Incest Pyaar - 100 Baar - Page 15 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

भाई पहुंच रहा हु घर. जैसा लिखा है अनएडिटेड पोस्ट कर दूंगा. 7 बजे के बाद टोल क्रासिंग ने पन्गा दाल दिए. 15 मिनट्स दो बस
 
अपडेट 91

गड़े मुर्दे -2


"चची आप कैसे रास्ता भूल गई.?", शंकर जी ने बहार आँगन का नजारा देखा तोह सब परेशानी छु मंतर हो गई. अर्जुन अपनी चची को बाहों में उठाये ख़ुशी जहरी करता उन्हें घुमा रहा था.

"ाचा ाचा अब मैं आ गई हु मेरे बेटे के पास. नीचे तोह उतार पहले.", कृष्णा जी भी उतनी हे खुश थी इतने साल बाद अपने लाडले से मिलकर. एकदम सफ़ेद रंग था उनका, पतली लम्बी और साफ़ सफ़ेद सलवार कमीज पहने हुए वह बेहद अलग हे थी. अर्जुन उन्हें निचे उतरने की जगह अंदर ले चला और नरिंदर जी के साथ सामान उठा कर संजीव भैया अंदर उनके पीछे चल दिए.

"भाई, आने में कोई परेशानी तोह नहीं हुई?", शंकर जी बड़े जोश से अपने भाई से गले लगे थे और वह भी बराबर वैसे हे. नरिंदर शर्मा उम्र के इस पड़ाव पर भी एक तंदुरुस्त और ऊर्जा से भरपूर इंसान थे, परिचित मुस्कान के साथ.

"परेशानी और नरिंदर एक साथ कहा रहते है? तुम जरूर परशान हो भाई.", कैसा जुड़ाव था के अभी गले हे मिले थे की मुस्कुराते शंकर की धड़कन नरिंदर समझ गया था.

"ये उल्लू का पट्ठा कहा भाग गया? ऐसे चीख रहा था जैसे भूत देख लिए हो.", रामेश्वर जी भी कभी कभी अदाकारी कर लेते थे और अब भी नाटक करते बहार आये और अपने दोनों बेटो को देख कर मुस्कुरा उठे. नरिंदर जी ने बाबा के पाँव छूने के बाद गले लगते हुए कुछ कहा और वह हँसते हुए दोनों को साथ लिए अंदर चल दिए.

"तेरी बीवी अगर मेरा पौता ले गया तोह मैं क्या कर सकता हु भाई. रिटायर्ड हु और अपने पौटे के साथ जुर्म में शामिल.", उनको बात सुनकर शंकर जी भी हंसने लगे थे.

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"अब आप यहाँ मेरे पास बैठो सब आपकी सेवा करेंगे और हम करवाएंगे.", अर्जुन अंदर आँगन में अपनी चची को कुर्सी पर बिठाते हुए बोलै और बाकी सब भी कृष्णा जी से मिलने लगे. आरती दीदी तोह अपनी माँ से मिलते हे रोने लगी थी. अर्जुन ने उनके कान में कुछ कहा तोह वह उसके ब्याह मर हाथ मरती अपनी माँ से लिपट गई.

"देखो ये छोटा है फिर भी आपके सामने मुझे तंग कर रहा है.", आरती को सबसे ज्यादा प्यार अपनी माँ से हे था लेकिन शायद कुछ डर और दर्द उसको दूर रखता था.

"एक हे तोह है छोटा भाई तुम सबका. अब ये परेशां करेगा तोह तुम्हे होना पड़ेगा. वैसे ये अब छोटा नै रहा, बहार से हे मुझे गॉड में उठा के यहाँ ले आया.", अर्जुन के कान हलके से खींचती वह मुस्कुरा रही थी.

"उठो तुम दोनों यहाँ से. चल कृष्णा मेरे साथ चल तू, कमरे में आराम कर मैं वही चाय नाश्ता करवाती हु.", रेखा जी ऐसे अर्जुन को कभी नहीं कहती थी लेकिन वह बिना कुछ कहे हँसता हुआ बैठा रहा. चची उसकी माँ के साथ अंदर चल दी. अर्जुन बड़े ध्यान से उन्हें देख रहा था.

"आरती दीदी, एक बात पुछु?", अर्जुन की ऐसी बात सुनकर जैसे आरती भी उसका सवाल समझ गई थी.

"नहीं. मैं अपने कमरे में चली तू कर शरारते."

"हुआ क्या है सबको?", अर्जुन हैरान सा उठने लगा तोह संजीव भैया ने उसको वापिस बिठा दिए.

"तोह आज अपने भाई को भी भूल गया तू."

"कहा भैया, आँखों से हे चरण स्पर्श कर लिए थे मैंने आपके.", अर्जुन उनके गले लगते हुए शरारत से बोलै.

"तेरी आँखों की तोह.. बड़ा हो जा थोड़ा सा. वैसे तू किस बात पर हैरान था अभी?", अलका दीदी ने उन्हें पानी दिए तोह वह रुकने लगी लेकिन फिर भैया को देख कर अंदर चल दी.

"आपको कैसे पता के मैं हैरान था.? वैसे मैं ये देख रहा हु के कृष्णा चची बहोत बदल गई है. उनका वजन 50 भी नहीं होगा अब तोह लेकिन पहले वह आरती दीदी जैसी दिखती थी, छोटा था तोह इतना हे ध्यान है लेकिन हाइट उनकी कही ज्यादा है. और अब उनका रंग जैसे उन्हें कुछ जरूर हुआ है.", अर्जुन की बात पर संजीव भैया भी पल भर के लिए सकुचा गए. दिवारगढ़ी पर समय देखा तोह दिन के 11:30 बता रही थी.

"चल आजा बहार चलते है मैं भी काफी देर से बंधा हुआ था गाडी चलते हुए. दोपहर का खाना तोह अपने समय से बनेगा.", अर्जुन उनके साथ उठ कर बहार चल दिए.

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"तुम्हे किसने खबर दी थी इस घटना की?", नरिंदर और शंकर अब यहाँ एकांत में बैठे थे, बहार वाले ड्राइंग हाल में. शंकर जी अपने छोटे भाई को कल शाम की घटना बता रहे थे.

"बिट्टू ने बताया था के ऐसा हुआ है और मैंने हॉस्पिटल भेजा था गुलाटी को सब बारीकी से देखने के लिए. उसने जो बताया वह, वह सच में हैरान करने वाली बात है.", शंकर जी के चेहरे पर अब भी anishchit-ta थी जैसे.

"क्या बताया मेहुल ने? और पक्का अर्जुन अकेले हे ये कर गया?", नरिंदर जी के चेहरे पर अब हल्का सा पसीना था लेकिन शांत चेहरा.

"सुदर्शन कोई छोटा इंसान तोह नहीं है. साढ़े 6 फ़ीट लम्बा और उमेद से ज्यादा बड़ा समझ ले. उसके अपराध मुझे पता है लेकिन तू जानता है के मैं खुद उलझना नहीं चाहता इन लफड़ो में जो कल को कुछ और करवा दे. वैसे भी पहले कभी aamna-saamna नहीं हुआ. और जो 4 लोग थे वह भी अर्जुन से बड़े और तगड़े हे थे, उनके नाम भी जुर्म दर्ज़ है कोई दर्ज़न भर. गुलाटी ने बताया के एक पाँव और हाथ तोह नाकारा हो गया है. रोड डालके भी मूवमेंट नहीं आ पायेगी. सर पे 12 टांके, दूसरे पेअर की घुटने से निचली हड्डी और पीठ की 5 पसलिया टूटी है. रीढ़ की हड्डी का कूल्हे के पास से जॉइंट हिला है और काफी छोटे है. बाकी 4 लोगो का हाल भी कुछ अलग नहीं है. जिस हिसाब से मारा है तोह वह जान भी ले सकता था लेकिन सिर्फ बड़ी हड्डिया तोड़ी और दिल, दिमाग, गुप्तांग जैसे हिस्से सलामत रखे.", शंकर ने एक हे सांस में पूरी जानकारी दे दी.

"उसने अकेले किआ ये सब? हमारे अर्जुन ने और फिर वह कोई बीच में नहीं आया?"

"हाँ जो बीच में आये वह उसके दोस्त थे जिन्हे उसने एक तरफ उछाल दिए. बिट्टू की गर्दन भी पकड़ ली थी. लेकिन उसकी वजह शायद ये होगी की बिट्टू ने पीछे से उसको रोका होगा. मैं जानता हु की उसमे शायद तुम्हारे जवान जिस्म और दिमाग से ज्यादा बल होगा लेकिन उमेद को तुमने कभी सर से ऊपर उठा कर 10 फ़ीट दूर फेंका और फिर मान लो 5 उमेद सिंह एक साथ हो.?", शंकर की ऐसी बात पर नरिंदर ताली मार के हंसने लगे.

"ये तोह यार असंभव सी बात हो गई. मतलब तुम कह रहे हो की अर्जुन ने न सिर्फ उनकी इतनी बुरी हालत की बल्कि वह अभी से ये जानता है के कहा चोट मारनी है, रफ़्तार भी उसके पास, दिमाग भी और इतने लोगो के बीच वह अकेला. पूरी बात नहीं पता शायद हमको. वैसे चंद्रो तै ने इतनी आसानी से बात ख़तम कर दी.?"

"हाँ. वह भी कल से हे जानती थी इस हादसे के बारे में. प्रीती और उसके मां की लड़की पर हाथ डाला था सुदर्शन ने, किडनैप करने के इरादे से तोह अपने छोटे नवाब नीले हो गए, तै तोह सिर्फ उसको देखने के लिए वह से यहाँ इस घर में आ गई."

"भाई, अगर ये सब सच है जैसा एक बार पहले भी वह कर चूका है तोह इसका कोई हल करना जरुरी है.", नरिंदर की बात पर शंकर जी की गर्दन ना में हिलने लगी.

"गलती भी नहीं कर सकते. मैंने उसपर नजर रखने की कोशिश की थी लेकिन वह कही ज्यादा शातिर है. लाइब्रेरी में किताबे कोनसी पढता है वह पता है?"

"बताओ जरा?", इसमें नरिंदर जी की रूचि बढ़ गई.

"एस्ट्रल ट्रैवेलिंग, ह्यूमन बॉडी एंड it's सीक्रेट्स, बॉडी मैकेनिज्म, ध्यान, योग और हर तरह की गहरी किताबे. और तुम्हे प्रमोद जी याद है?", शंकर द्वारा बताई गई किताबे और फिर ये नाम सुन्न कर निन्दर बस भाई को देखता रहा.

"प्रमोद शास्त्री उर्फ़ आचार्य हंस? वह तोह सालो पहले हे कैलिफ़ोर्निया चले गए थे. बीच में ek-do बार उनके बारे में पढ़ा था कुछ किताबो में लेकिन अब उनका क्या चक्कर है इस सबमे.? वह इतने खाली इंसान नहीं के ऐसे मामलो पर ध्यान देने लगे.

"वह अर्जुन के मार्गदर्शक है जितना मैं समझता हु. कई बार दोनों को साथ देखा गया है सुबह के वक़्त. आखिरी बार 2-3 दिन पहले.", शंकर जी अब जैसे सबकुछ बता चुके थे जितना वह बताना चाहते थे.

"अगर इंसान खुद की क्षमता और इन्द्रिओ को पहचान हे गया हो तोह फिर hum-tum कुछ नहीं कर सकते. और आचार्य हंस के पास इतना समय है तोह सच में अर्जुन ख़ास हे है नहीं तोह उस इंसान को sunn-ne के लिए 200 डॉलर तक देने पड़ते है और ध्यान शिविर में 500 से 2000 तक. आज मैं अर्जुन के साथ हे सोऊंगा.", नरिंदर की बात सुनकर शंकर जी कुछ सोचने लग गए.

"आज नहीं. कल सो जाना. आज हम चल रहे है गुलाटी के यहाँ. थोड़ी हे देर में और वह काम भी है कुछ."

"ाची बात है फिर इस तुलसी की माला को यही रख देता हु. वैसे बड़ी भाभी ने क्या कहा?", यहाँ नरिंदर के चेहरे पर बचो सी हंसी थी.

"दरवाजा खुल्ला है. कुछ चाहिए हो तोह आ के ले लेना.", शंकर भी हँसते हुए भाई के साथ हे खड़े हो गए.

"तुम्हारी सोच की भनक थानेदार साहब को भी नहीं लग सकती. क्या कहते थे प्रमोद जी, शंकर वह चांडाल है जिसके ऊपर लिंग और नीचे दिमाग लगा है. देखने वाला मरवाता भी है और उसको खबर भी नहीं होती की आगे क्या गुल खिलने वाला है ये. हाहाहा.", दोनों भाई हँसते हुए बहार निकल गए.

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"मुझे यही उतार दो भैया और आप घर चलो मैं 2 बजे तक आ जाऊंगा.", अर्जुन मार्किट में हे रुक गया था संजीव भैया से बातें करने के बाद और वह भी इत्मीनान से घर की तरफ निकल चले स्कूटर लिए. पैदल चलता हुआ वह अपनी चची के बारे में हे सोच रहा था.

'कितनी हंसमुख है वह और इतनी गंभीर बीमारी के बावजूद कुछ पता नहीं चलने देती. कितनी हिम्मत होगी चाचा में भी की जिस से प्यार करते है वह धीरे धीरे कमजोर हुआ जा रहा है लेकिन दोनों हमेशा खुश रहते है. भगवन उन्हें लम्बी ज़िन्दगी दे.', पैदल हे वह चलता हुआ मेनका के घर आ खड़ा हुआ. अंदर कार कड़ी थी और मंजू की स्कूटी नहीं थी जो उसके सामने हे उनके घर की तरफ जाती देखि थी.

दरवाजा खोलता वह अंदर चल दिए तोह यहाँ ड्राइंग हाल का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था. अर्जुन आराम से इधर आ कर हर तरफ देखने लगा. मेनका कही नजर नहीं आ रही थी. चिटकनी लगता वह कमरे के अंदर आया तोह बिस्टेर पर उसका दिलवाया हुआ सूट, ब्रा, पंतय पड़े थे और बाथरूम में पानी चलने की आवाज वह सुन्न चूका था. बीएड के सिरहाने वह तक लगाने हे लगा था की दिमाग में हल्का सा झटका लगा. ये तस्वीर उलटी राखी हुई थी चौकोर कंप्यूटर के छपु पर. अर्जुन ने ध्यान से उस तस्वीर को देखा तोह यहाँ 3 महिलाये थी जिनमे से बीच वाली अधेड़ औरत जैसे उसने कही देखि हो, लेकिन ये shwet-shyaam तस्वीर उतनी साफ़ नहीं थी. बाए तरफ वाली थोड़ी जवान थी जिसकी गॉड में एक बचा, शायद लड़की और पाँव के सहारे खड़ा 4-5 साल का लड़का था. अर्जुन ने फ़िलहाल वह तस्वीर वैसे हे रख दी और अपनी जगह वापिस आ कर सामने वाले दरवाजे को देखने लगा. पानी की आवाज बंद हो गई थी.

"तुम.", मेनका गुनगुनाती हुई भीगे बाल और शरीर पर एक लाल टोलिया लपेटे बहार निकली तोह सामने नजर पड़ते हे पांव जड़ हो गए. गोर चिकने पत् आधे से ज्यादा अर्जुन की आँखों के सामने निर्वस्त्र थे और वैसे हे सीने का ऊपर हिस्सा. अर्जुन अगले हे पल उसकी कमर में हाथ डेल साथ खड़ा था.

"अंदर जाने से क्या होगा? अब जिसके लिए तैयार हो रही हो वह खुद बहार तुम्हारा इन्तजार कर रहा है." मेनका का चेहरा बाथरूम के दरवाजे की तरफ था और पीछे वह अर्जुन के तगड़े जिस्म के आगोश में.

"शर्म नाम की कोई चीज होती है मिस्टर. ऐसे बंद घर में घुसना भी जुर्म है.", वह हल्का मचलती हुई हिल रही थी. लेकिन बेखबर की उस तोलिये का ऊपर हिस्सा खुलने से वह दोनों रेशम से मुलायम चुके उजागर हो चुके थे. अर्जुन का एक हाथ जो कमर पर था अब वह थोड़ा निचे खिसका और दूसरे से उसने ये गीला उभर दबोच लिए. 'आह्हः.", इस सिसकी के साथ हे मेनका सब भूलती उसके सीने से लिपट गई. टोलिया फर्श पर पड़ा था.

"दरवाजा खुल्ला रखोगी तोह ऐसा जुर्म हर रोज होगा.", अर्जुन थोड़ी बेशर्मी से मेनका का सबसे ख़ास भाग, उसके बड़े कूल्हे दोनों हाथो से दबाते हुए जैसे ऊपर उठा लगा था. मुँह ऊपर उचकती वह अपने लाल आधार अर्जुन के होंठो में देती खुद उसका साथ देने लगी. अब वह हाथ कूल्हों से फिंसटले बहार से उभरी अंदर गहरी दरार में घुस गए. दोनों बड़े कूल्हों की दरार में उंगलिया गड़ाए वह आज खुलकर मेनका के शरीर को टटोल रहा था.

"आह्हः.. क्या देख कर आये हो यहाँ जो ऐसे उतावले हो रहे हो.?", अर्जुन के गले तक हे होंठ पहुंच प् रहे थे और वह दांत गदति मेनका अपनी जाँघे भींचती हुई मदहोशी में अकड़ रही थी, अर्जुन की ऊँगली जल्द हे उसकी गीली गली में उतर गई जहा अभी तक अर्जुन सिर्फ 2 बार उतरा था, एक रात में हे.

"अभी से इतनी गीली हो और मुझे कह रही हो के उतावला मैं हो रहा हु.", अर्जुन ने वह गीला उभरा हुआ हिस्सा ऊँगली से हल्का सा रगड़ा और मेनका ने वही ऊँगली दबा ली.

"उम्म्म.. परसो से तड़प रही हु और तुम अब आ रहे हो.. आठ.. आते हे हाथ भी कहा लगा दिए.. माह.", सच में वह बुरी तरह पानी छोड़ रही थी. कहा तोह मेनका को दिक्कत थी की वह सम्भोग के वक़्त अपने पति के साथ हमेशा सूखी रहती थी और दर्दभरा संसर्ग होता था, यहाँ वह एक ऊँगली लगने से हे अंदर तक हिलती हुई बरसात कर रही थी.

"देखो कैसे तड़प काम होती है ये.", अर्जुन वैसे हे मेनका की योनि को कुरेदता दिवार से लगाए खड़ा हो गया. बेसुध सी वह भी निर्वस्त्र अवस्था में दिवार से लगी धनुष की तरह बलखाई सी अपने कूल्हे भिड़ाये अर्जुन को जैसे चुचो पर म्हणत का न्योता देने लगी. कच्ची मुसम्बी से मेनका के चुके फूले हुए अपने छोटे निप्पल उकेरे अर्जुन की प्रतीक्षा कर रहे थे. बिना समय गंवाए वह भी मेनका की नंगी पतली कमर को हथेली में भरता दोनों मुसंबिया होंठो में भरके पीने लगा.

"आठ.. बहुत दर्द दिए है इन्होने तुम्हारी याद में. आह्हः.. उम्म्म. जिस्म पर कपडा लगते हे ये आग भड़का देते थे.. पी लो इन्हे.. उम्", मस्ती में वह खुद अर्जुन का सर अपनी छाती पर दबती अपने अवयस्क सतांन बड़े करवाने पर आमादा थी. अर्जुन को भी उनमे वैसा हे स्वाद आ रहा था जैसे किसी नयी यौवन से भरी कुंवारी लड़की के स्टैनो पर होता है. जल्द हे कमर पे रखो दोनों हाथो में एक ने पूरी फूली हुई छूट को मुट्ठी में भर कर मसलना शुरू कर दिए.

"उम्मम्मम.. आठ एक बार कर दो.. आठ.. भर दो मुझे अर्जुन.. इस्सस..", रगड़ते हुए हे अर्जुन ने छूट रास सनी 2 लम्बी उंगलिया छूट के अंदर धंसा दी. नरम अंदरूनी मांस मजे से दोनों उंगलियों की रगड़ खता शरीर को हल्का करने लगा. जीन्स का बटन खोलकर जांघो से नीचे करने के बाद अर्जुन ने कच्चा भी हटा दिए. मेनका जितनी उत्तेजित और गीली थी उतना हे सही ये मौका था उसकी आग काम करने का. हलके घुटने मदद कर वह लुंड को ठीक मेनका की गीली छूट के सामने करता होंठो से उसकी आवाज बंद करके रुक गया. अगले हे क्षण मेनका के नाख़ून उसकी पीठ में टीशर्ट के ऊपर से हे पेवस्त हो गए. किसी देसी खीरे से ज्यादा हे मोटा वह लिंग पर्याप्त फिसलन की वजह से आधा अंदर घुस चूका था. दर्द से मेनका हलकी शांत सी हो गई लेकिन जल्द हे दोनों चुचो के मसलने पर वह अर्जुन के होंठ चूसती हुई अपनी टाँगे ढीली करने लगी.

"बहोत अंदर तक दुखता है जब तुम पहला धक्का लगते हो.. आठ.. देखो कैसे फंसा हुआ है ये.", मॉटे लुंड की hari-neeli उभरी नस्से देखती वह अर्जुन को भी ध्यान करने लगी की कैसे उसकी छूट का बुरा हाल करता है अर्जुन का मूसल.

"और फिर क्या करता है ये?", अर्जुन ने सीने से लगते हुए थोड़ा बहार खींच कर फिर से अंदर पेलते हुए पुछा..

"उम्. ाःह.. फिर थोड़ा काम दर्द देता है ाःह... लेकिन आठ इसमें अलग मजा है", 2-3 बार आधा लुंड हे छूट में आगे पीछे करते अर्जुन के साथ हे मेनका का जिस्म में लरजने लगा.

"तुम सच में प्यारी हो और बड़ी हिम्मतवाली भी. दर्द होने पर भी रोकती नहीं हो.", अर्जुन हलके धक्के देता अब फिर से उसके मॉटे कूल्हों की खाई में उंगलिया भर रहा था. छूट के बहार से हलकी चिकनाई लेता वह गांड के नरम छेड़ को दबाता अब 3/4 लुंड उस संकरी छूट में मजे से पेलता मेनका को उसके दूसरे चरम पर पहुंचने लगा.

"अहह.. अह्ह्ह.. हहहहहह.. ये बड़ा है तब भी प्यारा है. जैसे तुम हो वैसे हे तुम्हारा ये. उम्म्म.. मुझे पकड़ लो अर्जुन.", काम्पटी टाँगे वह अर्जुन के पंजो पर दबती जैसे गिरने हे लगी हो. अर्जुन ने भी कूल्हों को मजबूती से पकडे मेनका को थामे रखा. इस चरम उन्माद में मेनका को हल्का झटका सा लगा जब आधी ऊँगली उसकी गांड के गरम लचीले छेड़ के अंदर सरक गई. हल्का सा उछलती वह अर्जुन से अमरबेल सी लिपटी दोहरे मजे का लुत्फ़ उठती हांफ रही थी.

"वह क्यों करते हो तुम? आठ.. ाचा लगता है लेकिन उम्म्म.. वह ऐसे नै करना.", अर्जुन उसकी बात पर मुस्कुराता हुआ लुंड उस गीली छूट में फसाये हुए हे मेनका को लेकर हाल में आ गया. आज कोई डर या शर्म नहीं थी दोनों में. दिन के उजाले में मेनका पूरी निर्वस्त्र अर्जुन का मूसला लिए सोफे के किनारे कमर टिकाये अब अर्जुन के लम्बे धक्को से चुड़ रही थी. हर धक्का फैली हुई जांघो की जड़ में लगता और दोनों कूल्हों के बीच उसके बड़े अंडकोष टकराते.

"आठ.. कर दो ढीला इस कामिनी को.. आह्ह्हम्म्म. चुड़ते वक़्त रोटी है और अकेले में तुम्हे याद करती है. आठ. पूरा भर दो अंदर तक..", छोटे चुके बेरहमी से मसलता अर्जुन ऊपर झुकता मेनका के शरीर का हर हिस्सा हिला रहा था.

"अहह.. पलट जाओ यही.", अर्जुन ने लुंड बहार खींचा तोह इस बार भी मेनका अपनी गुलाबी छूट की फांके सहलाती उसकी हालत देख रही थी. छूट का छेड़ अर्जुन ने खोल दिए था और अंदर की लाल गहराई कॉमर्स से चमकती अपनी खुसी बता रही थी. धीरे धीरे वह सोफे के ऊपर हे घुटने मोड चौपाया आसान में आई तोह अर्जुन बड़े ध्यान से उन हेल भूरे सुडोल कूल्हों को पकड़ कर देखने लगा.

"वह अभी कुछ मत करना, प्लीज.", अपनी टांगो के बीच से वह अर्जुन को देख रही थी. मेनका को यकीन था के वह पक्का उसका पिछले छेड़ भी खोल देगा.

"तोह यहाँ कब करू?", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए छूट पर गीला सूपड़ा भिड़ाया लेकिन अंदर करने की बजाय हल्का सा सेहला कर हटा लिए. मेनका कमर पीछे करती तड़प रही थी लेकिन वह बार बार छूट से चिपकने के बाद लुंड हटा रहा था.

"पहले यहाँ की चुदाई पूरी करो फिर जहा मर्जी बाद देना. मुँह में या पीछे.", हलकी नाराजगी में मेनका ने कहा लेकिन फिर मुँह एक पल के लिए खुल्ला हे रह गया जैसे हे जड़ तक लुंड सरसराता हुआ छूट में भर गया.

"आईई.. कमीने.. बिना बताया तोह मत मारो.. आह्हः.. ", अब अर्जुन ने बिना तरस खाये मेनका की छूट को जैसे और खोलना शुरू कर दिए था. हर बार सुपडे तक लुंड बहार निकलता उस गुलाबी मोरी में पूरा समां जाता. मादक सिसकारिओ से पूरा घर गूँज रहा था. ये thap-thap की आवाज हर गुजरते सेकंड से भड़ती अब मेनका की चीखे निकलवाने लगी थी. चरम होने के बावजूद अर्जुन बिना रुके उसके पेल रहा था.

"मर जाउंगी... रुक जाओ.. आठ.. फट गई है.. माहहह.. " वह निकलने हे लगी थी की अर्जुन ने लुंड बहार खींच कर गांड के छेड़ पर दबा दिए. शरीर ढीला पड़ने से सुपडे का एक चौथाई हिस्सा उस चिकने छेड़ में धंसता गरम लावा गांड में भरने लगा. अर्जुन भी इस खास अंग की गरमी और जकड़न का मजा लेता 4-5 लम्बी पिचकारियां अंदर भरने के बाद छोटे सोफे पर बैठ गया. मेनका मुँह के बल सोफे पर लेती अपनी बड़ी गांड हवा में उठाये मजे और दर्द से आँखे बंद किये थी.

"ये लास्ट में क्या किआ था तुमने?", वह लड़खड़ाती हुई कड़ी हुई और फ्रिज से बारग का टुकड़ा ले कर छूट के ऊपर रखती सोफे पर पसर गई. हमेशा शरीर को हद्द से ज्यादा ढकने वाली मेनका अब पूरी जन्मजात हालत में अपनी दुखती हुई फैली छूट पर बर्फ से टकोर कर रही थी.

"तुमने हे कहा था के पहले चुदाई करो फिर जहा मर्जी दाल देना. मुँह तुम्हरा दूर था तोह इधर खाली कर दिए. लेकिन अंदर नहीं किआ मैंने. अगर करता तोह ये बर्फ वह लगा रही होती.", अर्जुन हँसता हुआ अपनी जीन्स ठीक करके पानी की बोतल ले कर फिर बैठ गया. मेनका के चुचो की घुंडी अभी भी सूज कर अकड़ी हुई थी. पूरे जिस्म पर अर्जुन ने ाची म्हणत की थी.

"लुंगी तुम्हारा मुँह में और पीछे.? सपने लेते रहना. तुम्हे तोह यहाँ भी नहीं करने दूंगी.", मेनका ने जो कहा था वह नखरे से कहा था और अर्जुन भी जानता था.

"मुझे नहीं करने डौगी? ाची बात है अगर कोई और पसंद आ गया है तुमको. मैं िज्जात्त करता हु के तुमने साफ़ साफ़ कह दिए.", अर्जुन ने गंभीर लहजे में ऐसा कहा और बोतल फ्रिज में रखता टीशर्ट ठीक करने हे लगा था के अपना दर्द भूलती मेनका भीगी आँखों से उसकी कमर से लिपट गई.

"मेनका ने इस शरीर के साथ अपनी आत्मा भी तुम्हरे हवाले कर दी है अर्जुन. तुम मुझे जलील भी कर दो तोह मैं कुछ नहीं कहूँगी लेकिन किसी और के साथ मैं कभी सोच भी नहीं सकती.", अर्जुन ने भी दोनों बाहे पकड़ कर उठाते हुए मेनका को अपने सीने से लगा लिए.

"पगली खुद हे तुमने ये बात कही. जानता हु मजाक में कही थी की तुम्हे तोह यहाँ भी नहीं करने दूंगी. मतलब मुझे नहीं करने डौगी. तोह मैंने भी मजाक हे किआ था. लेकिन सच ये भी मेनका के अगर तुम्हे प्यार हो जाए किसी और से तोह हमेशा याद रखना के तुम एक आजाद इंसान हो. अर्जुन तब भी तुम्हारे साथ खड़ा रहेगा.", अर्जुन ने अब जैसे होंठो को चूमा था उसके प्यार को मेनका भी समझ गई थी. वह साफ़ था बिलकुल बहते पानी सा.

"लेकिन जो भी हुआ हो फिर कभी ऐसा मत कहना. मैं जिन्दा हु, तुम्हारे साथ होने पर खुद को सबसे खुशकिस्मत मानती हु. और कुछ नहीं चाहिए. हाँ लेकिन मुँह में मैं फिर भी नहीं लुंगी.", रट हुए भी वह भोली सूरत बनाते हुए अर्जुन के सीने पर हाथ रखती हुई कह रही थी.

"अगली बार मैं शुरू हे तब करूँगा जब तुम मुँह में लोगी.", अर्जुन भी हँसता हुआ उसका एक उभर कस्ते हुए बोलै.

"आह्हः. ष्ही. गंदे दुःख रहे है ये. चलो फिर खोलो इसको."

"न बाबा न. तुम तैयार हो जाओ हम घर चल रहे है.", अर्जुन ने दोनों कूल्हों पर थपकी देते हुए मेनका को आजाद किआ.

"पौने एक हुआ है, घंटे भर में चलते है.", मेनका की गांड से निकलता सफ़ेद रास पिंडली तक आ गया था.

"ठीक है तुम नाहा लो मैं सोने लगा हु.", अर्जुन टीशर्ट बिस्टेर पर फेंकता धम्म से नरम गद्दे पर लुढ़क गया. निर्वस्त्र मेनका इस चुदाई के मजे को फिर से जागृत करती अपनी छूट सहलाते हुए अंदर नहाने चली गई.

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अर्जुन घर आया तोह मंजू खुद अपनी बड़ी ननद को लिए सबसे मिलवाने लगी और वह अपनी माँ के कमरे में जा घुसा. कृष्णा चची यहाँ अकेली बिस्टेर पर लेती कोई किताब पढ़ रही थी.

"मैं अंदर आ सकता हु चची?"

"बिस्टेर के पास खड़े हो तुम. चलो इधर आओ मेरे पास.", हंसती हुई वह अर्जुन का हाथ पकड़ कर पास बैठने लगी तोह वह भी उनकी बगल में बिस्टेर से पीठ लगता बैठ गया. अर्जुन ने अब ध्यान दिए था के चची के हाथ बर्फ से ठन्डे है.

"क्या पढ़ रही हो आप? ये कोई इंग्लिश नावेल है?"

"नहीं नावेल तोह नहीं है लेकिन शार्ट स्टोरीज है. मेरी फवौरीते बुक है और तुम्हारे चाचा ने हमारी दसवीं सालगिरह पर ये भेंट की थी. इतने साल इसकी तरफ ध्यान नहीं गया लेकिन अब मैं हमेशा इसको अपने पास रखती हु.", उनका हर लफ्ज़ दोनों के अथाह प्यार का वर्णन कर रहा था, बिना नाम लिए.

"चची आपको चाचा से प्यार हुआ था या उन्हें आपसे? मुझे सबने यही बताया था के आप दोनों की शादी एकदम हे हो गई थी, mummy-papa के साथ हे.", अर्जुन की बात पर उस सफ़ेद चेहरे पर अलग हे नूर आ गया था. अर्जुन ने अब ध्यान से देखा था की उनकी चमकती आँखों के अंदर भी बहोत दर्द हो जैसे.

"तेरे चाचा बस 3 साल तक दूर दूर से देखते रहे मुझको. मैं हे हर बार नोट्स के बहाने उनसे बात करती थी. पहले साल तोह उन्हें पसीजना आने लगता था लेकिन फिर वह भी खुद मेरा इन्तजार करते के मैं उनसे नोट्स लेने औ. 3 साल में एक बार कैंटीन में चाय हमने साथ में पी थी वह भी मेरे जन्मदिन पर. शंकर भाई साहब को जब पता चला था हमारे बारे में तोह उन्होंने ऐसा ड्रामा किआ था के हम दोनों हे फंस गए थे. लेकिन फिर जल्द हे शादी करवा दी गई हमारी और तुम्हारे चाचा अब हर रोज मेरे लिए चाय बनाते है.", कृष्णा चची की बात कितनी सीढ़ी सी थी. अर्जुन हैरान था के वाह ये भी प्यार था.

"ऐसा प्यार आजकल तोह देखने नहीं मिलता चची. यहाँ तोह लोग इंसान की कदर तक नहीं करते, सच्चा प्यार क्या करेंगे.", अर्जुन क्या बोल गया उसको खुद मालूम न चला. लेकिन चची अपने लादले को ध्यान से देखने लगी.

"बीटा प्यार करने से नहीं हो जाता है. ये छोटी छोटी बातें, स्वाभाव, अलग खिंचाव और एक चुम्बक सा होता है. मतलब की ये आपको खुद ढून्ढ लेता है. तुम समझ लो चुम्बक का उत्तरी ध्रुव हो और वह प्यार दक्षिणी. शुरू में तुम शायद ध्यान भी न दो लेकिन कभी वह आकर्षण तेज होता है तोह कभी धीमा. लेकिन अगर दोनों पहचान लेते है तोह फिर मिलते जरूर है. है 2 टुकड़े साथ जुड़े रहेंगे या नहीं वह एक्सटर्नल सुररौनडिंग पर भी देपेंद करता है इंटरनल के साथ.", चची हलकी आँख दबती हुई हंसने लगी. कितने ाचे से उन्होंने ये परिभाषा दी थी. अर्जुन भी मुस्कुराने लगा.

"सच बात है चची के चाचा की किस्मत सबसे बढ़िया है जो आप जैसी इंटेलीजेंट और फ्रेंडली वाइफ उन्हें मिली. आप हंसती हुई तोह और भी ाची लगती हो शायद इस लिए हे चाचा आपको बहार नहीं लाते.", अर्जुन की बात एक बार तोह उन्हें प्यारी लगी फिर कुछ सोचते हे वह दुखी होने लगी लेकिन उनका हाथ अर्जुन ने थोड़ा मजबूती से थाम लिए.

"इंसान अंदर से मरता है क्योंकि वह कमजोर होता है. आपके पास जो है जरा उस पर गौर कीजियेगा. तकलीफ khud-ba-khud काम हो जाएगी. वह आप अकेली नहीं होंगी, आपका वही प्यार साथ होगा जिसको एक्सटर्नल सुररौनडिंग से कोई फरक नहीं पड़ता, इंटरनल और म्यूच्यूअल से पड़ता है. ये जिस्म प्यार और एहसास से चलता है. कहने को सब जिन्दा है लेकिन जो अपनी जुंग उस शक्श के लिए जीते जो उसका सबकुछ है तोह असली जीना वही है बाकी बस सांस लेना हे है जिसमे कोई जोर नहीं लगता. आपका ये बीटा दर्द भी समझता है प्यार भी. आपके पास दोनों भरपूर है लेकिन किसी ने मुझे सिखाया था के पीड़ा हमेशा नहीं रहती, प्यार रहता है. वह बस आप चाचा पर वही भरोसा और प्यार रखना जो शादी की बात से पहले आपने किआ होगा.", अर्जुन मस्ती करता हुआ एकदम से इतनी प्यारी और गहरी बातें कर गया था की कृष्णा खुद को रोक न सकीय उसका माथा गाल चूमने से. आँखों में नमी थी लेकिन दर्द काम था.

"गलती करदी रे मैंने. तेरे पास हे आ जाती 4-5 साल पहले तोह तेरी ये चची इस हाल में होती हे नहीं. मेरा बचा इतना समझदार हो गया है ये मुझे नहीं पता था. वह थोड़ी देर पहले वाला शरारती भी पसंद था मुझे लेकिन ये वाला और बेहतर है.", अर्जुन को वह सीने से लगाना चाहती थी लेकिन उस से पहले अर्जुन ने हे अपनी चची का सर छाती से लगते हुए उनके आंसू साफ़ करने शुरू कर दिए.

"उस वक़्त तोह मैं हे ठीक नहीं था और बोर्डिंग में बंद था. लेकिन अब बस 25 साल के प्यार के सामने इस दर्द को बड़ा मत होने देना. एयरपोर्ट लेने मैं आऊंगा आपको वह भी एक महीने में. बस जाने से पहले एक किताब मैं आपको दूंगा, वह पढ़ना. हाँ चाचा को फिर काम प्यार करोगी लेकिन इतना चलता है अपने बेटे के लिए.", फिर से गंभीर बात को वह हलकी मस्ती से ख़तम करते हुए उनका मूड ाचा कर चूका था.

"तेरी माँ से पूछूँगी ये गुस्सैल लड़का जो हर समय kit-kit करता था आज इतना समझदार और बड़ा कैसे हो गया. वैसे सच कहु तोह इन कुछ पालो में हे मैं कुछ बेहतर महसूस कर रही हु."

"तू फिर इधर आ गया मुन्ना. कहा था न चची को तंग नहीं करना.", अपनी माँ की आवाज सुनकर वह उठने हे लगा था के चची ने हाथ पकड़ कर फिरसे साथ बिठा लिए.

"रेखा ये यही रहेगा हाँ तू चाहती है के मैं उठ जाओ तोह फिर चल बीटा हम यहाँ से चलते है."

"कृष्णा, बैठी रह. ये शरारती है और दिमाग खता रहेगा तेरा. इसलिए इसको मन कर रही थी. और कोई बात नहीं है."

"तेरा ये शरारती बहोत प्यारा है रेखा. ये मुझको देदे तोह मैं वैसे हे ठीक हो जाउंगी.", अपनी सहेली और देवरानी की बात सुनकर रेखा जी भी पाँव के पास बैठ कर अर्जुन का हाथ पकड़ कर उनके हाथ पर रखती बोली.

"ऐसे 100 अर्जुन कुर्बान है कृष्णा, बस तू ठीक हो जाये. ये पहले हे मुझे किस्मत से ज्यादा खुशियां दे चूका है.", रेखा जी स्नेह और गंभीरता के साथ बोली थी और कृष्णा जी को भी महसूस हुआ था के रेखा का दिल सचमुच कही ज्यादा बड़ा है.

"रेखा तू शुरू से ऐसी हे है रे. निर्मल और दिलदार. ये जितना तेरा है उतना हे तोह मेरा है. बस आज एहसास हुआ के मैं खुद हे इतने सालो से हारी हुई थी लेकिन अब तेरे अर्जुन ने मुझे जीने का तरीका सीखा दिए है."

"ओह चची, अभी तोह माँ ने कहा के अब मैं आपका हु. फिर ये तेरे मेरे क्या हुआ. और अब आराम करो आप, एक दिन में हे ठीक हो गई तोह इज़्ज़त्त और परवाह नहीं मिलने वाली ज्यादा. शाम को मिलता हु आपसे.", उनके गाल चूमने के बाद वह माँ को भी गले लगता बहार दौड़ गया.

"सच में तू खुद हे देख इसको. छोटा सा हे तोह है लेकिन जीवन का सार 2 पंक्तियों में समझा गया. मेरा नाम दे रही थी इसको तू लेकिन ये भीष्म पितामह का अर्जुन बन बैठा. है तोह कृष्णा हे.", रेखा ने भी इस बात पर कृष्णा को गले लगा लिए था.

"तू शादी से पहले से हे मेरी आदर्श थी, बड़ी बहिन की तरह. रिश्ता मेरा बड़ा करवा दिए बस. कृष्णा मतलब जिसके पास हर समाधान हो. खैर अब नहीं मिला वह नाम तोह क्या हुआ कृष्णा के साथ अर्जुन भी thik-thak लगता है.", रेखा जी की इस चुहल को वह भी समझ गई थी.

"Thik-thak की बची, देर से हे सही पार्थ मिले तोह सही. हाहाहा."

"तू स्कूल में भी कृष्णा हे बनती थी 8-9 क्लास की बात होगी, मैं सरोज से कहती थी की दीदी कही लड़का हे तोह नहीं है."

"हंस ले हंस ले. वह हमारी जमीन काम पानी वाली थी न तोह तेरी तरह पूरा पानी नहीं मिला था उस वक़्त. शादी के बाद पंजाब में हे थोड़ा khaad-pani डाला. लेकिन तुझे देख कर पता चलता है के दिन रात सिंचाई होती रही है तेरी, उपजाऊ तोह पहले से हे थी तू.", कृष्णा की बात पर रेखा हंसती हुई हाथ पर हाथ मरती उठने लगी.

"चल तू बैठ 2 मिनट मैं तेरा खाना लेके आई. भूल हे गई थी इन चक्करो में की कोमल ने यही कहने के लिए भेजा था. मैक्सी पहन ले आराम रहेगा.", रेखा जी ने अलमारी से अपनी ये हलकी नीली मैक्सी निकाल कर उन्हें दी और दरवाजा बंद करती चली गई उनका खाना लेने.

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"सुना है कल गौशाला जा रहे हो तुम?", खाने की मेज पर अब बस यही आखिरी लोग थे. बाकी सब दोपहर का भोजनत करके अपने काम में लग गए थे या कमरे में आराम कर रहे थे. इस वक़्त कौशल्या जी, रेणुका बुआ, मधु बुआ, मेनका और अर्जुन हे यहाँ बैठे थे. मधरुई दीदी और कोमल दीदी खाना परोस रही थी, गरम रोटियां ला रही थी. ये बात रेणुका बुआ ने कही थी जो मधु बुआ और मेनका के बीच बैठी थी.

"हाँ. चलो अगर चलना है आपने भी. मैं भी पहले नहीं गया हु इसलिए ाचा रहेगा के कोई साथ हो.", अर्जुन ने दही खाते हुए हे जवाब दिए. थोड़ी दही होंठो से नीचे आ लगी थी जिसको सामने बैठी तीनो देवियां खयालो में अपने तरीके से साफ़ करने का सोचने लगी थी लेकिन कौशल्या जी ने साड़ी के पल्लू से मुँह साफ़ करते हुए अर्जुन के सर पे हाथ फेरा.

"ले जा अपनी बुआ को. आजकल दिल अशांत रहता है इसका और सुबह की हवा में घूम भी आएगी और वह जा कर ाचा भी लगेगा. तेरे छोटे दादा बता रहे थे की घर का माहौल अभी जम्म नहीं रहा रेणुका को, अंतर्मुखी है थोड़ी.", कौशल्या जी की बात पर न अर्जुन के चेहरे पर खास भाव आये न रेणुका ने खुद पर आने दिए.

"ये आपकी अंतर्मुखी अर्जुन से और आपसे तोह बड़ा घुलमिल के बात करती है और मैं बात करने लगती हु तोह बिदक कर भाग जाती है.", मधु बुआ की इस बात पर जो लाली रेणुका बुआ के चेहरे पर चाय वह कौशल्या जी से न चिप्प सकीय.

"सुधर जा थोड़ी. वह क्यों भागती है और तू क्या बातें करती है तेरी माँ को पता है. और अब ये तेरे पास हे रहने वाली है अगले एक हफ्ते तक, रात को. वह इसका देखभाल सही नहीं हो रही.", कौशल्या जी की ऐसी बात सुनकर मधु और मेनका ने रेणुका को देखा जो खुद भी थोड़ी हैरान थी.

"बड़ी माँ, ऐसा कुछ नहीं है. बस वह तोह वैसे हे थोड़ा बहोत तोह इस समय होता हे है. मैं ठीक हु वही पर.", रेणुका सफाई देने लगी थी लेकिन कौशलया जी के चेहरे के भाव बता रहे थे की वह उसकी बात से सरोकार नहीं रखती.

"हुआ क्या है इसको माँ? देख तोह मैं भी रही हु की ये थोड़ी अजीब जरूर हो गई है.", इस बार मधु के स्वर में भी बेहद चिंता थी. बेशक वह दोनों हे अलग थी लेकिन प्यार और जुड़ाव तोह दोनों में था हे.

"पेट से है ये और वह अपने कमरे में या तोह अकेली रहती है या फिर प्रीती के साथ, जो खुद बची है. रोमिला भी दिन में देखभाल कर सकती है लेकिन रात में? इसलिए मैंने इसके बाप को भी कह दिए है के जितने दूसरा महीना ख़तम नहीं हो जाता ये तेरे साथ ऊपर वाले कमरे में रहेगी. तारा वैसे हे Alka-Ritu के साथ वाले कमरे में आ गई है और 2 नए ैरकाणस्तर संजीव लेने गया हुआ है तोह इन लड़कीओ के कमरे में भी अब ठंडी हवा रहेगी.", कौशल्या जी जैसे हर काम पहले हे कर चुकी थी और मधु थोड़ी हैरान थी लेकिन मेनका ये देख रही थी की गर्भवती होने पर रेणुका अलग क्यों नहीं दिख रही.

"और ये बात अब पता लग रही है? वैसे गलत हुआ इस समय के हिसाब से.", मधु कुछ और भी बोलती लेकिन रेणुका ने नीचे से हाथ कस कर पकड़ लिए. हलके थपथपाते हुए जैसे वह अपनी इस बड़ी बहिन को कोई गुप्त इशारा कर रही थी.

"ठीक है अब ये ऊपर हे रहेगी मेरे साथ. लेकिन अपने दोनों लाड़लो को बोल देना के वह ऊपर वाला बाथरूम उसे करना बंद कर दे अब.", मधु बुआ की बात पर कौशल्या जी हंसने लगी.

"एक तोह अबसे बैठक में सोने वाला है क्योंकि हफ्ते में एक रात हे वह आता है और दूसरे को तू जाने. उसको मैं कुछ कहने से रही. वैसे मेनका बीटा तुम कुछ पूछना चाहती हो?", मेनका भी बच न सकीय थी कौशल्या जी की नजरो से.

"जी आंटी लेकिन पूछना ठीक रहेगा बस यही दुविधा है.", मेनका की उंगलिया आपस में रगड़ खा रही थी शर्म और झिझक से.

"बीटा ये तेरी बहनो जैसी है और मैं माँ जैसी, अगर तू मानती है तोह. और पूछ ले कुछ भी अब यहाँ मर्द तोह कोई है नहीं घर में इस समय.", उनकी बात से आश्वस्त होती वह रेणुका की तरफ देख कर कहने लगी.

"ये प्रेगनेंसी में कैसा महसूस होता है? और सच में परेशानी या कुछ ज्यादा प्रॉब्लम होती है? मुझे सचमुच इसका कोई आईडिया नहीं है.", मेनका ने जितना भी कहा था लड़खड़ाते शब्दों से हे कहा था.

"बीटा एक बात समझ ले के औरत सही मायने में तभी औरत बनती है जब वह बचे को जनम देती है. अब कोख में 9 महीने एक और जीवन पनप कर बड़ा होगा तोह बदलाव आएंगे हे, लेकिन वह बदलाव खास होते है और औरत को हर बदलाव का पूरा एहसास होता है. शरीर बड़ा होता है, खुराक बढ़ती है, मैं विचलित रहने लगता है लेकिन परेशानी सिर्फ दूसरे महीने और फिर आठवे महीने ज्यादा होती है. ममता ौलात खुद माँ को पेट में हे सीखा देती है. 4-4 पैदा किये है मैंने और वह भी तब जब ये सुविधा नहीं थी. बस दूसरे महीने में पति या घर का वह सदस्य जिस से प्यार हो और वह साथ रहे तोह ये घभराहट, जी मचलना, नींद टूटना काम हो जाता है या होता हे नहीं. अकेले में मुश्किल है. इस मधु ने काम तारे दिखाए सबको तारा की बरी में? शंकर से ज्यादा जुड़ाव था और वह काम छोड़ कर इसके लिए rabri-faluda 3-3 बार घर देके जाता था. रात में पाँव सूज जाते थे क्योंकि काम कभी किआ नहीं था पहले तोह सबकी बारी लग जाती थी इसके पांव दबाने की.", अपनी माँ की बात सुनकर मधु झूठा गुस्सा दिखने लगी और मेनका गहराई से सोचने लगी.

"पहली बार तोह मुझे कुछ पता भी नहीं लगा था बड़ी माँ. अजीब लगता था लेकिन तब आदत थी अकेले रहने की फिर ससुराल का तोह आपको भी पता है. लेकिन अब तोह जिस दिन से पता चला था हर रोज कुछ अलग लगता है और मैं खुश भी हु इसके साथ", रेणुका की बात पर कौशल्या जी थोड़ा भावुक हो गई.

"ये सतीश की गलती थी तेरी नहीं जो कौशल से शादी करवा दी थी. अपने भाई साहब की बात भी न सुनी उस समय. लेकिन अब तू यहाँ है अपने परिवार में और मेरी बची के लिए किसी चीज की कमी न होने दूंगी. घर के बड़े यहाँ रहते हो या न रहते हो लेकिन तेरे ताऊजी और अर्जुन हमेशा यही है. और अर्जुन समझदार है, नींद भी कच्ची है उसकी तोह ज्यादा सोचना मत कभी भी कुछ परेशानी हो तोह जगा लेना उसको. बस अगर खुराक समय पर नहीं ली तोह फिर मधु भी जानती है और रेखा भी की मैं कोई लिहाज नहीं रखती. चलती हु नहीं आवाज आ जाएगी की चाय किधर रह गई.", कौशल्या जी के साथ हे मेनका भी कड़ी हो गई. उनके जाते हे मधु ने रेणुका के गले में एक ब्याह दाल ली.

"सब पूछूँगी और तू सब बताएगी, बिना कुछ छुपाये.", मधु की ऐसी बात सुनकर रेणुका की धड़कन हलकी सी तेज हो गई थी.

"क्या पूछना है आपको?", अपनी उंगलिया आपस में उलझती वह नीचे देख रही थी.

"अरे पागल परेशां मत हो. अगर तू नहीं बताना चाहती तोह कोई बात नहीं, मुझे लगा था के तू भी बात करना चाहती है. दिल हल्का करने के लिए.", रेणुका ने उनका हाथ थाम लिए.

"दीदी, ऊपर चलते है."

"चल आजा.", मधु हाथ पकडे हुए रेणुका के साथ सीढिया चढ़ती ऊपर चल दी.

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आज स्टेडियम में थोड़ा दृश्य बदल चूका था. जो भी अर्जुन को देखता वह या तोह अपने रस्ते हो लेता या फिर मुस्कुरा कर अभिवादन करता. अर्जुन शांतचित्त बस अपनी जगह आ गया. प्रीती और मंजू आज भी साथ आई थी लेकिन विक्य नहीं दिखी थी. कसरत के समय दोनों में पहले जैसी हे बातें हो रही थी. बलबीर खुश था सुमन के साथ और वही बातें वह अर्जुन को बता रहा था. दोनों अभ्यास के लिए किट के पास आये तोह यहाँ जोगिन्दर जी तोह नहीं थे लेकिन चारुल और सिम्मी जरूर आ कड़ी हुई थी.

"तुमने सिम्मी को मार्किट ले जाने का वादा किआ था?", चारुल की बात सुनकर अर्जुन पलट कर उन्हें देखने लगा और अपना हाथ सर पे रख लिए.

"वह याद नहीं रहा. लेकिन मैंने शायद संडे का कहा था."

"नहीं. तुमने saturday-sunday दोनों कहा था और साथ हे अन्नू ने चलने की है भरी थी.", सिम्मी नाराजगी भरे नखरे से कह रही थी.

"कपडे बदल लो अब. बहार अन्नू कार लिए कड़ी है क्योंकि कल न सिम्मी के पास वक़्त है और न तुम पकड़ में आने वाले हो, जैसे तुमने अभी सामने हे बहाना कर दिए था.", चोरल की बात सुनकर अर्जुन चुपचाप जहा से आया था उधर चल दिए. सिम्मी के चेहरे के ख़ुशी बता रही थी की उसको कितना ाचा लग रहा था अब.

"देखा तुम्हारी दीदी का कमाल. अब कल भी इसकी खबर लेंगे. सही किआ न अन्नू को साथ हे ले आये.", अर्जुन भी 2-3 मिनट में हे आ गया कपडे बदल कर.

"चलिए मैडम. मैं मेरी मोटरसाइकिल से आता हु.", अर्जुन उनके साथ आगे चलते हुए बोलै तोह चारुल ने तल्खी से कहा.

"कार में 4 लोग आराम से बैठ सकते है. और हमने घंटे में वापिस आना है तोह यही छोड़ देंगे तुम्हे, पौने पांच हुए है 6 बजे तक.", अर्जुन इधर उधर देखता चल रहा था के जिसका डर था वही हुआ.

"ोये हीरो, किधर?", प्रीती ने उसको दोनों लड़कीओ के पीछे चलते देख कर आवाज हे लगा दी थी.

"मार्किट जा रहा हु, मैडम के साथ. कपड़ो वाली दुकान पर.", अर्जुन ने भी प्रतिउत्तर में कहा और आगे चलती दोनों लड़किया ृक्क कर देखने लगी.

"साथ हे ले चलते है.", चारुल ने अर्जुन को घूरते हुए कहा.

"प्रीती मैडम पूछ रही है के साथ में हे चलो.", चारुल को ऐसी बिलकुल उम्मीद नहीं थी की अर्जुन ऐसा करेगा.

"Bye bye. हम मंडे चलेंगे, तारा के साथ.", प्रीती ने बॉल उछाल कर गेम शुरू करने से पहले कहा और लग गई अपने काम.

"तुम बड़े अजीब हो यार. मतलब सबकुछ बता देते हो अपनी गर्लफ्रेंड को? और ये आसपास सभी तुम्हे देख रहे जैसे हीरो हो. चल क्या रहा है?"

"चारुल जी इतना मत सोचो वह सामने देखो कैसे लाल हो रही है धुप में कड़ी. और मैं किसी से कुछ नहीं छुपता. उसने पुछा बता दिए लेकिन ये क्यों ऐसे देख रही है.?", अर्जुन तेज कदमो से स्टेडियम के बहार कड़ी कार के पास आया और मुस्कुरा कर अन्नू को देखा.

"तुम घर आने वाले थे."

"हाँ, यहाँ से सीधा वही आने वाला था. दिन में समय नहीं निकल पाया वह घर में chachi-chacha आये है आज.", अर्जुन भोली शकल बनाते हुए अन्नू को देखने लगा. इधर ड्राइवर सीट के बराबर वाली सीट पर सिम्मी बैठ चुकी थी. अन्नू जैसे तैसे गुस्सा शांत करती अंदर बैठी और पीछे अर्जुन चारुल के साथ.

"वह लड़की कौन थी?", सिम्मी ने ये सवाल किआ तोह अन्नू सामने देख कर गाडी चलती रही और अर्जुन बहार देख रहा था.

"इसकी गर्लफ्रेंड.", चारुल ने अनमने भाव से कहा और अन्नू ने शीशे से ये देख लिए था.

"अन्नू दीदी जब गर्लफ्रेंड है तब भी? वैसे लड़की बहोत सुन्दर थी, है न दीदी?"

"हम्म.", चारुल ने अर्जुन की तरफ देखा जो उन्हें नजरअंदाज किये सड़क पर देख रहा था.

"वैसे सुन्दर तोह आप भी बहोत हो दीदी. किस्मत देखो लड़के की 2-2 गर्लफ्रेंड और दोनों हे एक से बढ़कर एक.", सिम्मी चुप नहीं होने वाली थी.

"2 नहीं 3 गर्लफ्रेंड है इसकी, सिम्मी.", चारुल से भी चुप न रहा गया. अर्जुन से जाने वह क्यों चिद्द रही थी.

"3? कही तीसरी आप तोह नहीं हो?", और उसकी इतनी बात सुनते हे अन्नू के साथ अर्जुन की हंसी भी चूत गई. दोनों के इस तरह हंसने से जहा सिम्मी हैरान हुई वही चारुल का चेहरा फूल गया. होंठ नखरे से बनती वह पीछे बैठी हुई हे सिम्मी को घूरने लगी.

"हाँ सिम्मी, तेरी बड़ी दीदी अर्जुन की तीसरी गर्लफ्रेंड है, साइलेंट एंड पोसेस्सिवे. हाहाहा.", अन्नू हंसी पर काबू हे नहीं कर प् रही थी. लेकिन चारुल का गुस्सा थोड़ा ज्यादा चेहरे पर आते देख अर्जुन ने अपनी हथेली में उसका हाथ ले लिए.

"छोटी है वह और हम सभी मजाक हे कर रहे है.", अर्जुन ने धीमी आवाज में कहा लेकिन उसके ऐसे हाथ पकड़ने से चारुल की रीढ़ की हड्डी तक में सिहरन दौड़ गई. स्पोर्ट्स में होने के बावजूद बड़े मुलायम हाथ थे चारुल के और वही अर्जुन का वह मरदाना हाथ जाने कहा कहा असर दिखा गया था. पल में हे वह शांत हो गई लेकिन हाथ पकडे रही.

"It's ऑलराइट.", चारुल ने हलके से इतना कहा और दूसरी तरफ चेहरा करती वह बहार देखने लगी.

"क्या बात है अन्नू दीदी. मतलब जहा 3-3 हो सकती है वह मैं क्यों नहीं? पसंद तोह ये मुझे भी पहली बार में आ गया था लेकिन तब मुझे लगा के आपकी वजह से कोई चांस नहीं मेरा. क्या बोलती हो?", सिम्मी आवाज जरूर हलकी कर रही थी लेकिन कार में बाकि तीनो सुन्न प् रहे थे.

"मुझे क्या प्रॉब्लम होगी. हाँ पहले अपनी दीदी से पूछ लेना, वह ज्यादा सीरियस है उसके लिए.", अन्नू जैसे चारुल का पीछा हे नहीं छोड़ रही थी.

"चारुल दीदी..", सिम्मी ने इतना हे कहा था के चारुल ने पलट कर आगे बैठी सिम्मी को थोड़ी हैरानी से देखा.

