SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 7 - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 28


मैंने बड़ी मुश्किल से थोड़ा बहुत खाया और रचना की माँ से इजाज़त ले कर घर आ गया. अपने कमरे में बीएड पर पड़ा मैं रचना के बारे में सोचने लगा. क्या गुनाह किया था उस मासूम ने जो पिछले पांच सालो से मेरी चाहत की आस में खुद को तड़पा रही थी. क्या चाहती है वो मुझसे.? मैं तो अपनी माँ बहनो को ले कर यहाँ से दिल्ली चला जाउगा मगर उसका क्या होगा.???

मैं समझ नहीं प् रहा था की इस बारे में मुझे क्या करना चाहिए. अगर मैं रचना को यु hi छोड़ कर चला गया तो मैं जनता हु की वो साडी ज़िन्दगी यु hi मेरी चाहत में गुज़ार देगी. एक ऐसी चाहत में जो कभी उसे मिल hi नहीं sakti...main कभी उसका हो hi नहीं सकता. मुझे रचना के लिए ये सब सोच कर बहुत दुःख हुआ मगर मैं उसके लिए क्या कर सकता था.? उसने तो मुझसे कहा भी नहीं की मैं उसके लिए कुछ करू. शायद उसे अहसास था की अपने दिल से वो मेरे प्रति ये मोहब्बत नहीं मिटा सकती मगर खुद को पत्थर कर के उसने अपनी ख्वाहिशो का hi खून कर दिया था.

अब आगे पढ़िए....


अपने कमरे में बीएड पर पड़ा मैं रचना के बारे में जाने कब तक सोचता रहा. किस्मत भी बड़ी अजीब चीज़ होती है. किसी को चाह कर भी कुछ नहीं मिलता और किसी को बिना चाहे बहुत कुछ मिल जाता है. रचना ने जो चाहा उसे वो तो नहीं मिलने वाला था मगर जो नहीं चाहा था वो ज़रूर मिल गया tha...yaani ज़िन्दगी भर का दुःख.

मैं इस बात को सोच कर दुखी हो रहा था की मैंने रचना पर हमेशा शक किया था जबकि वो तो गंगा की तरह पवित्र थी और निर्दोष भी. ऐसा होता है की हम किसी को पहले समझ नहीं पते और जब समझ लेते हैं तब बहुत देर हो चुकी होती है. अब अगर मैं रचना को समझ भी गया तो क्या फर्क पद गया इससे.? उसको तो ज़िन्दगी भर के लिए मोहब्बत का गम मिल hi गया. किसी की यादो के सहारे साडी ज़िन्दगी गुज़ार लेना इतना भी आसान नहीं होता मगर शायद रचना में वो साहस और हिम्मत थी. उसने एक बार भी मुझसे ये नहीं कहा की उसे मुझसे कुछ चाहिए. बल्कि उसने तो खुद hi मुझसे ये कह दिया था की उसे पता था की उसका बाप उस घर में अपनी बेटी का ब्याह नहीं करेगा जिस घर में गांव का ब्राह्मण समाज पानी तक नहीं पीटा.

आज रचना का कद मेरी नज़र में बहुत बड़ा हो गया था. ज़िन्दगी ने उसके साथ कितना बड़ा छल कर दिया था. मेरी आँखों के सामने बार बार उसका हुलिया फ़्लैश हो जाता था. कितनी बदल गयी थी वो. पांच साल पहले आसमान से उत्तरी हुयी कोई पारी लगती थी वो मगर आज पारी जैसी कोई बात नहीं रह गयी थी उसमे. अपने आप पर ध्यान देना hi बंद कर दिया था उसने. उसे रूप श्रृंगार से जैसे कोई मतलब hi नहीं रह गया था. मेरा मन उसके बारे में सोच सोच कर बुरी तरह से भरी हो गया.

अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी मेरे कमरे का दरवाजा खुला और कुसुम दीदी कमरे में आ गयी. मुझे यहाँ आये हुए आज बीस दिन हो गए थे मगर इतने दिनों में आज ये पहली बार ऐसा हुआ था जब दीदी मेरे कमरे में आयी थी. सब के सामने वो मुझसे नार्मल hi बात करती थी मगर अकेले में मिलने का कोई अवसर hi न आया था. दूसरी बात ये भी थी की हमारे बीच तो पहले hi हर बात का करार हो गया था. इस लिए मिलने मिलाने का शायद सवाल hi नहीं था.

कुसुम दीदी मेरे कमरे में आयी तो मैं बीएड पर उठ कर बैठ गया. कुसुम दीदी के चेहरे को देख के ऐसा लग रहा था जैसे उनके मन में कुछ था. कमरे में आते hi उन्होंने दरवाजा बंद किया और फिर बीएड की तरफ आ कर बीएड के किनारे पर बैठ गयी. मैं उन्हें hi देखे जा रहा था. मेरा दिल जाने क्यों एकदम से ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे दीदी आज मुझसे कुछ कहने आयी हैं.

"क्या बात hai...aaj आप मेरे कमरे में.?" मैंने उनकी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए ये कहा तो दीदी ने मेरी तरफ देखा. उनकी आँखों में एकदम से आँशु भर आये.

"क्या मैं तेरे कमरे में नहीं आ सकती.?" दीदी ने दुखी हो के ये कहा तो मैंने कहा.

"ारी ये मैंने कब कहा की आप मेरे कमरे में नहीं आ सकती.? बेशक आप मेरे कमरे में आ सकती हैं. मुझे तो आपके आने से ख़ुशी hi हुयी है. खेर chhodiye...ye बताइये की अपने भाई के कमरे में आने में इतनी देर कैसे लगा दी आपने.?" मैंने ये कहा तो दीदी की जो आँखे भर आयी थी वो छलक पड़ी. ये देख कर मैं तड़प तो उठा मगर जाने क्यों इस बारे में मैं उनसे कुछ कह न सका.

"क्या लगता है तुझे.? मेरे सीने में दिल नहीं है.? मेरे अंदर कोई जज़्बात नहीं हैं.?" दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"कमाल hai....mujhe लगा की जो इंसान बेदर्दी से अपने जज़्बातो को कुचल चूका हो उसके अंदर अब कोई जज़्बात कहा रह गया होगा.?" मैंने ये कहा तो दीदी मुझे देखती रह गयी.

"क्या कहना चाहता है तू विक्की.? साफ़ साफ़ कह दे जो भी कहना हो तुझे. इस तरह तना मारने की कोई ज़रूरत नहीं है.?" दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ारी मैं तो मज़ाक कर रहा था दीदी. आप बताइये मेरे पास किस लिए आयी thi...koi काम था क्या मुझसे.?" मैंने ये कहा तो दीदी फिर मुझे देखती रह गयी.

"मुझे तुझसे ये उम्मीद नहीं थी विक्की की तू शहर में रह कर इतना बदल जायेगा." दीदी ने अपने आप को सम्हालते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ये हर इंसान की प्रॉब्लम है दीदी. हर इंसान को सामने वाले से ऐसी hi कोई उम्मीद नहीं hoti...mujhe आज तक समझ नहीं आया की इंसान किसी की उम्मीदों पर खरा क्यों नहीं उतरता.? क्यों हर इंसान को इस बात की शिकायत हो जाती है.?" मैंने ये सब कहा तो दीदी ने कहा.

"बहुत बड़ी बड़ी बाते सीख गया है तू. खेर अच्छी बात है ye...main तो तेरा हाल चाल पूछने आयी थी. मुझे नहीं पता था की मेरा भाई मुझे ताने मरेगा इस तरह." दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अगर आपको मेरी बातो से चोट पहुंची है तो मैं आपसे हाथ जोड़ के माफ़ी मांगता हु दीदी. वैसे आप तो जानती हैं की मैं आपको चोट पहुंचने के बारे में सोच भी नहीं सकता. अगर भगवन मेरे सामने आ कर मुझसे कहे की मांग मुझसे जो भी तुझे मांगना हो तो मैं उससे बस यही मांगूगा की मुझे मेरी दीदी के सरे दुःख दे दो और उनकी झोली में साडी दुनिया की खुशिया भर दो." मैंने ये कहा तो दीदी की आँखे एक बार फिर से छलक पड़ी. मैंने देखा की उन्होंने अपने आपको बड़ी मुश्किल से सम्हाला फिर बोली.

"अच्छा मैं तेरे लिए चाय बना के भिजवाती हु पूजा से." दीदी ने ये कहा और मेरा कोई जवाब सुने बिना hi उठ कर कमरे से चली गयी. उनके जाने के बाद मैं मुस्कुराया और बीएड पर लेट गया. मैं जानता था की दीदी ये बोल कर क्यों चली गयी थी. मेरी बातो ने उनके अंदर तूफ़ान खड़ा कर दिया था. जिसे वो मेरे सामने सम्हाल नहीं सकती थी. मैं ये भी जनता था की अब वो अकेले में मेरी बातो को याद कर कर के रोयेगी.

थोड़ी देर में प्रिय पूजा मेरे कमरे में चाय ले कर आयी और मेरे पास hi बैठ गयी. पांच सालो में ये दोनों भी काफी बदल गयी थी. पहले ये दोनों चुलबुली नटखट हुआ करती थी मगर अब दोनों में गंभीरता आ गयी थी. दोनों भरपूर जवान दिख रही थी. वक्त और हालात सबको बदल देते हैं.

पिता जी की मौत के बाद हम सब दुखी थे मगर अब धीरे धीरे सब नार्मल होने लगा था. मैं जब भी कमरे में होता तो मेरी दोनों जुड़वाँ बहने मेरे पास आ जाती थी और मुझसे ढेर साड़ी बाते करती रहती थी. दोनों ने मुझसे मेरे पांच सालो के बीच के सारे किस्से जान लिए थे. मैंने उन्हें ये नहीं बताया था की मेरे दक्षिणा से कैसे रिलेशन्स हैं. मैंने सिर्फ यही बताया की मैं वह पर नौकरी करता हु. मैंने उन्हें ये भी बताया की मैंने एक घर भी ख़रीदा हुआ है.

दोनों में एक बात अभी भी वैसी hi थी और वो ये की रात में दोनों मेरे कमरे में hi सोने आ जाती थी. दो दिन बाद मुझे डालर का फ़ोन आया. उसने बताया की एक नया खरीदार मिला है और वो मेरी ज़मीने देखना चाहता है तो मैंने डालर से कहा की वो उसे यहाँ ले आये. डालर ने मुझसे हाँ कहा और मैंने कॉल कट कर दी. उसके बाद मैंने पटवारी की बीवी यानी गायत्री जी को फ़ोन लगाया और उन्हें भी बताया तो उन्होंने कहा की वो अपने बेटे के साथ आ जाएगी.

गायत्री देवी बहुत hi भली और नेक दिल औरत थी. हमारी कोई इतनी ज़्यादा जान पहचान नहीं थी मगर फिर भी वो मेरी बिना कोई स्वार्थ के मदद कर रही थी. ऐसे लोग दुनिया में बहुत काम hi मिलते हैं. दो घंटे बाद डालर उस खरीदार को ले कर मेरे घर पर आ गया. उसके थोड़ी देर बाद गायत्री जी भी आ गयी अपने बेटे के साथ. उनका बीटा मेरी hi आगे का था.

इन लोगो के आने पर मैंने उनका अच्छे से स्वागत सत्कार किया और फिर सबको ले के खेतो की तरफ चल दिया. आधे घंटे बाद हम खेत पहुंचे. मैंने उन सबको अपनी साड़ी ज़मीने दिखाई. मेरी ज़मीनो में एक तरफ ामो का बाग़ भी हो गए थे. ामो के बहुत सरे पेड़ लगे हुए थे. मगर वो ज़्यादा बड़े नहीं थे. खरीदार ने मेरी साड़ी ज़मीनो को अच्छे से देखा. ज़मीनो के पीछे से hi बड़ी सी नहर गुज़र रही थी.

मैंने देखा की खरीदार मेरी ज़मीने देख कर बड़ा खुश दिख रहा था. गायत्री देवी भी सब देख रही थी. सब कुछ देखने के बाद हम सब वापस घर आ गए. घर में आने के बाद ज़मीनो के सौदे की बात चीत हुयी. मैंने सारे कागजात भी दिखाए उस खरीदार को.

बहुत सोच विचार के बाद उस खरीदार ने कहा की वो साडी ज़मीन नहीं ले पायेगा. वो आधी ज़मीन ले सकता है और उसका तत्काल भुगतान भी कर सकता है. उसकी ये बात सुन कर मैंने कहा की आधी ज़मीन बेचने का तो कोई सवाल hi नहीं है. ज़मीन बिकेगी तो साडी hi वर्ण नहीं. मेरी बात सुन कर डालर ने कहा की एक काम हो सकता है और वो ये की आधी ज़मीन पुरसोत्तम जी ले लेंगे और आधी वो जिनके साथ पहले सौदा हुआ था.

मैं इसके लिए राज़ी तो हुआ मगर दिक्कत ये थी की पहले वाला खरीदार साडी ज़मीन के पांच करोड़ बोल रहा था. पुरसोत्तम नया खरीदार tha...isne कुछ सोचते हुए कहा की दो दिन का वक्त उसे चाहिए. वो साडी ज़मीन ले लेगा. उसकी इस बात से मैंने कहा की ठीक है. फिर दाम की बात हुयी तो उसने साडी ज़मीन का दाम नौ करोड़ रुपये बोलै. उसकी ये बात सुन कर गायत्री देवी ने कहा की नौ करोड़ क्या होता है आप पूरा दस करोड़ में बात ख़तम कीजिये.

काफी देर तक इस बारे में बात होती रही और आखिर फिर वो खरीदार दस करोड़ देने को राज़ी हुआ मगर उसने कहा की दस करोड़ में उसे ये घर भी चाहिए. उसकी इस बात से गायत्री देवी ने मुझे चुपके से इशारा किया की मैं हाँ कह दू. फिर क्या था.. बात पक्की हो गयी. पुरसोत्तम जी ने दो दिन का वक्त मांगा और डालर के साथ चला गया. गायत्री जी को मैंने और माँ ने रोकने की बहुत कोशिश की मगर वो न रुकी. उन्होंने कहा की वो दो दिन बाद फिर आ जाएगी.

ऐसे hi दो दिन गुज़र गए. मैंने गांव में भनक भी नहीं लगने दी थी किसी को की मैं अपनी ज़मीने और घर बेच रहा हु. दो दिन बाद मैं शहर गया. वह पटवारी के घर में hi हम सब मिले और वही पर ज़मीनो का सौदा हुआ. पटवारी ने कागजी कार्यवाही का जिम्मा अपने ऊपर लिया. दस करोड़ की रकम पुरसोत्तम ने मेरे बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दी.

कागजी काम में कुछ दिन का वक्त लग्न था जिसके लिए मैं रुक गया था. खरीदार के जाने के बाद मैंने पटवारी से उस ज़मीन को भी बेचने की बात की जिसे मणि शंकर ने कब्ज़ा किया हुआ था. मेरी बात सुन कर पटवारी ने हस्ते हुए मुझसे कहा की चिंता मत करो बेटे. मणि शंकर को तो ऐसा झटका दूँगा की वो सात जन्मो तक याद रखेगा. मैंने पूछा वो कैसे तो पटवारी ने कहा की उस ज़मीन को वो खुद खरीदेगा.

हमारे गांव से सात कम दूर दूसरा गांव था जहा पर वो ज़मीन थी और जिसमे मणि शंकर ने ज़बरदस्ती कब्ज़ा किया हुआ था. वो ज़मीन पांच एकड़ के आस पास थी. वो ज़मीन अब उपजाऊ हो गयी थी वर्ण पहले बंजर hi पड़ी थी. सींच का उसमे कोई साधन नहीं था. गायत्री जी ने खुद hi कह दिया की वैसे तो उस ज़मीन में कोई ख़ास बात नहीं है मगर वो सिर्फ मेरी वजह से उस ज़मीन के अच्छे दाम दे सकती है.

गायत्री जी ने उस ज़मीन को उसकी औकात से ज़्यादा दाम दिया मुझे. दस लाख ज़मीन के और दो लाख अपनी तरफ से मेरे लिए. मैंने भी सोचा चलो कोई बात नहीं. गेयटी देवी ने और उसके पति ने बताया था की मुझे मेरी गांव वाली ज़मीनो के दुगुने दाम मिले हैं. ये सौदा किसी भी तरह से घाटे का नहीं है.

ऐसे hi एक हप्ते और गुज़र गए. सब कुछ बेच दिया गया था. दक्षिणा ने मुझे फ़ोन पर बताया की उसने एक अच्छा सा घर देख लिया है. मैंने घर की कीमत पूछी तो उसने बात को ताल दिया. मैं समझ गया की वो मुझे उसकी कीमत नहीं बताना चाहती मगर मैं उसके ऊपर बोझ नहीं ban'na चाहता था और न hi उसका इतना बड़ा अहसान लेना चाहता था. मेरे ज़ोर देने पर उसने बताया की वो घर पांच करोड़ की कीमत का है

घर की कीमत सुन कर मेरे पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी. मैंने दक्षिणा से साफ़ कह दिया की मुझे इतनी महगी कीमत का घर नहीं चाहिए. मैं कोई राजा महाराजा नहीं हु जो महल में रहुगा. मुझे अपनी हैसियत के हिसाब से रहने के लिए एक ऐसा घर चाहिए जिसमे मैं और मेरी माँ बहने आराम से और ख़ुशी से रह सके.

पहले तो दक्षिणा न मानी मगर जब मैंने नाराज़गी के साथ कहा तो उसने मुझसे नाराज़ हो के पूछा की कितनी कीमत का घर मुझे चाहिए तो मैंने बता दिया की एक दो करोड़ से ऊपर का नहीं होना चाहिए. मेरी ये बात सुन कर दक्षिणा ने ok कहा और फ़ोन रख दिया.

