल जहा पर बैठ कर हम सब खाना खाते थे. बाहर तरफ एक बड़ा सा हॉल था जो की बाहरी लोगो के बैठने के लिए बनाया गया था. अंदर hi दिवार से लगी हुयी सीढ़ियां थी जो ऊपर वाले फ्लोर पर जाने के लिए थी. ऊपर भी उतने hi कमरे हुए थे. एक किचन ऊपर भी था. घर के अंदर नीचे hi एक बड़ा सा आगाँ था और आगाँ के उस पार दो टॉयलेट बने हुए थे जिसमे नहाने के लिए भी था. आगाँ के दूसरे छोर पर एक छोटा सा मंदिर भी बना हुआ था.

इतने बड़े मकान में इतने सरे कमरे बहुत ज्यादा थे लेकिन फ्यूचर का सोच के hi बनाया गए थे. नीचे के फ्लोर पर hi एक मेरे माता पिता का एक कमरा था. उनके बगल वाले कमरे में मेरी बड़ी बहन कुसुम का कमरा था. जब की मेरा और मेरी दोनों जुड़वाँ बहनो का ऊपर के फ्लोर में बने कमरों में hi अलग अलग कमरा था. मेरी दोनों जुड़वाँ बहने एक hi कमरे में एक साथ hi रहती थी. उनका साथ बस टॉयलेट के वक्त hi छूटता था बाकी हर वक्त साथ hi रहती थी. मैंने कभी नहीं देखा था की उनका आपस में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ हो.

मेरी बड़ी बहन कुसुम थोड़ा गंभीर स्वभाव की थी. जब की दोनों जुड़वाँ बहने यानी प्रिय और पूजा थोड़ा नटखट और चुलबुली टाइप की थी. मेरे साथ उन दोनों की नोक झोंक चलती रहती थी. घर में पिता जी से हम सब डरते थे. मेरी माँ बहुत शांत स्वभाव की थी और हम बच्चो से बहुत प्यार करती थी. प्यार तो पिता जी भी करते थे लेकिन वो कभी दिखते नहीं थे. एक बात जरूर थी की पिता जी मेरी दोनों जुड़वाँ बहनो पर काम गुस्सा होते थे और उनकी शरारतो का मज़ा लेते रहते थे मगर ये हर वक्त नहीं होता था.

मेरे पिता जी अपने टाइम में 10तह तक पढ़े थे जब की माँ अनपढ़ थी. मैं शुरू से hi स्टडी में ठीक ठाक था. स्कूल में मेरे अच्छे मार्क्स आते थे. मेरे पिता जी मेरे अच्छे मार्क्स आने पर अपनी ख़ुशी का दिखावा नहीं करते थे. बस यही कहते की अच्छा hai...aage इससे भी अच्छा करना. गांव में 12तह तक hi स्कूल था इस लिए मेरी बहने 12तह के बाद पढ़ नहीं सकीय. गांव में लड़कियों को बाहर स्टडी करवाने पर लोग तरह तरह की बाते करने लगते थे. हम तो वैसे भी ब्राह्मण समाज से अलग थे इस लिए हम चाह कर भी ऐसा कोई काम नहीं करते थे की ब्राह्मण समाज के लोगो को कुछ उल्टा सीधा कहने का मौका मिले.

मैंने जब 12तह पास कर लिया तो मेरे पिता जी ने मुझे इसके आगे पढ़ने के लिए शहर भेज दिया था. मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ शहर में रह कर स्टडी करने लगा था. मेरी बड़ी बहन कुसुम से मेरी खूब जमती थी. वो मुझे बहुत स्नेह देती थी और मेरी हर ज़रूरत का माँ की तरह hi ख़याल रखती थी. मेरा स्वभाव ऐसा था की मैं थोड़ी देर के लिए नाराज़ रहता और फिर सबसे बोलने लगता था. मैं कभी अपने घर वालो से दूर नहीं हुआ था इस लिए जब मैं आगे की स्टडी के लिए शहर गया तो मुझे घर की बहुत याद आती. जिसकी वजह से मैं हर हप्ते गांव आ जाया करता था. शनिवार शाम को आता और फिर मंडे को सुबह फिर से चला जाता. मुझे सबसे ज़्यादा मेरी माँ और कुसुम दीदी की याद आती थी.

हम सभी बच्चो का बचपन बहुत hi हसी ख़ुशी गुज़रा था. हम आपस में खूब मस्ती करते थे. मगर ये सब पिता जी के सामने नहीं हो पता था. पिता जी के आते hi हम बच्चे भीगी बिल्ली बन जाते थे. गांव में मेरे कुछ दोस्त थे जो खुद भी बहुत अच्छे थे और वो भी ब्राह्मण कास्ट से hi थे. मेरी मेरे उन दोस्तों से तब अनबन होती थी जब उनके घर में कोई ख़ास प्रोग्राम होता और मैं उनके प्रोग्राम में शरीक नहीं हो पता था. शरीक न होने की वजह वही थी जिसका ज़िकर मैं पहले hi कर चूका हु.

गांव में कुछ तिवारी ब्राह्मण थे जिसमे से एक की बेटी को मैं स्कूल टाइम से hi बहुत पसंद करता था. वो भी मुझे बहुत पसंद करती थी. मगर हम दोनों ने एक दूसरे से इस बारे में कभी कोई बात न की थी. वो गांव की एक आम लड़की थी इस लिए वो खुद इसका इज़हार नहीं कर सकती थी और जबकि मैं इस लिए उससे नहीं कर सकता था क्यों की ब्राह्मण समाज हमें एक्सेप्ट hi नहीं करता बल्कि अगर उनको इस बात का पता चल जाता तो बहुत बड़ा हंगामा हो जाता. 12तह पास करके जब मैं आगे की स्टडी के लिए शहर जाने वाला था तब मेरी उससे इत्तेफाकन एक ख़ास मुलाकात हुयी थी. शायद उसके दिल ने उसे मजबूर कर दिया था मुझसे अपने दिल की बात बताने के लिए. उसने बहुत hi धीमे लहजे में और उदास हो कर अपने दिल की बात कही थी. उसके उस इज़हार से मैं खुश तो बहुत हुआ था मगर मेरे बस में कुछ नहीं था. मैंने भी उससे कहा था की मैं भी उसे बहुत पसंद करता हु और प्यार करता हु.

मेरे मन में उस वक्त ये विचार भी आया था की अगर हमारे घर वाले हमारी आपस में शादी नहीं कर सकते तो हम यहाँ से कही दूर जा कर शादी कर लेंगे. उसने एक बार ऐसा कहा भी था. मगर मैंने ऐसा करने से इंकार कर दिया था. मैं नहीं चाहता था की मेरी वजह से मेरे घर वालो का गांव में जीना मुहाल हो जाये. मैंने बहुत hi दुखी मन से उससे कहा था की प्यार में हासिल होना hi तो सब कुछ नहीं होता. असल मोहब्बत तो बलिदान मांगती है. हम एक दूसरे से पूरी लाइफ प्यार करेंगे मगर सिर्फ मन hi मन.

उस लड़की का नाम मेघा तिवारी था. उससे अलग होने के बाद मैं बहुत उदास रहने लगा था. घर में सब के सामने मैं खुश रहने का नाटक करता रहता था मगर अकेले में रातो को नींद नहीं आती थी. हर वक्त उसके hi बारे में सोचता और दुखी होता रहता था.

मेरी ये उदासी और मेरा ये दुःख मेरी बड़ी बहन से ज़्यादा दिन तक छुप नहीं सका था. उसने एक रात मेरे कमरे में आ कर मुझसे पूछ hi लिया. मैं उनसे अपनी कोई भी बात नहीं छुपता था लेकिन इस बात को छुपा गया था. उनके बहुत इशरार करने पर मैंने आखिर उन्हें बता hi दिया. मेरी ये छोटी सी लव स्टोरी सुन कर उन्हें भी बहुत दुःख हुआ. वो मुझे बहुत प्यार करती थी एक भाई की नज़र से. मगर वो मेरे लिए इस बारे में कुछ नहीं कर सकती थी.

उसके बाद से वो अक्सर मेरे पास आ जाती और मुझे घंटो समझती रहती और तरह तरह की बातो से मेरा दिल बहलाती. मैं नासमझ तो नहीं था लेकिन इस मामले में दिमाग का कोई ज़ोर नहीं चलता था. मेरे इस लव मटर का असर ये गए की कुसुम दीदी हर रात मेरे पास एक घंटे के लिए आती और फिर वापस नीचे अपने कमरे में चली जाती.

मैं स्टार्टिंग से hi है मुख स्वभाव का था और किसी भी बात को ज़्यादा देर तक दिल पर नहीं लिए रहता था मगर इस लव मटर ने मुझे चेंज सा कर दिया था और इसी वजह से कुसुम दीदी का मेरे करीब रहना ज़्यादा हो गया था. वो मुझे उदास नहीं देख सकती थी. जब मैं स्टडी के लिए शहर चला गया तो वो अक्सर मुझे फ़ोन करती और मेरा हाल अहवाल लेती. हमारे घर में पिता जी के अलावा मेरे और कुसुम दीदी के पास स्क्रीन टच मोबाइल था. माँ के पास कोई मोबाइल नहीं था क्यों की उनको मोबाइल की अबकड hi नहीं आती थी. जबकि मेरी दोनों जुड़वाँ बहनो के बीच एक hi मोबाइल था जिसे वो डोमो hi उसे करती थी. दीदी का स्क्रीन टच मोबाइल देख कर वो पिता जी से अक्सर कहती की ुंगे भी टच स्क्रीन मोबाइल चाहिए. पिता जी उनकी इस फरमाइश पर मुस्कुरा कर रह जाते थे.

मेरी कुसुम दीदी से फ़ोन पर अक्सर घंटो तक बाते होती. दिन में voice/video कालिंग पर और रात में मश्ग पर बाते होती थी. मेरे इस लव मटर की बात मेरे और दीदी तक hi सीमित थी. किसी तीसरे को इस बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका था. दीदी के समझने का असर मुझ पर काफी हुआ था और अब मैं उदास या दुखी नहीं रहता था. मेघा की याद तो आती थी मगर मैं उसकी याद से जल्द hi पीछा छुड़ा लेता था और अपना कोई दूसरा काम करने लग जाता था.

