जारी
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अर्जुन आचार्य जी का दिया हुआ हेलमेट पहने अपनी रानी पर सवार इस 30-35 मिनट के सफर को कुछ 10 मिनट पहले हे पूरा करता गाँव से मुड़ने वाले रस्ते पर आ पंहुचा. 11 बज कर 10 मिनट हो चुके थे और एक तरफ जाते इस अलग रस्ते को नजर करने के बाद वह इस पुराणी हवेली की तरफ हे हो लिए. ज्यादा लोग कही दिखाई न दिए थे और ये वक़्त भी ऐसा था के gaanv-dehat में धुप चढ़ने पर log-baag घरो में या khet-khalihaan की छायादार जगह में आराम करते है. बहार से देखने पर ये वाली हवेली अंदर वाली से बड़ी और शानदार थी. बस rakh-rakhaav और उम्र ज्यादा होने से समय की मार साफ़ झलक रही थी. सामने हे बरगद के विशाल वृक्ष के नीचे चबूतरा जर्जर हालत में था जो शायद कभी आबाद रहा होगा.
'अंदर हे करता हु अपनी रानी को. यहाँ नजर पड़ सकती है किसी की भी.', अर्जुन ने उस बड़े लोहे के दरवाजे को धकेला तोह वह आराम से खुल गया. मोटरसाइकिल के तरफ खड़ा करता वह वापिस दरवाजा बंद करके इस खामोश से विशाल ढाँचे को देखने लगा. अंदर से ये उतना भी जर्जर या टूटा फूटा न था. हवेली का प्रवेश का हिस्सा कोई आधा एकड़ का समतल मैदान था. 4 कुर्सियां, एक लकड़ी की पुराणी मेज एक तरफ नीम के नीचे लगी थी. तजा सफाई के बाद koode-karkat का ढेर कोने में किआ गया था जहा पानी की व्यवस्था भी थी.
'यहाँ काम चल रहा है तोह बबिता ने इधर क्यों बुलाया?', वह देख रहा था के इस निचली मंजिल पर तजा हे साफ़ सफाई हुई थी. गिलयारे के आगे 4 दरवाजे बता रहे थे के वह कमरों और हॉल में जाने के लिए है और बहार से हे पक्की सीढिया ऊपरी मंजिल तक जाती थी. एक तरफ से चौड़ी गली हवेली के पीछे वाले भाग में जाने का रास्ता दिखा रही थी.
"देख लिए हो तोह चाय में आ सकते हो.", गलियारे में हवेली की चाय था जिधर काले रंग की कासी हुई कुर्ती और सफ़ेद ढीली पजामी पहने दिवार पर हाथ रखे बबिता जाने कबसे अर्जुन को देख रही थी. गले में सफ़ेद दुपट्टा ऐसे लिया हुआ था के सीना ढकने की नाकाम कोशिश हो, अकार जरुरत से ज्यादा बड़ा जो था.
"सोच रहा था के कतल की जगह बड़ी ाची चुनी है आपने. कितनी ख़ामोशी और सुकून है यहाँ. आज हे खुलवाया है क्या इस हवेली को?", अर्जुन अभी भी इधर उधर देखता हुआ बबिता की तरफ जा रहा था. ऐसी जगह वीरान ाची नहीं लग रही थी.
"बस एक यही जगह है जहा कभी कतल नहीं हुए. शादी के बाद मैं यही रहने वाली हु.", बबिता आज बागड़ी हरियाणवी की जगह साफ़ हिंदी बोल रही थी, dhara-pravah.
"ाचा फैंसला किआ आपने. मैं यही देख रहा था के इतनी खूबसूरत जगह वीरान नहीं होनी चाहिए. कितने सालो से बंद है ये?", बबिता के बराबर आ रुका तोह वह उसके साथ धीमे कदमो से आगे चलने लगी. ये रास्ता भी शायद कभी बगीचे जैसा था, सूखी मोटी बैले अभी तक दिवार से लगी थी.
"बंद नहीं है, बस जरुरत पड़ने पर हे कोई इधर आता जाता है. वैसे ये हवेली मेरे pad-nana की थी और उस से पहले उनके पिता जी की. फिर नाना ने ये मेरे नाम कर दी थी और उनका परिवार अभी जहा है वह चला गया. माँ आती रहती थी कभी कभी और मैं तोह जब भी अकेली होती तोह समय बिताने यही आ जाती हु.", बबिता लड़की होकर भी चलते हुए अर्जुन सामान हे लम्बी दिखती थी, शायद वह 2 इंच ऊँची काली सैंडिल की वजह से. जिस्म कही से भी साधारण न था.
"यहाँ कच्चे कमरे है और ये झूला, शायद बरसो से कोई बचा नहीं आया इधर.", अर्जुन ने उन 2 कमरों को देखने के बाद इधर एक और नीम के पेड़ की दाल पर मोटी रस्सी और लकड़ी की फटती से बना झूला देखते पुछा. वृक्ष का घेरा कही ज्यादा हे मोटा था, जैसे इसने पूरी सदी देखि हो.
