SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 5 - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

भय आपका रिव्यु मुझे बहुत अच्छा लगा. अपने इसमें जो भी कहा और जो भी सवाल किया उससे पता चलता है की अपने अच्छे से अपडेट पढ़ा है. आपके रिव्यु में मुझे बाते ऐसी भी मिली जो मेरे लिए इम्पोर्टेन्ट हैं. यारा इसी लिए तो कहता हु की आप ऐसे hi साथ दो तो मुझे काम की चीज़े भी मिलेगी और ख़ुशी भी....

भय कुछ लोग फ्लैशबैक को जल्दी ख़तम करने की बात बोलते हैं. मगर फ्लैशबैक में hi इतना मटेरियल है की उसे जल्दी ख़तम नहीं किया जा सकता. सो मैंने सोच लिया है की उसे अपने हिसाब से hi लिखुगा. बीच बीच में प्रेजेंट का भी दिखाऊगा. फिर जब फ्लैशबैक की साडी बाते एन्ड हो जाएगी तो प्रेजेंट कंटिन्यू हो जायेगा. मैंने ठीक कहा न भय.?

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 19

फ्लैशबैक स्टार्ट....


मुझे याद आया की घर पहुंचते hi कुसुम दीदी मुझसे पूछेगी की मैं किस काम से सज धज कर शहर गया था और मेरे लिए क्या लाये हो तो मैं उनको क्या जवाब दुगा.? यही सोच कर मैंने मोटर सिक्ले को मार्किट की तरफ मोड़ दिया. कुछ hi टाइम में मैं मार्किट में था और एक स्टेशनरी की दूकान के अंदर जा कर वह से एक बुक खरीदी मैंने. यु तो मुझे बुक खरीदने की कोई ज़रूरत नहीं थी मगर मैं दीदी की नज़र में एक पढ़ने वाला लड़का था इस लिए स्टडी से रिलेटेड मैंने ये बुक खरीदी थी.

बुक ले कर मैं एक स्वीट की दुकान पर आया और वह से कुछ स्वीट पैक करवाया और फिर घर के लिए चल दिया. अब मेरे पास जवाब देने के लिए इन चीज़ो का बहाना था. शहर से मैं गांव जाने वाले रास्ते की तरफ चल पड़ा.

सरे रास्ते मैं आज रचना के साथ बिताये हुए पालो के बारे में सोचता रहा था. ख़ास कर उस सन को जो लास्ट में उस जंगल में देखा था. मैं सोच रहा था की कैसे रचना उस प्रेमी जोड़े की उस करतूत को देख कर एकदम से गुमसुम सी हो गयी थी. उसके पहले वो मुझसे कितना है है के बाते कर रही थी. मगर उस सन को देखने के बाद उसकी हालत जैसे खराब hi हो गयी थी. वो मुझसे नज़रे नहीं मिला प् रही थी. शर्म से उसका बुरा हाल था शायद. मुझे खुद भी बहुत अजीब महसूस हो रहा था मगर रचना से शायद काम.

यही सब सोचते हुए मैं घर पहुंच गया. शाम के 4 बज चुके थे. घर के दरवाजे पर आ कर मैंने कुण्डी खटखटायी तो थोड़ी देर में दरवाजा खुला. दरवाजा दीदी ने hi खोला था. मुझे देख कर उनके खूबसूरत चेहरे पर चमक आ गयी और सुर्ख होठो पर मनमोहक मुस्कान भी खिल गयी.

दीदी की मुस्कान को देख कर मैं भी मुस्कुराया और फिर दरवाजे के अंदर आ गया. अंदर कोई नहीं दिखा मुझे. पिता जी का तो पता था की वो खेत में hi होंगे. मगर माँ मुझे नज़र न आयी. तभी कुसुम दीदी आयी तो मैंने उनसे माँ के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया की माँ पड़ोस में गयी हैं. मेरी दोनों जुड़वाँ बहने भी माँ के साथ hi गयी थी. मैंने दीदी को अपने हाथ में लिए हुए पैकेट को पकड़ाया और फिर कमरे की तरफ चला गया.

कमरे में आ कर मैंने अपने कपडे उतरे और फिर एक टॉवल लपेट कर नीचे आया. मुझे फ्रेश होना था इस लिए आँगन की तरफ चला गया और वह पर मैं बाथरूम में फ्रेश हुआ. फ्रेश होने के बाद मैं वापस अपने कमरे में दीदी को चाय का कह कर आ गया.

करीब 10 मिनट बाद दीदी मेरे कमरे में चाय ले कर आयी और मुझे चाय दिया और एक कप खुद ले कर मेरे पास hi बीएड पर बैठ गयी. हम दोनों ने चाय pi...chaay पिटे वक्त दीदी मुझे hi देख रही थी और मैं ये सोच रहा था की दीदी को रचना के बारे में बताओ या नहीं. फिर मैंने उनको बता देना hi ठीक समझा क्यों की अगर ये बात उनको कही और से पता चली तो उनको बहुत दुःख भी होगा.

"तो तुम सिर्फ इतने से काम के लिए शहर गए थे विक्की.? ये मिठाई और वो एक किताब के लिए. या कोई दूसरा काम था?" दीदी ने इस तरह पूछा तो मैंने उनकी तरफ देखा. मैंने खुद को तैयार कर लिया था दीदी को सब कुछ बताने के लिए मगर इस वक्त नहीं बल्कि रात में जब दीदी मेरे कमरे में सोने आएगी.

"आपको क्या लगता है दीदी.?" मैंने उनकी तरफ देखते हुए पूछा तो उन्होंने मुझे कुछ देर देखा फिर बोली.

"मुझे तो कुछ और hi लगता है विक्की. सिर्फ इतने से काम के लिए तो तुम शहर नहीं गए थे. ज़रूर कोई दूसरा काम था जिसके लिए तुम आज इतना सज धज कर गए थे. अब अगर तुम्हारा दिल करे तो वो असली वजह बताओ मुझे भी." दीदी ने कहा तो मैंने कहा.

"ज़रूर बताउगा दीदी मगर अभी नहीं बल्कि तब जब आप रात में कमरे में सोने आएगी. तभी मैं तसल्ली से आपको सब कुछ बताउगा." मैंने कहा तो दीदी ने मुझे बड़े ध्यान से देखा. उनके चेहरे से ऐसा लगा जैसे वो अचानक hi कुछ सोचने लगी हो.

"कही तुम विभा से मिलने तो नहीं गए थे विक्की.?" दीदी ने ये कहा तो मैं एकदम से हैरान हुआ फिर नार्मल हो कर मुस्कुराया.

"नहीं didi...usse मिलने का तो कोई सवाल hi नहीं है. आप जानती हैं की मैंने उससे पहले hi हर रिश्ता तोड़ लिया था. अब तो बस उसकी यादे हैं बाकी कुछ नहीं." मैंने ऐसा कहा तो दीदी ने कहा.

"तो फिर किस काम से शहर गए थे तुम.?" दीदी ने पूछा तो मैंने कहा.

"बोलै न की रात में बताउगा सब कुछ. इस लिए रात होने का इंतज़ार कीजिये." मैंने कहा तो दीदी ने हाँ में सर हिलाया. कुछ देर बाद दीदी कमरे से चली गयी तो मैं बीएड पर लेट कर आराम करने लगा.

रात में खाना पीना करने के बाद मैं अपने कमरे में लेता हुआ था और आज दिन में रचना के साथ बिताये हुए उन पालो के बारे में सोच रहा था. मैं सोच रहा था की उन दो प्रेमियों को उस हालत में देखने के बाद रचना के मन अब क्या क्या चल रहा होगा. अब जब वो मुझे कॉल करेगी तो क्या वो मुझसे उसके बारे में कोई बात करेगी.?

मेरे मन में अजीब तरह के ख़याल आ रहे थे. खेर 11:30पं पर दीदी कमरे में आयी और दरवाजे की कुण्डी लगा कर बीएड पर आ कर मेरे बगल से लेट गयी. कुछ देर मुझे देखने के बाद उन्होंने मुझसे कहा की अब मैं उनको बताओ जो उन्हें रात में बताने को बोलै था.

"चल अब शुरू से बता विक्की और हाँ मुझसे कोई भी बात छिपाने की सोचना भी मत." कुसुम दीदी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा तो मैं सोच में पद गया. मुझे समझ न आया की मैं दीदी को कैसे रचना के बारे में बताओ.? वो साडी बात जान कर क्या कहेगी मुझसे.?

"क्या हुआ बता न अब." दीदी ने मुझे चुप देख कर फिर से कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है दीदी मैं सब कुछ बताता हु मगर उससे पहले आप मुझसे वडा कीजिये की आप सब कुछ जान कर गुस्सा नहीं करेगी." मैंने ऐसा कहा तो दीदी हैरानी से मुझे देखने लगी फिर बोली.

"ऐसी कौन सी बात है की मैं गुस्सा करुँगी.?" दीदी ने पूछा तो मैंने कहा.

"कोई तो ऐसी बात है hi दीदी. तभी तो आपसे बोल रहा हु की वडा कीजिये." मैंने कहा तो दीदी ने कुछ देर सोचा फिर बोली.

"अच्छा चल ठीक है. मैं वडा करती हु की तेरी बात सुन कर गुस्सा नहीं करुँगी." दीदी ने कहा तो मैंने उनके खूबसूरत चेहरे की तरफ ध्यान से देखा फिर बोलै.

"मैं आज रचना से मिलने के लिए शहर गया था दीदी." मैंने एक सांस में कह दिया तो दीदी ने हैरानी से पूछा.

"रचना.? ये कौन है.?" दीदी ने पूछा तो मैंने कहा.

"सरपंच की सबसे छोटी लड़की. उसी का नाम रचना है. क्या आप उसे नहीं जानती.?" मैंने बताते हुए पूछा तो दीदी एकदम से शॉक हो गयी फिर बोली.

"ये तू क्या कह रहा है विक्की.? तू उस सरपंच की लड़की से मिलने शहर गया था.? हे भगवन तू ऐसा कैसे कर सकता है भाई.? क्या तुझे पता नहीं है की अगर इस बारे में सरपंच काका को पता चल गया तो वो हमारे साथ क्या कर सकता है.?" दीदी ने बुरी तरह घबराते हुए कहा तो मैंने कहा.

"जनता हु didi...sab जनता हु." मैंने कहा तो दीदी बोल पड़ी.

"अगर जनता है तो तू उससे मिलने क्यों गया था fir...aur सबसे बड़ा सवाल ये की तू सरपंच की लड़की को कैसे जनता है और कबसे जनता है.?" दीदी ने पूछा तो मैंने कहा.

"अभी कुछ टाइम से hi जनता हु उसे." मैंने बताया तो दीदी बोल पड़ी.

"कैसे जनता है उसे.?" दीदी ने हैरानी से पूछा तो मैंने उनको साडी बाते शार्ट में बता दी. सब कुछ जानने के बाद दीदी शॉक रह गयी थी. वो एकदम से बीएड पर उठ कर बैठ गयी थी और मुझे ऐसे देख रही थी जैसे मैं कोई अजूबा हु.

"मुझे भरोसा नहीं होता की मेरा भाई ऐसा भी कर सकता है." दीदी ने इस बार दुखी हो कर कहा तो मैंने कहा.

"आप गलत समझ रही हैं दीदी. मैं तो रचना से कोई बात hi नहीं करना चाहता था उससे मिलने की तो बात hi दूर है. मगर जब उसने ज़्यादा ज़ोर दिया तो मैंने ये सोच कर उससे बात की के देखु ये मुझसे क्या चाहती है. अगर ये मुझसे अपने भाई का बदला लेने के लिए बात करना या मिलना चाहती है तो ये भी देखूगा की ये कहा तक जाती है.? इसके अलावा मेरा उससे कोई मतलब नहीं है दीदी. आप मेरा यकीन कीजिये." मैंने दीदी से ये सब कहा तो दीदी ने कहा.

"मैं गलत नहीं समझ रही हु विक्की. मुझे पता है की मेरा भाई गलत नहीं हो सकता. मैं ऐसा इस लिए कह रही हु क्यों की वो सरपंच की बेटी है और तेरा उससे बात करना या मिलना हमें किसी बहुत बड़ी मुसीबत में दाल सकता है. ये भी हो सकता है की सरपंच ने hi अपनी बेटी को तेरे पीछे लगाया हो. वो कुछ भी कर सकता है विक्की. तुझे फ़साने के लिए वो अपनी बेटी का उसे भी कर सकता है." दीदी ने गंभीरता से कहा तो मैंने कहा.

"हाँ मुझे इसका अहसास है दीदी और इसी लिए मैं रचना से उतना hi बात करता हु जितने में ये न हो की मुझ पर या मेरे घर वालो पर कोई आफत आये. आप जिस बात के बारे में सोच रही हैं उस बात को मैंने भी सोचा था दीदी. मैं बस देखना चाहता हु की रचना क्या करना चाहती है. जिस दिन मुझे लगा की उसके इरादे ठीक नहीं हैं उसी दिन मैं उससे किनारा कर लगा." मैंने ये सब कहा तो दीदी ने कहा.

"तू कुछ भी कह विक्की मगर मुझे इस सबसे अब बहुत दर लगने लगा है. पता नहीं उस रचना के मन में तेरे लिए क्या क्या हो. तू उससे बात करना और मिलना छोड़ दे मेरे भाई. जिसका भाई और बाप ऐसा है उसकी बहन और बेटी कैसी होगी.?" दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"आप फ़िक्र न कीजिये दीदी. मैं ऐसा कोई काम hi नहीं करुगा जिससे वो मुझे फसा सके. मैं बस देखना चाहता हु की उसके इरादे क्या हैं.?" मैंने कहा तो दीदी मुझे देखती रह गयी.

"तो आज तू उससे पहली बार मिलने गया था शहर.?" कुछ देर बाद दीदी ने पूछा तो मैंने कहा.

"हाँ didi...maine तो पहले मिलने से इंकार hi कर दिया था मगर जब उसने ज़्यादा ज़ोर दिया तो मैंने भी सोचा की चलो मिल hi लेता हु उससे. आखिर पता तो चले की वो किस लिए मुझसे मिलना चाहती है.?" मैंने कहा तो दीदी ने कहा.

"तो आज मिलने के बाद उसने क्या कहा तुझसे.?" दीदी ने मुझे ध्यान से देखते हुए पूछा तो मैंने उनको आज की साडी बाते बता बाटी. बस ये नहीं बताया की कैसे मैं और रचना ने वह पर एक प्रेमी जोड़े को उस हालत में देखा था.

"उसने तुझसे ये क्यों पूछा की तेरी कोई गफ क्यों नहीं बानी आज तक.? ये सब पूछने से उसका क्या मतलब था.? कही ऐसा तो नहीं की वो खुद तेरी गफ बनना चाहती हो.? देख विक्की मुझे उसके इरादे अच्छे नहीं लग रहे. तू अब दुबारा उससे मत मिलना और न hi उससे फ़ोन पर कोई बात करना." दीदी ने कहा तो मैं मुस्कुरा उठा.

"आप बहुत ज़्यादा सोच रही हैं दीदी. मैं तो वैसे भी उससे कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता. मेरा मकसद तो बस ये जानना है की उसने अचानक मुझसे दोस्ती करने का क्यों सोचा.? मुझे भरोसा है दीदी की इस बारे में जल्द hi पता चल जायेगा." मैंने कहा तो दीदी मुझे अजीब तरह से देखने लगी.

"तू समझता क्यों नहीं है विक्की.? वो लड़की सही नहीं है. उसका बाप बहुत खतरनाक आदमी है. वो तुझे फ़साना चाहती है. मुझे साफ़ साफ़ महसूस हो रहा है की इस सबसे कोई बखेड़ा हो जायेगा. इस लिए मेरी बात मान ले भाई. तू अब उससे कोई बात मत करना." दीदी ने कहा तो मैंने कहा.

"आप कहती हैं तो अब मैं उससे कोई बात नहीं करुगा दीदी. मैं तो वैसे भी उससे कोई बात करना hi नहीं चाहता था. मगर मैंने उससे बात इसी लिए की के मैं देखना चाहता हु की वो या उसका बाप क्या करना चाहता है.?" मैंने कहा तो दीदी ने कहा.

"मैं ये सब नहीं जानती विक्की. मैं बस ये जानती हु की तू अब उससे कोई मतलब नहीं रखेगा. क्या तू अपनी दीदी की ये बात नहीं मानेगा.?" दीदी ने इस बार बड़ी मासूमियत से कहा तो मैंने उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा.

"ऐसा कभी नहीं हो सकता दीदी की मैं आपकी बात न मानु. आपका हर हुकुम मैं बिना सोचे समझे मानुगा." मैंने दीदी से प्यार से कहा तो दीदी के होठो पर मुस्कान खिल गयी.

"हाँ इतना तो मुझे भी तुझ पर यकीन है की तू मेरी कोई भी बात ताल नहीं सकता." दीदी ने कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा आपको इतना यकीन क्यों है दीदी.?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा तो दीदी ने भी मुस्कुराते हुए कहा.

"बस यकीन है और वैसे भी आज तक ऐसा हुआ भी तो नहीं है की तूने मेरी कोई बात ताली हो." दीदी ने कहा तो मैं उनकी तरफ देखता रहा बोलै कुछ नहीं.

"अब ऐसे क्यों देख रहा है मुझे.?" दीदी ने हस्ते हुए कहा तो मैंने कहा.

"क्यों की आपको देखने से मुझे ख़ुशी महसूस होती है. मेरा मन खुश हो जाता है. काश ऐसा हो की आप हर वक्त मेरी आँखों के सामने रहो और मैं आपको देखता राहु." मैंने कही खोये हुए ऐसा कहा तो दीदी ने हैरानी से मुझे देखा.

"अच्छा ji...magar मैं तो ज़्यादातर तेरे सामने hi रहती हु न विक्की." दीदी ने फिर मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने कहा.

"क्या आपको भी ऐसा लगता है दीदी जैसे मुझे लगता है.?" मैंने पूछा तो दीदी ने कहा.

"मतलब.?" दीदी ने पूछा तो मैंने कहा.

"जैसे मैंने कहा की काश ऐसा हो की आप हमेशा मेरे सामने रहो और मैं आपको देखता राहु. तो क्या आप भी ऐसा सोचती हैं.?" मैंने कहा तो दीदी ने कहा.

"हाँ bilkul...main भी अक्सर यही सोचती हु की मेरा इतना ख़याल रखने वाला मेरा भाई हर वक्त मेरी आँखों के सामने hi रहे और मुझसे अच्छी अच्छी ढेर साडी बाते करे." दीदी ने कहा तो मैं देखता रह गया उन्हें.