हर हप्ते शनिवार की शाम मैं गांव आ जाता और सबसे मिलता. मेरी माँ मुझे अपने सीने से लगा खूब प्यार करती. उनकी आँखों में आँशु आ जाते जिनगी मैं खुद अपने हाथो से पोछता और उनसे कहता की आप इस तरह मेरे लिए आँशु न बहाया करिये. मेरे घर में सब का रंग साफ़ था जिनमे मेरी माँ और मेरी तीनो बहनो का रैंड ज़्यादा साफ़ और गोरा था. मेरी माँ कहने को तो माँ थी मगर उन्हें देख कर ऐसा लगता hi नहीं था की वो हमारी माँ हैं. उनका चेहरा बहुत इन्सेन्ट था. उनकी आँखों में हमारे लिए बेपनाह चाहत थी.

गांव आने पर मैं ज़्यादातर अपने घर में hi रहता था. शहर जाने के बाद मेरा गांव के अपने दोस्तों से मिलना जुलना बगत काम हो गया था. वो अगर कभी मिलते तो मुझसे इस बात की शिकायत भी करते और मुझ पर तानो की बरसात भी करते. मैं उनकी बातो को चुप चाप सुन लेता था. मैं जब घर आ जाता तो मेरी माँ बहुत खुश हो जाती थी. मेरी कुसुम दीदी के चेहरे पर भी ख़ुशी की चमक आ जाती थी. रात में सबके सो जाने के बाद वो मेरे कमरे में आ जाती और मेरे साथ hi बीएड पर मेरे बगल से लेट जाती. हम देर रात तक दुनिया जहां की बाते करते रहते. उसके बाद दीदी अपने कमरे में चली जाती और मैं भी सो जाता था. मैं अक्सर उनसे कहता की आप मेरे साथ मेरे कमरे में hi सो जाया कीजिये. मेरी इस बात पर वो कहती की इसमें कोई प्रॉब्लम तो नहीं है लेकिन इस बात का अगर पिता जी को किस तरह से पता चल गया तो वो बहुत गुस्सा करेंगे. वो मुझसे कहती थी की उनका भी दिल करता है की वो मेरे साथ hi सो जाया करे मगर पिता जी के दर से वो ऐसा नहीं कर सकती थी.

फ्रेंड्स...

आज के लिए इतना hi...



गिव योर सुग्गेस्टियन्स & कीप सपोर्टिंग....
 
Hello एवरीवन....
एंड आल्सो सम इतर पेओप्लेस रीड थिस स्टोरी बूत इन से में किसी ने भी कमेंट नहीं किया. मैंने देखा था इन सबको मेरी इस स्टोरी को पढ़ते हुए. भाई लोग एक तो मैं वैसे hi नया हु और पहली बार कुछ लिख रहा हु सो अगर आप लोग ऐसा करेंगे तो कैसे चलेगा.?

मैं आप सब भाई लोग को फाॅर्स नहीं कर रहा किसी बात के लिए मगर ये रिक्वेस्ट करता हु की अगर आप स्टोरी पढ़ते हैं तो प्ल्ज़ दो मिनट और रुक कर कमेंट भी कर दिया करे.

मैं स्टार्टिंग में सोचा करता था की कोई राइटर स्टोरी को बीच में छोड़ कर क्यों भाग जाता है बूत अभी जाना की रियल रीज़न क्या होता है. भाई लोग मैं स्टोरी को बीच में छोड़ कर नहीं जाना चाहता. मैं पहली बार कोई स्टोरी लिख रहा हु सो आप सब भाई लोग अपने कमैंट्स से मुझे मोटीवेट करे. मेरा प्रॉमिस है सबसे की मैं ये स्टोरी एन्ड तक लिखुगा.

कीप सपोर्टिंग & ऑलवेज स्टे विथ उस.....
 
भाई अगर आप कह रहे हैं की आप पहली बार इस स्टोरी को मेरे मेंशन की वजह से देख रहे हैं तो इसका मतलब ये हुआ की मैं झूठ बोल रहा हु. चलिए आपकी बात को hi सही मान लेता हु बूत जिनका नाम मैंने मेंशन किया क्या उन सबको मैंने झूठ कह दिया?

भाई नाम तो और भी हैं जिन्हे मेंशन कर सकता hu..wo भी रियल में. बूत शायद वो भी यही कहे की मैंने पहली बार hi देखा है स्टोरी को.

छोड़िये भय मगर क्या ये बात सच नहीं है की लोग स्टोरी पढ़ने के बाद कमेंट नहीं करते?

भाई सबकी देखा देखि में मैंने भी पहली बार स्टोरी शुरू की है. मैं नहीं जनता की कैसा लिख रहा हु मैं इसी लिए सबके कमैंट्स देखता रहता हु की लोग क्या कहते हैं.

भाई एक बात कहना चाहता हु की मैं स्टोरी को बीच में लटका कर नहीं जाना चाहता. मैं पहली बार कोई स्टोरी लिख रहा हु सो इसे आधा अधूरा नहीं करना चाहता. लोग अगर कमेंट नहीं करते तो ये उनकी मर्ज़ी है मगर मैं तो लिखता रहुगा एन्ड तक.

भाई अब से ऐसी कोई बात नहीं करुगा मैं. बस अच्छा नहीं लगा था इस लिए बोल दिया था. अगर ये मेरी गलती है तो मैं सब भाई लोग से सॉरी बोलता हु...
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 04

फ्लैशबैक कंटिन्यू....

मेरे पिता जी का स्वभाव गुस्से वाला ज़रूर था मगर अंदर से वो एक बहुत hi सॉफ्ट इंसान थे. उनके स्ट्रिक्टनेस की असल वजह यही थी की हम सब बच्चे लाड प्यार से कही बिगड़ न जाये और किसी तरह के गलत रास्ते पर न जा पड़े. दूसरी वजह ये थी की गांव में ब्राह्मण समाज के बीच वैसे भी हमारा ज्यादा उठना बैठना नहीं था. इस लिए पिता जी नहीं चाहते थे की उनके लाड प्यार से उनके बच्चे किसी से कोई उल्टा सीधा काम कर बैठे जिससे ब्राह्मण समाज वालो को हमें कुछ उल्टा सीधा कहने का मौका मिले.

स्टार्टिंग में हम बच्चो को इस पाबंदी से बहुत बुरा लगता था. हलाकि पिता जी ने हमें कभी किसी बात के लिए डाटा नहीं था. हमें स्टार्टिंग से hi ऐसे संस्कार दिए गए थे की हम गांव में किसी के भी साथ कोई उल्टा सीधा काम नहीं करते थे. जब कुछ बड़े हुए और जान्ने समझने लायक हुए तो हमें पिता जी की बाते समझ में आने लगी. उसके बाद हम सब भी वैसा hi करने लगे जिससे की हमारी वजह से पिता जी को कोई कुछ कह न सके.

वैसे सोचने वाली बात ये भी थी की हम सब तो अपनी तरफ से सही राह पर hi चलने की कोशिश करते रहते थे और कभी किसी को हमें कुछ कहने का मौका hi नहीं मिलता था. मगर जो इतर ब्राह्मण थे उनके घरो के बच्चो के गांव में आये दिन कई तरह के चर्चे सुनने को मिलते रहते थे. मेरी माँ हमेशा पिता जी से कहती की हमारे घर का तो ये लोग पानी तक नहीं पिटे मगर जैसी करतूत इनके घरो के बच्चे करते हैं तो क्या उसको कोई नहीं देखता.? दुसरो पर ऊँगली उठाने में बहुत मज़ा आता है मगर इन लोगो पर कोई ऊँगली क्यों नहीं उठता.? माँ की बात अपनी जगह सही थी पर पिता जी कुछ नहीं कह पाते थे. जानते समझते वो सब कुछ थे और देखते सुनते भी बहुत कुछ थे मगर किसी से कहने में झिझक होती थी. ऐसा इस लिए क्यों की वो सब एक साथ थे और हम अकेले.

इतर लौ कास्ट के लोग दबी जुबां में मेरे पिता जी से उनके बारे में हर तरह की बाते बताते थे और उन्हें बुरा भला भी कहते थे. इतर लौ कास्ट के लोग बाकी ब्राह्मण समाज के लोगो से ज़्यादा हमारी इज्जत करते थे और हमारे लिए किसी भी टाइम कुछ भी करने को तैयार रहते थे. इस बात से बाकी के ब्राह्मण हमसे जलते भी थे और इस टाक में रहते थे की हमें सुनाने का कोई उन्हें मौका मिले. मेरे पिता जी की एक hi सोच थी जिस पर वो ज़्यादा ज़ोर देते थे और वो ये की अपनी नीयत हमेशा साफ़ रखो और अपने रास्ते पर hi चलो. किसी से किसी की बुराई न करो. जब हम और हमारा काम अपनी जगह सही रहेगा तो कोई हमें कुछ कह hi नहीं पायेगा.

गांव में हमारे लिए भले hi इस तरह का माहौल था मगर हम उनसे ज़्यादा खुश रहते थे. हलाकि इंसान की लाइफ में कोई न कोई दुःख भी बना hi रहता है. हम घर की आर्थिक सिचुएशन से सुखी थे. हमें किसी चीज़ की कमी नहीं थी और न hi हमें किसी चीज़ के लिए किसी के सामने अपना हाथ फ़ैलाने की ज़रूरत पड़ती थी. मगर ये ज़रूर दुःख था की बाकी ब्रह्मिनो की तरह ख़ास मौको पर हमें वो ब्राह्मण समाज बुलाता नहीं था. वक्त के साथ साथ एक दुःख और भी शामिल हो गया था हमारी लाइफ में और वो ये की मेरी बड़ी बहन कुसुम दीदी अब जवान हो चुकी थी. उनकी शादी की चिंता का दुःख सताने लगा था पिता जी को. ऐसा नहीं था की हमें कुसुम दीदी के लिए कोई रिश्ता नहीं मिलता tha...wo तो मिलता था मगर कही पर बात पक्की नहीं हो पति थी. गांव के बाकी ब्रह्मिनो को जाने कहा से इस बात का पता चल जाता और फिर वो हमारे द्वारा तलाश किये गए रिश्ते पर ऐसा जादू कर देते की फिर वो रिश्ता जुड़ नहीं पता था बल्कि टूट hi जाता था.

