Meri Pakiza Ammijaan Ka Bhrashtikaran - SexBaba
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Meri Pakiza Ammijaan Ka Bhrashtikaran

hotaks

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Dec 5, 2013
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CHAPTER 1

मेरी माँ की शांत ज़िन्दगी

मैं ने हमेशा अपनी अम्मी, शाहिदा इक़बाल को परफेक्ट माँ के रूप में जाना है, मेरी शर्मीली

अम्मी, वह औरत जिस की तरफ हमारे मोहल्ले की हर माँ अपनी बेटियों को इश्क़ सिखाते हुए इशारा

करती है की एक अच्छी बीवी कैसी होनी चाहिए.

बालिस साल की उम्र में भी वह इतनी शांत इज़्ज़त से चलती हैं की जब वह गुज़र जाती हैं तो लोग

अपनी आवाज़ें धीमी कर लेते हैं.

उनका नाम, शाहिदा इक़बाल, बिलकुल उन पर सूट करता है: ज़िंदा दिल मगर पाकीज़ा.

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CHAPTER 2

मेरी माँ - एक परफेक्ट माँ और पत्नी का प्रतिबिम्ब

मेरा नाम ज़ैद है. मेरी अम्मी, शाहिदा इक़बाल, एक ऐसी औरत हैं जिनकी ज़िन्दगी ईमान की पाबन्दी, बेइंतेहा

सब्र और पाक मोहब्बत की मिसाल है. अब उनकी उम्र चालीस साल से कुछ ज़्यादा हो चुकी है, लेकिन वह

आज भी वही सिफ़ात रखती हैं जो मेरे दिल में फख्र का एहसास जगती हैं – वफ़ा, तवाज़ो, मेहेरबानी,

पर्दा और sidq-e-dil से भरा हुआ नेक इन्साफ का जज़्बा.

जब से मुझे होश संभाला है, अम्मी को मैंने हमेशा नमाज़ में पाया है. Subah-subah, जब

सूरज पूरी तरह उभरता भी नहीं होता, मैं उनकी जानमाज़ खुलने की हलकी सी आवाज़ सुनता था. उनके

नरम क़दमों की आवाज़ आती थी जब वह अपने मुक़र्ररा जगह की तरफ जाती थीं. उनकी आवाज़, जब वह दुआ

मांगती थीं, कितनी प्यारी और पुख्ता होती थी – लफ्ज़ नर्मियों से बहते हुए, मगर सच्ची इल्तिजा का बोझ लिए

हुए.

वह हमारी सेहत के लिए दुआ करती थीं, हमारी khair-o-afiyat के लिए, हमारी हिदायत के लिए ताकि हम

सीधे रास्ते पर क़ाइम रहें. उनकी नमाज़ सिर्फ एक रसम नहीं थी – वह तो अपने ख़ालिक़ से सीढ़ी बातचीत

थी, उम्मीद, शुक्र और मोहब्बत से भरी हुई.

मुझे याद है कैसे वह चुपके से बैठ जाती थीं, हाथ उठाये हुए, आँखें बंद, होंठ धीमे से

हिलते हुए. उनकी इबादत इतनी दिल से होती थी की लगता था उनका ईमान हवा में लहराया कर रहा हो. उनके लफ्ज़

हमेशा अदब से भरे होते थे, लहजा हुरमत से लबाज़. जब वह बरकत मांगती थीं तो आवाज़ में एक

नरमी भरी जल्दी होती थी, जैसे पूरा यक़ीन हो की उनकी दुआ आसमानों तक पहुंचेगी और क़ुबूल होगी.

उनको देख कर मैंने सीखा की नमाज़ सिर्फ माँगना नहीं होती – वह तो सर झुका देना है, ,.' की हिकमत

पर भरोसा करना है.

घर के अंदर अम्मी का लिबास उनकी सादगी और परदे को ज़ाहिर करता था. उन्हें आरामदेह, ढीले पाजामे और

सादा सफ़ेद दुपट्टा पसंद था जो वह अपने सर पर शराफत से ओढ़ लेती थीं. उनका कपडा बिलकुल सदा था,

लेकिन उनकी शख्सियत इतनी रोशन थी की कोई भी उनकी तरफ खींचता चला जाता था.

बाहरले में वह और ज़्यादा परदे में रहती थीं – लम्बी स्कर्ट, pur-parda कुर्ती, और वही सफ़ेद दुपट्टा जो

हमेशा saaf-suthra और शरीफाना तर्ज़ से लपेटा होता था. उनका पर्दा सिर्फ कपड़ों में नहीं था, बल्कि

उनके अंदाज़ में था – वह कभी ध्यान खींचना नहीं चाहती थीं, न तारीफ की तलबगार थी.

लिबास से हैट कर, अम्मी एक ुस्तानी थी – न सिर्फ तालीम की, बल्कि इख़लाक़ की. उनका maan'na था की अच्छे इख़लाक़

और किरदार hi असली ईमान की अलामत हैं. वह baar-baar मुझे सिखाती थीं की नरमी से बात करो, सच्चाई से

काम लो, हर शख्स का एहतराम करो.

मुझे याद है जब मैं छोटा था और कभी be-sabri या be-adabi दिखा देता था, वह धीरे से मुझे

समझाती थीं, आवाज़ में सख्ती नहीं बल्कि प्यार भरा सख्त लहजा: “याद रखना बीटा, अच्छे इख़लाक़

मोमिन की ज़ीनत होते हैं.”

अम्मी का दिन chupke-chupke, म्हणत और सुकून से भरा होता था. वह सुबह जल्दी उठ जाती थीं और घर

के काम शुरू कर देती थीं, इतनी नरमी और लिहाज़ से की सारा घर अमन से भर जाता था. झाड़ू लगते वक़्त

उनके हाथ कितने धीमे लेकिन तेज़ी से चलते थे.

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कपडे धोते वक़्त वह धीमी आवाज़ में कोई लोरी या दुआ gun-gunati थीं, कपड़ों को प्यार से मोड़ती थीं.

रसोई उनका maqam-e-ibadat थी – वहाँ वह सादगी भरे मसाले और चीज़ों को इतने प्यार से बदलती थीं

की खाने बन जाते थे जो दिल को छू जाते थे.

मुझे याद है मैं कितनी बार रसोई में दौड़ता हुआ जाता था और be-sabri से पूछता था, “अम्मी, खाना

तैयार हुआ?” वह अपना सर घुमा कर मुस्कुराती थीं, चेहरे पर गर्माहट भरी मुस्कराहट, और मेरे बालों

को प्यार से सहलाती थीं. उनका हाथ कितना नरम होता था, मुस्कराहट कितनी मेहरबान, और आवाज़ कितनी प्यारी:

“बस थोड़ी देर और बीटा, सब्र करो.”

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वह chhoti-chhoti बातें, कितनी क़ीमती थी. उन पलों में मुझे लगता था दुनिया की साड़ी मोहब्बत मुझे मिल

रही है.

उनका खाना कुछ अलग hi था. सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि दिल भरने के लिए. घर में खुशबू फ़ैल जाती

थी – तीखी, मीठी, दावत देती हुई.

हर दावत में उनकी मोहब्बत और सब्र का namak-mirch होता था.

Chaawal-daali हो या कोई बड़ा सालन, हर निवाला उनकी लगन का सबूत होता था. जैसे हर चम्मच हिलाते हुए,

हर मसाला डालते हुए वह दुआ hi मांग रही होती थीं.

खाने के बाद जब हम टेबुल पर बैठते थे, वह हमारे सामने बैठ कर देखती थीं की हम मज़े ले रहे

हैं या नहीं. जब हम तारीफ करते थे तो उनका चेहरा ख़ुशी से चमक उठता था. उनकी हंसी – कितनी नरम, कितनी

गरम – घर में गूंजती थी और सारा घर घर लगता था.

और हाँ, कपडे धोना अक्सर उनका शनिवार का काम होता था. उस वक़्त मैं कभी नहीं चूकता था उनकी धीमी

gun-gunahat सुनने से. वह आवाज़ें इतनी मीठी होती थीं की दिल को सुकून देता था, भले hi मैं समझ न

पाटा था की वह कौनसा गीत gun-guna रही हैं.

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दिन के सुकून भरे पलों में, मैं अक्सर अब्बू को देखता था जब वह अम्मी के पास जाते थे जब वह नमाज़

में होती थीं. वह चुपके से आते, कभी पीछे से, और धीरे से उनकी कमर में बाहें दाल कर प्यार से

गले लगा लेते थे.

अम्मी सर उठती थीं, चेहरे पर हलकी सी मुस्कराहट, और सुकून भरी निगाहों से उनकी तरफ देखती थीं. वह पल

खामोश मोहब्बत के होते थे – ईमान और इश्क़ का हुस्न का मिलाप. उन पलों को देख कर मैंने सीखा की ईमान

और प्यार saath-saath चलते हैं, और आपस में एक दुसरे को मज़बूत करते हैं.

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अम्मी की लगन मेरे लिए हमेशा एक मिसाल रही है. घर के कामों के बीच भी वह ,.' से अपना रिश्ता कभी

नहीं टूटने देती थीं. उनकी नमाज़ उनकी ताक़त थी, उनका पनाहगाह, उनका शुक्र ऐडा करने का तरीक़ा. उनको देखते

हुए मैंने समझा की ईमान सिर्फ जुबां का लफ्ज़ नहीं, बल्कि हर लम्हे का जीना है – दूसरों की खिदमत, सच्ची

इबादत, be-shart मोहब्बत.

उनकी ज़िन्दगी फ़र्ज़ और इबादत का एक खूबसूरत तवाज़ुन थी, मेहेरबानी और तवाज़ो का. उनके काम, उनका खाना, उनकी

मोहब्बत – हर चीज़ उनके गहरे ईमान और अपने घर वालों के लिए प्यार की अक्स थी. वह सिर्फ मेरी माँ नहीं, बल्कि

तक़वा, सब्र और मोहब्बत की ज़िंदा तस्वीर थी.

छोटी उम्र से hi मैं नेक और अदबदार लड़का बनने की कोशिश करता रहा हूँ. मेरे वालिदैन ने मुझे सच्चाई,

मेहेरबानी और दियानतदारी के मज़बूत उसूल सिखाये.

मैं कभी किसी के बारे में ग़लत नहीं सोचता था,

ख़ुसूसन अपनी अम्मी के बारे में. मसलन, मैंने कभी नहीं सोचा की अम्मी किसी दुसरे मर्द के साथ… या अब्बू

के साथ धोका करें.

मुझे पोर्न फिल्मों के बारे में भी कभी ख़याल नहीं आया क्यूंकि मेरा पला हुआ माहौल ऐसा बिलकुल नहीं था.

अम्मी एक नरम दिल और मेहरबान औरत हैं, मैं हमेशा उनकी गर्माहट और मेहेरबानी की िज़ात करता रहा हूँ.

वह हर शख्स से दोस्ती से पेश आती हैं लेकिन मर्दों के साथ हमेशा होश्यारी से. उन्हें पता है की हद्द बन्दियाँ

रखना कितना ज़रूरी है.

वह कभी अजनबियों के साथ ज़्यादा खुल कर या ज़्यादा दोस्ताना नहीं होती थीं – यह मैंने

सीखा की यह उनकी ताक़त और दानाई की निशानी है.

बचपन में मेरा ध्यान सिर्फ इताअत और अपने घर की क़ीमत समझने पर था. मैंने सीखा की असली ताक़त तवाज़ो,

सब्र और अपने और दूसरों के लिए एहतराम में है. अब्बू की म्हणत और अम्मी की हद्द बंदियों ने मुझे ज़िन्दगी के

उसूल दिए.

मैं हमेशा अच्छा बीटा बनने की कोशिश करता रहा – वालिदैन की इज़्ज़त, बुज़ुर्गों का अदब, हर शख्स

के साथ इन्साफ और मेहेरबानी.

आज जब पीछे मुद कर देखता हूँ तो शुक्रगुज़ार हूँ की वालिदैन से इतने क़ीमती सबक़ मिले. उनकी मिसाल ने

मुझे ज़िम्मेदारी और दियानतदारी का एहसास दिया.

मैं हमेशा उन उसूलों पर चलने की कोशिश करता हूँ

क्यूंकि अच्छा इंसान होना hi ज़िन्दगी की सबसे बड़ी कामयाबी है. इज़्ज़त, सच्चाई और मेहेरबानी – यह वह सिफ़ात

हैं जो मैं सबसे ज़्यादा क़ीमती समझता हूँ और फख्र से आगे ले जा रहा हूँ.

अम्मी की शादी बीस साल की उम्र में हुई थी – एक खूबसूरत और सादगी भरी शादी. वह ख़ुशी का मौका था,

पूरा घर रिश्तेदारों, हंसी और मोहब्बत से भर गया था. माली हालात सादे थे, लेकिन शादी दिल से दिल तक

पहुंची थी – नयी शुरुआत की अलामत.

उस दिन अम्मी की ख़ुशी और लिहाज़ ने सब पर गहरा असर छोड़ा था.

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फिर से याद आता है बचपन का वह दौर जब मैं अच्छा और अदबदार लड़का बनने की पूरी कोशिश करता था.

वालिदैन ने मुझे मज़बूत उसूल दिए – सच्चाई, मेहेरबानी, दियानतदारी. मैं कभी ग़लत खयालात नहीं

लाता था, ख़ुसूसन अम्मी के बारे में. कभी नहीं सोचा की अम्मी का किसी के साथ ग़लत रिश्ता हो या उनके

इख़लाक़ ख़राब हों.

वह एक नरम दिल और मेहरबान औरत हैं, मैं हमेशा उनकी गर्माहट की क़द्र करता रहा. वह हर किसी से दोस्ती

से मिलती हैं लेकिन मर्दों के साथ होशयार रहती हैं, हद्द बंदियों की अहमियत समझती हैं.

मेरे अब्बू, हुसैन, एक मेहनतकश इंसान हैं जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा हमारे घर की खैरियत के

लिए क़ुर्बान कर दिया. अब उनकी उम्र पचास साल है, लेकिन वह अब भी छोटी सी दूकान पर दिन भर म्हणत करते

हैं, अक्सर रात देर तक रुक कर सब कुछ ठीक करते हैं.

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लम्बी घंटों की म्हणत और जिस्मानी थकन के बावजूद उन्होंने कभी शिकायत नहीं की या सब्र नहीं खोया. उनकी

लगन ने मुझ पर गहरा असर छोड़ा. उनको हर रोज़ म्हणत करते देख कर मैंने सीखा की सब्र और ज़िम्मेदारी

क्या होती है. मैं हमेशा उनकी तरफ रोले मॉडल की तरह देखता था – समझता था की असली कामयाबी म्हणत और

सच्चाई से आती है.

बचपन में मैं अक्सर अम्मी के साथ बाजार जाता था. वह जगह कितनी rang-birangi और ज़िन्दगी से भरी होती

थी – दूकानदार अपनी चीज़ों के दाम चिल्लाते, ताज़ा सब्ज़ियों की खुशबू, रंगों का मेला. मुझे उनके साथ बैग

उठाने और चीज़ें चुनने में मज़ा आता था.

अम्मी से मैंने सीखा की सब्र कैसे करते हैं और लोगों से शराफत से कैसे पेश आते हैं. वह हमेशा

मुस्कुराते हुए पडोसियों और दुकानदारों को सलाम करती थीं.

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लेकिन साथ hi वह होशयार भी रहती थीं – अपनी जगह पर कड़ी रहना आता था उन्हें, और अपने बारे में ज़्यादा

बताना नहीं. वह मर्दों से जो वह भरोसा नहीं करती थीं, उनके साथ दूरी रखती थीं. उनका रवैया इज़्ज़त और

अदब की मिसाल था, और उन्होंने मुझे अमल से सिखाया की अपनी हिफाज़त कितनी ज़रूरी है जबकि मेहरबान और खुले

दिल के भी रहे.

बाजार के उन सफरों में मैंने तवाज़ो और हद्द बंदियों के क़ीमती सबक़ सीखे. अम्मी की होशयार दोस्ती ने

मुझे बताया की शख्सियत की हिफाज़त सबसे पहले है. वह कभी bad-mizaj या be-lagaaon नहीं होती थीं, लेकिन

अपनी सीमा कभी नहीं भूलती थीं.

मैं देखता था कैसे वह लोगों से मिलती थीं – मददगार, शरीफ, लेकिन हमेशा अपने aas-paas का ख़याल रखते

हुए. उनकी ताक़त और पर्दा मुझे इनसपिरे करता था ताकि मैं भी एक अदबदार और होशयार इंसान बन सकूं.

बड़ा होते हुए मैं और गहरी तरह समझ गया की दियानतदारी और दूसरों की सीमाओं की इज़्ज़त कितनी एहम है.

मैं कभी ग़लत तरीके से क्यूरियस नहीं रहा, न hi अम्मी या aas-paas की औरतों के बारे में ग़लत सोचा.

मुझे पता था की इज़्ज़त hi अच्छे किरदार की बुनियाद है. अब्बू की म्हणत और अम्मी की izzat-e-nafs ने मेरी ज़िन्दगी

के नज़रिये को शक्ल दी. उन्होंने सिखाया की कामयाबी सिर्फ पैसों में नहीं, बल्कि उन उसूलों में है जो तुम

निभाते हो और वह इज़्ज़त जो तुम दूसरों को देते हो.

बचपन में मेरा पूरा ध्यान इताअत और घर की अहमियत पर था. मैंने सीखा की असली क़ुव्वत तवाज़ो, सब्र और

अपने और दूसरों के लिए एहतराम में छुपी है.

अब्बू की म्हणत और अम्मी की हद्द बंदियों ने मुझे ज़िन्दगी के रहनुमा उसूल दिए. मैं हमेशा अच्छा बीटा

बनने की कोशिश करता रहा – maa-baap की इज़्ज़त, बुज़ुर्गों का अदब, हर इंसान के साथ मेहेरबानी और इन्साफ.

आज पीछे मुद कर देखता हूँ तो दिल शुक्र से भर जाता है. वालिदैन की मिसाल ने मुझे ज़िम्मेदारी और

सच्चाई का जज़्बा दिया. मैं हमेशा उन उसूलों पर चलने की कोशिश करता हूँ क्यूंकि अच्छा इंसान होना hi

ज़िन्दगी का असली मक़सद है.

इज़्ज़त, सच्चाई और मेहेरबानी – यह वह ख़ज़ाने हैं जो मैं अपने दिल में संभल कर रखता हूँ और आगे

भी ले जाऊंगा.
 
दोस्तों, आपके कमैंट्स के लिए बहुत बहुत शुक्रिया. मुझे बहुत अच्छा लगेगा अगर आप अपने सुग्गेस्टियन्स भी देते हो.

अगला अपडेट बस कुछ hi घंटों में आ रहा है.
 
CHAPTER 3

ये आदमी कौन है जो हमारे बगल वाले घर में किराये पर

रहने आया है???

वह एक ऐसी ताज़गी भरी सुबह थी जहां हवा साफ़ और ताज़ा महसूस होती थी, पड़ोस के बगीचे से

चमेली की हलकी सी खुशबू उठ रही थी जो दूर से शहर के जागने की हलकी सी गूँज के साथ मिल रही थी.

मैं अपने बिस्तर में हिलोरा, पास की मस्जिद से मुइज़्ज़िन की नरम आवाज़ ने मुझे नींद से जगा दिया.

यह सुबह की नमाज़ का वक़्त था, लेकिन मैं फिर से चूक गया – यह बात मुझे हमेशा गिल्ट

महसूस कराती थी, ख़ुसूसन जब मैं जानता था की अम्मी कितनी पक्की इबादत गुज़ार हैं.

जब तक मैं पूरी तरह जाग गया, मेरे अब्बू – हुसैन इक़बाल – अपनी दूकान के लिए निकल चुके थे.

वह अनारकली बाजार में एक छोटी सी किताब की दूकान चलते थे, जहां धुल भरी अलमारियां

मज़हबी किताबों, उर्दू में बच्चों की कहानियों और उनकी पसंदीदा शायरी के मजमूओं से भरी

रहती थीं.

अब्बू वह शख्स नहीं थे जो दौलत के पीछे दौड़ते; उन्हें ईमानदार काम पर यक़ीन था, समाज को

इल्म देने में. मुझे याद है उन्होंने एक बार मुझसे कहा था, “बीटा, किताबें रूह की रौशनी होती हैं.”

मैं उन पर फख्र करता था – फख्र इस बात पर की वह बाजार की अफरा तफरी में कितनी शान्ति से गुज़र जाते

थे, कभी आवाज़ ऊंची नहीं करते, हमेशा किसी गरीब talib-e-ilm को मेहेरबानी से डिस्काउंट देते या एक

नरम लफ्ज़ कहते.

मैं अपनी हरी शर्ट और जीन्स में कॉरिडोर से गुज़रा, ठंडी टाइल की फर्श ने मेरे पैरों में सर्दी दौड़ दी.

पीछे का आँगन वह जगह थी जहां अम्मी अपनी सुबह की रूटीन करती थीं, वह बंद ब्रिक की दीवारों

से घिरा सुकून भरा मक़ाम था जो नज़रों से मेहफ़ूज़ रखता था. यह उनका पनाहगाह था, कंक्रीट का

एक टुकड़ा जहां कुछ घड़े में पोदीना और तुलसी जैसे पौधे लगाए हुए थे जो वह प्यार से संभालती थीं.

जब मैं दरवाज़े से झाँका, तो वह वहां थी, अपनी हरकत में मसरूफ. अम्मी अपने रोज़मर्रा के एक्सरसाइज

के लिबास में थी: ढीले काले स्वीटपैंट्स जो उनके पैरों पर आराम से लटकते थे, टखनों तक पहुँचते

हुए बिना चिपके, और एक सादा लम्बी आस्तीन वाली काली टॉप जो उनके बाज़ू और सीने को पूरा धक् रही थी.

एक चमकीला लाल दुपट्टा उनके सर पर saaf-suthre तरीके से बंधा हुआ था, जो उनके काले बालों को

संभाले हुए था और उनके वैसे सदा लिबास में रंग भर रहा था. वह फोकस्ड लग रही थीं, उनकी

हरकतें नरम लेकिन मक़सद भरी. वह एक एक्सरसाइज कर रही थीं जिसे “प्लांक्स” कहते हैं.

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वह warm-up स्ट्रेचेस से शुरू करती थीं – बाज़ू घूमती थीं, पहले आगे फिर पीछे, कन्धों को

ढीला करती हुई. फिर साइड बेंड्स, जिस्म को धीरे से दाएं बाएं झुकाती हुई, हर हरकत के साथ गहरी सांस

लेती हुई.

उसके बाद लुंगेस, एक टांग आगे बढ़ा कर नीचे झुकती हुई ताकि घुटना ज़मीन को छूने के क़रीब

पहुँच जाए, फिर तरफ बदल कर.

उनके स्वीटपैंट्स थोड़े हिलते थे म्हणत से, लेकिन सब कुछ ढाका रहता था, यह उनकी परदे की पाबन्दी की मिसाल

था भले hi तन्हाई में हों.

“अस्सलामु अलैकुम, अम्मी,” मैंने धीमे से कहा, आँगन में क़दम रखते हुए मुस्कुराते हुए, उन्हें

डराना नहीं चाहता था.

वह स्क्वाट के ऊपर पहुँच कर रुक गयीं, सीढ़ी कड़ी हुई और मेरे तरफ मुद कर वह गरम, चमकती

मुस्कराहट दी जिसकी वजह से उनकी आँखों के कोने सिकुड़ गए. “व अलैकुम अस्सलाम, मेरे प्यारे बीटा. आज तो

जल्दी उठ गए हो.

क्या पंछियों ने जगाया या ताज़े पराठों का ख़याल?”

मैं हंस पड़ा, दीवार से तकिया लगा कर उन्हें अपनी रूटीन जारी रखते देखता रहा. “दोनों thoda-thoda,

शायद. लेकिन ज़्यादा तर तो मुझे तुम्हे ऐसे देखना अच्छा लगता है – मज़बूत और लगन वाली. तुम इसे आसान

दिखाती हो.”

वह हलके से हंसी, सांस बराबर रखते हुए एक और स्क्वाट में नीचे जाती हुई. “आसान? यह सब प्रैक्टिस और

फ़ज़ल है. चलो, बगीचे की तरफ चलते हैं. नींद कैसी रही?”

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“अच्छी, शुक्रिया,” मैंने जवाब दिया. “लेकिन अम्मी, मैं हमेशा सोचता हूँ – तुम हर सुबह एक्सरसाइज क्यों

करती हो? तुम तो घर संभालती हो, पड़ोस के बच्चों को पढ़ाती हो, हमारे लिए खाना बनती हो. क्या यह

सब किसी के लिए काफी वर्कआउट नहीं?”

उन्होंने अपने माथे पर हलकी सी पसीने की चमक को हाथ के पीछे से पोंछा, ध्यान से अपना लाल

दुपट्टा न हिल जाए.

“बीटा, जिस्म एक अमानत है. इसे मज़बूत रखना पड़ता है इबादत के लिए – नमाज़ में

खड़े होने के लिए, रोज़ा रखने के लिए, घर वालों की खिदमत के लिए. अगर मैं कमज़ोर हो गयी तो सजदा या

रुकू कैसे करुँगी बिना दर्द के? और वैसे भी, यह दिमाग़ को साफ़ करता है, दिन की शुरुआत एनर्जी से होती है.

यह सिर्फ जिस्म के लिए नहीं, रूह के लिए भी है.”

मैं सर हिलाया, उनके लफ़्ज़ों को समझते हुए. वह हमेशा सब चीज़ों को क़ीमत और घर से जोड़ देती थीं,

सादगी भरी बातों को गहरा बना देती थीं. “यह बात सही है. लेकिन गयम क्यों नहीं ज्वाइन करती? वहाँ फैंसी

मचिनेस हैं – ट्रेडमिल, वेइट्स. बेहतर इक्विपमेंट, सही? तुम और मज़बूत हो सकती हो.”

अम्मी स्ट्रेच के बीच रुक गयीं, हम बगीचे पहुँच गए थे, उन्होंने हाथ कमर पर रखे और वह jaan-ne

वाला नज़र से देखा, आधा हंस कर आधा सीरियस. “गयम? ओह बीटा, सोचो ज़रा. वह जगहें मर्दों और औरतों

से भरी होती हैं जो आज़ादी से मिलते जुलते हैं. यह ढीले स्वीटपैंट्स और टॉप भी पर्दा करती हैं, लेकिन गैर

मर्दों के सामने? नज़रें भटकती हैं, नियतें ख़राब होती हैं.

मैं अपनी इज़्ज़त या वैल को खतरे में नहीं

दाल सकती. नहीं, घर पर एक्सरसाइज करना बेहतर है – सुकून भरा, खल्वाट में, कोई डिस्ट्रक्शन नहीं. हमें

हुक्म है की पर्दा रखें, और यह तरीक़ा बेहतरीन है.”

