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खेल -1
अर्जुन थोड़ा देरी से आया था लेकिन किसी ने ज्यादा सवाल नहीं किये. आज बहार छोल पूरी ने अपने आदमी मुनीर को देखभाल के लिए लगा दिए था. रात 10 से सुबह 6 तक वह एक दिन के लिए पंडित जी के घर था. अर्जुन 5 मिनट मुनीर से बात करने के बाद अंदर चल दिए. कोमल दीदी नाहा कर अपने कमरे में गयी थी और अर्जुन ख़ामोशी से अपनी माँ के पास आ गया.
"मिल आया वालिए जी से?", रेखा जी भी स्टोर से गाउन पहन कर बीएड के पास हे आई थी.
"जी माँ. अंकल आंटी ने डिनर रखा था, कल उनकी बेटी इंग्लैंड जा रही है इसलिए. संधू सर भी आये थे तोह थोड़ा समय लग गया. आज मैं यही सोने वाला हु.", अर्जुन ने पहली बार खुदसे हे टेबल पर रखे अपने कपडे लिए और स्टोर में जा कर बदलने लगा. माँ अभी भी बात कर रही थी.
"पहले तोह नहीं बताया के तुम वालिए जी के घर भी aate-jaate हो. वैसे उनके एक बीटा और बेटी है न? बीटा भी इंग्लैंड हे रहता है.", बिस्टेर को ठीक करते हुए रेखा जी ने पुछा.
"हाँ, वह इंग्लैंड में हे मैरिड है और अन्नू नाम है उनकी बेटी का जो फिजिक्स में रिसर्च प्रोग्राम के लिए वह जा रही है. अंकल से ज्यादा आंटी के साथ मेरी जमती है. अन्नू मेरी टीचर थी थोड़े समय के लिए और संधू जी की बेटी की सगाई के वक़्त ाचे से पहचान हुई थी सबसे.", अर्जुन बहार आने के बाद अपना पर्स, रुमाल और वह उपहार टेबल पर रखने के बाद माँ के बराबर लेट गया. अब बड़ी लाइट की जगह वह जीरो का बल्ब रोशन था. रेखा जी हमेशा सोने से पहले नहाती थी और अब अर्जुन को वही महक आ रही थी जिस से उसको सुकून मिलता था. लेकिन आज वह बस उनकी तरफ आराम से करवट लिए लेता रहा.
"ाचे लोग है और तेरे पापा के दोस्त भी है वालिए जी. बस आना जाना काम हो गया पिछले 6-7 साल से. तेरी पापा की ट्रांसफर हो गयी और उनका बीटा भी बहार चला गया. लेकिन तेरे पापा को समय मिलता है तोह मिलने जाते रहते है.", रेखा जी ने हलके हाथो से अपनी नाजुक उंगलिया अर्जुन के सर पर फिरने लगी, सुकून देने के लिए.
"आंटी भी बहोत ाची है. मेरा बहोत ध्यान रखती हैं और मैं भी उनके साथ लूडो खेलता हु तोह कभी किचन में हेल्प करवा देता हु.", अर्जुन ने घुटने मोड़ते हुए अपना सर तकिये से निचे लाते हुए चेहरा गाउन के सामने कर दिए. रेखा जी ने भी एक पल के लिए हाथ सर से हटा कर चैन खोली और ऊपर वाला उभर अर्जुन के सामने कर दिए. निप्पल अभी हल्का सूजा हुआ था और एक पल देखने के बाद अर्जुन ने होंठो में भर लिए. रेखा जी फिर से उसका सर सहलाने लगी साथ हे दोनों की आँखे कुछ पल के लिए बंद हो गयी.
"वह हमेशा से हे ऐसी हैं. लोगो से मिलकर उन्हें ख़ुशी मिलती है और जल्दी हे सब पर भरोसा कर लेती है. बस उनका बीटा बहार चला गया तोह उन्होंने भी खुद को बदल लिए. अब पहले जैसी नहीं रही.", रेखा जी अर्जुन का सर सहलाती हुई खुद भी बड़ा हल्का महसूस करने लगी थी. स्टैनो का बोझ अर्जुन हल्का करता हुआ उन्हें आराम पंहुचा रहा था. वह आगे कुछ बातें करती उस से पहले हे वह नींद में जा चूका था.
'बिलकुल नहीं बदला, ले थोड़ी देर ये वाला पी.', अर्जुन को सोये में भी दूध पीटा देख वह मुस्कुराने लगी और निचला उभर उसके होंठो में दाल कर खुद भी आँखें बंद करके अर्जुन से लिपट गयी.
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Crime-branch की ये ईमारत शहर से 5-6 किलोमीटर बहार थी जहा चारदीवारी के बीच 2 एकड़ जामें को ाचे से वृक्षों से सुसज्जित रखा गया था. ठीक बीच में ये 2 मंजिला ईमारत में कई कमरे और दफ्तर थे और इनमे से हे एक कमरे में ये 55-56 साल का रोबीला सा आदमी एक कुर्सी पर बैठा जाम पी रहा था. चेहरे पर ज़माने भर का गुस्सा था और इस जगह पर होने की बेबसी. जाम पीते हुए वह ख़ास तरीके से होंठ भींचता अपने सामने बैठे व्यक्ति को नफरत से देख रहा था.
"सर, मुझसे क्या नाराजगी है? मुर्गा, शराब और उधर ख़ास गद्दा भी लगवा दिया मैंने आपके लिए फिर भी 2 शब्द तारीफ की जगह गुस्सा दिखा रहे हो.", सेव 6 फ़ीट का ये 26-28 वर्षीया आदमी मुस्कुरा रहा था. शरीर भी मजबूत और haav-bhav भी एक काबिल अफसर के थे.
"तुम ओहदे में बराबर हो दीपक लेकिन मैं सीनियर हु तुम्हारा. बहनचोद तुम सब लोगो की क्या हालत करूँगा वह देख कर तुम्हारा रोना न निकल गया तोह मैं भी एक बाप का नहीं.", दुष्यंत शाम से यही बंद था और दिग के जाने के बाद अब देखभाल और पूछताछ का जिम्मा इस नौजवान के पास था. सस्ती शराब और कामचलाऊ सी प्लास्टिक की प्लेट में रखे तंदूरी मुर्गे से वह ाची सेवा कर रहा था दुष्यंत मालिक की.
"सर, मैंने तोह रैंक की बात हे नहीं की. आप मेरे सीनियर है इसलिए तोह आपके लिए पेग बना रहा हु. आजतक हाथ नहीं लगाया इन दोनों चीजों को लेकिन देखिये आपके लिए ये भी कर रहा हु. आप तोह मेरा ख्याल रखने की जगह गाली दे रहे है.", दीपक वैसे हे मुस्कुराते हुए फिर से जाम बनाने लगा. यहाँ न बर्फ थी और न ठंडा पानी. लेकिन घड़े के पानी से भी काम चल हे रहा था.
"2 करोड़. 2 करोड़ 24 घंटे में तुम्हारे पास होंगे बस मेरे 2 काम कर दो.", दुष्यंत ने वह अधपका सा मांस का टुकड़ा उठा कर चबाते हुए कहा. थोड़ा बहोत बहार भी गिर रहा था जैसे भूख जोरो की लगी हो.
"इतना तोह हमारे पूरे गाँव में किसी ने देखा नहीं होगा. 2 करोड़ के लिए तोह मैं सबको मारने के लिए तैयार हु.", अभी दोनों बातें कर हे रहे थे की एक कांस्टेबल ने हलके से दरवाजा खटखटाया और अंदर आ गया. सलाम करते हुए वह जैसे आदेश का इन्तजार करने लगा था.
"रौनक जरा बहार गश्त लगा लो और बाकी सबसे भी कहना के यहाँ जरुरी काम चल रहा है.", दीपक की बात सुन्न कर हाँ में सर हिलने के बाद फिर से सलाम बजाय और बहार चला गया.
"मैं कह रहा था के 2 करोड़ तुम्हारे पास और बस 2 काम करने है.", दुष्यंत ने एक छोटा सा घूँट पीने के बाद बात जारी की लेकिन जवाब में दीपक ने बस सहमति जताई जैसे पूछ रहा हो के पूरी बात कहो.
"राजपाल और अमरीक के बयान के साथ हे मेरे खिलाफ जो बलात्कार और हत्या के सबूत जमा किये गए है वह बिना chhed-chaad के मुझे चाहिए. और यहाँ से दिल्ली तक जाने का इंतजाम. ये 2 काम के बदले 2 करोड़. क्या कहते हो?"
"डील बुरी नहीं है और मैं कोशिश करता हु लेकिन आधे पैसे अभी चाहिए.", दीपक ने अपना पक्ष रखते हुए थोड़ी गंभीरता से दुष्यंत को देखा.
"फ़ोन का इंतजाम करवाओ, एक करोड़ मैं अभी तुम्हारी कही जगह भिजवा देता हु.", दुष्यंत के इतना कहते हे दीपक कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और दरवाजा बंद करके साथ वाले कमरे से एक लम्बी तार वाला टेलीफोन लेकर फिर से अंदर आ गया.
"क्सक्सक्सक्स दूकान के बहार मेरा आदमी मिलेगा मोडल टाउन में, पैसा उसके पास पहुंचना है. एक करोड़ मिलते हे मैं आपको यहाँ से बहार भिजवा दूंगा और बाकी पैसा सबूत देते समय मैं खुद लूंगा. दिल्ली आप कल निकलना आज रात होटल तुलिप में मेरे खास कमरे में रहिये.", दीपक की बात सुन्न कर दुष्यंत के चेहरे पर ख़ुशी चा गयी. नंबर मिलाने से पहले उसने कहा.
"एक काम करो फिर. अपने आदमी को तुलिप हे आने को कहो, वही 2 करोड़ दे देता हु और रात की थकान दूर करके वही से दिल्ली निकल जाऊंगा. सबूत मेरा आदमी तुमसे ले लेगा.", दुष्यंत जरुरत से ज्यादा हे कड़ियल और हरामी इंसान था. जिसका विश्वास दीपक को भी नहीं था लेकिन उसने रजामंदी जाता दी और दुष्यंत नंबर मिलाने लगा.
"सट्टे, अनाज मंडी वाले गोदाम से 2 करोड़ ाचे से बैग में भर कर तुलिप होटल पहुंच आधे घंटे में. साथ हे रात के लिए एक नजराना भी, थोड़ा कमसिन सा.", इतना बोल कर सामने वाले की थोड़ी बात सुन्न कर दुष्यंत ने फ़ोन रखा और दीपक से अपने आदमी को घंटे बाद बुलाने को kaha.Deepak ने भी अपने आदमी को फ़ोन करके होटल से पैसा लेने को कहा एक घंटे बाद. हाथो में हथकड़ी पहनते हुए वह दुष्यंत को ले कर बहार आ गया. किसी ने सवाल नहीं किआ अपने अफसर से और मारुती 800 में बैठा कर दीपक दुष्यंत को बड़े आराम से बहार निकाल ले आया. रस्ते में बस 2-4 बात हुई और कार 10 मिनट बाद हे इस साधारण से होटल के बहार आ रुकी. हथकड़ी खोल कर दीपक खुद हे दुष्यंत की तरफ का दरवाजा खोल कर उसको लिए होटल में आ गया.
"मेरा कमरा खली है?", दीपक ने काउंटर पर बैठे जवान से लड़के को पुछा और उसने मुस्कुराते हुए खड़े हो कर एक चाबी हवाले कर दी.
"मेरा कोई दोस्त या साहब को पूछने कोई आये तोह 204 में भेज देना. ख़ास है अपने.", दीपक ने 50 का नोट देते हुए लड़के को खुद किआ और कमरे की तरफ चल दिए. दूसरी मंजिल पर 4 कमरे थे और सबसे आखिरी वाले को खोल कर दीपक ने दुष्यंत को कमरा दिखाया और आराम करने का बोल कर वापिस चला गया.
"चुटिया साला. किसने पुलिस में भर्ती कर दिए गांडू को? इसकी गांड भी ाचे से मारूंगा.", दुष्यंत बिस्टेर पर बैठने की जगह खिड़की के पास खड़ा बहार देखने लगा. जल्द हे दीपक अपनी मारुती कार को चलता वह से गायब हो गया जैसे दुष्यंत पर उसको पूरा विश्वास हो. लेकिन दुष्यंत मुचो पर हाथ फिरता वही खड़ा रहा जबतक बहार एक और गाडी न आ कर रुक गयी. ये उसके हे आदमी थे और 2 लोग गाडी में बैठे रहे बस एक आदमी और एक जवान लड़की होटल की तरफ बढ़ गए.
"खेल खेलने से पहले जरा पानी निकल हे लू.", लुंड को पतलून के ऊपर से खुजाते हुए वह बिस्टेर पर बैठ गया. पहले शराब का हल्का सुरूर था और अब आने वाली लड़की के लिए उत्तेजना में नशा दोगुना हो रहा था. जल्द हे दरवाजे पर दस्तक हुई.
"सट्टे दिल खुश कर दिए, साली क्या हूर लेकर आया है.", दरवाजा खोलता हुआ दुष्यंत कही ज्यादा हे खुश था. लेकिन अंजाम तोह सपने में भी नहीं सोचा था जो हो गया. मुँह पर जोरदार मुक्का लगते हे भारी शरीर बिस्टेर पर जा गिरा.
"आज ये mehmaan-navaaji का मौका गलती से मुझे मिल गया है मालिक.", नाक और होंठो से बहते खून से ज्यादा दर्द तोह सामने खड़े आदमी को देख कर दिल में होने लगा था दुष्यंत मालिक को. न सट्टे आया था और न लड़की लेकिन जल्लाद जरूर खड़ा था जिसके चेहरे पर ज़माने भर की ठंडक और भूरी आँखों में ख़ास चमक थी.
होटल के बहार भी अब न वह गाडी थी और न उन लोगो में से किसी का निशान. सबकुछ दुष्यंत की मर्जी से नहीं हुआ था.
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साढ़े 4 बजे अर्जुन की आँख खुली तोह दोनों उभर उसके चेहरे पर थे. उनसे आती वह सोंधी महक ाचे से साँसों में भरने के बाद वह सावधानी से अपनी माँ का हाथ तकिये पर रखते हुए कमरे से बहार निकल कर बाथरूम में आ गया. अगले 15 मिनट में हे वह नाहा धो कर बहार आ चूका था. कपडे माँ के हे कमरे में थे और टोलिया लपेटे वह अंदर आ गया. रेखा जी भी उठ चुकी थी और अर्जुन को तैयार होते देख उसके पास आ कड़ी हुई.
"नींद ाची आई?"
"बेस्ट.", अर्जुन ने ट्रैक पाजामे के ऊपर टीशर्ट पहन ली थी. और माँ के खूबसूरत चेहरे को इतने करीब देख कर अब ज्यादा सबर न कर सका. वह मॉटे होंठ चेहरा धुले बिना भी रस से भरे थे जिनपर अपने होंठ रखता वह ये गहरा चुम्बन करने लगा. जिस्म पर कही हाथ न लगते हुए दोनों कुछ पल इस लम्हे में क़ैद रहे और अलग होते हे रेखा जी नजरे झुकाये जाने लगी.
"गलती हो गयी क्या माँ?", अर्जुन ने उनकी कलाई पकड़ते हुए पुछा.
"पागल है तू. बाथरूम जाने दे.", वह मुस्कुराई तोह अर्जुन के दिल को स्वर्ग सा एहसास हुआ. उनके हसीं चेहरे और बिखरी जुल्फों को देखता वह हाथ थामे खड़ा रहा.
