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आवरण- 1
सांझ 7 बज चुके थे जब शंकर जी घर में दाखिल हुए. उन्हें आज इस वक़्त होना तोह राममेहर सिंह की हवेली पर था लेकिन इस अकस्मात मुठभेड़ की वजह से सारा कार्यक्रम इधर उधर हो गया. ढेरो सवाल थे और जवाब देने वाले लोग भी किसी टुकड़ो वाली पहेली की तरह सबकुछ नहीं जानते थे. गलियारे से भीतर वाले आँगन में आये तोह ऋतू, कोमल और प्रियंका के साथ ये अनजान लड़की बैठी कॉफ़ी पी रही थी. शंकर जी को देखते हे उसने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया तोह परिचय दूसरी तरफ से आती तारा ने दिया.
"मां जी ये हिमानी है, अर्जुन के आचार्य दादा जी की नातिन और हमारी सहेली. और हिमानी दीदी ये है मेरे प्यारे मां जी और अर्जुन के पापा.", तारा फिर से अपने मां की बगल में लगी कड़ी हो गयी.
"नमस्ते अंकल. आपके बारे में भी नाना जी बताया है के आप एक फेमस सर्जन है.", शंकर जी को ख़ुशी हुई की जिस लड़की को देख कर कभी ऋतू नाराज हुई थी वो आज उसकी हे बगल में बैठी थी. लेकिन आँखों पर चस्मा वो भी शाम के वक़्त.?
"नमस्ते बीटा, ये तुम्हारा भी घर है तोह बेफिक्र रहा करो. शास्त्री जी शहर से बहार है क्या?", शंकर जी अभी बात कर रहे थे की रेखा जी ने पानी का गिलास दिया तोह एक मुस्कान के साथ उन्होंने पानी लेकर पीते हुए बीवी को भी देखा और फिर हिमानी का जवाब सुन्न ने लगे. रेखा जी वही कड़ी रही.
"जी नाना जी को जरुरी काम था इसलिए वो आउट ऑफ़ इंडिया है लेकिन परसो आ जायेंगे. एंड ी ऍम रियली कम्फर्टेबले हेरे, थैंक यू सो मच."
"हिमानी दीदी पापा कह रहे है के ये गॉगल्स क्यों लगा रखे है.", ऋतू ने चुटकी ली तोह शंकर जी भी हंसने लगे अपनी शरारती बेटी की बात सुन्न कर लेकिन हिमानी थोड़ा सा झेंप गयी. वो अब पहले से बेहतर बोलने लगी थी इन लोगो के साथ रहने से.
"अंकल सबको इतना ाचा नहीं लगता जितना ऋतू को मुझे बिना चश्मे के देख के लगता है.", इतना कह कर हिमानी ने चस्मा हटाया तोह ऋतू अपने पिता का चेहरा देखने लगी. जहा शन्न भर के लिए हे हैरत थी जो सबको नहीं दिखे और उसके बाद एक मुस्कान.
"ओने इन ा मिलियन तोह ऋतू को ाचा हे लगेगा और बाकी सबको भी बेटी. यू अरे गिफ्टेड. खुश रहना जरुरी है और तुमको तोह डबल रहना चाहिए. हर कोई इतना लकी नहीं होता. मुझे, मेरे बचो को हे देख लो सबकी एक जैसी हे बोरिंग आईज है.", शंकर जी के इतना हलके में लेने और तारीफ के साथ साथ अपना हे मजाक उड़ाने पर सभी खुश थे, हिमानी के साथ साथ.
"सचमुच ऋतू और कोमल लकी है के उनके डैड इतने हंसमुख और पॉजिटिव है.", हिमानी ने अर्जुन को शामिल नहीं किया तोह रेखा जी अब मुस्कुराई. उन्हें पता था के बात जरूर होगी अब.
"बीटा बाप तोह मैं रुपाली और अर्जुन का भी हु."
"हाहाहा. सॉरी अंकल वो रुपाली से अभी इतना मिलना नहीं हुआ और वो भी ाची लड़की है. बूत don't मंद अर्जुन इस सलीगःती बेटर थान एवरीवन, नोन और अननोन. उसको कपड़े करना मतलब उसपे डाउट करना. नाना जी भी ऐसा नहीं करेंगे.", हिमानी ने इसमें आचार्य जी तक को शामिल किया था और शंकर जी को ाचा लगा के लड़का अपने व्यक्तित्व को सही रखता है.
"हैं कहा वो जनाब? घर में तोह सभी गाडी और उसकी मोटरसाइकिल कड़ी है. रेखा, बाथरूम में कपडे रख दो फिर मुझे जाना है. तारा मेरे लिए चाय बना देगी.", उन्होंने अर्जुन का पुछा था और चाय ले कर आरती इधर आ गयी थी अपने बड़े पापा के लिए.
"अर्जुन और भैया का शोर नहीं सुना था क्या जब आप घर में आये बड़े पापा?", आरती ने जैसे ये कहा शंकर जी कप ले कर बहार की तरफ चल दिए क्योंकि बैठक से हे वो शोर आ रहा था जिस पर उनका ध्यान नहीं गया. आरती और तारा भी पीछे हे चल दी, रेखा जी कमरे से अपने पति के कपडे लाने.
"भैया भैया आप आगे रहो न ये फाइनल ड्रैगन है और मेरे पास बस 2 चांस है. ये पावर मुझे लेने दो."
"रुक मैं आगे हु तोह मैं लेज़र लेता हु तू 'स' से काम चला. संभल उस दूसरी तरफ वाले को.", यहाँ तोह टेलीविज़न की आवाज 50 पर थी और दोनों भाई शोर मचाते धड़ाधड़ गोलिया चला रहे थे. रामेश्वर जी तोह घर थे नहीं कौशल्या जी को ले कर जो सुबह से बहार थे. शंकर जी के आने का भी इन पर कोई प्रभाव न पड़ा तोह वो हैरत से Tara-Aarti को देखने लगे की ये लड़के कितनी उम्र के है. अर्जुन तोह मान लिया लेकिन संजीव, वो तोह एक अधिकार और गंभीर युवक था. लेकिन यहाँ सब समझ से बहार. ऋतू ने आँख मारते हुए आँगन में लगे बिजली के स्विच को निचे गिरा दिया.
"ओह्ह्ह.. इस लाइट को भी अभी जाना था. हो गया न किया कराया सब खराब भैया? जनरेटर लेके आते है जिस से ये झंझट हे ख़तम.", अर्जुन ने रिमोट गुस्से में जमीन पर पटका तोह संजीव भैया भी झुंझलाते हुए बोल पड़े.
"चल अरोरा अंकल की दूकान पर चलते है. वैसे भी थानेदार साहब ने 5 दिन बाद लगवाना है तोह आज हे सही. ऊपर वाले कमरे में सेट करते है गेम और आते हुए अलादीन और स्ट्रीट फाइटर की कसेट्टी भी लेते आएंगे.", संजीव ने कमीज पहन कर खड़े होते कहा तोह दोनों की हे नजर बहार खड़े हँसते हुए सभी चेहरों पर पड़ी.
"अरे जनरेटर क्यों एक बड़ा टीवी, वो महंगी वाली वीडियो गेम और छोटा फ्रिज भी लेते आना हवा वाले गद्दे के साथ. एक की शादी होने वाली है, दूसरा बाप से भी 3 इंच ऊँचा हो गया लेकिन अभी तक निक्कर बदल कर पंत नहीं बानी.", शंकर जी के ऐसा कहने पर अर्जुन तोह अपने भैया की तरफ हो गया और जैसे हे नजर बहार की तरफ जलती लाइट पर पड़ी वो सब भूल कर चिल्ला उठा.
"ये ऋतू दीदी ने किया है भैया. ऊपर भी गेम यही बंद करती थी और आज बिजली भी इन्होने हे भागे है. कश्यप जी के तोह लाइट है.", उसकी बात पर शकर जी हंसने लगे और ऋतू अंगूठा दिखती फुर्र हो गयी. शंकर जी ने हे बिजली चालू की और हँसते हुए नहाने चले गए.
"चल अब बहार हे चलते है, डॉक्टर दांग आ गए तोह हमारा यहाँ रहना ठीक नहीं.", संजीव भैया ने कदम बहार बढ़ाये थे और अर्जुन भी अपने पापा के इस नए नाम पर हँसता हुआ उनके साथ हो लिया.
"भैया हिमानी को भी छोड़ दीजियेगा इसके घर. यही पार्क के पास है.", प्रियंका दीदी ने कहा तोह हिमानी इशारे से मन करने लगी.
"आ जाओ गुड़िया, हम वही जा रहे है.", संजीव भैया ने गुड़िया कहा तोह हिमानी की वो झिझक थोड़ी काम हुई. लेकिन अलका ने एक और फरमाइश रख दी.
"भैया आप उधर हे जा रहे है तोह chhole-tikki भी लेते आना.", उसकी शकल देख कर संजीव भैया ने सर हिला दिया.
"भैया और मेरे लिए दही भल्ले.", आरती ने अलग फरमाइश रख दी तोह तारा भी बोल पड़ी.
"3 प्लेट, प्लीज."
"ठीक है ठीक है, सब ले आएंगे. चल छोटे.", इलो की सीट पर बैठने लगा तोह उन्होंने अर्जुन को हिमानी के लिए दरवाजा खोलते देख ाचा लगा. कार घर से बहार निकली और इधर रोमिला जी के साथ रेणुका भी घर में दाखिल हो गयी थी. 1 मिनट बाद हे रामेश्वर जी शुदा छोल साहब और कौशल्या जी के वापिस आ गए.
"पापा, आज सारा दिन आप कहा थे? माँ भी आपके साथ हे गयी थी?", तैयार हो कर शंकर जी बैठक में वापिस आये तोह रामेश्वर जी सोफे पर आराम से पसरे हुए थे और छोल साहब पानी पी रहे थे. कोमल वीडियो गेम को सही से समेत कर रख रही थी.
"तेरी माँ के लाडले भाई को कार्ड देने गए थे और फिर जितना सोचा उतना काम कर नहीं पाए. तुम अभी घर पे हे हो?"
"हाँ बस जा रहा था और माँ के लाडले भाई कही भजन मां की तोह बात नहीं कर रहे आप?", शंकर जी भी छोटे सोफे पर बैठ गए. उनकी माता जी कपडे बदलने गयी थी.
"हाँ और फिर तेरी माँ तोह सरकार के जैसे वह जम्म हे गयी. वैसे कभी कभी हमसे भी सलाह मशवरा कर लिया करो भाई. बुड्ढे है लेकिन थोड़ा बहोत तोह काम कर हे सकते है."
"मुझे लगा के ऐसे वक़्त में आपको परेशां करना ठीक नहीं रहेगा और बात घर तक नहीं जानी चाहिए.", शंकर जी का संकोच देख छोल साहब में हाथ पर हाथ रखते हुए कहा.
"आणि चाहिए शंकर जिस से सब संभाला जा सके. पता है अगर तुम साथ न देते तोह बड़ी अनहोनी हो सकती थी और संजीव ने भी भाई साहब को समय रहते पूरी खबर दी. अर्जुन ये सब खुद हे करने वाला था उमेद और धर्मवीर भाई साहब के साथ.", अब शंकर जी को समझ आया था के उनका बीटा क्या करने लगा था.
"आइंदा पहले आपसे बात करूँगा अगर बात ऐसी हुई तोह. वैसे मान न पड़ेगा के आप लोग एक संस्था की तरह काम करते हो.", शंकर जी ने अपने पिता की तरफ देखते हुए कहा और छोल साहब हंसने लगे.
"बुड्ढे लोग तोह भाई अब ऐसा हे कर सकते, जवानो की तरह सामना करनी की उम्र नहीं है न जो सर पे कफ़न बांध कर खुद मौत को निमंत्रण देने लगे. अब ये अपने मां को अर्जुन से दूर रखना, मैं भी कोशिश करूँगा. आज धर्मवीर भाई से मदद ली है कल भजन को शामिल कर लिया तोह ये लड़का जाने क्या ulat-palat कर रख दे.", रामेश्वर जी ने व्यंग किया तोह जिसका मतलब गहरा था.
"कर देगा तोह कर देगा. गलत नहीं करने वाला वो कुछ भी और शंकर तू कल समय से ले जइयो सबको उधर. मैं और तेरे पापा उधर अर्जुन, सतीश भाई साहब के साथ जाने वाले है. राजकुमार बबिता का कन्यादान करेगा तो ललिता भी साथ जाएगी और बच्चियां भी.", कौशल्या जी की बात पर अब शंकर जी क्या कहते, सर हिला दिया.
"घर पे कौन रहेगा यहाँ?", ये सवाल अपनी जगह ठीक था.
"दिन का समय है शंकर, टाला लगा कर चाबी सतीश के घर दे देंगे. सतीश के घर पर तोह Parvati-Mukesh देख हे लेंगे.", मतलब साफ़ था के दोनों हे परिवार जा रहे थे कल और विवाह गाँव में होने थे.
"वह सेफ्टी के लिए कुछ सोचा है पापा?", बेटे का ये सवाल उन्हें भी पसंद आया लेकिन जवाब माँ ने दिया.
"तेरे से बड़ी सेफ्टी क्या हो सकती है उधर? हमारे साथ उमेद होगा. शादी में जा रहे है या बॉर्डर पर?"
"कौशल्या gaav-kasbe का माहौल है घर की बेटियां जा रही है तोह शंकर का चिंतित होना लाज़मी है. अपनी रिवॉल्वर रख लेना साथ और एक गाडी मुनीर ले जायेगा. हमारे साथ सब ठीक है उधर क्योंकि उमेद के सुरक्षाकर्मी होंगे हे.", आपने पिता की बात से शंकर जी कुछ हद्द तक निश्चिंत तोह हुए लेकिन उन्होंने सोच लिया था के वह वो अपने आप हे सुरक्षा का इंतजाम कर लेंगे. जाने की इजाजत लेते हुए वो अपनी एस्टीम कार निकल कर बढ़ गए राममेहर सिंह की हवेली के लिए. रात के 8 बजने वाले थे और फ़िलहाल ध्यान बस कल के कार्यक्रमों पर हे था.
