जारी
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अर्जुन पुराने घर में jaanch-padtal करने के बाद ठेकेदार से जानकारी ले रहा था. आज भी बहोत काम हुआ था यहाँ और घर अब ाचा दिखने लगा था.
"बीटा, बहार वाली दिवार का पूरा प्लास्टर कर दिया है, ये बड़ा दरवाजा भी मरम्मत के बाद पेंट हो गया. 2 मजदूर लगा कर सारा खली हिस्सा साफ़ करवाया था और अब कल 4 ट्राली मिटटी बिछवा देंगे. इधर ये साड़ी टूंटी, चिटकनी, हैंडल बदलवा दिए है. पल्ले (दरवाजे) भी कल वार्निश के बाद लगा देंगे. प्लम्बर ने भी सारे नल और पाइप जांच कर जो बदलने वाले थे वह बदल दिए है.", ठेकेदार के हाथ में 3-4 कागज़ थे और वह अर्जुन को सब दिखते हुए बता भी रहा था.
"अंकल जी अभी रसोई का पत्थर रह गया है, और ये पेंट बचा है शायद. वैसे चारो सीट बदलवा दी न बाथरूम की? और बहार गाये वाले कमरे का क्या करना है?", अर्जुन ने कमरे के अंदर हे बने एक बाथरूम का दरवाजा खोल कर देखा तोह यहाँ rang-rogan हो चूका था, नयी कोड और toonti-fuhare चमक रहे थे.
"हाँ, पहले बाथरूम हे पेंट करवाए है, रसोई भी हो गयी बिजली का काम करवाने के बाद. आज बहार आँगन का पत्थर रोका है कल रसोई का होगा. पंखे, एक, तुबेलिघ्त और जैसे लैंप लगवाने हो वह कल हे मंगवा देना सुबह. इस काम को भी शाम तक फारिग करवा देंगे, इलेक्ट्रीशियन कल 2 से 9 बजे तक काम करेंगे. और बहार वाले कमरे को तोह ाचे से तैयार करने का बोलै है आपके ताऊजी ने. पिछले हिस्से में भी वेहड़े को पक्का करना है. छत्त पर ाजे निरु किया है जिस से बारिश में कही भी पानी का सीलन नहीं होगा.", ठेकेदार काम का पक्का आदमी था और अर्जुन को भी ाचा लगा था ये देख कर की सभी तरह के मिस्त्री एक साथ लगा दिए थे इन्होने.
"छत्त की टंकी रह गयी है जैसा मैं देख रहा हु कागज़ पर नहीं लिखी."
"हाँ. ये शायद भूल गए राजकुमार जी. लेकिन अब लिख लेता हु यहाँ. वैसे वह दुरुस्त है बस सफाई करवा के प्लास्टर करवा देते है. बाकी कांच वाला परसो आएगा, 2-3 खिड़कियों के चटके हुए है. चौखट तोह सभी पालिश करवा दी है तोह ज्यादा काम नहीं है. वैसे मेरी सलाह है के बहार आँगन में गाडी कड़ी करने की जगह एक तरफ शटर वाला गैराज बनवा लिया जाये तोह बेहतर रहेगा. यहाँ का पत्थर भी इस वजह से हे खराब हुआ tha.",Aangan में लगे नए संगमरमर को देखते हुए ठेकेदार ने सलाह दी.
"हाँ, यहाँ तीनो तरफ हे तोह इतनी जगह. लेकिन मुझे नहीं लगता के शादी से पहले दादा जी कोई ऐसा काम करवाएंगे. आप संपर्क में हे रहना अंकल, शादी होते हे ये राइट साइड में घर की लम्बाई बराबर हे गैराज के लिए मैं दादा जी मन लूंगा. रंग तोह हर कमरे के आपको पता हे है, कल बाकी सामान मैं समय पर मंगवा दूंगा. वैसे भी ताऊजी आज हे आने वाले है वापिस, दादा जी ने बताया था थोड़ी देर पहले. तोह कल वो जरूर आएंगे इधर. अपना समय और उचित सलाह देने के लिए धन्यवाद्.", अर्जुन उनके साथ हे इस छोटे दरवाजे से बहार चला आया जो शायद सुविधा के लिए बड़े गेट के बाए हिस्से में बनाया गया था. दोनों पर टाला लगते हुए वह पैदल हे चल दिया एक तरफ.