"जाने दे न अर्जुन.", इस बार होश में आते हे वह उनसे पहले कमरे से बहार निकल गया.
'पगला कही का. मुँह भी धोने की परवाह नहीं की.', उसके बहार निकलते हे रेखा जी ने वही गीला टोलिया कुछ सोच कर उठाया और वो भी नहाने के लिए चली गयी. अर्जुन जूते पहन कर बहार जा चूका था और जाने से पहले मुनीर को भी ठन्डे पानी की बोतल पकड़ते हुए haal-chaal पूछ गया था. मौसम में हलकी उमस थी लेकिन फिर भी सुकून भरा और शांत माहौल था. हलके कदमो से दौड़ता अर्जुन आज कुछ दुविधा में था लेकिन कुछ सोचता हुआ वह पार्क की और बढ़ गया.
"आज बेचैन हो कुछ.", जाने कैसे आचार्य जी उसका दिल नजर भर में हे पढ़ लेते थे.
"ऐसा कुछ नहीं है गुरु जी. बस कल का दिन थोड़ा ज्यादा हे व्यस्त था और नींद भी टुकड़ो में हे लेनी पड़ी.", उनके पाँव छूने के बाद अर्जुन 10 मिनट दौड़ने का बोल कर पटरी पर तेज कदमो से भागने लगा. आचार्य जी shaant-bhav से उसको दौड़ते देख अपने नरम जूते एक तरफ रखते हरी घांस पर चहल कदमी करने लगे. ऐसे में भी वह आँखें बंद करते गहरी साँसे ले रहे थे. फिर इस हिस्से के ठीक बीच में घांस पर बैठते हुए उन्होंने पद्मासन की मुद्रा धारण कर ली. अर्जुन पूरे 5 चक्कर लगाने के बाद उनके पास आया तोह वह भी शरीर को ढीला छोड़ कर आराम से बैठ गए.
"तोह अब बताओ के परेशां क्यों हो?", सवाल वही था और अर्जुन के चेहरे का पसीना भी जैसे उसके भाव न छुपा पाया.
"एक दोस्त है, ख़ास. वह आज जा रही है 3 साल के लिए देश से बहार. रात मैं डिनर पर भी गया था उसकी ख़ुशी के लिए और वह भी सरप्राइज करते हुए. वह से आते हुए मेरे कदम साथ नहीं दे रहे थे दादा जी. लेकिन मैं माँ के पास सोया तोह सब भूल कर गहरी नींद ली. लेकिन घर से बहार आते हे आज कदम यहाँ आना नहीं चाहते थे और मैं वह जाना नहीं चाहता.", अर्जुन कुछ पल झुक कर खड़े होने के बाद फिर आचार्य जी के बगल में हे घास पर पाँव फैलते हुए बैठ गया. आचार्य जी भी सब ध्यान से सुन्न रहे थे और अर्जुन को पढ़ रहे थे.
"तुम वही जाना चाहते हो लेकिन खुद को कमजोर साबित नहीं करना चाहते बीटा. उस दोस्त की ख़ुशी के लिए तुमने रात जो किआ वह सही था लेकिन अब तुम्हारा अपनी ख़ुशी को दबाना गलत है. जिसकी परवाह हो उसके दर्द में शामिल होना जितना जरुरी है उतना हे जरुरी है उस से तब मिलना जब तुम्हे भी ख़ुशी की जरुरत हो. कभी कभी ऐसे प्यारे स्वार्थ करना जरुरी है.", आचार्य जी ने पीठ पर हलकी थकी देते हुए जैसे अर्जुन को खड़ा होने को कहा.
"गलत नहीं लगेगा?"
"लगेगा न, अगर तुम वक़्त रहते भी ना मिलने जाओ तोह गलत लगेगा. और शायद तुम जो आज कहना चाहते हो उसकी एहमियत तब्ब न रहे जब समय का चक्र घूम जाये.", आचार्य जी भी खड़े हो गए थे. अर्जुन ध्यान से उन्हें देखता रहा जैसे अब वह उन्हें पढ़ना चाहता हो.
"समय का एक सही पल.", उन्होंने फिर से अर्जुन को चेताया, मुस्कान के साथ. अर्जुन भी तुरंत उनके पाँव छु कर वह से निकल भागा. अब कदम असमंजस में न थे और न शरीर में किसी तरह का कोई दबाव. अन्नू से वह पहले उसकी ख़ुशी के लिए मिला था लेकिन अब वह अपने लिए उस से बात करना चाहता था, बताना चाहता था के अन्नू की एहमियत ख़ास है उसके जीवन में और वह भी उसको जरुरत से ज्यादा याद करेगा जाने के बाद. कदम khud-ba-khud आ रुके सरदार जी के घर के सामने. सफ़ीद टीशर्ट से पसीना पानी की तरह टपक रहा था और भीगे हुए बाल आँखों के सामने आ रहे थे. घडी 5:25 बजा रही थी और अर्जुन ने बिना सोचे बस धड़कते दिल से वह घंटी का बटन दबा दिए.
"वालिए जी तोह गुरुद्वारा साहिब चले गए अभी 5 मिनट पहले.", ये आवाज सुनते हे अर्जुन ने नजर घुमाई तोह ये आंटी वही थी जो अन्नू की माता जी के पास आती रहती थी. कहा तोह वह हिम्मत करके 2 किलोमीटर की दुरी उड़ता हुआ तये करके आया था और इनके शब्दों ने शरीर हे ठंडा कर दिए. वह भी इतना कह कर हाथ में दूध का दल्लु लिए अपने रस्ते चली गयी. गहरी सांसें लेता वह आँगन में कार को नदारद देख कर भारी कदमो से अपने घर की और जाती गली की तरफ बढ़ने लगा.
"अर्जुन.", यही आवाज तोह थी जिसके लिए अर्जुन जाने कितना बेचैन था. सपना न हो बस ये सोच कर एक बार फिर से नजर घुमाई तोह अंदर के दरवाजे को खोले अन्नू उनींदी सी कड़ी अर्जुन जैसी हे हालत में थी. लेकिन अर्जुन सजग था और इस बार वह जैसे अन्नू को नजरो से दूर नहीं होने देना चाहता था. गेट की कड़ी खोल कर वापिस बंद करता वह पलभर में हे अन्नू के सामने जा खड़ा हुआ.
"तुम नहीं जानती मेरे साथ क्या हो रहा है.", अन्नू ने अर्जुन की हालत देखि तोह साड़ी नींद काफूर हो गयी. उसका हाथ पकड़ती वह उसको अंदर करते हे दरवाजा बंद करके पीठ लगाए कड़ी हो गयी. धड़कन अपनी चाहत को यु सामने देख कर बेकाबू हो चुकी थी. भगवन क्या कर रहा है उसके साथ और अर्जुन ऐसे कैसे. लेकिन दिल के सामने सब समीकरण और उम्मीदे एक तरफ करती वह उसके पसीने से भरे जिस्म से जा लगी. ऐसी प्रभात होगी ये दोनों ने कहा सोचा था. आँखों से आंसू सब बाँध टॉड कर बहते हुए अर्जुन के सीने पर आये पसीने में घुलने लगे. दोनों के प्यार की तरह.
"ी लव यू अन्नू, मैं इस बार खुद ये कहने के लिए आया हु. जितना भी कहु के मैं ठीक हु और हम दोनों फिर मिलेंगे लेकिन एक सच ये भी है के मेरे दिल का एक हिस्सा तुम्हारी याद में सूना रहेगा. मैंने कभी महसूस नहीं किआ था के प्यार करने वाला अगर दूर हो जाये तोह कैसा लगता है लेकिन कल रात मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता था. कल रात मैं तुम्हारे लिए आया था लेकिन आज अपने लिए, हमारे लिए मुझे तुमसे मिलना था.", अर्जुन भी कसके अन्नू को बाहों के घेरे में लिए उसको सीने से लगाए खड़ा था.
"ये मेरे लिए भी मुश्किल है और मुझे भी तुमसे अकेले मिलना था जाने से पहले. बस डर था के सबके सामने तुम्हे देख कर मैं कोई गलती न कर दू. ी लव यू जान.", आज अन्नू के नमकीन होंठो का स्वाद अब तक का सबसे मीठा लग रहा था.
"मैं तुम्हे रुलाने नहीं आया अन्नू. बताने आया हु की तुम हमेशा मेरे पास रहोगी. जाने से पहले नहीं मिलना अगले 6 महीने तक जरूर खेलने वाला था.", अर्जुन उन बड़ी आँखों को चूमते हुए चेहरे को साफ़ करने लगा.
"तुम्हे इतना प्यार कब हो गया मुझसे? और देखो क्या हाल किआ है मेरा.", अन्नू ने हाली नाराजगी से अर्जुन के सीने पर मुक्का मारते हुए कहा और खुदकी भीगी टीशर्ट दिखने लगी, जहा अर्जुन का पसीना कपडे को त्वचा से चिपकाये था.
"काम या ज्यादा प्यार क्या होता है मुझे नहीं पता. और तुम मेरी हो तोह प्यार के साथ हे पसीना भी बराबर मिलेगा.", अर्जुन ने उस ताजे गुलाब से चेहरे को दोनों हाथो में लेते हुए ये गीला चुमबन्द किआ तोह अन्नू भी उसको मजबूती से पकडे बराबर साथ देने लगी. लम्बे कद के बावजूद अन्नू एड़ी उचकती ऊपर होने लगी तोह अर्जुन ने कमर थामते हुए चेहरे को देखा.
"मम्मी पापा 7 बजे तक आएंगे. हर संडे वह इस वक़्त घर नहीं होते.", अर्जुन को भी पता था के वह कहा गए है लेकिन कब आएंगे ये जानते हे कमर से हाथ निचे उन बेजोड़ मांसल कूल्हों पर आ गए. अन्नू को उठाये वह उसकी गर्दन चूमता उसके कमरे में आ गया. यहाँ भी दोनों एक कशिश से भरे चुम्बन में डूब गए. घडी के कांटो और दुनिया से परे ये 2 जिस्म और दिल एक दूसरे से लगे एक दूसरे में खोने लगे.
"जाने से पहले एक और बार प्यार नहीं करोगे?", अन्नू का हिलता सीना और लाल चेहरा अपनी हालत बयां कर रहा था. अर्जुन बस इस चेहरे को देख रहा था जो जाने कब दिल की गहराई में अपनी छाप बना गया था.
"जिस्मानी नहीं लेकिन रूमानी जरूर. आज तुम्हारे साथ मैं वह कुछ ख़ास शेयर करना चाहता हु. अगले 10 मिनट तुम बस मेरे साथ मेरा कहना मान लो.", अर्जुन ने अन्नू को फर्श पर खड़ा करते हुए गाल चूमते हुए कहा और बाथरूम से खुद का चेहरा दुरुस्त करने के बाद साथ लिए रसोई में आ गया.
"जो अब हम करेंगे वह तुम्हारे साथ हमेशा रहने वाला है.", अर्जुन ने चाय के बर्तन में थोड़ा पानी डालने के बाद चूल्हे पर उबलने रखा और अन्नू के महकते जिस्म को पीछे से बाँहों में लिए वही खड़ा हो गया.
"तुम मुझे ऐसे वक़्त चाय बनाना सीखा रहे हो?", अन्नू ने मुस्कुराते हुए अर्जुन के हाथ अपने बड़े उरोजों पर रखते हुए पुछा. अर्जुन मस्ती करता उन दोनों मांसल गोलों को दबाते हुए गोरी गर्दन पर होंठ फिरने लगा.
"हमेशा अकेले रहने से बचने का तरीका बता रहा हु. हॉस्टल में सीखा था मैंने की ख़ास पल कैसे याद रखे जाते है.", चायपत्ती के डब्बे से 2 चम्मच चाय की उबलते पानी में डालने के बाद अर्जुन 2 मिनट उसको पकता रहा. अन्नू को तोह इस सबसे कोई लेना देना न था, अर्जुन का पास होना काफी था उसके लिए. गिलास में वह काली बिना चीनी की चाय छान कर अर्जुन को साथ लिए वह वापिस कमरे में आ गया. गीली टीशर्ट दरवाजे पर तंगी थी और अन्नू उसकी गॉड में बैठी उसके सीने पर हाथ रखे हलके हलके चुम्बन लगातार करती रही.
"एक सिप लो.", अर्जुन ने वह गिलास सामने बढ़ाया तोह सिर्फ चाय की तीखी महक एक पल के लिए अन्नू को बेचैन करने लगी लेकिन अर्जुन के इतना प्यार से कहने पर गरम उबले पानी की छोटी सी घूँट मुँह में भरते हे दुनिया के सबसे बुरे जायेके का एहसास हो गया.
"हाहाहा.. बहोत बुरा स्वाद है न?", अर्जुन ने चेहरे के भाव देखते हुए हँसते हुए कहा.
"युक.. क्या है ये?", अन्नू ने मुँह के सामने हाथ रखते हुए कहा.
"मेरा प्यार, हमारा प्यार है ये अन्नू.", अर्जुन ने एक घूँट अपने होंठो से अंदर करते हुए बड़े आराम से स्वाद को महसूस करते हुए पी लिए. गिलास एक तरफ रखते हुए अन्नू के होंठो से अपने होंठ मिलते हुए इस बार जो चुम्बन किआ उसमे दोनों के होंठो के साथ हे जीभ भी अठखेलिया करने लगी और अलग होते हे अन्नू के चेहरे पर हैरत के भाव थे.
"आईटी टर्न्ड स्वीट."
"कहा न के ये हमारा प्यार है. जैसा स्वाद सिर्फ अकेले मिला, दोनों के बांटने पर वह बेहतर में बदल गया.", कसैली चाय का स्वाद भी अजीब था जो बाद में मीठा हो चूका था. इस बार अन्नू ने खुद हे घूँट भरी तोह वह अजीब महक उतनी बुरी न लगी, वह कड़वा पानी भी होंठो के साथ जीभ को तर करता आराम से निचे उतर गया. असर भी ऐसा था के दिमाग के नसों को आराम देने वाला. 5 मिनट में 10 घूँट और 5 गहरे मीठे चुम्बन. शरीर को कपड़ो के ऊपर से हे सेहलते हुए दोनों ने प्यार किआ और घडी में 6:10 का समय देखते हुए अर्जुन खड़ा हो गया.
"जल्द मिलेंगे अन्नू. जब भी याद आये तोह अब तुम्हारे पास हमारे प्यार को महसूस करने का एक pra-roop है. पंजाब न जाना होता तोह मैं ये दिन तुम्हारे साथ हे व्यतीत करता. इनका ख्याल रखना.", आखिरी लफ्ज़ कहते हुए अर्जुन ने शरारत से दोनों उभारो को पकड़ते हुए अन्नू के होंठो को कस के चूम लिए.
"ये सिर्फ तुम हे कर सकते हो. मैं तोह अब इन्हे हाथ भी नहीं लगाती. वैसे थैंक यू फॉर छीरिंग में उप. लव यू एंड टेक केयर.", दोनों हाथो को थाम कर अन्नू ने अर्जुन के दिल के ऊपर किश किआ और ाचे से गले लग गई.
"आंटी से मिलता रहूँगा और उन्हें बता देना के अर्जुन अपनी माँ के साथ उन्हें शादी का कार्ड देने आएगा. भैया और दीदी की शादी एक साथ हे है इस 21 मई को. तुम्हे भी फोटो ईमेल करूँगा.", दरवाजे तक आते हुए इस बार अन्नू भी खुश थी और अर्जुन की बेचैनी भी ख़तम हो चुकी थी. आँगन में भी अन्नू ने बिना किसी की परवाह के उसको गले लगा कर विदा किआ. अब अर्जुन के पाँव उस से अलग नहीं चल रहे थे.