"कमरे यहाँ काम करने वालो के थे और ये झूला माँ का है, होगा कोई 40-45 साल पुराण, वैसे हे बंधा पड़ा है. इधर आओ कुछ दिखती हु.", बबिता अर्जुन को लेकर हवेली की मुख्या ईमारत में इस पिछले दरवाजे को खोलती हुई दाखिल हुई तोह अर्जुन भी पीछे पीछे आ गया. शायद 2 कमरों को जोड़ कर ये कमरा तैयार किआ होगा. छत्त पर 4 ताडियो वाला पंखा नया था, दीवारे भी साफ़ उजली हुई सफ़ेद और ऊंचाई 12-13 फ़ीट. एक तरफ ये कही ज्यादा हे बड़ा बीएड जिसके दोनों तरफ ख़ास लकड़ी के काले चौकोर टेबल जिन पर पुराने लेकिन साफ़ लैंप रखे थे. दीवारों पर 2 हिरणो के मुँह टंगे थे, लम्बे सींग वाले. जैसे किसी महाराजा का कमरा हो. बंद हवेली में इतना साफ़ कमरा और तजा बिस्टेर उम्मीद से परे था.
"ये कमरा था बड़े नाना जी का और बाद में इधर वाला कमरा भी इसमें मिला दिए क्योंकि पहले हे 16 कमरे है इधर. उस ज़माने में बाथरूम इतने बड़े थे जितने आजकल शहर वाले घरो में कमरे होते है.", बबिता ने वह चौड़ा दरवाजा खोला और अर्जुन भी देखते हुए अंदर आ गया. सचमुच ये विशाल हे था जिसमे शायद कुछ मरम्मत और रंग कुछ समय पहले हे किआ गया था. पीतल का बड़ा नहाने का टब, धातु का फुजहरा जिसके पीछे लम्बी पाइप लगी थी और बाथरूम को 2 हिस्सों में विभाजित करता पर्दा जो पाइप में लगा था. बबिता अर्जुन को देख रही थी जो बाकी सबकुछ देख रहा था उसको छोड़ कर.
"तुम्हे मैंने यहाँ क्यों बुलाया जानते हो?", बबिता को 2 फ़ीट की दुरी पर थी अर्जुन से और उसके चेहरे पर हलकी गंभीरता का पट था अपनी बात कहते हुए.
"सिर्फ हवेली दिखने तोह नहीं बुलाया है आपने लेकिन ये मुझे पसंद आई. वैसे बताये क्या जरुरी बात करनी थी आपको?", अर्जुन बाथरूम से बहार आया तोह बबिता भी चुन्नी का एक कोना अपनी ऊँगली में घूमती हुई थोड़ी बेचैन सी उसके साथ वापिस कमरे में आ गयी.
"मुझे औरत bann-na है वह भी तुम्हारे साथ अपना पहला संसर्ग करके. 32 की हो चुकी हु मैं फरवरी महीने में लेकिन आज तक वही कोरी लड़की हु जो 16 की उम्र में थी फिर 21 की और आज 32 भी ख़तम हो चुके है.", बबिता ने यहाँ बुलाया था तोह बात ख़ास हे होगी ये अर्जुन जानता था लेकिन ये होगी ऐसी कल्पना भी न की थी.
"आपको पता है आप क्या कह रही है?"
"शायद तुम्हारी नजर में मैं बेशरम कहलाउंगी अपनी इत्छा जाहिर करने के बाद. लेकिन जो तुमने सुना वही सच है. मेरी शादी भी है हफ्ते बाद और मैं तब भी औरत बन्न सकती हु लेकिन मुझसे बचपन से आकर्षित होने वाला मेरा भाई जो मुझे पाने के लिए तुम्हारी बलि तक देने के लिए तैयार हो गया था उसको दरकिनार करके तुम्हे chunn-ne की एक बहोत बड़ी वजह है मेरे ऐसा करने की.", बिजेन्दर का सच तोह अर्जुन को गोलू ने हे बता दिए था लेकिन बबिता की बात जैसे कुछ रहस्य छुपाये बैठी थी.
"यहाँ सिर्फ हम दोनों हे है तोह बेशर्मी कहा हुई? अभी तक जो तहजीब और ाचे मेजबान की तरह बातें कर रही है वह आपको एक संजीदा इंसान ज्यादा कहता है. आप बताये क्या वजह है ऐसा करने की?"
"वजह कई है तुम्हे मैं इतना हे कहूँगी की बात ऐसी है के मैं मेरे परिवार को वापिस वैसा हे देखना चाहती थी जैसा वह पहले था. जिस इंसान की वजह से वह अपने ससुराल जाए मैं उसको हे अपना पहला मर्द मानूंगी, बेशक फिर चाहे एक हे बार के लिए क्यों न बने. तुमने तोह वैसे भी मेरे भाई के साथ लगी शर्त जीत कर मुझे हांसिल कर लिए है लेकिन मैं अभी भी पहली बात पर रहूंगी. जो इंसान इतना बदलाव कर सकता है वही मेरे में ये कुदरत का जरुरी बदलाव लाएगा. लड़की से औरत बनाने वाला महत्वपूर्ण बदलाव. किस्मत भी देखो, तुम्हे लगता है कोई साधारण इंसान मुझे संभल सकता है?", बबिता ने दुपट्टा एक तरफ रखते हुए बिस्टेर पर बैठ कर कहा.
