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मुकाम - Haansil/Pryaas (5)
साल 1973 दुस्सहर्रा का समय
ये युवक युवती काम क्रीड़ा करके इस निर्जन खेत से निकल कर बहार आये थे अभी. युवक खुश था वही लड़की संतुष्ट होने के बावजूद नाराज दिख रही थी. Salwar-kameej झाड़ती हुई वह मुँह फिराए थी अपने आशिक़ से.
"लता, मैंने कहा है न के पापा को मैं मन लूंगा हमारी शादी के लिए. तुम बिना वजह गुस्सा हो रही हो और मैं इतनी दूर सिर्फ तुम्हे खुश करने आता हु लेकिन हर बार वही नाराजगी.", ये युवक अपनी मेहबूबा का हाथ पकड़ते हुए मानाने लगा. गाँव से बहार इन खेतो में शाम का धुन्दल्का बढ़ने हे लगा था लेकिन किसी और की मौजूदगी का निशाँ भी न दिखा.
"शंकर, तुम्हे चुदाई करनी होती है तोह मेरी याद आती है. डॉक्टर की डिग्री पूरी होने तक तुम ब्याह नहीं करोगे और तब तक मेरे बापू मुझे घर न बैठने वाले. तुम्हारे तोह दोनों हाथो में लड्डू है. इतने जी भर के मेरा जिस्म लूटना और फिर नयी नवेली बीवी का.", लड़की तुनक कर बोली और जुबान सिर्फ कड़वाहट से लबरेज.
"तुम जानती हो लता के मैंने सिर्फ तुमसे प्यार किया है. बात अगर जिस्मानी रिश्ते की हे है तोह क्या लड़कियां मेरे कॉलेज या कसबे में नहीं है? शादी तुमसे हे करूँगा और अगर तुम्हे मेरी पढाई इतनी हे आखर रही है तोह मैं अपनी माँ से कह कर तुम्हारे यहाँ रिश्ता भिजवा देता हु. सगाई होने पर तोह रुक जाओगी न?"
"इतना आसान है क्या ये सब? मेरे बापू बिरादरी को मानते है और पांच भी है तोह ज्यादा परेशानी होगी. लेकिन ये सब तुम्हे हे देखना होगा और मुझे अपनी बीवी बना कर यहाँ से लेके जाओगे. अगर ऐसा नहीं हुआ तोह मैं तुम्हे बर्बाद कर दूंगी."
"गुस्सा क्यों करती हो चाँद. तुम हमारे हे घर की बहु बनोगी और फिर कर लेना मुझे बर्बाद, जैसे थोड़ी देर पहले किया था. कल हे भेजता हु मैं माँ और पापा को.", शंकर ने वह नरम उभर कस के मसल दिया था गाल को चूमने के साथ हे.
"आठ.. मेरा तोह खुद का दिल करता है रे शंकर की तुम बस ऐसे हे मुझको सुख देते रहो. लेकिन जवान लड़की हु और ऊंच नीच हो गयी तोह लड़की पहले मारी दी जाती है फिर सवाल किया जाता है. कल जरूर भेज देना अपने maa-baap को और कह देना के बापू बिरादरी से बहार शादी तभी करवाएंगे अगर ये उनकी शर्तो पर होती है तोह.", लता ने भी बात पूरी करते हुए शंकर को चूमा और यहाँ से निकलने को कहा. अब थोड़ी चिंता इस तगड़े नौजवान के मुखड़े पर थी. आगे एक तरफ खड़े स्कूटर तक जाते हुए शंकर ने पीछे मदद कर लता को देखा जो hari-sabjiyon को चुन्नी में लपेट कर गाँठ लगा रही थी. कुछ हे पालो में धुल उडाता वह स्कूटर कच्चे रस्ते से गाँव से विपरीत दिशा में निकल चला.
"तू बहोत बड़ी छिनाल है मुन्नी. पहली छोरी होगी इन दस गाँव में जो खुद यार से छोड़ने विरानो में घूमती रहती है.", ये 2 लड़के गोबर के बिटोड़ो के पीछे से लता के सामने आ खड़े हुए लेकिन लड़की के चेहरे पर कोई डर न था. एक युवक कोई 25-26 साल का सवा 6 फ़ीट लगभग और दूसरा अपने भाई से आधा फ़ीट छोटा Lata/Shankar की हे उम्र का, जो अधिक गुस्से में था.
"तेरी क्यों सुलग रही है फ़तेह? शंकर मर्द है और तबियत से ठंडा करता है. तेरे भाई का तोह मुझे पेशाब करते देख कच्चा सफ़ेद हो गया था. चलो बाजु हटो दोनों, बेगैरत साले.", लता के एक हाथ में तेज डरती और दूसरे में सब्जी की पोटली, जिसको कंधे पर लटकाये पकडे थी.
"देख मुन्नी, शंकर तुझे छोड़ता है लेकिन फिर भी तू मुझे पसंद है. साफ़ बात कहता हु के मेरे से ब्याह कर ले, हवेली की रानी बना कर रखूँगा.", ये बात छोटे वाले युवक ने उसका डरती वाला हाथ पकड़ कर कही और लता के सामने फ़तेह आ खड़ा हुआ.
"मेरे भाई का दिल देख ले मुन्नी कितना बड़ा है. चाहता तोह यही पटक कर छोड़ देता, तू कुछ कर भी नहीं सकती ये तुझे पता है. लेकिन ये ब्याह के लिए कह रहा है, मर्जी से या फिर बिना मर्जी ब्याह तोह हो के रहेगा तेरा सुरेंदर से.", अब सचमुच लड़की के दिल में डर पनप गया था लेकिन चेहरा शांत रखे वह फिर से बोली.
"मर्द हो तोह मर्द की तरह फैंसला करो न. कहो इस सुरेंदर से की शंकर को हरा दे, मैं कर लुंगी ब्याह इसके साथ. ये हरा तोह जिस हाथ से मेरी कलाई पकड़ी है वह राखी बांधूंगी, कह देती हु."
"तू शंकर को हारने का कहती है, मैं तोह जान से मार दूंगा. देखती जा बस तू लेकिन उस से पहले हे तू बहु होगी हमारे घर की. सुशीला से अभी कहता हु के तेरी माँ को शगुन दे आये. और तू न खुद अपने घरवालों को मन नहीं कर पायेगी.", फ़तेह जैसे बहोत कुछ सोचे बैठा था और इस बीच सुरेंदर ने हँसते हुए लता का गाल चूम लिया.
"भैया जो कहते है वही होता है. रांड की तरह छोडूंगा तुझे, देखती जा मुन्नी. बहोत दिल जलाया है न तुमने.", सुरेंदर की हिमाकत का कोई जवाब न था अब लता के पास. लेकिन दोनों हे युवक दूर हट गए जब साइकिल पर गुनगुनाता हुआ ये सजीला hatta-katta नौजवान इस तरफ आते देखा. साइकिल के सामने लगी बड़ी सी टोकरी में कुत्ते का पिल्ला रखे वह मुस्कुराता हुआ वही खड़ा हो गया.
"कैसे हो फ़तेह भैया? और भाई सुंडी आज खेत में पत्ते खाने आया है क्या?", अपने नाम का उपहास होते देख सुरेंदर का चेहरा गुस्से से तमतमा गया था वही लता इस लड़के को देख रहत की सांस ले रही थी.
"मेरा नाम सुरेंदर सिंह है, मालूम नहीं के हवेली के उत्तराधिकारी से कोई बदतमीजी से बात नहीं कर सकता. यहाँ के 10 गाँव में हमारा राज है."
"क्या फ़तेह भैया, इसका फ्यूज उदा रहता है क्या हर बखत? तभी सुंडी (कीड़ा) कहते है इसको. गुस्से में खुद को हे खाता रहता है. अबे मेरे भाई तुम हवेली हवेली करते रहते हो न जो हर समय तोह बता देते है के अभी तुमसे भी बड़ी हवेली में मूट मार कर आ रहे है. बैठो लता भाभी, शंकर भाई बोल कर गए थे के सांझ हो रही है तोह आपको लेता औ.", इस युवक की बात से दोनों भाइयो की गांड हे सुलग गयी थी. बेशक फ़तेह उम्र में बड़ा था और शरीर में भी तगड़ा लेकिन फिर भी इस लड़के से नहीं उलझा. और साइकिल के पीछे बैठ कर लता सुरेंदर की तरफ ख़ास तरह मुस्कुराती हुई निकल गयी जिधर से ये लड़का आया था उधर हे.
"आप कुछ भी कर लो भैया, साला शंकर से पहले इसको मारना पड़ेगा. अकेले तोह आपसे भी नहीं होगा इसका कुछ ये पता है मुझे लेकिन जबतक ये ज़िंदा है तोह भूल हे जाओ के आप हुकूमत बरक़रार रख पाओगे. ऊपर से जब से बाप बने हो, आपकी ज्यादा फटी रहती है.", गुस्से में सुरेंदर अपने बड़े भाई से पहले गाँव की तरफ चल दिया.
"अरे रुक तोह सही सुंडी. माफ़ कर दे भाई लेकिन मैं तेरा ब्याह कल हे पक्का करवा दूंगा उस मुन्नी से और फिर देखना इस अज्जू की कैसे गांड मारते है हम. शेर है न वह, भवानी भाई के साथ मिल कर हम इसका ऐसा शिकार करेंगे छोटे की रघुबीर सिंह की हवेली सुनसान न हो गयी तोह मैं अपना लुंड अपने हाथ से काट लूंगा. वादा है तेरे से मेरा. मुन्नी से तेरी शादी करवाते हे मैं इस अज्जू को मिटा दूंगा.", सुरेंदर अपने बड़े भाई की बात सुन्न कर गले लग गया था.
"फिर मेडी और शंकर. हाहाहा.", अपने ख्याल बुनते हुए दोनों भाई अपनी हवेली जाने लगे. विचार तोह कही से नेक न थे इनके, शायद परवरिश हे ऐसी रही होगी.
जैसे हर सूर्यास्त के बाद सूर्योदय होता है वैसा हे इधर भी हुआ था. अपने घर शंकर ने आज पूरी बात बता दी थी अपनी माँ को, भाई नरिंदर की उपस्थिति में और रौबदार कौशल्या देवी ने भी अपने पति रामेश्वर जी को बुलवा लिया था. बचो की ख़ुशी और अपनी बीवी के प्यार की वजह से थानेदार रामेशर शर्मा सवेरे हे अपनी पहचान के इस गाँव निकल लिए थे शुदा पत्नी कौशल्या.
ये भी एक bhara-poora गाँव था जो आता तोह रामेश्वर जी के परम mitra-bhai सामान रघुबीर सिंह की जड़ में था लेकिन उतनी हे पकड़ एक और दोस्त सोमबीर सिंह की भी थी, जो उम्र में रघुबीर से बड़ा था. पांच ईश्वर सिंह के आँगन में रघुबीर सिंह और रामेशर जी के आने से पहले हे सोमबीर सिंह की कार और जीप कड़ी मिली. पांच के घर सरपंच का होना कोई बड़ी बात न थी.
"आइये रघुबीर जी, पंडित जी. आज तोह आपका भी आना बड़े मंगल समय पर हुआ है. नमस्कार थानेदारनी जी.", ईश्वर सिंह ने खुद हे इन सबका स्वागत किया था और कौशल्या देवी अपनी सखी पूर्णिमा के साथ घर के भीतर चली गयी थी, वही बाकी सभी बैठक में विराजमान हो गए. सोमबीर सिंह से खुद रामेशवर जी ने हाथ जोड़ कर मुलाकात की और बराबर बैठे Fateh-Surender के सर पर भी हाथ फेरा.
"देखो भाई रामेश्वर, तुम कुछ भी कहो उस से पहले जरा मैं भी अपनी बात रख देता हु. हमारा जो आपसी भाईचारा है वो मजबूत रहना चाहिए बेशक तुम्हारा और हमारा यहाँ आने का प्रयोजन एक हे क्यों न हो.", सोमबीर सिंह सफ़ेद पगड़ी में हमेशा एक महाराजा सा तेवर रखता था, सामने वाला चाहे जो भी हो. बस रघुबीर सिंह एक अपवाद था.
"जी सोमबीर भाई. आपकी बात से मैं भी पूर्ण सहमत हु लेकिन जब प्रयोजन एक हे है तोह फैंसला उसको करना चाहिए जिसकी ज़िन्दगी का फैंसला हम दोनों में से किसी भी एक के परिवार से जुड़नेवाला हो. और मैं ईश्वर सिंह जी से भी हाथ जोड़ कर शमा चाहता हु के ऐसे सीधा हे उनकी देहलीज पर चला आया.", रामेशवर शर्मा को हाथ जोड़ते देख ईश्वर सिंह ने खुद हे उनके हाथ थाम लिए.
"देखिये ऐसा पाप मैट चढ़ाये मेरे सर पर पंडित जी. आप मेरे घर पधारे है तोह इस से ज्यादा ख़ुशी की और क्या बात हो सकती है. वैसे अब आप दोनों हे मेरी बेटी का हाथ मांगने आये है तोह मैं किसी को नाराज कैसे कर सकता हु? बस किसी भी सूरत में इस नाचीज की पगड़ी मैट उछलने दीजियेगा.", ईश्वर सिंह एक समझदार इंसान था और पूरे गाँव को हे परिवार मान कर चलने वाला नेक व्यक्ति. बेशक उसकी धर्मपत्नी कुछ अलग विचारो वाली थी.
"जी मैं आपको वचन देता हु, यहाँ जो फैंसला होगा मैं पूरे दिल से उसका सम्मान करूँगा. आप बेटी के पिता है और जो फैंसला लेंगे सही लेंगे बस मधुलता से जरूर राये ले लीजियेगा.", रामेश्वर जी के कथन पर रघुबीर सिंह ने भी सहमति जाता दी.
"मैं भी इस बात से इत्तेफाक रखता हु ईश्वर सिंह जी. सोमबीर भाई साहब हो सके तोह Fateh-Surender को बहार भेज दीजिये.", रघुबीर सिंह का ऐसा कहना उन तीनो का न पसंद आया लेकिन सोमबीर सिंह ने अपने दोनों बेटो को इशारे से जाने को कहा.
"सभी बातें तुम तीनो हे करोगे तोह हमको तोह यहाँ होना हे नहीं चाहिए. ईश्वर सिंह जैसा रामेश्वर ने कहा के फैंसला तुम्हे और तुम्हारी बेटी को लेना चाहिए, मुझे ये बात सही लगी लेकिन कुछ jaat-biradari, पंचायत और समाज भी मायने रखता है. खुद पांच हो तुम, इस बारे में भी विचार करना थोड़ा.", सोमबीर सिंह के स्वर में जो चेतावनी थी वह ये तीन लोग भली भाँती समझते थे.
"मेरे लिए मेरा समाज ये गाँव है सोमबीर सिंह जी लेकिन फैंसला करना है तोह फिर हम 4 लोगो के बीच चारो महिलाये भी होंगी और जिसका विवाह होने जा रहा है वो मेरी बेटी भी.", ईश्वर सिंह की इस प्रतिक्रिया को देख सभी सहमत थे. थोड़े हे समय में इस बैठक में चारो परिवार के दंपत्ति बैठे थे लेकिन सोमबीर सिंह के साथ चंद्रो देवी की जगह ये जवान महिला थी कोई 30-32 साल की. सभी जानते थे की ये खूबसूरत औरत शीला देवी है, सोमबीर सिंह की युवा दूसरी पत्नी.
"तुम जानती हो बेटी के हम सब यहाँ क्यों जमा है?", रामेश्वर जी ने हे घूंघट लिए बैठी मधुलता से सवाल की शुरुवात की थी.
"जी काका. मेरे ब्याह की बात करने के लिए."
"सभी तुम्हारा फैंसला jaan-na चाहते है, शुदा शरत मुन्नी.", सोमबीर सिंह की आवाज पर कुछ पल ख़ामोशी छायी रही. कौशल्या जी को ये 'शरत' लफ्ज़ बड़ा खटका और वह व्यक्तित्व अनुसार बोल हे उठी.
"भाई साहब, शर्तो पर कौनसे रिश्ते बनते है? और जरा बताओ बेटी तुम्हारी शर्ते जो तुमने मेरे बेटे से प्यार करते समय उसको नहीं बताई. अगर ये निस्चल प्रेम है तोह मैं यहाँ बैठे हरेक इंसान के खिलाफ जा सकती हु और अगर इसमें मिलावट है तोह ये सभी एक तरफ और मैं यहाँ उपस्थित भी नहीं.", शीला देवी को अलग हे मिर्च लग गयी थी लेकिन सोमबीर सिंह ने हाथ थाम कर चुप रहने को कहा.
"प्यार है तभी तोह शंकर से कहा के वह आप लोगो को मेरे यहाँ भेजे, काकी. लेकिन मैं भी एक भविष्य चाहती हु जैसा आपका है. मेरी शरत कोई बड़ी नहीं है और मेरा फैंसला शंकर के साथ ज़िन्दगी भर रहने का है.", मधुलता के कथन को सुन्न कर शीला फिर से सोमबीर सिंह को देखने लगी जो अपनी मुछो को ताव दे रहा था. बहार से वो दोनों भाई झरोखे से कान लगाए सब सुन्न रहे थे.
"मेरे घर में आने के बाद यही तोह होगा आगे चल कर. जैसे आज मैं बचो की माँ हु, घर चलती हु वैसे हे कल तुम भी यही करोगी. तुम्हे ऐसा संदेह क्यों हुआ भला? प्रेम करना बुरा तोह नहीं है और बेशक बात jaat-biradari की हो लेकिन मेरे घर में इंसान को इंसान हे मन जाता है, किसी के साथ पराये सा व्यवहार या रसूख नहीं दिखाया जाता.", कौशल्या देवी अभी भी मंतव्य jaan-na चाहती थी इस लड़की का जो सिर्फ जुबान से हे तेज न थी.
"हाँ बेटी खुल कर कहो जो कहना है. हमे इतना तोह समझ में आ गया के तुम्हारी नजर में हम दूसरे स्थान पर है लेकिन श्रीमती कौशल्या देवी जी का अपना मंतव्य स्पष्ट कर दो.", सोमबीर सिंह के बोलने पर अब रामेश्वर जी ने गहरी सांस ली जैसे उन्हें भान हो गया के यहाँ मिलावट जरूर है.