कुछ देर और हम दोनों के बीच बाते हुयी उसके बाद हम दोनों ने एक दूसरे को गुड नाईट कहा और सोने के लिए लेट गए. दीदी का तो पता नहीं मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी. मैं दीदी की बातो के बारे में सोच रहा था. दीदी ने साफ़ साफ़ कह दिया था की अब मैं रचना से कोई मतलब न राखु. उनकी बात को मैं भूल कर भी ताल नहीं सकता था. इस लिए मैंने अब फैसला कर लिया था की अब मैं रचना से कोई मतलब नहीं रखुगा और न hi उसकी कॉल उठाऊंगा.

यही सब सोचते हुए मैं जाने कब सो गया था. सुबह हुयी तो हर दिन की तरह मेरी दिन चर्या शुरू हुयी. मैंने मोबाइल पर देखा था रचना का रात में कोई मैसेज नहीं आया था और न hi सुबह कोई मैसेज आया था. इसका मतलब उसके दिल और दिमाग से अभी भी वो मंज़र नहीं हटा था.

सुबह 10 बजे पिता जी मेरी दोनों जुड़वाँ बहने और मैं सुबह का नास्ता करने बैठे थे. तभी बाहर गेट पर कुण्डी बजने की आवाज़ आयी तो माँ ने जा कर दरवाजा खोला. दरवाजे के बाहर खड़े आदमी को देख कर माँ बुरी तरह हैरान हुयी और अंदर hi अंदर घबरा भी गयी. फिर जल्दी से उन्होंने सर पर साड़ी का घूंघट कर लिया.

हमारे गांव में औरते ऐसा hi करती थी. अगर गांव का कोई बड़ा बुजुर्ग सामने आ जाये तो औरते जल्दी से घूंघट कर लेती थी. बाहर जो आदमी खड़ा था वो गांव का सरपंच मणि शंकर था. मणि शंकर आगे में मेरे पिता जी से बड़ा था इस हिसाब से मेरी माँ ने उसे देख कर घूंघट कर लिया था.

"वो मैं जरा महेश से मिलने आया था. अगर वो घर पर है तो उसे बता दो की मैं आया हु. और haan...kisi बात से घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है. मैं तो एक ज़रूरी काम से आया हु महेश के पास." मणि शंकर ने शांत लहजे में ये सब कहा तो माँ ने एक तरफ हैट कर अंदर आने का उसे रास्ता दे दिया. मणि शंकर अकेला hi आया था. उसके साथ दूसरा कोई नहीं था.

मणि शंकर अंदर आया और बैठक में बैठ गया. उधर दरवाजा बंद करके माँ भी अंदर आ गयी थी. माँ ने पिता जी को मणि शंकर के यहाँ आने के बारे में बताया तो पिता जी भी हैरान रह गए. फिर जल्दी से नास्ता ख़तम कर वो बैठक में आ गए. माँ को उन्होंने मणि शंकर के लिए चाय नास्ते का बोल कर आ गए थे.

पिता जी तो बैठक की तरफ चले गए. मगर मैं ये जान कर अंदर hi अंदर घबराया हुआ था की रचना का बाप हमारे घर आया हुआ था. मेरे मन में तरह तरह की आशंकाए उभर रही थी. मुझे लगा कही मणि शंकर को मेरे और रचना के मिलने के बारे में पता तो नहीं चल गया.?

मैं आराम से नास्ता कर रहा था मगर मणि शंकर के आ जाने से अब मुझसे खाया नहीं जा रहा था. मैं बुरी तरह घबरा सा गया था. मैंने भी किसी तरह नास्ता किया और उठ कर अपने कमरे की तरफ चला गया. मैं अपनी घबराहट को किसी को दिखाना नहीं चाहता था. उधर किचन में नास्ता बना रही दीदी को जब पता चला की सरपंच आया है तो उनकी हालत भी मेरी तरह हो गयी.

"ारी भाई साहब आप यहाँ.?" बैठक में आते hi पिता जी ने मणि शंकर को देखते हुए कहा तो मणि शंकर ने मुस्कुराते हुए कहा.

"यार महेश ये क्या बात हुयी.? क्या मैं यहाँ नहीं आ सकता.?" मणि शंकर ने ये कहा तो पिता जी ने कहा.

"क्यों नहीं आ सकते भाई साहब. ये भी तो आप hi का घर है. मुझे तो ख़ुशी hi हुयी की आप यहाँ आये" पिता जी ने कहा तो मणि शंकर ने कहा.

"ये तो अच्छी बात है महेश. खेर chhodo...Asal में मैं उस घटना की वजह से बहुत शर्मिंदा था. गलती तो सच में मेरे बेटे की hi थी. मगर एक बाप होने के नाते मैंने अपने बेटे की उस गलती पर पर्दा दाल कर उसे hi सबके सामने सही ठहरने की कोशिश की. मैं ये भूल गया था की जो गलती मेरे बेटे ने की और जो कुछ उसने कुसुम बिटिया के लिए कहा था वही सब अगर कोई मेरी अपनी बेटी से कहता तो कैसा लगता मुझे. यार महेश हम इंसान भी बड़े अजीब होते हैं न.? दुसरो की इज्जत की हमें परवाह नहीं hoti...ham बस अपनी इज्जत और अपने हिट के hi बारे में सोचते हैं. जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. हमें तो सबके बारे में अपने जैसा hi सोचना चाहिए." मणि शंकर ये सब कहने के बाद थोड़ी देर के लिए रुका फिर बोलै.

"मैं जनता हु महेश की मेरे बेटे ने गलती की थी और उससे बड़ी गलती ये हुयी की मैंने अपने बेटे को उस गलती की सजा देने के बजाय उसे सच साबित करने की कोशिश की. अब इसे तुम मेरे अपने बेटे के लिए प्यार समझो या मेरी गलती. मगर इस सब के बाद मुझे भी अहसास हुआ की गलत करने का अंजाम तो यही होना चाहिए था. मुझे उस सबका अहसास हुआ महेश. मैं तुमसे उस सबके लिए माफ़ी भी मांगना चाहता था मगर तुम्हारे सामने आने की मुझ में हिम्मत hi नहीं हो रही थी. आज उस घटना को बीते महीना गुज़र गया. मैं हर दिन सोचता था की तुम्हारे घर औ और उस सबके लिए तुमसे माफ़ी मागु. मगर महीने भर से हिम्मत जुटाने के बाद आज मैंने प्राण कर लिया था की आज तुम्हारे घर जा कर hi रहुगा. इस लिए mahesh....ho सके तो मुझे और मेरे बेटे को माफ़ कर दो. मैं मंटा हु की मैं बहुत बुरा आदमी हु मगर ये भी सच है की हर बुरे से बुरे आदमी को भी एक दिन ये अहसास होता है की उसने अब तक जो कुछ भी किया वो कितना गलत था. मेरे साथ भी ऐसा hi हुआ है. अगर ऐसा नहीं होता तो आज मैं तुम्हारी चौखट पर तुमसे माफ़ी मांगने नहीं आता." मणि शंकर ने ये सब कहा तो महेश ने कहा.

"उस सब को भूल जाइये भाई साहब. मुझे पता है की हर इंसान से गलतिया होती हैं. अच्छा इंसान वही है जो अपनी गलती को समझते हुए अच्छे रास्ते पर चलने लगे. आप यहाँ आये हैं तो ये साबित हो गया की आप अच्छे रास्ते पर हैं. मुझे ख़ुशी है की आप अपने इस छोटे भाई के घर आये. ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है." महेश ने ये सब कहा तो मणि शंकर मन hi मन हैरान हुआ की महेश उससे ये सब कह रहा है. उसने तो सोचा था की शायद महेश उसे अपने घर में आने hi नहीं देगा और अगर आने दिया भी तो उसे खरी खोटी सुनाएगा. मगर यहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

उसे तो ऐसा लग रहा था जैसे महेश उसकी इन बातो से hi गदगद हो गया है और अब उसकी मीठी मीठी बातो में आ गया है. ये सोच कर मणि शंकर अंदर hi अंदर खुश हो गया था. उसे लगा महेश को शीशे में उतारने में उसे ज़्यादा म्हणत नहीं करनी पड़ेगी.

"तुम सच में बहुत अच्छे हो महेश. तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है. वर्ण इतना कुछ होने के बाद तुम मुझे अपने घर में घुसने भी न देते." मणि शंकर ने कहा तो महेश बोल पड़ा.

"नहीं भाई साहब. मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता. हाँ ये ज़रूर है की इसके पहले मैं इस सबके लिए थोड़ा दुखी सा था मगर अब नहीं हु. आप यहाँ आये और ये सब कहा तो मेरा वो दुःख मिट गया है. आप मुझसे बड़े हैं और मुझसे माफ़ी मांग रहे हैं तो मुझे अच्छा नहीं लग रहा. इस लिए आप ऐसा मत कीजिये. आपका आशीर्वाद हम पर बना रहे यही कामना है." महेश ने कहा तो मणि शंकर और भी हैरान रह गया. वो ये तो जनता था की महेश पांडेय नाम का ये आदमी और इसका परिवार बहुत hi अच्छे लोग हैं मगर सच में इतने अच्छे हैं ये नहीं जनता था वह.

"ऐसा कह कर तुमने मेरे सर का बोझ हल्का कर दिया है महेश. महीने भर से मैं उस पाप के बोझ टेल दबा हुआ था." मणि शंकर ने कहा तो महेश कुछ न बोलै.

तभी रेणुका ट्रे में नास्ते की प्लेट लिए आयी और मणि शंकर के सामने राखी टेबल पर रख दिया. महेश ने मणि शंकर से हाथ जोड़ कर नास्ता करने को कहा तो मणि शंकर ने मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिलाया.

रेणुका ने टेबल पर नास्ते की प्लेट और लोटा गिलास में पानी रख दिया था. उसके बाद वो अंदर चली गयी थी. प्लेट से नमकीन और बिस्कुट उठा कर मणि शंकर खाने लगा था.

"और घर में सब कैसे हैं महेश.?" मणि शंकर ने पूछा तो महेश ने कहा.

"सब आप बड़े बुजुर्गो के आशीर्वाद से अच्छे hi हैं भाई साहब." महेश ने कहा तो मणि शंकर ने कहा.

"अच्छा मैं एक दिन अपने खेतो की तरफ से आ रहा था शाम को तो देखा की तुम दोनों बाप बेटे अपने खेतो की तरफ से इस तरफ आ रहे थे. क्या तुम्हारे साथ तुम्हारा बीटा भी खेती बाड़ी का काम करने लगा है.?" मणि शंकर ने ये कहा तो महेश ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मैंने तो उसे खेती बाड़ी का काम करने के लिए नहीं कहा भाई साहब. वो खुद hi खेतो की तरफ चला आता है और दिन भर मेरे साथ लगा hi रहता है काम में. मैंने उसे कई बार मन किया था की ये सब उसके बस का काम नहीं है मगर वो मानता hi नहीं." महेश ने कहा तो मणि शंकर है पड़ा फिर बोलै.

"ारी भाई उसे अगर खेती बाड़ी का काम hi करना था तो फिर इतना पढ़ने लिखने की क्या ज़रूरत थी.? मैंने इस गांव में बहुत लोगो के मुँह से सुना है की तुम्हारा बीटा बहुत होशियार और पढ़ने लिखने में तेज़ है. पता चला की तुम्हारे बेटे ने बीएससी किया है. इस गांव में इतना पढ़ा लिखा तो दूसरा कोई छोकरा नहीं है. एक हमारे साहबज़ादे हैं दिन भर आवारागर्दी करते घूमते रहते हैं. सोचा था की जहा तक कहेगा उसे वह तक पढ़ाऊंगा मगर नहीं. बड़ी मुश्किल से 10 तक पंहुचा और तीन साल फ़ैल हुआ 10 में. इतना सारा काम काज देखना होता है मगर उसके बस का नहीं है." मणि शंकर ने ये सब कहते हुए जब महेश के बेटे की तारीफ की तो महेश को बहुत अच्छा लगा.

"क्या करे भाई साहब. उसे पढ़ा लिखा तो दिया है. मगर बाहर नौकरी के लिए उसे भेजना नहीं चाहता. एक hi तो बीटा है. कभी आँखों से दूर नहीं किया उसे. उसके लिए मैंने इतना बना दिया है की उसे कही बाहर नौकरी करने की ज़रूरत hi नहीं है. मैं और विक्की की माँ बस यही चाहते हैं की वो हमेशा हमारी आँखों के सामने hi रहे." महेश ने ये कहा तो मणि शंकर ने कहा.

"हाँ मैं समझ सकता हु महेश. अपनी औलाद के लिए हर माँ बाप यही सोचते हैं. खेर ये तो अछि बात है की तुम दोनों अपने बेटे को आँखों से दूर नहीं जाने देना चाहते मगर ये भी सच है की पढ़ने लिखने के बाद हर लड़का सोचता है की वो अपनी पढ़ाई के हिसाब से कही अच्छी सी नौकरी भी करे." मणि शंकर ने कहा तो महेश ने कहा.

"हाँ ये तो ठीक कहा अपने. मैंने इस बारे में विक्की से बात की थी मगर उसने भी यही कहा की वो हमसे दूर नहीं रहना चाहता. हमारी तो शुरू से hi ये इच्छा थी की वो बस पढ़ लिख ले बाकी उसे नौकरी करने के लिए कही बाहर जाने की ज़रूरत नहीं है." महेश ने ये कहा तो मणि शंकर मुस्कुरा उठा.

"और अगर तुम्हारे बेटे को ऐसी नौकरी मिल जाये जिसमे उसे कही बाहर जाना hi न पड़े तो.?" मणि शंकर ने मुद्दे की बात करने का सोचते हुए ये कहा तो महेश उलझ सा गया फिर बोलै.

"मैं कुछ समझा नहीं भाई साहब." महेश ने कहा तो मणि शंकर ने कहा.

"ारी भाई सीढ़ी सी बात है. तुम चाहते हो की तुम्हारा बीटा तुम्हारी आँखों के सामने hi रहे. इस लिए तुम उसे बाहर कही नौकरी नहीं करने देना चाहते. तो मैं ये कह रहा हु की अगर तुम्हारे बेटे को ऐसी नौकरी मिल जाये जिससे वो तुम्हारी आँखों के सामने hi रहे तो क्या तुम ऐसा नहीं चाहोगे.?" मणि शंकर ने ये कहा तो महेश ने कहा.

"ऐसी नौकरी कहा मिलेगी भाई साहब.? बिना घर से बाहर गए नौकरी कहा मिलती है भला.?" महेश ने कहा तो मणि शंकर है कड़ा.

"तुम्हारा बीटा पढ़ा लिखा है महेश. तुम्हे शायद पता नहीं होगा. अगले महीने hi सचिव का चुनाव होने वाला है यहाँ. अब सचिव के लिए कई कंडीडेट खड़े हो सकते हैं. मगर वो कंडीडेट ऐसे होंगे जो ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं होंगे. आज युग बदल गया है. देश समाज को पढ़े लिखे लोगो की ज़रूरत है. देश समाज का उज्जवल भविष्य पढ़े लिखे युवाओ के हाथ में hi है. अनपढ़ कंडीडेट देश समाज की बेहतरी के बारे में उस तरह नहीं सोच सकते जैसे कोई पढ़ा लिखा सोच सकता है. मेरे मन में ख़याल आया की हमारे गांव में युवा वर्ग में सबसे ज़्यादा पढ़ा लिखा तुम्हारा hi बीटा है तो क्यों न सचिव का चुनाव तुम्हारा बीटा लाडे और जीत कर सचिव बने. तुम्हे तो पता hi है की इस नौकरी में जो सचिव बनता है उसे यही रहना होता है और अगर किसी दूसरी जगह का सचिव बनाया गया तो मैं ऊपर बात करके उसे अपने यहाँ का hi करवा सकता हु. हमने तो इस बारे में कुछ लोगो के साथ विचार भी किया था. सबने यही कहा की तुम्हारा बीटा सचिव के लिए बहुत बेहतर होगा." मणि शंकर ने ये सब कहा तो महेश सोच में पद गया.

"इसमें इतना सोचने की क्या बात है महेश.? सचिव कोई मामूली तो नहीं होता. वैसे भी तुम तो यही चाहते हो न की तुम्हारा बीटा तुम्हारी आँखों के सामने hi रहे तो सचिव बन कर वो तुम्हारी आँखों के सामने hi रहेगा. मैं ऊपर बात कर लगा की उसे किसी दूसरी जगह न भेजा जाये बल्कि वो हमारे अपने गांव में hi रहे. मैं बहुत सोच विचार करके तुम्हारे पास आया हु महेश. मैं तुम्हे पहले hi बता चूका हु की उस घटना से मैं बहुत शर्मिंदा था और मैं तुमसे माफ़ी भी मांगना चाहता था मगर हिम्मत नहीं हो रही थी तुम्हारे पास आने की. मुझे लग रहा था की क्या तुम मुझे माफ़ कर पाओगे.? और फिर जब सचिव का मामला मुझे पता चला तो मैंने बिना सोचे विचारे ये तय कर लिया की सचिव तो तुम्हारा बीटा hi बनेगा. मैंने सोचा की मैं अपने और अपने बेटे की गलतियों का प्रायश्चित ये सब कर के करुगा तो बहुत अच्छा होगा." मणि शंकर ने ये सब कहा तो महेश ने कहा.

"कहते तो आप ठीक hi हैं भाई साहब मगर मुझे समझ नहीं आ रहा की मैं इस बारे में क्या फैसला करू.?" महेश ने कहा तो मणि शंकर ने कहा.

"तुम भी हद करते हो यार. बेटे को पढ़ा लिखा कर काबिल बना दिया और अब उसे अपनी तरह किसान बना देना चाहते हो. यार उसकी पढ़ाई लिखाई का कुछ तो सम्मान करो महेश. एक बात तुम खुद सोचो की जिस आदमी को भी ये पता चलेगा की तुम अपने बेटे को पढ़ा लिखा कर किसानी hi करवा रहे हो तो वो सब यही कहेगे की फिर तुमने अपने बेटे को पढ़ाया hi क्यों था.? कल को तुम्हारे बेटे की शादी होगी तो लड़की वाले भी यही सोचेंगे. इस लिए अगर ऐसी कोई नौकरी मिल रही है जिससे तुम्हारा बीटा तुम्हारी आखो के सामने hi रहे तो फिर ज़्यादा सोचना नहीं चाहिए. काश तुम्हारे जैसा काबिल बीटा भगवन ने मुझे दिया होता तो आज मैं भी शान से सबसे कहता की देख लो पुरे गांव में मेरे बेटे जैसा पढ़ा किसी और का बीटा नहीं है. महेश औलाद जब होनहार हो तो हर बाप का सर ुचा हो जाता है और अगर नालायक हो तो उसे सबके सामने शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है. मुझे भी लगा करता है की मेरा बीटा तुम्हारे बेटे जैसा पढ़ा लिखा होता तो मैं उसे सचिव बनवा देता. मगर मेरा ये अरमान इस जनम में पूरा नहीं हो सकता." मणि शंकर ने दुखी लहजे में ये कहा तो महेश ने कहा.