शाम को मैं अपने कमरे में लेता हुआ था की तभी मेरे कमरे में माँ आयी और मेरे पास बीएड पर बैठ गयी. वो मुझसे ज़मीनो और घर के बारे में पूछने लगी तो मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया. ये भी की अब हम जल्द hi यहाँ से चले जायेगे और दिल्ली में रहेंगे. माँ मेरी इस बात से और तो ज़्यादा कुछ नहीं बोली बस यही कहा की हमने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा था मगर इसके बाद भी इस गांव के ब्राह्मण समाज ने हमारा कभी भला नहीं होने दिया. पता नहीं मेरी बेटियों से हम से क्या दुश्मनी थी उनकी.?

कुछ देर इसी बारे में माँ मुझसे बात करती रही फिर उन्होंने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए कुछ सोचने लगी. मुझे समझ न आया की वो क्या सोच रही हैं. तो मैंने उनसे पूछ hi लिया. मेरे पूछने पर उन्होंने कहा.

"रचना से तेरा क्या रिश्ता था जो तू उसके साथ पांच साल पहले शहर में घूमा करता था.?" माँ ने मुझसे ये पूछा तो मैं एकदम से कुछ बोल न सका. मेरी आँखों के सामने फिर से रचना का चेहरा घूमने लगा. मुझे कुछ न बोलता देख माँ ने फिर कहा.

"देख मुझे इतना पता है की मेरा बीटा किसी की लड़की के साथ कुछ भी गलत नहीं करेगा. मुझे ये भी भरोसा है की उस कमीने सरपंच की लड़की ने hi तुझे अपने रूप जाल में फसाया होगा. खेर तू मुझे सच सच बता हकीकत क्या है.?" माँ ने ये सब कहते हुए पूछा तो मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया. बस ये नहीं बताया की हमारे बीच चूमा छाती भी होती थी. मेरी बाते सुनने के बाद माँ चुप चाप मुझे देख के कुछ सोचती रही.

"क्या यहाँ आने के बाद तू उससे मिला है अभी.?" माँ ने पूछा तो मैं फिर कुछ न बोल सका तो माँ शायद समझ गयी फिर बोली.

"मतलब तू उससे मिला है. क्या ज़रूरत थी तुझे उससे मिलने की.?" माँ ने इस बार नाराज़गी से ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं उससे मिलने नहीं गया था माँ. वो तो सरपंच काका ने कहा था घर आ के हिसाब किताब देख लेना की कितना पैसा पिता जी ने उससे उधार लिया था. इस लिए मैं उसके घर गया था. जब मैं उसके घर गया तो सरपंच था hi नहीं घर में. काकी ने बताया की वो रुपेश के साथ किसी काम से बाहर गया है. काकी के बताने से मैं उसके घर से वापस hi आने वाला था की काकी ने मुझे रोक लिया और मेरा हाल चाल पूछने लगी. फिर मुझे चाय नास्ता करने को कहने लगी तो मैंने मन कर दिया. मगर काकी न मानी और मुझे बैठक में बैठा कर चाय नास्ता लेने अंदर चली गयी. मुझे रचना के बारे में कुछ पता नहीं था की अब वो कैसी है और कहा है. हाँ मैं ये समझ रहा था की अब उसकी शादी हो चुकी होगी मगर मैं गलत समझ रहा था. जब काकी अंदर चली गयी तभी रचना किसी काम से शायद बाहर बैठक में आयी थी मगर जब उसने बैठक में मुझे बैठे देखा तो मुझे देख कर हैरान रह गयी. उसे ये तो पता चल गया था की मैं वापस आ गया हु मगर शायद उसे ये उम्मीद नहीं थी की मैं उसके घर में उस वक्त उसे मिल जाउगा. उसके बाद उसने मुझसे मेरा हाल चाल पूछा और मैंने भी. उसका हुलिया देख कर मैं हैरान था. उसने खुद hi बताया की उसका वैसा हुलिया कैसे बन गया है.?" मैंने ये सब माँ से बताया तो माँ ने बीच में मुझसे टोकते हुए पूछा.

"क्या बताया उसने?" माँ ने बड़े ध्यान से मेरी तरफ देखते हुए ये पूछा तो मैंने उन्हें रचना की साड़ी बात बता दी. साडी बात जानने के बाद माँ हैरान रह गयी.

"तो ये वजह थी की उसने अब तक शादी नहीं की अपनी.? उसके घर वाले उसकी शादी के लिए बहुत परेशां थे. गांव में भी ये बात सब जानते हैं की सरपंच की बेटी शादी नहीं करना चाहती मगर वो क्यों शादी नहीं करना चाहती ये आज तक किसी को पता नहीं चल सका. हमें तेरे और उसके बारे में उतना hi पता था इस लिए हम यही सोचते थे की शायद वो तुम्हारी वजह से शादी नहीं कर रही है. अभी जब तूने ये सब बताया तब साड़ी बात समझ आयी." माँ ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैं कुछ न बोलै.

"मैं समझती थी की सरपंच के घर परिवार में सिर्फ उसकी बीवी hi अच्छी इंसान थी मगर अब पता चला की उसकी बेटी रचना भी एक नेक दिल लड़की थी. उसने तेरे जाने के बाद इस बात को किसी से नहीं कहा वर्ण अगर उसने अपने घर में किसी से इस बारे में बता दिया होता तो शायद सरपंच हम सबको ज़िंदा hi ज़मीन में गाड़ देता." माँ ने सोचते हुए ये सब कहा तो मैंने कहा.

"अब से पहले मैं भी यही समझता था माँ की रचना ने मुझसे सिर्फ इसी लिए दोस्ती की थी की वो अपने भाई की मार का मुझसे किसी तरह से बदला लेना चाहती है और उसके लिए उसने मुझसे दोस्ती की. उसके अंदर क्या साजिश थी इस बारे में मुझे कुछ पता नहीं था मगर उस दिन जब उसने मुझे सब कुछ अपने बारे में बताया तो मैं भरोसा नहीं कर प् रहा था. मुझे समझ आया की कितना गलत सोचता था मैं उसके बारे में.?" मैंने ये सब कहा तो माँ ने कहा.

"मगर तूने उससे दोस्ती की hi क्यों थी.? साफ़ साफ़ मन कर देता उसे इसके लिए." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं तो बस ये देखना चाहता था की वो दोस्ती की आड़ में मेरे साथ क्या करना चाहती है.? इस लिए उसकी दोस्ती को कबूल किया था. मगर अब जनता हु की उसके अंदर तो कभी कोई बदला लेने वाली बात थी hi नहीं. वो तो सच में मुझसे दोस्ती hi करना चाहती थी. क्यों की उसकी नज़र में मैं इस गांव में सबसे अच्छा लड़का था." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"बाप भाई के बुरे कर्मो की सजा बेटी भोग रही है. जब तू यहाँ से चला गया था तो मैं भी अपने सामने उसे हमेशा बुरा भला hi कहती थी. शायद मेरी बद्दुआ लग गयी उस मासूम को." माँ ने ये कहा तो मैं हैरानी से उन्हें देखने लगा.

"चल तू आराम kar....main भी खाना बनाने जा रही हु." माँ ने ये कहा तो मैंने हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद माँ नीचे चली गयी. उनके जाने के बाद मैं फिर से रचना के बारे में सोचने लगा.

रचना के बारे में सोचने से पता नहीं क्यों मुझे उसके लिए बहुत बुरा लग रहा था. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं रचना के लिए क्या करू. उसने मेरी चाहत में खुद को ऐसा बना लिया था. उसके बारे में सोचते सोचते अचानक hi मुझे दीदी का ख़याल आया. मैं अपने मन में रचना की तुलना दीदी से करने लगा. मेरी दीदी भी तो मुझसे बहुत प्यार करती हैं. ऐसा मुझे लगता था जबकि उन्होंने कभी भी इस बात को मुझसे कहा नहीं था मगर जब हमारे दिल एक दूसरे से इतने गहरे जुड़े होते हैं तो हमारे दिल एक दूसरे का हाल महसूस कर hi लेते हैं.

कुसुम दीदी अंदर hi अंदर खुद को सजा देती थी और यही हाल रचना का भी हो गया था. उसने उस दिन मुझसे अपने दिल का हाल बता तो दिया मगर मुझसे ये नहीं कहा की उसे अपनी मोहब्बत का कोई खूबसूरत सिला चाहिए. उसके मन में बस यही बात बैठी हुयी थी की उसका मिलान या उसका ब्याह मुझसे नहीं हो सकता क्यों की उसका बाप एक ऐसे घर में अपनी बेटी का ब्याह नहीं करेगा जिसके यहाँ ब्राह्मण समाज पानी भी नहीं पिता. ये सब सोच कर उसने हालातो से समझौता कर लिया था. वो अब सिर्फ मेरी यादो के सहारे साडी ज़िन्दगी गुज़ार देने के फैसले पर कायम थी.

रात में खाना पीना करके मैं वापस अपने कमरे में आ गया था. कुसुम दीदी से उसके बाद मेरी कोई बात नहीं हुयी. मैं जनता था वो मुझसे नाराज़ हैं. मगर मैं उनकी नाराज़गी पर अभी कुछ करने की हालत में नहीं था. माँ और दीदी के सो जाने के बाद प्रिय पूजा मेरे कमरे में आ गयी. आते hi वो दोनों मेरे अगल बगल लेट गयी.

"एक बात बताओ भाई तुम बैग में क्या ले कर आये थे.? हमने तो अभी तक उन्हें खोल कर देखा hi नहीं. क्या उसमे हमारे लिए कुछ है.?" पूजा ने मुझसे ये पूछा तो मुझे भी याद आया की मैं दिल्ली से जब आया था तो मेरे हाथ में दो बड़े बड़े बैग थे. पिता जी की मौत के बाद कभी उन बैग्स का ध्यान hi नहीं आया था.

"अब ये तो तुम्हे उनके खुलने पर hi पता चलेगा." मैंने ऐसा इस लिए कहा क्यों की मुझे भी नहीं पता था की उनमे क्या है अंदर. क्यों की दोनों बैग दक्षिणा ने पैक किये थे. मैं तो बस उन्हें ले कर यहाँ आ गया था.

"फिर तो हम अभी उन्हें खोल कर देखेंगे भाई की उनमे हमारे लिए क्या है." पूजा ने इस बार मुस्कुराते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"हाँ पूजा सही कहा तूने. चल खोल कर देखते हैं. मुझे पूरा भरोसा है की भाई हमारे लिए कुछ न कुछ लाया hi होगा." प्रिय ने ये कहा तो पूजा जल्दी से उठ कर बीएड से नीचे आ गयी.

मैं दोनों की तरफ hi देख रहा था. वो दोनों कमरे में इधर उधर देखने लगी. मगर वो दोनों बैग उन्हें कमरे में कही न दिखे. तब दोनों ने मुझसे बैग के बारे में पूछा तो मैंने कहा की मुझे पता नहीं है की वो कहा रखे हैं. मेरी ये बात सुन कर दोनों के चेहरे लटक गए. फिर जैसे उन्हें कुछ याद आया तो प्रिय ने कहा.

"भाई उस दिन हम दोनों hi तो तुम्हारे हाथ से बैग ले कर बाहर से अंदर आये थे. मुझे लगता है माँ के कमरे में होंगे वो बैग." प्रिय ने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"माँ के कमरे में अगर होंगे तो इस वक्त हम उनके कमरे में कैसे जायेगे.? वो सो रही होंगी." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो chhodo...kal सुबह उन्हें देख लेना. अभी आराम से सो जाओ." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"न bhai...ham तो अभी देखेंगे. कल सुबह तक हम इंतज़ार नहीं कर सकते अब. चल प्रिय माँ के कमरे में चलते हैं." पूजा ने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"माँ अगर डाँटेगी तो वो भी सह लगे मगर वो दोनों बैग ले कर सीधा यही आएंगे चल अब." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"और अगर माँ ने ये पूछा की बैग लेके कहा जा रही हो तो क्या जवाब डौगी तुम दोनों.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"बता देंगे की भाई ने मगाया है. उसमे कोई ज़रूरी चीज़ है जिसे अभी देखना चाहते हो तुम." प्रिय ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसे देखा. क्या बहाना बनाया था उसने.

मुझे हैरानी से देखता देख दोनों हसने लगी और कमरे से बाहर निकल गयी. उनके जाने के बाद मैं उन दोनों के बारे में hi सोचते हुए मुस्कुराता रहा. पता नहीं कैसे वो दोनों माँ के कमरे से वो दोनों बैग लाएगी.?

कुछ देर बाद जब वो दोनों वापस कमरे में आयी तो मैं उनके हाथो में बैग देख के हैरान रह गया. मुझे लगा था की दोनों जब सोती हुयी माँ को जगाएगी तो माँ ज़रूर उन्हें डाँटेगी और कमरे से ये कह के भगा देगी की कल देख लेना बैग. मगर ये तो बैग हाथ में ले के hi आयी थी.

दोनों मुस्कुराते हुए आयी और सबसे पहले कमरे का दरवाजा बंद किया उसके बाद मेरे पास आ कर बोली की भाई अब बैग खोलो. दोनों ने बताया की माँ अभी जाग रही थी और जब दोनों ने बैग के बारे में माँ से पूछ तो माँ ने बता दिया. तब दोनों वही पर बैग खोलने लगी थी मगर बैग खुला hi नहीं उनसे. क्यों की दोनों बैग नंबर से लॉक थे.

जब मुझे पता चला की बैग नंबर से लॉक हैं तो मैं भी हैरान रह गया. दोनों बैग दक्षिणा ने hi पैक किये थे और आते वक्त न मैंने उससे पूछा और न hi उसने बताया था नंबर लॉक के बारे में. जब दोनों ने मुझसे बैग खोलने के लिए कहा तो मैं हड़बड़ा गया की अब बैग कैसे खोलू. क्यों की मुझे भी पिन नंबर नहीं पता था. मैं उन दोनों से ये कह भी नहीं सकता था की मुझे इसका पिन पता नहीं है क्यों की उससे वो मुझसे हज़ारो सवाल करने लगती. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं अब क्या करू.?

दोनों कड़ी मुझे hi देखे जा रही थी. फिर मेरे मन में एक अड़िअ आया. मैंने दोनों से कहा की मैं बाथरूम करके आता हु. मैं बीएड से नीचे उतरा और मोबाइल ले कर नीचे बाथरूम की तरफ बढ़ गया. बाथरूम में आ कर मैंने दक्षिणा को फ़ोन लगाया. वो भी अभी जाग रही थी. मैंने उससे बैग के पिन नंबर का पूछा तो उसने मुझे पिन नंबर बता दिया. उससे और एक दो मिनट मैंने बात की और जल्दी से कमरे में आ गया.

कमरे में आ कर मैंने बैग के नंबर लॉक पर पिन डाला और दोनों बैग खोल दिए. बैग में बहुत सरे कपडे भरे थे और लेडीज लोगो के ज़रूरत का सामान भी. मैं ये सब देख कर हैरान रह गया.

प्रिय पूजा दोनों बैग में कपडे देख कर बहुत खुश हो गयी थी. दोनों बैग से सरे कपडे निकाल निकाल कर देखने लगी. उनके कपड़ो में जीन्स और तशीरतस थी. एक भी शलवार कुरता वाले कपडे नहीं थे. हमारे गांव में कोई भी लड़की जीन्स वगैरा नहीं पहनती थी. प्रिय पूजा ने जब जीन्स और टीशर्ट देखा तो बहुत खुश तो हुयी मगर फिर मायूस भी हो गयी.

"वाह भाई दिल तो खुश कर दिया तुमने ऐसे कपडे हमारे लिए ला कर मगर हम इन्हे पहन नहीं सकते. वैसे हमारा भी बहुत मन करता था ऐसे कपडे pahan'ne का मगर मज़बूरी थी की पहन नहीं सकते थे." पूजा ने ये कहा तो प्रिय बोली.

"एक तो माँ और पिता जी का दर और ऊपर से गांव वालो का. हमें पता है की शहर में लड़किया ऐसे hi कपडे पहनती हैं. मगर भाई तुम्हे तो यहाँ के बारे में पता था फिर ऐसे कपडे ले कर आने का क्या मतलब था.?" प्रिय ने ये कहा तो मैं कुछ बोल न सका. मैं खुद हैरान था की दक्षिणा ने ऐसे कपडे क्यों ख़रीदे थे.? अब मैं इन दोनों के सवालों के क्या जवाब दुगा.?

"क्या हुआ भाई चुप क्यों हो.? बताओ न की ऐसे कपडे हमारे लिए क्यों kharide..aur तो और दीदी के लिए भी ख़रीदे ऐसे hi कपडे. हम तो किसी तरह इन्हे पहन भी लगे मगर वो तो बिलकुल भी नहीं पहनेगी." प्रिय ने फिर से ये कहा तो इस बार मैंने कहा.

"अरे तो क्या हो गया देवियो.? मुझे लगा था की इन पांच सालो में यहाँ का माहौल भी कुछ न कुछ शहर की तरह हो गया होगा. इस लिए ख़रीदे थे ऐसे कपडे. अब मुझे क्या पता था की आज भी गांव में सब कुछ पहले जैसा hi है. खेर chhodo...ab हम सबको शहर तो जाना hi है इस लिए ये कपडे तुम लोग शहर में hi pahan'na." मैंने ये कहा तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा फिर पूजा बोली.

"मगर भाई ऐसा भी तो हो सकता है की माँ ये कपडे हमें शहर में भी न पहनने दे." पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"फ़िक्र मत करो. मैं सब सम्हाल लगा. अब चलो इन्हे वापस बैग में सेट करके रखो और सो जाओ." मैंने ने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"वैसे भाई क्या हम ये कपडे अभी पहन सकते हैं.?" प्रिय ने ये कहा तो पूजा भी बोल पड़ी.

"हाँ bhai...ham एक बार इन्हे पहन कर देखना चाहते हैं की ये हम पर कैसे लगते हैं.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"अच्छा ठीक है पहन लो मगर जल्दी करो जो कुछ भी करना है." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"ठीक है bhai...magar तुम हमारी मदद करो न. वो क्या है की हमें पता hi नहीं है की किस कपडे के साथ कौन सा कपडा पहनना है.?" प्रिय ने कहा तो मैं बीएड से उतर कर नीचे आया और बैग से निकले हुए कपड़ो को ध्यान से देखने लगा.