"चुपचाप सामने देखो सिम्मी.", इधर अर्जुन ने थोड़ी शरारत से चारुल की हथेली को हौले हौले सेहला दिए. हैरान चेहरे पर एक दिलकश मुस्कान लिए वह वैसे हे बहार देखने लगी, पहले की तरह.

"अन्नू दीदी, ये तोह सच में इसके लिए सीरियस है. वह स्टेडियम में भी परसो जानबूझ कर मुझे अपने साथ ले गई थी और तय जी के सामने मेरा नाम लगा दिए. फिर अर्जुन के साथ अकेली चली गई थी. हाँ नहीं तोह.", अन्नू ने गाडी मार्किट के अंदर वाले पार्क के पास रोकती और फिर से हंसने लगी.

"पता है मुझे ये तेरी दीदी आजकल कहा ध्यान लगाए है. गाडी रुकी हुई है फिर भी ये बहार देख कर मुस्कुरा रही है. ओह चारुल मैडम, वह कब का उतर के बहार जा चूका.", अन्नू के ऐसा कहते हे चारुल ने अपने हाथ की तरफ देखा. अर्जुन सचमुच वह नहीं था.

"कुछ भी बोलती रहती है ये सिम्मी. अर्जुन इतना भी खास नहीं के मैं उसको देखती फिरू.", वह भी दरवाजा खोलती बहार निकली तोह सिम्मी की अगली बात का जवाब न दे सकीय.

"हाँ, पीछे हाथ पकड़ के तोह अन्नू दीदी बैठी थी अर्जुन का. आप कुछ भी बोलती हो.", अर्जुन सड़क के पर खड़ा था जिधर ये तीनो बढ़ चली. थोड़ी देर बाद हे वह लोग सुधीर की दूकान पर थे. लड़किया आदतन कपडे देख कर उनमे हे खो गई वही अर्जुन सुधीर के साथ कुछ गहरी बातचीत में लग गया.

"ये कैसा है अर्जुन?", अन्नू एक चुस्त सा laal-safed गाउन लिए उसके पास आ कड़ी हुई. अर्जुन को वह एक नजर में हे भ गया था. सुधीर की तरफ देखते हे वह बोल उठा.

"ये इम्पोर्टेड है भाई और सच कहु तोह ऐसा फैब्रिक और डिज़ाइन हम भी पहली बार बेच रहे है."

"अन्नू पैक करवा लो.", अर्जुन ने जितने प्यार से उसको सुधीर के सामने बैठे हुए हे देखा था अन्नू के लिए जैसे वही पैसे वसूल हो गए थे. थोड़ी हे देर में 4-5 बैग लिए सभी बहार आ चुकी थी.

"बैग पकड़ो.", अन्नू ने अपना बैग थमाया तोह अर्जुन करीब से उसके प्यारे चेहरे को निहारने लगा. वह रुमाल से चेरा साफ़ कर रही थी, शायद गर्मी की वजह से. सिम्मी और चारुल भी इन दोनों को हे देख रही थी. संकरी गली में तेज रफ़्तार स्कूटर बेफिक्र सी अन्नू के करीब से निकलने हे वाला था या टकरा भी जाता, समय रहते अर्जुन ने उसको अपने पास खींच लिए. स्कूटर सचमुच इतने करीब से गुजरा था की दूसरी तरफ कड़ी सिम्मी के पैकेट से हल्का टकरा के निकला. उसके सीने से लगी वह हैरानी से सबको देखने लगी.

"अभी हो गया था तेरा काम, अन्नू की बची. चेहरा साफ़ करती करती सड़क के बीच में कड़ी हो गई थी.", चारुल की ऐसी बात और खुद को अर्जुन के सीने लगे देख वह मुस्कुरा दी.

"देख रही है न मैं कितनी सुरक्षित हु.", अर्जुन ने नजर बचते हुए हलके से अन्नू के पिछले हिस्से पर चपत लगा दी.

"सुरक्षित की बची, मेरा ध्यान भी तुम पर था. स्कूटर पे नहीं. आवाज की वजह से ऐसा किआ मैंने.", अर्जुन ने धीरे से कहा था और फिर चारो वैसे हे आगे चल दिए. उन्हें कुछ और भी खरीदी करनी थी लेकिन दुकान सिर्फ महिलाओ के लिए थी तोह अर्जुन बहार रुक गया.

'लकी भैया है ये तोह और वही कार. इनकी दूकान है खुदकी तोह संजीव भैया के बॉस की कार में ये.', अर्जुन ने वही काली कार अपने से थोड़ी दुरी पर कड़ी देखि और अब वह पार्क की ग्रिल पर बैठा बिना नजरो में आये सब ध्यान से देखने लगा.

2 पोलिसवाले लकी के सामने खड़े कुछ कागज दिखा रहे थे. और hav-bhav से लकी उनके सीनियर सा लग रहा था. अर्जुन ने इतने दिन से कई ख़ास बाते देखि थी लेकिन उस दिन संजीव भैया के झूठ और फिर कमर में दबाई रिवॉल्वर से वह समझ गया था के माजरा कुछ और हे है. दोनों पोलिसवाले सफ़ेद स्प्लेंडर मोटरसाइकिल पर बैठ कर निकल लिए और लकी सड़क पर उस पीसीओ बूथ में, जहा पैसे बहार बैठा व्यक्ति मशीन देख कर लेता था. अर्जुन इतनी दूर से बस देख सकता था और पास जाने का जोखिम उठाना गलत कदम होता.

'हो गई बात? अब करो इन्तजार जाने का.', अर्जुन वैसे हे ध्यान से देखने लगा. लकी ने इधर उधर सतर्कता से देखा और फिर सीधा निकल चला उस आदमी को 10 रुपये दे कर. अर्जुन एक अलग सी मुस्कान लिए उस और चल दिए.

"भाई एक मिनट.", अर्जुन ने फुर्ती से उस लड़के को बूथ से बहार खींच लिए जो अभी अंदर हे जाने लगा था.

"कर ले भाई अगर ज्यादा जल्दी है. बुर्शट तोह न पाद.", वह लड़का झल्लाता हुआ एक तरफ हो गया तोह अर्जुन ने दरवाजा बंद करते हे 'र' बटन दबा दिए

"पता था तुजे इतनी जल्दी याद नहीं रहेगा. #### गांव में दलीप सिंह गौशाला के पास मिलेगा. उसको बोलना मोहर Singh-Sushila सिंह की फाइल. मोहर सिंह वाली यहाँ घर ले आना और सुशीला सिंह वाली चाचा तुझसे खुद लेंगे. अब सब ऐसे हे करना गलती से सुशीला वाली फाइल इधर नहीं आ जाये.", दोनों तरफ से फ़ोन लाइन साथ में काट गई थी.

'संजीव भैया अभी घर है. इस वक़्त दादाजी होंगे बगीचे में. दलीप सिंह मतलब मौसा जी और चाचा मेरे पापा. यही 4 लोग उस दिन वह एक साथ थे. लेकिन संजीव भैया ने ये क्यों कहा के सुशीला की फाइल गलती से इधर न आ जाये? मतलब कुछ ऐसा जिसमे पापा शामिल है लेकिन दादा जी को खबर नहीं है. लेकिन वह सब बाद में पहले ये सब हो क्या रहा है? भैया, भैया करते क्या है? जवाब दादाजी से मिलेगा लेकिन सीधे बात करने से कोई फायदा नहीं.', अर्जुन इतनी हे देर में समझ चूका था के कुछ बड़ा है जो सिर्फ इन लोगो के बीच हे है. घर में किसी और को भनक तक नहीं.

"चलो अब. कितनी आवाज लगाई के इधर आ कर सामान पकड़ लो.", अन्नू की ऊँची आवाज से अर्जुन की तन्द्रा टूटी.

"क्या लिए?", वह बिना सोचे हे ये कह गया था.

"अब यही दिखाऊ? कल घर आओगे तोह कमरे में देख लेना खुद.", अन्नू ने होंठ भींच कर धीमी आवाज में कहा.

"बता दे इसको क्या लिए है अन्नू. शायद इसके काम की चीज हो.", चारुल ने ये बात मजे लेने के लहजे में कही थी लेकिन उम्मीद नहीं थी की अर्जुन ऐसा जवाब देगा.

"आप हे दिखा दो, ये तोह बता कर गई थी क्या लेने वाली है मेरी पसंद का.", सिम्मी के बंद होंठ पूरे खुल गए उसकी बात सुनकर.

"हाहाहाहा.. क्या बात कही है.. दिखा दो अब चारुल दीदी वैसे भी गर्लफ्रेंड का बॉयफ्रेंड से क्या छुपाना. देखा नहीं अन्नू दीदी ने ब्लैक और रेड के खास डिज़ाइन लिए है, अर्जुन की पसंद के.", अन्नू थोड़ी शर्मा गई थी लेकिन चारुल तेज कदमो से गाडी की तरफ बढ़ गई.

"बस बस. सॉरी बोल दो नहीं तोह आज तुम्हारी सहमत पक्की है. अर्जुन ने भी धीमे कदमो से उधर हे चलते हुए सिम्मी से कहा तोह वह भी उसकी बात समझ गई.

"सॉरी दीदी. वह बस मस्ती मजाक में हो गया. कोई इंटेंशन नहीं थी ऐसी मेरी."

"हंस तोह तेरे साथ कोई और भी रहा था.", हल्का गुस्सा था चारुल की आवाज में और उसने चेहरा भी इस तरफ नहीं किआ था.

"उसने हे कहा था के सॉरी बोलू आपको. मतलब वह आलरेडी सॉरी फील कर चूका है.", सिम्मी की बात सुनकर चारुल कुछ शांत हुई लेकिन फिर भी बहार देखने लगी. अन्नू ने गाडी स्टार्ट की और मार्किट से बहार चल दिए.

"ये पिंक भी ाचा है.", अर्जुन ने इतना कहा था के गाल लाल हो गया था उसका. हाथ में पकड़ा गुलाबी रुमाल कार के मत पर गिर चूका था. गाडी एकदम ब्रेक लगते हे सड़क के बीच रुक गई.

"चलता हु अन्नू. घर मिलता हु कल.", अर्जुन ने बिना पालते हे कार से निकल कर अन्नू के गाल को छुआ और ऑटो हाथ दे कर रुकवाता उसमे बैठ गया. 'स्टेडियम की लाइट पर उतार देना भैया.', अर्जुन के इतना कहते हे वैसी हे रफ़्तार में वह teen-pahiya उसको लिए निकल चला.

"अब ये क्या था? पता है तूने क्या कर दिए चारुल? मजाक की शुरुवात भी तूने की थी और सहा भी तुझसे नहीं गया.", अन्नू ने इस से ज्यादा कुछ न कहते हुए रेस पर पंजा दबा लिए. वह जैसे उस थप्पड़ के लिए खुद को गुनेहगार मान रही थी. गुस्सा रोके वह जितनी तेज उन दोनों को घर छोड़ सकती थी वह छोड़ कर बिना कुछ कहे निकल गई. सिम्मी हाथ में बैग पकडे अन्नू को रुकने को कह भी रही थी लेकिन जैसे उसको कुछ सुनाई हे न दिए. अपने घर के सामने जैसे तैसे गाडी कड़ी करती अन्नू अपने कमरे में आ कर रुकी.

दरवाजा पूरी तेज हाथ से भिड़ते हे उसकी आँखों का बांध टूट चूका था और गुस्से में रोटी हुई बीएड पर सजे हर नरम खिलोने को फेंक, बीएड पर बैठ foot-foot कर रोने लगी. घर में कोई था भी नहीं जो उसको ऐसी हालत में देखता या चुप करवाता.

"ऐ.. तुम्हारी क्या गलती है इसमें?", अर्जुन की रफ़्तार भी शायद वैसी हे रही होगी अन्नू की कार इतनी तेज जाते देख, जो वह 3-4 मिनट बाद हे उसको बहो में लिए बिस्टेर पर बैठा था.

"वह सहेली नहीं होती तोह मैं हाथ काट कर अलग कर देती उसका. मारा कैसे उसने तुम्हे? और तुम भी मुझको छोड़ कर चल दिए वह से.", अन्नू अभी भी गुस्सा करती रोये जा रही थी.

"छोड़ कर नहीं गया था. याद भी है के बोलने के बाद चला था के कल मिलेंगे, यही घर पर. लेकिन तुम्हारी गाडी ने मुझे इतनी जल्दी पंहुचा दिए.", अर्जुन अब भी मजाक करता हुआ उसको चुप करवा रहा था.

"ये तुम्हारा हाथ गीला है.", कुछ महसूस करते हे अन्नू ने खड़े हो कर लाइट जलाई.

"इडियट. ये क्या करवा लिए तुमने?", वह हाथ पकडे उसके साथ हे बाथरूम में घुस गई. कलाई से हल्का ऊपर आधे इंच के लगभग कट लगा था जहा से खून रिस रहा था अर्जुन की बाए हाथ पर.

"इतना कुछ नहीं हुआ है अन्नू. रुको तोह सही और सुनो.", थोड़ा सख्ती सी अन्नू को पकड़ते हुए अर्जुन ने सीधा किआ और फिर अपना हाथ धोने के बाद अन्नू की मदद से रुमाल बांध कर बहार बीएड पर आ गया.

"कितना बोलती हो और साथ में हे रोटी भी हो. तुम्हारे पीछे आने के चक्कर में बहार वाला दरवाजा लग गया और कुछ नहीं. अब जरा इधर देखो.", अर्जुन ने भरे हुए गाल पर हाथ रखते हुए अन्नू का चेहरा अपने सामने किआ.

"सॉरी अर्जुन. मैं इन दिनों में तुम्हारे सिवा किसी से मिलना भी नहीं चाहती थी और देखो क्या हो गया.", सुबकियां लेती अन्नू को अब हिचकियाँ आने लगी थी. अर्जुन ने बिस्टेर के पास राखी बोतल उसके होंठो से लगते हुए थोड़ा पानी पिलाया और फिर से अपने से लगते हुए पीठ सहलाने लगा.

"कुछ नहीं हुआ है. बस चारुल को लगा के शायद मैं उसके ख़रीदे कपडे देख रहा होऊंगा. हो गई गलती उस से भी और वैसे भी वह कौन है, तुम्हारी बचपन की दोस्त है. वैसे मैं सोच रहा था के आधा घंटा पड़ा है हमारे पास तोह अगर तुम्हे रोना है मैं बैठ जाता हु. बाकी कोई इस गरीब को प्यार करे तोह ाचा होगा.", अर्जुन समझने के बाद अन्नू की आंसुओ से भीगी नाक पर नाक रखते हुए शरारत से कहने लगा.

"मैं तोह चाहती हे यही थी की तुम स्टेडियम से जल्दी हे घर आ जाओ. अब तक प्यार कर भी लेते.", वह जैसे कह रही थी अर्जुन को थोड़ी हंसी और बहोत सारा प्यार आ रहा था उसकी बचो जैसी शकल बानी देख.

"उम्म्माह.. आज मीठी नहीं लग रही.", अर्जुन ने दोनों होंठो को चूमने के बाद हलकी गुदगुदी करती हुए अन्नू को बिस्टेर पर लिटा लिए.

"बॉर्न्विटा मम्मी बनती है और वह हैं नहीं, मैंने गैस नहीं चलाई कभी."

"चलो आज फिर सिर्फ मीठा दूध पीते है.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए दोनों उभर कपड़ो पे से हे थाम लिए. अन्नू भी हंसती हुई उसको अपने ऊपर खींचने लगी.

"गंदे हो तुम. यहाँ कोई दूध नहीं आता बद्तमीज.", अन्नू के लाल गाल कुछ सोच कर और गहरे हो गए थे.

"ये मैं क्या देख रहा हु, अन्नू?", अर्जुन ने कान की लौ चूमते हुए धीमे से कहा.

"चुप बिलकुल चुप. की.. कहा दिमाग घुमा दिए तुमने? हंसी आ रही है खुद पर हे.", अन्नू उसको जोर से कसके खुद से लगाती शर्मा रही थी.

"तुमने दूध आने की पूरी प्रोसेस सोच ली थी अभी. हैं न?", अर्जुन दोनों उभर प्यार से सहलाते हुए अन्नू को भरपूर छेड़ रहा था.

"सुधर जाओ. गलती से आ गया दिमाग में जैसे हे तुमने कहा. ऐसा कुछ हो गया न तोह.."

"तोह क्या अन्नू? पिलाओगी या नहीं?"

"की यार बस करो. बिन ब्याही माँ बनाने पर तुले हुए हो. कहा न गलती से सोच लिए था.", उसकी बार सुनकर अर्जुन थोड़ा शांत हो गया.

"अगर ऐसा हुआ तोह मैं कैसे तुम्हे रोक सकती हु? तुम्हारे हे है ये.", इस बार अन्नू ने ये बात बड़े प्यार से कही थी. जैसे सच में वह ये सुख चाहती थी लेकिन मज़बूरी हे आड़े आ रही थी.

"पता है मुझे लेकिन फ़िलहाल के लिए ऐसा सोचना भी मत. ये बाप bann-na मेरे बस की बात नहीं है.", अर्जुन कुछ सोचने के बाद ऐसा बोलै था. और धीरे धीरे दोनों एक दूसरे को मसलते हुए ऊपरी कपड़ो को खोलने लगे. अर्जुन ने ब्रा के ऊपर से हे उभर बहार निकलते हे मुँह में भर लिए.

"आह्हः.. उम्म्म्म.. बिलकुल वक़्त नहीं गवाते न तुम.. आह्हः.. साडी रात से तुम्हे हे याद करती रही हु. आठ. अब सुकून देने आये हो...", अन्नू सच हे कह रही थी. पिछली रात वह बस अर्जुन को हे अपने निर्वस्त्र जिस्म पर लिप्त महसूस करके हे सोई थी, खयालो में हे सही.

"इस अगले हफ्ते को महीने में बदलने की नाकाम कोश्शिह कर रहा हु. वक़्त जितना है उतने में हे.", अर्जुन कैसे ये बोल रहा था वह अन्नू भी समझ गई थी. खुद हे अपने बाकी कपडे हटती वह उसका भी ट्रैक और टीशर्ट जिस्म से जुड़ा करके अर्जुन की कमर पर आ बैठी.

"मेरे लिए ये साल भर तक हम दोनों की यादें रहने वाले है. ये पल जो अब कहने को चाँद लम्हे है अर्जुन.", बालो को खोलती वह उसके चेहरे पर झुक गई. इस बार का mookh-milan जैसे घनघोर बरसात सा था. एक दूसरे में डूबे दोनों हे प्रेमी बताशा जीभ चूसते हुए एक दूसरे से रगड़ खाते हुए बिस्टेर पर बिछी चादर इकट्ठी करने लगे. बड़े मुलायम उभर अर्जुन के सीने पर दबते हुए दोनों को उत्तेजना की सीमा पर ले जा रहे थे, जहा से अगली मंजिल वही जाती थी जिसके लिए अन्नू पूरी रात अर्जुन का नाम लेती रही थी.

"मत जाओ फिर. उमंमाहः..", अर्जुन ने नरम चिकनी कमर को पकड़ते हुए कहा और निचे लटकते लाल निप्पल को होंठो में दबा लिए.

"आह्हः.. बस ये एक साल कोई सवाल नहीं अर्जुन फिर तुम चाहोगे तोह ज़िन्दगी भर मैं तुम्हारे लिए अकेली रहने को तैयार हु.. उम्म्म.. फिर कभी नहीं रोकूंगी तुम्हे सवाल पूछने से या इनमे दूध भरने से.", आँखें बंद करती वह उत्तेजना में भी अर्जुन के लिए अपना अंतहीन प्यार जाहिर कर रही थी. वह मॉटे बांस सा अर्जुन का लिंग अब भरी नरम जांघो के बीच अन्नू की गीली छूट के घिसने से और चमकने के साथ हे फूल रहा था.

"बस याद रखना के अर्जुन हमेशा तुम्हारे पास है. हर तकलीफ में, मुसीबत में और अकेलेपन में.", अर्जुन का ध्यान कही और था हे नहीं जैसे. वो स्टैनो को छोड़कर फिरसे उसके चेहरे को चूमने लगा. अन्नू भी पूरी उसपर लेट कर अपने हाथ से उस मूसल को निशाने पर रखती जबड़े भींचे पीछे सरक गई.

"आह्हः.. .. तुम अलग हो हे नहीं सकते इस दिल से अर्जुन.. आआह्ह्ह..", किसी नशे सी हालत में वह 2 बार में हे आधे ज्यादा वह मोटा हिस्सा अपनी नरम छूट में सम्माहित कर चुकी थी. दर्द को रोके रखती वह कुछ पल वैसे हे उसके सीने से चिपकी पड़ी रही.

"ये पागलपन है अन्नू. दर्द से प्यार मत करो.", अर्जुन जैसे उसकी स्थिति समझ रहा था.

"जहा तुम हो वह दर्द हो हे नहीं सकता. बस अपने पूरे होने की चाहत समझ लो इसको.", उसका चेहरा पकड़ती वह खुद अपने कूल्हे हिलती अपने ख़ास हिस्से की लचक में अर्जुन का लिंग कस कर आगे पीछे करने लगी. अब जैसे दोनों हे चुप रहते हुए इस मिलान को पूर्ण करने लगे. आज कमान अन्नू के हाथ में थी और अर्जुन भी उसका साथ दे रहा था, अन्नू को मनमानी करने की छूट देते हुए.

"इनने फिर से कल जैसा कर दो.. आह्हः.. दबाओ या मुँह में लो लेकिन इन्हे सुकून से भर दो.. उम्..", फिर से दोनों उभर उसके हवाले करती वह तेजी से कमर घिसती अपनी फैले हुए मोटो कूल्हों के बीच वाले हिस्से में पूरा जड़ तक लुंड ले रही थी. जिद्द हे तोह थी जो सखलन के बावजूद वह पसीने में नहीं कामदेवी रुकना नहीं चाहती थी. गोरी दूध सी बंद फांके फ़ैल कर 3 इंच छोड़ और लाल हुई उस मॉटे लुंड से बुरी तरह चिपकी ऊपर नीचे हो रही थी.

"गलत हो रहा है ..आह्हः...", लुंड के फूलने पर अन्नू ने अर्जुन को कास के जकड लिए था. उसकी छूट के अंदर होते संकुचन के साथ हे वह मोटी गरम धार छूट की आखिरी दिवार पर टकराने लगी. हरेक कटरा अंदर लेने के बाद अन्नू पलट कर पीठ के बल लेट गई. उसकी फांके लाल हो चुकी था और अंदर का छेड़ लगातार khul-band होने लगा. जल्द हे वह सफ़ेद सा पानी बहार निकलने लगा और अन्नू पलट कर अर्जुन से लिपट गई.

"प्यार में कुछ गलत नहीं होता. मुझे बस ये अपने अंदर हे लेना था. कैसा लगता है इसका ये गरम सा एहसास जो दर्द ख़तम कर देता है.", प्यार से दोनों होंठो को चूमती वह अपनी पंतय से छूट साफ़ करती हुई दराज तक घुटनो के बल चली आई. 2 गोलियों वाला ये अलग सा पत्ता निकलती वह पानी के साथ एक गोली जातक कर सिरहाने से तक लगाए बैठ गई. वह खूबसूरत पाँव दर्द की वजह से काफी फैले हुए थे. पंतय को एक तरफ रखती वह आँखें बंद करके जैसे सब याद करने लगी हो.

"तुम anti-pregnancy टेबलेट ले रही हो?", अर्जुन भी बराबर आ बैठा और एक हाथ उसकी कमर में दाल लिए. अन्नू अपना सर उसके कंधे पर रखती चौड़ी छाती पर हाथ फिरने लगी.

"अभी माँ बनाने के चक्कर में हो क्या मुझे?", फिर से वही शरारती अन्नू देख अर्जुन की मुस्कान भी लौट आई.

"मुझे तोह सच में यही लग रहा था के तुम ऐसा हे कुछ करने लगी हो."

"नहीं अर्जुन ये बस प्यार था जिसमे मैं कुछ भी खराब नहीं करने देना चाहती थी. और जब बचा प्लान करना पॉसिबल हुआ तोह ऐसे दिन में आधा घंटा नहीं मिलने वाले. सुबह से रात और रात से सुबह बस रिपीट होता रहेगा जब तक टेस्ट पॉजिटिव न आ जाये.", वह आँख दबती हुई अर्जुन के निप्पल को चुटकी से मसल कर बाथरूम में दौड़ गई. बीच में दर्द की आह भर्ती हुई.

"ध्यान से अन्नू.", अर्जुन भी कपडे लिए अंदर आया तोह उसको कोड पे बैठे देख मुँह घुमा के खड़ा हो गया. 'शरररर' की आवाज बहोत थी बताने के लिए की अन्नू क्यों भागी थी.

"सॉरी. जब गाडी में थे तबसे रोके हुए थी.", शर्म से वह भी वैसे हे बैठी रही .

"पहले बताना था. बाथरूम में कर लेते.", अर्जुन ने कपडे पहन कर पलट ते हुए कहा. तोह अन्नू वैसे हे टाँगे भींचे बैठी रही.

"अब शर्म आ रही है तुम्हे.? थिस इस नेचुरल अन्नू."

"वह आवाज अजीब आने लगी है कल से. और तुम बहार जाओ, गंदे कही के. मुझे बेशरम बना कर छोड़ोगे पक्का.", अर्जुन इस बात पर हँसता हुआ बहार आ गया. आईने में खुद चेहरा दुरुस्त करने के बाद कलाई को देखा तोह वह खून जमा होने के बाद सूख चूका था. रुमाली ड्रेसिंग टेबल पर रखते हुए वह बिस्टेर ठीक करने लगा और अन्नू ने भी अलमारी से एक घुटने तक की ढीली फ्रॉक पहन ली.

"चलता हु. और सब भुला कर बस ये ध्यान रखना के हम वैसे हे है जैसे कल थे.", अर्जुन ने चेहरे को चूमने के बाद अन्नू को गले लगते हुए कहा. वह भी थोड़ा कस के लिपट गई थी. इतने में हे बहार की घंटी बजी और दोनों अलग हो गए.

"कल कब मिलोगे?", दोनों साथ हे बहार आ रहे थे और दरवाजे पर वही पड़ोस वाली बुजुर्ग आंटी कड़ी थी.

"कुछ कह नहीं सकता. पापा आये हुए है और कल सुबह काम से बहार जाना पड़ेगा मुझे. तरय करूँगा.", अर्जुन ने प्यार से देखा और बहार आ गया. अन्नू भी उसके साथ हे आई थी लेकिन आँगन में उन आंटी को कुछ बता कर धीमी चाल से वापिस अपने कमरे में आ गई.

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आज शंकर जी अपने भाई के साथ समय से हे घर लौट आये थे, जैसा अक्सर होता नहीं था. कुछ समय बहार बगीचे में छोल साहब, रोमिला और रामेश्वर जी के साथ बिताने के बाद शंकर और नरिंदर घर की छत्त पर आ गए. 2 बियर की बोतल बहार निकली शर्ट को ऊपर करके नरिंदर ने बहार निकली तोह शंकर ने हाथ लगा एक तापमान देखा.

"अब तक ठंडी है यार."

"ये पीछे अख़बार भी लगा है भाई. ठंडी तोह रेहनी हे थी ऊपर से जमी हुई ली थी. सोच अंदर क्या हाल हो रहा होगा.", नरिंदर की बात पर हँसते हुए उन्होंने एक बोतल दांत से खोल कर अपने भाई को थमाई और दूसरी खोलने के बाद दोनों आपस में बोतल टकराते टंकी से पीठ लगा कर बैठ गए.

"वैसे तुमने इंजेक्शन दिए तोह चलो समझ में आया लेकिन मेहुल कैसे तैयार हो गया था?", नरिंदर की बात पर शंकर अलग तरह से मुस्कुराया.

"पत्रं ने गुलाटी को chota-mota डॉक्टर बताया था जब गुलाटी उसके घर गया था उसकी बहु को देखने. लेकिन उसको तू काम मत समझ, बस उसको ऐसी हे पसंद है जैसी पत्रं की बहु है. हमेशा एक में रहने वाली और नाजुक घमंडी अमीरजादी.", शंकर की बात सुनकर निन्दर हँसते हुए लम्बा घूँट भरने लगा.

"कैसे चूतिये को मेरे पास बिठा गए तुम लोग. और वह मान कैसे गई यार?", नरिंदर हमेशा ये सवाल पूछता था लेकिन खुद कोई दिलचस्पी न थी इस सब में.

"ये जितनी भी इस तरह की होती है न, कपडे उतार कर बस निरिक्षण का कह कर ऊँगली दाल दो. बाकी उनके खस्सी मर्द एक बड़ी वजह बन जाते है पाँव फ़ैलाने के लिए. 2-2 बार लिए दोनों को फिर भी घर बुला के गई है. गुलाटी तोह अभी से अपना हफ्ते का सचेडूले उसके हिसाब से बनाने में लगा है."

"ाचा वह दलीप की लड़की का क्या चक्कर है? हमारी बात बीच में हे रह गई अभी आते हुए.", नरिंदर को अब इसमें दिलचस्पी थी.

"अर्जुन की राधा है वह."

"राधा कृष्ण की थी बे."

"ये अर्जुन है, निशाना लगाने से पीछे नहीं हटा. और वह लड़की जान दे सकती है अर्जुन के लिए इतना समझ ले. स्टेडियम वाली लड़ाई में इसने हे सुदर्शन का हाथ रोका था. आज तोह फोटो भी देख लिए तूने उस जानवर के."

"सच में शंकर वह कही ज्यादा खूंखार नजर आ रहा था. बाकी चारो भी किसी भी सूरत में काम नहीं थे. और उनकी हालत अपनी आँखों से न देखता तोह मुझे तेरी बात पर पूरा यकीन नहीं था. ये चीज क्या है यार.?"

"ये वह चीज है जिस से चंद्रो ताई का पहाड़ सा सपना चूर चूर हो गया. बेशक वह कभी हमारे साथ बुरा नहीं करती लेकिन सुदर्शन को वह ऐसे तैयार कर रही थी की आगे चल कर वह फिर से उनके परिवार को वही रुतबा दिला सके जो कभी था. और ुंखी आँखों में जरा भी दुःख न आया उनके पौटे का ये हाल करने वाले को देख कर. बस ढीली पड़ गई थी अर्जुन के गले लगती लेकिन वह भी उन्हें संभल गया. अब उन्हें डर है बिंदु और सुशीला का. ताई खुद कुछ नहीं करेगी लेकिन वह सुशीला को सामने रखते हुए बिंदु से झटका लगवायेगी और मेरी चिंता बस बिंदु है."

"तू अभी अर्जुन के बारे में बताता हुआ किधर आ गया.? बिंदु इंग्लैंड में है और वह यहाँ क्या करेगी? मोहर सिंह पर खुद तेरी बेटियां नजरे जमाये है और सुशीला अब ठंडी है मट्टू की मौत के बाद."

"बिंदु मेरे हाथ कभी नहीं आई इन्दर लेकिन वह तुझे पसंद करती थी.", शंकर ने बोतल 2/3 ख़तम कर दी थी इतना कहते हे.

"मैं कृष्णा से प्यार करता था लेकिन तू मुझे कहता तोह मैं वह भी करने को तैयार था. शादी के बाद मैंने अग्नि को साक्षी मान लिए था शंकर.", नरिंदर की आवाज में जो कम्पन्न थी वह शंकर समझता था.

"और मैं तेरे प्यार के लिए कुछ भी कर सकता हु. अर्जुन का हाल भी तेरे जैसे है और बस इस वजह से हे वह मेरा वजीर न बन्न सका.", शंकर की बात इतनी बड़ी थी जो नरिंदर को सकते में दाल गई.

"मतलब क्या है इसका? अर्जुन का प्यार प्रीती से है लेकिन अगर वह इतना तैयार है तोह क्या दिक्कत है भाई? शादी तोह 5-6 साल से पहले नहीं होती."

"वह जिस से सच्चा प्यार किये बैठा है न नरिंदर खुद उसको नहीं मालूम. बेशक अर्जुन शरीर से दलीप की बेटी या किसी और के साथ भी हो सकता है लेकिन वह उस जगह पहुंच चूका है आत्मा से जहा मैं कुछ नहीं कर सकता. पहली बार मैं तेरे से एक राज राज की तरह रखना चाहता हु मेरे भाई. अगर मैंने कुछ भी किआ तोह मैं घर के बहार और थानेदार घर के अंदर भी रह कर कुछ कर न सकेंगे. वह क्या है उसकी झलक तोह तुम्हे भी मिल गई और मैंने दूसरी झलक देखि है. दिल कहता है के वह उसको भी पंडित रामेश्वर के हाथ से हे पा ले गए. और दोनों में से कोई भी तड़पा फिर मैं नहीं जानता के मेरा वजूद भी बचेगा या नहीं.", शंकर की हालत एकाएक अलग हो गई थी. जैसे वह कुछ ज्यादा हे गहराई में डूबा एक अलग इंसान हो.

"ये कैसा चक्रव्यूह है भाई जिसमे तू हे उलझ गया है? लेकिन अगर इस तरह से वह रुका रहेगा तोह ठीक है मैं भी नहीं पूछता.", नरिंदर की बात पर अब शंकर के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी.

"अरे मैं तोह खुद उसके साथ हु. तू और मैं संभल लेंगे सबकुछ. संजीव ाचा सीख चूका है हमारी तरह हे. सब सही चलता रहेगा और भी बहोत लोग है जो शुभचिंतक है." नरिंदर की आधी बोतल बची थी जो अब ख़तम करता वह कमीज खोल कर दिवार पर रखते हुए शरीर लचका रहा था.

"तुझे शीला देवी याद है इन्दर?", शंकर भी अब अपने भाई की तरह मजबूत चौड़ा सीना निर्वस्त्र किये दिवार पर बैठ गया था.

"हाँ. याद कैसे न होगी भाई? साला पापा के कहने पर बड़ी सेवा करनी पड़ी उसकी. लेकिन आज कैसे याद आ गई तुझे वह ठरकी औरत.?"

"अरे उसकी बेटी मेनका, अर्जुन के पीछे है आजकल. दलीप की बेटी उस लड़के से हे ब्याही है जिसको तू थमा के आया था."

"क्या बात कर रहा है? तूने ये पहले क्यों नहीं बताया रे? तू जानता है न शीला देवी कैसी है?"

"हाँ रे. लेकिन तू अर्जुन को जान ले पहले. मेनका अभी तक हमारे हे हिसाब से है और भीम भी. ऋषभ पर संजीव नजर रखे हुए है. लेकिन लव स्टोरी बानी हुई है इनकी. मैडम शायद तेरे चेहरे की याद में अर्जुन की हो गई है या हो जाएँगी."

"बहनचोद. ये लड़कीबाजी करता है? खुलेआम? अब आँख न दुःख रही थानेदार साहब की जो तुझे पेल दिए था लता भाभी के वक़्त?"

"वह घर हे लेके आ रहा है nanad-bhabhi को. लेकिन वह लड़का समझदार है. अभी तक उसने ऐसा वैसा कुछ नहीं किआ."

"सही है. लेकिन ध्यान रखना अगर किसी को पकड़ लिए इसने तोह तेरे पास वापिस नहीं आने वाला वह."

"अब जानता हु इसको थोड़ा बहोत और दुरी भी रखूँगा. पागल है वह. Manju-Preeti की बात पर इतना संजीदा हो गया तोह जिस से प्यार किये बैठा है अगर उसपर नजर रखवाई तोह मुझे हे मार देगा." इधर संजीव ऊपर आ गया था हाथ में एक थैला लिए.

"ये लो आपकी दवा और मेरी दारू.", तीनो अब सहज हो कर जमीन पर बैठ गए थे.

"तू बियर नहीं पीटा?", नरिंदर ने अपने भतीजे से पुछा

"मैं माइल्ड सिग्रत्ती भी नहीं पीटा.", संजीव ने अपने बड़े चाचा को आँख मारते हुए जवाब दिए था.

"हाँ इसकी आँखें माइल्ड हो गई थी मट्टू के टाइम.", शंकर ने जैसे हे याद दिलाया संजीव शांत हो गया.

"पागल है चाचा ये आपके बड़े भाई साहब. दारू में खून मिलने पर भी नहीं छोड़ते."

"सिर्फ खून पिया है बीटा कभी.?", नरिंदर चाचा की बात पर संजीव प्लास्टिक के गिलास में पानी डालते हुए रुक गया.

"राममेहर की कलाई अलग करके नरिंदर ने वही बैठ कर पूरा गिलास पिया था.", शंकर चाचा की बात सुनकर पहली बार संजीव को अंदर तक डर लगा था.

"तेरी चची की मोहब्बत शंकर से काम है बीटा जो मैं घर से दूर हु. आज तू खुल के नौकरी करता अगर ये कसम न देता.", नरिंदर ने माहौल ठीक करते हुए गिलास में बियर के साथ दारू मिलते हुए कहा. शंकर भी वही कर रहा था.

"पहले बोल देते के दारू पीनी है."

"तू बीटा क्वार्टर पीटा है, बाकी हम ले रहे है.", छोटे चाचा की बात सुनकर अब संजीव को इत्मीनान हो गया था एक 4 पेग अकेले ले सकता था वह.

"तोह दारू पीने के बाद क्या ख़याल है."

"तू खाना यही लाएगा. नरिंदर कृष्णा से मिलकर आएगा और मैं सोचूंगा.", शंकर ने स्पष्ट किआ तोह अब तीनो सुरूर में लग गए बेपरवाह.

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"तुम मिले मेरे बेटे से?", नरिंदर चाचा कोई साढ़े 10 बजे नीचे आये तोह सीधा अपनी बड़ी भाभी के कमरे में दाखिल हुए. उन्हें पता था के उनका प्यार कहा मिलेगा. हलके नीले गाउन में लिपटी कृष्णा अपना सर अर्जुन की ब्याह पर रखे लेती थी जो उन्हें कहानिया सुना रहा था. नरिंदर कुछ देर उन्हें देखने के बाद हे अंदर आये थे.

"तोह तुम्हारे लादले ने एक दिन में हे तुम्हे इतना ठीक कर दिए की अब तुम्हे दर्द भी पता नहीं लग रहा?"

"सच कहु तोह अभी तक दवाई की जरुरत हे नहीं पड़ी. नरेन्, तुम्हे सच में इसके साथ रहना चाहिए." कृष्णा चची ने हाथ पकड़ कर उन्हें अपने पास हे बिठा लिए और अर्जुन भी उठ कर सामने गोल मेज के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गया.

"थैंक यू सो मच अर्जुन.", नरिंदर जी ने उल्टा हाथ अर्जुन के हाथ में रखते हुए अपनी बीवी को निहारा लेकिन वह उनके हाथ को पकडे बस अपने चाचा को देखने लगा.

"वह कही नहीं जाएँगी. डरो मत आप चाचा और आज यही रहो. माँ तै जी के कमरे में सो जाएँगी.", अर्जुन बहार निकल गया उन्हें hakka-bakka चोदे.

"ये क्या बोल गया कृष्णा?", चाचा अपनी बीवी से पूछ रहे थे.

"हाथ मत देने उसके हाथ में. मेरा दर्द पढ़ कर मुझे हे प्यार का पथ पढ़ा गया. चलो अगर तुम्हे खाना खाना है तोह अपने भाई के पास चले जाओ नहीं तोह कृष्णा नरेन् के साथ है.", नरिंदर ने भी बिना सोचे दरवाजा बंद करने के बाद लाइट बुझा दी थी. सीढ़ियों से नीचे आते शंकर और संजीव अपनी दिशा में चल दिए थे जैसा उनका बीटा छत्त पर बता कर आया था. संजीव ड्राइंग हाल में और शंकर जी ऋतू के कमरे में जहा रेखा थी.

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"ऋचा एक बार शबनम को जाने से पहले समझा डीओ. मैंने जो देखा है वह शंकर और नरिंदर के साथ तेरे दादा को भी मिला दे तोह ज्यादा आगे है. बाप के लिए हे सही लेकिन कोशिश कर के सब रुक जाये." चंद्रो देवी के शब्द अलग थे, जिनमे डर था.

"दादी वह खुद जान जाये तोह बेहतर रहेगा. इंग्लैंड की फ्लाइट में अभी हफ्ता पड़ा है शबनम की. अर्जुन के बारे में कोमल भी यही कह रही थी की वह सब जानता है और शीला दादी को भी. लेकिन अगर वह मरना चाहती है तोह मेरा भाई तैयार है." ऋचा ने जैसे बात ख़तम कर दी थी.

"शंकर की जनि है है तू."

"जो मेरे पापा से नहीं जाना वह खड़ा कर के देख लो आप फिर. भाई पर तोह आंच मैं भी न आने दूंगी.

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अर्जुन ऊपर पंहुचा हे था की दरवाजा लगती मधु बुआ ने उसको बिस्टेर पर धकेल कर दूसरे कमरे का रुख कर लिए. वह भौचक्का सा बिस्टेर पर गिरा एक पहचान के आलिंगन में लेता घबरा रहा था.
 
अपडेट 92

गड़े मुर्दे-3 (ा)


"मैं हु.", रेणुका ने धीरे से कहा

"पता है लेकिन यहाँ क्या कर रही हो आप? और ये मधु बुआ कैसे?", अर्जुन अभी भी थोड़ा ताज्जुब में था.

"दीदी को पता है. और बड़ी माँ ने हे मुझे यहाँ उनके साथ रहने के लिए कहा है रात में, वह घर की वजह से.", रेणुका बुआ भी उतना खुलकर अर्जुन को नहीं पकडे थी. बस अपने हाथ में अर्जुन का हाथ पकडे थी.

"क्या बताया आपने बड़ी बुआ को?", अर्जुन अभी तक बिस्टेर पर लेता न था.

"यही की उनकी बहिन के होने वाले बचे के पापा ख़याल नहीं रखते और रात अकेले खुद से लड़ना पड़ता है.", रेणुका को अब थोड़ा बेहतर लग रहा था.

"आपने मरवा दिए मुझे. अब मधु बुआ ने अगर मुँह खोला तोह समझो मैं और आप घर से बहार.", अर्जुन हलके से रेणुका का हाथ सेहला रहा था.

"वह बड़ी दीदी है मेरी और उन्होंने भी कुछ बताया है बदले में. जो बहनो के हे बीच सुरक्षित रह सकता है. तुम्हे मैं बुद्धू लगती हु क्या?", अर्जुन कुछ सहज होता रेणुका के तकिये को ठीक करने के बाद खड़ा हुआ और संजीव भैया का दरवाजा खोल कर देखने लगा.

"कोई नहीं है. संजीव ऊपर नहीं आएगा अब. तारा भी अब बाकी लड़कीओ के साथ हे अलग कमरे में आरती के साथ रहेगी. यहाँ बस हम तीन लोग है और दीदी तुम्हारे कमरे में रहेंगी." उनकी बात सुनकर अर्जुन ने अपने कमरे का थोड़ा खुला दरवाजा देखा तोह मधु बुआ निघ्त्य पहने करवट ले रही थी. शायद उधर उतनी ठंडक न थी.

"बुआ आप इधर सो जाइये मैं मेरे कमरे में ठीक रहूँगा.", अर्जुन दरवाजा खोल कर अंदर आ खड़ा हुआ.

"नहीं रे. तुम दोनों उधर ठीक रहोगे. उसको यहाँ गर्मी में घबराहट होगी.", मधु बुआ का जिस्म उनकी हालत बता रहा था.

"चलो आप उधर. मैं वही सो जाऊंगा लेकिन आप इधर नहीं सोयेंगी.", ऐसी खुली बात सुनकर मधु को थोड़ी हैरत हुई लेकिन ज्यादा बात बढ़ाये बिना वह उठ कर उसके साथ इधर आ गई. अर्जुन अपने बीएड से एक गद्दा लेकर उनके हे बीएड के बगल में फर्श पर बिछाने के बाद तकिया चादर लिए लेट गया.

"ये गलत है अर्जुन. तुम ऊपर सो जाओ.", मधु बुआ बिस्टेर पर बैठी बोल रही थी और रेणुका चुप थी.

"बुआ साथ हे हु न इस कमरे में. और आपको पता है के मैं एक की सीढ़ी हवा में नहीं सोता. आप दोनों आराम से ऊपर रहो मैं इधर हु और वैसे भी ये वही गद्दा है जैसा आपके बीएड पर है. थोड़ी देर में हे पूरा कमरा ठंडा हो जायेगा.", अर्जुन ने तकिया ठीक करने के बाद अपनी पीठ बीएड की दिशा में करते हुए आँखे बंद कर ली.

"ऐ.. तू जा अब उसके पास. वह ऊपर नहीं आएगा और मुझे दूसरे कमरे में जाने नहीं देगा.", मधु की ऐसी धीमी आवाज सुनकर रेणुका ने चुपचाप चादर जिस्म से हटाई और अपना तकिया लिए अर्जुन की बगल में आ बैठी.

"ाचा आ जाओ इधर आप. पता है कोई काम नहीं है यहाँ.", अर्जुन ने कमर से थोड़ा ऊपर अपना हाथ रखते हुए उन्हें लेटने को कहा और सकुचाती सी रेणुका पीठ के बल उसका हाथ अपने पेट पर रखे लेट गई. अब मधु बुआ भी निश्चिंत हो कर पसर चुकी थी.

"तुम बहोत प्यारे हो.", अर्जुन के होंठो पर हलके से होठ रखने के बाद रेणुका इस जीरो की नीली रौशनी में उसका चेहरा अपने करीब देख कर धीमी आवाज में बोली.

"हाँ पता है. सॉरी, मुझे पता नहीं था के रात में इतनी परेशानी होती होगी तुम्हे. प्रेग्नेंट नहीं हुआ न मैं कभी.", अर्जुन निघ्त्य के ऊपर से हे उस चिकने पेट को सहलाता हुआ रेणुका को आगोश में लिए करवट से लिप्त था.

"तुम हो भी नहीं सकते, गंदे कुछ भी बोलते हो. और परेशानी ऐसी कुछ नहीं होती बस नींद खुलती रहती है बार बार. प्रीती के पास सोने गई तोह रात विक्य आ गई कमरे में और फिर दोनों बातें करने लगी. मैं फिर अपने कमरे में अकेली.", अर्जुन अब समझ रहा था थोड़ा थोड़ा.

"चलो दादी ने समझा ये सब और मधु बुआ ने ठीक किआ जो तुम्हे अपने साथ रहने के लिए ऊपर ले आई.", अर्जुन वैसे हे हाथ फिरता रेणुका के तजा नहाये जिस्म की सोंधी खुशबु ले रहा था, चेहरे और बालो की.

"बड़ी माँ ने कहा के अर्जुन ऊपर हे रहता है तोह ध्यान रखेगा. और देखो ये कैसे ध्यान रख रहे है मेरा.", वह मोहक मुस्कान थोड़ी शरारती थी. अर्जुन का हाथ ऊपर एक सतांन पर आ गया था.

"तुमने रात में ये क्यों पहनी हुई है?", अर्जुन हलकी नाराजगी से बोलै और रेणुका बैठती हुई अपनी ब्रा खोलने की कोशिश करने लगी, जो मुश्किल था.

"इधर आओ.", अर्जुन ने वापिस करीब लिटाते हुए ढीली निघ्त्य में काख की तरफ से हाथ डालते हे आराम से हक्क खोला और उसको ढीला कर दिए.

"अब मैं कर लेती हु.", रेणुका ने सामने से एक एक करके दोनों स्ट्राप अपनी बाहो से बहार करते हुए सामने से वह सफ़ेद ब्रा निकल कर तकिये के नीचे रख दी.

"आइंदा से सोने के समय ये ऊपर नीचे कुछ नहीं. दबाव पड़ता है और जल्द हे ये दोनों बढ़ने लगेंगे.", अर्जुन आराम से एक उभर को हथेली में लिए पीठ से लिप्त था.

"अलग से नजर आते है फिर निघ्त्य के ऊपर से."

"मैं जब होता हे नहीं और इन्हे तुम खुद तोह टच करने से रही, फिर ये ऐसे क्यों होने लगे है?", अर्जुन बात समझ भी गया था और निप्पल को सूजा हुआ महसूस करके वैसे हे धीमी आवाज में पूछने लगा.

"इसलिए नींद नहीं आती. ये रात में ऐसे हे रहने लगे है और उधर भी खारिश रहती है, वैसी हे जैसी तुम्हारे हाथ लगाने से होती है.", रेणुका खुले शब्दों में तोह कहती नहीं थी कभी लेकिन अर्जुन समझ जाता था.

"ओह. ऐसा भी होता है?"

"उम्म्म.. बस यही दिल करता है हर वक़्त. आराम से करो.", अर्जुन ने रेणुका को फिर से पलट कर सीधा करते हुए अपना हाथ जांघो के बीच वाले फूले हिस्से पर रख दिए. कपडे के ऊपर से हे एक निप्पल होंठो में दबाता वह रेणुका की नरम छूट सहलाने लगा.

"आवाज नहीं. बुआ भी है इधर.", अर्जुन ने सर उभर से उठा कर आहिस्ता से रेणुका को चेताया और वह शर्माती हुई ना में सर हिलने लगी. जैसे ये मुश्किल काम था.

"ाचा पाँव इधर ऊपर रख लो.", अर्जुन ने उन्हें अपने ठीक सामने करते हुए दाया पाँव अपने पाँव पर रखवा लिए. निघ्त्य को कमर की तरफ सरकते हुए वह पूरे चिकने पाँव को उजली जांघ तक ऊपर करने के बाद निर्वस्त कुल्हा सहलाते हुए उनके होंठो को चूमने लगा. ऐसे में कोई आवाज भी नहीं हो रही थी और दोनों एक दूसरे को भरपूर सेहला भी रहे थे.

"इसको भी खोलो.", रेणुका ने अर्जुन की जांघो के बीच अकड़े हुए अंग को हल्का दबाता हुए कहा और अर्जुन ने भी पजामा निचे सरका कर वह मोटा लिंग आजाद कर दिए. फिर से एक दूसरे के होंठो को चूमते वह चुपचाप एक दूसरे के अंगो को सहलाने लगे. टांग ऊपर रखवाने से अर्जुन भी अब वह बहार को उभरी नरम योनि ाचे से सेहला रहा था. मस्ती में रेणुका उसका लिंग दबाये और करीब हो गई. सूपड़ा उस नरम गीले मांस से टकराया और रेणुका की मुट्ठी अपनी कलाई से मॉटे लिंग पर कस गई. अर्जुन ने भी समझते हुए खुद को थोड़ा आगे सरकते हुए हलके दबाव से अपना सूपड़ा रेणुका के योनिमुख पर धंसा दिए. रेणुका के शरीर में हलकी सी कम्पन्न हुई और अपना हाथ लिंग से हठाती वह उसकी पीठ पर उंगलिया कसने लगी.

"उम्म्म.. ाम्म्म", बस उत्तेजना में ये हलकी आवाज होंठो के किनारे से निकली और अर्जुन बड़े ध्यान से सिर्फ सुपडे से हे धीमी चुदाई करने लगा. रेणुका की वह अजीब सी खारिश अब पूरा मजा दे रही थी. अर्जुन भी पूरा ख्याल रखते हुए कोई दबाव या जोर दिए बिना रेणुका के जिस्म को सुकून देने लगा. दोनों हे ek-dusre में इतने खोये थे की बीएड के इसतरफ मुँह किये मधु बुआ की तरफ न उनका ध्यान गया और न वह अलग हुए. बस अब रेणुका की निघ्त्य कमर से ऊपर आ चुकी थी और आधा लिंग प्यार से अंदर बहार होता उन्हें एक दूसरे से जोड़े थे. होंठ जुड़ा होते तब भी वह आँखे बंद किये चेहरों को वैसे हे रखे एक दूसरे को सहलाते रहे.

"अंदर हे.", रेणुका 25 मिनट में अब तीसरी बार होने लगी थी और वह समझ गई थी की अर्जुन भी होने वाला है. इस बार दोनों कस के लिपटे तोह कमर कुछ देर हिलती रही फिर दोनों शांत हो गए. सारा रास अंदर हे भरने के बाद अर्जुन ने लिंग भी वैसे हे अंदर रहने दिए.

"ऐसे हे सोना है मुझे.", रेणुका की ये बात सुनकर अर्जुन ने मुस्कुराते हुए उसको सीने से लगा लिए. दोनों युगल बेपरवाह से वैसे हे सो गए. मधु बुआ भी मुस्कुराती हुए उन्हें देख कर अब अपने मुँह पर चादर ढकती सो गई.

"क्या हुआ?", 2 बजे रेणुका हिली तोह अर्जुन की आँख झट्ट से खुल गई.

"तुम लेते रहो. मैं बाथरूम हो कर आती हु.", अर्जुन उनसे पहले खड़ा होता रेणुका को भी आराम से बाँहों के सहारे खड़ा करते हुए बाथरूम तक ले आया. अंदर की लाइट जलने के बाद वह वापिस बहार आ गया और अर्जुन के होंठो पर प्यार की मुहर लगाती रेणुका अंदर चली गई.

"ऐसे मत उठा करो. मैं तोह 2-3 बार रात में उठूंगी और तुम्हारी नींद खराब होगी.", अर्जुन ने वैसे हे रेणुका को अपने साथ लगाए फिर से गद्दे पर लिटा लिए तोह वह कहने लगी.

"साड़ी रात जागने को तैयार हु जितने तुम आराम से नहीं सो जाती. चलो अब आँखें बंद करो."

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अर्जुन पौने 6 बजे घर वापिस आया तोह हमेशा की तरह रामेश्वर जी चटाई बिछाये अखबार पढ़ रहे थे. नजर उठा कर सामने अर्जुन को देखा तोह अपने पास बुला लिए. ट्रैक पजामा उतार कर एक तरफ रखता वह गीली बनियान और निक्कर में पाँव सीधे करते हुए उनके पास हे संगमरमर के ठन्डे फर्श पर बैठ गया. सख्त पिण्डलिया बहार उभरी हुई थी और वैसा हे हाल कुछ उसके सुडोल पत्तो का था. मांसपेशिया उभरी हुई वह की सख्ती बता रही थी.

"दादाजी ऐसी क्या खबर छपी है जो ध्यान से पढ़ रहे हो?", अर्जुन पाँव के अंगूठे पकड़ कर शरीर पूरा मौडे हुए अपना सर घुटनो पर झुकाये था.

"तू इतने बड़े शरीर के साथ ये सब भी कर लेता है?", रामेश्वर जी ने ये करते हुए अर्जुन को पहली बार देखा था और हैरान भी थे जितना बड़ा और सख्त शरीर था उसमे ऐसी लचक देख कर.

"करना पड़ता है दादा जी. वैसे तोह बोर्डिंग में करता था थोड़ा बहुत लेकिन अब अगर इतने बड़े शरीर को काबू करना है तोह फिर ये ज्यादा हे जरुरी है. आप बताओ?", अर्जुन शरीर ऊपर उठाये 145 के कोण पर पीठ करता दोनों हाथ पीछे फर्श पर रखे अब थोड़ा सुकून से बैठ चूका था.

"ाची बात है. और मैं तोह भाई हमेशा की तरह वही खबरे पढ़ रहा हु जो सामने दिख जाती है. ला पाँव इधर कर अपने.", खुद हे उसका पंजा पकड़ कर अपनी तरफ खींच कर वह दूसरे हाथ से सरसों का तेल पिण्डलिओ से पंजे तक रगड़ने लगे. अर्जुन ने एक नजर आधे मुड़े अखबार पर डालने के बाद कुछ पल के लिए आँखे बंद कर ली. वह अपने दादाजी की मजबूत हाथो की मालिश से ाचा महसूस कर रहा था.

"आपके हाथ बड़े जानदार है दादाजी. और कितने आराम से आपने मुझे खींच लिए.", अर्जुन का अब दूसरा पांव दादाजी के हाथ में था. वह मुस्कुरा रहे थे उसकी बात पर.

"तू इन्हे क्या समझता है? एक थप्पड़ पड़ते हे मैंने बदमाश को नीचे गिरते देखा है. वह बात अलग है के फिर खुद हे उसको डॉक्टर पे लेके गए थे टाँके लगवाने.", कौशल्या जी ने 2 कुर्सियां खिसकते हुए कहा और उनके पीछे हे आई रेणुका को देख कर अर्जुन फिर से दादाजी को देखने लगा. कौशल्या जी रेणुका का वही बिठा कर अंदर चली गई.

"ये कब की बात है दादाजी? दादी ने कहा है तोह झूठ बिलकुल नहीं हो सकती. बताओ तोह जरा.", वह हँसते हुए एक बार अपनी भतीजी को देख कर अर्जुन की पांव की उंगलिया खास अंदाज से दबाने लगे.

"भाई, फिल्म देखने गए थे तेरी दादी की जिद्द पर. उस दिन चंडीगढ़ में गया था मैं सरकारी काम से तोह वह जल्दी ख़तम हो गया था. फिर तेरी दादी की जिद्द पर पिकाडली में सिनेमा देख कर बहार आये तोह एक नवाबजादे ने तेरी दादी के हलकी सी टक्कर मार दी थी अपने स्कूटर से, वह भी जहा गाडी लाना मन था. बस हो गई मेरे से भी गलती लेकिन ज्यादा हे तेज लग गया था उसके.", दादी भी अंदर से मुस्कुराती हुई चली आ रही थी. ट्रे में दूध के गिलास और chai-laddu लिए.

"बात ये नहीं थी बीटा. टक्कर के लिए नहीं मारा था उसको तेरे दादा ने, उसने गाली दी तोह मारा था. बीवी के तोह बर्दाश्त कर सकते है लग्न, लेकिन गाली सुनते हे रंगत बदल जाती है. ले बेटी और ये पूरा पीने के बाद हे उठने दूंगी.", अपने हाथ से बड़ा गिलास रेणुका को पकड़ाया तोह वह भी गिलास के दूध को देखने लगी.

"इतना सारा? और ये क्या क्या दाल दिए आपने इसमें बड़ी माँ?", कौशल्या जी ने परिचित आँखे दिखाई तोह रेणुका ने हल्का सा घूँट भरा.

"जहर नहीं है इसमें. केसर और बादाम हे डाले है. मेरी ाची बची चल आराम से पी. वह बैल देख इस से दोगुना दूध कैसे ख़तम करता है, कड़वे लड्डू के साथ. और आप भी चाय पीयो जी. लो हाथ साफ़ कर लो इस से.", खुद भी वह रेणुका की बगल में हे बैठ गई अपने पतिदेव को छोटा टोलिया देने के बाद.

"वैसे फिल्म कोनसी थी दादा जी?", अर्जुन आधा दूध ख़तम करके सबको देखने लगा फिर नजरे दादा पर टिका दी जो मुस्कुरा रहे थे हाथ तोलिये से रगड़ते हुए.