ऐसा लग रहा था जाने कितने हे दिन बाद वह इस गली में आया हो. शाम के साढ़े 5 बज चुके थे, मतलब आधा घंटा वह इस घर रहा था और अब आकांक्षा की गली में चलते हुए चेहरे पर अलग हे ख़ुशी थी. उनके घर के बहार कोई गाडी न देख घंटी बजा दी. अंदर आकांक्षा की माता जी की कार कपडे से ढंकी थी, पिछली बार की तरह. कोई एक मिनट बाद ये 35-36 साल के लगभग उम्र की महिला ने दरवाजा खोला. एकटक वह अर्जुन को ऊपर से निचे देखने लगी जो 6 फ़ीट के गेट से भी लम्बा था.
"हांजी?", इन मोहतरमा ने इतना हे बोलै और ख़ास तरह से आँखें हिलाते हुए परिचय माँगा.
"जी अर्जुन, अंशु का फ्रेंड हु और नोट्स लेने थे. आंटी और अंशु नहीं है क्या घर में?", अर्जुन अपनी हे जगह खड़ा था. इन महिला ने अर्जुन को अंदर न बुला कर आकांक्षा को आवाज लगाई जो नंगे पाँव हे hilti-dulti से आँगन तक आयी और अर्जुन को देखते हे चिल्ला उठी.
"ोये तुम हो. वह क्यों खड़े हो, अंदर आ जाओ. बुआ ये अर्जुन है, अर्जुन.", अब जैसे इन महिला को कुछ याद आया और वह एक तरफ हुई के आकांक्षा ने अंदर आते हे अर्जुन का हाथ पकड़ लिया.
"सॉरी बीटा, दिमाग से निकल गया था. थैंक यू अर्जुन.", अर्जुन कुछ जवाब देता उस से पहले हे हॉल में बैठी सुषमा तनेजा सोफे से कड़ी होती उसके पास आ गयी. पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी वह और एक आकांक्षा की हमउम्र लड़की बस बैठी हुई देख रही थी.
"तुम घर के बहार से हे चले गए थे न? और फिर उसके बाद अब आ रहे हो.", सभी जैसे चाय हे पी रहे थे अर्जुन के आने से पहले.
"सॉरी आंटी रुपाली दीदी ने बताया हे होगा आपको की मैं तोह स्कूल भी नहीं जा रहा घर में शादी की वजह से. कल आने लगा था लेकिन फिर जरुरी जाना पड़ गया. आप कैसे है और अंकल?", अर्जुन दीवान के किनारे बैठ गया था और सुषमा जी उसके साथ.
"हम सब तोह तुम्हरे सामने हे है. लाइफ ज्यादा ाची हो गयी है, तुम्हारी वजह से. हाँ ये अब ज्यादा परेशां करने लगी बस.", गॉड में आ बैठी आकांक्षा को गले लगाती सुषमा जी ने हँसते हुए कहा. अर्जुन भी खुश था ये सब देख कर.
"आप लोग तोह मेरी वजह से चाय भी भूल गए. और आप हैं अंशु की बुआ जी और शायद ये सेजल है.", अर्जुन ने उस खामोश सी बैठी लड़की की तरफ नजर करते हुए कहा तोह वह थोड़ा हैरान हुई लेकिन सुषमा जी ने अर्जुन का सर सहलाते हुए कहा.
"सही पहचाना तुमने, ये सेजल हे है और अबसे यही रह कर अपना कॉलेज शुरू करेगी. और ये मेरी ननद काम छोटी बहिन ज्यादा है, जाया. अंशु की बुआ और सेजल की माँ. अब तुम बताओ के तुम्हारे लिए क्या बनाऊ? इतने दिन बाद दिखाई दिए हो तोह ऐसे न जाने दूंगी, कह देती हु.", सुषमा जी ने परिचय करवाया तोह अर्जुन ने फिर से बुआ को नमस्ते की. देख कर नहीं लगता था के सेजल उनकी बेटी होगी लेकिन सच यही था.