"नहीं. लेकिन आप फिर भी एक बेहतरीन युवती हो. वैसे अगर ये काम मेरे पापा करते तब भी आप उनके साथ ऐसा करती?", अर्जुन का सवाल सुन्न कर बबिता के चेहरे पे एक अलग हे हंसी आ गयी.
"हाहाहा.. शंकर काका और परिवर्तन? दया या बचाव? नामुमकिन है अर्जुन. वह बेशक मेरी माँ को हाथ न लगाए लेकिन गलती से बिजेन्दर उनसे भिड़ा तोह उसके शरीर कोई कोई हिस्सा सलामत नहीं मिलेगा. बिजेन्दर ऐसा करता भी नहीं, जो बात पीढ़ी मतलब जनरेशन के बीच होती है उसमे बचे आवाज बुलंद नहीं करते, अगर वह समझदार हो और बिजेन्दर, सुदर्शन, ऋचा, संजीव, कोमल, अक्षरा या मैं हे क्यों नहीं, हमने ऐसा कोई कदम नहीं लिए. तुमने लिए क्योंकि जान बचने गए थे, शबनम ने लिए वह गायब हो गयी. मेरी बात का जवाब दो अब? इतिहास काम का नहीं है. क्या कहते हो, मेरी इत्छा और मांग समझ लो या कुछ भी लेकिन पूरी करोगे?"
"इसके गंभीर परिणाम हो सकते है. और अगर ये एक बार से आगे बढ़ा तब?", अर्जुन भी अब एक तरफ बैठ गया था.
"माँ- बिजेन्दर कुछ नहीं कह सकते. उन्हें पता है के मैं कौन हु और तुम्हारे साथ मैं ये कर सकती हु. इसके सिवा तोह तुम्हे किसी से डरना नहीं चाहिए."
"इस जगह को चुन ने की ख़ास वजह?"
"अर्जुन, ये मेरा घर है जहा मैं रहने वाली हु. ये कमरा इस याद को संजोये रखेगा, अगर तुम सबकुछ दिल से और प्यार से करोगे तोह. और मैं जानती हु तुम निराश नहीं करोगे.", बबिता इतनी संजीदा युवती हो सकती है ये उसके साथ रहने वाले भी शायद न जान पाए हो लेकिन आज वह अपनी हमेशा की छवि को जैसे कही बंद करके यहाँ इस नए रूप में थी.
"पता है मुझे अंजाम की परवाह बहोत कम् होती है. आपके साथ बस मैं सुशीला बुआ को ठेस नहीं पहुंचना चाहता. लेकिन जब सामने से आप हे यही चाहती है के मैं हे आपका प्रथम पुरुष बनु तोह अर्जुन भी वादा करता है के आपको दुःख नहीं होने दूंगा.", अर्जुन ने इस बड़े कमरे में आती रौशनी को बंद करते हुए इन 3 बड़ी खिड़कियों को परदे से धक् दिए. कमरे में जहा थोड़ी देर पहले आधे हिस्से में भरपूर रौशनी थी अब गहरे रंग के पर्दो ने वह सोखते हुए एक हल्का अंधकार कर दिए था.
"यहाँ वैसे भी कोई नहीं है तोह इसकी जरुरत?", बबिता शांत चेहरे से बस अर्जुन को उस आखिरी खिड़की के पास खड़ा देख रही थी. थोड़े से उजले हिस्से के सामने खड़ा वह खुद रौशनी सा दिख रहा था. बबिता जांघ पर कोहनी रखे बस एकटक उसको देख रही थी, हथेली ठुड्डी के निचे टिकाये.
"ऐसा करने से आपको सहज लगेगा और मैं भी शायद पूरा प्यार दे पाव. सेक्स नहीं करने वाले हम.", अर्जुन के इतना कहते हे बबिता कड़ी हो गयी. वह क्या बोल रहा है ये सुन्न कर जैसे उसको बुरा लगा था. अर्जुन वह आखिरी रौशनी भी ढलने के बाद अपने समकक्ष कद की बबिता के बिलकुल सामने आ खड़ा हुआ.
"सेक्स नहीं करना तोह ये सब क्या था जो कह रहे थे और कमरे को ऐसा बना दिए?", ठंडी आवाज में गुस्सा नहीं बस तड़प सी थी जैसे अर्जुन ने ना बोल दिए हो.
"2 मिनट वाला हवस का मिलान आपको मेरी ाची याद तोह नहीं दिलाने वाला. आप कहती हो न के कोई साधारण इंसान आपको संभल नहीं सकता, मैं भी वैसा हे मिलान चाहता हु जो कभी आपको साधारण न लगे. ख़ास हो तोह आपके साथ मेरा संसर्ग भी ख़ास होना चाहिए.", अर्जुन ने वह गोरी गोल कलाई पकड़ कर हाथ को चूम लिए. पहली बार बबिता की नजरे शर्म से झुकी थी उसकी बात पूरी समझते हुए. वह पलट गयी थी जाने कैसे लेकिन अर्जुन की पहली चुहान ने अंदर नया एहसास अभी से दिला दिए था.