"आपके बाद परिवार की मुखिया मैं बनूँगी. और जो भी है वह शंकर और उसके बाद मेरे बचो के नाम होगा.", अब तोह ईश्वर सिंह के भी पाँव टेल जमीन खिसक गयी थी, बाकी सब तोह हैरान हे थे बेशक सोमबीर सिंह अदाकारी कर रहा था लेकिन साथ उसने भी सबका दिया चौंकने में. पहली बार पूर्णिमा जी ने कुछ कहा.
"हमारी हवेली, खेती की ज़मीन और लकड़ी का कारखाना बहोत रहेंगे तुम्हारे लिए या फिर शहर वाला प्लाट इसमें जोड़ दू? अगर तुम्हे परिवार के बड़ो पर हे भरोसा नहीं है जो अपनी हे बिरादरी के बहार सिर्फ बचो की खुशियों के लिए इधर चले आये तोह तुम्हारा मैं इतने से भी नहीं भरेगा. उठो भाई साहब यहाँ से.", पूर्णिमा जी ने रामेश्वर जी को कहा तोह उन्होंने अपनी भाभी के सामने हाथ जोड़ कर वापिस बैठने की गुहार की.
"आप ये सब क्यों देने लगी, मैं कोई अज्जू से ब्याह तोह नहीं करने लगी.? बात मेरी और शंकर की है तोह उनके पिता जी अपना फैंसला देंगे. मैं शादी के लिए तैयार हु बस मेरी एक यही शरत है.", मधुलता की बात पर भारी मैं से पंडित जी ने अपने गले वो तुलसी की माला उतार कर मधुलता के सामने रख दी.
"बेटी ये मेरी माँ की निशानी है, वचन देता हु के हमारे घर के बहार जो भी मेरे नाम है वो सब मैं तेरे बचो के नाम कर दूंगा. घर में मेरे 3 बेटे है और एक छोटी बेटी. उनको सभी को तेरे बचो से 10 काम हे दूंगा लेकिन घर की एक भी ईंट किसी के नाम नहीं होगी.", जीवनभर थानेदार रामेश्वर शर्मा ने वह तुलसी की माला कभी अलग न की थी खुद से. कभी maans-madira के हाथ न लगाया था क्योंकि उनकी माँ ने रुखसत होने से पहले अपने गले से यही उतार कर उन्हें पहनाई थी.
"आप गलत कर रहे है जी. भूलिए मत यहाँ सिर्फ आपके हे 4 बचे नहीं है. एक बहु पहले हे है मेरी, जो बड़ी है लेकिन उसका ओहदा कम् कर रहे है आप.", कौशल्या जी ने इतना कहा हे था के मधुलता ने वह माला उठा कर एक तरफ रख दी.
"ऐसे वचन नहीं चाहिए काका जिनका कोई मोल न हो. आप सबकुछ शंकर के नाम करिये, इधर मेरे पिता जी तारिख निकलवाते है ब्याह की.", मधुलता ने जो कहा वह असहनीय था इन सब के लिए.
"माफ़ कीजियेगा, भाई साहब. हमको अपने बेटे का प्यार चाहिए था लेकिन इस शरत पर नहीं के परिवार बिखर जाए. भगवन सबको खुश रखे बस, कोई गलत बात कही हो तोह शमा कीजियेगा.", Cigaar-daani के बराबर राखी अपने पति की माला को रुमाल में रखते हुए कौशल्या जी ने उठते हुए कहा तोह अब कही मधुलता की माँ के बोल निकले.
"पंडिताइन जी, चोखी बात है आपकी. अब बहार आपका बीटा जो हमारी इज्जत उछलेगा उसका क्या?"
"शंकर तोह है भी उद्दण्ड, बड़ो को कुछ नहीं समझता फेर ये तोह एक लड़की की िज्जात्त उछलने जैसा आसान काम है.", शीला ने अपनी टांग भी फंसा हे दी थी.
"मैं इस कमरे से बहार सिर्फ यही कहूंगा के ये रिश्ता इस लिए नहीं हो सकता क्योंकि पांच ईश्वर सिंह जी की बिरादरी ने उन्हें बेदखल करने की धमकी दी है अगर ऐसा होता है तोह. दूसरी बात मैं आपसे कहता हु शीला देवी, लड़की की िज्जात्त उछलने से ज्यादा गलत बात तोह इस शब्द को एक महिला हो कर कहना है. मेरा बीटा कटाई ऐसा काम नहीं करेगा जिस से आप लोगो पर कोई आंच आये, ये जिम्मेवार मेरी है. उसको मैं ये एक पारिवारिक फैंसले के रूप में कहूंगा.", रामेश्वर शर्मा इधर बहार निकल हे रहे थे की आँगन में उमेद अज्जू इन्दर और शंकर आ खड़े हुए थे, जीप उमेद के हाथ.
एक पल के लिए तोह माहौल शांत सा हो गया था. और सोमबीर सिंह ने जैसे मोहर लगवा हे ली थी ईश्वर सिंह की बीवी से अपने बेटे के साथ मधुलता के ब्याह की. सभी इस बड़े आँगन में आये तोह राममेहर सिंह के 2 लड़के भी सुरेंदर और फ़तेह के साथ मौजूद थे यहाँ.
"दीपावली के बाद सुरेंदर का विवाह किसी भी शुभ दिन हम मधुलता के साथ करवा देंगे. आप सभी को मैं अभी से आमंत्रित करता हु.", सोमबीर सिंह की ये गर्जना आघात कर गयी थी इन चारो के दिल में जो अभी अभी इधर आये थे. मधुलता ऊपरी मंजिल में जाली से देख रही थी बस.
"पापा, आपने मेरे लिए ये एक काम न किया? मैं आपकी प्रतिष्ठा के लिए सब सही तरीके से करना चाहता था नहीं तोह भगा कर भी ले जा सकता था मैं लता को. और अब भी आपके चेहरे पर कोई दुःख नहीं है?"
"बीटा ईश्वर जी एक लड़की के बाप है, बिरादरी समाज से इन्हे बहार करके हम चैन से रह सकेंगे? इनका भी तोह हक़ है अपनी बेटी पर और जहा ये उसका ाचा भविष्य देखेंगे वही तोह भेजेंगे. तुम मेरे ाचे बेटे हो शंकर, लड़की भागने जैसा कलंक तुम कभी मेरे सर नहीं लगने दे सकते. चलो अब हमको चलना चाहिए.", रामेश्वर जी अपने बेटे को लिए इस जीप में सवार हुए और दूसरी कार में कौशल्या देवी, पूर्णिमा और रघुबीर सिंह. बस मुस्कुराता हुआ अज्जू यहाँ जीप से उतर कर खड़ा रह गया.
"तोह ताऊ जी आपने तिकड़म लगा हे डाला न? पता था मुझे के आपके लोंडो के बस का नहीं है ये सब, 4-4 निकम्मे आज तक अपने बाप पर निर्भर. मेरी हार्दिक मुबारकबाद सुंडी भाई को, खेत से कटी फसल उसके पास चली आयी. Ram-Ram लाजो काकी, वैसे लाज तोह ना आयी होगी आपको भी. पता भी है के लड़की शंकर भाई से आठवीं से प्रेम करती आ रही है लेकिन पांच ईश्वर सिंह जी को बिरादरी का बहाना करके शिकार बना दिया.", अज्जू के मुस्कुराते चेहरे के साथ साथ ऐसे तीखे शब्द सभी के दिल में बाण से चुभ रहे थे, सिवाए ईश्वर सिंह के जो सर झुकाये खड़ा था.
"घनी जुबान चलती है लड़के तेरी लेकिन आइंदा नहीं चल ...आह्हः.", ये पहलवान सा व्यक्ति था भवानी गुज्जर, कड़ियल और आपराधिक व्यक्ति जो राममेहर का बीटा था. लेकिन इस सवा 6 फ़ीट के दानव को बड़े आराम से अज्जू ने गर्दन से पकड़ कर आँगन में चित्त पटक दिया था. बाकी किसी की हिम्मत न हुई थी के आगे बढे.
"देखो भैया ऐसा है के हम हे बड़े है और हम हे छोटे है. रही तुम्हारे इन bhai-kaka या जो भी हो यहाँ की बात तोह सबको पता है के अज्जू बोलता है तोह खरा बोलता है नहीं तोह hare-gopala hare-murari. अभी छोड़ रहा हु लेकिन आगे से कोई ऐसी चेष्टा की तोह वही हाल करूँगा जो किसी का भी नहीं किया आज तक.", भवानी हैरान था के कोई इतना तेज और ताक़तवर कैसे हो सकता है. वो भी साधारण सेहत वाला. बेशक 6 फ़ीट का अज्जू बाकी सबकी तरह पहलवान न था लेकिन शरीर गहरा कटाव लिए और मांसपेशियों से भरपूर था.
"हम तुम्हारे ताऊ लगते है बीटा. थोड़ा तमीज और िज्जात्त का ख्याल किया करो. हम भी तोह पसंद करते है तुम्हे क्योंकि तुम ाचे लड़के हो.", सोमबीर सिंह ने एक नजर जमीन पर पड़े भवानी को देखने के बाद अज्जू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.
"ताऊ जी, िज्जात्त तोह मैं भी आपकी करता था लेकिन आप न हमेशा बचो के बीच शामिल हो जाते हो. बताओ भला के लता भाभी इस सुंडी से शादी क्यों करेगी?"
"ये तोह तुम्हे लता से पूछना चाहिए और अब तुम हो एक व्यस्क तोह शादी तक तुम उस से मिल नहीं सकते. विवाह के बाद बता देगी तुम्हे की उसने ऐसा क्यों किया.", सोमबीर सिंह ने बाल सहलाते हुए अज्जू को समझाया तोह वह हामी भरता हुआ ईश्वर जी के आँगन से हे साइकिल उठा के अपने घर की और निकल लिया. इधर सोमबीर सिंह भी कल वापिस आने का बोल कर यहाँ से निकला तोह शीला देवी के साथ फ़तेह था और एक गाडी में भवानी सिंह, सुरेंदर और सोमबीर सिंह थे.
"पिता जी, आप न कुछ करो या न करो बस इस अज्जू का कुछ कर दो. शंकर तोह आधा आज हे मर्डर गया.", सुरेंदर ने बात कही जो गुस्से में था.
"अरे मेरे सुंडी बीटा, धीरज से काम ले. वो लोग अपने हे तोह हैं, अज्जू ाचा लड़का है बीटा. उसके साथ गलत करके बहुत कुछ खराब हो जायेगा. तुम उस से दूर रहो वो तुमसे दूर रहेगा. शंकर भी गलत नहीं है लेकिन जो चीज सोमबीर सिंह के बेटे को पसंद हो वह फिर किसी और की नहीं हो सकती. और भवानी याद रखना उस लड़के को, तुम जैसे तोह क्या फ़तेह सिंह जैसे भी 10 मिलकर अर्जुन सिंह सुपुत्र रघुबीर सिंह का बाल बांका नहीं कर सकते. वो श्रेष्ठ है और हमको पसंद भी है.", सोमबीर सिंह अपने इस लाडले को समझा रहा था और बीच में भवानी के साथ बैठा मोहर बोल पड़ा.
"भवानी भाई केहवे थे के शंकर की बहिन भी बहोत सुन्दर है."
"हरामखोर, ये गलती मैट कर देना तुम लोग. ज़िंदा दफ़न कर दूंगा तुम सबको अगर कुछ भी ऐसा वैसा सोच तोह मधु बिटिया के बारे में. कान खोल कर सुन लो और जो यहाँ नहीं है उनको भी कह देना के सोमबीर सिंह ने कहा है कोई भी मतलब कोई भी रामेश्वर शर्मा और रघुबीर सिंह के परिवार के किसी भी शक्श के साथ ऐसी वैसी हरकत नहीं करेगा. माँ छोड़ के रख दूंगा मैं तुम सबकी.", सोमबीर सिंह का तमतमाया चेहरा देख कर सबकी गांड फट गयी थी. इतना गुस्सा तोह वह कभी किसी पर न हुआ था.
चलो आज उसने जैसे तैसे अपने एक बेटे का घर तोह बसवा हे दिया था बेशक तिकड़म चलाये थे लेकिन तिकड़म भी वही चलते है जहा सामने वाले की मंजूरी हो. ऐसे रही अक्सर सफर में लावारिस भी रह जाते है जो प्यार के साथ शर्ते जोड़ देते है.
वही साइकिल के पैदल मारता हुआ अज्जू दुखी भी था अपने भाई शंकर के लिए और दुःख को काम करने के लिए हमेशा की तरह गीत गुनगुना रहा था.
'तेरी मंजिल न है ये बाँवरे, बस रुकाव है एक कतार का.
कर खुद को साबित जरा, बना दे नया संसार एक प्यार का.
प्रीत कर राधा सी, प्रेम कर मीरा सा
प्रीत कर राधा सी, प्रेम कर मीरा सा
प्यारे पत्त्झड़ से न टूटना, आएगा मौसम नया बहार का.
तेरी मंजिल न है ये बाँवरे, बस रुकाव है के कतार का
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साल 1998 (वर्तमान)
अर्जुन हिमानी को लिए घर से निकला तोह ये देख कर ाचा लगा था के वह खुश थी. लेकिन वही चस्मा आँखों पर था जो अर्जुन को पसंद न था.
"थैंक यू अर्जुन.", हिमानी ने जैसे ये लफ्ज़ कहे थे सुन्न कर अर्जुन को ाचा लगा. आज वह कल की तरह नाराज भी न थी और हाथ अर्जुन की कमर में डाले हिमानी मुस्कुरा भी रही थी.
"आप बस व्यस्त रहा करा, लेकिन अकेले नहीं. बहार निकला करोगी तोह मेरी जरुरत नहीं पड़ेगी आपको."
"तुम्हारी जरुरत हे रहने वाली है अब. कोमल को कह दिया है मैंने. जब भी मुझे तुम्हारे यहाँ आना होगा, तुम लेने आओगे मेरे फ़ोन करने पर.", अर्जुन बस खुश था के हिमानी बोलने लगी है.
"ठीक है, लेकिन कभी कभी मेरे न होने पर आप भी चली जाया करना या ऋतू दीदी लेने आ जाया करेगी. मैं चाहता हु के कॉलेज के पहले दिन आप खुद जाए, पूरे आत्मविश्वास से."
"फ़िलहाल तोह मैं पीछा छोड़ने नहीं वाली हु, जो भी करो या कहो. आओ तुम्हे मां जी से मिलवाती हु.", हिमानी ने गेट खोल कर अंदर आमंत्रित किया तोह अर्जुन ने ना में गर्दन हिला दी.
"फिर कभी मिलूंगा uncle-aunty से. अभी तोह स्टेडियम जाना जरुरी है.", अर्जुन ने असमर्थता से कहा तोह हिमानी ने हाथ हिला कर bye कहा और नजाकत से अंदर चली गयी. अर्जुन भी इतने दिन के बाद आज स्टेडियम जा रहा था, बेशक संधू जी को बताया जा चूका था के अर्जुन व्यस्त है लेकिन प्रशिक्षण प्रभावित जरूर हुआ था. इतने दिनों बाद स्टेडियम के द्वार से अंदर आया तोह अजीब सी ख़ुशी मिल रही थी इन सब चेहरों और जगह को देख कर.
"कैसे हो मिस्टर? आजकल तोह चौदवी का चाँद हो गए हो?", ये चांदनी थी जो डिम्पी की तरफ से चलती हुई स्टैंड तक आ गयी थी. डिम्पी टेनिस में व्यस्त थी और न उसका ध्यान था इधर. चांदनी की नजरे बहोत कुछ कहती थी और ये भाषा भी अर्जुन के लिए नयी न थी.
"मैं तोह ाचा हु चांदनी लेकिन लगता है आपका ख्याल नेक नहीं है. अब तोह सुमन ने भी बॉयफ्रेंड बना लिया है, परमानेंट. क्यों समय खराब कर रही हो किसी बेवकूफ के पीछे.?", अर्जुन ने कंधे पर बैग टांगते हुए जवाब दिया.
"ये बेवकूफ समझ नहीं रहा मेरी तड़प को. साफ़ कहती हु के बस एक बार मेरी ये जिज्ञासा शांत कर दो फिर कभी नहीं टोकने वाली तुम्हे.", खुलकर कहना हे बेहतर लगा था चांदनी को.
"जिस रस्ते की कोई मंजिल न हो उसका क्या फायदा चांदनी? समझदार हो और अब तोह टीम की कप्तान भी. खेल और करियर पर ध्यान दो, चाहने वाले तोह तुम्हारे भी बहोत है.", अर्जुन चलने हे लगा था के उसने हाथ पकड़ लिया.
"देखो, बेशरम भी बन्न गयी हु तुम्हारे लिए. अब इतना भी न गिराओ के मेरा वजूद हे न रहे. सच कह रही हु अर्जुन, तुम जो कहोगे वो करुँगी लेकिन एक बार मेरी चाहत पूरी कर दो."
"मंजू से जवाब ले लेना चांदनी, वह कहेगी तोह मैं आग में भी कूद जाऊंगा. अब हाथ छोडो मेरा.", अर्जुन ने नरमी से कहा और हाथ छुड़वाते हुए अपने रस्ते बढ़ गया. चांदनी के पास सुमन आ कड़ी हुई.
"देख चांदनी, वो लड़का ाचा है और मंजू अपनी हे सहेली है. क्या मिलेगा तुझे ऐसा करके?"
"सुमन बात सिर्फ सेक्स की नहीं है. मैं मंजू से हर चीज में बेहतर रही लेकिन सबकुछ उसको मिला. तुझे क्या लगता है के मंजू ने गेम छोड़ कर मुझे कप्तान ऐसे हे बना दिया? तमाचा मार के गयी है वह मेरे मुँह पर. एक बार ये लड़का मेरी तरफ चला आया न फिर देख मैं मंजू को कैसा दर्द देती हु."
"थू है तेरी जैसी सहेली पर चांदनी. गलती से मंजू अपने पुराने रूप में आ गयी तोह तेरा हॉस्टल, कॉलेज और स्टेडियम ख़तम हो जायेगा. दोस्त को दुश्मन समझने वाली तेरे जैसी कमीनी लड़की के आसपास भी नहीं दिखना चाहती मैं..", सुमन की बात सुन्न कर चांदनी ने गुस्सा और अकड़ दिखते हुए अलग हे जवाब दिया.
