CHAPTER 3
ये आदमी कौन है जो हमारे बगल वाले घर में किराये पर
रहने आया है???
वह एक ऐसी ताज़गी भरी सुबह थी जहां हवा साफ़ और ताज़ा महसूस होती थी, पड़ोस के बगीचे से
चमेली की हलकी सी खुशबू उठ रही थी जो दूर से शहर के जागने की हलकी सी गूँज के साथ मिल रही थी.
मैं अपने बिस्तर में हिलोरा, पास की मस्जिद से मुइज़्ज़िन की नरम आवाज़ ने मुझे नींद से जगा दिया.
यह सुबह की नमाज़ का वक़्त था, लेकिन मैं फिर से चूक गया – यह बात मुझे हमेशा गिल्ट
महसूस कराती थी, ख़ुसूसन जब मैं जानता था की अम्मी कितनी पक्की इबादत गुज़ार हैं.
जब तक मैं पूरी तरह जाग गया, मेरे अब्बू – हुसैन इक़बाल – अपनी दूकान के लिए निकल चुके थे.
वह अनारकली बाजार में एक छोटी सी किताब की दूकान चलते थे, जहां धुल भरी अलमारियां
मज़हबी किताबों, उर्दू में बच्चों की कहानियों और उनकी पसंदीदा शायरी के मजमूओं से भरी
रहती थीं.
अब्बू वह शख्स नहीं थे जो दौलत के पीछे दौड़ते; उन्हें ईमानदार काम पर यक़ीन था, समाज को
इल्म देने में. मुझे याद है उन्होंने एक बार मुझसे कहा था, “बीटा, किताबें रूह की रौशनी होती हैं.”
मैं उन पर फख्र करता था – फख्र इस बात पर की वह बाजार की अफरा तफरी में कितनी शान्ति से गुज़र जाते
थे, कभी आवाज़ ऊंची नहीं करते, हमेशा किसी गरीब talib-e-ilm को मेहेरबानी से डिस्काउंट देते या एक
नरम लफ्ज़ कहते.
मैं अपनी हरी शर्ट और जीन्स में कॉरिडोर से गुज़रा, ठंडी टाइल की फर्श ने मेरे पैरों में सर्दी दौड़ दी.
पीछे का आँगन वह जगह थी जहां अम्मी अपनी सुबह की रूटीन करती थीं, वह बंद ब्रिक की दीवारों
से घिरा सुकून भरा मक़ाम था जो नज़रों से मेहफ़ूज़ रखता था. यह उनका पनाहगाह था, कंक्रीट का
एक टुकड़ा जहां कुछ घड़े में पोदीना और तुलसी जैसे पौधे लगाए हुए थे जो वह प्यार से संभालती थीं.
जब मैं दरवाज़े से झाँका, तो वह वहां थी, अपनी हरकत में मसरूफ. अम्मी अपने रोज़मर्रा के एक्सरसाइज
के लिबास में थी: ढीले काले स्वीटपैंट्स जो उनके पैरों पर आराम से लटकते थे, टखनों तक पहुँचते
हुए बिना चिपके, और एक सादा लम्बी आस्तीन वाली काली टॉप जो उनके बाज़ू और सीने को पूरा धक् रही थी.
एक चमकीला लाल दुपट्टा उनके सर पर saaf-suthre तरीके से बंधा हुआ था, जो उनके काले बालों को
संभाले हुए था और उनके वैसे सदा लिबास में रंग भर रहा था. वह फोकस्ड लग रही थीं, उनकी
हरकतें नरम लेकिन मक़सद भरी. वह एक एक्सरसाइज कर रही थीं जिसे “प्लांक्स” कहते हैं.
वह warm-up स्ट्रेचेस से शुरू करती थीं – बाज़ू घूमती थीं, पहले आगे फिर पीछे, कन्धों को
ढीला करती हुई. फिर साइड बेंड्स, जिस्म को धीरे से दाएं बाएं झुकाती हुई, हर हरकत के साथ गहरी सांस
लेती हुई.
उसके बाद लुंगेस, एक टांग आगे बढ़ा कर नीचे झुकती हुई ताकि घुटना ज़मीन को छूने के क़रीब
पहुँच जाए, फिर तरफ बदल कर.
उनके स्वीटपैंट्स थोड़े हिलते थे म्हणत से, लेकिन सब कुछ ढाका रहता था, यह उनकी परदे की पाबन्दी की मिसाल
था भले hi तन्हाई में हों.
“अस्सलामु अलैकुम, अम्मी,” मैंने धीमे से कहा, आँगन में क़दम रखते हुए मुस्कुराते हुए, उन्हें
डराना नहीं चाहता था.