अगले आधे घंटे बाद वह तैयार हो कर अपनी बहनो से मिलने के बाद प्रीती और रेणुका के साथ 10 मिनट बिता कर इस एस्टीम कार में बैठा था पिछली सीट पर आरती और प्रियंका दीदी के साथ. अगली सीट पर लकी अरोरा और दीपक स्टीयरिंग पर थे और लकी ने हे अर्जुन का परिचय दीपक से करवाया था दोस्त के छोटे भाई और शंकर जी के सुपुत्र के रूप में.
"छोटे भाई पता है के तुम आराम से जाने वाले थे लेकिन जरा सरकारी काम हमको भी था और राज्य से बहार पुलिस की गाडी से जा नहीं सकते थे इसलिए तुम्हारे साथ हो लिए. भरोसा दिलाता हु के मेरी वजह से कोई व्यवधान नहीं आएगा तुम्हारे सफर में और गुड़िया आप दोनों भी निश्चिंत रहिएगा. एक हे शहर जा रहे है तोह बस सफर हे साथ होगा. कल मेरा काम ख़तम हो गया तोह शायद वापसी में भी आप लोगो के साथ औ नहीं तोह ये पोलिसिअ आप लोगो को झेलना नहीं पड़ेगा.", दीपक हंसमुख और मिलनसार व्यक्ति था.
"भैया जैसे लकी भैया वैसे हे आप हो हमारे लिए. ऐसा मत सोचना के आप जबरदस्ती हमारे साथ जा रहे हो, हो सकता है के हम लोग हे आपके पल्ले पड़ गए हो.", अर्जुन ने हाथ मिलते हुए जवाब दिए तोह सभी के चेहरे पर हंसी आ गयी. दीपक ने गाडी चालू करते हे सही दिशा में दौड़ा दी. प्रियंका दीदी बहार देख रही थी और आरती ने चेहरे पर दुपट्टा रखते हुए सोना हे बेहतर समझा.
"वैसे अर्जुन के किस्से तोह सुने हे होंगे तुमने दीपक.", हलकी फुलकी बातों में हे घंटा गुजर गया था और प्रियंका दीदी के सोते हे लकी ने बात शुरू की.
"अगर ये वही अर्जुन है तोह maan-na मुश्किल है. वैसे अर्जुन भाई तुम अपने पिता से थोड़ा जुड़ा हो.", दीपक ने पिछले शीशे में अर्जुन को देखते हुए कहा.
"हाँ पापा हमेशा व्यस्त रहते है और मैं दिन भर घर के लोगो को परेशां करता रहता हु.", अर्जुन हँसते हुए बोलै.
"अरे भाई मेरा मतलब वह नहीं था. शंकर जी तोह इतने मजाकिया और जिंदादिल इंसान है लेकिन तुम लगता है ज्यादा बातें नहीं करते.", लकी भी दीपक की बात सुन्न रहा था, ख़ामोशी से.
"भैया ऐसा है न के आप हो पोलिसवाले और पापा भी सरकारी डॉक्टर. आप लोगो का मजाक चल जाता है लेकिन मेरा तोह सिर्फ मेरे रिटायर्ड दादा जी या रिटायर्ड छोल अंकल हे झेल सकते है. ों ड्यूटी वालो से अपना थोड़ा दूर से नमस्कार है.", अर्जुन के मजाक पर दोनों हे हंसने लगे.
"वाकई दिलचस्प इंसान हो यार. सुना है बॉक्सिंग का भी शौक रखते हो."
"हाँ संजीव भी बता रहा था के तुम ाचा कर रहे हो बॉक्सिंग में.", लकी ने भी सुर में सुर मिलाया.
"शौक तोह है सीखने का, जो भी नया सीखने को मिले मैं तैयार हो जाता हु. उसके अलावा तोह बस peid-paudhe और परिवार.", अर्जुन की बात सुन्न कर धीमी आवाज में चलता रेडियो भी दीपक ने बंद कर दिए. साफ़ 15 फ़ीट चौड़ी सड़क के दोनों तरफ हरियाले वृक्षों की कतार से बस उनकी हे कार गुजर रही थी. कही कही कोई स्कूटर या गाडी सामने से उनकी तरफ निकल आती.
"सुदर्शन को तुमने हे मारा था?", दीपक ने इस बार शीशे से पीछे नहीं देखा था. अर्जुन की दोनों बहना आराम से सोई हुई थी और लकी को भी जैसे इस सवाल की उम्मीद न थी लेकिन वह भी चुप हे रहा.
"जैसी हरकत उसने की थी तोह मैंने वही किआ जो ठीक लगा. आपको सहानुभूति है क्या सुदर्शन से?", अर्जुन अब दीपक को टटोल रहा था.
"मेरा वह मतलब नहीं था. सुदर्शन पर पहले भी कुछ केस थे और 2-3 बार उसने पुलिस टीम जो उसको पकड़ने गयी थी उस पर भी हुम्ला किआ था. शरीर तगड़ा होने के बावजूद तुम उम्र में बहोत छोटे लगते हो और अनुभव में भी. कैसे कर दिखाया तुमने वह सब?", दीपक बात को समझते हुए पूछने लगा. शरीर से वह भी तगड़ा और लम्बा था, शायद अर्जुन से भी एक इंच ऊँचा.
"इंसान 2 हे हालात में सोच से ज्यादा कर गुजरता है. जब बात परिवार की हो या फिर खुद की जान की. मेरे साथ तोह दोनों स्थिति थी वह.", अर्जुन भी उतना हे जवाब दे रहा था जितने में अगला सवाल पैदा हो सके. दीपक कुछ देर सामने सड़क पर देखने लगा और फिर अगली बात कही.
"वह कबड्डी सिर्फ शौक के लिए खेलता था लेकिन कुश्ती और भारोत्तोलन (वेटलिफ्टिंग) में वह प्रोफेशनल था कोई 5 साल पहले. शायद जितनी तुम्हारी उम्र है उस से ज्यादा उसको अनुभव है इन खेलो का और शरीर भी लोहे सा. इसलिए मुझे बस हजम नहीं हुआ था उस वक़्त की कोई अकेले हे सुदर्शन और उसके जैसे 4 और लोगो को धुल छठा सकता है. और तुम्हे देख कर तोह अब बात ज्यादा हे मंनघडंत लग रही है.", दीपक की हंसी में जैसे एक तंज़ था. वह जाने क्या सोच कर ये सब बात कर रहा था लेकिन अर्जुन भी मुस्कुरा रहा था.
"यही तोह जरुरी है. मैं भी नहीं चाहता के आप विश्वास करे.", अर्जुन ने जवाब देते हुए आरती दीदी के लुढ़कते सर के पीछे अपनी ब्याह रख दी, जिस से वह बिना हिले और आराम से सोई रहे.
"सॉरी यार. अनजाने में हे ऐसी बातें होने लगी. वैसे एक पते की बात बताता हु. जहा जा रहे हैं वह माहौल बड़ा मजेदार होता है.", दीपक को भी लगा के अर्जुन दिल से बात नहीं कर रहा और शायद उसकी वजह भी दोनों बहनो की उपस्थिति है.
"मैं तोह कभी पंजाब आया नहीं हु पहले तोह मुझे ख़ास पता नहीं है.", अर्जुन को भी ठीक लगा था के बात अब सही तरफ मदद गयी है.
"सबसे बड़ा शहर है पंजाब का ये और छोटे भाई यहाँ न लोग भी मिलनसार है और खाना तोह पूछो हे मैट. कॉलेज रोड के samose-chole, मोडल टाउन के कुलचे, गोलगप्पे और राबड़ी. बड़ी मार्किट के छोले भठूरे, kulfi-falooda और जाने क्या क्या. हर मोहल्ले में कुछ न कुछ ख़ास रहता है. वैसे लकी इसलिए आया है के यहाँ उसकी पसंद का murga-machli हर जगह मिलता है वह भी इसके हिसाब से दुनिया का बेस्ट.", दीपक ने हँसते हुए लकी का जीकर किआ तोह वह भी हंसने लगा.
"बातो से तोह लगता है के शहर ज्यादा बड़ा है ये. फिर तोह मैं दीदी के साथ जितना समय मिलेगा बस घूमना पसंद करूँगा.", अर्जुन इस नए शहर के बारे में सुन्न कर रोमांचित होने लगा था.
"अर्जुन शहर भी बड़ा है और मार्किट तोह अनगिनत. पार्क, सिनेमा, विदेशी कपडे, फैक्ट्री और हर वह चीज जो होनी चाहिए तुम्हे देखने को मिलेगी. कॉलेज, यूनिवर्सिटी तोह तुम जाने हे वाले हो.", लकी ने चर्चा में शामिल होते हुए और भी बातें बताई.
"आप लोग भी घूमेंगे?", अर्जुन ने जिज्ञासा से पूछ लिए.
"कहा यार, हमारी कहा ऐसी किस्मत 12 बजे कमिश्नर साहब से मीटिंग है फिर शाम तक पुलिस लाइन में रहना पड़ेगा और कल सारा दिन काम. रात को समय मिला तोह लकी का तोह मनोरंजन तैयार रहेगा और मैं देखूंगा टेलीविज़न पर फिल्मे.", दीपक ने मायूस सा चेहरा बनाते हुए लकी को देखा.
"कोई बात नहीं. आप न हमारे शहर में समय निकलना फिर मैं आपको वह हमारे लायक जगह घुमाऊंगा. संजीव भैया भी बोरिंग लगते है लेकिन सच कहु हम दोनों भी मस्ती कर हे लेते है.", अर्जुन ने जैसे अस्पष्ट शब्दों में दोस्ती का हाथ बढ़ा दिए था दीपक के सामने.
"दोने भाई, वैसे भी मेरी शाम तोह बेकार हे रहती है. लकी का तोह घर है वह जब चाहे निकल जाता है लेकिन मैं तोह समय व्यतीत करने भी ड्यूटी चला जाता हु.", दीपक को ख़ुशी हुई थी की अर्जुन समझदार होने के साथ हे जिंदादिल लड़का था. सड़क किनारे एक ढाबा देख कर उन्होंने कार रोकी तोह दोनों दीदी की भी आँख खुल गयी. उन्हें बाथरूम दिखने के बाद कार में हे चाय और पराठे देने का बोल कर वह तीनो लोग 2 चारपाई पर आमने सामने बैठ गए.
"अब गाडी लकी चलाएगा और मैं नाश्ता करने के बाद घंटा नींद लूंगा. रात भी काली हो गयी और अब दिन भी वैसा हे जाने वाले है.", दीपक ने अपनी बात कहते हुए 5 आलू प्याज के परांठे माखन के साथ और 4 चाय एक लस्सी आर्डर कर दी. प्रियंका और आरती दीदी भी बाथरूम से मुँह धोने के बाद कार की तरफ जाते हुए अर्जुन को देखने लगी तोह अर्जुन ने इजाजत लेते हुए अपनी दीदी को भी एक तरफ चारपाई पर बुला लिए. लकी और दीपक अपनी बातों में लग गए और अर्जुन नाश्ता अपनी बहनो के साथ हे करने लगा.
"क्या परांठे है दीदी, मजा आ गया. लस्सी भी बड़ी ाची है.", अर्जुन ने खाने की तारीफ की तोह प्रियंका दीदी के बोलने से पहले हे ढाबे के संचालक, एक सफ़ेद दाढ़ी वाले आकर्षक से सरदार जी बोल पड़े.
"पुत्तर जी, यह पंजाब विच खुराक हे हैंगी जेहड़ी गबरू बनाये रखड़ी है. शहर विच मेरे छोटे प्रः (बरोथेर) डा ढाबा है गुरमेल दे नाम तोह मोडल टाउन दे गोल चक्कर कॉल, समां मिले तह होक ाइयो.", इतना कह कर वह अर्जुन के सर पर हाथ फेर कर आगे बैठे एक गरीब को chai-roti देने चले गए. अर्जुन को ाचा लगा उनका स्वाभाव और ऐसे अपनापन दिखाना.
"मैं भी यही कहने वाली थी की pyaaj-paneer के परांठे तोह गुरमेल के या फिर बंसी के खिलाऊंगी. देखना सब स्वाद भूल जाओगे.", आरती दीदी चेहरा धोने के बाद अब स्वाभाविक हो गयी थी, हमेशा की तरह खूबसूरत और प्यारी. प्रियंका दीदी भी बातों के साथ नाश्ता करने लगी और यहाँ से फारिग होने के बाद गाडी चल पड़ी अपनी मंजिल की और. अगले एक घंटे में हे सड़क के दोनों तरफ बड़ी फैक्ट्री और शोरूम दिखाई देने लगे. सड़क इतनी चौड़ी की 4 गाडी बराबर चल सके. अर्जुन बहार देख रहा था के 3 में से एक शख्स सरदार नजर आ रहा था.
"वाह दीदी, आपका शहर तोह बहुत बड़ा और ाचा है."
"अभी शहर आगे है भाई और मोडल टाउन तक जाते हुए हे 20-25 मिनट लग जायेंगे, खाली सड़क है इसलिए.", प्रियंका दीदी जिसको खली सड़क बता रही थी वह तोह पहले हे ाची भीड़ थी.
"आप शहर के आखिर में रहती हो क्या?", अर्जुन की बात का जवाब लकी ने दिए.
"अर्जुन, मोडल टाउन शहर के ठीक बीच में है और सबसे ख़ास इलाका. उस से आगे भी इतना हे शहर है और ऐसा हर तरफ से है न की सिर्फ सीढ़ी सड़क पर. हमारे शहर में तोह 4 लाख की आबादी है लेकिन यहाँ 22 लाख लोग रहते है. शायद अब तुम्हे ाचे से समझ आये.", प्रियंका दीदी के साथ आरती दीदी भी हंसती हुई अर्जुन की हैरत को देखने लगी.
"तभी सोचु की दीदी इसको खली सड़क क्यों कह रही है. मतलब प्रमुख समय पर तोह यहाँ जाम हे लग जाता होगा."
"सुबह 9-10 और शाम को 5-7 बजे के वक़्त गाडी 10 मिनट वाला सफर 25-30 मिनट में करती है.", दीपक ने भी थोड़ा ज्ञानद दिए और ऐसे हे शहर के दृश्य देखता रहा और प्रियंका दीदी लकी भैया को रास्ता समझती अपने घर तक ले आई. उन्होंने बहोत कहा था दोनों को अंदर आने के लिए लेकिन फिर कभी आने का बोल कर लकी और दीपक उन्हें घर के बहार हे छोड़ कर निकल चले.
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रामेश्वर जी के घर के बहार 11 बजे 3 गाडी कड़ी थी. 2 सरकारी और एक काली बेंज. शंकर जी घर आ चुके थे और इस वक़्त बैठक से इतर पूरा घर जैसे काट सा गया था.
"कल रात दुष्यंत मालिक होटल तुलिप में मारा गया. वह से एक 19 वर्षीया लड़की, 2 जख्मी अपराधी और 1 करोड़ बरामद हुआ है. होटल के कारिंदे का हे फ़ोन आया था और उसने पुष्टि की है के 3 लोग ऊपर गए थे उनमे से वारदात को अंजाम देने वाला भी साथ हे गया था लेकिन रूपरेखा बनवाई जा रही है.", निर्मल सिंह जी पूरी बात रामेश्वर जी को बता रहे थे. साथ हे धर्मवीर जी, परम और शंकर के साथ वह छोल साहब और 3 पुलिस वाले भी बैठे थे.