"तू मैट इत्र रंडी. जिसके साथ तू गुलछर्रे उड़ा रही है न, उसको तेरा पास्ट बताया तोह वो भी नफरत करने लगेगा तुझसे. पहले भी तोह यार था तेरा, जिस से छुड़वा कर अपना खर्च चलती थी. और कप्तान हु मैं, कोच की ख़ास भी. नेशनल तोह क्या खेलेगी, एक्स्ट्रा में भी न बैठने दूंगी तुझे.", चांदनी जो भी कह रही थी वह जैसे सुमन को मजाक सा लग रहा था.
"कर ले जो तू करना चाहती है. बलबीर प्यार करता है मुझसे और उसको पता है मेरे अतीत के बारे में. रही बात इस बास्केटबॉल की तोह अगले साल शादी है मेरी बलबीर के साथ, वो मेरे लिए मायने रखता है. जा छुड़वा ले कोच से भी और फिर देखती हु तुझे मंजूबाला नैन से कौन बचता है. तेरा कोच या तेरा घमंड.", सुमन ने भी करारा तमाचा लगा दिया था इस मूरख युवती के दिल पर, शब्दों और सचाई से. पाँव पटकती हुई चांदनी बड़बड़ाती हुई टेनिस कोर्ट से आगे जाने लगी तोह पानी की घूँट भर्ती डिम्पी ने तोह आग में घी का काम कर दिया.
"दीदी ओह चांदनी दीदी, सुना है स्टेडियम फेडरेशन कोई जांच बैठा रहा है बास्केटबॉल कोच और कुछ संदिग्ध लोगो पर. ये दीप्ति अभी वही से आयी है.", चांदनी के पाँव जड़ हो गए थे और डिम्पी के साथ कड़ी लड़की भी सहमति में सर हिला रही थी.
"क्या बक रही हो? हमारी टीम तोह नार्थ विनर है. कोच सर की तोह प्रमोशन होने वाली थी. ये कैसी जांच की बात कर रही हो तुम और कैसे पता इसके बारे में.?"
"दीदी, अभी हमारे टूर्नामेंट के बारे में पता करने गयी थी मैं तोह वह S.A.I. से भी कुछ लोग थे और स्टेडियम मैनेजमेंट भी. प्रदीप सर (टेनिस कोच) एक लड़की को चुप करवा रहे थे और वह उन्हें बता रही थी की कैसे टीम में जगह के लिए सीनियर लड़की ने उसको आपके कोच के साथ गलत काम करने को कहा. फ़िलहाल तोह वह और कुछ नहीं पता चला लेकिन प्रदीप सर कह रहे थे के वो उस लड़की को इन्साफ दिलवाएंगे और पुलिस जल्द हे आने वाली है.", दीप्ति नामक ये लड़की जितना जानती थी उसने उतना बता दिया. लेकिन चांदनी एक शब्द भी बोले बिना तेज कदमो से बास्केटबॉल कोर्ट की जगह दूसरी तरफ चल दी.
"नाम हे बता देती उसको यार, शायद ज्यादा जल्दी भाग जाती.", डिम्पी ने हँसते हुए कहा और दीप्ति थोड़ा शर्मा गयी.
"क्या यार डिम्पी, वैसे ये लड़की हो कर भी इतनी गलत कैसे हो सकती है?"
"कई बार हम सही मौको पर गलत फैंसले ले लेते है डार्लिंग. इसकी भूख ने इसको अँधा बना दिया लेकिन अब भुगतने दे, हम मैच लगते है.", यहाँ ये दोनों वापिस खेलने में लग गयी और इधर आज बलबीर के साथ कसरत करने के साथ साथ अर्जुन ने ढेरो बातें भी की. उसको ये जान कर भी ख़ुशी हुई थी की बलबीर को क्लर्क की नौकरी भी मिल गयी है. दोनों ने पसीना सुकाने के बाद अभ्यास वाली जगह का रुख किया तोह अर्जुन के कदम ठिठक गए.
"अबे तुझे क्या हुआ? कोच सर को ढून्ढ रहा है क्या?", बलबीर ने अर्जुन की चिंतित देख पुछा. लेकिन यहाँ चारुल को देख वह थोड़ा हैरत में था, परेशां नहीं.
"कहा है सर?"
"पता नहीं अभी थोड़ी देर पहले हे प्रबंधक साहब का प् उन्हें बुला कर लेके गया था. कोई meeting-weeting होगी भाई. वैसे 5 दिन से ये मैडम भी इधर आ रही है, तेरे दोस्त है न चारुल मैडम?", बलबीर इतना कहता हुआ किट की तरफ लिए चल दिया अर्जुन को.
"हम्म. लेकिन फीमेल बॉक्सिंग का प्रैक्टिस एरिया तोह दूसरी तरफ है न भैया. यहाँ क्यों है ये?", अर्जुन ने दोनों पंजो पर गरमपट्टी बांधते हुए पुछा. चारुल ने भी अर्जुन को देख लिया था और सोच रही थी की वो बात करने आएगा. लेकिन यहाँ तोह अर्जुन ने आज बलबीर से पहले किट पर शुरुवात कर दी थी. हलके मुक्को से वह सधी हुई लाये में अभ्यास करते हुए बलबीर की बातें भी सुन्न रहा था.
"वो सीखने नहीं आयी है भाई. 40 दिन के लिए अस्सिटेंट है वह, ट्रेनिंग देने से पहले ये जरुरी प्रक्रिया है. इसके बाद वह जूनियर कोच का इम्तिहान देंगी, यही स्टेडियम या फिर यूनिवर्सिटी में सीखने के लिए.", बलबीर ने ग्लूकोस की बोतल मुँह पर लगाई और फिर एक घूँट लेने के बाद 2-3 बार उठक बैठक की.
"ये बॉक्सिंग की कोच कैसे बन्न सकती है? जहा तक मुझे पता है वह पहले ञंञैस्ट थी और बाद में जुडो की प्लेयर.", अर्जुन अलग हुआ तोह बलबीर ने किट को थाम लिया. संतुलित करने के बाद वह भी आराम आराम से बस कंधे का अभ्यास कर रहा था हर मुक्के के साथ.
"गेम तोह और भी बहोत खेले है मैडम ने लेकिन जुडो में black-belt है वह. एथलेटिक्स की एक और बात है भाई, के कोचिंग के लिए जरुरी नहीं के वही खेल आपने खेला हो. आपको समझ है तोह प्रशिक्षण लो, तैयारी करो और इम्तिहान दो. बाकी आपकी समझ और कुशलता पर निर्भर है. दिखय बर्ड का तोह मैंने कोई क्रिकेट मैच नहीं देखा लेकिन वह अंपायर है.", बलबीर ने सही समझाया लेकिन गलत उदाहरण के साथ.
"हाँ लेकिन होल्डिंग बॉलर थे जो बाद में बोलिंग कोच भी बने. आपने एक्साम्प्ले रेफरी का दिया है भैया. वैसे वो टीम गेम्स है तोह वह शायद जरुरी हो जैसा मैं समझता हु लेकिन इधर आप सही है इंडिविजुअल में. संधू जी खुद बॉक्सर रहे है और अब सीनियर कोच है, करवा सकते है नाम की सिफारिश.", आखिरी बात अर्जुन ने थोड़ा तेज कही जो चारुल के कान तक सही से पहुंची. वो इतनी देर से इनकी हे बातें सुन्न रही थी. फिर भी वह खामोश रही और ये दोनों प्रैक्टिस करने लगे रहे. थोड़ी देर बाद संधू जी भी आ गए थे और ये दोनों अभ्यास ख़तम करके शरीर को सूखा रहे थे.
"बलबीर, तुम जरा हॉस्टल वार्डन के साथ चले जाओ. वो इन्तजार कर रही है तुम्हारा. और अर्जुन बीटा, मुझे अभी थोड़ा समय लगेगा यहाँ, अगर ज्यादा परेशानी न हो तोह चारुल को अपने साथ ले जाना.", संधू जी ने विनम्रता से कहा था जैसे वह थोड़ा परेशां हो.
"मैं ऑटो से चली जाउंगी पापा.", चारुल ने तुरंत जवाब दिया.
"ठीक है अगर तुम्हे ऑटो से जाना है तोह अर्जुन तुम्हे बत्तियों के परे तक छोड़ देगा. यहाँ से तोह ऑटो भी नहीं मिलेगा. वैसे भी इसको काम है shaadi-byaah के तोह घर छोड़ने के बाद कही तुम्हारी माँ इसका समय न खराब कर दे. मैं चलता हु बाकी सब लोग अभ्यास के बाद सभी सामान ठीक से रख के चले जाना.", संधू जी ने ज्यादा कुछ न कहा. काली चुस्त टीशर्ट और सलेटी सूती ट्रैक पजामा पहने चारुल के गोर गाल थोड़ी म्हणत की वजह से गुलाबी हो चुके थे. सुन्दर तोह वह पारुल से भी कही ज्यादा थी लेकिन हमेशा पहरावा खिलाड़ियों वाला रहता था.
"जी 2 मिनट रुकिए, मैं कपडे बदल कर यही आता हु. तब तक आप भी चेंज कर लीजिये चाहे.", अर्जुन ने आगे का जवाब न सुना और फुर्ती से निकल गया. चारुल धर्मसंकट में थी अब. जाना चाहती भी थी लेकिन अर्जुन द्वारा अनदेखी किये जाने से आहात भी थी. ये भी पता चला था के वह इतने दिन से क्यों नहीं आ रहा और अब अपने हे कथन पर गुस्सा थी के क्यों ऑटो का कहा. फिर कुछ सोच कर वो भी अलग दिशा में चली गयी, कपडे बदलने. अर्जुन 5 मिनट बाद उसकी प्रतीक्षा करता हे मिला. चारुल ने कपडे बदले जरूर थे लेकिन वह वैसे हे थे. बस अब काली की जगह सलेटी चुस्त टीशर्ट और ये कला ट्रैक पजामा जो कूल्हों पर से अब कुछ ज्यादा चिपका था.
"चलो और मेरी वजह से इन्तजार करना पड़ा उसके लिए सॉरी.", चारुल ने अपेक्षा से विपरीत बात कही थी और अर्जुन मुस्कुरा रहा था.
"दोस्तों में तोह सॉरी जैसा कुछ नहीं होना चाहिए."
"मैं दोस्त नहीं मानती तुम्हे. साफ़ कहती हु और याद रखना.", दोनों चलते हुए स्टैंड तक आ गए थे जहा आज स्टेडियम की शुरुवात चांदनी के साथ अलग बहस से हुई थी वही कुछ ऐसा हे जाते वक़्त होने वाला था.
"फिर क्या मानती हो आप? यहाँ भी मैडम हे कहु क्या?", अर्जुन ने अपना बैग चारुल को पकड़ते हुए कहा जो बेहिचक उसने थाम लिया.
"प्यार.", अर्जुन को एक पल अपने कानो पर विश्वास न हुआ के अभी चारुल ने क्या कहा है. लेकिन वो गहरी भूरी आँखे अपने जवाब पर अडिग थी जैसे. बिना प्रसाधन के भी चारुल उल्लेखनीय रूप से सुन्दर थी.
"पता है आप क्या कह रही है और हम लोग इस वक़्त कहा खड़े है?", अर्जुन ने वापिस आगे बढ़ते हुए मोटरसाइकिल में चाबी लगाई और बहार निकलने लगा.
"जहा मर्जी हो, ये बदलने तोह नहीं वाला जगह के हिसाब से. हाँ मानती हु के मैं तुम्हे किसी और के साथ नहीं देख सकती थी इसलिए कभी बोल न सकीय."
"फिर आज कोई ख़ास वजह इस पुरूस्कार से नवाजने की?", अर्जुन के बैठने के बाद चारुल भी दोनों तरफ पाँव करते हुए बैठ गयी. बीच में एक बैग था और दूसरा कंधे पर.
"सोचा कब तक अकेले परेशां होती राहु, तुम्हे भी थोड़ा करना हे चाहिए. इसलिए 5 दिन से स्टेडियम भी आ रही हु. 3 से 6 बजे तक."
"मैं कैसे परेशां होऊंगा जी? और इसका मतलब ये हुआ के आप मेरे लिए यहाँ आ रही है. फिर तोह ये सरासर गलत है."
"तुम ख़ास वजह हो लेकिन दूसरा पहलु भी जरुरी है. और गर्लफ्रेंड के नखरे कभी कभी परेशां तोह करते हे है. क्यों ऐसा नहीं होता क्या?", स्टेडियम से बहार निकलते हे चारुल ने अपना एक हाथ अर्जुन की कमर में रख लिया. अर्जुन समझ नहीं प् रहा था के वह क्या जवाब दे इस सब का.
"मेरी 2 गर्लफ्रेंड है पहले से हे, तीसरी इंग्लैंड जा चुकी है. एक और भी है जो फ़िलहाल यहाँ नहीं तोह टोटल हुई 4. अब पांचवी बन्न ने से तोह बहोत ज्यादा बुरा नहीं लगेगा आपको मिस चारुल संधू.?"
"हजारवीं में भी प्रॉब्लम नहीं है श्रीमान अर्जुन जी. आप बस हाँ तोह कहो के मैं आपके लायक हु, सच कह रही हु कभी कोई डिमांड नहीं होगी सिवाय साथ वक़्त बिताने और वो साड़ी बातें सुनाने के जो मैं अकेले करते आयी हु अबतक. इस से पहले के ये पूछो की मैंने एकदम से ये सब क्यों कहा तोह इसका जवाब है अन्नू."
"अन्नू का इस सब से क्या लेना देना? और तुम्हारी बात कब हुई उस से?"
"जब तुमने उस से बात की थी जस्ट उसके बाद. तुम बड़े सरल हो अर्जुन और मैं खुद तुम्हे उलझन की तरह समझ रही थी. नाउ ी रिग्रेट की तुम सामने थे और मैं हर वो बात ढून्ढ रही थी जिसका मुझसे कोई लेना देना न था. और जब बात समझ में आयी तोह आज सारा दिन मैं सिर्फ तुम्हे याद करती रही. देखो तुम आये भी आज लेकिन जैसे मेरी अनदेखी कर रहे थे तोह मुझे वही फीलिंग आ रही थी जो सचमुच एक लवर को होती है, मेरी गलती मान ली मैंने.", चारुल ने कुछ भी दिल में न रखते हुए साफ़ साफ़ हकीकत बयान कर दी. अर्जुन अभी भी असमंजस में था.
"उस दिन थप्पड़ क्यों मारा था?"
"क्यूंकि मुझे लगा तुम ..", एक पल के लिए चारुल चुप हे हो गयी.
"क्या लगा तुम्हे चारुल?", अर्जुन ने अब नाम से बुलाया तोह चारुल ने चेहरा एक तरफ करते हुए उसके कान के समीप होते हुए कहा.
"मेरे िन्नेर्स के कलर की बात कर रहे हो. सॉरी फॉर तहत तू. लेकिन तब भी सिर्फ तुम हे मेरे ख्याल में थे और सिम्मी ने मूड ख़राब किया हुआ था सच बोल बोल कर. मैं इस बात का बुरा नहीं मानती अगर वो सब तुम कहते या हम अकेले होते. थोड़ा इस बाद से भी गुस्सा थी के अन्नू वही थी जिस से तुम प्यार करते हो."
"और अब?"
"कहा न जब तुम और मैं हो बस तब. किसी के सामने मैं खुद हे पीछे हट जाउंगी."
"मतलब अब मैं िन्नेर्स की बात कर सकता हु?", अर्जुन ने चंचलता से कह तोह दिया लेकिन अंजाम देख कर खुद हे हालत पतली हो गयी.
"देख भी सकते हो, बस मेरे कमरे में या जहा हम दोनों हो. तभी तोह कह रही थी की मेरा दिल भरा बैठा है अर्जुन तुमसे ढेरो बातें करने के लिए. किस्मत कही और ले जाए तोह ये मलाल न हो के मैं एक बंद डायरी सी ज़िंदा थी जिसको वो इंसान खोल कर पढ़ भी न सका जिसका जीकर हर लाइन में था.", चारुल ने पीछे से हे उसको आगोश में ले लिया था.
"सड़क पर लोग है चारुल."
"सॉरी. और अगर तुम्हे तुम्हारी व्यस्त ज़िन्दगी से कभी भी फुर्सत मिले तोह मिलने जरूर आना अर्जुन."
"मैं यही हु चारुल और जब तुम्हारा दिल करे बात करने का तोह कह देना. मैं आ जाऊंगा और पढ़ लूंगा क्या क्या लिखा है."
"कल?"
"कल.", अर्जुन ने भी वही शब्द बिना प्रश्न के दोहरा दिया.
"कहा? मेरे घर तोह कोई न कोई होगा हे. वैसे भी 2 दिन स्कूल और है अभी."
"स्कूल के बाद या स्टेडियम के बाद जब तुम्हे ठीक लगे. बात करने के लिए तोह पूरा शहर हे है, फिर एक घर पर निर्भर क्यों रहना.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल चारुल के घर से थोड़ा पहले हे रोक दी थी.
"ठीक है, स्टेडियम के बाद. जहा तुम्हारा दिल करे. पार्क या मार्किट या चलती मोटरसाइकिल इस भीड़ से परे. गुड bye एंड टेक केयर.", हाथ हिला कर जाने से पहले चारुल ने बैग अर्जुन को वापिस किया और एक मुस्कान के साथ विदा किया. अर्जुन पहले दिन से हे जानता था के चारुल उसको ख़ास तरह से देखती है, स्कूल के बास्केटबॉल वाले प्रकरण से कुछ समय पहले जब अन्नू ने उसको कक्षा से बहार किया था तभी से. वो चारुल हे तोह थी जिसने अन्नू को बोलै था अर्जुन को वापिस क्लास में लेने के लिए. लेकिन उसके बाद सिलसिला एकतरफा मोहब्बत का बनती चारुल ने अनजाने हे खुद को क्षति पहुंचे थी.
'पागल सा एक शक्श, दुनिया समझने निकला लेकिन वापिस घर पागल हे आया.', इन विचारो से निकलता जब अपने घर दाखिल हुआ तोह बस इतना हे खुद से कहा. आँगन से बगीचे की तरफ जाते पंडित जी के साथ धर्मवीर सांगवान और छोल साहब थे. शंकर जी की कार फिर से नदारद थी और उमेद चाचा भी जा चुके थे.