वह स्क्वाट के ऊपर पहुँच कर रुक गयीं, सीढ़ी कड़ी हुई और मेरे तरफ मुद कर वह गरम, चमकती
मुस्कराहट दी जिसकी वजह से उनकी आँखों के कोने सिकुड़ गए. “व अलैकुम अस्सलाम, मेरे प्यारे बीटा. आज तो
जल्दी उठ गए हो.
क्या पंछियों ने जगाया या ताज़े पराठों का ख़याल?”
मैं हंस पड़ा, दीवार से तकिया लगा कर उन्हें अपनी रूटीन जारी रखते देखता रहा. “दोनों thoda-thoda,
शायद. लेकिन ज़्यादा तर तो मुझे तुम्हे ऐसे देखना अच्छा लगता है – मज़बूत और लगन वाली. तुम इसे आसान
दिखाती हो.”
वह हलके से हंसी, सांस बराबर रखते हुए एक और स्क्वाट में नीचे जाती हुई. “आसान? यह सब प्रैक्टिस और
फ़ज़ल है. चलो, बगीचे की तरफ चलते हैं. नींद कैसी रही?”
“अच्छी, शुक्रिया,” मैंने जवाब दिया. “लेकिन अम्मी, मैं हमेशा सोचता हूँ – तुम हर सुबह एक्सरसाइज क्यों
करती हो? तुम तो घर संभालती हो, पड़ोस के बच्चों को पढ़ाती हो, हमारे लिए खाना बनती हो. क्या यह
सब किसी के लिए काफी वर्कआउट नहीं?”
उन्होंने अपने माथे पर हलकी सी पसीने की चमक को हाथ के पीछे से पोंछा, ध्यान से अपना लाल
दुपट्टा न हिल जाए.
“बीटा, जिस्म एक अमानत है. इसे मज़बूत रखना पड़ता है इबादत के लिए – नमाज़ में
खड़े होने के लिए, रोज़ा रखने के लिए, घर वालों की खिदमत के लिए. अगर मैं कमज़ोर हो गयी तो सजदा या
रुकू कैसे करुँगी बिना दर्द के? और वैसे भी, यह दिमाग़ को साफ़ करता है, दिन की शुरुआत एनर्जी से होती है.
यह सिर्फ जिस्म के लिए नहीं, रूह के लिए भी है.”
मैं सर हिलाया, उनके लफ़्ज़ों को समझते हुए. वह हमेशा सब चीज़ों को क़ीमत और घर से जोड़ देती थीं,
सादगी भरी बातों को गहरा बना देती थीं. “यह बात सही है. लेकिन गयम क्यों नहीं ज्वाइन करती? वहाँ फैंसी
मचिनेस हैं – ट्रेडमिल, वेइट्स. बेहतर इक्विपमेंट, सही? तुम और मज़बूत हो सकती हो.”
अम्मी स्ट्रेच के बीच रुक गयीं, हम बगीचे पहुँच गए थे, उन्होंने हाथ कमर पर रखे और वह jaan-ne
वाला नज़र से देखा, आधा हंस कर आधा सीरियस. “गयम? ओह बीटा, सोचो ज़रा. वह जगहें मर्दों और औरतों
से भरी होती हैं जो आज़ादी से मिलते जुलते हैं. यह ढीले स्वीटपैंट्स और टॉप भी पर्दा करती हैं, लेकिन गैर
मर्दों के सामने? नज़रें भटकती हैं, नियतें ख़राब होती हैं.
मैं अपनी इज़्ज़त या वैल को खतरे में नहीं
दाल सकती. नहीं, घर पर एक्सरसाइज करना बेहतर है – सुकून भरा, खल्वाट में, कोई डिस्ट्रक्शन नहीं. हमें
हुक्म है की पर्दा रखें, और यह तरीक़ा बेहतरीन है.”
उनके लफ्ज़ मुझे गहरे छुए. एक ऐसे शहर में जहां हर कोने पर फितना था, अम्मी ने पाक रास्ता चुना बिना
शिकायत के.
मेरे सीने में फख्र का जज़्बा उभरा, उनकी मज़बूती और नरमी के मिलाप की क़द्र करते हुए, वह कभी अपने
उसूलों से समझौता नहीं करती थीं. “तुम सही हो, अम्मी. बिलकुल सही. मुझे तुम पर इतना फख्र है की तुम हमेशा
उसूलों को पहले रखती हो. हर कोई ऐसा नहीं करता.”
बगीचे में उन्होंने स्क्वाट एक्सरसाइजेज शुरू किये.
वह मेरे तरफ हाथ बढ़ाया और मेरे बालों को प्यार से सहलाया, उनका छूना गरम और यक़ीन दिलाने वाला.
“शुक्रिया, मेरे बीटा. अब बातें बंद – जाओ फ्रेश हो जाओ जब तक मैं यह ख़तम करती हूँ. नाश्ता खुद नहीं
बनेगा!”