गांव में 18 साल की लड़की हुयी तो उसकी शादी कर दी जाती थी. अगर कोई लड़की 18 से ज़्यादा की उम्र की होने लगी तो लोग तरह तरह की बाते करने लगते थे. मेरी बड़ी बहन कुसुम दीदी 18 से बहुत ऊपर हो चुकी थी. कुसुम दीदी का स्वभाव स्टार्टिंग से hi गंभीर था और उनके लिए शादी के बार बार रिश्ते टूट जाने की वजह से वो और भी ज़्यादा गंभीर रहने लगी थी. मैं सोचा करता था की आज के ज़माने में भी लोगो की मानसिकता नहीं बदली.

मेरी दीदी को संसार का कोई भी लड़का अगर देखता तो वो उनकी सुंदरता से प्रभावित हुए बिना न रहता. मगर इसके बावजूद ये उनकी खराब किस्मत hi थी की हर बार उनके लिए तलाश किया गया रिश्ता टूट जाता था. मुझे इस बात से बहुत बुरा लगता था. मैं अपनी दीदी का मुरझाया हुआ चेहरा देखता तो मेरा दिल तड़प कर रह जाता था. मैं हमेशा सोचता की काश मेरे बस में होता तो मैं अपनी दीदी के लिए आसमान से कोई ऐसा राज कुमार ले आता जो मेरी दीदी को जी जान से प्यार करे और उनको अपनी पलकों पर बिठा कर रखे. मगर ये तो बस मैं सोचता hi बस tha...aisa होना तो शायद पॉसिबल hi नहीं था.

मेरी दोनों जुड़वाँ बहने नटखट शरारती भले hi थी मगर उनको सिचुएशन की गंभीरता का भी ख़याल था. लेकिन वो इस माहौल में भी शरारते कर कर के सबका मन बहलाती रहती थी. वो दोनों पिता जी के ज़्यादा करीब थी. उन दोनों को पिता जी से बात करने में कोई झिझक या दर नहीं लगता था. वो कभी कभी पिता जी से ऐसी बाते कर डालती थी की पिता जी आश्चर्य से उनकी तरफ देखते रह जाते थे. छोटा मुँह बड़ी बात वाली तर्ज़ पर.

दीदी की शादी के लिए हम सब चिंतित थे. माँ ने पिता जी से कई बार यहाँ तक कहा था की हम इस गांव को छोड़ कर शहर चले जाते हैं. शहर में hi कोई अच्छा सा रिश्ता ढूंढ कर कुसुम की शादी कर देंगे. मगर पिता जी माँ की इस बात को मानने से साफ़ इंकार कर देते थे. उनका कहना था की वो इसी गांव में रह कर और सबकी नज़रो के सामने अपनी बेटियों का ब्याह करेंगे. वो दिखाना चाहते थे की बाकी ब्रह्मिनो के बुरे अरमानो को कुचलते हुए वो कैसे अपनी बेटियों का ब्याह करते हैं. उनकी वजह से वो कायरो की तरह इस गांव से कही नहीं जाना चाहते थे.

ऐसे hi दिन गुज़र रहे थे. हम सब बाकी हर चीज़ से खुश थे, बस दीदी की शादी के लिए hi परेशां थे. मैं हमेशा अपनी कुसुम दीदी के आस पास hi रहता और उनके मुरझाये हुए चेहरे को ताजे खिले गुलाब की तरह खिलाये रखने और महकाये रखने की कोशिश में लगा रहता. कुसुम दीदी मेरे ऐसा करने पर मेरे सामने बहुत ज़्यादा खुश होने का दिखावा करती मगर अकेले में मैं जानता था की वो फिर से उदास हो जाती थी. मुझे समझ नहीं आता था की मैं दीदी के लिए पल भर में ऐसा क्या कर दालु की उनका हर दुःख दूर हो जाये.

जब मैं शहर में रहने लगा तो दीदी की बहुत याद आती और मैं सोचता की वो फिर से मुरझाई हुयी रहती होंगी. मैं हर दिन उनसे घंटो फ़ोन पर बाते करता और रात में देर रात तक उनसे मश्ग में बाते करता. वो मुझे समझती और मैं उन्हें. वो मुझे इस बात के लिए समझती की मैं मेघा की याद में खुद को ज़्यादा दुखी न राखु और लाइफ में आगे बधु. जब की मैं उन्हें समझाता की एक दिन सब कुछ अच्छा हो जायेगा और आप इन बातो से खुद को उदास या दुखी न रखा करे. कमाल की बात थी के हम दोनों hi भाई बहन एक दूसरे को समझते थे जबकि शायद समझ कोई नहीं रहा था. बस एक दूसरे का दिल रखने के लिए एक दूसरे के सामने खुश दिखने लगते थे.

ऐसे hi तीन साल गुज़र गए और मैंने बीएससी कम्पलीट कर लिया था. छुट्टियों में मैं घर आ गया था. घर में सिर्फ मेरा hi बर्थडे मनाया जाता था. कुसुम दीदी का पहले बर्थडे मनाया जाता था. मगर जब वो जान्ने समझने लायक हुयी तो उन्होंने माँ को इसके लिए मन कर दिया. जब उन्होंने मन कर दिया तो माँ ने मेरी दोनों जुड़वाँ बहनो का भी जन्मदिन नहीं मनाया कभी. इसके लिए मेरी वो दोनों नटखट बहने झगड़ा भी करती थी और सबसे ज़्यादा मुझसे नाराज़ होती थी क्योकि मेरा बर्थडे पिता जी अच्छे से hi मानते थे.

छुट्टियों में जब मैं घर आ गया तो मैं खेती बाड़ी में पिता जी का भी हाथ बताता. हलाकि वो मुझसे इसके लिए मन करते रहते थे मगर मुझे अच्छा नहीं लगता था की मेरे पिता जी अकेले खेतो में खून पसीना बहाये. वैसे तो हमारे खेतो में इतर लौ कास्ट के चार चार मजदूर काम करने के लिए लगे रहते थे. मगर पिता जी खुद भी उनके साथ लगे रहते थे. उनका कहना था की काम करते रहने से इंसान का जिसम तंदुरुस्त रहता है और उसे जल्दी कोई बिमारी नहीं लगती. उनकी बात सच में सही थी क्यों की वो बहुत काम hi बीमार पड़ते थे. मेरे घर में सबसे ज़्यादा मेरी दोनों जुड़वाँ बहने hi बीमार पड़ती थी. एक बीमार होती तो दूसरी भी बीमार हो जाती थी. उन दोनों का कनेक्शन भी बड़ा अजीब था.

दिन में मैं खेतो पर पिता जी के साथ काम में उनका हाथ बताता और शाम को घर आ जाता. रात को खाना पीना करने के बाद मैं ऊपर वाले फ्लोर में अपने कमरे में सोने के लिए चला जाता. जब माँ पिता जी सो जाते तो कुसुम दीदी चुप चाप मेरे कमरे में आ जाती. उनके लिए मेरे कमरे का दरवाजा खुला hi रहता था अंदर से. मैं खुद भी उनके आने का बड़ी शिद्दत से इंतज़ार करता था.

कुसुम दीदी के आने के बाद हम दोनों देर रात तक दुनिया जहां की बाते करते. फिर जब वो अपने कमरे में जाने लगती तो मैं फिर से यही कहता की आज आप मेरे पास hi सो जाइये. मगर हर बार की तरह दीदी मुझसे वैसा hi बोल कर अपने कमरे में चली जाती और इधर मैं भी कुछ देर में सो जाता.

कुछ दिन बाद मेरा बर्थडे आया तो हर साल की तरह इस बार भी पिता जी ने अच्छे से मेरा बर्थडे मानाने के लिए इंतजाम किया. हर साल मुझे मेरे जन्मदिन पर तोहफे मिलते थे. हर साल मेरे पिता जी मुझे कोई न कोई तोहफा ज़रूर देते थे. मेरी माँ हर साल मुझसे कहती की बता तुझे तोहफे में क्या चाहिए तो मैं यही कहता की बस आप हमेशा खुश रहा कीजिये. आपका खुशियों से भरा हुआ चेहरा hi मेरा तोहफा है. मेरी इस बात से माँ की आँखों में ख़ुशी के आँशु आ जाते और फिर वो मुझे अपने कलेजे से लगा लेती. यही हाल मेरी कुसुम दीदी का था. वो भी मुझसे ऐसे hi पूछा करती और मैं यही कहता की आप हमेशा खुश रहा कीजिये, इसके शिव मुझे कुछ नहीं चाहिए. मेरी दोनों जुड़वाँ बहने अपनी क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ तोहफा दे hi देती थी.

हर साल की तरह इस साल भी मेरा बर्थडे मनाया गया और हर साल की तरह hi मुझे तोहफे मिले. माँ और दीदी ने जब पूछा तो मैंने उन दोनों से वही कहा जो हर साल कहता था. मेरी जुड़वाँ बहनो ने मुझे एक एक पेन तोहफे में दिया. रात में जब सो गए तो कुसुम दीदी मेरे कमरे में हर रोज़ की तरह आ गयी और बीएड पर मेरे बगल से लेट गयी. हमने देर रात तक बाते की. मगर मैं इस बात से हैरान था की दीदी ने एक बार भी मुझसे ये नहीं कहा की अब मैं अपने कमरे में सोने जा रही हु.

मैं तो हमेशा चाहता था की दीदी मेरे पास hi सोये और आज शायद मेरी वो चाहत पूरी hi हो गयी थी. मैं खुश था और हैरान भी. जब काफी देर तक दीदी ने जाने के बारे में कुछ न कहा तो मजबूरन मुझे hi उनसे पूछना पड़ा की क्या उन्हें अपने कमरे में सोने नहीं जाना? मेरे पूछने पर कुसुम दीदी मुस्कुराई और मुझसे कहने लगी की क्या उनके यहाँ पर होने से मुझे कोई परेशानी है?

मैंने उनके कहने पर कहा की हर बार तो आप यही कहती थी की पिता जी को अगर पता चल गया तो वो गुस्सा करेंगे. फिर आज ऐसा क्यों? आज ऐसा क्या हो गया है की आपको पिता जी के गुस्सा हो जाने का कोई दर नहीं है.?

मेरे इस सवाल पर वो बोली की आज मेरा बर्थडे है इस लिए आज वो मेरे साथ hi बीएड पर सोयेंगी. आज बस की hi तो बात है. सुबह वो पिता जी के उठने से पहले hi नीचे अपने कमरे में चली जाएँगी. उनकी इस बात से मैं बहुत खुश हुआ था. जब से जान्ने समझने लायक हुआ था तब से कुसुम दीदी से hi मेरा करीबी रिश्ता रहा था. स्कूल में मेघा को पसंद करता था और उसे चाहता भी था. मेघा मेरा पहला प्यार थी. कुसुम दीदी मेरी बहन थी लेकिन मेघा के बाद अगर मुझे कोई लड़की पसंद थी तो वो मेरी कुसुम दीदी थी.