"दुष्यंत वह से निकला कैसे?" रामेश्वर जी पहला सवाल वही था जो हर पुलिस वाले का होता है.
"शराब पीने के बाद उसने कांस्टेबल से खुली हवा में घूमने की रिक्वेस्ट की थी पंडित जी. बप की शिकायत थी उसको तोह ऐसा करना ठीक लगा. लेकिन दुष्यंत भी भली भांति वाकिफ था हमारी जगह से जो वह ऐसा कर गया.", निर्मल सिंह ने लाचारी दिखते हुए नजरे झुका ली.
"हो क्या रहा है यहाँ पर.? पहले ताई के घर हादसा हुआ, फिर सुशीला और शीला वाला काण्ड. उसके बाद बहन सिंह भी चौड़ा हो गया मेरी gair-maujdgi में और अब ये दुष्यंत कैसे और क्यों शामिल हुआ?", शंकर जी ने आवाज नीची रखते हुए हे नाराजगी में दिल की बात कही. लेकिन रामेश्वर जी ने वह जैसे सुनी हे नहीं.
"रात को ड्यूटी पर सिर्फ कांस्टेबल हे था.?", ये सवाल धर्मवीर जी ने किआ.
"जी. 2 कांस्टेबल खाना खा रहे थे और एक दुष्यंत के साथ बहार गया था. अफसर तोह आपको भी पता है के 8 बजे के बाद वह नहीं रहते. लेकिन सोचने वाली बात है के इतना पैसा, लड़की और आदमी के साथ दुष्यंत क्या प्लान कर रहा था? मामला आपसी विवाद का हे होगा जो साथ आया आदमी हे ये अंजाम दे गया.", निर्मल सिंह की बात पर रामेश्वर जी खामोश रहे. वैसा हे हाल धर्मवीर जी, शंकर और परम का था.
"भाग गया चलो मान लिए. लेकिन 6 किलोमीटर दूर पहुंच गया तोह मतलब इसमें कोई न कोई तोह शामिल हे था. निर्मल जी ऐसा तोह नहीं की बकरा जान बूझ कर हलाल हुआ हो.?", छोल पूरी का ये सवाल हर पक्ष को खोल रहा था.
"छोल पूरी, ये पुलिस विभाग है आर्मी नहीं जहा एक छोल के कहने पर पूरी रेजिमेंट बात मान लेती है. यहाँ हमारा सिपाही तक आजाद विचार लिए रहता है चाहे उसकी गलती से िग की नौकरी चली जाए.", िग कपूर के इतना कहते हे छोल साहब ने उनका हाथ पकड़ लिए.
"मेरा ये मतलब नहीं था कपूर. चूक हुई है और अभी 2 लोग बाकी थे जिनके साथ दुष्यंत का भी रिश्ता हो सकता था. उनसे खतरा है और इसलिए दुष्यंत की ज़िन्दगी की परवाह थी. नहीं तोह मैं खुद गोली चलने में देरी नहीं करता."
"4 लोगो की लाश भी मिली है. एक तोह पार्षद रमन कुमार और 3 उसके साथ के हे व्यापारी थे. आप जानते है किसी को? दुष्यंत के साथ उनका गठबंधन भी था और चारो हे लोक दाल के ख़ास थे.", एक 3 सितारा पोलिसवाले गट्टे की फाइल उनके सामने रखने के बाद अपनी जगह वापिस खड़ा हो गया.
"ये कब हुआ?", रामेश्वर जी की लिस्ट में रमन कुमार का भी नाम था. और उसकी मौत भी ठीक उसी दिन होना एक अलग कहानी बता रहा था.
"रात किसी ने **** होने फ़ोन किआ था के सड़क के बीच 4 लोग पड़े है. करीब 3 बजे की बात है. पोस्टमॉर्टम में हत्या तोह साबित हुई लेकिन कोई सबूत या जिस्म पर निशान नहीं मिला.", उस इंस्पेक्टर ने डिटेल दी और धर्मवीर जी के साथ हे रामेश्वर जी भी फोटो और रिपोर्ट देखने लगे.
"ाचा निर्मल जी, आप टीम को ले जाइये. मैं शाम को बात करता हु. कपूर साहब, आप छूती पर है तोह सतीश के साथ जाम शुरू कीजिये मैं इनके घर आता हु अभी.", रामेश्वर जी ने धर्मवीर जी को छोड़ कर बाकी सभी सरकारी व्यक्तियों को जैसे जाने का इशारा दिए और छोल साहब भी अब िग से गले मिलने के बाद उन्हें अपने साथ यह ले गए. शंकर जी भी जाम की बात सुन्न कर खड़े हुए लेकिन इस बार आवाज बड़े सांगवान जी की आई, पंडित जी की जगह.
"तुम दोनों यही बैठो अभी.", परम और शंकर दोनों हे ठिठक कर रुक गए लेकिन छोल साहब ने मदद कर भी नहीं देखा उन्हें. बैठक का दरवाजा बंद करने के लिए उन्होंने परम को कहा और शंकर को सामने बिठा लिए.
"बरखुरदार, बस इतना कह दो के तुम कल शाम 7 बजे अमेरिका से वापिस आ गए थे.", धर्मवीर जी का ये सवाल शंकर जी से था. रामेश्वर जी भी ध्यान से देख रहे थे.
"ये अभी आया है और मैं हे तोह लेके आया हु.", छोटे सांगवान ने बीच में जवाब दिए.
"तुम्हे पता है के तुमने क्या किआ है शंकर? दुष्यंत हमारा निशाना नहीं था, रमन के साथ ताराचंद गर्ग भी था इस मामले में. इन सबमे अमीर और ताक़तवर ताराचंद हे है जो आने वाला मला है. तुम्हारी वजह से वह हमारी पकड़ से निकल गया.", धर्मवीर जी के लफ्जो में अलग हे परेशानी थी. बात पूरी करने लगे.
"वह वर्तमान सर्कार में भी बड़ी हैसियत रखता है लेकिन तुमने सब gud-gobar कर दिए.", हताश से वह रामेशवर जी का हाथ पकड़ कर बैठ गए. कुछ पल ख़ामोशी छायी रही और इस बार रामेश्वर जी बोले.
"तोह ताराचंद को भी मार दिए?"
"पुलिस को 5 मिले है लेकिन 7 और मिलने बाकी है. मैं आप जितना दरियादिल नहीं हु और मेरी माँ की नींद एक रात भी खराब हुई तोह मैं शहर मिटा दूंगा उनके सुकून के लिए. दुष्यंत भी आपने छोड़ा था और ताराचंद के लिए चाचा ने मन किआ था. मेरी मज़बूरी थी की वह मैं बेबस था, दूर था लेकिन अब अगर किसी ने भी ऐसी गलती की तोह उन्हें मालूम रहेगा शंकर यही हैं.", बिना कोई जवाब सुने शंकर बहार निकल गया, धर्मवीर जी ने भी परम को इशारे से उसके साथ जाने को कहा.
"तोह आपको ये मालूम था?", धर्मवीर सांगवान जी का सवाल साधारण हे था.
"हाँ. और कौन हो सकता है जो लाशो का सैलाब ले आये? जब इसने कहा के ये आज दोपहर तक वापिस आ जायेगा मैं समझ गया था के ये रुकेगा नहीं लेकिन निर्मल की कोनसी नब्ज़ इसने दबाई हुई है जो वह इसका साथ दे रहा है? शंकर ने एक पोलिसवाले को मारा है धर्मवीर."
"नहीं भाई साहब. शंकर ने सबूत हे कहा छोड़ा है. दुष्यंत मालिक तोह आपको मरवाने की सुपारी दे रहा था. ये रही रिपोर्ट.", बड़े सांगवान जी ने फाइल का आखिरी पन्ना दिखते हुए कहा. जहा पुलिस की लेखनी में भी रामेश्वर जी को 25 साल पुराणी लिखवत नजर आ गयी.
"क्या करू मैं इसका धर्मवीर? कपूर और सतीश तोह इसके हे साथ है, मेडिकल भी ये करवा लेता है और चंदू भी मेरा दोस्त होने पर इसके साथ है.", रामेश्वर जी ने अपनी लाचारी दर्शाई.
"भाभी. भाई साहब ये सब इसलिए हुआ क्योंकि भाभी को ये बात पता लगी होगी. ऊपर से कौन बाप चाहेगा के उसका बीटा वह गन्दा काम करे जिसमे वह पहले हे शामिल है.", धर्मवीर जी भी थोड़ा परेशां थे.
"ताराचंद छोटी मोती हस्ती नहीं था भाई."
"7 लोग मारे है मतलब शंकर ने वंश हे ख़तम कर दिए. मैंने पहले हे कहा था के संजीव और दीपक को अलग रखना शंकर से क्योंकि वह दोनों आपके साथ रह कर भी शंकर से सीखने के लिए बेताब है. बुरा मैट मानियेगा लेकिन आप उस से ज्यादा हे क्रूर थे. वह अलग बात है के आपने हमेशा छोटे मोठे मुजरिम माफ़ किये लेकिन लड़की, माँ और धरम के खिलाफ वाले तोह आपने भी ज़िंदा नहीं छोड़े.", धर्मवीर सिंह ने टेबल से पानी का गिलास उठा कर रामेश्वर जी के मुँह पर लगाया तोह उन्होंने वह थाम कर पी लिए.
"तुम सब जानते हो दोस्त. मैं आज घर पर हु 8 साल से. लेकिन इन maa-bete को तोड़ना नामुमकिन है."
"तोडना क्यों है भाई साहब? जोड़ दीजिये फिर देखिये शंकर को घर से फुर्सत नहीं मिलेगी. मैं भी परेशां हु इस से क्योंकि ये उस जगह पहुंच चूका है के 1% ज़िन्दगी पर भी ये 100 का डाव खेलने लगा है. इसमें शंकर के संहार के साथ हे नारायण की जीवन देने का रूप भी अख्तियार हो चूका है. चैलेंज न मिले तोह शंकर खुद पैदा कर लेता है. इसको अपनी माँ के हे पास छोड़ दो.", धर्मवीर जी की बात में जो सत्य था वह रामेश्वर जी को समझ आ गया था.
"सीधा बोलो न के अर्जुन के सामने ला खड़ा करू. धर्मवीर, भजन को फ़ोन लगाओ और बोलो के रामेश्वर ने याद किआ है. देखे जरा शंकर कितनी देर टिकता है मेरे शेर के सामने. मैं बेशक नहीं चाहता था के कौशल्या का हम टूटे लेकिन शान्ति जरुरी है और शंकर को ये नहीं पता के उसकी माँ भी अब प्यार बाँट चुकी है. इस बार अर्जुन होगा मैदान में अभिमन्यु नहीं.", इतनी बात सुनते हे धर्मवीर जी के चेरे पर लम्बी मुस्कान आ गयी और फ़ोन को पास खींचते हुए उन्होने अपनी बात कही.
"मतलब अब दोनों को नहीं पता के मुकाबला किस से है और जीत कहा? मेरा डाव अर्जुन पर है.", धर्मवीर जी ने नंबर लगाने से पहले कहा.
"अर्जुन का डाव अपने बाप पर हैं.", रामेश्वर जी ने बेहिचक कहा और नंबर मिलने के बाद फ़ोन ले लिए.
"नमस्कार पंडित जी. कहो कैसे याद आ गयी इस नाचीज की?", सामने भी जैसे नंबर पता लगने की मशीन थी.
"ऐसा है भाई के शंकर की माँ की तबियत ठीक नहीं रहती जबसे मेरे साले का देहांत हुआ है. तुम तोह कम बने बाद फ़ोन करते नहीं मुझे, अपनी बहिन से गप्पे लगा लेते हो. जरा शंकर का कुछ करो के वह यहाँ पास रह सके. राजकुमार बहार रहता है नरिंदर की भी समस्या है.", रामेश्वर जी ने जो शब्दों का जाल बना सामने वाला उसमे पल में हे फंस गया.
"क्या बात कर दी आपने जीजा जी. शंकर कल सुबह हे आपके शहर का सिविल हॉस्पिटल समो के हिसाब से ज्वाइन करेगा. बाकी बचो की शादी और समारोह में मैं आ रहा हु. जीजी ने कल हे मुझे बता दिए था. कोई और सेवा हो तोह कहिये."
"बस तुम इतना कर दो मैं समझूंगा के मैंने अपनी बीवी के लिए कुछ तोह किआ. तुम जानते हे हो के शंकर उसकी सांस है.", रामेश्वर जी ने तुरुप का इक्का हे मार दिए.
"हाँ तोह वह है हे. दीदी ने तोह खुद हे कहा है के होने वाली बहु के लिए मैं अपनी गाड़ियां और लोग लागू जिस से उन्हें भी पता लगे के परिवार कैसा है.", रामेश्वर जी उसकी मंदबुद्धि पर बस मुस्कुरा दिए.
"जो करना है करो. मैं बीच में नहीं पड़ता. बस मेरी बीवी मुझे प्यारी है और उसका बीटा उसके पास. शंकर जो भी दलील दे ख़ारिज कर देना."
"बात करते हे हो गया जी. अभी नोटिस गया और उसका फार्मोसे का सामान भी मैं इधर मंगवा लूंगा.", भजन ने इतना कहा और हलकी फुलकी बात के बाद फ़ोन कट हो गया.
"भाई साहब शंकर को यहाँ रख रहे हो? मेरा काम भी तोह वह चलता है."
"धर्मवीर, वह तुम्हे बाप हे मानता है. तुमसे तोह अलग नहीं किआ. लेकिन सच कहु 8 साल मैंने कभी किसी पर नहीं लगाए और मैं अब देखना चाहता हु के क्या अर्जुन इस काबिल है जो कौशल्या के 9 महीने के बाद 45 साल पर भरी पड़ सके. दिमाग कहता है के शंकर जल्लाद और अधूरा इंसान है. दिल कहता है के अर्जुन के साथ रह कर वह इंसान भी बनेगा और पंडित भी. मुझे उसकी हरकत से परेशानी नहीं है, जिम्मेदारी से है.", रामेश्वर जी ने बात खोल कर रख दी.
"अर्जुन को मैं नहीं जानता. थोड़ा उल्लेख करेंगे."
"धर्मवीर, वह अजय है. हार के भी वही जीतेगा ये गुर उसको पता है. उमेद यही कहता है के शंकर की जवानी अर्जुन का बचपन और बाबा मलंग का बुढ़ापा अर्जुन का ये समय है. उसके पास शायद हमारे तक पहुंच हो लेकिन सबूत नहीं होने पर उसने सवाल नहीं किये. लेकिन यहाँ वह रेखा के साथ होगा, कौशल्या के सामने दोनों होंगे, जिम्मेदारी भी होगी. ऊंच नीच भी होना लाजमी है. शंकर को पता लग्न चाहिए के वह अब बाप है, बीटा नहीं.", रामेश्वर जी ने बात विस्तार से कही.
"अर्जुन कुछ और भी है. याद है न आपको."
"शंकर को देखने दो जरा के ताक़त के बावजूद होश रखना जरुरी होता है. मौका मैं खुद दूंगा. तुम भी जानते हो लिस्ट 12 की थी शंकर वही तक सिमित रहा. 3 जान कर छोड़े है शंकर के लिए लेकिन अब अर्जुन अपने बाप के साथ रहने वाला है.