उनके लफ्ज़ मुझे गहरे छुए. एक ऐसे शहर में जहां हर कोने पर फितना था, अम्मी ने पाक रास्ता चुना बिना

शिकायत के.

मेरे सीने में फख्र का जज़्बा उभरा, उनकी मज़बूती और नरमी के मिलाप की क़द्र करते हुए, वह कभी अपने

उसूलों से समझौता नहीं करती थीं. “तुम सही हो, अम्मी. बिलकुल सही. मुझे तुम पर इतना फख्र है की तुम हमेशा

उसूलों को पहले रखती हो. हर कोई ऐसा नहीं करता.”

बगीचे में उन्होंने स्क्वाट एक्सरसाइजेज शुरू किये.

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वह मेरे तरफ हाथ बढ़ाया और मेरे बालों को प्यार से सहलाया, उनका छूना गरम और यक़ीन दिलाने वाला.

“शुक्रिया, मेरे बीटा. अब बातें बंद – जाओ फ्रेश हो जाओ जब तक मैं यह ख़तम करती हूँ. नाश्ता खुद नहीं

बनेगा!”

एक्सरसाइज ख़तम करने के बाद, अम्मी बाथरूम गयीं अपना ग़ुस्ल के लिए. करीब बीस मिनट बाद वह बहार निकलीं,

ताज़गी भरी और सुकून से, जिल्द चमकती हुई ठन्डे पानी से.

उन्होंने अपने रोज़ाना घर के कपडे बदल लिए थे: आरामदेह ढीली ब्लू जीन्स जो एक pur-parda लम्बी हरी टॉप के

साथ पहनी हुई थी जो कमर के नीचे तक पहुँचती थी, और एक चमकीला पीला दुपट्टा सर और कन्धों पर शराफत

से ओढ़ा हुआ था, चेहरे को नरम फ्रेम देता हुआ. सादा लिबास था, लेकिन उन पर बिलकुल आसान और इज़्ज़तदार लगता था.

अम्मी ने अपनी साफ़ सफ़ेद मुस्लिन जा-,,., बिछाई हुई थी. वह सुबह की नफिल नमाज़ में मसरूफ थीं, उनका

पोस्चर सीधा और सकूं भरा.

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जैसे hi वह रकअतें ख़तम करके पीछे बैठीं, उन्होंने हाथ ऊपर उठाये, हथेलियां आसमान की तरफ खुली हुई.

होंठ धीमे से हिल रहे थे, आँखें बंद तसव्वुर में.

मैं जानता था, बिना सुने भी, की वह हमारे लिए दुआ कर रही थीं – अब्बू की दूकान पर हिफाज़त के लिए, मेरी पढाई

में कामयाबी के लिए, हमारे घर की सेहत और मज़बूत ईमान के लिए. यह एक खामोश, गहरा पल था जो मुझे

शुक्र से भर देता था; अम्मी की दुआएं एक सिपर की तरह थीं, हमें हर रोज़ मेहफ़ूज़ रखती थीं.

वह रसोई में गयीं और नाश्ता तैयार करना शुरू किया. अम्मी मुझे और अब्बू के लिए नाश्ता बनती थीं. लेकिन

अब्बू बाजार में म्हणत कर रहे होते थे, तो अम्मी ख़तम करने के बाद खुद नाश्ता ले जाती थीं या मुझे

भेजती थीं.

अम्मी का नाश्ता इतना मीठा होता था, बिलकुल उनकी तरह.

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घर में उस सुबह हलकी सी गुदगुदी थी क्यूंकि Eid-ul-Fitr सिर्फ तीन दिन दूर थी. जो न जाने, उनके लिए बता दूँ,

Eid-ul-Fitr रोज़ा ख़त्म होने का तेहवार है, रमजान के ख़तम होने की निशानी – एक महीना गहरे रूहानी

अनुशासन का, सुबह से शाम तक रोज़ा, ज़्यादा नमाज़ और खैरात.

हमारे घर में ईद हमेशा ख़ुशी का सबब होती थी. गरीबी के दिनों में भी अब्बू नए कपडे के लिए पैसे

जमा करते, अम्मी रेसिपी परफेक्ट करने में दिन गुज़ारती थीं, और मैं दोस्तों के साथ दौड़ता था, हवा में

एक्ससिटेमेंट की करंट दौड़ती हुई.

उस दोपहर, जब अम्मी और मैं ईद के दावतों के लिए मसाले और सामान सॉर्ट कर रहे थे, दरवाज़े पर हलकी

सी दस्तक हुई.

यह आंटी नफीसा थी, हमारी खुश मिज़ाज पड़ोसन. नफीसा लेट थिरतिएस में शादी शुदा औरत थी, गोल चेहरा,

तेज़ हंसी, और बात को लिवली गॉसिप बनाने की आदत. उनकी शादी एक शांत सरकारी क्लर्क से हुई थी, और उनका एक

बीटा जाबिर था जो मेरी उम्र का और मेरा सबसे क़रीबी दोस्त.

नफीसा अक्सर बिना बताये आ जाती थीं, ख़ुसूसन तेहवार की तैयारियों में, अपनी एनर्जी और बाजार से लायी

हुई थैली के साथ.

“अस्सलामु अलैकुम, शाहिदा!” नफीसा ने पुकारा, अंदर आते हुए गरम झप्पी के साथ, दुपट्टा हल्का सा टेढ़ा

हुआ चलने से.

“व अलैकुम अस्सलाम, नफीसा! बिलकुल सही वक़्त – आओ बैठो. मैं ईद का मेनू प्लान कर रही हूँ. चाय?”

“बिलकुल! तुम्हारी चाय को कैसे इंकार करूँ?” नफीसा दीवान पर बैठ गयीं, हाथ से पंखा करती हुई. “यह गर्मी

और कुछ है, सही? लेकिन ईद आ रही है – सब अच्छा लगता है.”

अम्मी ने सर हिलाया, गरम चाय कप्स में डालती हुई. “हाँ, शुक्रिया. बच्चे इतने एक्ससिटेड हैं. तुम्हारी क्या?

कपडे तैयार?”

नफीसा ने चाय पि, आँखें चमकती हुई शरारत से. “कपडे? ओह, इसके बारे में...” उन्होंने अपनी कपडे की

थैली से एक फोल्डेड फैब्रिक निकला, पिंक वाला, ड्रामा से खोलते हुए. यह चमकीला पिंक ड्रेस था – पूरी आस्तीन,

फिटेड बोडीके और हेम जो सिर्फ जांघ के बीच तक पहुँचता.

“Ta-da! क्या ख़याल है? ईद के लिए, शायद?”

अम्मी की आँखें चौड़ी हो गयीं, फिर वह ज़ोर से हंसी, मुँह धक् कर. “नफीसा! यह क्या है? लगता है

बॉलीवुड फिल्म से! मज़ाक कर रही हो न? यह ड्रेस तो ठीक से धक् भी नहीं पायेगा.”

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नफीसा मुस्कुरायी, ड्रेस को अम्मी के सामने मज़ाक से लगा कर. “चलो शाहिदा, तरय करो! सोचो – ईद की सुबह

इसमें. हुसैन भाई का मुँह खुल जाएगा! तुम फिर से नयी दुल्हन लगोगी.” अम्मी ने सिर्फ क्यूरोसिटी से पिंक ड्रेस

जल्दी पहन लिया.

अम्मी ने दोस्त के बाज़ू पर हलके से मारा, अभी भी हंस कर. “बिलकुल नहीं! सोचो मैं इसमें बहार निकलूं?

पूरा मोहल्ला महीने भर बात करेगा. नहीं नहीं – मज़ाक अलग, बिलकुल नहीं पहनेंगे ऐसा. यह बिलकुल पर्दा

नहीं है.”

“बिलकुल,” नफीसा मानी, ड्रेस को वापस मोड़ कर लेकिन एक और हंसी के साथ. “मैं सिर्फ तैसे कर रही थी. लेकिन

सीरियसली, शर्म की बात है उन औरतों पर जो ऐसे कपड़ों में घूमती हैं – छोटी स्कर्ट्स, नंगे बाज़ू,

ग़लत नज़रों को दावत देती हुई. वह अपनी इज़्ज़त, अपने उसूल भूल जाती हैं. जैसे खुद मुसीबत को बुला रही हों.”

अम्मी ने सर हिलाया गहरे अंदाज़ से. “सही कह रही हो. हमारे ज़माने में हमें ढकना और हिफाज़त सिखाया

गया था. यह मॉडर्न लडकियां... उन्हें हिदायत मिले. लेकिन बताओ नफीसा, यह कहाँ से लायी? लोकल बाजार से

तो नहीं न?”

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नफीसा झुक कर, आवाज़ धीमी कर के जैसे राज़ बता रही हों. “ऑनलाइन शॉपिंग, मेरी जान! मेरी भतीजी ने किसी

वेबसाइट से आर्डर किया, सोचा था लम्बा होगा. पहुंचा तो वह घबरा गयी और मुझे डिस्पोसे करने को दिया.

मैंने हसी के लिए रख लिया.”

अम्मी ने भुँह चढ़ाई. “ऑनलाइन? इसमें होशयार रहो. लेकिन अगर रखना है तो घर में hi पहनना –

शायद अपने शौहर को सरप्राइज दो एक शाम. रोमांस ज़िंदा रखो, लेकिन बंद दरवाज़ों के पीछे!”

दोनों हंसी में डूब गयीं, वह हंसी जो सालों की दोस्ती से आती है, चाय पीते हुए और सेफ टॉपिक्स पर जाती

हुई जैसे ईद के मेहँदी दसिग्नस.

तभी फ्रंट दूर ज़ोर से खुला, और जाबिर और मैं सांस फुलाये अंदर आये, गली में क्रिकेट खेल कर.

जाबिर और मैं बचपन से जुड़ा न होने वाले थे – एक कॉलेज, वीडियो गेम्स और स्ट्रीट फ़ूड का शौक.

वह लम्बा

था शरारती मुस्कराहट वाला, हमेशा एडवेंचर के लिए तैयार. मैं अपनी आरामदेह हरी शर्ट में था,

थोड़ा पसीने से भीगा, जबकि जाबिर की चमकीला नीला शर्ट उनकी एनर्जी से मैच करती थी.

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“अस्सलामु अलैकुम, सब लोग!” मैंने ज़ोर से कहा, दांत दिखाते हुए.

“व अलैकुम अस्सलाम!” अम्मी और नफीसा ने एक साथ जवाब दिया, अम्मी का चेहरा हमें देख कर चमक उठा.

जाबिर अपनी माँ के पास बैठ गया.

“अम्मी, तुम नहीं मानोगी – इस साल ईद एपिक होगी! हम सब लाड्स पार्टी प्लान कर रहे हैं – सुबह क्रिकेट

टूर्नामेंट, रात फिरवर्क्स, और रूफटॉप दावत!”

मैं बीच में कूद पड़ा, एक्ससिटेमेंट उबलते हुए. “हाँ! और हर चाचा से ऐड़ी कलेक्ट करेंगे. सोचो

बिरयानी, कबब्स – non-stop मज़ा!”

अम्मी ने हाथ उठाया, मुस्कुराती लेकिन सख्त. “रुको ज़रा, दोनों. ईद सिर्फ पार्टीज के लिए नहीं – शुक्र, घर

वक़्त, खैरात.

तुम मज़ा कर सकते हो, लेकिन नमाज़ और मेहमानों की मदद न भूलना.”

नफीसा ने सर हिलाया, जाबिर के घुटने पर थपकी दी. “बिलकुल. ठन्डे रहो, लाड्स. पिछले साल तुमने रूफटॉप को

आग लगा दी थी फिरवर्क्स से. सेफ रहो, ठीक? मज़ा करो लेकिन ज़िम्मेदारी से.”

हम थोड़ा धीमे हुए, लेकिन बातें जारी रहीं. “नए कपडे क्या?” मैंने पुछा. “अब्बू ने मुझे क्रीम

कुरता वडा किया – मस्जिद के लिए परफेक्ट.”

जाबिर चमका. “मेरा नेवी ब्लू. हम शार्प लगेंगे! और गेम्स? इफ्तार के बाद प्लेस्टेशन टूर्नामेंट – नहीं

रुको, ईद में रोज़ा नहीं!”

अम्मी हंसी. “देखो? आलरेडी प्लानिंग. लेकिन हाँ, घर पहले. नफीसा, याद है पिछले ईद जब बच्चों ने

टैलेंट शो किया? जाबिर के मैजिक ट्रिक्स मज़ेदार थे.”

नफीसा हंसी. “ओह हाँ! और तुम्हारी गायकी, शाहिदा – वह गीत सबकी आँखों में आंसू लाये. इस साल

कुछ ऐसा hi करेंगे.”

हम और बातें की – पसंदीदा ईद मिठाइयों पर (मैं गुलाब जामुन के तरफ, जाबिर जलेबी), कौन से

कौसिन्स आ रहे, बकरों के क़ीमत बढ़ने पर भी. यह आसान, बहती बातें थीं जो घर को और गरम

बनती थीं.

लेकिन आखिरकार, अम्मी और नफीसा गॉसिप मोड में चली गयीं. “सुना मरस. खान की बेटी के बारे में?”

नफीसा धीमे से.

“कराची के लड़के से मांगनी – वह पैसेवाला है, लेकिन अफवाह है की ज़्यादा दीनदार नहीं.”

अम्मी झुक कर. “सच? और मटन के दाम? आसमान छू रहे! और मर. अली की जॉब ट्रांसफर – बेचारे

घर, फिर शिफ्ट.”

जाबिर और मैंने अननोएड नज़रें मिलायीं. उनकी “स्टुपिड गॉसिपिंग,” जैसे हम कहते थे, कभी ख़तम

नहीं होती – पड़ोसियों की ज़िन्दगी पर be-maqsad बातें जो हमसे कोई लेना देना नहीं. हम पेअर हिलाते

रहे टेबुल के नीचे.

आखिरकार अम्मी ने नोटिस किया और कड़ी हुई. “बस बैठने का. लाड्स, बुचेरी जाओ और दो किलो ताज़ा चिकन

ले आओ. रात के लिए करी बनानी है, और ईद प्रेप से मैं नहीं जा सकती.”

मैं मज़ाक से करहा. “ॉव, अम्मी, अभी?”

नफीसा मुस्कुरायी. “मैं यहां मदद करुँगी, शाहिदा. चिंता मत – इरविंग और चोप्पिंग साथ करेंगे.”

अम्मी ने आह भरी, पीले दुपट्टे से हाथ गुज़ारते हुए. “नफीसा, बोहोत काम है – कपडे प्रेस करने,

सामान सॉर्ट, मीठे भिगोने. लगता है डूब रही हूँ!”

मैं खड़ा हुआ और उनके कंधे पर यक़ीन दिलाने वाला हाथ रखा. “अम्मी, शांत. सब ठीक होगा. जाबिर

और मैं चिकन जल्दी ले आएंगे, वापस आकर और मदद करेंगे.”

वह शुक्र से मुस्कुरायी, मुझे जल्दी झप्पी दी. “मेरा सोचने वाला बीटा. ठीक, लेकिन सुनो – सिर्फ बाबा

रहमान की बुचेरी से, पुराणी मस्जिद के पास वाली. वह हमेशा साफ़ हलाल काट देते हैं, कोई गड़बड़ नहीं.

उस नयी जगह मत जाना गली के नीचे; उनके सोर्स पर भरोसा नहीं. और पेपर बैग ले जाना कैर्री के लिए –

प्लास्टिक में मत लपेटवाना.”

“समझ गया, अम्मी – बाबा रहमान, ताज़ा चिकन, पेपर बैग. हम जल्दी वापस.”

जैसे hi जाबिर और मैं दोपहर की गरम धुप में निकले, सड़कें pre-Eid की हरकत से भरी – दूकानदार

रंग बिरंगी चूड़ियां बेच रहे, बच्चे एक दुसरे का पीछा करते – बात हमारे प्लान्स पर आयी.

“इस ईद, कुछ अलग करते हैं,” मैंने कहा. “सिर्फ क्रिकेट नहीं, मोहल्ले में त्रैझ हंट.”

जाबिर एक्ससिटेड से सर हिलाया. “हाँ! या मूवी मैराथन – एक्शन फिल्म्स रात भर. और खाना – किचन से एक्स्ट्रा

शेयर खुरमा चुरा लेंगे.”

मैं हंस पड़ा. “डील. ओह, यह ले – पेपर बैग संभाल. मेरे हाथ भरे हैं... यह, कुछ नहीं से, लेकिन

फिर भी.”

उसने लिया, आँखें घुमा कर. “ठीक. हे, कल रात नमाज़ पढ़ी?”

मैं सर खुजाया शर्म से. “नाह... गटा खेलते देर हो गयी. मिशंस में खो गया, जानते हो? ओवरस्लिट भी.”

जाबिर ने बाज़ू पर हल्का मुक्का मारा. “यार, तुम और तुम्हारे बहाने! गटा कूल है, लेकिन नमाज़ पहले.

चलो, ईद नया शुरू – वडा करो कोशिश करोगे?”

“ठीक, ठीक. नए शुरू की बात, देखो तुम्हारे घर के बगल वाला घर – हमेशा खाली. अगर हम

मॉम्स को कन्विंस कर लें रेंट के लिए? उससे हमारा हैंगऑउट बना देंगे – वीडियो गेम्स, स्नैक्स, कोई

एडल्ट डिस्टर्ब नहीं. हर तरह की चीज़ें कर सकते हैं, जैसे फोर्ट बनाना या सीक्रेट पार्टीज.”

जाबिर की आँखें चमकी पल भर. “जीनियस आईडिया! सोचो – हमारा अपना स्पेस. रात भर जग सकते, अंदर

क्रिकेट भी खेल सकते.”

“लेकिन रुको,” उसने चेहरा उतार कर. “हमारे पेरेंट्स अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते. इस इलाक़े में रेंट ऊंचा है,

अब्बू की दूकान बेसिक कवर करती है. तुम्हारा घर भी – सपना है, लेकिन हक़ीक़त नहीं.”

मैं चेहरा टेढ़ा किया. “हाँ सही. लेकिन शायद ऐड़ी जमा कर लें. रुको, तुम इतने डाउन क्यों लग रहे हो?

घर के साथ कुछ है?”

जाबिर रुक गया, फिर बताया. “एक्चुअली... कल किसी ने रेंट कर लिया. एक रुग्गड़ दीखता मर्द – बड़ा आदमी, रफ़.

लैंडलॉर्ड से बात कर रहा था बहार.”

मैं रुक गया, गुस्सा उभरा. “क्या? कब? कहाँ एक्साक्ट्ली? सब बताओ!”

“दोपहर देर, असर के बाद. मैं चाट पर पतंग उदा रहा था, उन्हें हैंडशेक करते देखा गेट पर. आदमी

ने कॅश दिया, मोटा बंडल. अब मूव इन कर रहा है.”

“लेकिन अकेला रहता है?” मैंने पुछा, दिमाग़ दौड़ता हुआ. “कोई फॅमिली नहीं? इतने बड़े घर के लिए अजीब.”

“हाँ, अकेला. कोई बीवी बच्चे नहीं देखे. सिर्फ वह और कुछ बैग्स.”

“इतना महंगा घर अकेला कैसे अफ़्फोर्ड? काम से काम 20,000 महीना. उसका क्या डील? जॉब? बैकग्राउंड?”

जाबिर ने कंधे ुचाके. “पता नहीं. लेकिन हमेशा टूथपिक मुँह में, चबाता रहता जैसे सोच रहा

हो. शादी लगता है.”

हम चलते हुए बातें करते रहे, टॉपिक खींचता गया. “वह सेक्रेटिवे भी है,” जाबिर जारी. “लैंडलॉर्ड से

ज़्यादा बात नहीं, सिर्फ सर हिलाया और पैसे दिए. कपडे पुराने, जैसे शक्ल की परवाह नहीं. और चेहरा – गाल

पर दाग, शायद? लगता है क्रिमिनल, एक्शन मूवीज वाला – खतरनाक विबे, जैसे कभी भी टूट पड़ेगा.”

“व्हो, धीमे,” मैंने कहा, रिज़नेबल बनने की कोशिश. “हमारे उसूल जज करने नहीं देते. शायद

वह bad-qismat है, या मज़दूर पैसे जमा कर रहा. उसकी कहानी नहीं जानते. हमें सिखाया गया है

दूसरों के बारे में अच्छा सोचना.”

जाबिर ने सर हिलाया ज़िद से. “छोड़ यार. जैसे उसने इधर उधर देखा, जैसे देखता है कोई देख रहा है –

सस्पीशियस. और हमारे मोहल्ले में? अगर वह इललीगल में हो? ड्रग्स, चोरी? हमें केयरफुल रहना चाहिए.

अम्मी दिन भर अकेली; अगर ट्रबल किया तो?”

मैं आह भरी, उसका पॉइंट समझ कर लेकिन नेगेटिविटी पर नहीं रुकना चाहता. “ठीक, होशयार रहना सही है.

लेकिन जल्दी कन्क्लूसिओंस मत कूदो. वैसे भी, टॉपिक बदलो – ईद प्लान्स? और घर और मिलेगा, सस्ता वाला.”

जाबिर गुस्सा करता रहा लेकिन आखिर शांत. जैसे hi हम मुड़े, वह रुक गया, दूर बगल के खाली घर की तरफ

देखता – अब इतना खाली नहीं.

“क्यों ऐसे घूर रहे हो?” मैंने पुछा, उसकी नज़र फॉलो कर.

“देखो – वह है,” जाबिर धीमे से, इशारे से दिखाते हुए.

आदमी घर के बहार खड़ा था, दीवार से तकिया लगाए. फेडेड जीन्स पहने हुए जो कमर पर नीचे लटकी

हुई, सादा नीला पोलो शर्ट उसके चौड़े मज़बूत जिस्म पर खींची हुई, और सिगरेट पी रहा था, धुंआ

धीरे से हवा में घूमता हुआ.

उसकी जिल्द काली, एबोनी जैसी, चेहरा रुग्गड़ – मज़बूत जबड़ा, तीखी आँखें सड़क स्कैन करती हुई. टूथपिक

मुँह के कोने से लटका हुआ, जैसे जाबिर ने कहा था.

“देखा? वही है,” जाबिर धीमे से. “हमारा सपनों का घर ले गया. कौन समझता है खुद को?”

मुझे भी गुस्सा आया – घर जो हमने सपने में देखा, इस अजनबी को. “हाँ इर्रिटेटिंग. लेकिन क्या कर सकते

हैं?”

आदमी ने सिगरेट ज़मीन पर फेंका, पेअर से बुझाया, फिर इधर उधर देखा – बाएं, दाएं, पीछे भी

– जैसे यक़ीन कर रहा हो कोई नहीं देख रहा. मुतमईन होकर दरवाज़ा खोला और अंदर चला गया, ज़ोर से

बंद करते हुए जो सड़क पर गूंजा.

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हमने उस वक़्त ज़्यादा न सोचा, सिर्फ नज़रें मिलायीं. “लोगों को उनके काम से काम,” मैंने जाबिर से कहा.

“हमारा मसला नहीं.”

लेकिन जाबिर सच में गुस्से में था, मुट्ठियाँ बंधी हुई. “तुम्हारे लिए आसान कहना. वह मेरे घर के

बिलकुल बगल! अगर ट्रबल हो तो? हम उस जगह ले सकते थे!”

“रिलैक्स यार,” मैंने जवाब दिया. “और ओप्तिओंस हैं – तुम्हारे घर या मेरे में खेल सकते हैं. रूफटॉप

हमेशा फ्री गेम्स के लिए. पूरे घर की ज़रुरत नहीं.”

वह गुस्सा करता रहा लेकिन आखिर ठंडा. फिर भी, चलते हुए मैं खुद से पूछने लगा की जाबिर इस शख्स पर

इतना परेशां क्यों है.

अब यह बात मुझे अंदर से कुरेद रही थी. हम बुचेरी की तरफ बढे, लेकिन मेरा दिमाग़ उस अजनबी पर अटक

गया. कौन था वह? क्यों अकेला इतने बड़े घर में? और वह नज़रें इधर उधर – जैसे कुछ छुपा रहा

हो. शायद जाबिर सही कह रहा था, हमें होशयार रहना चाहिए. लेकिन फिर याद आया अम्मी का सबक़ –

दूसरों के बारे में अच्छा सोचो, जज मत करो. यह कनफ्लिक्ट मुझे परेशां कर रहा था.

रस्ते में हमने बातें बदल ली, ईद के मज़े पर. “यार, इस बार ऐड़ी से नयी गेम खरीदेंगे,” मैंने

कहा, मूड हल्का करने की कोशिश. “गटा का नया वर्शन, मल्टीप्लयेर में हम दोनों टीम बनाएंगे.”

जाबिर हंस पड़ा, गुस्सा ढीला. “हाँ, और रूफटॉप पर टूर्नामेंट. सब दोस्त आएंगे, रात भर मज़ा.”

बुचेरी पहुँच कर हमने चिकन लिया, अम्मी की हिदायत के मुताबिक़. वापस जाते हुए, मैंने जाबिर से

पुछा, “उस आदमी के बारे में ज़्यादा मत सोच. शायद वह नार्मल है, बस नए मोहल्ले में एडजस्ट

कर रहा.”

उसने सर हिलाया लेकिन मुतमईन नहीं लगता था. “शायद. लेकिन अगर कुछ ग़लत हुआ तो, मैं बताऊंगा.”

घर पहुँच कर, अम्मी और नफीसा अभी भी बातें कर रही थीं, अब स्वीट्स की रेसिपीज पर. हमने चिकन

दिया, और अम्मी ने शाबाशी दी. “अच्छे लाड्स, जल्दी आ गए. अब मदद करो – वेजटेबल्स चोप करो ईद के

लिए.”

हमने हाँ कहा, और काम शुरू किया. लेकिन मेरा दिमाग़ उस नए पडोसी पर था. शायद यह सिर्फ

शुरुआत थी कुछ नयी कहानी की.

दोपहर गुज़री, और शाम होने लगी. अब्बू दूकान से वापस आये, थके हुए लेकिन मुस्कुराते. “क्या हाल है

घर के?” उन्होंने पुछा, अम्मी को गले लगते हुए.

अम्मी ने चाय दी, और बातें शुरू – ईद प्लान्स, बाजार की खबरें. मैं और जाबिर बहार गए, गली में

बैठ कर बातें की. “देख, वह घर की लाइट ों है,” जाबिर ने धीमे से कहा.

मैं ने देखा, अंदर हलकी रौशनी. “छोड़ न. हम अपने मज़े करेंगे.”

लेकिन अंदर से, क्यूरोसिटी बढ़ रही थी. क्यों वह इतना मिस्टीरियस था? और हमारी ज़िन्दगी में यह नयी एंट्री

का क्या मतलब?

रात के खाने पर, अम्मी ने करी बनाया, गरम गरम रोटी के साथ. “बीटा, बताओ दिन कैसा गुज़रा?”