"मुझे सोचने का वक्त दीजिये भाई साहब. मैं विक्की की माँ से भी इस बारे में चर्चा करुगा. उसके बाद जो भी नतीजा निकलेगा उसके बारे में आपको बता दुगा." महेश ने कहा तो मणि शंकर ने कहा.

"हाँ बिलकुल चर्चा कर लो महेश. कोई जल्दबाज़ी नहीं है. अभी तो सचिव के चुनाव के लिए काफी वक्त है. मगर एक बात ज़रूर कहुगा की मेरा सुझाव ज़रूर मानना महेश. इसमें तुम्हारे बेटे का hi उज्जवल भविष्य है. उसकी इतनी पढाई लिखाई का मान भी रहेगा और मुझे भी लगेगा की मैंने कोई अच्छा काम किया है. और हाँ एक बात aur...tumhe या तुम्हारे घर के किसी भी ब्यक्ति को किसी बात के लिए टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है. हम सब एक जैसे hi हैं महेश इस लिए सब मिल जल कर रहे." मणि शंकर ने ये कहा तो महेश ने कहा.

"आपने कह दिया यही बहुत है भाई साहब." महेश ने ये कहा hi था की तभी रेणुका ट्रे में चाय ले कर आयी और टेबल पर रख दिया. रेणुका ने घूँघट किया हुआ था. उसे देख कर मणि शंकर ने महेश से कहा.

"बहु से राय ले लेना महेश. आखिर माँ है विक्की की. इसकी इच्छा क्या है ये जानना भी ज़रूरी है." मणि शंकर ने कहा तो महेश ने हाँ में सर हिला दिया.

चाय पिटे पिटे hi कुछ देर मणि शंकर ने कुछ और बात चीत की उसके बाद वो चला गया. महेश मणि शंकर को छोड़ने बाहर तक गया था. उसके जाने के बाद महेश अंदर आ गया. उसके मन में मणि शंकर की बाते चल रही थी.

भाई लोग सॉरी फॉर लेट....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

सिराज भय फ्लैशबैक अब ज़्यादा नहीं रह गया है. सो मैं सोच रहा हु की अब क्या शार्ट करू इसे. जितना हो सकता है मैं कर रहा हु. इसी लिए बीच बीच में प्रेजेंट को भी दिखाया है जिससे रीडर्स को बोरियत न हो....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 80....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 20

फ्लैशबैक रनिंग....
"बहु से राय ले लेना महेश. आखिर माँ है विक्की की. इसकी इच्छा क्या है ये जानना भी ज़रूरी है." मणि शंकर ने कहा तो महेश ने हाँ में सर हिला दिया.

चाय पिटे पिटे hi कुछ देर मणि शंकर ने कुछ और बात चीत की उसके बाद वो चला गया. महेश मणि शंकर को छोड़ने बाहर तक गया था. उसके जाने के बाद महेश अंदर आ गया. उसके मन में मणि शंकर की बाते चल रही थी....

अब आगे पढ़िए....


मणि शंकर के जाने के बाद महेश जब अंदर आया तो रेणुका ने उससे पूछा की मणि शंकर क्या बात कर रहा था. रेणुका के पूछने पर महेश ने उसे कमरे में आने का इशारा किया और खुद कमरे में चला गया. उसके पीछे पीछे रेणुका भी चली गयी.

कमरे में आ कर रेणुका ने दरवाजे को बंद किया और फिर से महेश से पूछा तो महेश ने उसे साडी बात बता दी. साडी बात सुनने के बाद रेणुका सोच में पद गयी. रेणुका ने महेश से आशंका जताते हुए कहा की मणि शंकर ये सब करके कही कोई चाल तो नहीं चल रहा है उसके बेटे के साथ कुछ गलत करने की.? महेश के मन में भी यही आशंका थी मगर आज जिस तरह से मणि शंकर ने उससे माफ़ी मांगी थी और उसके बेटे के हिट के बारे में बात की थी उसमे उसे कही कुछ गलत नहीं दिखा था.

कुछ देर के बाद महेश कमरे से निकल कर खेतो की तरफ चला. उधर कमरे में मैं भी परेशां हालत में बीएड पर बैठा हुआ था. जब नीचे से मुझे पिता जी की ये आवाज़ सुनाई दी की वो माँ से खेत जाने का कह रहे हैं तो मैं भी कमरे से बाहर आ गया और पिता जी के साथ खेतो की तरफ चल दिया. सरे रास्ते मैं चुप hi रहा. पिता जी ने भी मुझसे किसी बारे में कोई बात नहीं की.

मैंने मणि शंकर और पिता जी के बीच की बाते नहीं सुनी थी इस लिए मुझे पता नहीं था की मणि शंकर हमारे घर किस लिए आया था. मैं तो बस यही सोच कर घबरा रहा था की मणि शंकर को कही मेरे और रचना के बीच का सब कुछ पता तो नहीं चल गया. जिसके बारे में बात करने के लिए वो मेरे पिता जी के पास आया था. मैं खुद पिता जी से पूछ नहीं सकता था की मणि शंकर क्या बात करने आया था.

वो सारा दिन सोचते सोचते hi गुज़र गया. पिता जी ने मुझसे मणि शंकर से रिलेटेड कोई बात नहीं की थी. शाम को मैं पिता जी के साथ घर की तरफ चला तो रास्ते में मेरे पेंट की पॉकेट में पड़ा मोबाइल वाइब्रेशन करने लगा. मोबाइल के वाइब्रेशन करते hi मेरे मन में सबसे पहले यही आया की ये रचना का कॉल है. मैंने जल्दी से मोबाइल निकाल कर देखा तो सच में रचना का hi कॉल था. ये देख कर मेरे मन में कुसुम दीदी की बात याद आ गयी. उन्होंने साफ़ साफ़ मुझे हुकुम दिया था की अब मैं रचना से कोई मतलब न राखु.

दीदी की बात याद आते hi मैंने कॉल को कट कर दिया और फिर से मोबाइल को पॉकेट में दाल लिया. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था. मैं सोच रहा था की मेरे द्वारा कॉल कट कर देने से रचना क्या सोच रही होगी मेरे बारे में. फिर मैंने इन सब बातो को अपने दिमाग से झटका और पिता जी के साथ घर आ गया.

ऐसे hi 3-4 दिन गुज़र गए. इन 3-4 दिनों में रचना के बहुत सरे मेस्सगेस आये मुझे और बहुत साडी कॉल्स भी मगर मैंने उसकी कॉल पिक नहीं की थी और न hi उसके किसी मैसेज का रिप्लाई किया था. वो मेस्सगेस में यही कह रही थी की मैं उसकी कॉल क्यों नहीं उठता या उससे बात क्यों नहीं कर रहा. उसने ये भी कहा की ये कैसी दोस्ती निभा रहा हु मैं. लास्ट में उसने ये भी कहा की क्या मुझे यही लगता है की उसने मुझसे सिर्फ इसी लिए दोस्ती की है की वो मुझसे अपने भाई का बदला ले सके.?

इधर मणि शंकर ने जो कुछ भी पिता जी से कहा था उसके बारे में पिता जी ने मुझसे कोई बात नहीं की थी. उधर दीदी ने माँ से पूछ कर जान लिया था की मणि शंकर हमारे घर किस लिए आया था. दीदी ने hi मुझे बताया था इस बारे में. मैं भी सोच में डूबा हुआ था की मणि शंकर मुझे गांव का सचिव क्यों बनाना चाहता होगा. आखिर इतनी बड़ी मेहरबानी वो मेरे पिता जी पर क्यों करना चाहता होगा.

दीदी को जब से पता चला था की मणि शंकर मुझे सचिव बनाना चाहता है तब से वो मुझसे यही कह रही थी की मैं सचिव का चुनाव न लाडू. अगर पिता जी मुझे कहे भी तब भी नहीं. पता नहीं दीदी को क्यों लगता था की इस सबके पीछे मणि शंकर की कोई चाल थी.

चौथे दिन मणि शंकर सुबह 10 बजे फिर से हमारे घर आ गया था. इस बार उसके साथ में एक ऐसा आदमी भी था जो मेरे पिता जी का करीबी था और भरोसे वाला था. मणि शंकर ने जब फिर से सचिव वाली बात के बारे में पिता जी से बात चीत स्टार्ट की तो उस आदमी ने भी पिता जी से यही कहा की उन्हें मणि शंकर के इस सुझाव को मान लेना चाहिए. इसमें कोई प्रॉब्लम वाली बात नहीं है. मैं सचिव बन जाउगा तो एक तरह से नौकरी वाला भी बन जाउगा और इससे उनका नाम भी होगा. सबसे बड़ी बात यही होगी की मैं अपने माता पिता की आँखों के सामने भी रहुगा.

उस आदमी के समझने बुझाने का पिता जी पर काफी असर हुआ था. इसकी वजह यही थी की वो आदमी पिता जी का करीबी था और भरोसे का था. उस आदमी ने माँ को भी बुलवा लिया था और फिर उनके सामने hi साडी बात चीत हुयी थी. माँ ने घूँघट किया हुआ था. लास्ट में यही फैसला हुआ की मैं अगले महीने सचिव का चुनाव लडूगा.

मणि शंकर और उस आदमी के जाने के बाद पिता जी और माँ के बीच फिर से कमरे में बात चीत हुयी. माँ ने यही कहा की उनका दिल नहीं करता की मैं सचिव का चुनाव लाडू मगर इस बार पिता जी ने साफ़ साफ़ कह दिया माँ से की इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा. मणि शंकर के साथ आया हुआ वो आदमी उनका बुरा होने का सोच भी नहीं सकता. उस आदमी के कहने से hi उन्होंने ये फैसला लिया था की वो अपने बेटे को सचिव के चुनाव में खड़ा करेंगे. अगर मणि शंकर कुछ गलत करने की कोशिश करेगा तो वो भी चुप नहीं बैठेंगे.

फैसला हो चूका था. नेक्स्ट मंथ सचिव के चुनाव में मुझे कंडीडेट बनना था. ये पक्की बात थी की हमारे गांव से जो जो कंडीडेट सचिव पद के लिए खड़े होंगे उनमे से जीत मेरी hi होनी थी क्यों की इसमें पूरा हाथ मणि शंकर का था.

सचिव वाले मामले के बाद से मणि शंकर हर दूसरे या तीसरे दिन हमारे घर आता और इस बारे में पिता जी से बाते करता रहता. पिता जी से वो बहुत hi अच्छे से बाते करता था. कभी भी ऐसा नहीं लगा की उसके मन में कोई खोट है. धीरे धीरे पिता जी को समझ आ गया की वो मणि शंकर को गलत hi समझ रहे थे. यानि मणि शंकर सच में हमारे लिए अच्छा hi करना चाहता था.

इस बीच मणि शंकर ने मुझसे भी कई बार बहुत अच्छे तरीके से बात की थी. वो मुझसे बड़े प्यार से बात करता और मेरी बहुत तारीफ करता. इस सबका असर ये हुआ की मणि शंकर के लिए जो दर या जो आशंका हमारे मन में थी वो दूर हो गयी थी और अब आलम ये था की हम सब उससे घुल मिल गए थे. ऐसा लग रहा था जैसे मणि शंकर से हमारा बहुत पहले से hi गहरा नाता था. पिता जी अक्सर मणि शंकर के घर भी जाते और वह से खा पि कर आते.

मणि शंकर मुझे अपने बेटे जैसा maan'ne लगा था और मुझे कई बार अपने घर भी ले गया. उसने मुझे ले कर एक बार शहर भी गया था जहा उसने कुछ ख़ास लोगो से मुझे मिलवाया था. मैं जब मणि शंकर के घर जाता तो वह रचना से भी मेरी नज़रे मिल जाती थी. मैं उससे कोई बात नहीं करता था और न hi वो मुझसे कोई बात करती थी. मैंने महसूस किया था की वो मुझसे नाराज़ थी मगर मुझे उसकी उस नाराज़गी से कोई मतलब नहीं था. मेरी दीदी ने साफ़ हुकुम दिया था की मैं उससे कोई मतलब न राखु.

मणि शंकर का वो बीटा जिसे मैंने मारा था वो भी मुझसे मिलने लगा था. स्टार्टिंग में उसने मुझसे अपने किये की माफ़ी मांगी थी उसके बाद वो मुझसे बहुत अच्छे से बात करता था. मैं स्टार्टिंग में ये सब देख कर हैरान था मगर फिर धीरे धीरे सब नार्मल हो गया था.

सचिव पद के लिए मणि शंकर ने मेरा सारा काम करवा दिया था और अब कुछ दिन बाद hi चुनाव होना था. हमारे घर से मणि शंकर का नाता काफी गहरा हो गया था और दोनों घरो में आना जाना भी हो गया था. मेरे घर से मैं और पिता जी hi उसके घर जाते थे जबकि उसके घर से रचना के अलावा करीब सब hi आ जाते थे. रचना की माँ बहुत hi शांत और अच्छे विचारो वाली थी. उसका मेरी माँ से अच्छा ताल मेल हो गया था. वो मेरी बहनो से बहुत अच्छे से बात करती और उन्हें प्यार देती थी.

रुपेश अक्सर मेरे पास आता और मुझे ज़बरदस्ती अपने साथ गाडी में बैठा कर ले जाता. हम दोनों गांव में घूमते और कभी कभी शहर भी चले जाते. मैं जनता था की वो पक्का लड़कीबाज था मगर वो मुझसे इस बारे में ज़्यादा बात नहीं करता था. वो मुझसे यही कहता की यार तुम इतने स्मार्ट और हैंडसम हो की गांव की कोई भी लड़की या भाभी खुद hi मुझसे पैट जाएगी. उसकी बातो से मैं बस मुस्कुरा देता.

इस एक मंथ में चंगेस तो बहुत हुए थे मगर एक चेंज ये भी हुआ था की कुसुम दीदी अब मेरे कमरे में सोने के लिए नहीं आती थी. मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने इस बारे में बस यही कहा की वो अपने कमरे में hi सोना चाहती हैं. मुझे साफ़ साफ़ महसूस हुआ था की वो मुझसे नाराज़ थी. वो चाहती थी की मैं ये चुनाव न लाडू और न hi रुपेश के साथ कही जाया करू. मगर मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता. क्यों की पिता जी ने hi फैसला किया था की मुझे सचिव बनना है.

मैंने एक दिन दीदी से इस बारे में काफी देर तक बात की और उनको भरोसा दिलाया की मैं रुपेश के साथ जाता ज़रूर हु मगर मैं उसके जैसा नहीं बनुगा और न hi उसके कहने पर कुछ करुगा. मेरी इन बातो से दीदी यही कहती की मैंने उनका कहना नहीं मन. उनका कहना यही था की मैं ये चुनाव न लाडू और इसी लिए वो मुझसे नाराज़ थी. उनकी नाराज़गी मेरे लिए असहनीय थी. वो मेरी सबसे सुन्दर और मसोसम दीदी थी. जिन्हे देख कर hi मेरी सुबह शाम होती थी. मुझे उनकी अब आदत सी हो गयी थी. मैं हर रात और सुबह उनको देख कर hi सोता और जानगता था.

मगर अब ऐसा नहीं हो रहा था जिससे मुझे बहुत दुःख होता था. मैंने दीदी से दुखी हो कर कहा भी की मैं उनकी नाराज़गी सहन नहीं कर प् रहा और वो मेरे कमरे में पहले की तरह सोया करे. मगर वो न मानी थी. मैंने महसूस किया था की वो मुझसे अपने से कोई बात नहीं करती थी. जब मैं खुद कोई बात करता तभी वो मेरी बातो का जवाब देती थी. वो पहले से ज़्यादा गुमसुम और गंभीर रहने लगी थी. मेरी दोनों जुड़वाँ बहने जो मस्ती में hi लगी रहती थी और जिनको इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता था अब उनमे भी चेंज आ गया था. वो चेंज ये था की दीदी उनको किसी न किसी बात पर डाट hi देती थी जिस अब वो भी मस्ती नहीं करती थी.

दीदी में आये इस चेंज से हम सब पहले हैरान हुए थे मगर अब आदत सी होने लगी थी. प्रिय पूजा जो दिन भर मस्ती करती थी अब वो दीदी की डाट की वजह से चुप hi रहती थी और चुप चाप या तो अपने कमरे में रहती या फिर माँ के साथ कोई न कोई काम करती. माँ इस बात से खुश थी की चलो इन दोनों में भी गंभीरता आ गयी और जिम्मेदारी को समझने भी लगी हैं.

एक चेंज ये भी आ गया था की प्रिय पूजा की जब से मस्ती बंद हुयी थी और वो गंभीर हुयी थी तब से वो दोनों मुझसे झगड़ती नहीं थी और न hi अब शम्भू काका के यहाँ चाट खाने के लिए जाने का कहती थी. मैं यकीन नहीं कर प् रहा था की मेरी इन दोनों जुड़वाँ बहनो का कायकलाप इतना बदल सकता था. वो दोनों मेरी एंजेल थी. उनकी मस्ती और उनका मुझसे झगड़ना मुझे अच्छा लगता था जिसे अब मैं मिस करने लगा था. किसी किसी टाइम मैं खुद hi उनके कमरे में जाता और उनसे ऐसी बाते करता जिससे वो मुझसे झगड़ा करे मगर मैं हैरान रह जाता था की वो मेरी हर बात को सुन कर बस मुस्कुरा कर रह जाती थी.

मैं उन दोनों से अक्सर कहता की क्या हो गया है तुम दोनों को. इतना चेंज कैसे आ गया तुम दोनों में. वो मस्ती करना और वो मुझसे झगड़ना कहा गया सब. मेरी इन सब बातो का वो यही जवाब देती की भाई अब हम बचे तो नहीं रहे. अब हम भी बड़े हो गए हैं तो हमें भी दीदी की तरह गंभीर रहना चाहिए. उनकी इन बातो से मैं हैरानी से उन दोनों को देखता रह जाता.

इधर दीदी की बेरुखी से मेरा दिल बहुत दुखी हो गया था. पता नहीं क्यों मेरे अंदर भी एक ईगो सा आ गया था की अब मैं भी दीदी से बात नहीं करुगा. सोचने वाली बात थी की इसके पहले मेरे अंदर कोई ईगो नहीं था और दीदी के लिए तो ईगो हो भी नहीं सकता था मगर अब ये ईगो जाने कहा से आ गया था मुझमे. इसके पहले जहा मैं दीदी का हर तरह से ख़याल रखने के लिए उनके आस पास hi बना रहता था वही अब मैंने उनसे किनारा सा कर लिया था.