खेल -1
अर्जुन थोड़ा देरी से आया था लेकिन किसी ने ज्यादा सवाल नहीं किये. आज बहार छोल पूरी ने अपने आदमी मुनीर को देखभाल के लिए लगा दिए था. रात 10 से सुबह 6 तक वह एक दिन के लिए पंडित जी के घर था. अर्जुन 5 मिनट मुनीर से बात करने के बाद अंदर चल दिए. कोमल दीदी नाहा कर अपने कमरे में गयी थी और अर्जुन ख़ामोशी से अपनी माँ के पास आ गया.
"मिल आया वालिए जी से?", रेखा जी भी स्टोर से गाउन पहन कर बीएड के पास हे आई थी.
"जी माँ. अंकल आंटी ने डिनर रखा था, कल उनकी बेटी इंग्लैंड जा रही है इसलिए. संधू सर भी आये थे तोह थोड़ा समय लग गया. आज मैं यही सोने वाला हु.", अर्जुन ने पहली बार खुदसे हे टेबल पर रखे अपने कपडे लिए और स्टोर में जा कर बदलने लगा. माँ अभी भी बात कर रही थी.
"पहले तोह नहीं बताया के तुम वालिए जी के घर भी aate-jaate हो. वैसे उनके एक बीटा और बेटी है न? बीटा भी इंग्लैंड हे रहता है.", बिस्टेर को ठीक करते हुए रेखा जी ने पुछा.
"हाँ, वह इंग्लैंड में हे मैरिड है और अन्नू नाम है उनकी बेटी का जो फिजिक्स में रिसर्च प्रोग्राम के लिए वह जा रही है. अंकल से ज्यादा आंटी के साथ मेरी जमती है. अन्नू मेरी टीचर थी थोड़े समय के लिए और संधू जी की बेटी की सगाई के वक़्त ाचे से पहचान हुई थी सबसे.", अर्जुन बहार आने के बाद अपना पर्स, रुमाल और वह उपहार टेबल पर रखने के बाद माँ के बराबर लेट गया. अब बड़ी लाइट की जगह वह जीरो का बल्ब रोशन था. रेखा जी हमेशा सोने से पहले नहाती थी और अब अर्जुन को वही महक आ रही थी जिस से उसको सुकून मिलता था. लेकिन आज वह बस उनकी तरफ आराम से करवट लिए लेता रहा.
"ाचे लोग है और तेरे पापा के दोस्त भी है वालिए जी. बस आना जाना काम हो गया पिछले 6-7 साल से. तेरी पापा की ट्रांसफर हो गयी और उनका बीटा भी बहार चला गया. लेकिन तेरे पापा को समय मिलता है तोह मिलने जाते रहते है.", रेखा जी ने हलके हाथो से अपनी नाजुक उंगलिया अर्जुन के सर पर फिरने लगी, सुकून देने के लिए.
"आंटी भी बहोत ाची है. मेरा बहोत ध्यान रखती हैं और मैं भी उनके साथ लूडो खेलता हु तोह कभी किचन में हेल्प करवा देता हु.", अर्जुन ने घुटने मोड़ते हुए अपना सर तकिये से निचे लाते हुए चेहरा गाउन के सामने कर दिए. रेखा जी ने भी एक पल के लिए हाथ सर से हटा कर चैन खोली और ऊपर वाला उभर अर्जुन के सामने कर दिए. निप्पल अभी हल्का सूजा हुआ था और एक पल देखने के बाद अर्जुन ने होंठो में भर लिए. रेखा जी फिर से उसका सर सहलाने लगी साथ हे दोनों की आँखे कुछ पल के लिए बंद हो गयी.
"वह हमेशा से हे ऐसी हैं. लोगो से मिलकर उन्हें ख़ुशी मिलती है और जल्दी हे सब पर भरोसा कर लेती है. बस उनका बीटा बहार चला गया तोह उन्होंने भी खुद को बदल लिए. अब पहले जैसी नहीं रही.", रेखा जी अर्जुन का सर सहलाती हुई खुद भी बड़ा हल्का महसूस करने लगी थी. स्टैनो का बोझ अर्जुन हल्का करता हुआ उन्हें आराम पंहुचा रहा था. वह आगे कुछ बातें करती उस से पहले हे वह नींद में जा चूका था.
'बिलकुल नहीं बदला, ले थोड़ी देर ये वाला पी.', अर्जुन को सोये में भी दूध पीटा देख वह मुस्कुराने लगी और निचला उभर उसके होंठो में दाल कर खुद भी आँखें बंद करके अर्जुन से लिपट गयी.
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Crime-branch की ये ईमारत शहर से 5-6 किलोमीटर बहार थी जहा चारदीवारी के बीच 2 एकड़ जामें को ाचे से वृक्षों से सुसज्जित रखा गया था. ठीक बीच में ये 2 मंजिला ईमारत में कई कमरे और दफ्तर थे और इनमे से हे एक कमरे में ये 55-56 साल का रोबीला सा आदमी एक कुर्सी पर बैठा जाम पी रहा था. चेहरे पर ज़माने भर का गुस्सा था और इस जगह पर होने की बेबसी. जाम पीते हुए वह ख़ास तरीके से होंठ भींचता अपने सामने बैठे व्यक्ति को नफरत से देख रहा था.
"सर, मुझसे क्या नाराजगी है? मुर्गा, शराब और उधर ख़ास गद्दा भी लगवा दिया मैंने आपके लिए फिर भी 2 शब्द तारीफ की जगह गुस्सा दिखा रहे हो.", सेव 6 फ़ीट का ये 26-28 वर्षीया आदमी मुस्कुरा रहा था. शरीर भी मजबूत और haav-bhav भी एक काबिल अफसर के थे.
"तुम ओहदे में बराबर हो दीपक लेकिन मैं सीनियर हु तुम्हारा. बहनचोद तुम सब लोगो की क्या हालत करूँगा वह देख कर तुम्हारा रोना न निकल गया तोह मैं भी एक बाप का नहीं.", दुष्यंत शाम से यही बंद था और दिग के जाने के बाद अब देखभाल और पूछताछ का जिम्मा इस नौजवान के पास था. सस्ती शराब और कामचलाऊ सी प्लास्टिक की प्लेट में रखे तंदूरी मुर्गे से वह ाची सेवा कर रहा था दुष्यंत मालिक की.
"सर, मैंने तोह रैंक की बात हे नहीं की. आप मेरे सीनियर है इसलिए तोह आपके लिए पेग बना रहा हु. आजतक हाथ नहीं लगाया इन दोनों चीजों को लेकिन देखिये आपके लिए ये भी कर रहा हु. आप तोह मेरा ख्याल रखने की जगह गाली दे रहे है.", दीपक वैसे हे मुस्कुराते हुए फिर से जाम बनाने लगा. यहाँ न बर्फ थी और न ठंडा पानी. लेकिन घड़े के पानी से भी काम चल हे रहा था.
"2 करोड़. 2 करोड़ 24 घंटे में तुम्हारे पास होंगे बस मेरे 2 काम कर दो.", दुष्यंत ने वह अधपका सा मांस का टुकड़ा उठा कर चबाते हुए कहा. थोड़ा बहोत बहार भी गिर रहा था जैसे भूख जोरो की लगी हो.
"इतना तोह हमारे पूरे गाँव में किसी ने देखा नहीं होगा. 2 करोड़ के लिए तोह मैं सबको मारने के लिए तैयार हु.", अभी दोनों बातें कर हे रहे थे की एक कांस्टेबल ने हलके से दरवाजा खटखटाया और अंदर आ गया. सलाम करते हुए वह जैसे आदेश का इन्तजार करने लगा था.
"रौनक जरा बहार गश्त लगा लो और बाकी सबसे भी कहना के यहाँ जरुरी काम चल रहा है.", दीपक की बात सुन्न कर हाँ में सर हिलने के बाद फिर से सलाम बजाय और बहार चला गया.
"मैं कह रहा था के 2 करोड़ तुम्हारे पास और बस 2 काम करने है.", दुष्यंत ने एक छोटा सा घूँट पीने के बाद बात जारी की लेकिन जवाब में दीपक ने बस सहमति जताई जैसे पूछ रहा हो के पूरी बात कहो.
"राजपाल और अमरीक के बयान के साथ हे मेरे खिलाफ जो बलात्कार और हत्या के सबूत जमा किये गए है वह बिना chhed-chaad के मुझे चाहिए. और यहाँ से दिल्ली तक जाने का इंतजाम. ये 2 काम के बदले 2 करोड़. क्या कहते हो?"
"डील बुरी नहीं है और मैं कोशिश करता हु लेकिन आधे पैसे अभी चाहिए.", दीपक ने अपना पक्ष रखते हुए थोड़ी गंभीरता से दुष्यंत को देखा.
"फ़ोन का इंतजाम करवाओ, एक करोड़ मैं अभी तुम्हारी कही जगह भिजवा देता हु.", दुष्यंत के इतना कहते हे दीपक कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और दरवाजा बंद करके साथ वाले कमरे से एक लम्बी तार वाला टेलीफोन लेकर फिर से अंदर आ गया.
"क्सक्सक्सक्स दूकान के बहार मेरा आदमी मिलेगा मोडल टाउन में, पैसा उसके पास पहुंचना है. एक करोड़ मिलते हे मैं आपको यहाँ से बहार भिजवा दूंगा और बाकी पैसा सबूत देते समय मैं खुद लूंगा. दिल्ली आप कल निकलना आज रात होटल तुलिप में मेरे खास कमरे में रहिये.", दीपक की बात सुन्न कर दुष्यंत के चेहरे पर ख़ुशी चा गयी. नंबर मिलाने से पहले उसने कहा.
"एक काम करो फिर. अपने आदमी को तुलिप हे आने को कहो, वही 2 करोड़ दे देता हु और रात की थकान दूर करके वही से दिल्ली निकल जाऊंगा. सबूत मेरा आदमी तुमसे ले लेगा.", दुष्यंत जरुरत से ज्यादा हे कड़ियल और हरामी इंसान था. जिसका विश्वास दीपक को भी नहीं था लेकिन उसने रजामंदी जाता दी और दुष्यंत नंबर मिलाने लगा.
"सट्टे, अनाज मंडी वाले गोदाम से 2 करोड़ ाचे से बैग में भर कर तुलिप होटल पहुंच आधे घंटे में. साथ हे रात के लिए एक नजराना भी, थोड़ा कमसिन सा.", इतना बोल कर सामने वाले की थोड़ी बात सुन्न कर दुष्यंत ने फ़ोन रखा और दीपक से अपने आदमी को घंटे बाद बुलाने को kaha.Deepak ने भी अपने आदमी को फ़ोन करके होटल से पैसा लेने को कहा एक घंटे बाद. हाथो में हथकड़ी पहनते हुए वह दुष्यंत को ले कर बहार आ गया. किसी ने सवाल नहीं किआ अपने अफसर से और मारुती 800 में बैठा कर दीपक दुष्यंत को बड़े आराम से बहार निकाल ले आया. रस्ते में बस 2-4 बात हुई और कार 10 मिनट बाद हे इस साधारण से होटल के बहार आ रुकी. हथकड़ी खोल कर दीपक खुद हे दुष्यंत की तरफ का दरवाजा खोल कर उसको लिए होटल में आ गया.
"मेरा कमरा खली है?", दीपक ने काउंटर पर बैठे जवान से लड़के को पुछा और उसने मुस्कुराते हुए खड़े हो कर एक चाबी हवाले कर दी.
"मेरा कोई दोस्त या साहब को पूछने कोई आये तोह 204 में भेज देना. ख़ास है अपने.", दीपक ने 50 का नोट देते हुए लड़के को खुद किआ और कमरे की तरफ चल दिए. दूसरी मंजिल पर 4 कमरे थे और सबसे आखिरी वाले को खोल कर दीपक ने दुष्यंत को कमरा दिखाया और आराम करने का बोल कर वापिस चला गया.
"चुटिया साला. किसने पुलिस में भर्ती कर दिए गांडू को? इसकी गांड भी ाचे से मारूंगा.", दुष्यंत बिस्टेर पर बैठने की जगह खिड़की के पास खड़ा बहार देखने लगा. जल्द हे दीपक अपनी मारुती कार को चलता वह से गायब हो गया जैसे दुष्यंत पर उसको पूरा विश्वास हो. लेकिन दुष्यंत मुचो पर हाथ फिरता वही खड़ा रहा जबतक बहार एक और गाडी न आ कर रुक गयी. ये उसके हे आदमी थे और 2 लोग गाडी में बैठे रहे बस एक आदमी और एक जवान लड़की होटल की तरफ बढ़ गए.
"खेल खेलने से पहले जरा पानी निकल हे लू.", लुंड को पतलून के ऊपर से खुजाते हुए वह बिस्टेर पर बैठ गया. पहले शराब का हल्का सुरूर था और अब आने वाली लड़की के लिए उत्तेजना में नशा दोगुना हो रहा था. जल्द हे दरवाजे पर दस्तक हुई.
"सट्टे दिल खुश कर दिए, साली क्या हूर लेकर आया है.", दरवाजा खोलता हुआ दुष्यंत कही ज्यादा हे खुश था. लेकिन अंजाम तोह सपने में भी नहीं सोचा था जो हो गया. मुँह पर जोरदार मुक्का लगते हे भारी शरीर बिस्टेर पर जा गिरा.
"आज ये mehmaan-navaaji का मौका गलती से मुझे मिल गया है मालिक.", नाक और होंठो से बहते खून से ज्यादा दर्द तोह सामने खड़े आदमी को देख कर दिल में होने लगा था दुष्यंत मालिक को. न सट्टे आया था और न लड़की लेकिन जल्लाद जरूर खड़ा था जिसके चेहरे पर ज़माने भर की ठंडक और भूरी आँखों में ख़ास चमक थी.
होटल के बहार भी अब न वह गाडी थी और न उन लोगो में से किसी का निशान. सबकुछ दुष्यंत की मर्जी से नहीं हुआ था.
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साढ़े 4 बजे अर्जुन की आँख खुली तोह दोनों उभर उसके चेहरे पर थे. उनसे आती वह सोंधी महक ाचे से साँसों में भरने के बाद वह सावधानी से अपनी माँ का हाथ तकिये पर रखते हुए कमरे से बहार निकल कर बाथरूम में आ गया. अगले 15 मिनट में हे वह नाहा धो कर बहार आ चूका था. कपडे माँ के हे कमरे में थे और टोलिया लपेटे वह अंदर आ गया. रेखा जी भी उठ चुकी थी और अर्जुन को तैयार होते देख उसके पास आ कड़ी हुई.
"नींद ाची आई?"
"बेस्ट.", अर्जुन ने ट्रैक पाजामे के ऊपर टीशर्ट पहन ली थी. और माँ के खूबसूरत चेहरे को इतने करीब देख कर अब ज्यादा सबर न कर सका. वह मॉटे होंठ चेहरा धुले बिना भी रस से भरे थे जिनपर अपने होंठ रखता वह ये गहरा चुम्बन करने लगा. जिस्म पर कही हाथ न लगते हुए दोनों कुछ पल इस लम्हे में क़ैद रहे और अलग होते हे रेखा जी नजरे झुकाये जाने लगी.
"गलती हो गयी क्या माँ?", अर्जुन ने उनकी कलाई पकड़ते हुए पुछा.
"पागल है तू. बाथरूम जाने दे.", वह मुस्कुराई तोह अर्जुन के दिल को स्वर्ग सा एहसास हुआ. उनके हसीं चेहरे और बिखरी जुल्फों को देखता वह हाथ थामे खड़ा रहा.