"चुप कर. सुबह सवेरे ये बातें लेके बैठ गया. और तेरे दादा भी तेरे हे जैसे है, भरपूर टाइम है इनके पास ऐसी बातों के लिए.", दादी के गुस्से के पीछे जो शर्म थी वह अर्जुन ने देख ली थी. रामेश्वर जी कप उठाते हुए बोले.

"बॉबी. तेरी दादी राज कपूर की बड़ी फैन थी बीटा उस समय. और फिर उसकी बनाई फिल्म जिसमे तीसरी पीढ़ी अपना आगाज कर रही थी ये कैसे छोड़ देती. नहीं तोह ये कहा चंडीगढ़ जाने लगी थी पोलिसवाले के साथ.", हँसते हुए उन्होंने घूँट भरा और कौशल्या जी मुँह बनाने के बाद फिर खुद हे मुस्कुरा उठी.

"वाह बड़ी माँ. ये तोह पता हे नहीं था के आप सिनेमा देखने भी जाती थी.", रेणुका ने माहौल थोड़ा ठीक किआ इस से पहले की अर्जुन वैसा हे कोई और सवाल करे. अर्जुन देख रहा था रेणुका को जिसने ये कड़क सफ़ेद सलवार कमीज पहना हुआ था और माथे पर लाल गोल तिलक उसकी आभा को और प्रज्वल कर रहा था. कही कोई सिलवट न थी और साधारण रंग में भी वह कितनी हसीं लग रही थी.

"रेणुका, तेरी ये बड़ी माँ टेलीविज़न पर तोह मज़बूरी में कभी महीने में एक आध प्रोग्राम या फिल्म देखती थी. मैं उस समय हवलदार था और मैडम राज कपूर, राजेंदर कुमार और धर्मेंदर की कोई फिल्म नहीं छोड़ती थी. बाद में मैं जिम्मेवारी और ओहदा बढ़ गया तोह थानेदारनी जी अपने सुपुत्र शंकर के साथ जाने लगी. ये तोह अब समझ ले की परिवार बढ़ गया और बचो के साथ रहना पड़ता है नहीं तोह आज कोई पुराणी फिल्म लगे ये फिर से देखने चली जाये.", उनकी बात पर कौशल्या जी को छोड़ कर बाकी दोनों हंसने लगे.

"बस भी करो जी. घर और बचे भी मैंने हे संभाले थे अकेली ने. मनोरंजन हर कोई करता है, हमारी शादी के बाद भी आपके बटुए में मधुबाला की फोटो के लिए तोह मैंने भी कभी न टोका था.", अब बाजी उलट गई थी और अर्जुन हंसी रोके अपने दादा को देख रहा था जो अखबार पढ़ने का ढोंग कर रहे थे.

"हाहाहा.. सच बात है दादी, दादाजी आपसे नहीं जीत सकते. हाहाहा.", अर्जुन पेट पकड़ कर लोटपोट होने लगा था और रामेश्वर जी हलके से उसके चपत लगते हुए उठ खड़े हुए.

"अरे बीटा ये तू खुद हे देख ले. इतनी सी हे बात बताई थी और उठ के चल दिए. जवानी हरेक मर्द के आती है और इनकी भी थी. चल अब तू भी उठ कर तैयार हो जा फिर गौशाला भी जाना है. ये भी आजसे bhagwad-geeta पढ़ने लगी है और ाची बात है के समय से सोयेगी समय से उठेगी. बचे पर ाचा असर पड़ेगा.", दादी ने रेणुका के हाथ से गिलास लिए और फिर हलके गुस्से से वापिस पकड़ा दिए.

"बड़ी माँ, थोड़ा सा हे तोह बचा है, प्लीज.", कौशल्या जी ने वह आधा लीटर का गिलास अर्जुन की तरफ कर दिए तोह वह हैरान सा उन्हें देखने लगा.

"तेरी बुआ हे है कोई गैर नहीं. तेरे से ज्यादा saaf-suthri है जो मुँह बना रहा है. और कौन पीयेगा अब इसको, म्हणत लगती है. चल ख़तम कर और गिलास वापिस दे.", अर्जुन ने अनमने भाव से गिलास लिए जिसमे 1/3 दूध बाकी था.

"ये थोड़ा सा है?", और गिलास मुँह से लगता हुआ ख़तम करने के बाद हे दादी को पकड़ा के उठ गया.

"फीका दूध कैसे पी सकता है कोई दादी.?", इतना बोल कर हँसता हुआ वह सीढ़ियों की तरफ भाग लिए.

"ठहर मैं बताती हु तुझे. बदमाश कही का. अपने हाथ से मिश्री डाली है और तुझे फीका लग रहा है.", दादी हंसती हुई अंदर जाने से पहले रेणुका के सर पर हाथ फेर गई. अंदर आँगन में भी चहल पहल शुरू हो चुकी थी. नरिंदर जी अपनी दोनों भाभियो के पास हे रसोई में बैठे चाय के साथ नमकीन पराठा डुबो कर खा रहे थे और साथ हे कोई चुटकुला सुना रहे थे.

बहार वाली मेज पर नाश्ता करते हुए शंकर जी भी तैयार थे और उनके साथ हे संजीव भैया भी. कोमल दीदी दोनों की प्लेट में पराठे और मक्खन रखने के बाद ऊपर अपनी छोटी बहनो के लिए coffee-chai लेके चल दी. थोड़ी हे देर में मधु बुआ और माधुरी दीदी भी उधर आ बैठी.

"इतनी सवेरे कहा की तैयारी शंकर?", मधु बुआ ने अपने भाई से पूछा और प्रियंका ने अपनी बुआ और बड़ी बहिन के सामने chai-coffee रख दी.

"कल जाना है मुझे भी Narinder-Krishna के साथ, उसे. कुछ सामान भी लेना है और सांगवान अंकल से थोड़े काम भी करवाने है वह रहने और हॉस्पिटल से जुड़े. संजीव यही है और थोड़ी देर तक वापिस आ जायेगा. मैं और नरिंदर हे जा रहे है. कुछ काम था क्या?", उन्होंने बिना laag-lapet के बता दिए.

"तुम भी जा रहे हो? ाची बात है भाई. नरिंदर और कृष्णा को भी परेशानी नहीं आएगी. वापसी कब तक होगी?"

"अगले रविवार की आने की टिकट बानी है. बता देना अगर वह से कुछ लाना हो तोह."

"ठीक है, शाम को तोह वापिस आओगे हे तोह बता दूंगी तभी.", मधु ने कॉफ़ी की छोटी सी घूँट लेते हुए फिर संजीव को देखा.

"उनके कमरों में भी एक लगवा दिए अब वह नीचे भी नहीं आने वाली.", मधु बुआ की इस बात पर संजीव हलके से मुस्कुरा दिए.

"ाची बात है न. यहाँ शोर काम रहेगा और उनका ध्यान पढाई में लगा रहे वही बढ़िया है. काम करने के लिए बाकी लोग है हे.", शंकर जी ने खाना ख़तम करते हुए अपनी काली कॉफ़ी उठा ली. इधर अर्जुन तैयार हो कर नीचे आया तोह शंकर जी ध्यान से उसको देखने लगे. सफ़ेद kurta-pyjama और ऊपर वाली जेब में पतली स्टील की डंडी वाला चस्मा, जो अंदर की तरफ था.

"क्या बात है.", उन्होंने ये संजीव को कहा था जो खुद अर्जुन को निहार रहा था. अर्जुन सीधा अपनी चची के कमरे में चला गया.

"देख लो चाचा. कुछ याद आया आपको?", संजीव की बात सुनकर बाकी तीनो मुस्कुरा दिए.

"चाचा आप भी ऐसे हे दीखते थे न. मुझे भी याद है.", माधुरी भी थोड़ी खुश थी.

"ये मेरे जैसा दीखता है मैं उस जैसा नहीं. और दोनों के स्टाइल थोड़े अलग है.", शंकर जी के ऐसा कहने पर नरिंदर जी भी अपनी बहिन के गाल पीछे से दबाते हुए कुर्सी पर कोहनी रखे खड़े हो गए.

"मान न मान, वह तेरे से बेहतर लग रहा है. ऊपर से देख कैसे सीधा मेरी लुगाई के पास चला गया. तेरी औलाद ज्यादा हे तेज है भाई.", अभी वह बात हे कर रहे थे के अर्जुन अपनी चची को उधर हे ले आया. वह भी जैसे थोड़े समय पहले हे नाहा चुकी थी. शरीर पर अभी भी एक ढीला साफ़ गाउन था.

"दीदी, कुर्सी खली करो जरा.", अर्जुन ने प्रियंका दीदी से कहा जो उसकी बात सुनते हे इधर वाली कुर्सी पर रखे अख़बार और पालक उठा कर गद्दी झड़ने लगी.

"बैठो आप चची. और अंदर अकेले बैठने की जगह थोड़ा बहार सबके साथ समय बिताया करो. ाचा भी लगेगा और खुला माहौल आपकी सेहत के लिए ज्यादा सही है. पाँव ऊपर करो जरा.", अर्जुन ने सरकंडो वाला गोल स्टूल उनके पाँव के नीचे रखा, जिसपर गद्दी लगी थी और रेखा जी भी अपनी देवरानी के लिए दूध ले आई. बाकी सब गौर से देख रहे थे की अर्जुन के लिए जैसे वह और लोग थे हे नहीं.

"मैं दूध नहीं पीती रेखा."

"अपने लाडले से पूछ. उसने रात में हे कह दिए था के तेरी चाय बंद अबसे.", अर्जुन ने अपने हाथ में गिलास लिए और चची के मुँह से लगा दिए. फिर उनका हे हाथ गिलास पे रखता वह उन्हें इशारे से हे पीने के लिए कहने लगा.

"शरीर में कुछ है भी क्या? ठंडा रहता है क्योंकि खुराक नहीं लेती हो आप. माँ, चची के नाश्ते का भी ध्यान रखना. मैं गौशाला से 3-4 घंटे में आ जाऊंगा. दादी ने कहा है के मेरा नाश्ता मौसी हे लेके आएगी.", अर्जुन अपनी दादी के कमरे चल दिए जहा रेणुका बुआ और उसके dada-daadi थे.

"साला ये सब क्या था? मेरे सामने मेरी लुगाई की सेवा कर रहा था और हम लोग उसको दिखे हे नहीं.", नरिंदर जी की ऐसी बात पर रेखा जी के साथ कृष्णा जी भी हलके से मुस्कुराई.

"वह नाराज है आप सबसे.", रेखा जी के ऐसा कहते हे माधुरी को परे करते नरिंदर जी अपनी बीवी के पास बैठ गए.

"किस बात के लिए नाराज है आपका चाँद? कल रात तक तोह भला चंगा था."

"भला चंगा अभी भी है. नाराज कृष्णा के सामने है क्योंकि किसी ने भी इसका ख्याल नहीं रखा और हालत जब इतने समय से खराब थी तोह यहाँ परिवार में क्यों नहीं लेके आये इसको. मुझसे भी गुस्सा है थोड़ा के मैं हे बुला लेती उसकी चची को. अब तक ठीक हो जाना था अगर सब ध्यान देते और ये अकेले न रहती तोह.", रेखा जी चली गई इतना कह कर और कृष्णा जी की आँखे हलकी सी नम्म हो गई थी. अर्जुन के प्यार और परवाह देखने के साथ हे उसका ऐसी बातें अपनी माँ से करने के लिए.

"कोई बात नहीं. मैं मन लूंगा मेरे लाडले को. बीवी की सेवा हे करनी है न, अब जैसे वह चाहता है वैसे हे रखूँगा वह इसको. चलो मुँह साफ़ करो कृष्णा.", नरिंदर जी shant-bhav से कह रहे थे लेकिन महसूस उन्हें भी हो गया था के कही न कही गलती हुई है. ऐसा हे शंकर जी के दिमाग में चल रहा था. अपने पति के हाथ से कृष्णा जी रुमाल लेने लगी तोह माधुरी दीदी ने और नै बात कर दी.

"जिसकी समझदारी की आप लोग बात कर रहे हो न वह रुमाल नहीं देता, खुद आंसू साफ़ पोंछता है हंसाने के साथ साथ.", नरिंदर जी मुस्कुराते हुए फिर खुद हे अपनी बीवी का चेहरा साफ़ करने लगे जहा अब मुस्कान थी.

"कमाल है भाई.", शंकर जी कपडे से हाथ साफ़ करते हुए सबको हे देख रहे थे.

"तुम हमेशा mummy-papa के लाडले रहे हो न तोह उनके कर्मो से हे वह औलाद तुम्हे मिली. हमारी किस्मत में तोह हमारे जैसे हे लिखे थे.", मुँह बनाते हुए मधु की ऐसी बात सुनकर सबके चेहरे खुश हो उठे थे. वह खुद भी हंसमुख हो चुकी थी इतने हे दिनों में.

"बेबे तू भी खुश रहने लगी सबके साथ. ये तोह मैंने भी न ध्यान दिए.", नरिंदर अपने हाथ से बीवी को दूध पिलाते हुए बहिन से बोलै.

"अब ये न कह डीओ के इसमें भी मेरी औलाद का हे हाथ है.", शंकर जी कटोरी में राखी saunf-cheeni अपने हथेली में दाल रहे थे.

"और किसका होगा? मेरा लाडला हे कर सकता है ये अजूबे. नहीं तोह इस लड़की ने तोह पहली बार में गाल लाल कर दिए था अपने भतीजे का और अब देख प्यार भी सारा उसपे लुटा रही है. शाम को खुद अपने लादले के कपडे इस्त्री किये और उसकी अलमारी में लगा के आई. रात में मेरे भी हाथ पांव दबाये पहली बार मेरी बेटी ने.", मधु बुआ अपने बारे में सुन्न कर शर्मीली सी मुस्कान देने लगी थी और कौशल्या जी इतना कहती फिर शंकर के हाथ में कुछ कागज थमा कर रसोई में चल दी, रामेश्वर जी का नाश्ता लगवाने.

"तुमने उस पर हाथ उठाया था?", कृष्णा के ऐसा कहते हे मधु बुआ जैसे सेहम हे गई थी.

"भाभी, पीछे से उसने मुझे गॉड में उठा लिए था जब मैं घर आई थी. और पता भी नहीं था के वह अर्जुन है या कोई और. बिना देखे लग गया था उसके. सॉरी बोल दिए था मैंने."

"अरे मैं पूछ रही थी बस. हाथ तोह तेरा हे दुख होगा मधु, मेरा बीटा पत्थर सा और तू फूल सी.", कृष्णा जी के इस अंदाज से कहने के साथ मुस्कुराने पर मधु बुआ रूठती हुई अपने भाई के गले लग गई.

"सब एक जैसे हे है."

"अरे तेरी वजह से मेरी लुगाई मुस्कुरा रही है और तू रूठ रही है? चल आजा अगर साथ चलना है तोह. ये अपने काम करेंगे इतने हम घुमाई करेंगे और शंकर की जेब भी ढीली करवा डीओ लगे हाथ.", नरिंदर की बात पर मधु का चेहरा खिल उठा.

"सच्ची? मैं चल सकती हु?"

"तेरे को मन करके देखे कोई.", नरिंदर की ऐसी बात सुनकर शंकर जी ने सामने से कहा.

"और मन कर दिए तोह क्या करेगा फिर तू?"

"हमारे पास और भी गाडी है, उस से चले जायेंगे. लेकिन वह भी पैसे तुम्हे देने पड़ेंगे.", नरिंदर की बात पर शंकर हँसते हुए खड़े हुए और मधु को तैयार होने का बोल कर अपने पिता के पास चल दिए.

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"ये इतनी जल्दी उठने की क्या जरुरत थी तुम्हे?", अर्जुन शहर से बहार निकल आया था और यहाँ रेणुका सर पे दुपट्टा लिए गले में दोनों तरफ किये, उसकी कमर में हाथ डालते हुए आराम से बैठी थी. घर से बहार आने पर रेणुका को भी ाचा लग रहा था और ज्यादा ाचा इस बात से की अर्जुन साथ था.

"नींद पूरी हो गई थी मेरी. दिन में भी आराम कर लेती हु. ाचा लगा बड़ी माँ के साथ पूजा करना और फिर तुम्हे देखना. कितना खुश रहते है न बड़ी माँ और ताऊजी तुम्हारे साथ."

"हाँ, वह दोनों भी एक बड़ी वजह है मेरी इस सपने सी ज़िन्दगी की. लेकिन वह सब बाद में पहले मेरी बात पर ध्यान दो. जल्दी उठना है तोह फिर अबसे जल्दी सोना भी पड़ेगा."

"अब जब तुम्हारे साथ हे सोना है तोह तुम्हारे समय से हे सोऊंगी. पहले नहीं.", रेणुका पीछे बैठी उसकी पीठ पर सर टिकाये बैठी थी. पेड़ सड़क दोनों तरफ कतार में लगे जैसे उनसे विपरीत दिशा में भागते जा रहे थे. रेणुका को इस पल में सबकुछ अलग और खुशनुमा एहसास दे रहा था.

"हो सकता है किसी दिन मैं सोने औ भी न, तोह क्या रात जाग कर निकलोगी? मेरी नींद जल्दी पूरी हो जाती है और मैं इधर उधर आराम कर लेता हु. तुम्हे अब अपने साथ उसकी सेहत का भी ड़याँ रखना है."

"जिस दिन नहीं आना होगा तोह पहले बता देना, मैं कोशिश करुँगी कैसे भी सोने की. मधु दीदी हैं न. और इसका ख़याल मैं हमेशा रखती हु बस कई बार तुम्हारी कमी महसूस होने लगती है अकेले में."

"ठीक है फिर मैं कोशिश करूँगा तुम्हारे साथ हर रात रह सकू. कल से घर पे कोई बड़ा नहीं होगा तोह बस मुझे ध्यान रखना पड़ेगा थोड़ा उधर भी.", अर्जुन की बात समझते हुए रेणुका ने भी सहमति जताई. दोनों बातें करते हुए 30 मिनट में इस बड़ी गौशाला के द्वार पर आ खड़े हुए थे. रास्ता उतना लम्बा न था लेकिन अर्जुन ने कही भी 40 से ऊपर गति नहीं की थी.

"बहोत बड़ी है ये तोह. पिछली बार ऐसा बोर्ड नहीं लगा था यहाँ तभी नजर नहीं पड़ी और शायद ये काम भी अभी पूरा हुआ है.", एक तरफ का बड़ा दरवाजा खुला था जिस से वह मोटरसाइकिल लिए हे अंदर आ गया. जमीन की सतह मिटटी की थी लेकिन सख्त. दूर तक वह सपाट हे थी जहा दोनों तरफ कुछ कमरे और तीन की चादर के शेड बने थे.

"आ गया मेरा बीटा? कैसी हो रेणुका?", सरोज जी तंग कमीज और सलवार जो पाँव की तरफ से ढीली थी, पहने हुए उनकी तरफ मुस्कुराती हुई चली आ रही थी. दुपट्टे से मुँह साफ़ करती फिर अर्जुन और रेणुका से गले लग के मिली और एक लम्बे शेड के नीच बिछी चारपाई पर बैठाया दोनों को.

"मौसी आप तोह हमारे से पहले हे आई हुई हो. कब निकली थी आप अपने शहर से?"

"बीटा ये साथ वाले खेत अपने हे तोह है और मेरी बहिन का घर भी साथ वाले गांव में हे है. कल हे मैं गांव आ गई थी और तुम्हारे आने से कुछ वक़्त पहले हे तेरे मौसा निकले है कुछ काम था उन्हें. रेणुका बिटिया पानी दू या chai-lassi लोगी?"

"कुछ भी नहीं भाभी. घर से आ रहे है और अभी तोह आये है. पहले मैं जरा सब देख तोह लू."

"हाँ मौसी. बुआ को आप पहले पूरी गौशाला घुमा दो, रस्ते से कहती आ रही है के gaaye-bachde सब देखने है. और इनके हाथ से उन्हें हरा चारा भी खिलवा दो. मैं भी जरा वह काम पर नजर मार लेता हु नहीं तोह थानेदारनी जी को क्या जवाब दूंगा.", अर्जुन की ऐसी बात सुनकर सरोज जी हंसती हुई उठी और रेणुका को अपने साथ लिए आगे की तरफ चल दी जहा पशुओ को रखा जाता था. अर्जुन आराम से बैठ उन्हें जाते देख रहा था. दोनों आपस में ाचे से बात कर रही थी, वैसे भी 2 औरते तोह अलग दुनिया बना हे लेती है वह जहा भी मिल जाये.

'यहाँ से मौसा गए है काम से. पापा और संजीव भैया भी बहोत आते है इधर. मतलब कुछ तोह जरूर है यहाँ.', अर्जुन कुर्ते का ऊपर वाला बटन खोलता इस तरफ कतार से बने तीन कमरों की तरफ चल दिए. पहले कमरे में Khal-binole की बोरियां राखी थी जो बहार से हे पता चल गया था. अगला कमरे के बहार सिर्फ कुण्डी लगी थी जिक्सो खोलते हे अर्जुन अंदर आ गया. एक तरफ बहोत साडी दवाइयों के dabbe-bottle, स्प्रे और बीज रखे थे. बड़ी खुली अलमारी में ऐसा कुछ हे था. चौकोर बड़ी घडी इस सामने वाली दिवार पर लगी थी जिसमे 4 बज रहे थे, मतलब वह रुकी हुई थी. एक कोने में ाचे से तेह किये हुए प्लास्टिक के तरपाल, दरिया पड़ी थी और जरुरत के बर्तन. कुछ ख़ास न दिखा तोह वह यहाँ से भी बहार निकल आया.

'ये आखिरी कमरा है अब और अगर यहाँ भी कुछ न मिला तोह मतलब खली हाथ और फिर से अँधेरे में.', खुद से इतना कहता वह आखिरी कमरे में आ गया जिसका दरवाजा भी पिछले की तरह हे बंद था. अंदर तीन तरफ खुली अल्मारिया बानी थी, वैसी हे फत्ते वाली और यहाँ ढेर सारा सामान था जिसको अर्जुन बड़े ध्यान से देख रहा था. इधर कई जगह हलकी धुल जमी थी जिसका मतलब था यहाँ बहोत काम कोई आता जाता है. एक स्टील के डब्बे में ऑपरेशन का सामान रखा था जो बिलकुल साफ़ था जैसे नया हो. वापिस सफाई से उसको बंद करता वह आगे बढ़ा जिधर ये रजिस्टर रखा था जो साफ़ था बहार से, मतलब वह इस्तेमाल होता है.

'ये क्या लिखा है? पैसे का len-den, फसल की आमदनी, तनख्वाह.. किसी काम का नहीं ये.', दिल फिर से परेशान हो गया था ये देख कर की यहाँ कुछ भी नहीं मिला था. अब वापिस जाना हे बेहतर था यहाँ से. दरवाजा बंद करते हुए साथ वाले कमरे की खिड़की देख रहा था जहा लोहे की गोल सलाखे बहार थी और अंदर लकड़ी के पल्ले. फिर एकदम से ध्यान अंदर दिवार पर तंगी घडी पर गया. वह 4 बजा रही थी लेकिन उसके नीचे लटकता पेंडुलम हिल रहा था. अर्जुन जल्दी से अंदर आ कर घडी को गौर से देखने लगा.

उसमे कांटे और शीशा हे नहीं था. ये एक लम्बी चाबी थी जो अंदर की जगह काट कर राखी गई थी.

'चाबी ऐसे राखी है तोह टाला आसानी से नहीं मिलने वाला अर्जुन. अब यहाँ बाद में हे आना ठीक रहेगा.', मुस्कुराता हुआ वह वैसे हे बहार निकल चला. कुछ तोह हाथ लगा था जिसको छुए बिना हे वह काम देखने मजदूरों की तरफ चल दिए.

"अर्जुन बीटा, आजा रेणुका भी खाने के लिए बैठी है.", अर्जुन काम देखता हुआ जानकारी भी ले रहा था और जगह को ाचे से समझ भी रहा था. आगे चलते हुए वह पशुओ के बाड़े की तरफ आ खड़ा हुआ था. 50 से ज्यादा गाये इधर एक तरफ बड़े साफ़ हिस्से में थी, सब चारा खाती हुई मुँह हिला रही थी. कही छोटे बछड़े भी थे और आगे के बाड़े में 7-8 bail-saand खूंटे से बंधे था. यहाँ भी एक तरफ के बड़े हिस्से में हरा चारा उगा था. एक घंटे से ऊपर हुआ तोह सरोज मौसी की पीछे से आती आवाज सुनकर वह उनकी तरफ हो लिए.

"चलो मौसी. भूख तोह मुझे भी लगी है. वैसे यहाँ पर कुत्ते भी पाले हुए है.", अर्जुन का इशारा एक तरफ बने बड़ी जाली वाले कमरे की तरफ था जहा 2 झबरैले और बड़े कुत्ते इस वक़्त आराम से बैठे थे.

"हाँ मुन्ना. वह तेरे पापा और मौसा ने रखे है. समझदार भी है और रात को इन्हे खोल देने से किसी के घुसने का डर भी नहीं रहता. वैसे तोह दिन में भी खोल कर हे रखते है लेकिन तू आया है और फिर तेरे मौसा भी इधर नहीं है इसलिए बंद कर दिए."

"ाची बात है मौसी. वैसे आप अब उस दिन से ाची लग रही हो. मौसा जी लगता है मंजू के जाने के बाद आपको टाइम देने लगे है.", अर्जुन इधर चला आया जहा वह चारपाई बिछी थी, अब साथ हे थोड़ी दुरी पर लोहे की जाली वाला कूलर चल रहा था, मखियो को दूर रखने के लिए.

"धत्त. बदमाश कही का. कुछ भी बोलता रहता है. तेरे मौसा जाने कोनसे अफसर लगे है जो पाँव टिकते नहीं कही. टाइम देना तोह दूर वह मुझे यहाँ भी अकेले आने का कह रहे थे."

"उन्हें यहाँ नहीं आना था क्या?"

"अरे उन्हें तोह इतनी जल्दी थी यहाँ आने की जो मुझे हे ताने देने लगे थे. लेकिन इधर आने के बाद कुत्तो को बंद करके चले गए. जाने कोनसी जमीन के कागज़ लिए थे जो आज ऐतवार को भी पटवारी से मिलने जाना पड़ा.", उनकी साफ़ बात सुनकर अर्जुन थोड़ा खामोश हो गया. रेणुका भी उनका इन्तजार करती हुई आँगन की चाय में बैठे पक्षिओ को दाने दाल रही थी.

"मैडम जी, आ जाओ अब आप भी खा लो. काम से काम उसका ख्याल करो जिसको भूख लगी होगी.", अर्जुन फिर से गलती कर गया था और हमेशा की तरह एहसास बाद में हुआ.

"किसको भूख लगी होगी?", सरोज मौसी की बात सुनकर पास आती रेणुका के चेहरे पर भरपूर शर्म चा गई थी. अर्जुन भी झेंपता हुआ चारपाई पर चौकड़ी लगा के बैठ गया था.

"मैं मेरी बात कर रहा था मौसी. बुआ भी हाथो से खिलाती है न आपकी तरह."

"अरे मेरा कन्हैया. तेरे लिए हे आज मौसा के ताने सुने है. ये चूरमा और लस्सी तेरे लिए, ननद रानी के लिए पुलाव, रायता और सलाद.", सरोज मौसी सच में एक भोली और सरल सी महिला थी. तीनो हे आराम से खाने लगे और बीच बीच में मौसी खुद अर्जुन को खिलने लगती.

"वैसे मौसी, एक बात बताओ. बुरा नहीं maan-na."

"तेरी बात बुरी कैसे लग सकती है रे. कुछ भी पूछ."

"ये मंजू की शादी ऐसे घर में क्यों की जहा आपके दामाद का घर आना हे नहीं होता? ऊपर से घर में लोग भी वह 2 हे है.", बात बड़ी समझदारी से कही और मौसी भी फीकी हंसी हँसते हुए जवाब देने लगी. रेणुका ने इधर अर्जुन के गिलास में और लस्सी दाल दी थी.

"तेरे मौसा कब क्या करते है मुझे क्या पता. हाँ शादी के लिए मैं भी जल्दी कर रही थी क्योंकि एक साल और निकल जाता तोह ये लड़की देश से हे बहार चली जाती. पाकि बात थी. फिर 2-3 रिश्ते देखे जो पसंद नहीं आये क्योंकि मंजू के लिए इतना तोह सोचना हे था के लड़का उसके बराबर का हो. फिर इन्होने बताया के ऐसा परिवार है, मंजू को rok-tok भी नहीं होगी और मंजू ने अपनी शर्त रख दी जो उन्होंने भी मान ली. कर दी शादी. लेकिन तेरी बात से मैं भी इत्तेफ़ाक़ रखती हु. परिवार जरूर होना चाहिए थोड़ा."

"मैं शादी में तोह नहीं आया था इसलिए पूछ रहा हु. कितना बड़ा परिवार है मंजू के पति का?"

"माँ है, लड़के का बड़ा भाई और भाभी है, मेनका से तोह तुम मिल हे लिए हो. यही परिवार है उनका. कोई और रिश्तेदारी है नहीं. मेनका विधवा हो गई थी मंजू की शादी से कुछ दिन पहले तोह सादे तरीके से कर दिए ब्याह. तेरी माँ और मेरे जीजा न आते तोह मेरा दिल हे नहीं था ब्याह करने का ऐसे. अकेली तोह लड़की है मेरी.", सरोज मौसी थोड़ी चिंतित हो गई थी. फिर अर्जुन ने अपने हाथ से उन्हें चावल खिलते हुए मुस्कुरा कर देखा तोह वह भी ठीक हो गई.

"और आप ाचे से खाना खा लो नहीं तोह दादी को मैंने बता देना है.", अर्जुन ने रेणुका बुआ को कहा तोह वह मासूम सा चेहरा बनती देखने लगी.

"ाचा आप ये दही ख़तम करो. फिर और मत खाना.", अर्जुन ने साफ़ दही से एक कटोरी भर कर सामने रख दी और बाकी प्लेट एक तरफ.

"वैसे सही बात है इसकी रेणुका. खाना ाचे से खाया करो. जिस्म थोड़ा भरा होना भी ाचा लगता है. चेहरा सुन्दर है, लम्बाई भी. लेकिन वजन मेरे हिसाब से 8-10 किलो काम है तुम्हारा.", अर्जुन तोह नहीं समझा था लेकिन रेणुका समझ गई थी की वह उनके माधयम सीने और लड़कीओ से कूल्हों की वजह से हे ऐसा कह रही है.

"जी अब बढ़ जायेगा भाभी जी और मैं खाना भी सही ले रही हु. ाचा मैं थोड़ा टहल रही हु आप दोनों बातें कीजिये.", रेणुका कटोरी रखती कड़ी हो गई. सरोज मौसी अपनी अनुभवी आँखों से पूरा शरीर देख कर फिर अर्जुन से बातें करने लगी.

"मुझे तोह लगा था के तू अकेला आएगा और फिर घर भी चलेगा मेरे साथ."

"वह मौसी सोचा तोह मैंने भी ऐसा हे था. लेकिन घर में चची आई है और कल सुबह उन्होंने अमेरिका जाना है इलाज के लिए. और पापा, भैया, चाचा भी आज घर है. लेकिन कल स्कूल की छुट्टी है मेरी तोह मैं इधर आ जाऊंगा. गौशाला भी देख लूंगा और आपका ये गाँव वाला घर भी.", अर्जुन की बात सुनकर अब उन्हें थोड़ी तस्सली हुई थी.

"सुबह आएगा तोह फिर शाम में हे जाने दूंगी. पहले कह देती हु. हमारे खेत भी देखिओ, घर भी और गांव भी. घर के अगर कुछ कहते हो तोह फिर शाम में मैं तेरे साथ हे चल पड़ूँगी वही. परसो माजी के साथ मंदिर जाना हे है तोह साथ हे आ जाउंगी."

"हाँ पक्का. कल मैं सही समय से आ जाऊंगा. और मौसा जी कब तक आएंगे?", अर्जुन की ऐसी बात सुनकर उनके चेहरे पर एक रहस्यमई मुस्कान तेरी गई. उन्हें जैसे लगा था के अर्जुन भी कुछ चाहता है उनसे.

"एक बार तोह शाम को आ जायेंगे तेरे मौसा लेकिन फिर कल 5 बजे निकल जायेंगे #### शहर, 2 दिन के लिए.", वह अपनी जगह से उठ कर फर्श से बर्तन उठाने लगी और अर्जुन की नजर उन बड़े खरबूजों पर जा रुकी, जो ऐसे झुकने की वजह से एक तिहाई बहार निकल आये थे. ताम्बे रंग के चिकने और बड़े गुब्बारे, शायद ताई जी से भी कही बड़े और सख्त. हलकी हलकी नस्से बता रही थी की उनका अकार और फुलावट ऐसे तोह समझ से हे परे थी. सरोज मौसी भी जमीन से चावल के दाने चुगती हुई ये नजारा देर तक उसको करवाती रही.

"देख ले बीटा.. उम्र हो गई है अब मेरी और तेरे मौसा तोह कोई मदद नहीं करते.", उनके ऐसे ृक्क कर कहने के पीछे जो भाव तोह उसका अंदेशा तोह अर्जुन को हो गया था और वह थोड़ा शर्माने का नाटक करता उठ कर उनसे बर्तन लेने लगा.

"लाओ मैं रख आता हु मौसी. आप बैठो मुझे पता है ये कहा रखने है.", इधर तोह मौसी उसके हाथो की उंगलिओ में हे अलग एहसास ले गई थी. बड़े धीरे से बर्तन छोड़ती वह फिर से चारपाई पर बैठ गई. रेणुका भी अंदर से अब यही आ गई थी. कुछ देर बातें हुई तोह अर्जुन ने घडी में समय देखा. 10 बजने वाले थे. उन्हें घर से निकले 3 घंटे हो चुके थे.

"चलता हु मौसी, कल मिलते है.", मिलने वाली बात अर्जुन ने उनके पाँव छूने के बाद खड़े होने पर उनके गले लग कर धीमी आवाज में कही. अर्जुन का ऐसे खुलकर कहना सरोज मौसी के चेहरे पर भी एक लाली दे गया था.

"ठीक है भाभी. वैसे आप भी चलती तोह बेहतर होता.", रेणुका बुआ ने गले लगते हुए कहा.

"सेहत पे ध्यान दे थोड़ा. और ऐसी अनूठे वाली चमड़े की चप्पल पहन न बंद कर दे रेणुका, जोर पड़ता है. बाद में सूजन होने लगेगी.", रेणुका ने शरमाते हुए हाँ में सर हिला दिए. मतलब साफ़ था के अर्जुन की बात और रेणुका के शरीर को ध्यान से देखने के बाद वह समझ गई थी की रेणुका किस हाल में है. दोनों बुलेट पर बैठ कर सावधानी से निकल लिए.

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साढ़े 10 बजे तक संजीव घर वापिस आ चूका था अपने चाचा का जरुरी काम करने के बाद और बाकी तीनो हे लोग मार्किट चले गए थे. यहाँ 2-3 जगह सामान की लिस्ट पकड़ने के बाद अब शंकर जी ने ये बड़ी गाडी (सफारी) पार्क के बहार लगे वृक्ष की चाय में कड़ी की और अपने लाड़ली बहिन और भाई के साथ अब मार्किट में टहलने लगे.

"बेबे, तू ये तोह बता के तुझे लेना क्या है? शायद हम फालतू घूमने से बच जाये.", नरिंदर की ऐसी बात सुनकर मधु ने अपने भाई को हलके गुस्से से देखा और शंकर ने भी होंठो पर ऊँगली रख के नरिंदर को चुप रहने को कहा. दोनों हे मुस्कुरा रहे थे.

"एक तोह इतने साल बाद आई हु मैं यहाँ मार्किट में और ऊपर से 5 मिनट में हे तुम्हारी चोंच शुरू हो गई. शंकर इसको केहदो के मैं जो भी लुंगी आराम से देख परख कर.

"Ha-ha.. जो भी लेना है ले ले गुड्डू. उसकी बात पर ध्यान मत दे वह शुरू से हे तेरे साथ मस्ती करता है तोह ये नयी बात तोह है नहीं. वैसे जब घर पे इसने पुछा था तुझसे मार्किट चलने के लिए तोह देख के लगा था के तुझे पता है के क्या लेने वाली है.", शंकर की ऐसी बात सुन्न कर मधु ये गली के बहार लगा ## & संस का बोर्ड देखती हुई इधर गली में हे चल दी. रविवार था और सुबह का ठीक समय, न ज्यादा भीड़ और ऊपर से हर दूकान खुली थी.

"बुलवा ली शामत. तू चल इसके साथ और मैं आया 5 मिनट में.", शंकर जी को सिग्रेटी पीना ज्यादा बेहतर लगा था कपड़ो की दूकान पर जाने से. मधु भी अपने शरारती भाई का हाथ पकडे इस दूकान पर आ कड़ी हुई

"Silk-cotton मिक्स है क्या salwar-kameej में?", इस नौजवान से लड़के को पहले काउंटर पर खली बैठे देख मधु बुआ ने अंदर आते हे पूछा. एक बार उसने मधु बुआ को देखा और फिर उनके साथ आये नरिंदर जी को. खुद को संभालता वह सर हिलता हुआ काउंटर से बहार निकल आया.

"जी मैडम ये इधर लेटेस्ट डिज़ाइन है. वह क्या है न अब फैशन तोह 20 साल बाद घूम के वापिस आ जाता है लेकिन जो बात सबसे ख़ास बनती है किसी परिधान को वह उसका धागा होता है. आपने सबसे बढ़िया मिक्स पूछा है और काफी काम लोगो को पता है इसके बारे में. ये सभी कमीज हाथ से बुने है और ये अंगोरी रेशम और बेहतरीन कपास के धागो का बेजोड़ मिश्रण है." ये लड़का सुधीर हे था जो अर्जुन का ाचा दोस्त और दूकान पर सबसे समझदार व्यक्ति था. मधु बुआ को भी उसने जो कपडे दिखाए थे वह सभी उन्हें बेहद पसंद आ गए थे पहली नजर में देखने भर से.

"ये सभी बहुत सुन्दर है. और कितने है ऐसे? सूती हिस्से का रंग तोह नहीं जायेगा?", नरिंदर जी भी देखने के बाद इधर उधर घूमने लगे. अपनी बहिन को सर खपाने के लिए अकेला छोड़ कर.

"जी मैडम, ये काफी सेलेक्टिव और ज्यादातर लोगो की रेंज से बहार है इसलिए शहर में 2 हे जगह आपको मिलेगा. मेरे पास यही 10 पीेछे है और दूसरी जगह तोह उतने भी नहीं होंगे. बाकी आप कपडे को लेकर कोई शंका मत रखिये. बना हुआ सूट भी 100 प्रतिशत पैसे वापसी के साथ ले लिए जायेगा जी.", सुधीर की ऐसी बात सुन्न कर उन्होंने 4-5 सूट एक तरफ रख लिए. नरिंदर जी भी अपने लिए ढीली टीशर्ट और निक्कर देख रहे थे विपरीत दिशा वाले आखिरी काउंटर पर.

"बिटिया तू जरा उन मैडम को कपडे दिखा और सुधीर को बोल उसका दोस्त आया है बहार.", ये सुधीर के पिता जी थे जो दुकान में घुसते हे काउंटर के पास कड़ी लड़की से बोले और वह भी सर हिलती मधु बुआ की तरफ बढ़ गई.

"भैया आपके दोस्त आये है बहार, अंकल जी ने कहा है के मिल लो आप मैडम को मैं अटेंड कर लेती हु.", सुधीर ने शीशे से बहार नजर डाली तोह अर्जुन मोटरसाइकिल पर हे बैठा था.

"मैडम 2 मिनट दीजिये मैं जरा अपने दोस्त से मिल लू. इतने अगर आपको कुछ और सामान देखना है तोह ये आपको दिखा देगी मेरा खास दोस्त बहार खड़ा है.", मधु बुआ ने भी देख लिए था कांच के उस पर लाल मोटरसाइकिल को और वह मुस्कुराती हुई हाँ कहती हुई उस लड़की से अगली फरमाइश करने लगी.

"भाई अंदर हे आ जाता यार. नमस्ते भाभी जी.", सुधीर ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया और फिर एक तरफ कड़ी दुपट्टा सही करती रेणुका बुआ की तरफ हाथ जोड़ दिए.

"आता हु पहले ये बता भाई की नरम सांडले या कुछ वैसा हे आरामदायक चप्पल जैसा कुछ कहा मिलेगा? जरुरी है लेना."

"मतलब कितना नरम भाई?", सुधीर थोड़ा हैरान हुआ ऐसे अर्जुन की सीढ़ी आधी अधूरी सी बात सुन्न कर.

"लड़कीओ के लिए. जो वह ज्यादातर समय पहन सके, तलवा बिलकुल सख्त न हो और स्लिप भी नहीं होना चाहिए. पाँव जामीप्य पर रखे तोह प्रेशर न पड़े कोई."

"ाचा ाचा भाई समझ गया. तू हर बार कुछ अलग हे चीजे सोच कर आता है. देख ये gol-chakkar से उल्टा हाथ लेना और सामने डायमंड फुटवियर है. लेकिन पूरी बात सुन्न. वह पूरी पहली मंजिल गर्ल्स की है और तूने जैसा बताया है तेरा काम एक से नहीं चलने वाला. बाथरूम के लिए अलग मिलेंगे, बैडरूम और साफ़ जगह के लिए अलग और चलना फिरना हुआ तोह अलग. अंजू दीदी को बोलना के सुधीर ने भेजा है और मैं अभी फ़ोन भी कर देता हु.", अर्जुन ने फिर से हाथ मिलाया और बुआ को बैठने का इशारा दिए.

"आता हु भाई अभी कुछ सामान और भी लेना है. फिर थैंक यू कहूंगा.", अर्जुन ने वह saleti-neele धुप के चश्मे को चेहरे पर लगाया और मोटरसाइकिल वापिस मदद ली. सुधीर भी मुस्कुरा कर देख रहा था के उसका दोस्त अब बदलने लग रहा है. वह भी अंदर आने पर एक फ़ोन करने के बाद वापिस मधु बुआ की तरफ चल दिए.

"जी मैडम, कुछ और पसंद आया आपको?"

"हाँ ये 2 कॉटन सूट लिए है मैंने. ये लड़की बता रही है की स्टिचिंग भी इधर हो जाती है?"

"जी क्यों नहीं. स्टिचिंग के साथ हे कुछ खास काम कपडे पर करवाना हो तोह हमारी मास्टरनी जी वह भी कर देंगी. लेकिन 4 दिन का समय लेकर चलते है जी हम तैयार करने के लिए.", सुधीर ने जानकारी देना बेहतर समझा.

"अगर ऐसा है तोह फिर मैं कर भी क्या सकती हु. जितना जल्दी हो सके करवा दीजियेगा, अपने मायके में पहन कर देख भी लुंगी. नहीं तोह अपने शहर से इधर आना तोह फिर मुश्किल हे है. वैसे मेरे भतीजे को कैसे जानते हो तुम?", उनकी बात सुनता हुआ वह बाकि कपडे प्लास्टिक में सही से रख रहा था. और आखिरी लाइन सुन्न कर नजरे ऊपर उठा ली.

"समझा नहीं जी."

"अर्जुन. अर्जुन को कैसे जानते हो तुम? मेरा भतीजा है वह."

"ओह. तोह इसका मतलब ये उनके पापा है, शकल थोड़ी मिल रही थी.", सुधीर नरिंदर जी की तरफ देखते हुए कहने लगा. जो अपने पसंद किये कपडे ले कर उधर हे आ रहे थे.

"नहीं, उसके पापा उधर है.", शंकर जी अंदर आने के बाद पहले काउंटर पर खड़े हे हंस हंस कर बातें कर रहे थे और सुधीर के पिता जी भी मुस्कुराते हुए उनका एक हाथ दोनों हाथो में पकडे थे. सुधीर ज्यादा हे हैरान हो गया था.

"आप माप दे दीजिये. ये कॉटन वाले कल मिल जायेंगे जी आपको और वह बाकी 4 परसो तक मैं करवा दूंगा.", सुधीर ज्यादा कुछ कहे काउंटर वाली लड़की को मधु बुआ के साथ जाने का कहकर एक तरफ खड़ा हो गया. नरिंदर जी भी काउंटर पे आ चुके थे और सुधीर के पिता और शंकर के साथ बातों में शामिल हो गए थे. सुधीर बाकी कपडे खुद हे सही से रखता दूकान का जायजा लेने लगा. थोड़ी देर में हे मधु बुआ भी उस लड़की के साथ माप देकर अब महिलाओ के खास हिस्से की तरफ चल दी.

"तोह बताओ लालजी क्या सेवा करे इस सामान के लिए.?", शंकर जी ने इतना कहा तोह सुधीर और उस लड़की ने 2 पर्चियां अपने पिता की तरफ बढ़ा दी जिसको उन्होंने निचे कचरे के छोटे डब्बे में बिना देखे फेंक दिए.

"शंकर भाई अब ऐसी बात करेंगे क्या? आपकी अपनी हे दूकान है. मुझे तोह ये देख कर ाचा लगा के इतने समय बाद मुलाकात हुई है और नरिंदर के साथ साथ गुड़िया ने भी दूकान पर कदम रखे. शर्मिंदा मत करो भाई.", सुधीर जहा अपने बाप को देख के हैरान था वही शंकर जी को भी जो अपनी जेब से एक 500 की गद्दी उसके पिता के हाथ में रख चुके थे.

"देख यार. दोस्ती और प्यार अपनी जगह है, काम अपनी जगह. पैसे तोह मैंने भी लिए है तोह तुझे भी लेने होंगे.", अब जैसे सुधीर के पिता बड़ी दुविधा में थे. कहा तोह उसका बाप एक रूपया नहीं छोड़ रहा था और यहाँ 35000 का माल फ्री में देने लगा था. और इधर अर्जुन बिना देखे दरवाजा खोलते हुए रेणुका के लिए एक तरफ हो गया, जैसे वह दरबान हो और अंदर आते हे रेणुका के कदम भी ठिठक गए.

"क्या बात है? तुम दोनों भी इधर हे आ गए.", शंकर जी ने बिना हैरान हुए मुस्कुरा कर कहा तोह अर्जुन ने भी चेहरे पर कोई भाव दिए बिना उनके अंदाज में हे जवाब दिए.

"वह बुआ को कुछ आरामदायक कपडे लेने थे और ये मेरे दोस्त की हे दूकान है. दीदी के साथ मैं पहले आया हु कई बार."

"हम्म्म. तेरे उस दोस्त का बाप यहाँ का मालिक है और तेरे बाप का 20 साल पुराण मित्र है. ले लो रेणुका जो भी लेना है. मधु जरा तुम भी मदद कर देना.", अर्जुन ख़ामोशी से सोफे पर पसर गया और कुछ चेहरों पर मुस्कान आ चुकी थी.

"इसको तोह मैं पहचान गया था भाई पहली बार में हे लेकिन जवाब बचो को उनका परिचय करना भी ठीक नहीं है. वैसे यार इतनी बातें हुई लेकिन जूस ठंडा कुछ नहीं पुछा. छोटू सबके लिए ठंडा ले आ. आओ भाई थोड़ी देर हम भी बैठ हे जाते है.", काउंटर से बहार निकल कर वह भी शंकर और नरिंदर जी के साथ बड़े सोफे और मेज के पास आ गए.

"तुमने कुछ लेना है.?", कांच के मेज पर रखा अर्जुन का वह neeli-saleti फिल्म वाला 'Ray-ban' चस्मा उठा कर ध्यान से देखते हुए शंकर जी ने अपने बेटे से पुछा. फिर अपनी ऊपर वाली जेब से वैसा हे चस्मा निकल कर दोनों की तुलना करने लगे. शंकर जी का चस्मा भी वैसा हे था लेकिन सुनहरी डंडी और गहरे भूरे शीशे वाला.

"नहीं पापा. पहले हे बहोत कपडे है मेरे पास. और 6 दिन स्कूल ड्रेस, ट्रैक pant-tshirt में निकल जाते है तोह और लेने का फायदा हे क्या जब पहन हे न सकू.", वह भी गौर से देख रहा था अपने पिता को. छोटू ठन्डे की बोतल खोल कर सबको दे रहा था. सुधीर ने अर्जुन के लिए उसको मन करते हुए 3 जूस लाने को कह दिए. रेणुका बुआ और मधु बुआ के लिए भी.

"हम्म. तेरे वाला ये चस्मा तोह कुछ खास है यार. दोनों एक जैसे है लेकिन तेरे वाला थोड़ा मजबूत और ये फिल्म लगी है इस पर."

"हां वह मिरर का काम करता है इसलिए. आप रख लीजिये ये, काम का है. मेरे पास एक और है.", अर्जुन की बात में जो मिरर शब्द था वह शंकर के साथ हे नरिंदर जी भी समझ गए थे. शंकर जी ने मुस्कुरा कर अर्जुन वाला चस्मा ऊपर उठाया तोह पीछे दूकान का प्रवेश द्वार बिलकुल साफ़ नजर आ रहा था.

"चल तू कहता है तोह मैं ये रख लेता हु लेकिन तू घर तक मेरे वाला पहन सकता है.", उन्होंने अपना पसंदीदा चस्मा उसकी तरफ बढ़ाया तोह अर्जुन के चेहरे पर चमक के साथ हे थोड़ी हैरानी भी थी.

"पक्का?"

"हाँ भाई. पक्का लेकिन घर तक.", शंकर जी ने भी मुस्कुराते हुए सर हिलाया. फिर ये बड़े आपस में बात करने लगे और अर्जुन धीमी आवाज में सुधीर से. कुछ हे देर में रेणुका बुआ भी उधर हे आ गई थी. मधु बुआ ने भी उनके साथ हे अपने लिए 4-5 निघ्त्य खरीद ली थी.

"वाह ये मदद करने भेजी थी तुमने शंकर. देखो जरा जिसने खरीदने थे उसके हाथ में एक पैकेट और इन मोहतरमा के 2.", नरिंदर की बात पर बाकी सब हंसने लगे लेकिन मधु बुआ मुँह चिढ़ाने लगी.

"रेणुका ने कहा के मेरे पर ाचे लगेंगे तोह दिल रखने के लिए ले लिए. चलो भाई अब घर चलते है बहोत देर हो गई है.", मधु की बात सुनकर शंकर जी उतने लगे थे की अर्जुन ने टेबल से 2 गिलास उठा कर दोनों के सामने कर दिए. मधु बुआ ने तोह बिना कुछ कहे गिलास लिए और पीने लगी. रेणुका को सिर्फ आँखे दिखानी पड़ी अर्जुन को, सबसे नजर बचते हुए और उन्होंने भी आधा गिलास पीने के बाद वापिस पकड़ा दिए.

"बुआ आपने गाडी में जाना है तोह आप भी साथ चली जाओ.", अर्जुन ने कुछ सोच कर कहा. उसके हाथो में हे सब सामान था. लेकिन इस बात पर रेणुका ने जैसे अर्जुन को घूरा वह चुपचाप बहार आ गया.

"ला बीटा सामान इधर दे. जो जिसके साथ आया है वह उसके हे साथ जायेगा.", मधु बुआ की ऐसी बात सुनकर रेणुका मुस्कुराती हुई अर्जुन के पीछे बैठ गई. अंदर शंकर जी ने जैसे तैसे करके पैसे दिए और वह भी बहार आ गए अपने भाई के साथ.

"ये उल्लू का पट्ठा निकल भी गया.", अर्जुन को धीमी रफ्ता से जाते देख शंकर जी ने मधु से पुछा.

"हां तोह जायेगा हे. तुमने तोह अभी पहले वाली तीनो दुकानों से सामान लादना है गाडी में. रेणुका की सोचकर मैंने हे भेज दिए उसको.", तन्नो हे गाडी की तरफ चल दिए. अब सारा सामान नरिंदर के हाथो में था जो शकल बनाये अपनी छोटी बहिन के नखरे के साथ उन्हें उठाये चल रहा था.

"दिमाग देखा तूने उसका?"

"हाँ, इतनी छोटी छोटी चीजों में भी ध्यान देता है. मैंने उसको चस्मा लगाए आज हे देखा था लेकिन वह 1-2 बार हाथ में पकडे दिखा तोह मुझे भी दिलचस्पी हुई की चस्मा सही में आकर्षक है लेकिन उसने तोह सामने से खुद हे बता दिए के इसका काम क्या है.", शंकर और नरिंदर ने गाडी में सामान रख लिए था, जो भी लिस्ट के हिसाब से लिए था.

"समझदार है. और एक तरह से उसने इशारा कर दिए अनजाने में हे की संभल कर रहना चाहिए."

"हाँ यार. कल तेरे साथ दिन बिताने के बाद मुझे एहसास हो रहा है के चूक तोह मुझे भी choti-moti हुई होंगी. पहले हम 2 थे तोह सब जगह नजर रहती थी. यहाँ मैं बेशक कही बड़े नेटवर्क के साथ हु लेकिन वह एक तरह से बस बताये निर्देश पर हे इनफार्मेशन निकलते है. हम साथ जुड़े है तोह हर छोटी बात पर 4 आँखे और 2 दिमाग काम करते है."

"आई बात समझ में महादेव? इसलिए मैं कहता था के हम दोनों को साथ रहना चाहिए था. लेकिन तुम्हे तोह मेरे में बस एक छुपा हुआ जानवर दीखता है. चलो अब बाकी बातें आराम से अमेरिका में करेंगे.", नरिंदर की बात पर हँसते हुए शंकर ने अपने भाई के बाल खराब किये और चाबी बढ़ा दी.

"तू गाडी में बैठ मैं जरा आया.", शंकर की बात सुन्न कर नरिंदर ड्राइवर सीट पर बैठ गया, दरवाजा खोलते हुए और शंकर साढ़े कदमो से गाडी से 30-40 कदम दूर इस 24-25 साल के लड़के की गर्दन थामे खड़ा था.

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क्रमश
 
अपडेट -92

गड़े मुर्दे -3 (बी)


जारी....

"हाँ तोह पिछले 3 घंटे से मेरी नजर तुझपे हे है. चल चुपचाप इधर चल.", ये साधारण kad-kaathi का लड़का अपनी गर्दन पर ऐसी मजबूत पकड़ देख जैसे शंकर ने कहा था वैसे हे इस सुनसान इमारत में आगे बढ़ लिए. इधर मार्किट ख़तम हे हो जाती थी और पुराणी इमारते या खंडहर से कुछ वैसे हे घर थे. दोनों हे जब इस अँधेरे से toote-foote कमरे में आ खड़े हुए तोह शंकर ने सार्ड लहजे में उसको घूर के देखा.

"वह.. वह मेरी कोई गलती नहीं है जी. मुझे तोह बस काम मिला था और पैसे. आपकी फोटो देते हुए मुझे बस आपका पीछा करने और जिस से भी मिलते हो उनकी तस्वीर लेने के लिए कहा था."

"फोटो कहा है? और काम किसने दिए था? पूरी बात बता देगा तोह आज़ाद कर दूंगा.", उस युवक की हालत बाज के कब्जे में कबूतर सी थी. आँखों के खौफ से हे पेशानी पर पानी की बुँदे उभर आई.

"ये रहा कैमरा. रील इसमें हे है जी. कल फ़ोन आया था और आज सुबह आपके एड्रेस के साथ फोटो और पैसे दे कर एक तगड़ी सी लड़की कोई 30 के aas-pas और उतनी हे उम्र का पहलवान सा लड़का मेरे घर आये थे. फ़ोन जिसने किआ था वह भी औरत हे थी लेकिन शायद थोड़ी बड़ी उम्र की और देसी लहजे वाली. नाम किसी का नहीं पता मैं सच कह रहा हु जी. मेरा धंदा बस पैसे के बदले जानकारी इकट्ठा करके देने का है. इस से ज्यादा मुझे नहीं पता किसी के बारे में और आपके घर से हे मैं पीछा कर रहा था."

"पूरी बात इतनी हे थी.?"

"जी वह लड़की उस लड़के को इतना हे बोली थी की 'चल बिज्जू अब बुढ़िया की खबर लेते है, तस्वीर इस से मां ले जायेगा.'"

"कड़ाक" की इस आवाज पर शंकर ने हैरत से देख तोह वह लड़का टूटी दाल सा जमीन पर और उसका भाई कैमरा उठाने के साथ हे हाथ पकड़ कर बहार चल दिए.

"तुम पागल हो? वह क्या किआ तुमने?", शंकर अपने छोटे भाई को ध्यान से देख रहा था जिसके चेहरे पर अलग मुस्कान थी.

"समय खराब कर रहे हो भाई. हमारा घर कोई कैंट नहीं है जो कोई भी परिवार के लोगो की जानकारी न हांसिल कर सके. बस इधर कोई आ नहीं सकता क्योंकि यहाँ पुराने लोग रहते है जो एक दूसरे को जानते है. ये लड़का बहार से आया था जो की इसका लहजा और बात करने के तरीके से मालूम चल हे रहा था. वह लाइन उसको ऐसे हे कहने के लिए कहा गया था जिस से हमारा ध्यान सुशीला, उसके दोनों बचो और मोहर सिंह पर रहे. आटोमेटिक स्लिम कैमरा 40000 के aas-pas का यहाँ के किसी जासूस के पास बहोत मुश्किल बात है. और सबसे बड़ी बात वह तुझे ध्यान से देख रहा था मतलब वह तेरे बारे में ज्यादा नहीं जनता था. इसके पीछे वह है जो हमारे बारे में उतना हे जानता है जितना 20-22 साल पहले मिला कोई दोस्त.", नरिंदर की हर बात सटीक थी.

"हम्म्म. इधर की तरफ का शीशा बंद था और तू अंदर बैठा था, वह कैसे देख लिए तूने.?", गाडी के पास दोनों आ खड़े हुए थे और शंकर वही से उसको वह बंद शीशा दिखा रहा था जिस से पीछे नजर राखी जाती है सड़क पर.

"गाडी में बैठ और देख ले.", दोनों अंदर आये तोह शंकर की नजर उस नीली फिल्म वाले चश्मे पर पड़ी जो डैशबोर्ड के ऊपर रखा था.

"सही बात है. जल्दी हे काम आ गया ये."

"क्या काम आ गया और तुम दोनों के काम नहीं ख़तम हो रहे क्या?", मधु की बात सुनते हे दोनों मुस्कुराने लगे.

"चल बेबे अब घर जा के तू चाय पीला डीओ फिर तैयारी भी करनी है.", इतना कहने के साथ हे वह गाडी चलते हुए इधर से निकल चले.