कुसुम दीदी के चेहरे पर हमेशा की तरह गंभीरता hi छायी रहती थी मगर अब वो गंभीरता ऐसी हो गयी थी की वो किसी से भी ज़्यादा बात नहीं करती थी. उन्होंने जैसे चुप्पी सी साध ली थी. मैं उन्हें इस तरह देख कर दुखी तो बहुत होता मगर ईगो की वजह से अब उनके पास नहीं जाता था. हर सुबह मेरे कमरे में दीदी hi मेरे लिए चाय ले कर आती थी मगर अब ऐसा नहीं रह गया था. अब या तो मुझे खुद hi नीचे आ कर चाय लेना पड़ता था या फिर मेरी जुड़वाँ बहने मुझे चाय देने आती थी.

कुसुम दीदी के इस ब्योहार से मैं और भी ज़्यादा दुखी हो गया था. मेरा दिल अब घर में नहीं लगता था. इस लिए मैं रुपेश के साथ अब हर दिन घर से बाहर चला जाता था. मैंने इतना ज़रूर किया था की दीदी के कहने पर रचना से अब तक कोई मतलब नहीं रखा था और न hi रुपेश के साथ रह कर उसके जैसा बनने का सोचा था.

एक महीना ऐसे hi गुज़र गया और वो दिन भी आया जिस दिन चुनाव लड़ा गया. सरपंच ने पढ़ाई लिखाई के बेस पर चुनाव लड़वाया था. गांव के 4 लड़के सचिव के लिए कंडितते बने थे. मैंने बीएससी किया था मगर चुनाव में 10तह और 12तह के परसेंटेज बेस पर फैसला होना था. मेरे 10तह में 94.4% थे और 12तह में 96.1%. इस बेस पर भी मैं hi उन चारो से आगे था.

परसेंटेज के हिसाब से फैसला उसी दिन हो जाना था. सो फैसला मेरे hi हक़ में हुआ. शहर से कुछ लोग आये थे और सबके सामने ये घोसित हो गया की मैंने सचिव का ये चुनाव जीत लिया है. मेरे पिता जी बहुत खुश थे. मणि शंकर ने बड़ी गरम जोशी से मेरे पिता जी को बधाई दी और अब इस ख़ुशी के लिए मिठाई खिलाने को कहा तो मेरे पिता जी ने उसी वक्त बहुत साड़ी मिठाई मगवाई और सबको खिलाई भी.

वो सारा दिन ऐसे hi काम काज में चला गया. शाम को घर आये तो घर में भी ख़ुशी का hi माहौल था. कुसुम दीदी के चेहरे में वही गंभीरता थी. ऐसा लग रहा था जैसे उनको मेरी जीत से कोई मतलब hi नहीं था. उनके लिए जैसे कुछ हुआ hi नहीं था. वो हर दिन की तरह घर के कामो में लगी थी. मेरी इस जीत से उनके अलावा सब खुश थे.

मैंने कभी नहीं सोचा था की मेरी दीदी का ब्योहार मेरे लिए ऐसा हो जायेगा. मैंने ये भी नहीं चाहा था की मैं ये चुनाव लाडू. मैं तो सिर्फ पिता जी के कहने पर hi इस चुनाव में खड़ा हुआ और अब जीत भी गया था. मैंने कभी अपने पिता जी की बात को नहीं टाला था तो भला इस बात को कैसे ताल कर उनसे कह देता की मैं ये चुनाव नहीं लडूगा. अब इसे मेरी बदकिस्मती कहिये या पिता जी के लिए मेरा आदर सम्मान की उनके कहे को मैंने मान लिया था.

मुझे समझ नहीं आ रहा था की मेरे सचिव बनने पर दीदी को इतनी ज़्यादा प्रॉब्लम क्यों थी. उनका मेरे प्रति ऐसा ब्योहार बदल जाने की क्या सिर्फ यही वजह थी या कोई दूसरी वजह भी थी जिसका न मुझे पता था और न hi उन्होंने मुझे बताया था.

उस दिन मेरे सचिव ban'ne पर सब कोई खुश था. मेरी दोनों जुड़वाँ बहनो ने मुझे ख़ुशी ख़ुशी बधाई दी थी और मिठाई भी खिलाई थी मगर दीदी ने मेरी तरफ देखा तक नहीं था कुछ कहने की तो बात hi दूर थी. मैं सचिव बनता या नहीं इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मगर उस दिन दीदी के उस ब्योहार से मैं बहुत ज़्यादा दुखी हुआ था. इसके बाद भी मैं खुद दीदी के पास गया और उनको बताया की मैंने चुनाव जीत लिया है तो दीदी ने बस मेरी तरफ देखा और फिर बिना कुछ कहे चली गयी थी.

मुझे समझ नहीं आया था की ये सब क्या था. क्या सच में दीदी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा था. क्या सच में उनको मेरी तकलीफ का अहसास नहीं रह गया था. मैं अपनी hi सोच को मैंने के लिए तैयार नहीं था मगर जो दिख रहा था और जो मैं महसूस कर रहा था उसका मैं क्या करता. दीदी के उस आखिरी ब्योहार से मैं इतना दुखी हुआ की अपने कमरे में जा कर मैं बीएड पर लेट गया और खूब रोया. उस रात मैंने खाना भी नहीं खाया. माँ पिता जी ने पूछा तो मैंने कहा की भूख नहीं है.

अपने कमरे में बीएड पर पड़ा मैं अपने जज़्बातो को सम्हालने में लगा हुआ था. मैं चाह कर भी दीदी के ब्योहार को भुला नहीं प् रहा था. मुझे नींद नहीं आ रही थी. मेरा दिल कह रहा था की मैं नीचे दीदी के कमरे में जाओ और उनसे बात करू. मगर मैं अब और ज़्यादा दुखी नहीं होना चाहता था. मैंने फैसला कर लिया था की अगर दीदी को मेरी किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता तो अब मैं भी उनसे कोई मतलब नहीं रखुगा. मैं चाह कर भी दीदी के लिए पत्थर नहीं हो सकता था मगर मैं कोशिश ज़रूर कर सकता था.

मेरे मन ने दुनिया जहां की बाते चल रही थी. तभी मेरे कमरे का दरवाजा हलके से खटखटाया गया. मेरा ध्यान दरवाजे की तरफ गया तो मुझे लगा कौन हो सकता है. क्या दीदी आयी hain...magar वो तो मुझसे अब कोई मतलब hi नहीं रखती हैं फिर क्यों आएगी मेरे पास. तभी दरवाजा फिर से खटखटाया गया तो मैंने सोचा शायद दीदी hi हैं. मैंने मोबाइल में टाइम देखा तो 11:32 का टाइम था. पता नहीं क्यों मैं टाइम देख कर एकदम से खुश हो गया.

इसी टाइम में तो रात को दीदी मेरे कमरे में आया करती थी. किसी दूसरे के आने का कोई सवाल hi नहीं था. ये सोच कर मैं बहुत ज़्यादा खुश हो गया और पिछले सरे दुःख भूल गया. मैं जल्दी से बीएड से नीचे उतरा और दरवाजे के पास जा कर दरवाजे की कुण्डी को खोला.

दरवाजा खोल कर मैंने सामने देखा तो मेरा अभी अभी खिला हुआ चेहरा एकदम से मुरझा सा गया मगर मैंने जल्द hi अपने आपको नार्मल भी कर लिया. दरवाजे के बाहर मेरी दोनों जुड़वाँ बहने कड़ी थी. उन दोनों का कमरा ऊपर hi था मगर दूसरी साइड. सीढ़ियों से ऊपर आते hi सबसे पहले मेरा hi कमरा था. उसके बाद अंदर की तरफ उन दोनों का कमरा था.

दरवाजा खुलते hi प्रिय पूजा कमरे के अंदर आ गयी. मैं उन्हें इस वक्त यहाँ देख कर हैरान हो गया था. अंदर आते hi प्रिय ने मुझसे दरवाजा बंद कर देने को कहा तो मैंने बिना कुछ बोले दरवाजा बंद कर दिया. पलट कर देखा तो प्रिय पूजा मेरे बीएड पर बैठ चुकी थी. मुझे समझ में न आया की ये दोनों इस वक्त मेरे कमरे में क्यों आयी हैं.

"भाई तुम यही सोच रहे हो न की हम इस वक्त आपके कमरे में क्यों आये हैं.?" प्रिय ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैंने कहा तो कुछ नहीं मगर सवालिया नज़र से देखा ज़रूर दोनों को.

"भाई हम तुमसे कुछ ज़रूरी बाते करना भी चाहते हैं और जानना भी." इस बार पूजा ने ये कहा तो मैंने फिर सवालिया नज़र से उसकी तरफ देखा और फिर बीएड पर करीब करीब लेट सा गया. वो दोनों मेरे कमर के पास hi बीएड के किनारे पर बैठी हुयी थी.

"भाई हम इसके पहले भी तुमसे बात करना चाहते थे मगर कर नहीं पाए. क्यों की एक तो हिम्मत hi नहीं पद रही थी और दूसरा ऐसा मौका भी नहीं मिला." प्रिय ने गंभीरता से ये कहा तो मैं मन hi मन शॉक सा हुआ. मैं सोच में पद गया की ये दोनों मुझसे क्या बात करना चाहती थी.

"आज हम दोनों बड़ी हिम्मत कर के तुम्हारे पास आये हैं भाई और तुमसे बात करना चाहते हैं." पूजा ने कहा तो मैंने कहा.

"तुम दोनों को जो भी बात करना हो कर सकती हो. इसमें हिम्मत वाली बात कहा से आ गयी.? तुम दोनों तो ऐसी थी की तुम दोनों को किसी से भी कुछ भी बात करने में हिम्मत की ज़रूरत hi नहीं पड़ती थी. मगर जब से मैं सचिव बना हु तब से जैसे सब कुछ बदल गया है. कुछ लोगो ने तो गिरगिट की तरह रंग भी बदल लिया है." मैंने ये सब कहा तो वो दोनों चुप रह गयी.

"खेर chhodo...tum बताओ की रात के इस वक्त तुम दोनों मुझसे क्या बात करने आयी हो.? और haan...jo भी बात हो उसे साफ़ साफ़ बेझिझक हो के कह सकती हो." मैंने ये कहा तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा. फिर प्रिय ने मुझसे कहा.

"भाई तुम वडा करो की हमारी किसी भी बात से हम पर गुस्सा नहीं होंगे." प्रिय ने ऐसा कहा तो मैं उसकी तरफ बड़े ध्यान से देखना लगा.

उसके ऐसा कहने से मुझे एकदम से अपनी वो बात याद आयी जब मैंने दीदी से भी ऐसा hi कहा था जब मैं उन्हें रचना के बारे में बताने वाला था. इसका मतलब ये दोनों भी मुझसे ऐसी hi कोई बात करने वाली हैं मगर उससे पहले मुझसे वडा लेना चाहती हैं की मैं इनकी किसी भी बात पर गुस्सा न करू. मैं सोचने लगा की ये दोनों आखिर ऐसी क्या बात करना चाहती होंगी.

"वडा करो न भाई." पूजा ने मुझे चुप देख कर कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है मैं वडा करता हु की मैं तुम दोनों की किसी भी बात पर गुस्सा नहीं करुगा." मैंने ये कहा तो दोनों ने फिर से एक दूसरे की तरफ देखा.

"भाई तुम्हारे और कुसुम दीदी के बीच में क्या है.?" प्रिय ने मेरी तरफ देखते हुए थोड़ा डरते हुए ये कहा तो मैं एकदम से शॉक रह गया. मुझे समझ में न आया की ये मुझसे क्या पूछ रही है. मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा तो उसने फिर कहा.

"भाई हम दोनों पिछले एक महीने से देख रही हैं की तुम और दीदी एक दूसरे से कोई बात नहीं करते हो. मैंने तो ये तक नोटिस किया है की वो तुम्हे देखती तक नहीं हैं. तो भाई ऐसी क्या बात हो गयी है की तुम दोनों के बीच ऐसा हो गया है. इसके पहले तो ऐसा नहीं था. हम सब जानते हैं की तुम दोनों एक दूसरे के बिना एक पल नहीं रहते थे. दोनों hi एक दूसरे का हर तरह से ख़याल रखते थे. फिर ऐसा क्या हो गया है की अब तुम डॉन एक दूसरे से बात नहीं करते. दोनों की हालत ऐसी दिखती है जैसे किसी बात से दोनों hi घुट रहे हो." प्रिय ने ये सब कहा तो मैं हैरान रह गया. मुझे समझ न आया की मैं प्रिय की बातो का क्या जवाब दू.

"ऐसी कोई बात नहीं है." मैंने हकलाते हुए ये कहा तो पूजा ने कहा.

"भाई हम कोई छोटी सी बच्चिया नहीं है. हम भी इतना समझते हैं की क्या होता है हमारे बीच." पूजा ने ऐसा कहा तो मैं समझ न सका की उसके कहने का क्या मतलब था.?

भाई लोग सॉरी फॉर लेट....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 21

फ्लैशबैक रनिंग....


"भाई हम दोनों पिछले एक महीने से देख रही हैं की तुम और दीदी एक दूसरे से कोई बात नहीं करते हो. मैंने तो ये तक नोटिस किया है की वो तुम्हे देखती तक नहीं हैं. तो भाई ऐसी क्या बात हो गयी है की तुम दोनों के बीच ऐसा हो गया है. इसके पहले तो ऐसा नहीं था. हम सब जानते हैं की तुम दोनों एक दूसरे के बिना एक पल नहीं रहते थे. दोनों hi एक दूसरे का हर तरह से ख़याल रखते थे. फिर ऐसा क्या हो गया है की अब तुम डॉन एक दूसरे से बात नहीं करते. दोनों की हालत ऐसी दिखती है जैसे किसी बात से दोनों hi घुट रहे हो." प्रिय ने ये सब कहा तो मैं हैरान रह गया. मुझे समझ न आया की मैं प्रिय की बातो का क्या जवाब दू.

"ऐसी कोई बात नहीं है." मैंने हकलाते हुए ये कहा तो पूजा ने कहा.

"भाई हम कोई छोटी सी बच्चिया नहीं है. हम भी इतना समझते हैं की क्या होता है हमारे बीच." पूजा ने ऐसा कहा तो मैं समझ न सका की उसके कहने का क्या मतलब था.?

अब आगे पढ़िए....


"क्या कहना चाहती हो तुम दोनों.?" मैंने आशंकित हो के पूछा तो प्रिय बोल पड़ी.

"भाई हम जो कहना चाहते हैं वो हमारा भरम भी हो सकता है मगर अभी जैसे हालात हो गए हैं उसे देख कर मन में वैसे hi ख़याल आते हैं." प्रिय ने ऐसा कहा तो मुझे कुछ समझ न आया.

"कैसे ख़याल आते हैं तुम दोनों के मन में.? यार जो भी बात है उसे साफ़ साफ़ बोलो न. ये पहेलियाँ क्यों बुझा रही हो तुम दोनों.?" मैंने परेशां हो के ये कहा तो दोनों ने फिर से एक दूसरे को देखा.

"भाई हमने एक दिन तुम्हारी और दीदी की बाते सुनी थी. ये तब की बात है जब वो सरपंच काका हमारे घर आये थे और उसने पिता जी से तुम्हे सचिव पद के लिए चुनाव में खड़ा करने को कहा था. हम दोनों दीदी को ढूढ़ते हुए तुम्हारे कमरे में आ रहे थे. जब दरवाजे के पास पहुंचे तो कमरे के अंदर से हमें तुम्हारी और दीदी की बाते सुनाई दी तो हम दोनों दरवाजे के पास hi रुक गए. तुम दोनों की बातो से hi हमें पता चला की तुम सरपंच की बेटी रचना से मिलने शहर गए थे एक दिन और ये भी की तुम उससे फ़ोन पर बाते भी करते हो. दीदी तुम्हे कह रही थी की रचना ने तुमसे इसी लिए दोस्ती किया होगा ताकि वो तुमसे अपने भाई की मार का बदला ले सके. दीदी तुम्हे उससे मतलब न रखने के लिए कह रही थी और ये भी की तुम सचिव का चुनाव न लड़ो." पूजा ने ये सब कहा और फिर सांस लेने के लिए रुक गयी तो उसकी जगह प्रिय ने कहना शुरू किया.

"उसके बाद तुमने दीदी से वडा किया था की तुम रचना से कोई मतलब नहीं रखोगे. मगर इसके लिए कुछ नहीं कहा की तुम सचिव का चुनाव नहीं लड़ोगे. क्यों की तुम पिता जी की बात ताल नहीं सकते थे." प्रिय ने ये कहा तो मैं बीच में hi बोल पड़ा.

"हाँ तो इसमें ऐसा क्या है.? रचना का मामला मेरे हाथ में था और मेरे बस में भी इस लिए मैंने दीदी से वडा कर लिया था. मगर सचिव के चुनाव वाला मामला पिता जी के हाथ में था. इस लिए मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता था. तुम दोनों जानती जो की हम में से किसी ने भी आज तक पिता जी की कोई बात नहीं ताली है. फिर मैं इसके लिए उनकी बात कैसे ताल सकता था. खेर chhodo...main ये जानना चाहता हु की तुम दोनों क्या यही बात करने आयी थी यहाँ.?" मैंने ये सब कहने के बाद पूछा तो प्रिय ने कहा.

"बात तो शायद इतनी hi थी मगर हमारी समझ में ये नहीं आ रहा की दीदी तुमसे इतना नाराज़ क्यों हैं.? इसमें इतना ज़्यादा नाराज़ होने की क्या बात थी की वो तुम्हारी तरफ देखे तक न. हम दोनों ने अच्छी तरह इस बात को नोटिस किया है भाई और यही सोच सोच कर अपना दिमाग खपा रहे हैं की इतनी सी बात पर दीदी तुमसे बात क्यों नहीं करती हैं.?" प्रिय ने ये सब कहा तो मुझे समझ न आया की मैं क्या बोलू.

"समझ में तो मुझे भी नहीं आ रहा प्रिय और यही जानने के लिए मैंने उनसे कई बार बात भी की मगर उन्होंने मुझे कोई जवाब नहीं दिया. बल्कि उन्होंने तो मेरी तरफ देखा तक नहीं. उनके इस ब्योहार से मुझे कितनी तकलीफ हुयी है ये सिर्फ मैं hi जनता हु." मैंने उदास को के ये कहा तो पूजा ने कहा.