एक्सरसाइज ख़तम करने के बाद, अम्मी बाथरूम गयीं अपना ग़ुस्ल के लिए. करीब बीस मिनट बाद वह बहार निकलीं,
ताज़गी भरी और सुकून से, जिल्द चमकती हुई ठन्डे पानी से.
उन्होंने अपने रोज़ाना घर के कपडे बदल लिए थे: आरामदेह ढीली ब्लू जीन्स जो एक pur-parda लम्बी हरी टॉप के
साथ पहनी हुई थी जो कमर के नीचे तक पहुँचती थी, और एक चमकीला पीला दुपट्टा सर और कन्धों पर शराफत
से ओढ़ा हुआ था, चेहरे को नरम फ्रेम देता हुआ. सादा लिबास था, लेकिन उन पर बिलकुल आसान और इज़्ज़तदार लगता था.
अम्मी ने अपनी साफ़ सफ़ेद मुस्लिन जा-,,., बिछाई हुई थी. वह सुबह की नफिल नमाज़ में मसरूफ थीं, उनका
पोस्चर सीधा और सकूं भरा.
जैसे hi वह रकअतें ख़तम करके पीछे बैठीं, उन्होंने हाथ ऊपर उठाये, हथेलियां आसमान की तरफ खुली हुई.
होंठ धीमे से हिल रहे थे, आँखें बंद तसव्वुर में.
मैं जानता था, बिना सुने भी, की वह हमारे लिए दुआ कर रही थीं – अब्बू की दूकान पर हिफाज़त के लिए, मेरी पढाई
में कामयाबी के लिए, हमारे घर की सेहत और मज़बूत ईमान के लिए. यह एक खामोश, गहरा पल था जो मुझे
शुक्र से भर देता था; अम्मी की दुआएं एक सिपर की तरह थीं, हमें हर रोज़ मेहफ़ूज़ रखती थीं.
वह रसोई में गयीं और नाश्ता तैयार करना शुरू किया. अम्मी मुझे और अब्बू के लिए नाश्ता बनती थीं. लेकिन
अब्बू बाजार में म्हणत कर रहे होते थे, तो अम्मी ख़तम करने के बाद खुद नाश्ता ले जाती थीं या मुझे
भेजती थीं.
अम्मी का नाश्ता इतना मीठा होता था, बिलकुल उनकी तरह.
घर में उस सुबह हलकी सी गुदगुदी थी क्यूंकि Eid-ul-Fitr सिर्फ तीन दिन दूर थी. जो न जाने, उनके लिए बता दूँ,
Eid-ul-Fitr रोज़ा ख़त्म होने का तेहवार है, रमजान के ख़तम होने की निशानी – एक महीना गहरे रूहानी
अनुशासन का, सुबह से शाम तक रोज़ा, ज़्यादा नमाज़ और खैरात.
हमारे घर में ईद हमेशा ख़ुशी का सबब होती थी. गरीबी के दिनों में भी अब्बू नए कपडे के लिए पैसे
जमा करते, अम्मी रेसिपी परफेक्ट करने में दिन गुज़ारती थीं, और मैं दोस्तों के साथ दौड़ता था, हवा में
एक्ससिटेमेंट की करंट दौड़ती हुई.
उस दोपहर, जब अम्मी और मैं ईद के दावतों के लिए मसाले और सामान सॉर्ट कर रहे थे, दरवाज़े पर हलकी
सी दस्तक हुई.
यह आंटी नफीसा थी, हमारी खुश मिज़ाज पड़ोसन. नफीसा लेट थिरतिएस में शादी शुदा औरत थी, गोल चेहरा,
तेज़ हंसी, और बात को लिवली गॉसिप बनाने की आदत. उनकी शादी एक शांत सरकारी क्लर्क से हुई थी, और उनका एक
बीटा जाबिर था जो मेरी उम्र का और मेरा सबसे क़रीबी दोस्त.
नफीसा अक्सर बिना बताये आ जाती थीं, ख़ुसूसन तेहवार की तैयारियों में, अपनी एनर्जी और बाजार से लायी
हुई थैली के साथ.
“अस्सलामु अलैकुम, शाहिदा!” नफीसा ने पुकारा, अंदर आते हुए गरम झप्पी के साथ, दुपट्टा हल्का सा टेढ़ा
हुआ चलने से.
“व अलैकुम अस्सलाम, नफीसा! बिलकुल सही वक़्त – आओ बैठो. मैं ईद का मेनू प्लान कर रही हूँ. चाय?”
“बिलकुल! तुम्हारी चाय को कैसे इंकार करूँ?” नफीसा दीवान पर बैठ गयीं, हाथ से पंखा करती हुई. “यह गर्मी
और कुछ है, सही? लेकिन ईद आ रही है – सब अच्छा लगता है.”