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"ये मैं हु?", अर्जुन मार्किट से सीधा प्रीती के घर चला आया था रेणुका को लिए. सबसे मिलने के बाद वह रोमिला के कमरे का दरवाजा खुला देख अंदर चला आया जहा रोमिला बोन्साई को साफ़ कर रही थी. वह गुलाब का पौधा भी एक 10 इंची गमले में हलकी रौशनी ले रहा था. बिस्टेर के दूसरी तरफ लगे डेस्क के ऊपर हे चारकोल के टुकड़े, पेंसिल और कुछ चित्र रखे थे. पहले वाला चित्र गाँव की 2 महिलाओ का था जो सर पे पानी का घड़ा लिए जा रही थी. साफ़ और बिलकुल सटीक बना हुआ. रोमिला माहिर थी जैसे. लेकिन अगली बड़ी शीट पर अर्जुन ने जो शरीर देखा वह उसका खुद का था. भूरे रंग की इस शीट पर आकृति को छोड़कर सारा हिस्सा कालापन लिए था जिस वजह से ड्राइंग उभर कर बहार आ रही थी. पीठ के तरफ से बना ये चित्र साफ़ बता रहा था अर्जुन के शरीर का कटाव, एक तरफ का चेहरा और निर्वस्त्र पृष्ट भाग.

"थिस इस रॉंग अर्जुन. तहत इस पर्सनल स्टफ.", वह मुस्कुराती हुई डेस्क के पास आ कड़ी हुई और उस चित्र को हे देखने लगी जो पिछली रात उसने बनाया था.

"एक्साक्ट्ली. ये मैं हु और उस हालत में जो नहीं होनी चाहिए. लेकिन ये बनाया कैसे आपने?"

"ये बस एक बेस स्केच है, ी विल कन्वर्ट आईटी ईंटो समथिंग बिग एंड कलरफुल. होप यू लिखे आईटी.", रोमिला ने एक फोल्डर में वह सभी कागज़ बंद करते हुए कहा. उसके ऐसे झुकने से अर्जुन का ध्यान एक पल के लिए उन गुलाबी बड़े उभारो पर गया जिनकी गहरी खाई बता रही थी की रोमिला हर तरफ से bhari-poori है. लेकिन फिर खुद को संभालता हुआ वह बिना कुछ कहे बहार निकल गया.

"स्ट्रेंज. ी हेट व्हेन पीपल अदमीरे माय आर्ट एंड लीव विथाउट मेकिंग अन्य कॉम्पलिमेंट. बूत यू अरे स्पेशल माय डिअर. मुआह.", रोमिला खुदसे इतना कहती हुई कुछ ज्यादा हे खुश थी. बाकी सामन को भी वह ठीक से अंदर रखने लगी.

"लंच करोगे?", प्रीती ने अर्जुन को ड्राइंग हॉल में पानी पीते देखा तोह पूछ लिए. समय नहीं हुआ था अभी लेकिन वह jaan-na चाहती थी की अर्जुन अभी यही है या जा रहा है.

"नहीं, अभी तोह चची के पास जाना है और फिर बहार कुछ काम से. तुम दीदी के पास गई थी क्या?"

"वही से आ रही हु. विक्य आज अलका दीदी के कब्जे में है. थोड़ा लेसन वह भी लेके हे आएगी. बुआ कहा है?"

"तुम्हारे कमरे में."

"चलो आ जाओ फिर अंदर.", प्रीती उसको अपने साथ हे कमरे में ले आई.

"वाओ. बुआ ये सब किसके लिए है.?", बिस्टेर पर रखे इतने सरे नरम जूते चप्पल देखते हे वह उछाल कर बीएड पर आ बैठी.

"तुम्हे जो भी पसंद हो तुम ले सकती हो.", रेणुका बुआ ने मुस्कुराते हुए जवाब दिए. प्रीती उन सफ़ेद गुलाबी मुलायम से दस्ताने जैसे जूतों को देखने लगी. ये वैसे हे थे जैसे नरम बालो वाले खिलोने.

"वैसे ये इतनी फ्लेक्सिबल सी चप्पल और बेल्लिएस किस ख़ुशी में ली है?"

"वह जो बुआ की ख़ुशी आ रही है न उसकी वजह से ली है. यहाँ तुम ध्यान रखना के इनके पाँव में सख्त चप्पलें न हो. वह तोह मैं pehan-ne दूंगा नहीं इन्हे."

"ओह फिर तोह ये मेरे काम की नहीं है. इनको pehan-ne की इतनी बड़ी वजह है तोह फिर अपने लिए तोह पुराने हे ठीक है.", प्रीती की शैतानी मुस्कान से रेणुका बुआ के गाल लाल हो गए थे.

"कमरे में पहन सकती हो ये वाले. टॉवल क्लॉथ हे है तोह ठीक रहेंगे. चलता हु अब और शाम को मिलता हु.", अर्जुन उन दोनों को वही छोड़ अपने घर आ गया. यहाँ माहौल शांत था जिसकी बड़ी वजह अर्जुन की सभी बहनो का ऊपर कमरे में होना था. सभी इस वक़्त ऊपर वाले ड्राइंग हाल में टेलीविज़न सी चिपकी हुई थी और Alka-Ritu विक्य को अलग लिए अपनी बातों में मगन थी. नीचे संजीव भैया अपने दादाजी के साथ बैठे थे और उन्हें परेशां किये बिना अर्जुन सीधा माँ के कमरे में आ गया.

"ये रख दीजिये. पापा ने दिए था मार्किट में मुझे.", रेखा जी एक बार फिर से नाहा धो कर अब साफ़ साड़ी और ब्लाउज में अपने बाल सही कर रही थी और कृष्णा चची आराम से सोई हुई थी. रेखा ने अपने बेटे के हाथ में ये खास चस्मा देखा तोह मुस्कुरा उठी.

"तोह आज तेरे पापा ने तुझे ये पहन ने के लिए दे हे दिए."

"इसमें खास क्या है माँ? हमेशा से बस मैंने ये पापा को हे पहने देखा है वह भी जब वह घर आते है."

"मुझे भी बस इतना पता है की तेरे पापा का ये बेहद खास है. मैं ज्यादा तोह कभी कुछ पूछ हे नहीं पाई उनसे.", रेखा जी ने वापिस वह अलमारी में अपने ठिकाने रख दिए था.

"चची कब सोई है?"

"बस थोड़ी देर पहले हे सुलाया है मैंने. ये तोह आराम हे नहीं करना चाहती थी इसलिए दवा दी. चल मैं थोड़ी तैयार कर दू फिर तेरे पापा ने भी जाना है chacha-chachi के साथ."

"पापा भी जा रहे है?"

"हाँ लेकिन हफ्ते तक वापिस आ जायेंगे. तू अब थोड़ी देर सोना चाहता है तोह ऊपर चला जा नहीं तोह पढ़ ले.", अर्जुन हामी भरता फिर से निकल चला, बिमला देवी को दोपहर के भोजन का वादा किआ था और अभी भी डेढ़ घंटा पड़ा था उसके पास. कुछ सोचता हुआ वह पहले अपने कमरे में गया और फिर बहार से हे निकल चला बुलेट लिए.

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"शंकर थोड़े समय के लिए सब भूल कर परिवार में रह. जितना ध्यान देगा उतना काम खराब हो सकता है.", नरिंदर और शंकर दोनों हे बैठक में अकेले बैठे थे. कौशल्या जी के साथ हे रेखा और ललिता जी उनका सामान पैक कर रही थी.

"यार मैं कभी भी अपने चेहरे पर परेशानी आने देता हु क्या?"

"ाचा चल अगर तुझे आराम हे चाहिए तोह मैं तेरी आधी समस्या का निवारण कर देता हु."

"कैसे इन्दर? और कौनसी समस्या, ये फोटो?"

"देख शंकर जैसा मैंने पहले कहा के वह लड़का बहार का था, जो लाइन कभी भी एक काम देने वाला इंसान नहीं कह सकता उसने तुझे वह बताई. फिर घर परिवार की फोटो लेने वाली बात जो मोहर सिंह कटाई तेरे यहाँ होने पर नहीं करता. उसको पता है के उसके आदमी तूने गायब कर दिए, सुशीला भी ऐसा नहीं करेगी. उसकी दोनों औलाद वह कैसे भेज सकती है?"

"वही बात तोह मैं इतनी देर से सोच रहा हु."

"इस फोटो पर समय देख जरा.", नरिंदर ने लेंस और रील सामने करते हुए कहा. शंकर ने पहली फोटो देखि तोह वह अर्जुन और रेणुका की थी, जब वह घर से निकले थे. उसके बाद भी उन दोनों की कुछ तस्वीर और बाद में शंकर की गाडी की जो शायद उनके हे सेक्टर की रही होगी.

"मतलब जो भी है वह अर्जुन पर नजर रखते हुए उसके परिवार की जानकारी जूता रहा था.?", शंकर के सवाल में जवाब भी था.

"हम्म. और ये आखिरी तस्वीर उसने मधु की ली थी मतलब इस समय वह गलत जगह पहुंच चूका था जहा उसका काम हो गया. ऐसा कौन हो सकता है जो तुझे नहीं जानता लेकिन अर्जुन के परिवार और उसकी जासूसी करवाए?", नरिंदर के इस बात पर जोर देने पर शंकर का चेहरा गंभीर हो गया.

"लड़की. कोई अमीर लड़की और औरत जिसको या तोह अर्जुन पसंद हो या फिर वह कोई बदला ले रही हो.", नरिंदर के चेहरे की अलग मुस्कान जैसे शंकर की बात से सरोकार रखती हो.

"या फिर ये ध्यान हटाना भी हो सकता है. जैसे हम सोच रहे है. क्योंकि वह सोमबीर सिंह की बड़ी बहु का नाम आया है. चल ये बता दे के बिंदु की बेटी के बारे में कितना मालूम है तुझे?"

"ये गलती हो गई इन्दर. और शायद वह लड़की मेरी नजर से बच भी गई हो क्योंकि अर्जुन पर हर वक़्त नजर रखवाना महंगा साबित हो जायेगा और वह हमारी सोच से कही तेज है. ये पहली फोटो में हे उसने आँखे कैमरा की तरफ की हुई है, मतलब वह अनदेखी कर रहा था जान बूझ कर. ये जो कोई भी है अर्जुन उसकी मंशा जान चूका है इन्दर."

"अभी कहा है वह? आराम से हे पूछना जिस से किसी को शक न हो.", नरिंदर को भी पता था के शंकर ने सही ध्यान दिए तह फोटो पर. और अर्जुन ने मार्किट वाली तस्वीर में भी कैमरा और लड़के, दोनों को देख लिए था. शंकर ने अपनी बीवी से अर्जुन के बारे में पुछा तोह उन्होंने भी इतना हे कहा के 3 बजे तक आने का बोल कर गया है. खाना अपने दोस्त के घर हे खा कर आएगा.

"इसके कितने दोस्त है?", नरिंदर और शंकर आराम से बहार निकल चले, कार भी संजीव वाली निकल कर.

"संदीप, धर्मपाल का बीटा. लेकिन वह वो नहीं गया होगा. पूरा परिवार गांव गया हुआ है, कल हम दोनों हे तोह मिले थे धर्मपाल से गेट के बहार. विकास भी घर है और बलबीर के पास वह हॉस्टल क्या करेगा जा के? गाड़ी वापिस ले इन्दर. छोल साहब के घर.", शंकर की बात पर नरिंदर ने भी तुरंत सेक्टर से गाडी वापिस घुमा ली.

"वह वह मोटरसाइकिल लेके क्यों जाने लगा?"

"इन्दर वह रेणुका के साथ उस दूकान पर पहले भी आया था और फिर वह दोनों निकल गए थे और 20-25 मिनट बाद आये थे. तूने रील कहा राखी है? साड़ी फोटो देखि थी क्या?", शंकर की बात सुनते हे इन्दर ने गाडी एक तरफ लगते हुए जेब से लेंस और रील दोनों बहार निकल लिए.

"मैंने बीच की फोटो नहीं देखि थी क्योंकि मुझे लगा के ऊपर और आखिर की फोटो बहोत होंगी. करीब 30 तस्वीर थी तोह 5-6 रह गई शायद.", और फिर कुछ सोच कर रील और लेंस शंकर को थमते हुए गाडी घर वाली सड़क पर ले आये. दोनों ने एक बार शीशे में अपने चेहरों के भाव देखे और मुस्कुराते हुए अंदर चल दिए.

"आज तोह दोनों शेर इखट्ठे. वाह भाई लगता है छोल पार्टी की तैयारी करनी भूल गया.", छोल साहब की बात पर हँसते हुए दोनों हे कुर्सी खींच कर बैठ गए. रोमिला अपने कमरे में थी और प्रीती शंकर जी के हे घर, जहा विक्य पहले से हे थी.

"कोई बात नहीं चाचा, 3 गिलास बनाने में देर हे कितनी लगती है.", नरिंदर की बात सुन्न कर छोल साहब अंदर चल दिए अपनी बोतल और गिलास लेने और रेणुका पानी लेकर इधर आई तोह शंकर जी ने बिना laag-lapete सवाल दाग दिए

"रेणुका, तुम लोग कपडे लेने से पहले कही गए थे?"

"हाँ भैया वह गौशाला गए थे न."

"नहीं मेरा मतलब की उस दुकान पर एक बार आने के बाद फिर कही गए थे."

"हाँ भैया वह मुझे सॉफ्ट स्लिपर्स लेने थे तोह अर्जुन वही ले गया था."

"अर्जुन ने हे पसंद किये होंगे, क्योंकि वह हमेशा से सही चीज पहचानता है. मुझे भी आज उसने ये चस्मा दिए जो काम का हे निकला.", शंकर जी की मुस्कराहट देख कर रेणुका ने भी वैसे हे अंदाज से मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ उसको पता रहता है के किसको क्या चीज लेनी चाहिए. लेकिन वह कुछ देर के लिए बहार गया था मोटरसाइकिल की चाबी शायद गिर गई थी. फिर 10 मिनट ढूंढ़ने के बाद पार्क के पास हे मिल गई थी. फिर वह अंदर आके सारा सामान खुद पैक करवाने के बाद मुझे वही ले आया था जहा आप लोग थे."

"थोड़ा धान रखा करो उसका, शरारती होता जा रहा है दिन प्रतिदिन.", नरिंदर जी ने बात बदल दी थी जैसे हे सामने से आते छोल साहब को देखा. रेणुका उनकी बात पर हलके से शर्माती हुई फ्रिज की तरफ चल दी, बर्फ और और पानी लेने के लिए.

"हाँ भी पुत्तारो, स्कॉच या सिंगल माल्ट?"

"सिंगल." "सिंगल", दोनों के स्वर एक साथ हे निकले और एक जैसे तोह छोल साहब भी हँसते हुए तीनो के गिलास में वह भूरी महंगी बोतल से सुनहरी तरल उड़ेलने लगे. 4-4 बर्फ के टुकड़े डालने के बाद शराब जितना हे पानी डालते हुए तीनो ने गिलास आदर से एक दूसरे की तरफ दिखाए और एक छोटी सी घूँट भरी. यहाँ उन्होंने गिलास टकराये नहीं थे.

"यार शंकर 2 मिनट दे, मैंने न मुर्गा रखा हुआ था और रेणुका हो गई है पक्की ब्राह्मण कुछ महीनो से तोह बस अभी आया.", शंकर जी ने रेणुका को भी अपने कमरे में जाते हुए देखा और रील पर एक जगह ऊँगली रखते हुए नरिंदर के हाथ में लेंस दे दिए.

"बहनचोद ये लड़का क्या बाला है? उसकी हे फोटो उतार ली इसने तोह. मतलब उसने जानकारी ले ली होगी और इस लड़के को ऐसे हे छोड़ दिए मतलब उसको तेरे बारे में भी पता था.?"

"जूते की दुकान पार्क के पास है, पार्क से पीछे वही गली जहा मदद पर मैं सिग्रेटी फूंक रहा था. अर्जुन ने मुझे देख लिए था यक़ीनन. लेकिन जैसे वह लड़का अपनी बात पर अदा रहा था और डर रहा था तोह अर्जुन को उसने कुछ अलग नहीं बताया होगा."

"फ़िलहाल यही मान लेना बेहतर रहेगा. चल अब ठंडा हो जा और तेरी वजह से इतने सालो बाद दोपहर में दारू पीनी पड़ गई."

"2-2 हे लेने है. फिर यही मुर्गा लगा के सब साफ़.", अब कोई हल नहीं था तोह दोनों के पास तोह हँसते हुए इस छोटी सी महफ़िल का हे मजा लेने लगे. लेकिन हरिआन और खुश भी थे की लड़का उनसे आगे चल रहा है.

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अर्जुन पौने एक बजे इस गाँव वाली सड़क पर आराम से मोटरसाइकिल चलता हुआ साधू सिंह के घर पहुंच गया था. बाहर इस समय भैंसो के बाड़े पर तिरपाल लगी थी, उन्हें धुप से बचने के लिए. अर्जुन ज्यादा न सोचता हुआ दरवाजे की तरफ बढ़ा तोह वह महेन्दर की मोटरसाइकिल भी नहीं कड़ी थी.

"Thakk-thakk", बहार लगी लोहे की कड़ी दरवाजे पर बजता वह प्रतीक्षा करने लगा, किसी के उधर आने की. खुले आँगन के दूसरी तरफ के कोने से बिमला देवी उसकी हे तरफ चली आ रही थी. मेहँदी रंग का सफ़ेद और सुनहरी चाप वाला पारम्परिक घाघरा और कमीज पहने. हाथ और पाँव हलके गीले थे और थोड़ा बहुत लेहंगा भी, जैसे वह पानी से जुड़ा कोई काम कर रही थी अभी. काजल को अपना शरीर बिमला देवी से हे मिला था जो एक भरपूर गदराई और कड़े शरीर की स्वामिनी थी.

"अरे बीटा तुम आये हो. आओ अंदर आ जाओ. ाचा लगा के तुम वाडे के तोह पक्के हो.", मुँह के सामने से चुन्नी हटती वह ख़ुशी से अर्जुन को अंदर ले आई और अंदर से वह सांकल भी दरवाजे की चौकट पर लगा कर उसको बंद कर दिए.

"अंकल और महेन्दर भैया नजर नहीं आ रहे?", अर्जुन ने जानबूझ कर काजल का नाम न लिए. बिमला देवी भी उसके लिए खाट बिछाने के बाद एक पीतल के बड़े गिलास में लासी लेकर उसके पास बैठ गई.

"तेरे अंकल तोह अपने नाम को हे सार्थक करने में जुटे है और मिन्दर का तोह शहर हे भला. आ जायेगा घूम फिर के सांझ छुपे. ले तू लस्सी पि फिर मैं खाना बनती हु. और अगर रुक के खाना है तोह चल घर और पिछले khalihaan-sabjiya दिखती हु तुझे. देसी लोग है बीटा और वैसा हे khaan-paan है.", बिमला देवी के घाघरे से उनके उजले लेकिन मजबूत पाँव झाँक रहे थे. वैसे हे उनका पर्वत सा बड़ा सीना अपनी दोनों समकक्ष चोटियां उभरे था. अर्जुन ने उन्हें अपनी तरफ देखते पाया तोह वैसे हे उन्हें भी निहार लिए. बिमला देवी इस जवान लड़के द्वारा खुद का निहारा जाना देख मुस्कुरा उठी.

"आंटी जी देसी रेहान सेहन हे तोह सादगी वाला है और खाना भी साफ़ और ताक़त देने वाला. मिलावट से तोह जीवन और शरीर दोनों खराब होते है."

"अरे बीटा ये अमृत वाणी वाली बातें है सब. लोगो को तोह गोरी मेम और होटल का खाना हे भाता है.", उनकी ऐसी खरी बात सुनकर अर्जुन हंसने लगा.

"आप रोमिला आंटी की वजह से तोह नहीं कह रही?"

"अरे वह मतबल नहीं था मेरा लेकिन तुन्हे ाचा याद दिलाया. देखा नहीं चौपाल और सामने वाले जेठ जी भी उसको हे घूर रहे थे. मर्दो का तोह दिन में बस नहीं चलता हां. और यही गाँव की मेहनतकश और घर सम्भालनेवाली की ज़िन्दगी बस चूल्हे और पशुओ तक सिमित. कोई पूछने वाला नहीं के हमारी हालत क्या है.", अपनी बात कुछ रोक कर वह जैसे जो कहना चाहती थी कह गई.

"नहीं आंटी वह सिर्फ रंगत या कुछ अनोखा पहली बार देखने की वजह से हे आकर्षण होता है. मुझे तोह अलग नहीं लगता कुछ. चलिए आपका घर हे देखते है, रोटी तोह 2 बजे तक हे खाता हु मैं.", अर्जुन के साथ वह भी कड़ी हुई और उसको अंदर वाली दूसरी रसोई दिखती हुई सबके कमरे दिखने लगी. 6-7 कमरे थे यहाँ जैसे सबके हे अलग अलग.

"आंटी इतने सारे कमरे? लोग तोह 4 हे हैं घर में.", अर्जुन ने गलियारे से हे पहले कमरे में जहा एक दीवान, टेलेवसिओं और हुक्का रखा था.

"इस घर में बस कमरे हे है बीटा, परिवार या प्यार नहीं. ये तेरे अंकल का कमरा है और इधर वाला मिन्दर का. देख दुनिया जहा का कबाड़ मिलेगा यहाँ. और ये वाला काजल को जो बंद हे रखती है वह.", बिमला देवी के स्वर में नाराजगी और खुद के पार्टी अनदेखी थी.

"आप अंकल के कमरे में नहीं रहती?", अर्जुन को ताज्जुब हुआ जान कर.

"नहीं रे मेरा कमरा तोह ये जानवरो के चारे वाले से अगला है, हौदी के साथ हे. लेकिन इसमें रहने से ाचा मैं गर्मी के वक़्त छत्त पे हे सो जाट हु या बारिश हो तोह इधर गलियारे में. इधर से ये पीछे का रास्ता है.", यहाँ पानी की टंकी बानी हुई थी उनके कमरे के सामने और बर्तन धोने की जगह. एक दरवाजा खोलते हे वह पिछले खुले खेत जैसे हिस्से में आ गए. यहाँ 5-6 बड़े पेड़ लगे थे और छोटी छोटी बगीची में अलग अलग सब्जिया. यहाँ भी पानी देने के लिए एक खुली टंकी बानी थी. इस तरफ कही ज्यादा हे जमीन थी उनके घर के हिसाब से.

"ये तोह सचमुच बड़ी ाची जगह है. जितनी ये बाद लगी है क्या साडी जगह आपकी है?"

"4 किल्ले है ये पूरे और इनकी देखरेख मैं अकेली करती हु. कभी कभी देवरानी मदद कर देती है लेकिन अपना वक़्त तोह यही काट जाता है.", नीम के घने पेड़ के नीचे बिछी खाट पर अर्जुन के साथ बैठती वह सब तरफ देख रही थी. पूरा हिस्सा उन्ही का था और 5 फ़ीट ऊंचाई की कटीली बाद पर हर तरफ फलियों की बैल और सफेदे के पतले लम्बे पेड़ कतार से लगे थे.

"वैसे एक बात पुछु तुझसे?", उनके ऐसे ये बात कहने से अर्जुन ने ध्यान से उन्हें देखा.

"Be-jhijhak पूछिए. आपको तोह ऐसा कहना हे नहीं चाहिए."

"तेरा हमारी काजल के साथ चक्कर कबसे चल रहा है?", अर्जुन एक पल के लिए टोहड़ा हैरान हुआ लेकिन वह ऐसी जगह था जहा वह दोनों हे थे और जवाब सही देने हे जरुरी था. क्योंकि उनकी बात से इतना तोह पता चल हे गया था के वह सब जानती है.

"कोई डेढ़ महीने से. लेकिन आप क्या चाहती है? जब आपको पता है और आपने ये बात मुझसे ऐसे सीधा अकेले में हे की है तोह कुछ तोह आप भी चाहती होंगी.", अर्जुन की बात सुनकर बिमला देवी ने उसकी तरफ मुस्कुरा कर देखा.

"समझदार है तू जो बात के पीछे की वजह पूछने में समय नहीं गवाया."

"लड़की का रिश्ता कर चुकी हो, उसको मेरे साथ देखने के बाद उसको, मुझे या अपने घर में कुछ नहीं कहा आपने तोह जरूर वजह तोह होगी हे."

"तू सीढ़ी बात करता है तोह मैं भी तेरी हे तरह हु. मैं में नहीं रखती कुछ. तू काजल को जब तक चाहे छोड़, जहा तुम दोनों का दिल करे वह कर. मुझे तोह लगता है के वह बचा भी तेरे से हे जानेगी क्योंकि मर्द तोह उसका मर्द है नहीं. लेकिन इस बुढ़िया पर महीने डेढ़ में नजर रख लिए कर. ऐसा नहीं है के बिमला सबके सामने घघरी खोल देती है, तेरे अंकल ने हे आखरी बार किआ था वह भी जब काजल 5 बरस की थी. और ये न सोचना के मैं ये इसलिए कह रही हु की मैं तुम दोनों के सम्बंद जानती हु और इसका फायदा ले रही हु. बस जैसे तुम दोनों को देखा था न वह तस्वीर दिमाग से जा नहीं रही. जो आग इतने साल तक बस कभी 15-20 दिन में ऊँगली से रोकती आ रही थी वह अब शरीर जलने लगी है और इसको तोह तेरे जैसा घोडा हे ठंडा कर सकता है. बाकी तेरी मर्जी है और मैं तेरे मन करने के बाद ये बात अपने मुँह पर फिर नहीं लाऊंगी.", बिमला का चेहरा वही हरियाली बगीची की तरफ शुन्य भाव से रुका हुआ था. अपनी हे रौ में बहती वह पूरी बात स्पष्ट कह गई थी.

"आपका बुखार अभी उतरना है या किसी खास दिन?", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा तोह बिमला के चेहरे पर सुकून के साथ आँखों में नमी आ गई.

"तू सच में इस बुढ़िया की बात मान रहा है? मैं अब भी कह रही हु की तू ना भी करेगा तब भी तू काजल के साथ जारी रह सकता है. उसमे छुडास जरूर है लेकिन वह घोड़ी खुद तेरे पे मरती है. बिरादरी में उसकी शादी तोह रुकने से रही और मेरी लाड़ली की खुशियों के बीच मैं किसी को आने नहीं देने वाली."

"वह जैसा चलेगा जबतक चलेगा देखा जायेगा. आप अपनी बात करो.", अर्जुन ने सपाट तरीके से गेंद उनके पाले में फेंक दी.

"2 बजे खाना खता है न तू, पौन घंटा है और तेरे समय पे मैं खाना खिला दूंगी तुझे.", वह मुस्कुराती हुई उठने लगी तोह अर्जुन ने वह मजबूत चिकनी कलाई थाम ली. रंगत हाथो की गेहुआ जरूर थी बिमला देवी की काम करने की वजह से, लेकिन बाल एक न था. और हाथ बता रहा था के वह शरीर से अभी तक जवान और सख्त है.

"और देरी हुई तोह उसका जुरमाना?", अर्जुन ने हलकी हंसी के साथ उन्हें देखा. बिमला देवी बस अपनी कलाई पकडे जाने से हे पेट में तरंगे महसूस करने लगी थी. हाथ और पेट पर रोये उबरने लगे थे अर्जुन के मरदाना स्पर्श मात्रा से.

"तेरा जुरमाना मुझे भी पता है. पिछले हिस्सा भी तेरा अगर ऐसा हुआ तोह. पसंद है न तुझको वह भी करना, मेरी लाड़ली ले सकती है तोह मैं उसकी माँ हु."

"चलिए क्या पता आप हे कुछ सीखा दे.", अर्जुन हाथ थामे हे उनके पीछे चलने लगा.

"खुल कर बोलना और गलियां देना एक अलग हे मजा देता है. लेकिन मुझे नहीं लगता तू वैसा करेगा.", बिमला देवी ने अपने कमरे के किवाड़ खोले और उसको अंदर लाती फिर से दरवाजा लगाने लगी.

"दरवाजा खुला रहने दो. कितने दरवाजे बंद करोगी जब यहाँ वाला खुलना हे है. हाँ गालियां पसंद नहीं खुल कर जो मर्जी बोलिये.", अर्जुन ने बिमला देवी को अपनी तरफ खींचते हुए दरवाजा बंद करने से रोक लिए. वह जानदार औरत भी हलके कपडे की तरह उसके चौड़े सीने से आ लगी.

"तोह फिर तैयार हो जा असली चुदाई के लिए. शहर में जाने क्या कहते होंगे लेकिन बीटा गाँव में जो भी कहते है वह अब तू ाचे से सुनेगा.", बिमला देवी ने तोह सीधा उसका लुंड पकड़ कर हे मसलना शुरू कर दिए. अर्जुन समझ गया था के वह उतावली हो रही है और जितना आसान उन्हें लग रहा है उतना ये होने वाला नहीं.

"करो तैयार जरा मैं भी देखु. आपकी बेटी ने जितना सिखाया है मैं उतना हे जानता हु.", अर्जुन ने दिखने के लिए हथियार दाल दिए थे और बिमला देवी ने अपनी चुनरी एक तरफ फेंकते हुए ब्लाउज के सामने वाले 4 बटन खोल कर वह बड़े देसी तरबूज आजाद कर दिए. अर्जुन एक पल तोह उन gore-bhoore असाधारण चुचो को देखता रहा जिनके चूचक आधा इंच लम्बे और पतली ऊँगली से मॉटे, गहरे भूरे रंग के थे. देहात में शायद ब्रा pehan-ne का रिवाज हे न था.

"ले फिर आज देख ये जाटनी क्या हाल करती है तेरा.", दोनों पपीता को आपस में एक बार दबती वह जमीन पर घुटने मदद कर बैठ गई. अर्जुन की जीन्स खोल कर जैसे हे उसका ardh-sakht लुंड देखा तोह लपक कर पकड़ लिए.

"बड़ा तगड़ा लौड़ा हे तेरा अभी से हे. देखु कितना बड़ा हो सके है यो?", लुंड हहत में पकड़ते हे बोली भी ठेठ हो गई थी और उसकी खाल हिलती वह लुंड को सख्त करने लगी. अर्जुन भी उस लकड़ी के मजबूत दीवान के किनारे बैठ गया, बिमला देवी को पूरी सहूलियत देते हुए.

"अब तगड़ा है या नहीं वह तोह आप हे बताएंगी.", लौड़ा शब्द पहली बार अर्जुन ने संजीव भैया के मुँह से सुना था और आज दूसरी बार बिमला के.

"मुट्ठी में ना आ रहा था तगड़ा हे कहूँगी. ले देख जरा ये कसरत.", उसके लुंड पर थूक टपकती वह अपने दोनों बड़े तरबूज से चुचो के बीच दबाकर कस के हिलने लगी. ये सचमुच नया एहसास था. मुलायम और गद्देदार चुके उस पौन फुट के तगड़े लुंड को और मोटा करने लगे. अर्जुन ने थोड़ा झुकते हुए दोनों निप्पल ुंगियो में पकड़ कर मसलने शुरू किये तोह बिमला की आँखे भी मस्ती से बंद होने लगी.

"आह रे.. जोर की दबा ये घुंडीया. बहोत दिन बाद तोह हाथ लगया है इनपे. तेरा लौड़ा भी कुछ ज्यादा हे बड़ा है, दूर से देखन पर तोह इतना न लगे था."

"आंटी अभी थोड़ी देर बाद लेने हे वाली हो. पता चल हे जायेगा."

"आठ.. अब चूचियां खोल के यो मसल रही हु तोह भजन न करने वाली. छोड़ने के लिए हे तैयार करू हु न बीटा.. आह.", जब लुंड ाचे से चिकना हो गया तोह अपने घाघरे का साइड में बंधा नाडा खोलती वह अब पूरी तरह नंगी उसके सामने कड़ी थी. मांसल और मॉटे पत्, हल्का उभरा पेट, एक इंच गहतरी नाभि और मोटी छूट के ऊपर घुंगराले बालो का छोटा सा जंगल. छूट के होंठ थोड़े भूरे थे गोर शरीर की तुलना में, फांके कुछ बहार को. बड़ी मादकता से अपनी ऊँगली गीली करती वह छूट की दरार में डालते हुए अर्जुन को देखने लगी.

"बड़ा तगड़ा शरीर है आंटी आपका. अब देख के लग रहा है के अंकल आपको मुश्किल से सँभालते होंगे.", अगर िंचितपे से मापा जाता तोह बिमला के चुके कही भी 42-44 से काम न थे और वह भी किसी ख़ास बड़े ब्रा कप में सामने लायक. 34 की गुदाज कमर और 44-46 के लगभग बड़े और भरी चुत्तड़.

"तगड़ा है तभी तोह तुझे पसंद किआ. तेरे अंकल का लुंड तोह ठीक है लेकिन गर्मी 2 मिनट न झेल सकता वह आदमी. चल अब तू भी निकाड ले कपडे और देखु कितनी khaat-kabaddi सिखाई है मेरी बेटी ने.", अर्जुन भी अपने कपडे निकलता पूरा निर्वस्त्र उनके सामने खड़ा हो गया.

"मुँह में लोगी?"

"तू बोल मेरे बेटे मैं मुँह, छूट और गांड सबमे ले लुंगी बस गीला करते हे एक बार जम्म के मेरी raam-pyaari कूट दे.", दीवान पर बैठ के वह दोनों हाथो से उसका lund/lauda पकड़ कर जीभ लगाती जैसे स्वाद देखने लगी. फिर हिम्मत करती अपना मुँह खोल कर पूरा सूपड़ा निगल गई. अर्जुन भी उनके बड़े चुचो को कस के मसलता हलके धक्के से देने लगा. आधे से कुछ काम हे लुंड लिए था के एक मिनट में हे खांसती वह उस से अलग हो गई.

"जाड दुख दी रे इसने तोह. घन्ना हे मोटा है तेरा. चल ेब आजा.", टाँगे खोले वह दीवान पर पसरी तोह अर्जुन हँसते हुए ऊपर आ गया.

"तेल नहीं है?"

"2 बचे कांड दिए इसमें से और गीली भी है, तेल से अचार डालेगा?", हो गई गलती बिमला देवी से.

"आह्हः.. बेटिचोड़ड़.. मार दिए रे.. फाड़ दी meriiii..aahh माँ ऋ मर्डर गई मैं", बस यही चिल्लाने की आवाजे मुँह से फुट पड़ी जैसे हे अर्जुन ने 1-2 बार उस उभरी हुई छूट पर सूपड़ा फिरने के बाद दोनों मोटी जाँघे फैलते हुए धक्का लगाया. 13 साल से जो छूट सिर्फ पेशाब के काम ली गई हो और yada-kada हे ऊँगली ने उसको सहलाया हो वह तीन इंच मॉटे लुंड के सामने क्या टिकती. कमजोर कपडे की तरफ छूट को फाड़ता अर्जुन का लुंड 5 इंच अंदर जा बैठा. उनके दोनों चुके मुट्ठी में भर कर वह बिना रुके उतने हे लुंड से चुदाई करने लगा. छूट की निचली किनारी से खून की चाँद बुँदे बिस्टेर पर गिरने लगी थी लेकिन 15-20 धक्को से हे बिमला देवी का दर्द थोड़ा काम होते हुए उनकी छूट में पानी बनाने लगा.

"आंटी अब ठीक है न? वैसे आप अंदर से तोह काजल जितनी हे कासी हुई हो.. आह.. गरम भी."

"कमीं.. छूट फाड़ के रख दी रे. मैंने लगे था के आराम से घुस जे गए. घाना हे बड़ा ले लिए आज मुनिया ने.. आह्हः. बीटा थोड़ी देख के चुदाई करे कर.. जवान छोरी तोह मर्डर जे गई इसके नीचे आती... आह्हः.. अह्ह्ह..", अगले 3-4 मिनट में हे अब उनकी बड़ी गांड थोड़ी हवा में ऊपर उछलती पूरा जड़ तक वह खूंटा अपने अंदर ले रही थी. बिमला की छूट भी अपनी हद्द तक उसको महसूस करके खुले नल सी झड़ने लगी.. इतनी हे देर में कमर और चुत्तड़ो की दरार में पसीना आ गया था.

"चलो घोड़ी बनो आप फिर करता हु आपकी सवारी.", अर्जुन ने गांड पर हलके से थप्पड़ मारा तोह वह का मांस स्प्रिंग की तरह हिलने लगा.

"आह.. बीटा. खिलाडी आदमी निकल्या रे तू तोह. छूट भी झाड़ दी और ेब गांड भी मारेगा."

"न आंटी, आज सिर्फ छूट. वह भी आप जब तक मन न कर दो.", अर्जुन को यही आसान तोह पसंद था हर भारी महिला के साथ. फैले हुए मॉटे चुत्तड़ और बीच से दिखती वह भूरी मोटी छूट जिसकी हालत इतनी हे देर में बदल चुकी थी. लाल मांस के बीच वैसे हे रंग का सूपड़ा भिड़ाता वह किसी घोड़े के तरह हे पूरा अंदर डालते हुए बिमला पर छड्ड गया. दोनों बड़े चुके अब जैसे उसके लिए लगाम का काम कर रहे थे जिन्हे खींचता वह इस घोड़ी को काबू किये था.

"आह्ह्ह्हम्म्म. माँ ऋ बचा ले.. कसूता जानवर है तू तोह. इस तरिया और भी भीतर लगे hai..aahh मममम.", न होंठ चूसे थे न शरीर मसले थे, सीधा चुदाई जैसे बिमला देवी को भरी पड़ रहे थी. हर धक्के पर वह पूरा कांप रही थी.

"अरे तेरे बाप ने भी न छोड़ा था इस तरया तोह.. आठ माँ. जलन हो ऋ है बीटा थोड़ा धीरे कर.", उसको मालूम न था के वह क्या बोल गई थी लेकिन ये बात सुनकर अर्जुन अब कही ज्यादा उत्तेज्जित होता हुआ बिना रुके सुपडे से जड़ तक उस गाँव की तगड़ी घोड़ी की छूट को खोलने लगा. एक बार फिर दर्द की जगह बिमला के शरीर में मजा भरने लगा था. निप्पल दबा दबा के अर्जुन ने सुजा दिए थे और अब वह लुंड बहार निकल कर बिमला को अपनी मर्जी से बिस्टेर के किनारे लाता फर्श पे खड़े हो कर और बुरी तरह से पेलने लगा. दोनों चुके सामने थे और गिरफ्त में जिन्हे अर्जुन ने होंठो में दबाते हुए पीना शुरू कर दिए.

"आठ.. कहा छुडवां की सोच ली बिमला, घोडा तोह फेर भी हट जे है लेकिन यू तोह आह्हः. फाड़ के हे हटेगा..", छूट से पानी रिस्ता हुआ बिस्टेर के किनारे धब्बा बना रहा था और छूट के बहार के बाल भी अब शरीर से चिपक गए थे बहार निकलते गीलेपन से.

"आंटी सच में बड़ा कैसा हुआ बदन है आपका. अगली बार तैयारी से आऊंगा नहीं तोह पिछले हिस्से में जल्दी न हो जाऊ.", इतनी देर बाद भी वह बोलै तोह डरने वाली बात हे बोलै.

"बीटा छूट फाड़ के तोह फेर भी काम चला लुंगी, गांड की दुर्गति कर दी तोह चलने से भी गई. आह्हः.. आह्हः.. मर्डर गई रे.", टीसीर बार छूट झड़ने लगी थी और अब 2 बजने वाले थे. अर्जुन ने दोनों भरी टाँगे कंधे पर रखते हुए ये आखिरी धक्के तूफ़ान से लगाने चालू कर दिए. पूरे कमरे में चुतरस की तीखी महक भर गई थी और patt-patt का शोर जैसे बाकी सब आवाज दबाये था. लुंड के फूलते हे बिमला की चीखे तेज हो गई लेकिन अर्जुन जब तक नहीं रुका जितने उसका वीर्य लुंड की तरफ न बढ़ने लगा.

"आठ.. आंटी.. गजब हो आप.. ाः..", हाथ में पकडे वह अपना सफ़ेद पानी उस बड़ी जमीन पर गिराने लगा जहा दोनों पर्वत अब लाल हो चुके थे. बिमला का शरीर ठंडा हो गया था और जगह जगह वह सफ़ेद गरम पानी उसको अलग हे सुकून से भर रहा था.

"2 बज गए आंटी. घर चलता हु, खाना वही खाऊंगा. परसो मिलता हु आपसे 2 बजे.", अर्जुन ने ऐसा पहले किसी के भी साथ न किआ था लेकिन इसकी वजह जरूर रही होगी कुछ. बिमला बस टाँगे फैलाये पड़ी हुई हांफ रही थी और अर्जुन को बहार जाते देख. जल्द हे वह बहार वाला दरवाजा ढालने के बाद उधर से निकल लिए था. कुछ गड़े मुर्दे उसको यहाँ भी मिले थे मुस्कान के बाद.
 
अपडेट 93

शतरंज के खिलाडी (1)


अर्जुन घर आया तोह वह देख चूका था के उनकी एक गाडी छोल साहब के घर के बहार कड़ी है. कुछ देर अपने dada-daadi के साथ बैठने के बाद वह कोमल दीदी बुलाने पर वह से उठ गया.

"जी दीदी."

"चल भाई खाना खा ले.", कोमल दीदी के सीधा ऐसे कहते हे वह उन्हें हैरत से देखने लगा.

"इस वक़्त तू घर है मतलब अपने दोस्त के पास तू खा के नहीं आया और मैंने भी अभी तक लंच नहीं किआ है तोह साथ में हे खाते है.", अर्जुन अपनी प्यारी बड़ी दीदी के साथ हे उनके कमरे में चल दिए. दोनों का खान वही अपने बिस्टेर पर लगाती वह इधर उधर की बातें भी कर रही थी. जैसे Chacha-Papa की पैकिंग, कृष्णा चची का आज दिन में hansna-bolna और ऊपर सबका फिल्म देखना.

"आप कभी बहार नहीं जाना चाहती क्या दीदी? ऋतू दीदी तोह कह रही थी की वह मस बहार से हे करेंगी और अलका दीदी भी आगे की पढाई का वैसा हे प्लान बनाये हुए hai.",Arjun ने अपने हाथ से निवाला दीदी को खिलाया और उनके प्यारे चेहरे को देखने लगा. उन्होंने भी अपने भाई को वैसे हे खिलाया और फिर बताने लगी.

"देख पढ़ने के बाद न मेरे से किसी ने पुछा के आगे पढ़ना है या नहीं और न मैंने अभी तक बताया है. ग्रेजुएशन तोह मेरी ख़तम हे हो गई अब और रिजल्ट जून में आएगा. अगर इस बीच किसी ने पुछा तोह मैं शायद कह दू की मैं मास्टर्स करना चाहती हु लेकिन चांस 1% है.", कोमल दीदी की बात कुछ समझ आई कुछ नहीं.

"1%? वह क्यों दीदी? पापा तोह कभी भी पढ़ने से रोकते नहीं उल्टा वह तोह खुश होंगे और माँ भी."

"भाई अब जल्द हे संजीव भैया के साथ माधुरी दीदी की भी शादी हो जाएगी. और यहाँ पर फैंसले घर में रहने वाले लेते है पापा नहीं. दादा जी भले हे एक बार के लिए इजाजत दे भी दे ब के लिए लेकिन दादी नहीं देंगी. मैं तोह इसके लिए बहार भी नहीं जाना चाहती, यही यूनिवर्सिटी से ब कर लुंगी लेकिन फिर उनका वही प्रवचन के अकेली लड़की को यूनिवर्सिटी भेजना ठीक नहीं, शादी की उम्र होने लगी है, साल या 2 साल में क्या पता कर भी दे. और रही बात देश से बहार जाने की तोह वह मैं खुद नहीं चाहती. कभी तू घूमने ले गया तोह जहा ले चलेगा मैं साथ चल दूंगी.", कोमल दीदी ने साड़ी बात ख़तम करते वक़्त जैसे अर्जुन को खुश करना चाहा इस बात को बोलकर.

"पढ़ोगी तोह आप जरूर और फिर देखता हु दादी मन कैसे करती है. वह खुदसे कहेंगी की कोमल बीटा तू एडमिशन ले ले. माधुरी दीदी 23-24 की होंगी और आप उनसे 2 साल छोटी. और उनकी शादी की वजह कुछ और है साथ हे वह राजी भी है. आप करो ये 2 हफ्ते आराम फिर मैं हे लेके चलूँगा आपको फॉर्म जमा करवाने.", अर्जुन का दृढ निश्चय देख कोमल दीदी को अपने भाई पर प्यार के साथ हे थोड़ी चिंता होने लगी.

"अरे तू फ़िक्र मत कर. ब के बाद भी शादी हे करनी है तोह फायदा तोह कुछ होने वाला नहीं. चल खाना ख़तम कर फिर तू थोड़ा आराम कर लेना और मैं माँ के साथ बाकी काम करवाती हु.", अर्जुन अब ख़ामोशी हे रहा और खाना ख़तम करते हुए ऊपर चल दिए जहा बाकी बहने थी. अभी भी सब टेलीविज़न से चिपकी थी लेकिन Alka-Ritu दीदी उसको न दिखाई दी. लेकिन अर्जुन को अभी उनसे काम नहीं था.

"प्रियंका दीदी, एक बार मेरे कमरे में आना.", अर्जुन उनके सामने से अपने कमरे में चला गया तोह उसकी बात सुन्न कर सभी एक दूसरे को देखने लगी. तारा हमेशा की तरह आरती के साथ बैठी थी और माधुरी दीदी सोफे पर प्रियंका दीदी के साथ.

"जा, लगता है जरुरी काम है.", माधुरी दीदी के चेहरे पर भी कोई विशेष भाव न आये थे. प्रियंका दीदी के अंदर आते हे अर्जुन ने दरवाजा ढाल दिए. कुछ देर तक दोनों हे बातें करते रहे और 15 मिनट बाद एकसाथ हे निचे चल दिए. अर्जुन खाने की मेज पर बैठ गया और दीदी को अंदर जाते देखने लगा. अंदर चाचा, पापा, बुआ और dada-daadi थे और अर्जुन को पहले से ये पता था.

"पापा, आप कबतक वापिस आने वाले है?", प्रियंका बिटिया अपने पापा की वैसी हे लाड़ली थी जैसे ऋतू शंकर जी की.

"बोल बेटी क्या बात है? कुछ लाना है वह से?"

"नहीं पापा, आपको और माँ को वह टाइम लगेगा और इधर मेरा ब का दाखिला भी निकलने वाला है. माँ के साथ तोह आप वापिस यही आने वाले है फिर मैं इधर हे एडमिशन ले लू?", प्रियंका की बात पर दादी के कान खड़े हो गए लेकिन वह उनकी तरफ पीठ किये कड़ी अपने पापा से बात कर रही थी.

"हाँ तोह क्या बड़ी बात है. यहाँ तोह यूनिवर्सिटी भी वह से ाची है और फिर अभी मैं तेरे दादा जी से यही बात कर रहा था के पीछे वाले मकान को तैयार करवाना है अब. सब यही रहने वाले है लेकिन वह मकान भी संभालना है तोह 4-6 महीने में उधर हे शिफ्ट कर लेंगे पंजाब से सामान मंगवा कर. तुम मंगवा लो फॉर्म, अर्जुन ला देगा या तुम साथ चली जाना.", नरिंदर जी जैसी किसी और से सरोकार हे नहीं रखते थे अपनी बेटी के फैंसले के सामने.

"नौकरी भी करनी है बीटा?", कौशल्या जी के ऐसा कहते हे रामेश्वर जी थोड़ा पीछे हे खिसक गए थे. उन्हें उम्मीद थी की अब पानीपत का युद्ध होने हे वाला है.

"माँ, प्रियंका सिविल सर्विस की तैयारी भी कर रही है मेरे कहने पर और इसका खुद का सपना है की ब करके कुछ समय नौकरी और फिर अपना बिज़नेस करने की. अब सपने मारना तोह maa-baap को ाचा नहीं लगेगा. बल्कि मैं तोह चाहता हु की ये सिविल सर्विस न हे क्लियर करे और जैसा इसने सोच रखा है वैसा करे जिस से ज़िन्दगी के सभी फैंसले लेने लायक बने ना की घर में पति की चाय में रहने वाली कोई पढ़ी लिखी बदनसीब."

"तेरी बात से मैं भी सहमत हु भाई. मैंने भी तारा को आज कह दिए के ट्रेनिंग के बाद अगर वह आगे पढ़ना चाहती है तोह डिग्री कर ले और डिज़ाइनर कपड़ो बिज़नेस या फैक्ट्री लगनी है तोह उसके लिए भी मैं तैयार हु. तू कर प्रियंका ब, वैसे भी तेरी पढाई सबके काम हे आने वाली है.", मधु बुआ ने तोह अब कौशल्या जी हे दबा दिए था बीच में अपना मजबूत पक्ष रखते हुए.

"तू तोह खुद कह रही थी की तारा की शादी इस साल करने के लिए. मैं मन कर रही थी तब तेरी ज़िद्द थी और अब खुद हे बदल गई.", कौशल्या जी ने जैसे बात पलटी थी मतलब अब वह अलग तरह से घेरने के मूड में थी.

"अर्जुन ने कहा था के फैक्ट्री चलने वाला लड़के का बाप है, वह खुद तोह नहीं. काबिलियत तारा में है तोह उसको मौका मिलना चाहिए न की सजा ऐसे घर में शादी करवा के. और मेरे बेटे ने जो कहा वह किसी भी हाल में गलत नहीं. पापा ने भी तोह मुझे अपने समय के हिसाब से कॉलेज भेजा जब लड़किया 10 पार करते हे ब्याह दी जाती थी. पहले मुझसे गलती हुई की मैं सिर्फ वैसे सोच रही थी जैसे माहौल में जी रही थी. अब तारा खुद लड़का पसंद करके लाये तोह भी ठीक और मुझसे कहिगी तोह भी. लेकिन प्रियंका तू एडमिशन ले और फिर अगले साल तारा भी 2 साल के लिए अपनी फैशन में मास्टर्स डिग्री के लिए फ्रांस जाएगी.", प्रियंका बिस्टेर के किनारे बटिह गई थी लेकिन पीठ अभी भी दादी की तरफ.

"कौशल्या देवी जी अब तोह मैं भी इत्तेफ़ाक़ रखता हु इनकी बातो से. बचे बड़े हो रहे है और बात पढ़ने, ज़िन्दगी संवारने की कर रहे है. ये 1970 तोह नहीं है जहा इतनी बंदिश लगनी चाहिए. जमीन भी है इन सबके पास तोह आपस में काम करेंगे तोह साथ हे रहेंगे,10-20 लोगो को रोजगार मिलेगा और ाचा है न तुम भी थोड़ा बहोत इनके पास जाने लगोगी तोह मैं भी आराम करूँगा.", रामेश्वर जी की बात सुनकर थोड़ा नाराजगी से उनके पाँव पर हाथ मरती हुई वह बोलने लगी.

"कल हे लगेगी इनकी फैक्ट्री और परसो तोह डिग्री भी हो जाएगी जैसे. अब सबने कह दी अपनी बात तोह मेरी भी सुन्न लो. अकेल तोह मैं प्रियंका को भेजने न वाली, कोमल साथ जाएगी इसके. उसका भी फाइनल का नतीजा साथ हे आएगा. और प्रियंका तू अर्जुन या संजीव को अपने साथ ले जा एक 2 दिन में अपने कॉलेज, माइग्रेशन का परचा दिए बिना तोह तेरा और आरती का यहाँ दाखिला होने नई वाला.", अपनी दादी की बात सुनते हे प्यार से वह उनके गले लग गई. शंकर जी भी अपनी माँ को देख रहे थे जो कितनी भी सख्त क्यों न थी लेकिन भेदभाव बिलकुल नहीं करती टी.

"और जरा उस सलाह देने वाले को भेज यहाँ मेरे पास. मधु के साथ साथ तेरा वकील भी वही है जितना मैं उसको जानती हु. दादी को ज्यादा हे जानता है न वह.", अर्जुन दरवाजे पर खड़ा मुस्कुरा रहा तह और उनकी बात सुनते हे आ के उनसे लिपट गया.

"मुझे पता था के दादी कैसे मानेगी. आप हो हे इतनी प्यारी की मुझे पता है आपको कैसे राजी करना है. मुझे भी आपकी बात सही लगती है के अकेले जाने से ाचा साथ में कोई रहे.", अर्जुन उनके गाल चूम कर फिर प्रियंका दीदी को परे हटाता अपनी दादी की गॉड में सर रखे लेट गया.

"तेरी दादी कोई कल पैदा नहीं हुई बीटा. और अगर ये सब तू चाहता है तोह इसका साफ़ मतलब है के जिम्मेदारी भी तू संभालेगा. अब घर का डिप्टी तोह फिर तुझे हे बना रखा है सप साहब ने. कोमल को भी बता डीओ के किताबे खरीद लेगी इतने खली समय में. पहले हे तैयारी करके रखने की आदत तुझे भी तोह कोमल और ऋतू से मिली है. शंकर वह हॉस्पिटल वाला जमीन का टुकड़ा दे डीओ भाई अपनी लाड़ली बहिन को, बाद में तुम लड़ पड़े तोह मेरी जान खायेगी. जैसा इनका मैं करे करें दो, लगाओ फैक्ट्री या जो भी करना है."

"वह पहले से हे मेरे नाम है माँ. भाई ने उसके बदले खेती वाली जमीन अर्जुन के नाम चढ़वा दी थी, पापा को भी पता है. और अब तुम लोग भागो यहाँ से, यहाँ maa-baap के साथ अभी उनकी औलादे बैठी है तुम्हारे baap-bua नहीं.", मधु बुआ ने अर्जुन को हटते हुए खुद जगह हथिया ली और वह दोनों भी मुस्कुराते हुए कोमल के कमरे में चल दिए.

"आप अर्जुन को सबसे ज्यादा समझती है माँ. इतना तोह कोई भी नई जानता जैसे अभी हे देख लो.", नरिंदर जी सब देख समझ रहे थे और उनको हैरत थी की अर्जुन इस सबके पीछे है वह उनकी माँ जानती थी.

"ये समझते है उसको और मैं सिर्फ प्यार करती हु. तेरे पापा जब पीछे हेट थे न तोह मतलब साफ़ है के मेरे से उलझने के लिए उनका लाडला हे होगा इस सबके पीछे. और कोमल को किताब पढ़ते मैंने भी देखा था. प्रियंका को यहाँ लाया क्योंकि वह तुझे भी ाचे से जानता है, इनकी बदौलत. मधु यहाँ बैठी है तोह उसकी बात काटने वाली भी कमजोर. मतलब साफ़ है के वह पहले पूरी जानकारी लेता है, फिर सब तरफ से घेरता है और आखिर में मौका नहीं देता. काम होने के बाद हे नजर आएगा.", रामेश्वर जी ने अपनी बीवी को इतना ज्यादा समझते देख कर अलग तरह से देखा और वह हंसती हुई फिर अपनी बेटी के सर की मालिश करने लगी. नरिंदर को बहुत कुछ समझने के बाद.

"तोह पापा ने उसको अर्जुन बना हे दिए पूरा. ाची मैनेजमेंट और उचित समय पर उचित डाव. मान न पड़ेगा आपको पापा के वह इतनी काम उम्र में हे कही ज्यादा समझदार है.", नरिंदर जी के मुस्कुराते चेहरे के पीछे जो बेचैनी थी वह रामेश्वर जी भी समझ चुके थे. और वैसा हे उन्हें अपने दूसरे बेटे के चेहरे पर दिखाई दे रहा था, बेशक वह चुप था.

"बीटा सबके लिए वह 7-8 साल की उम्र में परेशानी जैसा था या एक ज़िद्दी गुस्सैल लड़का. लेकिन तेरी माँ और मैं जब कभी शतरंज खेलते थे तोह अर्जुन हमेशा से मेरे पीछे पड़ा रहता था उस वजीर को ज़िंदा करने के लिए जिसको तुम्हारी माँ ऊँट (कैमल) और हठी से घेर कर मार देती थी. उसने श्रीमतीजी की बिसात भी समझी और अपने दादा को सब हारते हुए भी देखा लेकिन 2 घोड़े और वजीर के साथ वह बाजी ख़तम कर देता है, म्हणत से वजीर ज़िंदा करने के बाद. यकीन न हो तोह पूछ लो अपनी माँ से.", रामेश्वर जी अपने कपडे ठीक करते हुए उठ गए. उन्हें भी बैठक का दरवाजा खुलने की आवाज से पता चल गया था के उनके परम मित्र आ गए होंगे. बचे रात को दिल्ली जो निकलने वाले थे. मधु बुआ भी उनके जाते हे अंदर वाले कमरों की और चल दी.

"माँ, पापा का वही मतलब था जो मैं सोच रहा हु?", शंकर की इस बात पर वह भी अपने बेटे को देखने लगी.

"वह बचपन में भी अपने दादा को पसंद करता था क्योंकि उसको उनके नियम और आदर्श ाचे लगते थे. तेरे पापा उसको दिमागी और शारीरिक म्हणत करवाते हुए काबू कर चुके थे लेकिन तेरी जिद्द ने फिर उसको बहार भेज दिए. लेकिन वह हमेशा से वैसा हे है, सीखने और म्हणत करने वाला. गलती से अब ऐसा कुछ मत करना के वह हठी और ऊँट पहचान जाये. घर में अब तक वह ठीक है और इनके हिसाब से हे है. दोनों ज्यादा jaan-ne की कोशिश करना बंद करो और उसको उसके हाल पर छोड़ दो.", कौशल्या जी भी उन दोनों को वही छोड़ कर बहार की तरफ चल दी.

"यार सच्ची बात है माँ की. अर्जुन को उसके हाल पर छोड़ देना हे बेहतर है. हम जितने मर्जी होनहार हो लेकिन वह बाप है हमारे और उन्हें ब्याज प्यारा है मूल से तोह अपना रास्ता पकड़ने में हे भलाई है.", नरिंदर की बात पर शंकर ने कुछ विचार करने के बाद छोल साहब और अपने पिता जी की तरफ रुख कर लिए खड़े होते हुए.

"सही है. वैसे भी अब जा हे रहे है तोह क्या फायदा सोचने से भी."

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अर्जुन आज घर हे था तोह अपनी चची के साथ थोड़ा वक़्त बिताते हुए वह भी उनकी मदद करने लगा सब जरुरत का सामान और उनकी रिपोर्ट, दवाइया रखवाते हुए. सब काम जल्दी हे ख़तम करके वह कुछ देर वही अपनी माँ के बिस्टेर पर लेट गया और जल्द हे नींद से आँखें बंद हो गई.

"देख तेरे मुन्ने को कैसे नींद में भी मुस्कुराता रहता है.", ललिता जी ने ये बात कही तोह रेखा जी से थी लेकिन अर्जुन के पर बैठ कृष्णा जी गई.

"दीदी, मुस्कुराना हे तोह सबसे मुश्किल काम है दुनिया में. मेरे लाडले ने इतनी सी उम्र जैसे बहुत कुछ सीख लिए है. भगवन हर बुरी नजर से इसका बचाव करे.", आँख से काजल लेती कृष्णा जी ने अर्जुन के कान के पीछे नजर का टीका लगा दिए.