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"ये लड़की ख़ास थी क्या छोटे?", दोनों भाई अरोरा इलेक्ट्रिकल पर जनरेटर का आर्डर देने के बाद अब मॉडल टाउन में लगी रेहड़ियों से खाने पीने का सामान पैक करवा रहे थे. जनरेटर तोह अब परसो हे लगने वाला था क्योंकि रात को आदमी भी नहीं थे और अगले दिन सोमवार होने की वजह से दूकान बंद रहने वाली थी. बात शुरू हुई हिमानी से तोह अर्जुन भैया की बात पर थोड़ा गंभीर हो गया.
"भैया ये आचार्य जी की दोहती है और सच कहु तोह ज़िन्दगी का जो कड़वा पहलु होता है न इसको बस वही नसीब हुआ है. अकेलापन, maa-baap का साया नहीं, पुरुषो से डर और अपने वजूद से भी हारी हुई. कोशिश कर रहा हु के इनकी ज़िन्दगी कुछ बदल सकू. मेरे गुरु और दोस्त होने के साथ साथ आचार्य जी मेरे दादा जी भी है. बहोत कुछ सिखाया है उन्होंने मुझे वो भी हर सवाल का जवाब देने के साथ.", संजीव भैया को तोह अर्जुन हमेशा हे सबसे प्यारा था लेकिन उसका ये रूप देख सम्मान बढ़ गया .
"छोटे पता है तू कुछ साल उसके जैसे हे माहौल में रहा लेकिन तेरा ज़िन्दगी के लिए नजरिया बिलकुल विपरीत बना. इसलिए मैं हमेशा कहता हु के तू न एक वरदान है और तेरे लिए हमेशा दिल में एक डर लगा रहता है. घर न सचमुच तेरे आने के बाद बिलकुल बदल गया है यार. सब आपस में करीब है, हँसते है, एक दूसरे का ख्याल रखते है और बाबा (पंडित जी) तोह 10 साल जवान हे हो गए."
"ये हमेशा ऐसा हे रहने वाला है भैया क्योंकि ये सब आप लोगो ने किया है मैंने नहीं. वैसे ये सब छोड़िये असली बात बताये के आपके फ़ोन पर दादा जी ने कैसे प्रतिकिर्या दी थी आज? भड़क गए थे न वो आप पर?", अर्जुन थोड़ा हंस रहा था लेकिन खुद को रोक भी रहा था.
"साले तू काण्ड हे ऐसे करता है. लेकिन अगर तू वो सलाह न देता तोह काम बिगड़ जाता. देखा न कैसे तीनो एक साथ हे उठा लिए और पुलिस गायब हे करवा दी थी सम्पत के पास से. सही जगह पर सही तीर तू चला गया छोटे."
"वैसे अगर वो सब नहीं भी होता तोह पापा और चाचा संभल लेते भैया लेकिन चोट भी लग सकती थी और उनके हाथ ज्यादा हे गंदे हो जाते. मैं भी कोशिश कर सकता था लेकिन वो पापा है तोह उनके सामने नहीं और ऊपर से दादा जी ने तोह आज हे मेरा बोरिया बिस्तर घर से कही दूर लगवा देना था. ाचा कल आप हमारे साथ चलेंगे उधर बड़ी दादी के घर शादी में?", अर्जुन ने ये बात कुछ सोच कर हे कही थी जिसका पता संजीव का जरा भी न था.
"ना, चाचा के साथ जाऊंगा मैं. वह तोह मेरे पापा जायेंगे और वह किसी से ज्यादा बोलचाल मत शुरू कर देना. दादी को जानता है उधर तोह बस उन्ही तक सिमित रहना.", भैया की बात सुन्न कर अर्जुन मुस्कुराने लगा.
"जानता तोह मैं वह सुशीला बुआ को भी हु, बिजेन्दर भैया, बबिता और ऋचा दीदी को भी. बाकी आप कहते है तोह बस बड़ी दादी से बोलचाल करूँगा.", अर्जुन की बात पर संजीव भैया को भी हंसी आ गयी. उन्हें याद आ गया के आज ये परिवार इतने करीब है तोह उस घटना के बाद से जब अर्जुन ने उन्हें बचाया था.
"बबिता और बिजेन्दर को देखा है कैसे पहाड़ से bhai-behan है दोनों. मिला हु मैं उन दोनों से अपने दादा जी के साथ और बबिता बहोत गुस्सैल थी जितना मुझे याद है.", अर्जुन को जैसे याद आ गया था के बबिता ने एक वादा किया था उसको और वो उनका बेजोड़ संसर्ग.
"न भैया वो तोह बहोत ज्यादा हे प्यारी है.", अर्जुन को ऐसे खोये देख संजीव भैया जैसे कुछ समझ गए.
"अबे तू क्या बोल रहा है? कुछ लफड़ा तोह नहीं कर दिया क्योंकि उसकी माँ जो है वह नाक पर गुस्सा लिए फिरती है."
"सुशीला जी तोह अपनी बुआ है, प्यारी बुआ और बबिता दीदी से तोह मेरी ाची जमती है. टेंशन मत लो वह की, सब अपने है और जो नहीं है वो जान जायेंगे की रामेश्वर जी का छोटा पौता आ रहा है. उचित ध्यान रखा जाये नहीं तोह पापा थोड़े ज्यादा हे फेमस है मेरे.", अर्जुन के मजाक के साथ हे दोनों ने वो tikki-bhalle लिए और घर की तरफ मदद गए. संजीव भैया ने एक बार भी सिग्रत्ते नहीं सुलगाई थी इस दौरान.
"देख मैं वह के बारे में ज्यादा नहीं जानता छोटे लेकिन इतना पता है के उधर सभी लोग अपने परिवार के हितेषी नहीं है. तू उनकी नजरो में आएगा जरूर और इस बात का मुझे डर है. हाँ दादा जी के होते तोह तू बिलकुल सुरक्षित है."
"भैया, वो भी सिर्फ इस वजह से हे सुरक्षित है. लेकिन आप टेंशन मैट लीजिये, न मैं हाथ गंदे करूँगा और न किसी को करने दूंगा जब तक वो इंसान हमारे परिवार को चोट पहुंचने की कोशिश नहीं करता.", अर्जुन का बदला स्वर ऐसा था जिसमे संजीव भैया को झलक मिली के वो उनसे भी कही ज्यादा जानता है.
"वैसे तेरी लव लाइफ कैसी चल रही है? याद है पहली बार तेरा प्रैक्टिकल मैंने हे करवाया था और अब सुन्न रहा हु के तू वह भी सचिन बना हुआ है.", अर्जुन उनकी इस बात को सुन्न कर हँसता हुआ बहार देखने लगा.
"मैं कुछ नहीं करता बस हो जाता है भैया लेकिन आप मेरी छोडो अपनी बताओ. न तोह भाभी की तस्वीर देखने को मिली, न आपने कोई जीकर हे किया उनका और ऊपर से सबकुछ एकदम हे हो रहा है. चक्कर क्या है? लव मैरिज को अर्रंगे तोह नहीं करवा रहे आप?", संजीव का दिमाग जरूर हिल गया था अर्जुन की बात से लेकिन जाहिर न करते हुए हंसने लगा.
"देख छोटे ये न एक सरप्राइज है. तेरी होने वाली भाभी और तू बस डायरेक्ट हे मिलना. उसको भी तेरे बारे में कुछ नहीं पता है लेकिन इतना बता देता हु के परिवार थोड़ा बड़ा है और भीड़ ाची लगने वाली है.", दोनों हे ऐसे बातें करते हुए घर तक चले आये तोह बहार हे प्रीती दिख गयी जो शायद अभी अपने घर से आ रही थी. अर्जुन भी पहले हे उतर गया और भैया मुस्कुराते हुए अंदर चले गए.
"मेमसाब, आज बिना प्रोटेक्शन के?", अर्जुन ने करीब जाते हे मजाक में कहा तोह प्रीती उसको ऊपर से निचे देखने के बाद सीधा बोल पड़ी.
"तुम्हे हे बुलाने आ रही थी मैं. पता नहीं कहा उड़ते फिरते हो हर वक़्त. चलो मेरे साथ इस से पहले कोई टांग अदाए.", प्रीती ने अंदर देखने के बाद गेट लगा दिया बहार से हे. और अर्जुन को तोह कुछ समझ हे नहीं आ रहा था के वो क्या चाह रही है.
"कर क्या रही हो तुम और यहाँ घर पर दादी के साथ साथ ऋतू ने भी जान ले लेनी है क्योंकि 8 बज गए है.", अर्जुन प्रीती को तोह ना कर हे नहीं सकता था लेकिन समझते हुए उसके साथ उनके हे घर की तरफ चल दिया.
"मैंने खाना बनाया हुआ है हम दोनों का और mom-bua उधर हे है रात खाने पर. आजकल कुछ ज्यादा हे वो रेखा माँ के साथ चिपकी रहती है, 10 बजे तक वो वापिस आने वाली है दादा जी के साथ. तुम अंदर चलो और ये ऋतू दीदी या दादी जी का राग अलापना बंद करो, उन्हें कुछ नहीं पता लगता.", प्रीती घर के अंदर आते हे उसका हाथ पकड़ कर अपने कमरे में हे जा घुसी. अर्जुन भोचक्का था के एकाएक प्रीती को ये क्या हो गया. अभी वो कुछ बोलता उस से पहले हे प्रीती की टीशर्ट एक तरफ जा गिरी और अर्जुन को बीएड पर गिरते हुए वो उसके ऊपर थी.
"दरवाजा खुला है और ये तुमने टॉप क्यों उतार दिया? मरवाओगी प्रीती. उम्मम्मम", और होंठो पर अपने होंठो का टाला लगाती प्रीती ने अर्जुन को खामोश कर दिया. और अब वो खुद शामिल हो चूका था प्रीती के साथ इस मनचाहे सफर पर. दोनों हाथ उस रेशमी जालीदार ब्रा के ऊपर रखते हुए अर्जुन कठोर स्टैनो को दबाता प्रीती का मीठा मुखरास पीने में इतना खो गया था के हॉल में हैरत से उनको देखती विक्की का भी आभास न हुआ. प्रीती ने इस मिलान को आगे ले जाने के लिए अपना पजामा खिसकाया हे था के गाला खंखारने की आवाज से दोनों हे इस अवरोध की तरफ देखने लगे जिसकी उपस्थिति ने मजा खराब कर दिया था.
"ी didn't मैं तो डिसट्रब यू बोथ. योर दूर इस ओपन प्रीती.", विक्की इतना बोल कर सपाट चेहरे से रसोईघर में चली गयी और प्रीती ने अर्जुन के ऊपर से उठते हुए एक और चुम्बन कर दिया.
"बोलती है के मैं रोमांटिक नहीं हु.", प्रीती ने आँख मारते हुए अर्जुन से इतना हे कहा और टीशर्ट पहन ने के लिए बिस्टेर से उठ कड़ी हुई. अर्जुन को तोह कुछ समझ हे नहीं आ रहा था.
"उसने दरवाजा बंद करने को कहा तोह टॉप क्यों पहन रही हो?", अर्जुन की हालत खराब थी और लिंग तनाव से पूरा खड़ा कर दिया था प्रीती ने उसका.
"इडियट, चलो अपने घर जाओ. दरवाजा बंद करू वो भी इस टाइम पर.?", इतराते हुए प्रीती आईने में अपने बाल ठीक करने लगी तोह अर्जुन मायूसी से उठ कर जाने हे लगा था के प्रीती ने हाथ थाम लिया.
"तुमने हे तोह कहा था वेडनेसडे को और मैं तैयार भी हु. विक्की को बस दिखाना जरुरी था इसलिए ऐसा किया. उम्मम्मम.. होप यू अंडरस्टैंड."
"अब तुम ऐसे कहोगी तोह मैं क्यों बुरा मान ने लगा. ी लव यू."
"ी लव यू तो अर्जुन. चलो मैं तुम्हे घर तक छोड़ देती हु, वैसे भी लोग नजर बहोत लगा रहे है. माँ को जाने दो एक बार वापिस फिर विक्की मार ले अपने पाँव पर कुल्हाड़ी.", प्रीती ने भी एक बार ाचे से गले लगने के बाद अर्जुन का चेहरा चूमा और दोनों वापिस उनके घर की और चल दिए. रसोई में कड़ी विक्की शरीर से चिपकी लेग्गिंग के ऊपर से हे छूट को सेहला कर होंठ दबा रही थी.
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"तुम्हारा नाम मुस्कान है न बेटी?", सितारा देवी के यहाँ बेशक एक मौत हुई थी जिस वजह से विवाह समारोह बिलकुल सदा रखा गया था लेकिन घर की अगली पीढ़ी में ये पहला विवाह था तोह पिछले आँगन में संगीत और खाने पीने की व्यवस्था उन्होंने खुद बोल कर रखवाई थी जिस से अनुपमा को भी कुछ रहत हो. महिलाये और युवतिया हे इधर शामिल थी. वही गिने चुने लोगो के लिए नोहरे में थोड़ा खाने पीने का इंतजाम विकास और दोस्तों ने अपने जिम्मे ले लिया था. सब से फारिग होने के बाद अब शंकर जी हवेली के बहार वाले आँगन में आराम करने लगे थे तोह अक्षरा की जगह उनके लिए दूध मुस्कान ले कर आ गयी.
"जी अंकल जी, मुस्कान मिर्ज़ा मेरा पूरा नाम है और आपके उधर हे यूनिवर्सिटी स्टूडेंट हु.", थोड़ा झिझकते हुए मुस्कान ने अपना पूरा नाम बताया तोह शंकर जी ने चारपाई पर एक तरफ बैठते हुए इस लड़की को भी सामने बैठने को कहा.
"शबनम तुम्हारी बहिन है न बेटी?"
"बदकिस्मती से वो मेरी बड़ी बहिन है और बिंदिया सिंह जो अब मिर्ज़ा है वो मेरी माँ. ी क्नोव उन सबके साथ मैं भी आपकी गुनेहगार हु लेकिन मैंने कभी उन्हें न अर्जुन की कोई इन्फ्रोमेशन दी और न उनके वो काम पूरे होने दिए जिस से नुक्सान हो सकता था किसी का.", शंकर जी को हैरत थी की ये लड़की निडर होने के साथ साथ शबनम या बिंदु की तरह फरेबी नहीं है. होंठो पर जो बात थी वो दिल से हे निकल रही थी और ढेर सारा पश्चाताप था.