मैं हमेशा हसी मज़ाक में उनसे कह देता था की मुझे आपके जैसी लड़की से hi शादी करनी है. वो मेरी बात पर है देती और पूछती की मेरे जैसी hi क्यों? उनके इस सवाल पर मैं कुछ कह नहीं पता था. जब वो ज़्यादा ज़ोर दे कर मुझसे पूछती तो मैं पहले उनसे इस बात का वचन लेता की वो मेरी बात पर गुस्सा नहीं होंगी. वो कहती की क्या उन्होंने कभी मुझ पर गुस्सा किया है जो अब करुँगी?

आखिर मुझे बताना hi पड़ता की ऐसा क्यों. मैं उन्हें उनके अच्छे नेचर के बारे में बताता और उनकी सादगी के बारे में. ये भी की वो मेरा कितना ख़याल रखती हैं और मुझे कितना प्यार करती हैं. मेरी बात पर वो मुस्कुराते हुए कहती ki....Pagal कुछ भी बोलता है.

उस वक्त उनके चेहरे पर अजीब सी चमक होती थी. मैं नहीं जनता था की उनके चेहरे की वो चमक क्या सोच कर उनके चेहरे पर आयी होती थी. वो मुझे बड़े ध्यान से देखती तो मैं पूछता की आप किस तरह के लड़के से शादी करना चाहेंगी तो वो एकदम से चुप हो जाती. उनके चेहरे पर फिर से उदासी छ जाती. मैं उन्हें इसके लिए प्यार से डाट भी देता और फिर पूछता. मगर वो अक्सर यही कहती की उनके चाहने से क्या होता है.? अभी तो यही बहुत मुश्किल है की उनके लिए कोई रिश्ता पूरी तरह से पक्का हो जाये. वो अपनी किस्मत को कोसती और कहती की उनकी चाहते के कोई मायने नहीं हैं और न hi वो ऐसी कोई चाहत रख सकती हैं जो कभी पूरी hi न हो सके.

उनकी बात सुन कर मेरा दिल बैठने लगता था. मुझे लगता की मैं अपनी दीदी को खींच कर ज़ोर से अपने सीने से लगा लू और उनके सरे दुःख उनसे ले लू. मगर मैं ऐसा कुछ नहीं कर पता था.

"ऐसा मत कहा कीजिये दीदी. शादी ब्याह जीवन मरण सब भगवन के हाथ में होता है. जिस दिन जो होना लिखा होगा तो वो हर कीमत पर हो के रहेगा. बस आप इन सब बातो के बारे में ज़्यादा मत सोचा कीजिये." मैंने कहा.

"मेरी वजह से सब बहुत दुखी हैं न विक्की?" कुसुम दीदी ने उदास लहजे में कहा तो मेरा दिल फिर से बैठने लगा.

"फिर वही बात." मैंने कहा.

"अच्छा चल ठीक hai...chhod इन बातो को. हम कोई दूसरी बात करते हैं." दीदी ने खुद को सम्हाला.

"यस that's better....ab बताइये की आप किस तरह के लड़के से शादी करना चाहेंगी?"

"ये सवाल hi बेकार है विक्की. क्यों की मैं बता hi चुकी हु की मेरी चाहते के कोई मायने नहीं हैं. मेरे चाहने से कुछ नहीं हो सकता." कुसुम दीदी ने कहा.

"वो एक अलग बात है दीदी. मैं आपकी पसंद और चाहत के बारे में पूछ रहा हु. जैसे मैंने बताया की मैं उसी लड़की से शादी करुगा जिसमे आपके जैसी खुबिया होंगी. सो अब आप भी बताइये की आप किस तरह के लड़के से शादी करना चाहेंगी?" मैं कहा.

"क्यों ज़िद करते हो विक्की.? भला कोई भाई अपनी बहन से ऐसे सवाल पूछता है?" दीदी ने कहा.

"सब भाई पूछते हैं दीदी. आज कल ये सब नार्मल बाते हैं. आप बस बताइये जो मैंने आपसे पूछा है." मैंने कहा.

"तुम भी न हद hi कर देते हो विक्की. अच्छा ठीक hai...jaise तुम्हे मेरे जैसी hi लड़की से शादी करना है तो मैं भी यही चाहती हु की मेरी शादी उसी से हो जो मेरे भाई विक्की के जैसा hi हो." दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा तो मैं हैरान रह गया. पता नहीं क्यों मगर मुझे दीदी की इस बात से बहुत ख़ुशी भी हुयी.

मुझे अंदर से पता नहीं क्यों बहुत अच्छा लगा था जब दीदी ने ऐसा कहा था. मैं हैरान था की दीदी को मेरे जैसा लड़का पसंद था. अब मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था की मुझ में ऐसा क्या है जो दीदी को अच्छा लग रहा था.

"कमाल hai...par मुझ में ऐसा क्या देख लिया आपने दीदी जो ऐसा कह रही हैं की मेरे जैसे लड़के से आपकी शादी हो.?" मैं उतावला सा हो रहा था ये जान्ने के लिए.

"मुझे नहीं पता vicky...bas ये जानती हु की मुझे तेरे जैसे लड़के से hi शादी करने की इच्छा है." दीदी ने कहा. उनकी नज़ारे झुक गयी थी जब वो ये कह रही थी.

"ये क्या बात हुयी दीदी.? आपको मेरे जैसे लड़के से शादी करने की इच्छा है और आपको ये hi नहीं पता की आपको मेरे जैसे लड़के से hi शादी करने की क्यों इच्छा है.?" मैंने कहा. मुझे जाने क्यों ऐसा लग रहा था जैसे दीदी कुछ छुपा रही हैं.

"हाँ विक्की मुझे कुछ नहीं पता. बस मेरा मन करता है की मेरी जिससे शादी हो वो तेरे जैसा hi हो." दीदी ने कहा.

"आप भी न कमाल hi कर देती हैं. भला ऐसा कैसे हो सकता है.? अगर आपका मन ऐसा करता है तो उसकी भी कोई वजह hi होगी. प्ल्ज़ बताइये न didi...mujh जैसा लड़का hi क्यों.? मुझ में ऐसा क्या ख़ास है.?" मैंने ज़िद कर के दीदी से पूछा.

जब मैंने ऐसा कहा तो दीदी मुझे ख़ामोशी से देखने लगी. उनके चेहरे पर अजीब से भाव थे. मैंने देखा की उनका एक हाथ बीएड शीट को मुट्ठियों में बार बार खींच रहा था.

"बताइये न दीदी." उनको चुप देख कर मैंने फिर से पूछा.

"ये सब अंदर की बाते हैं विक्की. तू मेरा भाई है इस लिए हर बात मैं तुझे नहीं बता सकती. हाँ ये सच है की मुझे तेरे जैसे लड़के से hi शादी करने की इच्छा है. ऐसा इस लिए क्यों की हर लड़की यही चाहती है की उसका पति उससे खूब प्यार करे. उसका हर तरह से ख़याल रखे. उसके दुःख को बिना बताये महसूस कर ले और उसकी हर ज़रूरत पूरी करे." दीदी ने एक hi सांस में कह दिया.

"तो आपका मतलब है की जो भी खूबियां आपने एक पति की बतायी हैं वो सब मुझ में हैं.?" मैंने उनकी तरफ ध्यान से देखते हुए कहा.

"हाँ विक्की. मैं तुझे तेरे बचपन से जानती हु. तेरी राग राग से परिचित हु मैं. इतना तो मैं भी समझती हु की तू कैसा है. हमारे बीच शुरू से ले कर अब तक कभी कोई लड़ाई झगड़ा नहीं हुआ और न hi ऐसा कभी वक्त आया की हमारे बीच किसी बात को ले कर अनबन हुयी हो. मुझे अच्छी तरह इस बात का अहसास है की तू मुझे बहुत मानता है और मेरी बहुत इज्जत करता है. मेरा कितना ख़याल रखता है ये भी मैं जानती हु. मुझे एक पल के लिए भी तू दुखी नहीं देख सकता. ये सब बाते यही दर्शाती हैं की तू एक अच्छा इंसान है जिसे किसी भी इंसान के सुख दुःख का अहसास है. मैं हमेशा सोचा करती हु की दुनिया में हर लड़की को तेरे जैसा भाई मिले. ये भी सच है की ऐसे hi अच्छे नेचर वाले लड़के से हर लड़की शादी करना चाहेगी." दीदी ने एक बार फिर से एक hi सांस में ये सब कह दिया था और मैं उनकी ये बाते सुन कर हैरान भी हो रहा था और अंदर hi अंदर खुश भी.

"काश मेरे पास कोई जादू वाली पावर होती दीदी तो मैं एक पल में आपके लिए ऐसा hi लड़का प्रगट कर देता. फिर आपकी उससे शादी भी करवा देता." मैंने कहा.

"तुझे पता है विक्की मैं अपना जन्मदिन क्यों नहीं मानाने देती कभी.? क्यों की मेरा जन्म भी उसी दिन और तारिख को हुआ था जब तेरा हुआ था. जब तेरा जन्मदिन मानते हैं तो मेरा तो आलरेडी hi हो जाता है. मुझे ख़ुशी मिलती है की मेरे भाई के साथ hi मेरा जन्म दिन भी खुद hi मन जाता है." दीदी ने सब्जेक्ट चेंज कर दिया था और ये बात उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था.

"हाँ मुझे पता है. बूत ये नहीं पता था की आप ऐसा क्यों करती हैं.? सो जब आज पता चल hi गया है तो फिर मैं आपको आपके जन्मदिन की विशेष देना चाहता हु. जन्मदिन मुबारक हो DIDI...AAPKE दामन में संसार की हर खुशिया भर जाये और आपकी हर वो मुराद पूरी हो जो आपने अपने मन में चाहि हो." मैंने एक hi सांस में उनकी तरफ करवट लेते हुए कह दिया था.

"ओह्ह विक्की मैं बता नहीं सकती की तेरे इस तरह विश करने से मैं कितना खुश हो गयी हु." दीदी ने कहा और उठ कर बीएड पर बैठ गयी. उनके उठ कर बैठ जाने पर मैं भी उठ कर बैठ गया था.