"मेरी दादी कहती है के मैं गलती नहीं करती, बेशक काम फैंसले किये है आजतक.", बबिता की कलाई अभी भी अर्जुन के हाथ में थी और अब वह दूसरी कलाई भी पकड़ कर दोनों हाथो को बबिता के पेट के सामने ले आया. इस तरह अर्जुन अब उसके पिछले हिस्से से पूरी तरह सत्ता हुआ था. काली कमीज से भी गोरी गर्दन और आधे कंधे नुमाया थे जहा ठोस गोश्त इस शरीर के भराव का वर्णन कर रहा था. बबिता की धड़कन तेज हो चली जैसे हे अर्जुन के तपते होंठो ने वह गोरा नरम कन्धा चूम लिए. खुद हे बबिता ने उसके हाथो को मजबूती से पकड़ कर अपने पेट पर दबा लिए. आँखें बंद करती वह गर्दन अर्जुन की तरफ करने लगी थी.
"ज़िन्दगी में पहली बार पुरुष का स्पर्श दिल तक महसूस हुआ है. सच कहती है मेरी सहेली की ये शब्दों में नहीं कह सकते. ाः..", बबिता को अब अर्जुन के हाथ पेट सहलाते लगे तोह झनझनाहट सी होने लगी हर तरफ. बड़े कूल्हों के बीच अर्जुन का धीरे धीरे तनाव लेता लिंग एक और मजा दे रहा था.
"आपको पता है आप जब वह होती हो जैसा पहली बार देखा था तब ज्यादा ख़ास लगती हो. यहाँ हम दोनों है तोह वैसी रहो न. और थोड़ी देर पहले इतना खुल कर बोल रही थी मिलान के लिए अब शरीर कांप रहा है."
"बेशरम करना चाहता है मुझे.?", बबिता ने गर्दन पीछे टिकाये हुए आँखें बंद रखे हे कहा. अर्जुन ने वह दूध सा गोरा नरम गाल चूमते हुए दोनों हाथ उन पर्वतो के निचले हिस्से पर टिका दिए.
"उसको बेशरम होना नहीं कहते, साथ देना ज्यादा ठीक लगता है. वैसे मैं भी महसूस कर रहा हु के आप खुल कर साथ देने लगी तोह भारी न पड़ जाओ.", अर्जुन को आभास हो गया था उन बड़े तरबूजों का जो बबिता कितने आराम से सीने पे लिए रहती थी. रेशमी कपडे के ऊपर फिसलता हाथ उनकी निचली गोलाई सेहला रहा था.
"आठ.. बात ऐसी है के आज तेरी बारी और अगर दिल में अरमान कभी भूले से पैदा हुए इस बबिता के लिए तोह दूसरी बारी मेरी. साथ दूंगी तेरा लेकिन करेगा सबकुछ तू आज. आह्हः.. शहर में हु मैं अभी तोह 5 बजे तक 5 घंटे में जितना खोलना खोल ले. आह्हः.. चेहरा छोड़ के जहा मर्जी स्टाम्प लगा मैंने कोई परहेज न.", वह तगड़ा शरीर नरम और गद्देदार सा अर्जुन की मजबूत पकड़ में धंस रहा था. लेकिन वक़्त था यहाँ बबिता को युवती वाला एहसास करने का और अर्जुन के लिए जैसे मुश्किल न था. पल में हे वह सीने से उसके सामने घूम चुकी थी.
"कोशिश करता हु लेकिन ऐसे में बात नहीं हो पायेगी.", विशाल नितम्बो का गोश्त दबा कर अर्जुन ने दोनों की कमर सताते हुए पहला मुखस्पर्श किआ. वह नरम लरजते होंठ माखन से फिसल कर अर्जुन के मुँह में भर गए. खड़े हुए हे दोनों इस चुम्बन का मजा लेने लगे. बबिता के लिए तोह सब नया था, जीवन का पहला चुम्बन और वह भी इतना कामुक जहा उसके भरी पिछवाड़े को अर्जुन प्यार से मसलता हुए अपने लिंग की सख्ती जांघो के बीच करवा रहा था. बबिता की सांस उखाड़ने लगी तोह अर्जुन ने होंठ गर्दन से निचे खुले सीने पर लगा दिए
"आह.. बावला करे है तेरा हाथ लगाना. पप्पी का पता था यु किश करना तोह जानलेवा है अर्जुन. आठ.. आराम से मसल, मेरा भाई पहलवान है मैं कोणी.. आअह्ह्ह.. अरे के करे है.. आह्हः..", अर्जुन ने कूल्हों के निचे से उन भारी जांघो को बाँहों में लेते हुए बबिता को ऊपर हे उठा लिए था. बड़े पहले हुए गुब्बारों को कमीज के ऊपर से हे चूमता वह बता रहा था के बबिता भी एक लड़की है और मर्द कैसा भी हो अपनी औरत को उठा हे लेता है.
"आपको एहसास करवा रहा हु और कुछ नहीं.", अर्जुन ने जैसे हे बबिता को फर्श पर खड़ा किआ वह धम्म से बिस्टेर पर जा लेती, पाँव निचे टिकाये. नशीली आँखें और लम्बी साँसे लेती वह अर्जुन को निहार रही थी जो अपनी टीशर्ट उतार कर एक तरफ रखते हुए अब वैसे हे उसके ऊपर आ गया. एक कोहनी बबिता के सीने के बराबर बिस्टेर पर रक्त वह फिर से उन गीले होंठ का रस निचोड़ने लगा. फैले पाँव के बीच अर्जुन का मोटा तगड़ा लिंग बबिता के खजाने को जांच रहा था.