"तुम्हारी बड़ी बहिन तोह कह रही थी की मैं तुम्हारे साथ कुछ न करू, कोई नुक्सान न पहुचौ? और तुम अलग बात कह रही हो. जानती हो वो मेरी कस्टडी में है.", शंकर जी ने मुस्कान को थोड़ा सहज करने के लिए उसकी तरफ एक तकिया बढ़ाया तोह पहली बार वो थोड़ा मुस्कुराई. गॉड में तकिया ले कर अब वो सही से बैठ गयी थी. शंकर जी की बेटी ऋतू भी तोह ऐसे हे बैठती थी जब पाँव लटका कर वो बात करती थी.
"क्या है न अंकल वो brain-washed होने का नाटक जरुरी करती है लेकिन शबनम को तोड़ना किसी के भी बस का नहीं है, फिजिकल पैन दे कर तोह बिलकुल भी नहीं. मुझे तोह इतना पता है के माँ ने शादी की थी सिर्फ हमारी फॅमिली के लेवल और पैसे को देख कर. और मेरे पापा कहते रहे के माँ ने उनसे सच्चा प्यार किया है. भला जो आदमी चल हे नहीं सकता उस से एक विडो इंडिया से इंग्लैंड आ कर हफ्ते में हे सच्चा प्यार कर बैठी? शबनम को माँ के साथ साथ और भी बहोत से लोगो ने ट्रैन किया है और मैं कुछ जान नहीं पायी क्योंकि कभी ध्यान था हे नहीं इस सब पर जब इंग्लैंड थी. बस ध्यान रखना के वो नाम भी बताएगी तोह उनके जिन्हे रस्ते से हटवाना हो. इतना तोह इंडिया आने के बाद मैं जान हे गयी.", मुस्कान का इतना सब बताना और ऐसे मासूम चेहरे के साथ याद करते समय सर झटकना शंकर जी को भी बेहद ाचा लग रहा था.
"तुम्हारी माँ का ससुराल और मायका तोह यहाँ है. कभी गयी नहीं वह?"
"मेरा तोह उनसे कोई रिश्ता है नहीं और वैसे भी ी वास् जस्ट ा बैत (चारा) फॉर थम और अब वो भी हाथ से निकल गया. हाँ बिजेन्दर भैया और सुशीला मौसी से मिलने जा सकती हु वो भी अगर कभी पॉसिबल हुआ तोह. वैसे आप अर्जुन के पापा है न?", मुस्कान का सुशीला को मौसी कहना शंकर जी को थोड़ा खटका और फिर अर्जुन का जीकर करना भी.
"हाँ, मेरा बीटा है अर्जुन. तुम मिली हो अर्जुन से, शायद जब वो अपने दादा जी के साथ यहाँ आया था तब?"
"नहीं नहीं अंकल. तब मैं यहाँ नहीं थी जब वो लोग आये थे. अर्जुन ने हे तोह मेरी जान बचाई है और बाद में शबनम को भी. यूनिवर्सिटी और स्टेडियम में हम थोड़े टाइम से नोन है और उसने हे मुझे इस सब से बहार निकला क्यूंकि वो समझ गया था के मैं उस पर नजर रख रही हु जो मुझे आता भी नहीं था.", शंकर की जो ऐसी बातें भी खुसी दे रही थी जिनमे काम का कुछ था भी नहीं लेकिन ये लड़की शायद दिल हल्का कर रही थी और उन्हें मुस्कान ाची भी लगी.
"वो तोह स्कूल में है फिर यूनिवर्सिटी कैसे? तुमसे मिलने तोह नहीं आता बीटा?"
"ः. नथिंग लिखे तहत अंकल. वो कॉम्प्लिकेटेड लड़का है और लाइब्रेरियन से ले कर कंप्यूटर डिपार्टमेंट के साथ इन्वॉल्व रहता है. मोस्टली स्टडी पर्पस से और कभी कभी मुझसे भी मिल लेता है अगर बास्केटबॉल खेल रही होती हु या लाइब्रेरी में पढ़ते टाइम. आप कहते है वो स्कूल में है लेकिन जैसे सोच चूका है के आगे क्या सब्जेक्ट लेने है. बूत यस वे अरे गुड फ्रेंड्स क्योंकि मेरे दोस्त है हे नहीं उधर.", शंकर जी ऐसे वक़्त पर अब गंभीर बात नहीं करने चाहते थे तोह वो भी बची की ख़ुशी देख खुश होते रहे.
"उसकी लाइफ है बीटा लेकिन कल मेरी वाइफ और बेटियां भी आएँगी यहाँ तोह पॉसिबल है तुम्हे और भी दोस्त मिल जाये. एक तोह इस सेशन से तुम्हारे हे ुनिवर्सिय से ब स्टार्ट करने वाली है, कोमल नाम है उसका. दोस्त होने चाहिए और वही आपकी बुरे समय में ताक़त बनते है."
"सी मैं जो बताने आयी थी वो सिर्फ डर की वजह से नहीं बता पायी. आप सचमुच उतने स्ट्रिक्ट या कहु डेंजरस नहीं है जितना सुना था. माँ की एक बात सुनी थी मैंने की आप हमेशा नजर में हे रहते हो. 'जो भी है उसमे शंकर और नरिंदर को कभी कुछ नहीं होगा क्योंकि उन्हें सब अपनी आँखों से देखना होगा.' और अंकल अगर आप कोशिश करे तोह उन लोगो को पकड़ सकते है क्योंकि वो फ़ोन करने वाला माँ के मायके के aas-pas से है. और शबनम की भी यहाँ हर तरफ बहोत से लोगो ने हेल्प की है. आपके घर पर या शहर में तोह ऐसा कुछ करने की हिमाकत वो नहीं करेंगे लेकिन जैसा आपने कहा के फॅमिली भी यहाँ आएगी तोह सचेत रहना.", मुस्कान का स्वर एकदम हे धीमा हो गया था इतनी लम्बी बात बताते हुए. और शंकर जी को जो झटका लगा उसकी तोह कोई सीमा हे नहीं थी. बिंदु भी तोह नरिंदर के पंजाब वाले घर ऐसा हे कुछ करवाने वाली थी.
"उस फ़ोन के बारे में तुम इतना सही से कैसे कह सकती हो के वो तुम्हारी माँ के मायके से आया था.?"
"क्योंकि डिस्प्ले पर 91-12** तोह दिख गया था बाकी नजर नहीं आया क्योंकि वो हमेशा हाथ रख लेती थी जब भी कॉल आती थी इंडिया से, चाहे पास में कोई हो या न हो. उन्होंने कभी घर से यहाँ इंडिया फ़ोन नहीं किया ये भी उनकी खूबी है. इनकमिंग वाले नंबर बिल पर प्रिंट नहीं होते. अब ये कोड तोह वही का है न जहा वो पैदा हुई?", मुस्कान ने सही कोड बताया था शंकर जी को और अब कई सवाल उठ गए थे दिमाग में.
"तुमने सुना कैसे जब वह नंबर हे छिपा कर बात करती है तोह?"
"मैंने डायरेक्ट कन्वेसशन नहीं सुनी अंकल. जितना नंबर दिखा वो अचानक दिखा और उस वक़्त मैं कसेट्टी से एक सांग क्लियर करने के लिए वह बैठी थी. फ़ोन आने पर माँ ने बहार जाने को कहा तोह मेरा कसेट्टी रिकॉर्डर मैं वही भूल गयी. अब सबसे इजी वे तोह यही है न किसी सांग को हटाना हो तोह साइलेंट जगह बस रील का उतना हिस्सा रिकॉर्डिंग पर लगा दो सब साफ़. लेकिन वह इतना हे रिकॉर्ड हुआ और रील ख़तम क्योंकि आखिरी सांग था वो. मैं कोई डिटेक्टिव नहीं हु बस ये सब अनजाने में हुआ और अगर मेरे कुछ करने से ये सब रुक सकता है तोह मैं ऐसा हे करुँगी. आप कोई बुरे लोग तोह नहीं है और मुझे तोह वजह भी नहीं पता के ये ऐसे खेल खेले हे क्यों जा रहे है.? चलती हु मैं अंकल और अगर आपको कुछ भी पूछना हो तोह कभी भी पूछ सकते है. गूडनिघत.", मुस्कान के शुभरात्रि कहने पर शंकर जी ने भी सर पे हाथ फेरते हुए खुश रहने का आशीर्वाद दिया और अब गहराई से सब सोचने लगे जो इस लड़की ने उनसे बिना पूछे हे बता दिया था. एक बात तोह साफ़ थी की मुस्कान अपने ऊपर दाग नहीं लगने देना चाहती थी और न अपने पिता पर.
'हल नहीं निकलेगा इतने सबूत से. वो कोड पीसीओ का हे होगा और फ़ोन करने वाले का पता करना घांस के ढेर से सूई निकलना. इतना साफ़ है के जेड वही गाड़ी है जहा सब शुरू हुआ. लेकिन मुझपर नजर कौन रख सकता है? ये लड़की अपने वह के परिवार को बचाना चाहती है और इसके बदले खुद खतरे में है. शंकर, ये गुत्थी एक दिमाग से नहीं सुलझने वाली.', अपने आप से बातें करते हुए शंकर जी बेचैन हो चुके थे. बिंदु के साथ वो दूसरा कौन हो सकता है जो उनको और नरिंदर को कुछ नहीं करना चाहता.
"चाचा जी अभी तक जाग रहे हो?", विकास भी इधर आ कर खाट पर लेट गया और शंकर जी को बैठे देख बात की शुरुआत की.
"हाँ यार, आदत नहीं है न इतनी जल्दी सोने की और ऊपर से कल फिर सबसे जरुरी दिन है. सॉरी तेरा उतना साथ नहीं दे पाया यार. हॉस्पिटल और बहार के काम की वजह से 2 दिन ज्यादा हे व्यस्त रहा."
"चाचा जी, अभी से हम लोगो को आदत पड़ेगी तोह आगे चल कर कुछ संभल सकेंगे. किया तोह अभी भी आपने और उमेद अंकल ने हे है सबकुछ. दादा जी ने भी बाकी काम करवा दिए लगे हाथ. मैंने और मेरे दोस्त ने तोह बस आने वाले मेहमानो और यही छोटा मोटा काम संभाला. अब आप आराम कीजिये क्योंकि बड़े काम से पहले शरीर का तैयार रहना भी जरुरी है.", विकास ने तोह अपने खिलाडी वाले जीवन की बात कही थी लेकिन शंकर जी को ये बात अपने हिसाब से भी सही लगी. बड़े काम से पहले खुद को शांत रखना.
"यार तेरा छोटा भाई (अर्जुन) भी कुछ करता धर्ता है स्टेडियम में या सिर्फ टाइम पास हे हो रहा है उसका? मैं तोह ज्यादा देख रेख नहीं कर पता उसकी."
"वो उनमे से है जो खेत न भी जाए तोह खली जमीन देख कही भी म्हणत करनी शुरू कर दे चाचा जी. अनुशाशन भी है और लगन का भी पक्का है बस थोड़ी चिंता होती है के वो न जज्बाती और दिल से चलने वाला लड़का है. सभी वैसे नहीं होते और इसलिए उसका ख्याल ज्यादा रखना पड़ता है. बॉक्सिंग ट्रायल में स्टेट चैंपियन हे धो दिया था लड़के ने जबकि पहले कोई अनुभव नहीं था उसको.", शंकर जी को ये बात अपने पिता से भी पता चली थी की अर्जुन ने ऐसा काम किया है.
"वही उसने सुदर्शन वाला काण्ड भी किया था. तब तोह अनुशाशन नहीं दिखा उसमे.", कटाक्ष भी कुछ सोच कर करते थे शंकर जी लेकिन विकास समझदार था.
"ज़िंदा छोड़ कर अनुशाशन हे तोह दिखाया अर्जुन ने. आप वह होते तोह पक्का जान ले लेते ऐसे इंसान की. बाकी बात जब लड़की की इज्जत पर आये तोह अर्जुन को वो करना बिलकुल सही था. उस दिन भी उसने खुद को काबू हे किया था चाचा जी नहीं तोह आज हालात दूसरे हो सकते थे सभी परिवारों में. दिलेर भी है और माफ़ करना भी जानता है.", विकास के लफ्जो में अर्जुन के लिए प्यार और परवाह थी जिसको देख कर शंकर जी ने हलकी सी गर्दन हिला दी सोने की मुद्रा लेने से पहले.
"हाँ वो बड़ी गलती थी सुदर्शन की और वैसा नहीं होना चाहिए था. शेर इंसान पैदा होता है, तैयार नहीं किया जा सकता. ताक़त गलत हो तोह अंजाम भी वैसा हे मिलता है."
"बड़ी दादी ने लाड लाड में ज्यादा ढील दे दी थी उसको और एकलौता था न तब हवेली पर तोह ताक़त का भी पता चल गया था. अब न करेगा वो ऐसी हिमाकत और अब बिजेन्दर उधर है तोह समझो हवा भी टाइट रहेगी क्योंकि वो कायदे से रहने वाला ाचा इंसान है जिसके लिए परिवार सबकुछ है.", विकास ने तकिया सही करते हुए आँखें बंद की तोह शंकर जी भी अनुसरण करते हुए सोने लगे. 10 बज चुके थे रात के और अब हवेली में कोई शोर भी न था.
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रात के 9 बजे सोमबीर सिंह की हवेली में सन्नाटा नहीं था. एक तरफ जहा मल्टी जी अपनी जेठानी के कहे अनुसार गहने, कपडे आदि सही से व्यवस्थित कर रही थी वही सुशीला सिंह अपने बेटे को भी सबकुछ समझा रही थी की क्या रस्मे होती है और फिर गाँव वापिस आने पर सबसे पहले किन जरुरी रिवाजो को पूरा करना होता है. बिजेन्दर भी सबकुछ सुनते हुए अपने कल पहने जाने वाले कपड़ो को हैंगर में दाल कर अलमारी में रख देता है. आज हवेली में और भी कुछ रिश्तेदार थे जिस वजह से बबिता ऊपर वाली मंजिल पर उसी कमरे में अपनी तैयारी कर रही थी जहा दिन में वो ऋचा के साथ थी. यहाँ एक दूर की भाभी भी उसके साथ मदद कर रही थी.