"अगर ऐसी बात है तो मुझे उसके लिए माफ़ कर दीजिये जो मैंने इसके पहले आपको आपके जन्मदिन पर विश नहीं किया था." मैंने उदास लहजे में कहा तो दीदी बस मुस्कुरा पड़ी.

"तुझे किसी बात के लिए मुझसे माफ़ी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है. जन्मदिन पर विश करना तो एक औपचारिकता है विक्की. मुझे तो ये पता hi है की तू मुझे बहुत मानता है और मेरी हर ख़ुशी का ख़याल रखता है." कुसुम दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा.

"बताइये दीदी आपको तोहफे में मुझसे क्या चाहिए.? बेझिझक मांगिये didi...jo भी आपका मन करे. मैं आपकी हर विश पूरी करने की पूरी कोशिश करुगा." मैंने कहा.

"मुझे तुझसे कोई तोहफा नहीं चाहिए विक्की. मैं तो इसी बात से खुश हु की मेरा भाई मेरा हद से ज़्यादा ख़याल रखता है. एक बहन को इससे ज़्यादा क्या चाहिए.? हाँ ये ज़रूर कहुगी की जैसे तू अभी मेरा इतना ख़याल रखता है वैसे hi ज़िन्दगी भर मेरा ख़याल रखना. अगर संजोग से कभी मेरी शादी हो भी जाये तब भी तू मेरा ख़याल रखना. अपनी इस पगली दीदी को भूल न जाना." दीदी ने कहा. ये कहते हुए उनकी आँखों में आँशु आ गए थे जिन्हे देख कर मैं तड़प उठा था.

"ये तो आपको कहने की ज़रूरत hi नहीं है दीदी. मैं तो वैसे भी ज़िन्दगी भर आपका ख़याल रखुगा और आपको कभी दुखी नहीं होने दूँगा." मैंने कहा तो दीदी की आँखों से आशु छलक कर बाहर आ गए.

"मेरा बहुत दिल करता है विक्की की मैं तेरे सीने से लिपट जाओ. मुझे एक बार अपने सीने से लगा ले मेरे भाई." दीदी के चेहरे पर ये कहते हुए दुःख के भाव थे. इधर उनकी ये बात सुन कर मैंने जल्द hi अपनी बाहो को फैला दिया. मेरी आँखों में भी आँशु आ गए थे.

मैंने जैसे hi अपनी बाहे फैलाई दीदी झपट कर मेरे सीने से लग गयी और फुट फुट कर रोने लगी. उनका पूरा जिस्म थरथरा रहा था. वो मुझे बुरी तरह कास कर पकडे हुए थी. मैंने भी उन्हें कास कर खुद से छुपका लिया था. उनकी कोमल पीठ पर मैं अपने हाथ फेरने लगा था.

लाइफ में आज ये पहला वक्त था जब हम दोनों भाई बहन ने एक दूसरे को गले से लगाया था. इसके पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. उधर दीदी मुझसे लिपटी सिसक रही थी. पता नहीं क्या बात थी की वो मुझसे इतनी ज़ोर से लिपटी सिसक रही थी. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. बस मुझे अच्छा लग रहा था की आज मेरी दीदी प्यार से मेरे गले लगी हुयी थी.

काफी देर तक दीदी मुझसे लिपटी रही. उसके बाद वो मुझसे अलग हो गयी. मैंने देखा की उनके आँशु उनके पुरे गालो पर फैले हुए थे. सफ़ेद गोरा चेहरा एकदम से सुर्ख पद गया था. मेरा दिल दीदी को उस हालत में देख कर बहुत दुखी सा होने लगा था.

"ये गलत बात है दीदी. आप जानती हैं की मैं आपको दुखी नहीं देख सकता और न hi आपकी आँखों में आँशु. फिर ऐसा क्यों दीदी.?" मैंने शिकायत की उनसे.

"माफ़ कर दे विक्की. मैं खुद को सम्हाल hi नहीं पति हु. कितनी कमज़ोर हु न मैं.?" दीदी ने भीगी आँखों से मेरे तरफ देखा तो इस बार मैं खुद hi खुद को सम्हाल नहीं पाया और मैंने इस बार खुद उनको अपने सीने से छुपका लिया.

"नहीं दीदी आप कमज़ोर नहीं हैं. ारी मेरी दीदी तो बहुत बहादुर हैं. दुनिया में सबसे सुन्दर मेरी दीदी हैं और सबसे मासूम भी." मैंने कहा और फिर धीरे से उनको खुद से अलग किया. अलग करने के बाद मैंने उनके चेहरे की तरफ देखा तो इस बार उनके चेहरे पर चमक थी और सुर्ख होठो पर मुस्कान. शायद मेरी बात पर वो मुस्कुरा रही थी.

"झूठ मूठ की तारीफ मत कर tu...Mujhe भी पता है की दुनिया में बहुत सी ऐसी लड़किया हैं जो बहुत सुन्दर और मासूम हैं." दीदी ने कहा.

"Hongi...lekin एक बात मैं दावे के साथ कहता हु की वो सब आपसे काम hi सुन्दर और मासूम होंगी. मेरी कुसुम दीदी से बढ़ कर तो कोई हो hi नहीं सकता." मैंने गर्व से कहा तो दीदी है पड़ी.

"चल अब बस कर fenkuram....sona नहीं है क्या.?" दीदी ने हस्ते हुए hi कहा तो मैं भी है दिया उनके फेंकूराम कहने पर.

"सोते तो रोज़ hi हैं didi...aaj साडी रात जागते रहेंगे हम दोनों." मैंने मुस्कुरा कर कहा तो दीदी ने हैरानी से मेरी तरफ देखा.

"तेरा तो ठीक है मगर सुबह मेरी खैर नहीं रहने वाली." दीदी ने कहा.

"वो क्यों.?" मैंने एकदम से शॉक हो कर उनकी तरफ देखा.

"ारी बुद्धू राम जब मैं साडी रात जागती रहूगी तो मेरी आँखे सुबह माँ को बता देंगी की मैं सोई नहीं साड़ी रात. वो यही समझेंगी की मैं शादी के टेंशन की वजह से रात भर जागती हु. वो मुझे इसके लिए बहुत समझती हैं. इस लिए कल मेरी आँखे देख कर माँ को पता चल जायेगा और फिर वो मुझे डाटेंगी." दीदी ने कहा.

"ठीक है didi...chaliye सो जाते हैं फिर." मैंने मायूस हो कर कहा तो दीदी ने अपना एक हाथ बढ़ा कर मेरे चेहरे पर फेरा.

"ऐसे मायूस चेहरा मत बना विक्की. जैसे तू मुझे उदास और दुखी नहीं देख सकता न वैसे hi मैं भी तुझे उदास और मायूस नहीं देख सकती. मुझे भी लगा करता है की मैं तेरे पास hi राहु और तुझसे ढेर साड़ी बाते करू. मगर सब कुछ हमारे चाहने से नहीं होता न. हमें सबके बारे में भी सोचना पड़ता है. अब चल सो जाते हैं. तुझे एक राज़ की बात बताओ..????" दीदी ने कहा तो मैंने उनकी तरफ देखा.

"राज़ की बात.???" मैंने पूछा.

"ारी इतना हैरान न ho...raaz की बात ये है की अब से मैं हर रोज़ तेरे साथ hi सो जाया करुँगी. अगर तुझे इससे कोई परेशानी न हो तो." दीदी ने ऐसा कहा तो मैं और भी ज़्यादा हैरान रह गया. आज का तो चलो ठीक था समझ में आया. मगर हर रोज़ कैसे पॉसिबल हो सकता था.?

"मगर आप तो कहा करती थी की पिता जी को पता चल गया तो वो गुस्सा करेंगे. फिर आप ये कैसे कह सकती हैं.? क्या अब पिता जी गुस्सा नहीं करेंगे.?" मैंने कहा.

"गुस्सा तो तब करेंगे न विक्की जब उन्हें पता चलेगा. मैं सुबह उनके उठने से पहले hi तेरे कमरे से नीचे अपने कमरे में चली जाया करुँगी. वैसे मेरे पास एक उपाय ये भी है की सुबह जल्दी उठ कर मैं खुद hi वो काम करने लागगी जो काम माँ करती हैं सुबह. यानी पिता जी के लिए चाय बनाना." दीदी ने बड़ी राज़दारी से कहा तो मैं फिर से हैरान रह गया.

"और अगर किसी दिन आपकी नींद सुबह जल्दी न खुल पायी तो..???" मैंने कहा.

"खुलेगी vicky...tere पास अलार्म घडी है न. मैं रोज़ उसमे सुबह पांच बजे का अलार्म सेट कर दिया करुँगी." दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा तो मैं भी उनकी चालाकी पर मुस्कुरा पड़ा.

"That's ग्रेट didi...now i'm सो हैप्पी. अब से आप मेरे साथ hi सोयेंगी." मैं बच्चो की तरह ख़ुशी मानाने लगा तो दीदी है पड़ी. वो जब हस्ती थी तो उनके दोनों गालो पर गड्ढे पद जाते थे और मोतियों की तरह चमकते हुए उनके डाट बहुत सुन्दर लगते थे.

"चल अब सो जा vicky...bahut रात हो गयी है. सुबह मुझे जल्दी यहाँ से जाना भी है." दीदी ने कहा तो मैं उनकी बात मान कर चुप चाप लेट गया. मेरे लेटते hi दीदी भी लेट गयी.

कमरे में नाईट बल्ब जल रहा था. हम दोनों अपनी आँखे बंद कर के लेते होते थे. दीदी का तो मुझे पता नहीं मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी. लाइफ में पहली बार आज दीदी मेरे बीएड पर मेरे साथ hi सोई हुयी थी और अब से हर रात वो यही मेरे पास hi सोने वाली थी. मैं उनको अपने पास इस तरह देख कर बहुत खुश था. मेरे मन में बहुत साडी बाते चलने लगी थी. फिर मुझे पता hi नहीं चला की कब मैं नींद की आगोश में चला गया.

फ्रेंड्स....

आज के लिए इतना hi....

रीड & एन्जॉय

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 05

फ्लैशबैक कंटिन्यू.....