"जाने दे न अर्जुन.", इस बार होश में आते हे वह उनसे पहले कमरे से बहार निकल गया.
'पगला कही का. मुँह भी धोने की परवाह नहीं की.', उसके बहार निकलते हे रेखा जी ने वही गीला टोलिया कुछ सोच कर उठाया और वो भी नहाने के लिए चली गयी. अर्जुन जूते पहन कर बहार जा चूका था और जाने से पहले मुनीर को भी ठन्डे पानी की बोतल पकड़ते हुए haal-chaal पूछ गया था. मौसम में हलकी उमस थी लेकिन फिर भी सुकून भरा और शांत माहौल था. हलके कदमो से दौड़ता अर्जुन आज कुछ दुविधा में था लेकिन कुछ सोचता हुआ वह पार्क की और बढ़ गया.
"आज बेचैन हो कुछ.", जाने कैसे आचार्य जी उसका दिल नजर भर में हे पढ़ लेते थे.
"ऐसा कुछ नहीं है गुरु जी. बस कल का दिन थोड़ा ज्यादा हे व्यस्त था और नींद भी टुकड़ो में हे लेनी पड़ी.", उनके पाँव छूने के बाद अर्जुन 10 मिनट दौड़ने का बोल कर पटरी पर तेज कदमो से भागने लगा. आचार्य जी shaant-bhav से उसको दौड़ते देख अपने नरम जूते एक तरफ रखते हरी घांस पर चहल कदमी करने लगे. ऐसे में भी वह आँखें बंद करते गहरी साँसे ले रहे थे. फिर इस हिस्से के ठीक बीच में घांस पर बैठते हुए उन्होंने पद्मासन की मुद्रा धारण कर ली. अर्जुन पूरे 5 चक्कर लगाने के बाद उनके पास आया तोह वह भी शरीर को ढीला छोड़ कर आराम से बैठ गए.
"तोह अब बताओ के परेशां क्यों हो?", सवाल वही था और अर्जुन के चेहरे का पसीना भी जैसे उसके भाव न छुपा पाया.
"एक दोस्त है, ख़ास. वह आज जा रही है 3 साल के लिए देश से बहार. रात मैं डिनर पर भी गया था उसकी ख़ुशी के लिए और वह भी सरप्राइज करते हुए. वह से आते हुए मेरे कदम साथ नहीं दे रहे थे दादा जी. लेकिन मैं माँ के पास सोया तोह सब भूल कर गहरी नींद ली. लेकिन घर से बहार आते हे आज कदम यहाँ आना नहीं चाहते थे और मैं वह जाना नहीं चाहता.", अर्जुन कुछ पल झुक कर खड़े होने के बाद फिर आचार्य जी के बगल में हे घास पर पाँव फैलते हुए बैठ गया. आचार्य जी भी सब ध्यान से सुन्न रहे थे और अर्जुन को पढ़ रहे थे.
"तुम वही जाना चाहते हो लेकिन खुद को कमजोर साबित नहीं करना चाहते बीटा. उस दोस्त की ख़ुशी के लिए तुमने रात जो किआ वह सही था लेकिन अब तुम्हारा अपनी ख़ुशी को दबाना गलत है. जिसकी परवाह हो उसके दर्द में शामिल होना जितना जरुरी है उतना हे जरुरी है उस से तब मिलना जब तुम्हे भी ख़ुशी की जरुरत हो. कभी कभी ऐसे प्यारे स्वार्थ करना जरुरी है.", आचार्य जी ने पीठ पर हलकी थकी देते हुए जैसे अर्जुन को खड़ा होने को कहा.
"गलत नहीं लगेगा?"
"लगेगा न, अगर तुम वक़्त रहते भी ना मिलने जाओ तोह गलत लगेगा. और शायद तुम जो आज कहना चाहते हो उसकी एहमियत तब्ब न रहे जब समय का चक्र घूम जाये.", आचार्य जी भी खड़े हो गए थे. अर्जुन ध्यान से उन्हें देखता रहा जैसे अब वह उन्हें पढ़ना चाहता हो.
"समय का एक सही पल.", उन्होंने फिर से अर्जुन को चेताया, मुस्कान के साथ. अर्जुन भी तुरंत उनके पाँव छु कर वह से निकल भागा. अब कदम असमंजस में न थे और न शरीर में किसी तरह का कोई दबाव. अन्नू से वह पहले उसकी ख़ुशी के लिए मिला था लेकिन अब वह अपने लिए उस से बात करना चाहता था, बताना चाहता था के अन्नू की एहमियत ख़ास है उसके जीवन में और वह भी उसको जरुरत से ज्यादा याद करेगा जाने के बाद. कदम khud-ba-khud आ रुके सरदार जी के घर के सामने. सफ़ीद टीशर्ट से पसीना पानी की तरह टपक रहा था और भीगे हुए बाल आँखों के सामने आ रहे थे. घडी 5:25 बजा रही थी और अर्जुन ने बिना सोचे बस धड़कते दिल से वह घंटी का बटन दबा दिए.
"वालिए जी तोह गुरुद्वारा साहिब चले गए अभी 5 मिनट पहले.", ये आवाज सुनते हे अर्जुन ने नजर घुमाई तोह ये आंटी वही थी जो अन्नू की माता जी के पास आती रहती थी. कहा तोह वह हिम्मत करके 2 किलोमीटर की दुरी उड़ता हुआ तये करके आया था और इनके शब्दों ने शरीर हे ठंडा कर दिए. वह भी इतना कह कर हाथ में दूध का दल्लु लिए अपने रस्ते चली गयी. गहरी सांसें लेता वह आँगन में कार को नदारद देख कर भारी कदमो से अपने घर की और जाती गली की तरफ बढ़ने लगा.
"अर्जुन.", यही आवाज तोह थी जिसके लिए अर्जुन जाने कितना बेचैन था. सपना न हो बस ये सोच कर एक बार फिर से नजर घुमाई तोह अंदर के दरवाजे को खोले अन्नू उनींदी सी कड़ी अर्जुन जैसी हे हालत में थी. लेकिन अर्जुन सजग था और इस बार वह जैसे अन्नू को नजरो से दूर नहीं होने देना चाहता था. गेट की कड़ी खोल कर वापिस बंद करता वह पलभर में हे अन्नू के सामने जा खड़ा हुआ.
"तुम नहीं जानती मेरे साथ क्या हो रहा है.", अन्नू ने अर्जुन की हालत देखि तोह साड़ी नींद काफूर हो गयी. उसका हाथ पकड़ती वह उसको अंदर करते हे दरवाजा बंद करके पीठ लगाए कड़ी हो गयी. धड़कन अपनी चाहत को यु सामने देख कर बेकाबू हो चुकी थी. भगवन क्या कर रहा है उसके साथ और अर्जुन ऐसे कैसे. लेकिन दिल के सामने सब समीकरण और उम्मीदे एक तरफ करती वह उसके पसीने से भरे जिस्म से जा लगी. ऐसी प्रभात होगी ये दोनों ने कहा सोचा था. आँखों से आंसू सब बाँध टॉड कर बहते हुए अर्जुन के सीने पर आये पसीने में घुलने लगे. दोनों के प्यार की तरह.
"ी लव यू अन्नू, मैं इस बार खुद ये कहने के लिए आया हु. जितना भी कहु के मैं ठीक हु और हम दोनों फिर मिलेंगे लेकिन एक सच ये भी है के मेरे दिल का एक हिस्सा तुम्हारी याद में सूना रहेगा. मैंने कभी महसूस नहीं किआ था के प्यार करने वाला अगर दूर हो जाये तोह कैसा लगता है लेकिन कल रात मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता था. कल रात मैं तुम्हारे लिए आया था लेकिन आज अपने लिए, हमारे लिए मुझे तुमसे मिलना था.", अर्जुन भी कसके अन्नू को बाहों के घेरे में लिए उसको सीने से लगाए खड़ा था.
"ये मेरे लिए भी मुश्किल है और मुझे भी तुमसे अकेले मिलना था जाने से पहले. बस डर था के सबके सामने तुम्हे देख कर मैं कोई गलती न कर दू. ी लव यू जान.", आज अन्नू के नमकीन होंठो का स्वाद अब तक का सबसे मीठा लग रहा था.
"मैं तुम्हे रुलाने नहीं आया अन्नू. बताने आया हु की तुम हमेशा मेरे पास रहोगी. जाने से पहले नहीं मिलना अगले 6 महीने तक जरूर खेलने वाला था.", अर्जुन उन बड़ी आँखों को चूमते हुए चेहरे को साफ़ करने लगा.
"तुम्हे इतना प्यार कब हो गया मुझसे? और देखो क्या हाल किआ है मेरा.", अन्नू ने हाली नाराजगी से अर्जुन के सीने पर मुक्का मारते हुए कहा और खुदकी भीगी टीशर्ट दिखने लगी, जहा अर्जुन का पसीना कपडे को त्वचा से चिपकाये था.
"काम या ज्यादा प्यार क्या होता है मुझे नहीं पता. और तुम मेरी हो तोह प्यार के साथ हे पसीना भी बराबर मिलेगा.", अर्जुन ने उस ताजे गुलाब से चेहरे को दोनों हाथो में लेते हुए ये गीला चुमबन्द किआ तोह अन्नू भी उसको मजबूती से पकडे बराबर साथ देने लगी. लम्बे कद के बावजूद अन्नू एड़ी उचकती ऊपर होने लगी तोह अर्जुन ने कमर थामते हुए चेहरे को देखा.
"मम्मी पापा 7 बजे तक आएंगे. हर संडे वह इस वक़्त घर नहीं होते.", अर्जुन को भी पता था के वह कहा गए है लेकिन कब आएंगे ये जानते हे कमर से हाथ निचे उन बेजोड़ मांसल कूल्हों पर आ गए. अन्नू को उठाये वह उसकी गर्दन चूमता उसके कमरे में आ गया. यहाँ भी दोनों एक कशिश से भरे चुम्बन में डूब गए. घडी के कांटो और दुनिया से परे ये 2 जिस्म और दिल एक दूसरे से लगे एक दूसरे में खोने लगे.
"जाने से पहले एक और बार प्यार नहीं करोगे?", अन्नू का हिलता सीना और लाल चेहरा अपनी हालत बयां कर रहा था. अर्जुन बस इस चेहरे को देख रहा था जो जाने कब दिल की गहराई में अपनी छाप बना गया था.
"जिस्मानी नहीं लेकिन रूमानी जरूर. आज तुम्हारे साथ मैं वह कुछ ख़ास शेयर करना चाहता हु. अगले 10 मिनट तुम बस मेरे साथ मेरा कहना मान लो.", अर्जुन ने अन्नू को फर्श पर खड़ा करते हुए गाल चूमते हुए कहा और बाथरूम से खुद का चेहरा दुरुस्त करने के बाद साथ लिए रसोई में आ गया.
"जो अब हम करेंगे वह तुम्हारे साथ हमेशा रहने वाला है.", अर्जुन ने चाय के बर्तन में थोड़ा पानी डालने के बाद चूल्हे पर उबलने रखा और अन्नू के महकते जिस्म को पीछे से बाँहों में लिए वही खड़ा हो गया.
"तुम मुझे ऐसे वक़्त चाय बनाना सीखा रहे हो?", अन्नू ने मुस्कुराते हुए अर्जुन के हाथ अपने बड़े उरोजों पर रखते हुए पुछा. अर्जुन मस्ती करता उन दोनों मांसल गोलों को दबाते हुए गोरी गर्दन पर होंठ फिरने लगा.
"हमेशा अकेले रहने से बचने का तरीका बता रहा हु. हॉस्टल में सीखा था मैंने की ख़ास पल कैसे याद रखे जाते है.", चायपत्ती के डब्बे से 2 चम्मच चाय की उबलते पानी में डालने के बाद अर्जुन 2 मिनट उसको पकता रहा. अन्नू को तोह इस सबसे कोई लेना देना न था, अर्जुन का पास होना काफी था उसके लिए. गिलास में वह काली बिना चीनी की चाय छान कर अर्जुन को साथ लिए वह वापिस कमरे में आ गया. गीली टीशर्ट दरवाजे पर तंगी थी और अन्नू उसकी गॉड में बैठी उसके सीने पर हाथ रखे हलके हलके चुम्बन लगातार करती रही.
"एक सिप लो.", अर्जुन ने वह गिलास सामने बढ़ाया तोह सिर्फ चाय की तीखी महक एक पल के लिए अन्नू को बेचैन करने लगी लेकिन अर्जुन के इतना प्यार से कहने पर गरम उबले पानी की छोटी सी घूँट मुँह में भरते हे दुनिया के सबसे बुरे जायेके का एहसास हो गया.
"हाहाहा.. बहोत बुरा स्वाद है न?", अर्जुन ने चेहरे के भाव देखते हुए हँसते हुए कहा.
"युक.. क्या है ये?", अन्नू ने मुँह के सामने हाथ रखते हुए कहा.
"मेरा प्यार, हमारा प्यार है ये अन्नू.", अर्जुन ने एक घूँट अपने होंठो से अंदर करते हुए बड़े आराम से स्वाद को महसूस करते हुए पी लिए. गिलास एक तरफ रखते हुए अन्नू के होंठो से अपने होंठ मिलते हुए इस बार जो चुम्बन किआ उसमे दोनों के होंठो के साथ हे जीभ भी अठखेलिया करने लगी और अलग होते हे अन्नू के चेहरे पर हैरत के भाव थे.
"आईटी टर्न्ड स्वीट."
"कहा न के ये हमारा प्यार है. जैसा स्वाद सिर्फ अकेले मिला, दोनों के बांटने पर वह बेहतर में बदल गया.", कसैली चाय का स्वाद भी अजीब था जो बाद में मीठा हो चूका था. इस बार अन्नू ने खुद हे घूँट भरी तोह वह अजीब महक उतनी बुरी न लगी, वह कड़वा पानी भी होंठो के साथ जीभ को तर करता आराम से निचे उतर गया. असर भी ऐसा था के दिमाग के नसों को आराम देने वाला. 5 मिनट में 10 घूँट और 5 गहरे मीठे चुम्बन. शरीर को कपड़ो के ऊपर से हे सेहलते हुए दोनों ने प्यार किआ और घडी में 6:10 का समय देखते हुए अर्जुन खड़ा हो गया.
"जल्द मिलेंगे अन्नू. जब भी याद आये तोह अब तुम्हारे पास हमारे प्यार को महसूस करने का एक pra-roop है. पंजाब न जाना होता तोह मैं ये दिन तुम्हारे साथ हे व्यतीत करता. इनका ख्याल रखना.", आखिरी लफ्ज़ कहते हुए अर्जुन ने शरारत से दोनों उभारो को पकड़ते हुए अन्नू के होंठो को कस के चूम लिए.
"ये सिर्फ तुम हे कर सकते हो. मैं तोह अब इन्हे हाथ भी नहीं लगाती. वैसे थैंक यू फॉर छीरिंग में उप. लव यू एंड टेक केयर.", दोनों हाथो को थाम कर अन्नू ने अर्जुन के दिल के ऊपर किश किआ और ाचे से गले लग गई.
"आंटी से मिलता रहूँगा और उन्हें बता देना के अर्जुन अपनी माँ के साथ उन्हें शादी का कार्ड देने आएगा. भैया और दीदी की शादी एक साथ हे है इस 21 मई को. तुम्हे भी फोटो ईमेल करूँगा.", दरवाजे तक आते हुए इस बार अन्नू भी खुश थी और अर्जुन की बेचैनी भी ख़तम हो चुकी थी. आँगन में भी अन्नू ने बिना किसी की परवाह के उसको गले लगा कर विदा किआ. अब अर्जुन के पाँव उस से अलग नहीं चल रहे थे.