"तेरे पापा तोह ऐसे वक़्त भी शामिल नहीं होंगे हमारे साथ. यही तोह अन्याय है जो मुझे हमेशा दुःख देता है. काम से काम तेरा तोह सोच सकते थे लेकिन नहीं वो तोह अपने प्यार भरे परिवार के साथ कल एक परै लड़की के बाप बन्न रहे है.", मधुलता भी यहाँ ऋचा के लिए कपडे तैयार कर रही थी और जो भी देना था बबिता को वो अलग से पैक करती हुई आदतन गुस्सा हो रही थी.
"उनका असली परिवार तोह वही है माँ. यहाँ सिर्फ एक मेरे लिए तोह वो सबको छोड़ नहीं देंगे और वैसे भी हवेली और इस गाँव के हिसाब से तोह वो मेरे बस dharam-chacha है. आप पहन लो जरा ब्याहता की साड़ी और मांग भर लो अगर मैं गलत कह रही हु तोह?", कल अपनी माँ द्वारा पहने जाने वाले odhni-kameej और घाघरे को देख कर ऋचा ने कुछ जरुरी सामान अलग करते हुए सवाल किया तोह अब मधुलता की बारी थी जवाब देने की.
"जितने इस हवेली में हु तोह ये बेरंग कपडे भी मेरे जीवन का हे सच है. मैं तोह तेरे लिए कह रही थी की वो आ सकते थे यहाँ."
"बहिन के लिए उसका भाई आ रहा है तोह मुझे उतने में हे ख़ुशी है. हाँ आपकी डिमांड अपने लिए है तोह फ़ोन कर के बुला लेती, वैसे भी आपसे तोह वो डरते हे है.", ऋचा ने ये प्रसाधन का सामान एक बैग में डालते हुए एक नजर अपनी माँ को खोये देखा और अंदर हे अंदर मुस्कुराने लगी. कहा तोह मधुलता इतना कभी सुनती नहीं और आज बोलती बंद थी.
"हाँ कर लियो जी पूरा अपने सौतेले भाई से मिल कर. उसके गुण तोह तेरी दादी भी जाती रहती है, जरा परवाह नहीं की ऐसे लड़के को प्यार करने में जिसने इस घर के बड़े बेटे को अधमरा कर के नरक जैसी ज़िन्दगी दी. सबको बस वही भला लगता है जो छाती तान कर लोगो के घर उजाड़े.", कटाक्ष करते समय वो ये भी नहीं सोच रही थी की आज हे तोह बेटी ने उसको सब समझाया था लेकिन इंसान जेह्रीला हो जाये तोह फिर साफ़ खून पसंद भी कहा करता है.
"फिर तोह आपको विधवा करने वाले के साथ मुझे पैदा करके आपने कुछ अलग नहीं किया माँ. वैसे भी सुदर्शन भैया ने अर्जुन की मंगेतर को उठाने की कोशिश की थी, मर्द लड़ता नहीं बचता है. जिन्होंने मर्दानगी दिखाई वो तोह न रहे लेकिन हाँ कुछ लोग ऐसे है जो तब भी एक परछाई थे और आज भी वही है. आप क्यों बिना वजह इतना सोचती हो? शादी यहाँ है और यही अपना परिवार है. आप करो अपनी भाभी और मौसी से बात मैं ऊपर जा रही हु बबिता दीदी के कमरे में. सवेरे टाइम से न उठी तोह जगाने आ जाना.", ये make-up और वैसा हे सामान का थैला लिए ऋचा पिछले आँगन में जाती हुई दोनों बड़े कुत्तो को भी आजाद करती ऊपर चल दी.
'हाँ अब तू हे सिखाएगी के मुझे किसके साथ रहना चाहिए और किसके साथ नहीं? कर लेने दो एक रात और आराम उस तेरी प्यारी आंटी और अर्जुन की माँ को. मेरी हालत में शंकर होगा तोह फिर उसको भी अकाल आएगी के एक मयान में 2 तलवार रखना हमेशा फायदा का सौदा नहीं होता. तू बच गयी इसका शुक्र मन और उस अर्जुन को में दिखती हु चक्रव्यूह का 8व दरवाजा.', मधुलता ने स्टील का वो गिलास गुस्से में इतनी जोर से दबाया था के नरम हाथो ने भी उसका अकार बदल कर नाकारा कर दिया था. गहरी सांस लेने के बाद खुद को सहज करती वो अपने कमरे में चली गयी.
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रामेश्वर जी के यहाँ तोह 11 बजे हे निचला हिस्सा शांत होता था और वो भी जरुरी नहीं था के सभी सो जाते थे इस वक़्त. ऊपरी भाग का कोई समय नहीं था जहा पिछले भाग में लड़किया 2 बजे तक भी जागती रहती थी वही अर्जुन वैसे हे कुछ न कुछ करता रहता था. संजीव भैया को दादा जी ने बैठक में सोने को कहा था तोह आज भी वो यहाँ अकेला हे किताबो में खोया बैठा था. 2 घंटे से वो बस पढाई में हे लगा था और अब पानी की बोतल खाली देख कर दूसरे कमरे में आया तोह यहाँ भी कोई न था.
'आज तोह अकेले नहीं सोने वाला मैं. इनका ठीक है 4-5 एक साथ रहती है और उधर माधुरी दीदी के साथ भी प्रियंका दीदी और कोमल दीदी के साथ रुपाली दीदी. भैया इतने दिन बाद आये लेकिन उन्हें भी निचे हे सुला दिया.' अपने आप से हे बातें करता वो ऋतू दीदी के कमरे में गया तोह जैसा सोचा था वैसा हे नजारा मिला लेकिन आज पढ़ाई की जगह सभी अपनी अपनी ड्रेस निकल कर देख रही थी की वो क्या पहनेंगी कल और उसके बाद अर्जुन को पता था के इनके मेकअप वाला टॉपिक चालू हो जायेगा.
"ोये, निकल यहाँ से. ज्यादा taak-jhaank नहीं कर रहा?", ऋतू दीदी ने दरवाजे के बीच खड़े होते जैसे उसको अंदर देखने से रोका. लेकिन फिर भी नजर आ हे गया के वह प्रीती और विक्की भी बैठी थी.
"ये बिल्ली आज रात को यही सो रही है?", अर्जुन ने इतना पुछा तोह दरवाजा मुँह पर हे बंद करती ऋतू दीदी ने बस इतना हे जवाब दिया.
"जा के सो जा, ज्यादा इधर उधर मैट देखा कर.", और अर्जुन अपना मुँह लिए निचे चल दिया. उसको तोह पहले हे अंदेशा था की यहाँ फ़िलहाल िज्जात्त नहीं मिलने वाली थी. निचे रसोई में पानी पीने के बाद उसने माँ का हे दरवाजा हलके से खटकाया.
"नींद नहीं आ रही थी क्या ऊपर?", रेखा जी ने सर सहलाते हुए अपने लाडले को कमरे में अंदर किया और चिटकनी लगा दी. वो अमूमन दरवाजा बंद करती थी लेकिन चिटकनी सिर्फ कभी कभी. अर्जुन भी सिर्फ बनियान और पाजामे में बिस्टेर पर जा लेता.
"नहीं माँ, भैया ऊपर होते तब भी मैं शायद आराम से न सो पता.", बेटे की ये बात सुन्न कर रेखा जी ने आंवला तेल की शीशी उठाई और एक अंगोछा अपनी गॉड में बिछाते हुए अर्जुन का सर वह रख लिया. हथेली में तेल गिरा कर वो बड़े प्यार से अपने बेटे के सर को मालिश से हल्का करने लगी.
"पता है जब शरीर ज्यादा काम करे तोह नींद आसानी से आती है और जब दिमाग का प्रयोग ज्यादा हो तोह तनाव. तुम्हे खुद को कुछ कदम पीछे हे रहना चाहिए बीटा. अभी सुकून से रहोगे तोह आगे बेहतर काम कर सकोगे.", रेखा जी अगर दिल से बात करती थी तोह ज्यादातर वो अपने बचो या जेठानी के साथ हे होता था. लेकिन अर्जुन इसमें भी ख़ास था जहा कोई एक परिभाषा नहीं थी इस prem-dor की.
"अभी सब ठीक हो जाये तोह फिर हमेशा सुकून रहेगा न माँ. और मुझे ाचा लगता है क्योंकि आप यही तोह करती है. सबको प्यार और इज्जत देती हो, कभी कोई सवाल नहीं कोई मांग नहीं. तोह बताओ मैं ऐसा क्यों न करू?", अर्जुन नीचे लेता हुआ अपनी माँ के चेहरे को देख रहा था जिसके साथ वो किसी की तुलना नहीं करता था. रेखा जी के चेहरे पर बस हमेशा वाली मुस्कान थी अपने बेटे के लिए.
"वो मेरा दायित्व है बीटा और मुझे ये हमेशा करना हे होगा. तुम्हे अभी कक्षा में घूमना चाहिए ना की खुद केंद्र बन्न न. मुझे नाज है तुम पर क्योंकि जब हर इंसान ये कहता है के अर्जुन समझदार है, सबका ख़याल रखता है या सुरक्षा करना जानता है दिल को एक ख़ुशी मिलती है जिसके लिए शब्द भी काम लगे. लेकिन क्या ये सही है जब तुम एक किशोर हो और घर की पहचान अभी तुमसे नहीं होनी चाहिए बीटा. किसी को निराश कभी मैट करना और हमेशा बड़ो की बात को वचन की तरह लेना लेकिन अपने इस मैं को थोड़ा सिमित करो जो बिना किसी के मांगे परवाह देने चला जाता है.", रेखा जी की बातों की गहराई बताती थी की उनका ज्ञान साधारण नहीं है. एक किशोर बेटे की परवाह और जीवन के सुनहरे पालो का मूल्य उन्हें मालूम था. उंगलिया सचमुच अर्जुन को आराम देती हुई जैसी किसी अदृश्य जकड़न से आजाद कर रही थी.
"फिर भी माँ, अगर सब एकदम सही हो जाये तोह ाचा रहेगा न."
"तू ऐसा जवाब देगा ये उम्मीद नहीं थी अर्जुन. तेरे इस ा कम्पलीट प्रोसेस बिहाइंड एव्री क्लियर प्रोजेक्ट. िफ़ यू ऐड अडिश्नल फाॅर्स और स्किप अन्य रिक्वायर्ड स्टेप, आईटी विल रुइन it's नेचर एंड फार्मेशन. बचा 5 महीने में बहार नहीं निकल सकते या फिर अगर कहु की पृथ्वी 12 घंटे में अपनी धुरी पर घूमने लगे तोह जीवन हे नहीं होगा. सब ठीक करने की कोशिश में उतावलापन और जल्दबाजी वही अतिरिक्त ऊर्जा और गायब क्रमांक का काम करेंगे जो उम्मीद से इतर परिणाम देगा.", अब कही अर्जुन लाजवाब हो गया था. उसने अपने पापा वाले काम में कुछ ऐसा हे किया था, दादा जी भी तोह उसको मन कर रहे थे की वो दूर रहे अब ऐसी किसी भी घटना से.
"सॉरी माँ, मैं समझ गया के आप क्या कहना छह रही हो. गलती हो जाती है जब मैं ज्यादा सोचने लग जाता हु."
"वही तोह मैंने कहा था न सबसे पहले की अपने मैं को नियंत्रित करो. अभी जो सामने दिखाई दे उसके बारे में सोचो, उस से जुडी परेशानी के बारे में पता करो और कोशिश करो के वो सही तरीके और सही इंसान की मदद से सुलझे. घर में रहो, अपने दोस्तों के साथ milo-julo, जो घर के काम हमेशा करते रहते हो उन पर ध्यान दो और सही दिशा में अपने लक्ष्य पर काम करो. मेरा सबकुछ सिर्फ तुम्ही हो और मेरा जीवन तभी सार्थक होगा जब तुम अपने जीवन से संतुष्ट होंगे. दिल से, दिमाग या बहरी कमाई से नहीं. इन कंधो पर इतना बोझ अभी से मैट लो की जरुरत पड़ने पर ये झुक जाए.", सर थपकने के बाद वो उसके कंधे और गर्दन पर ख़ास तरह से दबाव देती हुई मालिश करने लगी.
"आप इतना गहराई से कैसे जानती है सबकुछ? मतलब हर टॉपिक पर आप पकड़ रखती है लेकिन सबसे ज्यादा आप इंसान को समझती है माँ. लेकिन फिर भी इतनी शांत और बस मेरी परछाई सी रहती है.", अर्जुन ने लेते हुए हे माँ के गाल पर हौले से हाथ फिराया तोह वो भी झुक कर उसके माथे पर प्यार देने के बाद मुस्कुराने लगी.
"तेरी परछाई नहीं हु मैं बीटा, तू मेरी तपस्या का वो वरदान है जिसका आवरण बन कर मुझे हे रहना होगा. चल अब तू आराम कर मैं हाथ धो कर आती हु.", अर्जुन के सर पर लगाया तेल उस सफ़ेद अंगोछे से ाचे से साफ़ करने के बाद उन्होंने कंधे और चेहरे को भी प्यार से साफ़ किया जिस से कही भी तेल का निशाँ न रहे और कमरे से निकल कर बाथरूम चली गयी.
अर्जुन बस यही सोच रहा था के माँ इतनी असीमित ज्ञान रखती है और उतनी हे शांत रहती है. ये कैसा संतुलन बना लिया है उन्होंने जिसमे कोई तर्क या विवाद की झलक देखने को नहीं मिलती. माँ उसको भी इतना जानती है जितना वो खुद नहीं जान पाया. तभी तोह वो उसका आवरण है. इधर सोच से बहार आया तोह अब दिमाग बिलकुल हे शांत हो गया था अगला दृश्य देख कर. माँ ने वही काली निघ्त्य पहन ली थी जो उसने उन्हें उपहार स्वरुप दी थी.
"शांत होने के बाद हे तुम सो पाओगे.", बड़ी लाइट को बंद करते हुए उन्होंने वो जीरो की रौशनी जला दी थी लेकिन उनके सामने शायद पहले वाली लाइट भी बेमतलब हे थी. इस नैसर्गिक सौन्दर्य की तुलना करना बेमतलब हे था.