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"तुम्हारी लाड़ली मेरी नाक कटवाने पर तुली हुई है सरोज. एक बाप ने आज वो देख लिया जो कभी कोई भला इंसान सपने में सोचने तक की गलती नहीं करता.", भन्नाये से दलीप सिंह की आवाज चाह कर भी तेज न हो सकीय थी. दीवान पर बैठते हुए चेहरे पर dard-gussa और बेबसी के mile-jule भाव लिए वह हाथ पांच रहे थे.
"लाड़ली तोह वैसे वह ब्याह से पहले तक आपकी हे थी. मुझे तोह आपने बस उसकी पालनहार समझ के रखा हुआ था. जरा सुनु तोह आपकी लम्बी नाक पर मेरी लाड़ली कैसे पहुंच गयी.?", सरोज मौसी के स्वर में सिर्फ बेबाकी थी.
"कुछ कह भी नहीं सकता और कर भी नहीं सकता, इतना बेबस मैं कभी न था सरोज. मंजू वह खेत में शंकर के बेटे के साथ उस हालत में थी जिसको देखना हर बाप के लिए शर्मनाक है. कैसे मुमकिन है ये सब? मेरे लिए तोह दोनों एक सामान हे हैं.", आज दोपहर में अपनी बेटी और na-maloom दामाद को देखने वाले वही तोह थे.
"गौमती तोह आपकी सगी चचेरी बहिन नहीं है? सुना है ब्याह के बाद तक वो अपने लाडले बड़े भाई की गॉड में खेलती रही है. वैसे मंजू की शादी जहा आपने करवाई थी वह तोह खुद आप लोगो ने उसका संसार उजाड़ डाला. अब जहा वो अपनी मर्जी से खुश है, उधर भी आपको दिक्कत है. हो क्या आप? बाप? कसाई? भेड़िये या फिर मुँह खराब करके नयी उपाधि दे दालु?", सरोज की आवाज नरम न थी इस वक़्त और दलीप सिंह के पाजामे के अंदर पिछवाड़े तक पसीना आ चूका था ऐसी खरी खरी सुन्न कर. सरोज तोह कभी उसके साथ तीखा व्यवहार न करती थी. कभी कोई सवाल नहीं के वह कहा जाता है क्या करता है लेकिन आज. वह भी इतनी बड़ी बातें कह डाली थी.
"गौमती के साथ जो भी मेरा सम्बन्ध था मैं उसमे तुम्हारा पापी हु सरोज लेकिन ये जो मंजू और अर्जुन के बीच हो रहा है वो तूफ़ान ला देगा कई घरो में. शंकर गौशाला पे हे था और अगर वो ये सब देख लेता या फिर राजेश? देखो मैं माफ़ी मांगता हु अपने किये की तुमसे. मुझसे बदले की भावना में गलत हो गया और मंजू मेरी जान है. उसकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी."
"वो पेट से आपकी करनी की वजह से. गिरवा दो बचा और फिर से बांध दो उसको किसी के पल्ले, बकरी है न वह तुम्हारे खानदान की. बदले की भावना वाले कसाई अपने खून से साणे कपड़ो के लिए किसी और को जिम्मेवार मैट ठहराओ. चुड़ैल भी बलि किसी और की देती है अपनी औलाद की नहीं. वो खेत मेरा है और आइंदा वह कदम मत रखना आप, कह देती हु. रही बात अर्जुन की तोह वह इस घर के अंदर मेरा दामाद है जिसने मेरी बेटी को एक सही जिंदगी दी. उसके और मंजू के बाप की तरह उजाड़ी नहीं.", सरोज बेफिक्र सी ठीक सामने बैठ गयी थी एक कुर्सी पर. दलीप सिंह शून्यभाव से बस सोच रहा था.
"पंडित जी से ये राज न बचेगा सरोज. मुझे चिंता अर्जुन की है और उसकी ज़िन्दगी किसी और लड़की के साथ पहले हे बाँधी जा चुकी है. मैं तुम्हारे सामने से कही न जाऊंगा और जहा भी गया तुम्हे लेके जाऊंगा लेकिन ये अनर्थ रोक दो."
"यही बात शंकर जी को यहाँ बुलवा कर कहिये, मैं भी विचार करुँगी. फ़िलहाल मेरे बचे खुश है अपनी दुनिया में. अर्जुन एक जिम्मेवार पति और दामाद है, मंजू का हर फैंसला वो करेगा और बात करनी होगी शंकर जी के साथ बैठ कर आपको. हाँ मंजू उसके साथ हे होगी उस समय भी. मिलाये तोह जरा शंकर जी को फ़ोन.", सरोज ने कहते के साथ हे स्टूल पर रखा फ़ोन आगे कर दिया था दलीप के. सोचने समझने की ताक़त जब न बची हो तोह आदमी हुकुम मान हे लेता है. दलीप को पता था शंकर अभी कहा होगा. डायरी से नंबर निकल कर बस हैंडल कान पे टिकाये वह प्रतीक्षा करता रहा.
"शंकर भाई दलीप बोल रहा हु."
"पता है भाई, आवाज जानता हु तुम्हारी. लेकिन घबराये हुए क्यों हो? मुसीबत में तोह नहीं, मैं आता हु तुम्हारे पास."
"सुनो भाई सुनो. एक बहोत बड़ी घटना हो गयी है शंकर. मंजू और अर्जुन...", अब वो अटक गया था इतना कहते कहते और दूसरी तरफ शंकर की बेचैनी बढ़ गयी थी इन 2 नामो को सुन्न कर.
"क्या हुआ उन दोनों को? कहा है वह दलीप? कुछ तोह बोल मेरे दोस्त, देख उन पर मुसीबत आयी तोह मैं bina-wajah मारा जाऊंगा."
"शंकर, यार उन दोनों का चक्कर है. मुझे माफ़ कर दे यार लेकिन मुझे आज हे पता लगा के मेरी बेटी अर्जुन के साथ शर्मनाक हालत में थी.", दलीप दर्द में इतना हे कह सका.
"Pati-patni के बीच क्यों आते हो मेरे भाई? हमारे पास किसी के भी सवाल के सही जवाब नहीं है. और जो सही है उनसे सवाल करके हम ज्यादा गिर जायेंगे. तेरी बेटी उसकी बीवी है बस यही एक गुप्त सच है. अपने तक हे रखना इस बात को, वैसे भी लफड़े 50 पहले से है कही ये अब तुम्हारे पीछे पड़ गया तोह तुम्हे तोह बचने वाला भी कोई नहीं. मेरे पास माँ तोह हैं.", शंकर से तोह ऐसे जवाब की उम्मीद तक न थी दलीप को.
"तुम्हे पता है क्या कह रहे हो?"
"हाँ पता है. हम दोनों सचमुच कसूरवार है मंजू के और अर्जुन उसका सबकुछ. और ये बात भी समझ लेना के अर्जुन की शादी परिवार के हिसाब से प्रीती से हे होगी, लेकिन वो लड़की भी शायद शामिल है Arjun-Manju के साथ. हम बहार है तोह हमारे लिए फ़िलहाल ठीक है. तू गौमती के पास जा थोड़ा ठंडा करेगी तोह चैन से समझ सकेगा.", ये नाम भी सरोज को सुनाई दे गया था बाकी बातों के साथ. हड़बड़ाहट में दलीप ने तुरंत फ़ोन रख दिया.
"मैं भगवन कसम खाता हु के गौमती के साथ अब मेरा कुछ नहीं है. आइंदा मैं उनके परिवार के भी किसी इंसान से नहीं मिलने वाला. मुझे कैसे भी माफ़ कर दो सरोज."
"आप बस अब वही करोगे जो इस घर के लिए ठीक होगा. काम राजेश के साथ जो की मंजू के हिस्से किया है अर्जुन ने और बाकी वक़्त यहाँ घर में. अपने भाई को बोल देना के उस खेत में न जाए और वह जब भी हम काम करेंगे, पता होना चाहिए. बगीचे वाली तरफ घेराव करवा दो और वह 2 एकड़ मंजू के नाम. बाकी सब तोह सही है. मैं नहीं रोकती गौमती के पास जाने से या बिंदिया के. चाय ला रही हु.", सरोज जाते हुए ये नया नाम भी बम की तरह फोड़ गयी थी अपने पति के सर पर.
'सही कहते थे पंडित जी, बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी. फटती भी ऐसी की अब दुबारा सील न पायेगी.', दलीप बेबस सा यही कह सका खुद को. दिल ग़मगीन था और बीवी अब भी साथ थी. आँखों में पानी आ हे गया था.
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"तू अब इधर आ कमरे में, भागता फिर रहा है न मैं सब समझती हु.", अर्जुन नाहा धो कर बाथरूम से निकला तोह कोमल दीदी ने बैठक का दरवाजा अंदर से बंद करते हुए उसको बिस्टेर पर बैठा लिया.
"क्यों भागूंगा मैं आपसे.? बस थोड़ा व्यस्त था और सब होते है यहाँ. कोई आ जायेगा दीदी."
"कोई नहीं आता तू निश्चिंत हो जा. और चल अब बता के मधु बुआ के साथ क्या हो रहा है?", सीधा सवाल तोह टेढ़ा जवाब देने की गलती अर्जुन यहाँ तोह नहीं कर सकता था. अगले 20 मिनट तक रट्टू तोते की तरह वह सब बोलता गया सिवाए अपने पिता के राज के. कैसे उसने बुआ के साथ सम्बन्ध बनाये, बुआ को उस से प्यार होना, बुआ की परेशां हालत और साथ हे दादा जी का बेटी के लिए व्यथित होना. आखिर में जब उनके ससुराल में शामिल होने का उल्लेख किया तोह कोमल ने अपने भाई को प्यार से गले लगा लिया.
"तोह इसलिए बुआ रो रही थी? देख समबन्ध के बारे में तोह मैं क्या हे कहु. दोनों व्यस्क हो और वह समझदार बड़ी महिला है. लेकिन तूने ये बहोत ाचा किया के उनकी ज़िन्दगी को सही मंज़िल तक पंहुचा दिया. जिस इंसान का दिल छलनी हुआ हो न अर्जुन, उसको प्यार की मरहम लगाना गुनाह नहीं है. वैसे 2-3 सवाल और है मेरे पास.", कोमल दीदी ने अर्जुन का हाथ पकड़ते हुए पूछ हे लिया.
"जी आप पूछिए."
"तेरे कुछ बातें समझ में नहीं आती मेरे भाई. कहा था के हर उस लड़की के साथ शामिल मैट होना जो कहे की उसको तुझसे प्यार है? ये गलतिया तुझे कही का कही ले जा सकती है."
"आप किसकी बात कर रही है?", अर्जुन ने दिमाग पर जोर डाले बिना कहा.
"ाचा ये छोड़ और जरा ये बता के हिमानी, ऋचा और विनीता दीदी के बारे में तुम क्या फील करते हो. मुझे पता है के तुम हमेशा सच बोलते हो.", कोमल दीदी ने जैसे ये बात कही थी अर्जुन बिस्टेर पर थोड़ा सही से हो कर बैठ गया.
"बता रहा हु दीदी लेकिन इसके बाद एक सवाल मेरा भी होगा. सबसे आखिर में."
"ठीक है. आज तुम सवाल भी कर लेना."
"हिमानी दीदी एक जिम्मेवारी है मेरे लिए, जिन्हे बड़े विश्वास से आचार्य जी ने मेरे सुपुर्द किया है. वो उस सूक्ष्म पल में हे क़ैद है जहा अगर उन्हें निरंतर बाहरी दुनिया का एहसास न कराया जाये तोह वो वापिस बंद हो जाएँगी. मैं उन्हें अकेला ठीक नहीं कर सकता. हो सकता है इस सबके दौरान वह मुझमे दिलचस्पी ले और ऐसा स्वाभाविक है दीदी. लेकिन मेरा लक्ष्य है के बिखरे कांच को गोंड से जोड़ने की जगह पिघला का एक मजबूत मूरत दू, जिसमे कोई और अक्स न हो. हिमानी दीदी के बारे में मेरा यही विचार है.", अर्जुन ने हर शब्द को गहनता से कहा, सोच समझ कर.
"और ऋचा?"
"उनके बारे में हम व्यर्थ हे बात करेंगे दीदी. सवाल भी आपके पास, जवाब भी आपके पास. लेकिन अगर कुछ मेरे मुँह से हे jaan-na है तोह बता देता हु. वो हैं चंद्रो देवी की पौती और इनकी माता जी का नाम है मधुलता Singh/Lata शर्मा. दिमाग मजबूत, हर चीज को सिर्फ देखना समझना और चुप रहना. मतलब जीवन में 2 किरदार जीने वाली, शायद अतृप्त और एक आशावान लड़की. मुझको भाई की तरह देखती है, ऋतू दीदी को किसी प्रतिस्पर्धी की तरह और सामने दिखती चीज का पता पूछने वाली. मतलब बात करने के लिए उत्सुक एक अकेलेपन की शिकार, मासूम लड़की. आधा सच और na-maloom सच उनकी ज़िन्दगी को आसान नहीं करने वाला.", अर्जुन के इस जवाब पर कोमल की धड़कन तेज हो गयी थी. वो उसकी सोच से आगे जा चूका था और जैसे किसी सचाई के करीब जो कोमल के साथ साथ किसी को भी न पता थी.
"विनीता?", ये नाम लेते हुए होंठो कंपकंपा रहे थे.
"वो तोह आपके हे जैसी है न दीदी? उनके बारे में तोह हमको नहीं बात करनी चाहिए. आप चाहती है के ये मैं कहु या आप वैसे हे समझ जाये जैसे आप Tara-Priyanka दीदी के बारे में जानती है.", अर्जुन से आज शायद वो गलत हे उलझ गयी थी लेकिन कोमल दीदी जानती थी की अर्जुन हैं तोह उनसे छोटा हे.
"तुम आज सुबह कहा गए थे? आचार्यजी तोह बहार है और एक बात मैं कह देती हु की कामवाली बाई ने तुम्हे कुछ सन्देश दिया था. बिमला जीजी के नाम से.", यहाँ अब माहौल बदल कर कोमल दीदी के पक्ष में आ चूका था. घडी ने इतनी जल्दी पौने 8 बजा दिए थे लेकिन अर्जुन कुछ सोच कर अपनी बात कहने लगा.
"साधू सिंह अंकल की बीवी है बिमला देवी. उनकी बेटी है काजल जिसके साथ मैंने जंगल में 3-4 बार वो सब किया है. सच कहता हु के वह सिर्फ जिस्मानी जरुरत जैसा है जो खुद वह चाहती है. मैंने वह जाना छोड़ा तोह बिमला आंटी ने यहाँ सन्देश भिजवा दिया. मुझे नहीं पता था के आपने सुन्न लिया था वह. इसलिए सुबह मैं काजल के साथ फिर से वही दोहरा कर आया. एक और लड़की भी शामिल थी आज."
"कौन है वो लड़की?"
"स.. s..Savita नाम है उसका दीदी."
"वो तुझसे प्यार करती है?"
"हाँ. और पहले मैंने उसको हे देखा था काजल से. लेकिन हमने कुछ किया नहीं और अब उसकी शादी है 2 महीने बाद काजल के भाई के साथ."
"और इन 2 महीने में तू उसको भी औरत बना देगा? मैंने झूट तोह नहीं कहा न?"
"हाँ. वो यही चाहती है."
"तू क्या चाहता है अर्जुन ये जरुरी है. इधर देख कर बात कर निचे देखने से ये बात नहीं छुप जाएगी की तेरा सम्बन्ध शायद बिमला देवी से भी है.", कोमल दीदी ने आज पहली बार थोड़ा जोर से कहा था. अर्जुन के चेहरे पर अजीब से भाव आ गए थे.
"मैं क्या करू दीदी? सामने से अगर कोई खुद तैयार हो और फिर मेरा भी दिल हो उस लड़की के साथ तब मैं क्या करू?"
"मेरे और उस सविता में से किसी एक को चुनन ले भाई.", दीदी ने इतनी बड़ी बात कह दी थी की अर्जुन बिना कुछ कहे बस उनके गले लग गया था.
"एक बार ऐसे हे हादसे ने बहोत कुछ बदल दिया था अर्जुन. मैं नहीं चाहती की तू शिकार हो किसी क्षद्यंत्र का. तू शिकार नहीं करता क्योंकि तू प्यार करना जानता है. लेकिन खुद हे सोच तू उस लड़की के प्यार को महसूस करना चाहता है या जिस्म को? अगर वो तुझे के नजर में कभी ाची लगी होगी तभी तोह वह आजतक अक्षत है. आज वह उस देहलीज पर है जहा वह अपना सबकुछ तेरे हवाले करके तुझे अपना बनाना चाहती है. इसमें काजल या बिमला देवी जैसा वो kaam-vaasna या सुख का चाह नहीं रे पगले. खुद हे सोच के पहल सविता मिली लेकिन 3-4 बार तू काजल के साथ एकाकार हुआ. ये सब महीने 2 महीने के बीच तोह हुआ हे होगा. इतना सबर करने वाली को तू क्या जवाब देगा? या वो लड़की क्या लेके अपने पति के पास जाएगी जब आत्मा तेरे हवाले हो जाने वाली है. कई मंदिरो में दिए किसी और को भी जलने दे ारु, पंडित प्रेम का हर कोई. न कोई न होये. अब तेरा सवाल.", दीदी ने जो आइना दिखाया था वह बहोत था उसके लिए.
"मैं आपसे प्यार करता हु. और आइंदा ये मत कहना के किसी के लिए भी आप खुदको सामने रख देंगी. मेरा कोई सवाल नहीं है बस.", अर्जुन हलकी नाराजगी में था और चेहरा पर हल्का दर्द. कोमल दीदी ने भी उसके चेहरे को पकड़ते हुए होंठो से होंठ जोड़ दिए. जब अलग हुए तोह अर्जुन शरमाने लग रहा था.
"हाँ अब बोल. तू मेरी जान है ारु और मैं जानती हु के तू मेरे बिना नहीं रह सकता. तभी तुझे सुधरती हु थोड़ा थोड़ा. बाकि तू जो मर्जी करता रह."
"ी लव यू.", इस बार अर्जुन ने उन्हें चूमने के बाद बाहों में ले लिया था. कुछ देर तक वह उन्हें जकड़े रहा तोह कोमल दीदी को भी पता लग गया के वह सचमुच परेशां हो गया है.
"ाचा बाबा. आइंदा ऐसा नहीं कहूँगी. लेकिन अब तू न अपना सवाल कर.", कोमल दीदी ने अर्जुन को गले लगा लिया था.
"मुझसे शादी कर लो."