"ससससष्ठ.. आठ.. अर्जुन तू घाना तगड़ा है रे.. आठ.. आग लग ऋ सारे बदन में.", सीने पर सचमुच पसीना उभर आया तोह अर्जुन ने उस लाल चेहरे को अपने निचे बिस्टेर पर देखने के बाद सीना होंठो से साफ़ कर दिए. वह नमकीन पसीना कोई घिन्न नहीं दे रहा था और बबिता को पेट से नीच तक बिजली सी जाती महसूस हुई.
"आग बस वह एहसास है जो बहोत पहले हर युवती को हो जाता है लेकिन आप आज महसूस कर रही थी. वैसे कैसे संभालती है इतने बड़े खजाने को?", अर्जुन ने उन दोनों पर्वतो पर हाथ रखे तोह कसाव भरपूर लगा. बड़े थे बेडोल नहीं. बबिता भी सख्त हाथो का वह लग्न देख मचलने लगी. हर सांस के साथ दोनों फुटबॉल से चुके ऊपर निचे थिरक रहे थे. कमीज के सिरे को ऊपर करने की कोशिश बिना बबिता के साथ दिए असफल होने लगी.
"संभालना जरुरी था रे. ले कर ले उघड़ा (निर्वस्त्र).", बबिता ने कमर के ऊपर का हिस्सा उठाते हुए साथ दिए और अर्जुन कमीज हटते हे बस देखता रह गया. बबिता के गाल सेब से लाल हो चले थे अर्जुन की हालत देख. मर्द की आँखें क्या असर करती है ये बखूबी पता चल गया था.
"असली है?", अर्जुन का कंठ सूख गया क्योंकि इतने बड़े होंगे ये आभास कपड़ो के ऊपर से न था. बड़े जरूर थे लेकिन अकाल्पनिक से वह सचमुच 5-5 किलो के तरबूज से फक्क गोर चुके सफ़ेद ब्रा में बस जैसे तैसे आधे छुपे थे.
"ब्रा न मिलती इनके माप की लेकिन सचमुच कष्ट बहोत दिए रे इन्होने. आह्हः.. आराम से जालिम, बोब्बे है रबर कोणी. आठ.. तू सरे बटन दबावेगा तोह फिल्म कद शुरू होवेगी?", अर्जुन तोह उनका नुमाया हिस्सा सहलाते हे होश खो बैठा था. चुचो में कम्पन्न होती बता रही थी की इनका बोझ कही ज्यादा हे है. ब्रा के किनारे आते आते हथेली ने जोर लगा हे दिए.
"ये कमाल के है.", छोटा सा चूचक फुदक के बहार निकलते हे अर्जुन ने होंठो से लपक लिए.
"सीईईई.. आठ माँ.. के करके मानेगा रे.. आह्ह्ह्ह.. आराम से खा.. पहली बार चुसवा ऋ हु प्रैक्टिस कोणी.. माँ..", इधर अर्जुन उन बड़े दूध सी रंगत के गोलों को एक तरफ से मसलता और दूसरी तरफ निप्पल को होंठो में दबाता पीने लगा. सलवार के सामने कमीज न थी और लुंड उस पहले हुए नरम मांस को बुरी तरह रगड़ रहा था. बबिता का सर मस्ती और अलग से मीठे दर्द में इधर उधर हिलता उसकी आग भड़काने लगा.
"आप न हर तरफ से खाने के लिए हे बानी हो. सचमुच कितनी नरम और मीठी हो, मैं शायद जल्दबाजी कर दू.", अर्जुन ने दूसरी तरफ से भी ब्रा का कप निचे खिसका दिए था.
"तेरे से ज्यादा जल्दी मैंने हो ऋ है. आठ.. बेरा न के कर दिए जो शरीर सुन्न पड़े है. जोर जहा दिखाना वह दिखा, इनका स्वाद लेता रहिओ.. आठ.. तू बहरा से के.. दर्द hove..aaahh.. मा.. कर ले जो करे है.. मेरी छूट गीली हो गई.", बबिता ने शर्म लिहाज दूर फेंकते हुए आँखे मूँद कर छूट पर हाथ रख लिए. अर्जुन अब दूसरे बोब्बे को जितना मुमकिन था उतना मुँह में लेने लगा. कमरे में अब कही बबिता की निरंतर सिसकिया गूँज रही थी. 2 भरी और तगड़े शरीर किसी आम बिस्टेर को टॉड कर रख देते. जीन्स में क़ैद लुंड बेशक सर उठाये छूट के पास लग रहा था लेकिन उत्तेजना के साथ वह भी दुखने लगा.
"आप सलवार उतरो बस.", अर्जुन जैसे नशे में पहुंच गया था और फर्श पे खड़े होते हे उसकी जीन्स और कच्चा दोनों हे जिस्म से जुड़ा हो गए. वह गेंहुआ 9 इंची अंग ठुमक रहा था, भयंकर रूप लिए. बबिता बेसुध सी अभी तक सलवार के ऊपर से छूट मसलती दूसरे हाथ से एक चुके को सेहला रही थी. अर्जुन ने खुद हे आगे बढ़ते हुए गोल नाभि पर होंठ लगा दिए. सलवार का नाडा ढीला करके बबिता के यौवन को उजागर किआ तोह यहाँ भी चुचो जैसी विलक्षणता थी. चीरा लमबी लिए दोनों बेदाग़ मोटी जाएंगे के बीच बस लकीर सा था और फुलावट लिए. पारदर्शी रस उस दरार के किनारे फैला अर्जुन को अपनी तरफ खींच रहा था.