मैं गहरी नींद में सोता ज़रूर था लेकिन अगर कोई आवाज़ दे तो मेरी नींद खुल जाती थी. ऐसा hi हुआ यानी किसी आवाज़ से मेरी नींद खुल गयी. नींद खुली तो मुझे समझ आया की बीएड के सिरहाने पर hi राखी अलार्म घडी बज रही थी. मेरी नज़र बीएड पर मेरे बगल में पड़ी तो देखा की कुसुम दीदी उठ कर बैठ गयी थी और अपने एक हाथ से अलार्म घडी के उस switch/botton को बंद कर रही थी जिसके ऑफ कर देने से अलार्म घडी का बजना बंद हो जाता था.

अलार्म बंद करने के बाद जब वो पलटी तो उनकी नज़र मुझ पर पड़ी. मुझे जगा हुआ देख कर वो थोड़ी चौंकी फिर मुस्कुरा उठी. कहा उस वक्त उनकी मनमोहक मुस्कान देख कर मेरा मन ख़ुशी से भर उठा था.

"आज की सुबह कितनी अच्छी है न दीदी.?" मैंने उनकी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोलै.

"Achha...aur वो कैसे भला.?" उन्होंने मुस्कुरा कर मुझसे पूछा था.

"वो ऐसे की आज सुबह सुबह hi मैंने अपनी उस दीदी की मुस्कान देखि जो दुनिया में सबसे सुन्दर और मासूम हैं." मैंने जब ऐसा कहा तो दीदी की मुस्कान और गहरी हो गयी. उनके चेहरे पर ख़ुशी के भाव उभर आये. वो मुझे बड़े ध्यान से देखने लगी.

"बाते बनाना कोई तुमसे सीखे है न.?" फिर मुझे ध्यान से देखते हुए कहा दीदी ने.

"लो इसमें बाते बनाने वाली कौन सी बात है भला.? मैंने तो वही कहा जो सच है. आपको ऐसा क्यों लगता है की मैं बाते बना रहा हु.?" मैंने कहा तो दीदी बस मुस्कुरा कर रह गयी मगर बोली कुछ न.

"अब बतिआए bhi...aisa क्यों लगता है आपको.?" मैंने उन्हें चुप देखा तो दोबारा पूछा.

"क्यों की ऐसा तुम सिर्फ मेरा दिल रखने के लिए कहते हो. तुम हमेशा यही चाहते हो की मैं खुश राहु. वर्ण जितनी बड़ी बड़ी तुम तारीफे करते हो मेरी उतनी तो मैं हु hi नहीं." दीदी ने नज़रे झुकाये हुए कहा तो मैं मुस्कुरा उठा.

"एक तो लड़कियों का भी न बस एक hi पन्गा है. तारीफ न करो तब भी प्रॉब्लम और तारीफ करो तब भी प्रॉब्लम. आखिर हम लड़के करे तो करे क्या.?" मैंने रूठे हुए लहजे से कहा तो दीदी है पड़ी.

"अच्छा तुम्हे लड़कियों के बारे में बड़ा पता है vicky...kya मेघा ने बताया था या उससे सीखा है.?" दीदी ने मज़ाक में कह तो दिया मगर अगले hi पल उन्हें लगा जैसे ऐसा कह कर उन्होंने बड़ी गलती कर दी हो. इधर मैं उनकी इस बात से एकदम चुप रह गया था. मेघा का नाम आते hi मेरे जिसम में एक झटका सा लगा था. मगर मैंने खुद को सम्हाल लिया. मुझे पता था की दीदी ने ऐसा बस मज़ाक में hi कहा था वर्ण वो मेरा दिल दुखने के लिए ऐसा कह hi नहीं सकती थी. मैंने जब देखा की वो एकदम से चुप हो गयी हैं तो मैं उन्हें देख कर मुस्कुराया.

"ऐसा कुछ नहीं है didi...itna तो आज कल के बच्चो को भी पता है की लड़किया कैसी होती hain....khair आप बात को घुमाइए मत और इस बात को मान लीजिये की जो मैंने आपकी तारीफ में कहा था वो सब सोलह आने सच है." मैंने ऐसा कहा तो दीदी फिर से मुस्कुराने लगी.

कुछ देर वो मुझे देखते हुए जाने क्या सोचती रही फिर वो बीएड से नीचे उतरने लगी. उन्हें बीएड से उतरता देख मुझे ऐसा लगा जैसे मैं दीदी को रोक लू और अपने पास से जाने न दू. मगर मैं ऐसा चाह कर भी नहीं कर सकता था. भला मैं उनसे रोकने की क्या वजह बताता.? मुझे भी अजीब लगा की मेरे मन में ऐसी बात क्यों आयी.?

"तुम्हारी बातो को सुनने के चक्कर में कही ऐसा न हो की माँ पिता जी जाग जाये. माँ की आदत है की वो जागने के बाद जब अपने कमरे से निकलती हैं तो सबसे पहले मेरे hi कमरे में आती हैं. मुझे नहीं पता की ऐसा वो क्यों करती hain....shayad देखने आती होंगी की मैं ठीक से सो रही हु की नहीं." दीदी ने बीएड से उतरने के बाद मेरी तरफ देखते हुए कहा था.

"ठीक है दीदी आप jaiye...main तो अब नहीं सौगा क्यों की मेरी आज की सुबह बहुत hi अच्छी हुयी hai...fir से सौगा तो इतनी अच्छी सुबह की इंसल्ट हो जाएगी." मैंने ऐसा कहा तो दीदी फिर से मुस्कुरा पड़ी.

"तुम नहीं मानोगे na...chalo मैं जा रही हु. कुछ देर में आती हु तुम्हारे लिए चाय ले कर. तब तक तुम भी हाथ मुँह धो लो." दीदी ने कहा तो मैं एकदम से खुश हो गया. मेरे चेहरे पर एकदम से आयी इस ख़ुशी को देख कर दीदी हसी और फिर कमरे से बाहर चली गयी. उनके जाने के बाद मैं भी बीएड से नीचे उतरा और फिर कमरे से बाहर आ गया.

टॉयलेट नीचे आगाँ के उस पार बना हुआ था सो मैं नीचे आ कर उस तरफ hi चला गया हाथ मुँह धोने के लिए. अभी सुबह के पांच नहीं बजे थे. शायद अलार्म 4:30 का लगाया था दीदी ने. पांच बजे माँ पिता जी दोनों hi उठ जाते थे.

हाथ मुँह धोने के लिए मैं नीचे आया था. हमारे यहाँ शहरो की तरह कमरे में hi आत्ताच बाथरूम नहीं बना हुआ था बल्कि नीचे hi बना था जिसमे सब लोग जाते थे. माँ पिताजी अपने कमरे में होते थे और टॉयलेट आँगन के उस पार था. जिससे अगर कोई टॉयलेट में हो तो वह से पानी वगैरा गिरने जैसी कोई आवाज़ यहाँ तक सुनाई नहीं देती थी.

आँगन के उस पार दो टॉयलेट बने थे जो की अगल बगल hi थे. दोनों में hi नहाने के लिए भी जगह थी. मैं जब टॉयलेट के करीब पंहुचा तो मुझे लेफ्ट वाले टॉयलेट से हल्का पानी गिरने की आवाज़ सुनाई दी तो मैं समझ गया की कुसुम दीदी उसके अंदर hi हैं. ये जान कर मैं राइट साइड वाले टॉयलेट में चला गया.

दो मिनट बाद hi लेफ्ट साइड वाले टॉयलेट का दरवाज़ा हलके से खुला. शायद दीदी फ्रेश हो चुकी थी. इधर मैं भी हाथ मुँह धोने के लिए बढ़ा तो मैंने सोचा अच्छे से फ्रेश hi हो लेता हु. ये सोच कर मैं फ्रेश होने लगा. 10 मिनट बाद मैं टॉयलेट से फ्रेश हो कर वापस अपने कमरे में ऊपर आ गया और दीदी के आने का वेट करने लगा. आज ये पहली बार था जब मैं इतनी सुबह उठ कर फ्रेश हो लिया था वर्ण तो 7 या 8 बजे के पहले मैं ये सब करता hi नहीं था.

पता नहीं क्यों मगर आज मैं खुश था. मेरा मन बार बार दीदी की तरफ hi जा रहा था. उनके hi बारे में सोचने लगता था. शायद इस लिए की कल रात वो लाइफ में पहली बार मेरे साथ एक hi बीएड पर सोई थी और अब से ऐसा hi होने वाला था. मेरी सबसे सुन्दर और मासूम दीदी जो मुझे बहुत पसंद थी वो अब रोज़ाना मेरे साथ hi रात में सोयेंगी. इस बात की ख़ुशी मुझे बहुत हो रही थी. मेरे मन में उनके लिए कोई भी बुरा विचार नहीं था और न hi मेरा मन कभी इस तरफ गया था. वो मेरी बड़ी बहन थी और मेरा हद से ज्यादा ख़याल रखती थी. हम दोनों एक दूसरे को बहुत मानते थे.

10 मिनट इंतज़ार बाद आखिर कुसुम दीदी हाथ में ट्रे लिए मेरे कमरे में आयी. जैसे hi हम दोनों की नज़रे मिली तो वो हलके से मुस्कुराई. उनके होठो पर फैली हलकी मुस्कान और उनके दोनों तरफ के गालो पर हलके गड्ढे पद जाना उनको इतना खूबसूरत बना देता था की उसको लफ्ज़ो में शायद बताया hi न जा सके.

उनकी मुस्कान देख कर मेरे होठो पर भी मुस्कान आ गयी. आज की सुबह सच में सबसे हसीं लग रही थी मुझे. इसके पहले ऐसा कभी महसूस नहीं किया था मैंने. मैं और तो कुछ नहीं जनता था लेकिन मैं हमेशा यही चाहता था की मैं अपनी दीदी के पास hi राहु और उनसे ढेर साड़ी बाते करता राहु. उनकी आवाज़ इतनी प्यारी और सुरीली थी की हर वक्त बस उनकी आवाज़ को hi सुनते रहने का दिल करता था.

"आज मैं कुछ अलग महसूस कर रहा हु दीदी. क्या आपको भी कुछ अलग महसूस हो रहा है.?" मैंने कहते हुए पूछा तो दीदी बोली तो कुछ न बस मुस्कुराते हुए मेरे करीब आ गयी. मेरे बिलकुल सामने ट्रे को लिए रुक गयी तो मैंने ट्रे पर रखे दो कप में से एक कप को उठा लिया.

"बताइये न didi....kya आपको भी आज कुछ अलग महसूस हो रहा है.?" मैंने उत्सुकता से इस बार पूछा तो दीदी ने उसी तरह मुस्कुराते हुए ट्रे से अपना कप उठाया और फिर ट्रे को नीचे बीएड के पास रख कर मेरे पास hi बीएड के किनारे पर बैठ गयी. जब के मैं उनके मुख से जवाब सुनने की जिज्ञासा से उनकी तरफ hi देखता रहा.