फिर मैंने एक एक जीन्स और एक एक टीशर्ट छात कर उन दोनों को पकड़ा दिया और कहा की इन्हे पहन लो. कपडे लेने के बाद प्रिय पूजा ने कहा की अब हम इन्हे पहने कैसे तो मैंने कहा जैसे पहना जाता है और कैसे. मेरे ऐसा कहने पर दोनों हसने लगी फिर प्रिय बोली की भाई हम तुम्हारे सामने कपडे कैसे उतर कर इन्हे पहनेगे.? तब मुझे समझ आया तो मैंने कहा की मैं कमरे से बाहर चला जाता हु. जब पहन लेना तो दरवाजा अंदर से बजा देना. मेरे ऐसा कहने पर दोनों मुस्कुरायी और हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद मैं कमरे से बाहर आ गया.

करीब दस मिनट बाद दरवाजा बजा तो मैं कमरे के अंदर गया और जब मेरी नज़र उन दोनों पर पड़ी तो मैं हैरानी से देखता रह गया दोनों को. दोनों जीन्स और टीशर्ट पहने हुए थी और बहुत hi कमाल की लग रही थी. कासी हुयी जीन्स में उनकी जाँघे और टाँगे साफ़ साफ़ समझ में आ रही थी और ऊपर टीशर्ट में भी उनके सीने के उभार साफ़ नज़र आ रहे थे. मैं उन्हें आँखे फाड़े देखे जा रहा था और वो दोनों मुझे अपनी तरफ इस तरह देखते देख बुरी तरह शर्माए जा रही थी.

"भाई ऐसे आँखे फाड़े क्यों देख रहे हो हमें.? क्या ये कपडे हम पर अच्छे नहीं लग रहे.?" प्रिय ने शरमाते हुए ये कहा तो मुझे होश आया और फिर मैंने अपने आपको सम्हालते हुए बोलै.

"मुझे यकीन hi नहीं हो रहा की तुम दोनों गांव में रहने वाली आम सी लड़किया हो. ऐसा लगता है जैसे तुम दोनों शहर में hi रही हो. बस एक hi कमी है अभी." मैंने ऐसा कहा तो दोनों जल्दी से बोली की कौन सी कमी है भाई तो मैंने बताया की वो दोनों इन कपड़ो में शर्मा रही हैं यही कमी है.

मैंने कमी बताया तो दोनों मुस्कुरायी और बोली की भाई पहली बार ऐसे कपडे पहने हैं इस लिए थोड़ा अजीब लग रहा है हमें इस लिए शर्म आ रही है और दूसरी बात ये भी है की इन कपड़ो में सब कुछ साफ़ साफ़ नज़र भी आता है इस लिए भी शर्म आ रही है.

जब पूजा ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा तो उसने शर्मा के सर झुका लिया. मैंने कहा की शहरो में लोग इनसे भी छोटे छोटे कपडे पहनते हैं और वो तुम्हारी तरह शरमाते नहीं हैं. इस लिए इस शर्म को निकाल लो अभी से वर्ण शहर में कैसे चलेगा.?

"भाई अब तुम बाहर जाओ हम इन कपड़ो को उतार कर फिर से अपने कपडे पहनना चाहते हैं." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"एक मिनट ruko....main तुम दोनों की इन कपड़ो में एक एक फोटो खींच लेता हु मोबाइल में." मैंने ये कहा तो दोनों मुस्कुराते हुए शर्मा गयी फिर पूजा बोली.

"नहीं न bhai...photo मत खींचो अभी. अभी हमें इन कपड़ो में शर्म आ रही है इस लिए फोटो अच्छी नहीं आएगी." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"तुम दोनों इन कपड़ो की तरफ ध्यान hi मत दो और ये सोचो की तुम अपने hi कपडे पहने हुयी हो. तब तुम्हे शर्म नहीं आएगी." मैंने ये कहा तो दोनों ने हाँ में सर हिला दिया.

उसके बाद मैंने बीएड पर रखा अपना मोबाइल लिया और दोनों के सामने आ कर उन दोनों की फोटो लेने लगा. वो दोनों अभी भी थोड़ा शर्मा रही थी. फोटो ले के जैसे hi मैं फुर्सत हुआ तो दोनों कहने लगी की हमें भी दिखाओ की हम कैसी लग रही हैं तो मैंने दोनों को फोटो दिखाई. अपनी फोटो देख कर दोनों हैरान भी हुयी और शर्मा भी गयी. उसके बाद मैं कमरे से बाहर आ गया.

कुछ देर बाद जब दरवाजा बजा तो मैं वापस कमरे में गया तो देखा दोनों ने फिर से अपने पहले वाले कपडे पहन लिए थे. सरे कपड़ो को सेट करके बैग में रखने के बाद दोनों बैग को एक तरफ रख दिया गया. उसके बाद हम तीनो बीएड पर आ कर लेट गए.

"भाई सच सच बताओ न हम दोनों उन कपड़ो में कैसे लग रहे थे.?" पूजा ने मुझसे चिपकते हुए मुझसे ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"बहुत hi सुन्दर लग रही थी तुम दोनों. तुम दोनों को देख के मुझे ऐसा लग रहा था जैसे तुम दोनों को अपनी बाहो में उठा लू और ख़ुशी से नाचने लागु." मैंने ये कहा तो दोनों हसने लगी फिर प्रिय बोली.

"तो भाई अपनी बाहो में हमें उठाया क्यों नहीं तुमने.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"वो इस लिए नहीं उठाया क्यों की तुम दोनों का भरी वजन मैं उठा hi नहीं पता." मैंने ये कहा तो दोनों के चेहरे पर नाराज़गी उभर आयी. दोनों hi मुझसे अलग हो गयी और फिर पूजा बोली.

"हमें तुमसे कोई बात नहीं करना भाई. हम क्या तुम्हे इतने भरी नज़र आते हैं.?" पूजा ने बुरा सा मुँह बनाते हुए ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"हम तो फूल सी कोमल और मासूम हैं. इतनी बड़ी तौहीन आज तक न हुयी थी हमारी. जाओ अब बिलकुल भी बात नहीं करना तुमसे." प्रिय ने ये कहा तो मैं मुस्कुराया. मैंने तो दोनों को छेड़ने के लिए hi ऐसा कहा था.

"ारी मैंने तो तुम दोनों से मज़ाक में ऐसा बोलै था मेरी प्यारी प्यारी बहनो. मुझे भी पता है की मेरी ये दोनों परिया कितनी कोमल और मासूम हैं. मैं तो साडी दुनिया से ये कह सकता हु की मेरी ये दोनों बहने सबसे सुन्दर और सबसे मासूम हैं." मैंने ऐसा कहा तो दोनों जल्दी से मुस्कुराते हुए वापस मुझसे चिपक गयी. फिर पूजा बोली.

"क्या सच कह रहे हो भाई.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"क्या तुम दोनों को कोई शक है मेरी बात में.?" मैंने ये कहा तो दोनों ने न में सर हिलाया और फिर दोनों ने मेरे सीने पर अपना अपना सर रख लिया.

मैं सीधा लेता हुआ था और वो दोनों मेरे से पेट के बल चिपकी लेती हुयी थी. दोनों के सीने के उभार मुझे साफ़ साफ़ महसूस हो रहे थे. मैंने ये भी महसूस किया की दोनों के वो उभार पहले से अब बड़े थे. मेरे मन में ये गन्दा ख़याल आया तो पता नहीं एकदम से मुझे नदामत सी फील हुयी. मगर जो चीज़ मेरे जिसम में धसी हुयी फील हो रही थी उनको मैं कैसे इग्नोर करता.

ऐसे hi कुछ देर में हम तीनो सो गए. सुबह मेरी आँख खुली तो देखा दोनों मुझसे वैसे hi चिपकी सोई हुयी थी. मैंने दोनों को जगाया तो दोनों ने पहले मेरी तरफ ध्यान से देखा फिर दोनों ने झुक कर मेरे दोनों गालो पर चूमा और फिर मुस्कुराते हुए गुड मॉर्निंग कहा तो मैं भी मुस्कुरा उठा. मुझे पांच साल पहले का सब कुछ याद आया. पहले भी ये दोनों ऐसा hi करती थी. दोनों मेरी तरफ hi देख रही थी. मैं समझ गया की दोनों क्या चाहती हैं इस लिए मैंने भी मुस्कुरा कर दोनों के गाल पर बरी बरी से चूमा और गुड मॉर्निंग कहा.

उसके बाद वो दोनों ख़ुशी ख़ुशी चली गयी कमरे से. उसके बाद दिन ऐसे hi गुजरने लगा. दोपहर को खाना पीना करने के बाद मैं माँ के पास उनके कमरे में गया तो पता चला की वो घर पर नहीं हैं. प्रिय ने बताया की वो किसी काम से किसी के घर गयी हैं. माँ ने बताया नहीं था की वो किसके घर गयी हैं.

माँ के कमरे से निकलने के बाद मैं वापस अपने कमरे की तरफ जाने के लिए सीढ़ियों की बढ़ा hi था की मुझे दीदी का ख़याल आया तो मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ चला. मैं जनता था की वो उस दिन की बातो से मुझसे नाराज़ हैं.

दीदी के कमरे का दरवाजा बंद था तो मैंने दरवाजा खटखटाया. कुछ hi पालो में दीदी ने दरवाजा खोला और बाहर मुझे देख कर कुछ न बोली और वापस मुद कर कमरे में चली गयी. मैं अंदर गया और दरवाजा बंद कर दिया.

"क्या बात hai...aaj इतने दिनों बाद अपनी बड़ी बहन के कमरे में आने का कास्ट कैसे किया मेरे भाई ने.?" कुसुम दीदी ने बीएड पर बैठने के बाद मुझे देखते हुए ये कहा तो मैं मुस्कुराया और जा कर उनके बगल से बीएड पर बैठ गया.

"बहुत कोशिश की मैंने की इस तरफ न औ मगर हर बार अपनी कोशिशों में नाकाम hi हुआ. आपकी तरह शायद मैं इतना पक्का नहीं हु की अपनी बात पर कायम राहु. माँ के बाद बचपन से जिसे देखा और जाना समझा है वो आप hi थी दीदी. अगर कोई मुझसे ये पूछे की माँ पिता जी के बाद किसने मुझसे सबसे ज़्यादा प्यार किया है तो मैं यही कहुगा की मेरी कुसुम दीदी ने. और अगर कोई मुझसे ये पूछे की मैंने सबसे ज़्यादा किस्से प्यार किया है तो मैं यही कहुगा की अपनी......!" मैं ये कह hi रहा था की तभी एकदम से दीदी ने मेरे मुँह पर अपनी हथेली रख दी और मेरी बात को पूरा होने से पहले hi रोक दिया. उनकी आँखों में आँशु थे. मेरी तरफ देखते हुए इंकार में सर हिला रही थी. जैसे कह रही हो की इसके आगे मैं उनसे कुछ न कहु.

मेरे अंदर भी तूफान सा उठ खड़ा हुआ था. आँखों में मेरे भी आँशु आ गए थे. दीदी ने मेरे मुँह पर हथेली रख दिया था जिससे मैं आगे अपनी बात पूरी नहीं कर सका था. कुछ देर तक कमरे में अजीब सी ख़ामोशी रही. दीदी ने अपनी हथेली मेरे मुँह से हटा लिया था.

"तू मुझसे दुनिया जहां की सब बाते कर विक्की मगर इस बारे में कुछ न बोलै कर मुझसे." दीदी ने अपने आपको सम्हालते हुए भरी आवाज़ में ये कहा तो मैंने कहा.

"क्यों न बोलै करू दीदी.? आखिर मेरे इस बारे में बोलने से क्या हो जायेगा.? पांच साल पहले भी आपने मुझे रोक दिया था और कसम दे दी थी मगर काम से काम मुझे ये तो बता दीजिये की मुझे बोलने से मन क्यों करती हैं आप.?" मैंने ये कहा तो दीदी ने मेरी तरफ देखा फिर बोली.

"कुछ सवालों के जवाब नहीं होते विक्की. तू मुझे किसी बात के लिए मजबूर मत कर बस." दीदी ने ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"मैं आपको मजबूर करने के बारे में सोच भी नहीं सकता दीदी. मैं तो बस ये चाहता हु की मेरी दीदी मुझसे पहले की तरह बोले और मेरे सामने रहे. मुझे आज तक समझ नहीं आया की मैंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया था जिसकी वजह से आपने मुझसे इतनी बड़ी दूरी बना ली और मुझसे बात तक करना बंद कर दिया था.?" मैंने मायूसी से ये सब कहा तो दीदी ने कहा.

"तूने कोई गुनाह नहीं मेरे भाई और मैं ये भी जानती हु की तू मेरे साथ कोई गुनाह करने का सोच भी नहीं सकता. मगर कभी कभी ऐसा भी होता है विक्की की गुनाह न करने से भी गुनाह हो जाता है. मैंने तुझसे दूरी बना ली इसकी वजह वही गुनाह है जो हुआ hi नहीं है. खेर छोड़ ये सब और ये बता की हम इस गांव से कब चलेंगे शहर.?" दीदी ने बात को बदलते हुए ये पूछा तो मैंने कुछ देर तक उन्हें देखा फिर कहा.

"बस एक दो दिन में निकल लेंगे यहाँ से." मैंने बताया तो दीदी ने कहा.

"क्या शहर में हम सब के रहले के लिए तूने कोई इंतजाम किया है.?" दीदी ने ये पूछ तो मैंने उन्हें बताया की मैंने एक घर खरीद लिया है. हम सब आराम से उसी घर में रहेंगे. मेरी ये बात सुन कर दीदी के चेहरे पर थोड़ा राहत दिखी. उसके बाद कुछ देर और हम दोनों के बीच ऐसी hi बाते हुयी फिर मैं अपने कमरे में चला आया.

कुसुम दीदी ने आज फिर उस बात को दबा दिया था. मैं जनता तो सब कुछ था की ऐसा क्यों कर रही थी वो मगर मैं उनके मुख से साफ़ साफ़ sun'na चाहता था. खेर देखते हैं ऐसा वो कब तक करेगी. कभी तो ऐसा वक्त आएगा जब उनका साबरा टूट जायेगा और उन्हें खुद मुझसे चीख चीख के सब कुछ कहना पड़ेगा.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

भय जब मैं इस स्टोरी का फ्लैशबैक पोस्ट कर रहा था तो कुछ रीडर्स को शिकायत थी की मैं बहुत स्लो स्टोरी को बढ़ा रहा हु और बोर कर रहा हु. मैंने किसी तरह फ्लैशबैक को एन्ड किया और अब प्रेजेंट में स्टोरी को चला रहा हु....

आप बोल रहे हो यारा की स्टोरी को फ़ास्ट फॉरवर्ड कर दिया मैंने. भय मैं ये सीखा हु की उसी को डिटेल में लिखो जिसकी ज़रूरत हो बाकी फॉरवर्ड करते रहो....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 116....

रीड & एन्जॉय....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

कामदेव भय आपका रिव्यु आपका सुग्गेस्टिव बहुत अच्छा है. मैंने आपसे पहले भी कहा था की आप कुछ न कुछ कहते रहा करो. मुझे आपकी बातो से कुछ न कुछ ख़ास मिल hi जाता है....

भय अपने बहुत अच्छे से मुझे हर बात के बारे में बताया मैं ज़रूर ध्यान दुगा इस पर....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 116....

रीड & एन्जॉय....
 
भय आपने सही कहा मगर मैं आप सबके सुग्गेस्टियन्स भी चाहता था. इससे मुझे भी पता चलता की आप सब क्या सोचते हैं इस बारे में. इसी लिए मैंने आप सबसे सुग्गेस्टियन्स के लिए बोलै था. आप सबने बहुत अच्छे सुग्गेस्टियन्स दिए. मुझे बहुत कुछ आप सबकी बातो से जानने को भी मिला यारा....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 116....

रीड & एन्जॉय....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

भय आपकी ये सलाह फ़ोकट की नहीं है. मेरे लिए बड़े काम की है. यारा स्टोरी इन्सेस्ट में hi है मागत थोड़ा बहुत थ्रिल भी था. इन्सेस्ट की स्टार्टिंग फ्लैशबैक में hi स्टार्ट हो गयी थी और अब प्रेजेंट में क्लियर दिखेगा. खेर देखते हैं आगे क्या होता है....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 116....

रीड & एन्जॉय....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

सिराज भय आप जिस सस्पेंस की बात कर रहे हैं वो तो पिछले अपडेट में हीरो के बाप ने हीरो से बता भी दिया था. फिर क्या क्लियर नहीं हुआ अभी....

यारा आपका कमेंट मेरी स्टोरी में आना स्टार्ट हो गया इसके लिए थैंक्स भय....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 116....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 29


"बस एक दो दिन में निकल लेंगे यहाँ से." मैंने बताया तो दीदी ने कहा.

"क्या शहर में हम सब के रहले के लिए तूने कोई इंतजाम किया है.?" दीदी ने ये पूछ तो मैंने उन्हें बताया की मैंने एक घर खरीद लिया है. हम सब आराम से उसी घर में रहेंगे. मेरी ये बात सुन कर दीदी के चेहरे पर थोड़ा राहत दिखी. उसके बाद कुछ देर और हम दोनों के बीच ऐसी hi बाते हुयी फिर मैं अपने कमरे में चला आया.

कुसुम दीदी ने आज फिर उस बात को दबा दिया था. मैं जनता तो सब कुछ था की ऐसा क्यों कर रही थी वो मगर मैं उनके मुख से साफ़ साफ़ sun'na चाहता था. खेर देखते हैं ऐसा वो कब तक करेगी. कभी तो ऐसा वक्त आएगा जब उनका साबरा टूट जायेगा और उन्हें खुद मुझसे चीख चीख के सब कुछ कहना पड़ेगा.

अब आगे पढ़िए....


शाम को माँ फिर से मेरे कमरे में आयी तो मुझे याद आया की माँ गांव में किसी के यहाँ गयी थी मगर किसके यहाँ और किस लिए.? उधर माँ ने पहले दरवाजा बंद किया और फिर आ कर बीएड पर मेरे पास बैठ गयी. मैं भी उठ कर बैठ गया था.