"कहु थी के तू करियो जो करना है. अब देर न कर अर्जुन आह्ह्ह्ह.. यु गन्दी se..aaahhhhh.. जानवर.. माँ आह्ह्ह्ह.", बात अधूरी हे रह गयी जब अर्जुन ने अपना मुँह उस फूले हुए मांस और रसभरी छूट पर भिड़ा दिए. ाचा खासा मांस अर्जुन के मुँह में आने लगा था और उसके बड़े पंजो के बीच ब्रा से बहार झूलते खरबूजे मसले जाने लगे. बबिता ने छूट के अंदर जाट वह गीली जीभ महसूस करते हे पानी छोड़ दिए.
"मर्डर गयी रे जालिम.. बहनचोद.. कुत्ता भी न करता यु काम.. छूट है चासनी कोणी.. आह्हः.. मजा तोह आवे है.. माँ.. मार दिए इस खागड ने.. ", छूट के छेद तक जाने में हे आधी जीभ लकीर में उतर गयी थी. सब साफ़ करते हुए अर्जुन ने अपना चेहरा बबिता के ऊपर झुकाया तोह शर्म से उसने गर्दन एक तरफ कर दी.
"की.. के कार्य यो गंदे आदमी? छूट कोण चूसे करे है?"
"कहा था न आपका हर हिस्सा खाने लायक है. कसम से आपकी छूट के पास पहुंचने में हे इतना सफर करना पड़ा जो सोच नहीं सकता था. बड़ी मीठी हो आप.", अर्जुन के इतना प्यार दिखने पर बबिता ने बड़ी बड़ी आँखे उसके चेहरे की तरफ करते अपने होंठो को उसके सामने कर दिए.
"जड़ तन्ने मेरा सब पसंद तोह फिर मैं भी तेरी और ेब कोई नखरा न करती. देखु जरा अगला सफर तू किस तरिया करे है... उम्म्म्म..", अपनी हे छूट का वह अलग सा स्वाद पहले बकबका सा लगा लेकिन बबिता अर्जुन के होंठो को चूसती रही. निप्पल फूल कर अपनी अकड़ अर्जुन के सीने पर बता रहे थे और नंगी छूट के बाहरी मलमल से हिस्से पर कठोर सूपड़ा अर्जुन की बेचैनी भी जाहिर कर रहा था.
"दिल नहीं भर रहा आपके किसी हिस्से को छोड़ने का. कितनी नरम हो aap..aahh.", बबिता ने उसकी बात पूरी होने से पहले हे अपनी नरम उंगलियों से वह खूंटा अपनी जामे के ऊपर टिका दिए.
"घाना हे बड़ा औजार है तेरा. देख के ठोकिये खसम.. फेर काट लिए बोब्बे mere..aa रे किलकि (चीख) लिकद्वान में ज्यादा मजा आवे है के.. आअह्ह्ह.. भोत मोटा है यु.", लुंड को थोड़ा हे दबा पाई थी अपनी नरम गुदगुदी छूट के बहार और अर्जुन ने हल्का सा अंदर दबा दिए. आधा सूपड़ा धंसने के बाद कही छूट के छेड़ पर लगा था.
"आप कोनसा छोटी सी हो. मोमबत्ती से तोह आपको फरक नहीं पड़ने वाला था.. आअह्ह्ह.. आग उगल रही हो निचे से.", अर्जुन ने मदहोश होते हुए ाचे से बबिता की दोनों बाहो के निचे हाथ रखते हुए जकड लिए था. अभी तक पाँव निचे लटके थे लेकिन बबिता का जिस्म भरवा और हर चोट झेलने के मुताबिक था. चुचो का मर्दन करते हुए अर्जुन ने कमर का जोर भरपूर लगा दिए था इस धक्के के साथ.
"आअह्ह्ह्ह.. महानस.. फाड़ दी रे मेरी छुट्ट्ट्ट.... खसम... तेरा लुंड सत्यानाशी hai..maar दिए रिइइइइ... आइइइइइइइ.. दत्त जा (रुक ja)..aahhhh..", लिजलिजे हिस्से से आगे छूट का मुँह फाड़ता अर्जुन का मोटा सूपड़ा सब परत फाड़ता आधा अंदर जा धंसा. बबिता बस होंठ हे छुड़ा पाई थी, शरीर जैसे जंजीर से बाँध कर ताले में बंद था अर्जुन की मजबूत पकड़ में.
"हो गया बस जो होना था.. आह्हः.. बहार से तोह इतनी नरम हो.. आह्हः.. कितनी टाइट छूट है आपकी.. aahh..ummmm", अर्जुन फिर से उन होंठो को चूसने लगा, भरी चुके तोह अब खुद चीख रहे थे के दर्द खराम करने के लिए चाहे उन्हें मसल डालो.