अगले आधे घंटे बाद वह तैयार हो कर अपनी बहनो से मिलने के बाद प्रीती और रेणुका के साथ 10 मिनट बिता कर इस एस्टीम कार में बैठा था पिछली सीट पर आरती और प्रियंका दीदी के साथ. अगली सीट पर लकी अरोरा और दीपक स्टीयरिंग पर थे और लकी ने हे अर्जुन का परिचय दीपक से करवाया था दोस्त के छोटे भाई और शंकर जी के सुपुत्र के रूप में.
"छोटे भाई पता है के तुम आराम से जाने वाले थे लेकिन जरा सरकारी काम हमको भी था और राज्य से बहार पुलिस की गाडी से जा नहीं सकते थे इसलिए तुम्हारे साथ हो लिए. भरोसा दिलाता हु के मेरी वजह से कोई व्यवधान नहीं आएगा तुम्हारे सफर में और गुड़िया आप दोनों भी निश्चिंत रहिएगा. एक हे शहर जा रहे है तोह बस सफर हे साथ होगा. कल मेरा काम ख़तम हो गया तोह शायद वापसी में भी आप लोगो के साथ औ नहीं तोह ये पोलिसिअ आप लोगो को झेलना नहीं पड़ेगा.", दीपक हंसमुख और मिलनसार व्यक्ति था.
"भैया जैसे लकी भैया वैसे हे आप हो हमारे लिए. ऐसा मत सोचना के आप जबरदस्ती हमारे साथ जा रहे हो, हो सकता है के हम लोग हे आपके पल्ले पड़ गए हो.", अर्जुन ने हाथ मिलते हुए जवाब दिए तोह सभी के चेहरे पर हंसी आ गयी. दीपक ने गाडी चालू करते हे सही दिशा में दौड़ा दी. प्रियंका दीदी बहार देख रही थी और आरती ने चेहरे पर दुपट्टा रखते हुए सोना हे बेहतर समझा.
"वैसे अर्जुन के किस्से तोह सुने हे होंगे तुमने दीपक.", हलकी फुलकी बातों में हे घंटा गुजर गया था और प्रियंका दीदी के सोते हे लकी ने बात शुरू की.
"अगर ये वही अर्जुन है तोह maan-na मुश्किल है. वैसे अर्जुन भाई तुम अपने पिता से थोड़ा जुड़ा हो.", दीपक ने पिछले शीशे में अर्जुन को देखते हुए कहा.
"हाँ पापा हमेशा व्यस्त रहते है और मैं दिन भर घर के लोगो को परेशां करता रहता हु.", अर्जुन हँसते हुए बोलै.
"अरे भाई मेरा मतलब वह नहीं था. शंकर जी तोह इतने मजाकिया और जिंदादिल इंसान है लेकिन तुम लगता है ज्यादा बातें नहीं करते.", लकी भी दीपक की बात सुन्न रहा था, ख़ामोशी से.
"भैया ऐसा है न के आप हो पोलिसवाले और पापा भी सरकारी डॉक्टर. आप लोगो का मजाक चल जाता है लेकिन मेरा तोह सिर्फ मेरे रिटायर्ड दादा जी या रिटायर्ड छोल अंकल हे झेल सकते है. ों ड्यूटी वालो से अपना थोड़ा दूर से नमस्कार है.", अर्जुन के मजाक पर दोनों हे हंसने लगे.
"वाकई दिलचस्प इंसान हो यार. सुना है बॉक्सिंग का भी शौक रखते हो."
"हाँ संजीव भी बता रहा था के तुम ाचा कर रहे हो बॉक्सिंग में.", लकी ने भी सुर में सुर मिलाया.
"शौक तोह है सीखने का, जो भी नया सीखने को मिले मैं तैयार हो जाता हु. उसके अलावा तोह बस peid-paudhe और परिवार.", अर्जुन की बात सुन्न कर धीमी आवाज में चलता रेडियो भी दीपक ने बंद कर दिए. साफ़ 15 फ़ीट चौड़ी सड़क के दोनों तरफ हरियाले वृक्षों की कतार से बस उनकी हे कार गुजर रही थी. कही कही कोई स्कूटर या गाडी सामने से उनकी तरफ निकल आती.
"सुदर्शन को तुमने हे मारा था?", दीपक ने इस बार शीशे से पीछे नहीं देखा था. अर्जुन की दोनों बहना आराम से सोई हुई थी और लकी को भी जैसे इस सवाल की उम्मीद न थी लेकिन वह भी चुप हे रहा.
"जैसी हरकत उसने की थी तोह मैंने वही किआ जो ठीक लगा. आपको सहानुभूति है क्या सुदर्शन से?", अर्जुन अब दीपक को टटोल रहा था.
"मेरा वह मतलब नहीं था. सुदर्शन पर पहले भी कुछ केस थे और 2-3 बार उसने पुलिस टीम जो उसको पकड़ने गयी थी उस पर भी हुम्ला किआ था. शरीर तगड़ा होने के बावजूद तुम उम्र में बहोत छोटे लगते हो और अनुभव में भी. कैसे कर दिखाया तुमने वह सब?", दीपक बात को समझते हुए पूछने लगा. शरीर से वह भी तगड़ा और लम्बा था, शायद अर्जुन से भी एक इंच ऊँचा.
"इंसान 2 हे हालात में सोच से ज्यादा कर गुजरता है. जब बात परिवार की हो या फिर खुद की जान की. मेरे साथ तोह दोनों स्थिति थी वह.", अर्जुन भी उतना हे जवाब दे रहा था जितने में अगला सवाल पैदा हो सके. दीपक कुछ देर सामने सड़क पर देखने लगा और फिर अगली बात कही.
"वह कबड्डी सिर्फ शौक के लिए खेलता था लेकिन कुश्ती और भारोत्तोलन (वेटलिफ्टिंग) में वह प्रोफेशनल था कोई 5 साल पहले. शायद जितनी तुम्हारी उम्र है उस से ज्यादा उसको अनुभव है इन खेलो का और शरीर भी लोहे सा. इसलिए मुझे बस हजम नहीं हुआ था उस वक़्त की कोई अकेले हे सुदर्शन और उसके जैसे 4 और लोगो को धुल छठा सकता है. और तुम्हे देख कर तोह अब बात ज्यादा हे मंनघडंत लग रही है.", दीपक की हंसी में जैसे एक तंज़ था. वह जाने क्या सोच कर ये सब बात कर रहा था लेकिन अर्जुन भी मुस्कुरा रहा था.
"यही तोह जरुरी है. मैं भी नहीं चाहता के आप विश्वास करे.", अर्जुन ने जवाब देते हुए आरती दीदी के लुढ़कते सर के पीछे अपनी ब्याह रख दी, जिस से वह बिना हिले और आराम से सोई रहे.
"सॉरी यार. अनजाने में हे ऐसी बातें होने लगी. वैसे एक पते की बात बताता हु. जहा जा रहे हैं वह माहौल बड़ा मजेदार होता है.", दीपक को भी लगा के अर्जुन दिल से बात नहीं कर रहा और शायद उसकी वजह भी दोनों बहनो की उपस्थिति है.
"मैं तोह कभी पंजाब आया नहीं हु पहले तोह मुझे ख़ास पता नहीं है.", अर्जुन को भी ठीक लगा था के बात अब सही तरफ मदद गयी है.
"सबसे बड़ा शहर है पंजाब का ये और छोटे भाई यहाँ न लोग भी मिलनसार है और खाना तोह पूछो हे मैट. कॉलेज रोड के samose-chole, मोडल टाउन के कुलचे, गोलगप्पे और राबड़ी. बड़ी मार्किट के छोले भठूरे, kulfi-falooda और जाने क्या क्या. हर मोहल्ले में कुछ न कुछ ख़ास रहता है. वैसे लकी इसलिए आया है के यहाँ उसकी पसंद का murga-machli हर जगह मिलता है वह भी इसके हिसाब से दुनिया का बेस्ट.", दीपक ने हँसते हुए लकी का जीकर किआ तोह वह भी हंसने लगा.
"बातो से तोह लगता है के शहर ज्यादा बड़ा है ये. फिर तोह मैं दीदी के साथ जितना समय मिलेगा बस घूमना पसंद करूँगा.", अर्जुन इस नए शहर के बारे में सुन्न कर रोमांचित होने लगा था.
"अर्जुन शहर भी बड़ा है और मार्किट तोह अनगिनत. पार्क, सिनेमा, विदेशी कपडे, फैक्ट्री और हर वह चीज जो होनी चाहिए तुम्हे देखने को मिलेगी. कॉलेज, यूनिवर्सिटी तोह तुम जाने हे वाले हो.", लकी ने चर्चा में शामिल होते हुए और भी बातें बताई.
"आप लोग भी घूमेंगे?", अर्जुन ने जिज्ञासा से पूछ लिए.
"कहा यार, हमारी कहा ऐसी किस्मत 12 बजे कमिश्नर साहब से मीटिंग है फिर शाम तक पुलिस लाइन में रहना पड़ेगा और कल सारा दिन काम. रात को समय मिला तोह लकी का तोह मनोरंजन तैयार रहेगा और मैं देखूंगा टेलीविज़न पर फिल्मे.", दीपक ने मायूस सा चेहरा बनाते हुए लकी को देखा.
"कोई बात नहीं. आप न हमारे शहर में समय निकलना फिर मैं आपको वह हमारे लायक जगह घुमाऊंगा. संजीव भैया भी बोरिंग लगते है लेकिन सच कहु हम दोनों भी मस्ती कर हे लेते है.", अर्जुन ने जैसे अस्पष्ट शब्दों में दोस्ती का हाथ बढ़ा दिए था दीपक के सामने.
"दोने भाई, वैसे भी मेरी शाम तोह बेकार हे रहती है. लकी का तोह घर है वह जब चाहे निकल जाता है लेकिन मैं तोह समय व्यतीत करने भी ड्यूटी चला जाता हु.", दीपक को ख़ुशी हुई थी की अर्जुन समझदार होने के साथ हे जिंदादिल लड़का था. सड़क किनारे एक ढाबा देख कर उन्होंने कार रोकी तोह दोनों दीदी की भी आँख खुल गयी. उन्हें बाथरूम दिखने के बाद कार में हे चाय और पराठे देने का बोल कर वह तीनो लोग 2 चारपाई पर आमने सामने बैठ गए.
"अब गाडी लकी चलाएगा और मैं नाश्ता करने के बाद घंटा नींद लूंगा. रात भी काली हो गयी और अब दिन भी वैसा हे जाने वाले है.", दीपक ने अपनी बात कहते हुए 5 आलू प्याज के परांठे माखन के साथ और 4 चाय एक लस्सी आर्डर कर दी. प्रियंका और आरती दीदी भी बाथरूम से मुँह धोने के बाद कार की तरफ जाते हुए अर्जुन को देखने लगी तोह अर्जुन ने इजाजत लेते हुए अपनी दीदी को भी एक तरफ चारपाई पर बुला लिए. लकी और दीपक अपनी बातों में लग गए और अर्जुन नाश्ता अपनी बहनो के साथ हे करने लगा.
"क्या परांठे है दीदी, मजा आ गया. लस्सी भी बड़ी ाची है.", अर्जुन ने खाने की तारीफ की तोह प्रियंका दीदी के बोलने से पहले हे ढाबे के संचालक, एक सफ़ेद दाढ़ी वाले आकर्षक से सरदार जी बोल पड़े.
"पुत्तर जी, यह पंजाब विच खुराक हे हैंगी जेहड़ी गबरू बनाये रखड़ी है. शहर विच मेरे छोटे प्रः (बरोथेर) डा ढाबा है गुरमेल दे नाम तोह मोडल टाउन दे गोल चक्कर कॉल, समां मिले तह होक ाइयो.", इतना कह कर वह अर्जुन के सर पर हाथ फेर कर आगे बैठे एक गरीब को chai-roti देने चले गए. अर्जुन को ाचा लगा उनका स्वाभाव और ऐसे अपनापन दिखाना.
"मैं भी यही कहने वाली थी की pyaaj-paneer के परांठे तोह गुरमेल के या फिर बंसी के खिलाऊंगी. देखना सब स्वाद भूल जाओगे.", आरती दीदी चेहरा धोने के बाद अब स्वाभाविक हो गयी थी, हमेशा की तरह खूबसूरत और प्यारी. प्रियंका दीदी भी बातों के साथ नाश्ता करने लगी और यहाँ से फारिग होने के बाद गाडी चल पड़ी अपनी मंजिल की और. अगले एक घंटे में हे सड़क के दोनों तरफ बड़ी फैक्ट्री और शोरूम दिखाई देने लगे. सड़क इतनी चौड़ी की 4 गाडी बराबर चल सके. अर्जुन बहार देख रहा था के 3 में से एक शख्स सरदार नजर आ रहा था.
"वाह दीदी, आपका शहर तोह बहुत बड़ा और ाचा है."
"अभी शहर आगे है भाई और मोडल टाउन तक जाते हुए हे 20-25 मिनट लग जायेंगे, खाली सड़क है इसलिए.", प्रियंका दीदी जिसको खली सड़क बता रही थी वह तोह पहले हे ाची भीड़ थी.
"आप शहर के आखिर में रहती हो क्या?", अर्जुन की बात का जवाब लकी ने दिए.
"अर्जुन, मोडल टाउन शहर के ठीक बीच में है और सबसे ख़ास इलाका. उस से आगे भी इतना हे शहर है और ऐसा हर तरफ से है न की सिर्फ सीढ़ी सड़क पर. हमारे शहर में तोह 4 लाख की आबादी है लेकिन यहाँ 22 लाख लोग रहते है. शायद अब तुम्हे ाचे से समझ आये.", प्रियंका दीदी के साथ आरती दीदी भी हंसती हुई अर्जुन की हैरत को देखने लगी.
"तभी सोचु की दीदी इसको खली सड़क क्यों कह रही है. मतलब प्रमुख समय पर तोह यहाँ जाम हे लग जाता होगा."
"सुबह 9-10 और शाम को 5-7 बजे के वक़्त गाडी 10 मिनट वाला सफर 25-30 मिनट में करती है.", दीपक ने भी थोड़ा ज्ञानद दिए और ऐसे हे शहर के दृश्य देखता रहा और प्रियंका दीदी लकी भैया को रास्ता समझती अपने घर तक ले आई. उन्होंने बहोत कहा था दोनों को अंदर आने के लिए लेकिन फिर कभी आने का बोल कर लकी और दीपक उन्हें घर के बहार हे छोड़ कर निकल चले.
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रामेश्वर जी के घर के बहार 11 बजे 3 गाडी कड़ी थी. 2 सरकारी और एक काली बेंज. शंकर जी घर आ चुके थे और इस वक़्त बैठक से इतर पूरा घर जैसे काट सा गया था.
"कल रात दुष्यंत मालिक होटल तुलिप में मारा गया. वह से एक 19 वर्षीया लड़की, 2 जख्मी अपराधी और 1 करोड़ बरामद हुआ है. होटल के कारिंदे का हे फ़ोन आया था और उसने पुष्टि की है के 3 लोग ऊपर गए थे उनमे से वारदात को अंजाम देने वाला भी साथ हे गया था लेकिन रूपरेखा बनवाई जा रही है.", निर्मल सिंह जी पूरी बात रामेश्वर जी को बता रहे थे. साथ हे धर्मवीर जी, परम और शंकर के साथ वह छोल साहब और 3 पुलिस वाले भी बैठे थे.