मुकाम - Haansil/Pryaas (5)
साल 1973 दुस्सहर्रा का समय
ये युवक युवती काम क्रीड़ा करके इस निर्जन खेत से निकल कर बहार आये थे अभी. युवक खुश था वही लड़की संतुष्ट होने के बावजूद नाराज दिख रही थी. Salwar-kameej झाड़ती हुई वह मुँह फिराए थी अपने आशिक़ से.
"लता, मैंने कहा है न के पापा को मैं मन लूंगा हमारी शादी के लिए. तुम बिना वजह गुस्सा हो रही हो और मैं इतनी दूर सिर्फ तुम्हे खुश करने आता हु लेकिन हर बार वही नाराजगी.", ये युवक अपनी मेहबूबा का हाथ पकड़ते हुए मानाने लगा. गाँव से बहार इन खेतो में शाम का धुन्दल्का बढ़ने हे लगा था लेकिन किसी और की मौजूदगी का निशाँ भी न दिखा.
"शंकर, तुम्हे चुदाई करनी होती है तोह मेरी याद आती है. डॉक्टर की डिग्री पूरी होने तक तुम ब्याह नहीं करोगे और तब तक मेरे बापू मुझे घर न बैठने वाले. तुम्हारे तोह दोनों हाथो में लड्डू है. इतने जी भर के मेरा जिस्म लूटना और फिर नयी नवेली बीवी का.", लड़की तुनक कर बोली और जुबान सिर्फ कड़वाहट से लबरेज.
"तुम जानती हो लता के मैंने सिर्फ तुमसे प्यार किया है. बात अगर जिस्मानी रिश्ते की हे है तोह क्या लड़कियां मेरे कॉलेज या कसबे में नहीं है? शादी तुमसे हे करूँगा और अगर तुम्हे मेरी पढाई इतनी हे आखर रही है तोह मैं अपनी माँ से कह कर तुम्हारे यहाँ रिश्ता भिजवा देता हु. सगाई होने पर तोह रुक जाओगी न?"
"इतना आसान है क्या ये सब? मेरे बापू बिरादरी को मानते है और पांच भी है तोह ज्यादा परेशानी होगी. लेकिन ये सब तुम्हे हे देखना होगा और मुझे अपनी बीवी बना कर यहाँ से लेके जाओगे. अगर ऐसा नहीं हुआ तोह मैं तुम्हे बर्बाद कर दूंगी."
"गुस्सा क्यों करती हो चाँद. तुम हमारे हे घर की बहु बनोगी और फिर कर लेना मुझे बर्बाद, जैसे थोड़ी देर पहले किया था. कल हे भेजता हु मैं माँ और पापा को.", शंकर ने वह नरम उभर कस के मसल दिया था गाल को चूमने के साथ हे.
"आठ.. मेरा तोह खुद का दिल करता है रे शंकर की तुम बस ऐसे हे मुझको सुख देते रहो. लेकिन जवान लड़की हु और ऊंच नीच हो गयी तोह लड़की पहले मारी दी जाती है फिर सवाल किया जाता है. कल जरूर भेज देना अपने maa-baap को और कह देना के बापू बिरादरी से बहार शादी तभी करवाएंगे अगर ये उनकी शर्तो पर होती है तोह.", लता ने भी बात पूरी करते हुए शंकर को चूमा और यहाँ से निकलने को कहा. अब थोड़ी चिंता इस तगड़े नौजवान के मुखड़े पर थी. आगे एक तरफ खड़े स्कूटर तक जाते हुए शंकर ने पीछे मदद कर लता को देखा जो hari-sabjiyon को चुन्नी में लपेट कर गाँठ लगा रही थी. कुछ हे पालो में धुल उडाता वह स्कूटर कच्चे रस्ते से गाँव से विपरीत दिशा में निकल चला.
"तू बहोत बड़ी छिनाल है मुन्नी. पहली छोरी होगी इन दस गाँव में जो खुद यार से छोड़ने विरानो में घूमती रहती है.", ये 2 लड़के गोबर के बिटोड़ो के पीछे से लता के सामने आ खड़े हुए लेकिन लड़की के चेहरे पर कोई डर न था. एक युवक कोई 25-26 साल का सवा 6 फ़ीट लगभग और दूसरा अपने भाई से आधा फ़ीट छोटा Lata/Shankar की हे उम्र का, जो अधिक गुस्से में था.
"तेरी क्यों सुलग रही है फ़तेह? शंकर मर्द है और तबियत से ठंडा करता है. तेरे भाई का तोह मुझे पेशाब करते देख कच्चा सफ़ेद हो गया था. चलो बाजु हटो दोनों, बेगैरत साले.", लता के एक हाथ में तेज डरती और दूसरे में सब्जी की पोटली, जिसको कंधे पर लटकाये पकडे थी.
"देख मुन्नी, शंकर तुझे छोड़ता है लेकिन फिर भी तू मुझे पसंद है. साफ़ बात कहता हु के मेरे से ब्याह कर ले, हवेली की रानी बना कर रखूँगा.", ये बात छोटे वाले युवक ने उसका डरती वाला हाथ पकड़ कर कही और लता के सामने फ़तेह आ खड़ा हुआ.
"मेरे भाई का दिल देख ले मुन्नी कितना बड़ा है. चाहता तोह यही पटक कर छोड़ देता, तू कुछ कर भी नहीं सकती ये तुझे पता है. लेकिन ये ब्याह के लिए कह रहा है, मर्जी से या फिर बिना मर्जी ब्याह तोह हो के रहेगा तेरा सुरेंदर से.", अब सचमुच लड़की के दिल में डर पनप गया था लेकिन चेहरा शांत रखे वह फिर से बोली.
"मर्द हो तोह मर्द की तरह फैंसला करो न. कहो इस सुरेंदर से की शंकर को हरा दे, मैं कर लुंगी ब्याह इसके साथ. ये हरा तोह जिस हाथ से मेरी कलाई पकड़ी है वह राखी बांधूंगी, कह देती हु."
"तू शंकर को हारने का कहती है, मैं तोह जान से मार दूंगा. देखती जा बस तू लेकिन उस से पहले हे तू बहु होगी हमारे घर की. सुशीला से अभी कहता हु के तेरी माँ को शगुन दे आये. और तू न खुद अपने घरवालों को मन नहीं कर पायेगी.", फ़तेह जैसे बहोत कुछ सोचे बैठा था और इस बीच सुरेंदर ने हँसते हुए लता का गाल चूम लिया.
"भैया जो कहते है वही होता है. रांड की तरह छोडूंगा तुझे, देखती जा मुन्नी. बहोत दिल जलाया है न तुमने.", सुरेंदर की हिमाकत का कोई जवाब न था अब लता के पास. लेकिन दोनों हे युवक दूर हट गए जब साइकिल पर गुनगुनाता हुआ ये सजीला hatta-katta नौजवान इस तरफ आते देखा. साइकिल के सामने लगी बड़ी सी टोकरी में कुत्ते का पिल्ला रखे वह मुस्कुराता हुआ वही खड़ा हो गया.
"कैसे हो फ़तेह भैया? और भाई सुंडी आज खेत में पत्ते खाने आया है क्या?", अपने नाम का उपहास होते देख सुरेंदर का चेहरा गुस्से से तमतमा गया था वही लता इस लड़के को देख रहत की सांस ले रही थी.
"मेरा नाम सुरेंदर सिंह है, मालूम नहीं के हवेली के उत्तराधिकारी से कोई बदतमीजी से बात नहीं कर सकता. यहाँ के 10 गाँव में हमारा राज है."
"क्या फ़तेह भैया, इसका फ्यूज उदा रहता है क्या हर बखत? तभी सुंडी (कीड़ा) कहते है इसको. गुस्से में खुद को हे खाता रहता है. अबे मेरे भाई तुम हवेली हवेली करते रहते हो न जो हर समय तोह बता देते है के अभी तुमसे भी बड़ी हवेली में मूट मार कर आ रहे है. बैठो लता भाभी, शंकर भाई बोल कर गए थे के सांझ हो रही है तोह आपको लेता औ.", इस युवक की बात से दोनों भाइयो की गांड हे सुलग गयी थी. बेशक फ़तेह उम्र में बड़ा था और शरीर में भी तगड़ा लेकिन फिर भी इस लड़के से नहीं उलझा. और साइकिल के पीछे बैठ कर लता सुरेंदर की तरफ ख़ास तरह मुस्कुराती हुई निकल गयी जिधर से ये लड़का आया था उधर हे.
"आप कुछ भी कर लो भैया, साला शंकर से पहले इसको मारना पड़ेगा. अकेले तोह आपसे भी नहीं होगा इसका कुछ ये पता है मुझे लेकिन जबतक ये ज़िंदा है तोह भूल हे जाओ के आप हुकूमत बरक़रार रख पाओगे. ऊपर से जब से बाप बने हो, आपकी ज्यादा फटी रहती है.", गुस्से में सुरेंदर अपने बड़े भाई से पहले गाँव की तरफ चल दिया.
"अरे रुक तोह सही सुंडी. माफ़ कर दे भाई लेकिन मैं तेरा ब्याह कल हे पक्का करवा दूंगा उस मुन्नी से और फिर देखना इस अज्जू की कैसे गांड मारते है हम. शेर है न वह, भवानी भाई के साथ मिल कर हम इसका ऐसा शिकार करेंगे छोटे की रघुबीर सिंह की हवेली सुनसान न हो गयी तोह मैं अपना लुंड अपने हाथ से काट लूंगा. वादा है तेरे से मेरा. मुन्नी से तेरी शादी करवाते हे मैं इस अज्जू को मिटा दूंगा.", सुरेंदर अपने बड़े भाई की बात सुन्न कर गले लग गया था.
"फिर मेडी और शंकर. हाहाहा.", अपने ख्याल बुनते हुए दोनों भाई अपनी हवेली जाने लगे. विचार तोह कही से नेक न थे इनके, शायद परवरिश हे ऐसी रही होगी.
जैसे हर सूर्यास्त के बाद सूर्योदय होता है वैसा हे इधर भी हुआ था. अपने घर शंकर ने आज पूरी बात बता दी थी अपनी माँ को, भाई नरिंदर की उपस्थिति में और रौबदार कौशल्या देवी ने भी अपने पति रामेश्वर जी को बुलवा लिया था. बचो की ख़ुशी और अपनी बीवी के प्यार की वजह से थानेदार रामेशर शर्मा सवेरे हे अपनी पहचान के इस गाँव निकल लिए थे शुदा पत्नी कौशल्या.
ये भी एक bhara-poora गाँव था जो आता तोह रामेश्वर जी के परम mitra-bhai सामान रघुबीर सिंह की जड़ में था लेकिन उतनी हे पकड़ एक और दोस्त सोमबीर सिंह की भी थी, जो उम्र में रघुबीर से बड़ा था. पांच ईश्वर सिंह के आँगन में रघुबीर सिंह और रामेशर जी के आने से पहले हे सोमबीर सिंह की कार और जीप कड़ी मिली. पांच के घर सरपंच का होना कोई बड़ी बात न थी.
"आइये रघुबीर जी, पंडित जी. आज तोह आपका भी आना बड़े मंगल समय पर हुआ है. नमस्कार थानेदारनी जी.", ईश्वर सिंह ने खुद हे इन सबका स्वागत किया था और कौशल्या देवी अपनी सखी पूर्णिमा के साथ घर के भीतर चली गयी थी, वही बाकी सभी बैठक में विराजमान हो गए. सोमबीर सिंह से खुद रामेशवर जी ने हाथ जोड़ कर मुलाकात की और बराबर बैठे Fateh-Surender के सर पर भी हाथ फेरा.
"देखो भाई रामेश्वर, तुम कुछ भी कहो उस से पहले जरा मैं भी अपनी बात रख देता हु. हमारा जो आपसी भाईचारा है वो मजबूत रहना चाहिए बेशक तुम्हारा और हमारा यहाँ आने का प्रयोजन एक हे क्यों न हो.", सोमबीर सिंह सफ़ेद पगड़ी में हमेशा एक महाराजा सा तेवर रखता था, सामने वाला चाहे जो भी हो. बस रघुबीर सिंह एक अपवाद था.
"जी सोमबीर भाई. आपकी बात से मैं भी पूर्ण सहमत हु लेकिन जब प्रयोजन एक हे है तोह फैंसला उसको करना चाहिए जिसकी ज़िन्दगी का फैंसला हम दोनों में से किसी भी एक के परिवार से जुड़नेवाला हो. और मैं ईश्वर सिंह जी से भी हाथ जोड़ कर शमा चाहता हु के ऐसे सीधा हे उनकी देहलीज पर चला आया.", रामेशवर शर्मा को हाथ जोड़ते देख ईश्वर सिंह ने खुद हे उनके हाथ थाम लिए.
"देखिये ऐसा पाप मैट चढ़ाये मेरे सर पर पंडित जी. आप मेरे घर पधारे है तोह इस से ज्यादा ख़ुशी की और क्या बात हो सकती है. वैसे अब आप दोनों हे मेरी बेटी का हाथ मांगने आये है तोह मैं किसी को नाराज कैसे कर सकता हु? बस किसी भी सूरत में इस नाचीज की पगड़ी मैट उछलने दीजियेगा.", ईश्वर सिंह एक समझदार इंसान था और पूरे गाँव को हे परिवार मान कर चलने वाला नेक व्यक्ति. बेशक उसकी धर्मपत्नी कुछ अलग विचारो वाली थी.
"जी मैं आपको वचन देता हु, यहाँ जो फैंसला होगा मैं पूरे दिल से उसका सम्मान करूँगा. आप बेटी के पिता है और जो फैंसला लेंगे सही लेंगे बस मधुलता से जरूर राये ले लीजियेगा.", रामेश्वर जी के कथन पर रघुबीर सिंह ने भी सहमति जाता दी.
"मैं भी इस बात से इत्तेफाक रखता हु ईश्वर सिंह जी. सोमबीर भाई साहब हो सके तोह Fateh-Surender को बहार भेज दीजिये.", रघुबीर सिंह का ऐसा कहना उन तीनो का न पसंद आया लेकिन सोमबीर सिंह ने अपने दोनों बेटो को इशारे से जाने को कहा.
"सभी बातें तुम तीनो हे करोगे तोह हमको तोह यहाँ होना हे नहीं चाहिए. ईश्वर सिंह जैसा रामेश्वर ने कहा के फैंसला तुम्हे और तुम्हारी बेटी को लेना चाहिए, मुझे ये बात सही लगी लेकिन कुछ jaat-biradari, पंचायत और समाज भी मायने रखता है. खुद पांच हो तुम, इस बारे में भी विचार करना थोड़ा.", सोमबीर सिंह के स्वर में जो चेतावनी थी वह ये तीन लोग भली भाँती समझते थे.
"मेरे लिए मेरा समाज ये गाँव है सोमबीर सिंह जी लेकिन फैंसला करना है तोह फिर हम 4 लोगो के बीच चारो महिलाये भी होंगी और जिसका विवाह होने जा रहा है वो मेरी बेटी भी.", ईश्वर सिंह की इस प्रतिक्रिया को देख सभी सहमत थे. थोड़े हे समय में इस बैठक में चारो परिवार के दंपत्ति बैठे थे लेकिन सोमबीर सिंह के साथ चंद्रो देवी की जगह ये जवान महिला थी कोई 30-32 साल की. सभी जानते थे की ये खूबसूरत औरत शीला देवी है, सोमबीर सिंह की युवा दूसरी पत्नी.
"तुम जानती हो बेटी के हम सब यहाँ क्यों जमा है?", रामेश्वर जी ने हे घूंघट लिए बैठी मधुलता से सवाल की शुरुवात की थी.
"जी काका. मेरे ब्याह की बात करने के लिए."
"सभी तुम्हारा फैंसला jaan-na चाहते है, शुदा शरत मुन्नी.", सोमबीर सिंह की आवाज पर कुछ पल ख़ामोशी छायी रही. कौशल्या जी को ये 'शरत' लफ्ज़ बड़ा खटका और वह व्यक्तित्व अनुसार बोल हे उठी.
"भाई साहब, शर्तो पर कौनसे रिश्ते बनते है? और जरा बताओ बेटी तुम्हारी शर्ते जो तुमने मेरे बेटे से प्यार करते समय उसको नहीं बताई. अगर ये निस्चल प्रेम है तोह मैं यहाँ बैठे हरेक इंसान के खिलाफ जा सकती हु और अगर इसमें मिलावट है तोह ये सभी एक तरफ और मैं यहाँ उपस्थित भी नहीं.", शीला देवी को अलग हे मिर्च लग गयी थी लेकिन सोमबीर सिंह ने हाथ थाम कर चुप रहने को कहा.
"प्यार है तभी तोह शंकर से कहा के वह आप लोगो को मेरे यहाँ भेजे, काकी. लेकिन मैं भी एक भविष्य चाहती हु जैसा आपका है. मेरी शरत कोई बड़ी नहीं है और मेरा फैंसला शंकर के साथ ज़िन्दगी भर रहने का है.", मधुलता के कथन को सुन्न कर शीला फिर से सोमबीर सिंह को देखने लगी जो अपनी मुछो को ताव दे रहा था. बहार से वो दोनों भाई झरोखे से कान लगाए सब सुन्न रहे थे.
"मेरे घर में आने के बाद यही तोह होगा आगे चल कर. जैसे आज मैं बचो की माँ हु, घर चलती हु वैसे हे कल तुम भी यही करोगी. तुम्हे ऐसा संदेह क्यों हुआ भला? प्रेम करना बुरा तोह नहीं है और बेशक बात jaat-biradari की हो लेकिन मेरे घर में इंसान को इंसान हे मन जाता है, किसी के साथ पराये सा व्यवहार या रसूख नहीं दिखाया जाता.", कौशल्या देवी अभी भी मंतव्य jaan-na चाहती थी इस लड़की का जो सिर्फ जुबान से हे तेज न थी.
"हाँ बेटी खुल कर कहो जो कहना है. हमे इतना तोह समझ में आ गया के तुम्हारी नजर में हम दूसरे स्थान पर है लेकिन श्रीमती कौशल्या देवी जी का अपना मंतव्य स्पष्ट कर दो.", सोमबीर सिंह के बोलने पर अब रामेश्वर जी ने गहरी सांस ली जैसे उन्हें भान हो गया के यहाँ मिलावट जरूर है.