"खसम (पति) मोटी हु छूट तोह सबकी एक सी होव है.. आह्हः.. ेब चूस मेरे बोब्बे.. फाड़ के रख दी बेरा न चाल भी सकुंगी के आड़े रात काटनी padegi..maa गलती हो गयी.. आह्हः. पी ले रे इन्हने.. किम्मे दर्द काम होव है.", अभी तक अर्जुन ने उसके भरी कूल्हों को निर्वस्त्र नहीं थमा था. एक बोब्बे को मुँह में लिए उसने बबिता की टांग ऊपर उठाई तोह लुंड थोड़ा और अंदर धंस गया.
"माँ छोड़ ले मेरी मैंने बक्श de..aahh.. के सर्कस करे है अर्जुन. मैं कहु हु रुक जा और तू यो सत्ता (मूसल) और धक्के है छूट के भीतर."
"सॉरी. आपके पाँव ऊपर कर रहा था. अब नहीं करता."
"नाराज न हो मेरी जान. छूट का दर्द ज्यादा से, मैंने पीछे खिसका दे आराम से फेर उठा लिए मेरी सांतल (जांघ).", अर्जुन ने भी प्यार से होंठ चूम कर बात मान ली. बबिता के वजनी शरीर को बड़े एहतियात से पीछे बिस्टेर पर करते हुए वह पूरी तरह ऊपर ले आया. आधा लुंड अभी भी उस नरम मांस के अंदर फंसा हुआ था जहा से इतनी देर बाद खून बहार निकलने लगा था.
"बबिता जी, आपके ये भी काम नहीं है.", एक हाथ नरम कूल्हे के निचे गया तोह अर्जुन ने हलके से थोड़ा लुंड बहार निकल कर अंदर कर दिए.
"सीई.. आह्हः.. आज आगे हे कर ले मेरी जान, पिछवाड़े की तारीफ बहोत है कुछ करियो न.. आठ.. तेरा लुंड कोई कबूतरी ले किस तरिअ सके है? आह्हः.. ेब पूरा घायल दे, रओं दिए जे मैं रौ तोह.", बबिता अब वक़्त न जाया करते हुए अर्जुन के साथ मिलान आगे ले जाना चाहती थी और निप्पल मसलते हुए अर्जुन ने भी बात ख़तम होते हे पूरा लुंड जड़ तक अंदर ठूस दिए.
"माआआआ...", बबिता चीख रोकने के लिए अर्जुन के कंधे पर दांत गदति तडफने लगी. लम्बे कद्द के बावजूद अर्जुन का लुंड गर्भ चूम कर थोड़ा पीछे आ गया था. अंदर जैसे वह सुरंग आज जा कर पूरी हुई थी. अर्जुन भी कसमसा गया था नरम मांस के बीच सख्ती से फंसे लुंड की हालत से.
"आअह्ह्ह.. बबिता जी, कही और दांत गदा लो, यहाँ नहीं.", कंधे के मांस में 4 दांत गाड़ने से बबिता को भी मुँह में खून का स्वाद पता लगा. तुरंत हे वह सर हटती अपना दर्द भूल कर अर्जुन को देखने लगी. चेहरे पर बस म्हणत का पसीना था लेकिन कंधे पर लगे 4 कट से हल्का खून रिस रहा था.
"अर्जुन माफ़ कर दे रे, गलती हो गयी दर्द में दर्द दे बैठी."
"आपने कुछ नहीं किआ, हो जाता है ये सब.. उम्म्म", अर्जुन ने अपनी छाती से उन रसीले खरबूजों को कुचलते हुए बबिता की छूट में 2 इंच लुंड अंदर बहार किआ तोह वह भी जोश में उसको लगाती हुई इन हलके धक्को को सहने लगी.
"आह्हः.. अब न चीखती मैं.. तू सच्ची मरद है रे और मैंने जी जी न कह. बबिता बोल या जान बोल ले या जो दिल करे.. आह्हः.. आराम से कर या खुली कोणी."
"खोलने में तोह हफ्ते लगेंगे बबिता और ज्यादा भी लग सकता है अगर ये चुके ऐसे हे ईमान खराब करते रहे. ाःह..", अर्जुन ने जोश में आधा लुंड निकल कर धक्का लगाया और दोनों की तेज चीख निकल पड़ी. गोर बूबे लाल पड़ने लगे थे और छूट से paani-rakt बहार आने लगा था.
"तन्ने यु घने पसंद है न, पलट जा मेरी जान.", अर्जुन ने बबिता की बात सुनते हे लुंड फसाये हुए हे दोनों को पलट लिए. अब बबिता का मखमली बड़ा बदन उसके ऊपर था और जड़ तक लुंड छूट के अंदर निचे से धंसा हुआ.
"हिम्मत वाली हो Babita..aahh.. उम्म्म्म..", जोश में दोनों की राल एक दूसरे के मुँह में जाने लगी. इधर चुचो को छोड़ अर्जुन ने वह मटके से बड़े बड़े कूल्हों को थाम लिए. गांड की दरार को कास के दबाते हे पहली बार लुंड आखिरी हद में जा अटका. इस मुद्रा में छूट फैलने से हे ऐसा हो पाया था.
"ओह्ह्ह्ह.. इतना बचा के राख्या था ke..aahhh.. तू आदमी ठीक कोणी लगे मैंने.. गांड छोड़ दे अगर थोड़ी इज़्ज़त करे है तोह.."