"दुष्यंत वह से निकला कैसे?" रामेश्वर जी पहला सवाल वही था जो हर पुलिस वाले का होता है.
"शराब पीने के बाद उसने कांस्टेबल से खुली हवा में घूमने की रिक्वेस्ट की थी पंडित जी. बप की शिकायत थी उसको तोह ऐसा करना ठीक लगा. लेकिन दुष्यंत भी भली भांति वाकिफ था हमारी जगह से जो वह ऐसा कर गया.", निर्मल सिंह ने लाचारी दिखते हुए नजरे झुका ली.
"हो क्या रहा है यहाँ पर.? पहले ताई के घर हादसा हुआ, फिर सुशीला और शीला वाला काण्ड. उसके बाद बहन सिंह भी चौड़ा हो गया मेरी gair-maujdgi में और अब ये दुष्यंत कैसे और क्यों शामिल हुआ?", शंकर जी ने आवाज नीची रखते हुए हे नाराजगी में दिल की बात कही. लेकिन रामेश्वर जी ने वह जैसे सुनी हे नहीं.
"रात को ड्यूटी पर सिर्फ कांस्टेबल हे था.?", ये सवाल धर्मवीर जी ने किआ.
"जी. 2 कांस्टेबल खाना खा रहे थे और एक दुष्यंत के साथ बहार गया था. अफसर तोह आपको भी पता है के 8 बजे के बाद वह नहीं रहते. लेकिन सोचने वाली बात है के इतना पैसा, लड़की और आदमी के साथ दुष्यंत क्या प्लान कर रहा था? मामला आपसी विवाद का हे होगा जो साथ आया आदमी हे ये अंजाम दे गया.", निर्मल सिंह की बात पर रामेश्वर जी खामोश रहे. वैसा हे हाल धर्मवीर जी, शंकर और परम का था.
"भाग गया चलो मान लिए. लेकिन 6 किलोमीटर दूर पहुंच गया तोह मतलब इसमें कोई न कोई तोह शामिल हे था. निर्मल जी ऐसा तोह नहीं की बकरा जान बूझ कर हलाल हुआ हो.?", छोल पूरी का ये सवाल हर पक्ष को खोल रहा था.
"छोल पूरी, ये पुलिस विभाग है आर्मी नहीं जहा एक छोल के कहने पर पूरी रेजिमेंट बात मान लेती है. यहाँ हमारा सिपाही तक आजाद विचार लिए रहता है चाहे उसकी गलती से िग की नौकरी चली जाए.", िग कपूर के इतना कहते हे छोल साहब ने उनका हाथ पकड़ लिए.
"मेरा ये मतलब नहीं था कपूर. चूक हुई है और अभी 2 लोग बाकी थे जिनके साथ दुष्यंत का भी रिश्ता हो सकता था. उनसे खतरा है और इसलिए दुष्यंत की ज़िन्दगी की परवाह थी. नहीं तोह मैं खुद गोली चलने में देरी नहीं करता."
"4 लोगो की लाश भी मिली है. एक तोह पार्षद रमन कुमार और 3 उसके साथ के हे व्यापारी थे. आप जानते है किसी को? दुष्यंत के साथ उनका गठबंधन भी था और चारो हे लोक दाल के ख़ास थे.", एक 3 सितारा पोलिसवाले गट्टे की फाइल उनके सामने रखने के बाद अपनी जगह वापिस खड़ा हो गया.
"ये कब हुआ?", रामेश्वर जी की लिस्ट में रमन कुमार का भी नाम था. और उसकी मौत भी ठीक उसी दिन होना एक अलग कहानी बता रहा था.
"रात किसी ने **** होने फ़ोन किआ था के सड़क के बीच 4 लोग पड़े है. करीब 3 बजे की बात है. पोस्टमॉर्टम में हत्या तोह साबित हुई लेकिन कोई सबूत या जिस्म पर निशान नहीं मिला.", उस इंस्पेक्टर ने डिटेल दी और धर्मवीर जी के साथ हे रामेश्वर जी भी फोटो और रिपोर्ट देखने लगे.
"ाचा निर्मल जी, आप टीम को ले जाइये. मैं शाम को बात करता हु. कपूर साहब, आप छूती पर है तोह सतीश के साथ जाम शुरू कीजिये मैं इनके घर आता हु अभी.", रामेश्वर जी ने धर्मवीर जी को छोड़ कर बाकी सभी सरकारी व्यक्तियों को जैसे जाने का इशारा दिए और छोल साहब भी अब िग से गले मिलने के बाद उन्हें अपने साथ यह ले गए. शंकर जी भी जाम की बात सुन्न कर खड़े हुए लेकिन इस बार आवाज बड़े सांगवान जी की आई, पंडित जी की जगह.
"तुम दोनों यही बैठो अभी.", परम और शंकर दोनों हे ठिठक कर रुक गए लेकिन छोल साहब ने मदद कर भी नहीं देखा उन्हें. बैठक का दरवाजा बंद करने के लिए उन्होंने परम को कहा और शंकर को सामने बिठा लिए.
"बरखुरदार, बस इतना कह दो के तुम कल शाम 7 बजे अमेरिका से वापिस आ गए थे.", धर्मवीर जी का ये सवाल शंकर जी से था. रामेश्वर जी भी ध्यान से देख रहे थे.
"ये अभी आया है और मैं हे तोह लेके आया हु.", छोटे सांगवान ने बीच में जवाब दिए.
"तुम्हे पता है के तुमने क्या किआ है शंकर? दुष्यंत हमारा निशाना नहीं था, रमन के साथ ताराचंद गर्ग भी था इस मामले में. इन सबमे अमीर और ताक़तवर ताराचंद हे है जो आने वाला मला है. तुम्हारी वजह से वह हमारी पकड़ से निकल गया.", धर्मवीर जी के लफ्जो में अलग हे परेशानी थी. बात पूरी करने लगे.
"वह वर्तमान सर्कार में भी बड़ी हैसियत रखता है लेकिन तुमने सब gud-gobar कर दिए.", हताश से वह रामेशवर जी का हाथ पकड़ कर बैठ गए. कुछ पल ख़ामोशी छायी रही और इस बार रामेश्वर जी बोले.
"तोह ताराचंद को भी मार दिए?"
"पुलिस को 5 मिले है लेकिन 7 और मिलने बाकी है. मैं आप जितना दरियादिल नहीं हु और मेरी माँ की नींद एक रात भी खराब हुई तोह मैं शहर मिटा दूंगा उनके सुकून के लिए. दुष्यंत भी आपने छोड़ा था और ताराचंद के लिए चाचा ने मन किआ था. मेरी मज़बूरी थी की वह मैं बेबस था, दूर था लेकिन अब अगर किसी ने भी ऐसी गलती की तोह उन्हें मालूम रहेगा शंकर यही हैं.", बिना कोई जवाब सुने शंकर बहार निकल गया, धर्मवीर जी ने भी परम को इशारे से उसके साथ जाने को कहा.
"तोह आपको ये मालूम था?", धर्मवीर सांगवान जी का सवाल साधारण हे था.
"हाँ. और कौन हो सकता है जो लाशो का सैलाब ले आये? जब इसने कहा के ये आज दोपहर तक वापिस आ जायेगा मैं समझ गया था के ये रुकेगा नहीं लेकिन निर्मल की कोनसी नब्ज़ इसने दबाई हुई है जो वह इसका साथ दे रहा है? शंकर ने एक पोलिसवाले को मारा है धर्मवीर."
"नहीं भाई साहब. शंकर ने सबूत हे कहा छोड़ा है. दुष्यंत मालिक तोह आपको मरवाने की सुपारी दे रहा था. ये रही रिपोर्ट.", बड़े सांगवान जी ने फाइल का आखिरी पन्ना दिखते हुए कहा. जहा पुलिस की लेखनी में भी रामेश्वर जी को 25 साल पुराणी लिखवत नजर आ गयी.
"क्या करू मैं इसका धर्मवीर? कपूर और सतीश तोह इसके हे साथ है, मेडिकल भी ये करवा लेता है और चंदू भी मेरा दोस्त होने पर इसके साथ है.", रामेश्वर जी ने अपनी लाचारी दर्शाई.
"भाभी. भाई साहब ये सब इसलिए हुआ क्योंकि भाभी को ये बात पता लगी होगी. ऊपर से कौन बाप चाहेगा के उसका बीटा वह गन्दा काम करे जिसमे वह पहले हे शामिल है.", धर्मवीर जी भी थोड़ा परेशां थे.
"ताराचंद छोटी मोती हस्ती नहीं था भाई."
"7 लोग मारे है मतलब शंकर ने वंश हे ख़तम कर दिए. मैंने पहले हे कहा था के संजीव और दीपक को अलग रखना शंकर से क्योंकि वह दोनों आपके साथ रह कर भी शंकर से सीखने के लिए बेताब है. बुरा मैट मानियेगा लेकिन आप उस से ज्यादा हे क्रूर थे. वह अलग बात है के आपने हमेशा छोटे मोठे मुजरिम माफ़ किये लेकिन लड़की, माँ और धरम के खिलाफ वाले तोह आपने भी ज़िंदा नहीं छोड़े.", धर्मवीर सिंह ने टेबल से पानी का गिलास उठा कर रामेश्वर जी के मुँह पर लगाया तोह उन्होंने वह थाम कर पी लिए.
"तुम सब जानते हो दोस्त. मैं आज घर पर हु 8 साल से. लेकिन इन maa-bete को तोड़ना नामुमकिन है."
"तोडना क्यों है भाई साहब? जोड़ दीजिये फिर देखिये शंकर को घर से फुर्सत नहीं मिलेगी. मैं भी परेशां हु इस से क्योंकि ये उस जगह पहुंच चूका है के 1% ज़िन्दगी पर भी ये 100 का डाव खेलने लगा है. इसमें शंकर के संहार के साथ हे नारायण की जीवन देने का रूप भी अख्तियार हो चूका है. चैलेंज न मिले तोह शंकर खुद पैदा कर लेता है. इसको अपनी माँ के हे पास छोड़ दो.", धर्मवीर जी की बात में जो सत्य था वह रामेश्वर जी को समझ आ गया था.
"सीधा बोलो न के अर्जुन के सामने ला खड़ा करू. धर्मवीर, भजन को फ़ोन लगाओ और बोलो के रामेश्वर ने याद किआ है. देखे जरा शंकर कितनी देर टिकता है मेरे शेर के सामने. मैं बेशक नहीं चाहता था के कौशल्या का हम टूटे लेकिन शान्ति जरुरी है और शंकर को ये नहीं पता के उसकी माँ भी अब प्यार बाँट चुकी है. इस बार अर्जुन होगा मैदान में अभिमन्यु नहीं.", इतनी बात सुनते हे धर्मवीर जी के चेरे पर लम्बी मुस्कान आ गयी और फ़ोन को पास खींचते हुए उन्होने अपनी बात कही.
"मतलब अब दोनों को नहीं पता के मुकाबला किस से है और जीत कहा? मेरा डाव अर्जुन पर है.", धर्मवीर जी ने नंबर लगाने से पहले कहा.
"अर्जुन का डाव अपने बाप पर हैं.", रामेश्वर जी ने बेहिचक कहा और नंबर मिलने के बाद फ़ोन ले लिए.
"नमस्कार पंडित जी. कहो कैसे याद आ गयी इस नाचीज की?", सामने भी जैसे नंबर पता लगने की मशीन थी.
"ऐसा है भाई के शंकर की माँ की तबियत ठीक नहीं रहती जबसे मेरे साले का देहांत हुआ है. तुम तोह कम बने बाद फ़ोन करते नहीं मुझे, अपनी बहिन से गप्पे लगा लेते हो. जरा शंकर का कुछ करो के वह यहाँ पास रह सके. राजकुमार बहार रहता है नरिंदर की भी समस्या है.", रामेश्वर जी ने जो शब्दों का जाल बना सामने वाला उसमे पल में हे फंस गया.
"क्या बात कर दी आपने जीजा जी. शंकर कल सुबह हे आपके शहर का सिविल हॉस्पिटल समो के हिसाब से ज्वाइन करेगा. बाकी बचो की शादी और समारोह में मैं आ रहा हु. जीजी ने कल हे मुझे बता दिए था. कोई और सेवा हो तोह कहिये."
"बस तुम इतना कर दो मैं समझूंगा के मैंने अपनी बीवी के लिए कुछ तोह किआ. तुम जानते हे हो के शंकर उसकी सांस है.", रामेश्वर जी ने तुरुप का इक्का हे मार दिए.
"हाँ तोह वह है हे. दीदी ने तोह खुद हे कहा है के होने वाली बहु के लिए मैं अपनी गाड़ियां और लोग लागू जिस से उन्हें भी पता लगे के परिवार कैसा है.", रामेश्वर जी उसकी मंदबुद्धि पर बस मुस्कुरा दिए.
"जो करना है करो. मैं बीच में नहीं पड़ता. बस मेरी बीवी मुझे प्यारी है और उसका बीटा उसके पास. शंकर जो भी दलील दे ख़ारिज कर देना."
"बात करते हे हो गया जी. अभी नोटिस गया और उसका फार्मोसे का सामान भी मैं इधर मंगवा लूंगा.", भजन ने इतना कहा और हलकी फुलकी बात के बाद फ़ोन कट हो गया.
"भाई साहब शंकर को यहाँ रख रहे हो? मेरा काम भी तोह वह चलता है."
"धर्मवीर, वह तुम्हे बाप हे मानता है. तुमसे तोह अलग नहीं किआ. लेकिन सच कहु 8 साल मैंने कभी किसी पर नहीं लगाए और मैं अब देखना चाहता हु के क्या अर्जुन इस काबिल है जो कौशल्या के 9 महीने के बाद 45 साल पर भरी पड़ सके. दिमाग कहता है के शंकर जल्लाद और अधूरा इंसान है. दिल कहता है के अर्जुन के साथ रह कर वह इंसान भी बनेगा और पंडित भी. मुझे उसकी हरकत से परेशानी नहीं है, जिम्मेदारी से है.", रामेश्वर जी ने बात खोल कर रख दी.
"अर्जुन को मैं नहीं जानता. थोड़ा उल्लेख करेंगे."
"धर्मवीर, वह अजय है. हार के भी वही जीतेगा ये गुर उसको पता है. उमेद यही कहता है के शंकर की जवानी अर्जुन का बचपन और बाबा मलंग का बुढ़ापा अर्जुन का ये समय है. उसके पास शायद हमारे तक पहुंच हो लेकिन सबूत नहीं होने पर उसने सवाल नहीं किये. लेकिन यहाँ वह रेखा के साथ होगा, कौशल्या के सामने दोनों होंगे, जिम्मेदारी भी होगी. ऊंच नीच भी होना लाजमी है. शंकर को पता लग्न चाहिए के वह अब बाप है, बीटा नहीं.", रामेश्वर जी ने बात विस्तार से कही.
"अर्जुन कुछ और भी है. याद है न आपको."
"शंकर को देखने दो जरा के ताक़त के बावजूद होश रखना जरुरी होता है. मौका मैं खुद दूंगा. तुम भी जानते हो लिस्ट 12 की थी शंकर वही तक सिमित रहा. 3 जान कर छोड़े है शंकर के लिए लेकिन अब अर्जुन अपने बाप के साथ रहने वाला है.