"ाररी पहले चाय तो पियो vicky....aur जो सवाल तुमने मुझसे पूछा है उसका जवाब पहले तुम hi मुझे दो." दीदी ने ूल जलूल जैसे अंदाज़ में मुझसे ये कहा तो मुझे कुछ समझ न आया.

"मतलब.." मैंने चाय का पहला घुट पीने के बाद कहा उनसे.

"पहले तुम बताओ की तुम्हे आज क्या अलग महसूस हो रहा है.?" दीदी ने भी कप से एक घुट चाय पीते हुए पूछा.

"सब कुछ hi तो अलग महसूस हो रहा है दीदी. कुछ चीजे नई हुयी हैं शायद इसी वजह से ऐसा लग रहा है मुझे. जैसे कल रात आप मेरे पास hi बीएड पर रात भर रुकी रही और आपने ये भी कहा की अब से हर रोज़ ऐसा hi होगा. दूसरी बात ये की सुबह सुबह ये चाय पिलाना. आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. यानी न आप कभी मेरे साथ रात भर मेरे कमरे में रही थी और न hi ये सुबह सुबह चाय पिलाने वाला सिस्टम हुआ था." मैंने डिटेल में ये सब बताया तो दीदी मुस्कुरा पड़ी.

"तो इस वजह से तुम्हे आज कुछ अलग महसूस हो रहा है.?" दीदी ने कहा.

"Haan...aur मुझे लगता है की आपको भी ऐसा hi महसूस हो रहा होगा." मैंने कहा तो दीदी ने चाय का एक और घुट पिया और फिर मेरी तरफ देखा.

"सच कहा तुमने मगर ये तो होता hi है विक्की. इंसान की लाइफ में जब कोई चीज पहली बार होती है तो उसका अहसास पहली दफा अलग hi लगता है. उसके बाद फिर उस अहसास की आदत सी हो जाती है." दीदी ने जैसे मुझे समझते हुए कहा तो मैं बस अपना सर हिला कर रह गया.

"तुम्हे पता है vicky...aaj जब मैं माँ पिता जी को चाय देने के लिए उनके पास गयी तो वो दोनों हैरान रह गए थे." दीदी ने ये कहा तो मैं मुस्कुरा उठा.

"वो तो होना hi था didi...iske पहले ऐसा हुआ जो नहीं था." मैंने कहा.

"Haan...jab मैं चाय ले कर गयी तो उनका कमरा पहले बंद था तो मैंने माँ को आवाज़ दी. कुछ hi देर में जब माँ ने दरवाज़ा खोला और मुझसे पूछा की क्या है तो मैंने चाय का ट्रे उनकी तरफ बढ़ा दिया. मेरे हाथो में इतनी सुबह सुबह चाय का ट्रे देख कर वो हैरान रह गयी. फिर कहने लगी की आज ये सूरज किस दिशा से उग गया है.? मैंने कहा की आपको सुबह सुबह हम सब के लिए तकलीफ उठानी पड़ती है इस लिए अब से सुबह सुबह का ये वाला काम मैं करुँगी. मेरी ये बात सुन कर माँ बहुत खुश हुयी और फिर उन्होंने यही बात पिता जी को भी बताई तो पिता जी भी खुश हो गए. माँ ने मुझे प्यार से गले लगाया. उसके बाद उनको चाय दे कर मैं तुम्हारे पास आ गयी." दीदी ने लम्बी चौड़ी ये कहानी बताई तो मैं मुस्कुरा उठा.

"सो अब ये पक्का हो गया की अब से ऐसा hi होगा.?" मैंने कहा तो दीदी ने हाँ में सर हिला दिया.

"कुछ भी हो दीदी मगर इस सबसे काम से काम मुझे बहुत ख़ुशी हुयी है. अब से आप मेरे पास hi रहेंगी और सुबह सुबह आपकी ये मनमोहक मुस्कान देख कर मेरा मन सारा दिन ख़ुशी से भरा रहेगा." मैंने ऐसा कहा तो दीदी मुझे बड़े ध्यान से देखने लगी. उनके होठो पर फिर से मुस्कान उभर आयी थी.

"तू मुझे इतना क्यों मानता है विक्की.? मुझे ऐसा लगता है की इस दुनिया में तुम पहले ऐसे भाई हो जो अपनी बहन को इतना मानता है. मुझे ख़ुशी है की भगवन ने मुझे तेरे जैसा भाई दिया है. तुझे एक बात bataau....Main हर वक्त तेरे hi बारे में सोचती रहती हु." दीदी ने ऐसा कहा तो मैं शॉक हो गया. मगर अगले hi पल मैं मुस्कुरा उठा. मुझे उनकी इस बात से अंदर hi अंदर जाने क्यों एक ख़ुशी सी महसूस हुयी. मैं अब ये जानना चाहता था की दीदी मेरे बारे हर वक्त ऐसा क्या सोचती रहती हैं.?

"ऐसा क्या सोचती रहती हैं आप मेरे बारे में.?" मैंने उनकी तरफ ध्यान से देखते हुए पूछा तो उनके चेहरे पर एक एक गंभीरता उभर आयी.

"कुछ समझ hi नहीं पति विक्की. बस मेरे मन में जाने क्या क्या चलने लगता है." दीदी ने कहा तो मैं हैरान रह गया.

"क्या चलने लगता hai...bataiye न दीदी." फिर मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा उनसे.

"बहुत साडी बाते हैं vicky...kuch तो ऐसी भी हैं जिनके बारे में मैं शायद तुझे बता भी नहीं सकती." दीदी ने नज़रे झुका लिया था ये कहते वक्त. उनकी इस बात से मैं सोचने लगा की ऐसी कौन सी बात हो सकती है जिसे दीदी मुझसे बता भी नहीं सकती.

"ये तो बड़ी अजीब बात hai...magar मैं जानना चाहता हु दीदी की ऐसी वो कौन सी बाते हैं जिन्हे आप मुझसे बता भी नहीं सकती.?" मैंने कहा तो दीदी ने नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा. उनके चेहरे पर ढेर सरे रंग आ गए.

"जाने दे vicky....is बारे में कुछ मत पूछ. चल अब मैं जाती hu...mujhe माँ के साथ काम में हाथ भी बताना है." दीदी ने ये कहा और बीएड से उठ गयी. मैं उनके इस अंदाज़ से हैरान हुआ और उनकी तरफ देखने लगा. उनके चेहरे पर मौजूद रंग बड़ी तेजी से बदल रहे थे. मुझे समझ न आया की दीदी ने ऐसा क्यों कहा और अब काम का बहाना कर के जा रही हैं यहाँ से.

"क्या आप मुझे बताना नहीं चाहती दीदी.? और क्या इसी लिए आप यहाँ से जा रही हैं.?" मैंने गंभीरता से कहा तो दीदी ने झटके से मेरी तरफ देखा. ऐसा लगा जैसे वो अंदर hi अंदर किसी बात से घबरा गयी हो.

"नहीं vicky....aisi कोई बात नहीं है." दीदी ने खुद को सम्हालते हुए कहा मगर मुझे उनकी बात पर भरोसा न हुआ. मुझे यकीन सा हो गया था की कुछ तो ऐसी बात है जिसे दीदी मुझसे बताना नहीं चाहती हैं.

"चलिए ठीक hai...mat bataiye...main आपको मजबूर नहीं कर सकता. मजबूर करने का मतलब है की आपको दुःख तकलीफ देना जो की मैं नहीं दे सकता. मैं तो भगवान् से हमेशा यही दुआ करता हु की मेरी दीदी की साडी तकलीफे और सरे दुःख मुझे दे दे." मैंने ऐसा कहा तो दीदी की आँख से छलछला कर आँशु बहने लगे. वो झपट कर आयी और मुझसे लिपट कर रोने लगी.

"नाहीइ vickyyyy....aisa मत कह री. मुझमे इतनी हिम्मत नहीं है की मैं तेरी इतनी बड़ी बड़ी बातो को सह जाओ. देख आज के बाद तू ऐसी बात कभी मत करना. तू मेरा इकलौता भाई hai...mujhe जान से प्यारा है तू. तेरे बारे में कुछ भी बुरा नहीं चाह सकती मैं. कुछ बाते होती hi ऐसी हैं जिन्हे एक बहन अपने भाई से नहीं बता sakti...tu समझ सकता है तो बस समझ ले मगर मुझे गलत मत समझना." दीदी ने मुझसे लिपटे हुए ये कहा तो मेरा सारा वजूद झनझना कर रह गया.

"मैं आपको कभी गलत समझने की भूल कर hi नहीं सकता दीदी. अगर मुझे भगवन भी आ कर कहे की मेरी दीदी गलत है तो मैं यकीन नहीं कर सकूगा." मैंने ऐसा कहा तो दीदी का पूरा जिसम मुझे एक एक थरथरा गया सा महसूस हुआ.

"ऐसा तू इस लिए कह रहा है विक्की क्यों की तू मुझे बहुत मानता है और बहुत प्यार करता है. मगर दुनिया की एक सच्चाई ये भी है इस दुनिया में कोई भी इंसान दूध का धुला हुआ नहीं है. कोई भी इंसान ऐसा नहीं है इस दुनिया में जिसने कोई पाप न किया हो." दीदी ने मुझसे अलग हो कर कहा तो मैं उनके आंशुओ से तर चेहरे को देख दहल सा गया.

"पर आपने कोई पाप नहीं kiya...iska मुझे पूरा यकीन है." मैंने कहा तो दीदी के होठो पर फीकी सी मुस्कान उभर आयी.

"मैंने कहा न विक्की की ऐसा तू बस इसी लिए कह रहा है क्यों की तू अपनी इस दीदी को बहुत चाहता है. तेरी नज़र में मैं दुनिया की सबसे अच्छी दीदी हु. जब के हर इंसान कोई न कोई पाप ज़रूर किया होता है." दीदी ने कहा तो मैं बे यकीनी से उनकी ततफ देखने लगा.

"क्या आप मुझे बता सकती हैं की आपने ऐसा कौन सा पाप किया है.?" मैंने कहा.

"मुझ में इतनी हिम्मत नहीं है विक्की की अपने पाप के बारे में तुझे बता सकू. शायद ऐसे बहुत काम hi लोग होंगे जो ख़ुशी ख़ुशी अपने पापो का बखान किसी से करते होंगे." दीदी ने कहा तो मैं चुप रह गया.