आवरण- 1
सांझ 7 बज चुके थे जब शंकर जी घर में दाखिल हुए. उन्हें आज इस वक़्त होना तोह राममेहर सिंह की हवेली पर था लेकिन इस अकस्मात मुठभेड़ की वजह से सारा कार्यक्रम इधर उधर हो गया. ढेरो सवाल थे और जवाब देने वाले लोग भी किसी टुकड़ो वाली पहेली की तरह सबकुछ नहीं जानते थे. गलियारे से भीतर वाले आँगन में आये तोह ऋतू, कोमल और प्रियंका के साथ ये अनजान लड़की बैठी कॉफ़ी पी रही थी. शंकर जी को देखते हे उसने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया तोह परिचय दूसरी तरफ से आती तारा ने दिया.
"मां जी ये हिमानी है, अर्जुन के आचार्य दादा जी की नातिन और हमारी सहेली. और हिमानी दीदी ये है मेरे प्यारे मां जी और अर्जुन के पापा.", तारा फिर से अपने मां की बगल में लगी कड़ी हो गयी.
"नमस्ते अंकल. आपके बारे में भी नाना जी बताया है के आप एक फेमस सर्जन है.", शंकर जी को ख़ुशी हुई की जिस लड़की को देख कर कभी ऋतू नाराज हुई थी वो आज उसकी हे बगल में बैठी थी. लेकिन आँखों पर चस्मा वो भी शाम के वक़्त.?
"नमस्ते बीटा, ये तुम्हारा भी घर है तोह बेफिक्र रहा करो. शास्त्री जी शहर से बहार है क्या?", शंकर जी अभी बात कर रहे थे की रेखा जी ने पानी का गिलास दिया तोह एक मुस्कान के साथ उन्होंने पानी लेकर पीते हुए बीवी को भी देखा और फिर हिमानी का जवाब सुन्न ने लगे. रेखा जी वही कड़ी रही.
"जी नाना जी को जरुरी काम था इसलिए वो आउट ऑफ़ इंडिया है लेकिन परसो आ जायेंगे. एंड ी ऍम रियली कम्फर्टेबले हेरे, थैंक यू सो मच."
"हिमानी दीदी पापा कह रहे है के ये गॉगल्स क्यों लगा रखे है.", ऋतू ने चुटकी ली तोह शंकर जी भी हंसने लगे अपनी शरारती बेटी की बात सुन्न कर लेकिन हिमानी थोड़ा सा झेंप गयी. वो अब पहले से बेहतर बोलने लगी थी इन लोगो के साथ रहने से.
"अंकल सबको इतना ाचा नहीं लगता जितना ऋतू को मुझे बिना चश्मे के देख के लगता है.", इतना कह कर हिमानी ने चस्मा हटाया तोह ऋतू अपने पिता का चेहरा देखने लगी. जहा शन्न भर के लिए हे हैरत थी जो सबको नहीं दिखे और उसके बाद एक मुस्कान.
"ओने इन ा मिलियन तोह ऋतू को ाचा हे लगेगा और बाकी सबको भी बेटी. यू अरे गिफ्टेड. खुश रहना जरुरी है और तुमको तोह डबल रहना चाहिए. हर कोई इतना लकी नहीं होता. मुझे, मेरे बचो को हे देख लो सबकी एक जैसी हे बोरिंग आईज है.", शंकर जी के इतना हलके में लेने और तारीफ के साथ साथ अपना हे मजाक उड़ाने पर सभी खुश थे, हिमानी के साथ साथ.
"सचमुच ऋतू और कोमल लकी है के उनके डैड इतने हंसमुख और पॉजिटिव है.", हिमानी ने अर्जुन को शामिल नहीं किया तोह रेखा जी अब मुस्कुराई. उन्हें पता था के बात जरूर होगी अब.
"बीटा बाप तोह मैं रुपाली और अर्जुन का भी हु."
"हाहाहा. सॉरी अंकल वो रुपाली से अभी इतना मिलना नहीं हुआ और वो भी ाची लड़की है. बूत don't मंद अर्जुन इस सलीगःती बेटर थान एवरीवन, नोन और अननोन. उसको कपड़े करना मतलब उसपे डाउट करना. नाना जी भी ऐसा नहीं करेंगे.", हिमानी ने इसमें आचार्य जी तक को शामिल किया था और शंकर जी को ाचा लगा के लड़का अपने व्यक्तित्व को सही रखता है.
"हैं कहा वो जनाब? घर में तोह सभी गाडी और उसकी मोटरसाइकिल कड़ी है. रेखा, बाथरूम में कपडे रख दो फिर मुझे जाना है. तारा मेरे लिए चाय बना देगी.", उन्होंने अर्जुन का पुछा था और चाय ले कर आरती इधर आ गयी थी अपने बड़े पापा के लिए.
"अर्जुन और भैया का शोर नहीं सुना था क्या जब आप घर में आये बड़े पापा?", आरती ने जैसे ये कहा शंकर जी कप ले कर बहार की तरफ चल दिए क्योंकि बैठक से हे वो शोर आ रहा था जिस पर उनका ध्यान नहीं गया. आरती और तारा भी पीछे हे चल दी, रेखा जी कमरे से अपने पति के कपडे लाने.
"भैया भैया आप आगे रहो न ये फाइनल ड्रैगन है और मेरे पास बस 2 चांस है. ये पावर मुझे लेने दो."
"रुक मैं आगे हु तोह मैं लेज़र लेता हु तू 'स' से काम चला. संभल उस दूसरी तरफ वाले को.", यहाँ तोह टेलीविज़न की आवाज 50 पर थी और दोनों भाई शोर मचाते धड़ाधड़ गोलिया चला रहे थे. रामेश्वर जी तोह घर थे नहीं कौशल्या जी को ले कर जो सुबह से बहार थे. शंकर जी के आने का भी इन पर कोई प्रभाव न पड़ा तोह वो हैरत से Tara-Aarti को देखने लगे की ये लड़के कितनी उम्र के है. अर्जुन तोह मान लिया लेकिन संजीव, वो तोह एक अधिकार और गंभीर युवक था. लेकिन यहाँ सब समझ से बहार. ऋतू ने आँख मारते हुए आँगन में लगे बिजली के स्विच को निचे गिरा दिया.
"ओह्ह्ह.. इस लाइट को भी अभी जाना था. हो गया न किया कराया सब खराब भैया? जनरेटर लेके आते है जिस से ये झंझट हे ख़तम.", अर्जुन ने रिमोट गुस्से में जमीन पर पटका तोह संजीव भैया भी झुंझलाते हुए बोल पड़े.
"चल अरोरा अंकल की दूकान पर चलते है. वैसे भी थानेदार साहब ने 5 दिन बाद लगवाना है तोह आज हे सही. ऊपर वाले कमरे में सेट करते है गेम और आते हुए अलादीन और स्ट्रीट फाइटर की कसेट्टी भी लेते आएंगे.", संजीव ने कमीज पहन कर खड़े होते कहा तोह दोनों की हे नजर बहार खड़े हँसते हुए सभी चेहरों पर पड़ी.
"अरे जनरेटर क्यों एक बड़ा टीवी, वो महंगी वाली वीडियो गेम और छोटा फ्रिज भी लेते आना हवा वाले गद्दे के साथ. एक की शादी होने वाली है, दूसरा बाप से भी 3 इंच ऊँचा हो गया लेकिन अभी तक निक्कर बदल कर पंत नहीं बानी.", शंकर जी के ऐसा कहने पर अर्जुन तोह अपने भैया की तरफ हो गया और जैसे हे नजर बहार की तरफ जलती लाइट पर पड़ी वो सब भूल कर चिल्ला उठा.
"ये ऋतू दीदी ने किया है भैया. ऊपर भी गेम यही बंद करती थी और आज बिजली भी इन्होने हे भागे है. कश्यप जी के तोह लाइट है.", उसकी बात पर शकर जी हंसने लगे और ऋतू अंगूठा दिखती फुर्र हो गयी. शंकर जी ने हे बिजली चालू की और हँसते हुए नहाने चले गए.
"चल अब बहार हे चलते है, डॉक्टर दांग आ गए तोह हमारा यहाँ रहना ठीक नहीं.", संजीव भैया ने कदम बहार बढ़ाये थे और अर्जुन भी अपने पापा के इस नए नाम पर हँसता हुआ उनके साथ हो लिया.
"भैया हिमानी को भी छोड़ दीजियेगा इसके घर. यही पार्क के पास है.", प्रियंका दीदी ने कहा तोह हिमानी इशारे से मन करने लगी.
"आ जाओ गुड़िया, हम वही जा रहे है.", संजीव भैया ने गुड़िया कहा तोह हिमानी की वो झिझक थोड़ी काम हुई. लेकिन अलका ने एक और फरमाइश रख दी.
"भैया आप उधर हे जा रहे है तोह chhole-tikki भी लेते आना.", उसकी शकल देख कर संजीव भैया ने सर हिला दिया.
"भैया और मेरे लिए दही भल्ले.", आरती ने अलग फरमाइश रख दी तोह तारा भी बोल पड़ी.
"3 प्लेट, प्लीज."
"ठीक है ठीक है, सब ले आएंगे. चल छोटे.", इलो की सीट पर बैठने लगा तोह उन्होंने अर्जुन को हिमानी के लिए दरवाजा खोलते देख ाचा लगा. कार घर से बहार निकली और इधर रोमिला जी के साथ रेणुका भी घर में दाखिल हो गयी थी. 1 मिनट बाद हे रामेश्वर जी शुदा छोल साहब और कौशल्या जी के वापिस आ गए.
"पापा, आज सारा दिन आप कहा थे? माँ भी आपके साथ हे गयी थी?", तैयार हो कर शंकर जी बैठक में वापिस आये तोह रामेश्वर जी सोफे पर आराम से पसरे हुए थे और छोल साहब पानी पी रहे थे. कोमल वीडियो गेम को सही से समेत कर रख रही थी.
"तेरी माँ के लाडले भाई को कार्ड देने गए थे और फिर जितना सोचा उतना काम कर नहीं पाए. तुम अभी घर पे हे हो?"
"हाँ बस जा रहा था और माँ के लाडले भाई कही भजन मां की तोह बात नहीं कर रहे आप?", शंकर जी भी छोटे सोफे पर बैठ गए. उनकी माता जी कपडे बदलने गयी थी.
"हाँ और फिर तेरी माँ तोह सरकार के जैसे वह जम्म हे गयी. वैसे कभी कभी हमसे भी सलाह मशवरा कर लिया करो भाई. बुड्ढे है लेकिन थोड़ा बहोत तोह काम कर हे सकते है."
"मुझे लगा के ऐसे वक़्त में आपको परेशां करना ठीक नहीं रहेगा और बात घर तक नहीं जानी चाहिए.", शंकर जी का संकोच देख छोल साहब में हाथ पर हाथ रखते हुए कहा.
"आणि चाहिए शंकर जिस से सब संभाला जा सके. पता है अगर तुम साथ न देते तोह बड़ी अनहोनी हो सकती थी और संजीव ने भी भाई साहब को समय रहते पूरी खबर दी. अर्जुन ये सब खुद हे करने वाला था उमेद और धर्मवीर भाई साहब के साथ.", अब शंकर जी को समझ आया था के उनका बीटा क्या करने लगा था.
"आइंदा पहले आपसे बात करूँगा अगर बात ऐसी हुई तोह. वैसे मान न पड़ेगा के आप लोग एक संस्था की तरह काम करते हो.", शंकर जी ने अपने पिता की तरफ देखते हुए कहा और छोल साहब हंसने लगे.
"बुड्ढे लोग तोह भाई अब ऐसा हे कर सकते, जवानो की तरह सामना करनी की उम्र नहीं है न जो सर पे कफ़न बांध कर खुद मौत को निमंत्रण देने लगे. अब ये अपने मां को अर्जुन से दूर रखना, मैं भी कोशिश करूँगा. आज धर्मवीर भाई से मदद ली है कल भजन को शामिल कर लिया तोह ये लड़का जाने क्या ulat-palat कर रख दे.", रामेश्वर जी ने व्यंग किया तोह जिसका मतलब गहरा था.
"कर देगा तोह कर देगा. गलत नहीं करने वाला वो कुछ भी और शंकर तू कल समय से ले जइयो सबको उधर. मैं और तेरे पापा उधर अर्जुन, सतीश भाई साहब के साथ जाने वाले है. राजकुमार बबिता का कन्यादान करेगा तो ललिता भी साथ जाएगी और बच्चियां भी.", कौशल्या जी की बात पर अब शंकर जी क्या कहते, सर हिला दिया.
"घर पे कौन रहेगा यहाँ?", ये सवाल अपनी जगह ठीक था.
"दिन का समय है शंकर, टाला लगा कर चाबी सतीश के घर दे देंगे. सतीश के घर पर तोह Parvati-Mukesh देख हे लेंगे.", मतलब साफ़ था के दोनों हे परिवार जा रहे थे कल और विवाह गाँव में होने थे.
"वह सेफ्टी के लिए कुछ सोचा है पापा?", बेटे का ये सवाल उन्हें भी पसंद आया लेकिन जवाब माँ ने दिया.
"तेरे से बड़ी सेफ्टी क्या हो सकती है उधर? हमारे साथ उमेद होगा. शादी में जा रहे है या बॉर्डर पर?"
"कौशल्या gaav-kasbe का माहौल है घर की बेटियां जा रही है तोह शंकर का चिंतित होना लाज़मी है. अपनी रिवॉल्वर रख लेना साथ और एक गाडी मुनीर ले जायेगा. हमारे साथ सब ठीक है उधर क्योंकि उमेद के सुरक्षाकर्मी होंगे हे.", आपने पिता की बात से शंकर जी कुछ हद्द तक निश्चिंत तोह हुए लेकिन उन्होंने सोच लिया था के वह वो अपने आप हे सुरक्षा का इंतजाम कर लेंगे. जाने की इजाजत लेते हुए वो अपनी एस्टीम कार निकल कर बढ़ गए राममेहर सिंह की हवेली के लिए. रात के 8 बजने वाले थे और फ़िलहाल ध्यान बस कल के कार्यक्रमों पर हे था.