अम्मी ने सर हिलाया, गरम चाय कप्स में डालती हुई. “हाँ, शुक्रिया. बच्चे इतने एक्ससिटेड हैं. तुम्हारी क्या?
कपडे तैयार?”
नफीसा ने चाय पि, आँखें चमकती हुई शरारत से. “कपडे? ओह, इसके बारे में...” उन्होंने अपनी कपडे की
थैली से एक फोल्डेड फैब्रिक निकला, पिंक वाला, ड्रामा से खोलते हुए. यह चमकीला पिंक ड्रेस था – पूरी आस्तीन,
फिटेड बोडीके और हेम जो सिर्फ जांघ के बीच तक पहुँचता.
“Ta-da! क्या ख़याल है? ईद के लिए, शायद?”
अम्मी की आँखें चौड़ी हो गयीं, फिर वह ज़ोर से हंसी, मुँह धक् कर. “नफीसा! यह क्या है? लगता है
बॉलीवुड फिल्म से! मज़ाक कर रही हो न? यह ड्रेस तो ठीक से धक् भी नहीं पायेगा.”
नफीसा मुस्कुरायी, ड्रेस को अम्मी के सामने मज़ाक से लगा कर. “चलो शाहिदा, तरय करो! सोचो – ईद की सुबह
इसमें. हुसैन भाई का मुँह खुल जाएगा! तुम फिर से नयी दुल्हन लगोगी.” अम्मी ने सिर्फ क्यूरोसिटी से पिंक ड्रेस
जल्दी पहन लिया.
अम्मी ने दोस्त के बाज़ू पर हलके से मारा, अभी भी हंस कर. “बिलकुल नहीं! सोचो मैं इसमें बहार निकलूं?
पूरा मोहल्ला महीने भर बात करेगा. नहीं नहीं – मज़ाक अलग, बिलकुल नहीं पहनेंगे ऐसा. यह बिलकुल पर्दा
नहीं है.”
“बिलकुल,” नफीसा मानी, ड्रेस को वापस मोड़ कर लेकिन एक और हंसी के साथ. “मैं सिर्फ तैसे कर रही थी. लेकिन
सीरियसली, शर्म की बात है उन औरतों पर जो ऐसे कपड़ों में घूमती हैं – छोटी स्कर्ट्स, नंगे बाज़ू,
ग़लत नज़रों को दावत देती हुई. वह अपनी इज़्ज़त, अपने उसूल भूल जाती हैं. जैसे खुद मुसीबत को बुला रही हों.”
अम्मी ने सर हिलाया गहरे अंदाज़ से. “सही कह रही हो. हमारे ज़माने में हमें ढकना और हिफाज़त सिखाया
गया था. यह मॉडर्न लडकियां... उन्हें हिदायत मिले. लेकिन बताओ नफीसा, यह कहाँ से लायी? लोकल बाजार से
तो नहीं न?”
नफीसा झुक कर, आवाज़ धीमी कर के जैसे राज़ बता रही हों. “ऑनलाइन शॉपिंग, मेरी जान! मेरी भतीजी ने किसी
वेबसाइट से आर्डर किया, सोचा था लम्बा होगा. पहुंचा तो वह घबरा गयी और मुझे डिस्पोसे करने को दिया.
मैंने हसी के लिए रख लिया.”
अम्मी ने भुँह चढ़ाई. “ऑनलाइन? इसमें होशयार रहो. लेकिन अगर रखना है तो घर में hi पहनना –
शायद अपने शौहर को सरप्राइज दो एक शाम. रोमांस ज़िंदा रखो, लेकिन बंद दरवाज़ों के पीछे!”
दोनों हंसी में डूब गयीं, वह हंसी जो सालों की दोस्ती से आती है, चाय पीते हुए और सेफ टॉपिक्स पर जाती
हुई जैसे ईद के मेहँदी दसिग्नस.
तभी फ्रंट दूर ज़ोर से खुला, और जाबिर और मैं सांस फुलाये अंदर आये, गली में क्रिकेट खेल कर.
जाबिर और मैं बचपन से जुड़ा न होने वाले थे – एक कॉलेज, वीडियो गेम्स और स्ट्रीट फ़ूड का शौक.
वह लम्बा
था शरारती मुस्कराहट वाला, हमेशा एडवेंचर के लिए तैयार. मैं अपनी आरामदेह हरी शर्ट में था,
थोड़ा पसीने से भीगा, जबकि जाबिर की चमकीला नीला शर्ट उनकी एनर्जी से मैच करती थी.
“अस्सलामु अलैकुम, सब लोग!” मैंने ज़ोर से कहा, दांत दिखाते हुए.
“व अलैकुम अस्सलाम!” अम्मी और नफीसा ने एक साथ जवाब दिया, अम्मी का चेहरा हमें देख कर चमक उठा.
जाबिर अपनी माँ के पास बैठ गया.