मैं चुप हुआ तो दीदी ने भी कुछ न कहा. हम दोनों के बीच सन्नाटा सा छ गया. मुझे लगा की ऐसी बातो की वजह से हमारे बीच कैसी सिचुएशन क्रिएट हो गयी है. मुझे इस सिचुएशन को देख कर बड़ा अजीब सा फील हुआ. उधर दीदी के चेहरे पर गंभीरता छायी हुयी थी. पता नहीं क्यों मगर मुझे ऐसा लगा जैसे अनजाने में मैंने अपनी दीदी को किसी धरम संकट में दाल दिया है जिसकी वजह से वो एक डैम से खामोश हो गयी हैं. उनके होठो की वो मनमोहक मुस्कान जो इसके पहले तक कायम थी उसका कही पता hi नहीं था.

मुझे खुद पर गुस्सा आया की अभी जिस मुस्कान को ले कर मैंने अपने दिन के अच्छा होने की बात कही थी अब उसी अच्छे दिन को इन सब बातो से खराब सा कर दिया था. सो मैंने सोच लिया की सिचुएशन को फिर से पहली जैसी बनाया जाये. पर मुझे समझ न आया की मैं इस गंभीर सिचुएशन को पहले के जैसी कैसे बनाओ.?

"फ़िक्र मत कीजिये didi...aur ये सब बाते जो हमारे बीच अभी हुयी हैं उनको भी दिमाग से निकाल दीजिये. ये सोचिये की हमारे बीच ऐसी कोई बाते हुयी hi नहीं हैं. कितना बेवकूफ हु मैं की एक अच्छे खासे माहौल को गंभीर बनवा दिया. जब के इसके पहले मैं इस बात पर खुश था की मैं सुबह सुबह अपनी सबसे प्यारी दीदी की मनमोहक मुस्कान को देखा और जिस मुस्कान की वजह से मेरा आज का सारा दिन खुशियों से भरा रहेगा. ओह्ह्ह दीदी प्ल्ज़ मुझे माफ़ कर दीजिये और फिर से मुझे अपनी वही मनमोहक मुस्कान दिखा दीजिये. मैं नहीं चाहता की इस सब की वजह से आप सारा दिन किसी टेंशन में रहे." मैंने दीदी के दोनों कंधो को पकड़ते हुए ऐसा कहा तो दीदी ने कुछ पल मुझे देखा और फिर उनके चेहरे पर मौजूद रंग बदलने लगे. उनके होठो पर फिर से वही मुस्कान आ गयी. उनकी वो मुस्कान देख कर मुझे अपने अंदर एक सुखद अहसास हुआ.

"एक बात कहु didi....aap हमेशा ऐसे hi मुस्कुराते रहा कीजिये. आप सच में बहुत प्यारी लगती हैं ऐसे में. मैं किसी की भी कसम खा कर कह सकता हु की आप दुनिया की सबसे सुन्दर और प्यारी दीदी हैं." मैंने ऐसा कहा तो दीदी के होठो की मुस्कान और भी गहरी हो गयी.

उनके चेहरे पर एक चमक आ गयी. वो मुझे बहुत hi प्यार भरी नज़रो से देखने लगी थी. मैंने देखा की उनका गोरा चेहरा एक एक hi सुर्ख सा हो गया था और फिर तभी उन्होंने अपनी नज़रे झुका ली. उनके गुलाबी होठ कपकपाने लगे थे.

"क्या हुआ दीदी.? आपने यु अपनी नज़रे क्यों झुका ली.?" मैंने भोलेपन से कहा तो दीदी है पड़ी और फिर मेरी तरफ देखा.

"अब तू मुझसे मार khayega...chal अब मैं जा रही हु. कही ऐसा न हो की माँ मुझे ढूढ़ते हुए यहाँ आ जाये." दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा और बीएड से नीचे उतर गयी.

"ठीक है दीदी आप jaiye...main भी अब नहाने धोने जाउगा. खा पि कर पिता जी के साथ खेतो पर भी जाना है न." मैंने कहा तो दीदी ने मेरी तरफ कुछ पल देखा और फिर मेरे सर पर हलके से अपना हाथ फेर कर कमरे से बाहर चली गयी.

उनके जाने के बाद मुझे ऐसा लगा जैसे अब मैं कितना अकेला हो गया हु और मुझे अब कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. ऐसा लग रहा था की दीदी के साथ मैं भी चला जाता तो कितना अच्छा होता. मुझे कुछ और न सूझा तो मैं बीएड पर फिर से लेट गया और अपनी आँखे बंद कर ली.

आँखे बंद किये मैं दीदी के साथ हुयी बात चीत के बारे में शुरू से अब तक की साड़ी बाते सोचने लगा. सोचते सोचते मैं इस एक सवाल पर आ कर रुक गया की ऐसी क्या बात हो सकती है जिसे दीदी मुझे बता नहीं सकती.? मैंने बहुत सोचा मगर मुझे कुछ समझ न आया.

मेरे मन में अचानक ये विचार भी उभरा की मैं ऐसा क्यों चाहता हु की मेरी दीदी हर पल मेरे पास hi रहे और मैं उनकी वो मनमोहक मुस्कान देखता राहु. क्या मैं ये सब सिर्फ एक भाई के रिश्ते से hi सोचता हु या फिर इसमें कुछ और भी ऐसी कोई बात है जिसके बारे में मुझे अभी तक कोई अहसास नहीं हुआ है.?

बीएड पर लेते लेते मैं इस बारे में जाने कब तक सोचता रहा. मुझे वक्त का पता hi नहीं चला tha...wo तो जब दीदी दुबारा मेरे कमरे में खाना खाने का कहने आयी तब मुझे ध्यान आया की मुझे नहाने धोने भी जाना था. उनके बुलाने पर मैं जल्दी से उठा और फिर जल्दी जल्दी अपने कपडे उतरने लगा. कपडे उतरने के बाद मैंने एक टॉवल लिया और नीचे आँगन के पास बने टॉयलेट कॉम बाथरूम की तरफ तेजी से बढ़ गया.

खाना कहते वक्त सब नार्मल hi रहा. मैं और पिता जी साथ hi बैठ कर खाना खा रहे थे जब के माँ खाना परोस रही थी. दीदी अंदर किचन में थी. मेरे पिता जी की आदत थी की वो खाना खाते वक्त बात नहीं करते थे और न hi उन्हें खाते वक्त किसी का बात करना पसंद था. उनका कहना था की खाना खाते वक्त बात नहीं करना चाहिए. तसल्ली से खाना खाओ उसके बाद hi जो बात करना है करो.

खेतो में इस रबी में ज़्यादा कोई काम तो नहीं था मगर काम बनाये रखने के लिए कुछ न कुछ खेतो पर उगाया hi जाता था. जैसे अभी के वक्त में खेतो पर बहुत साड़ी सब्जियां उगाई गयी थी. एक तरफ नए नए पौधे लगाए जा रहे थे. हमारे यहाँ चार मजदूर 12 महीने लगे रहते थे.

खाना खाने के बाद hi मुझे ये पता चला की पिता जी खेतो पर एक नार्मल सा मकान बनवाना चाह रहे हैं. वो माँ से बात कर रहे थे. बातो से hi मुझे पता चला की मकान बनवाने की बात पहले से hi चल रही thi...ab तो बस मकान बनना शुरू hi होना था. थोड़ी देर माँ से बात करने के बाद पिता जी ने मुझसे कहा की मैं खेतो पर jaau...unhe कुछ सामान वगैरा लाना है शहर से.

मैं खेतो पर जाने के लिए तो पहले से hi तैयार था इस लिए जब पिता जी ने ऐसा कहा तो मैंने ख़ामोशी से हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद पिता जी अपने कमरे की तरफ चले गए. कमरे से वो कुछ देर में वापस आये और बाहर की तरफ चले गए. मैं भी खेतो पर जाने के लिए माँ से बताया और चल दिया तो तभी माँ की आवाज़ आयी जो की मुझे hi दे रही थी. मैं उनके पास गया तो माँ ने मुझसे कहा की मैं कुसुम दीदी को भी साथ ले जाओ.

माँ की बात सुन कर मैंने हाँ कह दिया. कुसुम दीदी अक्सर खेतो पर जाया करती हैं जब के मेरी दोनों जुड़वाँ बहने खेतो के नाम से hi मुँह बनाने लगती थी. इस वक्त वो दोनों अपने कमरे थी. दोनों को आज कल सिलाई सीखने का भूत सवार था. दीदी को सिलाई आती थी इस लिए अब वो भी उनकी नक़ल कर रही थी. वैसे भी घर में उनके पास दूसरा कोई काम तो था नहीं. इस लिए वो दोनों एक साथ कमरे में एक hi मशीन पर बारी बारी से लगी रहती थी.

सिलाई सीखने के भूत ने एक अच्छा काम ये कर दिया था की अब उन लोगो का शोर गुल काम सा हो गया था. वर्ण उन दोनों की नोक झोंक चलती रहती थी. दोनों का टारगेट मैं hi होता था. पता नहीं मुझे सताने में उन दोनों को क्या मज़ा आता था. मैं उन दोनों पर कभी गुस्सा नहीं करता था. उनकी चुहल बाज़ियो पर मुझे भी मज़ा आता था.

आज के लिए इतना hi भाई लोग & सॉरी फॉर लेट.....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ.....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

भाई आपने ऐसी बात कही तो मुझे सच में ख़ुशी हो रही है. मैंने साइलेंट रीडर बन कर स्टोरीज पढ़ी बहुत हैं. सभी वरिटेरस को पढ़ा है और उनकी राइटिंग स्किल्स को देखा है. मैं कोशिश कर रहा हु की अच्छा लिख सकू. बाकी आप लोग hi जानो भाई लोग. मैं बस लिखे जा रहा हु....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 18....

रीड & एन्जॉय....
 
भाई लोग स्टोरी पसंद आ रही है na....Kahi कोई गलती हो तो बता देना यार. मुझे जो समझ में आता है मैं लिखे जा रहा हु. सही गलत का मुझे पता नहीं है. इस लिए खुल के बता देना मुझे. और भाई लोग लम्बा रिव्यु तो कोई देता hi नहीं है. चलो छोडो आपकी मर्ज़ी....

नेक्स्ट अपडेट विल कमिंग सून....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
 
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