"कृष्णा प्यार तोह तेरे से ये भी बहोत करता है. इतने सालो बाद भी तू इसके लिए वैसी हे है जैसे जब ये छोटा सा था और तेरे आगे पीछे घूमता रहता था सारा दिन. माँ जी तोह तुझे भी दांत पड़ती थी इसके चक्कर में जब धुप में हे छत्त पर तुम दोनों पतंग उड़ने में लग जाते थे.", ललिता जी की ये बात सुन्न कर कृष्णा जी भी पुराणी बातें याद करती मुस्कुरा उठी.

"दीदी याद है ये क्या कहता था अगर मैं मन कर देती थी? ऐ कृष्णा मैं फिर तेरे साथ नहीं सोऊंगा, अकेले में डर लगेगा फिर पता चलेगा. और आधी रात को खुद हे मेरे बिस्टेर पर आ जाता था, नींद में चलता हुआ."

"चालाक था जब छोटा था. सबके सामने चची माँ अकेले में कृष्णा. सच कहु तोह जब ये वापिस आया था न पिछले साल तोह अपनी गर्मियों की छुट्टियों में इसने पुछा था के कृष्णा चाची आ रही है क्या? माँ जी ने इतना हे कहा था के वह अब इधर क्यों आएगी? उसके अपने बचे है जो बड़े हो गए है तोह उनके साथ हे रहेगी वह. अर्जुन ने उस दिन के बाद किसी के सामने नाम नहीं लिए तेरा लेकिन मैंने कॉपी देखि थी इसकी जहा आज भी पहले पैन पर वैसे हे 'कृष्णा' लिखता है जैसे सिखाया था तूने. "रेखा" और उसके निचे 'कृष्णा'. प्यार तोह सबसे हे करता है ये लेकिन शायद तुझमे और रेखा में ये फरक नहीं करता, शायद परवाह ज्यादा हे करता हो क्योंकि रेखा को इसने वही करते तोह देखा है.", ललिता जी भी परिवार का वह अदृश्य मजबूत स्तम्भ थी जो सबके बारे में जानती थी और प्यार करती थी.

"आपके सामने हे था दीदी. मेरा बस तोह कभी चला हे नहीं. मैं अलग नहीं रहना चाहती थी और इस से तोह बिलकुल भी नहीं. लेकिन अब जो मर्जी हो जाये मैं वापिस पंजाब न जाने वाली मेरे बचे को छोड़ कर.", कृष्णा जी ने भी पाँव सीधे करते हुए एक हाथ अर्जुन के सीने पर रखा और आँखे मूंदे लेट गई.

"अब उठना मत शाम से पहले. ये भी इतने नहीं उठने वाला जितने तू सो रही है.", ललिता जी की ऐसी बात सुनकर वह बिना चेहरा उठाये मुस्कुराई और फिर आराम करने लगी, भरपूर सुकून से.

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मेनका शाम के 5 बजे अकेली थी घर में. मंजू घर का सामान लेने पास वाली मार्किट गई थी और उन दोनों के सिवा यहाँ रहता हे कौन था. मंजू को गए 10 मिनट हुए थे और कमरे में रखा फ़ोन बजते हे वह अंदर चली आई.

"Hello.", फ़ोन कान पे लगाए फिर जो बातें शुरू हुई तोह अगले 15 मिनट तक लाइन चालू रही. लेकिन मेनका ने आखिर में तंग आते हुए थोड़ी ऊँची आवाज में कहा.

"आप माँ हो मेरी इसलिए अपनी ज़िन्दगी खराब करती रही हु. आइंदा से अगर इस बारे में कोई भी बात की तोह फिर मुझसे बुरा कोई न होगा. उसके साथ आपका कोई लेना देना नहीं है तोह गलती से भी उसको शामिल मत करना. पहले हे बड़ी मुश्किल से नरक ख़तम किआ है और आप फिर मुझे वही सब करने के लिए उकसा रही है.?", मेनका अपनी बात कहने के बाद दूसरी तरफ से आने वाली इस अलग आवाज को सुन्न ने लगी.

"भैया आप जैसे हो मुझे ाचे से पता है. चुप रहती हु इसका मतलब ये नहीं के मुझे कुछ नहीं पता. एहसान आपने नहीं किआ मुझ पर कोई, उन्होंने हमारे परिवार पर किआ जिसको आप दोनों मिलकर कैसे उतार रहे हो ाचे से दीखता है. बिंदु मेरी भाभी नहीं थी कभी भी लेकिन बड़ी माँ आज भी मेरे लिए बड़ी माँ है. माँ की करतूत जरा देर से पता चली और कैसे बेटे हो जो अपनी माँ के साथ हे .. छी.. अगली बार यहाँ फ़ोन करने से पहले 100 बार सोचना और फिर भी नंबर मत मिला देना." मेनका की बात जैसे बीच में से हे काट ते हुए सामने से कुछ और भी कहा गया था. मेनका के भाई ने जाने क्या कहा था के वह अपना आप खोटी हुई बोलने लगी.

"Maa-chaudh है और उतना हे बना रहिओ. अर्जुन का नाम तेरी जुबान पर भी आया तोह मेनका तेरा औजार काट कर कुत्तो को खिला देगी. बहनचोद bann-ne के लिए जिगरा है तोह करके देख ये गुस्ताखी. मैं भी उस बाप की बेटी हु जिस से तू जन्मा लेकिन मैंने तेरी रखैल का क़र्ज़ बहुत ज्यादा हे अदा किआ है. बीच में अगर ऋषभ भी आया तोह वह भी नहीं बचेगा. रख फ़ोन साले दल्ले नीच.", गुस्से से काम्पटी वह फ़ोन के पास बैठी लम्बी सांसें ले रही थी और थोड़ी हे देर बाद खुद को ठीक करने के लिए उठ कर बाथरूम में चल दी.

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शाम को जल्दी खाना बना था क्योंकि शंकर, नरिंदर और कृष्णा जी ने 9 बजे निकलना था दिल्ली के लिए. 4 बजे की उनकी उड़ान थी तोह समय रहते जाना हे ठीक था. लेकिन कृष्णा को aas-pas न देख कर नरिंदर खुद हे अपनी भाभी के कमरे में चला आया जिधर अर्जुन की बाजु पर सर रखे कृष्णा जी इत्मीनान से सो रही थी. उनका एक हाथ अपने लादले के गाल पर था नींद में भी.

"अभी वक़्त है जाने में, इन्हे सोने दो. और अर्जुन जाग गया तोह दोनों भावुक हो जायेंगे.", रेखा जी अपने देवर का हाथ पकड़ कर वापिस बहार लाती हुई कहने लगी.

"भाभी कृष्णा ठीक हो जाये तोह प्रायश्चित में अपनी बाकी ज़िन्दगी लगा दूंगा मैं. शंकर के साथ हे मेरे से भी एक गलती हो गई की इन maa-beto को जुड़ा कर दिए इतने साल. सच कहु तोह वह एक दिन भी बिना दवा के ये सो न सकीय थी, बीमारी में. यहाँ बस उसके साथ होने पर हे वह उठने लगी है, सबसे बातें करने भी लगी है और देखो जरा कैसे दोनों बेखबर से सोये हुए है पिछले 3 घंटे से.", नरिंदर की आँख में हल्का पानी आ गया था, जो बहोत बड़ी बात थी. रेखा जी ने भी अपने प्यारे देवर को गले लगा लिए.

"हिम्मत रखो नरिंदर और अब कोशिश करना के वह ाचे से ध्यान रखो कृष्णा का और इलाज पूरा सही से हो. फिर अर्जुन अपने आप हे कृष्णा की देखभाल कर लेगा यहाँ. ये बता रहे थे की इलाज ज्यादा बेहतर तभी हो पायेगा जब वह खुश रहेगी और समय से अपनी पूरी खुराक लेगी. चलो तुम खाना खा लो फिर मिलने में भी टाइम लगेगा.", रेखा जी ने प्यार से नरिंदर के सर पर हाथ फेरा और दूर खड़े शंकर जी भी ये दृश्य देख रहे थे. कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही थी एक वाडे के पीछे.

अगले आधे घंटे में संजीव के साथ हे Narinder-Shankar जी ने भी खाना खा लिए था. ऋतू दीदी अपने पापा को अपनी लिस्ट बता रही थी जो सामान उनको चाहिए था वह से और ऐसे हे अलका का हाल था जो छोटे चाचा को सामान की पर्ची थमाए उनके पास बैठी थी. मधु बुआ और कौशल्या जी भी बच्चियों की बातें सुनती खुश हो रही थी. फिर रामेश्वर जी के उधर आते हे बस बड़े हे वह बैठे रहे.

"हाँ तोह सब सामान गाडी में रखवा लिए न? पासपोर्ट, kagaj-patra और टिकट अलग से सुरक्षित रखना. वह कुछ पहचान के लोग है मेरी तोह घरेलु खाना और माहौल मिल जायेगा. बस घडी मिला लेना दोनों देशो के हिसाब से जब भी फ़ोन करना हो.", रामेश्वर जी की बात पर नरिंदर जी ने सर हिला दिए.

"तू सुस्त क्यों हो गया है? क्या परेशानी है बीटा?", रामेश्वर जी अपनी जगह से उठकर अपने बेटे के सामने आ खड़े हुए. कितने सालो बाद आज उन्होंने अपने बेटे का चेहरा अपनी छाती से लगया था. बचे कितने भी बड़े क्यों न हो जाये maa-baap उनकी धड़कन भी पहचान लेते है. नरिंदर की आँखों में थोड़ी देर पहले रुक चूका पानी फिर से बहने लगा था. शंकर ये न देख सका जो चुपचाप उठकर गलियारे से बहार निकल गया.

"पापा, ज़िन्दगी में पहली बार आज मुझे अपना दोष पता चला है. दुःख कृष्णा का उतना नहीं है जितना ये सोच सोच कर हो रहा है के आपको जब हमारी जरुरत है और थी भी, हम कभी आपके पास न रह सके."

"मेरे बचे कभी भी अपने फैंसले का अफ़सोस मत करना. ज़िन्दगी में बहुत कुछ देखना पड़ता है और हर फैंसले के पीछे जो वजह होती है वह मायने रखती है. बाप तोह मैं भी ाचा न बन्न सका जो बाप के कर्त्तव्य की जगह काम के प्रति झुका रहा. लेकिन तुम्हारी माँ ने वह संभाला क्योंकि फैंसले के पीछे वजह थी. तुमने भी मर्जी से तोह नहीं चाहा था ऐसा और अगर मैं एक बाप की तरह कहु तोह शंकर और तुम, दोनों हे मेरा घमंड हो. कह नहीं पता क्योंकि परिवार में नहीं रहा न मैं उस वक़्त. आज रह रहा हु तोह यकीन करो मैंने अब परवरिश की, बेशक वह मेरा पौता या पौती है लेकिन मैंने सुधार करने की कोशिश की. तुमने ज़िन्दगी में जो किआ वह परिवार के लिए हे किआ, हमारे लिए किआ तोह शिकायत नहीं है मुझे कोई. दुःख भी होता है के मेरे बचे हमारी खुशियों की वजह से अपनी ज़िन्दगी दूर रहते हुए बिता रहे है. चल खड़ा हो बीटा और तेरी माँ से मिल ले, मैं शंकर से भी कुछ बात कर लू.", रामेश्वर जी की मजबूत बाहे नरिंदर को अपने बाप का प्यार अंदर तक महसूस करा गई थी.

"चल देख कैसा माहौल बना दिए है तूने. पता हे न था के मेरी 2 छोरियां है.", कौशल्या जी के ऐसा कहते हे नरिंदर अपनी माँ से भी गले लग गया.

"तू मेरा राजा बीटा है और हमेशा रहेगा. तेरी माँ का सर तोह उनके सामने भी तुमने न झुकने दिए जिनके सामने दुनिया हे झुकती थी. ऐसे बेटे सबको नहीं मिलते. और चल तेरी लुगाई को भी उठा ले, यही कहता है न तू कृष्णा के लिए.", अब नरिंदर कुछ शांत था और बेहतर भी.

"माँ, वह उधर अर्जुन के साथ सो रही है. डर की वजह से नहीं उठाया कही अर्जुन भी न उठ जाये."

"हक़ है उन दोनों का और नहीं मिलेगा तोह फिर कृष्णा को ज्यादा दुःख होगा. मैं उठती हो दोनों को.", उनकी बात सुन्न कर नरिंदर भी बहार अपने भाई और पिता की तरफ चल दिए.

"ओह कपूत, उठ जा और छोड़ तेरी चची को. इसने जाना भी है.", अब यहाँ अर्जुन अपनी चची को कस के बहो में लिए था. दादी की आवाज से अंगड़ाई लेट वह उठने लगा तोह पहले अपनी चची को प्यार से उठाया.

"यहाँ आराम करने नहीं मिलता चची. आप तैयार हो जाओ लगता है जाने का समय हो गया. मैं सारा सामान देख लेता हु के सही से रखा है या नहीं.", कृष्णा जी अपनी सास को देख हलकी शर्माती सी उठने लगी.

"कर लिए लाड तोह अब खाना खा ले बीटा. कपडे सफर में यही ठीक है.", कौशल्या जी उन्हें अपने साथ लिए हे बहार आ गई थी और अर्जुन पहले हे कुर्सी के पास वह छोटा स्टूल रख के बहार जा चूका था. थोड़ी हे देर में जाने वाले सभी लोग तैयार थे और अर्जुन अपने कमरे में कुछ लेने का बोल कर भाग गया था. छोल साहब, रेणुका बुआ, प्रीती भी आये थे उनसे मिलने के लिए और कृष्णा जी ने प्यार से प्रीती का माथ चूमने के बाद गले लगाया था. गाडी में बैठने के बाद कृष्णा जी ने संजीव को अभी रुकने को कहा और जैसे हे अर्जुन को एक किताब जैसा कूचे ले कर अपने पास आते देखा तोह मुस्कुराने लगी.

"तुझे याद था के ये मुझे देनी है.? वैसे है क्या ये?"

"आप हे देख लेना. और सबसे पहले वह जाते हे फ़ोन करना. Bye चाचा, bye पापा.", अर्जुन उन्हें bye करने के बाद खिड़की के पास बैठी अपनी चची का गाल चूमने के बाद हाथ पकड़ते हुए इतना हे कहा, "आप वह परेशां मत होना चची माँ, मैं हमेशा आपके पास रहूँगा.", और वह भी अपने लाडले के माथे को चूमती हामी भरने लगी. गाडी घर से बहार निकलते हे नरिंदर जी ने अपनी बीवी के हाथ से वह जिल्द चढ़ी किताब लेते हुए पहला पेज देखते हे वह वापिस उन्हें पकड़ा दी. जिसको वह भी देख रही थी. "Krishna-Arjun, श्रीमद भगवद गीता पूर्ण संवाद"

"ये तुम उसको पढ़के सुनती थी सोने से पहले. आज भी कितनी साफ़ राखी है जैसे नयी हो.", नरिंदर जी की बात पर कृष्णा जी भी मुस्कुरा दी.

"उसको हमेशा से ये फोटो पसंद थी और कहता था के देखो आपकी आँखें ऐसी हे है. संभल सकता है इसलिए तोह ये उसके पास छोड़ी थी. शायद वह इस से हे जीना सीख गया और अब मुझे भी देने का मकसद यही है.", अँधेरे में गाडी अब सही रफ़्तार पर थी. आगे शंकर जी संजीव की बगल में बैठे थे जो गाडी आराम से चला रहा था.

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अर्जुन कुछ वक़्त अपने दादा जी के साथ बिताने के बाद रुपाली दीदी को वही dada-daadi से बातें करने के लिए छोड़ कर अंदर वाले आँगन की तरफ चल दिए. यहाँ रसोई में हमेशा की तरह कोमल दीदी काम कर रही थी और तारा भी उनके साथ कड़ी गीले बर्तन कपडे से साफ़ कर रही थी.

"ारु, तू कब आया इधर?", कोमल दीदी ने जैसे हे कहा तोह तारा ने भी पलट कर पीछे देखा जहा अर्जुन आराम से पीढ़ी पर बैठा पानी पी रहा था.

"अभी तोह आया हु जब आप दोनों हे पढाई की बातें कर रही थी. ाची बात है न के अब आप दोनों को हे मनचाहा समय मिल गया है और मुझे आप दोनों से ज्यादा ख़ुशी है इस बात की.", अर्जुन ने बात ख़तम हे की थी की तारा उसके सीने से लिपट गई, नीचे बैठते हुए. कोमल दीदी वैसे हे काम करती हुई मुस्कुरा रही थी.

"सच में अर्जुन तुम बहोत ाचे हो. मैं नहीं जानती के कैसे तुमने ये सब किआ लेकिन मुझे अपनी ज़िन्दगी वापिस दे कर साबित कर दिए के तुम कुछ भी कर सकते हो. थैंक यू सो मच भाई.", तारा ने स्नेह से उसका गाल चूमा तोह दीदी भी तारा के सर पर हाथ फेरती उसको याद दिलाने लगी की वह उसके ऊपर हे गिरी हुई है.

"मेरा प्यारा भाई है ये तोह मुझे पूरा हक़ है.", तारा हलकी शर्म से मुस्कुराती हुई अलग हो कर कहने लगी.

"हाँ तोह मन कब किआ मैंने लेकिन जो दूर से देखेगा तोह तुम्हे देख कर behan-bhai तोह नहीं समझने वाला. चल अब तू ऊपर जा और उनके लिए पानी की बोतल भी लेती जाना.", कोमल दीदी के ऐसा कहते हे तारा ने एक बार अर्जुन को भी देखा जो उनकी ख़ुशी में खुद भी खुश था. फिर बोतल फ्रिज से निकल कर तारा ऊपर अपने नए कमरे की और चली गई.

"आपसे कुछ बात करनी है दीदी.", अर्जुन ने जैसे ये कहा कोमल दीदी ने भी अपने हाथ कपडे से साफ़ किये और अर्जुन को छत्त पर 5 मिनट इन्तजार करने को कहा. वह आगे कोई सवाल किये बिना बहार मुख्या दरवाजे का टाला लगाने के बाद ऊपर छत्त को जाने वाली सीढ़ियों पर बढ़ गया. मौसम साफ़ था और इस वक़्त हवा में न ज्यादा ठंडक थी न उमस. माहौल शांत और साफ़ हे था. अर्जुन दिवार पर बैठा अपने हे खेलो में डूबा आसमान निहार रहा था. कोमल दीदी कब ऊपर चली आई और गद्दा बिछा कर बैठ गई उसको जैसे एहसास भी न हुआ.

"हाँ तोह अब बता तेरी परेशानी की वजह.", अर्जुन उनकी आवाज सुन्न कर अपनी जगह से उठा और नीचे गद्दे पर आ बैठा.

"वह जो बड़ी दादी आई थी उनको आप पहले से जानती है न? और जो दीदी थी उनके साथ वह कौन थी.?"

"हाँ मैं थोड़ा बहुत जानती हु उनको भाई. हमारे परिवार के साथ उनका पुराण सम्बन्ध है शायद जब दादाजी पुलिस में अफसर नहीं बने थे तबसे. और jaan-pehchaan भी इस वजह से हे है के दादाजी उनके गांव में हे काफी समय तक रहे थे. 30 साल पुराणी पहचान है तोह सम्बन्ध भी ाचे है. वह लड़की जैसे हमारी बड़ी बहिन हे है और तुमने उन्हें जब देखा होगा तोह शायद 7 साल के रहे होंगे."

"दीदी, वह बड़ी दादी की एक पुराणी तस्वीर मैंने मेनका के घर देखि थी और उनके साथ 2 महिलाये और थी जो उस वक़्त जवान होंगी. एक शायद मेनका की माँ और दूसरी महिला, जो उनसे भी काम उम्र की थी की शकल ठीक वैसी थी जैसी एक लड़की हमारे स्टेडियम में बास्केटबॉल खेलने आती है. मेनका के परिवार में तोह सिर्फ उनके बड़े bhaiya-bhabhi, माँ और ये लड़का जिस से मंजू की शादी हुई है वही लोग है."

"पहले तू ये बता के ये jaan-ne के बाद तूने कितना दिमाग लगाया है?", कोमल दीदी हे तोह अपने भाई को सबसे ज्यादा जानती थी.

"आज जब गौशाला के लिए निकले थे तोह ये व्यक्ति हमारे सेक्टर के पास जैसे मुझ पर नजर रख रहा था. लेकिन वह पीछे नहीं आया और जब हम वापिस आये तोह मैं रेणुका बुआ को मार्किट लेके गया था जहा वही व्यक्ति मुझे दिखाई दिए लेकिन इस बार उसकी नजर जैसे पापा और जो भी उनके साथ मार्किट थे उन पर थी. बुआ को बहाना करके मैं करके मैंने सावधानी से वह आदमी पकड़ लिए था, वह गोल पार्क वाले ट्रांसफार्मर के कमरे में.", कोमल दीदी किसी आशंका से उसकी बातें ध्यान से सुन्न रहे थी.

"फिर?"

"उसने डर की वजह से मुझे जो बताया वह ये था की मुस्कान ने उसको एक मोटी रकम दी थी मेरी और परिवार के सदस्यों की जानकारी लेकर आने के बदले. मुस्कान वही लड़की है जिसकी शकल उस औरत से ठीक वैसे हे मिलती है जैसे आपकी हमारी माँ से."

"तूने उसके साथ क्या किआ? कही.."

"नहीं दीदी वह बेचारा तोह मेरे हाथ में बिजली की तार देख कर हे डर गया था. वैसे भी जितना मुझे jaan-na था उसने बता दिए था. घर के कुछ लोगो की थोड़ी बहोत डिटेल थी उसके पास, एक रील और दूसरी उसके कैमरा में थी. कैमरा वाली छोड़ कर मैंने सबकुछ ले लिए था. उसकी तस्वीर के साथ."

"वह क्यों छोड़ दी फिर भाई?"

"उसकी अलग वजह है दीदी. वैसे ऐसा कैमरा पहले बार देखा था मैंने. कागज भी डालता था और रील भी साथ हे थोड़ी मोती ज्योमेट्री जितना.", अर्जुन को जैसे वह सचमुच पसंद आया था.

"तुझे उसके हाथ में सबूत नहीं छोड़ने चाहिए थे भाई."

"पापा को उसके बारे में पता था दीदी. और वह सिर्फ अपना काम कर रहा था, दुश्मन थोड़ी हे था.", अर्जुन ने कंधे झटकते हुए ऐसे कहा जैसे उसको परवाह नहीं थी.

"तू घर आने के बाद फिर वापिस गया था. और क्या पता लगा उस जासूस के बारे में.?"

"सच कहु दीदी तोह मैं खुद मुस्कान पर नजर रखवा रहा था जबसे मैं नानी के घर से आने के बाद स्टेडियम जा रहा हु. वह स्टेडियम के हॉस्टल में रहती है, शायद दिखने के लिए. यूनिवर्सिटी में फॉरेन स्टूडेंट्स हॉस्टल का कार्ड है उसके पास."

"ये सब कैसे पता चला तुझे?"

"मंजू भी उसकी सहेली हो कर इतना न जान पाई लेकिन समय दीदी (तेजपाल शर्मा की बड़ी बेटी) उसके साथ हे पढ़ती है और वह भी अलका दीदी की तरह हे है, समझ लो. आज के हादसे के बाद मुझे यही बेहतर लगा के खुद हे सामने से बात की जाये. ऐसे तोह पता नहीं कितने लोग बेमतलब हे शामिल हो जायेंगे."

"तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था अर्जुन, काम से काम तू ये बात मुझसे करता. और ये मुस्कान कौन है जिसके बारे में मुझे पता नहीं?"

"नृ है दीदी और वह मेरे साथ वह सब करना चाहती है जो मैं प्यार या एहसास के बिना किसी के साथ नहीं करता. लेकिन ाचा हुआ के मैंने बात खुद हे कर ली उसके साथ. और बाकी सब वह अपने घर के दबाव में कर रही थी और असलियत खुद उसको भी नहीं पता लेकिन कल शाम उसने मुझे खुद बुलाया है. उसकी बड़ी बहिन से मिलवाने के लिए, जिसको ज्यादा बेहतर पता है और आज वह शहर में थी भी नहीं.", कोमल दीदी ध्यान से देख रही थी अपने इस मासूम भाई को जो कही ज्यादा हे गंभीर था इस समय.

"मंजू की सहेली है वह, शकल उस औरत से मिलती है जिसको तुमने मेनका के घर तस्वीर में देखा था और अब मंजू उस परिवार में हे शादी करके आ गई है. इस बारे में विचार नहीं किआ? और तुम इतने यकीन से कैसे कह सकते हो के वह आगे कुछ ऐसा नहीं करेगी?"

"विचार तोह मैं तभी कर चूका था जब तस्वीर देखि थी और मुस्कान की हरकते पहचान ली थी. लेकिन कही न कही जैसे मेनका और सरोज मौसी को इस बारे में कुछ भी नहीं पता और शायद कुछ ऐसे लोग है जिन्हे सब पता है और हम उनसे सवाल नहीं कर सकते. मुस्कान जो चाहती है मैं उसको वह देने को तैयार हु और सभी सबूत जो उसके खिलाफ है वह मेरे पास सुरक्षित है, उसके कबूलनामे के साथ."

"और समय का क्या? वह बेवजह हे ये सब कर रही थी? और उसके बारे में अगर मुस्कान को पता चल गया हो या बाद में पता चले तोह वह भी मुश्किल में नहीं पड़ जाएगी?", कोमल दीदी जैसे हर पहलु को ध्यान से समझ रही थी.

"मैंने कहा न आपसे के वह सीधे से इस सबमे शामिल नहीं है और अलका दीदी की तरह होने का मतलब यही है के वह बहोत शातिर है शांत दिखने के साथ हे. पापा उनके भी पोलिसवाले है. और मेरा साथ देने की वही वजह है जो आप सबकी है.", अर्जुन दोनों हाथ कमर के पीछे से गद्दे पर रखता हुआ आराम से पाँव पसरे बैठ था.

"आजकल तुम ज्यादा हे उड़ने लगे हो, यहाँ तक की आधी बात तोह मुझे भी पता नहीं चलने देते.", कोमल दीदी अपने भाई की गॉड में सर रख कर लेट गई थी.

"आप मेरी बड़ी बहिन हो तोह इसका मतलब यही हुआ न के आप आधे का आधा भी नहीं बताती, जिसके पीछे आपका यही मकसद है के आप मुझे प्यार करती है और परवाह करती है. और मैं भी अपनी प्यारी दीदी से सवाल नहीं करना चाहता कभी. आप ख़ास हो जो मुझे हे बिना बताये बेहतर बनाने में लगी रहती हो.", अर्जुन ने उनका वह नाम के स्वरुप हे कोमल गाल सहलाते हुए कहा और दीदी भी उसकी तरफ चेहरा करती मुस्कुराने लगी.

"वैसे तू पापा की बजाये दादाजी जैसा ज्यादा है. मुझे तोह लगा था के तूने उस आदमी को नुक्सान पहुंचाया होगा पकड़ने के बाद."

"आपका अर्जुन इतने chote-mote प्यादे नहीं मारता क्योंकि वह किसी और के लिए ये सब करते है, अपना परिवार बचने या पालने के लिए. वैसे भी जीवन लेना बुझदिली है दीदी. आपको जब डर लगता है तोह आप किसी की जान लेते हो, फिर डर और बढ़ता है और फिर ज्यादा सतर्क रहना पड़ता है क्योंकि अगली बार कही ज्यादा बड़ा हुम्ला होने की आशंका रहती है. एक कमजोर प्यादे को अपनी तरफ आने दो और उसके पीछे खड़े वजीर को मार कर राजा से नजर मिलाना कही ज्यादा बेहतर है."

"और राजा जो मौत देगा वह?"

"दीदी एक घोडा अपने वजीर के ऊपर और एक उस राजा के पीछे पहले हे रखना पड़ता है. वैसे ये बताओ के आजकल ये बाकी लोग इतना कमरे में क्यों रहने लगे है?", अर्जुन अब दिमाग को दूसरी दिशा में करता सहज होना चाहता था.

"Ritu-Alka तोह साल शुरू होने से पहले हे किताबे ख़तम करने में लगी है. और अंदर रहने की वजह वही लड़कीओ वाली है. इतना साथ रहने लगी है के दोनों का टाइम भी अब साथ आने लगा है. रुपाली भी जैसे उनके साथ रहना पसंद करती है और सारा ध्यान बस पढाई पर है उसका भी. गाँव से शहर में आने पर फरक तोह पड़ता हे है तोह ऋतू भी चाहती है के उसका आत्मविश्वास और बोलने का लहजा समय के साथ जल्दी बेहतर हो जाये. बाकी आरती को वह साथ वाले कमरे में सुकून रहता है और वह दर्जन भर मॉटे मॉटे उपन्यास पढ़ती रहती है या फिर शाम को Manju-Tara और प्रीती के साथ अपनी मस्ती में लग जाती है. वैसे तोह कल रात से तेरा भी सिस्टम बदल गया है."

"हाँ. आपकी खास सहेली मेरे ऊपर आपने जो बाँध दी है. दादी तोह बहाना हे है इसके पीछे. रेणुका को मन के कुछ तकलीफ है लेकिन आपने एक तीर से कही सारे निशाने लगा दिए है. मैं भी बांध गया हु, वही मधु बुआ वह हो कर भी कुछ नहीं कर सकती और जहा तक मुझे लगता है इस बीच बाकी सब भी मेरे दायरे से बहार रहेंगे."

"तुम्हारी भलाई के लिए हे. लेकिन मैं तुम्हारे पास हे हु.", कोमल दीदी को मुस्कुराते देख अर्जुन ने उनके चेहरे को थाम लिए. दोनों बड़े प्यार से एक दूसरे के होंठ चूमते हुए जैसे इस खामोश रात का हे हिस्सा बन्न गए थे. इस लम्बे चुम्बन के बाद दोनों के चेहरे जुड़ा हुए तोह अर्जुन भी उठ खड़ा हुआ.

"मुझे लगा था के तुम कुछ देर ऊपर रहना चाहते हो, मेरे साथ."

"मैं हमेशा ऐसा हे चाहता हु लेकिन अभी दोनों को काफी समय हो गया है इधर. माधुरी दीदी आपका इन्तजार कर रही होंगी और दोनों बुआ मेरा.", अर्जुन ने हलके से उनका उभार सहलाते हुए गाल चूम लिए.

"मतलब तू भी समझने लगा है. ाची बात है और लोगो से ज्यादा सवाल जवाब करने की जरुरत नहीं है फ़िलहाल."

"निश्चिंत रहिये. मेनका बहार नहीं है और उनसे सवाल करके मैं उन्हें दुःख नहीं पहुँचाऊँगा.", अर्जुन अपनी बड़ी बहिन को हँसते हुए नीचे जाते देखने लगा. छोल साहब के घर के बहार वाले आँगन में टहलती विक्य को देख कर अर्जुन भी मुस्कुराता हुआ दिवार पर बैठ गया.

'बिल्ली ने काबू किआ है इसको. सही है जितने दूर रहेगी बची रहेगी.' 15 मिनट के बाद अर्जुन भी कल वाली जगह आ कर लेट गया था. आज रेणुका ने उसकी दिलवाई हुई निघ्त्य पहनी हुई थी और वैसा हे कुछ पहने मधु बुआ बीएड पर पसरी हुई कान में वॉकमेन लगाए गाने सुन्न रही थी.

"सो जाओ आराम से. आज आपकी बड़ी बहिन को कोई शो नहीं दिखने वाले हम.", अर्जुन ने कान में हलके से कहा और रेणुका को सीने से लगा कर वह लेट गया था. रेणुका भी अब जा कर कही सुकून महसूस करती उसके सीने में धंसी थी. जल्द हे माहौल शांत हो गया था.

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मुस्कान आधी रात में अपने बिस्टेर पे सीने के बल लेती नाम के अनुसार हे मुस्कुरा रही थी. इस बंद कमरे में वह अकेली थी लेकिन जैसे किसी को उसका ये अकेलापन रास न आया. 'Thakk-Thakk' की हलकी आवाज दरवाजे पर होते हे वह खयालो से निकल कर दरवाजे को देखने लगी. इस समय जैसे उसको ऐसी कोई उम्मीद न थी. लेकिन फिर से आवाज आने पर झट्ट कड़ी होती वह दरवाजा खोल कर देखने लगी.

"सो गई थी क्या?"

"नहीं दीदी बस सोने हे लगी थी. लेकिन आप इतनी रात में और वह भी बिना बताये.?", ये उसकी बड़ी दीदी थी, उस से भी थोड़ी लम्बी और भरे शरीर की खूबसूरत युवती.

"कोई लड़का बुलाया हुआ है क्या अंदर जो ऐसे पूछ रही है."

"नहीं नहीं. अंदर आओ आप. और आपको जब पता है के मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं करती फिर भी ऐसे सवाल.", अपनी दीदी के अंदर आते हे दरवाजा बंद करती वह उन्हें बीएड पर पसरते देखने लगी. तकिया सीने के एक तरफ लगाती हुई उसकी दीदी करवट के बल लेती मुस्कान को देखने लगी और खुद को संभालती हुई वह भी स्टडी टेबल से पानी पकड़ने के बाद दूसरी तरफ तक लगाती सी बैठ गई.

"क्या पता भाई दुनिया में क्या क्या होता रहता आजकल. तेरी अफवाहे इतनी है तोह सोचा कही सच में हे दिल न कर गया हो तुम्हारा भी किसी के नीचे आने का.", तंज़ करते हुए वह वह मुस्कुरा रही थी.

"शुक्र है के बदनाम हु तोह ज्यादा नाम खराब होने से प्रॉब्लम नहीं होगी मुझे. लेकिन लोग तोह सादगी का बुर्का पहने भी 3-4 यार बनाये घूमते है, कल वह बदनाम न हो जाये कही.", मुस्कान ने कुछ ज्यादा हे बड़ा जवाब दे दिए था वह भी सार्ड चेहरे से.

"हाहाहा.. करना पड़ता है मेरी जान नहीं तोह लोग प्यार में कैसे फंसेंगे. जब सादगी पर मर्द मरता है न और म्हणत से हांसिल करके अपना जिस्मानी प्यार दिखता है, वह हर वो बात भी बता देता है जो शराब के नशे में न कह पाए. वैसे काम हुआ जो दिए था?", अपनी बहिन की बदचलनी देख कर मुस्कान भी फीकी हंसी हंसती हुई बीएड के सिरहाने पड़े पैकेट से कुछ तस्वीर निकाल कर उनकी तरफ करती बोलने लगी.

"जितना मुनासिब था उतना हुआ और आपका एक यार शहीद हो गया इन 4 फोटो के चक्कर में."

"फोटो कैसे मिली फिर?", उसकी बहिन ने हलके गुस्से और दबी आवाज में पुछा. फोटो पर नजर नहीं डाली थी अभी जिसका मतलब था के वह इंसान भी खास था और यहाँ एक सवाल भी.

"फोटो देने के बाद भी मारा जा सकता है. यहाँ शाम को भी अख़बार आता है जिसमे उसकी लाश बरामद होने की बात लिखी थी. फोटो वही रख गया था वह जहा बताया था लेकिन फिर वह उन पुराणी बिल्डिंग में क्या करने गया होगा ये तोह आपको ज्यादा पता होगा मुझसे.", मुस्कान का चेहरा थोड़ा अजीब और शक्क से भरा था.

"मैं ऐसा क्यों करुँगी, वह भी उसके साथ जिस से मैं खुद प्यार करती थी."

"हाँ दिख रहा है आपका प्यार और कितना दुखी हो आप वह भी."

"मोंटी को कितना प्यार करती हु ये मैं तुम्हे नहीं बताना चाहती और जब मैं खुद को क़ुर्बान कर सकती हु तोह मोंटी भी इस मकसद में मेरा साथ हे दे कर गया है.", मुस्कान की दीदी सब काबू किये अब उन तस्वीरो को ध्यान से देखने लगी. सबसे ऊपर अर्जुन की हे तस्वीर थी जिसमे पीछे बैठी युवती का चेरा ढाका था. अगली तस्वीर में शंकर सिग्रेटी का काश लगते हुए मार्किट के इस कोने में खड़े थे, नरिंदर जी और शंकर दोनों एक साथ खड़े था जहा नरिंदर की गर्दन दिख रही थी. आखिरी तस्वीर में फिर से अर्जुन हे था और उसके साथ खड़े संजीव के चेहरे के सामने पीपल की टहनी आने से वह भी सही से नहीं दिख रहा था.

"बस यही तस्वीरें मिली तुम्हे वह से? मोंटी तोह कह रहा था के उसने दर्ज़न भर फोटो कल हे खींच लिए थे फिर यहाँ सिर्फ 4. और इनमे से 3 आज की है.", दीदी अब जैसे मुस्कान पर हे शक्क कर रही थी.

"ये मैसेज था इनके साथ. और ये खबर आप भी देख लो तोह कैमरा कहा है पता चल जायेगा.", मुस्कान ने वही पैकेट से एक कगह और फिर गद्दे के नीचे से आज का संध्या दैनिक अख़बार उनकी तरफ सरका दिए.

'बाकी कल रील धुलवाने के बाद. कैमरा प्रिंट नहीं दे रहा.' और अखबार में लिखा था 'किसी बड़ी घटना का अंजाम देने के मकसद से जासूसी कर रहा संदिग्ध व्यक्ति ***** चौक के पुराने खंडहर में मृत मिला. कब्जे में लिए गए कैमरा से शहर के ख़ास हिस्सों और व्यक्तिओ की जानकारी मिली है. पुलिस प्रशाशन की तरफ से पूरी रिपोर्ट कल तक दी जाएगी.'

अब उनके चेहरे पर हवाइयां उड़द रही थी ये पढ़ने के बाद.

"शायद रील धुलवाने हे गया होगा वह उधर. संडे को उधर वाली हे कलर लैब है जो खुली रहती है. वैसे कही मोंटी के पास कोई डायरी या नंबर तोह नहीं था आपका, पर्स वैगरह में.?", मुस्कान की ऐसी बात सुन्न कर वह अब सच में हे डर गई थी.

"पर्स में मेरी फोटो थी और शायद पता भी जो मैंने बताया था मुझसे मिलने के लिए. अगर वह ज़िंदा रहता तोह कल हम मिलने वाले थे और फिर वह बॉम्बे चला जाता वापिस. अब पुलिस के पास मामला गया है तोह फिर मेरे चांस भी है फंसने के.", डर क्या होता है वह जैसे आज उस खूबसूरत चेहरे पर पहली बार चाय था. लेकिन अपनी छोटी बहिन को खिलखिलाते देख कर वह हैरान हो गई.

"सॉरी सॉरी. वैसे आपको परेशां नहीं करना चाहती थी लेकिन फिर सोच के देखने में क्या जाता है. बाकी फोटो के साथ ये आपकी 2 तस्वीर भी वह छोड़ गया था और उस कागज को पला कर भी पढ़ लो. 'शबनम मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा. तुम्हारी फोटो वापिस दे रहा हु क्योंकि जब तुम हे मेरी हो तोह इनकी जरुरत नहीं. कही मुझे कुछ हो गया तोह तुम पर भी मुसीबत आ सकती है. हमारे बीच का कोई सबूत अब मेरे पास नहीं है. कल मिलते है.'

वह पैन के पीछे लिखा सन्देश पढ़ते हे जैसे आँखों से दरिया फुट पड़ा था शबनम के. कागज़ चेहरे पर लगाए वह चूमती हुई रोने लगी थी. मुस्कान ने अपनी दीदी को गले लगते हुए थोड़ी हिम्मत दी और फिर चेहरा साफ़ करते हुए पानी होंठो से लगा दिए.

"मुस्कान, इस सबके बदले में अब वह दोनों परिवार क्या क्या देखने वाले है उन्हें भी नहीं पता. मोंटी की मौत का बदला अब मेरे इरादे और मजबूत कर रहा है.", जख्मी नागिन सी वह गीली आँखों में भी लाल हो रही थी.

"दीदी, आपका गुस्सा जायज है और जैसे मैंने कभी आपसे कोई सवाल नहीं किआ और हमेशा जो कहा वह मान लिए तोह आप भी मेरी बात ध्यान से सुनो."

"बोल. लेकिन काम की बात होनी चाहिए."

"आप कल एक बार अर्जुन से मिल लो. देखो इसको पर्सनली मत लेना पर वह लड़का ाचा है दीदी. आपने तोह काम बाद में दिए था लेकिन मुझे वह पहली नजर में पसंद आ गया था. फिर भी मैं उसको क़ुर्बान करने के लिए आपके साथ कड़ी रही, बेशक एकतरफा प्यार है लेकिन प्यार है. जाने से पहले आप दादी को ख़तम करवा देंगी तोह माँ की एक इत्छा पूरी हो जाएगी. लेकिन अर्जुन निर्दोष है और उसके परिवार से क्या लेना देना है वह कभी माँ ने बताया क्या आपको? और अगर इतना हे उन्हें बदला लेना है अपने ससुराल से तोह फिर दूसरी शादी करके मुझे क्यों पैदा किआ इस नरक में जीने के लिए?", चटाक की आवाज के साथ हे शबनम ने मुस्कान का गाल लाल कर दिए था. गुस्से से वह घूरती रही लेकिन मुस्कान को थप्पड़ खाने के बावजूद मुस्कुराते देख बदन में चींटिया दौड़ने लगी.

"अर्जुन सबसे बड़ी वजह है इस सबके बीच. उसके बाप को नुक्सान पहुंचने से कुछ खास नहीं होने वाला लेकिन चंद्रो देवी और अर्जुन की मौत से दोनों परिवार अपने आप ख़तम हो जायेंगे. वह बुढ़िया मुखिया बानी फिरती है और ये लड़का अपने घर की जान. उसकी तस्वीर और जानकारी लेने हे मैं यहाँ खुद आई थी क्योंकि तेरी बातो से पता चल गया था के तू उसके नीचे आने वाली है, आज नहीं तोह कल. और ये तूने साबित भी कर दिए उस से मिलने की बात करके. सही बात है के तू मेरे बाप का खून नहीं है, उनका खून कभी गिरी हुई बात नहीं करेगा. ऐसे दुश्मन की तारीफ तुझ जैसी दोगली हे कर सकती है लेकिन मैं तुझे नुक्सान नहीं पहुचाउंगी.", दिमाग का संतुलन जैसे बुरी तरह हिल गया था शबनम का सिर्फ अर्जुन के नाम से हे.

"ऐसा खून मुझे भी नहीं चाहिए. भगवान् का शुक्र है के मैं दोगली हुई और उनसे दूर भी जिनमे असली खून भरा है. कसम खिलवाई थी ना आपने के मैं मर जाउंगी लेकिन अपने परिवार के बारे में कबि किसी का कुछ न बताऊ तोह मैं फिर से वह दोहराती हु. आपके या किसी के बारे में मैं मुँह नहीं खोलूंगी लेकिन अंजाम देखना आप अपनी ज़िद्द का और उस sati-savitri को भी बता देना की बाप जाल में फंसा लिए लेकिन बेटी आजाद है. न उनके साथ है और न उनके दुश्मनो के. अर्जुन मुझे अपनी रखैल भी बनाये तोह भी खुशनसीब समझूंगी खुदको. नाउ मिस शबनम सिंह यू मई लीव. कमरे से भी और ज़िन्दगी से भी.", मुस्कान ने अब कही अपनी आवाज ऊँची की थी और शबनम भी जैसे तैयार हे थी जाने के लिए.

"मैंने कोई कसम नहीं खाई है याद रखना. और तेरी कोई भी गलती अब माफ़ नहीं होगी. साली है तोह एक भड़वे की हे औलाद तोह वैसी हे निकलेगी.", गुस्से से बड़बड़ाती वह बहार निकल चली अँधेरे में हे और दरवाजा बंद करने के बाद मुस्कान की आँखे jaar-jaar आंसू बहाने लगी. जाने कितनी हे देर वह वैसे हे बैठी खुद को कोसती हुई रोटी रही और थक्क कर आखिर में फर्श पर हे सो गई. हर बार ऐसा तोह नहीं होता के सब आपकी बात को समझे, जो चाहो वह मिल जाये. नसीब शायद इंसान खुद लिख लेता है, कभी गलती से तोह कभी हिम्मत से. यहाँ मुस्कान शायद वह अभागिन थी जो परिवार से भी दूर थी और प्यार से भी.

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सुबह तक़रीबन 4 बजे का वक़्त था जब हवेली के बहार खटका सुन्न कर सुलतान गुर्राने लगा और आँगन में सोया मोहर सिंह जैसे तैसे लड़खड़ाता हुआ दरवाजे तक आया.

"कौन है भाई इतनी सुबह?", दरवाजा खोलने से पहले सुल्तान का पत्ता पकड़ कर उसने आवाज दी.

"मां, शबनम."

"खोलता हु बेटी. चल आजा अंदर. वैसे इस बख्त आने का कार्यक्रम कैसे बन्न गया?", मोहर सिंह को ऐसे लड़खड़ाते देख कर अंदर आती शबनम ने पूछ हे लिए.

"मां, तबियत ठीक है क्या? किसी से लड़ाई झगड़ा हुआ है?"

"अरे बेटी मेरे से झगड़ने वाला इस पूरे गाँव में कोई नहीं. लोग तोह तेरे मां से आँख मिलते डरते है झगड़ना दूर की बात है."

"ओह Sheikh-chilli शर्म है के वा भी बेच खाई? गाम में कोई गांड मार के चला गया और यु डींग हाके है इस छोरी के स्यामि. डेढ़, टांग खुल्लन कोणी लाग ऋ ार मुँह पादना बंद कोणी हो रहा. चाल बेटी तू भीतर चाल मैं चा राखु सु.", अपनी बड़ी बहिन सुशीला सिंह की ऐसी खरी खोटी सुन्न के मोहर सिंह गाँव के लंगड़े कुत्ते की तरह कूल्हों के नीचे तकिया दबाता फिर से लेट गया. 'भगवन ेहसि बहिन दें से ाचा तोह एक और रांड दे देता जो बहार चुद के कम् ते कम् घर और जीवन मई सुकून तोह रखती. या अपना घर के छोड़ के मेरी कुंडली में आ बैठी, काली नागिन. पर जो भी हो गांड तोह शबनम की बहोत सुथरी और बड़ी से. आह.. आरर मेरी बहनचोद कौन मार गया रे. आठ.. उठा ले रे भगवन उस खागड ने जो आपने खुट्टा बाद गया मेरी कोरी धरती के भीतर.'

"ओह भंवरी देवी, चा छान दे ार आड़े मेरे कमरे में देदे.", अंदर सुशीला बिस्टेर पर शबनम के साथ बैठी थी. और अपनी बड़ी भाभी को आदेश देती फिर शबनम की तरफ देखने लगी.

"मौसी, आप मेरी वजह से उठी हो या रोज इस वक़्त हे उठती हो?"

"नींद कहा आती है बेटी. बस शरीर का बोझ काम करने के लिए पसर जाती हु. तू बता इतनी सवेरे कैसे आना हो गया? वह भी यहाँ घर पे?"

"मौसी अपने हे दगाबाज हो जाये तोह फिर कहा जाये? पहले तोह सोच रही थी की दिल्ली निकल जाऊ लेकिन इधर के काम ध्यान आते हे सोच के यही एक दिन बिता के फिर समय से पहले काम निबटा दू."

"किसने देगा कर दिए तेरे साथ? तेरी मौसी का वक़्त बदला जरूर है लेकिन बचो के लिए अब भी 1-2 का सीना पाद सकती है. तू टेंशन न ले और जबतक रहना है यहाँ रह."

"मुस्कान पकड़ से निकल गई मौसी और ऐसे वक़्त पे जब काम को अंजाम देना था. मैं तोह सोचे बैठी थी की सब निबटा के हवा हो जाउंगी और फसेंगी वह दोगली हे. लेकिन वह पीछे हट गई और रात में बहार 2 घंटे बिताने के बाद मैं इधर चली आई."

"मुस्कान तोह ऐसी न थी. जितना वह चुपचाप कर गई उतना हम लोग न कर सके. खैर जो हुआ सो हुआ, कुछ पता लगा शंकर के बीज का?", सुशीला मुद्दे की बात पर आ गई थी बाकी सब दरकिनार करते हुए.

"ये रहा वह लड़का, अब इसका काम आपने करवाना है और आपकी सास को ऊपर मैं भेजूंगी बस भीम अब कोई परेशानी न कर दे. माँ ने तोह पहले हे कह दिए है के आप बनो मुखिया उन्हें बस इस काम से मतलब है. बाकी पैसे मेरे वह जाते हे आपको मिल जायेंगे.", सुशीला गौर से फोटो देख रही थी इस लड़के की जो कितना मासूम और दिल को बहाने वाला था.

"पक्का यही है वह?"

"हाँ, यही है वह. अर्जुन नाम है इसका और मुस्कान की तरह स्टेडियम में हे प्रैक्टिस के लिए जाता है. इसको प्यार करने लगी है वह दोगली."

"कोई पूरी तस्वीर है इसकी?"

"हाँ मौसी इस वाली में देखो ये रहा और दूसरे का चेहरा चिप्प गया है.", संजीव के साथ वाली तस्वीर देख कर सुशीला सोच में हे डूब गई.

"क्या हुआ मौसी?"

"पहली वाली में तोह मासूम सी सूरत दिख रही थी लेकिन lamba-chauda और वैसे हे घुंगराले बाल. मुन्नी अगर शंकर पर मरती थी तोह फिर मुस्कान का इस्पे मरना जायज हे है. और इतने प्यारे लड़के को मारने में तकलीफ तोह मुझे भी होगी.", सुशीला की कुटिल मुस्कान चिप्प न सकीय.

"मारने के चक्कर में छुड़वा मत लेना मौसी.", सुशीला शबनम की ऐसी बात पर भी वैसे हे मुस्कुराती रही.

"अरे बीटा ये शहरी कबूतर दीखता है शंकर जैसा लेकिन तेरी मौसी उस bagad-bille के हाथ न लगी तोह ये फिर भी बालक है. हाँ तेरा दिल करे तोह ले लिओ इसका. अब एक मजे की बात सुन्न जरा तू भी.", सुशीला ने आँख दबाते हुए कहा.

"कैसी मजे की बात?"

"भीम पागल हो चूका है मेनका की लेने के लिए और उसको शहर में अपनी रखैल बना के रखने की तमन्ना है उसकी. उसको जिम्मे लगाया था रामेश्वर के परिवार पर नजर बिठाये रखने के लिए और जानती है उसने क्या किआ है?"

"मतलब मुझे बताये बिना भी वह नजर राखी जा रही थी? मौसी आपने तोह ये बात मुझे न बताई.", सुशीला अपनी चोरी पकडे जाने पर भी ख़ास तरीके से हंसती हुई जैसे जाहिर कर रही हो के वह तोह शबनम का हे काम कर रही थी. लेकिन शबनम क्या जानती थी की इधर एक अलग हे शतरंज बिठाये बैठी है उसकी मौसी.

"तुम हो jawaan-garam खून बीटा. हमको करना पड़ता है इन्तजार, हम बूढ़े लोग शिकार के पीछे नहीं भाग सकते न. पूरी बात सुन्न अब. मेनका बिदक गई है और वजह है अर्जुन शर्मा. मतलब अब सही समय है इस लड़के को घेरने का. भीम इसको मारना चाहता है, तेरा भी वही इरादा है और मेरा तोह दिल है के बिजेन्दर इस लड़के का दिल निकाल कर रामेश्वर के हाथ में पकड़ा के आये. मोहर सिंह को भनक न लगने डीओ नहीं तोह वह चुटिया काम बिगाड़ देगा."

"आपने ये कैसे करने का सोचा है? देखना किआ कराया खराब न हो जाये कुछ ऐसी वैसी हरकत से.", शबनम अभी जैसे निश्चिंत न था.

"मेनका इसको मुसीबत में देख के तोह निकलेगी न घर से? और ये मेनका से प्यार करता हो या न करता हो लेकिन रामेश्वर का खून है तोह अगर मेनका मुसीबत में होगी तोह जरूर आएगा और अकेले हे आएगा. पर वापिस नहीं जायेगा. बिजेन्दर को तैयार किआ था शंकर का सामना करने के लिए लेकिन उतना तोह न हुआ वह फिर भी इसको जमीन में दफना सकता है. भीम भी भीम है और मेनका के लिए वह पहले हे इसकी जान का दुश्मन बना हुआ है. आज खुलवाती हु फिर बिपास वाला गोदाम और कल रामेश्वर को उसका पहला तोहफा दिया जाये.", सुशीला का चेहरा बदले की आग से पहली बार लाल हुआ था. जैसे वह सच में हे खून पी चुकी हो अपने दुश्मन का.

"मौसी, आप वह मौजूद रहना और मैं तबतक सामने नहीं आने वाली जबतक दोनों काम नहीं हो जाते."

"तुझे भी सब दिखाउंगी और फिर तेरी मर्जी है के सामने आ कर देखे या फिर चुपचाप बंद कमरे से देख कर निकल जाये. अब तू आराम कर और मैं जरा चक्कर लगा औ नोहरे का.", शबनम को आराम करने का कह कर वह बहार निकल चली और शबनम अपने आप से कहने लगी, 'जानती हु रांड तू भी कितना सोचे बैठी है लेकिन तू पुराणी होगी खिलाडी पर शबनम तेरे भी पर काटेगी वक़्त आने पे.' इन दोनों को बस ये खबर न थी की इनकी बातें कोई और भी सुन्न चूका है जो अब साड़ी सूचना आगे पहुंचने वाला था.

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"इतनी सवेरे तुम यूनिवर्सिटी में? बात तोह शाम को मिलने की हुई थी."

"मुझे लगा था के शायद हमको थोड़ा जल्दी मिलना चाहिए. कई बार सब समय से नहीं होता."

"हाँ ठीक किआ तुमने जो खुद आ गए. उधर चलो वह हम बिना नजरो में आये बात कर सकते है."

"बैठ जाओ पीछे."

"वैसे तुम्हे कितनी देर हुई यहाँ खड़े हुए?"

"एक घंटा हो हे गया होगा लेकिन जानता था के तुम इधर जरूर आती हो 5 बजे, आज साढ़े 5 बजे हे सही."

"मुझे तुमसे वह सब नहीं चाहिए अब."

"लेकिन अब मुझे चाहिए."
 
अपडेट 94

शतरंज के खिलाडी (2)


करीब सवा 6 बजे अर्जुन पार्क के बहार आ खड़ा हुआ जहा आचार्य प्रमोद शास्त्री जी अपने समय के पश्चात भी जैसे उसका हे इन्तजार कर रहे थे. मुख पर हमेशा हे रहने वाला वह तेज और लाली उनके व्यक्तित्व की पहचान. अर्जुन ने करीब आते हे उनके पाँव चूहे और बिना कुछ कहे खड़ा हो गया.

"भाई आज जरा हमको भी सवारी करवाओ इसकी. हमने तोह जावा और ट्राइंफ हे चलाये लेकिन इसका अनुभव लेना जैसे तुम्हारी साथ हे लिखा था.", उनकी ऐसी मुस्कान देख अर्जुन ने अपनी हथेली उनके सामने कर दी जिसपर बुलेट की चाबी राखी थी.

"दिशा दिखने वाले सामने रहते है बाबा.", अर्जुन के ऐसा कहने से हे आचार्य जी स्नेह से गदगद हो गए. जो लड़का उन्हें सबसे प्रिय था और उन्होंने कभी ये खुद से भी कबूल न किआ था आज उसने जिस हक़ से 'बाबा' पुकारा था वही शब्द जैसे वह कबसे sunn-na चाहते थे. अपने समकक्ष कद के इस उभरते व्यक्तित्व को गले लगाने के बाद आचार्य जी जैसे उस बुलेट पर सवार हुए तोह अर्जुन ने भी महसूस किआ था के उसकी 'रानी' अब श्रेष्ठ हाथ में थी. वह सैदेव शांत रहने वाला चेहरा अब किसी जवान प्रेमी सा दिख रहा था. और अर्जुन के पीछे बैठते हे 'कटक' की आवाज भी ना आई और मोटरसाइकिल आगे बढ़ गई.

"हम स्वयं को jaan-ne के लिए जितना अंदर से निरिक्षण करते है उतना बहार से भी करना चाहिए. बेशक ये मायने रखने जैसा न लगे क्योंकि अब शरीर और स्वयं तोह एक हे है. लेकिन प्रभाव बहुत बड़ी चीज है बीटा. वह तुम्हारे आने से पहले तुम्हारे लिए तैयार था और अब भी तुम्हे घेरे है."

"बाबा, ये प्रभाव मुझे उतना क्यों नहीं पता चलता जितना मुझे लगता है के वह कही ज्यादा हे बड़ा है?"

"तुम्हे ऐसा लगता है के वह बड़ा है? बीटा, जरा ये देखना.", मोटरसाइकिल की गति एकाएक बढ़ गई और दोनों के सही भार से जैसे बुलेट कही ज्यादा बेहतर पकड़ से दौड़ रही थी. बिपास पर करते हे पहली बार अर्जुन की रानी 130 के ऊपर उड़द रही थी लेकिन हवा को चीरती हुई वह अब ऐसे शांत थी जैसे वह 'dug-dug' वाला यन्त्र गायब हो गया हो उसमे से. दोनों की आँखों से हल्का पानी निकलता कान की दिशा में जा रहा था. कुछ पल बाद दोनों जहा रुके थे वह वही सरोवर था जहा अर्जुन अन्नू को लिए आया था.

"क्या महसूस किआ अभी?"

"सब अचानक के हुआ. एक पल के लिए अजीब जैसे नियंत्रण से बहार जा रही हो स्थिति और फिर सब शांत लेकिन बहुत तेज और वही रफ़्तार जैसे मैं को शांत करने लगी. ऐसा लग रहा था के रानी ने अपनी काशमता को, उस वेग के साथ बांध कर काबू कर लिए हो. ये रफ़्तार बढ़ने के बावजूद सुकून दे रही थी."

"रानी.. हम्म. तुम कह रहे थे न दबाव बड़ा लगता है. वह दबाव कैसे चीयर कर सुकून मिला तुम्हारी इस 'रानी' को? गति तोह तुमने भी महसूस की थी. फिर कही कोई दबाव न था. बीटा, वह दबाव जबतक तुम्हे उलझाए रखेगा तुम उसको इस सूक्ष्म रूप को भी बड़े बादल सामान पाओगे. लेकिन अर्जुन का तीर मेघ के पार निकल कर भी इंद्रा के सिंहासन पर आ लगा था. मतलब वह बादल एक दिखावा है और तुम्हारा विश्वास और क्षमता कही ज्यादा बड़ी जो हर दबाव के पार जा कर तुम्हे खुद से मिलवाएगी. उस पल में तुम्हे ठीक वैसा हे अनुभव होगा जैसा कुछ समय पहले अभी तुमने किआ. लेकिन वह वाला क्षण भर के लिए नहीं होगा.", आचार्य जी मुस्कुराते हुए सीढ़ियों की तरफ चल दिए अर्जुन भी गहरी सांस भरता हुआ उनसे एक कदम पीछे चलने लगा.