“अम्मी, तुम नहीं मानोगी – इस साल ईद एपिक होगी! हम सब लाड्स पार्टी प्लान कर रहे हैं – सुबह क्रिकेट
टूर्नामेंट, रात फिरवर्क्स, और रूफटॉप दावत!”
मैं बीच में कूद पड़ा, एक्ससिटेमेंट उबलते हुए. “हाँ! और हर चाचा से ऐड़ी कलेक्ट करेंगे. सोचो
बिरयानी, कबब्स – non-stop मज़ा!”
अम्मी ने हाथ उठाया, मुस्कुराती लेकिन सख्त. “रुको ज़रा, दोनों. ईद सिर्फ पार्टीज के लिए नहीं – शुक्र, घर
वक़्त, खैरात.
तुम मज़ा कर सकते हो, लेकिन नमाज़ और मेहमानों की मदद न भूलना.”
नफीसा ने सर हिलाया, जाबिर के घुटने पर थपकी दी. “बिलकुल. ठन्डे रहो, लाड्स. पिछले साल तुमने रूफटॉप को
आग लगा दी थी फिरवर्क्स से. सेफ रहो, ठीक? मज़ा करो लेकिन ज़िम्मेदारी से.”
हम थोड़ा धीमे हुए, लेकिन बातें जारी रहीं. “नए कपडे क्या?” मैंने पुछा. “अब्बू ने मुझे क्रीम
कुरता वडा किया – मस्जिद के लिए परफेक्ट.”
जाबिर चमका. “मेरा नेवी ब्लू. हम शार्प लगेंगे! और गेम्स? इफ्तार के बाद प्लेस्टेशन टूर्नामेंट – नहीं
रुको, ईद में रोज़ा नहीं!”
अम्मी हंसी. “देखो? आलरेडी प्लानिंग. लेकिन हाँ, घर पहले. नफीसा, याद है पिछले ईद जब बच्चों ने
टैलेंट शो किया? जाबिर के मैजिक ट्रिक्स मज़ेदार थे.”
नफीसा हंसी. “ओह हाँ! और तुम्हारी गायकी, शाहिदा – वह गीत सबकी आँखों में आंसू लाये. इस साल
कुछ ऐसा hi करेंगे.”
हम और बातें की – पसंदीदा ईद मिठाइयों पर (मैं गुलाब जामुन के तरफ, जाबिर जलेबी), कौन से
कौसिन्स आ रहे, बकरों के क़ीमत बढ़ने पर भी. यह आसान, बहती बातें थीं जो घर को और गरम
बनती थीं.
लेकिन आखिरकार, अम्मी और नफीसा गॉसिप मोड में चली गयीं. “सुना मरस. खान की बेटी के बारे में?”
नफीसा धीमे से.
“कराची के लड़के से मांगनी – वह पैसेवाला है, लेकिन अफवाह है की ज़्यादा दीनदार नहीं.”
अम्मी झुक कर. “सच? और मटन के दाम? आसमान छू रहे! और मर. अली की जॉब ट्रांसफर – बेचारे
घर, फिर शिफ्ट.”
जाबिर और मैंने अननोएड नज़रें मिलायीं. उनकी “स्टुपिड गॉसिपिंग,” जैसे हम कहते थे, कभी ख़तम
नहीं होती – पड़ोसियों की ज़िन्दगी पर be-maqsad बातें जो हमसे कोई लेना देना नहीं. हम पेअर हिलाते
रहे टेबुल के नीचे.
आखिरकार अम्मी ने नोटिस किया और कड़ी हुई. “बस बैठने का. लाड्स, बुचेरी जाओ और दो किलो ताज़ा चिकन
ले आओ. रात के लिए करी बनानी है, और ईद प्रेप से मैं नहीं जा सकती.”
मैं मज़ाक से करहा. “ॉव, अम्मी, अभी?”
नफीसा मुस्कुरायी. “मैं यहां मदद करुँगी, शाहिदा. चिंता मत – इरविंग और चोप्पिंग साथ करेंगे.”
अम्मी ने आह भरी, पीले दुपट्टे से हाथ गुज़ारते हुए. “नफीसा, बोहोत काम है – कपडे प्रेस करने,
सामान सॉर्ट, मीठे भिगोने. लगता है डूब रही हूँ!”
मैं खड़ा हुआ और उनके कंधे पर यक़ीन दिलाने वाला हाथ रखा. “अम्मी, शांत. सब ठीक होगा. जाबिर
और मैं चिकन जल्दी ले आएंगे, वापस आकर और मदद करेंगे.”
वह शुक्र से मुस्कुरायी, मुझे जल्दी झप्पी दी. “मेरा सोचने वाला बीटा. ठीक, लेकिन सुनो – सिर्फ बाबा
रहमान की बुचेरी से, पुराणी मस्जिद के पास वाली. वह हमेशा साफ़ हलाल काट देते हैं, कोई गड़बड़ नहीं.