"ये क्या पियेगा वह मुझे पता है माँ. आप न अपनी चाय पी लीजिये और तुम उठो वह से और मेरे साथ चलो.", वह अर्जुन को हाथ पकड़ कर उठती हुई हॉल से बहार रसोई में ले जाने लगी.
"मैंने दूध गरम करना सीख लिया, अब देख लेना.", आकांक्षा की बात पर अर्जुन के साथ सुषमा भी हंस रही थी. सेजल भी वह से उठ कर अंदर वाले कमरे में टीवी देखने का बोल कर निकल गई. दोनों के जाते हे जाया कुछ सोचते हुए बोल पड़ी.
"भाभी, लड़का ाचा है लेकिन अंशु का व्यवहार ज्यादा हे खुला हुआ है. मुझे यकीन है के वह ऐसा वैसा कुछ नहीं करेगी लेकिन.."
"जाया तुम्हारी यही बात ाची है के तुम सबकी परवाह करती हो. लेकिन ये लड़का हमारी अंशु की परवाह हमसे ज्यादा करता है. और वह शादी में तुमने देखा हे था न के पहली बार मेरी बेटी कितना चहक रही थी, सबसे मिली भी और शामिल भी हुई. फिर ये समाज तोह मेरी बेटी के बुरे समय में उसके साथ न था. जान लेना थोड़ा इस लड़के को तुम भी, जितना मैंने जाना है इसने लोगो के घर आबाद हे किये है.", अपनी ननद से चाय का कप लेते हुए सुषमा जी मुस्कुरा दी. जाया थोड़ा झेंप रही थी.
"सच कहती हो आप के ज़िन्दगी में सबसे जरुरी अगर कुछ है तोह सबके साथ खुश रहना हे है. अकेलापन और दर्द इंसान को टॉड देते है. सॉरी भाभी, सेजल की वजह से थोड़ा अजीब लगा था.", इधर ये बातें कर रहे थे और रसोई में आकांक्षा अर्जुन से हे दूध गरम करवा रही थी.
"ज्यादा मत गरम करना और ये मलाई तोह निकल हे देना प्लीज. हाँ मेरे वाले में बॉर्न्विटा एक्स्ट्रा थोड़ा."
"वह तोह बोल रही थी की दूध गरम करना सीख लिया है तुमने.", अर्जुन ने पलट कर उसकी कमर में दोनों हाथ दाल लिए थे. वो बिल्लोरी आँखें इतने में हे चमक उठी और खुद हे आकांक्षा उसकी तरफ होने लगी.
"तुमने मुझे मिस किया न? ी क्नोव थिस एंड ी आल्सो मिस्ड यू ा लोट. दूध गिलास में दाल लो इस से पहले की मैं बताना शुरू करू के क्या मिस किया मैंने.", जीभ होंठो पर फिरती हुई वह अर्जुन का गाल चूम कर बहार निकल आयी. अर्जुन 2 गिलास में दूध डालते हुए हंस रहा था.
"मुझे बिलकुल पता था के मेरी बेटी कितना काम जानती है. दूध भी तुमने हे बनाया होगा?", अर्जुन को 2 गिलास लिए अंदर आते देख सुषमा जी ने हँसते हुए कहा और आकांक्षा जीभ निकाल कर कमरे में भाग गयी.
"इधर है हम दोनों, वह फिर आप उसके साथ दुनिया जहाँ की बातें करने लगोगी."
"जाओ अर्जुन नहीं तोह ये ऐसे हे सबको परेशां करती रहेगी. कुछ साथ में बना देती हु."
"नहीं आंटी जी, वैसे भी मैं फिर आऊंगा. अभी नोट्स लेके जाने है मैथ के इसलिए आया था.", अर्जुन को जाते देख सुषमा जी ने टेबल से बर्तन समेटे और अपनी ननद के साथ ऊपर चल दी, जहा उनकी सास अकेली थी.
"अब ये दूध रखो एक तरफ और मुझे प्यार करो.", अर्जुन के हाथ से गिलास एक तरफ रखती वह बंद कमरे में अब उसकी गॉड में बैठी थी.