"आपके बाद परिवार की मुखिया मैं बनूँगी. और जो भी है वह शंकर और उसके बाद मेरे बचो के नाम होगा.", अब तोह ईश्वर सिंह के भी पाँव टेल जमीन खिसक गयी थी, बाकी सब तोह हैरान हे थे बेशक सोमबीर सिंह अदाकारी कर रहा था लेकिन साथ उसने भी सबका दिया चौंकने में. पहली बार पूर्णिमा जी ने कुछ कहा.
"हमारी हवेली, खेती की ज़मीन और लकड़ी का कारखाना बहोत रहेंगे तुम्हारे लिए या फिर शहर वाला प्लाट इसमें जोड़ दू? अगर तुम्हे परिवार के बड़ो पर हे भरोसा नहीं है जो अपनी हे बिरादरी के बहार सिर्फ बचो की खुशियों के लिए इधर चले आये तोह तुम्हारा मैं इतने से भी नहीं भरेगा. उठो भाई साहब यहाँ से.", पूर्णिमा जी ने रामेश्वर जी को कहा तोह उन्होंने अपनी भाभी के सामने हाथ जोड़ कर वापिस बैठने की गुहार की.
"आप ये सब क्यों देने लगी, मैं कोई अज्जू से ब्याह तोह नहीं करने लगी.? बात मेरी और शंकर की है तोह उनके पिता जी अपना फैंसला देंगे. मैं शादी के लिए तैयार हु बस मेरी एक यही शरत है.", मधुलता की बात पर भारी मैं से पंडित जी ने अपने गले वो तुलसी की माला उतार कर मधुलता के सामने रख दी.
"बेटी ये मेरी माँ की निशानी है, वचन देता हु के हमारे घर के बहार जो भी मेरे नाम है वो सब मैं तेरे बचो के नाम कर दूंगा. घर में मेरे 3 बेटे है और एक छोटी बेटी. उनको सभी को तेरे बचो से 10 काम हे दूंगा लेकिन घर की एक भी ईंट किसी के नाम नहीं होगी.", जीवनभर थानेदार रामेश्वर शर्मा ने वह तुलसी की माला कभी अलग न की थी खुद से. कभी maans-madira के हाथ न लगाया था क्योंकि उनकी माँ ने रुखसत होने से पहले अपने गले से यही उतार कर उन्हें पहनाई थी.
"आप गलत कर रहे है जी. भूलिए मत यहाँ सिर्फ आपके हे 4 बचे नहीं है. एक बहु पहले हे है मेरी, जो बड़ी है लेकिन उसका ओहदा कम् कर रहे है आप.", कौशल्या जी ने इतना कहा हे था के मधुलता ने वह माला उठा कर एक तरफ रख दी.
"ऐसे वचन नहीं चाहिए काका जिनका कोई मोल न हो. आप सबकुछ शंकर के नाम करिये, इधर मेरे पिता जी तारिख निकलवाते है ब्याह की.", मधुलता ने जो कहा वह असहनीय था इन सब के लिए.
"माफ़ कीजियेगा, भाई साहब. हमको अपने बेटे का प्यार चाहिए था लेकिन इस शरत पर नहीं के परिवार बिखर जाए. भगवन सबको खुश रखे बस, कोई गलत बात कही हो तोह शमा कीजियेगा.", Cigaar-daani के बराबर राखी अपने पति की माला को रुमाल में रखते हुए कौशल्या जी ने उठते हुए कहा तोह अब कही मधुलता की माँ के बोल निकले.
"पंडिताइन जी, चोखी बात है आपकी. अब बहार आपका बीटा जो हमारी इज्जत उछलेगा उसका क्या?"
"शंकर तोह है भी उद्दण्ड, बड़ो को कुछ नहीं समझता फेर ये तोह एक लड़की की िज्जात्त उछलने जैसा आसान काम है.", शीला ने अपनी टांग भी फंसा हे दी थी.
"मैं इस कमरे से बहार सिर्फ यही कहूंगा के ये रिश्ता इस लिए नहीं हो सकता क्योंकि पांच ईश्वर सिंह जी की बिरादरी ने उन्हें बेदखल करने की धमकी दी है अगर ऐसा होता है तोह. दूसरी बात मैं आपसे कहता हु शीला देवी, लड़की की िज्जात्त उछलने से ज्यादा गलत बात तोह इस शब्द को एक महिला हो कर कहना है. मेरा बीटा कटाई ऐसा काम नहीं करेगा जिस से आप लोगो पर कोई आंच आये, ये जिम्मेवार मेरी है. उसको मैं ये एक पारिवारिक फैंसले के रूप में कहूंगा.", रामेश्वर शर्मा इधर बहार निकल हे रहे थे की आँगन में उमेद अज्जू इन्दर और शंकर आ खड़े हुए थे, जीप उमेद के हाथ.
एक पल के लिए तोह माहौल शांत सा हो गया था. और सोमबीर सिंह ने जैसे मोहर लगवा हे ली थी ईश्वर सिंह की बीवी से अपने बेटे के साथ मधुलता के ब्याह की. सभी इस बड़े आँगन में आये तोह राममेहर सिंह के 2 लड़के भी सुरेंदर और फ़तेह के साथ मौजूद थे यहाँ.
"दीपावली के बाद सुरेंदर का विवाह किसी भी शुभ दिन हम मधुलता के साथ करवा देंगे. आप सभी को मैं अभी से आमंत्रित करता हु.", सोमबीर सिंह की ये गर्जना आघात कर गयी थी इन चारो के दिल में जो अभी अभी इधर आये थे. मधुलता ऊपरी मंजिल में जाली से देख रही थी बस.
"पापा, आपने मेरे लिए ये एक काम न किया? मैं आपकी प्रतिष्ठा के लिए सब सही तरीके से करना चाहता था नहीं तोह भगा कर भी ले जा सकता था मैं लता को. और अब भी आपके चेहरे पर कोई दुःख नहीं है?"
"बीटा ईश्वर जी एक लड़की के बाप है, बिरादरी समाज से इन्हे बहार करके हम चैन से रह सकेंगे? इनका भी तोह हक़ है अपनी बेटी पर और जहा ये उसका ाचा भविष्य देखेंगे वही तोह भेजेंगे. तुम मेरे ाचे बेटे हो शंकर, लड़की भागने जैसा कलंक तुम कभी मेरे सर नहीं लगने दे सकते. चलो अब हमको चलना चाहिए.", रामेश्वर जी अपने बेटे को लिए इस जीप में सवार हुए और दूसरी कार में कौशल्या देवी, पूर्णिमा और रघुबीर सिंह. बस मुस्कुराता हुआ अज्जू यहाँ जीप से उतर कर खड़ा रह गया.
"तोह ताऊ जी आपने तिकड़म लगा हे डाला न? पता था मुझे के आपके लोंडो के बस का नहीं है ये सब, 4-4 निकम्मे आज तक अपने बाप पर निर्भर. मेरी हार्दिक मुबारकबाद सुंडी भाई को, खेत से कटी फसल उसके पास चली आयी. Ram-Ram लाजो काकी, वैसे लाज तोह ना आयी होगी आपको भी. पता भी है के लड़की शंकर भाई से आठवीं से प्रेम करती आ रही है लेकिन पांच ईश्वर सिंह जी को बिरादरी का बहाना करके शिकार बना दिया.", अज्जू के मुस्कुराते चेहरे के साथ साथ ऐसे तीखे शब्द सभी के दिल में बाण से चुभ रहे थे, सिवाए ईश्वर सिंह के जो सर झुकाये खड़ा था.
"घनी जुबान चलती है लड़के तेरी लेकिन आइंदा नहीं चल ...आह्हः.", ये पहलवान सा व्यक्ति था भवानी गुज्जर, कड़ियल और आपराधिक व्यक्ति जो राममेहर का बीटा था. लेकिन इस सवा 6 फ़ीट के दानव को बड़े आराम से अज्जू ने गर्दन से पकड़ कर आँगन में चित्त पटक दिया था. बाकी किसी की हिम्मत न हुई थी के आगे बढे.
"देखो भैया ऐसा है के हम हे बड़े है और हम हे छोटे है. रही तुम्हारे इन bhai-kaka या जो भी हो यहाँ की बात तोह सबको पता है के अज्जू बोलता है तोह खरा बोलता है नहीं तोह hare-gopala hare-murari. अभी छोड़ रहा हु लेकिन आगे से कोई ऐसी चेष्टा की तोह वही हाल करूँगा जो किसी का भी नहीं किया आज तक.", भवानी हैरान था के कोई इतना तेज और ताक़तवर कैसे हो सकता है. वो भी साधारण सेहत वाला. बेशक 6 फ़ीट का अज्जू बाकी सबकी तरह पहलवान न था लेकिन शरीर गहरा कटाव लिए और मांसपेशियों से भरपूर था.
"हम तुम्हारे ताऊ लगते है बीटा. थोड़ा तमीज और िज्जात्त का ख्याल किया करो. हम भी तोह पसंद करते है तुम्हे क्योंकि तुम ाचे लड़के हो.", सोमबीर सिंह ने एक नजर जमीन पर पड़े भवानी को देखने के बाद अज्जू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.
"ताऊ जी, िज्जात्त तोह मैं भी आपकी करता था लेकिन आप न हमेशा बचो के बीच शामिल हो जाते हो. बताओ भला के लता भाभी इस सुंडी से शादी क्यों करेगी?"
"ये तोह तुम्हे लता से पूछना चाहिए और अब तुम हो एक व्यस्क तोह शादी तक तुम उस से मिल नहीं सकते. विवाह के बाद बता देगी तुम्हे की उसने ऐसा क्यों किया.", सोमबीर सिंह ने बाल सहलाते हुए अज्जू को समझाया तोह वह हामी भरता हुआ ईश्वर जी के आँगन से हे साइकिल उठा के अपने घर की और निकल लिया. इधर सोमबीर सिंह भी कल वापिस आने का बोल कर यहाँ से निकला तोह शीला देवी के साथ फ़तेह था और एक गाडी में भवानी सिंह, सुरेंदर और सोमबीर सिंह थे.
"पिता जी, आप न कुछ करो या न करो बस इस अज्जू का कुछ कर दो. शंकर तोह आधा आज हे मर्डर गया.", सुरेंदर ने बात कही जो गुस्से में था.
"अरे मेरे सुंडी बीटा, धीरज से काम ले. वो लोग अपने हे तोह हैं, अज्जू ाचा लड़का है बीटा. उसके साथ गलत करके बहुत कुछ खराब हो जायेगा. तुम उस से दूर रहो वो तुमसे दूर रहेगा. शंकर भी गलत नहीं है लेकिन जो चीज सोमबीर सिंह के बेटे को पसंद हो वह फिर किसी और की नहीं हो सकती. और भवानी याद रखना उस लड़के को, तुम जैसे तोह क्या फ़तेह सिंह जैसे भी 10 मिलकर अर्जुन सिंह सुपुत्र रघुबीर सिंह का बाल बांका नहीं कर सकते. वो श्रेष्ठ है और हमको पसंद भी है.", सोमबीर सिंह अपने इस लाडले को समझा रहा था और बीच में भवानी के साथ बैठा मोहर बोल पड़ा.
"भवानी भाई केहवे थे के शंकर की बहिन भी बहोत सुन्दर है."
"हरामखोर, ये गलती मैट कर देना तुम लोग. ज़िंदा दफ़न कर दूंगा तुम सबको अगर कुछ भी ऐसा वैसा सोच तोह मधु बिटिया के बारे में. कान खोल कर सुन लो और जो यहाँ नहीं है उनको भी कह देना के सोमबीर सिंह ने कहा है कोई भी मतलब कोई भी रामेश्वर शर्मा और रघुबीर सिंह के परिवार के किसी भी शक्श के साथ ऐसी वैसी हरकत नहीं करेगा. माँ छोड़ के रख दूंगा मैं तुम सबकी.", सोमबीर सिंह का तमतमाया चेहरा देख कर सबकी गांड फट गयी थी. इतना गुस्सा तोह वह कभी किसी पर न हुआ था.
चलो आज उसने जैसे तैसे अपने एक बेटे का घर तोह बसवा हे दिया था बेशक तिकड़म चलाये थे लेकिन तिकड़म भी वही चलते है जहा सामने वाले की मंजूरी हो. ऐसे रही अक्सर सफर में लावारिस भी रह जाते है जो प्यार के साथ शर्ते जोड़ देते है.
वही साइकिल के पैदल मारता हुआ अज्जू दुखी भी था अपने भाई शंकर के लिए और दुःख को काम करने के लिए हमेशा की तरह गीत गुनगुना रहा था.
'तेरी मंजिल न है ये बाँवरे, बस रुकाव है एक कतार का.
कर खुद को साबित जरा, बना दे नया संसार एक प्यार का.
प्रीत कर राधा सी, प्रेम कर मीरा सा
प्रीत कर राधा सी, प्रेम कर मीरा सा
प्यारे पत्त्झड़ से न टूटना, आएगा मौसम नया बहार का.
तेरी मंजिल न है ये बाँवरे, बस रुकाव है के कतार का
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साल 1998 (वर्तमान)
अर्जुन हिमानी को लिए घर से निकला तोह ये देख कर ाचा लगा था के वह खुश थी. लेकिन वही चस्मा आँखों पर था जो अर्जुन को पसंद न था.
"थैंक यू अर्जुन.", हिमानी ने जैसे ये लफ्ज़ कहे थे सुन्न कर अर्जुन को ाचा लगा. आज वह कल की तरह नाराज भी न थी और हाथ अर्जुन की कमर में डाले हिमानी मुस्कुरा भी रही थी.
"आप बस व्यस्त रहा करा, लेकिन अकेले नहीं. बहार निकला करोगी तोह मेरी जरुरत नहीं पड़ेगी आपको."
"तुम्हारी जरुरत हे रहने वाली है अब. कोमल को कह दिया है मैंने. जब भी मुझे तुम्हारे यहाँ आना होगा, तुम लेने आओगे मेरे फ़ोन करने पर.", अर्जुन बस खुश था के हिमानी बोलने लगी है.
"ठीक है, लेकिन कभी कभी मेरे न होने पर आप भी चली जाया करना या ऋतू दीदी लेने आ जाया करेगी. मैं चाहता हु के कॉलेज के पहले दिन आप खुद जाए, पूरे आत्मविश्वास से."
"फ़िलहाल तोह मैं पीछा छोड़ने नहीं वाली हु, जो भी करो या कहो. आओ तुम्हे मां जी से मिलवाती हु.", हिमानी ने गेट खोल कर अंदर आमंत्रित किया तोह अर्जुन ने ना में गर्दन हिला दी.
"फिर कभी मिलूंगा uncle-aunty से. अभी तोह स्टेडियम जाना जरुरी है.", अर्जुन ने असमर्थता से कहा तोह हिमानी ने हाथ हिला कर bye कहा और नजाकत से अंदर चली गयी. अर्जुन भी इतने दिन के बाद आज स्टेडियम जा रहा था, बेशक संधू जी को बताया जा चूका था के अर्जुन व्यस्त है लेकिन प्रशिक्षण प्रभावित जरूर हुआ था. इतने दिनों बाद स्टेडियम के द्वार से अंदर आया तोह अजीब सी ख़ुशी मिल रही थी इन सब चेहरों और जगह को देख कर.
"कैसे हो मिस्टर? आजकल तोह चौदवी का चाँद हो गए हो?", ये चांदनी थी जो डिम्पी की तरफ से चलती हुई स्टैंड तक आ गयी थी. डिम्पी टेनिस में व्यस्त थी और न उसका ध्यान था इधर. चांदनी की नजरे बहोत कुछ कहती थी और ये भाषा भी अर्जुन के लिए नयी न थी.
"मैं तोह ाचा हु चांदनी लेकिन लगता है आपका ख्याल नेक नहीं है. अब तोह सुमन ने भी बॉयफ्रेंड बना लिया है, परमानेंट. क्यों समय खराब कर रही हो किसी बेवकूफ के पीछे.?", अर्जुन ने कंधे पर बैग टांगते हुए जवाब दिया.
"ये बेवकूफ समझ नहीं रहा मेरी तड़प को. साफ़ कहती हु के बस एक बार मेरी ये जिज्ञासा शांत कर दो फिर कभी नहीं टोकने वाली तुम्हे.", खुलकर कहना हे बेहतर लगा था चांदनी को.
"जिस रस्ते की कोई मंजिल न हो उसका क्या फायदा चांदनी? समझदार हो और अब तोह टीम की कप्तान भी. खेल और करियर पर ध्यान दो, चाहने वाले तोह तुम्हारे भी बहोत है.", अर्जुन चलने हे लगा था के उसने हाथ पकड़ लिया.
"देखो, बेशरम भी बन्न गयी हु तुम्हारे लिए. अब इतना भी न गिराओ के मेरा वजूद हे न रहे. सच कह रही हु अर्जुन, तुम जो कहोगे वो करुँगी लेकिन एक बार मेरी चाहत पूरी कर दो."
"मंजू से जवाब ले लेना चांदनी, वह कहेगी तोह मैं आग में भी कूद जाऊंगा. अब हाथ छोडो मेरा.", अर्जुन ने नरमी से कहा और हाथ छुड़वाते हुए अपने रस्ते बढ़ गया. चांदनी के पास सुमन आ कड़ी हुई.
"देख चांदनी, वो लड़का ाचा है और मंजू अपनी हे सहेली है. क्या मिलेगा तुझे ऐसा करके?"
"सुमन बात सिर्फ सेक्स की नहीं है. मैं मंजू से हर चीज में बेहतर रही लेकिन सबकुछ उसको मिला. तुझे क्या लगता है के मंजू ने गेम छोड़ कर मुझे कप्तान ऐसे हे बना दिया? तमाचा मार के गयी है वह मेरे मुँह पर. एक बार ये लड़का मेरी तरफ चला आया न फिर देख मैं मंजू को कैसा दर्द देती हु."
"थू है तेरी जैसी सहेली पर चांदनी. गलती से मंजू अपने पुराने रूप में आ गयी तोह तेरा हॉस्टल, कॉलेज और स्टेडियम ख़तम हो जायेगा. दोस्त को दुश्मन समझने वाली तेरे जैसी कमीनी लड़की के आसपास भी नहीं दिखना चाहती मैं..", सुमन की बात सुन्न कर चांदनी ने गुस्सा और अकड़ दिखते हुए अलग हे जवाब दिया.