"आज मैं सरपंच के घर गयी थी दोपहर के बाद." माँ ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैं हैरान रह गया. मेरे दिमाग में बहुत सरे सवाल पैदा हो गए. मैंने माँ की ये बात सुन कर उनसे कहा.

"ये आप क्या कह रही हैं माँ.? आप सरपंच के घर किस लिए गयी थी.?" मैंने ये पूछा तो माँ ने कहा.

"कल जब तूने मुझसे रचना के बारे में वो सब बताया तो उसके बाद मैं अपने कमरे में देर रात तक उसके बारे में सोचती रही. वैसे तो उसके घर परिवार में वो और उसकी माँ बहुत hi नेक दिल हैं मगर बाकी सब डस्ट hi हैं. अपने कमरे में लेती मैं हर चीज़ और हर बात के बारे में सोच रही थी. मैं सोच रही थी तेरे और रचना के बीच के रिश्ते के बारे में सरपंच को कैसे न पता चला होगा.? इस गांव में उसके परिवार की तरफ अगर कोई तिरछी नज़र से देखता है तो उसे उसी वक्त कही न कही से पता चल hi जायेगा. फिर ये बात उसको कैसे न पता चली होगी.? मेरा मन तो नहीं मान रहा था इस बात को मगर ये भी सोच रही थी की अगर पता चल गया होता तो क्या वो इसके लिए हमें छोड़ देता.? तेरे जाने के बाद उसने आज तक कभी हम में से किसी को उस बारे में कुछ नहीं कहा था. हाँ वो तेरे पिता जी को धमकिया ज़रूर देता था मगर वो भी हमारी उस ज़मीन के लिए जो दूसरे गांव में है. पहले तो हमें उस ज़मीन के बारे में पता hi नहीं था. फिर किसी ने एक दिन तेरे पिता जी को उसके बारे में बताया. तेरे पिता जी को यकीन नहीं हो रहा था तो वो उस गांव गए और वह के बूढ़े बुजुर्गो से पूछताछ की तब उन लोगो ने बताया की बहुत पहले उस गांव में एक परिवार रहता था जो तेरे दादी जी के रिश्ते में आता था. दादा जी पहले वह जाते भी थे मगर उसके बारे में कभी तेरे पिता जी को बताया नहीं था. उसके बाद वो उस ज़मीन के कागजातों का पता लगाने में जुट गए. बड़ी मुश्किल से उन्हें उस ज़मीन के नंबर का पता चला और फिर वो शहर गए पटवारी के पास. काफी दिन भाग दौड़ करने के बाद उन्हें वह से उस ज़मीन के कागजात मिले थे." माँ ने इतना कहने के बाद एक लम्बी सांस ली फिर बोली.

"उसी समय कही से सरपंच को भी ये पता चला की वो जिस ज़मीन पर कब्ज़ा करके फसल ऊगा रहा है उस ज़मीन के लिए तेरे पिता जी पूछताछ करते फिर रहे हैं. सरपंच को जब ये पता चला तो वो एक दिन हमारे घर आ धमका और तेरे पिता जी से उस ज़मीन के बारे में पूछने लगा और ये भी पूछा की वो उस जानें के बारे में हर जगह क्यों पूछते फिर रहे हैं.? तब तेरे पिता जी ने उसे साफ़ साफ़ बता दिया की वो ज़मीन उनकी है जिसमे वो कब्ज़ा करके फसल ऊगा रहा है. तेरे पिता जी की ये बात सुन कर सरपंच भड़क गया और तेरे पिता जी को साफ़ बोलै की उस ज़मीन की तरफ देखना भी नहीं वर्ण अच्छा नहीं होगा. बस उसके बाद यही सब चलता रहा. तेरे पिता जी उस गांव तो नहीं गए मगर उस ज़मीन के कागजात ज़रूर निकलवा लिए. शहर में जो पटवारी था वो बहुत अच्छा आदमी था उसने तेरे पिता जी की बहुत मदद की थी और ये सलाह भी दी की वो सरपंच को अभी ज़मीन के कागजातों के बारे में कुछ न बताये." माँ ने ये सब बताया तो मैं बस इस सब के बारे में सोचता रहा और बोलै कुछ नहीं.

"तेरे जाने के बाद हम सब बहुत दुखी हो गए थे. मैं तो रोज़ तेरे पिता जी से लड़ती थी तेरे लिए. तेरे पिता जी मुझे कुछ नहीं बताते थे की क्यों उन्होंने तुझे सिर्फ उतनी सी बात पर घर से निकाल दिया था. मैं उनसे इतना नाराज़ हुयी की फिर उनसे बात करना hi बंद कर दिया. तेरी बहनो का भी यही हाल था. दिन भर तो वो खेतो में रहते और जब घर आते तो घर को घर न पाते. उनसे ठीक से कोई बात नहीं करता था. दोनों वक्त का खाना उन्हें दे दिया जाता था बस. शायद यही वजह थी की वो इस सबसे इतना दुखी हुए की एक दिन उन्हें दिल का दौरा पद गया और वो दरवाजे पर hi गिर पड़े थे. उस दिन हमने किसी तरह उन्हें सम्हाला और डॉक्टर को बुला कर उन्हें दिखाया. उस दिन कुछ दवाइयों को खाने की वजह से वो ठीक तो हो गए मगर उस दिन से उनकी तबियत ख़राब रहने लगी थी. एक दिन मैं उन्हें ले कर शहर गयी और वह हॉस्पिटल में उनकी जांच वगैरा करवाई तो डॉक्टर ने बताया की उन्हें दिल की बीमारी हो गयी है. वो कोई तेज़ झटका सह नहीं पाएंगे. मैं ये जान कर बहुत दर गयी थी और रोई भी थी. मुझे अपने आप पर गुस्सा भी आया की हम सब उनसे बात नहीं करते थे इस वजह से वो दुखी हो गए थे. हम ये समझे hi नहीं थे की वो तो पहले से hi अंदर से बहुत दुखी थे तेरे लिए. घर आ कर मैंने तेरी तीनो बहनो को भी सब बताया और ये कहा की उनसे सब पहले की तरह बाते करे. उसके बाद हम सब उनसे बात करने लगे. मैंने उनसे दुबारा ये नहीं पूछा की क्यों उन्होंने तुम्हे घर से इस तरह निकाल दिया था." माँ कुछ देर के लिए रुकी फिर कहना शुरू किया उन्होंने.

"सब कुछ ठीक हो गया था. तेरे पिता जी ठीक हो गए थे और फिर से खेतो पर जाने लगे थे. एक रात जब मैं कमरे में गयी तो उन्होंने खुद hi मुझे बताया की क्यों उन्होंने तुम्हे घर से निकाल दिया था. उन्होंने बताया की कैसे उन्होंने सरपंच के खेत वाले घर में सरपंच के साथ साथ और भी कुछ लोगो की बाते सुन ली थी. ये उन लोगो ने hi साजिश करके तुझे गांव का सचिव बनवाया था. जिससे तू सरपंच के ज़्यादातर करीब hi रहे और वो जब चाहे तुझे अपने तरीके से इस्तेमाल कर सके. तेरे पिता जी ने बताया की सरपंच तुझे अपने लड़के रुपेश के जैसा बना देना चाहता था. वो चाहता था की जैसे उसका बीटा दिन भर आवारागर्दी करता है और दुसरो की बहन बेटियों को खराब करता है वैसे hi तू भी करने लगे. तेरे पिता जी ने जब उनकी ये सब बाते सुनी तो उनके पैरो के नीचे से ज़मीन hi खिसक गयी थी. उन्हें समझ नहीं आ रहा था की वो अब क्या करे.? वो ये जानते थे की सरपंच कुछ भी करवा सकता था. उन्होंने सोचा की अगर वो तुझे कही भेज देंगे तो सरपंच ज़बरदस्ती उनसे पता लगा लेगा और तुझे धुंधवा लेगा. तेरे पिता जी को उस वक्त कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो ऐसा क्या करे जिससे सरपंच का बुरा साया तुझ पर न पड़ने पाए. तब उन्होंने वैसा कठोर फैसला लिया था की वो तुझे घर से निकाल देंगे. तुझे जहा जाना होगा तू खुद hi चला जायेगा. अगर सरपंच ने उनसे तेरे बारे में ज़बरदस्ती जानने की कोशिश की तो वो तेरे बारे में उसे कुछ बता hi नहीं पाएंगे. क्यों की जब उन्हें कुछ पता hi नहीं रहेगा की तू कहा गया है तो वो सरपंच को क्या बतायेगे. तेरे पिता जी ने ऐसा इस लिए भी किया था की उन्हें लगता था की सरपंच कही इस सबके लिए जान लेने पर न उतारू हो जाये. इस लिए वो अपनी तो जान दे सकते थे मगर तुझ तक उसके साये को भी नहीं पहुंचने देना चाहते थे." माँ ने ये सब बताया और सांस ली फिर उन्होंने कहा.

"ये तो भगवन की कृपा थी बीटा की वैसा कुछ सरपंच ने किया hi नहीं. मगर तेरे पिता जी ने बहुत दूर तक का सोच लिया था क्यों की उन्हें सरपंच पर बिलकुल भी भरोसा नहीं था. तुझे घर से निकाल कर वो एक पल के लिए भी खुश नहीं रहे. अंदर hi अंदर वो अपने किये हुए उस कार्य पर बहुत दुखी थे और अपने आपको सजा देते रहते थे. जिस दिन उन्होंने मुझसे ये सब बताया था उस दिन मुझे पता चला की उन्होंने कितना बड़ा पत्थर रख लिया था उस वक्त अपने दिल पर वर्ण वो तुझे घर से कैसे निकाल पते.? मैंने उन्हें बहुत समझाया और सम्हाला भी. उसके बाद ऐसे hi दिन रात गुज़रते चले गए. हम सब जी तो रहे थे मगर कोई खुश नहीं था अंदर से. मेरे लाख समझने पर भी तेरे पिता जी अपने उस कार्य के लिए खुद को माफ़ नहीं कर पते थे. वो हर रोज़ कहते की रेणुका मैंने अपने जिगर के टुकड़े के साथ बहुत गलत किया है. भगवन इसके लिए मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा. ऐसा पत्थर दिल बाप भगवन किसी बेटे को न दे. वो ये सब कहते और बहुत दुखी होते. न ठीक से कहते थे न ठीक से सो पते थे. उनके दिल और दिमाग में जैसे ये बात बैठ गयी थी की उन्होंने अपने बेटे के साथ बहुत गलत किया है. भगवन से बस एक hi विनती करते थे की मेरा बीटा जहा भी हो उसे खुश रखना bhagwan...use कोई दुःख न dena...aur अगर हो सके तो मेरे मरने से पहले मुझे एक बार अपने बेटे से ज़रूर मिलाना." माँ ने ये सब कहा तो मैं बुरी तरह फफक कर रो पड़ा.

मैं ये तो जनता था की मेरे पिता जी मुझे बहुत प्यार करते थे मगर आज ये भी जान गया था की वो हद से भी ज़्यादा मुझसे प्यार करते थे. मेरी वजह से उन्होंने अपनी ज़िन्दगी को ऐसा बना लिया था की फिर वो बच नहीं सके थे. भगवन ने भी उनकी मुराद को जैसे सुन hi लिया था और जब उनका लास्ट टाइम आया तो उसने मुझे उनकी आँखों के सामने ला दिया था.

मैं माँ से लिपट कर सिसक रहा था. माँ खुद भी रो रही थी और मेरे सर पर प्यार से हाथ फेर रही थी. कमरे में काफी देर तक ऐसा hi माहौल रहा फिर जब हम दोनों नार्मल हुए तो मैंने कहा.

"पिता जी मुझसे इतना प्यार करते थे की उन्होंने मेरे दुःख में अपने जीवन को भी ख़तम कर लिया और एक मैं था माँ की हमेशा इस बात को सोच कर जलता रहा की मेरे पिता ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया था.?" मैंने दुखी हो के ये कहा तो माँ ने कहा.

"तेरी जगह कोई भी होता तो वो भी यही सब सोचता और दुखी होता बीटा. ये तो भगवन की कृपा थी जो तू वापस आ गया यहाँ." माँ ने ये कहा तो मैंने माँ को बताया की कैसे मैं यहाँ आया था. मैंने उन्हें बताया की कैसे एक दिन मुझे फेसबुक पर दीदी के नाम से फ्रेंड रिक्वेस्ट आयी थी और फिर कैसे मैंने दीदी के नाम वाली उस लड़की से बात की. जब मुझे पता चल गया की वो मेरी दीदी hi थी तो मैंने उनसे फ़ोन नंबर लिया और फिर उनसे बात की थी. साडी बात जान कर माँ हैरान रह गयी. फिर माँ ने कहा की उन्हें इस बारे में कुसुम दीदी ने कुछ भी नबी बताया था.

"आपने ये तो बताया hi नहीं माँ की आप सरपंच के घर किस काम से गयी थी.?" कुछ देर बाद मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"ारी हाँ मैं तो भूल hi गयी थी इन सब बातो में." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ तो अब बताइये." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"कल रात अपने कमरे में लेती हुयी मैं यही सब सोच रही थी की सरपंच को तेरे और रचना के बारे में कैसे पता न चला होगा. जबकि उसे हमारे बारे में सब कुछ पता चलता रहता था. मुझे लग रहा था की इसके पीछे कुछ तो वजह होगी. सरपंच को पता तो ज़रूर चला होगा मगर हैरानी की बात यही थी की उसने हमारे साथ कुछ गलत क्यों नहीं किया कभी.? फिर मुझे लगा की कही ऐसा तो नहीं की रचना ने अपने बाप को किसी तरह रोक लिया रहा हो. मगर सरपंच रुकने वाला नहीं tha...fir आखिर कैसे वो रुक गया था. यही मैं jan'na चाहती थी. मैंने सोचा की कल दोपहर को सरपंच के घर जाओगी और उसकी बीवी से इस बारे में कुछ पता लगाने की कोशिश करुँगी और अगर मौका लगा तो रचना से भी इस बारे में बात करुँगी." माँ ने ये कहा तो मैं हैरान रह गया.

"रचना से आप किस बारे में बात करती माँ.?" मैंने हैरानी से ये पूछा तो माँ ने कहा.

"यही की वो तेरे चक्कर में अपना जीवन क्यों बर्बाद कर रही है..?" माँ ने ये कहा तो मैं कुछ न बोल सका.

"खेर आज जब मैं सरपंच के घर गयी तो संजोग से सरपंच और उसका बीटा घर पर नहीं थे. मुझे आया देख सरपंच की बीवी ने मेरा अच्छे से स्वागत किया और फिर थोड़ी देर तक वो तेरे और तेरे पिता जी के बारे में मुझसे बाते करती रही. उसके बाद मैंने उससे रचना के बारे में बात की. मैं उससे सीधे सीधे वो सब पूछ नहीं सकती थी इस लिए मैंने रचना का सहारा लिया. मुझे लग रहा था की जब मैं रचना के बारे में उससे बाते करने लागगी तो वो बातो बातो में कुछ तो ऐसा बोलेगी hi जिससे मुझे खुल कर उससे बाते करने का मौका मिलेगा." माँ ने थोड़ी देर रुकने के बाद फिर कहा.

"जब मैंने रचना की माँ से रचना के बारे में पूछा तो उसने दुखी हो के साफ़ साफ़ मुझसे कह दिया की उसकी बेटी तेरे लिए अपना जीवन डाव पर लगाए हुए है. मैं उसकी ये बात सुन कर हैरान रह गयी थी. फिर जब मैंने उससे पूछा की ऐसा कैसे तब उसने मुझे सब कुछ बताया." माँ ने ये कहा तो मैं बीच में hi उनकी बात काट कर पूछ बैठा की क्या बताया उसने.? मेरे पूछने पर माँ ने कहा.

"उसने बताया की सरपंच को शुरू में hi पता चल गया था की उसकी बेटी तेरे साथ शहर में मिलती है. मगर उसने तब इस बात पर अपनी तरफ से कुछ नहीं किया. बल्कि वो खुश हो गया था की उसकी बेटी ने तुझे अपने जाल में फास लिया है. वो इंतज़ार कर रहा था की कब ऐसा वक्त आये जब वो तुझे ऐसे वक्त पर पकडे जब तू या हम सब कुछ करने के लायक hi न हो. मगर सरपंच का मंसूबा कामयाब न हुआ क्यों की तभी तू यहाँ से चला गया था. सरपंच को लगा की तू वापस आएगा इस लिए वो तेरे आने का इंतज़ार करने लगा मगर जब तू महीने भर में भी वापस नहीं आया तो उसने अपने आदमियों को तेरी तलाश में लगा दिया. मगर उसके आदमी तुझे कही नहीं ढूंढ पाए. फिर उसने तेरे बारे में हमसे पूछा तो हमने उसे यही बताया की तेरे और तेरे पिता जी के बीच किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ था और उस झगडे में पिता जी ने तुझे मारा भी था इस लिए तू गुस्से में घर छोड़ कर चला गया है. सरपंच ये जान कर कुछ न बोलै और चला गया था." माँ ने ये कहा और थोड़ी देर रुकने के बाद फिर कहा.

"रचना की माँ ने बताया की एक दिन सरपंच घर में रचना से इस बारे में पूछताछ कर रहा था. रचना अपने बाप से तेरे साथ अपने रिश्ते की बात सुन कर दर गयी थी. फिर जब सरपंच ने इसके लिए ये कहा की वो हमें इस गुनाह के लिए ज़िंदा नहीं छोड़ेगा तो रचना ने उसी वक्त माँ दुर्गा का रूप धार लिया था. उसने अपने बाप से साफ़ शब्दों में कह दिया था की अगर उसने तेरे घर वालो के साथ कुछ भी बुरा करने का सोचा तो अच्छा नहीं होगा. वो सरे गांव में चीख चीख कर बताएगी की उसने और उसके बाप ने किस किस के साथ क्या क्या बुरा किया है. सरपंच अपनी बेटी की बात सुन कर बहुत गुस्सा हुआ था और उसी वक्त उसे जान से मार देने पर उतारू हो गया था. मगर रचना की माँ और उसके भाई ने सरपंच को रोक लिया था. सरपंच इस बात से भी गुस्सा था की जिस बेटी को उसने सबसे ज़्यादा लाड प्यार दिया था उसी ने उस दिन उसे ऐसी धमकी दे दी थी. पता नहीं रचना को क्या हो गया था उस दिन की उसने अपने बाप को हकीकत और इंसानियत का आईना दिखा दिया था." माँ ने ये सब बताया तो मैं बुरी तरह हैरान रह गया था. मुझे भरोसा नहीं हो रहा था की रचना हमारे लिए अपने बाप से भीड़ गयी थी.