उस नयी जगह मत जाना गली के नीचे; उनके सोर्स पर भरोसा नहीं. और पेपर बैग ले जाना कैर्री के लिए –
प्लास्टिक में मत लपेटवाना.”
“समझ गया, अम्मी – बाबा रहमान, ताज़ा चिकन, पेपर बैग. हम जल्दी वापस.”
जैसे hi जाबिर और मैं दोपहर की गरम धुप में निकले, सड़कें pre-Eid की हरकत से भरी – दूकानदार
रंग बिरंगी चूड़ियां बेच रहे, बच्चे एक दुसरे का पीछा करते – बात हमारे प्लान्स पर आयी.
“इस ईद, कुछ अलग करते हैं,” मैंने कहा. “सिर्फ क्रिकेट नहीं, मोहल्ले में त्रैझ हंट.”
जाबिर एक्ससिटेड से सर हिलाया. “हाँ! या मूवी मैराथन – एक्शन फिल्म्स रात भर. और खाना – किचन से एक्स्ट्रा
शेयर खुरमा चुरा लेंगे.”
मैं हंस पड़ा. “डील. ओह, यह ले – पेपर बैग संभाल. मेरे हाथ भरे हैं... यह, कुछ नहीं से, लेकिन
फिर भी.”
उसने लिया, आँखें घुमा कर. “ठीक. हे, कल रात नमाज़ पढ़ी?”
मैं सर खुजाया शर्म से. “नाह... गटा खेलते देर हो गयी. मिशंस में खो गया, जानते हो? ओवरस्लिट भी.”
जाबिर ने बाज़ू पर हल्का मुक्का मारा. “यार, तुम और तुम्हारे बहाने! गटा कूल है, लेकिन नमाज़ पहले.
चलो, ईद नया शुरू – वडा करो कोशिश करोगे?”
“ठीक, ठीक. नए शुरू की बात, देखो तुम्हारे घर के बगल वाला घर – हमेशा खाली. अगर हम
मॉम्स को कन्विंस कर लें रेंट के लिए? उससे हमारा हैंगऑउट बना देंगे – वीडियो गेम्स, स्नैक्स, कोई
एडल्ट डिस्टर्ब नहीं. हर तरह की चीज़ें कर सकते हैं, जैसे फोर्ट बनाना या सीक्रेट पार्टीज.”
जाबिर की आँखें चमकी पल भर. “जीनियस आईडिया! सोचो – हमारा अपना स्पेस. रात भर जग सकते, अंदर
क्रिकेट भी खेल सकते.”
“लेकिन रुको,” उसने चेहरा उतार कर. “हमारे पेरेंट्स अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते. इस इलाक़े में रेंट ऊंचा है,
अब्बू की दूकान बेसिक कवर करती है. तुम्हारा घर भी – सपना है, लेकिन हक़ीक़त नहीं.”
मैं चेहरा टेढ़ा किया. “हाँ सही. लेकिन शायद ऐड़ी जमा कर लें. रुको, तुम इतने डाउन क्यों लग रहे हो?
घर के साथ कुछ है?”
जाबिर रुक गया, फिर बताया. “एक्चुअली... कल किसी ने रेंट कर लिया. एक रुग्गड़ दीखता मर्द – बड़ा आदमी, रफ़.
लैंडलॉर्ड से बात कर रहा था बहार.”
मैं रुक गया, गुस्सा उभरा. “क्या? कब? कहाँ एक्साक्ट्ली? सब बताओ!”
“दोपहर देर, असर के बाद. मैं चाट पर पतंग उदा रहा था, उन्हें हैंडशेक करते देखा गेट पर. आदमी
ने कॅश दिया, मोटा बंडल. अब मूव इन कर रहा है.”
“लेकिन अकेला रहता है?” मैंने पुछा, दिमाग़ दौड़ता हुआ. “कोई फॅमिली नहीं? इतने बड़े घर के लिए अजीब.”
“हाँ, अकेला. कोई बीवी बच्चे नहीं देखे. सिर्फ वह और कुछ बैग्स.”
“इतना महंगा घर अकेला कैसे अफ़्फोर्ड? काम से काम 20,000 महीना. उसका क्या डील? जॉब? बैकग्राउंड?”
जाबिर ने कंधे ुचाके. “पता नहीं. लेकिन हमेशा टूथपिक मुँह में, चबाता रहता जैसे सोच रहा
हो. शादी लगता है.”
हम चलते हुए बातें करते रहे, टॉपिक खींचता गया. “वह सेक्रेटिवे भी है,” जाबिर जारी. “लैंडलॉर्ड से
ज़्यादा बात नहीं, सिर्फ सर हिलाया और पैसे दिए. कपडे पुराने, जैसे शक्ल की परवाह नहीं. और चेहरा – गाल
पर दाग, शायद? लगता है क्रिमिनल, एक्शन मूवीज वाला – खतरनाक विबे, जैसे कभी भी टूट पड़ेगा.”