"तू मैट इत्र रंडी. जिसके साथ तू गुलछर्रे उड़ा रही है न, उसको तेरा पास्ट बताया तोह वो भी नफरत करने लगेगा तुझसे. पहले भी तोह यार था तेरा, जिस से छुड़वा कर अपना खर्च चलती थी. और कप्तान हु मैं, कोच की ख़ास भी. नेशनल तोह क्या खेलेगी, एक्स्ट्रा में भी न बैठने दूंगी तुझे.", चांदनी जो भी कह रही थी वह जैसे सुमन को मजाक सा लग रहा था.
"कर ले जो तू करना चाहती है. बलबीर प्यार करता है मुझसे और उसको पता है मेरे अतीत के बारे में. रही बात इस बास्केटबॉल की तोह अगले साल शादी है मेरी बलबीर के साथ, वो मेरे लिए मायने रखता है. जा छुड़वा ले कोच से भी और फिर देखती हु तुझे मंजूबाला नैन से कौन बचता है. तेरा कोच या तेरा घमंड.", सुमन ने भी करारा तमाचा लगा दिया था इस मूरख युवती के दिल पर, शब्दों और सचाई से. पाँव पटकती हुई चांदनी बड़बड़ाती हुई टेनिस कोर्ट से आगे जाने लगी तोह पानी की घूँट भर्ती डिम्पी ने तोह आग में घी का काम कर दिया.
"दीदी ओह चांदनी दीदी, सुना है स्टेडियम फेडरेशन कोई जांच बैठा रहा है बास्केटबॉल कोच और कुछ संदिग्ध लोगो पर. ये दीप्ति अभी वही से आयी है.", चांदनी के पाँव जड़ हो गए थे और डिम्पी के साथ कड़ी लड़की भी सहमति में सर हिला रही थी.
"क्या बक रही हो? हमारी टीम तोह नार्थ विनर है. कोच सर की तोह प्रमोशन होने वाली थी. ये कैसी जांच की बात कर रही हो तुम और कैसे पता इसके बारे में.?"
"दीदी, अभी हमारे टूर्नामेंट के बारे में पता करने गयी थी मैं तोह वह S.A.I. से भी कुछ लोग थे और स्टेडियम मैनेजमेंट भी. प्रदीप सर (टेनिस कोच) एक लड़की को चुप करवा रहे थे और वह उन्हें बता रही थी की कैसे टीम में जगह के लिए सीनियर लड़की ने उसको आपके कोच के साथ गलत काम करने को कहा. फ़िलहाल तोह वह और कुछ नहीं पता चला लेकिन प्रदीप सर कह रहे थे के वो उस लड़की को इन्साफ दिलवाएंगे और पुलिस जल्द हे आने वाली है.", दीप्ति नामक ये लड़की जितना जानती थी उसने उतना बता दिया. लेकिन चांदनी एक शब्द भी बोले बिना तेज कदमो से बास्केटबॉल कोर्ट की जगह दूसरी तरफ चल दी.
"नाम हे बता देती उसको यार, शायद ज्यादा जल्दी भाग जाती.", डिम्पी ने हँसते हुए कहा और दीप्ति थोड़ा शर्मा गयी.
"क्या यार डिम्पी, वैसे ये लड़की हो कर भी इतनी गलत कैसे हो सकती है?"
"कई बार हम सही मौको पर गलत फैंसले ले लेते है डार्लिंग. इसकी भूख ने इसको अँधा बना दिया लेकिन अब भुगतने दे, हम मैच लगते है.", यहाँ ये दोनों वापिस खेलने में लग गयी और इधर आज बलबीर के साथ कसरत करने के साथ साथ अर्जुन ने ढेरो बातें भी की. उसको ये जान कर भी ख़ुशी हुई थी की बलबीर को क्लर्क की नौकरी भी मिल गयी है. दोनों ने पसीना सुकाने के बाद अभ्यास वाली जगह का रुख किया तोह अर्जुन के कदम ठिठक गए.
"अबे तुझे क्या हुआ? कोच सर को ढून्ढ रहा है क्या?", बलबीर ने अर्जुन की चिंतित देख पुछा. लेकिन यहाँ चारुल को देख वह थोड़ा हैरत में था, परेशां नहीं.
"कहा है सर?"
"पता नहीं अभी थोड़ी देर पहले हे प्रबंधक साहब का प् उन्हें बुला कर लेके गया था. कोई meeting-weeting होगी भाई. वैसे 5 दिन से ये मैडम भी इधर आ रही है, तेरे दोस्त है न चारुल मैडम?", बलबीर इतना कहता हुआ किट की तरफ लिए चल दिया अर्जुन को.
"हम्म. लेकिन फीमेल बॉक्सिंग का प्रैक्टिस एरिया तोह दूसरी तरफ है न भैया. यहाँ क्यों है ये?", अर्जुन ने दोनों पंजो पर गरमपट्टी बांधते हुए पुछा. चारुल ने भी अर्जुन को देख लिया था और सोच रही थी की वो बात करने आएगा. लेकिन यहाँ तोह अर्जुन ने आज बलबीर से पहले किट पर शुरुवात कर दी थी. हलके मुक्को से वह सधी हुई लाये में अभ्यास करते हुए बलबीर की बातें भी सुन्न रहा था.
"वो सीखने नहीं आयी है भाई. 40 दिन के लिए अस्सिटेंट है वह, ट्रेनिंग देने से पहले ये जरुरी प्रक्रिया है. इसके बाद वह जूनियर कोच का इम्तिहान देंगी, यही स्टेडियम या फिर यूनिवर्सिटी में सीखने के लिए.", बलबीर ने ग्लूकोस की बोतल मुँह पर लगाई और फिर एक घूँट लेने के बाद 2-3 बार उठक बैठक की.
"ये बॉक्सिंग की कोच कैसे बन्न सकती है? जहा तक मुझे पता है वह पहले ञंञैस्ट थी और बाद में जुडो की प्लेयर.", अर्जुन अलग हुआ तोह बलबीर ने किट को थाम लिया. संतुलित करने के बाद वह भी आराम आराम से बस कंधे का अभ्यास कर रहा था हर मुक्के के साथ.
"गेम तोह और भी बहोत खेले है मैडम ने लेकिन जुडो में black-belt है वह. एथलेटिक्स की एक और बात है भाई, के कोचिंग के लिए जरुरी नहीं के वही खेल आपने खेला हो. आपको समझ है तोह प्रशिक्षण लो, तैयारी करो और इम्तिहान दो. बाकी आपकी समझ और कुशलता पर निर्भर है. दिखय बर्ड का तोह मैंने कोई क्रिकेट मैच नहीं देखा लेकिन वह अंपायर है.", बलबीर ने सही समझाया लेकिन गलत उदाहरण के साथ.
"हाँ लेकिन होल्डिंग बॉलर थे जो बाद में बोलिंग कोच भी बने. आपने एक्साम्प्ले रेफरी का दिया है भैया. वैसे वो टीम गेम्स है तोह वह शायद जरुरी हो जैसा मैं समझता हु लेकिन इधर आप सही है इंडिविजुअल में. संधू जी खुद बॉक्सर रहे है और अब सीनियर कोच है, करवा सकते है नाम की सिफारिश.", आखिरी बात अर्जुन ने थोड़ा तेज कही जो चारुल के कान तक सही से पहुंची. वो इतनी देर से इनकी हे बातें सुन्न रही थी. फिर भी वह खामोश रही और ये दोनों प्रैक्टिस करने लगे रहे. थोड़ी देर बाद संधू जी भी आ गए थे और ये दोनों अभ्यास ख़तम करके शरीर को सूखा रहे थे.
"बलबीर, तुम जरा हॉस्टल वार्डन के साथ चले जाओ. वो इन्तजार कर रही है तुम्हारा. और अर्जुन बीटा, मुझे अभी थोड़ा समय लगेगा यहाँ, अगर ज्यादा परेशानी न हो तोह चारुल को अपने साथ ले जाना.", संधू जी ने विनम्रता से कहा था जैसे वह थोड़ा परेशां हो.
"मैं ऑटो से चली जाउंगी पापा.", चारुल ने तुरंत जवाब दिया.
"ठीक है अगर तुम्हे ऑटो से जाना है तोह अर्जुन तुम्हे बत्तियों के परे तक छोड़ देगा. यहाँ से तोह ऑटो भी नहीं मिलेगा. वैसे भी इसको काम है shaadi-byaah के तोह घर छोड़ने के बाद कही तुम्हारी माँ इसका समय न खराब कर दे. मैं चलता हु बाकी सब लोग अभ्यास के बाद सभी सामान ठीक से रख के चले जाना.", संधू जी ने ज्यादा कुछ न कहा. काली चुस्त टीशर्ट और सलेटी सूती ट्रैक पजामा पहने चारुल के गोर गाल थोड़ी म्हणत की वजह से गुलाबी हो चुके थे. सुन्दर तोह वह पारुल से भी कही ज्यादा थी लेकिन हमेशा पहरावा खिलाड़ियों वाला रहता था.
"जी 2 मिनट रुकिए, मैं कपडे बदल कर यही आता हु. तब तक आप भी चेंज कर लीजिये चाहे.", अर्जुन ने आगे का जवाब न सुना और फुर्ती से निकल गया. चारुल धर्मसंकट में थी अब. जाना चाहती भी थी लेकिन अर्जुन द्वारा अनदेखी किये जाने से आहात भी थी. ये भी पता चला था के वह इतने दिन से क्यों नहीं आ रहा और अब अपने हे कथन पर गुस्सा थी के क्यों ऑटो का कहा. फिर कुछ सोच कर वो भी अलग दिशा में चली गयी, कपडे बदलने. अर्जुन 5 मिनट बाद उसकी प्रतीक्षा करता हे मिला. चारुल ने कपडे बदले जरूर थे लेकिन वह वैसे हे थे. बस अब काली की जगह सलेटी चुस्त टीशर्ट और ये कला ट्रैक पजामा जो कूल्हों पर से अब कुछ ज्यादा चिपका था.
"चलो और मेरी वजह से इन्तजार करना पड़ा उसके लिए सॉरी.", चारुल ने अपेक्षा से विपरीत बात कही थी और अर्जुन मुस्कुरा रहा था.
"दोस्तों में तोह सॉरी जैसा कुछ नहीं होना चाहिए."
"मैं दोस्त नहीं मानती तुम्हे. साफ़ कहती हु और याद रखना.", दोनों चलते हुए स्टैंड तक आ गए थे जहा आज स्टेडियम की शुरुवात चांदनी के साथ अलग बहस से हुई थी वही कुछ ऐसा हे जाते वक़्त होने वाला था.
"फिर क्या मानती हो आप? यहाँ भी मैडम हे कहु क्या?", अर्जुन ने अपना बैग चारुल को पकड़ते हुए कहा जो बेहिचक उसने थाम लिया.
"प्यार.", अर्जुन को एक पल अपने कानो पर विश्वास न हुआ के अभी चारुल ने क्या कहा है. लेकिन वो गहरी भूरी आँखे अपने जवाब पर अडिग थी जैसे. बिना प्रसाधन के भी चारुल उल्लेखनीय रूप से सुन्दर थी.
"पता है आप क्या कह रही है और हम लोग इस वक़्त कहा खड़े है?", अर्जुन ने वापिस आगे बढ़ते हुए मोटरसाइकिल में चाबी लगाई और बहार निकलने लगा.
"जहा मर्जी हो, ये बदलने तोह नहीं वाला जगह के हिसाब से. हाँ मानती हु के मैं तुम्हे किसी और के साथ नहीं देख सकती थी इसलिए कभी बोल न सकीय."
"फिर आज कोई ख़ास वजह इस पुरूस्कार से नवाजने की?", अर्जुन के बैठने के बाद चारुल भी दोनों तरफ पाँव करते हुए बैठ गयी. बीच में एक बैग था और दूसरा कंधे पर.
"सोचा कब तक अकेले परेशां होती राहु, तुम्हे भी थोड़ा करना हे चाहिए. इसलिए 5 दिन से स्टेडियम भी आ रही हु. 3 से 6 बजे तक."
"मैं कैसे परेशां होऊंगा जी? और इसका मतलब ये हुआ के आप मेरे लिए यहाँ आ रही है. फिर तोह ये सरासर गलत है."
"तुम ख़ास वजह हो लेकिन दूसरा पहलु भी जरुरी है. और गर्लफ्रेंड के नखरे कभी कभी परेशां तोह करते हे है. क्यों ऐसा नहीं होता क्या?", स्टेडियम से बहार निकलते हे चारुल ने अपना एक हाथ अर्जुन की कमर में रख लिया. अर्जुन समझ नहीं प् रहा था के वह क्या जवाब दे इस सब का.
"मेरी 2 गर्लफ्रेंड है पहले से हे, तीसरी इंग्लैंड जा चुकी है. एक और भी है जो फ़िलहाल यहाँ नहीं तोह टोटल हुई 4. अब पांचवी बन्न ने से तोह बहोत ज्यादा बुरा नहीं लगेगा आपको मिस चारुल संधू.?"
"हजारवीं में भी प्रॉब्लम नहीं है श्रीमान अर्जुन जी. आप बस हाँ तोह कहो के मैं आपके लायक हु, सच कह रही हु कभी कोई डिमांड नहीं होगी सिवाय साथ वक़्त बिताने और वो साड़ी बातें सुनाने के जो मैं अकेले करते आयी हु अबतक. इस से पहले के ये पूछो की मैंने एकदम से ये सब क्यों कहा तोह इसका जवाब है अन्नू."
"अन्नू का इस सब से क्या लेना देना? और तुम्हारी बात कब हुई उस से?"
"जब तुमने उस से बात की थी जस्ट उसके बाद. तुम बड़े सरल हो अर्जुन और मैं खुद तुम्हे उलझन की तरह समझ रही थी. नाउ ी रिग्रेट की तुम सामने थे और मैं हर वो बात ढून्ढ रही थी जिसका मुझसे कोई लेना देना न था. और जब बात समझ में आयी तोह आज सारा दिन मैं सिर्फ तुम्हे याद करती रही. देखो तुम आये भी आज लेकिन जैसे मेरी अनदेखी कर रहे थे तोह मुझे वही फीलिंग आ रही थी जो सचमुच एक लवर को होती है, मेरी गलती मान ली मैंने.", चारुल ने कुछ भी दिल में न रखते हुए साफ़ साफ़ हकीकत बयान कर दी. अर्जुन अभी भी असमंजस में था.
"उस दिन थप्पड़ क्यों मारा था?"
"क्यूंकि मुझे लगा तुम ..", एक पल के लिए चारुल चुप हे हो गयी.
"क्या लगा तुम्हे चारुल?", अर्जुन ने अब नाम से बुलाया तोह चारुल ने चेहरा एक तरफ करते हुए उसके कान के समीप होते हुए कहा.
"मेरे िन्नेर्स के कलर की बात कर रहे हो. सॉरी फॉर तहत तू. लेकिन तब भी सिर्फ तुम हे मेरे ख्याल में थे और सिम्मी ने मूड ख़राब किया हुआ था सच बोल बोल कर. मैं इस बात का बुरा नहीं मानती अगर वो सब तुम कहते या हम अकेले होते. थोड़ा इस बाद से भी गुस्सा थी के अन्नू वही थी जिस से तुम प्यार करते हो."
"और अब?"
"कहा न जब तुम और मैं हो बस तब. किसी के सामने मैं खुद हे पीछे हट जाउंगी."
"मतलब अब मैं िन्नेर्स की बात कर सकता हु?", अर्जुन ने चंचलता से कह तोह दिया लेकिन अंजाम देख कर खुद हे हालत पतली हो गयी.
"देख भी सकते हो, बस मेरे कमरे में या जहा हम दोनों हो. तभी तोह कह रही थी की मेरा दिल भरा बैठा है अर्जुन तुमसे ढेरो बातें करने के लिए. किस्मत कही और ले जाए तोह ये मलाल न हो के मैं एक बंद डायरी सी ज़िंदा थी जिसको वो इंसान खोल कर पढ़ भी न सका जिसका जीकर हर लाइन में था.", चारुल ने पीछे से हे उसको आगोश में ले लिया था.
"सड़क पर लोग है चारुल."
"सॉरी. और अगर तुम्हे तुम्हारी व्यस्त ज़िन्दगी से कभी भी फुर्सत मिले तोह मिलने जरूर आना अर्जुन."
"मैं यही हु चारुल और जब तुम्हारा दिल करे बात करने का तोह कह देना. मैं आ जाऊंगा और पढ़ लूंगा क्या क्या लिखा है."
"कल?"
"कल.", अर्जुन ने भी वही शब्द बिना प्रश्न के दोहरा दिया.
"कहा? मेरे घर तोह कोई न कोई होगा हे. वैसे भी 2 दिन स्कूल और है अभी."
"स्कूल के बाद या स्टेडियम के बाद जब तुम्हे ठीक लगे. बात करने के लिए तोह पूरा शहर हे है, फिर एक घर पर निर्भर क्यों रहना.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल चारुल के घर से थोड़ा पहले हे रोक दी थी.
"ठीक है, स्टेडियम के बाद. जहा तुम्हारा दिल करे. पार्क या मार्किट या चलती मोटरसाइकिल इस भीड़ से परे. गुड bye एंड टेक केयर.", हाथ हिला कर जाने से पहले चारुल ने बैग अर्जुन को वापिस किया और एक मुस्कान के साथ विदा किया. अर्जुन पहले दिन से हे जानता था के चारुल उसको ख़ास तरह से देखती है, स्कूल के बास्केटबॉल वाले प्रकरण से कुछ समय पहले जब अन्नू ने उसको कक्षा से बहार किया था तभी से. वो चारुल हे तोह थी जिसने अन्नू को बोलै था अर्जुन को वापिस क्लास में लेने के लिए. लेकिन उसके बाद सिलसिला एकतरफा मोहब्बत का बनती चारुल ने अनजाने हे खुद को क्षति पहुंचे थी.
'पागल सा एक शक्श, दुनिया समझने निकला लेकिन वापिस घर पागल हे आया.', इन विचारो से निकलता जब अपने घर दाखिल हुआ तोह बस इतना हे खुद से कहा. आँगन से बगीचे की तरफ जाते पंडित जी के साथ धर्मवीर सांगवान और छोल साहब थे. शंकर जी की कार फिर से नदारद थी और उमेद चाचा भी जा चुके थे.