"अपनी बेटी से सरपंच बहुत गुस्सा था. बेटी की वजह से उसके अरमानो पर पानी फिर गया था. सबसे बड़ी बात उससे ये सहन नहीं हो रही थी की उसकी बेटी के सम्बन्ध तुझसे थे. जबकि किसी भी लड़के की इतनी हिम्मत नहीं हो सकती थी की वो उसकी बेटी के बारे में सोच भी सके. रचना भी जानती थी की उसका बाप चुप नहीं बैठेगा इस लिए वो एक दिन शहर गयी और सीधा ऊपर hi अपने बाप के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा आयी और ये भी बता आयी की अगर हम में से किसी को भी और खुद उसे कभी कुछ हो जाये तो उसका जिम्मेदार मणिपुर गांव का सरपंच मणि शंकर तिवारी और उसका पूरा परिवार होगा. रचना ने सब कुछ विस्तार से रिपोर्ट में लिखवा दिया था और उसकी एक कॉपी वो अपने साथ ले कर घर आ गयी थी. घर में उसने अपने बाप को वो रिपोर्ट की कॉपी दिखाई और फिर से धमकी दी की वो हमारे साथ कुछ भी गलत करने का सोचे भी नहीं. पहले तो सरपंच उस कॉपी को देख कर हैरान हुआ फिर ज़ोर ज़ोर से हसने लगा और उससे बोलै की उसके सामने इस रिपोर्ट का कोई असर नहीं होगा. क्यों की स्टेट की पुलिस में भी उसकी पहुंच है. अपने बाप की ये बात सुन कर रचना अंदर hi अंदर दर गयी थी मगर उसने हार नहीं मानी." माँ ये सब बताने के बाद कुछ देर के लिए रुकी फिर बोली.

"उस रिपोर्ट की कॉपी दिखने से रचना का घर से निकलना बंद करवा दिया था सरपंच ने. फिर एक दिन माँ की मदद से रचना घर से निकल गयी और फिर से शहर पहुंच गयी और इस बार वो नारी शक्ति के एक बड़े संगठन से मिली और वह पर भी रिपोर्ट लिखवाया उसने और उन्हें सब कुछ बता दिया. ये भी कहा की पुलिस में उसके बाप की पहुंच है. नारी संगठन ने रचना को भरोसा दिलाया की उनके होते हुए कोई कुछ नहीं कर सकेगा. शहर से आने के दूसरे दिन hi नारी संगठन की बहुत साड़ी महिलाये सरपंच के घर पर आ धमकी थी. सरपंच ये सब देख कर बुरी तरह हैरान परेशां हो गया था. नारी संगठन वाली औरतो ने सरपंच को बुरी तरह धमकाया था की अगर उसने रचना को या महेश पांडेय जी के परिवार के किसी भी ब्यक्ति के साथ कुछ गलत करने की कोशिश की तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा. उस दिन नारी संगठन की धमकी से सरपंच डाब गया था और फिर उसने अपनी बेटी से बात करना छोड़ दिया था और जल्दी से उसका ब्याह करवा के उसे घर से निकाल देना चाहता था. जब रचना को पता चला की उसका बाप उसकी शादी कर देना चाहता है तो उसने अपने बाप से साफ़ कह दिया की वो जीवन में कभी शादी नहीं करेगी. वो यही रह कर हमारे परिवार के लोगो की उससे रक्षा करेगी. बेटी की ये बात सुन कर सरपंच फिर गुस्सा हुआ तो रचना ने कहा की बाप की संपत्ति पर उसका भी हक़ है. वो चाहे तो इसी वक्त उससे अपना हक़ ले सकती है. उस दिन रचना ने ये भी अपने बाप से कह दिया की वो तुझसे बहुत प्यार करती है और तुझे hi अपना सब कुछ मानती है. उसे तू मिले या न मिले मगर वो किसी और से शादी नहीं करेगी जीवन में. रचना की इस बात को सुन कर सरपंच देखता रह गया था उसे." माँ ने ये सब बताया तो मैं ये सब सुन कर बुरी तरह हैरान था.

मैं रचना के करैक्टर के बारे में जान कर अचंभित था. मेरे जाने के बाद इतने सालो से वो मेरे परिवार की रक्षा कर रही थी. मैं यकीन नहीं कर प् रहा था की रचना अपने बाप के इस हद तक खिलाफ चली जाएगी और मेरे परिवार की रक्षा करेगी.

"उस दिन के बाद से सरपंच ने अपनी बेटी से हर नाता hi तोड़ लिया था. वो उसके घर में ज़रूर थी मगर उसके लिए वो न के बराबर थी. गांव में उसे अपनी बदनामी का दर था इस लिए वो ज़्यादा इस बात को बढ़ाना नहीं चाहता था. उसके बाद ऐसे hi चलता रहा. रचना उस नारी संगठन से जुड़ गयी थी तो सरपंच और भी कुछ नहीं कर सकता था." माँ ये सब बताने के बाद चुप हो गयी.

"यकीन नहीं होता माँ की रचना ने हमारे लिए इतना बड़ा त्याग किया है. अपने बाप के खिलाफ जा कर उसने आप लोगो पर कोई आंच नहीं आने दी." मैंने ये कहा तो माँ ने इस बार मुस्कुराते हुए मुझसे कहा.

"हमारे लिए तो किया hi मगर तू ये क्यों भूल रहा है की उसने तेरे लिए भी तो अपने जीवन का त्याग किया है." माँ ने ऐसा कहा तो मैं कुछ बोल न सका तो माँ ने hi कहा.

"रचना के बारे में ये सब जान कर कोई भी कह सकता है बीटा की वो तुझसे सच में बहुत प्यार करती है. आज जब मैं उसके घर पर थी तो उससे मुलाकात नहीं हुयी मेरी. उसकी माँ ने बताया की वो शहर गयी है. उसी नारी संगठन में. सच कहु तो सब कुछ जानने के बाद मुझे उससे मिलने की बहुत इच्छा हो रही थी मगर वो थी hi नहीं उस वक्त." माँ ने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए ये सब कहा तो मैं इस बार भी कुछ न बोलै.

"अच्छा ये bata...kya तेरे अंदर भी रचना जैसा त्याग है.? क्या तू भी उससे प्यार करता है.?" माँ ने मुझसे ये पूछा तो मैं एकदम से हड़बड़ा गया फिर बोलै.

"नहीं to...main उससे कोई प्यार व्यार नहीं करता माँ. उसने मुझसे दोस्ती की थी तो मैं भी उसे दोस्त hi समझता था बस. उसके बाद मैं यहाँ से चला hi गया था." मैंने ये कहा तो माँ ने मुस्कुराते हुए कहा.

"चल मैंने मान लिया की तू उससे प्रेम नहीं करता मगर उसके बारे में इतना कुछ जान लेने के बाद भी क्या तेरे अंदर ऐसी कोई बात नहीं आयी. जिससे तुझे लगे की जो तुझे इतना चाहती है उसे तू भी उतना hi चाहे.?" माँ ने ये कहा तो मैं बुरी तरह हैरान रह गया. मुझे माँ के मुख से ऐसी बातो की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी.

"ऐसे क्या देख रहा है मुझे.? अरे इतना सब कुछ तो मैं भी समझती हु. कोई छोटी बच्ची नहीं hu...teri माँ हु समझे.?" माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैंने तो कुछ बोलै hi नहीं माँ." मैंने घबरा के ये कहा तो माँ ने फिर से मुस्कुराते हुए कहा.

"कोई बात nahi...tu अच्छे से सोच ले. वैसे जहा तक मेरा सवाल है तो मुझे तो वो लड़की बहुत पसंद है. तुझे भी अगर पसंद आ जाये तो बता देना मुझे. हम अपने साथ उसे भी यहाँ से ले जायेगे और फिर वह मैं तेरा उससे बड़ी धूम धाम से ब्याह करुँगी." माँ ने ये कहा तो मैं और भी ज़्यादा हैरानी से उनकी तरफ देखने लगा.

मुझे इस तरह आँखे फाड़े अपनी तरफ देखते देख माँ हसने लगी और फिर मेरे सर पर उन्होंने हलके से एक चपत लगायी और कमरे से बाहर चली गयी. उनके जाने के बाद भी मुझे काफी देर तक होश नहीं आया था. मेरे अपने सर में ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई बहुत ज़ोर ज़ोर से कोई बहुत बड़ा हथौड़ा मार रहा हो.

अभी मैं अपनी इसी हालत में था की तभी मेरी दोनों जुड़वाँ बहने कमरे में आ गयी और मेरी हालत को देख कर ज़ोर ज़ोर से हसने लगी. उनके ज़ोर ज़ोर से हसने पर मुझे होश आया. उन दोनों को इस तरह हस्ते देख मैं सकपका गया तो वो और भी ज़्यादा ज़ोर से हसने लगी. मुझे समझ न आया की ये दोनों इतना है क्यों रही हैं.

"ारी अब बस भी करो तुम दोनों और ये बताओ की इतना गाला फाड़ फाड़ के क्यों हसे जा रही हो.?" मैंने नाराज़गी से ये पूछा तो प्रिय ने अपनी हसी को रोकते हुए कहा.

"मत पूछो bhai...warna तुम कही हमें मारने न लगो." प्रिय ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"क्या मतलब है तेरा.? जो भी बात है जल्दी से बताओ मुझे." मैंने ये कहा तो इस बार पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"भाई हमने कमरे के बाहर दरवाजे पर अपने अपने कान लगा रखे थे और माँ की बाते सुन रहे थे. जब माँ ने ये कहा की रचना से तुम्हारी शादी धूम धाम से कर देगी तो हमें ये सोच कर बहुत मज़ा आया की भाई के अब ऐसे दिन भी आ गए की उन्हें पुरे एक ट्रक से शादी करनी पड़ेगी." पूजा ने ये कहा तो प्रिय हसने लगी. जबकि मैंने कहा.

"ये क्या बोल रही हो तुम.? कौन सा ट्रक.?" मैंने ये कहा तो पूजा ज़ोर ज़ोर से हसने लगी जबकि प्रिय ने हस्ते हुए कहा.

"भाई वो रचना किसी ट्रक से काम है क्या.? तुमने देखा नहीं क्या उसे.?" प्रिय ने ये कहा तो तब मुझे समझ आया की वो रचना के बारे में सोच कर इतना है रही थी.

रचना का जिसम इतना भी मोटा नहीं हो गया था जितना ये समझ कर उसे ट्रक बोल कर है रही थी. एक वक्त था जब वो आसमान से उत्तरी हुयी पारी लगती थी. मैं खुद उसकी खूबसूरती में खो जाता था. आज अगर वो ऐसी बन गयी थी तो इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी बल्कि ये उसके त्याग का नतीजा था. इंसान जब खुद पर ध्यान नहीं देता तो वो थोड़ा बेढंगा सा हो जाता है. वैसे सच तो ये भी है की इंसान जब दुखी होता है और खुद पर ध्यान नहीं देता तो वो ज़्यादातर दुबला पतला हो जाता है मगर रचना इसके ऑपोसिट थी. वो मोती हो गयी थी. मुझे समझ न आया की वो मोती कैसे हो गयी थी.? इधर प्रिय पूजा अभी भी है रही थी. ये देख कर मुझे दोनों पर बहुत गुस्सा आया. किसी को भी किसी इंसान का मज़ाक उड़ने का कोई हक़ नहीं होता.

"तुम दोनों को ये तो समझ आया की वो ट्रक है मगर ये समझ नहीं आया की उसने इसके पीछे कितना बड़ा त्याग किया है. आज अगर तुम सब यहाँ सलामत हो तो सिर्फ उसकी वजह से." मैंने गुस्से में ये सब कहा तो दोनों एकदम से चुप हो गयी. दोनों को अपनी गलती का अहसास हुआ तो दोनों ने सर झुका लिया.

"मुझे बहुत दुःख हो रहा है की मेरी बहनो ने उस लड़की का मज़ाक उदय जिसने इस घर के लिए अपनी खुशियों का बलिदान कर दिया. मज़ाक की भी एक हद होती है मगर तुम दोनों को ये कौन समझाए.?" मैंने ये कहा तो दोनों जल्दी से अपने घुटनो पर बैठ गयी और मेरी तरफ देखते हुए बोली.

"भाई हमें माफ़ कर दो. हमसे सच में बहुत बड़ी भूल हो गयी है." दोनों ने नाम आँखों से ये कहा तो मैंने कहा.

"किसी के बारे में कुछ भी बोलने से पहले अच्छी तरह उसके अच्छे बुरे का सोचना भी चाहिए. आज जिसे तुम ट्रक बोल रही हो एक वक्त ऐसा भी था जब वही ट्रक चाँद को भी मात देता था और ये तुम दोनों भी अच्छी तरह जानती हो." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"गलती हो गयी bhai...hame रचना दीदी के बारे में ऐसा नहीं बोलना चाहिए था. हम कितने बुरे हैं न भाई.?" पूजा ने एकदम से आँशु बहते हुए ये कहा तो मैंने झुक कर उसे उठाया और अपने सीने से लगा लिया. प्रिय भी उठ कर मुझसे छुपक गयी. कुछ देर बाद जब सब नार्मल हुआ तो मैंने दोनों को अलग किया और बीएड पर आ कर बैठ गए. मैंने दोनों से चाय के लिए कहा तो पूजा ने ख़ुशी दिखते हुए कहा की वो अभी चाय बना के लाती है.

"भाई तुमने हमें माफ़ कर दिया न.?" पूजा के जाने के बाद प्रिय ने मुझसे ये पूछा तो मैंने मुस्कुरा कर हाँ में अपनी पालक झपका दी.

"माफ़ तो कर दिया है मैंने मगर मैं तुम दोनों से यही कहना चाहता हु की कभी भी किसी का मज़ाक मत उड़ाना. ये बहुत hi गलत बात होती है." मैंने ये कहा तो प्रिय ने हाँ में सर हिलाया और मेरे बाजू से सात कर अपना सर मेरे कंधे पर रख लिया.

थोड़ी देर में पूजा ट्रे में चाय ले कर आयी तो हम तीनो ने एक एक कप चाय ली और पिने लगे. चाय पिने के बाद पूजा ने सरे कप को ट्रे में वापस रखा और ट्रे को नीचे रखने चली गयी.

"भाई अभी माँ तुमसे रचना दीदी के बारे में क्या कह रही थी.?" प्रिय ने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा फिर कहा.

"वो तो बहुत कुछ कह कर गयी हैं मगर तुम किस बारे में बोल रही हो.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने मुस्कुराते हुए कहा.

"भाई जैसे की माँ को रचना दीदी बहुत पसंद आ गयी हैं और वो उनसे तुम्हारी शादी भी करवाने का कह रही थी तो तुम इस बारे में क्या कहोगे.? मेरा मतलब है की क्या तुम भी रचना को चाहते हो.?" प्रिय ने ये सब कहते हुए पूछा तो मैंने कहा.

"आज से पांच साल पहले वो सिर्फ मेरी दोस्त थी. उसके साथ दोस्ती भी ज़्यादा दिनों तक नहीं चली. क्यों की मैं यहाँ से चला गया था. वक्त के साथ सब बदल जाता है प्रिय. अगर मैं यही रहता तो शायद ऐसा हो सकता था की मेरे दिल में भी उसके लिए चाहत पैदा हो जाती मगर मैं तो यहाँ था hi नहीं. इस लिए मेरे दिल में उसके लिए कैसे चाहत हो जाएगी.?" मैंने ये सब कहा तो प्रिय ने कहा.

"और कुसुम दीदी के लिए.? क्या उनके लिए भी तुम्हारे दिल में चाहत नहीं है.?" प्रिय ने ये पूछा तो मैंने उसकी तरफ देखा फिर कहा.

"वैसे तो इस बारे में सोचना भी गलत है प्रिय. पर अगर ऐसा सोच भी लू तो उससे क्या फर्क पड़ता है.? दीदी तो इस बारे में कोई बात भी नहीं करना चाहती हैं. इसका मतलब तो यही हुआ न की उन्हें भी यही लगता है की ये सब गलत है." मैंने ये कहा तो प्रिय कुछ न बोली. तभी पूजा भी आ गयी और मेरे बगल से बैठ गयी.

"भाई क्या आज भी हम वो वाले कपडे पहन सकते हैं.?" पूजा ने मुझसे चिपकते हुए बड़े प्यार से पूछा तो मैंने कहा.

"ठीक है पहन लेना. इसमें पूछने की कौन सी बात है.?" मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"भाई आज na....main वो कपडे पहन कर hi सो जाओगी." पूजा ने उछालते हुए ये कहा तो मैं है पड़ा और बोलै.

"नहीं सो पाओगी तुम क्यों की वो बहुत ज़्यादा कैसे हुए होते हैं और तुम दोनों को अभी आदत नहीं है कैसे हुए कपडे पहन के सोने की." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"भाई ठीक कह रहा है पूजा. सच में हम नहीं सो पाएंगे. देखा नहीं था कल कितने टाइट लग रहे थे वो कपडे.?" प्रिय ने ये कहा तो पूजा मान गयी. ऐसे hi हम तीनो के बीच थोड़ी देर और बात हुयी. उसके बाद वो दोनों नीचे चली गयी.