"सब घर में हे है मेरी माँ. मरवाओगी तुम.", अर्जुन कुछ कहता उस से पहले कंधे से दोनों तान्निया सरकती वह उस प्यारी सी ब्रा में क़ैद अपने उभर सामने करती अर्जुन के होंठो से लगी. आकांक्षा का चूमने का अंदाज शुरू में जहा धीमा था थोड़ी हे देर में कशिश भरा हो कर तेज होने लगा. अर्जुन का हाथ अपने सीने पर दबती वह बुरी तरह उसके होंठो को चूस रही थी. 2 मिनट बाद होंठ अलग हुए तोह अर्जुन बस इस खूबसूरत सी पारी को निहार रहा था.
"आज न एक बात और केहनी है, पूरी जरूर sunn-na.", ब्रा से एक उभर खुद हे बहार निकल कर अर्जुन के पंजे में रखवाती वह हलकी हलकी कमर हिला रही थी. अर्जुन हमेशा उसके शरीर को बिहार प्यार से हे सहलाता था, कभी कोई उतावलापन या जोर नहीं. आज भी इस गुलाबी छोटे से निप्पल को उकेरता वह बस उसकी आँखों को देख रहा था.
"सुन्न रहा हु."
"तुम बस ऐसे हे मुझसे प्यार करते रहना चाहे हमारी मंज़िल अलग अलग हो जाये. सेंटी हो कर नहीं दिल से कह रही हु. तुम हमेशा प्रेजेंट में रहना मेरे साथ अर्जुन, फ्यूचर की बात कभी नहीं करेंगे.", बड़ी अजीब बात कह दी थी आकांक्षा ने. अर्जुन जानता था के ऐसा मुमकिन नहीं लेकिन खुद सामने से उसने ऐसा क्यों कहा.
"तुम्हे ये गलत नहीं लगता. मैं प्यार करता हु तुमसे, बेशक सबसे पहले मैंने कहा था के हम फ्रेंड्स है जब तुमने प्रोपोज़ किया था."
"बुद्धू, तुम बड़े नहीं हो रहे दिमाग से. प्यार है तभी तोह मेरे कमरे में मैं नंगी हो जाती हु तुम्हारे सामने. बस चाहती हु के हम ऐसे हे रहे, कोई प्रॉमिस नहीं जैसे shaadi-vaadi या बचे तक. मेरे प्यार का फैंसला मैंने किया लेकिन शादी या फ्यूचर का फैंसला पेरेंट्स करेंगे और इसके बारे में नहीं सोचना मुझे. नाउ टेक थिस इन योर माउथ.", हँसते हुए खुद हे उसने आगे बढ़ते हुए अपना वह प्यारा सा सतांन अर्जुन के होंठो पर लगा दिया. एक हाथ से वह अर्जुन को पकड़े हुए कमर हिला रही थी. फ्रॉक के निचे शायद पंतय उसने पहले हे निकल दी थी.
"घर में शादी है 2-2, कार्ड देने आऊंगा मैं तुम्हारे घर जब अंकल होंगे. वैसे पता है तुम्हे तुम कितनी प्यारी हो अंशु?", मुँह से उभर निकल कर अर्जुन ने दोनों तरफ चुम्बन करते हुए वह गाल थाम लिए. इस बार आकांक्षा भी उतने हे प्यार से उसको देख रही थी. फिर उसके सीने पर सर रखती वह चिपक गयी.
"यही तोह मुझे ाचा लगता है तुम में. तुम दिल से प्यार करते हो, शरीर से नहीं. सॉरी नुदे होने के लिए. होल्ड में फॉर ा व्हिले. और तुम बुलाओगे तोह पापा मन कैसे करेंगे.", अर्जुन ने भी कपडे ठीक करने के बाद उसको बाहों में जकड कर बैठा रहा.
"मैं चाहता हु के तुम हर फंक्शन में आओ. और फ्राइडे को तैयार रहना, मैं कार लेके आऊंगा तुम्हे लेने दोपहर को 1 बजे.", अर्जुन के सीने से लगी वह उसके गले को चूमने लगी.
"तोह अब कार भी ले ली है जनाब ने. वैसे कार में मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं करने वाली."