"भाई एक दिन हमने भी इस बारे में दीदी से बात करने की कोशिश की थी मगर उन्होंने ये कह कर हमें चले जाने का हुकुम दे दिया की हमें इस बारे में बात करने की कोई ज़रूरत नहीं है. भाई दीदी इतना बदल जाएँगी हमने कभी नहीं सोचा था. वो तो हम सबसे बहुत अच्छे से बात करती थी और हम पर कभी गुस्सा भी नहीं करती थी. मगर पता नहीं क्यों अब उनका ब्योहार इतना पत्थर सा हो गया है." पूजा ने ये सब कहा तो प्रिय बोल पड़ी.

"हम jan'na चाहते थे की दीदी का हमसे इतना पत्थर दिल वाला ब्योहार कैसे हो गया है. आखिर इसके अलावा और क्या वजह हो सकती है. क्यों की सिर्फ उस वजह से उनमे इतना ज़्यादा बदलाव नहीं हो सकता था. हमें लगने लगा था की बात कुछ और hi है. वर्ण हमारी दीदी इतना पत्थर दिल नहीं हो सकती. वो तो बहुत hi ज़्यादा नरम स्वभाव की हैं. वो खुद दुःख तकलीफ सह लेंगी मगर अपनी तरफ से वो हम में से किसी को भी दुःख नहीं दे सकती थी." प्रिय ने ये सब कहा तो मैं मन hi मन हैरान रह गया की ये दोनों कितना दूर का सोच रही हैं. यही बात मेरे मन में भी थी.

"और फिर हमने अपने तरीके से सच का पता लगाने के लिए सोचा और फिर पता भी लगाया हमने." पूजा ने ये कहा तो मैं शॉक हो गया. मेरे मन में कई तरह के ख़याल आने लगे. मैं अब जानना चाहता था की इन दोनों ने क्या पता लगाया था.

"क्या पता लगाया तुम दोनों ने.?" मैंने पूछा तो दोनों ने फिर से एक दूसरे की तरफ देखा फिर प्रिय ने कहा.

"भाई हमें लगता है की दीदी की नाराज़गी की वजह कुछ और hi है." प्रिय ने कहा तो मैं उलझ सा गया.

"क्या matlab...saaf साफ़ बताओ क्या वजह है.?" मैंने आशंकित हो के कहा तो प्रिय ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा.

"हमने सोचा की आज फिर से दीदी से बात करेंगे. इस लिए दोपहर को खाना पीना हो जाने के बाद जब दीदी अपने कमरे में आराम करने चली गयी तो कुछ देर बाद हम दोनों भी उनके कमरे की तरफ चल दिए. मैंने दीदी के कमरे के दरवाजे पर खटखटाने के लिए हाथ रखा hi था की दरवाजा मेरे हाथ रखते hi थोड़ा सा खुल गया. ये देख कर मैंने दरवाजे को थोड़ा सा और खोल दिया. उसके बाद हमने अंदर कमरे में देखा तो दीदी बीएड पर बैठी हुयी थी और कमरे में थोड़ा थोड़ा उनके सिसकने की आवाज़ गूँज रही थी. मतलब दीदी रो रही थी उस वक्त. ये देख कर हम दोनों हैरान हुए की दीदी आखिर रो क्यों रही हैं." प्रिय ने ये सब कहा और फिर पूजा की तरफ देखने लगी तो अब आगे की बात पूजा ने बताना शुरू किया.

"दीदी की पीठ हमारी तरफ यानि दरवाजे की तरफ थी. हमारे मन में ये जानने की उत्सुकता जाएगी की दीदी रो क्यों रही हैं इस लिए हम दोनों धीरे से कमरे के अंदर गए. बीएड के पास दीदी के पीछे पहुंच कर हमने पीछे से hi देखा की दीदी के हाथ में तुम्हारी फ्रेम लगी एक तस्वीर थी. उसी तस्वीर को देख कर वो रो रही थी. ये देख कर हम दोनों हैरान रह गए थे. हमने सोचा की ये क्या बात हुयी. एक तरफ तो दीदी तुम्हारी तरफ देखती भी नहीं हैं और दूसरी तरफ यहाँ वो तुम्हारी तस्वीर लिए रो रही हैं. हम दोनों को कुछ समझ न आया की ये क्या माजरा है." पूजा ने ये सब कहा और फिर उसने भी प्रिय की तरफ देखा. जैसे कह रही हो की अब आगे की बात तुम बताओ.

"हम दोनों सोच में पद गए थे. जब कुछ समझ न आया तो हमने सोचा दीदी से अब अच्छे से इस बारे में पूछते हैं. मगर उनसे पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी. हमें दर था की कही वो हमारे इस तरह चोरी छुपे कमरे में आ जाने से गुस्सा न हो जाये. फिर हमने सोचा की अगर वो गुस्सा हो जाएगी तो हम उनका गुस्सा भी झेल लेंगे मगर अब ये सब माजरा उनसे पूछ कर hi रहेंगे. उसके बाद हम दोनों घूम कर एकदम से दीदी के सामने आ गए. हमें अपने सामने अचानक इस तरह देख कर दीदी हैरान रह गयी. फिर उन्होंने जल्दी से अपने आपको सम्हाला और उस तस्वीर को उल्टा करके एक तरफ रख दिया." प्रिय ने ये सब कहा और सांस लेने लगी तो उसकी बात को आगे बढ़ाते हुए पूजा ने कहना शुरू किया.

"फिर वो एकदम से हम पर गुस्सा हो गयी और हमें डाटने लगी की हम इस तरह छुप के उनके कमरे में क्यों आये. हम उनकी डाट पर चुप hi रहे. फिर जब वो थोड़ा शांत हुयी तो हमने उनसे माफ़ी मांगी और पूछा की वो उस तस्वीर को लिए क्यों रो रही थी. हमारे पूछने पर वो फिर से गुस्सा हो गयी और हमें जाने के लिए कह दिया. उनके कुछ न बताने से हमें भी थोड़ा गुस्सा आने लगा था. इस लिए हमने ज़्यादा और तो कुछ नहीं कहा मगर यही कहा की ये क्या बात हुयी दीदी की एक तरफ तो आप विक्की की तरफ देखती भी नहीं हैं और यहाँ उसी की तस्वीर को लिए रो रही हैं. आखिर ऐसी कौन सी बात हो गयी है की आप उसके साथ ऐसा कर रही हैं.? हमारी ये बात सुन कर दीदी गुस्से से कहा की तुम्हे इससे कोई मतलब नहीं होना chahiye...jaao यहाँ से." पूजा ने ये कहा और चुप हो गयी.

"दीदी हमें कुछ बताना hi नहीं चाहती थी. उसके बाद हम उनके कमरे से वापस आ गए. अपने कमरे में आ कर हम सोचने लगे की आखिर ऐसा क्या हो गया है जिससे दीदी ऐसा कर रही हैं. अगर वो तुम्हारे लिए इतना hi दुखी हो कर रो रही हैं तो फिर वो तुमसे बात क्यों नहीं करती.? हमने इस बारे में बहुत सोचा मगर हमें कुछ न समझ आया. दीदी से दुबारा पूछना बेकार था इस लिए हम दोनों ने एक प्लान बनाया और दीदी पर नज़र रखना शुरू कर दिया. उस दिन के बाद से दीदी अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद hi रखती थी." प्रिय ने कहा और फिर उसने पूजा की तरफ देखा. ये इन दोनों की आदत थी. दोनों एक दूसरे के साथ hi रहती थी. दोनों एक दूसरे को अपनी हर बात बताती थी. वो दोनों दो जिसम एक जान थी.

"एक दिन हमारे मन में आया की क्यों न दीदी के कमरे की तलाशी ली जाये. शायद कुछ ऐसा मिल जाये जिससे हमें ये पता चल जाये की दीदी का ब्योहार अचानक क्यों बदल गया है. क्यों की जिस वजह से वो तुमसे नाराज़ थी या बोल नहीं रही थी वो वजह ये तो नहीं हो सकती थी ऐसा हमारा man'na था. हमें नहीं पता था की हम दोनों उनके कमरे में किस चीज़ की तलाश करना चाहते हैं. हम तो बस उनके कमरे की यु hi तलाशी लेना चाहते थे. तलाशी का काम हमने दिन में hi करने का socha..wo भी तब जब दीदी रसोई में खाना बना रही हो. क्यों की वही एक अच्छा मौका था जब दीदी कमरे में नहीं होगी और हमें तलाशी के लिए टाइम भी ज़्यादा मिल सकता था." पूजा ने कहा तो उसे देख कर प्रिय ने आगे बताना शुरू किया.

"हमने देखा की दीदी ने रसोई में माँ के साथ खाना बनाना शुरू कर दिया है तो हम जल्दी से उनके कमरे की तरफ गए. मैंने पूजा को दरवाजे के बाहर रुक कर दीदी पर नज़र रखने के लिए कहा और मैं दीदी के कमरे में चली गयी. दरवाजा बंद करके मैं कमरे की तलाशी लेने लगी. मुझे ये सोच कर बहुत ज़्यादा दर भी लग रहा था की अगर दीदी कमरे में आ गयी और उन्होंने मुझे तलाशी लेते देख लिया तो मेरा क्या अंजाम होगा. मगर मैंने भी फैसला कर लिया था की अब जो भी हो जाये ये काम कर के hi रहूगी. मैं जल्दी जल्दी हर जगह की तलाशी ले रही थी. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं क्या ढूढ़ रही हु दीदी के कमरे में. मगर मुझे इतना ज़रूर भरोसा था की दीदी के कमरे में कुछ तो ऐसा होगा hi जिससे ये पता चल जायेगा की दीदी का ब्योहार अचानक से बदल क्यों गया है. काफी देर तक मैं कमरे की हर चीज़ को उलट पलट कर देखती रही. मगर कुछ भी ऐसा नहीं मिला जिसे देख पता चल सके दीदी का ब्योहार क्यों बदल गया है. मैं हर चीज़ को उलट पलट कर देख रही थी और फिर उसे वैसे hi रख भी रही thi..warna दीदी को पता चल जाता की उनके कमरे में कोई आया था जिसने उनकी चीज़ो के साथ छेड़ छाड़ की थी. मुझे कमरे में ए हुए काफी देर हो गयी थी. मुझे दीदी के आने का दर भी था. मैंने दीदी की आलमारी, उनके ड्रेसिंग टेबल, सूटकेस सब कुछ देख लिया था मगर कही कुछ ऐसा नहीं मिला था मुझे. मैं इस सबसे अब निराश हो गयी थी. मुझे समझ नहीं आ रहा था की अब क्या करू. दीदी के दर से मैं उनके कमरे से जाने लगी तो एकदम से मुझे ख़याल आया की एक बार दीदी के बीएड के सिरहाने के नीचे भी देखना चाहिए. ये सोच कर मैं जल्दी से बीएड के पास गयी और सिरहाने के नीचे गद्दे को उठा कर देखा तो मुझे एक डायरी छुपाई हुयी नज़र आयी. डायरी देख कर मेरे मन में एकदम से ख़याल आया की इस डायरी में ज़रूर कुछ न कुछ ऐसा होगा जिससे मुझे कुछ पता चल सकता है. मैंने सुना था की डायरी में लोग अपनी ब्यक्तिगत बाते लिखते हैं. ये सोच कर मैंने जल्दी से उस डायरी को उठाया और उसे खोलने hi वाली थी की तभी कमरे में पूजा आयी और उसने धीरे से कहा की दीदी रसोई से बाहर आ गयी हैं और वो अपने कमरे की तरफ आ सकती हैं. पूजा की बात सुन कर मैंने जल्दी से दीदी की डायरी को वैसे hi गद्दे के नीचे रख कर गद्दा सही कर दिया. उसके बाद मैं जल्दी से कमरे से बाहर आ गयी. बाहर आ कर मैंने दरवाजे को वैसे hi बंद किया और फिर हम दोनों वह से बाहर आ गए." प्रिय ने ये सब कहा और चुप हो गयी.

"कुछ देर बाद हम दोनों बाहर से अंदर आये और अपने कमरे में आ गए. प्रिय ने मुझे बताया की उसने दीदी की डायरी देखि है. मगर वो डायरी को खोल कर देख नहीं पायी थी. इसे लगता था की उस डायरी में ज़रूर कुछ ऐसा लिखा होगा जिससे दीदी के इस बदले ब्योहार के बारे में पता चल सकता था. मुझे भी यही लगा. इस लिए अब हमने सोचा की दीदी की उस डायरी को किसी तरह से खोल कर पढ़ा जाये. ये सोच कर एक दिन फिर हम दीदी के कमरे में गए और और बीएड के सिरहाने में देखा मगर हम ये देख कर हैरान हो गए की दीदी की डायरी गद्दे के नीचे नहीं थी. हमने गद्दे के नीचे अच्छे से देखा मगर डायरी वह पर नहीं थी. फिर हमने सोचा की शायद दीदी ने उस डायरी को आलमारी में रख दिया होगा. ये सोच कर हम आलमारी की तरफ बढे और जैसे hi आलमारी को खोलना चाहा तो पता चला की आलमारी लॉक है." पूजा ने मेरी तरफ देखने के बाद प्रिय की तरफ देखा तो प्रिय ने कहना शुरू किया.

"उस दिन दीदी के कमरे में हमें वो डायरी नहीं मिली. आलमारी को लॉक देख कर हम समझ गए की दीदी ने डायरी को आलमारी के अंदर hi रख दिया है और फिर आलमारी को लॉक कर दिया है. इसका मतलब ये भी हो सकता था की दीदी को ये शक हो गया होगा की किसी ने उनकी डायरी को छुवा है. उसके बाद हमने एक दो बार और कमरे में जा कर उस डायरी को खोजै मगर डायरी हमारे हाथ नहीं लगी. हमने इस बारे में यही सोचा की उस डायरी में कुछ तो ऐसा है जिसे दीदी ने इस तरह आलमारी में छुपा दिया है की अब वो किसी के हाथ न लगे. आलमारी की चाभी भी हमें नहीं मिली थी." प्रिय ने कहा और चुप हो गयी. उसके चुप हो जाने पर इस बार पूजा ने कुछ नहीं कहा.

इधर मैं भी उन दोनों की बाते सुन कर सोच में डूबा हुआ था. मैं भी सोच रहा था की दीदी की उस डायरी में क्या हो सकता है. क्या सच में उनकी उस डायरी में ऐसा कुछ लिखा हो सकता है जो उनके इस ब्योहार की वजह बता सकता है.? दोनों ने बताया था की दीदी मेरी तस्वीर को लिए रो रही थी तो इसका मतलब है दीदी मुझसे दिल से नाराज़ नहीं थी बल्कि वो नाराज़गी का दिखावा कर रही थी. मगर सवाल था की क्यों ऐसा कर रही थी वो.?

"तो तुम दोनों को लगता है की दीदी की उस डायरी में ज़रूर कुछ ऐसा है जिससे ये पता चल जायेगा की वो अचानक से इतना बदल क्यों गयी हैं या वो मुझसे बात क्यों नहीं करती हैं.?" मैंने गंभीरता से उन दोनों को देखते हुए ये कहा तो दोनों ने एक बार एक दूसरे की तरफ देखा फिर प्रिय ने कहा.

"हाँ भाई हमें सच में यही लगता है और अब एक बात और है जिसे हम तुमसे कहना चाहते हैं." प्रिय ने कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा.

"अब कौन सी बात है..?" मैंने कहा तो प्रिय ने कहा.

"इसके पहले दीदी तुम्हारे कमरे में तुम्हारे साथ hi रात को सोती थी न.?" प्रिय ने ये कहा तो मैं बुरी तरह हैरान रह गया. मुझे यकीन न हुआ की ये बात इन दोनों को पता हो सकती hai..magar कैसे.?

"झूठ मत बोलना भाई. हमें अच्छी तरह पता है की इसके पहले दीदी तुम्हारे कमरे में hi सोती थी." पूजा ने ये कहा तो मैंने नार्मल हो के कहा.

"हाँ ये सच hai..magar मैं झूठ क्यों बोलूगा तुम दोनों से इस बात के लिए.?" मैंने कहा तो प्रिय ने कहा.

"भाई ये तो हम सब जानते हैं की तुम दोनों का शुरू से hi बहुत लगाव था. ये भी जानते हैं की तुम दोनों एक दूसरे का कितना ख़याल रखते हो. मगर आज जो हालात बने हैं उसे देख कर हमारे मन में कई तरह के ख़याल आते हैं." प्रिय ने ये कहा तो मैं कुछ समझ न सका.

"क्या matlab...kya कहना चाहती हो तुम.?" मैंने कहा तो प्रिय ने कहा.

"भाई तुमने वडा किया है तुम हमारी किसी भी बात पर गुस्सा नहीं करोगे." पूजा ने कहा तो मैं बोल पड़ा.

"हाँ मैंने वडा किया है. मगर तुम साफ़ साफ़ बताओ न की क्या कहना चाहती हो तुम दोनों.?" मैंने आशंकित हो के कहा तो प्रिय ने कहा.

"भाई क्या तुम दीदी से प्यार करते हो.?" प्रिय ने मेरे चेहरे की तरफ ध्यान से देखते हुए कहा तो मैंने कहा.

"हाँ मैं दीदी से बहुत प्यार करता हु. इसमें पूछने की क्या बात है. हर भाई अपनी बहन से प्यार करता है. मैं तुम तीनो से बहुत प्यार करता हु." मैंने कहा तो पूजा ने कहा.

"भाई हम इस प्यार के बारे में नहीं पूछ रही हैं." पूजा ने कहा तो मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"क्या मतलब.?" मैं ने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"भाई हम उस प्यार के बारे में पूछ रहे हैं जो भाई बहन वाला नहीं बल्कि प्रेमी प्रेमिका वाला होता है." पूजा ने ये कहा तो मैं शॉक रह गया. फिर एकदम से मुझे उन दोनों पर गुस्सा आ गया.

"ये क्या बकवास कर रही हो तुम.? तुम्हारा दिमाग तो सही है न.?" मैंने गुस्से में ये कहा तो दोनों दर गयी और फिर प्रिय ने जल्दी से कहा.

"भाई तुमने वडा किया था की तुम हम पर गुस्सा नहीं करोगे. हम तो बस पूछ रहे हैं तुमसे. अगर तुम दीदी से वैसा वाला प्यार नहीं करते तो ऐसे भी बता सकते हो की ऐसा नहीं करते हो तुम." प्रिय ने ये कहा तो मेरा गुस्सा थोड़ा शांत हुआ. मगर मेरे दिल और दिमाग में तूफ़ान सा चलने लगा था. मैं ये सोच सोच कर हैरान था की ये दोनों ऐसा कैसे सोच सकती हैं.?