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"ये लड़की ख़ास थी क्या छोटे?", दोनों भाई अरोरा इलेक्ट्रिकल पर जनरेटर का आर्डर देने के बाद अब मॉडल टाउन में लगी रेहड़ियों से खाने पीने का सामान पैक करवा रहे थे. जनरेटर तोह अब परसो हे लगने वाला था क्योंकि रात को आदमी भी नहीं थे और अगले दिन सोमवार होने की वजह से दूकान बंद रहने वाली थी. बात शुरू हुई हिमानी से तोह अर्जुन भैया की बात पर थोड़ा गंभीर हो गया.
"भैया ये आचार्य जी की दोहती है और सच कहु तोह ज़िन्दगी का जो कड़वा पहलु होता है न इसको बस वही नसीब हुआ है. अकेलापन, maa-baap का साया नहीं, पुरुषो से डर और अपने वजूद से भी हारी हुई. कोशिश कर रहा हु के इनकी ज़िन्दगी कुछ बदल सकू. मेरे गुरु और दोस्त होने के साथ साथ आचार्य जी मेरे दादा जी भी है. बहोत कुछ सिखाया है उन्होंने मुझे वो भी हर सवाल का जवाब देने के साथ.", संजीव भैया को तोह अर्जुन हमेशा हे सबसे प्यारा था लेकिन उसका ये रूप देख सम्मान बढ़ गया .
"छोटे पता है तू कुछ साल उसके जैसे हे माहौल में रहा लेकिन तेरा ज़िन्दगी के लिए नजरिया बिलकुल विपरीत बना. इसलिए मैं हमेशा कहता हु के तू न एक वरदान है और तेरे लिए हमेशा दिल में एक डर लगा रहता है. घर न सचमुच तेरे आने के बाद बिलकुल बदल गया है यार. सब आपस में करीब है, हँसते है, एक दूसरे का ख्याल रखते है और बाबा (पंडित जी) तोह 10 साल जवान हे हो गए."
"ये हमेशा ऐसा हे रहने वाला है भैया क्योंकि ये सब आप लोगो ने किया है मैंने नहीं. वैसे ये सब छोड़िये असली बात बताये के आपके फ़ोन पर दादा जी ने कैसे प्रतिकिर्या दी थी आज? भड़क गए थे न वो आप पर?", अर्जुन थोड़ा हंस रहा था लेकिन खुद को रोक भी रहा था.
"साले तू काण्ड हे ऐसे करता है. लेकिन अगर तू वो सलाह न देता तोह काम बिगड़ जाता. देखा न कैसे तीनो एक साथ हे उठा लिए और पुलिस गायब हे करवा दी थी सम्पत के पास से. सही जगह पर सही तीर तू चला गया छोटे."
"वैसे अगर वो सब नहीं भी होता तोह पापा और चाचा संभल लेते भैया लेकिन चोट भी लग सकती थी और उनके हाथ ज्यादा हे गंदे हो जाते. मैं भी कोशिश कर सकता था लेकिन वो पापा है तोह उनके सामने नहीं और ऊपर से दादा जी ने तोह आज हे मेरा बोरिया बिस्तर घर से कही दूर लगवा देना था. ाचा कल आप हमारे साथ चलेंगे उधर बड़ी दादी के घर शादी में?", अर्जुन ने ये बात कुछ सोच कर हे कही थी जिसका पता संजीव का जरा भी न था.
"ना, चाचा के साथ जाऊंगा मैं. वह तोह मेरे पापा जायेंगे और वह किसी से ज्यादा बोलचाल मत शुरू कर देना. दादी को जानता है उधर तोह बस उन्ही तक सिमित रहना.", भैया की बात सुन्न कर अर्जुन मुस्कुराने लगा.
"जानता तोह मैं वह सुशीला बुआ को भी हु, बिजेन्दर भैया, बबिता और ऋचा दीदी को भी. बाकी आप कहते है तोह बस बड़ी दादी से बोलचाल करूँगा.", अर्जुन की बात पर संजीव भैया को भी हंसी आ गयी. उन्हें याद आ गया के आज ये परिवार इतने करीब है तोह उस घटना के बाद से जब अर्जुन ने उन्हें बचाया था.
"बबिता और बिजेन्दर को देखा है कैसे पहाड़ से bhai-behan है दोनों. मिला हु मैं उन दोनों से अपने दादा जी के साथ और बबिता बहोत गुस्सैल थी जितना मुझे याद है.", अर्जुन को जैसे याद आ गया था के बबिता ने एक वादा किया था उसको और वो उनका बेजोड़ संसर्ग.
"न भैया वो तोह बहोत ज्यादा हे प्यारी है.", अर्जुन को ऐसे खोये देख संजीव भैया जैसे कुछ समझ गए.
"अबे तू क्या बोल रहा है? कुछ लफड़ा तोह नहीं कर दिया क्योंकि उसकी माँ जो है वह नाक पर गुस्सा लिए फिरती है."
"सुशीला जी तोह अपनी बुआ है, प्यारी बुआ और बबिता दीदी से तोह मेरी ाची जमती है. टेंशन मत लो वह की, सब अपने है और जो नहीं है वो जान जायेंगे की रामेश्वर जी का छोटा पौता आ रहा है. उचित ध्यान रखा जाये नहीं तोह पापा थोड़े ज्यादा हे फेमस है मेरे.", अर्जुन के मजाक के साथ हे दोनों ने वो tikki-bhalle लिए और घर की तरफ मदद गए. संजीव भैया ने एक बार भी सिग्रत्ते नहीं सुलगाई थी इस दौरान.
"देख मैं वह के बारे में ज्यादा नहीं जानता छोटे लेकिन इतना पता है के उधर सभी लोग अपने परिवार के हितेषी नहीं है. तू उनकी नजरो में आएगा जरूर और इस बात का मुझे डर है. हाँ दादा जी के होते तोह तू बिलकुल सुरक्षित है."
"भैया, वो भी सिर्फ इस वजह से हे सुरक्षित है. लेकिन आप टेंशन मैट लीजिये, न मैं हाथ गंदे करूँगा और न किसी को करने दूंगा जब तक वो इंसान हमारे परिवार को चोट पहुंचने की कोशिश नहीं करता.", अर्जुन का बदला स्वर ऐसा था जिसमे संजीव भैया को झलक मिली के वो उनसे भी कही ज्यादा जानता है.
"वैसे तेरी लव लाइफ कैसी चल रही है? याद है पहली बार तेरा प्रैक्टिकल मैंने हे करवाया था और अब सुन्न रहा हु के तू वह भी सचिन बना हुआ है.", अर्जुन उनकी इस बात को सुन्न कर हँसता हुआ बहार देखने लगा.
"मैं कुछ नहीं करता बस हो जाता है भैया लेकिन आप मेरी छोडो अपनी बताओ. न तोह भाभी की तस्वीर देखने को मिली, न आपने कोई जीकर हे किया उनका और ऊपर से सबकुछ एकदम हे हो रहा है. चक्कर क्या है? लव मैरिज को अर्रंगे तोह नहीं करवा रहे आप?", संजीव का दिमाग जरूर हिल गया था अर्जुन की बात से लेकिन जाहिर न करते हुए हंसने लगा.
"देख छोटे ये न एक सरप्राइज है. तेरी होने वाली भाभी और तू बस डायरेक्ट हे मिलना. उसको भी तेरे बारे में कुछ नहीं पता है लेकिन इतना बता देता हु के परिवार थोड़ा बड़ा है और भीड़ ाची लगने वाली है.", दोनों हे ऐसे बातें करते हुए घर तक चले आये तोह बहार हे प्रीती दिख गयी जो शायद अभी अपने घर से आ रही थी. अर्जुन भी पहले हे उतर गया और भैया मुस्कुराते हुए अंदर चले गए.
"मेमसाब, आज बिना प्रोटेक्शन के?", अर्जुन ने करीब जाते हे मजाक में कहा तोह प्रीती उसको ऊपर से निचे देखने के बाद सीधा बोल पड़ी.
"तुम्हे हे बुलाने आ रही थी मैं. पता नहीं कहा उड़ते फिरते हो हर वक़्त. चलो मेरे साथ इस से पहले कोई टांग अदाए.", प्रीती ने अंदर देखने के बाद गेट लगा दिया बहार से हे. और अर्जुन को तोह कुछ समझ हे नहीं आ रहा था के वो क्या चाह रही है.
"कर क्या रही हो तुम और यहाँ घर पर दादी के साथ साथ ऋतू ने भी जान ले लेनी है क्योंकि 8 बज गए है.", अर्जुन प्रीती को तोह ना कर हे नहीं सकता था लेकिन समझते हुए उसके साथ उनके हे घर की तरफ चल दिया.
"मैंने खाना बनाया हुआ है हम दोनों का और mom-bua उधर हे है रात खाने पर. आजकल कुछ ज्यादा हे वो रेखा माँ के साथ चिपकी रहती है, 10 बजे तक वो वापिस आने वाली है दादा जी के साथ. तुम अंदर चलो और ये ऋतू दीदी या दादी जी का राग अलापना बंद करो, उन्हें कुछ नहीं पता लगता.", प्रीती घर के अंदर आते हे उसका हाथ पकड़ कर अपने कमरे में हे जा घुसी. अर्जुन भोचक्का था के एकाएक प्रीती को ये क्या हो गया. अभी वो कुछ बोलता उस से पहले हे प्रीती की टीशर्ट एक तरफ जा गिरी और अर्जुन को बीएड पर गिरते हुए वो उसके ऊपर थी.
"दरवाजा खुला है और ये तुमने टॉप क्यों उतार दिया? मरवाओगी प्रीती. उम्मम्मम", और होंठो पर अपने होंठो का टाला लगाती प्रीती ने अर्जुन को खामोश कर दिया. और अब वो खुद शामिल हो चूका था प्रीती के साथ इस मनचाहे सफर पर. दोनों हाथ उस रेशमी जालीदार ब्रा के ऊपर रखते हुए अर्जुन कठोर स्टैनो को दबाता प्रीती का मीठा मुखरास पीने में इतना खो गया था के हॉल में हैरत से उनको देखती विक्की का भी आभास न हुआ. प्रीती ने इस मिलान को आगे ले जाने के लिए अपना पजामा खिसकाया हे था के गाला खंखारने की आवाज से दोनों हे इस अवरोध की तरफ देखने लगे जिसकी उपस्थिति ने मजा खराब कर दिया था.
"ी didn't मैं तो डिसट्रब यू बोथ. योर दूर इस ओपन प्रीती.", विक्की इतना बोल कर सपाट चेहरे से रसोईघर में चली गयी और प्रीती ने अर्जुन के ऊपर से उठते हुए एक और चुम्बन कर दिया.
"बोलती है के मैं रोमांटिक नहीं हु.", प्रीती ने आँख मारते हुए अर्जुन से इतना हे कहा और टीशर्ट पहन ने के लिए बिस्टेर से उठ कड़ी हुई. अर्जुन को तोह कुछ समझ हे नहीं आ रहा था.
"उसने दरवाजा बंद करने को कहा तोह टॉप क्यों पहन रही हो?", अर्जुन की हालत खराब थी और लिंग तनाव से पूरा खड़ा कर दिया था प्रीती ने उसका.
"इडियट, चलो अपने घर जाओ. दरवाजा बंद करू वो भी इस टाइम पर.?", इतराते हुए प्रीती आईने में अपने बाल ठीक करने लगी तोह अर्जुन मायूसी से उठ कर जाने हे लगा था के प्रीती ने हाथ थाम लिया.
"तुमने हे तोह कहा था वेडनेसडे को और मैं तैयार भी हु. विक्की को बस दिखाना जरुरी था इसलिए ऐसा किया. उम्मम्मम.. होप यू अंडरस्टैंड."
"अब तुम ऐसे कहोगी तोह मैं क्यों बुरा मान ने लगा. ी लव यू."
"ी लव यू तो अर्जुन. चलो मैं तुम्हे घर तक छोड़ देती हु, वैसे भी लोग नजर बहोत लगा रहे है. माँ को जाने दो एक बार वापिस फिर विक्की मार ले अपने पाँव पर कुल्हाड़ी.", प्रीती ने भी एक बार ाचे से गले लगने के बाद अर्जुन का चेहरा चूमा और दोनों वापिस उनके घर की और चल दिए. रसोई में कड़ी विक्की शरीर से चिपकी लेग्गिंग के ऊपर से हे छूट को सेहला कर होंठ दबा रही थी.
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"तुम्हारा नाम मुस्कान है न बेटी?", सितारा देवी के यहाँ बेशक एक मौत हुई थी जिस वजह से विवाह समारोह बिलकुल सदा रखा गया था लेकिन घर की अगली पीढ़ी में ये पहला विवाह था तोह पिछले आँगन में संगीत और खाने पीने की व्यवस्था उन्होंने खुद बोल कर रखवाई थी जिस से अनुपमा को भी कुछ रहत हो. महिलाये और युवतिया हे इधर शामिल थी. वही गिने चुने लोगो के लिए नोहरे में थोड़ा खाने पीने का इंतजाम विकास और दोस्तों ने अपने जिम्मे ले लिया था. सब से फारिग होने के बाद अब शंकर जी हवेली के बहार वाले आँगन में आराम करने लगे थे तोह अक्षरा की जगह उनके लिए दूध मुस्कान ले कर आ गयी.
"जी अंकल जी, मुस्कान मिर्ज़ा मेरा पूरा नाम है और आपके उधर हे यूनिवर्सिटी स्टूडेंट हु.", थोड़ा झिझकते हुए मुस्कान ने अपना पूरा नाम बताया तोह शंकर जी ने चारपाई पर एक तरफ बैठते हुए इस लड़की को भी सामने बैठने को कहा.
"शबनम तुम्हारी बहिन है न बेटी?"
"बदकिस्मती से वो मेरी बड़ी बहिन है और बिंदिया सिंह जो अब मिर्ज़ा है वो मेरी माँ. ी क्नोव उन सबके साथ मैं भी आपकी गुनेहगार हु लेकिन मैंने कभी उन्हें न अर्जुन की कोई इन्फ्रोमेशन दी और न उनके वो काम पूरे होने दिए जिस से नुक्सान हो सकता था किसी का.", शंकर जी को हैरत थी की ये लड़की निडर होने के साथ साथ शबनम या बिंदु की तरह फरेबी नहीं है. होंठो पर जो बात थी वो दिल से हे निकल रही थी और ढेर सारा पश्चाताप था.