"नहीं कर रहा वह kuch..aahh.. छूट तोह मारी नहीं अभी तक आप तीसरी बार गांड बोल कर वह ले जा रही हो. आपका तोह दिल नहीं कर रहा वह करवाने का? आठ.. ये दोनों है कितने बड़े..?", अब अर्जुन ने वह झूलते गुब्बारे हे चूसना ठीक समझा. एक चुके को खुद हे बबिता ने मुँह में ठूंस दिए और अपने वजनी कूल्हों को आगे पीछे हिलने लगी..
"आठ.. कसम से अर्जुन तू सच बोलिये के कोई छोरी पूरा लुंड ले चुकी तेरा? आठ.. मेरे चुके 44-ह है और कच्ची मिलती न तोह सलवार पहन के रहना पड़े है बस. वैसे भी पसंद कोणी मैंने अंदर कुछ पहन न.. आठ.. राम रे.. चुका लुंड है तेरा."
"आपके बोब्बे अभी इतने बड़े है माँ बनोगी तब घर से नहीं निकल पाओगी.. आठ पूरा पीछे जाओ न."
"तू बस बोब्बे चूस, पीछे जाओ न. लुंड मेरी छूट में है और आठ.. मैं गयी रे.. ", बीच में हे टंगे कांप उठी बबिता की. धम्म से वह अर्जुन पे गिरी और एक और चीख निकल गयी निप्पल पर दांत गाड़ने से.
"मार दे manne..aahh.. निचे लुंड ऊपर मुँह.. आह्हः चुकी काट दी. बालक होये तोह के पिलाऊंगी मैं..", चरम का मजा अधूरा लगने लगा था लेकिन अर्जुन गलती सुधरता निचे निकल आया.
"अब देखो जब दोनों सही से खुलकर करते है तोह मंजिल कैसे नहीं मिलती.", अर्जुन ने बबिता को सही से घोड़ी की मुद्रा में किआ और पीछे आ गया. कूल्हे सचमुच इतने बड़े थे जिनते सरोज मौसी या ललिता जी के भी न हो. मांस से लबरेज गोल मटके से दोनों बहार को निकले गोर नितम्बो के बीच हे वह गुलाबी पारी उभरी हुई दिख रही थी. छूट को फैला कर छेड़ का जायजा लेने पर हे अर्जुन देख पाया था उन मॉटे होंठो की असाधारण गहराई.
"कमाल हो बबिता.", चिकनाई छूट को खोलने से हे नजर आ गयी थी उस लाल छेड़ के ऊपर. हाथ में कास के लुंड को पकडे वह इस मुर्राह भैंस सी युवती पर जिप्सी घोड़े सा जा चढ़ा.
"आह्ह्हह्ह्ह्ह.. कसूता आदमी है टूउउ.. माँ.. कितनी बार फाड़ेगा मेरी...?", ठप्प की आवाज से दोनों के जिस्म जा मिले और ऊंचाई के साथ झुकने पर भी वह बड़े बड़े गुब्बारे बिस्टेर को छू रहे थे. Hatti-katti बबिता के दोनों भारी चुके गिरफ्त में लेता अर्जुन jor-shor से चुदाई में लग गया. जल्द हे तेज चीखे अब मीठी आहों में बदल चुकी थी. बड़ा और मजबूत बिस्टेर कांपने लगा था इन bhari-bharkam जीवो के भरपूर मिलान से.
"बबिता आह्हः.. ये एक बार में नहीं ख़तम होने wala..aahh..", अर्जुन के अंडकोष छूट के नीच जा भिड़ते. Thap-thap की आवाज ने बिस्टेर की चूल्हो के साथ बबिता का भी जिस्म हिला दिए था. गांड के बड़े गोले दोनों तरफ हिलते हर धक्के को लील रहे थे.
"मैं तोह कहु हु तू हे हरी करदे रे मेरी dharti..aahh.. बेरा न कोई और कर सकेगा के कोणी.. माँ मैं फेर गयी रे..", वह मजबूती से हाथ टिकाये खुद को रोके हुए थी झड़ते हुए भी. लेकिन लुंड और तेजी से फिसलता छूट का सत्यानाश करता रहा. चुके उमेठे जाने से सिसकारियां तीव्र होने लगी.
"आने वाला हु.. आह्हः.."
"भीतर (अंदर) भर दे सामान.. आह्ह्ह्ह.. oooiii....ke छोड़ दिए रे अंदर? आह्ह्ह्हह..", वीर्य भी ऐसे गिर रहा था जैसे नलका खोल दिए हो. अब दोनों के जिस्म जा गिरे बिस्टेर पर और बबिता अपने ऊपर अर्जुन को आराम से लिए पसरी रही. चुके आधे दोनों तरफ से बहार निकल आये थे.
"अभी और करेंगे.", अर्जुन जैसे समय और इंसान भूल चूका था.
"कर लिए लेकिन थोड़ा दत्त जा. मेरी बुरी दुर्गति हो गई है. 4 घंटे है अपने पास."
"बस आधे घंटे बाद एक बार और.", अर्जुन ने लेते हुए हे दोनों उभारो को दबोच लिए.
"आह्हः.. कर ले मेरी जान. आज कोरी कोणी रही तोह आज हे रमा करदे. तेरी रेल तगड़ी है, पटरी फाड़ दी."

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