"आपका कहना है के दबाव व्यर्थ है या भ्रम जैसा कुछ है.?"

"मैंने ऐसा तोह नहीं कहा दोस्त. सामने से ट्रक आ रहा होता तोह हम दोनों कहा होते? वैसे हे मैंने जब मेघ कहा तोह उसमे जल भी भरा हो सकता है और विद्युत भी. खुद को नियंत्रित कर सकोगे तोह ट्रक भी निकल जायेगा और वह paani-bijli भी तुम्हे सहयोग हे देंगे. अन्यथा उड़ता कागज़ रफ़्तार में दिशा भूल जाता है और पानी में गीला. 'रानी' कुछ हद्द तक मजबूत है और तुम्हारी हद्द उस से कही ज्यादा. इधर देखो लेकिन शांत रहना.", आचार्य जी अधिकतर उदहारण हे देते थे बाद में व्याख्यान अगर जरुरी लगता.

अर्जुन भी उन लम्बी सीढ़ियों पर बैठा देखने लगा के कैसे वह पानी में डूबी तीसरी सीढ़ी पर एक ख़ास तरीके से ऊँगली चलते हुए तरंगे उत्पन्न कर रहे थे. ऐसा नहीं था के वह ये कुछ सेकंड तक करते रहे, अगले 7-8 मिनट तक वह निरंतर वही दोहराते रहे और फिर हाथ आधा फ़ीट अंदर और उतनी हे तेजी से बहार. एक फ़ीट के लगभग लम्बाई के ये सलेटी सी 'cat-fish' दोनों पारो के बराबर से उनके हाथ में इधर उधर हिल रही थी. अर्जुन कभी उस मछली को और कभी आचार्य जी को देख रहा था. वह चमकदार थी और फिसलन से भरपूर लेकिन फिर भी उसके हाथ की गिरफ्त में.

"ये कितना दाबाव सेहती है मालूम है? इस पानी के तलहटी में शायद इतना वजन जितना किसी बड़े ट्रक को तुम्हारे सर पर रख दिया जाये उतना. ये एक मिनट अगर उस ठहराव में आई तोह जीवन देने वाला पानी हे इसका काल बन कर प्राण ले लेगा. और जरा उस तरफ जा कर खड़े हो जाओ.", अर्जुन तेज कदमो से उनकी बताई दिशा में बढ़ चला तोह 20-25 फ़ीट दुरी पर उन्होंने रुकने को कहा और मछली को हवा में उछाल दिए. पानी पर गिरते हे वह आँखों से ओझल हो गई लेकिन फिर 2-3 गोल तरंगे बनती अपने ज़िंदा होने का सबूत दे गई.

"उसको कुछ नहीं हुआ?"

"जीवन मिलना थोड़ा कष्ट दे सकता है लेकिन है तोह अनमोल हे.", अगले 10 मिनट दोनों वही सीढ़ियों पर बैठे रहे फिर अर्जुन पहले बार उन्हें घर के बहार तक छोड़ कर अपने 'संसार' लौट आया. थोड़ी देर से सही लेकिन ज्यादा हे दुरुस्त हो कर.

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"ठीक हो आप?", अर्जुन नहाने के बाद ऋतू दीदी के कमरे में अब उन्हें अपने से लगाए बैठा था. वह भी बंद कमरे में अपने ढीले कपड़ो के साथ उसके सीने से लगी प्यार के छोटे से पल में मुस्कुरा रही थी.

"मुझे क्या हुआ है?"

"वही जो हर महीने होता है. आपको तकलीफ नहीं होती क्या?"

"होती है बाबा लेकिन पहले से बहुत काम. तुम्हारी दवा काम कर गई है न और अब तुमने तोह रहा सहा भी ख़तम कर दिए.", अर्जुन ने उनके गुलाबी होंठो को चूम कर फिर सीने पर लिटा लिए. पीठ सहलाता हुआ वह जैसे सचमुच ऋतू को सुकून दे रहा था. मासिक चक्र को जहा लोग घृणा से देखते थे वही अर्जुन के लिए बस ये एक चक्र था जिसमे उसकी संगिनी को थोड़े अतिरिक्त प्रेम की जरुरत थी.

"आप कही ज्यादा प्यारी हो, पता है?"

"हाँ, क्योंकि तुम झूठ नहीं कहते कभी.", हंसती हुई वह अर्जुन के गाल को दांतो से हल्का सा काट कर जीभ से चाटने लगी.

"शैतान भी हो. आराम से लेती रहो न थोड़ी देर.", अर्जुन उनके दोनों कूल्हों को हलके से अपनी तरफ दबाते हुए मनमानी करने दे रहा था.

"कल मैं और अलका दादी और माँ के साथ नानी के जा रहे है. शायद बाकी और लोग भी जाये क्योंकि बड़ी गाडी से जाना है.", ऋतू दीदी की बात सुन्न कर अर्जुन उनका चेहरा देखने लगा.

"क्यों?"

"दादी ने मन्नत की हुई थी और कल मंगलवार भी है तोह हनुमान जी का प्रशाद लगाने. जहा तक मुझे पता है आरती, तारा, माधुरी दीदी भी साथ चलेंगी. लेकिन मैं और अलका तोह मंदिर की जगह नानी के घर रहने वाली है. वह भी मजा आता है. और तुम होते तोह ज्यादा ाचा लगता लेकिन दादी ने साफ़ मन कर दिए के अर्जुन को मंदिर नहीं लेके जाना."

"आपने मुझे कभी देखा है क्या मंदिर जाते? हाँ फिर कभी सिर्फ आपको लेके जाऊंगा लेकिन अलग मंदिर में, हनुमानजी वाले में तोह मुश्किल है.", अर्जुन के इस तरह से कहने से हे ऋतू समझ गई की इशारा किस तरफ है.

"गंदे कही के."

"क्यों, आप नहीं चलोगी मेरे साथ Krishna-pranami?", अर्जुन ने जितनी सादगी से पुछा था ऋतू ने अपनी आँखे बंद करते हुए अपने लब्ब उसके होंठो पर दबाने के बाद धीमी आवाज में कहा.

"मैं खुद चाहती हु के हम गन्धर्व को वास्तविक बना दे. जब तुम कहोगे मैं तैयार रहूंगी.", इस बार का गले लग्न अलग था. प्रेमिका की जगह ये जीवनसंगिनी थी.

"खाना खा लो तुम दोनों अब. हाँ साथ में मैं भी खाउंगी हे.", अलका दीदी ने दरवाजा वापिस लगा कर खाना बिस्टेर पर खली जगह रख दिए. हलकी फुलकी मस्ती करता अर्जुन वह से उठ कर बर्तन रसोई में रखता हुआ अपनी माँ को कुछ कहकर घर से निकल चला.

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मेनका नाश्ते से फारिग होने के बाद अब पिछले आँगन में कपडे धोने की मशीन लगाने लगी थी. नल के नीचे पानी बाल्टी रख कर वह मंजू को देखने अंदर आई तोह मंजू इत्मीनान से saaf-safaai करने में व्यस्त दिखी. झाड़ू पहले हे लगा चुकी थी और अब कांच का टेबल कपडे से चमकती हुई वह कुछ गुनगुनाने लग रही थी.

"ओह लाडो मेरी. आराम कर ले या किताब खोल ले थोड़ी देर. ये saaf-safaai मैं कर लुंगी."

"दीदी, इतना भी काम नहीं है. और 2 घंटे पहले सो के उठने के बाद फिर से आराम कौन करता है?", मुस्कुराती हुई वह थोड़ा पानी छिड़क कर अखबार से शीशा चमकाने लगी.

"तुझसे कुछ बात करनी है मंजू, जरा चाय रख मैं बाल्टी का पानी बंद कर के आती हु.", मंजू भी सर झटकती हुई रसोई की तरफ चल दी. हाथ धोने के बाद पानी का बर्तन चूल्हे पर चढ़ाया तोह मेनका भी अंदर आ कड़ी हुई. पत्थर की स्लैब पर हाथ रखती वह मंजू को देखने लगी.

"अर्जुन खतरे में हैं.", मंजू के हाथ कांप गए इतना सुनते हे. वह जैसे पल में हे सफ़ेद पड़ गई थी मेनका के मुँह अर्जुन के लिए ऐसा सुन्न कर.

"K..kis से खतरा है उसको? आपको कैसे पता दीदी?", मंजू प्यार जो करती थी उस शख्स से जिसका नाम लिए गया था.

"मेरे परिवार से है मंजू. तुझे मैं इसलिए ये बता रही हु की तुम्हारी आँखों में मैंने उसके लिए समर्पण और प्यार देखा है. चाहे वह तुम दोनों का आपस में खेलना या तुम्हारे लिए प्लेट लगाना हो. वह भी दिल से तुम्हारे लिए सब करता है. पता नहीं कितना सच है या कही मैं ज्यादा हे सोचती हो. लेकिन तुम उसकी बहुत परवाह करती हो. मैं खुद उसको कुछ नहीं कह सकती और तुमसे भी वचन चाहती हु की उसको ये नहीं कहोगी की मैंने तुम्हे बताया है. अगर वचन दे सकती हो तोह मैं खतरे से आगाह कर सकती हु नहीं तोह सीधा मेरे सामने आने पर वह बच भी जाये लेकिन मेरा वजूद खतरे में पड़ सकता है और साथ हे बहुत से लोगो का."

"उसके लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हु. तुम बेफिक्र रहो मंजू कभी जीकर नहीं करेगी, अपनी आखिरी सांस तक.", मंजू आज जैसे मेनका का रिश्ता हे भूल गई थी, आवेश और डर की वजह से. वह भी हलकी मुस्कराहट के साथ चूल्हे के सामने आती उसमे patti-adrak डालने लगी. मंजू चुप कड़ी बस देख रही थी की मेनका को चाय की पड़ी है ऐसी गंभीर बात कहने के बाद. लेकिन उसको जवाब जल्द हे मिल गया.

"मेरा परिवार सिर्फ वही 4 लोग नहीं है जिन्हे तुम जानती हो. ये भी उतना हे बड़ा है जितना अर्जुन का, शायद उस से भी कही बड़ा. लेकिन यहाँ फॅमिली ट्री सुनाने की जगह मैं मुद्दे की बात करती हु. मेरे बड़े भैया कोई महात्मा नहीं है जैसा अगर मैंने उनके मेहनत से मुझे पढ़ने, पालने के बारे में पहले बताया था. मैं खुद अँधेरे में थी मंजू. वह चाहते है अर्जुन को ख़तम करना और इसमें उनके साथ है मेरी बड़ी भाभी. ये भीम की पत्नी की बात नहीं कर रही हु मैं, यहाँ 4 और भाभियाँ है मेरी जिनमे से एक को मैं थोड़ा ज्यादा जानती हु और दूसरी के बारे में जानती हु लेकिन वह दिखी हे नहीं कभी ज्यादा. तोह 4 में से 2 भाभियाँ जो मेरी माँ की उम्र की होंगी, वह अपने बचो के साथ मिलकर चाहती है अर्जुन को ख़तम करना. वैसा मौका मिला तोह वह उसके परिवार के हरके व्यक्ति के साथ ऐसा करना चाहेंगे लेकिन अर्जुन का परिवार अपने आप में एक रहस्य है और साथ हे ऐसा किला जिसमे कोई खिड़की बहार नहीं खुलती जिसकी मदद से कोई भेद सके.", मेनका रामकहानी सुनते हुए रुक रुक कर मंजू को भी देख रही थी. फिर पानी में उबाल आने पर दूध डालती हुई मंजू को देखने लगी.

"और मेरे भाई को अब एक नै वजह मिल गई अर्जुन को जल्दी से जल्दी रस्ते से हटाने की. और एक वही लड़का है जिसको नुक्सान पहुंचते हे उसका परिवार बिखर जायेगा. मेरी बड़ी भाभियाँ कुनबे से बहार है और जितनी शातिर है वह मैं भी नहीं सोच सकती. लेकिन इस पूरे षड़यंत्र में उनके साथ और भी दरिंदे है. वक़्त काम है और जहा तक लगता है उनके लिए ये वक़्त सही होगा अर्जुन को शिकरण बनाने के लिए."

"और तुम इस सबमे कौन हो? तुम्हारी सच्चाई क्या है मेनका?", मंजू जो इतनी देर से सुन्न रही थी उसकी आँखों में आंसू थे और दर्द. कब उसने मेनका के दोनों हाथ कस के पकड़ लिए खुद वह भी नहीं जानती थी.

"बकरी थी मैं इस सबके बीच. एक मासूम सी बकरी जो कभी इधर बाँध दी कभी उधर. शेर को पकड़ने के लिए लेकिन अब बकरी भी उनके हाथ से बहार निकल आई है तोह छटपटाहट ज्यादा हो गई है. हो सकता है के अर्जुन के साथ मेरी भी आहुति दे दी जाये. वह ज्यादा ठीक रहेगा उस से जो मैं सपने में भी खुद के साथ होने वाले अंजाम से खौफ खा रही हु.", मेनका की हालत और बात ने मंजू को फिर से वर्तमान में ला कर पटक दिए.

"वह क्या करने वाले है? और कैसे?", मंजू ने खुद को सँभालते हुए अब समझना हे बेहतर मन.

"वह शहर में तोह ऐसा कुछ कर नहीं सकते और अर्जुन को बहार बुलाने के लिए उन्हें जरुरत पड़ेगी एक बड़े चारे की. और अगर उन्हें इतना हे पता है तोह वह मुझे या तुम्हे उठाएंगे. हो सकता है किसी और को भी जो गलती से उनकी नजर में आ गया हो और जानकारी ले चुके हो उसके बारे में. लेकिन सबसे आसान मैं हु और अर्जुन को तुम जानती हे हो के वह मदद करने से कभी पीछे नहीं hat-ta तोह अगर किसी की जान खतरे में पड़ने पर वह अपनी भी डाव पर लगा देगा. देखो मंजू, इस खतरे के टालने के बाद तुम मुझसे जो भी पूछोगी मैं सब बताउंगी लेकिन फिलहाल हर चीज को गौर से समझो और बताओ के ये मौका हे क्यों ठीक है.", मंजू उलझन में पड़ गई और मेनका चाय को 2 गिलास में डालती खुद भी सोच रही थी. चाय लिए वह अपने कमरे में चल दी और पीछे गुमसुम सी मंजू.

"अर्जुन के घर में इस वक़्त उसके papa-chacha और ताऊजी नहीं है और भैया भी. दादा जी हमेशा घर रहते है और बुजुर्ग है. कल सुबह तोह बाकी के सभी लोग भी नहीं होंगे क्योंकि सब हमारे गाँव जाने वाले है और फिर शहर. मतलब अगर अर्जुन के साथ कुछ होने वाला है तोह .."

"हाँ मंजू, मुझे भी चची से पता चला था के वह लोग मंगलवार को घर नहीं होंगे और जिनसे सब डरते है वह पहले हे देश से बहार है. अर्जुन किस वक़्त घर नहीं होता?"

"सुबह से लेकर दोपहर तक वह स्कूल होता है और फिर शाम को स्टेडियम. स्कूल के पास कोई इतनी हिम्मत नहीं करेगा क्योंकि वह घर के पास है और स्कूल के बराबर हे थाना भी है. वह आप भी होंगी और अर्जुन भी. ये बात तोह आप भी जान लीजिये के वह कोई बचा नहीं है अगर उसके सामने किसी ने आप पर या मुझ पर हाथ डाला तोह वह सामना कर सकता है."

"जवान लोगो में यही प्रॉब्लम होती है के वह जल्द होश खो देते है. जिनसे खतरा है वह लोग दिमाग से इतने शांत है के सालो से वह जैसे बाहरी दुनिया से अलग हुए पड़े है. रही बात जोश और ताक़त की तोह एक जानवर बड़ी भाभी के पास है बिजेन्दर के रूप में और दूसरा मेरे भैया भीम. वैसे वह न भाई कहलाने लायक है न भीम, दुर्योधन ज्यादा ठीक रहेगा. और शेर को मारने के लिए कई जगह बड़े कुत्तो का प्रयोग भी होता है. अगर अर्जुन तुम्हारी सोच में कही ज्यादा हे मजबूत और दिलेर है तोह मैं भी चाहूंगी के तुम्हारा कहना हे उचित हो. बस घिनोने दिमाग ज्यादा आगे न सोचे बैठे हो.", मेनका अपनी तरफ से जितना बताना चाहती थी उतना बता चुकी थी.

"वह लोग किसी को स्टेडियम भेजेंगे. अर्जुन का वही ठिकाना है जहा उसके aas-pas वह लोग नहीं होंगे जिनकी वह परवाह करता, जैसा वह लोग सोचते है. प्रीती कल होगी नहीं और मैं यहाँ तुम्हारे साथ रहने वाली हु."

"तुम्हे जाना हे होगा मंजू. ये तलवार ऐसे जाने कब तक लटकती रहेगी. मुझे वह यहाँ से ले जाये तोह तुम कानून का सहारा लेना और अर्जुन को वही रोके रखना. सिर्फ यही एक तरीका है जिस से मैं उसको बचा सकती हु और बाकी सबको उनके अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है.", मेनका ने जैसे ठान लिए था के अब भी वह अर्जुन को इस सबसे बहार हे रखेगी, उसके साथ जो होता है हो जाये.

"अगर वह ऐसे लोग है तोह कानून में भी कही न कही उनकी पकड़ तोह होगी हे. और आप हे नहीं रही तोह फिर सब व्यर्थ हो जायेगा. ऐसी क़ुरबानी वह भी आप अर्जुन के लिए देने को तैयार है?"

"जान तोह बहोत छोटी चीज है मंजू, उस लड़के और पूरे परिवार के लिए तोह हर रोज मरना भी क़ुबूल है मुझे. उनकी अपराधी भी हु और मुरीद भी."

"ठीक है फिर आप घर रहेंगी और मैं स्टेडियम लेकिन कुछ बदलाव के साथ.", मंजू कुछ विश्वास से इतना कह कर वह से उठ कड़ी हुई.

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"मौसी, आप आज dhaniye-hari मिर्च की चुतनये बनाओ तोह खाने का ज्यादा मजा आएगा.", अर्जुन कुछ देर तक सरोज मौसी के साथ गौशाला में टहलता रहा और फिर जब उन्होंने खाने का पुछा तोह अर्जुन ने अपनी प्यारी मौसी से फरमाइश कर दी. घर से निकलते हे वह आधे घंटे में यहाँ पहुंच गया था और उम्मीद के मुताबिक मौसी पहले से वही मिली थी. आज पिछले दिन से भी कही ज्यादा खुश और मुस्कुराती हुई.

"हाँ तोह मेरे लाडले के लिए इतना तोह कर हे सकती हु. बस थोड़ा इन्तजार करना पड़ेगा क्योंकि खेत तक आने जाने में समय लगेगा और बनाने में भी.", सरोज मौसी को निहारता हुआ वह उनकी बात भी सुन्न रहा था.

"फिर खेत पे हे खाएंगे खाना. इतनी देर में भूख भी लग हे जाएगी और वह ज्यादा सुकून होगा इधर से.", अर्जुन की बात का मतलब समझती वह हलकी सी लाल होती अपनी सादगी भरी मुस्कान से उसको देखने लगी.

"खेत का रास्ता इधर से भी है. चलो फिर वही बैठ जाना.", मौसी ने वह कच्चा तार वाला दरवाजा दिखते हुए साथ चलने को कहा.

"आप चलो मैं जरा एक बार ये सब देख कर आता हु. मौसी, उधर पानी की व्यवस्था है क्या?", अर्जुन की ऐसी बात पर वह थोड़ा हैरान हो गई.

"मेरा मतलब पानी की टंकी या नहाने की जगह से है मौसी. वह थोड़ा मिटटी और पसीना होने की वजह से. आप चिंता मत करो अगर नहीं है तोह मैं इधर नाहा लूंगा."

"बीटा पूरी हौद है वह पर और मोटर भी लगी है. यहाँ फिर मिटटी में गन्दा होगा लेकिन खेत में एक हिस्सा सिर्फ रहने के हिसाब से तैयार किआ हुआ है. चल तू जब दिल करे आ जाना. ये सीधा चलते हुए वह नीम के पेड़ के पास आ जाना, बगीची और कमरा वही है.", अर्जुन जानता था उस जगह को कही ाचे से लेकिन फिर भी ध्यान से देखने का दिखावा करता वह 400 गज़ की दुरी पर निगाह मरता सर हिलने लगा.

"ठीक है आप चलो मैं भी आता हु. और इन्हे खुल्ला हे रहने दू न.", दोनों कुत्ते आज अर्जुन के पास हे घूम रहे थे जिनके लम्बे बाल वह सहलाता हुआ मौसी से पूछ रहा था.

"हाँ. लेकिन ये बंद करके आना नहीं तोह खेत में हे आ जायेंगे ये.", दरवाजा खोलती वह आगे गई इधर अर्जुन ने वह जंजीर वापिस बंद करते हे दोनों कुत्तो की गर्दन बाहों में लेते हुए प्यार से कहा.

"अब तुम लोग मस्ती करो और मैं काम करता हु.", चारपाई पर रख दूध का डब्बा बड़े बर्तन में खली करता वह उस दूसरे कमरे में घुस गया और ये दोनों बड़े कुत्ते उस बर्तन से जा लगे. जैसे जल्दी हे दोनों ने अर्जुन को अपना ख़ास दोस्त मान लिए था. चाबी बहार निकलते वक़्त भी अर्जुन ने उसको कपडे से हे पकड़ा था और अब अंदर वाले रस्ते से हे वह कुत्तो के जाली लगे कमरे में आ गया था. 8क्ष10 का ये कमरे बहार से जैसे आधा हे दीखता था सेहत लगे दरवाजे की वजह से लेकिन अंदर वह एक हे था जैसे दूसरा दरवाजा एक भ्रम हे हो. 2 लोहे के पति इधर कोने में राखी थी जहा नजर नहीं पड़ती थी. चाबी आगे और पीछे से दांत वाली थी मतलब दोनों हे टालो के लिए.

'खुल जा sim-sim', अर्जुन ने मुस्कुराते हुए वह ऊपर वाला टाला खोला और अंदर ढेर सारे 'कोर्स' कंपनी की rang-birangi फाइल देख कर हैरान हो गया. ये वैसी हे गट्टे की फाइल थी जैसी कागज़ सँभालने के लिए dafta-school में प्रयोग होती है. कपडे से पहली फाइल को ऊपर उठाते हे उसपर लिखा नाम देख कर एक तरफ रख दिए. कोई रोशन था जिसकी फाइल थे. ऐसे हे 3-4 फाइल हटाने के बाद ये नाम पढ़ते हे अर्जुन ने उसको उठा लिए. 'सुशीला'. मतलब ये नाम वही था जो उसने फ़ोन पर सुना था. कोई 4 पैन और 6 तस्वीर देखने के बाद अर्जुन ने वह वापिस रखते हुए उसके नीचे वाली फाइल उठाई. अगले 10 मिनट में हे वह 6 फाइल अपने दिमाग में बिठा चूका था. उनको सही से वापिस रखने के बाद ये पति बंद करके उसने एक और रख दी.

'इतना झमेला है और कितने आराम से ये लोग रहते है जैसे इनसे ाची ज़िन्दगी किसी और की है हे नहीं. बेवकूफी भी है जो इतना सामान रखे बैठे है.', अर्जुन दूसरी पति खोलता यही कह रहा था खुदसे और इसमें ज्यादा चौकाने वाला सामान था.

"ये फोटो तोह मेरी और प्रीती की लेकिन इधर.? फिर पीछे लगा खून देख कर जैसे कुछ समझने लगा था के ये कैसे हांसिल की गई होंगी. एक पीले कागज़ में मुस्कान, शबनम, आकांक्षा की तस्वीर देख कर जैसे अर्जुन को झटका लगा. शबनम की तस्वीर तोह खुद उसने भी कल हे देखि थी और यहाँ वह पहले से हे थी लेकिन पीछे लिखा था अननोन. वैसे हे मुस्कान की तस्वीर के पीछे लिखा था लेकिन आकांक्षा की फोटो के पीछे पढ़ते हे उसने कुछ रहत की सांस ली. 'फ्रेंड'. एक और फोल्डर में वही पहलवान था जिसने विकास पर हमला किआ था. (बिजेन्दर) और यहाँ फाइल वाली सुशीला की एक फोटो थी (माँ), एक सेहतमंद तगड़ी युवती जिसका नाम लिखा था बबिता (बहिन) और फिर मोहर सिंह. यहाँ कुछ और भी फोटो थी जिनके ऊपर काला कांटा मारा गया था और सब अलग अलग तरह से राखी गई थी.

'मतलब अभी इन्हे मेरे बारे में भी उतना हे पता है जितना जरुरी है. लेकिन शबनम इनकी भी पहुंच से बहार रही है. लाल फोल्डर में मेनका के माँ और भाई की फोटो सुशीला के साथ लेकिन मेनका की फोटो मेरी वाली लिस्ट में. हम्म.. सही जा रहे हो पापा लेकिन अब नहीं फंसने वाला आपके चक्कर में. चल बीटा अर्जुन अब जरा मौसी का haal-chaal लेते है फिर मुस्कान का एहसान भी उतरना है.', सब सही से रखता वह बहार आ गया. इतनी हे देर में बदन पर पसीना पानी की तरह आ चूका था. चाबी वही रखता वह फिर से दोनों कुत्तो के साथ दिल बहलाने लगा. रबर की गेंद फेंकता और उन्हें बरी बरी से दौड़ता वह जैसे उन्हें थकना चाहता था या उनसे कही ज्यादा हे घुलना मिलना.

"अबसे ये गले में पत्ता नहीं pehan-na. चलो आराम करो दोस्तों.", दोनों की गर्दन से वह नायलॉन का चौड़ा पत्ता खोल कर दिवार पर टांगने के बाद वह भी खेत की तरफ बढ़ चला. अपने पिता के प्रति उसके दिल में आदर और बढ़ गया था सब jaan-ne के बाद और अब वह भी चाहता था के कुछ और फोटो पर लकीरे लगे लेकिन उसका हाथ खराब न हो. पिता के लिए वह वही छोटा बचा रहना चाहता था जो अब तक वह बना हुआ था.

"मौसी, लगता है ज्यादा परेशान कर दिए मैंने आपको. और यहाँ भी चूल्हा लगाए बैठी हो आप.", अर्जुन आसपास का ये jana-pehchana खूबसूरत माहौल देख कर थोड़ा तजा महसूस कर रहा था. वही सरोज मौसी आम के वृक्ष की ठंडी चाय के नीचे लकड़ी की पीढ़ी पर बैठी आता गूंध रही थी. भरी वक्ष उनके सूट के गले से 1/3 बहार निकलते हुए हिल भी रहे थे. फिर नजर घूमता वह उनके पास हे राखी ताज़ी चटनी और कड़ाही देखने पर मुस्कुराता हुआ इस बड़ी टंकी के पास आ खड़ा हुआ, उनसे 10 फ़ीट दूर. सीमेंट और ईंट की बानी ये मजबूत टंकी उसकी लम्बाई जितनी हे थी और ाची चौड़ी ऊपर तक लबालब भरी.

"तूने कहा परेशां किआ रे. मैं तोह खुश हु के तू इस बुढ़िया के कहने भर से उसके पास चला आया. इस बहाने मुझे थोड़ा काम भी मिल गया और आराम भी. अभी भरी है मैंने ये और तू इधर हे नाहा ले, मैं अंगोछा दे दूंगी पौंछने के लिए.", अर्जुन हँसता हुए कपडे उतार कर उस सन्न की रस्सी पर टांगने लगा जो शायद चाय में कपडे डालने के लिए हे 2 पैदा से बंधी थी. 15-20 वृक्षों से घिरा ये हिस्सा सचमुच किसी प्राकृतिक स्वर्ग सा हे था. आम की बोर की महक, बगीचे में लगे फूल और आसपास का saf-suthra ये पूरा हिस्सा अर्जुन के दिल को भ गया था. उसको जैसे पता हे न था के मौसी कबसे उसके लम्बे चौड़े शरीर को निहार रही थी. सिर्फ आधी जांघ तक का सफ़ेद रंग का इलास्टिक वाला कच्चा पहने वह एक छोटी बाल्टी से पानी निकल कर अपने ऊपर डालने लगा.

लम्बे बाल भीगने से अपनी पूरी लम्बाई दिखते उसके चेहरे को भी धक् गए थे. शरीर को ाचे से मसल कर वह 5-6 बाल्टी गिराने के बाद खुद को ऊपर से नीचे तक देखने लगा.

"मौसी सच में आपने ये जगह जन्नत सी बना राखी है. जाने कितनी म्हणत की होगी इसको इतना ख़ास बनाने में.", अर्जुन की सादगी से कही बात पर आते के ऊपर कपडा रखती वह भी हाथ धोने उसके पास आ कड़ी हुई. अर्जुन हाथ धुलवा रहा था और फिर से नजर उन सुनहरी खरबूजों पर जा पड़ी. एक डैम चिकने चमकदार उभार जैसे बिना कहे भी मौसी के जिस्म के प्रति बहुत कुछ कह रहे थे. अर्जुन के कच्चे में ना चाहते हुए भी उभार बढ़ने लगा जिसको देख कर मौसी भी मुस्कुरा उठी.

"ये तेरी मौसी ने अपनी लाड़ली के लिए खुद तैयार किआ था. हाँ वह बरगद सबसे पुराण है जिसकी वजह से बाकी पेड़ fale-fule और आज ये ऐसा हो गया. मंजू यहाँ तैरना सीखती थी जब 4 साल की होगी. फिर हमने इस से बड़ी खेल (लॉन्ग ओपन टैंक) कमरों के पिछले हिस्से में बनवा के दी तोह वह घंटो लगी रहती थी उन 25 फुट को मापति. फिर वह यहाँ बस तभी आने लगी जब उसका थोड़ा अकेले रहने का मैं होता. खेल तोह 8 साल से सुखी पड़ी है. और तूने अगर ज्यादा हे मस्ती करनी है तोह इसमें बैठ जा, तेरी गाजर उठने लगी है.", मुँह पर हाथ रख के हंसती हुई वह टंकी से पानी अर्जुन के मुँह पर फेंकती पलट कर जाने लगी.

"आप भी साथ हे आ जाओ अंदर इसके. क्या पता ये बैठ जाये.", अर्जुन से इतना खुल्ले निमंत्रण की उम्मीद उन्हें न थी लेकिन वह हंसती हुई आगे चल दी.

"खुद बिठा ले इसको बीटा, बुढ़िया के साथ कही फिर ये रूठ हे न जाये.", उनका इतना खुशनुमा स्वभाव देख कर अर्जुन भी हँसता हुआ उस बड़ी टंकी में उतर गया.

"मौसी मुझे तोह लगता है के मंजू की वजह से ऐसा कह रही हो आप. लेकिन वह बेटी नहीं लगती आपकी अगर लम्बाई और आँखे हटा दे. आप 30 से कही ऊपर नहीं दिखती और उसकी तरह दुबली पतली नहीं हो.", अर्जुन इतना कह कर डुबकी लगता खड़ा हो गया.

"हवा में न चढ़ा अब इतना भी. शादी के समय मैं भी मंजू जैसी हे थी लेकिन फिर जाने कब चर्बी चढ़ गई. तेरे मौसा का तोह कहना के मेरी अब नानी ban-ne की उम्र हो गई है तोह अब मैं kaam-dhaam भी बंद कर दू."

"मौसा के लिए तोह मैं कुछ नहीं कह सकता क्योंकि वह बड़े है. लेकिन इतना कहूंगा के आप जैसी बीवी हो तोह पति घर से घंटे भर भी दूर न रहे. सब काम भी करती हो ghar-pariwar, khet-khalihan का और mausa-manju का भी लेकिन फिर भी हरदम मुस्कुराती रहती हो."

"बड़ा जानता है रे तू अपनी मौसी को.", सरोज मौसी अब सलाद के लिए कुछ हरे प्याज और गोल छोटे खीरे टॉड रही थी.

"मौसी, दिल की बात कहु तोह आपके कॉलेज में अगर मैं भी होता न उस वक़्त तोह पक्का भगा ले जाता मैं आपको. अब तोह मौसा जी ले उड़े और मैं जरा देर से पैदा हुआ.", हँसता हुआ वह बहार निकला तोह मौसी ने सर पर चपत लगते हुए वह सफ़ेद गमछा और टोलिया उसको पकड़ा दिए.

"तेरे मौसा तोह वैरागी हो गई जाने उन्होंने क्या देख लिए मुझमे. चल गमछा बाँध ले और मैं रोटियां पका लू फिर खाने के बाद बातें करेंगे.

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गोलू और बिजेन्दर अपने साथ 2 और साथिओ और एक मजदूर से आदमी को लिए जीप से इस सुनसान सड़क पर बानी एक मंजिला गोदाम जैसी एक मंजिला इमारत के बहार आ खड़े हुए. दड्टयकार शरीर वाले बिजेन्दर ने टाला खोलने के बाद एक हाथ से हे उस 20 फ़ीट चौड़े शटर को ऊपर उठाते हुए रास्ता खोल दिए. गोलू ने भी जीप सीधा अंदर करने के बाद उतर कर बिजेन्दर को थोड़ी हैरानी से देखा.

"भाई ेब कोनसा काम पकड़ लिए यु? इस वीराने में ाँ के पाछे के मज़बूरी हो गई.?"

"आजा मेरे यार जरा इसने थोड़ा संवार देवा. ोये थाम दोनो मांगेराम के साथ मिलके वह अगले हिस्से ने थोड़ा ठीक करवा दो ार गाडी में लट्टू (बल्ब) पड़े है वह लगवा डीओ. मैं ार गोलू जगह jaanch-padtaal कर लेवा.", उसके कहते हे वह तीनो लोग फुर्ती से काम में लग गए. यहाँ अंदर आते हे 30 फ़ीट तक पक्का फर्श और आगे कच्ची जमीन जिसपर झाडिया उग्ग आई थी. अंदर हे एक तरफ बड़ा खली सा उजाड़ प्लाट था जहा 2-3 पेड़ लगे थे और एक तरफ बंद स्टोर या बाथरूम जैसा कुछ था. इधर आखिर में ऊपर जाने के लिए बहार से हे सीढिया लगी थी लेकिन जर्जर हालत में. हाथ लगने भर से वह गिर सकती थी.

"एहसा के काम हाथ लगया भाई के आड़े ाँ की लोड पड़ गई? यु तोह बहुत बड़ी जगह है.", गोलू अब उसके साथ वो कच्ची जमीन से गोदाम के अंदर आ गया था जहा 20क्ष90 फुट का ये बड़ा हाल अब थोड़ा रोशन था दिवार पर लगे 2 बड़े बल्ब की रौशनी में. आगे की तरफ मांगेराम कूड़ा एक तरफ करता हुआ जले भी हटा रहा था. बिलकुल आखिर में यहाँ टूटे कांच की खिड़किआ और 2 कमरे बने थे. और एक तरफ शौचालय.

"काम बड़ा है भाई और जितने लोग यहाँ है हम सबने हे यु काम अंजाम देना है. कड़े से भी हलकी सी गलती का मतलब थाम सारे मेरी माँ ने जानो हे हो. मार देगी बिना सवाल जवाब के.", फिर कुछ देर तक वह बाकी चारो को बड़ी गंभीरता से सब समझने लगा और फिर एक कमरे में चल दिए गोलू को लिए. इस वर्षो से बंद कमरे में एक दरवाजा बहार गली में भी निकलता था और अंदर की दिवार पर ये कला डेढ़ फ़ीट का शीशा लगा था जो बहार से पुराने आईने जैसा था. ध्यान से खुद उसको साफ़ करके वह बहार खड़े तीनो को देखने लगा.

"यार यु छोरा स्टेडियम में से आरर मैं देख चुक्या हु इसने. बड़ा भला छोरा है और उसकी खातिर इतना झंझट. मारना हे है तोह साले ने उठा लेते स्टेडियम के बहार ते और नहर में फेंक देना था. बेरा नई ताई (सुशीला) के पकाना चाहवे है.", गोलू कमीज झाड़ता हुआ वह बहार के दरवाजे से गली देखने लगा.

"भाई माँ ज्यादा न बोलती लेकिन इतना जरूर बताया के यु छोरा उनका हे है जीना ने मेरे पिता ार दादा टी मारा था. ार इंग्लैंड वाली मौसी इसके खून के बदले अपना गाम का हिस्सा भी माँ ने दें लाग ऋ है. 5 करोड़ के साथ अपनी बेटी क्या ब्याह मेरे गइल. लेकिन मैं इस सबमे इस खातिर शामिल कोन्या. तू तोह जाने है के लुगाई मेरे काम की कोणी और पीसा मेरे दादके में भी बहोत है और नानके में भी.", बिजेन्दर थोड़ा गंभीर हो गया था अपनी बात कहते हुए. गोलू भी अपने दोस्त के कंधे पर हाथ रख के जैसे उसको आगे बोलने को कहने लगा.

"भाई मेरे टी बेरा है के तुह moh-maya ते घणनि दूर है. हम सारे तोह दारू भी पी लेवा है ार कड़े हाथ लगे तोह कोई कबूतरी भी खेत में पकड़ लेवा है. तू कड़े एहसा कोई काम नई करदा."

"मैं भी प्यार करू सु रे गोलू. मेरा जी भी करे है के ब्याह करू, खेती सँभालु ार बालक पैदा करके परिवार बनाऊ. फेर तेरे गइल दारु पी के घर जाऊ तोह मेरी जान मैंने अपने हाथ तेह टूक खिलावे आरर कोली भर के मेरे ते चिपट के सोवे. लेकिन वा भी शरत रखे बैठी है के ब्याह जड़ करेगी जइब मैं शंकर के छोरे की छाती पाद उसने ख़तम करूँगा.", बिजेन्दर जैसे एकाएक दिल की गहराई से बोलने लगा था. अपनी ज़िन्दगी का सच जो कभी वह कह न पाया था और इस काम से पहले वह अपने राजदार को बता के हल्का होना चाहता हो.

"भाई तू करेगा यु और मैं तेरे ब्याह में सर पे बोतल रख के गाम का चक्कर लगाऊंगा. गोलू अपने यार के खातर किसे तेह भी टकरान ने तैयार है."

"गोलू शर्त का दूसरा भाग भी है एक. जे मेरी ार उस लड़के की मुठभेड़ हुई तोह जितना टेम मेरे बाप टी शंकर ने दिए था उतना मैं भी उस लड़के ने दूंगा, जोर आजमाइश का. वह जीत गया तोह ... मैं सब हार जाऊंगा."

"तू बेबे तेह प्यार करे है भाई?", गोलू अब हैरान हो गया था क्योंकि अगर किसी ने ऐसी शर्त उसके दोस्त के साथ राखी है तोह वह लड़की भी बिजेन्दर जितना जानती थी यार उस से ज्यादा हे.

"हाँ भाई. बबिता मेरा प्यार और दुनिया है. मैं अर्जुन ने कोणी मारना चहु न हे शंकर ने. मेरे baap-dada की लड़ाई जिसमे वह खुद गलत थे और उन्हने हे सब शुरू किआ था तोह मैं किस तरिया कह डीयू के मैं सही कारन लाग रहा हु.? शंकर आरर उमेद चाचा ने हे 5 साल की उम्र में मेरे शरीर पर माटी लगाई थी अखाड़े की फेर एक साल में सब बदल गया. मधुलता चची मेरी माँ की वजह तेह शंकर की न हो पाई, मेरे बाप ने रामेश्वर जी पे गोली चला दी, रघुबीर ताऊजी का छोरा मार दिए और 15 आदमी जिन्दा जला दिए 4 जाना ने मिलके, राममेहर नाना के लाडले ने बलात्कार की गवाही का बदला लें के चक्कर में सारा सत्यानाश कर दिए. दादी बहोत प्यारी है रे मेरी लेकिन माँ ज़िद्दी है ार बेबे उसकी भी माँ है.", बिजेन्दर ने दिल हे खोल के रख दिए था गोलू के सामने.

"भाई यु तोह मैंने जमा भी कोन्या बेरा था. इतना बड़ा घमासान हो राख्या है और फिर विकास के गइल तेरा पन्गा कुश्ती तोह कोणी हो सके है. जब इतनी बड़ी बात तू माफ़ कर सके है तोह विकास की पहलवान सिलेक्शन पे एहसा कदम उठाना जांचे कोणी.", गोलू को अपने यार का दर्द आज पता लगा था.

"वह भी आपने हे है रे. उसपे हुम्ला न करता तोह वह मर्डर जाता बेमतलब. मोहर मामे की लुगाई आरर विकास की माँ बहिन थी, वह दिन बिठाये बैठ्या था उसका आरर हमारी हरकत ने सबके कान खड़े कर दिए. नहीं तोह मां तोह विकास ने ख़तम करके अपना बदला लें मैं सफल हो जाता."

"तू अर्जुन ने मारेगा फेर?"

"भाई गोलू, देखूंगा के कितना मुक़ाबला कर सके है लेकिन भीम जान लेवेगा उसकी. शमा मांग के खून हाथ पे लगा लूंगा. फेर मेरी माँ ऍन्जा राजपाट संभाले आरर मैं मेरी जान ने लेके जम्मू. चाल ेब देखा जरा के कुछ कर लिया इन्हने. एक कुर्सी आरर रस्सी भी रखवा दे आड़े.", बिजेन्दर आगे चल दिए लेकिन गोलू जैसे खुद से बात करने में लगा था. 'तेरी कसम बेरा न भाई सबका के करवावेगी. वह जानवर महारे सबके बास तेह बहार है लेकिन तेरा दोस्त पाछे कोणी हट्टे. बबिता तोह तेरी हो के रहेगी.'

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दिन के 11 बज रहे थे जब अर्जुन और सरोज मौसी खाने से फारिग हो कर कमरे के अंदर फर्श पे दरी बिछाये लेते थे. बहार घनी चाय के बावजूद कुछ उमस और गर्मी बढ़ गई थी और अंदर इस बड़े कमरे में सीमेंट का साफ़ फर्श ठंडा भी था और हवादार भी जहा 2 पंखे चल रहे थे. अर्जुन को बड़े प्यार से खाना खिलाया तोह सरोज जी ने और उसने भी मौसी को वैसे हे अपने हाथो से तृप्त किआ था, मन करने के बावजूद. हलकी फुलकी मस्ती करते हुए दोनों अंदर आ गए थे क्योंकि सवेरे अँधेरे में उठने वाले ये लोग अब आराम की इत्छा लिए थे.

"मौसी आप भी ग्रेजुएट हो फिर आपने शादी ऐसे घर में कैसी की?", अर्जुन सर के नीचे तकिया लगाए छत्त को देख रहा था. बगल वाली दरी पर लेती सरोज मौसी करवट करती उसको देखने लगी

"2 बातें है जिन्हे तू भी समझ जरा सा. एक तोह मेरी पढाई की वजह थी तेरी माँ रेखा, और तेरे नाना के कहने पर हे मुझे 10 जमात के बाद कॉलेज की इजाजत मिली थी. दूसरा बीटा समय और माहौल. मैं ज़मींदारी वाले घर से हु जहा लड़की के सर पे 12 साल की उम्र में दुपट्टा आ जाता है और फिर 16 पार तोह शादी हो जाती थी उस बख्त. लेकिन पिता जी भी थोड़ा मान रखते थे तेरे नाना का तोह मुझे उन्होंने पद्य और 22 साल होने पर शादी कर दी. मेरी छोटी बहिन भी मेरे हे साथ तेरे मौसा के छोटे भाई से ब्याह दी और उस समय बस ज़मींदारी हे देखि जाती थी और ये लोग भी थे बराबरी के. पिताजी ने झट्ट शादी करवा दी."

"आपसे कुछ भी नहीं पुछा या सलाह ली किसी ने? और छोटी मौसी भी साथ हे?"

"बीटा सलाह, यहाँ तोह शकल तक न देखि थी मैंने इनकी और जरा सोच के पति ऐसे मिले जो सांझे घर की शर्म मानते 4 महीने बाद तोह मेरे करीब आये. छोटी तोह तभी जमीन का बहाना बना कर अपने पति के साथ इधर गाँव में आ बसी. मैं बड़ी थी और शांत रहने वाली फिर पति तोह नीरा जड़ मिला. खुद सोच जरा के मंजू और कोमल में कितना फरक है, जबकि शादी मेरी पहले हुई थी. और मंजू है ऋतू से कुछ बड़ी."

"फिर मौसी अब तोह मैंने किसी को नहीं देखा वह घर पे. मंजू के dada-daadi?"

"वह बीटा चल बेस थे. सास मेरी बीमार रहती थी तोह ज्यादा न जी सकीय और बाबूजी का एक्सीडेंट हो गया था. है मेरी माँ 2 साल पहले हे पूरी हुई है और पापा उनसे एक साल पहले."

"कितनी अजीब ज़िन्दगी है ऐसे तोह. मौसा को ऐसा तोह नहीं करना चाहिए. बीवी मतलब अर्धांगिनी, आधा शरीर और उसका ध्यान जरुरी है, सबसे जरुरी. इतने साल आपने फिर कैसे निकाल दिए?"

"बीटा तेरी माँ ने भी निकाल दिए बस फरक इतना है के शंकर जीजा की मज़बूरी थी जो दूर रहना पड़ता था और मेरे मिया जी तोह खलिहान का बोल कर जाने कहा कहा गायब रहते थे. अब भी तोह कुछ नहीं बदला है. मंजू से मुझे कभी शिकायत नहीं हुई और उसने भी घर के लड़के की तरह सब किआ है. बाप के लाड के नाम पर छोटी मोती फरमाइश पूरी होती रही और वह उतने में हे संतुष्ट. लेकिन रेखा और तेरी नानी ने हिम्मत दी थी की इसके साथ वह सब न हो जो मैंने झेला. लड़की खुद की अपनी पहचान बनाये, फिर जितना कर सकती थी किआ लेकिन आखिर में ये शादी वाली गलती हो गई."

"मौसी, दादाजी कहते है के गलत तोह कुछ होता नहीं बस परिष्तीत्ती और निर्णय होते है. हाँ उन्हें बदला जा सकता है अगर आप में बदलने की हिम्मत हो. इंसान का सबसे जरुरी हक़ है उसका अपने आप को बनाये रखना और जीवन को बेहतर करने के लिए हमेशा खुश रहना. बाकी सब चिंता है या चिंतन. देखा कभी आपने मुझे परेशां, अकेला या समझौता करते हुए.?", अर्जुन ने जान लिए था के मौसी का सर सख्त फर्श पर है. खुद को वैसे हे रखते हुए उसने अपनी ब्याह उनके सर के नीचे रखते हुए उन्हें थोड़ा आराम दिए. वह भी आराम से उसके साथ वैसे हे लेती रही, करवट अर्जुन की और किये.

"सब तेरे जितने समझदार नहीं होते रे. तू कितनो का ख़याल रखता है अभी से. अपने dada-dadi से लेकर घर के हर सदस्य का. बहार भी तू बदलता तोह नहीं होगा. हीरा और मोती किसी को ऐसे पास नहीं आने देते लेकिन तू उनसे भी घुलमिल गया. Insaan-insaan की बात होती है बीटा."

"मौसी ज़िन्दगी में जो आज है वह है, जो कल आएगा उसके लिए तैयार रहो लेकिन बेवजह परेशां होना ठीक नहीं. मैं कहा ख़याल रखता हु किसी का. सब मेरा हे ख़याल रखते है बदले में जो मेरे बस में होता है वह मैं कर देता हु. बस इतना सा हे तोह है. आप भी तोह मेरा कितना ख़याल रखती हो. सब chhod-chaad के इतनी म्हणत सिर्फ मेरे लिए की. इसलिए तोह कहता हु के आप बहोत प्यारी हो.", अर्जुन ने जैसे हे उनकी तरफ देखा तोह मौसी निरंतर बस उसके चेहरे को हे देख रही थी लेकिन करवट लेने से दोनों हे अब एक दूसरे से 6 इंच दूर थे.

"मैं भी बदलना चाहती हु लेकिन फिर सोचती हु तोह डर लगता है कही अपनी ख़ुशी के लिए ... और उनकी बात ख़तम होने से पहले हे अर्जुन ने प्यार से उनके होंठो का नमक चख लिए. वह पलभर सुन्न सी उसको देखती रही जो उन्हें चूमने के बाद भी प्यार से देखे जा रहा था.

"सोचना कमजोर करता है मौसी. आप मजबूर नहीं है आपका हक़ है मुझ पर. आपके निस्चल प्रेम के बदले मैं इतना तोह कर हे सकता हु. वह खालीपन बहोत तकलीफ देता है जिसके लिए आप खुद को जिम्मेवार मान कर बस ज़िन्दगी काट रही है. सबकुछ पास है आपके.", अर्जुन ने आराम से उनके बालो में लगा क्लिप निकलते हुए लम्बे बाल आजाद कर दिए.

"तू सच में बहोत प्यारा है रे.", इस बार उन्होंने एप नरम होंठ अर्जुन से जोड़ते हुए बाहों के घेरे में ले लिए था. उन्नत बड़ा सीना अर्जुन से दबता जैसे सालो से दबे प्यार की गर्मी महसूस करता सख्त होने लगा था. दोनों के बीच कही कोई जल्दबाजी न थी और अर्जुन भी बराबर प्यार से उनके होंठो को मुँह में लेता हुआ अपनी प्यारी मौसी को नए एहसास से भरने लगा. दलीप सिंह ने तोह कभी भी होंठो को गीला न किआ था लेकिन अर्जुन उनकी जीभ भी निस्संकोच अपने मुँह में भरता हुआ पीठ सेहला रहा था. सुधबुध खोटी सरोज जैसे अपनी जवानी का पहला सही अनुभव ले रही थी. पत्नी तोह वह दलीप की कितने हे सालो से थी लेकिन प्रेमिका वह आज बानी थी.

"तू बहुत कुछ जानता है रे.", इतनी देर बाद उनके मुँह से यही निकला और वह मुस्कुराती हुई अर्जुन पर जैसे निहाल हुए जा रही थी.

"मैं तोह बचा हु मौसी, आपके साथ khud-ba-khud हो गया ये.", अर्जुन उनके तगड़े शरीर को अपने ऊपर ले आया तोह वह और हैरान हो गई.

"ये कैसे किआ रे अब?"

"फूल सी तोह आप और इतनी दूर से ाचा भी नहीं लग रहा था.", अर्जुन ने कमर पर दोनों हाथ रखते हुए गाल चूमने के साथ हे कान में लटकती सोने की बलि के छेड़ पर जीभ फिरै और मौसी अंदर तक कांप गई. जीभ वह से घूमती कान की लौ पर आ रुकी जहा अर्जुन ने होंठो से चूमते हुए उनकी नंगी कमर पर अपनी उंगलिया ख़ास तरीके से फिरनी शुरू कर दी.

"अरे बीटा.. आठ.. तू तोह हाथ लगा के हे जान ले रहा है.. और ये इधर चूमने से तोह झुरझुरी होने लगी.", छाती के दोनों किनारो पर कोहनिया रखती वह उसके मुँह को इधर उधर जाने से रोकने के लिए फिर से होठो को पीने लगी. अर्जुन के साथ वह पहला चुम्बन इतना पसंद आया था के वह बार बार वही एहसास जीना चाहती थी. सिर्फ ढीले पाजामे में लेता अर्जुन भी उनकी इत्छा पूरी करता हुआ साथ हे सलवार के ऊपर से वह 46 के कूल्हे बड़े प्यार से दबाता लेता रहा. मौसी के कूल्हे भी उनकी तरह बेजोड़ हे थे. खास फुलावट और लम्बे तगड़े शरीर के अनुसार हे विशाल गद्देदार.

"मौसी सच कहु तोह आपकी म्हणत ने आपका शरीर भी निखार दिए है. अभी भी आप किसी लड़की से हजार गुना बेहतर हो.", अर्जुन का इशारा वह समझ गई थी और उसकी उंगलिया का अपने नरम कूल्हों में धंसना भी पसंद आ रहा था.

"इतनी हे म्हणत के बाद तेरा प्यार मिल रहा है तोह मैं संतुष्ट हु. वैसे तूने अभी मौसी को देखा हे कहा है रे. अब जब तेरे हे हवाले है तोह पूरा देख ले. सच कहु तोह तुझे देख के लगता है के मेरे इस बड़े शरीर को तू संभल सकता है शायद. तेरा पूरा शरीर भी कितना बड़ा और सख्त है. चेहरे से धोखा हो सकता है लेकिन बाकी चट्टान सा है जो मुझ जैसी 2 मैं (80) की औरत को ऐसे ऊपर लिटाये है. रुक जरा.", वह उठने लगी तोह अर्जुन ने उनकी कमर थपथपा दी.

"ऊपर हे बैठ के करो न मौसी.", वह शर्माती हुई फिर पीठ पे लगी छोटी चैन नीचे करने के बाद कमर से पकड़ कर अपने कमीज को जिस्म से अलग करती जल्द हे वापिस लेट गई. इतनी हे देर में अर्जुन ने देख लिए था उन पहाड़ से बड़े स्टैनो को जो जरा भी लटके न थे बस एक खास गोलाई और वजन से भारी जरूर थे. इस उम्र में भी निप्पल मटर के दाने जैसे और पूरा जिस्म साफ़ चिकना. छाती पर दोनों मुलायम मॉटे उभर दबते हे उसकी भी आ निकल ै.

"मौसी, आपने तोह बेटी पैदा की है फिर भी ये उतने बड़े नहीं है."

"इतने बड़े पूरे गाँव में नहीं होंगे और तुझे ये छोटे लगते है. बेशरम.", वह वैसे हे ऊपर से निर्वस्त्र लेती दोनों के निर्वस्त्र सीने की गर्मी का सुख ले रही थी. अर्जुन हर मायने में उनकी टक्कर का था. 46 के कूल्हे तोह थे हे वह चुके भी रत्ती भर न छोटे थे.

"मेरा मतलब है के आपके निप्पल. मंजू ने दूध तोह पीया होगा और मौसा ने भी तोह इन्हे सुख दिए होगा. लेकिन ये उतने भी बड़े नहीं है जितने दूध आने से पहले एक औरत के हो जाते है."

"धत्त. इतनी जल्दी ये देख लिया तूने.? मुझे दूध नहीं उतरा था कभी. रेखा ने पिलाया न अपनी लाड़ली को और फिर उसका पेट नई भरता था तोह वह गाये का पीती थी. आअह्ह्ह.. आराम से दबा रे. तेरी मौसी तगड़ी है लेकिन जिस्म 10 साल से अछूता है.", अर्जुन ने दबाव से लुढ़क कर बहार निकल आये एक बड़े गुब्बारे से चुके को हथेली में लेते हुए पिचकने की कोशिश की तोह वह भी दांग रह गया उन्हें इतना ठोस और भरा हुआ महसूस करके.

"मौसी ये तोह कोरे हे है जैसे लेकिन इतने बड़े."

"तेरे मौसा ने दबाये जरूर लेकिन पीये नहीं और फिर खुराक और मालिश से ज्यादा हे बड़े हो गए. आठ.. तू है जो उम्म्म इन्हे प्यार कर रहा है. बेशक पति हाथ नहीं लगता लेकिन शरीर मैंने हमेशा ध्यान से रखा है, इस आस से के कभी तोह सुख मिलेगा..", वह थोड़ा ऊपर हुई तोह अर्जुन ने दोनों हाथ से एक उभर को ऊपर करते हुए वह भूरा निप्पल होंठो में दबा लिए. मौसी खुद हे आगे सरकती उसके पेट से थोड़ा आगे आ गई थी. अर्जुन ने अब दूसरे को भी अंगूठे से सहलाते हुए कड़ा करना शुरू कर दिए.

"ठीक किआ मौसा ने फिर.", अर्जुन ने शरारत से इतना कहते हे दूसरे वाले को मुँह में भर लिए. वह सच में तरबूज से हे थे, hari-neeli नस्से और उतने हे बड़े गुब्बारे से लेकिन ठोस.

"आठ.. चल कुछ तोह ठीक किआ अगर तू कहता है तोह.. उम्.. ", आँखें बंद किये वह थोड़ा हांफने सी लगी थी. ये सनसनी एकदम अलग और तेज थी जो शरीर में अधिक भरने के बाद जैसे उनके पेट से नीचे उतरती हुई जांघो के बीच भूचाल ले आई थी. पंजे अर्जुन के सीने पर दबती वह रह रह का झटके खाने लगी थी और जब नशे से भरी आँखें खोली तोह हैरान रह गई.

"आह्हः.. ये क्या करने लगा है तू बीटा?", अर्जुन उनकी स्थूल मोटी जांघो के बीच बैठा कुछ देर तक कमर के ठीक नीचे उस 7-8 इंच के निशाँ को देखने के बाद नरम मांस को फैलते हुए 4 इंच लम्बी और जिस्म के अनुसार हे मोटी फूली हुई बंद छूट को निहारने लगा. छूट के इतने मॉटे और उभरे होंठ तोह कल्पना से हे परे थे. और वह मुलायम सिलवटे उनके नरम होने का संकेत थी. खुद को ढीला छोड़ता हुआ वह जैसे हे उन मॉटे मखमली होंठो को फैलते हुए छूट के अंदरूनी हिस्से पर होंठ दबाने लगा वैसे हे उनके चरम का रास मुँह में उतर गया. डिवनवर सा वह अपनी मौसी के यौनकुंड का पूरा रस जैसे चूसने हे लगा था. और उठने की कोशिश करती सरोज मौसी का जिस्म भी इतने अधिक मजे की वजह से फिर दरी पर लुढ़क गया.

"मौसी, ये तोह अभी तक जैसे कोरी है लेकिन हैं बड़ी मीठी और सुन्दर.", अर्जुन जैसे हे उनकी जांघो की तरफ से उनके ऊपर झुकता आया वैसे हे मौसी शर्म से दूसरी तरफ मुँह करती दिवार देखने लगी.

"तू क्या क्या करने लगा है रे. आठ.. गन्दा कही का."

"ाचा नहीं लगा क्या? वह तोह खुश हो रही थी और इतना ज्यादा हे खुश थी की दूसरी बार मुँह गीला कर दिए.", दोनों चुके वह मसलता हुए जैसे उनका मुँह इन स्टीयरिंग से घूमने लगा.

"बदमाश. आह. कोई वह भी ये सब करता है क्या? लेकिन पता नहीं क्यों ाचा लगा.", वह खुद अर्जुन के पाजामे को नीचे सरकने की कोशिश करने लगी थी.