अम्मी ने पुछा.

मैंने सब बताया, लेकिन नए पडोसी का ज़िक्र नहीं किया. अब्बू ने कहा, “हमेशा होशयार रहो, लेकिन दूसरों

की मदद करो. यह हमारे उसूल हैं.”

उस रात, बिस्तर पर लेट कर, मैं सोचता रहा. ज़िन्दगी में छोटी चीज़ें कैसे बड़ी हो जाती हैं. ईद आ रही

थी, ख़ुशी का वक़्त, लेकिन यह नयी चीज़ – शायद कुछ बदल देगी.

सुबह फिर से, अम्मी की एक्सरसाइज रूटीन, नमाज़, नाश्ता. रूटीन में सुकून था, लेकिन अब एक नया सवाल.

जाबिर से मिल कर, हमने डीडे किया ऑब्सेर्वे करेंगे, बिना जज किये.

दिन गुज़रते गए, ईद क़रीब आती गयी. हमने डोरशंस की, लाइट्स लगायी, स्वीट्स बनाये. अम्मी और नफीसा

ने मिल कर कपडे प्रेस किये, हिना लगायी.

एक दिन, बाजार जाते हुए, हमने उस आदमी को देखा – सिगरेट पीटा हुआ, इधर उधर देखता. जाबिर ने कहा,

“देख, फिर वही.”

मैं ने इग्नोर किया, लेकिन अंदर से परेशां. क्यों वह हमेशा अलर्ट? शायद वह सिक्योरिटी अफसर से भाग रहा हो,

या कुछ और.

लेकिन अम्मी के सबक़ याद आये – सब्र रखो, ,.' पर भरोसा.

ईद की रात, चाँद देखा, ख़ुशी से भरा. सुबह, नए कपडे पहने, मस्जिद गए. अब्बू ने दुआ की, अम्मी ने

शुक्र ऐडा किया.

दावत में, सब मिले, हंसी मज़ा. लेकिन जाबिर ने धीमे से कहा, “वह आदमी नहीं आया दावत में. अजीब.”

मैं हंस पड़ा, “छोड़, एन्जॉय कर.”

लेकिन कहानी यहीं ख़तम नहीं थी. यह सिर्फ शुरुआत थी.
 
CHAPTER 4

मैं इस मिस्टीरियस पडोसी पर शक करने लगा हूँ

जाबिर और मैं आखिरकार बुचेरी से घर वापस पहुंचे, अब हमारे क़दम तेज़ी से बढ़ रहे थे क्यूंकि

दोपहर की गर्मी में चिकन का भारी पेपर बैग बोझ बन चूका था.

सड़कें उस पुराणी ईद से पहले वाली एनर्जी से भरी हुई थीं – रंग बिरंगे दुपट्टे ओढ़े औरतें ताज़ा

खजूर और मेवों के ढेरों पर mol-tol कर रही थीं, बच्चे नए गुबारों के साथ पैरों के बीच

दौड़ रहे थे, और kabhi-kabhi सजाये हुए रिक्शा का हॉर्न बजता जो तेहवार के गीत ज़ोर से चला रहा था.

मेरी पीठ पर पसीना बह रहा था, लेकिन हम गटा में किये हुए किसी बेवकूफी भरे स्टंट पर हंस रहे

थे, वह मिस्टीरियस पडोसी पल भर के लिए दिमाग़ के पीछे चला गया था.

“यार, अगर तेरी अम्मी उस चिकन से अपनी स्पेशल करहि बनाये तो मैं डिनर के लिए रुक जाऊंगा,” जाबिर ने

कहा, बैग दुसरे हाथ में बदलते हुए. “इनविटेशन की ज़रुरत नहीं.”

मैं मुस्कुराया. “डील. लेकिन उसके बाद बर्तन धोने पड़ेंगे – पिछली बार की तरह भागना नहीं.”

हमने दरवाज़ा खोला, घर की ठंडी छाँव एक सुकून भरी रहत थी. तुरंत hi लज़्ज़त भरी खुशबू ने

हमें घेर लिया: गहरे मसाले गार्लिक और अदरक के सीज़्ज़ले के साथ मिल रहे थे, प्याज के सुनहरे होने की

वह पहचानी खुशबू गरम तेल में.

नफीसा आंटी मैं किचन में थी, आस्तीन चढ़ी हुई, एक बड़े देगची को फोकस्ड एनर्जी से हिलती हुई, चेहरा

चूल्हे की गर्मी से लाल लेकिन ख़ुशी से चमकता हुआ.

अम्मी काउंटर पर थी, स्टील के टिफ़िन बॉक्स को धीरे से पैक कर रही थीं – ताज़ा रोटियां फॉयल में लपेटी हुई,

करी का बड़ा हिस्सा जो नफीसा बना रही थी, बगल में दही का रायता, और अब्बू को पसंद आम का अचार उस तीखी

किक के लिए.

“लो तुम दोनों आ गए!” अम्मी ने कहा, सर उठा कर रहत और मज़ाक भरी झिड़की के मिलाप से. “मुझे लगा

बाजार में खो गए. नफीसा यहाँ लिफेसवेर बानी हुई है – आओ, चिकन सिंक में रख दो ताकि वह ठीक से

धो कर मरिनाते कर सके.”

नफीसा मुद कर, दुपट्टे के किनारे से माथा पोंछती हुई, बड़ी मुस्कराहट दी. “मेरे बहादुर डिलीवरी बॉयज!

बाबा रहमान बिजी था? बताओ उन्होंने ताज़ा पीसेज में कमी नहीं की न.”

“जगह भरी हुई थी,” मैंने कहा, बैग फख्र से देते हुए. “लेकिन हमने बेस्ट कट्स लिए – ब्रैस्ट और तइस,

बिलकुल जैसे तुमने कहा था, अम्मी.”

जाबिर ने एक्ससिटेड सर हिलाया. “और उन्होंने एक्स्ट्रा गिबलेट्स फ्री में दाल दिए. कहने लगे शाहिदा बीबी की मशहूर

कुकिंग के लिए.”

अम्मी हलके से हंसी, टिफ़िन को मुतमईन क्लिक से बंद करते हुए. “वह कॅशे अच्छा आदमी है न? अच्छे लाड्स.

अब सुनो – मैं यह खाना तुम्हारे अब्बू की दूकान पर ले जा रही हूँ. सुबह से मैसेज कर रहे हैं की

last-minute ईद शोप्पेर्स से कितना रश है. बेचारा नाश्ता के बाद से कुछ नहीं खाया होगा.”

वह नफीसा की तरफ मुदिन, चेहरे पर सच्ची शुक्रगुज़ारी. “नफीसा, दिल से शुक्रिया की मेरी किचन में कूद

पड़ी मदद के लिए. तुम न होती तो यह सब प्रेप कैसे मैनेज करती. करी की खुशबू आलरेडी लज़्ज़त भरी है.”

नफीसा ने हाथ हिला कर ताल दिया, लेकिन आँखें ख़ुशी से चम्किन.

“अरे शाहिदा, रिश्तेदार किसके लिए होते

हैं? जाओ, हुसैन भाई का ख़याल रखो. यहाँ हम संभाल लेंगे – शायद वापस आने तक टास्ते टेस्ट भी

तैयार हो.”

अम्मी ने पर्स उठाया, टिफ़िन उसमें डाला, और एक हल्का शाल, पीला दुपट्टा आखरी बार ठीक करते हुए.

“ज़्यादा देर नहीं लगेगी. लाड्स, कोई शरारत नहीं – और अगर नफीसा को मदद चाहिए तो चूल्हे पर नज़र रखो.”

जल्दी से हाथ हिला कर वह बहार निकलीं, दरवाज़ा धीरे से बंद हुआ.

खिड़की से मैंने देखा वह गली में भीड़ को अपनी उस आसान ग्रेस से गुज़र रही थीं. धुप उनके दुपट्टे पर

पद रही थी, पीला कपडा और चमक रहा था, और उनमें एक हलकी सी चमक थी – किचन की गर्मी से गाल

लाल, आँखें मक़सद से रोशन. लोग सर घुमा कर देखते जा रहे थे: एक दूकानदार पुकारता हुआ

“शाहिदा बीबी, एडवांस ईद मुबारक!” और वह गरम मुस्कराहट और सलाम से जवाब देती हुई.

बाजार की

afra-tafri में वह एक सुकून भरी शख्सियत की तरह चल रही थीं, टिफ़िन धीरे से झूलता हुआ, वह

शांत कॉन्फिडेंस जो हर किसी को गरम महसूस करता था.

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अनारकली बाजार तक पैदल ज़्यादा दूर नहीं था, लेकिन सड़कें last-minute सौदा करने वालों से भरी थीं.

अम्मी चलते हुए सच में चमक रही थीं.

जब अम्मी अब्बू की दूकान पहुंचीं, वहाँ afra-tafri थी – अलमारियां चमकती कपड़ों से भरी, कस्टमर्स

कुर्ते रौशनी में उठा कर mol-le रहे, एक्ससिटेड आवाज़ों में हाग्ग्लिंग.

अब्बू बीच में थे, आस्तीन चढ़े हुए, एक घराने को मैचिंग कपडे चुनने में मदद कर रहे,

पर्चासेस saaf-suthre पैक करते हुए.

उनका चेहरा खुलता हुआ बड़ा, थका हुआ लेकिन ख़ुशी भरा मुस्कराहट बना जब उन्होंने भीड़ में से अम्मी को

देखा. “शाहिदा? मेरी फेवरेट डिलीवरी सर्विस?” उन्होंने पुकारा, कस्टमर से माफ़ी मांग कर काउंटर के आगे

आये.

वह टिफ़िन प्राइज की तरह उठाये, आँखें चमकती हुई. “Hardest-working हस्बैंड इन लाहौर के लिए स्पेशल

डिलीवरी. सोचा अगर खाना न पहुँचाया तो यह मैडनेस में भूक से बेहोश हो जाएंगे.”

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उन्होंने बॉक्स लिया, उन्हें धीरे से स्कार्व्ज़ की रैक के पीछे एक शांत कोने में ले जाते हुए, afra-tafri से दूर.

पास झुक कर धीमे से बोले, “तुमने मेरा दिल पढ़ लिया. और तुम – ऐसे आना, इतनी खूबसूरत लग रही हो...

एक सादगी भरा काम को गिफ्ट की तरह कैसे बना देती हो?”

अम्मी के गालों में पुराणी गर्माहट उभरी, धीरे से इधर उधर देखते हुए नरम आवाज़ में जवाब दिया,

“बस करो, चरमर. कोई सुन लेगा. लेकिन सीरियसली, गरम है अभी खाना. रोटी, करी, रायता – सब जो तुम्हे पसंद.”

अब्बू ने ढक्कन खोला, गहरी सांस लेते हुए ेक्साग्गेरेटेड सुकून की आह भरी. “जन्नत. बिलकुल जन्नत. एक मिनट

बैठो मेरे साथ? बिज़नेस रुक सकता है.”

वह प्यार से सर हिलाया लेकिन पास रही. “नहीं – घर में बोहोत काम. लेकिन बताओ, कैसे चल रहा? लगता है सब

बेच डोज.”

“अल्हम्दुलिल्लाह, महीनो में बेस्ट दिन,” उन्होंने कहा, एक निवाला लेते हुए आँखें बंद कर के मज़े लेते हुए.

“सबको कल के लिए नए कपडे चाहिए. और कल की बात – ईद! यकीन नहीं आता आखिरकार आ गयी. घर चाओस और

मिठाइयों से भर जाएगा.”

अम्मी हंसी, काउंटर से तकिया लगाए. “चाओस हाँ – लाड्स आलरेडी फिरवर्क्स एम्पायर प्लान कर रहे. लेकिन

खूबसूरत होगा. घर वाले, खाना, वह नयी गाउन जो तुमने सरप्राइज दी... अभी भी यकीन नहीं आता इतना खर्च

किया.”

उन्होंने हाथ हिला कर ताल दिया, मुँह आधा भरा मुस्कुराते हुए. “हर पैसा वर्थ था तुम्हे चमकते देखने

के लिए. और बच्चे – हमारा बीटा सूट तरय करते हुए कितना बड़ा लग रहा था.”

वह सर टेढ़ा किया, आँखों में शरारती चमक. “चमकते की बात... जानते हो, तुमने जेवेलरी का वडा किया

था गाउन के साथ मैच करने को. कुछ साधा, बिलकुल.”

अब्बू हंसा, बिना हिचक पॉकेट में हाथ दाल कर फोल्डेड नोट्स निकलते हुए. “जैसे भूल जाऊंगा. यह लो – जाओ

खुद ट्रीट करो. लेकिन वडा करो कुछ ऐसा चुनोगी जो तुम्हे ख़ुशी दे.”

उनका चेहरा ईद सुबह के बच्चे की तरह चमक उठा, आँखें ख़ुशी से चौड़ी हुई पैसे लेते हुए.

“ओह हुसैन... शुक्रिया. तुम मेरे साथ ज़्यादा अच्छे हो.” वह पैरों के पंजों पर उठी, एक बार इधर उधर

देखा फिर गाल पर नरम, देर तक रहने वाला किश दिया. “ी लव यू.”

उन्होंने उनका हाथ पकड़ा पल भर, दबाया. “और मैं तुमसे ज़्यादा. अब जाओ – वर्ण दूकान जल्दी बंद कर के

पीछे आ जाऊंगा.”

“एक आखरी बात,” उन्होंने जाते हुए कहा, लहजा मज़ाक भरा सख्त. “ज़्यादा महंगा नहीं, ठीक? बच्चों की

ऐड़ी और बिल्स अभी बाक़ी हैं.”

वह पीछे मुद कर शरारती मुस्कराहट दी. “देखेंगे.” और यूँ वह भीड़ में घुल गयीं, सीधे अपनी

पसंदीदा जेवेलरी दूकान की तरफ जो कुछ गलियां दूर थी.

अम्मी की यह प्यारी आदत थी – जब एक्स्ट्रा पैसे होते या खुसूसी मौका, वह जेवेलरी में इंडल्ज करती थीं. न

भरी भरकम, बल्कि वह टुकड़े जो रौशनी पकड़ते और उन्हें एलिगेंट महसूस करते: नाज़ुक चैन, सादगी भरे

इयररिंग्स, शायद एक ब्रेसलेट हलके पत्थरों वाला.

उन्होंने जेवेलरी स्टोर से कई जेवेलरी खरीदे.

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अब्बू हमेशा मज़ाक करते “शिनय चीज़ों पर पैसे बर्बाद” के बारे में, लेकिन दिल से कभी बुरा नहीं मानते;

उनकी ख़ुशी देखना hi काफी था. उस दिन उन्होंने एक खूबसूरत गोल्ड नेकलेस चुनी डैंगलिंग पेंडेंट्स वाली और

मैचिंग झुमका इयररिंग्स – सेक्विनेड गाउन के लिए परफेक्ट.

इस बीच घर पर, जाबिर और मैं लिविंग रूम पर क़ब्ज़ा कर चुके थे, कंट्रोलर्स हाथ में, पूरी तरह गटा के

गरम मुक़ाबले में डूबे हुए. टीवी इंजन की गूँज और ड्रामेटिक म्यूजिक से गूँज रहा था जब हम वर्चुअल ट्रैफिक

में दौड़ रहे थे, एक दुसरे पर चिल्लाते हुए.

“वह शॉर्टकट ले – लेफ्ट, लेफ्ट!” मैं चिल्लाया, आगे झुक कर.

“नहीं यार, वह ट्रैप है – कॉप्स हर जगह!” जाबिर ने जवाब दिया, बटन्स ज़ोर से दबाते हुए. “है! बूस्ट – मैं निकल

गया!”

चेस के बीच दरवाज़ा खुला, और अम्मी शॉपिंग बैग्स छुपाये अंदर आयी. वह रुकी, हाथ कमर पर,

afra-tafri का जायज़ा लेते हुए.

“लाड्स! यह क्या शोर? पूरा मोहल्ला जगा डोज. गेम बंद करो और ज़ुहर पढ़ो – वक़्त निकल गया.”

हमने स्क्रीन पॉज किया, गिलटी नज़रें मिलाये. “अम्मी, प्लीज – बस यह मिशन ख़तम कर लें,” मैंने मिन्नत की.

“तुरंत नमाज़ पढ़ लेंगे, वडा.”

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“हाँ शाहिदा आंटी,” जाबिर ने साथ दिया. “यह बिग हेस्ट है – इतने क़रीब पहुँच गए!”

नफीसा ने किचन से सर निकला, अभी भी हिलती हुई. “ओह छोड़ दो उन्हें थोड़ी देर, शाहिदा. देखो चेहरे – ईद की

एक्ससिटेमेंट उबाल रही है. थोड़ा शोर किसने रोक दिया, आज के दिन.”

अम्मी ने आह भरी लेकिन मुस्कराहट छुपा न सकीय, आयी और मेरे बालों को प्यार से सहलाया. “ठीक, जीत गए

तुम – इस बार. लेकिन वॉल्यूम धीमी, और जल्दी नमाज़. मेरे छोटे शरारती... जब बड़े हो कर चले जाओगे तो क्या

करुँगी?”

हम धीमे से चीयर किये, गेम लौ वॉल्यूम पर जारी रखा जबकि बड़े बातें करने लगे. “करी खूबसूरत

बन रही है,” नफीसा ने कहा. “तुम्हारी रेसिपी बिलकुल – एक्स्ट्रा टमाटर तीखापन के लिए.”

अम्मी ने क़द्र से सर हिलाया. “खुशबू से लग रहा. ओह, और नफीसा – बगीचा सूखा लग रहा. पिछले साल लगाए

गुलाब विल्टिंग कर रहे. अभी पानी दाल आती हूँ; शाम की हवा अच्छी लगेगी.”

“अच्छा आईडिया,” नफीसा मानी. “फ्रेश एयर कुकिंग मैराथन से पहले.”

जब अम्मी होसे ले कर कोर्टयार्ड की तरफ गयीं, मैं जाबिर से बोलै. “पॉज कर जाबिर, प्यास लग रही. पीछे किचन

से पानी ले आता हूँ. तुझे गिलास?”

“नहीं, मैं ठीक – जल्दी आ, वर्ण बिना तेरे शुरू कर दूंगा.”

दूसरी किचन शांत थी, पीछे वाली बड़ी खिड़की से पडोसी घर दीखते थे. धुप सुनहरी धारों में अंदर

आ रही थी जब मैं फ़िल्टर से गिलास भरा, ठंडा पानी मज़े से पिया.

गेमिंग के जोश के बाद ठंडा पानी कितना सुकून देता था.

फिर, be-jaane खिड़की से देखते हुए, मेरी नज़र बगल में हरकत पर पड़ी.

वही वह रुग्गड़ आदमी, अपने गेट की तरफ तेज़ी से जा रहा, चेहरे पर वही सख्त एक्सप्रेशन. पास से देखने में

बिलकुल जाबिर की डिस्क्रिप्शन मैच कर रहा: मज़बूत जबड़ा, काली तीखी आँखें, गाल पर हल्का दाग, टूथपिक

धीरे धीरे होंठों के बीच घूमता हुआ.

उसमें वह क्रिमिनल जैसा और था – चौड़े कंधे, मक़सद भरा चल, ऐसा आदमी जो शांत गली में नहीं

बल्कि अँधेरी गलियों में लगता था.

लेकिन जो मुझे हैरान कर गया, पानी पर गले रुक गया, वह जवान औरत जो उसके बगल में चल रही थी.

लग भाग 25 साल की, उसके बाज़ू से हलके से चिपकी हुई, टाइट काली ट्राउज़र्स में जो पैरों को हुग कर रही थीं और

सादा सफ़ेद t-shirt जो उसकी कर्व्स को ज़ाहिर कर रही थी – सेक्सी, कॉंफिडेंट, लम्बी लेहेरदार बाल हंसने के साथ

उछाल रहे जब उसने कुछ धीमे बोलै.

वह कसुआलय सिगरेट पी रहा था, एक बाज़ू उसकी कमर पर पोस्सेस्सिवेली.

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मेरा पहला ख़याल: बेटी? शायद ईद विजिट के लिए, लेकिन क्या वह '. भी है? यह समझा देता – रेस्पोंसिबल,

प्रोटेक्टिव लग रहा, अंदर ले जा रहा. तो जाबिर ने वररेक्ट किया; आदमी सिर्फ प्राइवेट फॅमिली मन था जो बेटी के

साथ लेकिन मैं सिर्फ गेस कर रहा, मुझे पता नहीं.

फिर भी, वह गेट पर रुका, सड़क स्कैन करता हुआ – बाएं, दाएं, ऊपर रूफटॉप्स तक. औरत पहले अंदर गयी,

कंधे पर से प्लेफुल मुस्कराहट फ़ेंक कर.

फिर, स्लो मोशन में, उसकी आँखें आखरी बार इधर उधर – तीखी, हिसाब लगाती, शिकारी जैसी. मेरा दिल रुक

गया; मैं कर्टेन के पीछे छुप गया इन्स्टिंक्टिवेली, गिलास अभी हाथ में. मुझे यकीन नहीं था उस पर तो उसे

पता नहीं चलना चाहिए था की मैं घूर रहा हूँ.

उसने गहरा काश लिया, धुंआ छोड़ा जो हवा में लटका रहा, सिगरेट अभी मुँह में, दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया.

मैंने झटका साक कर इग्नोर किया और बिलकुल परवाह नहीं की क्यूंकि मेरा कोई लेना देना नहीं था और जाबिर के पास

वापस गेम जारी करने चला गया. ज़िन्दगी चलती रही.

Eid-ul-Fitr की सुबह रोशन और ख़ुशी भरी थी. मस्जिद में खुसूसी नमाज़ के बाद, जहां तक्बीरों और “ईद

मुबारक” के गले मिलने से गूँज रही थी, हमारा बारे घराना और पडोसी एक बड़े कम्युनिटी हॉल में जमा हुए.

जगह बदल चुकी थी – रंग बिरंगे बैनर्स, खाने से लड़ी मेज़ें, लिवली डांस फ्लोर जहां स्पीकर्स भंगड़ा

बीट्स और पॉपुलर सांग्स चला रहे थे.

अब्बू और मैंने मज़ाक में ओउत्फिट्स मैच किये – क्रीम सुइट्स सटल गोल्ड एम्ब्रायडरी वाले, परफेक्ट टैलोरेड. “बाप

बीटा, शो चुरा लेंगे,” उन्होंने मज़ाक किया जब हमने घर से निकलने से पहले एक दुसरे के कालर ठीक किये,

दोनों शार्प और फख्र से.

लेकिन अम्मी – उन्होंने सबका सांस रोक लिया. अब्बू ने सेक्रेटली एक स्तुन्निंग गाउन बनवायी थी: floor-length लम्बी

आस्तीन वाली, बॉडीकॉन सिल्होउएत्ते जो फिगर को एलिगेंट तरीके से कंटूर करती थी जबकि पूरा पर्दा. मल्टीकलरेड

सीक्विन्स वर्टीकल स्ट्राइप्स में बहते हुए, हर रौशनी पकड़ कर रेनबो की तरह चमकते.

उन्होंने कस्टम वर्क पर अच्छा खर्च किया था, चाहते थे वह क्वीन जैसी महसूस करें – खूबसूरत, कॉंफिडेंट

, और अपने उसूलों के साथ. नयी जेवेलरी गले और कानों में चमकती हुई, हल्का मेकअप फीचर्स को एनहान्स

करता हुआ, वह पुरे एलेगणसे रदियते कर रही थीं.

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हॉल एनर्जी से गूँज रहा था – घराने मिल रहे, बच्चे गुबारे दौड़ा रहे, कहलाएं ओउत्फिट्स कपड़े कर रही.

अम्मी अपने एलिमेंट में थी, लिवली और हंस रही, सीक्विन्स चमकते हुए जब वह भीड़ में सबको सलाम करती

गुज़रती थीं.

मैं ज़्यादा देर दूर न रह सका. डांस फ्लोर के पास उन्हें देखते hi दौड़ पड़ा. “अम्मी! मेरे साथ डांस करना

पड़ेगा – कोई बहाना नहीं!”

वह मुदिन, आँखें मोचक सरप्राइज से चौड़ी फिर प्यार से नरम. “बीटा, देखो तुम – सूट में कितने हैंडसम.

ठीक, एक डांस, लेकिन मेरे पैरों पर मत कदम रखना!”

हम फ्लोर पर शामिल हुए, हाथ जुड़े हुए म्यूजिक के साथ. “तुम यहाँ सबसे खूबसूरत औरत हो,” मैंने सच्चे

दिल से कहा, सिंपल स्टेप्स में गाइड करते हुए. “यह गाउन – अब्बू ने अच्छा किया.”

वह हंसी, ख़ुशी भरी आवाज़ जो सर घुमा देती थी. “किया न? लेकिन तुम – कितनी जल्दी बड़े हो रहे. जल्दी hi अपनी

उम्र की किसी स्पेशल के साथ नाचोगे.”

मैंने मुँह बनाया. “कभी नहीं. तुम फॉरएवर मेरी फेवरेट पार्टनर. बताओ अपना पसंदीदा ईद मेमोरी – जब तुम

मेरी उम्र की थीं.”

जैसे हम झूल रहे थे, उन्होंने गाओं की सादगी भरी सेलेब्रेशन्स की कहानियां सुनाई – साधा लेकिन प्यार से भरा.

परफेक्ट था.

बाद में, सांस फूली हुई, उन्होंने मेरा गाल थपथपाया. “बस अब – जाओ जाबिर ढूंढो और थोड़ी मासूम शरारत

करो. नफीसा आखिरकार आ गयी; मुझे उससे बात करनी.”

मैं चला गया, जबकि अम्मी अपनी दोस्त के पास गयीं.

“नफीसा! लो आ गयी – फ़िक्र हो रही थी,” अम्मी ने कहा, गरम झप्पी में खींचते हुए. “ईद मुबारक! इतनी देर क्यों?

मस्जिद में मिस किया.”

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नफीसा ने ड्रामेटिक आह भरी, दुपट्टा ठीक करते हुए. “ईद मुबारक, शाहिदा! ट्रैफिक और मेरा शौहर ब्लामे करो,

जो एक घंटे शूज डीडे नहीं कर पाया. तुम तो – वाओ! यह गाउन स्तुन्निंग है. घूमो, दिखाओ.”

अम्मी धीरे घूमी, सीक्विन्स चमके. “हुसैन की दें. और तुम भी कितनी अच्छी लग रही – यह रंग सूट करता.”

जल्दी hi रुबीना शामिल हो गयी, नफीसा की बातें करने वाली दोस्त मोहल्ले के पार से. “लेडीज! ईद मुबारक! शाहिदा,

तुम चमक रही हो – नयी जेवेलरी भी? सब बताओ.”

तीनो आसान बातों में डूब गयीं – ओउत्फिट्स कपड़े, शेयर खुरमा रेसिपीज, बच्चों की शरारतों पर हंसी.