"तुम दोनों ऐसा सोच भी कैसे सकती हो मेरे बारे में.?" मैंने नाराज़ हो के कहा तो पूजा ने कहा.

"भाई हम जानते हैं की तुम ऐसे नहीं हो. मगर हालातो को देख कर मन में कई तरह के ख़याल आ जाते हैं. हमें तो पहले ये पता hi नहीं था की दीदी तुम्हारे कमरे में सोती हैं. वो तो एक रात मुझे प्यास लगी तो मैंने प्रिय को जगाया. उसके बाद हम दोनों अपने कमरे से निकल के बाहर आये और जब तुम्हारे कमरे के सामने से गुजरने लगे तो हमें तुम्हारे कमरे से उस वक्त दीदी की आवाज़ सुनाई दी. पहले तो हमें भरोसा न हुआ फिर जब हमने ध्यान से सुना तो दीदी की आवाज़ फिर से सुनाई दी. हम सोच कर हैरान हुए की इतनी रात को दीदी तुम्हारे कमरे में कैसे.? दीदी का कमरा तो नीचे था इस लिए वो इतनी रात को ऊपर तुम्हारे कमरे में क्यों थी.? फिर हम दोनों ने दरवाजे पर कान लगा कर तुम दोनों की बाते सुनी. हमें लगा की शायद दीदी किसी काम से तुम्हारे कमरे में आयी होंगी. फिर प्रिय ने चलने को कहा तो हम दोनों नीचे रसोई में आ गए. पानी पि कर हम वापस कमरे में आ गए. वापस आते वक्त तुम्हारे कमरे से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी तो हमने सोचा की शायद दीदी अपने कमरे में चली गयी होगी." पूजा ने ये सब कहा तो मैं कुछ न बोलै. मैं हैरान था की ये बाते इन दोनों को पता थी.

"एक रात फिर ऐसे hi हुआ. हम दोनों अपने कमरे में मोबाइल में गेम खेल रहे थे. जब रात बहुत ज़्यादा हो गयी तो हमने सो जाने का सोचा. मगर पूजा ने कहा की उसको पहले बाथरूम जाना है. इस लिए हम दोनों बाथरूम जाने के लिए कमरे से बाहर आये और जैसे hi तुम्हारे कमरे से गुजरने लगे तो तुम्हारे कमरे से फिर से हमें दीदी की और तुम्हारी आवाज़ सुनाई दी. हम दोनों हैरान हुए की आज भी दीदी तुम्हारे कमरे में इतनी रात को कैसे. उसके बाद हमने एक दो बार खुद भी चेक किया तो पता चला की हर रात दीदी तुम्हारे कमरे में hi होती थी. एक रात हमने ये तक चेक किया की दीदी तुम्हारे कमरे में कब तक रहती हैं.? उस रात पहले मैं सो गयी थी और पूजा मोबाइल में गेम खेलती रही. फिर जब 1:30 बजे इसे नींद आने लगी तो इसने मुझे जगा दिया. इसके सो जाने के बाद मैं कमरे से बाहर आ कर दीदी के कमरे में गयी तो दीदी का कमरा बंद था मगर जब मैंने दरवाजे को हलके से धक्का दिया तो वो खुल गया. कमरे के अंदर अंधेरा था. मैंने दरवाजा बंद करके लाइट जलाई तो देखा दीदी बीएड पर नहीं थी. मैं समझ गयी की वो तुम्हारे कमरे में hi होगी. उस वक्त डेढ़ बजा था और दीदी तुम्हारे कमरे में थी. तुम्हारे कमरे से कोई आवाज़ नहीं आ रही thi..iska मतलब था की तुम और दीदी सो गए थे अंदर. मैं सोच रही थी की क्या दीदी हर रात तुम्हारे कमरे में hi सो जाती होंगी. उस रात मैं 3 बजे तक दीदी के कमरे में hi रही. उसके बाद मैंने लाइट बंद किया और ऊपर अपने कमरे में आ गयी. मैं देखना चाहती थी की दीदी तुम्हारे कमरे से सुबह कब निकलती हैं?" प्रिय ने ये सब बताया और सांस लेने के लिए रुकी फिर कहना शुरू किया.

"मुझे कमरे में बहुत ज़ोरो की नींद आ रही थी मगर मैं सोना नहीं चाहती थी. किसी तरह 4 बजे तो मैंने एक बार फिर से बाहर चेक करने का सोचा. कुछ देर बाद मैंने दरवाजा खोला और बाहर निकल कर तुम्हारे कमरे की तरफ चल दी. जैसे hi मैं तुम्हारे कमरे की तरफ मुड़ी तो देखा दीदी उसी वक्त तुम्हारे कमरे से बाहर निकली थी. दीदी को देख कर मैं दिवार की आड़ में hi रुक गयी. मैंने देखा की दीदी तुम्हारे कमरे से निकल कर नीचे चली गयी हैं. मैं काफी देर तक वही पर कड़ी दीदी के बारे में सोचती रही. फिर मैंने वापस अपने कमरे की तरफ जाने का सोचा और जैसे hi मुड़ने का किया तो मेरी नज़र तुम पड़ी. तुम उसी वक्त कमरे से बाहर निकले और नीचे की तरफ चले गए. मैं ये देख कर हैरान थी की इतनी सुबह सुबह तुम दोनों जाग कैसे गए थे और नीचे चले गए थे. मैंने मोबाइल में टाइम देखा तो सवा चार बज रहे थे. मेरे मन में आया की एक बार देखु की नीचे तुम कहा गए हो. मुझे लग रहा था की तुम दीदी के कमरे में गए होंगे. मगर जब नीचे आयी तो मुझे रसोई की लाइट जाली हुयी दिखी और दीदी भी वही पर दिखी. मैं रसोई की तरफ चुपके से गयी और देखा तो दीदी वह पर चाय बना रही थी. ये देख कर मैं वापस आ गयी अपने कमरे की तरफ." प्रिय ने ये सब बताया तो मैं मन hi मन बुरी तरह हैरान था. मैं सोच रहा था की मेरी ये दोनों जुड़वाँ बहनो ने किसी सफल जासूस की तरह हमारी जासूसी कर ली थी. ये भी मन में आशंका हो रही थी की कही ये कुछ उल्टा पुल्टा न समझने लगी हो इस सब के बारे में.

"तो इसमें तुम दोनों ने ये कैसे सोच लिया की मैं दीदी से वैसा प्यार करता हु.? क्या भाई बहन एक साथ एक hi कमरे में नहीं सो सकते. आखिर तुम दोनों के मन में ऐसी घटिया बात आयी भी कैसे?" मैंने नाराज़गी से ये कहा तो पूजा ने कहा.

"गलती हमारी नहीं है भाई. हमको भी इस बात का भरोसा नहीं है. हम भी नहीं सोच सकते की तुम दोनों के बीच ऐसा कुछ हो सकता है." प्रिय ने सर झुकाते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"तो फिर अब कैसे सोच लिया तुम दोनों ने ऐसा.?" मैंने थोड़ा तेज़ आवाज़ में कहा तो प्रिय ने कहा.

"उस दिन दीदी जब तुम्हारी तस्वीर को लिए रो रही थी तो हमें अजीब लगा था. बाद में हमने उस बारे में बहुत सोचा और फिर हमें ख़याल आया की ऐसा तो कोई लड़का या लड़की तभी करते हैं जब वो किसी को बहुत प्यार करते हैं और वो एक दूसरे से दूर हो जाते हैं. उस दिन जब हमने दीदी को भी वैसे hi तुम्हारी तस्वीर लिए रट देखा तो हमें लगा शायद दीदी और तुम दोनों एक दूसरे से वैसा hi प्यार करते हो और अब क्यों की एक दूसरे से बात नहीं करते तो दीदी अकेले में इस तरह रो रही हैं. इतना hi नहीं तुम भी वैसे hi उनकी तरह अकेले में रट होंगे. इसी लिए भाई हम दोनों तुमसे ये jan'ne आये थे की क्या ऐसा hi कुछ है और अगर है तो फिर ऐसा क्या हो गया है की तुम दोनों एक दूसरे से बात नहीं करते.?" प्रिय ने ये सब कहा तो मैं फिर से हैरान रह गया. मुझे यकीन नहीं हो रहा था की ये दोनों ऐसा भी सोच सकती हैं या इसका ये भी मतलब निकाल सकती हैं.

"मुझे यकीन नहीं होता की तुम दोनों मेरे और दीदी के बारे में ऐसा भी सोच सकती हो. कल को अगर मैं तुम दोनों के साथ सोने लागु तो तुम अपने बारे में भी ऐसा सोचने लगोगी." मैंने दुखी लहजे में ये कहा तो प्रिय पूजा दोनों हड़बड़ा गयी और फिर मेरी तरफ देखने लगी. मुझे दुखी देख उनके सर झुक गए. शायद उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ था.

"भाई हमें माफ़ कर दो. हम दोनों ने तुम दोनों के बारे में कितना गन्दा सोचा. सच में हम दोनों बहुत बुरे हैं." पूजा ने बड़ी मासूमियत से ऐसा कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा.

दोनों की आँखों में आँशु तैरने लगे थे. मैं जनता था की उनकी कोई गलती नहीं थी. सिचुएशन hi ऐसी थी की उनको ऐसा सोचना पद गया था. उन्होंने साडी बाते जिस तरह से बतायी थी और जिस तरह से सच का पता लगाने के लिए जो कुछ भी देखा सुना था उससे किसी के भी मन में ऐसा hi ख़याल आता.

मुझे ये बात बड़ी अजीब लग रही थी की उन दोनों ने ये सोच लिया था की मैं दीदी से किसी प्रेमी प्रेमिका वाला प्यार करता हु और शायद दीदी भी. मैंने कभी भी दीदी के बारे में गलत नहीं सोचा था. वो मेरे साथ मेरे इतने पास hi सोती थी मगर मेरे मन में कभी उनके लिए कोई गलत विचार नहीं आया था. मुझे तो बस ख़ुशी होती थी की मेरी दीदी मेरे पास हैं.

प्रिय पूजा की बातो ने मेरे दिल और दिमाग को हिला कर रख दिया था. इसके पहले जहा मैं दीदी के बारे में ऐसा कुछ भी नहीं सोचता था वही अब मैं इसी बारे में सोचे जा रहा था. मेरे मन में सवाल था की दीदी मेरी तस्वीर लिए क्यों रो रही थी. क्या मेरी इन जुड़वाँ बहनो की बातो में कोई ऐसी सच्चाई है. क्या दीदी के मन में ऐसा कुछ है की वो मुझसे किसी प्रेमिका की तरह प्यार करती हैं.?

मैं सोचे जा रहा था मगर मुझे इसका कोई भरोसा नहीं हो रहा था. उधर वो दोनों अभी भी सर झुकाये बैठी हुयी थी. मुझे उनके ऊपर तरस आया और प्यार भी. तभी मेरे मन में एक बात आयी की अगर ऐसा कुछ होता भी तो क्या उन दोनों को इस बात से कोई प्रॉब्लम होती.? मुझे एकदम से ख़याल आया की ये मैं क्या सोच रहा हु.? मैं ऐसा कैसे सोच सकता हु की मैं और दीदी एक दूसरे से प्रेमी प्रेमिका वाला प्यार कर सकते हैं.? ऐसा तो सोचना भी पाप है. मेरा रोया रोया इस ख़याल से खड़ा हो गया.

"अच्छा छोडो ये सब और इस तरह मुँह मत लटकाओ तुम दोनों." मैंने कहा तो दोनों ने चेहरा उठा कर मेरी तरफ मासूमियत से देखा तो उनकी आँखों में आँशु देख कर मुझे बहुत बुरा लगा.

मैंने अपने दोनों हाथ फैला कर उनको सीने से लग जाने का इशारा किया तो दोनों के चेहरे खिल उठे और फिर दोनों hi मेरे सीने से छुपक गयी. दोनों के कोमल जिसम मेरे सीने से लग गए थे. तभी मुझे उनके सीने के उभार अपने सीने में धसे हुए महसूस हुए. मुझे बड़ा अजीब लगा और थोड़ा शर्म सी भी फील हुयी तो मैंने जल्दी से उनको अपने से अलग किया. मेरे इस तरह अलग कर देने से दोनों ने मेरी तरफ हैरानी से देखा. जैसे पूछ रही हो की हमें अपने से अलग क्यों कर दिया.

"अच्छा अब जाओ और सो जाओ. रात बहुत हो गयी है." मैंने दोनों की तरफ देखते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"भाई क्या हम दोनों आज तुम्हारे पास hi सो जाये यहाँ.?" प्रिय ने मासूमियत से देखते हुए ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा ठीक है सो जाओ मगर बाद में कुछ और मत सोच लेना." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दोनों है पड़ी. फिर पूजा ने कहा.

"और अगर सोच लिया तो.?" पूजा ने शरारत से ये कहा तो मैंने कहा.

"तो फिर पिटाई भी हो जाएगी तुम्हारी." मैंने आँखे दिखा कर कहा तो प्रिय ने पूजा से कहा.

"तू न एकदम से बुद्धू hi है. तुझे इतनी भी समझ नहीं है की भाई का मामला तो दीदी से है फिर ये हमारे बारे में ऐसा मामला कैसे कर देंगे.?" प्रिय ने ऐसा कहा तो मैंने हैरानी उसकी तरफ देखा.

"ये क्या बकवास कर रही है तू.?" मैंने नाराज़गी से कहा ज़रूर मगर उसकी इस बात से पता नहीं क्यों मुझे अंदर hi अंदर ख़ुशी सी महसूस हुयी थी.

"गलती हो गयी भाई माफ़ी डैडो." प्रिय ने मुस्कुरा कर हाथ जोड़ते हुए ये कहा तो पूजा खिखिला कर हसने लगी.

"अब तो तू गयी बीटा. भाई तेरी अच्छे से पिटाई करेगा." पूजा ने कहा तो मैंने हस्ते हुए दोनों को डाटा और सो जाने को कहा तो दोनों मेरे अगल बगल से लेट गयी.

बचपन में मैं दोनों को अपने साथ hi सुला लिया करता था. उसके बाद जब ये दोनों बड़ी हुयी तो माँ ने इन्हे अलग कमरे में सोने का बोल दिया था. तब से ये दोनों एक साथ अलग कमरे में hi सोती थी. आज काफी सालो बाद दोनों मेरे साथ सोने वाली थी. मैं दोनों के बीच में लेता हुआ था. हम तीनो में से इस वक्त कोई कुछ नहीं बोल रहा था.

"भाई कैसा लग रहा है आज.?" तभी पूजा ने मेरी तरफ करवट लेते हुए ऐसा कहा तो मैंने उसकी तरफ देखते होते कहा.

"कैसा लग रहा है का क्या मतलब है तेरा.?" मैंने पूछा तो पूजा ने मुस्कुराते हुए शरारत से कहा.

"भाई आज तो दो खूबसूरत लड़किया तुम्हारे दोनों तरफ लेती हुयी हैं न. इस लिए पूछ रही हु की कैसा लग रहा है तुम्हे.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने फिर हैरानी से देखा उसे. जबकि उसकी ये बात सुन कर मेरे दूसरी तरफ लेती हुयी प्रिय हसने लगी थी. मैं समझ गया की ये दोनों मेरी खिचाई कर रही हैं. मैंने भी सोचा की चलो मैं भी थोड़ा इनसे मज़ा लेता हु इनकी hi भाषा में.

"हाय मत पूछिए पूजा ji...mujhe तो ऐसा लग रहा है की दो खूबसूरत लड़कियों के बीच मैं किसी जन्नत में आ गया हु. मगर अभी बस थोड़ी सी कमी hai...agar ये दोनों सुन्दर परिया दोनों तरफ से मुझसे चिपक जाये तो और भी मज़ा आ जाये." मैंने ऐसा कहा तो दोनों मुझसे ऐसे दूर हुयी जैसे अचानक hi उन्होंने मुझमे कोई भूत देख लिया हो.

"ारी pooja...ye क्या भाई तो किसी और hi मूड में आ गया है. अब अगर हमें अपनी खेर माननी है तो चल भाग लेते हैं यहाँ से वर्ण ये लड़का हमारे साथ जाने क्या करे." प्रिय ने मुस्कुराते हुए पूजा से ये सब कहा तो पूजा ने कहा.

"चिंता मत कर प्रिय. ये अकेला है और हम दो हैं. ये हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता." पूजा ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"न बाबा na...mard तो आखिर मर्द hi होता है यार. हम तो नाज़ुक सी हैं. भला क्या कर लेंगे इसका.?" प्रिय ने ये कहा तो मैं मुस्कुरा उठा. उधर उसकी इस बात से पूजा ने कहा.

"ारी हम इतना तो कर hi सकते हैं न प्रिय की अगर इसने हमारे साथ कुछ उल्टा सीधा करने का सोचा तो हम शोर मचा देंगे. शोर सुन कर माँ पिता जी आ जायेगे और फिर इसकी जो पिटाई करेंगे तो हमें बड़ा मज़ा आएगा." पूजा ने ये सब कहा तो मैं मुस्कुरा कर रह गया और फिर दोनों को सोने के लिए कह कर मैंने अपनी आखे बंद कर ली.

मैंने आँखे तो बंद कर ली थी मगर नींद आँखों में थी hi नहीं. दिल और दिमाग में तो बस ये साडी बाते hi घूम रही थी. आज कुछ बदला बदला सा लग रहा था मुझे. मेरी दोनों जुड़वाँ बहने तो पहले से hi नटखट शैतान थी. अभी पिछले एक महीने से ये दोनों भी दीदी की तरह गंभीर हो गयी थी मगर आज अभी इन्होने जिस तरह से शरारत में वो सब आसानी से कह दिया था उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था.

मैं समझ नहीं प् रहा था की इन लोगो ने लास्ट में जो कुछ भी कहा वो सिर्फ एक मज़ाक था या सच में इनके मन में इस तरह की कोई बात थी. सोचते सोचते मुझे पता hi नहीं चला की कब मेरी आँख लग गयी थी.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भाई लोग....

यारा गिनती के दो कमेंट आये हैं. आप लोग बोलते हो की मैं स्टोरी कंटिन्यू करू. क्या ऐसे रिस्पांस पर कंटिन्यू करू. भाई लोग मैं ये नहीं कहता की रिव्यु दो मगर कुछ तो बोलो.

ो भय आप भी देख लो यहाँ गिनती के दो कमेंट आये हैं. आप खुद सोचो की इस तरह के रिस्पांस में कोई नई राइटर कैसे स्टोरी को कंटिन्यू करेगा. मैंने तो मन मार के सोचा भी चलो कंटिन्यू करता हु. मगर यहाँ तो हद hi हो गयी भय....