"तुम्हारी बड़ी बहिन तोह कह रही थी की मैं तुम्हारे साथ कुछ न करू, कोई नुक्सान न पहुचौ? और तुम अलग बात कह रही हो. जानती हो वो मेरी कस्टडी में है.", शंकर जी ने मुस्कान को थोड़ा सहज करने के लिए उसकी तरफ एक तकिया बढ़ाया तोह पहली बार वो थोड़ा मुस्कुराई. गॉड में तकिया ले कर अब वो सही से बैठ गयी थी. शंकर जी की बेटी ऋतू भी तोह ऐसे हे बैठती थी जब पाँव लटका कर वो बात करती थी.
"क्या है न अंकल वो brain-washed होने का नाटक जरुरी करती है लेकिन शबनम को तोड़ना किसी के भी बस का नहीं है, फिजिकल पैन दे कर तोह बिलकुल भी नहीं. मुझे तोह इतना पता है के माँ ने शादी की थी सिर्फ हमारी फॅमिली के लेवल और पैसे को देख कर. और मेरे पापा कहते रहे के माँ ने उनसे सच्चा प्यार किया है. भला जो आदमी चल हे नहीं सकता उस से एक विडो इंडिया से इंग्लैंड आ कर हफ्ते में हे सच्चा प्यार कर बैठी? शबनम को माँ के साथ साथ और भी बहोत से लोगो ने ट्रैन किया है और मैं कुछ जान नहीं पायी क्योंकि कभी ध्यान था हे नहीं इस सब पर जब इंग्लैंड थी. बस ध्यान रखना के वो नाम भी बताएगी तोह उनके जिन्हे रस्ते से हटवाना हो. इतना तोह इंडिया आने के बाद मैं जान हे गयी.", मुस्कान का इतना सब बताना और ऐसे मासूम चेहरे के साथ याद करते समय सर झटकना शंकर जी को भी बेहद ाचा लग रहा था.
"तुम्हारी माँ का ससुराल और मायका तोह यहाँ है. कभी गयी नहीं वह?"
"मेरा तोह उनसे कोई रिश्ता है नहीं और वैसे भी ी वास् जस्ट ा बैत (चारा) फॉर थम और अब वो भी हाथ से निकल गया. हाँ बिजेन्दर भैया और सुशीला मौसी से मिलने जा सकती हु वो भी अगर कभी पॉसिबल हुआ तोह. वैसे आप अर्जुन के पापा है न?", मुस्कान का सुशीला को मौसी कहना शंकर जी को थोड़ा खटका और फिर अर्जुन का जीकर करना भी.
"हाँ, मेरा बीटा है अर्जुन. तुम मिली हो अर्जुन से, शायद जब वो अपने दादा जी के साथ यहाँ आया था तब?"
"नहीं नहीं अंकल. तब मैं यहाँ नहीं थी जब वो लोग आये थे. अर्जुन ने हे तोह मेरी जान बचाई है और बाद में शबनम को भी. यूनिवर्सिटी और स्टेडियम में हम थोड़े टाइम से नोन है और उसने हे मुझे इस सब से बहार निकला क्यूंकि वो समझ गया था के मैं उस पर नजर रख रही हु जो मुझे आता भी नहीं था.", शंकर की जो ऐसी बातें भी खुसी दे रही थी जिनमे काम का कुछ था भी नहीं लेकिन ये लड़की शायद दिल हल्का कर रही थी और उन्हें मुस्कान ाची भी लगी.
"वो तोह स्कूल में है फिर यूनिवर्सिटी कैसे? तुमसे मिलने तोह नहीं आता बीटा?"
"ः. नथिंग लिखे तहत अंकल. वो कॉम्प्लिकेटेड लड़का है और लाइब्रेरियन से ले कर कंप्यूटर डिपार्टमेंट के साथ इन्वॉल्व रहता है. मोस्टली स्टडी पर्पस से और कभी कभी मुझसे भी मिल लेता है अगर बास्केटबॉल खेल रही होती हु या लाइब्रेरी में पढ़ते टाइम. आप कहते है वो स्कूल में है लेकिन जैसे सोच चूका है के आगे क्या सब्जेक्ट लेने है. बूत यस वे अरे गुड फ्रेंड्स क्योंकि मेरे दोस्त है हे नहीं उधर.", शंकर जी ऐसे वक़्त पर अब गंभीर बात नहीं करने चाहते थे तोह वो भी बची की ख़ुशी देख खुश होते रहे.
"उसकी लाइफ है बीटा लेकिन कल मेरी वाइफ और बेटियां भी आएँगी यहाँ तोह पॉसिबल है तुम्हे और भी दोस्त मिल जाये. एक तोह इस सेशन से तुम्हारे हे ुनिवर्सिय से ब स्टार्ट करने वाली है, कोमल नाम है उसका. दोस्त होने चाहिए और वही आपकी बुरे समय में ताक़त बनते है."
"सी मैं जो बताने आयी थी वो सिर्फ डर की वजह से नहीं बता पायी. आप सचमुच उतने स्ट्रिक्ट या कहु डेंजरस नहीं है जितना सुना था. माँ की एक बात सुनी थी मैंने की आप हमेशा नजर में हे रहते हो. 'जो भी है उसमे शंकर और नरिंदर को कभी कुछ नहीं होगा क्योंकि उन्हें सब अपनी आँखों से देखना होगा.' और अंकल अगर आप कोशिश करे तोह उन लोगो को पकड़ सकते है क्योंकि वो फ़ोन करने वाला माँ के मायके के aas-pas से है. और शबनम की भी यहाँ हर तरफ बहोत से लोगो ने हेल्प की है. आपके घर पर या शहर में तोह ऐसा कुछ करने की हिमाकत वो नहीं करेंगे लेकिन जैसा आपने कहा के फॅमिली भी यहाँ आएगी तोह सचेत रहना.", मुस्कान का स्वर एकदम हे धीमा हो गया था इतनी लम्बी बात बताते हुए. और शंकर जी को जो झटका लगा उसकी तोह कोई सीमा हे नहीं थी. बिंदु भी तोह नरिंदर के पंजाब वाले घर ऐसा हे कुछ करवाने वाली थी.
"उस फ़ोन के बारे में तुम इतना सही से कैसे कह सकती हो के वो तुम्हारी माँ के मायके से आया था.?"
"क्योंकि डिस्प्ले पर 91-12** तोह दिख गया था बाकी नजर नहीं आया क्योंकि वो हमेशा हाथ रख लेती थी जब भी कॉल आती थी इंडिया से, चाहे पास में कोई हो या न हो. उन्होंने कभी घर से यहाँ इंडिया फ़ोन नहीं किया ये भी उनकी खूबी है. इनकमिंग वाले नंबर बिल पर प्रिंट नहीं होते. अब ये कोड तोह वही का है न जहा वो पैदा हुई?", मुस्कान ने सही कोड बताया था शंकर जी को और अब कई सवाल उठ गए थे दिमाग में.
"तुमने सुना कैसे जब वह नंबर हे छिपा कर बात करती है तोह?"
"मैंने डायरेक्ट कन्वेसशन नहीं सुनी अंकल. जितना नंबर दिखा वो अचानक दिखा और उस वक़्त मैं कसेट्टी से एक सांग क्लियर करने के लिए वह बैठी थी. फ़ोन आने पर माँ ने बहार जाने को कहा तोह मेरा कसेट्टी रिकॉर्डर मैं वही भूल गयी. अब सबसे इजी वे तोह यही है न किसी सांग को हटाना हो तोह साइलेंट जगह बस रील का उतना हिस्सा रिकॉर्डिंग पर लगा दो सब साफ़. लेकिन वह इतना हे रिकॉर्ड हुआ और रील ख़तम क्योंकि आखिरी सांग था वो. मैं कोई डिटेक्टिव नहीं हु बस ये सब अनजाने में हुआ और अगर मेरे कुछ करने से ये सब रुक सकता है तोह मैं ऐसा हे करुँगी. आप कोई बुरे लोग तोह नहीं है और मुझे तोह वजह भी नहीं पता के ये ऐसे खेल खेले हे क्यों जा रहे है.? चलती हु मैं अंकल और अगर आपको कुछ भी पूछना हो तोह कभी भी पूछ सकते है. गूडनिघत.", मुस्कान के शुभरात्रि कहने पर शंकर जी ने भी सर पे हाथ फेरते हुए खुश रहने का आशीर्वाद दिया और अब गहराई से सब सोचने लगे जो इस लड़की ने उनसे बिना पूछे हे बता दिया था. एक बात तोह साफ़ थी की मुस्कान अपने ऊपर दाग नहीं लगने देना चाहती थी और न अपने पिता पर.
'हल नहीं निकलेगा इतने सबूत से. वो कोड पीसीओ का हे होगा और फ़ोन करने वाले का पता करना घांस के ढेर से सूई निकलना. इतना साफ़ है के जेड वही गाड़ी है जहा सब शुरू हुआ. लेकिन मुझपर नजर कौन रख सकता है? ये लड़की अपने वह के परिवार को बचाना चाहती है और इसके बदले खुद खतरे में है. शंकर, ये गुत्थी एक दिमाग से नहीं सुलझने वाली.', अपने आप से बातें करते हुए शंकर जी बेचैन हो चुके थे. बिंदु के साथ वो दूसरा कौन हो सकता है जो उनको और नरिंदर को कुछ नहीं करना चाहता.
"चाचा जी अभी तक जाग रहे हो?", विकास भी इधर आ कर खाट पर लेट गया और शंकर जी को बैठे देख बात की शुरुआत की.
"हाँ यार, आदत नहीं है न इतनी जल्दी सोने की और ऊपर से कल फिर सबसे जरुरी दिन है. सॉरी तेरा उतना साथ नहीं दे पाया यार. हॉस्पिटल और बहार के काम की वजह से 2 दिन ज्यादा हे व्यस्त रहा."
"चाचा जी, अभी से हम लोगो को आदत पड़ेगी तोह आगे चल कर कुछ संभल सकेंगे. किया तोह अभी भी आपने और उमेद अंकल ने हे है सबकुछ. दादा जी ने भी बाकी काम करवा दिए लगे हाथ. मैंने और मेरे दोस्त ने तोह बस आने वाले मेहमानो और यही छोटा मोटा काम संभाला. अब आप आराम कीजिये क्योंकि बड़े काम से पहले शरीर का तैयार रहना भी जरुरी है.", विकास ने तोह अपने खिलाडी वाले जीवन की बात कही थी लेकिन शंकर जी को ये बात अपने हिसाब से भी सही लगी. बड़े काम से पहले खुद को शांत रखना.
"यार तेरा छोटा भाई (अर्जुन) भी कुछ करता धर्ता है स्टेडियम में या सिर्फ टाइम पास हे हो रहा है उसका? मैं तोह ज्यादा देख रेख नहीं कर पता उसकी."
"वो उनमे से है जो खेत न भी जाए तोह खली जमीन देख कही भी म्हणत करनी शुरू कर दे चाचा जी. अनुशाशन भी है और लगन का भी पक्का है बस थोड़ी चिंता होती है के वो न जज्बाती और दिल से चलने वाला लड़का है. सभी वैसे नहीं होते और इसलिए उसका ख्याल ज्यादा रखना पड़ता है. बॉक्सिंग ट्रायल में स्टेट चैंपियन हे धो दिया था लड़के ने जबकि पहले कोई अनुभव नहीं था उसको.", शंकर जी को ये बात अपने पिता से भी पता चली थी की अर्जुन ने ऐसा काम किया है.
"वही उसने सुदर्शन वाला काण्ड भी किया था. तब तोह अनुशाशन नहीं दिखा उसमे.", कटाक्ष भी कुछ सोच कर करते थे शंकर जी लेकिन विकास समझदार था.
"ज़िंदा छोड़ कर अनुशाशन हे तोह दिखाया अर्जुन ने. आप वह होते तोह पक्का जान ले लेते ऐसे इंसान की. बाकी बात जब लड़की की इज्जत पर आये तोह अर्जुन को वो करना बिलकुल सही था. उस दिन भी उसने खुद को काबू हे किया था चाचा जी नहीं तोह आज हालात दूसरे हो सकते थे सभी परिवारों में. दिलेर भी है और माफ़ करना भी जानता है.", विकास के लफ्जो में अर्जुन के लिए प्यार और परवाह थी जिसको देख कर शंकर जी ने हलकी सी गर्दन हिला दी सोने की मुद्रा लेने से पहले.
"हाँ वो बड़ी गलती थी सुदर्शन की और वैसा नहीं होना चाहिए था. शेर इंसान पैदा होता है, तैयार नहीं किया जा सकता. ताक़त गलत हो तोह अंजाम भी वैसा हे मिलता है."
"बड़ी दादी ने लाड लाड में ज्यादा ढील दे दी थी उसको और एकलौता था न तब हवेली पर तोह ताक़त का भी पता चल गया था. अब न करेगा वो ऐसी हिमाकत और अब बिजेन्दर उधर है तोह समझो हवा भी टाइट रहेगी क्योंकि वो कायदे से रहने वाला ाचा इंसान है जिसके लिए परिवार सबकुछ है.", विकास ने तकिया सही करते हुए आँखें बंद की तोह शंकर जी भी अनुसरण करते हुए सोने लगे. 10 बज चुके थे रात के और अब हवेली में कोई शोर भी न था.
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रात के 9 बजे सोमबीर सिंह की हवेली में सन्नाटा नहीं था. एक तरफ जहा मल्टी जी अपनी जेठानी के कहे अनुसार गहने, कपडे आदि सही से व्यवस्थित कर रही थी वही सुशीला सिंह अपने बेटे को भी सबकुछ समझा रही थी की क्या रस्मे होती है और फिर गाँव वापिस आने पर सबसे पहले किन जरुरी रिवाजो को पूरा करना होता है. बिजेन्दर भी सबकुछ सुनते हुए अपने कल पहने जाने वाले कपड़ो को हैंगर में दाल कर अलमारी में रख देता है. आज हवेली में और भी कुछ रिश्तेदार थे जिस वजह से बबिता ऊपर वाली मंजिल पर उसी कमरे में अपनी तैयारी कर रही थी जहा दिन में वो ऋचा के साथ थी. यहाँ एक दूर की भाभी भी उसके साथ मदद कर रही थी.