हॉल के पार, अब्बू ने भीड़ में अम्मी की नज़र पकड़ी और गैलेंट बाउ के साथ हाथ बढ़ाया. “माय लेडी, एक डांस के

लिए चुरा लून?”

उनकी मुस्कराहट रोशन, बिना हिचक हाथ थामा. “चुरा लो, काइंड सर, तुम मेरे शौहर जो हो.”

वह साथ ग्रेसफुल चले, सालों का साथ हर क़दम में ज़ाहिर. उनके सामने, अम्मी के हाथ उनके कन्धों पर, कमर

म्यूजिक के साथ धीरे झूलती, गाउन जैसे लिक्विड लाइट बहती हुई. वह धीमे मीठी बातें करते – इनसाइड जोक्स, प्यार

भरा मज़ाक – सेलिब्रेशन में अपने बबल में खो गए.

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दिन पुरे ख़ुशी था: बेइंतेहा खाना, दिल से झप्पियाँ, ऐड़ी लिफाफे, हंसी दोपहर तक गूंजती रही. हम तब तक नाचे

जब तक पेअर दर्द न करने लगे, खाया जब तक पेट न भर जाए, हर पल को चेरिश किया.

शाम ढलते hi हम घर की तरफ कार में सवार हुए, थके हुए लेकिन सुकून से. पडोसी घर से गुज़रते हुए मैंने

कसुआलय देखा. वही वह रुग्गड़ आदमी, जिसका नाम अभी भी नहीं जानता, एक और औरत को अंदर ले जा रहा था, यह अब लग

भाग 30 साल की चमकीले पीले सलवार कमीज में, हंस रही थी दरवाज़े के अंदर गायब होते हुए.

मैंने ज़्यादा न सोचा – शायद और रिश्तेदार या दोस्त. अच्छा है उनके लिए; ऐसे दिन प्यार और साथ सेलिब्रेट करना चाहिए.

घर करीब 9 बजे पहुंचे, रात के आसमान में तारे चमक रहे. अम्मी आरामदेह बैंगनी निघ्टड्रेस में बदल

गयीं – नरम बेहटा कपडा रिलैक्स के लिए परफेक्ट – और किचन में लेफ्टोवेर्स गरम करने चली गयीं late-night फीस्ट के

लिए.

अब्बू सोफे पर बैठ गए, रिमोट हाथ में, मुतमईन आह के साथ चैनल्स बदलते.

उन्होंने नमाज़ भी पढ़ी. वह कभी नमाज़ नहीं छोड़ती.

जल्दी hi हम डिनर टेबल पर जमा हुए: गरम बिरयानी, ताज़ा सलाद, गरम नान. बातें बहती रही – हॉल के मज़ेदार पल

याद करते, अगले दिन के विजिट्स प्लान करते.

“याद है अंकल फ़ारूक़ डांस फ्लोर पर फिसला?” अब्बू हंसा.

अम्मी हंसी. “बेचारा – लेकिन स्टाइल से रिकवर किया!”

खाने के बाद मैं माफ़ी मांग कर हाथ धोने दूसरी किचन में गया, सबसे शांत जगह. पानी पैरों पर बेहटा

हुआ, मैंने आदत से खिड़की से देखा.

फिर हरकत. वह आदमी – अब एक और औरत को अंदर ले जा रहा. दूसरों से अलग, नीली साड़ी में, फेमिलिअर आसानी से अंदर

जा रही. अब भी सिगरेट मुँह में.

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मैं रुक गया, भुँह चढ़ाई. फिर एक? सुबह, दोपहर, अब रात? शुबहा उभर आया. यह साधी फॅमिली विजिट्स नहीं लग

रही. इतनी अलग अलग औरतें क्यों आ रही और जा रही?

यह सवाल दिमाग़ में लटका रहा जब मैं हाथ पोंछ रहा था, ईद की ख़ुशी अब उस एनिग्मेटिक पडोसी के बारे में

धीमी सी बेचैनी से भरी हुई
 
CHAPTER 5

ईद के जश्न के बाद कुछ चीज़ें हो रही हैं जो

मैं पूरी तरह समझ नहीं प् रहा

सुबह की रौशनी धीरे धीरे मेरे कमरे में दाखिल हो रही थी जैसे एक नरम

मेहमान, पतले लास के पर्दो से छनती हुई और बिस्तर पर सुनहरी हलकी धारियां

बनाती हुई.

मैं धीरे से करहा जब खिंच कर उठा, कल की बेइंतेहा nach-gaane और कम्युनिटी

हॉल में daud-dhoop से मेरी मसल्स आहिस्ता से एहतिजाज कर रही थीं.

मगर जैसे हमेशा होता था, अम्मी मुझसे बोहोत पहले उठ चुकी थीं. वहां,

मेरे बिस्तर के बगल में छोटी लकड़ी की मीज़ पर वह नाश्ता रखा था जो उन्होंने

चुपके से तैयार कर के रख दिया था – उनका वह प्यार भरा रिचुअल जो सुस्त सुबहों

को भी खुसूसी बना देता था.

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ताज़ा, खस्ता पराठों का ढेर अभी तवा से गरम, सुनहरे और घी के दाने चमक

रहे थे जो दिलकश तरीके से मैं को लुभा रहे थे; एक पियाली दही में चीनी और

इलाइची का हल्का छींटा जो नरम खुशबू फैला रहा था.

मैं तसव्वुर कर सकता था की उन्होंने पहले पैरों के पंजों पर आयी होंगी, मुझे

जगाना नहीं चाहते हुए, सब कुछ प्यार भरी मुस्कराहट के साथ सजाते हुए.

मैं धीरे से बैठा, एक पराठा उठाया और टुकड़ा तोड़ कर मुँह में डाला, घी

भरे पत्तों का मज़े लेते हुए जो मुँह में घुल रहे थे. घर में ख़ामोशी थी

सिवाए बहार से आती हुई एक पहचानी आवाज़ के – पानी की बराबर बहती, रदम वाली

छींटा जो पत्तियों और मिटटी पर पद रही थी.

मुझे तुरंत समझ आ गया: अम्मी

बगीचे में थी, अपने प्यारे पोड़ों को पानी दे रही थीं.

यह उनकी रोज़ की रदम का हिस्सा था, ख़ुसूसन सुबह के वक़्त.

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लेकिन इस सुबह, कुछ ठीक नहीं लग रहा था. हवा में एक हलकी सी बेचैनी थी. मुझे

यह पल बोहोत पसंद था – पाजामे में खड़ा होना, गरम सुबह की धुप चेहरे को

छूना, मोहल्ला धीरे धीरे ज़िंदा होता देखना.

पंछी चहचहा रहे थे, मेरी

नज़र बहार के मंज़र पर भटकी, और तब मैंने उसे फिर देखा – पडोसी घर के उस

रुग्गड़ आदमी को.

वह अपनी छोटी बालकनी पर था, जो हमारे दरमियान की नीचे दीवार से साफ़ नज़ारा

देता था. वह पुराने प्लास्टिक कुर्सी पर लेता हुआ था, टाँगे आराम से फैलाये, गॉड

में एक मैगज़ीन खुला हुआ.

वह पेज पलट रहा था सुस्ती से, लेकिन उसका पोस्चर बता रहा था की वह पूरी तरह

पढ़ने में मसरूफ नहीं. उसके होंठों में सिगरेट लगी हुई थी, नोक हलकी सी चमक

रही थी जब वह काश लेता, पतला धुंआ हवा में उड़ता और गायब हो जाता. बगल की

छोटी मीज़ पर गरम काली कॉफ़ी का मग था, अभी तक छुआ नहीं.

क्यूरोसिटी इस बार और ज़ोर से खींच रही थी. वह अब भी सिगरेट पी रहा था. आज उसने

सादा स्लीवलेस वेस्ट पहना था, जो गर्मी में मज़दूर अक्सर पहनते, उसके चौड़े,

मज़बूत सीने पर टाइट खिंचा हुआ जो काले बालों से ढाका था – कपडे के खुले हिस्से

से दिखाई दे रहा था.

रोक न सका, मैंने डेस्क के ड्रावर से पुराण बिनोकुलर्स निकल लिया – वह जो अब्बू ने सालों

पहले फॅमिली पिकनिक पर पंछी देखने के लिए दिए थे – और आँखों से लगा कर फोकस किया

जब तक वह साफ़ न दिखने लगा.

मैगज़ीन लगता था ग्लॉसी वाला, कार एड्स या शायद कुछ ज़्यादा सेंसेशनल; कवर साफ़ नहीं

दिख रहा था लेकिन लग रहा था पोर्न मैगज़ीन.

फिर सबसे हैरत अंगेज़ बात हुई, गरम धुप के बावजूद मेरी रीढ़ में सर्दी दौड़

गयी. उसने सर धीरे धीरे घुमाया, जैसे सिर्फ सुबह का मंज़र देख रहा हो.

उसकी नज़र

घरूँ की क़तार पर फेरी – पहले दूर वाले घर पर थोड़ी देर टिक कर, फिर नफीसा के घर

पर जो हमारे बिलकुल बगल में, और आखिरकार हमारे घर पर, बीच में.

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लेकिन यह जल्दी की नज़र नहीं थी; उसकी आँखें ख़ुसूसन हमारे पीछे बगीचे की तरफ

मुद गयीं, जहां ऊंची दीवारें ख़तम होकर पोड़ों और छोटे आँगन का खुला नज़ारा

देती थीं.

मैंने दिल से उम्मीद की की वह सिर्फ हरियाली को सराह रहा होगा, लेकिन नज़र बोहोत देर तक तिकी

रही – मिनट लगे – वह सिगरेट पीटा रहा, धीरे काश लेते और सुस्ती से धुंआ छोड़ते

हुए.

उसने एक ज़िद्दी माखी को हाथ हिला कर दूर किया, हाथ सुस्ती से हिला, लेकिन आँखें हमारी

तरफ से नहीं हटी.

मेरा दिल तेज़ी से धड़का जब मैंने बिनोकुलर्स नीचे किये और नंगी आँख से बगीचे की तरफ

देखा. अम्मी अब भी वहां थी, बेखबर, होसे ले कर घडून के बीच नरम हरकत से चल

रही थीं. उन्होंने हलके कॉटन के पाजामे पहने थे – नरम पंत और मैचिंग टॉप जो घर

में आराम के लिए ढीले थे.

मैं इस बारे में कोई ग़लत तरीके से नहीं सोचना चाहता था, मेरी परवरिश और उसूल मुझे

अम्मी के जिस्म के बारे में सेक्सुअल बात करने से सख्त मन करते थे – लेकिन सुबह की ोास और

झुकने की हरकतें कपडे को हल्का सा चिपका रही थीं, उनकी शक्ल को ज़्यादा ज़ाहिर करते हुए:

सीने से कमर और हिप्स तक नरम चउरवे, जब वह नीचे पोड़ों को पानी देने के लिए झुकती या

बैठती थीं.

मैं यकीन नहीं करना चाहता था की वह आदमी उनके जिस्म को ऐसे देख रहा है – उस तरीके से

सराह रहा जो इन्ट्रूसिवे और ग़लत लग रहा था.

लेकिन बिनोकुलर्स फिर से लगा कर मैंने देखा उसकी आँखें बगीचे पर, जहां अम्मी पोड़ों को

पानी दे रही थीं, बिलकुल टिक्की हुई, चेहरा पढ़ा नहीं जा सकता लेकिन इंटेंस. कुछ ग़लत था;

मेरे अंदर हिफाज़त का जज़्बा भड़क उठा.

मैंने बिनोकुलर्स गिरा दिए और कमरे से दौड़ कर बहार निकला, बगीचे की तरफ जाने का इरादा की

अम्मी को जल्दी ख़तम करने को कहूँ – शायद बहाना बना लून की अंदर मदद चाहिए या

नाश्ता ठंडा हो रहा. दिमाग़ फ़िक्र से दौड़ रहा था जब मैं कॉरिडोर से गुज़रा.

लेकिन सिटींग रूम में पहुँचते hi रुक गया, रहत की लहार दौड़ गयी.

वहां दरवाज़े पर दादी ज़ैनब कड़ी थीं, अम्मी की माँ – चेहरे पर प्यार भरी बड़ी मुस्कराहट,

हाथों में होममेड मिठाइयों से भरे कपडे के थैले.

मैं पूरी तरह भूल गया था

ईद के फ़ोन कॉल में उनका वडा: वह और नाना क़ादिर अगले दिन आएंगे, गाओं की मिठाइयां

लाएंगे और एक दो खाने के लिए रुकेंगे.

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बगीचे के दरवाज़े से अम्मी दिखी, गीले हाथों को टॉवल से पोंछती हुई, चेहरा सूरज की

तरह चमक उठा. “अम्मी! ओह, कितनी खूबसूरत सरप्राइज – जल्दी आ गए! अंदर आओ, अंदर

आओ.” फिर दादी ने मुझे सलाम किया.

“अस्सलामु अलैकुम, मेरे शरारती पोते!” उन्होंने पुकारा, थैले नीचे रखते हुए और

बाहें फैलाते हुए. “इधर आओ – देखूं पिछली बार से कितना बड़ा हो गया.”

पहले की टेंशन पल भर में पिघल गयी; “व अलैकुम अस्सलाम, दादी! फिर से ईद मुबारक!

आ गए – मुझे लगा बस लेट हो जायेगी.”

29 मिनट में, नाना क़ादिर भी शामिल हुए.

उस सुबह बाद में, मैं पूरा फायदा उठाना चाहता था – उनकी और कहानियां सुन्ना,

मोहल्ले में साथ घूमना, शायद गाओं की हिकमत जो वह बताना चाहती थीं.

जाबिर, मेरा हमेशा साथ रहने वाला दोस्त, जब थोड़ी देर बाद आया तो प्लान की खबर लगी और

एक्ससिटेड हो कर शामिल हो गया. “मुझे भी काउंट करो,” उसने मुस्कुराते हुए कहा. “दादी की

कहानियां किसी वीडियो गेम से बेहतर हैं.”

घर से निकलने से पहले, मैं रोक न सका और खिड़की से चुपके से पडोसी की बालकनी की तरफ

देखा – उस रुग्गड़ आदमी की, जो कल से मेरे ख्यालों में घूम रहा था.

मैं नहीं चाहता था की कोई बाक़ी बेचैनी हमारे सफर पर साया करे. परदे के पीछे से

धीरे देखते हुए मैंने स्कैन किया: कुर्सी खाली थी, न मैगज़ीन न कॉफ़ी का मग, सिगरेट

का धुंआ नहीं. वह कहीं नहीं दिखा – न बालकनी पर, न सामने के छोटे आँगन में जो

हमारी तरफ से दीखता था.

रहत की लहार आयी जैसे ठंडी हवा. वह बहार गया होगा, शायद काम या सौदा के लिए.

वजह कुछ भी, रास्ता साफ़ था, और सीने में सुकून उतरा. आज कोई अजीब नज़रें नहीं; मैं

रिलैक्स कर सकता था और दादी के साथ वक़्त एन्जॉय कर सकता था.

“चलो लाड्स – धुप तेज़ होने से पहले,” दादी ने दरवाज़े से पुकारा, हमारे साथ बाहें जोड़ते

हुए, चेहरा उम्मीद से चमकता हुआ. मैं और जाबिर दोपहर की गरम रौशनी में बहार निकले,

दूकानदार अपनी गाड़ियों से ताज़ा फल और ईद की बाक़ी रंग बिरंगी चूड़ियों की पुकार लगा रहे

थे.

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हमने दादी को मोहल्ले की पहचानी गलियों में धीरे धीरे घुमाया, पिछली मुलाकात से

छोटी छोटी तब्दीलियन दिखाते हुए.

आखिरकार हम उन्हें अनारकली बाजार की तरफ ले गए, सीधे अब्बू की दूकान पर. बाजार जैसे

हमेशा गूँज रहा था, तंग गलियां शोप्पेर्स से भरी जो कपड़ों और तैयार कुर्तों पर mol-le

रहे थे.

अब्बू की दूकान चल रही थी – रैक्स रंग बिरंगे शलवार कमीज सेट्स से भरे, एम्ब्रॉइडरेड

दुपट्टे झरने की तरह लटके, कस्टमर्स शर्ट्स के ढेर पलट रहे जबकि अब्बू पर्चासेस तेज़ी से

पैक कर रहे थे.

“अब्बू! देखो किसको लाये,” मैंने पुकारा, हाथ हिलाते हुए जब हम क़रीब पहुंचे.

अब्बू ने कस्टमर को कुरता मोड़ने में मदद करते हुए सर उठाया, चेहरा हैरत भरी बड़ी

मुस्कराहट से चमका जब उन्होंने दादी को देखा. जल्दी माफ़ी मांग कर काउंटर के आगे आये,

हाथ कपडे से पोंछते हुए. “अम्मी जी! कितनी खूबसूरत सरप्राइज – फिर ईद मुबारक! सेफ

पहुंचे?”

दादी चम्किन, उन्हें गरम झप्पी में खींचते हुए. “ईद मुबारक, बीटा. बिलकुल – अपने दामाद

की एम्पायर देखने कैसे छोड़ती. देखो यह जगह; पहले से ज़्यादा बिजी.”

अब्बू शर्मा कर हंसा, भरे रैक्स की तरफ इशारा करते हुए. “फ़ज़ल से, अम्मी जी. ईद के बाद रश

– सबको विजिट्स के लिए नयी चीज़ें चाहिए. बैठो, बैठो – बगल से चाय लाता हूँ.”

“फ़स की ज़रुरत नहीं,” दादी ने कहा, मगर स्टूल पर बैठ गयीं जो उन्होंने निकला. “सिर्फ गुज़र

रहे थे. लेकिन बताओ – बिज़नेस कैसे चल रहा? शाहिदा कहती है हमेशा पैरों पर रहते हो.”

“शिकायत नहीं,” अब्बू ने कहा, आँखें चमकती हुई. “अच्छे दिन और सुस्त, लेकिन बराबर. और

तुम – सफर ठीक? नाना साथ हैं?”

“वह टांगें हिलने घूम रहे,” दादी ने कहा. “अब भी मज़बूत, वह शख्स.”

हम थोड़ी देर और रुके, बाजार के दाम और गाओं के मुक़ाबले पर हलकी बातें करते हुए, फिर

अब्बू को उनके बिजी कस्टमर्स के लिए छोड़ा.

बाजार से निकलते हुए, हम चार – मैं, जाबिर, दादी, और अब नाना जो अपनी सैर के बाद मिल गए –

आसान बातों में डूब गए.

बात शाम के प्लान्स पर आयी. दादी की आँखें अचानक चम्किन. “जानते हो मुझे क्या पसंद

आएगा? आज रात खाना बनाना – प्रॉपर गाओं स्टाइल. तुम सब के साथ किचन में बोहोत देर से

नहीं हुई. क्या कहते हो?”

मैं मुस्कुराया. “हाँ! तुम्हारा खाना सबसे बेहतर.”

जाबिर एक्ससिटेड से माना. “बिलकुल – आंटी का खाना अच्छा, लेकिन दादी का वह स्पेशल टास्ते.”

दादी हंसी, खुश होकर. “चापलूस दोनों. ठीक, फिर – ताज़ा चिकन चाहिए. यहां अच्छी जगह

कहाँ? साफ़, भरोसेमंद?”

मैंने सोचा. “वही सूरज की बुचेरी जहां अम्मी हमेशा भेजती थीं. बेस्ट कट्स, हमेशा ताज़ा

और हलाल.”

“परफेक्ट,” दादी ने एक्ससिटेड कहा. “रास्ता दिखाओ, लाड्स. मेरे पुराने मसाला वाली स्पाइसी करहि

बनाने का इरादा है.”

हम बुचेरी की तरफ चले, बिजी साइड लेन में, हवा में ताज़ा गोश्त और लटकते हर्ब्स की

खुशबू.

मैं: दादी, यह कॅशे की दूकान. वह चिकन ले लेते हैं जो तुम चाहती थीं.

दादी: ठीक है बीटा. यक़ीन कर लो ताज़ा और ठीक हलाल हो.

कॅशे: (एप्रन पर हाथ पोंछते हुए काउंटर पर झुक कर बड़ी मुस्कराहट के साथ) गुड

आफ्टरनून! वेलकम, वेलकम. आज क्या चाहिए, खूबसूरत मैडम? कुछ ताज़ा चिकन?

दादी: (शराफत से सर हिलाते हुए) हाँ, दो पूरे चिकन प्लीज, साफ़ किये और काटे हुए.

मैं: दादी, मैं जाबिर के साथ कुछ देखने जा रहा हूँ. कॅशे को तैयार करने दो, हम

जल्दी वापस.

दादी: (मुझे तरफ मुद कर थोड़ी फ़िक्र से) ठीक, लेकिन दूर मत जाना बीटा. मुझे यह जगह

अच्छी नहीं आती.

(मैं और जाबिर दूकान से निकल गए. दादी काउंटर की तरफ मुदिन, सर का दुपट्टा हल्का

ठीक करते हुए.)

कॅशे: (मुझे जाते देखते हुए, फिर दादी पर पूरी तवज्जोह देते हुए गरम मुस्कराहट के

साथ) बिलकुल फ़िक्र मत करो, मैडम. जब तक वह गए हैं मैं आपका बोहोत अच्छा ख़याल

रखूँगा. तो… ऐसी खूबसूरत औरत को आज मेरी नेक दूकान में क्या लाया?

दादी: (गोश्त के डिस्प्ले पर नज़र डालते हुए) बस रोज़ का – चिकन pote-potion के लिए. कुछ

फैंसी नहीं.

कॅशे: (उनके फिगर पर तवज्जोह से नज़र डालते हुए फिर आँखों में मिलते हुए) यह, लेकिन

आप यहाँ कड़ी हैं तो सब फैंसी हो जाता है. मैं सूरज हूँ वैसे. और आप…?

दादी: (सर हल्का टेढ़ा करते हुए छोटी शरारती मुस्कराहट के साथ) हम्म… अभी से नाम

चाहिए? सिर्फ चिकन खरीद रहे हैं.

कॅशे: (धीमी हंसी के साथ चिकन चुनते हुए) बिलकुल चाहिए. मुझे जानना पसंद है

किसको अपना बेस्ट गोश्त दे रहा हूँ. ख़ुसूसन जब उनका टास्ते इतना… गेनेरोउस हो.

दादी: (भुँह चढ़ा कर नरम मुस्कराहट के साथ, चिकन की तरफ देखते हुए) गेनेरोउस

टास्ते? मुझे बस अच्छा क्वालिटी चिकन पसंद है, बस.

कॅशे: (मोटा चिकन उठा कर दिखाते हुए, नज़र पल भर उनके सीने पर जा कर फिर

आँखों में) क्वालिटी, हाँ. देख सकता हूँ आप अच्छी चीज़ों की क़द्र करती हैं. देखो

कितना भरा और परफेक्ट… आदमी को अपना माल दिखने में फख्र होता है.

दादी: (चिकन को सराह कर सर हिलाते हुए, आँखों में हलकी अमज़द चमक) तुम्हारा

चिकन ताज़ा लगता है, यह तो मानना पड़ेगा.

कॅशे: (मुस्कराहट और चौड़ी करते हुए साफ़ करना शुरू) सिर्फ स्पेशल कस्टमर्स के लिए

ताज़ा. बताओ मैडम… कभी पिग सउसगेस पसंद आये? कुछ औरतें कहती हैं क्यूरियस हैं,

सिर्फ एक बार.

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दादी: (नरम हंसी के साथ सर हिलाते हुए) नहीं शुक्रिया. हमारे घर में वह नहीं छू

जाता. सिर्फ हलाल.

कॅशे: (चोप्पिंग करते हुए प्लेफुल आँख मारता हुआ) समझदार औरत. पाक और ठीक

चीज़ों से चिपकी हुई. लेकिन अगर कभी कुछ बड़ा, मोटा, पूरा हलाल तरय करना हो… मेरे

पास बेस्ट रखे होते हैं.

दादी: (थोड़ी और मुस्कुराते हुए, उसके हाथों का काम देखते हुए) यक़ीन है. मेरे चिकन

को कितनी देर लगेगी?

कॅशे: (सर उठा कर देखते हुए, आवाज़ हलकी नीचे) ज़्यादा नहीं – सॉरी, मैडम कह रहा था.

आप वहीँ खूबसूरत कड़ी रहो मैं जल्दी कर दूंगा. जानते हो, दिन भर गोश्त संभालने

से अच्छे टुकड़े पहचान में आते हैं जब आते हैं.

दादी: (सीने के नीचे बाहें हलकी मोड़ते हुए, अब गरम मुस्कराहट) कॅशे के लिए बोहोत

बातें करते हो.

कॅशे: (धीमी हंसी के साथ पहला चिकन लपेट ते हुए) सिर्फ जब कोई बात करने लायक हो. आपकी

मुस्कराहट अच्छी है, जानते हो? पूरी दूकान रोशन कर देती है.

दादी: (हलकी सी शर्माहट के साथ नीचे देखते हुए) शुक्रिया. उम्र में शायद तारीफ

हमेशा पसंद आती है.

कॅशे: (लपेट ख़तम करते हुए काउंटर के क़रीब आते हुए) उम्र? आप तो स्तुन्निंग से एक दिन

ज़्यादा नहीं लगती. यह लो, ये भी ख़तम. और प्लीज – मेरा कार्ड ले लो. बिज़नेस के लिए बिलकुल. अगर

कभी और… गोश्त या कुछ और चाहिए तो कॉल करना.

दादी: (कार्ड लेने हाथ बढ़ाते हुए) ठीक, ले लेती हूँ.

कॅशे: लो… अच्छे से गहरा, पर्स के अंदर सेफ.

दादी: (पर्स में देखते हुए हलकी हैरत से) यह कार्ड किस लिए?

कॅशे: (हल्का झुक कर, आवाज़ धीमी और मज़ाक भरी) सिर्फ मेरा नंबर और डिटेल्स, ज़ैनब.

लेकिन अगर कभी मेरा बड़ा हलाल सॉसेज तरय करना हो… वह सच में स्पेशल वाला… तो कभी

भी कॉल करना. वडा है वर्थ होगा.

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जब मैं और जाबिर कुछ मिनट बाद दादी के पास वापस आये, उनके पास साफ़ लपेटा पैकेज

था, लेकिन उनका एक्सप्रेशन बदल गया था. वह सोच में डूबी लग रही थीं, पहले जैसी ख़ुशी

की चमक काम, सड़क की तरफ अबसेंटली देखती हुई.

“दादी, सब ठीक?” मैंने पुछा, उनके बगल में चलते हुए घर की तरफ.

जाबिर ने क्यूरियस नज़र डाली. “हाँ – चुप क्यों लग रही हो? सूरज ने ख़राब गोश्त दिया या ज़्यादा

पैसे लिए?”

दादी पालक झपकी, जैसे ख्वाब से जाग कर, और छोटी, be-maani मुस्कराहट दी जो आँखों तक

नहीं पहुंची. “क्या? ओह नहीं लाड्स – गोश्त ठीक है. अच्छी क्वालिटी, ठीक दाम.”