“व्हो, धीमे,” मैंने कहा, रिज़नेबल बनने की कोशिश. “हमारे उसूल जज करने नहीं देते. शायद
वह bad-qismat है, या मज़दूर पैसे जमा कर रहा. उसकी कहानी नहीं जानते. हमें सिखाया गया है
दूसरों के बारे में अच्छा सोचना.”
जाबिर ने सर हिलाया ज़िद से. “छोड़ यार. जैसे उसने इधर उधर देखा, जैसे देखता है कोई देख रहा है –
सस्पीशियस. और हमारे मोहल्ले में? अगर वह इललीगल में हो? ड्रग्स, चोरी? हमें केयरफुल रहना चाहिए.
अम्मी दिन भर अकेली; अगर ट्रबल किया तो?”
मैं आह भरी, उसका पॉइंट समझ कर लेकिन नेगेटिविटी पर नहीं रुकना चाहता. “ठीक, होशयार रहना सही है.
लेकिन जल्दी कन्क्लूसिओंस मत कूदो. वैसे भी, टॉपिक बदलो – ईद प्लान्स? और घर और मिलेगा, सस्ता वाला.”
जाबिर गुस्सा करता रहा लेकिन आखिर शांत. जैसे hi हम मुड़े, वह रुक गया, दूर बगल के खाली घर की तरफ
देखता – अब इतना खाली नहीं.
“क्यों ऐसे घूर रहे हो?” मैंने पुछा, उसकी नज़र फॉलो कर.
“देखो – वह है,” जाबिर धीमे से, इशारे से दिखाते हुए.
आदमी घर के बहार खड़ा था, दीवार से तकिया लगाए. फेडेड जीन्स पहने हुए जो कमर पर नीचे लटकी
हुई, सादा नीला पोलो शर्ट उसके चौड़े मज़बूत जिस्म पर खींची हुई, और सिगरेट पी रहा था, धुंआ
धीरे से हवा में घूमता हुआ.
उसकी जिल्द काली, एबोनी जैसी, चेहरा रुग्गड़ – मज़बूत जबड़ा, तीखी आँखें सड़क स्कैन करती हुई. टूथपिक
मुँह के कोने से लटका हुआ, जैसे जाबिर ने कहा था.
“देखा? वही है,” जाबिर धीमे से. “हमारा सपनों का घर ले गया. कौन समझता है खुद को?”
मुझे भी गुस्सा आया – घर जो हमने सपने में देखा, इस अजनबी को. “हाँ इर्रिटेटिंग. लेकिन क्या कर सकते
हैं?”
आदमी ने सिगरेट ज़मीन पर फेंका, पेअर से बुझाया, फिर इधर उधर देखा – बाएं, दाएं, पीछे भी
– जैसे यक़ीन कर रहा हो कोई नहीं देख रहा. मुतमईन होकर दरवाज़ा खोला और अंदर चला गया, ज़ोर से
बंद करते हुए जो सड़क पर गूंजा.
हमने उस वक़्त ज़्यादा न सोचा, सिर्फ नज़रें मिलायीं. “लोगों को उनके काम से काम,” मैंने जाबिर से कहा.
“हमारा मसला नहीं.”
लेकिन जाबिर सच में गुस्से में था, मुट्ठियाँ बंधी हुई. “तुम्हारे लिए आसान कहना. वह मेरे घर के
बिलकुल बगल! अगर ट्रबल हो तो? हम उस जगह ले सकते थे!”
“रिलैक्स यार,” मैंने जवाब दिया. “और ओप्तिओंस हैं – तुम्हारे घर या मेरे में खेल सकते हैं. रूफटॉप
हमेशा फ्री गेम्स के लिए. पूरे घर की ज़रुरत नहीं.”
वह गुस्सा करता रहा लेकिन आखिर ठंडा. फिर भी, चलते हुए मैं खुद से पूछने लगा की जाबिर इस शख्स पर
इतना परेशां क्यों है.
अब यह बात मुझे अंदर से कुरेद रही थी. हम बुचेरी की तरफ बढे, लेकिन मेरा दिमाग़ उस अजनबी पर अटक
गया. कौन था वह? क्यों अकेला इतने बड़े घर में? और वह नज़रें इधर उधर – जैसे कुछ छुपा रहा
हो. शायद जाबिर सही कह रहा था, हमें होशयार रहना चाहिए. लेकिन फिर याद आया अम्मी का सबक़ –
दूसरों के बारे में अच्छा सोचो, जज मत करो. यह कनफ्लिक्ट मुझे परेशां कर रहा था.