"तेरे पापा तोह ऐसे वक़्त भी शामिल नहीं होंगे हमारे साथ. यही तोह अन्याय है जो मुझे हमेशा दुःख देता है. काम से काम तेरा तोह सोच सकते थे लेकिन नहीं वो तोह अपने प्यार भरे परिवार के साथ कल एक परै लड़की के बाप बन्न रहे है.", मधुलता भी यहाँ ऋचा के लिए कपडे तैयार कर रही थी और जो भी देना था बबिता को वो अलग से पैक करती हुई आदतन गुस्सा हो रही थी.
"उनका असली परिवार तोह वही है माँ. यहाँ सिर्फ एक मेरे लिए तोह वो सबको छोड़ नहीं देंगे और वैसे भी हवेली और इस गाँव के हिसाब से तोह वो मेरे बस dharam-chacha है. आप पहन लो जरा ब्याहता की साड़ी और मांग भर लो अगर मैं गलत कह रही हु तोह?", कल अपनी माँ द्वारा पहने जाने वाले odhni-kameej और घाघरे को देख कर ऋचा ने कुछ जरुरी सामान अलग करते हुए सवाल किया तोह अब मधुलता की बारी थी जवाब देने की.
"जितने इस हवेली में हु तोह ये बेरंग कपडे भी मेरे जीवन का हे सच है. मैं तोह तेरे लिए कह रही थी की वो आ सकते थे यहाँ."
"बहिन के लिए उसका भाई आ रहा है तोह मुझे उतने में हे ख़ुशी है. हाँ आपकी डिमांड अपने लिए है तोह फ़ोन कर के बुला लेती, वैसे भी आपसे तोह वो डरते हे है.", ऋचा ने ये प्रसाधन का सामान एक बैग में डालते हुए एक नजर अपनी माँ को खोये देखा और अंदर हे अंदर मुस्कुराने लगी. कहा तोह मधुलता इतना कभी सुनती नहीं और आज बोलती बंद थी.
"हाँ कर लियो जी पूरा अपने सौतेले भाई से मिल कर. उसके गुण तोह तेरी दादी भी जाती रहती है, जरा परवाह नहीं की ऐसे लड़के को प्यार करने में जिसने इस घर के बड़े बेटे को अधमरा कर के नरक जैसी ज़िन्दगी दी. सबको बस वही भला लगता है जो छाती तान कर लोगो के घर उजाड़े.", कटाक्ष करते समय वो ये भी नहीं सोच रही थी की आज हे तोह बेटी ने उसको सब समझाया था लेकिन इंसान जेह्रीला हो जाये तोह फिर साफ़ खून पसंद भी कहा करता है.
"फिर तोह आपको विधवा करने वाले के साथ मुझे पैदा करके आपने कुछ अलग नहीं किया माँ. वैसे भी सुदर्शन भैया ने अर्जुन की मंगेतर को उठाने की कोशिश की थी, मर्द लड़ता नहीं बचता है. जिन्होंने मर्दानगी दिखाई वो तोह न रहे लेकिन हाँ कुछ लोग ऐसे है जो तब भी एक परछाई थे और आज भी वही है. आप क्यों बिना वजह इतना सोचती हो? शादी यहाँ है और यही अपना परिवार है. आप करो अपनी भाभी और मौसी से बात मैं ऊपर जा रही हु बबिता दीदी के कमरे में. सवेरे टाइम से न उठी तोह जगाने आ जाना.", ये make-up और वैसा हे सामान का थैला लिए ऋचा पिछले आँगन में जाती हुई दोनों बड़े कुत्तो को भी आजाद करती ऊपर चल दी.
'हाँ अब तू हे सिखाएगी के मुझे किसके साथ रहना चाहिए और किसके साथ नहीं? कर लेने दो एक रात और आराम उस तेरी प्यारी आंटी और अर्जुन की माँ को. मेरी हालत में शंकर होगा तोह फिर उसको भी अकाल आएगी के एक मयान में 2 तलवार रखना हमेशा फायदा का सौदा नहीं होता. तू बच गयी इसका शुक्र मन और उस अर्जुन को में दिखती हु चक्रव्यूह का 8व दरवाजा.', मधुलता ने स्टील का वो गिलास गुस्से में इतनी जोर से दबाया था के नरम हाथो ने भी उसका अकार बदल कर नाकारा कर दिया था. गहरी सांस लेने के बाद खुद को सहज करती वो अपने कमरे में चली गयी.
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रामेश्वर जी के यहाँ तोह 11 बजे हे निचला हिस्सा शांत होता था और वो भी जरुरी नहीं था के सभी सो जाते थे इस वक़्त. ऊपरी भाग का कोई समय नहीं था जहा पिछले भाग में लड़किया 2 बजे तक भी जागती रहती थी वही अर्जुन वैसे हे कुछ न कुछ करता रहता था. संजीव भैया को दादा जी ने बैठक में सोने को कहा था तोह आज भी वो यहाँ अकेला हे किताबो में खोया बैठा था. 2 घंटे से वो बस पढाई में हे लगा था और अब पानी की बोतल खाली देख कर दूसरे कमरे में आया तोह यहाँ भी कोई न था.
'आज तोह अकेले नहीं सोने वाला मैं. इनका ठीक है 4-5 एक साथ रहती है और उधर माधुरी दीदी के साथ भी प्रियंका दीदी और कोमल दीदी के साथ रुपाली दीदी. भैया इतने दिन बाद आये लेकिन उन्हें भी निचे हे सुला दिया.' अपने आप से हे बातें करता वो ऋतू दीदी के कमरे में गया तोह जैसा सोचा था वैसा हे नजारा मिला लेकिन आज पढ़ाई की जगह सभी अपनी अपनी ड्रेस निकल कर देख रही थी की वो क्या पहनेंगी कल और उसके बाद अर्जुन को पता था के इनके मेकअप वाला टॉपिक चालू हो जायेगा.
"ोये, निकल यहाँ से. ज्यादा taak-jhaank नहीं कर रहा?", ऋतू दीदी ने दरवाजे के बीच खड़े होते जैसे उसको अंदर देखने से रोका. लेकिन फिर भी नजर आ हे गया के वह प्रीती और विक्की भी बैठी थी.
"ये बिल्ली आज रात को यही सो रही है?", अर्जुन ने इतना पुछा तोह दरवाजा मुँह पर हे बंद करती ऋतू दीदी ने बस इतना हे जवाब दिया.
"जा के सो जा, ज्यादा इधर उधर मैट देखा कर.", और अर्जुन अपना मुँह लिए निचे चल दिया. उसको तोह पहले हे अंदेशा था की यहाँ फ़िलहाल िज्जात्त नहीं मिलने वाली थी. निचे रसोई में पानी पीने के बाद उसने माँ का हे दरवाजा हलके से खटकाया.
"नींद नहीं आ रही थी क्या ऊपर?", रेखा जी ने सर सहलाते हुए अपने लाडले को कमरे में अंदर किया और चिटकनी लगा दी. वो अमूमन दरवाजा बंद करती थी लेकिन चिटकनी सिर्फ कभी कभी. अर्जुन भी सिर्फ बनियान और पाजामे में बिस्टेर पर जा लेता.
"नहीं माँ, भैया ऊपर होते तब भी मैं शायद आराम से न सो पता.", बेटे की ये बात सुन्न कर रेखा जी ने आंवला तेल की शीशी उठाई और एक अंगोछा अपनी गॉड में बिछाते हुए अर्जुन का सर वह रख लिया. हथेली में तेल गिरा कर वो बड़े प्यार से अपने बेटे के सर को मालिश से हल्का करने लगी.
"पता है जब शरीर ज्यादा काम करे तोह नींद आसानी से आती है और जब दिमाग का प्रयोग ज्यादा हो तोह तनाव. तुम्हे खुद को कुछ कदम पीछे हे रहना चाहिए बीटा. अभी सुकून से रहोगे तोह आगे बेहतर काम कर सकोगे.", रेखा जी अगर दिल से बात करती थी तोह ज्यादातर वो अपने बचो या जेठानी के साथ हे होता था. लेकिन अर्जुन इसमें भी ख़ास था जहा कोई एक परिभाषा नहीं थी इस prem-dor की.
"अभी सब ठीक हो जाये तोह फिर हमेशा सुकून रहेगा न माँ. और मुझे ाचा लगता है क्योंकि आप यही तोह करती है. सबको प्यार और इज्जत देती हो, कभी कोई सवाल नहीं कोई मांग नहीं. तोह बताओ मैं ऐसा क्यों न करू?", अर्जुन नीचे लेता हुआ अपनी माँ के चेहरे को देख रहा था जिसके साथ वो किसी की तुलना नहीं करता था. रेखा जी के चेहरे पर बस हमेशा वाली मुस्कान थी अपने बेटे के लिए.
"वो मेरा दायित्व है बीटा और मुझे ये हमेशा करना हे होगा. तुम्हे अभी कक्षा में घूमना चाहिए ना की खुद केंद्र बन्न न. मुझे नाज है तुम पर क्योंकि जब हर इंसान ये कहता है के अर्जुन समझदार है, सबका ख़याल रखता है या सुरक्षा करना जानता है दिल को एक ख़ुशी मिलती है जिसके लिए शब्द भी काम लगे. लेकिन क्या ये सही है जब तुम एक किशोर हो और घर की पहचान अभी तुमसे नहीं होनी चाहिए बीटा. किसी को निराश कभी मैट करना और हमेशा बड़ो की बात को वचन की तरह लेना लेकिन अपने इस मैं को थोड़ा सिमित करो जो बिना किसी के मांगे परवाह देने चला जाता है.", रेखा जी की बातों की गहराई बताती थी की उनका ज्ञान साधारण नहीं है. एक किशोर बेटे की परवाह और जीवन के सुनहरे पालो का मूल्य उन्हें मालूम था. उंगलिया सचमुच अर्जुन को आराम देती हुई जैसी किसी अदृश्य जकड़न से आजाद कर रही थी.
"फिर भी माँ, अगर सब एकदम सही हो जाये तोह ाचा रहेगा न."
"तू ऐसा जवाब देगा ये उम्मीद नहीं थी अर्जुन. तेरे इस ा कम्पलीट प्रोसेस बिहाइंड एव्री क्लियर प्रोजेक्ट. िफ़ यू ऐड अडिश्नल फाॅर्स और स्किप अन्य रिक्वायर्ड स्टेप, आईटी विल रुइन it's नेचर एंड फार्मेशन. बचा 5 महीने में बहार नहीं निकल सकते या फिर अगर कहु की पृथ्वी 12 घंटे में अपनी धुरी पर घूमने लगे तोह जीवन हे नहीं होगा. सब ठीक करने की कोशिश में उतावलापन और जल्दबाजी वही अतिरिक्त ऊर्जा और गायब क्रमांक का काम करेंगे जो उम्मीद से इतर परिणाम देगा.", अब कही अर्जुन लाजवाब हो गया था. उसने अपने पापा वाले काम में कुछ ऐसा हे किया था, दादा जी भी तोह उसको मन कर रहे थे की वो दूर रहे अब ऐसी किसी भी घटना से.
"सॉरी माँ, मैं समझ गया के आप क्या कहना छह रही हो. गलती हो जाती है जब मैं ज्यादा सोचने लग जाता हु."
"वही तोह मैंने कहा था न सबसे पहले की अपने मैं को नियंत्रित करो. अभी जो सामने दिखाई दे उसके बारे में सोचो, उस से जुडी परेशानी के बारे में पता करो और कोशिश करो के वो सही तरीके और सही इंसान की मदद से सुलझे. घर में रहो, अपने दोस्तों के साथ milo-julo, जो घर के काम हमेशा करते रहते हो उन पर ध्यान दो और सही दिशा में अपने लक्ष्य पर काम करो. मेरा सबकुछ सिर्फ तुम्ही हो और मेरा जीवन तभी सार्थक होगा जब तुम अपने जीवन से संतुष्ट होंगे. दिल से, दिमाग या बहरी कमाई से नहीं. इन कंधो पर इतना बोझ अभी से मैट लो की जरुरत पड़ने पर ये झुक जाए.", सर थपकने के बाद वो उसके कंधे और गर्दन पर ख़ास तरह से दबाव देती हुई मालिश करने लगी.
"आप इतना गहराई से कैसे जानती है सबकुछ? मतलब हर टॉपिक पर आप पकड़ रखती है लेकिन सबसे ज्यादा आप इंसान को समझती है माँ. लेकिन फिर भी इतनी शांत और बस मेरी परछाई सी रहती है.", अर्जुन ने लेते हुए हे माँ के गाल पर हौले से हाथ फिराया तोह वो भी झुक कर उसके माथे पर प्यार देने के बाद मुस्कुराने लगी.
"तेरी परछाई नहीं हु मैं बीटा, तू मेरी तपस्या का वो वरदान है जिसका आवरण बन कर मुझे हे रहना होगा. चल अब तू आराम कर मैं हाथ धो कर आती हु.", अर्जुन के सर पर लगाया तेल उस सफ़ेद अंगोछे से ाचे से साफ़ करने के बाद उन्होंने कंधे और चेहरे को भी प्यार से साफ़ किया जिस से कही भी तेल का निशाँ न रहे और कमरे से निकल कर बाथरूम चली गयी.
अर्जुन बस यही सोच रहा था के माँ इतनी असीमित ज्ञान रखती है और उतनी हे शांत रहती है. ये कैसा संतुलन बना लिया है उन्होंने जिसमे कोई तर्क या विवाद की झलक देखने को नहीं मिलती. माँ उसको भी इतना जानती है जितना वो खुद नहीं जान पाया. तभी तोह वो उसका आवरण है. इधर सोच से बहार आया तोह अब दिमाग बिलकुल हे शांत हो गया था अगला दृश्य देख कर. माँ ने वही काली निघ्त्य पहन ली थी जो उसने उन्हें उपहार स्वरुप दी थी.
"शांत होने के बाद हे तुम सो पाओगे.", बड़ी लाइट को बंद करते हुए उन्होंने वो जीरो की रौशनी जला दी थी लेकिन उनके सामने शायद पहले वाली लाइट भी बेमतलब हे थी. इस नैसर्गिक सौन्दर्य की तुलना करना बेमतलब हे था.