"वह तोह हम मिल कर डीडे करेंगे. बस तैयार रहना और अब कड़ी हो जाओ, सवा 6 हो गए है. अंकल भी आ सकते है.", अर्जुन ने अलग करते हुए उसके गुलाबी होंठो पर प्यारा सा चुम्बन करते कहा तोह खुद को ठीक करती वह बाथरूम में चली गयी. कुछ देर बाद कमरे की चिटकनी खोल कर वह बीएड पर उसके बराबर हे बैठ गयी. दोनों दूध पी रहे थे और साथ हे अर्जुन उसके नोट्स भी देख रहा था.
"नानी जी पूछ रहे है के तुम ऊपर आओगी क्या? मां जी भी आ गए है.", सेजल ने दरवाजे के बहार से हे पुछा तोह जवाब अर्जुन ने दिया.
"हाँ मैं बस निकल हे रहा हु, ये आ रही है.", सेजल इतना सुन्न कर अजीब सा चेहरा बनती निकल गयी और जाने से पहले अर्जुन ने भी आकांक्षा के माथे को चूमा और उसके साथ हे बहार निकल गया. अपने घर पहुंचते पहुंचते उसको 8 बज हे गए थे, अन्नू की माता जी के साथ 4-5 बाजी लूडो की खेलने और सरदार जी के साथ गप्पे लगा कर हे वह वापिस आया था. अंकल आंटी बहोत खुश हुए थे उस से मिल कर और अन्नू से फ़ोन पर तीनो ने बात की थी.
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शंकर जी आज चंद्रो देवी के हे घर रुकने वाले थे, विवाह के काम बहोत बाकी थे और बिजेन्दर के होने से उस से भी बात कर सकते थे. राममेहर की हवेली में विकास सब देख हे रहा था और उसको हे वह गॉड लेने की बात आज सितारा देवी से कौशल्या जी ने की थी. विकास की माँ को भी इस से ऐतराज न हुआ था क्योंकि अपने शहर वह जैसे अकेले हे रह रही थी. वैसे भी सितारा देवी के सर पर बोझ था अपने बेटे द्वारा बहु के कतल का. उमेद सिंह भी अपने घर आज सुकून से माँ और बीवी के साथ था, उसको अपनी बेटी की थोड़ी कमी खाल रही थी क्योंकि विन्नी के आने के बाद वह अभी तक पूरा समय नहीं दे पाया था. लेकिन बिटिया को शंकर के घर खुश देख कर वह भी खुश था. इधर पंडित जी के संसार में चहल पहल ज्यादा हो गयी थी. राजकुमार जी 7 बजे हे ससुराल से वापिस लौट आये थे क्योंकि एक रात और वह बिताना उन्हें भी ठीक नहीं लगा था.
"कहा था तू इतनी देर तक? पता नहीं के घर पे काम हो सकता है.", ये आवाज सुन्न कर अर्जुन के पाँव वही ठिठक गए थे. कौशल्या जी थोड़ा रूखे स्वर में उसका स्वागत करती हुई बोली. वो बहार आँगन में हे कड़ी थी जब अर्जुन अंदर आया तब. अर्जुन कुछ सोचने के बाद उनके गले जा लगा.
"दादी, कोई ऋचा और मधुलता जी आपके इस अर्जुन को आपसे अलग नहीं कर सकती. मैं आपका हु बेशक वह लोग बुरे नहीं और जो भी है मैं jaan-na नहीं चाहता लेकिन आज आप बहोत परेशां रही है. गुस्सा दादा जी पर निकाल रही थी लेकिन काम से काम ये तोह याद रखती की ये आपका घर है, हमारा घर. मैं सबको जानता हु बड़ी माँ और जिसका जो हक़ है वह आप हे दे सकती है, मैं बस उन्हें इज्जत दे सकता हुआ क्योंकि वही तोह आपने सिखाया है.", अर्जुन के इस बयान से जहा कुछ पल तक कौशल्या जी सकते में थी वही रामेश्वर जी ने अपनी धर्मपत्नी के कंधे पर हाथ रखते हुए दूसरे से अर्जुन का सर सेहला दिया.