“लेकिन कुछ तो है,” मैंने नरमी से दबाया, जाबिर से जल्दी नज़र मिला कर. “ज़ोर से सोच रही लग

रही हो.”

वह पल भर रुकी, बैग के हैंडल पर उंगलियां कसीं, फिर हलके से कंधे ुचाके.

“कुछ नहीं सच में. बस… इंतज़ार में एक पुराणी याद आ गयी. गाओं के बाजार अलग थे न –

सब एक दुसरे को जानते थे.”

जाबिर ने सर टेढ़ा किया. “यक़ीन?” दादी ने कहा, “छोडो लाड्स – बात करने लायक नहीं. डिनर

पर फोकस करें; तुम्हारी अम्मी खुश होगी किचन में मदद से.”

हमने ज़्यादा नहीं दबाया, लेकिन साफ़ था कुछ हुआ था.

अब घर पर वापस शिफ्ट करें, पहुँचने से पहले hi, अम्मी घर में अकेली थी, बिलकुल अकेली,

इंतज़ार करते हुए वह नरम दुआ वाली तस्बीहात gun-guna रही थीं सुकून और इबादत की.

अचानक फ्रंट दूर पर ज़ोर की दस्तक ने खामोश सुर को काट दिया.

अम्मी रुक गयीं, ड्रामेटिक

तरीके से मुद कर आवाज़ की तरफ, आँखें चौड़ी और माथे पर हलकी सी सरप्राइज की लकीर.

उन्हें किसी की उम्मीद नहीं थी – इस वक़्त नहीं. लेकिन कौन हो सकता था?

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CHAPTER 6

मेरी माँ और इस अनजान आदमी के बीच

पहली baat-cheet

मैं उस दोपहर काफी जल्दी घर पहुँच गया, दादी ज़ैनब को बुचेरी के बगल वाली

छोटी मसाला की दूकान पर छोड़ कर. उन्होंने ज़िद की थी कुछ एक्स्ट्रा चीज़ें लेने की –

करहि के लिए उनका खुसूसी व्होले मसाला का ब्लेंड, कुछ सूखी लाल मिर्चें जो उन्होंने

कहा “बिलकुल ठीक तीखापन” वाली एक खुसूसी दूकानदार से.

“तुम लाड्स आगे जाओ,” उन्होंने हाथ हिला कर कहा, आँखें खाना बनाने की एक्ससिटेमेंट

से चमक रही थीं. “मैं नाना के साथ मिल लुंगी; वह अभी फल की गाड़ियों पर देख

रहे हैं. शॉपिंग में जल्दी नहीं करनी चाहिए – अच्छा खाना वक़्त मांगता है.”

नाना क़ादिर ने मानते हुए सर हिलाया, खुश थे की देर तक रुक कर पुराने दोस्त से बातें

कर लेंगे. जाबिर पहले hi अपनी अम्मी नफीसा की मदद के लिए घर चला गया था, तो आखरी

कुछ गलियां मैं अकेला चलता रहा, धुप पीठ पर गरम, सड़कें सुबह की भीड़ के

बाद दोपहर की ख़ामोशी में डूब गयीं.

हमारा घर नज़र आया – साधा दो मंज़िला मकान सफ़ेद धुले दीवारों वाला, सामने

का छोटा गेट हवा से हल्का खुला, सीढ़ियों पर लगे घड़े जो अम्मी इतने प्यार से

संभालती थीं.

मुझे ठन्डे पानी का गिलास और शायद अम्मी जो लंच बना रही थी उसकी झलक देखने की

उम्मीद थी, खुशबू खुली किचन की खिड़की से धीरे धीरे बह रही थी.

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लेकिन आखरी मोड़ मुड़ते hi कुछ हैरत अंगेज़ ने मुझे रोक दिया, पेअर पेवमेंट पर रुक गए.

वहां, हमारे फ्रंट दूर पर, चौड़ी पीठ मेरी तरफ, वह रुग्गड़ चेहरे वाला आदमी

खड़ा था – पडोसी घर का, तीखी आँखों वाला, हमेशा टूथपिक वाला, वह उनसेटलिंग

जज़्बा जो उसके move-in से मुझे परेशां कर रहा था.

उसका हाथ उठा हुआ था, लकड़ी पर सख्त, बराबर रदम से दस्तक दे रहा था जो खामोश

गली में गूँज रही थी. मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा, एड्रेनालाईन की लहार सीने में ठंडी

पानी की तरह दौड़ गयी.

शॉक ने मुझे जकड लिया – सांस रुक गयी, दिमाग़ सवालों से भर गया. यह यहाँ क्या कर

रहा था? हमारे दरवाज़े पर? जैसे अपना हक़ हो? कोई शिकायत? या कुछ बुरा? बालकनी से

उसकी देर तक टिक्की नज़रें याद आयी, हाथ पसीने से भर गए, सीने में दर और गुस्से

का मिलाप.

मैं जल्दी पडोसी दीवार के पीछे छुप गया, धीरे से झांकते हुए, कानों में दिल की

धड़कन गूँज रही थी. पल भर पैनिक घुमा – दौड़ कर सामने जा कर रोक लून? चिल्लाऊं?

लेकिन फिर अकाल आयी. मैंने खुद को शांत किया, गहरी सांसें लेते हुए छुपते हुए.

शायद सिर्फ पड़ोसियों से मिल रहा हो – नया रहने वाला, मोहल्ले में राउंड लगा रहा, शराफत

से इंट्रोडस कर रहा. हमारे मोहल्ले में ऐसा होता था; लोग मिठाई लाते या सिर्फ सलाम करते

अच्छे रिश्ते के लिए. बुरा न सोचो. Be-gunaah हो सकता, बस अंदाज़ अजीब.

फिर भी वक़्त गलत लग रहा, बेचैन करने वाला. अम्मी घर में अकेली थी. नाना क़ादिर अभी

लम्बी सैर से नहीं लौटे – वह अक्सर लम्बा रास्ता लेते, पुराने दोस्तों से रुक कर बातें करते.

दादी ज़ैनब अभी बाजार में अपने मसाले ले रही थी, शायद नाना के साथ क्यूंकि दोनों

घूमने में मज़े ले रहे थे.

घर खामोश, be-hifazat, और अम्मी का दरवाज़ा खोलना इस अजनबी के सामने, कोई और पास न हो,

पेट में गिरह सी बन गयी.

छुपने की जगह से देखता रहा जब दरवाज़ा धीरे खुला. अम्मी ने धीरे से बहार झाँका,

चेहरा शरीफ लेकिन होशयार, जैसे हमेशा अनएक्सपेक्टेड मेहमान के साथ. उन्होंने कुछ नरम

कहा – दूरी से लफ्ज़ नहीं सुन सके – लेकिन आदमी ने जवाब दिया, आवाज़ धीमी और बराबर, एक

हाथ से हल्का इशारा करते हुए.

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मैं समझ नहीं प् रहा था बात क्या थी; लफ्ज़ धीमे, हवा ले गयी. क्यूरोसिटी और हिफाज़त ने

दर को पीछे धकेल दिया. मुझे सुन्ना था, समझना था.

इधर उधर देखा कोई न देख रहा हो, फिर चुपके घर की तरफ दौड़ा, साइड वाल के साये में

चिपकता हुआ, गार्डन की फेंस के साथ चलता नरम मिटटी का रास्ता जहां स्नीकर्स की आवाज़ नहीं

आती.

मैं पुराणी छुपने की जगह में घुस गया – ऊंचे घडो का झुण्ड और गार्डन गेट के पास

नीचे ब्रिक की दीवार, झाड़ियों के पीछे झुक कर, पत्तियों से अच्छा कवर लेकिन सुनने के लिए

खुला.

दिल अब भी तेज़ी से धड़क रहा था जब मैं बैठा, कान टेढ़े किये. उनकी बात साफ़ होने से पहले,

गार्डन से अलग आवाज़ आयी – पानी की बराबर, रदम वाली छींटा, होसे पाइप पूरी तरह खुली

छूती हुई, ज़मीन पर ज़ोर से पड़ता हुआ, जमा होकर गली की तरफ बह रहा.

लगता था होसे छूट गया, तप खुला, पानी ज़ोर से फींक रहा, मिटटी भिगोता और रास्ते पर बह

रहा. सोचा कैसे – शायद अम्मी के पहले वाटरिंग से – तब तक आदमी की आवाज़ साफ़ हो गयी

दरवाज़े पर अम्मी से बात करते हुए.

गजेंद्र: Hi तेरे! मैं गजेंद्र, आपका नया पडोसी बगल से. कुछ दिन पहले hi शिफ्ट हुआ हूँ.

(अम्मी वहां कड़ी, थोड़ी होशयार, हाथ आगे बन्दे हुए.)

अम्मी: ओह, hello. मिल कर अच्छा लगा. उम्मीद है शिफ्ट अच्छी हो रही होगी.

गजेंद्र: एडवेंचर तो है hi! बस सेटल होने की कोशिश. वैसे, पूछना था क्या आपने होसे पाइप

चलता छोड़ दिया? गार्डन में काफी पानी बह रहा था.

(अम्मी के गाल लाल हुए जब उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ.)

अम्मी: ुम, हाँ. माफ़ कीजिये. कभी कभी भूल जाती हूँ, गार्डनिंग में मसरूफ होकर.

गजेंद्र: माफ़ी की क्या ज़रुरत! सब के साथ होता है. चल कर देखें? मदद कर दूँ ख़ुशी से.

(जब वह बहार निकलीं, उन्होंने हिचक कर सर हिलाया. उन्हें मंज़ूर नहीं था क्यूंकि हमारे मज़हब

में शादी शुदा औरत का किसी गैर मर्द के साथ चलना अजीब है, ख़ुसूसन पाजामे में, लेकिन

उन्होंने माना क्यूंकि इंकार करना बदतमीज़ी होती.)

अम्मी: ठीक, चलिए. शुक्रिया मदद का.

(वह गार्डन की तरफ चले, फूल खिल रहे थे, गजेंद्र बगल से देखता हुआ, धीरे से उनकी

कर्व्स की क़द्र करता हुआ.)

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गजेंद्र: आपका गार्डन बोहोत खूबसूरत है. बिलकुल आप पर सूट करता. देख कर लगता है कितनी

मोहब्बत और म्हणत डाली है – यह आपकी शख्सियत की अक्स है.

अम्मी: शुक्रिया! गार्डनिंग में बोहोत सुकून मिलता है. फितरत से जुड़ने और ज़िन्दगी की afra-tafri में

अमन पाने का जरिया.

गजेंद्र: ताज़ा लगता है ऐसी शख्स को मिलना जो फितरत से इतना जुडी हो. अक्सर लोग रूटीन में इतने डूबे

होते हैं की मज़े नहीं ले पाते.

अम्मी: सच है. पोड़ों की देखभाल और उन्हें उगते देखना कुछ अलग hi सुकून देता है.

वह गार्डन गेट की तरफ चले, अम्मी आगे तेज़ी से, गजेंद्र पीछे क़रीब. मेरी छुपने की जगह से

देखता रहा, और पल भर को सोचा शायद वह अच्छा इंसान hi हो – पडोसी ने आवाज़ सुनी और

मदद की ऑफर, कुछ बुरा नहीं. हमारे समाज में लोग एक दुसरे का ख़याल रखते थे; be-gunaah

हो सकता.

गार्डन में पहुँच कर अम्मी ने तुरंत मसला देखा. “वहां – गुलाबों के सामने एक और तप

खुला छूट गया. पहले माँ के आने की जल्दी में डिस्ट्रक्टेड हो गयी; आज गाओं से आयी हुई हैं.”

गजेंद्र ने सर हिलाया, क़रीब आकर मदद के लिए. “कोई बात नहीं – सब के साथ होता.”

अम्मी थोड़ी झुक कर तप ठीक करने लगी, नॉब ज़ोर से घूमती हुई पानी रोकने, हरकतें प्रैक्टिकल और

फोकस्ड. लेकिन जैसे hi वह झुकी, गजेंद्र ने धीरे पीछे क़दम उठाया, पोस्चर बदला.

उसकी आँखें उन पर टिक गयीं, उनकी बड़ी हिप्स पर सख्त नज़र – कपडा खिंच कर चिपक रहा था,

नरम, गोल शेप को ज़ाहिर कर रहा. शॉक ने मुझे मारा जैसे लहार, सांस गले में अटकी.

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यह कैसे कर सकता था? यह आदमी, यह अजनबी गजेंद्र, मेरी अम्मी को इतनी रॉ इंटेंसिटी से देख रहा,

चेहरा भूखा सा, तारीफ भरा सबसे बुरी तरीके से.

मुझे इस आदमी से शॉक लगा – मुट्ठियाँ झाड़ियों के पीछे कास गयीं, सीने में गुस्सा गरम

उभरा. यह पहली बार था जो मैंने देखा, याद से – किसी मर्द का अम्मी को ऐसे देखना, क़रीब से,

सेक्सुअल तरीके से जो मेरी जिल्द पर सिहरन दौड़ता था.

पहले कभी ऐसा नहीं देखा; अम्मी मेरे लिए सिर्फ अम्मी थी – पक्की इबादत गुज़ार, शर्मीली, हमारे

घर की पाकिज़त की मरकज़. किसी मर्द ने मेरी मौजूदगी में ऐसा देखा नहीं, इतनी be-sharmi से उनकी

कर्व्स पर नज़र दौड़ाई नहीं.

बाजार की दूर की नज़रें अलग थीं; यह इंटिमेट था, इन्ट्रूसिवे, हमारे गार्डन में. दिमाग़ में कुछ

बदलने लगा – be-gunaah नज़र से सख्त दुनिया की समझ की तरफ, कन्फूसिओं, हिफाज़त और एक नयी,

बेचैन करने वाली समझ की दुसरे उन्हें कैसे देख सकते हैं.

यह पहली बार था अम्मी के लिए ऐसी अटेंशन – तारीफ या नज़रें जो निय्यत से भरी – किसी गैर मर्द से,

ख़ुसूसन अलग मज़हब के. हमारी ज़िन्दगी परदे और ईमान पर थी; ऐसी चीज़ें अजनबी, करीबन

मन थी.

जब अम्मी सीढ़ी हुई, होसे से पानी अब भी टपकता, गजेंद्र ने गाला साफ़ किया छोटी मुस्कराहट के

साथ. “काफी ज़ोर का बह रहा था – पुराने पाइप्स में प्रेशर तेज़ होता है. ज़्यादा फलेश जमा हो जाए

तो चीज़ें… अचानक पहात भी सकती हैं.” वह बह ते हुए पानी की तरफ चले.

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गजेंद्र: जानते हो, फूलों के बीच में तुम्हारा चलना कितना मोहक है. हर चीज़ को सँभालने

में कितनी लचक है.

(अम्मी थोड़ी सी हिलती है, सिगरेट के धुएं से थोड़ी असहजता महसूस करते हुए.)

अम्मी: तारीफ़ के लिए शुक्रिया, लेकिन क्या आप इसे दूसरी तरफ स्मोक कर सकते हो? मैं स्मोक नहीं करती,

और हवा साफ़ रखना पसंद करती हूँ.

(गजेंद्र सर हिलता है, एक कदम पीछे लेता है और थोड़ा घूम कर धुय उससे दूर फेंकता है.)

गजेंद्र: बिलकुल! इरादा परेशां करने का नहीं था. तुम सच में इस जगह को कितना सुन्दर बनती हो.

(वह मुस्कुराती है शिस्टाचार से, फूलों के काम में लग जाती है.)

अम्मी: धन्यवाद. मैं कोशिश करती हूँ एक शांत वातावरण बनाने की, सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि

हर आने वाले के लिए.

(गजेंद्र उसे देखता है, उसकी लगन से प्रभावित होकर.)

गजेंद्र: बाघ में वक़्त का पता hi नहीं चलता. तुमने यहाँ एक स्वर्ग बना दिया है.

(अम्मी अपनी स्थिति बदलती है, काम पर ध्यान रखते हुए.)

अम्मी: मुझे इसमें बहुत सुकून मिलता है. सिर्फ पौधों से नहीं, बल्कि जो शान्ति लाता है उससे.

(गजेंद्र थोड़ा और पास झुकता है, उत्सुकता बढ़ती हुई, नज़र बदलता है.)

गजेंद्र: तुम इस जगह में जादू घुल देती हो. किसी को इतना समर्पित देखना प्रशंसनीय है.

(अम्मी तनाव महसूस करती है लेकिन संतुलन बनाये रखती है.)

अम्मी: शुक्रिया, लेकिन मैं सच में बस काम एन्जॉय करती hoon—ye मेरे लिए पूरा करने वाला है.

(एक kshaṇik मौन, गजेंद्र उसे निरिक्षण करता है.)

अम्मी: ओह, रुकता hi नहीं जा रहा. ध्यान न देने पर हमेशा ऐसा hi मुश्किल होता है.

(गजेंद्र पास आता है, मदद के लिए झुकता है, लेकिन वह पीछे हैट जाती है.)

गजेंद्र: यहाँ, मैं तरय करता हूँ. चिंता मत करो. वह चउरवे संभालना मुश्किल होता है,

है न?

(अम्मी और असहज महसूस करती है, काम पर ध्यान देने की कोशिश.)

अम्मी: ये तो बस एक होसे है. इस पर इतना परेशां होने की बात नहीं.

(गजेंद्र पीछे नहीं hat-ta.)

गजेंद्र: सही. लेकिन तुम्हारे पास एक तरीका है की एक सिंपल काम को भी... कितना अट्रैक्टिव बना देती

हो. जैसे तुम हर चीज़ में एक विशेष आकर्षण लाती हो.

(अम्मी फिर हिलती है, असहजता साफ़, ध्यान बनाये रखने की कोशिश.)

अम्मी: ऐसा नहीं... मैं बस इसे सँभालने की कोशिश कर रही हूँ. इसे बड़ी बात नहीं बनाना चाहती.

इशारा छुपा था लेकिन spaṣht—usne "कर्व्स" शब्द का इस्तेमाल किया था उसके शरीर की तरफ

इशारा करते हुए, उसकी कोमल भर्ती को घूरते हुए, बिना सीधे "बूब्स" और "गांड" कहे.

अम्मी थोड़ी रूकती है, पीठ आधी मुड़ी हुई, और मैंने उसके कन्धों में हलकी तनाव dekhī—vah

समझ गयी थी की वह उसके शरीर की बात कर रहा था, उसकी फिगर जो ज़ाहिर हो रही थी.

लेकिन वह दृढ कड़ी रही, उसका सामना नहीं किया, और आगे बढ़ते हुए बात बदली. "हाँ, पाइप पुराने

हैं; कभी कभी अटक जाते हैं. मुझे बताने के लिए फिर शुक्रिया."

उसने कभी दांत नहीं pilayi—sur शिस्त, taṭasth रखा.

(जब वह होसे एडजस्ट करती है, गजेंद्र और पास झुकता है, बेहतर बांधने के लिए जानबूझकर.

अचानक, वह जानबूझकर पानी उछाल देता है उस पर.)

गजेंद्र: ऊप्स! माफ़ करना! इरादा नहीं था तुम्हे ऐसे अनएक्सपेक्टेड पानी देना.

(अम्मी पीछे hat-ti है, हैरान, आँखें थोड़ी बड़ी.)

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अम्मी: ओह! कोई बात नहीं, सच में. हादसे तो होते रहते हैं, है न?

(वह सर हिलती है हलकी हंसी के साथ, शर्मिंदगी को झटकने की कोशिश में पानी पोंछती है अपने

पाजामे से.)

गजेंद्र: यह सुन कर ख़ुशी हुई! लेकिन कहना पड़ेगा, ऐसे भीगी देखना कितना सुन्दर है. तुम्हारा

पजामा सच में तुम्हारी शकल दिखा रहा hai—jaise फूल करते हैं.

(अम्मी नीचे देखती है, गाल लाल, कपडा चिपक गया. नज़र बचती है, शांत रहने की कोशिश.)

अम्मी: ये तो बस पानी है... चिंता की कोई बात नहीं.

(आखिर पाइप ठीक हो गया, गजेंद्र ने ठीक किया.)

गजेंद्र: वैसे, मुझे तुम्हारा नाम नहीं पता. बताओगी, ताकि बात थोड़ी व्यक्तिगत लगे?

(अम्मी झिझकती है, नाम बताने में अनसुने. होसे से खेलती है, बात बदलने की कोशिश.)

अम्मी: अच्छा, नाम तो अभी ज़रूरी नहीं हैं, हैं न?

(गजेंद्र भौं उठता है, रोचक.)

गजेंद्र: अरे, चलो न! हर किसी का नाम होता है. यह तो हमारी पहचान का हिस्सा है. नए

पडोसी से नाम नहीं बताओगी?

(अम्मी असहज हिलती है, घर की तरफ देखती है.)

अम्मी: लगता है अब आप जा सकते हो, मदद के लिए शुक्रिया.

(गजेंद्र और पास आता है, ज़िद साफ़.)

गजेंद्र: लेकिन आज का दिन नए दोस्त बनाने के लिए सुन्दर है! थोड़ी बात चीत कर लें?

(अम्मी गहरी सांस लेती है, संतुलन बनाये.)

अम्मी: सच में, मेरे काम हैं. आप घर लौट जाएँ.

(उसकी बात अनदेखा कर, गजेंद्र उसके पीछे चलता है घर की तरफ जाते हुए.)

गजेंद्र: क्या बात छोड़ कर चली जा रही हो?

(जब वह आगे चलती है, गजेंद्र देखता है, मज़ाकिया सुर में.)

गजेंद्र: जानते हो, ऐसे मेरे सामने चलना ज़रूर ध्यान खींच रहा होगा.

(अम्मी तेज़ी से चलती है, उसकी नज़र के बोझ को महसूस कर.)

अम्मी: मैं बस अंदर जा रही हूँ.

(गजेंद्र फिर पास आता है, रोकता है.)

गजेंद्र: लेकिन नाम अभी भी नहीं पता! चलो, बता दो. वादा है नहीं काटूंगा.

(झिझकते हुए, वह कंधे पर मुद कर देखती है.)

अम्मी: शाहिदा है...

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(गजेंद्र का चेहरा बदलता है, आँखों में प्रशंसा.)

गजेंद्र: शाहिदा. कितना सुन्दर नाम. तुम भी सुन्दर हो, लेकिन देखता हूँ थोड़ी ठण्ड

लग रही hai—haath कांप रहे हैं.

(बिना सोचे, वह हाथ बढ़ता है और उसके बाइसेप्स को पकड़ कर गरम करने की कोशिश

करता है. अम्मी की आँखें हैरानी से बड़ी, पीछे हैट जाती है.)

अम्मी: मुझे छूना मत!

(उसका सुर दृढ, अचानक चिल्लाना दोनों को हैरान करता है.)

गजेंद्र: अरे, परेशां करने का इरादा नहीं था. बस मदद कर रहा था.

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(अम्मी पीछे hat-ti है, झिझक ख़तम.)

अम्मी: चिंता के लिए शुक्रिया, लेकिन दूर रहिये. मुझे छूना पसंद नहीं.

(तनाव हवा में, गजेंद्र हाथ ऊपर करता है, जगह देता है.)

गजेंद्र: बिलकुल, माफ़ करना! बस अपने तरीके से मदद कर रहा था.

(अम्मी संतुलन वापस पाती है, खफा लेकिन दृढ.)

अम्मी: समझने के लिए धन्यवाद. अब माफ़ कीजिये, मुझे काम पूरा करना है.

अम्मी शांत रही, सीधे दांत नहीं पिलाई भले hi उसकी नियत समझ गयी थी भरी नज़रों और

शब्दों से. उसने उसके शरीर पर सेक्सुअल इशारों को चतुरता से ताल दिया, बात सुरक्षित

विषयों पर ले गयी जैसे बाघ के पौधे या मोहल्ले की शान्ति.

वह अकेली थी aakhir—pariwar पास nahi—to झगड़ा नहीं चाहती थी, नए पडोसी से रिश्ता बिगड़ने

का खतरा नहीं लेना था जो शत्रु बन सकता था. बेहतर था शांत रहना, जल्दी ख़तम करना.

भीगे सिल्क पाजामे ने उसके शरीर की शकल दिखा di—bade बूब्स और बड़ी गांड, कोमल और

striyatmak—jis से वह बहुत असहज थी.

मुझे अपनी अम्मी को सेक्सुअल बना कर पसंद नहीं, उनके शरीर का इस्तेमाल स्टोरी में, लेकिन उस

पल, अम्मी को अपने कर्व्स साफ़ दीखते महसूस हुए, एक ऐसे आदमी के सामने जो उसका पति नहीं

था. उसकी धर्म ने मन किया tha—sikshaen परदह और असंबंधित मर्दों से दूरी पर ज़ोर देती थी.

आखिर अम्मी घर में घुसी, तेज़ी से कदम, अंदर से गुस्से mein—usne "मदद" में हाथ

छुए थे, उसके रफ़ उँगलियाँ जानबूझकर चिपक कर, घुसपैठिया. उसे पसंद नहीं आया,

व्यक्तिगत जगह का उल्लंघन.

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जब वह अंदर गयी, दरवाज़ा दृढ बंद किया, गजेंद्र गेट पर थोड़ी देर रुकता है. उसकी नज़र

उसकी जाती फिगर पर, उसकी गांड को घूरता hai—itni कोमल और हर तेज़ी कदम में हिलती हुई, भीगा

कपडा नेचुरल हिलोरे को और दिखा रहा.

मैं इस आदमी से शॉकेड tha—meri छुपने की जगह

बहुत पास लग रही थी, उसकी be-sharmi देख गुस्सा जल रहा था जब वह मुस्कुरा कर सिगरेट

फेंकता है मुद कर.

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.
 
CHAPTER 7

क्या मेरी पाक और वफादार माँ गजेंद्र के छूने

से एफेक्ट हो गयी है? और दादी ज़ैनब आजकल इतना अजीब

क्यों बेहवे कर रही हैं?

मैं शुरू में पूरे वाक़िये पर गजेंद्र के साथ गुस्सा नहीं tha—kam से काम

पहले तो नहीं. जब मैं फूलों के पीछे छुपने की जगह से चुपके से निकल

आया, मेरा दिमाग़ सब समझने की जल्दी में दौड़ रहा था.

शायद वह बस

मज़ाक़ कर रहा था, मैंने खुद से कहा, उसके शब्द be-tarteeb मज़ाक़ की

कोशिश, वह तरीका जो कुछ मर्द बिना सोचे फ़ेंक देते हैं.

लेकिन अम्मी ने

इसे गंभीरता से लिया था, उनका चेहरा उस हलके तरीके से सख्त हो गया था

जो वह करती थी जब कोई चीज़ अंदर से परेशां करती थी.