काबदेव भाई आप अब ये मत बोलना मुझे की मैं भगोड़ा राइटर हु. यहाँ पर मेरी कोई गलती नहीं होगी बल्कि रीडर्स की hi साडी गलती है की उन्होंने मुझे मजबूर किया की मैं स्टोरी बंद कर दू. आप बोलते हो की मैं अपने लिए likhu...to भय अपने लिए क्या लिखना मुझे तो वैसे भी स्टोरी का सब कुछ पता है....

सिराज भय और कामदेव भय आप दोनों मुझे बताओ की मैं क्या करू. क्यों की इस तरह के रिस्पांस से मेरा मन hi नहीं करता स्टोरी को लिखने का....
 
सिराज भय मैं रिव्यु के लिए किसी को नहीं कहता. मैं तो बस ये कहता हु की रीडर्स को कुछ तो बोलना चाहिए अपडेट के लिए जिससे मुझे भी लगे की मुझे कुछ तो रिस्पांस मिल hi रहा है....

यारा आपका मुझे पता है की आप कांटेस्ट में बिजी हो इस लिए मैं आपको कुछ नहीं कह रहा. मैं बस इतना चाहता हु जितनी म्हणत से मैं अपडेट लिखता हु उसके लिए रीडर्स कुछ तो अच्छा बुरा बोले. ये थोड़े की कोई कुछ बोलेगा hi न....

भय अभी आप देखो की मैंने ऐसा कहा तो एक दो लोग ऐसे यहाँ दिख गए जो पहले नहीं दिखे थे यहाँ. तो भय मैं ये कह रहा हु की क्या वो मेरे ऐसा कहने का वेट करते हैं.? ईमानदारी से जो भी बोलना हो बोल दिया करे बस. रिव्यु जाये भाड़ में मुझे उससे मतलब नहीं मगर रीडर्स को कुछ तो बोलना चाहिए न यारा....

भय मैंने पहले भी कहा था की सबकी हेल्प से और सबके मोटीवेट करने से hi मैं कुछ लिख पाउगा. अगर किसी का कमेंट hi नहीं आएगा तो यही लगेगा की मैं भैंस के आगे बीन बजा रहा हु और भैंस कोई रिस्पांस hi नहीं दे रही. तो भय स्टोरी लिखने का क्या फायदा रह गया....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 22

फ्लैशबैक रनिंग....
मैंने आँखे तो बंद कर ली थी मगर नींद आँखों में थी hi नहीं. दिल और दिमाग में तो बस ये साडी बाते hi घूम रही थी. आज कुछ बदला बदला सा लग रहा था मुझे. मेरी दोनों जुड़वाँ बहने तो पहले से hi नटखट शैतान थी. अभी पिछले एक महीने से ये दोनों भी दीदी की तरह गंभीर हो गयी थी मगर आज अभी इन्होने जिस तरह से शरारत में वो सब आसानी से कह दिया था उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था.

मैं समझ नहीं प् रहा था की इन लोगो ने लास्ट में जो कुछ भी कहा वो सिर्फ एक मज़ाक था या सच में इनके मन में इस तरह की कोई बात थी. सोचते सोचते मुझे पता hi नहीं चला की कब मेरी आँख लग गयी थी....

अब आगे पढ़िए....


सुबह चार बजे मेरी आँख खुली तो मैंने देखा की मेरे दोनों तरफ प्रिय पूजा घोड़े बेच कर सो रही थी. लेफ्ट साइड पूजा सोई थी मगर अजीब हालत में. उसने दूसरी तरफ करवट लिया हुआ था. उसका नीले रंग का कुरता ऊपर उठा हुआ था जिससे उसकी कमर साफ़ दिख रही थी और नीचे उसकी उभरी हुयी बून्द. मेरे घर के हर मेंबर का जिसम दूध की तरह साफ़ और गोरा था. पूजा को इस हालत में देख कर मुझे आज थोड़ा अजीब सा लगा. मैंने जल्दी से उसकी तरफ से नज़रे हटा कर राइट साइड में लेती प्रिय की तरफ देखा जो मेरी तरफ करवट लिए सो रही थी. उसके कुर्ते का गले वाला हिस्सा काफी खुला हुआ दिखा और उसी खुले हुए हिस्से से मेरी नज़र उसके दूध जैसे गोर सीने के उभार के ऊपरी भाग पर पड़ी.

मेरी नज़र उसके गोर गोर और सॉफ्ट से उभार पर जैम सी गयी. कुर्ते का गाला काफी आगे को हो गया था जिससे उसकी छतियो का ऊपरी हिस्सा साफ़ साफ़ क्लीवेज के साथ दिख रहा था. प्रिय की छतिया और उसका क्लीवेज देख कर मुझे बड़ा अजीब सा लगने लगा. इसके पहले मैंने अपनी बहनो के प्राइवेट पार्ट्स को कभी नहीं देखा था और न hi कभी मेरे मन में देखने का ख़याल आया था. मगर आज जब खुद hi दिखा तो मैं उस खूबसूरत चीज़ से अपनी नज़रे नहीं हटा प् रहा था. मेरे दिल की धड़कन एकदम से बढ़ गयी थी.

प्रिय की छतिया बहुत बड़ी तो नहीं थी मगर छोटी भी नहीं थी. करवट के बल लेटने से ऊपर साइड वाली छाती कुछ ज़्यादा hi उभर आयी थी. मुझे एकदम से ख़याल आया की ये मैं क्या देख रहा हु.? अपनी hi बहन के प्राइवेट part को देख रहा हु. मुझे अपने अंदर शर्म और ग्लानि सी महसूस हुयी और मैंने जल्दी से प्रिय की छाती से अपनी नज़रे हटा ली. मैं दोनों के बीच में था और बीएड पर उठ कर बैठ चूका था. कुछ देर इसी बारे में सोचता बैठा रहा. मेरी आँखों के सामने बार बार प्रिय की वो खूबसूरत छाती और उसका क्लीवेज दिख रहा था.

मैंने धड़कते दिल से एक बार प्रिय के चेहरे की तरफ देखा तो वो गहरी नींद में सो रही थी. उसके खूबसूरत चेहरे पर दुनिया भर की मासूमियत थी. वो सोते हुए बहुत hi मासूम और प्यारी लग रही थी. मुझे उस पर बहुत ज़्यादा प्यार आया तो मैंने झुक कर उसके माथे पर हलके से चूम लिया. मेरे चूमने पर वो थोड़ा सा कुनमुनाई और फिर शांत हो गयी. मुझे समझ नहीं आ रहा था की अब मैं क्या करू.

जब मेरे कमरे में दीदी सोती थी तो वो 4 बजे का अलार्म लगा कर सोती थी. धीरे धीरे मेरी आदत पद गयी थी 4 बजे उठने की और अब तो हाल ये था की बिना अलार्म के hi मेरी नींद 4 बजे खुल जाती थी जैसे आज खुल गयी थी. अगर अलार्म बजता तो मेरी ये दोनों जुड़वाँ बहने ज़रूर अलार्म की आवाज़ से उठ जाती. कुछ देर तक मैं दोनों की तरफ बारी बारी से देखता रहा उसके बाद मैं बड़े आराम से बीएड के नीचे आया और कमरे से बाहर निकल गया.

आँगन के पास बने बाथरूम में फ्रेश हुआ और फिर मैं अपने कमरे की तरफ चल पड़ा. मैंने देखा की रसोई में लाइट जल रही थी. मतलब कुसुम दीदी रसोई में थी और माँ पिता जी के लिए चाय बना रही थी. मेरा दिल किया की मैं रसोई में दीदी के पास जाओ और उनसे बात करू मगर तभी मेरा ईगो जाग गया और फिर मैंने रसोई में जाने का अपना इरादा बदल दिया. मैं ये जनता था की दीदी को भी पता चल गया होगा की मैं भी इस वक्त नीचे आया हु फ्रेश होने के लिए.

कमरे में आ कर मैंने दरवाजा बंद किया और फिर से बीएड में दोनों बहनो के बीच में आ गया. वो दोनों अभी भी वैसे hi सो रही थी. पूजा का नीले रंग का कुरता अभी भी वैसे hi उसकी कमर के ऊपर तक उठा हुआ था और उसकी गोरी गोरी कमर के साथ सलवार में छुपी उसकी उभरी हुयी बून्द साफ़ दिख रही थी.

मैं दोनों को कुछ देर तक देखता रहा उसके बाद मैंने उन दोनों को जगा देने का सोचा. मैंने प्रिय को उसके कंधे से पकड़ कर उसका नाम धीमी आवाज़ में लेते हुए हिलाया तो वो हिलते हुए पहले सीढ़ी लेती और फिर वापस वैसे hi पोजीशन में हो गयी. उसे जागता न देख मैंने फिर से उसे हिलाया तो इस बार उसके मुँह से अजीब सी आवाज़ निकली.

दोनों को 8 बजे तक सोने की आदत थी और इस वक्त तो अभी साढ़े चार hi बजे थे. फिर भला वो दोनों अपने टाइम से पहले कैसे जाग सकती थी. मगर उन्हें जगाना ज़रूरी था क्यों की वो मेरे कमरे में सो रही थी. सुबह माँ या दीदी उनके कमरे में उनको जगाने जाएगी और जब इन दोनों को अपने कमरे में नहीं पाएंगी तो गड़बड़ हो जाएगी. इन दोनों को तो अभी इस बात का अहसास hi नहीं था की ये दोनों मेरे कमरे में हैं.

मैंने बड़ी मुश्किल से दोनों को जगाया. वो दोनों बुरा सा मुँह बनाते हुए बीएड पर उठ के बैठ गयी और मेरी तरफ अजीब तरह से देखने लगी. उन दोनों की आँखों में अभी भी नींद दिख रही थी. मुझे लगा कही ये फिर से न लेट जाये. इस लिए उनको समझते हुए कहा.

"नींद से जागो deviyo..aur अपने कमरे में जाओ. क्यों की अगर माँ या दीदी ने देख लिया की तुम दोनों अपने कमरे में नहीं हो तो माँ तो कुछ नहीं कहेगी मगर दीदी का पारा शायद हाई हो जाये. इस लिए जल्दी से तुम दोनों अपने कमरे में जाओ और वही पर अपनी नींद पूरी करना." मैंने ऐसा कहा तो दोनों को अहसास हुआ की वो दोनों अपने कमरे नहीं बल्कि मेरे कमरे में हैं. दोनों ने हैरानी से एक दूसरे की तरफ देखा. फिर जैसे उनको पिछली रात का सब कुछ याद आया.

"ारी हाँ भाई हम तो भूल hi गए थे की हम अपने कमरे में नहीं सोये थे कल. अच्छा हुआ भाई की तुमने हमें जगा दिया." प्रिय ने कहा तो पूजा भी बोल पड़ी.

"हाँ भाई और अगर दीदी हमें ढूढ़ते हुए यहाँ आ जाती तो ज़रूर वो हम पर गुस्सा होती. आखिर वो ये कैसे बर्दास्त करती की हम दोनों उनकी जगह भाई के कमरे में सोये. है न भाई.?" पूजा ने शरारत से मेरी तरफ देखते हुए कहा तो मैंने हैरानी से उसे देखा. जबकि उसकी ये बात सुन कर प्रिय खिलखिला कर हसने लगी थी.

"तुम दोनों फिर से शुरू हो गयी.?" मैंने झूठ मुठ का गुस्सा दिखते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"हाय haye...kyo गुस्सा करते हो भाई.? हमें पता है की इस बात से तुम्हारे अंदर गुदगुदी हुयी है." प्रिय ने ये कहा तो मैं और भी बुरी तरह हैरान हुआ. ये दोनों तो सच में मेरे अंदर का हाल समझ रही थी.

"तुम दोनों बहुत बिगड़ गयी हो. जो भी मुँह में आता है बोल देती हो. इतना भी नहीं सोचती की जो तुम दोनों सोच कर बोल रही हो वो गलत है या सही." मैंने नाराज़गी से कहा तो पूजा ने कहा.

"हम सब समझते हैं भाई. इतने नासमझ भी नहीं हैं हम. वैसे हम तो ये सोच रहे हैं की काश दीदी की जगह हम होते. है न प्रिय.?" पूजा ने ये सब कहते हुए प्रिय की तरफ देखा तो प्रिय ने मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिला दिया. ये देख सुन कर मैं शॉक रह गया. मुझे समझ नहीं आ रहा था की ये दोनों मेरे और दीदी के बारे में ऐसा कैसे सोच कर बोल सकती हैं.

"तुम दोनों का दिमाग खराब हो गया है. अब अगर फिर से ये सब सोचा और बोलै तो सच कहता हु मैं तुम दोनों की शिकायत माँ से कर दुगा." मैंने धमकी देते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"माँ से इस बारे में कुछ मत कहना भाई. वर्ण बात और भी बिगड़ जाएगी और अगर उन्होंने पिता जी से इस बात का ज़िकर कर दिया तो समझो हम सबकी खेर नहीं. इस लिए तुम माँ से बताने की धमकी हमें मत दो." प्रिय ने ये सब कहा तो मैं भी सोचने लगा की बात तो सही है. अगर ऐसी बात माँ पिता जी को पता चल गयी तो सच में तूफ़ान आ जायेगा.

"वैसे एक बात कहु bhai...hame सच में इस बात से कोई एतराज़ नहीं है. हम ये जानते हैं की भाई बहन के बीच ऐसा रिश्ता गलत है मगर हमने सुना है की प्यार अँधा होता है और पवित्र भी और ये भी की वो रिश्ते नाते कुछ नहीं देखता. वो तो बस किसी से भी हो जाता है. इस लिए अगर तुम दोनों को एक दूसरे से ये प्यार हो भी गया है तो इससे हमें कोई एतराज़ नहीं है. वैसे भी हम तीनो बहनो की किस्मत hi ऐसी लिखी है भगवन ने की साडी ज़िन्दगी अकेले hi रहना है. हमारी किस्मत में किसी से हमारी शादी होना तो लिखा hi नहीं है. अगर लिखा होता तो दीदी के लिए इतने सरे बने बनाये रिश्ते न टूट जाते. हम दोनों हस्ते खेलते रहते हैं और मस्ती करते रहते हैं मगर ऐसा इसी लिए करते हैं क्यों की हम मिलने वाले उस दुःख को याद नहीं करना चाहते. दीदी के लिए हम भी बहुत दुखी होते हैं मगर जो हमारे बस में hi नहीं है उसके लिए क्या कर सकते हैं.?" पूजा ने गंभीरता से ये सब कहा तो मैं उसकी तरफ हैरानी से देखता रह गया. मुझे आज पता चला की मेरी ये दोनों जुड़वाँ बहने तो कब की सायानी हो चुकी हैं और समझदार भी.

"भाई हमने इस बारे में बहुत सोचा. हमने अपनी किस्मत के बारे में भी बहुत सोचा. हमने तो इस दुःख को मस्ती करते हुए भुला देने की आदत बना ली है मगर दीदी ने तो खुद को इस दुःख में hi डुबो रखा है. तुम भले hi इस बात को न समझो मगर हम दोनों अच्छी तरह समझ गए हैं की दीदी तुमसे बहुत प्यार करती हैं. उस दिन तुम्हारी तस्वीर को सीने से लगाए जिस तरह वो रो रही थी उससे साफ़ साफ़ यही महसूस होता है की वो तुमसे बेपनाह प्यार करती हैं. उसके बाद हमने इस बारे में बहुत सोचा. हम जानते हैं की ये गलत है और ऐसा नहीं होना चाहिए मगर हर बात के बारे में सोचते हुए हमें यही लगा की अगर दीदी को तुमसे प्यार है तो क्या गलत है.? हर लड़की को अपने लिए एक ऐसे जीवन साथी की इच्छा होती जो उसे बहुत सारा प्यार दे सके और दीदी से ऐसा प्यार करने वाला तो बस एक hi हो सकता है जो की तुम hi हो भाई. सब जानते हैं की तुम दीदी को किसी भी हाल में दुखी नहीं देख सकते इस लिए तुमसे अच्छा प्यार करने वाला दूसरा कौन होगा दीदी के लिए. हाँ ये ज़रूर है की तुम दोनों एक दूसरे के जीवन साथी नहीं बन सकते मगर एक प्यार करने वाला तो बन hi सकते हो." प्रिय ने ये सब कहा तो मेरा दिल और दिमाग हैंग सा हो गया. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था की अपनी इन बहनो की बातो का क्या जवाब दू.

"भाई दीदी के दुखो का अंत कर दो. उन्हें बहुत सारा प्यार दो. वो बहुत दुखी हैं. उनके दुःख को दूर कर दो भाई. हमें इस सबसे कोई एतराज़ नहीं है. बल्कि हमें ख़ुशी hi होगी की हमारी दीदी को तुमने अपने प्यार से ख़ुशी दे दी." पूजा ने इस बार गंभीरता से कहा तो मैं बोल पड़ा.

"ऐसा नहीं हो सकता. ये गलत hai....ye पाप है. भाई बहन के बीच ऐसा रिश्ता नहीं बन सकता. माँ पिता जी को पता चलेगा तो वो जीते जी मर जायेगे. इस गांव में अगर किसी को इस रिश्ते के बारे में पता चल गया तो वो हमारे माँ पिता पर थूकेंगे और इस गांव से बेदखल कर देंगे." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा भाई. सब की नज़र में तुम दोनों भाई बहन hi रहोगे. माँ पिता जी को भी कुछ पता नहीं चलेगा. हम सब इस बारे में ख़याल रखेंगे की उन्हें इस बारे में कुछ पता न चल सके." प्रिय ने कहा तो मैंने कहा.

"तुम दोनों का दिमाग खराब हो गया है. इस बात का पता चले या न चले मगर मैं ऐसा नहीं कर सकता. ये गलत hai...ye पाप है. माँ पिता जी को जीते जी नहीं मार सकता मैं. उन्हें किसी भी तरह का धोखा नहीं दे सकता." मैंने ये सब कहा तो पूजा ने कहा.

"तो क्या तुम चाहते हो की दीदी इस दुःख में ऐसे hi पल पल मरती रहे.? एक भाई बन कर तुम दीदी को जितना खुश रखने की कोशिश कर सकते थे वो तुमने किया मगर एक लड़की को खुश रहने के लिए और क्या चाहिए होता है ये तुम नहीं समझ सकते भाई." पूजा ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसक्ती तरफ देखा.

"क्या मतलब है तुम्हारा.?" मैंने पूछा तो पूजा ने कहा.

"हर बात का मतलब बताना ज़रूरी नहीं होता भाई. कुछ बाते खुद भी समझनी पड़ती हैं." पूजा ने नज़रे झुकाते हुए ये कहा तो मैं देखता रह गया उसे. उसकी बात का मतलब मैं अच्छी तरह समझ गया था.