"थानेदारनी, तुम जिसको नासमझ मानती हो न वह सचमुच वही औलाद है जिसके लिए तुमने शिवजी की उपासना की और अपना रामायण का पाठ एक दिन भी नहीं त्यागा. जब ये सबको समझता है तोह तुम संदेह क्यों करती हो? आज तोह इसने नाम भी ले दिया और कह भी दिया के हक़ सिर्फ तुम हे दे सकती हो. दिल देख रही हो अपने बेटे का? ऋचा चाहे तोह यहाँ जितना दिल करे रह सकती है अर्जुन, बाकी तुम खुद समझदार हो. ये तुम्हारी दादी के लफ्ज़ मैं कह रहा हु.", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर कौशल्या जी ने एक बार उन्हें देखा और फिर अर्जुन के चेहरे को पकड़ कर बोली.
"तू कितना कुछ दिल पर लिए फिरता है रे. तेरे बटुए में जो तेरी माँ है न बस वही रहेंगी, इस बगावत में तू अगर किसी का साथ देगा तोह फिर मैं यहाँ नहीं रहूंगी. और मैं जानती हु तू ऐसा नहीं करेगा. तू मेरे दिल को समझता है बीटा ये मैं जानती हु और सबूत खुद अभी दे दिया तुमने. मेरे बचे कभी वो मैट कर गुजरना जिसकी पीड़ा मैं सेह न सकू."
"दादी, जितने आपका अर्जुन आपकी छाँव में है, इतने इस घर में वही होगा जैसा आप कहेंगी. उसके बाद शायद मैं भी धुप बर्दाश्त न कर सकू.", एकाएक उसकी आँखों में 2 पानी की बुँदे उतर आयी.
"मेरे बचे तेरे साथ हमेशा मैं और तेरे दादा जी रहेंगे. मेरा बीटा कभी इन सायो से अलग नहीं होगा. बस माफ़ कर देना व्यवहार के लिए. तेरे सहारे लोग रास्ता ढून्ढ रहे है और तू भोला है, तेरे दादा ने थोड़ा भी मैल नहीं आने दिया न तुझमे."
"सही तोह किया बाउजी ने, मैल आ जाता तोह शायद मैं आपका ाचा बीटा नहीं होता. आपने जो सिखाया है वो हे मेरी सबसे बड़ी शिक्षा है बड़ी माँ. अपना परिवार एक घर है जिसकी नीव कभी नहीं बदल सकते, अस्तित्व नहीं रहता. फिर क्या मुकाम और क्या मंज़िल. गुस्सा हुआ करो लेकिन उतना जितना दादा जी को ाचा लगे, इन्होने तोह आज बप की दवा भी नहीं खायी होगी. देख लेना 4 गोली होंगी पत्ते में.", अर्जुन ने अब प्यार से दादी का गाल चूम कर फिर से अपने दादा को निशाने पर खड़ा कर दिया था.
"करने दे जरा इन्हे ऐसा. फिर कल जा के दकिहये ये घर से बहार. और तू चल के कपडे बदल ले, खाना खा के कमरे में आ जाना अगर फुर्सत हो तोह. और आप जरा अपनी दवा दिखा दो, फिर मैं बताती हु.", पल में हे तीनो अपने सामाजिक रूप में आ गए थे. एक बात तोह साफ़ थी की कौशल्या जी बेवजह हे शंकर से ज्यादा अर्जुन की सगी न थी. वो भी अपने इस बचे पर जान न्योछावर करती थी और अर्जुन उनके दिल को कही ज्यादा समझता था. बस बात सोचने वाली थी तोह अर्जुन का मधुलता और ऋचा का सच jaan-ne वाली, जो कोमल तक ने उसको न बताया था. अर्जुन यही से ऊपर चल दिया था और रामेश्वर जी बड़े स्नेह से अपनी धर्मपत्नी को देख रहे थे.
"तोह क्या जाना मेरी थानेदारनी ने आज?"
"यही की ये मेरा एकलौता है, असली एकलौता. काम बाकी तीनो भी न है लेकिन वह मेरे पेट से न हो के भी दिल को जानता है. चलो अब दवाई दिखाओ अपनी."