हमारा दीं एक shaadi-shuda औरत को किसी दूसरे मर्द के छूने की इजाज़त नहीं

deta—aise hi हाथ लग्न या नहीं; यह एक हद्द थी जो हमारी परवरिश में लिखी हुई

थी, इज़्ज़त और पाकीज़गी की लकीर जो चीज़ों को साफ़ रखती थी.

मैं थोड़ा खुद से

हंस भी लिया जब दूर जाते हुए, सोचा की उन्होंने उसके "गलती से" हाथ छूने पर

ज़्यादा रिएक्शन दिया होसे ठीक करते वक़्त. "चलो अम्मी," मैंने सोचा बाद में

उनको कहूंगा, "गजेंद्र बस मदद कर रहा tha—shayad कुछ मतलब नहीं था."

लेकिन फिर भी, मुझे उसकी नियत का यक़ीन नहीं था. उसके नज़रों का तिक्तक रहना,

शब्दों में छुपी tezi—ye मुझे खाने लगी, एक चुप्पी शक जो पूरी तरह मिट

नहीं रहा था.

बाक़ी दोपहर आम ज़िन्दगी के धुंधले में गुज़र गयी, जैसे वह अजीब मुलाक़ात

बस एक गुजरने वाला बादल थी साफ़ दिन में. दादी ज़ैनब और नाना क़ादिर बाजार

से थोड़ी देर बाद लौटे, उनके हाथों में सब्ज़ियों के एक्स्ट्रा थैले, ताज़ी अजवाइन,

और वह ख़ास मिर्चें जो दादी अपनी रेसिपीज के लिए क़सम खा कर लेती थी. वह घर

में धूम मचा कर आये, बाजार की कहानियां सुनाते हुए, एक पुराने दूकानदार

के पहचानने पर हंस रहे थे जो नाना को सालों पहले से जानता था.

अम्मी ने उनका गरम दिल से इस्तक़बाल किया, भले hi मैंने उनकी आँखों में एक हल्का

साया dekha—shayad दोपहर की बेचैनी का बचा hua—lekin उन्होंने इसे अच्छे से

छुपा लिया, डिनर की तैयारी में लग गयी.

शाम ढलते hi घर परिवार की तसल्ली बख्श आदतों से ज़िंदा हो उठा. सूरज नीचे

उतरा, खिड़कियों से लम्बी परछाइयां दाल रहा था, और हवा में किचन से आती हुए

मसालेदार खुशबू से भर गयी. अम्मी और दादी वहाँ साथ थी, खाने की

जादूगरी की जोड़ी, उनकी आवाज़ें काटने, हिलने और चखने के साथ मिल कर गूँज रही थी.

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अम्मी अपने रोज़ के कपड़ों में थी लेकिन कमर पर एप्रन बंधी हुई, अपनी तेज़ लचक से

हिल रही थी, जबकि दादी ने बाज़ू चढ़ाये हुए थी और दुपट्टा साफ़ तुक कर रखा था,

गाओं का अंदाज़ लाती hui—haath से मसाले पीस कर, थोड़ी थोड़ी चीज़ डालते हुए,

धाइयों की हिकमत के साथ.

बैठक में हम teen—main, नाना क़ादिर, और अब्बू (जो अपनी दूकान से लौटे थे जब

मस्जिद से अज़ान goonji)—sofe पर आराम से बैठे थे, यूँ hi बातें कर रहे थे. अब्बू

ने जूते उतार दिए थे, पीछे टिका कर थके लेकिन खुश आह भरी, गॉड में लेड़गेर

खुला रखा था दिन के हिसाब लिखते हुए. नाना सामने बैठे थे, तस्बीह हाथ में,

कभी कभी उँगलियों से चलते हुए, जबकि मैं ज़मीन पर कुशिओं पर पड़ा था, आधा

सुन रहा, आधा फ़ोन पर स्क्रॉल कर रहा.

"लम्बी दिन थी दूकान पर, हुसैन?" नाना ने पुछा, उनका सुर गहरा और मुस्तक़िल, आँखों

में नाना वाली उत्सुकता चमक रही थी.

अब्बू ने सर हिलाया, लेड़गेर एक पल के लिए बंद कर.

"बिजी, Abbu—Eid के बाद भी बिक्री जारी थी. लोग परिवार से मिलने के लिए चीज़ें ले रहे

थे. लेकिन अच्छा—,.' देता है."

नाना मुस्कुराये. "ईमानदार म्हणत हमेशा देती है. गाओं में हम फसलें कपडे के

बदले हफ्तावार बाजार में बदलते थे. कोई लेड़गेर नहीं, बस हाथ मिलाना."

मैंने बीच में बोलै. "मैथ्स से आसान लगता है, नाना. अब्बू हमेशा नंबर्स गईं

रहे होते हैं."

अब्बू हांसे. "दिमाग़ तेज़ रखता है, बीटा. एक दिन तुम sambhaloge—abhi से सीख लो."

किचन से हंसी सुनाई di—Daadi की ज़ोर दार क़हक़हा अम्मी के हलके के साथ मिल रहा था.

एक पल में, जब मैंने मुद कर देखा, दादी अम्मी के पीछे आयी खेलते हुए, उनके हाथ

बढे और अम्मी की बड़ी गांड को प्यार से हल्का सा दबाया, जैसे दादियां बिना सोचे करती

हैं, सब मज़ाक़ में.

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"शाहिदा, तेरी यह गांड अब भी उतनी hi मज़बूत है जैसे गाओं में मुर्गियों के पीछे

दौड़ती थी!" दादी ने छेड़ा, आवाज़ में शरारत भरी हुई.

दादी: (अचानक फिर अम्मी की गांड पकड़ कर जब वह बर्तन के लिए हाथ बढाती हैं,

हँसते हुए) "मंम्ह! बिलकुल मेरी जैसे! मुझे पता था तू यह बरकत मुझसे लेगा. देख—

मज़बूत, बिलकुल अपनी अम्मी जैसे!"

अम्मी: (हैरान, फिर हँसते हुए) "मां! यह क्या कर रही हो?!" (दूर हटने की कोशिश,

लेकिन और ज़ोर से हंस पड़ती हैं)

दादी: (पकडे हुए, सर हिलाते हुए) "नहीं नहीं, मुझे महसूस करने दे! यह क्वालिटी है—

पुराने दिनों जैसे. सोचती है मैं उन छोटी कुर्सियों में फिट होती थी? नहीं! हम जगह

लेते हैं, इज़्ज़त कमांड करते हैं! यही वजह है की तेरे नाना ने मुझसे शादी की."

अम्मी: (चेहरा छुपा कर, शर्मिंदा लेकिन खुश) "मां, रुक जाओ! कोई अंदर आ गया तो?!"

दादी: (हाथ हिला कर, अब भी पकडे हुए) "आने दो! देखने दो की असली औरतें ऐसे hi बनती

हैं. तेरे अब्बूजान को मेरी पसंद थी—"

अम्मी: (हँसते हुए, बीच में रोक कर) "ठीक है ठीक है, यह नहीं सुन्ना!"

दादी: (मुस्कुराते हुए, आखिर छोड़ कर) "मैं सीरियस हूँ, मेरी बेटी. यह तेरी ताक़त है.

कभी किसी को शर्मिंदा न होने देना इसके लिए. इस जिस्म की हिफाज़त करना, समझी? यह तेरा

है, सुन्दर है, और हमारा है."

अम्मी: (मुस्कुराते हुए, कमर पर हाथ रख कर) "ठीक है, मां. हिफाज़त करुँगी."

दादी: (सर हिला कर खुश) "अच्छा. अब चिकन के साथ मदद कर वर्ण जल जायेगा."

अम्मी ने सर हिलाया, अब भी क़हक़हा करते हुए. "तुम नहीं सुधरेगी. लेकिन theek—namak दो."

यह बात हवा को हल्का कर गयी, उन दोनों के बीच प्यार भरे रिश्ते की याद दिलाती हुई.

जल्दी hi डिनर तैयार, टेबल पर गरम गरम डिशेस से सज गयी, पूरा घर जन्नत की

खुशबू से भर गया. हम पांच— अम्मी, अब्बू, नाना क़ादिर, दादी ज़ैनब, और मैं—

डाइनिंग टेबल पर इकठ्ठा हुए, कमरे में ऊपर की लाइट से हलकी रौशनी, दीवारों पर गरम

परछाइयां.

प्लेट्स पर ढेर लगी हुई:

दादी की तीखी करहि चिकन, नाम और उनके राज़ वाले मसाला से भरी; अम्मी का फ़लुफ़्फ़ी

चावल पुलाओ किशमिश और नट्स से सजा; गरम रोटी तवा से उत्तरी हुई; ठंडी होने के लिए दही

रायता; और निम्बू और चाट मसाला वाला सदा खीरे टमाटर का सलाद.

यह एक दावत थी,

सदी लेकिन ढेर साड़ी, वह जिस से दिन की परेशानियां भूल जाती हैं.

हम लगे हाथ, शुरू में चमचों की खनक और खुश नुमें से ख़ामोशी भरी.

फिर अब्बू ने पहला निवाला खा कर खुश आह भरी.

"शाहिदा, अम्मी ji—ye कमाल है. करहि... बिलकुल गाओं जैसे."

दादी ज़ैनब चमकी, उनको और रोटी देती हुई. "सारा क्रेडिट तेरी बीवी को, Hussain—usne आंच

बिलकुल ठीक राखी. लेकिन मेरा मसाला मदद किया, है न?"

अम्मी शर्मा कर मुस्कुरायी, नाना को परोस कर. "नहीं, Ammi—tumhare हाथों ने जादू

किया. मैं बस तुम्हारी पैरवी की."

नाना क़ादिर ने सर हिलाया, रोटी का टुकड़ा पहाड़ कर ग्रेवी में डुबोया. "Dono—ustad. यह

चिकन नाम, लज़्ज़तदार... घर के त्यौहार याद दिलाती है. तुम्हारे हाथों को दुआ."

मैंने निवाला निगला, मुस्कुराते हुए. "सबसे बेहतर डिनर. दादी, वह masala—teekha लेकिन

हद्द में. और अम्मी के चावल परफेक्ट, बादलों जैसे हलके."

अब्बू हांसे. "सुनते हो एक्सपर्ट की. लेकिन सच, खावतीनों, तुमने हद्द कर दी. हम मर्द

खुशनसीब हैं."

दादी अम्मी को आँख मारी. "सुना, शाहिदा? हमारे मर्द क़द्र करते हैं. क़ादिर, क्या

कहते ho—mere घर के खाने से बेहतर?"

नाना ने सोचने का नाटक किया, फिर मज़ाक़ किया, "अच्छा, घर में शाहिदा की मदद नहीं

थी. यह दो गुना behtar—gaon की औरतों को मत बताना."

अम्मी ने खेलते हुए हाथ से मारा. "अब्बू! झगड़ा मत शुरू करो. लेकिन shukriya—sabko.

खाओ; और है."

हम ऐसे hi जारी रहे, तारीफें आगे पीछे, टेबल गर्माहट और हंसी से ज़िंदा, दिन का पहला

अजीबपन परिवार की तसल्ली में धुंधला गया.

रात में, जब घर शांत हुआ, हम सब सोने चले गए. अम्मी और अब्बू अपने कमरे में,

दरवाज़ा धीरे बंद. अब्बू सीधा बाथरूम में नहाने, पानी की आवाज़ रोज़ की शाम की

आदत.

अम्मी अपनी मेकअप टेबल पर बैठी, छोटी आईने में थकी लेकिन सोच में डूबी शकल

दिखाई दे रही थी हलकी लैंप की रौशनी में. वह गहरी सोच में लगती थी, उँगलियाँ क्रीम के

जार के किनारे पर चल रही थी, चेहरा दूर जैसे कोई परेशां करने वाली बात दोहरा रही हो.

उन्हें दिन का वह परेशां करने वाला गजेंद्र याद आ gaya—achanak दरवाज़े पर

खटखटाहट, बाघ में "मददगार" घुसबैठ. याद ताज़ा थी: उसके छुपाये तारीफ़, नज़रों

का टिकना, और ख़ास कर होसे बांधते वक़्त हाथ छूना.

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उसके रफ़ उँगलियाँ उनकी पर लग्न, मदद के बहाने एक सेकंड ज़्यादा टिकना. अब उनकी रूह

काँप उठी. कैसे उसने हिम्मत की? एक अजनबी, नियत में बोल्ड, उनकी मुक़द्दस हड्डों को

क्रॉस करते हुए.

अब्बू नहा कर निकले, टॉवल गर्दन पर, उनकी हालत देख कर. "शाहिदा? कहीं खो गयी हो.

सब ठीक?"

अम्मी पालक झपकाई, ज़बरदस्ती मुस्कुरायी. "ओह, कुछ नहीं, जान. बस दिन से थक गयी—

अम्मी के साथ खाना बनाना, आना जाना."

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"हाँ, सच," उन्होंने ज़िद की, कड़ी होकर बिस्तर की चादर ठीक करने. "जाओ, हिसाब पूरा

कर लो. मैं ठीक हूँ."

अब्बू ने चेहरा देखा लेकिन सर हिलाया. "ठीक hai—agar तुम कहती हो. ज़रुरत पड़े तो

बुलाना." उनकी तसल्ली से खुश, वह बैठक में चले गए दिन के हिसाब के लिए, लेड़गेर

हाथ में.

अकेले, अम्मी ने खुद से कहा की उन्हें गजेंद्र के छूने के लिए रब से मदद चाहिए—

वह na-pasand छुअन जैसे दाग़ लगा हुआ. वह कमरे के कोने में जा-,,., पर

गयी, धीरे से बिछा कर, क़िब्ला रुख. घुटने तक कर, दुआ शुरू की, पहले धीमी आवाज़,

फिर मज़बूत.

"या ,.', आज की कोई कमी माफ़ करना. अजनबियों की नज़रों और छुअन से हिफाज़त करना.

वह aadmi—niyat साफ़ नहीं थी; महसूस किया. उसके छुअन से पाक कर दो, या रब्ब.

मुझे अपनी परदह में और मज़बूत बनाओ, ऐसे मक़ामात से दूर रखो.

"मेरी फॅमिली को बरकत दो, फ़िटने से बचाओ. अमीन."

मैंने हॉलवे से चुपके देखा जब अपने कमरे जा रहा tha—unki शकल सजदे में,

हाथ उठाये दुआ में. जब ख़तम की, अब्बू लौटे, उनको अब भी जा-,,., पर पाया.

अब्बू: (धीरे, कमरे में आते हुए और अम्मी को दुआ में देखा, आवाज़ में जज़्बात)

"हबीबती… देर हो गयी. बिस्तर पर आओ. आज इतनी गहरी दुआ क्यों?"

अम्मी: (धीरे, अब भी झुकी, हाथ जोड़े) "अभी नहीं, मेरे प्यारे. मेरा दिल… भरी है.

इसे पाक करना है."

अब्बू: (पास बैठ कर, फ़िक्र से) "पाक करना? किस चीज़ से? आज कुछ हुआ? बता सकती हो."

अम्मी: (सर हिलाते, आँखें बंद) "कुछ ऐसा नहीं जो तुम ठीक कर सको. बस… दुनिया

इतनी na-paak है. कभी छोटी सी चीज़ भी दाग़ जैसे लगती है."

अब्बू: (धीरे कंधे पर हाथ रख कर) "दाग़? हबीबती, तुम सबसे पाक रूह हो जो

जानता हूँ. जो भी है, तुम्हारी गलती नहीं."

अम्मी: (आवाज़ थोड़ी टूटी) "पता है, लेकिन… बस रब से मांगना है हिफाज़त. मुझे

मज़बूत रखे. कभी ऐसा… गन्दा महसूस न करना पड़े."

अब्बू: (हैरान, गले लगा कर) "गन्दा? मतलब?"

अम्मी: (जल्दी, रोक कर) "नहीं नहीं, वह नहीं जो सोच रहे हो. बस… पाकि कितनी नाज़ुक है

इसकी याद. बेहतर होना है, उसके और क़रीब रहना."

अब मैं अपने बैडरूम में, घर अँधेरा और शांत, मैंने दूसरे कमरे में मुद कर

देखा जहां नाना क़ादिर और दादी ज़ैनब सो रहे थे. कुछ गलत laga—darwaza थोड़ा

खुला, अंदर से हलकी रौशनी.

चुपके देखा: नाना बिस्तर पर खर्राटे ले रहे थे, ब्लैंकेट में लिपटे सोये हुए.

लेकिन दादी, पीली स्लीवलेस निघ्टड्रेस में, हैडबोर्ड से टिका बैठी थी, फ़ोन पकडे,

उँगलियाँ टाइप कर रही थी, चेहरे पर हलकी मुस्कराहट.

मैंने सोचा शायद दोस्तों को message—din भर देखा था फ़ोन निकाल कर टाइप करते

हुए वह फोकस्ड अंदाज़. लेकिन मुस्कराहट अलग thi—raaz भरी, जैसे ख़ुशी से, आम

बातों वाली नहीं.

उन्होंने नाना को देखा, पक्का किया की सो रहे हैं, फिर धीरे उठी, शाल ोधी, और बहार

निकली, आँखें स्क्रीन पर, टाइप करते हुए मुस्कुराती हुई.

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मुझे hairaani—ab इस वक़्त कहाँ? चलते हुए फ़ोन पर चिपकी, स्क्रीन की रौशनी चेहरे

पर, वह मुस्कराहट जारी, गरम और दिलचस्प.

मुझे दादी की ज़िन्दगी का ज़्यादा पता nahi—kya यह रात की आदत thi—lekin मेरे लिए नया

था. शायद पुराने दोस्तों से बात, गाओं की गॉसिप. लेकिन दोस्त अब सो रहे होंगे; देर हो

गयी थी. कुछ खाने लगा.

वह बहार वृंदा की तरफ गयी, दीवार से टिका, अब भी टाइप, जवाबों पर मुस्कराहट

बढ़ी. फिर फ़ोन baja—dheemi वाइब्रेशन रात की ख़ामोशी mein—jis से बात कर रही थी

उसी का. हैरान होकर इधर उधर देखा, फिर उठाया, कान पर लगाया.

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बात शुरू की, आवाज़ धीमी, कभी हलकी हंसी निकलती. बाद में हाथ मुँह पर रख कर

हैरानी या ख़ुशी से, जैसे कुछ मज़ेदार या शॉक वाला बोलै, लेकिन मुस्कुराती रही,

चेहरा स्क्रीन से रोशन.

मैंने सोचा शायद दोस्तों से गॉसिप, रात की गाओं की कहानियां. लेकिन एक चीज़ हैरान

ki—woh घर के वृंदा के बहार वाशरूम की तरफ गयी, कॉल पर, मुस्कुराते हुए बात

करते.

अंदर गयी, दरवाज़ा धीरे बंद किया क्लिक के साथ.

मैं pareshan—kya इतना ज़रूरी? प्राइवेसी क्यों? रात की हवा भरी लगी, सवाल दिमाग़

में घूमते हुए जब मैं बिस्तर की तरफ गया, दिन के वाक़ियात और यह नया राज़ बेचैन

कर रहे थे.

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CHAPTER 8

क्या गजेंद्र मेरी माँ के पीछे पीछे हर जगह जा रहा है,

वह चाहता क्या है?

दादी ज़ैनब और नाना क़ादिर के post-Eid विजिट को अब दो हफ्ते हो गए थे, और घर उनकी मौजूदगी

से एक आरामदेह लहजे में बस गया था.

यह चौदह दिन त्यौहार के हलके सिलसिले जैसे lage—subah नाना की गाओं की कहानियां, दोपहर दादी

की किचन में मददगार हाथ, और शाम परिवार टेबल के गिर्द इकठ्ठा, हंसी और सदा खानों

के साथ.

शुरू की जोश अब आदति बन गयी थी, लेकिन छोटी छोटी चीज़ें बदलने लगी थी जिन्हे मैं ठीक

से पकड़ नहीं प् रहा था. दादी ज़्यादा एनर्जेटिक लग रही थी, अक्सर "छोटी सैर" या काम के लिए

बहार निकलती, जबकि अम्मी अपने रोज़ के कामों में लगी रही, भले hi मैंने उनकी आँखों में

कभी कभी चुप्पी सोच देखि.

पडोसी गजेंद्र उस अजीब बाघ वाक़िये के बाद चुप रहा था, उसका बालकनी अक्सर खाली, जिस से मैंने

याद को पीछे धकेल दिया. ज़िन्दगी आगे बढ़ी, अंदाज़ा और अमन से, या ऐसा hi लगा.

एक सुबह आयी, जब मैं पाजामे में नीचे उतरा, आँखों से नींद मलते हुए, अम्मी को हमेशा की

तरह किचन में पाया, उनका गरम और तरतीब वाला इलाक़ा.

वह स्टोव पर पराठे पलट रही थी,

आसानी से, दुपट्टा कन्धों पर ढीला पड़ा, धीमी धुन गन गुना रही थी. कमरा आरामदेह था,

केतली से भाप उठती, काउंटर पर बेलन से आता छिड़ा हुआ.

लेकिन आज कुछ अलग था. दादी ज़ैनब उठ चुकी थी और तैयार, रोज़ की निघ्टड्रेस में सुस्त सुबह नहीं,

बल्कि साफ़ सलवार कमीज में मैचिंग दुपट्टे के साथ, बाल पीछे बंधे, दिन के लिए तैयार लग

रही थी. वह अम्मी की सब्ज़ी काटने में मदद कर रही थी, हरकतें तेज़ी और मक़सद से, चेहरे पर

हलकी मुस्कराहट.

मैंने सोचा kyun—Daadi अक्सर थोड़ी देर ज़्यादा सोती थी, शहर की सुस्ती एन्जॉय करती थी बिना सुबह के

कामों के, जबकि नाना क़ादिर अब भी उनके कमरे में गहरी नींद में थे, उनकी खर्राटें पतली

दीवारों से गूँज रही थी दूर की बिजली जैसे, मस्जिद की अज़ान जितनी मुस्तक़िल. वह हमेशा ज़्यादा

खर्राटे लेते थे, सालों की गाओं की सख्त म्हणत की आदत, लेकिन यह तसल्ली बख्श थी अपनी आदति

में.

"सुबह बखैर, बीटा," अम्मी ने कहा, मुझे देख कर गरम मुस्कराहट के साथ पराठों की प्लेट

मेरी तरफ सरकायी. "नींद अच्छी आयी?"

"हाँ, अम्मी," मैंने जवाब दिया, टेबल पर बैठ कर. "दादी, आज जल्दी उठ गयी. सब ठीक?"

हमने साथ ब्रेकफास्ट kiya—parathe दही के साथ, ताज़ा फल, और और chai—table पर दिन के बारे

में आसान बातें. अम्मी ने अपनी रोज़ की फ्राइडे की बाजार शॉपिंग का ज़िक्र किया हफ्ते की चीज़ों के

लिए, जबकि दादी सर हिलती रही, आँखें कभी खिड़की की तरफ जैसे कुछ इंतज़ार कर रही हो.

ब्रेकफास्ट के बाद, जब मैं प्लेट्स साफ़ करने में मदद कर रहा था, दादी ने अम्मी को किचन

में अलाहदा खींच लिया, आवाज़ धीमी लेकिन जोशीली. "शाहिदा, बीटा, मैं सोच रही thi—aaj फिर

बुचेरी जाना चाहती हूँ. कुछ ताज़ा मटन ले आऊं उस ख़ास करी के लिए जो वादा किया था.

तेरा बीटा मुझे ले जाए; उससे रास्ता पता है."

अम्मी (शाहिदा): (काम रोक कर ऊपर देख कर) "बुचेरी, मां? हफ्ते के लिए गोश्त काफी है. क्या

ज़रुरत?"

दादी: (सर का दुपट्टा ठीक करते हुए, सुर हल्का लेकिन ज़िद से) "यह, लेकिन पता नहीं कब एक्स्ट्रा

चाहिए हो जाए. तेरे चाचा आ सकते हैं, या तेरे अब्बूजान को अपना पसंद टुकड़ा चाहिए. तैयार

रहना हमेशा अच्छा."

ज़ैद: (मैगज़ीन बंद कर, उत्सुक) "दादी, मुझे क्यों आना? बस बता दो क्या लाना है."

दादी: (धीरे हँसते हुए, सर हिलाते) "नहीं नहीं. मुझे तुझे चाहिए वहाँ. तेरी अच्छी आँख

है, और वह कॅशे सूरज तेरी इज़्ज़त करता है. कुछ ख़ास माँगना हो तो सुनेगा."

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अम्मी: (अपनी अम्मी को घोर से देख कर, सुर में थोड़ी शरारत) "ख़ास? मां, ऐसा लगा रही हो

जैसे बड़ी बात हो. बस गोश्त है."

दादी: (हाथ हिला कर, दरवाज़े की तरफ बढ़ते हुए) "इस घर को खिलाने में हर चीज़ बड़ी बात

है. अब ज़ैद, सैंडल्स पेहेन. ज़्यादा देर नहीं लगेगी."

ज़ैद: (खड़ा होकर, अम्मी को मुस्कुराते हुए) "फ़िक्र मत करो, अम्मी. मैं दादी को गम नहीं होने

दूंगा."

अम्मी: (रुक कर, दादी की शकल पर नज़र दाल कर) "मां… तुमने मेकअप लगाया है."

दादी: (गाल पर धीरे छू कर, बेखुदी दिखाते) "मेकअप? यह? बस थोड़ा पाउडर, शाहिदा. आज

धुप तेज़ है."

ज़ैद: (मुस्कुराते हुए, उठ कर) "दादी, बुचेरी जाते वक़्त लिपस्टिक नहीं लगाती. क्या बात है?"

दादी: (हँसते हुए, हाथ हिला कर) "तुम बच्चे ज़्यादा नोटिस करते हो! कुछ नहीं. बस प्रेसेंटाब्ले

देखना चाहती थी. सड़क पर पता नहीं किस से मिल जाए."

अम्मी: (भौं उठा कर, होंठों पर स्मिर्क) "प्रेसेंटाब्ले? मां, गोश्त खरीदने जा रही हो, शादी

में नहीं."

दादी: (दुपट्टा ठीक कर, नज़रें बचा कर) "शाहिदा, हर चीज़ पर सवाल क्यों? ज़ैद, चलो. अच्छे

टुकड़े ख़तम होने से पहले जाना है."

अम्मी: (मुस्कुराते हुए, सर हिलाते हुए हमे जाते देख) "पक्का करना की आधी दूकान न लाये!"

दादी: (हँसते हुए, ज़ैद का बाज़ू धीरे खींच कर) "शाहिदा, हमेशा मज़ाक़! जल्दी वापस आ

जाएंगे."

हम ताज़ी सुबह में बहार निकले, सड़कें रोज़ की हाला चल से भरी हुई, लेकिन आज दादी तेज़ी से चल

रही थी, कदम तीखे और ज़िद से, लगभग जल्दी में, जो उनकी रोज़ की सुस्त रफ़्तार से अलग था. वह अपना

छोटा पर्स मज़बूती से पकडे थी, दुपट्टा पीछे उड़ता हुआ.