रस्ते में हमने बातें बदल ली, ईद के मज़े पर. “यार, इस बार ऐड़ी से नयी गेम खरीदेंगे,” मैंने
कहा, मूड हल्का करने की कोशिश. “गटा का नया वर्शन, मल्टीप्लयेर में हम दोनों टीम बनाएंगे.”
जाबिर हंस पड़ा, गुस्सा ढीला. “हाँ, और रूफटॉप पर टूर्नामेंट. सब दोस्त आएंगे, रात भर मज़ा.”
बुचेरी पहुँच कर हमने चिकन लिया, अम्मी की हिदायत के मुताबिक़. वापस जाते हुए, मैंने जाबिर से
पुछा, “उस आदमी के बारे में ज़्यादा मत सोच. शायद वह नार्मल है, बस नए मोहल्ले में एडजस्ट
कर रहा.”
उसने सर हिलाया लेकिन मुतमईन नहीं लगता था. “शायद. लेकिन अगर कुछ ग़लत हुआ तो, मैं बताऊंगा.”
घर पहुँच कर, अम्मी और नफीसा अभी भी बातें कर रही थीं, अब स्वीट्स की रेसिपीज पर. हमने चिकन
दिया, और अम्मी ने शाबाशी दी. “अच्छे लाड्स, जल्दी आ गए. अब मदद करो – वेजटेबल्स चोप करो ईद के
लिए.”
हमने हाँ कहा, और काम शुरू किया. लेकिन मेरा दिमाग़ उस नए पडोसी पर था. शायद यह सिर्फ
शुरुआत थी कुछ नयी कहानी की.
दोपहर गुज़री, और शाम होने लगी. अब्बू दूकान से वापस आये, थके हुए लेकिन मुस्कुराते. “क्या हाल है
घर के?” उन्होंने पुछा, अम्मी को गले लगते हुए.
अम्मी ने चाय दी, और बातें शुरू – ईद प्लान्स, बाजार की खबरें. मैं और जाबिर बहार गए, गली में
बैठ कर बातें की. “देख, वह घर की लाइट ों है,” जाबिर ने धीमे से कहा.
मैं ने देखा, अंदर हलकी रौशनी. “छोड़ न. हम अपने मज़े करेंगे.”
लेकिन अंदर से, क्यूरोसिटी बढ़ रही थी. क्यों वह इतना मिस्टीरियस था? और हमारी ज़िन्दगी में यह नयी एंट्री
का क्या मतलब?
रात के खाने पर, अम्मी ने करी बनाया, गरम गरम रोटी के साथ. “बीटा, बताओ दिन कैसा गुज़रा?”
अम्मी ने पुछा.
मैंने सब बताया, लेकिन नए पडोसी का ज़िक्र नहीं किया. अब्बू ने कहा, “हमेशा होशयार रहो, लेकिन दूसरों
की मदद करो. यह हमारे उसूल हैं.”
उस रात, बिस्तर पर लेट कर, मैं सोचता रहा. ज़िन्दगी में छोटी चीज़ें कैसे बड़ी हो जाती हैं. ईद आ रही
थी, ख़ुशी का वक़्त, लेकिन यह नयी चीज़ – शायद कुछ बदल देगी.
सुबह फिर से, अम्मी की एक्सरसाइज रूटीन, नमाज़, नाश्ता. रूटीन में सुकून था, लेकिन अब एक नया सवाल.
जाबिर से मिल कर, हमने डीडे किया ऑब्सेर्वे करेंगे, बिना जज किये.
दिन गुज़रते गए, ईद क़रीब आती गयी. हमने डोरशंस की, लाइट्स लगायी, स्वीट्स बनाये. अम्मी और नफीसा
ने मिल कर कपडे प्रेस किये, हिना लगायी.
एक दिन, बाजार जाते हुए, हमने उस आदमी को देखा – सिगरेट पीटा हुआ, इधर उधर देखता. जाबिर ने कहा,
“देख, फिर वही.”
मैं ने इग्नोर किया, लेकिन अंदर से परेशां. क्यों वह हमेशा अलर्ट? शायद वह सिक्योरिटी अफसर से भाग रहा हो,
या कुछ और.
लेकिन अम्मी के सबक़ याद आये – सब्र रखो, ,.' पर भरोसा.
ईद की रात, चाँद देखा, ख़ुशी से भरा. सुबह, नए कपडे पहने, मस्जिद गए. अब्बू ने दुआ की, अम्मी ने
शुक्र ऐडा किया.
दावत में, सब मिले, हंसी मज़ा. लेकिन जाबिर ने धीमे से कहा, “वह आदमी नहीं आया दावत में. अजीब.”
मैं हंस पड़ा, “छोड़, एन्जॉय कर.”
लेकिन कहानी यहीं ख़तम नहीं थी. यह सिर्फ शुरुआत थी.