"सजा हे दे लो कौशल्या, सच कहु तोह तुम्हारे दर्द से मैंने आज दवा न खाई.", रामेश्वर जी ने इकबालिया जुर्म स्वीकार लिया था.
"तोह क्या हुआ जी, दिन में एक हे तोह खानी है. चलो आप भोजन करो फिर मैं दूध के साथ देती हु आपकी दवा. और मुझे तोह आपको सताने में सचमुच मजा आता है, बस कभी कभी पूर्णिमा को देख के आपके भाई की याद आ जाती है. हम ज्यादा खुश थे जब रघुबीर भाई साहब आपके साथ होते थे. आज अकेले हो आप.", दोनों अंदर चल दिए थे.
"रघुबीर आज भी तोह साथ है कौशल्या. देखा नहीं पूर्णिमा को, वह यहाँ आ कर कितना खुश होती है. भगवन मेरे भाई की आत्मा को सुखी रखे और परिवार को भी.", रामेश्वर जी ने कमरे में आते हे कपडे उठाते हुए स्टोर का रुख किया और कौशल्या जी पिछले आँगन में चली गयी खाने का बोलने.
ये रात भी हमेशा की तरह सुकून से गुजर रही थी. वही अर्जुन का सबके साथ हंसी मजाक, अलका का उसका साथ देना और बदले में Ritu-Tara का उन दोनों को चिड़ाना. आरती भी रुपाली की तरह इस सब में शामिल होने लगी थी. प्रियंका दीदी को तोह जैसे एक हे दिन में यहाँ की कमी महसूस हो गयी थी जो वह अर्जुन की बगल में बैठी बस उसकी हे प्लेट में साथ खाना खा रही थी. कोमल और माधुरी दीदी हमेशा की तरह सबको खाना परोस रही थी, ख़ुशी ख़ुशी. रसोई में ललिता जी का परिचित अंदाज समां बनाये था और रेखा जी सभी बचो को परोस रही थी. परिवार क्या होता है? कोई मंज़िल तोह नहीं, न कोई प्रयास. बस एक संसार जिसमे सब एक सामान और एक दूसरे के साथ हो. विन्नी ने आज यही जाना था, यही देख रही थी और अर्जुन ने जो निवाला उसको खुदसे खिलाया वह जैसे अनमोल हे था.
"ी रियली मिस्ड थिस लाइफ. चची सच कहु तोह आज मुझे लग रहा है के मैं न यहाँ पैदा होनी चाहिए थी."
"तू यही पैदा हुई थी विनीता, तुम्हारी हवेली में नहीं. राजेश्वरी ने इस मेहमान कमरे में तुझे पैदा किया था, डॉक्टर कांटा की मदद से.", ललिता जी मुँह पौंछती बहार चली आयी और विन्नी के सर पर हाथ फिरती हुई फिर रेखा जी को देखने लगी जो आरती को अपने हाथो से खाना खिला रही थी.
"सच ताई जी? ये तोह किसी ने बताया भी नहीं कभी."
"उमेद डर के मारे तेरी माँ को यही ले आया था रात को 9 बजे. क्योंकि राजेश्वरी के एकदम दर्द उठा था और तू समय से 2 हफ्ते पहले हे उस रात हो गयी. ये पिछले कमरे में भी बाद में बने है तेरे पैदा होने के.", ललिता जी ने जैसे सब बताया बाकी सब भी हैरान हो उठे विन्नी के साथ साथ.
"मतलब मैं इस घर की बेटी हुई? ये सब मेरे से वैसे हे छोटे है लेकिन अब तोह मेरा हक़ है इन पर हुकुम चलने का.", विन्नी ने जिस अदा से कहा उतनी अदा से सामने से जवाब आया.
"भूल भी मैट करना दीदी. नानी के घर मैं भी पैदा हुई हु. दहेज़ में आप सब आते हो मेरी माँ के.", तारा ने आँख मारते हुए कहा तोह सभी चेहरों पर हंसी आ गयी.
"यार कोमल, तुम सही थी. Ritu-Alka तोह मेरी समझ से बहार हे है लेकिन ये मिर्ची भी काम नहीं है. अपनी जोड़ी तोह अर्जुन के साथ हे ठीक है."