"दादी, थोड़ा धीरे," मैंने कहा, हलकी दौड़ से पास आते हुए. "इतनी तेज़ी क्यों? बुचेरी कहीं नहीं

जा रही."

उन्होंने तेज़ी से मुस्कुराते हुए मुझे देखा, रफ़्तार नहीं घाटी. "ओह, बीटा, बस क्राउड से पहले

पहुँचने की जल्दी. बाजार जानते ho—achhe टुकड़े पहले जाते हैं. और ताज़ी हवा अच्छी लग रही;

गाओं के रास्तों की याद दिलाती."

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"सही," मैंने जवाब दिया, उनकी रफ़्तार मिलते हुए. "लेकिन ऐसा लग रहा जैसे लेट हो रही हो. सब ठीक?

तुम... जोशीली लग रही हो."

दादी धीरे हांसे, हाथ हिला कर. "कुकिंग के लिए एक्ससिटेड, बस. तेरे नाना को मेरी मटन करी

पसंद; हफ्ते से नहीं बनायीं. चलो, पास raho—budhiya जैसे मैं तुमसे आगे नहीं निकल जानी

चाहिए!"

मैं हंस दिया, बात ताल दी. "ठीक, रेस करते हैं."

सूरज: [humare paas aate dekh kar, zor se muskurata hai] अरे, देखो कौन आया फिर! मुबारक हो,

dost—tum इस सुन्दर औरत को इतनी जल्दी फिर मेरे स्टाल पर लाये. बाजार रोशन हो गया!

मैं: सच में, दादी ने hi कहा आज आना है.

दादी: [khelte hue mera baazu thapthapaati] चुप कर! राज़ मत बता.

सूरज: [zor se hansta] ः, फर्क नहीं पड़ता किसने फैसला kiya—mujhe ख़ुशी है तुझे देख कर, ज़ैनब.

कल की मुलाक़ात बहुत छोटी थी. आओ, आज के सबसे अच्छे टुकड़े दिखाता हूँ.

दादी: [garam muskurahat] कल जो गोश्त लिया था वह कमाल था, सूरज. इतना taaza—ghar सबने पसंद

किया.

सूरज: [aankhen chamak uthi] यह सुन कर दिल खुश हो गया. आज क्या दिल कर रहा? बकरे की पसलियां

शायद? अभी परफेक्ट हैं... या मेरी ख़ास मोती सउसगेस तरय करोगी? लम्बा, रसभरा, और जब औरत

अच्छे से मांगे तो हमेशा तैयार.

दादी: [halki muskurahat, thodi nazar hata kar] बकरे की पसलियां अभी अच्छी लग रही. दिखाओ क्या है.

सूरज: [paas aata hai, dheere unka haath pakad kar stall ke andar le jaata] Idhar—andar ठंडी है.

तुम्हारे दीं की ज़्यादातर औरतें दूसरे मर्दों का हाथ भी नहीं पकड़ती, लेकिन तुम... अलग हो.

तुम्हे खुशामदीद करना ख़ास लगता है. और जानते हो, जो चीज़ पहले हराम लगती है वह सही

छुअन से बिलकुल हलाल बन जाती है.

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दादी: [aur muskurate hue, sur halka rakhte, haath nahi chhudati] ज़िन्दगी छोटी है हर छोटे

नियम के लिए, सूरज. थोड़ी गर्माहट ने किसी को नुक्सान नहीं पहुँचाया.

सूरज: [andar le jaata, ab bhi haath dheere pakde] सही कहा. यहाँ बैठो इस स्टूल par—mere

पसंदीदा ग्राहकों के लिए सबसे अच्छी सीट. [aaraam se baithne mein madad] आराम करो जब मैं

सबसे अच्छे टुकड़े लाता हूँ. कल तुम्हारा सुन्दर गोश्त ढीले शाल के नीचे छुपा था, लेकिन आज

... ओह, सब कुछ साफ़, पूरा दिखाई दे रहा. असली क्वालिटी की क़द्र करना आसान हो गया.

दादी: [dheere qahqaha, dupatta theek karte hue jaan kar muskurahat] फिर तारीफ़? तुम बहुत मीठा

हो. कल की छोटी बात चीत ने सोचा से ज़्यादा मज़ा दिया.

सूरज: [tukde taiyaar karte hue thoda jhuk kar] यहाँ भी. तुम में इतनी लचक hai—nadar. और वह

नंबर याद है जो दिया था? कभी कॉल करना... गोश्त के लिए, या बस बात के लिए. ख़ास कर अगर वह

सउसगेस के बारे में उत्सुक ho—to हमेशा ताज़ा और तस्कीन बख्श. ज़ैनब, तुम मेरी सउसगेस

टास्ते कर सकती हो [aankh maarta hai] जानता हूँ वह हराम हैं.

दादी: [muskurate hue, aankhen thodi chamak] सूरज, तुम जानते हो हमारा दीं पोर्क के सउसगेस

"खाने" की इजाज़त नहीं देता.

सूरज: [khelte hue muskurata] फ़िक्र मत करो, हर हराम चीज़ पाक नहीं बन सकती.

दादी: [muskurate hue, aankhen chamak] देखा जायेगा.

मैं: दादी, बकरे की पसलियां ले रहे हैं या चिकन? चिकन जल्दी बन जाती.

दादी: [shaant mud kar] पहले देखते हैं सूरज क्या सुग्गेस्ट करता है, प्यारे.

सूरज: [mujhe dekhta, phir Daadi ko muskurate hue] तेरी दादी क्वालिटी जानती है. यह पसलियां

dekho—nam और परफेक्ट. लेकिन अगर कुछ बोल्ड चाहिए तो मेरी सउसगेस be-misaal. जो भी

पसंद हो वैसे hi काट दूँ.

मैंने उन्हें बात करने छोड़ दिया, पीछे हैट कर मुस्कुराते हुए. दादी को दोस्त मिलना अच्छा लग

रहा था, भले सूरज अलग दीं का हो—*****, नाम से लगता था. हमारे मुख्तलिफ मोहल्ले में

यह आम था, और मुझे उनके लिए ख़ुशी हुई.

उन्हें ऐसी कंपनी मिलनी चाहिए जो उन्हें ऐसे मुस्कुराये, ख़ास कर गाओं से दूर. "दादी, सूरज—

मैं जाबिर से मिलने जा रहा हूँ. बस लेन के नीचे. जल्दी वापस आता हूँ."

मैं जाबिर के घर चला गया, छोटी सैर ने सोचने का वक़्त दिया. वहाँ पहुंचा तो वह कमरे

में था, कंट्रोलर हाथ में. "यार, आखिर कर! गटा के लिए तैयार?"

"थोड़ी देर में," मैंने कहा, बैठ कर. "पहले बताता हूँ उस पडोसी गजेंद्र के साथ क्या हुआ."

जाबिर: ठीक...

मैं: गजेंद्र दरवाज़े पर खटखटाता है, अम्मी को कहता है होसे चालू है और पानी बर्बाद

हो रहा. अम्मी बहार जा कर ठीक करती है, लेकिन पाइप पहात जाती है या kuchh—paani उन पर उछाल

जाता है. कपडे पूरी तरह भीग जाते हैं.

जाबिर: [bhaun utha kar] रुक, सुन. और वह वहाँ देख रहा था सब?

मैं: हाँ, होसे ठीक करने में मदद की. लेकिन यार, अम्मी झुक कर बंद कर रही थी, उन्हें उसकी

नज़रें महसूस हुई... समझ, फिगर पर, गांड पर, सीने पर. छुपा भी नहीं रहा था.

जाबिर: [dheere dhuya chhodte hue] यार, मुझे पता था वह आदमी शादी है. यह नॉन-'. पडोसी

कभी हद्द नहीं समझते.

मैं: चिल कर, यार. लगता है बस... देख रहा था. मर्द देखते हैं. कुछ इतना बुरा नहीं किया.

जाबिर: [sar hilate] बस देखना? कहानी आगे बता.

मैं: तो अम्मी के कपडे भीगे, ठंडी पानी से थोड़ी थरथरा रही थी. गजेंद्र अचानक हाथ

बढ़ाता है और बाज़ू छूटा है, कहता है, “आंटी, ठण्ड लग रही, मदद करून.”

जाबिर: [aankhen badi] उसने छुआ?! शाहिदा आंटी को? Shaadi-shuda औरत को?

मैं: हाँ... अम्मी तुरंत पीछे हटी. शिस्त लेकिन मज़बूत कहा, “मुझे छूना मत, हमारा दीं

अजनबी मर्दों के छूने की इजाज़त नहीं देता.”

जाबिर: [hairaan] देखा? मैंने कहा था वह अच्छा नहीं. हद्द तेस्तै है. पहले घूरना, फिर छूना?

अगली बार और बुरा होगा.

मैं: नहीं यार, रिलैक्स. लगता नहीं उसने बुरा इरादा किया. शायद मज़ाक़, अपने तरीके से दोस्ताना.

जाबिर: [gambheer dekh kar] मज़ाक़? Shaadi-shuda '. औरत के जिस्म के साथ? पक्का ठीक पढ़

रहा है, बीआरओ?

मैं: पक्का. उसने पकड़ा नहीं या कुछ. बस बाज़ू पर हल्का छुअन. शायद हमारे नियम ठीक से

नहीं जानता.

जाबिर: [nakaara] नहीं जानता? सब जानते हैं. हद्द से बहुत आगे गया. सीना और कमर घूरने के

बाद छूना? यह मासूम नहीं.

मैं: ठीक, मान liya—chhune में ज़्यादा आगे गया. वह गलत था.

जाबिर: ज़्यादा? बहुत ज़्यादा. नज़र रखो उस पर. और आंटी को बताओ उसके आस पास सावधान रहे.

ऐसे आदमी एक छुअन पर नहीं रुकते.

मैं: हाँ... अम्मी से बात करूँगा. लेकिन अभी बड़ा इशू मत बनाओ.

जाबिर: [aur dhuya lete hue] बेहतर सेफ रहना, बीआरओ. मुझ पर भरोसा कर. अब खेलते हैं.

घर वापस जाते हुए, आदति रास्ते पर, मैंने अम्मी को आगे चलते देखा, भीड़ में उनकी शकल

लचकती हुई. वह फ्राइडे को शॉपिंग करती थी, लाल ड्रेस पहनी थी जो टखनों तक बह रही थी.

साथ में क्रीमी स्कार्फ़ सर और कन्धों पर, सुन्दर लग रही thi—posture सीढ़ी, लाल कपडा रौशनी

पकड़ता, चल कॉंफिडेंट लेकिन परदह वाली, राह चलतों की नज़रें खींचती. क्रीमी स्कार्फ़ चेहरे को

नरमी से फ्रेम कर रही थी, रोज़ की सैर में एलेगणसे दाल रही.

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वह बाजार के पास एक छोटे रेस्टोरेंट में ghusi—chai और स्नैक्स के लिए मशहूर जगह. मैं उनके

पीछे जाना चाहता था, शायद सलाम या बैग्स उठाने में मदद, लेकिन कुछ रोक गया.

एक काली कार उनके पीछे आयी, धीरे चलते हुए पास पार्क. लग रहा था स्टॉक कर रही thi—unke साथ

रफ़्तार मिलते हुए रुकना, टिंटेड शीशे ड्राइवर छुपाये. कैसे पता? कार कार्नर पर लती थी जब वह

मुड़ी, तेज़ी तब बधाई जब उन्होंने, छुप कर फॉलो जैसे.

हैरान होकर, मैं एक ठेले के पीछे छुप गया जब दरवाज़ा खुला, और गजेंद्र निकला, नीली शर्ट

ब्लैक ट्रॉउज़र में, शार्प लेकिन कासुअल. मुझे नहीं पता था उसकी car—compound में कभी नहीं देखि;

वह अक्सर पैदल या रिक्शा. उसने शर्ट ठीक की और रेस्टोरेंट में मक़सद से अंदर गया.

मैंने सोचा शायद सलाम करना chahta—ittifaq, उन्हें देख कर पडोसी पाना. लेकिन शक आ गया; टाइमिंग

परफेक्ट थी. शक्की होकर, चुपके फॉलो किया, रेस्टोरेंट में घुस कर पार्टीशन के पीछे जगह ली

देखने के लिए.

अम्मी कार्नर टेबल पर बैठी थी, बिरयानी आर्डर कर, नफीसा से फ़ोन पर बात jaari—roz की ब्रेक में—

धीरे हंस रही थी.

गजेंद्र पास गया, सामने की चेयर बिना इजाज़त खींच कर बैठ गया. "ज्वाइन कर सकता हूँ?"

मुस्कुराते

हुए.

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अम्मी ऊपर देखि, hairaan—aankhen बड़ी, फ़ोन धीरे नीचे. उम्मीद नहीं थी, पोस्चर सख्त.

"गजेंद्र?

यहाँ क्या कर रहे हो?"

गजेंद्र: [chair kheench kar bina intezaar baith jaata, cocky muskurahat] अस्सलामु अलैकुम, शाहिदा जी.

ग्रीटिंग ठीक कही? जगह भरी है. Khushqismati—sabse अच्छी सीट मिली, बिलकुल सामने.

अम्मी: [ek pal upar dekh, phir plate par] मैं अच्छी हूँ, अकेली खा रही हूँ.

गजेंद्र: ज़्यादा देर नहीं. पहले, माफ़ी उस दिन की. बाज़ू छूना… गलत था. लेकिन यार, भीगी हुई, थरथरा

—मर्द का रियेक्ट करना मुश्किल.

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अम्मी: [dheere] माफ़ी क़ुबूल. बस हद्द याद रखो.

गजेंद्र: हद्द नोट की. फिर भी, भीगे कपड़ों के नीचे वह कर्व्स? जुर्म. आज पूरी ढकी हो, लेकिन मर्द

सोच सकता है नीचे क्या है.

अम्मी: गजेंद्र जी… प्लीज.

गजेंद्र: रिलैक्स, सुन्दर. बस हकीकत. यह बिरयानी अच्छी लग रही. धीरे खा रही हो?

अम्मी: हाँ.

गजेंद्र: स्मार्ट. मैं भी हमेशा वक़्त लेता हूँ. बड़े निवाले, गोश्त मुँह में रहने दो, रास बहने दो.

जितना मोटा टुकड़ा, उतना लम्बी देर मुँह में.

अम्मी: [chhota rukna] बस खाना है.

गजेंद्र: हाँ. लेकिन कुछ चीज़ों को अच्छे मुँह की ज़रुरत होती सही सँभालने को. धीमी ज़बान का

काम सब... लज़्ज़तदार बना देता.

अम्मी: [seat par hilti] हम्म.

गजेंद्र: वाओ, मतलब तुम्हारा मुँह अच्छा है. यह चिकन के इलावा दूसरा “गोश्त” भी फिट कर सकता, समझ

रही हो? [smirk] बड़े टुकड़े, mote—lagta है तुम अच्छे से संभल लोगी.

अम्मी: [thodi bhaun, samajh nahi] दूसरा गोश्त? जैसे मटन या बकरा? मैं चिकन hi लेती हूँ.

गजेंद्र: [dheemi hansi] हाँ… कुछ ऐसा. वह जो गरम, मज़बूत, धीरे चूसने से पूरा लज़्ज़ा निकल आये.

अम्मी: [ab bhi matlab nahi pakad] चूसना? मैं तो नार्मल चबाती हूँ.

गजेंद्र: [aage jhuk kar, table par haath badha kar plate ke paas unke haath par ungliyan dheere fereta]

आसान, शाहिदा जी. हाथ टेंस लग रहा. बस देख रहा आज गरम हो की नहीं.

अम्मी: [haath tezi se peeche] मुझे छूना मत.

गजेंद्र: [qahqaha, be-parwaah] रोक नहीं सकता. तेरी जैसी स्किन छूने को कहती है.

अम्मी: मैंने कहा tha—hamara दीं यह इजाज़त नहीं देता.

गजेंद्र: याद है. लेकिन नियम कभी लचक जाते हैं. बात तेरी दीं की... सुना है मुस्लिम पडोसी

के हुक़ूक़ में बड़े हैं. हमेशा बुलाना, चाय, खाना, मेहमान नवाज़ी.

अम्मी: [savdhaani se] हाँ… पड़ोसियों से अच्छे तालुकात की तालीम है.

गजेंद्र: बिलकुल. तो batao—mujhe घर में अब तक क्यों नहीं बुलाया? हफ्ते से पड़ोस में हूँ.

तुम्हारा मज़हब पडोसी को पसंद करता है, है न?

अम्मी: [ruk kar, hairaan, soch kar] मेहमान नवाज़ी ज़रूरी... लेकिन हद्द होती है. ख़ास कर औरतों

के लिए जब मर्द ग़ैर महरम.

गजेंद्र: हद्द? चलो, शाहिदा जी. पड़ोसियों में चाय? कुछ गलत नहीं.

अम्मी: [chaturai se] पडोसी अच्छे, लेकिन नज़र नीचे और pardah—dono उसी मज़हब का हिस्सा.

गजेंद्र: [muskurata, mutaassir] स्मार्ट जवाब. लेकिन फिर भी… जब तुम्हारा शौहर नहीं होता तब

क्यों नहीं बुला सकती? किसी को पता भी नहीं चलेगा. बस छोटी सी मुलाक़ात.

अम्मी: [aankhen tez, shak badhta] ख़ुसूसन जब शौहर नहीं होता तब क्यों?

गजेंद्र: [kandhe uchaal kar, cocky] बस आसान, है न? वह दूकान पर बिजी रहता है. तुम अकेली.

ठीक से बात कर सकते हैं.

अम्मी: [sur mazboot] और शौहर बिना ठीक से बात करने की क्या ज़रुरत? असली वजह क्या है यह पूछने की?

गजेंद्र: [dheemi hansi] शार्प हो. पकडे गए सोच में.

अम्मी: मुझे यह पसंद नहीं आ रहा.

गजेंद्र: Waise—main दोनों खानों का बिल पहले hi दे दिया. मेरा ट्रीट. कुछ देना नहीं... अभी.

अम्मी: बिना पूछे फिर बिल दिया?

गजेंद्र: कोकी आदत. तो, तुम्हारा shauhar—din भर क्या करता है?

अम्मी: कपड़ों की दूकान है बाजार में.

गजेंद्र: बिजी आदमी. सुबह जल्दी जाता, देर से लौटता?

अम्मी: [aankhen sanki] उसके बारे में इतना क्यों पूछ रहे?

गजेंद्र: उत्सुक. तेरी जैसी सुन्दर बीवी दिन भर अकेली… किसी को देखना पड़ता है बोर न हो.

अम्मी: मैं बोर नहीं. और मेरा पीछा बंद करो. मैंने देखा सड़क पार से घूर रहे थे.

गजेंद्र: [aur muskurata] क़ुसूरवार. रोक नहीं सका. तक़दीर बार बार रास्ते में लाती है.

अम्मी: तक़दीर नहीं. पीछा बंद करो.

गजेंद्र: वादा नहीं कर सकता. ऐसी औरत को इग्नोर करना मुश्किल जो कुरता ऐसे भर्ती है.

अम्मी: [chamcha mazbooti se rakhte] मैं shaadi-shuda हूँ. '. हूँ. यह ध्यान नहीं चाहिए.

गजेंद्र: जानता हूँ. इसी से मज़ा ज़्यादा. नंबर दे दो. अगर घर में मज़बूत हाथ चाहिए जब

शौहर शर्ट बेच रहा हो.

अम्मी: नहीं.

गजेंद्र: हार्ड तो गेट खेल रही. चेस पसंद है.

फिर अम्मी बहार निकली, गजेंद्र पास पास पीछे. वह खफा लग रही थी, कदम तेज़ी से, यह ज़िद वाला

ध्यान पसंद नहीं. गजेंद्र फॉलो जारी, रफ़्तार मिलाते.

गजेंद्र: [paas aate hue, bagal mein chalte] शाहिदा जी, रुक जाओ! घर छोड़ दूँ. मेरी कार कार्नर

पर है.

अम्मी: [raftaar ghataaye bina, mud kar nahi] नहीं, शुक्रिया. पैदल जाउंगी.

गजेंद्र: चलो, गर्मी है. शॉपिंग की, बैग्स uthaaye—thakne की ज़रुरत नहीं.

अम्मी: ठीक हूँ. पैदल पसंद है.

गजेंद्र: [aasani se raftaar milaate] पक्का? हमारे लेन तक दूर है. और सामने पीछे इतना...

बोझ उठाये, दूर चलना थका देगा.

अम्मी: [chalti rahi, sur sada] रोज़ संभल लेती हूँ.

गजेंद्र: बस कह raha—teri वह भरी चीज़ें, सामने और पीछे, चलना में म्हणत लगती होगी.

ज़्यादा थक जाओगी. बाइक पर आसान होगा.

अम्मी: [thodi dheemi, matlab samajh kar gaal laal gusse se] क्या कहा तुमने?

गजेंद्र: [muskurata, be-parwaah] रिलैक्स, सुन्दर. बस फ़िक्र. बड़ा सीना, पूरी kamar—sundar, लेकिन

गर्मी में भरी बोझ. दूर मत थको खुद को.

अम्मी: [chalna rok kar, mud kar] गजेंद्र जी, बस करो. फिर मेरे जिस्म की बात. यह be-izzati है.

गजेंद्र: [haath upar, bekhudi] Be-izzati नहीं. सिर्फ फ़िक्र. तेरी जैसे बानी aurat—curves इतने— आराम

चाहिए. छोटी सी सचाई पर हंगामा मत करो.

अम्मी: हंगामा इसलिए की हर हद्द क्रॉस कर रहे हो. अंदर कहा tha—shaadi-shuda, दीं मानती,

तुमसे कुछ नहीं चाहिए.

गजेंद्र: [thoda paas] एक छोटी राइड घर. पडोसी मदद. किसी को पता नहीं चलेगा.

अम्मी: बाइक पर बैठी तो सबको पता चल जाएगा. पूछना बंद करो.

गजेंद्र: ज़िद. पसंद आयी. लेकिन सच, वह कमर ऐसे हिलती हुई घर तक… ज़्यादा पसीना आएगा.

अम्मी: [awaaz thodi upar] मेरी कमर की बात बंद करो! देखना बंद, कमेंट बंद, पीछा

बंद!

गजेंद्र: [dheemi qahqaha] शांत हो जाओ, शाहिदा जी. लोग देख रहे. सन मत बनाओ. राइड

क़ुबूल कर लो. ताक़त बचाओ.

अम्मी: सिर्फ ताक़त तुमसे दूर होने में लगा रही. मुझे अकेला छोड़ दो.

गजेंद्र: आखरी ऑफर. बाइक आरामदेह. सब कुछ के लिए काफी जगह.

अम्मी: [tez mud kar tezi se chal di] बस हो गया. अब पीछा मत करना.

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उन्होंने साफ़ इंकार किया, उससे वहाँ काली कार के पास खड़ा छोड़ दिया, चेहरा मायूसी और कुछ

अँधेरा. अम्मी दूर जाती हुई, लाल ड्रेस ज़िद भरे क़दमों से हिलती, वह रुक कर देखता रहा, नज़रें

उनकी बड़ी गांड पर, ध्यान से देख ता हुआ जब तक भीड़ में गायब नहीं हुई.

मुझे इस आदमी पर गहरा शक होने laga—kyun अम्मी की गांड ऐसे देख रहा था? पसंद नहीं आया,

उसकी नज़र उन्हें ऑब्जेक्ट बना रही थी, सदी चल को घुसपैठिया. प्रेदटरय लग रहा था, बाघ वाक़िये

से पैटर्न. उसका खेल क्या था?

उस शाम, सूरज डूबते हुए घर डिनर की खुशबू से भर गया, मैं सूरज की बुचेरी चला गया.

दादी ने कहा था शायद और चीज़ें चाहिए, लेकिन पहुंचा तो दूकान जल्दी band—shutter नीचे,

अंदर रौशनी नहीं. फ़िक्र हुई दादी कहाँ होगी; उन्हें इलाक़ा ज़्यादा नहीं पता, और बुचेरी में पहले की

अजीब हरकत, खाने लगी. अकेली गयी? गम हो गयी?

फ़ोन baja—Daadi का. "बीटा, फ़िक्र mat—Suraj मुझे बाजार में छोटी सैर पर ले गया. मैंने तेरी

अम्मी और नाना को बता दिया. जल्दी घर आ जाएंगे."

"ठीक, दादी," मैंने कहा, रहत लेकिन परेशां. "घर पर मिलते हैं."

अजीब laga—hamara दीं ऐसे मामलात में सेंसिटिव, shaadi-shuda औरत अकेली ग़ैर महरम मर्द

के साथ नहीं चलती, ख़ास कर अलग दीं के. लेकिन सोचा शायद दोस्ताना, masoom—recipes या गाओं की

बातें. सूरज अच्छा लगता था.

उस रात बाद में, घर वापस एक छोटे काम से, इत्तिफ़ाक़ से दादी और सूरज को बाजार के पास साइड

लेन में साथ चलते देखा.

बगल बगल, धीरे हँसते, और phir—hairat—Suraj दादी का हाथ पकडे था, उँगलियाँ एक दूसरे में

गुथी हुई, आसानी से चलते हुए. मैं तेज़ी से परकेड रिक्शा के पीछे छुप गया, दिल डूब गया.

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हैरान, देखता रहा गुजरने tak—Daadi का चेहरा ऐसी मुस्कराहट से रोशन जो पहले नहीं देखि.

हमारे '. दीं में shaadi-shuda औरत जैसे दादी ऐसा नहीं करती; परदह और वफादारी की हद्द.

यह ठीक नहीं laga—masoom सैर या नहीं, तालीमात की मुक़द्दस हड्डों को क्रॉस कर रहा था. क्यों

करती वह?

उस रात, सब ने खाना khaaya—Daadi की करी फिर से लज़्ज़तदार और अम्मी के ताज़ा salads—phir परिवार

बिखर गया. नाना को बिलकुल पता नहीं चला की दादी ने पूरा दिन क्या किया था; वह अपनी सैरों से थके

हुए थे, डिनर के दौरान गाओं की ख़बरों पर यूँ hi बातें कर रहे थे.

उस रात खाने के वक़्त टेबल पर रौनक थी लेकिन chhoti—khaane की तारीफें, हलके मज़ाक़. सब जल्दी अपने

अपने बैडरूम में चले गए, घर रात के चादर में शांत हो गया.

मैंने दादी और नाना के बैडरूम में झाँका, दरवाज़ा थोड़ा खुला था. फिर दादी की हरकत ने मेरा

ध्यान खींच liya—woh बिस्तर पर थी, तकिये से टिका हुई, फ़ोन पर बात कर रही थी उसी राज़ भरी

मुस्कराहट के साथ.

इस बार चीज़ें नार्मल नहीं लग रही थी क्यूंकि वह आने के बाद हर रात यह कर

रही थी, चुपके से निकल जाती या देर तक जागती स्क्रीन की रौशनी में. इतनी मुस्तक़िल क्यों? क्या चीज़ उनका

ध्यान खींच रही थी?