"वैसे बताया नहीं के वह से अभी भी आप ऐसी कैसे हो?"

"मंजू ऑपरेशन से हुई थे रे. उसके बाद हे वजन बढ़ा था और वह तोह वैसी हे रहेगी जैसी थी. कोनसा उसके अंदर हमेशा कुछ घुसा रहता है.", शर्म अभी भी बहोत आ रही थी, शायद ज्यादा इसलिए क्योंकि के नया जवान लड़का उन जैसी तगड़ी और umar-daraj को 2 बार बिना हे मिलान किये झाड़ चूका था.

"अब जाएगा अंदर फिर वैसी नहीं रहने वाली. और मुझे तोह लगता है आपको मेरे लिए हे बचा कर रखा गया था. बाल भी नहीं है उधर तोह.", अर्जुन थोड़ा खुल कर मस्ती कर रहा था.

"शरीर भरी है न तोह बाल साफ़ हे रखने पड़ते है, वैसे भी आते हे कितने है. और तू क्या अंदर डालेगा जिस से उसमे बदलाव आ जायेगा रे?", वह होंठो पर हलके से दांत दबती अर्जुन को देखने लगी. महसूस तोह उन्हें भी हो रहा था वह सख्त मोटी लकड़ी सा डंडा अपने नरम पेट पर.

"आ पहले ये बांधो आँखों पर.", अर्जुन को शरारत सूझी और पजामा खोलने से पहले हे उसने मौसी की आँखों पर उनका हे दुपट्टा ाचे से बांध दिए. एक पल वह उनके इस भड़काऊ बदन को देखने लगा जो मुर्दे का भी खड़ा कर दे. फिर कमरे की खिड़की के पास राखी तेल की शीशी उठता वह खुद भी पजामा उतार कर उनकी जांघो के पास आ बैठा.

"तू क्या खेल खेलने लगा है रे? शर्म आ रही थी इसका मतलब अब आँखे हे बंद कर देगा?"

"मौसी, आप मेरी प्यारी मौसी हो न तोह थोड़ी देर के लिए बस ऐसे हे लेती रहो.", अर्जुन ने ठंडा तेल उनकी मोटी फांको के बीच धार से डालना शुरू किआ और दूसरे हाथ से ाचे से उतने हिस्से की मालिश करने लगा, बड़े हलके दबाव से.

"आठ.. मेरे लाडले तेरी हे है मौसी लेकिन तेल क्यों लगा रहा है? वह पहले हे गीलापन बहोत है. आठ लेकिन तेरे हाथो से भी ाचा लग रहा है रे.", मौसी तोह खुद हे पाँव फ़ैलाने लगी थी. कूल्हे इतने मॉटे थे की छूट का ऊपर हिस्सा 8 इंच ऊपर था जमीन से और आगे जहा तक चीरा जा रहा था उसके बाद दोनों कूल्हे आपस में बुरी तरह चिपके थे. अर्जुन ने वैसे हे उनकी छूट में अपनी तेल से सनी ऊँगली दबाई तोह वह प्यार से अंदर बैठने लगी. छूट का अंदर का हिस्सा भी पूरी फुलावट लिए गेली सा नरम था.

"उम्... तेरी तोह ऊँगली भी मजा दे रही है. .आठ.. मेरे मुँह पर भी कपडा बांध दे रे. बेशरम होती जा रही हु मैं"

"मौसी आँखें बंद इसलिए की है के मुँह खोल सको. अब महसूस करना क्या अंदर करने वाला था मैं.", अर्जुन ने अपना सूपड़ा चिकना करने के बाद 2-3 बार उनके भरी कूल्हों के बीच फंसते हुए जैसे पूरा उत्तेजित करना हे ठीक समझा. उसको ये तरीका माँ ने सिखाया था और अपने खुल्हो के बीच इतना मोटा गरम गोला सा महसूस करते हे मौसी भी उत्तेजना से उसको दबती हुई बाकी काम कर रही थी. आकृति से तोह उन्हें भी पता चल गया था के वह क्या चीज है लेकिन आकर से खौफ पैदा होने लगा था. जैसे हे वह लाल दहकता हुआ लुंड छूट के सामने आया तोह अर्जुन ने मोटी उभरी छूट की लकीर में उसको दबाते हुए ऊपर नीचे करके बता दिए था के मौसी का सोचना सही है.

"ये.. ये वही है जो मैं सोच रही हु? तेरा कुछ अलग हे है बीटा.", अर्जुन मुस्कुराते हुए उनके ऊपर लेटने लगा. नरम शरीर पर जब उसका चौड़ा शरीर चा गया तोह एक हाथ से उनकी रस बहती मुनिया के छोटे से छेड़ पर बड़े देसी टमाटर सा सूपड़ा दबाये रखते हुए उसने धीमी आवाज में कहा.

"अब वह बदलने वाली है मौसी लेकिन आपका शरीर झेल लेगा. थोड़ा दर्द जरूर होगा.", इसके साथ हे उन्हें कुछ बोलने देने से पहले हे होंठो को कस के मुँह में दबाता हुआ वह अपनी कमर एक माध्यम से धक्के से आगे ठेलता हुआ उनके कंधे को जमीन से लगता रुक गया. छूट बेशक कच्ची न थी लेकिन सूपड़ा जरुरत से ज्यादा हे भयंकर था जिसने बंद गुलाब की डोड्डी से छेड़ को फैलते हुए खिले हुए गुलाब सा चौड़ा दिए था. मौसी तद्फी लेकिन अर्जुन ने उन्हें काबू किये रखा. पूरा सूपड़ा और उसके आगे का एक इंच हिस्सा अंदर भूचाल ले आया था. अब लुंड से हाथ हटाता वह बड़े आराम से उनका वह बया उभर मसलता हुआ भूरे निप्पल को सेहला रहा था.

"ये क्या कर दिए बीटा.. आह्हः.. माँ.. भैंस का खूटा तोह नहीं बाद दिए रे अंदर...", होंठो अलग करते हुए उन्हें साँसे खुलकर सांस लेने देता वह अब कंधे पर रखा हाथ उनके चेहरे पर फिर रहा था. जहा दर्द और पसीना चाय था.

"मौसी, अगर ऐसा न करता तोह ये अंदर न ले पाती. बस थोड़ी देर बाद आप खुद साथ देने लगोगी.", अर्जुन को आशा थी की उनकी मोटी छूट थोड़ी हे देर में सब सेहन कर लेगी और फिर कख का सहारा लेता वह दोनों उभरे निप्पल चूसता हुआ उतने हे लुंड से चुदाई करने लगा.

"आठ.. दुखता है रे.. जैसे छूट हे बहार आ रही हो इसके साथ.. उम्.. थोड़ा प्यार से कर न.", धीमी गति से भी छूट में जलन हो रही थी जिसकी बड़ी वजह निचली किनारी से टपकता खून था. छूट का मांस थोड़ा बहार आता और फिर अंदर चला जाता लेकिन जल्द हे तेल और चुतरस के मिश्रण की वजह से वह भैंस का खूटा आधे के लगभग अंदर उतरने लगा था. चुके फिर से फूल कर कसने लगे और अब दर्द की आवाज में हल्का खुअमार आने लगा था.

"मौसी सच में आप न बिलकुल बंद जैसी हे हो. आह.. मेरा भी ये जैसे तैसे हे अंदर जा रहा है.", अर्जुन को जब मुश्किल होने लगी तोह मौसी ने खुद घुटने ऊपर करते हुए उसको रास्ता दिए. बेशक दर्द था लेकिन वह जानती थी की आज पूरा मर्द मिला है जो उस से प्यार भी कर रहा है और ध्यान भी रख रहा है.

"उम्म्म.. अर्जुन.. आह.. इतने से हे कर रे. पता नहीं और ले भी सकेगी या नहीं. उम्मम्माह्ह.. थोड़ा कस के मसल बोब्बे.", अब वह थोड़ा खुलकर बोलने लगी और अर्जुन भी नरम जांघो के बीच हर बार थोड़ा आगे सरकता 7 इंच अंदर घुसाए छूट का रूप बदलने में लगा था. होंठ चूसता वह दोनों गुब्बारे ऊपर से निचे तक मसलता मौसी को वह सुख दे रहा था जिस से पूरी तरह अनजान थी. उनके पति तोह बस सलवार खोली, अंदर डाला और कमीज के ऊपर से हे चुके मसल कर अंदर खली हो गए वाला कार्यक्रम हे जानते थे लेकिन अर्जुन कामकला में मौसी को नए हे आसमान में ले आया था.

"मौसी उम्म्म.. आपको ाचा लग रहा है न अब.?", चिकनाई और शरीर के इतने गदराये होने की वजह से अब लुंड कुछ आराम से 5-6 इंच तक अंदर बहार होने लगा था. अंदर की दिवार से रगड़ता वह अपने साथ हे छूट की सफ़ेद बहार जमा करता मौसी को फिर से स्खलन पर ले आया.

"आअह्ह्ह्ह.. माँ... अर्जुन.. अब बहुत तेज कुछ निकलने वाला hai..aahhh..", और सचमुच इस बार जैसे बरसात सी होने लगी थी अंदर. कॉमर्स का चिदड्रा जैसे पूरा आज हे खुला था और इतनी मात्रा में किसी को झड़ते अर्जुन ने दूसरी बार देखा था लेकिन ये फिर भी कही ज्यादा हे था. लुंड बहार खींचते हे 'पुक्क' की आवाज हुई और हलके दर्द के बाद शरीर शांत हो गया था मौसी का. अंगोछे से अपना लुंड और छूट को साफ़ करते हुए उसने कपडा गीला करके और बेहतर तरीके से सब निशाँ साफ़ किये. 10 साल से बंद वह गुलाबी पत्ते अब छूट का मुँह खोले फिर से बहार झाँक रहे थे. रंगहीन तरल रह रह कर बूँद के रूप में बहार निकल रहा था. अर्जुन ने फिर से थोड़ा तेल सुपडे पर लगाने के बाद मौसी को करवट के बल कर लिए और खुद सामने आ कर वह भरी पत् अपनी टांग पर रखता थोड़े काम दबाव से हे फिरसे उनकी नरम संकरी छूट में लुंड भरता लिपट गया. दुपट्टा अब खोल कर एक तरफ रख दिए था.

"सीई.. आह्हः. इतनी उम्मीद न थी रे.. आठ.. पेट तक लगता है ऐसे करने से और तेरा ये है कितना बड़ा? माँ...", अर्जुन उनका एक विशाल कुल्हा दबाता नीचे से दोनों के कमर चिपकाये आराम से पूरा अंदर करके एंड छोटे लेकिन गहरे धक्के दे रहा था.

"मौसी उम्म्म.. सच कहु तोह आपसे पहले भी मैं हमबिस्तर हुआ हु.. आठ.. लेकिन वह लड़की सुन्दर बहोत थी पर आपका मुकाबला वह सपने भी नहीं कर सकती.", अर्जुन की ऐसी बात सुन्न कर मौसी भी शरमति सिसकती उसके गले लग गई. ऊपर वाले हाथ को अब वह कूल्हों की दरार में दबा रहा था लेकिन आधी उंगलिया दरार में धंसने के बावजूद वह उनके छेड़ से दूर हे रहा. वह की नर्माहट और चिकनापन अर्जुन को और उत्तेज्जित कर रहा था. लुंड जल्द हे फटने की हालत में आने लगा जो अर्जुन के लिए थोड़ा हैरानी की बात थी. वह मिलान को आधे घंटे तक लेके जा सकता था लेकिन इतने कसाव और गीलेपन में मौसी का भारीपन भी उसके लुंड को दबोचता हुआ मंजिल पर ले जाने लगा था.

"उम्म्म.. बीटा .. आह्हः. 10 साल बंद रहने से तोह नदी भी भर जाती है ये तोह छोटी सी छूट है. आह.. लेकिन तू मममम.. स्सीइ. तू प्यार करना बड़े ाचे से जानता है.. मैं इतनी जल्दी फिर से आने लगी हु.. आठ.."

"मौसी ढीला chhodo..aahh.. मेरा..

"अंदर हे भर दे रे.", वह जैसे काम्पी थी उनकी पकड़ में अर्जुन भी हिल न सका और शरीर की साड़ी ताक़त जैसे लुंड से निकलती मौसी के अंदर बाहरणे लगी थी. शरीर उसका भी रह रह कर झटके खा रहा था. 5 मिनट तक दोनों हे अचेत से एक दूसरे से लिपटे रहे और सरोज को ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने छूट में गरम पानी का नल खोल दिए हो. सफ़ेद रास में लिथड़ा वह अत्यधिक मोटा लिंग बहार निकलते हे वीर्य का ढेर दरी पर जमने लगा.

"हे राम.. तू घोडा है जो इतना पानी निकलता है.?", लेकिन अर्जुन शांत लेता मुस्कुराता रहा. सरोज भी उठने की असफल कोशिश करने के बाद अर्जुन के सीने पर लुढ़क गई. आँखें बंद किये भी वह उनके गद्देदार चुचो को सहलाने लगा.

"ओह बेशरम. तू अभी तोह तबाही मचा के रुका है अब फिर से इन्हे मसलने लगा. आह.. सच में रे तूने क्या हाल किआ है मेरी दुलारी का...", उन्हें भी अर्जुन का सहलाना पसंद आ रहा था लेकिन वह शर्मीली औरत एक बार की चुदाई से हे उसका मुँह में तोह लेने नहीं वाली थी.

"ओह मौसी, आपके साथ तोह मैं हर घंटे बाद करने को तैयार हु. पता है पहली बार ऐसा लगा है जैसे मेरे शरीर से सारा रस निचोड़ लिए गया हो. लेकिन फिर भी दिल कहता है के रुकना नहीं है.", अर्जुन की बात सुनकर खुद मौसी ने अपना गाल उसके होंठो पर रख दिए.

"पता है तू मेरा हमेशा से चाहता रहा है. रेखा बोलती थी की मंजू उसकी बेटी है और मैं हमेशा उसको एक तरफ रखके तुझे अपने से लगा लेती थी. और कुछ समय के लिए दोनों दूर भी हो गई थी जब तू घर से बहार हो गया था."

"मौसी, मुझे पता है आप हमेशा मुझे मंजू से दूर रखती थी और सारा प्यार मुझपे लुटाती थी. कैसे भूल सकता हु के मंजू को आपने थप्पड़ मार कर उसकी kiss-miss मुझे दे दी थी. बहोत रोइ थी वह लेकिन बाद में मुझसे बोली थी की वह मेरे लिए हे लेके आई थी लेकिन माँ ने छिन्न के दे दी थी. आपको लगता है के मैं कुछ भूल सकता हु? वह घर आपने बाद में पक्का किआ है, पहले वह सामने आँगन होता था और पीछे कमरे. साथ वाला भी हिस्सा आपके पास था जहा अब पीला माकन है.", अर्जुन वैसे हे लेता अब बड़े प्यार से मौसी के बाल और सर सेहला रहा था.

"तुझे याद है ये सब?"

"मुझे तोह ये भी याद है मौसी के आप उस वक़्त हमारे घर आने के बाद कैसे दुपट्टा उतार कर रख देती थी. जैसे बोझ लिए फिरती हो."

"और मंजू?", अब इन 2 शब्दों ने अर्जुन के दिल में हलचल मचा दी थी. वह आँखें बंद किये बस खामोश हो गया था.

"तू मंजू की तरफ खुद हे खिंचा आया या वह आई थी?

"उसका गुस्सा वैसा हे है. ऊँगली दिखते हुए वह बोलती गुस्से में है लेकिन पता है वह ऐसा तब करती है जब उसको वह पसंद हो. मैं जरा देर से समझा था."

"और वह तेरे नाम का सिन्दूर लगाए हे फेरो से पहले हे ब्याह कर चुकी थी.", बम फोड़ दिए था मौसी ने जैसे ये बात कहके.

"ये कैसे हुआ? आपने खुद देखा ये सब?"

"शांत रह मेरे बेटे. वह जिसने देखा था वो रेखा थी. लेकिन उस से पहले मई तुम दोनों का प्यार सुन्न चुकी हु, ऊपर वाले कमरे में. रेखा ने कहा भी था के ये दोनों बर्बाद न कर दे सबकुछ क्योंकि वह तुझसे प्यार करती है और तू उसका हमेशा से लाडला रहा है."

"मौसी माँ को पता है ये सब?", अर्जुन के पसीने जहा से आ रहे थे वह नजारा नहीं जा सकती थी.

"वह पता है कौन है? जिसने तुंझे धड़कन दी है. एक तू हे है जिसकी वजह से रेखा खुश है और अब तू उसको वापिस खुशियां देने लगा है. घर आएगा तोह दिखाउंगी के वह खुद ये सिन्दूर वाली बात कहने के बाद तेरी फोटो दे कर गई थी. और हम दोनों के सपने उतने पूरे नहीं भी हुए लें तेरा और मंजू का प्यार बहोत है बीटा."

"मौसी वह मेरी पत्नी है और आपके होने वाली naati-natin की माँ. पहली बार तोह दिल नहीं पहचाना था लेकिन हम दोनों इस जगह हे थे जब मिलान हुआ था. मंजू खुद दिल में ऐसे उतर गई थी की मैं पचता रहा था."

"वह तू मैट हे कह बीटा. संभल लिए जायेगा सब और मैं जानती हु प्रीती तेरा अधिकार है, प्यार है और ज़िन्दगी. लेकिन मंजू की जितने नसीब में हो उतना साथ निभाना बीटा."

"मौसी, वादा करता हु की मंजू हमेशा सुहागन रहेगी. बाकी जो हो न हो. वह दूर रहे या करीब लेकिन आज आपसे भगवन को साक्षी मान कर कहता हु की मंजू पर मेरा अधिकार रहेगा. रामेश्वर जी की प्रतिज्ञा और मेरा उनको दिए वचन भी रुकावट बना तोह अर्जुन मिटत जायेगा लेकिन मंजू हमेशा अपने स्थान पर रहेगी.", अर्जुन इतना कह हे रहा था के मौसी ने उसके होंठो पर ऊँगली रख दी.

"वह मायने नहीं रखता अर्जुन, तुम्हे बस उस घर को सुरक्षित रखना है. मंजू की ज़िन्दगी वह खुद हे संवार सकती है लेकिन घर पर लगे ग्रहण को तुम्हे हटाना होगा. रेखा कहती है के उसका अर्जुन सबकुछ कर सकता है, तुम यही मेरे पास आ कर अपनी माँ को सार्थक करना. मैं समझ लुंगी की मेरी बेटी हमेशा सुहागन रहेगी और मुझपर तुम्हारा अधिकार ऐसा हे रहेगा. मैं खुद तुम्हे उस वचन से मुक्त करती हु. याद रखना के तुम्हारे दादाजी हे सबकुछ है.", मौसी इस वक्त अपना दर्द भूलती हुई उठ कर कड़ी हो गई थी.

"अब मौसी को भी प्यार करने लगे हो तोह साथ तोह चलो जरा.", अर्जुन उन्हें निहारता हुआ उठ गया.

"वैसे मौसी, मंजू आप पर हे गई है."

"हाँ पता hai.Shayad मेरे से भी खास है जो मेरी बेटी होने के बावजूद तेरा झेल भी गई और नौटंकी भी बरकरार राखी उसने. और तूने बाद में कुछ किया क्या उसके साथ?", मौसी अब कमरे के बहार कड़ी थी उसका सहारा लिए.

"वह कहती है के मेरे बचे की हे माँ बन्न न है उसको."

"जितना तू निकाल रहा है तोह मुझे खुद डर लग रहा है के कही तू माँ और बेटी दोनों हे न पेट से कर दे.", अर्जुन हँसता हुआ उन्हें उठा कर हौदी में घुस गया. पल भर के लिए पानी बहार उछला और फिर दोनों एक दूसरे से लिपटे सब भूल कर एक दूसरे में को चूमने लगे.

"तू बस वही कर जो तू चाहता है. सब झंझट के बाद मैं खुद कहती हु की जो तू चाहेगा वही होगा. बस लक्स्य मैट भूल.", मौसी ने उस ठन्डे पानी में हे उसका लिंग पकड़ कर अपने छेड़ पर रखते हुए आंखें बंद कर ली. सर्र से वह भयंकर नाग अपनी पसंद की जगह बैठ गया था

.

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गोलू कमर में छुरा रखे अर्जुन के आने की प्रतीक्षा कर रहा था जो घंटे भर पहले अंदर गया था. दोस्ती का क़र्ज़ अदा करने का वक़्त आ गया था.
 
Ok. एक अपडेट अभी दे रहा हु. दूसरा 1 बजे रात को
 
अपडेट 95

Daav-Pench


अर्जुन हमेशा की तरह शांत था जब घर पंहुचा. अभी साढ़े 6 बज रहे थे और पूरा हे दिन उसका उथल पुथल भरा रहा था. आचार्य जी, फिर मौसी के साथ वह खास समय बिताना और ढाई बजे घर आने के बाद फिर से मुस्कान से मिलने के लिए जाना. स्टेडियम में भी थोड़ा अधिक समय लग गया था लेकिन इतनी bhaag-daud के बावजूद न जिस्म में थकान थी न चेहरे पर कोई तनाव.

"हाँ तोह अर्जुन शमरा जी, अगर आपको ाचा लगे तोह कृपया इस बगीचे में भी थोड़ा पानी दे दो भाई. गर्मिया होने लगी है तोह इन्हे पे जरुरत होती होगी.", रामेश्वर जी chir-parichit आवाज देते हुए उसको ध्यान दिलाने लगे की और भी काम है उसके जिम्मे. वह भी टीशर्ट कुर्सी पर रखने के बाद जूते खोलकर बगीचे में आ गया. छोल साहब अब उठ कर चल दिए थे.

"तोह दादा जी फिर कल आप #### शहर जा रहे हो और बाकी सब भी जा हे रहे है आपके साथ."

"बीटा जी कभी कभी जाना जरुरी होता है. वैसे तोह मैं घर से निकलता हे कहा हु?"

"वह तोह सही बात है लेकिन बिना काम तोह आप कही जाते भी नहीं हो. वैसे गाडी लेके कौन जायेगा? आप तोह अब गाडी चलते नहीं जितना याद है और भैया इधर है नहीं.", अर्जुन पानी की पाइप बड़े हिस्से में रखता हुआ खुरपी से थोड़ी बहोत गुड़ाई करके सख्त जगह को नरम कर रहा था. रामेश्वर जी भी अब उसकी बगल में आ बैठे थे जैसा खास मौके पर हे होता था.

"संजीव को काम दिए है और बिट्टू का ड्राइवर लेके जायेगा सबको. ये देख जरा इधर, लगता है न हरा पत्ता है लेकिन कीड़ा है. चलवा जो सबमे से एक लगता है लेकिन होता बिलकुल विपरीत. ये पत्ते हे इसका भोजन बन्न जाते है.", अर्जुन के सामने हे उन्होंने वह विलक्षण बड़ा सा कीड़ा पत्ते से उठाते हुए दिखाया. अर्जुन ने भी उनके हाथ से वह पकड़ने के बाद ाध्ये खाये पत्ते पर नजर डाली. जहा पहले वह पूरा पत्ता दिख रहा था.

"ये कीड़ा अगर रंग न बदल कर वैसे हे पेट भरता तोह मैं इसको कुछ न कहता लेकिन अब ये नहीं रहेगा इधर.", अर्जुन उसकी तिनके सी टांग पकड़ कर बड़े गौर से देख रहा था.

"तोह क्या करेगा इसके साथ तू.?"

"ये अब बैठेगा नागफनी (कैक्टस) पर. बदल बचे भेष तू अब और खा इसको.", रामेश्वर जी हंसने लगे अपने पौटे की हरकत पर.

"मुझे लगा तू इसको मार देगा."

"दादाजी मैं ऐसा कुछ नहीं करता और थोड़ी देर में इसको अमरुद के पेड़ पर रख दूंगा. ये प्रकृति का हिस्सा है और मैं इनके बीच नहीं आना चाहता. हाँ कोई दूसरा कीड़ा इसको खा जाये तोह फिर इसकी किस्मत.", रामेश्वर जी उसके हाथ से खुरपी ले कर मिटटी के छोटे दल्ले दबाते हुए महीन करने लगे.

"तू सही कर रहा है लेकिन थोड़ा बहोत ध्यान मिटटी पर भी देना चाहिए, कई बार वह सिर्फ पानी से नहीं गलती. ठुकाई करनी पड़ती है और तब तक जब तक वह बाकी मिटटी में मिल न जाये.", अर्जुन मुस्कुरा रहा था और फिर पाइप थोड़ा दूसरी तरफ खिसका कर अपने दादा जी से कहने लगा.

"आप मिटटी बराबर करने की बात करते हो, जरा इधर देखो आप. मैंने तोह मिटटी में खाद भी ऐसे मिला दी है के पता नहीं चलता. हाँ अब वह fal-fool ाचे देगी.", पपीते के 2 पौधे जमीन ाचे से पकड़ चुके थे जीने अर्जुन ने कुछ दिन पहले हे लगाया था.

"यही उम्मीद करता हु बीटा के तू यहाँ सबको ाचे से जगह दे उनकी. हर किस्म अलग है और उनका rehan-sehan भी. खरपतवार तेरा दादा ाचे से साफ़ कर लेता है तोह तू बाकी सब संभल.", रामेश्वर जी ने भी हलके हाथ से उन पौधों का जायजा लिए तोह वह बिलकुल सही थे. उन्हें तस्सली हुई तोह वह बाकी हिस्से भी देखने लगे और अर्जुन उनसे बातें करता हुआ सही से पानी देने लगा. आधा घंटा हुआ होगा के ये आवाज दोनों के चेहरे पर हंसी ले आई.

"बिस्टेर वही लगा दू दोनों का? घंटे भर से मिटटी में मिटटी हो रहे है और बातें पता नहीं कैसी के कुछ पल्ले नहीं पड़ती. अब आप अंदर चलो जी हाथ पाँव धो के और तू सीधा गुसलखाने में जा, बैलबुद्धि.", कौशल्या जी जैसे कुछ समय से कड़ी थी और फिर हल्का अँधेरा होने लगा तोह दोनों को अलग किआ.

"भगवान कल घर नहीं होऊंगा तोह इसको समझा रहा था के जिम्मेवार रहे और घर का ध्यान रखे.", मुस्कुराते हुए रामेश्वर जी पानी की पाइप से हे पाँव साफ़ करते हुए आँगन में आये तोह अपनी धर्मपत्नी जी से टोलिया लेते हुए खुद को साफ़ करके अंदर चल दिए. अर्जुन अभी भी बगीचे में हे था और प्रीती को अपनी तरफ आते देख प्रसन्न हो गया.

"आजकल तोह मानो (बिल्ली) हाथ नहीं लग रही. वैसे इस समय दर्शन कैसे दे दिए?"

"ओह मिस्टर बनो मत. आती हु लेकि तुम हे नहीं दीखते. वैसे आई तोह ऋतू दीदी से हे मिलने थी तुम्हे देखा तोह सोचा शकल दिखा दू. स्टेडियम में ऐसे घूर रहे थे जैसे मेरे साथ वह कोई और था हे नहीं."

"दिल कर रहा था तोह देख लिए. वैसे भी अब तुम्हारे यहाँ आने में डर लगने लगा है."

"हाँ अभी आना भी मैट. विक्य पागल हो रही है तुमसे मिलने के लिए और मम्मी के सामने कुछ उल्टा सीधा हो गया तोह तुम बच भी जाओगे लेकिन मैं और वह नहीं."

"अरे मम्मी ज्यादा खतरनाक है तुम्हारी. विक्य को तोह मैं नजदीक नहीं लगने दूंगा लेकिन अब उनसे डर लगने लगा है.", अर्जुन अपना नग्न चित्र याद कर रहा था.

"ऐसा क्यों हो बच्चू जो तुम अब उनसे दररने लगे हो? वह तोह तुम्हे बहोत याद करती है और कह रही थी की फिर से तुम्हारे साथ फोटो के लिए जाने वाली hai.",Preeti को अब वह कैसे समझाता.

"हाँ देखेंगे लेकिन ये बताओ तुम ऐसे jeans-shirt में तैयार हो इस वक़्त?", अर्जुन ने बात हे पलट दी.

"चंडीगढ़ जा रही हु दादू के साथ. वह मामी को लेके आना है न. लेकिन पहले ये बताओ के मम्मी से किस बात का डर लगने लगा है.?", प्रीती जैसे अब पीछा नहीं छोड़ने वाली थी.

"उनकी ड्राइंग देखना और फिर बताना. बाकी अब ये सब छोडो और बताओ के वापिस कब आना है?"

"कल शाम तक. विक्य ने कल हॉस्टल जाना था लेकिन अब वह भी एक दिन बाद हे जाएगी. फिर मिलेंगे हम.", आँख मार कर वह हंसती हुई भाग गई, अर्जुन को हैरान करती हुई.

'ये लड़की भी न. पता नै क्या क्या चलता रहता है इसके दिमाग में. शरारती मानो.'

.

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"बबिता, तेरा भाई कर आया ऋ सब काम? आरर थोड़ी देर उस डायन पे भी नजर राख ले, ज्यादा खाली छोड़ना भी ठीक कोणी उसने. बहोत तेज लोमड़ी है.", सुशीला सिंह हवेली के इस पिछले कमरे में आ कड़ी हुई. नरम बिस्टेर पर पसरी बबिता भी hatti-katti मांसल महिला थी, 32 वर्ष की लड़की कहना था कदाचित गलत हे होगा. अपनी माँ की बात सुन्न कर वह सीढ़ी होने लगी तोह उसके मॉटे उभर हिलते हुए बहोत कुछ बता गए थे. कमीज के ऊपर से हे 2 बटन से उभरे निप्पल का मतलब था के बबिता में इतनी गर्मी थी के वह पतले कमीज के नीचे ब्रा भी नहीं पहने थी.

"उस रांड पे जितनी नजर रखवा ले माँ वा के करेगी बेरा कोणी लागे. तू कहवे है तोह मैं भी घडी दो घडी देख लियू हु.", वह उठकर कड़ी हे हुई थी अपनी बात कहते हुए के सुशीला ने टोक दिए.

"थोड़ी सरम करे कर तू. झोत्ती से भैंस हो चुकी है लेकिन latta-kapda एब्बी तक पहन का होश कोणी. न्यू उघाड़ी बहार निकलेगी? मान लिए के घर उतने मरद कोणी लेकिन तेरा मां तोह है. और बिजेन्दर भी आ सके है.", सुशीला गुस्सा तोह कर रही थी लेकिन आवाज में वैसा दम नहीं था जैसा औरो के सामने रहता था. वजह भी साफ़ थी. बबिता अपनी माँ को हे आँखें दिखती हुई कमीज खोल कर एक तरफ रखती हुई बिस्टेर पर ब्रा ढूंढ़ने लगी. 2-2 किलो के बड़े मांसल चुके निर्वस्त्र झूल रहे थे उसके बिस्टेर पर झुकने से. चादर के नीचे से वह बड़े आकर का अपने कबूतरों का पिंजरा उठती उनपर बांधने लगी.

"मां की मजाल कोणी जो आँख था के देख ले आरर रही बात बिजेन्दर की तोह वह इतने स्यामि कोंनी आवे जितने अपनी कही बात पूरी न करदे. आरर इतनी हे फ़िक्र से इस भैंस की तोह पहला उन सबने ख़तम करके मेरे खातिर भी कोई झोटा देख लेती. इस बार अगर किम्मे न होया ने तोह फेर मैं तेरी आख्या के सामी हे कोई झोटा ऊपर चढ़वा लियुंगी.", बबिता कैसी थी वह सुशीला का भी पता था. गुस्सा और khari-khoti बात धड़्डले से वह बिना देखे कह देती थी.

"फेर न्यू करिये के शंकर का छोरा हे चढ़वा लिए तू. कलंकनी कड़े सीढ़ी बात तोह कहवे कोणी आरर जितनी भुंडी बात बुलवा लो. इतना हे कहु थी के कपडे ठीक पहन ले. लेकिन मुँह में जो आवे है वा बक्क देगी. माँ सु तेरी आरर फ़िक्र मैंने भी है.", सुशीला अपनी बात से हे पलट गई.

"तू घात कोणी माँ. आग लगा के पाछे हट जे है तू भी. मेरे कमरे में मैं उघड़ी राहु या न, कोई किम्मे नई कह सकता. मैंने भैंस बतावे थी थोड़ी देर पहला. सोच के बोले कर नहीं दिमाग मिंट में खिसक जे है मेरा.", बबिता थोड़ी शांत होगी थी अब और फिरसे कमीज पहन ने लगी तोह वह छाती पर कही ज्यादा हे कसता हुआ नीचे जाने से रुकने लगा था.

"देख बेटी समझ सकू हु तेरी हालत. गलती मेरी भी है लेकिन एक दिन की बात है फेर तू भी अपनी आग ठंडी कर लिए.", उसका कमीज सही करती सुशीला को भी थोड़ा जोर लगाना पड़ा. अपने हाथ से हे बेटी के उभर दबाने के बाद हे वह सही हो पाया.

"जो मर्जी हो काल. बिजेन्दर उसने मारे या वह बिजेन्दर ने लेकिन मैं मुहूर्त करवा के हे रहूंगी. शंकर का छोरा भी घात न लगता.", बबिता दरवाजे के पास ृक्क कर अपने पीछे कड़ी माँ से बोली तोह सुशीला मुँह बनती सी उसको देखने लगी फिर मुस्कुरा दी.

"बर्बाद हे होना है तोह फेर पूरा हे होवेंगे. वो छोर एक तोह बचे कोणी आरर बच गया तोह बाकी कोई न बचता. करवा लिए तू भी अपनी रिबन कटाई फेर.", सुशीला के साथ हे वह भी हंसती हुई फिर हवेली के अगले हिस्से की तरफ बढ़ चली लेकिन अब सुशीला के माथे पर हलके बल पड़ गए थे.

'तेरी आग भी ठंडी होवेगी लेकिन मेरे हिसाब ते.'

"हाँ तोह बेबे कड़े दिमाग लगा रही है तू?", बबिता अब शबनम के पास कुर्सी पर बैठी थी. शबनम भी शायद घर की हे किसी लड़की के ढीले सलवार कमीज में बिस्टेर पर बैठी कुछ करने में व्यस्त थी.

"बबिता दीदी, अपना दिमाग तोह फ़िलहाल रेस्ट पे है. कल देखेंगे क्या होता है फिर अगला काम भी करना है.", शबनम वह कागज मदद कर डायरी के अंदर रखने के बाद बिस्टेर से तक लगाती बबिता को देखने लगी.

"मतलब बुढ़िया की चिता बनाये बैठी है तू. बढ़िया बात है. आरर न्यू बता छुटकी (मुस्कान) क्यों बिदक गई.?"

"दीदी, इंसान सिर्फ तभी हाथ से निकलता है जब वह दुश्मन से इश्क़ कर बैठे. लेकिन उस बेवकूफ ने जो किआ है वह भुगतना तोह पड़ेगा हे. वह लड़का तोह वैसे भी कल मरने वाला है और रहा सहा अब वह अकेली भी हो गई और कमजोर भी.", शबनम के चेहरे की ख़ुशी देखती बबिता को ये ाचा न लगा था लेकिन वह शांत हे रही.

"छोरे की फोटू तू दिखा जरा शबनम. के हीरे जेड है उसमे जो मुस्कान जैसी शातिर भी दिल हार गई उसपे, मैं भी देखु.", बबिता ने बिस्टेर के पास राखी फोटो देख ली थी लेकिन यहाँ से सही तरह पता नहीं चल रहा था कुछ. शबनम ने वैसे हे मुस्कुराते हुए 2 फोटो सामने बढ़ा दी.

"देख लो दीदी आप भी देख लो. ये दुश्मन अब कुछ घंटो का मेहमान हे है.", बबिता ने पहले चेहरा देखा जिसको वह देख कर जैसे खो हे गई थी. फिर उसकी पूरी तस्वीर देखते हे उसने शबनम की और नजर की.

"छोरा कसूता है बेबे आरर मैंने यु पहले भी दिखाया होया है लेकिन नजर भर.", बबिता फिर से अर्जुन की तस्वीर देखने लगी.

"आपने इसको कहा देख लिए दीदी?"

"मैं डॉक्टर ने चेकउप कारण गई थी शहर आरर यु लड़का एक लुगाई के साथ gol-gappe खा के लीकडया था मार्किट में. मैं बगल में कड़ी थी आरर सच कहु तोह फोटो भी उतना न दिखता जितना गजब यु असली मैं से.", बबिता ने वह 3क्ष4 की उसके चेहरे वाली फोटो अपनी ब्रा में दाल ली.

"गज़ब कर रही हो आप तोह. ये भी जानती हो के वह हमारा दुश्मन है? वैसे आपने इसके साथ तोह नहीं देखा था कही?", हैरान शबनम डायरी के पीछे से एक थोड़ी बड़ी तस्वीर बबिता को दिखने लगी.

"यु मेनका है बावली, भीम की बेबे. ना या कोणी थी लेकिन तेरे धोरे उसकी फोटू किस तरिया आई?"

"ओह तोह ये है मेनका. वैसे ये फोटो बिजेन्दर ने दी थी मुझे की इस लड़की को उठाना है अर्जुन को दबोचने के लिए. मेनका जब आखिरी बार देखि थी तब मैं 3 साल की थी और भीम के घर तोह मैं अभी तक गई हे नहीं जो मुझे कुछ पता होता. भीम से भी बात हुई थी वैसे.", शबनम जो भी कह रही थी बबिता सुन्न कर भी तस्वीर घूरे जा रही थी.

"भीम माँ छुड़ाए अपनी लेकिन या रांड उस छोरे के गइल है? तन्ने सही खबर तोह है न? क्यूंकि जो मैंने देखि वह भी घनी सुथरी थी लेकिन थोड़ी दुबली. फेर वह इसके गइल चक्कर चलाये है तोह छोरा हल्का कोणी शबनम. एक पते की बात बता डीयू किसे सयाने ने कही थी. "जो छोरा बड़ी लुगाई का यार होव है उस जितना खतरनाक कोई न होता.'", बबिता को शायद कुछ दिक्कत भी थी मेनका से और अब उसका अर्जुन के साथ सम्बन्ध पता लगने पर वह गुस्सा भी थी और दिमाग भी लगा रही थी.

"मतलब जिसको आपने देखा वह उसकी प्रेमिका जैसी थी?"

"100 प्रतिशत. मेरी उम्र की होवेगी या थोड़ी बड़ी. शहर की लुगाईया का बेरा कोणी चालता न बेबे."

"बड़ा हे शातिर है जो 2-2 लिए फिर रहा है वह भी दोनों अपने से कही ज्यादा बड़ी. ऊपर से मुस्कान जैसी जाने कितनी होंगी और.", शबनम की बात का जैसे ख़ास असर न हुआ था बबिता पर और ये साधारण शरीर की गोरी युवती बिस्टेर पर 2 थाली खाने की रख कर चुपचाप बहार चली गई.

"ऐ अक्षरा, अंदर आ जरा.", आवाज में बिलकुल गुस्सा न था बबिता की जो उसके स्वाभाव से अलग था.

"जी दीदी.", सवा 5 फ़ीट के लगभग और बेहद खूबसूरत चेहरे के साथ हे वह थोड़ी मासूम से थी. शरीर में ज्यादा मांस न था लेकिन सलीके से सलवार कमीज और गले में दुपट्टा लिए वह बबिता के सामने सर झुकाये कड़ी थी.

"देख तेरा छोटा भाई.", अर्जुन की दूसरी तस्वीर उसको पकड़ती हुई वह hav-bhav देखने लगी.

"मेरा भाई नहीं है ये. सिर्फ बिजेन्दर भैया हे मेरे भाई है और कोई नहीं.", धीमी आवाज में हे स्पॉट सा जवाब देती वह वापिस फोटो पकड़ने के बाद कड़ी रही.

"ाची बात है. चाल एक का कर दे मेरा. सामान पकड़ा जा और एक प्लेट दे दिए ढकन खातिर."

"जी", इतना कहती वह बहार निकल गई.

"कोनसा सामान? और आप ये क्यों कह रही थी की अर्जुन उसका भाई है.?", शबनम ने हैरान होते हुए पुछा.

"व्हिस्की. और शंकर ने मामी पेट से की थी जब मां जेल में था. दोनो छोरिया उसकी हे है लेकिन ख़ास बात यु है के बहोत भोली और समझदार है दोनो. मेरे से बहोत प्यार है इनका और बिजेन्दर भी दिल से करे है इनकी खातिर. ले ेब देख अर्जुन का थोबड़ा और फोटू वापिस कर दिए.", शबनम ने वह तस्वीर पकड़ी जो बबिता ने ब्रा से निकल कर उसकी और की थी. वैसी हे भूरी आँखें और इधर अक्षरा तोलिये में लपटे वह बोतल, थाली और नमकीन के साथ पानी की बोतल जैसे तैसे अंदर लेकर आई तोह शबनम ने पास बिठा लिए. एक बार पूरे चेहरे को ध्यान से देखने के बाद वह चुप्प हे रही. अक्षरा भी सब सामान लगाने के बाद दरवाजा बंद करती चली गई.

"पीयेगी?"

"बना दो दीदी. अब तोह हजम करना हे ठीक है. साला ये शंकर कितने खाते खोले बैठा है."

"जबान संभल के बेबे. साला कोणी वह. दुश्मन है लेकिन पहले काका भी लागे है मेरा. और बुरा न मानिओ मेरी बात का.", बबिता ने भी आराम से हे कहा था लेकिन शबनम देख रहे थी की बबिता संजीदा थी इस बात पर.

"सॉरी. मुँह से निकल गया. वह बॉम्बे में थोड़ी जुबान खराब हो हे गई. मेरा छोटा हे रखना.", गिलासों में एक चौथाई शराब डालने के बाद बबिता ने मुस्कुराते हुए उन्हें पानी से भरा और एक गिलास शबनम को थमा दिए.

"कोई बात न. और शराब बराबर पिए करे है बेबे. तोह हो गया यकीन के इनका लड़ा करवाऊं?"

"डीएनए होता है दीदी लेकिन उसकी जरुरत नहीं है. वैसे सच कहु तोह दिमाग को जरुरत बहोत थी इस शराब की. 3 दिन से भरी है सबकुछ."

"तेरा भारीपन तू कांड ले है किसे न किसे तरह. गांड और चुके न्यू हे न हिलते तेरे left-right आड़े बस या शराब और अपना कमरा हे सहारा से.", शबनम को हल्का सा झटका लगा था बबिता की बात सुनकर जो मुस्कुराती हुई आधा गिलास खली करके अब चम्मच से नमकीन खा रही थी.

"आपका मतलब दीदी?"

"जानेमन जो तेरे उभार से यु बहोत कुछ बतला दे है तेरे बारे में. विदेश रही है, फेर film-nagri तोह यार तोह चोखे बनाये होंगे. आड़े तोह भीतर ऊँगली न गई आज तक लेकिन ससुरे देख पहाड़ से ऊपर और उतने हे पाछे है.", अपने सीने और कूल्हों की तरफ ध्यान दिलाती वह हंसने लगी थी.

"मैं pyaar-vyaar में नहीं पड़ती दीदी लेकिन आपकी बात भी सच है. आग बढ़ जाती है तोह मैं खुद को नहीं रोकती. इंग्लैंड में तोह 2 थे जो काम चला देते थे, फिर यहाँ भी एक मिला लेकिन साला शहीद हो गया कल. लेकिन सच कहु तोह मेरा जिस्म आपके सामने कुछ भी नहीं है. कोई हब्शी (नीग्रो) हे ऐसे शरीर को तृप्त कर सकता है, मेरा तोह छोटे मॉटे से काम हो जाता है.", शबनम इस मुद्दे पर थोड़ा खुलकर बोलने लगी थी. गिलास दोनों के ख़तम हुए तोह बबिता ने फिर से बना दिए.

"हमने तोह कोई हब्शी न मिलना और जे कोई होवेगा तोह वह मामे बर्ज की गांड मार सके है लेकिन मेरी चढ़ाई तोह सपने में न कर सकता. हाँ जे किस्मत में लिख्या होया तोह झोटा आड़े भी मिल जे गए इस देसी खातिर.", बबिता को थोड़ी गर्मी लगने लगी थी लेकिन उसको मजा आ रहा था. वैसा हे हाल शबनम का था जिसको शायद एक की हे आदत थी और छोटे कपड़ो की.

"दीदी, दरवाजा बंद कर दो यार.", बबिता उठती हुई चिटकनी लगा कर वापिस बैठ गई. सामने शबनम को सिर्फ ब्रा में देख कर वह मुस्कुरा रही थी.

"सच बोलू तोह थोक्कू तोह तन्ने भी न मिला कोई बढ़िया. असली मर्द तोह शरीर बढ़ा के चमका देवे है. वैसे बदन तेरा भी मादा कोन्या."

"दीदी, ज़िन्दगी में सुकून हो तोह ध्यान दू कही. ये बहनचोद पसंद आया था लेकिन साला एक तोह उम्र में छोटा और दूसरा ये गलत जगह पैदा हो गया.", शबनम हलके सुरूर में थी डेढ़ गिलास पीने के बाद. 4 गिलास बनाने में हे बबिता ने एक चौथाई से थोड़ी ज्यादा बोतल खली कर दी थी और शबनम जैसे उसके मुकाबले की नहीं थी.

"यु खागड मैंने भी पसंद है ऋ. फोटू चुके पे लगाके भी सुकून देवे है लेकिन तेरे वाली बात मेरे गइल है. मरेगा तोह नसीब में ाँ से रहा. लेकिन शरत लगा के कह सकू के यु शंकर से भी बड़ा खिलाडी होगा. बता 2-2 लुगाई इत्ती सी उम्र में संभल के छाले है तोह इसका यु मतलब हे होया के कोई छोरी इसका झेल न सकती."

"हम्म्म. करेक्ट. पक्का यही वजह होगी. वैसे क्या लगता है मेनका इसके साथ उस हद्द तक गई होगी?"

"देख बेबे, दारु साथ पी है तोह बात दिल की कहूँगी. भीम ार शीला देवी का पुराण चक्कर है. भीम है तगड़ा और जवानी बरकरार है उसकी. शीला हो गई ढीली आरर भीम की लुगाई उसका बिस्टेर में साथ न देती. मेनका के विधवा होये पाछे वह चाहवे है उसने अपनी रखैल बनाना क्यूंकि भीम ने शर्त राखी थी माँ के साथ के अर्जुन ने वह इस लिए हे मारन में साथ देवेगा अगर माँ मेनका उस से छुड़वा दे, बलात्कार कोणी करना. माँ ने फेर एक तीर 2 निशाने वाला यु प्लान बना दिए. अर्जुन के खातिर मेनका छुड़ेगी लेकिन अगर अर्जुन की हत्या का इल्जाम आया तोह वह भीम कबूल करेगा. कागज़ लिखवा चुकी है माँ.", शबनम एक घूँट में बाकी शराब ख़तम करती हुई गहरी सांस लेने लगी.

"शीला भीम की माँ है? और अब वह मेनका के साथ ये करना चाहता है? अपनी सगी बहिन के साथ. बहनचोद ये आदमी हैवान है क्या?"

"चाहत है उसकी, नहीं तोह छूट की कमी कोणी उसके धोरे. हरकत मेरे साथ भी करना चाहवे था वह लेकिन लुंड पकड़ के मरोड़ दिए था उसका गलती कारन ते पहला. खैर आदमी ठीक है वह. ार उसकी माँ खुद छुड़ेगी तोह हर तरफ वह छूट हे भलेगा. दिल करे तोह गर्मी लिकद्वा लिए तू भी, आराम से झेल लेगी तू खेली खाई है.", ये गिलास बनाने के साथ हे बबिता ने बोतल डब्बे में वापिस बंद कर दी मतलब ये आखिरी पेग थे.

"दीदी तुम्हारा दिल नहीं करता करने का ये सब?", अलग हे आग लगने लगी थी शबनम के शरीर में अब.

"बिजेन्दर लट्टू है मेरे पे और तैयार भी शादी खातिर. मैंने भी कह राख्या है के अर्जुन ने मार के मांग भर दिए मैं साथ चाल पड़ूँगी जहा कहेगा."

"आप अपने भाई के साथ हे?"

"अरे बावली वह प्यार करे है मैं कोणी. वह जितना मर्जी तगड़ा हो या जानवर लेकिन शंकर के लड़के को जान से न मारने वाला. समाज में रेहान वाले लोग जितने भी बुरे हो यु काम कोन्या करते अपनी बहिन के साथ. जो वह अपना कहा कर गया तोह भी बया तोह होता न. माँ ने कुछ सोच राख्या है इस बारे में."

"अगर अर्जुन बच गया तोह? उसके चांस नहीं है लेकिन अगर ऐसा हुआ तोह?"

"फेर मैं खुद उस से छोडूंगी क्युकी मैं डाव पे पहले हे लगी हु. बाकी ऊपर वाला अपने रंग के दिखावेगा वह वही जाने. चल रोटी तोड़ा फेर मैं चाली अपने कमरे में आरर थाम लोग जो करो वह करो.", बबिता ने खली गिलास एक तरफ रखते हुए थाली अपनी तरफ कर ली. लेकिन शबनम एक और गिलास बनती जैसे आज ढेर होने के मूड में थी.

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आज रेणुका अपनी भाभी के साथ हे रहने वाली थी तोह अर्जुन कुछ आजाद था. खाने के बाद वह कुछ समय अपने दादा जी के साथ बिताने के बाद माँ से मिल कर अपने कमरे में आ गया. घर का दरवाजा जल्द हे लग गया था और बाकी सब भी अपने कमरों में जा चुके थे. दादा जी ने बताया थे के ऐतवार को वह पंजाब जायेगा प्रियंका दीदी के साथ हे, कुछ जरुरी कागज लेने थे उनके कॉलेज और यूनिवर्सिटी से. साथ हे घर में संभल के आना था. मतलब साफ़ था के वह काम से काम सोमवार रात से पहले वापिस नहीं आने वाला था.

"तोह आज मेहरबानी होने वाली है.", मधु बुआ एक रेशमी निघ्त्य पहने कोई उपन्यास पढ़ रही थी जब अर्जुन अपने कमरे से गद्दा निकल कर वही बिछाने लगा.

"आप करेंगी मेहरबानी तोह.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए उन्हें एक पल देखा और फिर सभी दरवाजे जांच कर बंद करता हुआ अपनी जगह लेट गया.

"जोरू के बिस्टेर पर उसकी बड़ी बहिन के साथ. ऊपर हे आ जाते.", मधु बुआ उसके पास आने से पहले आईने में खुद को ठीक करती हुई घुंगराले लम्बे बालो को भी उंगलियों से सुलझा रही थी.

"ये ज्यादा ठीक है और फिर बीएड हिलता भी है.", अर्जुन के ऐसा कहने पर वह मुस्कुराती हुई नैत्य की तान्निया ठीक करने लगी. अर्जुन देख रहा था के मधु बुआ अभी भी कितनी आकर्षक है और हमेशा संवरी रहने से उनका जिस्म बहोत अलग और खिला चमकता रहता था. निघ्त्य के बहार से भी उनके मॉटे चुचो का वह कटाव और मांसल बड़े कूल्हे उनकी ख़ूबसूरती में 4 चाँद लगते थे. गोरी नंगी पिण्डलिया भी पूरे जिस्म की तरह baal-vihin चमकदार थी.

"तुम हिला सकते हो इसलिए हिलता है. और ऐसे क्या देख रहे हो? तुम्हारे पास हे आ रही हु.", चिकनी बाहों पर खास लोशन लगाती वह फिर बीएड के किनारे पर एक पांव रखती उसकी मालिश करने लगी. अर्जुन वह मांसल मोटी जाँघे और उनकी गहराई में देखता हुआ बुआ के जिस्म की तुलना करने लगा था. बेदाग़ शरीर और अंदर साफ़ फूली हुई छूट, जिनकी फांको की झलक उसको मिल रही थी.

"सच में कमाल की हो आप बुआ. सच बात तोह ये भी है के आपने अपना ध्यान पूरा रखा है.", अर्जुन के पाजामे में भी वह खास अंग अंगड़ाई लेने लगा था. मधु बुआ एक ऐसी महिला थी ाचे से जानती थी की प्यार करने वाले मर्द का ख़याल कैसे रखा जाता है.

"सब तेरे लिए हे करती हु ये मैं. पहले तोह कभी ध्यान नहीं देती थी या बेमन से समय निकलने के लिए करती रहती थी. अब तेरे साथ होने से मैं खुश रहने लगी हु. और वैसे भी मैं अपने आप को पसंद करती हु तोह ये जरुरी भी है.", मधु बुआ ने आज ये दूसरी लाइट जला दी थी जो हलकी थी लेकिन जीरो बल्ब वाली नीली की तरह बिलकुल मद्दिम न थी. एक अदा से वह चलती हुई अर्जुन के सामने कड़ी हुई और घुटनो के बल बैठती हुई अपना चेहरा उसके सामने ले आई. दोनों हाथ गद्दे पर ठीके थे और सीना बहार को निकला उनकी इस मुद्रा को कही ज्यादा उत्तेजक बना रहा था. अर्जुन भी उनके निमंत्रण को स्वीकारता बुआ के मदद्भरे रसीले होंठो पर होंठ रखता उनके बड़े चुचो के नीचे हाथ लगता जैसे उनका वजन लेने लगा.

दोनों हे सिर्फ चेहरा जोड़े बाकी शरीर विपरीत किये थे. जल्द हे उनका धीमा चुम्बन होंठो को चबाने में बदलता फिर जीभ चूसै तक आ पंहुचा. निघ्त्य घुटने तक थी और इस तरह झुकने से वह वह अंडकार बड़े कूल्हे पूरा नुमाया होते बुआ का कामुक जिस्म झलका रहे थे. पतले कपडे के ऊपर से अर्जुन उन मांसल स्टैनो को सहलाने के बाद अब निघ्त्य के अंदर आ चूका था. चिकनी त्वचा और चुचो का पूरा वजन उसकी हथेलियों के साथ हे दोनों के जिस्म में हलकी मजे की तरंगे भरने लगा. निप्पल कड़े होने लगे थे और दोनों की साँसे तेज. थोड़ी पकड़ मजबूत करते हे बुआ की आँखे बंद हो गई और होंठ अलग.

"Isss...aahh.. कैसे सहलाता है रे तू इन्हे.. उम्.. आह्हः..", सिसकारियां बढ़ने लगी तोह अर्जुन ने दोनों तान्निया कंधे से अलग करते हुए ऊपर भाग बेपर्दा कर दिए. वह बड़े और मॉटे dugdh-kalash उसके सामने बेपर्दा थे. बुआ को वैसे हे झुकाये रखे अर्जुन गद्दे पर सर रखता नीचे से एक भूरे निप्पल को चूसने लगा. बुआ उसकी इस हरकत से हिलने लगी थी लेकिन दूसरे उभर को मसलता वह अपनी इस गदराई गाये सी बुआ के दोनों थांन कास कर मुँह में भरता दूध पीने का उपक्रम करने लगा. बुआ ने भी एक हाथ से बीएड का किनारा पकड़ते हुए दूसरे से अर्जुन का मोटा लिंग थाम लिए. चूसै तेज हो गई थी जैसे हे उन्होंने उसके लुंड को सहलाना शुरू किआ.

"अह्ह्ह.. खा जा रे.. तू आठ.. संतुष्ट करता है.. मममम.. ऐसे हर हिस्से को प्यार कर.. उम्म्म..", 10 मिनट तक दोनों निप्पल चूस चूस कर मॉटे करने के बाद वह वैसे हे लेते हुए उनकी कमर पकड़ कर शरीर अपनी तरफ खींचने लगा. बुआ का चेहरा उसके बड़े उभार के सामने आ पंहुचा तोह अब उनकी ये तेज सिसकारी निकल गई. अर्जुन नीचे लेता उनकी छूट की दरार चूमने के साथ हे अब अंदर के नरम हिस्से को भी होंठो में बाहरणे लगा.

"माह.. आज क्या क्या करेगा तू.. आठ.. मेरे नीचे डब्ब जायेगा.. आठ. लेकिन बड़ा ाचा लग रहा है..", बुआ ने खुद हे घुटने उसके चेहरे दोनों तरफ रखते हुए खुलकर छूट चूसै का मजा लेना शुरू कर दिए. खुद भी वह उसका पजामा ढीला करने के बाद अपनी कलाई से मॉटे लुंड को एक पल देखने के बाद होंठो से चूमने लगी. जल्द हे कामसूत्र की 69 मुद्रा में दोनों एक दूसरे के शरीर को ये अलौकिक सुख देने लगे. बेशक वह हिम्मत और थोड़े अनुभव के साथ 3-4 इंच तक अर्जुन के लुंड का हिस्सा मुँह में ले रही थी लेकिन उतना भी पर्याप्त था. जबड़े जल्द हे मोटाई की वजह से दुखने लगे तोह वह अर्जुन की जांघ पर सर टिकाया उसके लुंड को हाथ से हे हिलने लगी. शरीर अकड़ते हे मुट्ठी ज्यादा हे कस चुकी थी, जिस से वह लार से भीगा टमाटर सा सूपड़ा और भी अधिक फूल गया.

"बुआ.. आठ.. मजा आया आपको?", मधु बुआ तोह जैसे उसकी आवाज सुनकर सपनो से बहार निकली.

"मेरा रोम रोम हिला दिए रे तूने तोह. क्या जादू करता है.. आह.. सच में ये लुंड chota-bada तोह कुछ मायने नहीं रखता तेरी कामकला की तुलना में. अभी तक अंदर से कुछ निकल रहा है.", अब वह पूरा वजन डाले अर्जुन के ऊपर लेट गई थी. दोनों चुके अब छाती में दबने लगे थे बुआ का चेहरा अर्जुन के चेहरे पे होने से.

"आज तोह सब हिलेगा बुआ जरा कमर ऊपर उठाओ.", अर्जुन की ऐसी बात पर वह खुश होती हुई अपने कूल्हे हवा उठती जैसे तैयार हे थी. हाथ से लुंड को सीधा करता वह उनकी गीली छूट पर भिड़ा के रुक गया. आगे बुआ समझदार थी.

"आठ.. आराम से आराम से.. ummm..ahh...mmmmm", जब छूट उस भयंकर लुंड से चौड़ी होने लगी तोह बुआ खुद हे अपने होंठ अर्जुन के मुँह पर दबती आवाज बंद करने लगी. नरम छूट खुद हे उस बांस से मॉटे लुंड पर चिपकती हुई नीचे आने लगी. आधी लम्बाई अंदर लेते हे खुद बुआ न जैसे कमर नीचे गिरा दिए.