रात में खाना पीना करके हम सब सो गए. दूसरे दिन भी वैसे hi दिन गुज़र रहा था. दोपहर को माँ फिर घर से कही बाहर चली गयी थी और फिर शाम के पहले hi आयी. मैं समझ गया की वो रचना के घर गयी रही होंगी. मुझे समझ न आया की माँ को रचना के घर जाने की क्या ज़रूरत थी अब.?

मुझे कमरे में पड़े पड़े अच्छा नहीं लग रहा था इस लिए मैं उठा और पैदल hi गांव की तरफ निकल गया. मेरा गांव कहने को तो काफी बड़ा था और सभी कास्ट के लोग क्रम से बेस हुए थे मगर कही कही घर थोड़ा दूर दूर भी बने हुए थे. गांव में ज़्यादातर मकान कच्चे hi थे. कुछ पक्के भी थे मगर उन्ही के जो थोड़ा बहुत संपन्न थे.

गांव की सड़क पर मैं एक तरफ चला hi जा रहा था की एक माकन के बाहर बने छोटे से कच्चे चबूतरे पर एक छोटा सा बच्चा बैठा सुबक रहा था. मैं उस बच्चे को तो नहीं पहचानता था मगर उस घर के मुखिया को जनता था. वो घर रघुवीर काका का था. रघुवीर गौतम के घर के बाहर चबूतरे में बैठा वो बच्चा धीरे धीरे सुबक रहा था.

जब मैं उस घर के सामने सड़क पर आ गया तो मैंने उस बच्चे के करीब जा कर उससे पूछा की वो क्यों रो रहा है तो उसने कहा की उसकी माँ ने उसे गुड़ नहीं दिया और ज़बरदस्ती बाहर भेज दिया है. मैंने उससे पूछा की बाहर क्यों भेज दिया है तो उसने बताया की उसे नहीं पता. फिर मैंने उससे पूछा की उसके पिता जी कहा हैं तो उसने बताया की वो खेत में हैं और माँ अंदर है. बच्चे ने आगे बताया की थोड़ी देर पहले सरपंच दादा आये तो माँ ने उसे बाहर भेज दिया.

मैं बच्चे के मुँह से सरपंच का नाम सुन कर और उसकी ये बात सुन कर हैरान हुआ. मेरे मन में सवाल उभरा की सरपंच के आते hi इस बच्चे की माँ ने अपने बेटे को बाहर क्यों भेज दिया है. मैं तेज़ी से सोचने लगा की माजरा क्या है. फिर मुझे जल्दी hi समझ आ गया. मतलब बच्चे का बाप खेत में है और बच्चे की माँ सरपंच के साथ अंदर है. इसका मतलब कुछ तो गड़बड़ है. ये सोच कर मैं मन hi मन मुस्कुराया और फिर तभी मेरे दिमाग में एक ज़बरदस्त बात आयी.

मैंने बच्चे को कुछ पैसे दिए और उससे कहा की उसे जो खाना हो वो जा के दूकान से खा ले. बच्चा पैसा प् कर खुश हो गया और भागते हुए दूकान की तरफ चला गया. उसके जाने के बाद मैं आगे बढ़ा और घर के दरवाजे को हलके से अंदर की तरफ धकेला तो पता चला की वो अंदर से बंद है. मैं अब किसी भी कीमत पर घर के अंदर जाना चाहता था मगर प्रॉब्लम ये थी की आस पास और भी घर थे और मुझे इस तरह घर के अंदर जाते हुए कोई भी देख सकता था.

मैंने इधर उधर देखा और फिर घूम कर घर के राइट साइड आया. इस तरफ घर के बगल से एक बॉउंड्री थी कच्ची दिवार की जो की चार या पांच फुट ुचि थी. दिवार के नीचे इस तरफ से एक पतली गली अंदर की तरफ चली गयी थी. मैंने आस पास देखा तो मुझे कुछ दूरी पर एक मोटा सा लकड़ी का थम्हा पड़ा दिखा तो मैंने जल्दी से उसे उठाया और उस दीवारी पर ऐसे लगाया की उसका ऊपर वाला भाग दिवार पर टिका और नीचे वाला भाग उस पलटी गली की ज़मीन पर. अब मैं उस लकड़ी के थाम्हे के सहारे उस बॉउंड्री पर चढ़ सकता था मगर प्रॉब्लम यही थी की इस पतली गली में कोई भी आ सकता था.

मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. मैंने इधर उधर देखा और फिर जल्दी से उस लकड़ी के थाम्हे पर चढ़ना शुरू कर दिया. जब मुझे लगा की अब मैं बॉउंड्री के उस पार झांक सकता हु तो मैंने बड़ी सतर्कता से उस पार देखा. उस तरफ आँगन था और आँगन में कोई नहीं दिखा मुझे. ये देख कर मैं जल्दी से बॉउंड्री पर चढ़ गया. कुछ hi पालो में मैं बॉउंड्री पर चढ़ गया और अब बॉउंड्री के ऊपर खपरैल में बैठा था. मेरे सामने उस घर का आँगन था. मेरी नज़र मेरे लेफ्ट साइड पर राखी लकड़ी की सीढ़ी पर पड़ी. वो सीढ़ी इसी दिवार पर आँगन की तरफ से टिकाई हुयी राखी थी. मुझे इस बात का भी दर था की पीछे पतली गली से कोई आ न जाये और मुझे बॉउंड्री में बैठा देख ले वर्ण बहुत बड़ा बखेड़ा हो जायेगा.

मैं किसी तरह उस सीढ़ी को खिसकते हुए अपने सामने ले आया. उसके बाद मैं बड़े आराम से घर के आँगन में उतर आया. आँगन में कोई नहीं था बल्कि एकदम सन्नाटा छाया हुआ था. मैंने इधर उधर देखा और फिर एक तरफ को दबे पाँव बढ़ चला. कुछ hi देर में मैं अंदर के कमरों के पास पंहुचा तो मुझे कुछ अजीब सी आवाज़ सुनाई दी. ये आवाज़ लेफ्ट साइड वाले कमरे से सुनाई दी थी.

मेरा दिल बड़े ज़ोरो से धड़कने लगा था. उस कमरे का दरवाजा पूरा खुला हुआ था. वही से आवाज़ आ रही थी. जैसे जैसे मैं कमरे के करीब पंहुचा तो आवाज़ क्लियर सुनाई देने लगी. उन आवाज़ों को सुनते hi मैं सब कुछ समझ गया की अंदर कमरे से ये किस चीज़ की आवाज़े आ रही हैं.

कमरे के दरवाजे के पहले hi दिवार में एक छोटी सी खिड़की भी थी. मैं खिड़की के पास पहुंच गया और खिड़की से जब अंदर की तरफ देखा तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी. अंदर सरपंच काका और उस बच्चे की माँ पूरी तरह नंगे चारपाई पर कबड्डी खेल रहे थे. कमरे का दरवाजा इस लिए खुला था क्यों की उनकी समझ में घर के बाहर का दरवाजा अंदर से बंद hi था और बाहर से कोई अंदर आ hi नहीं सकता था. मगर उन्हें क्या पता की विकास थे ग्रेट बिना दरवाजे के hi यहाँ पहुंच चुके हैं.

सरपंच उस औरत के ऊपर था और उसकी दोनों टाँगे सरपंच ने अपने कंधो में राखी हुयी थी और अपने दोनों हाथो को चारपाई के पाटो पर जमाये हुमच हुमच के धक्के लगा रहा था. उसके हर धक्के पर वो औरत ज़ोर से आअह्ह्ह ऊऊह्ह्ह कर रही थी और सरपंच को और ज़ोर से छोड़ने को उकसा रही थी.

कमरे में लाइट की फुल रौशनी थी. मुझे सब कुछ क्लियर दिख रहा था. मैं ये सब देख कर मन hi मन मुस्कुराया और फिर जो सोच कर मैं यहाँ आया था वही करने लगा. मैंने अपने पेंट की पॉकेट से अपना मोबाइल निकला और फिर अंदर चल रहे उस ज़बर्दस्त ब्लू फिल्म की वीडियो रिकॉर्डिंग करने लगा. सरपंच को ख्वाब में भी नहीं पता था की उसके इस करतूत की कोई वीडियो बना रहा है.

कमरे के अंदर सरपंच उस औरत के मज़े ले रहा था. मुझे याद आया की वो औरत गांव के रिश्ते से सरपंच की बहु लगती थी. मैं ये तो जनता था की सरपंच पक्का औरतबाज़ है मगर मुझे ये भरोसा नहीं था की रघुवीर काका की बीवी का सरपंच से ऐसा चक्कर होगा.

उधर कमरे में सरपंच ने पोजीशन चेंज की और उस औरत को घोड़ी बनाया और फिर अपने काले लुंड को उस औरत की छूट में एक hi झटके में पेल दिया जिससे उस औरत ने लम्बी आआह्ह्ह्ह भरी. उसकी मोती मोती और बड़ी बड़ी चूचिया सरपंच के धक्को की वजह से बुरी तरह लहरा जाती थी. औरत सरपंच की तरह काली नहीं थी बल्कि साफ़ रंगत की थी और उसके नैन नक्श भी ठीक थे.

पहले तो ये सब देख कर मेरा मन किया की मैं भी बहती गंगा में डुबकी लगा लू. क्यों की सेक्स किये हुए मुझे काफी टाइम हो गया था और इस वक्त ये नज़ारा देख कर मेरा लुंड बुरी तरह से तन्ना गया था. वैसे अगर मैं इसी वक्त कमरे में उन दोनों के सामने पहुंच जाता तो मुझे यहाँ देख कर दोनों की हालत खराब हो जनि थी और मुझे पक्का यकीन था की सरपंच अपनी पोल खुलने के दर से मेरा मुँह बंद करने के लिए खुद hi ये कहता की आजा विक्की बीटा तू भी मज़े ले ले.

मेरा मन तो बहुत कर रहा था मगर मैंने अपने आपको सम्हाला और वीडियो शूट करता रहा. कुछ देर बाद दोनों अपने चरम पर पहुंच गए और शांत पद गए. सरपंच झड़ने के बाद एक साइड चारपाई में लेट गया और वो औरत भी. मैं ये सब अभी भी शूट कर रहा था. कुछ देर बाद जब दोनों की साँसे सम्हली तो सरपंच ने उस औरत की तरफ करवट ली और उसकी बड़ी बड़ी चुकी को मसलते हुए पहले उसके गाल पर चूमा फिर बोलै.

"आज तो तूने सच में मुझे थका दिया रेखा. काफी दिनों बाद मौका लगा था तुझे छोड़ने का. अच्छा हुआ की तेरी सास मर गयी वर्ण ऐसा मौका नहीं मिलता." सरपंच ने ये कहा तो रेखा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"तुमसे भी तो सबर नहीं होता था मेरे राजा. बड़ी मुश्किल से माने थे तुम." रेखा ने ये कहा तो सरपंच ने उसकी चुकी को मसलते हुए कहा.

"अब तो रोज़ hi मौका मिलेगा मेरी रानी. अब तो मैं रोज़ तुझे छोड़ूगा और जैम के छोड़ूगा. तेरा पति खेत में अपनी माँ छुड़ाएगा और मैं यहाँ उसकी बीवी को छोड़ूगा." सरपंच ने ये कहा तो रेखा मुस्कुरायी फिर बोली.

"वो सब तो ठीक है मगर मुझे छोड़ने के चक्कर में तुम लापरवाह मत हो जाना. क्यों की अगर किसी को हमारे बारे में पता चल गया तो तुम्हारा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा मगर मैं गांव में किसी को मुँह दिखने के काबिल नहीं रह जोगी." रेखा ने ये कहा तो सरपंच ने उसकी दूसरी चुकी को मसलते हुए कहा.

"फ़िक्र न कर मेरी रानी. किसी को कुछ पता नहीं चलेगा. मेरे रहते तुझ पर कोई बात नहीं आएगी." सरपंच ने ये कहा और रेखा की एक चुकी के निप्पल को मुँह में भर लिया जिससे रेखा की सिसकी निकल गयी फिर वो बोली.

"फिर तो ठीक है मेरे राजा. मगर तुम अपने वेड के पक्के भी नहीं हो. भूल गए पिछली बार जब तुम आये थे तो तुमने मुझे क्या देने का वडा किया था.?" रेखा ने नाराज़गी दिखते हुए ये कहा तो सरपंच ने उसकी चुकी के निप्पल को मुँह से निकाल कर कहा.

"मैं कुछ नहीं भूला मेरी रानी. मैं अपने वेड के मुताबिक तेरे लिए सोने की नाथ लेके आया हु. सोचा पहले तुझे छोड़ कर खुश कर दू उसके बाद तुझे अपने हाथो से तेरी नाक में उस नाथ को पहनाऊंगा." सरपंच ने ये कहा तो रेखा ने खुश होते हुए कहा.

"क्या सच कह रहे हो मेरे राजा.?" रेखा ने कहा तो सरपंच ने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ मेरी रानी. मैं तुझसे झूठ क्यों बोलूगा.? वैसे मैंने तो अपना वडा पूरा कर दिया मगर तूने अपना वडा पूरा नहीं किया अभी तक. तूने वडा किया था की तू अपनी जेठानी की छूट दिलवाएगी मुझे मगर अभी तक नहीं दिलवाया तूने." सरपंच ने शिकायत करते हुए ये कहा तो रेखा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"फ़िक्र क्यों करते हो मेरे राजा.? मैंने अपनी जेठानी को शीशे में उतार लिया है. उसने हाँ तो कर दिया है मगर उसने कहा है की बदले में उसको क्या डोज तुम.?" रेखा ने ये कहा तो सरपंच ने मुस्कुराते हुए कहा.

"वैसे तो छूट के बदले मैं उसे अपना लुंड दूँगा पर अगर वो लुंड के साथ साथ कुछ और भी चाहती है तो उसे बोल देना की फ़िक्र न करे. उसे जो भी चाहिए मिल जायेगा मगर पहले उसको खुश करना होगा मुझे." सरपंच ने ये कहा तो रेखा ने कहा.

"ठीक है बोल दूगी मैं. अब तुम जाओ क्यों की मेरे पति का खेत से आने का वक्त हो गया है. कही ऐसा न हो की हम दोनों पकडे जाये." रेखा ने ये कहा तो सरपंच ने कहा.

"क्या मेरी rani...aise क्यों भगा रही है मुझे.? मेरा तो एक बार और तुझे छोड़ने का मन कर रहा है अभी." सरपंच ने ये कहा तो रेखा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"आज इतने से hi काम चला लो मेरे राजा. कल दोपहर को आ जाना. तब जितना चाहे मुझे छोड़ लेना मैं मन नहीं करुँगी." रेखा ने ये कहा तो सरपंच ने खुश होते हुए कहा.

"फिर तो ठीक है मेरी रानी. चल अब मैं अपने हाथ से तेरी नाक में नाथ पहनता हु." सरपंच ने उठते हुए ये कहा तो रेखा भी उठ गयी. दोनों अभी भी पूरी तरह नंगे थे. रेखा ने अपनी नाक से जो पहले सोने का एक छोटा सा फूल पहना था उसे उतरा और फिर सरपंच ने उसकी नाक में अपनी लायी हुयी सोने की नाथ पहना दी.

"इस नाथ में तू बहुत सुन्दर लग रही है मेरी रानी. कसम से कहता hu...ab तो तुझे छोड़ने का बहुत मन करने लगा है. चल जल्दी जल्दी काम ख़तम कर दुगा मैं. मुझे एक बार और तुझे छोड़ना है. मुझसे अब सबर नहीं होगा." सरपंच ने ये कहा तो रेखा है पड़ी.

"सच में बहुत बेसब्री हो मेरे राजा. मगर ख़याल करो की इस चक्कर में हम पकडे भी जा सकते हैं. मेरा पति आता hi होगा. अगर वो इस वक्त आ गया तो हम दोनों उसे कोई जवाब नहीं दे पाएंगे. इस लिए मान जाओ raja...kal दोपहर को आ जाना. फिर जितना चाहे मुझे छोड़ लेना." रेखा ने ये कहा तो सरपंच ने कहा.

"एक शर्त par....kal तुझे अपनी गांड भी देनी होगी मुझे." सरपंच ने ये कहा तो रेखा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा और फिर बोली.

"ये क्या कह रहे हो राजा.? मैंने वह पर कभी नहीं करवाया. मेरा पति तो छूट में hi करता है." रेखा ने ये कहा तो सरपंच ने उसकी चुकी को मसल कर कहा.

"तेरा पति गांडू है मेरी रानी. उसे असली मज़े का पता hi नहीं है. कल जब मैं तेरी गांड में लुंड दाल कर तेरी अच्छे से चुदाई करुगा तो देखना कितना मज़ा आएगा तुझे." सरपंच ने ये कहा तो रेखा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"ठीक है मेरे राजा. अब तुम जाओ यहाँ से. मेरा पति आ गया तो लेने के देने पद जायेगे और तुम यहाँ से बाहर भी नहीं जा पाओगे." रेखा ने ये कहा तो सरपंच चारपाई से नीचे आ गया.

मैंने वीडियो शूट करना बंद कर दिया. इतना मसाला काफी था मेरे लिए. मैंने देखा की दोनों जल्दी जल्दी अपने कपडे पहनने लगे थे. कपडे pahan'ne के बाद सरपंच ने रेखा को अपनी बाहो में भर लिया और उसे चूमने लगा. मैं समझ गया की विदा होने से पहले दोनों एक दूसरे को प्यार कर रहे हैं.

मैंने भी वह से निकल लेने का सोचा और वह से वापस आँगन में उसी जगह पर आया जहा से मैं आया था. सीढ़ी पर चढ़ कर मैं बॉउंड्री के ऊपर आ गया. बॉउंड्री के उस तरफ की पलटी गली में मैंने झांक कर देखा और जब कोई न दिखा तो मैं ऊपर से hi गली में कूद गया.

गली से चलते हुए मैं घर के सामने सड़क पर आया तो देखा चबूतरे में वो बच्चा बैठा हुआ था. उसके हाथ में एक कागज़ था जिसमे शायद नमकीन या गुड़ था जिसे वो बड़े मज़े से खा रहा था. मुझे देखते hi वो मुस्कुराया और मुझे उस कागज़ को दिखने लगा तो मैं उसके पास गया और उसे समझाया की वो अपनी माँ से न बताये की मैंने उसे पैसे दिए थे जिससे वो ये सब लाया था. उसने बड़ी मासूमियत से पूछा क्यों तो मैंने उसे बताया की अगर वो ये बात अपनी माँ और अपने पिता जी को बता देगा तो उसकी वो लोग पिटाई करेंगे.