लेकिन उस रात मुझे कुछ बहुत हैरत अंगेज़ dikha—unki अंगूठियां स्क्रीन पर तेज़ी से उड़ रही थी, चेहरा

थोड़ा लाल पद गया जब मैसेज पढ़ा, ख़ुशी से होंठ काट ते हुए. फिर उन्होंने नाना की तरफ देखा, जो

अमाना से खर्राटे ले रहे थे, और बिस्तर से धीरे उत्तरी, कन्धों पर शाल लपेट कर हॉलवे में

धीरे कदम रखा, फ़ोन अब भी हाथ में

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CHAPTER 9

मैं अपने ज़िन्दगी में पहली बार एक इतनी शर्मनाक चीज़

अपनी आँखों से देख चूका हूँ

वह वृंदा के बहार कड़ी थी, अब भी टेस्टिंग कर रही थी, उनकी शकल घर की दीवारों पर

चढ़ी बेलों से छनती चांदनी की हलकी रौशनी में उभर रही थी. रात की हवा ठंडी और

शांत थी, रात में खिलने वाले फूलों की हलकी खुशबू और दूर से शहर के सुस्ताने

की आवाज़ ले कर.

दादी ज़ैनब रेलिंग से टिक कर कड़ी थी, उनकी पीली स्लीवलेस निघ्टड्रेस ढीली पड़ी हुई, पहले

ओढ़ा क्रीम स्कार्फ़ अब कन्धों से थोड़ा सरक गया था.

उनकी अंगूठियां फ़ोन के स्क्रीन पर उम्र के हिसाब से हैरत अंगेज़ तेज़ी से चल रही थी, हलकी

नीली रौशनी उनके चेहरे को रोशन कर रही थी जिस से वह दिन से छोटी और ज़्यादा ज़िंदा लग रही

थी. हर कुछ सेकण्ड्स में रूकती, मैसेज पढ़ती, और होंठों पर छोटा राज़ भरा

मुस्कराहट आ जाती, आँखें ख़ुशी और इंतज़ार से चमक उठ टी.

मैं हॉलवे के अँधेरे से देख रहा था, उत्सुकता बढ़ी हुई लेकिन अभी हैरत नहीं. इतनी रात

को किस से टेस्टिंग कर रही थी? हर कुछ देर में बैडरूम के दरवाज़े की तरफ मुद कर देखती,

पक्का करते हुए की नाना क़ादिर के खर्राटे जारी हैं, यह दिखाता था की बात निजी थी.

शायद गाओं की पुराणी दोस्त, रात की gossip—shaadiyon या परिवार की ड्रमों ki—woh बातें जो

सुबह तक चलती थी क्यूंकि गाओं में वक़्त का इतना एहमियत नहीं थी. लेकिन जब देखता रहा,

फ़ोन फिर बजा, वह मैसेज घोर से पढ़ी, खुद से सर हिलाती जैसे हुक्म मिल रहा हो. "ठीक

है," धीरे मुरम्मत की, इतनी धीमी की साफ़ नहीं सुनी, लेकिन चेहरा खेलते ita'at में बदल

गया.

फिर उन्होंने दाया हाथ धीरे उठाया, उँगलियाँ स्कार्फ़ के किनारे पर. तेज़ी से इधर उधर देखा

—वृंदा खाली पक्का करने के liye—phir स्कार्फ़ पूरी उतार दी, sre-streaked बाल कन्धों पर

गिर गए. थोड़ा फ्लूफेड किया, उँगलियाँ चला कर वॉल्यूम दिया, फिर फ़ोन बाज़ू की दूरी पर

पकड़ा.

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कैमरा का सॉफ्ट फ़्लैश चला जब उन्होंने सेल्फीज़ li—ek शर्मीली मुस्कराहट के साथ, सर साइड पर

झुका; दूसरी होंठ चुम्बा के लेंस की तरफ; तीसरी खेलते चुम्बन उड़ाते हुए, आँखें आधी

बंद फलिर्टाटिओउस विंक में.

सेल्फीज़ निजी, व्यक्तिगत लग रही thi—aisi जो आम दोस्त या रिश्तेदार को नहीं भेजते. गर्माहट थी,

थोड़ी सेंसुअलिटी पोज़ में, निघ्टड्रेस एक कंधे से थोड़ा सरक गयी, चांदनी चेहरे की नरम

लकीरों को उभार रही. जैसे ख़ास किसी के साथ निजी पल बाँट रही हो, अपना राज़ भरा पहलु.

मैं अँधेरे हॉलवे से छुप कर देखता रहा, सोच में. क्या यह बस be-nuksaan मज़ा था, रात

में जवान महसूस करने का तरीका? दादी हमेशा परिवार का सहारा रही thi—mujhe और जाबिर

को अच्छे इख़लाक़, दीं, इज़्ज़त सिखाती थी अपने दौरों में. दीं की कहानियां सुनाती थी परदह

और ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए.

लेकिन यहाँ वह स्क्रीन पर आते जवाबों पर धीरे क़हक़हा कर रही थी, तेज़ी से रिप्लाई. शायद

दूर का रिश्तेदार, या बचपन की दोस्त टेक्नोलॉजी से फिर मिली. या be-gunah flirt—gaon में कभी

कभी बेवह औरतें ऐसे साथ ढूंढती थी, भले दीं shaadi-shuda औरतों के लिए मन करता.

नाना सो रहे थे; उन्हें पता था? दिमाग़ घूम raha—utsaukta और थोड़ी बेचैनी. अगर कुछ नहीं

तो? अगर ज़्यादा सोच रहा हूँ, दिन के वाक़ियात की परेशानी उन पर दाल रहा हूँ? फिर भी उन

सेल्फीज़ की निजता खाने लगी, वह पजल का टुकड़ा जो मेरी जानी दादी से मैच नहीं कर रहा.

दो दिन बाद, कुछ ड्रामेटिक नहीं हुआ रोज़ को बिगड़ने वाला. ज़िन्दगी मुस्तक़िल बह रही thi—subah

परिवार के साथ ब्रेकफास्ट, दोपहर कामों और जाबिर के साथ खेल, शाम दादी के खाने और

नाना की कहानियों से. लेकिन मैंने नोटिस किया दादी अब हर रोज़ सूरज की बुचेरी जाती थी, लंच के

बाद छोटे बैग के साथ "ताज़ा चीज़ों" के लिए.

अब उन्हें रास्ता इतना पता था की अकेली जाती, किसी को साथ की ज़रुरत नहीं. "मैं संभल लूंगी, बीटा,"

मुस्कुराते हुए कहती. "अच्छी सैर है, और सूरज को पता है मुझे क्या पसंद." मासूम लगता—

शायद बात चीत एन्जॉय करती, बाजार की आदति गाओं जैसे.

एक शाम, सूरज डूबते हुए आसमान गहरा नारंगी, मैं खुद सूरज की बुचेरी गया. अम्मी ने कहा

था कल के खाने के लिए एक्स्ट्रा बीफ चाहिए, और सोचा दादी को सरप्राइज कर दूँ अगर वहाँ हो.

लेकिन 9 बजे पहुंचा तो दूकान band—shutter जल्दी नीचे, अंदर रौशनी नहीं, सिग्न हवा में हिल

रहा.

अजीब था; सूरज अक्सर देर तक खुला रखता last-minute ग्राहकों के लिए. मैंने उसका फ़ोन मिलाया,

रिंग गूंजी लेकिन जवाब नहीं. फिर दादी ka—wahi, वॉयसमेल. पेट में फ़िक्र गड गयी; कहाँ हो सकती

थी? इलाक़ा ज़्यादा नहीं जानती, और इस वक़्त सड़कें अँधेरी, ठीक नहीं लग रहा.

मैंने फैसला किया उसके घर jaaoon—Suraj ने एक बार बात में ज़िक्र किया था, शहर से दूर एक

अलाहदा जगह, जंगल में. शहर की हद्द से बहार जंगल का टुकड़ा जहां कुछ बंगलोस थे

अमन के लिए. वह लकड़ी के बंगला में रहता था, ृस्टिक और दिलकश, वरपराउण्ड पोर्च और पेड़

छा रहे थे, जो सुना था.

रिक्शा लिया, सफर झटके दार जब पैदल सड़कें छोड़ जंगल के मक्की रास्तों पर. जंगल घाना,

हवा ठंडी क्रिकेट्स और पत्तों की सरसराहट से. पहुंचा, रिक्शा वाले को पैसे दिए, जो देखा

उस से हैरान रह गया.

बंगला पोर्च पर लैंटर्न्स से हलकी रौशनी, और बहार दादी और सूरज खड़े थे. वह पूरे नंगे

थे, डिम रौशनी में जिस्म उभरा हुआ, मज़बूत और be-sharma, जबकि दादी सिर्फ हलकी गुलाबी आबय

और क्रीम स्कार्फ़ में, कपडा ढीला लता हुआ, रोज़ की परदह इस निजी जगह में उतर गया.

दिल डूब गया, सांस अटक गयी जब पेड़ के पीछे छुप गया. यह वह औरत थी जिसने अम्मी को पाला,

हमें दुआएं और इख़लाक़ सिखाये, अब इतनी समझौता करने वाली हालत में. समझ आने लगा

उनकी निजता kyun—butchery की चमकती मुस्कुराहटें, "साइरेन" जो हर बार लम्बी होती जाती.

मैंने सोचा दोस्त थी, मेहरबान बुढ़िया बात एन्जॉय करती, लेकिन galat—yeh गहरा, मन था. देखता

रहा जैम कर, वह chumey—honth पैशनेट लम्बी मुलाक़ात में, उसके हाथ कमर पर, उनकी

उँगलियाँ बालों में.

सूरज: [dheere, baazu kamar par lapet kar] ज़ैनब... पूरा दिन दिमाग़ में थी. दिल में क्या है बता.

दादी: [jhijhak, haath uske nange seene par, awaaz thodi kaamp ti] सूरज... मुझे तुम पसंद हो.

ज़्यादा से ज़्यादा. तुम मुझे फिर जवान महसूस कराते हो, देसिरद औरत जैसे. लेकिन... हम

बहुत दूर निकल आये. यह क्या कर रहे हैं?

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सूरज: [paas kheench kar, pyar se dheere] श, मेरी सुन्दर ज़ैनब. किसी को पता नहीं चलेगा. सिर्फ

हम दोनों ka—raat का छोटा राज़. मुझे तुम्हारी खिदमत करने दो, दिखाऊं कितनी ख़ास हो.

तुम यह एहसास डेसेर्वे करती हो.

दादी: [chalaaki se muskurate, sar jhuka kar sharmaati] ओह, तुम मीठी बातें करते हो. लेकिन

मैं '. औरत हूँ... यह ठीक नहीं. भले... अच्छा लग रहा है.

सूरज: [gaal par dheere sehlaate] तुम्हारा दीं मज़बूत, दिल भी. लेकिन दिल को भी ख़ुशी चाहिए.

हम किसी को नुक्सान नहीं पहुंचा रहे. छोड़ दो, सिर्फ आज की रात.

दादी: [ghabra kar idhar udhar dekhte, awaaz dheemi] सूरज, हम बहार हैं. कोई देख लेगा? पडोसी,

या गुजरने वाला...

सूरज: [dheere hanste, chehra mud kar] मेरा घर जंगल में gehra—alaahda, नज़रों से दूर. रात

को कोई नहीं आता. हमारा निजी दुनिया.

दादी: [utsauk, lekin chalaak, bhaun utha kar] वैसे बाजार से इतने दूर क्यों रहते हो? इतने अलाहदा...

सूरज: [sexy muskurahat, sur gehra] क्यूंकि यहाँ मैं आज़ाद हूँ... तारों के नीचे नंगा, तुम

जैसे औरत का इंतज़ार करते हुए रात और गरम करने को. कोई डिस्ट्रक्शन नहीं, सिर्फ खालिस ख्वाहिश.

दादी: [sharma kar, nanhi ladki jaise be-yaqeen, dupatte se khelte] सूरज... मुझे नहीं पता. यह

सब नया है... आज रात मुझे यहाँ क्यों लाये? एक बुढ़िया जैसे मुझसे सच में क्या चाहते हो?

सूरज: [dheere pakad mazboot, aankhen milaa kar] तुम में आग देखता हूँ, ज़ैनब. तुम मुझे

देखती हो, स्टाल पर लौटती हो... तुम भी यह चाहती हो जितना मैं. खुद को मन मत karo—socho उन

सालों को जो इतने फ़र्ज़ ऐडा करते गुज़ारे. थोड़ी एडवेंचर, थोड़ी जज़्बा डेसेर्वे करती हो. मुझे

गुनहगार महसूस होता है की मैंने यह जगाया, लेकिन अच्छे तरीके से... जैसे हम कुछ असली बाँट

रहे हैं.

दादी: [gehri saans, dheere sur mein shikayat] ओह, सूरज... सही कह रहे हो, असली लगता है. लेकिन ठीक

नहीं लग रहा यह करते. याद है, मैं दादी हूँ, ईमानदार '.. परिवार टूट जाएगा अगर पता

चला. ज़िन्दगी भर पांच वक़्त नमाज़, हर नियम... और अब यहाँ ***** आदमी की बाहों में,

रात में, जंगल में. जैसे सब कुछ धोखा दे रही हूँ जो मुक़द्दस है. गुनाह खींच रहा

—कल आईने में चेहरा कैसे देखूँगी?

सूरज: [maathe par narmi se chuma] ज़ैनब, यही तुम्हे सुन्दर बनता hai—dil, भक्ति. लेकिन यह

धोखा नहीं; तुम खुद को जीने दे रही हो. हम दोनों अकेला बहुत दिन से. मुझे दिखाने दो ठीक

है. कोई नुक्सान नहीं.

दादी: [thoda peeche, aankhen talaash kar] लेकिन सूरज... इतना सदा नहीं. दीं परदह, पाकि सिखाता

है. अगर यह मुझे हमेशा बदल दे? पुराणी खुश और यक़ीन वाली औरत को तरस आ रहा. अब सब

सवाल करवा रहे हो.

सूरज: [garam muskurahat, phir kheench kar] और यह अच्छा गुनाह, मेरी jaan—woh जो याद दिलाता

है हम ज़िंदा हैं. तुमने सबको इतना दिया; अब थोड़ा खुद के लिए लो. मेरे साथ.

दादी: [sar thoda hilate, lekin paas tikti] मन करना मुश्किल कर रहे हो. लेकिन... अभी भी नहीं

पता अगर और आगे जाने दूँ.

सूरज: [aur paas, saans honthon par garam] मुझ पर भरोसा, ज़ैनब. दिखाता हूँ. [Chehra

pakad kar pehli baar honth dabane ki koshish, narmi lekin zid se.]

दादी: [pehle thoda peeche, nanhi jaise mana karte, dheemi siski] सूरज... नहीं, नहीं करना

चाहिए... ओह... रुक, अभी नहीं...

सूरज: [ruk kar, paas rakhte] मन क्यों, ज़ैनब? तुम भी यह चुम्बन चाहती हो जितना मैं.

दादी: [nazar hata kar, sharmaati] जल्दी है... दिल तेज़ी से धड़क रहा. अगर पछतायी तो?

सूरज: [dheere] नहीं पछताओगी. हमारा मीठा राज़ होगा. चलो, सुन्दर...

दादी: [lambi jhijhak, honth kaat te] सूरज... प्लीज...

सूरज: [dheere chehra mud kar] बस एक चुम्बन. अंदर की जवान औरत के लिए.

दादी: [aakhir thoda haan, lekin khelte] ओह, ठीक है... लेकिन नरमी से.

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सूरज: [ab gehra chumban, haath neeche sarak kar gaand ko mazbooti se dabaya] ममम,

ज़ैनब... इसका ख्वाब देखा था. तेरी यह नरम gaand—itni पूरी, परफेक्ट. हाथों में कितना

अच्छा लगता.

दादी: [chumban mein pighal kar, jism paas daba, phir saans lete alag] ओह, सूरज... वह था...

लेकिन अब अच्छी औरत नहीं लग रही. तुमने मेरा क्या कर दिया? रूह में shikayat—is के बाद

नमाज़ कैसे करून?

सूरज: [gardaan par halke chumban, paas rakhte] तुम सबसे अच्छी औरत हो जो जानता हूँ.

अच्छा होने का मतलब खुद से ख़ुशी मन नहीं. अंदर ले जा कर और अच्छा महसूस कराऊँ

—जहां गरम है.

दादी: [chalaak muskurahat waapas, sur dheemi] तुम ज़्यादा आज़मा रहे हो. लेकिन... शायद

तारों के नीचे थोड़ी देर और.

सूरज: [phir gaand dabaya, ghar ki taraf kheenchte] मेरी लड़की. किसी को नहीं पता चलेगा, और

तुम मेरे साथ हमेशा जवान महसूस करोगी.

बाद में वह धीरे अलग हुआ, उन्हें पोर्च के बहार लकड़ी की कुर्सी पर बैठने को ले गया.

"यहाँ इंतज़ार करो, ज़ैनब ji—kuchh ख़ास लाता हूँ," सुर धीमा और प्यार भरा,

बंगला में गायब.

दादी वहाँ बैठी गहरी सोच में, लैंटर्न की रौशनी में चेहरा मुख्तलिफ जज़्बात का

नक़्शा. अंदर की लड़ाई saaf—jaanti थी हद्द क्रॉस कर दी, धाइयों से भक्ति और क़द्रों से

भटक गयी.

ईमानदार '. औरत होने के नाते, सालों की शादी, सूरज से यह rishta—alag दीं का

aadmi—har चीज़ के खिलाफ: शादी की मुक़द्दसात, उसके बहार निजता की मनाही, संस्कारी

और दीनी हद्द जो खुद परिवार को सिखाई थी.

गुनाह उलझा rahi—ghar पर अमाना से सोये नाना की सोच, अम्मी जो उनकी क़द्र करती, नमाज़

जो छोड़ दी थी चुपके निकलने को. फिर भी थ्रिल, सूरज का dhyaan—sawaal उठाता: क्या

ज़िन्दगी बहुत सख्त थी? क्या यह देर की बग़ावत, मनाही आज़ादी का मज़ा? सांस भरी,

आबय के किनारे पर उँगलियाँ, पछतावा और नए जोश के बीच फँसी.

फिर सूरज लौटा, ट्रे पर भुनी गरम pork—tukde सुनहरे, किनारे करारे, चर्बी चमक

रही, खुशबू मेरे छुपने तक पहुंची. मैंने जाना पोर्क फ्राइड कैसे dikhti—kitabon या

बाजार से, मरब्लेड टेक्सचर, चिकन मटन से अलग करारा.

सोचा शायद खुद khaayega—Daadi पोर्क नहीं खाती, दीं में हराम, सख्त हद्द जो कोई

ईमानदार '. नहीं क्रॉस करता. नहीं सोचना चाहता जो सोच raha—ki वह खायेगी, यह

उनके राज़ का हिस्सा.

दादी: [hairaan, awaaz thodi upar] सूरज! यह... यह क्या? पोर्क? यहाँ पोर्क लाये?

सूरज: [shaant muskurahat, bagal mein baith kar] हाँ, मेरी ज़ैनब. ताज़ा, परफेक्ट ग्रिल्ड.

सिर्फ हमारे लिए.

दादी: [peeche hat kar, haath mazbooti se jode] क्या कर रहे हो? तुम जानते हो मैं नहीं..

. हम नहीं... पोर्क सख्त मन है. सबसे बुरा हराम.

सूरज: [knee par dheere haath] याद है पहले कहा था? जो हराम लगता वह सही छुअन,

नियत, सही इंसान से हलाल बन जाता.

दादी: [sar dheere hilate, bechain] वह... अलग था. तुम्हे चूमना hi दीं में गुनाह था.

लेकिन पोर्क खाना? यह बहुत आगे. ज़िन्दगी भर हाथ नहीं लगाया. खुशबू भी नहीं

सूंघी पकते हुए.

सूरज: [sur narmi, tasalli] मेरी मीठी ज़ैनब, सुनो. तुम बुरी औरत नहीं. तुम औरत हो जो

आखिर खुद को महसूस करने दे रही, पूरी ज़िन्दगी चखने. कोई यहाँ नहीं. किसी को नहीं

पता. हमारी छोटी दुनिया. मुझे खिदमत करने दो.

दादी: [khud par kamzor muskurahat, aankhen chamak] तुम मुझे यह सब क्यों कराते हो,

सूरज? जानते हो तुम ऐसे बात करो तो कमज़ोर पद जाती हूँ.

सूरज: [pyar se hanste, ungliyon se chhota tukda utha kar] क्यूंकि असली तुम देखता हूँ—

उत्सुक, जज़्बाती औरत जो नियमों के पीछे छुपी. सब कुछ एक बार तरय करने लायक.

भरोसा करो, सुन्दर.

दादी: [tukde ko honthon ke paas dekhte, jhijhak] मैं... पोर्क हाथ में भी नहीं पकड़ा.

यह नया लग रहा. इतना गलत.

सूरज: [paas jhuk kar, sur shahad jaise] बस गोश्त है, ज़ैनब. नाम, रसभरा, तुम्हारे

होंठों का इंतज़ार. एक छोटा निवाला. मेरे लिए. तुम्हे नया मज़ा लेते देखना चाहता

हूँ.

दादी: [honth kaat te, usse phir tukde ko dekha] नहीं करना चाहिए...

सूरज: [tukda neeche honth par dheere ferete] करना चाहिए. क्यूंकि ज़िंदा महसूस

कराएगा. मेरे लिए खोलो, मेरी जान.

[Lambi rukne ke baad, dheere honth khole. Woh andar rakha. Chhota, savdhaan niwala

liya, dheere chabaya.]

दादी: [turant bhaun, chehra sakht] यह... तेज़ है. अलग. नमकीन, धुंआ दार...

सूरज: [halki muskurahat] कैसा लगा, ज़ैनब? बता.

दादी: [ab bhi chabate, be-yaqeen] नहीं पता... अजीब. थूक देना चाहिए लग रहा.

सूरज: [gaal pakad kar dheere kheench] नहीं नहीं. चूमो मुझे उसी में. मज़ा मुझ से

मिला दे.

[Jhijhki, phir paas hui. Gehri chumban, muh mein pork ab bhi.]

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दादी: [thoda alag, chehra bana kar] सूरज... थूकना चाहती हूँ...

सूरज: [maathe par chuma, phir honth] निगल लो, सुन्दर. लड़ना मत. अंदर का हिस्सा बन

जाए. मेरे साथ सेफ हो.

[Aankhen band ki, mushkil se nigla, phir saans chhodi.]

सूरज: [aur tukda offer] एक और निवाला. इतना अच्छा किया.

दादी: [is baar khud tukda liya, jhijhak lekin muh ke paas] विश्वास नहीं होता यह कर

रही हूँ...

[Phir kaata, dheere chabaya.]

दादी: [dheere, khud se] यह... सोचा से मीठा. नाम.

सूरज: [fakhr se dekhte] देखा? जिस्म को पता है क्या पसंद.

[Phir khud chumi, pork muh mein. Chumban lamba.]

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दादी: [nigalne ke baad, dheemi awaaz, khud ko halka sharminda karte] या रबी... कैसी

औरत बन रही हूँ? नंगे आदमी को चुम, मन गोश्त खा, तारों के नीचे...

शर्मिंदा होना चाहिए.

सूरज: [baal sehlaate] फख्र करना चाहिए. बहादुर हो. आज रात आज़ाद.

दादी: [tray se khud aur tukda liya, ab khul kar maza lete] ममम... सच में मीठा.

मसाले... गलती छुपाते हैं.

सूरज: [peeche tika, jeet jaise muskurahat] देखा, ज़ैनब? मैंने कहा tha—sahi दिल से

कुछ सच में हराम नहीं. अब पूरा मज़ा लो. एन्जॉय करो.

(मैं सच में हैरान था, हैरत से छुपने की जगह से थोड़ा बहार निकल आया बस

यह देख कर की दादी अपने आशिक़ सूरज के कहने पर मन पोर्क खा रही थी)

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दादी: [aur niwala chabate, aankhen aadhi band, chhoti chalaak muskurahat] तुम खतरनाक

हो, सूरज. लेकिन... शायद आज रात सही कह रहे.

सूरज: [kursi paas kheench, haath jaangh par] मेरी लड़की. जितना चाहे खाओ. पूरी रात हमारी.

दादी: [aur ek tukda, ab khul kar] सिर्फ हम दोनों में... हमारा राज़ गुनाह.

सूरज: [dheere] हमारा राज़ मज़ा.

[Woh jhuk kar phir chumi, pork ka maza honthon ke beech jungle ke shaant aasman ke neeche

baanta]

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मैं हैरान और जी मिचला रहा tha—nazara पेट उलट रहा, गले में खट्टा पानी. सबसे

बुरा देखा, सब पाकीज़गी का धोखा. गलती से पत्ता डाब गया, क्रंच जंगल की ख़ामोशी में

ज़ोर. उन्होंने आवाज़ की तरफ देखा, सर तेज़ मुड़े.

Ghabrahat—bhaag गया, पेड़ों के बीच, दिल ज़ोर से धड़कता, शाखें चेहरे पर मार.

मैं ने कभी पोर्न नहीं देखा, मासूमियत थी, घर में दीं ने ऐसी गन्दगी से बचाया,

नज़रें नीचे और दिमाग़ साफ़. हमेशा गलत से नज़र हटाई, पढ़ाई और नमाज़ पर,

मनाही में उत्सुक नहीं. लेकिन आज रात जो देखा वह इतना bura—bhalai को अँधेरा बना दिया.

सोचा दादी, जो मुझे और जाबिर को अच्छे इख़लाक़ सिखाती थी, परदह और वफादारी पर आयतें,

सूरज के साथ इस गन्दगी में कैसे गिर गयी. मुनाफ़िक़ात जला rahi—unki सिखाये दीं अब खाली.

सूरज से नफरत होने लगी, वह मैनीपुलेटर जो उनकी अकेलापन का फायदा उठा रहा. इख़लाक़ बिगाड़

रहा.

दादी अम्मी की माँ होने से, क्या अम्मी शाहिदा में भी वही हरकत है? यह सोच द्वारा रही थी,

जेनेटिक्स, क्या दादी की यह हरकत हमारे खानदान में चलती है?

अम्मी ईमानदार, परदह करने वाली, हमेशा नमाज़ में, अब्बू के लिए वफादार, ज़िन्दगी

परिवार और दीं पर. मुझे सख्त क़द्रों से पाला, कभी राज़ का इशारा नहीं, दिन साफ़ और पाक.

देर रात टेस्टिंग नहीं, शक्की बहार जाना नहीं.

याद आया एक टीचर ने कहा था, "बेटियां माओं का aaina—khaasiyatein हेयरलूम जैसे उतरती

हैं." शक होने लगा क्या अम्मी भी दादी जैसे. क्या अम्मी में भी वही हरकत है जो दादी

में?
 
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