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"तुम्हारी लाड़ली मेरी नाक कटवाने पर तुली हुई है सरोज. एक बाप ने आज वो देख लिया जो कभी कोई भला इंसान सपने में सोचने तक की गलती नहीं करता.", भन्नाये से दलीप सिंह की आवाज चाह कर भी तेज न हो सकीय थी. दीवान पर बैठते हुए चेहरे पर dard-gussa और बेबसी के mile-jule भाव लिए वह हाथ पांच रहे थे.
"लाड़ली तोह वैसे वह ब्याह से पहले तक आपकी हे थी. मुझे तोह आपने बस उसकी पालनहार समझ के रखा हुआ था. जरा सुनु तोह आपकी लम्बी नाक पर मेरी लाड़ली कैसे पहुंच गयी.?", सरोज मौसी के स्वर में सिर्फ बेबाकी थी.
"कुछ कह भी नहीं सकता और कर भी नहीं सकता, इतना बेबस मैं कभी न था सरोज. मंजू वह खेत में शंकर के बेटे के साथ उस हालत में थी जिसको देखना हर बाप के लिए शर्मनाक है. कैसे मुमकिन है ये सब? मेरे लिए तोह दोनों एक सामान हे हैं.", आज दोपहर में अपनी बेटी और na-maloom दामाद को देखने वाले वही तोह थे.
"गौमती तोह आपकी सगी चचेरी बहिन नहीं है? सुना है ब्याह के बाद तक वो अपने लाडले बड़े भाई की गॉड में खेलती रही है. वैसे मंजू की शादी जहा आपने करवाई थी वह तोह खुद आप लोगो ने उसका संसार उजाड़ डाला. अब जहा वो अपनी मर्जी से खुश है, उधर भी आपको दिक्कत है. हो क्या आप? बाप? कसाई? भेड़िये या फिर मुँह खराब करके नयी उपाधि दे दालु?", सरोज की आवाज नरम न थी इस वक़्त और दलीप सिंह के पाजामे के अंदर पिछवाड़े तक पसीना आ चूका था ऐसी खरी खरी सुन्न कर. सरोज तोह कभी उसके साथ तीखा व्यवहार न करती थी. कभी कोई सवाल नहीं के वह कहा जाता है क्या करता है लेकिन आज. वह भी इतनी बड़ी बातें कह डाली थी.
"गौमती के साथ जो भी मेरा सम्बन्ध था मैं उसमे तुम्हारा पापी हु सरोज लेकिन ये जो मंजू और अर्जुन के बीच हो रहा है वो तूफ़ान ला देगा कई घरो में. शंकर गौशाला पे हे था और अगर वो ये सब देख लेता या फिर राजेश? देखो मैं माफ़ी मांगता हु अपने किये की तुमसे. मुझसे बदले की भावना में गलत हो गया और मंजू मेरी जान है. उसकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी."
"वो पेट से आपकी करनी की वजह से. गिरवा दो बचा और फिर से बांध दो उसको किसी के पल्ले, बकरी है न वह तुम्हारे खानदान की. बदले की भावना वाले कसाई अपने खून से साणे कपड़ो के लिए किसी और को जिम्मेवार मैट ठहराओ. चुड़ैल भी बलि किसी और की देती है अपनी औलाद की नहीं. वो खेत मेरा है और आइंदा वह कदम मत रखना आप, कह देती हु. रही बात अर्जुन की तोह वह इस घर के अंदर मेरा दामाद है जिसने मेरी बेटी को एक सही जिंदगी दी. उसके और मंजू के बाप की तरह उजाड़ी नहीं.", सरोज बेफिक्र सी ठीक सामने बैठ गयी थी एक कुर्सी पर. दलीप सिंह शून्यभाव से बस सोच रहा था.
"पंडित जी से ये राज न बचेगा सरोज. मुझे चिंता अर्जुन की है और उसकी ज़िन्दगी किसी और लड़की के साथ पहले हे बाँधी जा चुकी है. मैं तुम्हारे सामने से कही न जाऊंगा और जहा भी गया तुम्हे लेके जाऊंगा लेकिन ये अनर्थ रोक दो."
"यही बात शंकर जी को यहाँ बुलवा कर कहिये, मैं भी विचार करुँगी. फ़िलहाल मेरे बचे खुश है अपनी दुनिया में. अर्जुन एक जिम्मेवार पति और दामाद है, मंजू का हर फैंसला वो करेगा और बात करनी होगी शंकर जी के साथ बैठ कर आपको. हाँ मंजू उसके साथ हे होगी उस समय भी. मिलाये तोह जरा शंकर जी को फ़ोन.", सरोज ने कहते के साथ हे स्टूल पर रखा फ़ोन आगे कर दिया था दलीप के. सोचने समझने की ताक़त जब न बची हो तोह आदमी हुकुम मान हे लेता है. दलीप को पता था शंकर अभी कहा होगा. डायरी से नंबर निकल कर बस हैंडल कान पे टिकाये वह प्रतीक्षा करता रहा.
"शंकर भाई दलीप बोल रहा हु."
"पता है भाई, आवाज जानता हु तुम्हारी. लेकिन घबराये हुए क्यों हो? मुसीबत में तोह नहीं, मैं आता हु तुम्हारे पास."
"सुनो भाई सुनो. एक बहोत बड़ी घटना हो गयी है शंकर. मंजू और अर्जुन...", अब वो अटक गया था इतना कहते कहते और दूसरी तरफ शंकर की बेचैनी बढ़ गयी थी इन 2 नामो को सुन्न कर.
"क्या हुआ उन दोनों को? कहा है वह दलीप? कुछ तोह बोल मेरे दोस्त, देख उन पर मुसीबत आयी तोह मैं bina-wajah मारा जाऊंगा."
"शंकर, यार उन दोनों का चक्कर है. मुझे माफ़ कर दे यार लेकिन मुझे आज हे पता लगा के मेरी बेटी अर्जुन के साथ शर्मनाक हालत में थी.", दलीप दर्द में इतना हे कह सका.
"Pati-patni के बीच क्यों आते हो मेरे भाई? हमारे पास किसी के भी सवाल के सही जवाब नहीं है. और जो सही है उनसे सवाल करके हम ज्यादा गिर जायेंगे. तेरी बेटी उसकी बीवी है बस यही एक गुप्त सच है. अपने तक हे रखना इस बात को, वैसे भी लफड़े 50 पहले से है कही ये अब तुम्हारे पीछे पड़ गया तोह तुम्हे तोह बचने वाला भी कोई नहीं. मेरे पास माँ तोह हैं.", शंकर से तोह ऐसे जवाब की उम्मीद तक न थी दलीप को.
"तुम्हे पता है क्या कह रहे हो?"
"हाँ पता है. हम दोनों सचमुच कसूरवार है मंजू के और अर्जुन उसका सबकुछ. और ये बात भी समझ लेना के अर्जुन की शादी परिवार के हिसाब से प्रीती से हे होगी, लेकिन वो लड़की भी शायद शामिल है Arjun-Manju के साथ. हम बहार है तोह हमारे लिए फ़िलहाल ठीक है. तू गौमती के पास जा थोड़ा ठंडा करेगी तोह चैन से समझ सकेगा.", ये नाम भी सरोज को सुनाई दे गया था बाकी बातों के साथ. हड़बड़ाहट में दलीप ने तुरंत फ़ोन रख दिया.
"मैं भगवन कसम खाता हु के गौमती के साथ अब मेरा कुछ नहीं है. आइंदा मैं उनके परिवार के भी किसी इंसान से नहीं मिलने वाला. मुझे कैसे भी माफ़ कर दो सरोज."
"आप बस अब वही करोगे जो इस घर के लिए ठीक होगा. काम राजेश के साथ जो की मंजू के हिस्से किया है अर्जुन ने और बाकी वक़्त यहाँ घर में. अपने भाई को बोल देना के उस खेत में न जाए और वह जब भी हम काम करेंगे, पता होना चाहिए. बगीचे वाली तरफ घेराव करवा दो और वह 2 एकड़ मंजू के नाम. बाकी सब तोह सही है. मैं नहीं रोकती गौमती के पास जाने से या बिंदिया के. चाय ला रही हु.", सरोज जाते हुए ये नया नाम भी बम की तरह फोड़ गयी थी अपने पति के सर पर.
'सही कहते थे पंडित जी, बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी. फटती भी ऐसी की अब दुबारा सील न पायेगी.', दलीप बेबस सा यही कह सका खुद को. दिल ग़मगीन था और बीवी अब भी साथ थी. आँखों में पानी आ हे गया था.
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"तू अब इधर आ कमरे में, भागता फिर रहा है न मैं सब समझती हु.", अर्जुन नाहा धो कर बाथरूम से निकला तोह कोमल दीदी ने बैठक का दरवाजा अंदर से बंद करते हुए उसको बिस्टेर पर बैठा लिया.
"क्यों भागूंगा मैं आपसे.? बस थोड़ा व्यस्त था और सब होते है यहाँ. कोई आ जायेगा दीदी."
"कोई नहीं आता तू निश्चिंत हो जा. और चल अब बता के मधु बुआ के साथ क्या हो रहा है?", सीधा सवाल तोह टेढ़ा जवाब देने की गलती अर्जुन यहाँ तोह नहीं कर सकता था. अगले 20 मिनट तक रट्टू तोते की तरह वह सब बोलता गया सिवाए अपने पिता के राज के. कैसे उसने बुआ के साथ सम्बन्ध बनाये, बुआ को उस से प्यार होना, बुआ की परेशां हालत और साथ हे दादा जी का बेटी के लिए व्यथित होना. आखिर में जब उनके ससुराल में शामिल होने का उल्लेख किया तोह कोमल ने अपने भाई को प्यार से गले लगा लिया.
"तोह इसलिए बुआ रो रही थी? देख समबन्ध के बारे में तोह मैं क्या हे कहु. दोनों व्यस्क हो और वह समझदार बड़ी महिला है. लेकिन तूने ये बहोत ाचा किया के उनकी ज़िन्दगी को सही मंज़िल तक पंहुचा दिया. जिस इंसान का दिल छलनी हुआ हो न अर्जुन, उसको प्यार की मरहम लगाना गुनाह नहीं है. वैसे 2-3 सवाल और है मेरे पास.", कोमल दीदी ने अर्जुन का हाथ पकड़ते हुए पूछ हे लिया.
"जी आप पूछिए."
"तेरे कुछ बातें समझ में नहीं आती मेरे भाई. कहा था के हर उस लड़की के साथ शामिल मैट होना जो कहे की उसको तुझसे प्यार है? ये गलतिया तुझे कही का कही ले जा सकती है."
"आप किसकी बात कर रही है?", अर्जुन ने दिमाग पर जोर डाले बिना कहा.
"ाचा ये छोड़ और जरा ये बता के हिमानी, ऋचा और विनीता दीदी के बारे में तुम क्या फील करते हो. मुझे पता है के तुम हमेशा सच बोलते हो.", कोमल दीदी ने जैसे ये बात कही थी अर्जुन बिस्टेर पर थोड़ा सही से हो कर बैठ गया.
"बता रहा हु दीदी लेकिन इसके बाद एक सवाल मेरा भी होगा. सबसे आखिर में."
"ठीक है. आज तुम सवाल भी कर लेना."
"हिमानी दीदी एक जिम्मेवारी है मेरे लिए, जिन्हे बड़े विश्वास से आचार्य जी ने मेरे सुपुर्द किया है. वो उस सूक्ष्म पल में हे क़ैद है जहा अगर उन्हें निरंतर बाहरी दुनिया का एहसास न कराया जाये तोह वो वापिस बंद हो जाएँगी. मैं उन्हें अकेला ठीक नहीं कर सकता. हो सकता है इस सबके दौरान वह मुझमे दिलचस्पी ले और ऐसा स्वाभाविक है दीदी. लेकिन मेरा लक्ष्य है के बिखरे कांच को गोंड से जोड़ने की जगह पिघला का एक मजबूत मूरत दू, जिसमे कोई और अक्स न हो. हिमानी दीदी के बारे में मेरा यही विचार है.", अर्जुन ने हर शब्द को गहनता से कहा, सोच समझ कर.
"और ऋचा?"
"उनके बारे में हम व्यर्थ हे बात करेंगे दीदी. सवाल भी आपके पास, जवाब भी आपके पास. लेकिन अगर कुछ मेरे मुँह से हे jaan-na है तोह बता देता हु. वो हैं चंद्रो देवी की पौती और इनकी माता जी का नाम है मधुलता Singh/Lata शर्मा. दिमाग मजबूत, हर चीज को सिर्फ देखना समझना और चुप रहना. मतलब जीवन में 2 किरदार जीने वाली, शायद अतृप्त और एक आशावान लड़की. मुझको भाई की तरह देखती है, ऋतू दीदी को किसी प्रतिस्पर्धी की तरह और सामने दिखती चीज का पता पूछने वाली. मतलब बात करने के लिए उत्सुक एक अकेलेपन की शिकार, मासूम लड़की. आधा सच और na-maloom सच उनकी ज़िन्दगी को आसान नहीं करने वाला.", अर्जुन के इस जवाब पर कोमल की धड़कन तेज हो गयी थी. वो उसकी सोच से आगे जा चूका था और जैसे किसी सचाई के करीब जो कोमल के साथ साथ किसी को भी न पता थी.
"विनीता?", ये नाम लेते हुए होंठो कंपकंपा रहे थे.
"वो तोह आपके हे जैसी है न दीदी? उनके बारे में तोह हमको नहीं बात करनी चाहिए. आप चाहती है के ये मैं कहु या आप वैसे हे समझ जाये जैसे आप Tara-Priyanka दीदी के बारे में जानती है.", अर्जुन से आज शायद वो गलत हे उलझ गयी थी लेकिन कोमल दीदी जानती थी की अर्जुन हैं तोह उनसे छोटा हे.
"तुम आज सुबह कहा गए थे? आचार्यजी तोह बहार है और एक बात मैं कह देती हु की कामवाली बाई ने तुम्हे कुछ सन्देश दिया था. बिमला जीजी के नाम से.", यहाँ अब माहौल बदल कर कोमल दीदी के पक्ष में आ चूका था. घडी ने इतनी जल्दी पौने 8 बजा दिए थे लेकिन अर्जुन कुछ सोच कर अपनी बात कहने लगा.
"साधू सिंह अंकल की बीवी है बिमला देवी. उनकी बेटी है काजल जिसके साथ मैंने जंगल में 3-4 बार वो सब किया है. सच कहता हु के वह सिर्फ जिस्मानी जरुरत जैसा है जो खुद वह चाहती है. मैंने वह जाना छोड़ा तोह बिमला आंटी ने यहाँ सन्देश भिजवा दिया. मुझे नहीं पता था के आपने सुन्न लिया था वह. इसलिए सुबह मैं काजल के साथ फिर से वही दोहरा कर आया. एक और लड़की भी शामिल थी आज."
"कौन है वो लड़की?"
"स.. s..Savita नाम है उसका दीदी."
"वो तुझसे प्यार करती है?"
"हाँ. और पहले मैंने उसको हे देखा था काजल से. लेकिन हमने कुछ किया नहीं और अब उसकी शादी है 2 महीने बाद काजल के भाई के साथ."
"और इन 2 महीने में तू उसको भी औरत बना देगा? मैंने झूट तोह नहीं कहा न?"
"हाँ. वो यही चाहती है."
"तू क्या चाहता है अर्जुन ये जरुरी है. इधर देख कर बात कर निचे देखने से ये बात नहीं छुप जाएगी की तेरा सम्बन्ध शायद बिमला देवी से भी है.", कोमल दीदी ने आज पहली बार थोड़ा जोर से कहा था. अर्जुन के चेहरे पर अजीब से भाव आ गए थे.
"मैं क्या करू दीदी? सामने से अगर कोई खुद तैयार हो और फिर मेरा भी दिल हो उस लड़की के साथ तब मैं क्या करू?"
"मेरे और उस सविता में से किसी एक को चुनन ले भाई.", दीदी ने इतनी बड़ी बात कह दी थी की अर्जुन बिना कुछ कहे बस उनके गले लग गया था.
"एक बार ऐसे हे हादसे ने बहोत कुछ बदल दिया था अर्जुन. मैं नहीं चाहती की तू शिकार हो किसी क्षद्यंत्र का. तू शिकार नहीं करता क्योंकि तू प्यार करना जानता है. लेकिन खुद हे सोच तू उस लड़की के प्यार को महसूस करना चाहता है या जिस्म को? अगर वो तुझे के नजर में कभी ाची लगी होगी तभी तोह वह आजतक अक्षत है. आज वह उस देहलीज पर है जहा वह अपना सबकुछ तेरे हवाले करके तुझे अपना बनाना चाहती है. इसमें काजल या बिमला देवी जैसा वो kaam-vaasna या सुख का चाह नहीं रे पगले. खुद हे सोच के पहल सविता मिली लेकिन 3-4 बार तू काजल के साथ एकाकार हुआ. ये सब महीने 2 महीने के बीच तोह हुआ हे होगा. इतना सबर करने वाली को तू क्या जवाब देगा? या वो लड़की क्या लेके अपने पति के पास जाएगी जब आत्मा तेरे हवाले हो जाने वाली है. कई मंदिरो में दिए किसी और को भी जलने दे ारु, पंडित प्रेम का हर कोई. न कोई न होये. अब तेरा सवाल.", दीदी ने जो आइना दिखाया था वह बहोत था उसके लिए.
"मैं आपसे प्यार करता हु. और आइंदा ये मत कहना के किसी के लिए भी आप खुदको सामने रख देंगी. मेरा कोई सवाल नहीं है बस.", अर्जुन हलकी नाराजगी में था और चेहरा पर हल्का दर्द. कोमल दीदी ने भी उसके चेहरे को पकड़ते हुए होंठो से होंठ जोड़ दिए. जब अलग हुए तोह अर्जुन शरमाने लग रहा था.
"हाँ अब बोल. तू मेरी जान है ारु और मैं जानती हु के तू मेरे बिना नहीं रह सकता. तभी तुझे सुधरती हु थोड़ा थोड़ा. बाकि तू जो मर्जी करता रह."
"ी लव यू.", इस बार अर्जुन ने उन्हें चूमने के बाद बाहों में ले लिया था. कुछ देर तक वह उन्हें जकड़े रहा तोह कोमल दीदी को भी पता लग गया के वह सचमुच परेशां हो गया है.
"ाचा बाबा. आइंदा ऐसा नहीं कहूँगी. लेकिन अब तू न अपना सवाल कर.", कोमल दीदी ने अर्जुन को गले लगा लिया था.
"मुझसे शादी कर लो."