"इसके साथ तोह सपने में भी मैट बनाना.", अलका ने ये कह तोह दिया लेकिन हर तरफ से आती हंसी ने उसको झेंपने पर मजबूर कर दिया था. विन्नी को तोह कुछ समझ नहीं आया तोह वह बोल हे पड़ी. अर्जुन चुपचाप खाना ख़तम करके वह से गायब हे हो गया था.
"ये क्या मतलब हुआ? अर्जुन मेरे जैसा हे तोह है."
"बिलकुल अपोजिट है दीदी. बाकी आपकी मर्जी.", ऋतू ने वैसे हे कहा था, जिस से किसी को ज्यादा कुछ न कहना पड़े. खाना सबने खा लिया था यहाँ और फिर बात आयी सोने पर.
"मैं तोह बड़ी माँ के साथ सोने वाली हु.", आरती ने सबसे पहले हे घोसित कर दिया.
"मैं और प्रियंका.", माधुरी दीदी ने भी बता दिया.
"विन्नी दीदी, आपको हमारे साथ मैनेज करना है या अकेले सोना है? मैं अलका और तारा एक साथ हे सोने वाली है और कोमल दीदी के साथ रुपाली. आप चाहे तोह हम तीनो में से किसी के साथ सो सकती है और अगर दिल करे तोह कोमल दीदी और रुपाली के साथ.", ऋतू ने सभी बरतन समेटने के साथ हे बता दिया.
"यार मेरी प्रॉब्लम है के मैं अकेले सोती हु. िफ़ यू don't मंद. तोह चाहे एक वाला कमरा मैट मैं मैनेज कर लुंगी लेकिन अकेले सोना है. ी don't फील कम्फर्टेबले, सॉरी. शुरू से आदत है."
"तोह आप इसके ऊपर वाले कमरे में सो जाना. मेरा हे है और एक भी लगा है. सबसे बड़ा कमरा है विथ टेलीविज़न.", तारा ने परेशानी हल करते हुए कहा और विन्नी को भी पता था के कोनसा कमरा है.
"फाइन तो में. वैसे चाचा जी नहीं आ रहे क्या?"
"नहीं, वह कल हे आएंगे, काम है न शादी का.", कोमल दीदी ने जब बताया तोह विन्नी ने हाँ में सर हिलाया. इधर सभी उठ कर बातचीत में मशगूल हो गयी ऊपर वाले कमरों में और अर्जुन अपने दादा दादी के पाँव की मालिश कर रहा था. रसोई में बर्तन प्रियंका दीदी के साथ कोमल दीदी और ललिता जी धो रही थी, गेट पर टाला पहले हे लग चूका था और देखते हे देखते 11 बजे तक पूरा घर हमेशा की तरह शांत हो गया. विन्नी Alka-Ritu के कमरे से अलका के हे रात के कपडे ले कर इधर तारा वाले कमरे में चली आयी. दरवाजा अंदर से बंद करते हुए विन्नी ने एक चालू किया और बेधड़क सी बाथरूम में चली गयी.
लघुशंका के साथ हे तंग ब्रा की परेशानी से निजात पाने के किये इस एकांत में अपनी जीन्स, टीशर्ट और ब्रा उतार कर वह सिर्फ हलके बैंगनी रंग की पंतय में एक तरफ कोड की तरफ बढ़ी और कुछ सोच कर आईने में खुद को देखने लगी. वह हलकी बैंगनी पंतय भी उतार कर विन्नी आईने में खुद को निहार रही थी. फक्क गोरी और कपडे के अंदर वह बहार से बिलकुल अलग, मांसल बड़े चुचो के साथ पतली कमर और baal-vihin. सचमुच विन्नी का जिस्म बिना कपडे को ऐसा था जो यकीन नहीं दिलाता था के कपड़ो के पीछे वह इतनी गदराई, लम्बी और छरहरी होगी. कोड पर बैठती वह अपने में हे खोयी थी. बस यही वह अनहोनी हो गयी जो बहुत कुछ बदलने वाली थी. ये कैसा अंजाम था, कैसा मुकाम?