मेरी ये बात सुन कर बच्चा दर गया और बोलै की वो किसी को कुछ नहीं बताएगा. फिर उसने मुझसे कहा की भैया क्या तुम फिर से मुझे ऐसे hi पैसा डोज तो मैंने उसे हाँ कहा और फिर अपने घर की तरफ चल दिया. आज मेरे हाथ बहुत बड़ा सबूत लग गया था सरपंच के खिलाफ. मेरे मन में एक ज़बरदस्त प्लान तैयार हो रहा था.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 30


गली से चलते हुए मैं घर के सामने सड़क पर आया तो देखा चबूतरे में वो बच्चा बैठा हुआ था. उसके हाथ में एक कागज़ था जिसमे शायद नमकीन या गुड़ था जिसे वो बड़े मज़े से खा रहा था. मुझे देखते hi वो मुस्कुराया और मुझे उस कागज़ को दिखने लगा तो मैं उसके पास गया और उसे समझाया की वो अपनी माँ से न बताये की मैंने उसे पैसे दिए थे जिससे वो ये सब लाया था. उसने बड़ी मासूमियत से पूछा क्यों तो मैंने उसे बताया की अगर वो ये बात अपनी माँ और अपने पिता जी को बता देगा तो उसकी वो लोग पिटाई करेंगे.

मेरी ये बात सुन कर बच्चा दर गया और बोलै की वो किसी को कुछ नहीं बताएगा. फिर उसने मुझसे कहा की भैया क्या तुम फिर से मुझे ऐसे hi पैसा डोज तो मैंने उसे हाँ कहा और फिर अपने घर की तरफ चल दिया. आज मेरे हाथ बहुत बड़ा सबूत लग गया था सरपंच के खिलाफ. मेरे मन में एक ज़बरदस्त प्लान तैयार हो रहा था.

अब आगे पढ़िए....


मैं ख़ुशी ख़ुशी घर आ गया. आज सच में मैं इस सबसे बहुत खुश हुआ था. सरपंच के खिलाफ ऐसा डायनामाइट सबूत मिला था की मैं उससे सरपंच की सरे गांव में धज्जिया उदा सकता था मगर मैं फिलहाल ये करना नहीं चाहता था. अभी मुझे अपनी फॅमिली को इस जगह से दूर ले जा कर उनको सेफ करना था. उसके बाद सोचुगा की मुझे इस डायनामाइट सबूत से क्या करना है.

मेरी आँखों के सामने बार बार सरपंच और रेखा की चुदाई वाला सारा सन घूम रहा था. उस वक्त मेरी खुद की हालत बहुत खराब हो गयी थी. मन तो कर रहा था की मैं भी कमरे में जा कर उस छिनाल रेखा को हुमच हुमच के छोड़ू मगर मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को कण्ट्रोल किया था. उस वक्त मुझे दक्षिणा की बहुत याद आयी थी.

मेरे दिमाग में यही सब चल रहा था और मैं इसी बारे में सोचते हुए ऊपर अपने कमरे के पास पहुंच कर दरवाजे को झटके से खोल कर अंदर गया और फिर एकदम से मेरी नज़र जिन पर पड़ी तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी. मुझे अपने आप की कोई खबर न रही. फिर अचानक किसी आवाज़ से मैं उछला तो देखा प्रिय पूजा दोनों ने चीखते हुए बीएड की चादर को अपने अपने जिसम पर लपेट लिया था.

सब कुछ अचानक hi हो गया था. मुझे ये अंदाज़ा hi नहीं था की प्रिय पूजा मेरे कमरे होंगी और वो भी ऊपर से नंगी. असल में वो दोनों मेरे लाये हुए बैग से जीन्स और टीशर्ट निकल कर उन्हें पहन रही थी. जीन्स तो दोनों ने पहन लिया था मगर ऊपर से नंगी hi रह गयी थी. इधर मैं अपनी धुन में जैसे hi कमरे में घुसा तो मेरी नज़र उन दोनों पर पड़ी थी और मैं दोनों को ऊपर से नंगी देख कर शॉक रह गया था.

मुझे एकदम से होश आया और सिचुएशन की गंभीरता का अहसास हुआ तो मैं जल्दी से कमरे से बाहर आ गया. मेरा दिल बहुत तेज़ी से धड़क रहा था. मेरी आँखों के सामने बार बार प्रिय पूजा का नंगा जिसम घूम जाता था. उनकी नंगी चाहतियो के उभार. उफ्फ्फ्फ़ मेरा दिमाग खराब हुआ जा रहा था. मैंने अपनी लाइफ में किरण और उसकी माँ दक्षिणा को न जाने कितनी बार नंगा देखा था और उनके साथ सेक्स भी किया था मगर उनके जिसम में और मेरी इन दोनों जुड़वाँ बहनो के जिसम में बहुत अंतर दिखा था मुझे. प्रिय पूजा की छतिया ऐसी थी जैसे भगवन ने बड़ी फुर्सत से तरसा था उन्हें. हे भगवन ये मैं क्या सोचे जा रहा था अपनी hi बहनो के बारे में.????

कमरे के बाहर खड़ा मैं पसीने पसीने हुआ जा रहा था. मुझे फील हुआ की मेरा गाला सूख गया है. मैं वह से नीचे की तरफ चल दिया. मैं बहुत कोशिश कर रहा था की मेरी आँखों के सामने वो मंज़र न आये और न hi मेरे मन में उसका कोई ख़याल आये मगर मैं अपनी कोशिश में नाकाम हो रहा था. नीचे रसोई में जा कर मैंने देखा कुसुम दीदी रात के खाना बनाने की तयारी कर रही थी.

मुझे रसोई में आया देख दीदी ने मुझे हैरानी से देखा. मैंने एक नज़र उनकी तरफ देखा फिर बिना कुछ बोले मैंने घड़े से गिलास में पानी लिया और एक hi सांस में पूरा पि लिया. पानी पिने के बाद मैं चुप चाप रसोई से बाहर आ गया. अब दुबारा अपने कमरे की तरफ जाने की मेरी हिम्मत न हुयी तो मैं बाहर बैठक में आ कर कुर्सी पर बैठ गया.

मैंने ख्वाब में भी नहीं सोचा था की मैं अपनी बहनो को उस हालत में देखूगा. हालत तो उन दोनों की भी उस वक्त खराब हो गयी होगी. उन्होंने भी नहीं सोचा रहा होगा की मैं इस तरह कमरे में आ जाउगा. वैसे गलती मेरी थी hi नहीं क्यों की कमरा मेरा था और मैं जब चाहु अपने कमरे में आ जा सकता था. गलती तो उन दोनों की थी जो मेरे कमरे में इस तरह कपडे बदल रही थी और वो भी कमरे को बिना अंदर से बंद किये. उन्हें सोचना चाहिए था की कमरा मेरा है और मैं किसी भी वक्त आ सकता हु.

मैं बैठक में यही सब सोचते बैठा hi था की तभी वह पर माँ आ गयी. मुझे बैठक में बैठा देख वो भी मेरे पास hi एक कुर्सी पर बैठ गयी. मेरे चेहरे पर बारह बजे थे. मैंने उन्हें देखते hi अपने आपको सम्हालने की कोशिश की.

"क्या हुआ beta....koi परेशानी है क्या.?" माँ ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा तो मैं एकदम से हड़बड़ा गया मगर फिर अपने आपको सम्हालते हुए बोलै.

"नहीं to...aisi तो कोई बात नहीं है माँ." मैंने ये कहा तो माँ मुस्कुरायी और फिर बोली.

"छुपता क्यों है re...wo भी मुझसे.? ारी मैं तो तेरी माँ हु. अपने दिल की बात तू मुझसे बता सकता है. देख अगर तू भी उस रचना को पसंद करता है तो मुझे बेझिझक बता दे. मुझे तो वो बहुत पसंद है सच में. हाँ थोड़ी मोती हो गयी है वो. लगता है अपना किसी तरह भी ख़याल नहीं रखती है. ऐसा लगता है जैसे उसे अब सजने सवारने से कोई मतलब hi नहीं है. मगर मुझे यकीन है की उसका जब तेरे साथ ब्याह हो जायेगा न तो वो फिर से पहले जैसी हो जाएगी." माँ ने ये सब कहा तो मैं हैरान रह गया. मुझे समझ न आया की मैं माँ से क्या बोलू.? वो तो लगता है ज़बरदस्ती मेरा ब्याह रचना से करा देंगी.

"उसके घर आज जब गयी तो मिली थी वो मुझे. बड़े अच्छे ढंग से उसने मुझसे बात की. उसकी बाते मुझे बहुत अच्छी लगी बीटा. पहले उसे पता hi नहीं था की मुझे अब उसके और तेरे बारे में सब कुछ पता चल गया है और फिर जब मैंने अकेले में उससे इस बारे में बात की तो बेचारी कुछ बोल hi नहीं प् रही थी." माँ ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा.

"मैंने उससे इस बारे में ज़्यादा कोई बात नहीं की बस ये कहा की कल दोपहर को वो हमारे घर ज़रूर आये." माँ ने ये कहा तो मैं और भी हैरान हुआ. मुझे समझ नहीं आ रहा था की माँ ये सब क्यों कर रही थी.?

"कल दोपहर जब वो आएगी तो मैं तसल्ली से उससे बात करुँगी मगर उससे पहले मैं तुझसे भी जानना चाहती हु की तू क्या कहता है इस बारे में.?" माँ ने ये कहा तो मैंने इस बार कहा.

"मैं इस बारे में आपसे बस यही कहुगा माँ की मुझे ब्याह करना hi नहीं है." मैंने ये कहा hi था की माँ ने बीच में hi मेरी बात को kaat'te हुए कहा.

"ये तू क्या कह रहा है बीटा.? तू ब्याह नहीं karega..magar क्यों बीटा.?" माँ ने अचंभित हो के ये कहा तो मैंने कहा.

"आप तो जानती हैं माँ की मुझसे बड़ी कुसुम दीदी हैं और उनका ब्याह करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है. उनके बाद मेरी वो दोनों जुड़वाँ बहने भी ब्याह के लायक हो गयी हैं. जब तक अपनी तीनो बहनो का ब्याह नहीं करुगा तब तक मैं अपना ब्याह नहीं करुगा और न hi ब्याह के बारे में सोचुगा." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"उनका भाग्य इस गांव में नहीं अब शहर में hi जा कर बदलेगा बीटा. उन तीनो के भाग्य में क्या है ये भगवन hi जनता है मगर रचना के बारे में सोचना भी हमारा फ़र्ज़ है. क्यों की उसकी वजह से आज हम सब सही सलामत हैं. उसने हमारे लिए कितना बड़ा त्याग किया ये हम कैसे भूल सकते हैं. उसने तेरे प्रेम की वजह से ये सब किया. बदले में हमसे उसने कुछ नहीं मांगा. मैंने उसकी आँखों में तेरे लिए बहुत सारा प्यार देखा है बीटा. आज अगर हम उसे यहाँ यु hi छोड़ कर चले जायेगे तो हमसे बड़ा स्वार्थी कोई नहीं होगा. वो भी कहेगी की हमने उसके बारे में एक बार भी नहीं सोचा. नहीं बीटा nahi....mujhse ये सब नहीं होगा. मैं उसके साथ गलत नहीं करुँगी." माँ ने ये सब कहा तो मुझे समझ न आया की मैं उनसे क्या कहु.

"कल जब वो यहाँ आएगी तो मैं उससे साफ़ साफ़ पूछूगी की उसके दिल में क्या है. मैं उसे बताऊगी की हम सब अपनी ज़मीने और ये घर बेच कर इस गांव से बहुत दूर हमेशा हमेशा के लिए जा रहे हैं. अगर उसे भी हमारे साथ चलना है तो मैं उसे चलने से मन नहीं करुँगी." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"कहने और करने में फर्क होता है माँ. आपको जो सही लगे वो आप बेशक कीजिये मगर ये भी सोचिये की यहाँ से निकलना इतना भी आसान नहीं है. हम सब जिस दिन यहाँ से जायेगे उस दिन सबको पता चल जायेगा. लोग हमसे पूछेंगे की हम कहा जा रहे हैं तो क्या बतायेगे हम.? ऊपर से सरपंच की लड़की को भी ले जायेगे तो बखेड़ा अलग खड़ा हो जायेगा." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"तो फिर कैसे चलेंगे हम यहाँ से.?" माँ ने पूछा तो मैंने कहा.

"हम सब यहाँ से रात को जायेगे जब सारा गांव सोया हुआ होगा. जो भी ज़रूरी सामान है उसे पैक कर लेंगे और फिर हम सब किसी कैब में चलेंगे. मगर यहाँ से सिर्फ हम लोग hi जायेगे. अगर आप रचना को भी ले जाना चाहती और अगर रचना हमारे साथ जाना चाहती है तो उसे यहाँ से बाद में बुला लिया जायेगा." मैंने ये कहा तो माँ ने हैरानी से मुझे देखते हुए कहा.

"बाद में उसे कैसे बुला लोगे तुम.?" माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"पहले मैं आप सबको यहाँ से ले जा कर दिल्ली में रखुगा. उसके बाद मैं यहाँ फिर आयगा और रचना को साथ ले जाउगा यहाँ से." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"तू यहाँ अकेले आएगा वह से.?" माँ ने हैरानी से पूछा तो मैंने कहा.

"फ़िक्र मत कीजिये माँ. मैं यहाँ से रचना को ले भी जाउगा और सरपंच कुछ कर भी नहीं पायेगा." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"सरपंच को पता चला तो वो अनर्थ कर देगा बीटा." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"कुछ नहीं कर पायेगा वो. आप बेफिक्र रहिये." मैंने ये कहा तो माँ मुझे देखती रह गयी. ऐसा लगा जैसे वो कुछ सोचने लगी थी.

"ठीक है बीटा जैसा तुझे ठीक लगे वैसा कर. मैं तो बस यही चाहती हु की हम सब यहाँ से सुरक्षित चले जाये." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"आप किसी बात की फ़िक्र मत करो माँ. हम सब यहाँ से सुरक्षित hi वह पहुचेगे." मैंने ये कहा तो माँ ने मुस्कुराते हुए मेरे चेहरे पर प्यार से हाथ फेरा और फिर उठ कर चली गयी.

माँ के जाने के बाद मैं कुछ देर तक इस सबके बारे में सोचता रहा. फिर मुझे प्रिय पूजा का ख़याल आया तो एक बार फिर से मेरी आँखों के सामने कमरे का वो मंज़र घूमने लगा. मैं एकदम से परेशां हो गया इससे. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं ऐसा क्या करू की वो मंज़र न मुझे याद आये और न hi मेरी आँखों के सामने घूमे.?

मैंने अपने लेफ्ट हैंड में बंधी घडी पर टाइम देखा तो शाम के सात बज रहे थे. मैं कुर्सी से उठा और फिर से घर से बाहर निकल गया. बाहर आ कर मेरे मन में सवाल आया की अब यहाँ से कहा जाओ इस वक्त.? कमरे में मैं जाना नहीं चाहता था. वैसे मुझे अंदाज़ा था की प्रिय पूजा मेरे कमरे से जा चुकी होंगी मगर फिर भी मेरा कमरे में जाने का मन नहीं किया.

अभी मैं कही जाने के बारे में सोच hi रहा था की तभी मुझे सरपंच और रेखा का ख़याल आया. मैंने सोचा क्यों न एक बार उस रेखा चची के घर जाया जाये. देखु वह जा कर क्या होता है. ये सोच कर मैंने पहले अपने पेंट की पॉकेट में हाथ फेरा. मेरा मोबाइल पॉकेट में hi था. उसके बाद मैं मन hi मन मुस्कुराते हुए रेखा चची के घर की तरफ चल दिया. मेरा दिल जाने क्यों एकदम से धड़कने लगा था.

रास्ते में मैं सोच रहा था की रघुवीर काका खेत से आ गए होंगे तो उनके सामने क्या हो सकेगा कुछ.? वैसे तो मुझे भी अभी कुछ समझ नहीं आ रहा था की मैं रेखा चची के घर जा कर क्या करना चाहता हु. मगर यु hi जा रहा था.

थोड़ी hi देर में मैं रेखा चची के घर के दरवाजे के बाहर खड़ा था. मैंने इधर उधर देखा तो आस पास के घरो के बाहर कोई न dikha...bas घरो की खिड़कियों से अंदर की तरफ लाइट जलती दिख रही थी. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था. मैंने अपने दिल और दिमाग को शांत किया और दरवाजे की कुण्डी को बजाय तो थोड़ी hi देर में दरवाजा जिसने खोला वो रेखा चची hi थी.

मुझे बाहर खड़ा देख कर उनके चेहरे पर पहले हैरानी दिखी फिर मुस्कुराते हुए मुझे अंदर आने को कहा तो मैं अंदर चला गया. गांव में ज़्यादातर एक दूसरे को सभी जानते हैं. मेरे घर पर भले hi ये ब्राह्मण समाज ख़ास मौको पर पानी नहीं पिता था मगर बोल चाल तो सबसे था. कभी कोई काम हुआ या कभी किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ी तो सब एक दूसरे की मदद कर देते थे. प्रॉब्लम सिर्फ यही थी की ख़ास मौको पर ये लोग न हमें बुलाते थे और न हमारे यहाँ आते थे.

मैं चची के पीछे पीछे अंदर बैठक में पंहुचा तो चची ने मुझे वह पर बैठाया. मैंने उनसे काका के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया की वो खाना खा रहे हैं. मैंने हैरानी से उनसे पूछा की इतना जल्दी खाना कैसे खा रहे वो तो चची ने बताया की उनको रात में खेतो पर रखवारी के लिए जाना पड़ता है. चची के मुख से ये बात जान कर मुझे अंदर से ख़ुशी हुयी. मतलब रघुवीर काका कुछ hi देर में यहाँ से अपने खेत चले जायेगे और फिर वो साडी रात वही रहेंगे.