मुझे समझ न आया की उसकी इस बात का मैं क्या जवाब दू. एक तरह से अगर सोचा जाये तो उसने अब साडी बात को ओपन hi कर दिया था. मुझे बहुत अजीब लगने लगा था की मेरी इन बहनो ने मुझसे ओपनली ऐसी बाते कर दी थी.

"अब हम जा रहे हैं भाई मगर हमारी बातो के बारे में सोचना ज़रूर. एक बात aur...agar तुम इसके लिए हाँ करते हो तो हम दोनों इसके लिए हर वक्त तुम्हारा साथ देंगे." प्रिय ने बीएड से नीचे उतारते हुए ऐसा कहा तो मैं कुछ न बोलै.

वो दोनों मेरे कमरे से चली गयी थी मगर अपनी बातो से उन दोनों ने मेरे दिल और दिमाग में तूफ़ान सा खड़ा कर दिया था. मेरी आँखों के सामने साडी दुनिया घूमती हुयी दिख रही थी. बार बार आँखों के सामने दीदी का वो दुखी चेहरा आ जाता था. सोचते सोचते मेरा सर फटने लगा तो मैं आँख बंद करके लेट गया.

आज का सारा दिन मेरा यही सब सोचते हुए गुज़र गया. दोपहर को रुपेश आया था मगर मैं उसके साथ नहीं गया. सरपंच काका ने मुझे फ़ोन करके बताया था की दो दिन बाद से मैं सचिव का काम काज देखना शुरू कर दू.

प्रिय पूजा दो तीन बार आज मेरे कमरे में आयी थी. दोनों ने मुझसे पूछा था की मैंने इस बारे में क्या सोचा है मगर मैंने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया. मुझे खुद कुछ समझ में नहीं आ रहा था की मैं क्या फैसला करू.? मुझे बस एक hi बात सत्ता रही थी की अगर मैंने ये सब किया और किसी दिन इसका पता माँ पिता जी को चल गया तो क्या होगा.? मेरे पिता जी बहुत hi नेक इंसान थे. वो हम सबसे बहुत प्यार करते थे और हमेशा हमें अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा देते थे. गांव में हमारे लिए जिस तरह का माहौल था उस हिसाब से वैसे भी ब्राह्मण समाज हमें ज़्यादा भाव नहीं देता था. यही सोच कर पिता जी की हमेशा यही कोशिश रहती थी की उनका परिवार कभी कोई ऐसा काम न करे जिससे ब्राह्मण समाज को कुछ उल्टा सीधा बोलने का मौका मिले.

मैं हर बात पर विचार कर रहा था और ये मामला ऐसा था की अगर ये सब सबके सामने आ गया तो सब कुछ बिखर जाने वाली बात हो जनि थी. सारा दिन मैं इन सभी बातो के बारे में सोचता रहा मगर मेरी सोच यही पर आ कर रूकती की मुझे अपनी फॅमिली को बिखरने नहीं देना है. मैं कोई गलत काम नहीं करुगा और ये जायज़ भी था. मगर फिर जब कुसुम दीदी का ख़याल आता तो मेरी आँखों के सामने उनका गुमसुम सा चेहरा घूमने लगता. मैं उन्हें इस हालत में नहीं देख सकता था. मेरा दिल चीख चीख कर कहता की अपनी इस दीदी के लिए कुछ ऐसा कर की इसके चेहरे पर कभी कोई उदासी न आये. मगर मैं ऐसा कुछ करने में सफल नहीं हो सकता था.

सारा दिन ऐसे hi गया. शाम को पूजा मुझे चाय का कहने आयी तो मैं नीचे आया और चाय पिया. दीदी मुझे नज़र नहीं आयी थी. मैं जनता था की वो यही कही होंगी. चाय पिने के बाद मैं घर से बाहर निकल गया. मुझे समझ न आया की अब कहा जाओ और कैसे अपने अशांत मन को बहलाऊ.?

फिर मेरे मन में सरपंच काका का ख़याल आया तो मैं उनके घर की तरफ hi बढ़ गया. रास्ते में कुछ आदमी मिले जो मुझे देख कर पूछने लगे थे की कब से मैं सचिव पद सम्हाल कर काम करुगा. मैंने उनको बताया तो उन्होंने खुश हो के मुझसे कहा की बीटा तुम सच में महेश के होनहार बेटे हो. थोड़ी देर बाद मैं उनसे विदा ले के चला तो मेरे मन में फिर से ये बात आ गयी की ये सब लोग मुझे अच्छा और होनहार समझते हैं मगर आज अगर इन्हे पता चल जाये की हम भाई बहन के बीच प्यार वाला रिश्ता बन गया है तो ये लोग हमारे बारे में क्या क्या सोच बैठेंगे.

यही सब सोचते हुए मैं सरपंच काका के घर पंहुचा. वह देखा की घर के बाहर hi मैदान में कुर्सी पर सरपंच की छोटी बेटी रचना बैठी थी. उसके हाथ में कोई किताब थी जिसे वो पढ़ रही थी. घर के बाहर उसके अलावा और कोई न दिखा मुझे. उसे अकेला इस तरह बैठे देख कर मुझे समझ न आया की मैं उससे कुछ बोलू की नहीं. उधर रचना किताब में खोयी हुयी थी. उसे मेरे आने का अहसास तक न हुआ था.

घर के बाहर वो गाड़ी भी नहीं कड़ी थी जो रुपेश की थी. शायद वो हमेशा की तरह कही आवारागर्दी करने गया हुआ था. मैंने इधर उधर देखा तो मुझे कोई नहीं दिखा. मैंने सोचा अब क्या करू.? मैं रचना से कोई बात नहीं करना चाहता था. मैं तो बस सरपंच काका से मिलना चाहता था मगर यहाँ पर तो कोई नज़र hi नहीं आ रहा था.

जब मुझे कुछ न समझ आया तो मैंने वापस लौट जाने का सोचा और वापस चल hi दिया था की तभी पीछे से रचना की आवाज़ मेरे कानो में पड़ी.

"अगर तुम पिता जी से मिलने आये थे तो बता दू की वो घर पर नहीं हैं. वैसे अगर मेरी एक बात सुनते जाओगे तो मेरे दिल को थोड़ा सुकून मिल जायेगा." रचना ने ये सब कहा तो मैं एकदम से अपनी जगह पर रुक गया. मैं उसकी तरफ नहीं पलटा और न hi मैंने उसकी बात का कोई जवाब दिया. जब मैं कुछ न बोलै और न hi उसकी तरफ पलटा तो उसने फिर कहा.

"तुम्हारे बारे में जितना मैंने सुना था और जितना मैंने जाना था क्या वो सब झूठ था.? कमाल की बात है न की तुमको अगर कोई अपना सीना चीयर कर भी दिखते हुए कहे की देख लो मेरे दिल में कोई खोट या कोई गलत नीयत नहीं है तब भी तुम्हे यकीन नहीं होगा. कितनी बेवकूफ थी मैं जो ये समझने लगी थी की एक अच्छा इंसान मेरा दोस्त बन गया है मगर तुम तो वो हो जिससे किसी को कोई मतलब hi नहीं रखना चाहिए." रचना ने तना मारते हुए ऐसा कहा तो मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया और आगे बढ़ गया.

मैं आगे तो बढ़ चला मगर मैं जनता था की मेरे कुछ जवाब न देने से रचना को बहुत बुरा लगा होगा मगर मुझे उसके बुरा लगने से कोई मतलब नहीं था. मेरे दिमाग में बस एक hi बात थी की मेरी दीदी ने उससे कोई मतलब न रखने के लिए हुकुम दिया था.

मैं रचना के बारे में सोचते हुए घर आ गया. रात होने लगी थी और पिता जी भी खेतो से घर आ गए थे जो बैठक में थे. उनके पास दो आदमी बैठे हुए थे. मुझे देख कर पिता जी ने मुझे बुलाया और फिर उनसे मेरा परिचय कराया. कुछ देर बाद मैं अपने कमरे में आ गया.

मुझे कमरे में आये थोड़ी hi देर हुआ था की प्रिय पूजा दोनों एक साथ hi मेरे कमरे में आ गयी. पूजा के हाथ में चाय का एक कप था जिसे उसने मुझे दिया और फिर दोनों hi मेरे अगल बगल बीएड पर बैठ गयी.

दोनों कुछ देर मुझे देखती रही फिर पूजा ने मुझे किसी सोच में दुबे हुए देख कर पूछा की मैं क्या सोच रहा हु मगर मैंने कुछ नहीं कह कर बात को ताल दिया और उनसे कहा की वो दोनों जाये कमरे से. मुझे कुछ देर अकेले रहना है.

मेरे इस तरह कहने से दोनों ने बुरा सा मुँह बनाया और कमरे से चली गयी. मैं बीएड पर लेट कर रचना और दीदी के बारे में सोचने लगा. मैं जनता था की रचना मुझसे नाराज़ है और वो चाहती है की मैं उसे मनाओ और उससे फिर से बाते करने लागु मगर मैं ऐसा नहीं कर सकता था. उधर दीदी की अलग टेंशन थी. ऐसा कभी नहीं हुआ था की मैं दीदी से एक दिन भी उनसे बात किये बिना रहा हो. यही हाल उनका भी था. मुझे याद है की जब भी मैं उनके सामने आ जाता तो उनका चेहरा खिल सा जाता था. मगर काफी दिन गुज़र गए थे और हमने एक दूसरे से बात करने की तो बात दूर बल्कि एक दूसरे की तरफ देखा भी नहीं था. इससे मैं कितना दुखी और बेचैन थस ये मैं hi जनता था और मैं ये भी महसूस करता था की यही हाल दीदी का भी होगा.

मुझे याद आया की प्रिय पूजा ने दीदी की डायरी का ज़िकर किया था. उस दिन के बाद से वो डायरी उन दोनों के हाथ नहीं लगी थी. कुछ तो ऐसा था दीदी की उस डायरी में जिसे दीदी ने ऐसी जगह छुपा दिया था की वो आसानी से किसी को मिल नहीं सकती थी. दीदी ने डायरी को उस आलमारी में hi रखा होगा जो अब लॉक hi रहती थी. क्या सच में दीदी मुझसे प्यार करती होंगी. प्रिय पूजा भी तो यही कह रही थी और वो मुझसे भी कह रही थी की मैं उनसे प्यार करता हु. मगर मैं तो दीदी से वैसा प्यार नहीं करता. वो तो बस भाई बहन का hi प्यार है. फिर उन दोनों ने ऐसा कैसे कह दिया मेरे लिए.?

मैं अपने आप से पूछने लगा की क्या मैं दीदी से प्यार करता हु.? दीदी का हर तरह से ख़याल रखने का मतलब क्या सिर्फ यही है की मैं उनसे प्यार करता हु.? मगर मुझे तो ऐसा कभी नहीं महसूस हुआ. क्या दीदी के दिल में मेरे लिए प्रेमी प्रेमिका वाला प्यार है.? उनोने अपनी उस डायरी में ऐसा क्या लिख रखा है जिसे उन्होंने छुपा दिया है. उस दिन शायद उन्हें शक हुआ होगा की किसी ने उनकी डायरी को छुआ है और इसी लिए उन्होंने उसे छुपा दिया था. आखिर क्या लिखा होगा दीदी ने उस डायरी में.? क्या ये की वो मुझसे प्यार करती हैं.? प्रिय पूजा ने बताया था की कोई आदमी किसी डायरी में अपनी ब्यक्तिगत बाते या दिल की बाते hi लिखता है जिसे वो किसी दूसरे को पढ़ना नहीं चाहता.

बीएड पर लेता मैं इसी बारे में सोचे जा रहा था मगर मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंच प् रहा था. मेरा दिल कह रहा था की मुझे दीदी के पास जाना चाहिए और उनसे बात करना चाहिए. दीदी मुझसे नाराज़ हैं तो मुझे उनकी नाराज़गी दूर करना चाहिए. मगर ये तो मैंने पहले भी करने की कोशिश की थी. प्रिय पूजा ने बताया था की वो मेरी तस्वीर को सीने से लगाए रो रही थी. इसका मतलब वो मुझसे दिल से नाराज़ नहीं हैं.

मैंने सोच लिया की मैं एक बार फिर से दीदी के पास जाउगा और उनसे बात करने की या उनकी नाराज़गी दूर करने की कोशिश करुगा. मैंने ये फैसला लिया तो तभी मेरा ईगो फिर से जाग गया और कहने लगा की मैं hi क्यों बार बार उनके पास जा कर उन्हें मानाने की कोशिश karu...kya उनको एक बार भी मेरे पास नहीं आना चाहिए.? अपने ईगो की इस आवाज़ को मैंने इस बार दबा दिया. पता नहीं क्यों मगर मुझे इस बार ईगो की ये बात अच्छी नहीं लगी.

रात में खाना पीना करने के बाद हम सब अपने अपने कमरों में सोने के लिए आ गए थे. मैं माँ पिता जी के सोने का इंतज़ार कर रहा था. क्यों की उनके सो जाने के बाद hi मैं दीदी के कमरे में जा कर तसल्ली से बात कर सकता था. मुझे एकदम से ख़याल आया की कही प्रिय पूजा आज भी मेरे कमरे में न आ जाये. ऐसा हो सकता था क्यों की उनका कोई भरोसा नहीं था. उन दोनों ने मुझे सोचने का टाइम दिया हुआ था इस लिए इसके लिए वो मेरे कमरे में आ भी सकती थी.

मैंने मोबाइल में टाइम देखा तो 11 बज रहे थे. मैंने फैसला किया की मैं प्रिय पूजा से एक बार जान लेता हु की कही वो आज भी तो मेरे कमरे में सोने के लिए नहीं आएगी.? ये सोचते hi मैं बीएड से उठा और उनके कमरे की तरफ चल पड़ा.

उनके कमरे के दरवाजे पर पहुंच कर मैंने दरवाजा खटखटाया तो कुछ hi पालो में दरवाजा प्रिय ने खोला. मुझे बाहर खड़ा देख कर वो मुस्कुरायी फिर एक तरफ हैट कर मुझे अंदर आने का रास्ता दिया तो मैं कमरे के अंदर आ गया.

दरवाजा बंद करके प्रिय वापस आयी और बीएड पर मेरे पास hi बैठ गयी. पूजा बीएड पर पहले लेती हुयी थी मगर अब वो भी बैठ गयी थी. दोनों ने मुझे कुछ देर देखा फिर पूजा ने शरारत से कहा.

"क्यों bhai...dil को चैन नहीं मिल रहा क्या.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने उसको आखे दिखते हुए कहा.

"तुम दोनों के दिमाग में जब देखो यही सब चलता रहता है क्या.?" मैंने कहा तो पूजा ने कहा.

"ारी नहीं भाई मैं तो बस मज़ाक कर रही थी. तुम बताओ आज हमारे कमरे में आने का कास्ट कैसे किया.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"देखो मैंने ये सोचा है की एक बार फिर से मैं दीदी से बात करने की कोशिश करता हु और उनसे पूछता हु की वो मुझसे नाराज़ क्यों हैं.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"हम भी यही चाहते हैं भाई की तुम दीदी से बात करो. पहले हमें भी लगता था की वो तुमसे किसी बात से बहुत नाराज़ हैं. इसी लिए वो तुमसे बात नहीं करती हैं. मगर उस दिन जब हमने उन्हें तुम्हारी तस्वीर को सीने से लगाए रट देखा तो पता चला की वो तुमसे दिल से नाराज़ नहीं hain..agar होती तो तुम्हारी तस्वीर को हाथ भी न लगाती. भाई कुछ तो बात ज़रूर है जिससे वो दुखी हैं. हो सकता है की उस डायरी में उन्होंने अपने दिल की बाते लिखी हो जिन्हे वो तुमसे कह न पाती होगी." प्रिय ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"हाँ हो सकता है. इस लिए मैं सोच रहा हु की माँ पिता जी के सो जाने के बाद मैं दीदी के कमरे में जाउगा और उनसे बात करुगा. मैं कोशिश करुगा की वो अपने दिल की बाते मुझे बता सके." मैंने कहा तो पूजा ने कहा.

"ठीक है भाई तुम दीदी के पास जाओ. हम दोनों तो आज भी तुम्हारे कमरे में आने वाले थे. मगर अब जब तुम दीदी के पास जा रहे हो तो अब नहीं जायेगे." पूजा ने कहा तो प्रिय बोल पड़ी.

"भाई तुम दीदी के पास जा रहे हो तो अब हमें भी ये जानने की उत्सुकता रहेगी की दीदी ने आखिर क्या बताया होगा तुमसे. इस लिए जब तुम वापस अपने कमरे की तरफ आना तो पहले हमारे कमरे में आना. हम कमरे का दरवाजा अंदर से खुला रखेंगे." प्रिय ने कहा तो मैंने हाँ में सर हिलाया तो पूजा ने कहा.

"भाई दीदी की नाराज़गी दूर करके hi वापस आना. दीदी को इस तरह दुखी देख कर हमें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता है. इस लिए तुम ऐसा कुछ करना की उनका सारा दुःख दूर हो जाये." पूजा ने कहा तो मैं उसकी तरफ देखने लगा. मुझे समझ न आया की उसके ऐसा कहने का क्या मतलब है.

जैसे hi 11:30 बजे तो मैं प्रिय पूजा के कमरे से बाहर आ गया और नीचे दीदी के कमरे की तरफ चल पड़ा. मेरा दिल ये सोच कर ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था की मैं दीदी से किस तरह बात कर पाउगा.? क्या दीदी मुझसे बात करना चाहेंगी या वो मुझे अपने कमरे से चले जाने को कह देंगी.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi. नेक्स्ट अपडेट में प्रेजेंट आएगा....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
ओह्ह यारा ये जान के दुःख हुआ की आपके ताऊ जी की डेथ हो गयी है. भगवन उनकी आत्मा को शांति दे...

भय आप भी राइटर हो न तो इतना तो आप भी उम्मीद करते होंगे की रीडर्स का कमेंट आपकी स्टोरी में आये. आप भी ये देखना चाहते होंगे न रीडर्स आपकी स्टोरी के बारे में क्या बोलते हैं. तो बस वही मैं भी तो चाहता हु कामदेव भय. अब अगर ये भी गलत है तो बोलो ये भी न चाहु....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 89....

रीड & एन्जॉय....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

वेलकम भय. कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

भय मैं ये नहीं कहता की आप रिव्यु दो. मैं बस ये कहता हु की जो भी इस स्टोरी को पढता है वो अच्छा बुरा जो भी हो कमेंट ज़रूर करे बस.

भय जिसे स्टोरी के प्रेजेंट में hi रिव्यु करना है तो वो प्रेजेंट का वेट करे....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 89....

रीड & एन्जॉय....
 
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