चची ने मुझसे मुस्कुराते हुए कहा की आज हमारे घर की तरफ कैसे भूले से आ गए विक्की तो मैंने उनसे कहा की मैं काका से मिलने आया था. मेरी बात सुन कर चची मुस्कुरायी और बोली की काका से hi लगाव है क्या अपनी चची से कोई लगाव नहीं है तुम्हे.? चची की ये बात सुन कर मैंने मन hi मन कहा तुमसे hi तो लगाव था चची jaan...warna यहाँ क्या काका की गांड मारने आता. मगर मैंने ऐसा कुछ बोलै नहीं बस ये कहा की आपसे भी लगाव है मगर काका से कुछ काम था इस लिए आया हु उनसे मिलने.

चची मुझे बैठक में छोड़ कर अंदर की तरफ ये कह कर चली गयी की उसे काका को खाना देना है. मैं यही पर बैठु और काका के आने का इंतज़ार करू या फिर अंदर hi आ जाओ तो मैंने कहा की नहीं मैं यही पर बैठा हु.

चची के जाने के बाद मैं जल्दी जल्दी सोचने लगा की जब काका मेरे पास आएंगे तो मैं उनसे क्या बोलूगा की किस काम से उनसे मिलने आया था. मगर मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या बहाना बनाऊ. मेरा दिमाग बड़ी तेज़ी से कोई बहाना ढूंढ रहा था. फिर एकदम से मेरे दिमाग में एक मस्त बहाना आ गया. अब बस काका के आने का इंतज़ार था.

थोड़ी देर में काका आये तो मुझे देख कर बड़ा खुश हुए और मेरे पास hi लकड़ी के एक तखत पर बैठ गए. उन्होंने बताया की उन्हें अभी खेतो पर जाना है. खेतो में फसल की रात भर रखवारी करनी पड़ती है वर्ण मवेशी वगैरा सब फसल बर्बाद कर देते हैं. काका ने मेरे आने की वजह पूछी तो मैंने उनसे कहा की मैं उनके पास ये जानने आया था की पिता जी ने अपनी बीमारी में उनसे कोई पैसे तो उधार नहीं लिए थे.? अगर लिए हो तो वो बता de...main उनके पैसे चुकता कर दुगा.

मेरी ये बात सुन कर काका मुस्कुरा दिए और फिर मुझसे बड़े प्यार से बोले बीटा तेरे पिता जी बीमार ज़रूर थे मगर मुझे नहीं लगता की उन्होंने किसी से एक रूपया भी पैसा उधार लिया होगा. क्यों की भगवन का दिया सब कुछ तो था उनके पास. हाँ उस वक्त तुम नहीं थे जिसका उन्हें दुःख था.

रघुवीर काका से थोड़ी देर इसी बारे में बातचीत हुयी. फिर मैंने उनसे झूठ मुठ जाने का कहा तो वो बोले की बीटा मैं तो अब खेतो की तरफ जा रहा हु मगर तुम अपनी चची के पास जाओ और खाना खा कर hi जाना यहाँ से. वैसे भी तुम पहले भी कभी हमारे घर बहुत काम hi आते थे. सरे गांव में चर्चा थी की महेश भाई साहब का बीटा बड़ा होनहार लड़का है. कसम से बीटा ये सुन कर बड़ा अच्छा लगता था मुझे. बाकी गांव के लड़के तो सब साले बिगड़े नवाब बने घूमते रहते हैं.

रघुवीर काका की इन बातो पर मैं कुछ न बोलै. उसके बाद मैंने फिर से जाने का कहा तो काका न माने और चची को आवाज़ दे कर बैठक में बुलाया और फिर उनसे कहा की विक्की को यहाँ से बिना खाना खाये मत जाने देना. काका की बात सुन कर चची ने मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिलाया. मुझे तो रुकना hi था इस लिए मैंने भी ज़्यादा न नुकुर नहीं की. उसके बाद काका अपने हाथ में एक बांस का लट्ठ ले कर घर से बाहर चले गए. काका के जाने पर मैंने सुकून की सांस ली.

काका जब बाहर निकल गए तो चची ने बाहर वाला दरवाजा बंद कर दिया और फिर मेरे पास आयी और मुस्कुराते हुए बोली की रसोई में आ जाओ विक्की. तुम्हारे काका कह कर गए हैं न की तुम्हे खाना खिलाये बिना यहाँ से न जाने दू.

मैं काकी के साथ रसोई की तरफ आ गया. काकी ने वही ज़मीन पर एक चटाई बिछाई और मुझे बैठने को कहा तो मैं बैठ गया. जहा पर मैं बैठा था उसके दो या तीन फुट दूरी पर रसोई थी जहा पर रेखा चची मिट्ठी वाले चूल्हे पर रोटियां बना रही थी.

रेखा चची दिखने में बहुत ज़्यादा सुन्दर तो नहीं थी मगर उनका जिसम काफी कैसा हुआ था और उनकी छतिया बड़ी बड़ी और मोती थी. उनकी उम्र का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था मेरे लिए. मगर उनका जो बच्चा आज मुझे उस वक्त मिला था वो तीन या चार साल का था. उस हिसाब से रेखा चची की उम्र 22 या 23 साल होनी चाहिए थी.

"तो मिल लिए अपने काका से.?" चची ने रोटी बनाते हुए मुझसे मुस्कुराते हुए ये पूछा तो मैंने उनकी तरफ देखते हुए उन्हें बता दिया की किस काम से मैं उनसे मिलने आया था. साडी बात सुन कर चची हसने लगी और बोली की हमारे पास इतना पैसा कहा जो हम किसी को उधर दे सके.

मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं चची से कैसे असल मुद्दे पर बात करू. नीली साड़ी को उन्होंने पीठ से घुमा कर कमर में खोंस लिया था. ब्लॉउज के नीचे नंगा पेट दिख रहा था मुझे. वो किसी वजह से जब भी झुकती तो मुझे उनके ब्लॉउज से झांकती उनकी बड़ी बड़ी चूचिया दिख जाती थी. मैंने आज इन्हे सरपंच से छुड़वाते हुए देखा था इस लिए उन्हें देख देख के hi मेरे जिसम में झुरझुरी हो रही थी और मेरे लुंड में करंट सा लग रहा था.

"वैसे चची आपकी उम्र क्या होगी.?" मैंने उनकी तरफ देखते हुए ये पूछा तो चची ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा.

"मेरी उम्र क्यों पूछ रहे हो विक्की.?" चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"बस ऐसे hi...kaka की उम्र आपसे ज़्यादा लगती है दिखने में." मैंने ये कहा तो चची ने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ वो मुझसे बहुत बड़े हैं उम्र में. बबलू के पहले मुझे एक बेटी हुयी थी जो दो साल की उम्र में भगवन को प्यारी हो गयी थी. उसके बाद बबलू हुआ जो चार साल का है. जब मैं 18 साल की थी तो तुम्हारे काका से मेरा ब्याह हुआ था. अब तुम अंदाज़ा लगा लो की मेरी उम्र क्या होगी.?" चची ने ये कहा तो मेरा दिमाग ये सोच कर चक्र गया की ये कैसा हिसाब है.

"मुझे लगता है आप की उम्र 24 या 25 की होगी अभी." मैंने अंदाज़े से ये बताया तो चची हसने लगी फिर बोली.

"रहने दो vicky...tum नहीं बता पाओगे. वैसे मुझे ये तो पता नहीं की तुमने क्या सोच कर इतनी उम्र बतायी है मेरी मगर सही सही उम्र 30 साल है मेरी." रेखा चची ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने हैरानी से उनको देखते हुए कहा.

"क्या सच me...magar भरोसा नहीं होता चची." मैंने ये कहा तो चची ने हस्ते हुए कहा.

"सब यही कहते हैं. किसी को भरोसा नहीं होता. जब मेरी बेटी हुयी तब मैं 19 साल की थी. जब मेरी बेटी दो साली की हुयी तो वो गुज़र गयी और मैं तब 21 साल की थी. उसके बाद बीच में कई सालो तक मुझे कोई औलाद नहीं हुयी. फिर जब मैं 26 साल की हुयी तब बबलू हुआ." चची ने पूरा हिसाब किताब बताया तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"वही तो मेरा अंदाज़ा सही नहीं हुआ था. मगर जो भी हो आप भले hi 30 साल बता रही हैं मगर 30 साल की लगती नहीं हैं." मैंने ये कहा तो चची बस मुस्कुराती रही.

मैं चटाई पर बैठा था और चची रोटी बना रही थी. मैंने सोचा अब चची को कुछ झटके दिए जाये वर्ण ऐसे में तो कुछ नहीं होने वाला. ये सोच कर मैंने चची से कहा.

"आज मैं काका से मिलने शाम से पहले भी आया था चची मगर." मैंने ये कहा hi था की चची ने एकदम से मेरी तरफ देखा. उनके चेहरे पर हैरानी दिखी. उन्होंने मेरी बात kaat'te हुए कहा.

"S..shaam से पहले..? कब आये थे तुम.?" चची ने ये कहा तो मैंने मन hi मन मुस्कुराते हुए कहा.

"यही कोई पांच बजे थे उस वक्त. आपके घर के बाहर चबूतरे में एक छोटा सा बच्चा बैठा सुबक रहा था. उससे मैंने पूछा तो उसने बताया की...." मैंने ये कहा hi था की चची की हालत ख़राब होती दिखी मुझे. उनका रोटियां बनाना एकदम से बंद हो गया.

"क्या बताया उसने..??" चची के चेहरे पर पसीना उभर आया. मैं जनता था की चची की हालत ये सोच कर पतली हुयी जा रही थी की उसके बच्चे ने मुझे क्या बताया होगा उस वक्त.? मैंने भी मज़ा लेने का सोचा और कहा.

"सब kuch....us बच्चे ने मुझे सच कुछ बताया चची." मैंने ये कहा तो चची के हाथ से चिंता छूट गया. उनकी आँखे फटी रह गयी और चेहरा सफ़ेद पद गया. बड़ी मुश्किल से उन्होंने मुझसे कहा.

"सब कुछ मतलब.?" चची ने ये कहा तो मैंने इस बार मुस्कुराते हुए उन्हें देखा और कहा.

"क्या चची आप bhi...are उस बच्चे ने बताया की आप अंदर हो और उसे गुड़ नहीं दिया अपने और बेचारे को बाहर भगा दिया डाट के. ये आपने अच्छा नहीं किया उस बेचारे के साथ. बच्चा है अभी वो." मैंने ये कहा तो चची की जान में जान आती दिखी. फिर वो बोली.

"तो क्या करू vicky...din भर गुड़ मांगता है मुझसे. अब कहा से लौ उसे गुड़.? वैसे भी ज़्यादा गुड़ खाने से उसके दांत में कीड़े पद जायेगे. इस लिए डाट कर बाहर भगा दिया था उसे और अंदर से दरवाजा बंद करके अपने काम में लग गयी थी." चची ने ये कहा तो मैं कुछ न बोलै.

मेरे मन में ख़याल आया की अभी चची के सामने खुलना ठीक नहीं होगा. इससे मेरा hi नुक्सान हो सकता है. मगर मैं थोड़ा चची की हालत को ख़राब करके मज़े लेना चाहता था. मैं उतना hi बोलना चाहता था जिससे चची बस कंफ्यूज रहे और परेशां हो.

"आपकी नाक की नाथ बहुत सुन्दर लग रही है चची. आज hi ख़रीदा है क्या आपने इसे.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो चची ने जल्दी से अपनी नाक की नाथ में अपना हाथ फेरा. मैंने साफ़ महसूस किया की मेरी इस बात से वो एकदम से हड़बड़ा गयी थी मगर जल्द hi सम्हाल गयी और फिर मुस्कुराते हुए बोली.

"हाँ वो आज hi ख़रीदा है ise...tumhare काका ने ला कर दिया है मुझे." चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"वाह चची क्या बात है. काका कितना चाहते हैं आपको. वैसे काका की पसंद बहुत अच्छी है चची. कितनी सुन्दर नाथ खरीदी है उन्होंने और आपके नाक में तो ये और भी ज़्यादा सुन्दर लग रही है." मैंने ये कहा तो चची हस्ती हुयी बोली.

"अच्छा ji....jhuth मुठ की तारीफ न करो तुम. इतनी भी सुन्दर नहीं लग रही है." चची ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने सोचा की अगर यही पर मैं ये कह दू की चची ये बात सरपंच से पूछना की कैसी लग रही है तो. मगर मैंने ऐसा कहा नहीं.

"अब मैं आपको कैसे भरोसा दिलाओ चची.? मैं तो वही बोल रहा हु जो सच है. आपको मेरी बात पर भरोसा नहीं तो कोई बात नहीं." मैंने ये कहा तो चची ने थाली में रोटी सब्जी सजाते हुए कहा.

"चलो मान लेती हु तुम्हारी बात की सुन्दर लग रही होगी अब खुश.?" चची ने ये कहते हुए मेरी तरफ मुस्कुरा कर देखा तो मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा.

"अच्छा अब लाइए जल्दी से मैं थोड़ा बहुत खा लेता हु. वैसे भी बहुत देर हो गयी है मुझे यहाँ आये हुए. घर में माँ और बहने मेरे आने का इंतज़ार कर रही होंगी." मैंने ये कहा तो चची ने कहा.

"ये भी तो तुम्हारा hi घर है विक्की. वैसे भी तुम तो कभी हमारे घर आते नहीं हो. तुम देख hi रहे हो की तुम्हारे काका तो खेतो पर चले गए और अब मैं इतने बड़े घर में अकेली रह गयी हु. तुम्हारे काका को तो मेरी कोई फ़िक्र hi नहीं है. ये तो मैं hi जानती हु की अकेले घर में मैं कैसे रात गुज़रती हु." चची ने ये कहा तो मैंने कहा.

"इसमें काका की क्या गलती है चची.? खेती बड़ी भी तो ज़रूरी है वर्ण खायेगे क्या.?" मैंने ये कहा तो चची उठ कर आयी और मेरे सामने थाली रख कर मेरे पास hi बैठ गयी फिर बोली.

"कहते तो तुम ठीक hi हो विक्की मगर क्या करू जब तुम्हारे काका घर पर नहीं होते तो दर भी लगा करता है की कही कोई घर में न घुस जाये रात को. ऐसे में मैं अकेली औरत किसी का क्या कर लूँगी.?" चची ने ये कहा तो मैंने मन hi मन सोचा की सरपंच को क्यों नहीं बुला लिया करती. मगर मैंने ये नहीं कहा बल्कि ये कहा.

"किसी को रात में अपने साथ सुलाने के लिए बुला लिया कीजिये न." मैंने ये कहा तो चची ने कहा.

"किसे बुला लू विक्की.? सब को अपनी पड़ी है मेरी किसी को फ़िक्र hi नहीं है. मैंने जेठानी की लड़की से कई बार कहा की रात को यहाँ आ जाया करे मगर वो आती hi नहीं है." चची ने ये कहा तो मैं कुछ न बोलै.

ऐसे hi चची से मेरी बाते होती रही और मेरा खाना हो गया तो मैंने चची से जाने की इजाज़त मांगी तो उन्होंने कहा की मैं आ जाया करू दिन में तो उनका भी टाइम पास हो जाया करेगा. उनके ऐसा कहने पर मैंने यही कहा की देखिये टाइम मिला तो ज़रूर आउगा. अब मैं उनसे कैसे कह देता की पक्का आउगा.? क्यों की कल दोपहर को तो सरपंच उसकी गांड मरने आने वाला था.

चची के घर से आने के बाद मैं सीधा अपने घर आ गया. घर में सच मच माँ और मेरी बहने मेरा इंतज़ार कर रही थी. माँ ने मुझसे पूछा की कहा था मैं तो मैंने उन्हें बताया की ऐसे hi गांव में घूम रहा था. उसके बाद माँ ने खाने के लिए कहा तो मैंने उनके साथ थोड़ा सा खाया और अपने कमरे में आ गया. मैंने देखा की प्रिय पूजा सिर्फ तभी दिखी थी मुझे जब मैं घर आया था उसके बाद वो नहीं दिखी. मैं समझ गया की वो मेरे सामने आने की हिम्मत नहीं कर प् रही हैं.

अपने कमरे में बीएड पर लेता मैं आज के सरे दिन के बारे में सोच रहा था. रेखा चची काफी हसमुख स्वभाव की थी और मस्त मालदार औरत भी थी. उनका जिसम मस्त कैसा हुआ था. मुझे सबसे ज़्यादा उनकी बड़ी बड़ी चूचिया अच्छी लगी थी. जब वो मेरे पास hi बैठ गयी थी तो मेरी नज़र बार बार ब्लॉउज को फाड़ कर बाहर निकलने को आतुर उनकी छाहतियो पर पद जाती थी. चची ने ज़रूर महसूस किया होगा की मैं उनकी छतियो को देख लेता था.

रात काफी हो गयी मगर आज प्रिय पूजा मेरे कमरे में सोने के लिए नहीं आयी. मैं समझ गया की वो दोनों आज शाम को हुए इंसिडेंट से मेरे सामने आने से कटरा रही हैं. मैं उन दोनों से कल सुबह बात करने का सोचते हुए सो गया.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

भय अपने बिलकुल सही कहा. रचना का जितना दिमाग चला उसने लगाया और उसी के डैम पर अपने बाप और भाई को कुछ करने hi नहीं दिया....

अब देखते हैं यारा आगे विक्की की माँ क्या करती है और विक्की भी....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 126....

रीड & एन्जॉय....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

भय कहा तो अपने सही है मगर अभी ये करना क्या सही रहेगा. कही रेखा ने सरपंच को बता कर कोई पन्गा कर दिया तो विक्की और उसकी फॅमिली के लिए प्रॉब्लम हो जाएगी. मगर भाई मुझे आपकी बात मजेदार लगी. रेखा की गांड का उद्घाटन विक्की करे. :हहै:

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 126....

रीड & एन्जॉय....
 
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