"मर्डर gaiiii..aahhh..mmmm", अर्जुन के कंधो पर दोनों पंजे गदति वह जैसे दर्द में तड़प उठी थी. अभी भी छूट दुक्थि थी उसके अकार से और इतना बड़ा एक बार में लेने से हालत तोह खराब होनी हे थी. फिर कुछ पल रुकने के बाद वह दर्द में भी अपना जिस्म हौले हौले हिलती हुई 2-3 इंच ऊपर नीचे करने लगी.

"बुआ.. आठ.. आप पूरा साथ देती ho..aahh.. कसम से देखने से नहीं लगता के इतनी नाजुक हो कर भी आप सब झेल लेती ho..aah..aaj ज्यादा हे टाइट लग रही है.", अर्जुन भी उनके बड़े कूल्हे मसलता नीचे से कमर हिलने लगा. दोनों धीमी रफ़्तार में इस कामुक चुदाई का लुत्फ़ लेते सब भूल कर लगे रहे.

"Ahhh..aammmmm.. ये तुझे हे टाइट लगती है re...aahh. अब तेरे फूफा ..आठ.. का नहीं जाने वाला इसमें.. उम्.. गायब हे हो जायेगा.. माह.. gai..main", झड़ने से वह बुरी तरह अर्जुन से लिपट गई और वह भी उनकी छूट के रास से ऊँगली गीली करता उस गरम रबर से छेड़ को कुरेदने लगा. 5-6 बार छूट की चिकनाई उनके लचीले छोटे छेड़ पर लगते हुए वह अपनी आधी ऊँगली दाल कर वैसे हे रुक गया.

"बुआ आपने करवाया है वह पहले..", लुंड अभी भी पूरा छूट के अंदर सर उठये खड़ा था.

"तोह क्या ऐसे हे ये इतने बड़े हो गए re..aahh.. लेकिन जैसा आगे गया है वैसा हे पीछे.. उम्म्म.. ढीली करेगा तभी करने dungi..umm.. आह्हः..", अर्जुन उनकी बात पर मुस्कुराता हुआ बुआ को एक तरफ करके बाथरूम में चला गया. बहार आने पर बुआ वैसे हे गांड ऊपर किये औंधी लेती टी. ठंडी क्रीम गांड के छेड़ पर लगते हे आग भड़काने लगी.

"िसष्ठ.. लगता है आज मैं mari..aahhh..Chal कभी न कभी तोह करना हे tha..umm.. वैसे भी कल कोई होने वाला nai..mmm..", अर्जुन ने अंगूठे से वह गुलाबी भूरा छेड़ ाचे से चिकना करने के बाद ढीला करना शुरू कर दिए था. बुआ को भी यहाँ करवाने में मजा तोह आता था लेकिन वह खुद नै कहना चाहती थी. जल्द हे 2 उंगलिया अंदर बहार करने से अर्जुन को समझ आ गया था के अब आगे बढ़ना चाहिए.

"बुआ घुटनो के बल हो जाओ.", कमर से उन्हें ऊपर उठता वह मधु बुआ के मटके से गोल और बड़े कूल्हे देखने लगा. रस बहती गुलाबी खुली छूट के ऊपर ये भूरा चिकना छेड़ दरार में एक इंच गहरा था. वैसे हे लुंड पर लोशन लगता वह हाथ से मालिश करते हुए उनके ठीक पीछे घुटनो पर आ गया था.

"आराम से करना अर्जुन, तुम्हारा सच में बहुत बड़ा है.", बुआ ने एक बार पलट कर देखा और फिर तकिये पर मुँह टिका दिए. अर्जुन उनके एक कूल्हे को थपकता उन्हें गांड ढीली करने का इशारा देने लगा. लुंड का मुख छेड़ पर लगते हे दोनों ने आँखे बंद कर ली. अर्जुन सांस लेता हुआ थोड़ा दबाव बढ़ने लगा और लुंड धीमी रफ़्तार से वह बंद चला खोलता हुआ थोड़ा अंदर जाने लगा. 'कछह' थोड़े हलके से तेज धक्के के साथ हे पूरा मोटा सूपड़ा दहकती सुरंग में अटक चूका था. अर्जुन को ऐसा लगा जैसे किसी ने दांतो के बीच उसका लुंड पकड़ लिए हो. मधु बुआ मुँह में तकिये का हिस्सा दबाये ये पीड़ा सेहन कर रही थी, आँखों में पानी आ गया लेकिन कोई शब्द न कहा. फिर शरीर वह से ढीला छोड़ती वह अर्जुन को भी आराम देने लगी.

"बुआ, सॉरी. दर्द हो रहा होगा आपको लेकिन अब मोटा हिस्सा चला गया अंदर.", अर्जुन उनके नरम कूल्हे सहलाता रुका रहा.

"भर दे अब आठ.. फ़िक्र मत कर.. उम्म्म.. ये छेड़ सेह लेगा रे..", अर्जुन उनकी बात पर थोड़ा सा हैरान था. फिर दोनों लटकते चुके पकड़ कर आगे दबाव बनता वह उनके माखन से नरम छेड़ में गरम सलाख और आगे तक भरने लगा. सचमुच बुआ के गोल कूल्हे गूंधे हुए आते से नरम और मक्कन से चिकने थे. अर्जुन की मजे से आँखे मुंड गई जब जड़ तक लुंड बैठ गया. जो छेड़ दरार से दीखता तक न था अब पूरी तरह फैलकर दोनों फैंको को 3-4 इन्चा चौड़ा किये था.

"आह्हः.. बुआ.. बहोत नरम और कासी हुई हो आप.. ये जैसे मुझे हे निचोड़ रही है आठ..", अर्जुन की उंगलिया उन गोर खरबूजों को दबती हुई अंदर धंस चुकी थी और छुट्टोडो से चिपका वह वैसे हे रुका रहा.

"ममम.. तेरा ये डंडा जाने कहा कहा लग रहा है अंदर.. आह्हः.. उम्मीद न थी लेकिन आठ.. ऐसा लग रहा है के पहली बार करवा रही हु... लेकिन दर्द में भी मजा है..", कमर हलकी नीचे करती वह फिर से पीछे हो गई. ऐसे में 2-3 इंच लुंड की उस हलकी रगड़ ने झुरझुरी सी भर दी थी दोनों हे छेड़ में.

"मौसी आपने इसको पहले हे तैयार किआ हुआ tha...aahh.", अर्जुन ने चुचो से हाथ हटा कर कमर थाम ली थी. आधा लुंड बहार खेंच कर वापिस अंदर भरते हुए वह उनके शरीर का थिरकना देख रहा था. गोल चुके नीचे से झूल रहे थे और वैसे हे कूल्हों का मांस भी.

"उम्.. पता था मुझे की इस बार तू नहीं मानेगा.. आठ.. 8 बजे हे नाहा कर मैंने आधा घंटा पूरा शरीर संवारा और फिर आखिर में इसको भी.. उम्.. नहीं तोह खून आना पक्का था रे.. आह.. अंदर तोह ये और भी बड़ा हो रहा है.. उम्.", सच में चले की कसावट से जिस्म का सारा खून जैसे सुपडे में उतर रहा था.

"आपको प्यार से करवाना पसंद नहीं न.. आठ.", अब धक्के थोड़े तेज होने लगे थे. एक हाथ से अर्जुन उनकी छूट को मसलता हुआ बुआ का पूरा ख्याल रख रहा था.

"ऐसा शरीर हो तोह फिर टकराने में हे मजा है अर्जुन आह्हः.. उम्.. वह मस्ती ज्यादा सुकून देती है जो शरीर दुखने से बरकरार रहती है.", अर्जुन ने 2 उंगलिया छूट में उतार दी

"वैसे आठ.. आपको सबसे ज्यादा क्या पसंद है.. आठ."

"सैटरडे बताउंगी तुझे.. अभी कस के पेल जरा.. वैसे तूने रेणुका के साथ यहाँ किआ है..?", लुंड को कूल्हों के बीच कस्ती वह अर्जुन को भी तड़पा देती थी.

"ाःह.. नहीं बुआ.. उम्म्म्म. वह नहीं झेल सकती आठ.. और न मैं उनके साथ ये करना चाहता हु.. उम्.."

"पागल है.. आह्हः.. वह चाहती है के तू उसको पति की तरह नहीं बॉयफ्रेंड के जैसे प्यार करे.. ऊँगली तेज चला आह..", छूट भीगने लगी थी और लुंड भी सांस लेना चाहता था, वीर्य उगल कर.

"उम्.. आपसे किसने कहा हहहह?"

"हम दोनों सहेलिया और बहने भी है.. आठ.. सीई.. गई re..ahh. ", वह गद्दे पर लुढ़कने लगी लेकिन अर्जुन भी पीछे से उनके ऊपर बड़ी चादर सा बिछता गांड की गहराई में समाया हे लेट गया.

"बुआ.. आठ. अब तोह और ाचा लग रहा है.", ऐसे में अर्जुन उन नरम कूल्हों का मजा ले रहा था उनपर लेता हु और 3-4 धक्को में हे उसने बुआ के खरबूजे नीचे से हाथ दाल कर पकड़ते हुए अपना पानी अंदर खोलना शुरू कर दिए. कसावट की वजह से वीर्य भी रुक रुक कर लम्बी पिचकारियां मार रहा था. जो अलग हे सुकून दे रही थी मधु को.

"अगली बार रेणुका को आठ. तबियत से रगड़ना बजाये शरीर से चिपका के miya-biwi वाला शांत कार्यक्रम करने के."

"वह पेट से है बुआ."

"उल्लू वह पेट से है लेकिन अभी छत्ता महीना नहीं है जो तू चिंता कर रहा है. यही समय है उसको सब सुख देने का. ाःह... हिल मत, अंदर रहने दे.."

"फिर क्या करू मैं?"

"यहाँ बाथरूम है, तेरा कमरा है, संजीव का है.. तबियत से हर जगह सबकुछ तरय कर. शरीर जितना खोलेगा वह उतनी मजबूत banegi..umm. फिर चौथा महीना लगने पर कुछ समय देना. अंदर शरीर bann-ne लगता है तब.. और फिर पीछे मत करना.. आगे भी करते समय पेट का ख़याल रखते हुए miya-biwi की तरह आराम से और साइड से. बचा नार्मल हे होगा.", इस वक़्त अर्जुन के नीचे दबी हुई भी मधु बुआ बड़े प्यार से उसको ज़िन्दगी के कुछ खास सबक सीखा रही थी. अर्जुन भी उनके जिस्म को प्यार से सहलाता हुआ सब ध्यान से सुन्न रहा था. समय 11 हे हुआ था इसका साफ़ मतलब था के दोनों अभी और भी बहोत कुछ करने वाले थे.

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राममेहर सिंह की ये हवेली हमेशा हे 10 बजे तक शांत हो जाती थी और अभी 11 बजे यहाँ वैसा हे सन्नाटा पसरा था. आँगन में मोहर सिंह किसी चौकीदार सा तख़्त पर बैठा हुआ हुक्के का धुआँ उड़ा रहा था. शायद कुछ आखिरी हे काश बचे थे जितना अलाव हुक्के में था उस हिसाब से. सुलतान भी इस वक़्त खुल्ला था लेकिन फर्श पे लेता ऊंघ रहा था. इतने शांत वातावरण में मोहर सिंह के कानो में रह रह कर हलकी आवाज पड़ रही थी लेकिन वह इसपर को ध्यान नहीं दे रहा था. कुछ पल बाद थोड़ी सी तेज आवाज होने पर वह उठ खड़ा हुआ. बहार से हे सब बंद कमरों की खिड़कियों पर नजर फेरता वह कतार से बने 5 कमरों का निरिक्षण करने लगा. यहाँ 2 कमरे खली थे जो बैठक और उसका हे कमरा था.

"ओह तेरी बहिन की यु के है?", तीसरे कमरे में मददिमम रौशनी थी और पर्दो के बीच की जगह से कमर से नीचे तक निर्वस्त्र पाँव उसको नजर आ रहे थे. ये खिड़की का कांच का पल्ला बंद नहीं था, हवा के संचार को बनाये रखने के लिए. और अंदर वह दूधिया लम्बी टाँगे फैली हुई थी जहा एक नाजुक गोरी कलाई कांच की बोतल अपनी छूट में अंदर बहार कर रही थी. सिर्फ लम्बा पतला ऊपरी 4 इंच लम्बा गोल हिस्सा.

'यु शबनम हे है पक्का. भान की लौड़ी ाची गरम से या छोरी तोह. काश मेरा लुंड इसकी छूट में होता आठ..", वह शबनम हे थी जो शराब और अंदर की गर्मी से इतनी उत्तेज्जित हो चुकी थी की शरीर को ठंडा करने के लिए इस बड़े बिस्टेर के बीच में लेती खुद को शांत कर रही थी. गोर शरीर पर हलकी भूरी छूट को रगड़ती हुई वह बोतल के पतले हिस्से को अंदर बहार कर रही थी. मोहर सिंह वही खड़ा अपना ढीला लुंड हिलने लगा.

'साली ऐसी जवानी तोह नसीब हे न हुई. कोई न, भांजी है लेकिन पानी तोह लिकद्वा हे देगी..', हल्का सा पर्दा सरकते हुए वह अब कमर से ऊपर उन दोनों हिलते हुए चुचो को भी निहार रहा था. शबनमस छुडास में खोई सिसकीअन लेती हुई बड़बड़ा रही थी. 'mmma..uuuuuhhhh.. उम्म्म.. आह्हः... टेअर में baby..aahh..', और 2 मिनट में हे वह शांत हो गई लेकिन मोहर सिंह के लिए इतना हे बहोत था. 2-3 बूँद फर्श पर गिराने के बाद वह ढीले लुंड को धोती से साफ़ करता हांफ रहा था.

"कौन है बहार?", शबनम की आवाज से मोहर सिंह की फटी हुई गांड जैसे और फट गई थी. जैसे तैसे वह चारपाई तक आया और पसर गया. एक गहरे दर्द के साथ. शबनम 2 मिनट बाद सिर्फ वह घुटनो तक की कमीज पहने इधर का दरवाजा खोलती बहार निकली तोह खिड़की के पास सुल्तान को देख कर मुस्कुरा दी.

"नॉटी बॉय. तोह तुम देख रहे थे? लेकिन I'm नॉट ईंटो बेअसतालित्य स्टड. उमाह.", सुल्तान जैसे सुन्न हो गया था शबनम द्वारा चूमे जाने से. एकटक वह उसको प्यार से देखने लगा और शबनम वापिस अंदर चली गई.

'गांड फटी सो फटी पर यु कुत्ता बचा गया. ाःह.. कुटिया साली देखन भी न देती.', मोहर सिंह फिर से आँखे बंद करता हुआ सोने लगा. यहाँ अब पहले सी ख़ामोशी चा गई थी. लेकिन पूरी हवेली में शायद अभी भी कुछ लोगो की आँखों में नींद न थी. बिजेन्दर तोह घर था हे नहीं लेकिन यहाँ सुशीला और बबिता अपने अपने कमरों में जाग रही थी. सुशीला बंद कमरे में एक झीना घाघरा और कमीज पहने जैसे कुछ घटने का इन्तजार कर रही थी. पूरा कमरा और खिड़किआ कई बार देख चुकी थी जैसे कोई डर हो किसी की नजर का. ठीक 11:30 पर वह टेलीफोन के सामने बैठ कर नंबर मिलाने लगी.

"सुशीला बोलू सु.", उसके पर्वत से बड़े उभर इस वक़्त ऊँची टेबल पर ठीके थे जिस तरह वह फ़ोन पर झुकी सामने वाले को अपना परिचय दे रही थी.

"शीला, भीम ने फ़ोन दे.", दूसरी तरफ से आवाज सुनते हे उसने भीम को लाइन पर आने का कहा और फिर हलकी हांफती आवाज कान में सुनाई दी.

"तू इस बख्त भी अपनी माँ के छेड़ में ग़ुस्सा से? थोड़ी ताक़त बचा के राख ले बीटा, बहोत जरुरी है.", सुशीला की बात सुनकर सामने से कुछ देर आवाज आती रही.

"बेरा है मैंने के तू कोन्या थकता लेकिन तेरी छोटी सी गलती का बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सके है. मेरे से ज्यादा नुक्सान तेरा हे होगा इस खातिर फ़िक्र है. कड़े तू इस बुध्दिया में जोर ख़तम कारन लाग रहा है, काल तेरी रानी मिलेगी उसका मजा लिए. ध्यान से सुन्न ेब. तड़के बाकी लोग तैयार रखिये, एक छोटी सी चूक आरर सारा खेल खराब. व बिंदु ाली घनी चालाक से, पक्का कोई जुगत भिड़ाये बैठी होगी. आज सारा दिन वा आराम ते पड़ी थी मतबल साफ़ है के उसकी तैयारी कुछ ज्यादा हे है.", सुशीला की आवाज सिर्फ इतनी थी की 10 फुट दूर से कोई सुन्न न सके. भीम को बड़े ध्यान से वह सबकुछ काम से काम शब्दों में समझा रही थी.

"हाँ, बिपास वाला गोदाम जमा सुरक्षित है. आज ठीक करवाया है मैंने.", सुशीला ने काम को अंजाम देने की जगह का बताया.

"देख भीम वा मेरे बस की कोणी.", सामने से जो भी कहा गया सुन्न कर सुशीला थोड़ी नरम पड़ गई थी और फिर से भीम की बात सुन्न ने लगी.

"मेनका का वादा मेरा था आरर बबिता और तेरे बीच में बिजेन्दर है. पहले काल का काम निबटा ले फेर कोई हल करेंगे इस बात का.", सुशीला की चिंता जायज़ थी लेकिन जल्द हे वह ठीक हो गई.

"हाँ, पक्का. मेरी तरफ तेह निश्चिंत रह. ेब थोड़ा आराम कर ले तू, भोत काम है अगले दिन में.", सुशीला ने फ़ोन रखने के बाद एक लम्बी सांस ली और कुछ पल वैसे हे बैठी रही. 'यु बी बबिता का दीवाना से और बिजेन्दर बी. बिजेन्दर जेल में भेजना पड़ेगा 2-4 साल आरर इसके कीड़े मैं काडुंगी. घाना लालच आ गया कमीं के दिल में. शंकर तेरी एक बार की ना देख तेरा सबकुछ उजाड़ के जावेगी.', कुर्सी से कड़ी हो वह बिस्टेर पर आती हलके गुस्से से अपना एक उभार दबाने के बाद करवट ले कर लेट गई. सोने से पहले भी जुबान पर आखिरी नाम शंकर का था. आज भी घर का वह अज्ञात शक्श समान्तर फ़ोन पर साड़ी बातें सुन्न कर हैंडल पर हाथ रखे उस हरे टेलीफोन को देख रहा था.
 
अपडेट 96

शंखनाद से पहले


साढ़े 3 बजे अर्जुन की नींद खुली तोह बुआ का मांसल बदन उसकी बाहों में था. मधु बुआ अल्फ नंगी उसके सीने में अपने सतांन दबाये लिपटी हुई सुकून से सो रही थी. अर्जुन कमरे की हलकी नीली रौशनी में वह शांत मासूम चेहरे देखने लगा. ऐसा लगता था के जैसे वर्षो बाद वह चैन से सोई हो. उभरे होंठ किसी छोटे शीशी पीते बचे से ऊपर उठे हुए और चेहरे पर ये अलग हे नूर. उन्हें देखते हुए अर्जुन ने गालो पर आये कुछ बाल पीछे किये तोह वह जैसे कोई मीठा सपना देखती मुस्कुराने लगी.

'बहोत प्यारी हो आप बुआ. आपको भी जीवन में वह प्यार न मिला जो मिलना चाहिए था. मैं कोशिश करूँगा कुछ खुशियां आपके जीवन में देने की.', उनके गाल को हलके से चूमते हुए वह फिर से चेहरा उनके सामने किये लेट गया. आँखे अभी भी बुआ को हे देख रही थी. जाने कैसे लेकिन नींद में हे बुआ ने अपनी टांग उसके ऊपर रखते हुए निचला हिस्सा भी साथ लगा दिए. रात 2 बार भरपूर चुदाई होने के बाद भी जैसे वह ख्वाब में भी वही कर रही थी. लुंड उनकी ऐसी हरकत से अकड़ता हुआ उनकी जांघो के बीच दबाव देने लगा तोह बुआ ने अर्जुन को जोर से पकड़ते हुए होंठो पर होंठ लगा दिए.

"मानोगी नहीं आप?", अर्जुन ने अपने मैं में हे ये कहा और ऊपर वाले हाथ से पकड़ कर अपना अकड़ा हुआ लिंग बुआ की बहार निकली मोटी फैंको के बीच दबा दिए. हैरत की बात थी की वह इतनी गीली थी जैसे कोई स्खलन हुआ हो अभी. उनके नरम नितम्भ अपनी तरफ करता वह बड़े प्यार से छूट के अंदर अपना लुंड उतरने लगा.

"माहहह.. सुधर जाओ.. आठ.", बुआ की नींद उचट गई उस मॉटे डंडे को छूट में जगह बनाते देख. फिर अर्जुन से लिपटी वह खुद हे उसके उअप्र आ गई. गीली गली में पूरा रास्ता उस विकराल लिंग से भरने के बाद आराम से उसके सीने पर लेट गई. प्यार से उसके चेहरे, होंठ और ठुड्डी को गीला करती बुआ को फिर से अर्जुन का नशा चढ़ रहा था.

"सपने में भी आप यही कर रही थी न?"

"जिस वक़्त तुम्हारा महसूस हुआ ठीक तभी शायद मैं झड़ी थी. आठ.. ये अंदर होने पर लगता है मैं पूरी हो गई हु. तुम भी काम नहीं हो.", अर्जुन ने दोनों के सीने के बीच एक हथेली डालते हुए उनका सूजा हुआ मोटा निप्पल और नरम उभर पकड़ लिया. आमतौर पर छोटे लाल बैर सा रहने वाला निप्पल अभी सूजा हुआ दोगुना लग रहा था. धीमे धीमे कमर उछलती वह अब सीढ़ी बैठ गई थी. खुले घुंगराले बाल और जोरो से हिलते दोनों बड़े सतांन. अर्जुन भी हल्का ऊपर उठता उनका एक चूचक मुँह में भर के पीने लगा और फिर बुआ की कमर पकड़ कर जैसे उनकी उछलने में मदद करने लगा.

"ाःह... ये हर वक़्त तैयार रहता है? काश ये करना मैं देख पाती..", बड़े कूल्हे आधे से ज्यादा लुंड अंदर बहार कर रहे थे. और बुआ की ऐसी मंशा जान कर अर्जुन उन्हें आराम से एक तरफ करता उठ गया.

"क्या हुआ?", वो जैसे किसी अनहोनी का सोच कर डर सी गई थी.

"कुछ भी नहीं मेरी प्यारी बुआ. चलो मेरे साथ आओ.", उन्हें अपना हाथ देता वह बुआ के साथ हे बाथरूम में आ गया. बुआ कुछ समझ नहीं पा रही थी लेकिन अर्जुन का कहा मानती वह दिवार से लग कर कड़ी हुई और उनकी एक टांग ऊपर उठता वह एक धक्के में हे उनके अंदर पूरा समां गया.

"ाःह.. ये क्या कर रहा है रे?", बुआ का जिस्म जितना भरा हुआ था उतना हे लचीला था. अर्जुन भी आराम से उन्हें दिवार से लगाए हलके धक्के देता अपनी छाती से उनके मॉटे उभर दबा रहा था.

"शीशे में देख लीजिये उधर. आठ.. आपकी इत्छा पूरी हो जाएगी.", उनका गाल चूमता वह चेहरे को उधर करते हुए बड़े प्यार से बुआ की नरम छूट का मर्दन करने लगा. और शीशे में उस मॉटे तगड़े लुंड को अपनी नरम उभरी छूट के बीच अंदर बहार होता देख एक पल को तोह बुआ भी शर्मा गई फिर गहरे धक्को और मस्ती में वह देखना जैसे और सुखद लगने लगा. हर बार वह सख्त सा डंडा अंदर से और चमकता हुआ बहार निकल रहा था. मॉटे गुब्बार डब्ब कर बहार निकल रहे थे.

"आठ.. कस कर मार.. ये तोह और मजा दे रहा है आह्हः.. कैसी चौड़ी कर दी है रे तूने मेरी... उम्म्म..", बुआ हैरान हो गई जब अर्जुन ने उनका भरी शरीर ऊपर उठाते हे दोनों कूल्हे थाम कर जड़ तक लुंड पेलना शुरू कर दिए. सिसकती हुई वह भी अपने पाँव उसकी कमर पर लपेटे हाथो से गर्दन पकड़ कर अपनी गांड तेजी से हिलने लगी.

"माह.. अम्म्मम्म.. मजा आ रहा है ऐसे तोह.. आठ.. तू कितना तगड़ा है रे. ", अब शीशे को छोड़ वह अर्जुन को देखने लगी. जल्द हे दोनों होंठो को चूसते इस चुदाई को और आगे ले गए. अगले 20 मिनट में दोनों हे बाथरूम में 4-5 अलग आसान से ये चुदाई सुख ले चुके थे. दिवार पर हाथ टिकाये बुआ अब पीछे से अर्जुन से छुड़वा रही थी. वह भी घोड़े के तरह उन्हें जोरो से अंदर तक हिलता हुआ बड़े खरबूजे मसल रहा था.

"मैं होने वाला हु बुआ.. आह..", बुआ की छूट जाने 4 बार या 5 बार झड़ने के बाद फिर से कसने लगी थी.

"अंदर हे भर दे ये आह्ह्ह्ह.. आराम मिलेगा.", छूट में अपना रस भरता वह खड़े हुए हे जोर से उनसे लिपट गया था. बुआ भी लम्बी साँसे लेती हांफ रही थी. कुछ आराम करने के बाद अर्जुन ने फुहारा चला दिए.

"नाहा हे लो अब आप. फिर मैं घूमने जाऊंगा और आप आराम से सोना.", बुआ फर्श पर लेट गई थी. गांड का दर्द कुछ काम हे हुआ था के अब उनकी छूट सूज चुकी थी. अर्जुन ने उनका पूरा शरीर पानी के नीचे प्यार से साफ़ किआ और सूखने के बाद बदन पर लोशन लगा कर थोड़ी रहत दी. गॉड में लिए हे वह उन्हें बिस्टेर तक ले आया.

"ये गाउन पहन लीजिये और अब आराम कीजिये.", अर्जुन ने उनको प्यार से चूमने के बाद एक पूरा गाउन गले में डालते हुए कहा. उन्होंने भी मुस्कुराते हुए दोनों हाथ गाउन से निकलकर शरीर का सही से ढाका और उतने हे प्यार से अर्जुन के होंठ चूम कर कुछ देर सीने से लगी रही. अर्जुन को भी उनका ऐसा करना ाचा लगा.

"आप रो क्यों रही हो?", अलग होते हे उनकी भीगी आँखे देख अर्जुन उनका हाथ थाम कर साथ हे बैठ गया.

"भगवन ने इतनी खुशियां नहीं दी थी न पहले. तू बड़ा प्यारा और साफ़ है अर्जुन जो जिस्मानी सम्बन्ध के लालच से कोसो दूर अपने साथी का इतना ध्यान रखता है, परवाह करने के साथ हे एहसास करता हे के तुम्हारे लिए मेरा कितना आधी मूल्य है. कपडे तोह अशोक और शंकर ने अपनी मर्जी से अनगिनत बार उतरे, मार भी खाई है मैंने कभी कभी दिल न होने की वजह से लेकिन तुम बिलकुल अलग हो. थोड़ी देर बैठोगे मेरे पास.", अर्जुन से जैसे उन्होंने निवेदन किआ था, प्यार से भरा.

"आपको ये नहीं कहना चाहिए.", अर्जुन ने बुआ का हाथ चूम कर पहले 2 तकिये बिस्टेर की पुष्ट से लगाए और फिर बुआ को अपने साथ लगता वह जुड़ कर बीएड पर उनके साथ हे बैठ गया. आँखों से निकले दोनों मोती अर्जुन ने साफ़ करते हुए अब एक हाथ बुआ के कंधे पर रख लिए था.

"शादी से पहले मेरा पहला प्यार शंकर था. वह हमेशा सामने रहा जब मैं बड़ी हो रही थी. फिर सही वक़्त आने पर उसने मुझे लड़की से औरत बनाया और ये जवानी का जोश जो होता है ये उस दूध की तरह होता है जो जितनी बार चूल्हे पर रखो उबाल लेने लगता है. लेकिन ध्यान देने पर पता चलता है के वह काम भी होता रहता है. फिर आखिर में सख्त. शंकर से मुझे शिकायत नहीं थी कोई लेकिन मैं उस पर हक़ समझती थी. पता चल के उसकी ज़िन्दगी में मैं अकेली नहीं थी. दर्ज़न भर होंगी कोई और वह जब घर आता तभी मेरे कहने पर हे करता था. शादी के बाद अशोक भी सिर्फ अपनी मर्जी होने पर यही करते, मेरी मर्जी से उनको कभी फरक हे न पड़ा. ऐसा नहीं के प्यार नहीं करते मुझसे, लेकिन ये मर्द जो होता है न जिस्मानी समय में ये हावी रहना चाहता है, मर्दानगी और औरत पर अधिकार दिखने के लिए.", बुआ जैसे आज अपना पूरा दिल अर्जुन के सामने खोलना चाहती थी. अर्जुन तोह वही पक्ष जानता था जो बुआ और उसके पापा के दरमियान था.

"फिर पैसा, kaam-dhanda, परिवार. मैं तोह कही दिखी हे नहीं किसी को. शंकर तोह तारा के होने के बाद वह कभी आया नहीं कई साल और यहाँ आ कर मैं जब भी उस से मिलती तोह तड़प बढ़ जाती थी. अशोक के साथ मेरा अब मैं नहीं करता था और शंकर मेरे साथ घर से भागने को तैयार नहीं था. मानती हु मैं गलत कर रही थी लेकिन मेरे अंदर जो चल रहा था उसकी परवाह किसी ने न की. पुराने घर में 15 मिनट चुदाई की वह भी जैसे खुदको पसंद हो, फिर कभी रात में इस ऊपर वाली मंजिल पर क्योंकि शंकर पीने के बाद उतावला रहता था. घर वापिस जाने के बाद सब वही. इस चक्कर में मैंने भी शराब शुरू कर दी. नशे में मुझे दर्द सहने की हिम्मत मिलती थी. फिर अशोक आगे करे, पीछे या मुँह में. 6 महीने या साल बाद शंकर आता तोह मैं ये सब उसके साथ भी करती. अब वह भी फिर से आसक्त हुआ के मधु अब उसके हिसाब की हो गई है. लेकिन उस शराब की वजह किसी ने नहीं पूछी, मेरे आत्मा को सहलाना तोह दूर किसी ने ये भी नहीं पुछा के मैं इतनी क्यों बदल गई.", बुआ अर्जुन के कंधे से लगी एक हाथ सीने पर रखे थी. थोड़ी देर पहले वाली मधु जैसे अब अन्धकार में डूब चुकी थी. अर्जुन उनका सर सहलाते हुए जैसे उन्हें प्रेरित कर रहा था जीवन को सँभालने के लिए.

"जानते हो मैं यहाँ आई थी तब मैंने पहले बार शंकर से कहा था के रेखा को भी समय देना. जाने कैसे मेरे दिल से वही निकला जो मैं खुदके लिए न कह सकीय थी. और फिर मुझे तुम मिले. नादान से दिखने वाले मासूम जिसके प्रति मैं माँ की उम्र होने पर भी खींची चली दी. बहुत रोका खुदको, तुम्हे भी दुःख पहुंचाया लेकिन फिर मुझे जो प्यार और िज्जात्त तुमने दी वह सब घाव भर गया. अंदर और बहार दोनों के. मुझे ये मासूम सा लड़का इतना समझदार है, प्यार को जानता है ये पता चला. तुम कोई वादा नहीं करते जैसे दूसरे लोग पहली बार जिस्म मिलने पर दुनिया जहा की कस्मे खा लेते है. लेकिन तुम मेरे खुद उतरे कपडे पहनाने से पहले मुझे गहराई से देखते हो. कही कोई जख्म न दे दिए हो, दुःख न पहुंचाया हो. कल रात मैं वैसे हे सोई थी जैसे बचपन में नासमझ सी bhag-daud के बात खुश हो कर सो जाती थी पापा के गुड़िया दिलाने पर. इतना समझदार किसने बना दिए तुम्हे?"

"हालात ने बुआ. पापा का माँ को हमेशा दबाना, दादा जी का अकेले हे म्हणत करना 3 जवान बेटे होने के बावजूद, बहनो पर पाबंदिया, आपका पापा के लिए तड़पना और फिर मेरा इस घर से जाना. कृष्णा माँ को मेरी परवाह थी लेकिन वह भी न रह सकीय मेरे साथ. फिर अकेला रहने पर मैंने देखा की बड़ा इंसान छोटे को हमेशा दबाता है, डरता है जबकि वह उस ताक़तवर के लिए din-rat म्हणत करता है. फिर किताबे और दादा जी की शिक्षा ने मुझे खुद को बदलने में साथ दिए. वापिस आने पर दादाजी ने एक बड़ी बात कही थी जब मैं उनसे कहता था के आप हमेशा दादी जी से डरते है. वह बोले की मेरी दादी हे है जो उनके हिस्से की भी साडी जिम्मेदारिअ अकेले निभाती रही है. ये डर नहीं है, समर्पण है. समर्पण इंसान को ज्यादा मजबूत बनता है क्योंकि फिर वह अकेला नहीं होता. किसी का दिल या दर्द हे नहीं समझूंगा तोह वह मुझे समर्पित क्यों होने लगा? ये दोनों तरफ से काम करता है और जितने आपस में पूर्ण समर्पण हे नहीं तोह फिर प्यार कैसे हुआ?", अर्जुन ने सरलता से इतनी गहरी बातें कह दी थी.

"बुआ, आप जब दिल से मेरे साथ है. मुझे ख़ुशी दे रही है, मेरी देखभाल भी करती है तोह मैं वही क्यों न करू? और कैसे वाडे हम कर सकते है सिवाय इसके की जब भी हम दोनों होंगे तोह निश्छल और साफ़ होंगे एक दूसरे के साथ, पूरे दिल और आत्मीयता से. इतने अनमोल समय में कैसे आपको क्षति पहुंचने की गलती कर सकता हु? यादें तोह गुलाब सी होनी चाहिए न इन पालो की, महकती हुई ख़ास सुगंध लिए. हमारे एकांत में तोह मैंने कभी आपको किसी रिश्ते से नहीं देखा सिवाय प्यार के, और आप बड़ी है तोह मुझे आपका ज्यादा ख्याल रखना हे होगा. वैसे अब शराब मैट पीना आप.", अर्जुन ने सुबह के वक़्त इन गंभीर बातों को इस मस्ती से ख़तम करते हुए मुस्कुरा कर उनकी नाक पर हलके से चूम लिए.

"ये पापा तुम्हे पैदा नहीं कर सकते थे क्या?", वह भी लाड से अर्जुन के सीने लगती कहने लगी.

"शादी फिर भी नहीं होने वाली थी. और आप अब ज्यादा ाची दिखती हो, उस वक़्त की तस्वीर मैंने देखि है. दुबली सी.", अर्जुन उन्हें प्यार से सताते हुए अलग हुआ और वह नाराजगी से हाथ मरने का दिखावा करने लगी. अपने कमरे की तरफ जाता वह जल्दी से उन्हें चूम कर फिर भाग गया.

"शैतान कही के. तू मिल अगली बार मुझे."

"रात का क्या ख़याल है बुआ?", अर्जुन कमरे में कपडे बदलते हुए बोलै.

"भूल जा तू अब. बुरा हाल है पहले हे मेरा. अब सोने दे थोड़ी देर.", नाटक करती वह लेट गई थी और अर्जुन तैयार हो कर उनके कमरे में आया तोह बुआ की बंद आँखे देख कमरे को ठीक करता वह फिर बहार निकल चला.

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खुशनुमा माहौल था इन वृक्षों के झुरमुट और खुल्ले आसमान के टेल. 5 बजे वातावरण पूर्ण शांत था यूनिवर्सिटी के अंदर हे आगे के इस जंगल सी जगह पर. हलके उजाले में घास पर बैठा अर्जुन अपने पास बैठी मुस्कान की बातें सुनता हुआ उस छोटे तालाब को देख रहा था. 5-6 भूरी रंग की बतख खास तरीके से चलती फिर पानी में उतर रही थी. बराबर हे बेटी मुस्कान एक उजली सफ़ेद ढीली टीशर्ट और घुटनो तक की जीन्स की निक्कर पहने थी.

"बड़े आराम से बैठे हो यार. वह सब लोग जुंग की तैयारी में लगे है और तुम मेरे साथ इस जंगल में इतनी सवेरे बैठे बत्तखे देख रहे हो.", मुस्कान के रेशमी सीधे बाल सही से एक रबर में बंधे उसके कंधे से नीचे ठीके थे. वह भी अर्जुन की नजरो का पीछा करती वही देख रही थी.

"बताओ फिर मैं क्या करू? अब उन्होंने जो करना है वह करेंगे लेकिन उनके चक्कर में मैं क्यों ये अनमोल पल खराब करू? इतनी प्यारी दुश्मन साथ बैठी है और सामने पक्षियों का पूरा परिवार मजे ले रहा है.", अर्जुन की इस हलकी सी हंसी पर वह भी मुस्कुरा दी.

"दुश्मन तोह मैंने तुम्हे कभी नहीं मन. और मैं कबसे प्यारी हो गई?", वह मुँह बनती हुई दूसरी तरफ देखने लगी जहा 10 फ़ीट ऊँचे घने सरकंडे लगे थे. अर्जुन ने एक बार मुस्कान की तरफ देखा और छोटा सा तिनका उसके कान से लगते हुए मस्ती करने लगा.

"ोुछ.. पागल कही के. मैं सच में परेशां हु और तुम हंस रहे हो."

"किस बात से परेशां हो? यही की तुम्हारी दीदी के लोग और कई दूसरे लोग मिलकर मुझे ख़तम कर देंगे. तोह ाचा हे है न. फिर तुम भी आजाद हो जाओगी इन सब मुश्किलों से और घर वापिस जा सकोगी. इतने लोग अगर ऐसा चाहते है तोह कोई बड़ी वजह हे होगी. फिर इस से उनको सुकून मिलेगा तोह ाचा है.", बात कहता वह मुस्कान को देखने लगा जो मुँह फेरे बात सुनती रही और एकदम से उसकी तरफ पलट कर ढीले हाथ से करारा तमाचा गाल पर मार दिए. आँखों में आंसू भरे थे मुस्कान की और अर्जुन को थप्पड़ मारती वह खुद हे उसके गले से लग गई. वह अब भी शांत हे था.

"मुझे प्यार नहीं करते ये मैं जानती हु. लेकिन मैं करती हु प्यार और वह लोग मुझे मार दे तोह मैं खुशकिस्मत समझूंगी खुदको. मेरी आँखें अब बंद भी नहीं होती रात में की उन्होंने तुम्हे कुछ कर दिए और इसकी जिम्मेवार मैं हु.", शान्ति कुछ हद्द तक भंग्ग हो चुकी थी मुस्कान के foot-foot के रोने से. गुलाबी गाल आंसुओ से टर्र थे और वह हल्का हिलती हुई अपने अंदर भरे दर्द को निकलने लगी.

"सब बातें तुम हे सोच लेती हो क्या? मैं प्यार नहीं करता? वह मुझे मार देंगे? जिम्मेवार तुम हो? अरे कितनी पागल हो तुम तुम्हे खुद नहीं पता. और बिलकुल नासमझ भी. शबनम ने जाने क्या सोच कर तुम्हे काम लगाया था जो हर बार तुम मेरी आँखों में रही. जब मैं खुद तुम्हारी बहिन की पहचान वापिस दे सकता हु और तुम्हारे हाथ अपनी और पापा की तस्वीरें उन तक पंहुचा सकता हु तोह तुम्हे अभी भी लगता है के अर्जुन तैयार नहीं है? रोना बंद करो और रात को तैयार रहना.", अर्जुन ने आखिरी बात बिलकुल कान को चूमते हुए कही.

"तुम इंसान हो भी या नहीं? यहाँ मैं इस सबसे इतनी परेशां हु की सो नहीं पा रही और तुम गन्दी बातें कर रहे हो.", मुस्कान सिसकते हुए अपने भीगे चेहरे से उसको देख रही थी. फिर अर्जुन ने उसके चेहरे को खुद हे साफ़ किआ और अपना हाथ मुस्कान की कमर में डालता अपने से लगाए बैठ गया.

"न तुम मुझे कुछ बताओगी के वह कौन लोग है और न मैं तुम्हे बताऊंगा के मैं क्या सोच कर निश्चिंत हु. लेकिन सच कहता हु के आज मैं तुम्हारे पास जरूर आऊंगा, रात में. मेरा दिल है तुमसे ढेरो बातें करने का, jaan-ne का और मेरी वजह से अब तुम अकेली पड़ गई हो तोह फिर ज़िन्दगी के बारे में कुछ सोचना तोह पड़ेगा. जिम्मेवार मैं हु इस सबके लिए तुम नहीं.", अर्जुन कही न कही मुस्कान की इस हालत से चिंतित था.

"वह लोग बहोत खतरनाक है अर्जुन. शबनम भी उन्हें इतना नहीं जानती क्योंकि वह एक तरह से मुझे सामने रखती आई है और इधर वह बस 10 दिन से हे है. 6 महीने वह बॉम्बे हे थी और उस से पहले साल में एक बार 2-3 दिन के लिए इंग्लैंड से इधर आती थी. मैं वह लोग करीब से देखे है और उन्हें समझा है. बेरहम, चालाक और हमारी सोच से कही ज्यादा ताक़तवर. और वह मेरी जानकारी से भी ज्यादा हे होंगे. मैं इनमे से किसी की सगी नहीं हु तोह मुझे जान बूझ कर सामने रखा गया और ऐसी इमेज बना दी जैसे मैं बिगड़ैल अमीर लड़की हु, कल को सब गायब हो जायेंगे और मैं इस सबकी जिम्मेदार कहलाउंगी.", मुस्कान समझदार थी जिसको अपने हे परिवार वालो के मनसूबे पहले से पता थे.

"तुम्हारे तक बात नहीं आएगी. वैसे तुम्हारे पापा तोह ऐसा कभी नहीं कर सकते मुस्कान. एक बाप कभी बेटी को खतरे में नहीं डालेगा."

"अर्जुन, पापा से माँ ने दूसरी शादी सिर्फ इसलिए की थी क्योंकि वह इंग्लैंड के नागरिक होने के साथ हे एक बड़े परिवार के सबसे लाडले लड़के थे. माँ खूबसूरत थी और पापा अपाहिज. वह व्हीलचेयर पे है जबसे शादी हुई, शायद उस से भी पहले से. फिर आधी से ज्यादा प्रॉपर्टी माँ के नाम हो गई और पापा भी उनके सामने बेबस. दादी के बाद अब माँ हे परिवार के हेड है, ताऊजी के होने के बावजूद. उन्होंने हे माँ को बनाया है जैसे.", लड़की कही भी कोई गलत अल्फाज नहीं बोल रही थी. अर्जुन उसकी ऐसी हालत देख दुखी हो गया था. इस बार उसने खुद मुस्कान को अपने सीने से लगा लिए और वही घास पे लेट कर आँखें बंद कर ली. मुस्कान को तोह जैसे इतने प्यार की सपने में भी उम्मीद न थी.

"सब ठीक हो जायेगा मुस्कान बस अपने नाम को याद रखना. पता नहीं कैसे होगा लेकिन तुम्हे पूरा परिवार मिलेगा और उतना हे प्यार जितना हर लायक बेटी को मिलता है. तुमने अपने हिस्से का दुःख जी लिए है और अब बाकी सबकी बारी है. एक मासूम के कंधे पर बन्दूक रख कर चलने की बड़ी भारी गलती कर दी.", अर्जुन कभी उग्र नहीं होता था लेकिन जैसे सीने से लगते हुए वह मुस्कान के दर्द से जुड़ सा गया था.

"वह लोग..."

"शठ.. सब को भुगतना पड़ेगा. पता था के ऐसा कुछ होने वाला है लेकिन पहले मैं सिर्फ इसको एक बदले की मंशा से लिए जाने वाले प्रतिशोध की तरह देख रहा था लेकिन ये क्षद्यंत्र है और इसमें जितने भी शामिल है सबको सजा मिलेगी.", अर्जुन की आवाज हलकी कांप रही थी लेकिन वह तेज नहीं थी. मुस्कान को पहली बार लगा था जैसे अर्जुन सचमुच अलग है उसकी सोच से. बेशक वह ताक़तवर है और उसमे शक करना बेवकूफी थी क्योंकि उसने खुद आँखों से देखा था की उसके भीतर एक जानवर और है.

"शांत हो जाओ.", बड़ी नरम आवाज में मुस्कान ने कहा तोह अर्जुन ने उसका शरीर ढीला छोड़ते हुए खुदकी आँखे भी बंद कर ली. लेकिन मुस्कान खुद उसके ऊपर सरकती अर्जुन के शांत चेहरे को देखने लगी. अपनी भी आँखे बंद करती वह उसके होंठो पर झुकी लेकिन उसको नहीं पता था के वह क्या कर रही है. बंद होंठो से अपने भी नरम होंठ भिड़ती वह वैसे हे रही. अर्जुन के चेहरे पर लम्बी सी मुस्कराहट आ गई.

"तुम्हे किश नहीं करना आता? इंग्लैंड से हो फिर भी नहीं? मंजू को तोह बहुत कहानिया सुनाई हुई है तुमने.", अब वह घास पर लेती थी और अर्जुन सिर्फ उसके चेहरे पर एक तरफ से झुका था. शर्म से आँखें बंद करती वह गर्दन ना में हिलने लगी.

"इंग्लैंड का मतलब ये तोह नहीं की वह हर कोई हर तरफ चूमता फिरता है. मैं जॉइंट फॅमिली में रही हु और हमेशा अपने पापा के पास. टीचर घर पढ़ने आते थे और फिर यहाँ आने के बाद मैंने क्या किआ है वह तुम्हे भी पता होगा. हाँ मंजू मेरी ाची सहेली है और अपनी इमेज खराब करना फिर उसके सामने हे शुरू किआ था. वैसे तुमने मंजू को किश किआ है?"

"हर बार किश से ज्यादा हे करता हु. पूछ लेना मन नहीं करेगी बताने से जैसे प्रीती ने तुमसे कहा था.", अर्जुन ने दोनों का नाम लेते हुए भी आवाज में शोखी बरक़रार राखी.

"कितने गंदे हो तुम. 2-2 गर्लफ्रेंड और ये सब भी करते हो.", वह शर्म से चेहरा घूमने लगी.

"अब 3-3 कहना ठीक रहेगा.", अर्जुन ने जैसे प्यार से उसका चेहरा थामा तोह मुस्कान ने हिम्मत करते हुए उसका चेहरा नीचे खींच लिए. अपनी पतले गुलाबी होंठ खोलती इस बार वह खुद हे पूरे जोश से अर्जुन को चूम रही थी. होंठो का रस अगले एक मिनट तक बदलता रहा फिर अलग होने पर दोनों हे ऊपर आसमान देखने लगे.

"तुम्हे तोह आता नहीं था?"

"फिल्मे इंग्लैंड में भी देखने को मिलती थी और यहाँ भी. बड़ी हु तुमसे, कॉलेज गर्ल."

"ये स्कूल वाला बॉय तुम्हारी साड़ी फिल्मे भुला देगा.", अर्जुन वैसे हे लेता मुस्कुरा रहा था और मुस्कान फिर से उसके ऊपर झुकती बड़ी नजाकत से छोटे छोटे कई चुम्बन होंठो पर लगातार करती रही. जाने ये कैसा तरीका था के अर्जुन का दिल धीमे धड़कने लगा, सुकून से. शरीर हल्का हो चूका था और अब मुस्कान भी बालो से रबर निकले उसके सीने पर सर रखे लेती थी.

"बटरफ्लाई किस्सेस. आईटी कनेक्ट्स तवो सोल्स. एक इंग्लिश शार्ट मूवी में देखा था मैंने ये. तुमसे पहले सिर्फ ब्रूनो के साथ इसकी प्रैक्टिस की थी."

"ब्रूनो?"

"रूम में आओगे तोह मिलवा दूंगी. जेलस मत होना फिर. वैसे तुम क्यों होने लगे 3-3 गर्लफ्रेंड वाले हो."

"उठो तीसरी जी. आसमान साफ़ होने लगा है अब मुझे चलना होगा और तुम बिलकुल भी अकेले नहीं रहना फ़िलहाल."

"ये बात मुझे तुम्हारे लिए केहनी चाहिए.", अर्जुन उसकी परवाह देख हँसता हुआ कच्ची सड़क पर कड़ी मोटरसाइकिल तक आ गया, पीछे हे मुस्कान आ रही थी.

"अकेला नहीं हु मैं लेकिन तुम अपना ध्यान रखना.", अर्जुन जैसे उसको आश्वस्त करना चाहता था और मुस्कान इस बार अलग तरह से पीछे बैठी थी, दोनों तरफ पाँव करती उसके पीठ से चिपक कर.

"तुम न जैसे दीखते हो बिलकुल वैसे नहीं हो. बदमाश और शरारती से.", सर पीठ पर रखती वह फिर थोड़ा चिंतित हो गई थी.

"जो कहा है वह याद रखना."

"हाँ हाँ अकेली नहीं रहूंगी और ध्यान रखूंगी अपना."

"मेरा मतलब था रात के बारे में.", अर्जुन मोटरसाइकिल लिए आगे बढ़ चला और मुस्कान उसकी पीठ पर हलके से चपत लगती हंसने लगी.

.

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"दोनों गाडी जा रही है? और भैया आप कब आये?", अर्जुन जल्दी तैयार हो गया था और फिर सभी जब जाने लगे तोह वह बहार उनके साथ हे चला आया. यहाँ सफारी और एस्टीम दोनों गाडी कड़ी थी. साथ हे संजीव भैया और एक पुलिस का हवलदार भी.

"हाँ भाई अब बाकी लोग तोह नाराज नहीं कर सकते. इसलिए सोचा सबको हे ले चलते है. बस तेरी ताईजी आरती दीदी घर में है बीटा तोह स्कूल से आने के बाद थोड़ा ध्यान रखना अगर कोई सामान लाना हो. वैसे रात को हरपाल आ जायेगा निगरानी के लिए और आँगन में हे बिस्टेर लगवा देना उसका.", दादाजी ने अर्जुन को साडी हिदायते दे दी थी जो अपने भैया के साथ लगा खड़ा था. हरपाल पुलिस का हवलदार था और पहले वह रामेश्वर जी का ड्राइवर रह चूका था.

"ारु, मेरी लीव टेबल पर हे राखी है. भाई मेरी क्लास में दे देना प्लीज. 2 दिन की दी है.", रुपाली दीदी ने उसको आज ारु कह कर बुलाया था और अर्जुन मुस्कुराता हुआ उन्हें देखने लगा.

"किसी और का भी कोई काम हो तोह बता देना. वैसे स्टेडियम तोह जा सकता हु न.", ये उसने अपनी दादी को देख कर कहा था और कौशल्या जी भी उसको गले लगाने के बाद बीच वाली सीट पर बैठने लगी.

"आजाद है तू बीटा. इनकी मत सुना कर इतनी, ललिता के पास सरोज भाभी आ जाएगी तेरी और वैसे भी पड़ोस में अपने हे लोग है. तू खाना खा के स्कूल चले जाना.", दादी की बात पर अर्जुन सर हिलता फिर माँ से गले मिला. सबको bye कहने के बाद जब संजीव भैया भी गाडी में बैठे तोह अर्जुन कुछ समय उनके गले लगा रहा. सबको ाचा लगता था उन दोनों का प्यार देख कर. भैया ने गाल थपथपाया और फिर दोनों गाडी घर से निकल कर अपनी मंजिल की और बढ़ गई.

"शुक्र है.. हहह..", अर्जुन उनके जाते हे अंदर आ गया. अभी स्कूल जाने में पौने घंटा बाकी था.

"लल्ला खाना लगा दू पहले तेरा?", ताई जी जैसे काफी समय से उठी हुई थी और सभी लोग नाश्ता करके गए थे इसलिए बर्तन धोने में लगी हुई वह रसोई में आ खड़े हुए अर्जुन से पूछने लगी.

"आज नाश्ता में आप हो क्या?"

"हट बदमाश. सुबह सवेरे हे शुरू हो गया. स्कूल से आने के बाद देखेंगे ये सब और रात भी है.", अर्जुन उनको छोड़ कर अलग होता मुस्कुरा रहा था.

"ताईजी फ़िलहाल तोह मैं एक बार तैयार हो जाऊ, 10 मिनट में आता हु नीचे.", अर्जुन फिर सीधा अपने कमरे में चल दिए, ऊपर वाली मंजिल पर. यहाँ अब भरपूर शांति थी क्योंकि तीनो कमरों में रहने वालो में से सिर्फ अर्जुन हे इधर था. अलमारी में कुछ ढूंढ़ता वह थोड़ा निश्चिंत हुआ हे था की सीने पर लिपटे ये नाजुक हाथ और पीठ पर 2 नरम गोले महसूस करते हे अर्जुन ने आँखे बंद कर ली. अलमारी आराम से बंद करता वह बोलै.

"इतने दिनों बाद आज आपको याद आई है आरती दीदी."

"तुम्हे पता है न, दीदी और घर में इतने लोगो के सामने मैं पास नहीं आने वाली. अब न रोक सकीय जब तुम्हे इधर आते देखा तोह.", ये आरती दीदी हे थी और अर्जुन से चिपकी हुई वह बेहद खुश नजर आ रही थी. अभी तक उनको अर्जुन का एहसास याद था.

"और थोड़ी देर बाद मैं स्कूल चला जाऊंगा.", अर्जुन ने उनका एक हाथ थमने के बाद उनकी तरफ मुड़ते हुए कहा. ढीले टॉप और पाजामे में वह हमेशा की तरह मासूम सी अल्हड़ लड़की लग रही थी, चश्मे के बिना. अर्जुन दूसरा हाथ कमर के पीछे लगता उन्हें साथ लगाए प्यार से निहारने लगा.

"तोह क्या हुआ? लेकिन 2 मिनट तोह हमारे पास है न.", उनकी बात सुनकर आज दिन चढ़ने से पहले हे वह तीसरी युवती को चूमने लगा था. आरती के भी हाथ उसकी पीठ पर कस्ते अर्जुन को खुद से चिपकने लगे. आरती के दोनों होंठ बुरी तरह गीले हो चुके थे और 1 मिनट बाद वह हांफती हुई मुस्कुरा रही थी.

"हो गई आज मेरी गुडमॉर्निंग. बाद में मिलते है.", उनकी हलकी कम्पटी टाँगे देख अर्जुन शरारती मुस्कान देने लगा.

"गंदे. ये होता है जब तुम्हारे पास आती हु.", और वह बड़ी हवा की गति से वह से निकल चली.

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मोहर सिंह घर में हो रही गतिविधि के बारे में तोह कुछ नहीं जानता था लेकिन मामला कुछ गड़बड़ जरूर लग रहा था. अपनी सोच में हे डूबा वह नोहरे में बैठा था. अभी नाश्ता करने के बाद वह हुक्का तैयार हे कर रहा था के साथ हे घर की हरेक बारीक बात पर गौर करने लगा.

'पहले आई थी शीला और साथ भीम. फेर 2 दिन बाद सुशीला गई थी सेहर आरर फेर या शबनम नीम अँधेरे में सीढ़ी सुशीला के गइल. चोखा मामला है कोई जो मैंने नई बता रे यो लोग. काल बिजेन्दर मांगेराम आरर गोलू के साथ गया था वह भी जीप में तड़के. आया साँझ ने. रात शबनम चस्के लेवे थी जिस तरह लेवे थी वह तरीका था अकेलेपन का. मतलब को बड़ी टेंशन से. हम्म्म. मैंने नई बता रे मतबल मेरे पे इनका भरोसा कोणी लेकिन काम चोखा बड़ा है.' मोहर सिंह को जैसे सभी लोग कमतर आंक रहे थे लेकिन ये अलग हे प्राणी था. ज़िंदगी भर सही समय पर गलत निर्णय और गलत समय पर सही जैसे इसकी किस्मत हे थी.

"राम राम मां, के ज्ञान?", ये बिजेन्दर हे था जो सुल्तान को अपने साथ लेके नोहरे में चक्कर लगाने आया था.

"लाडले तू आजकल दिखे हे कोणी. कड़े मामे के साथ सुख दुःख बतला लिए कर."

"मां तेरा दुःख तोह मई भी समझू सु. लेकिन आज किम्मे चिंतित लग्गे है.", बिजेन्दर निवार की बनी लोहे की कुर्सी पर सामने बैठ गया.

"देख बीटा मैं तेरा मां काम और दोस्त ज्यादा सु. दिल में एक बात घने टेम तेह थी लेकिन आज थोड़ा परेशां हु क्यूंकि किम्मे ठीक न लाग रहा तोह किसी दुर्घटना तेह पहला बता देना हे ठीक है.", मोहर सिंह ने हुक्के का पाइप कपडे से चमकते हुए कपडा एक तरफ रखा और अपने लम्बे चौड़े भांजे को देखते हुए कहने लगा. बिजेन्दर के दिल में भी मां की ऐसी आवाज सुनकर एक डर सा बैठ गया.

"देख बीटा, तू है भोला आरर हमेशा सीढ़ी सोच वाला आरर तेरा मां बहोत कपटी. लेकिन बेरा है मैंने आजतक कड़े तेरा बुरा नई चाहा.", मोहर सिंह चुप्प हो गया तोह बिजेन्दर अशांत.

"मां सीधा बता मेरे पहलवान दिमाग मई ये आदि बात कोन्या समझ आती."

"तू जिस से प्यार करे है वह तेरे से कोणी करे. जो तेरे से प्यार करे है तू जाने कोणी. बाकी सुशीला ने सिर्फ तन्ने एक हथियार की तरया तैयार कार्य है, बेटे की तरह न. मां आरर भांजा ने 2 एक जिहसे दिल होव है बीटा. 2 बार माँ आवे है मां में.", मोहर सिंह कही गहरी बात कर गया था.

"मां, मैं किसे तेह प्यार नई करदा. आरर मैंने कौन प्यार करे है. माँ वाली बात मान ली लेकिन औलाद हु उसकी मैं. जो बनेगा वह करूँगा उसकी खातिर.", बिजेन्दर दिमाग वाला नहीं था जो ऐसी बातें समझता वह सीधा और एक रस्ते चलने वाला था.

"बबिता तेरी कोंनी होव आज लिखवा ले. न सुशीला कड़े हों देगी. अनुपमा तेरे से जड़ से प्यार करे है जड़ तू आठवीं में था और व तीसरी में. आज भी तेरे कपडे वह धोवे है आरर प्रेस करे है. सिर्फ तेरी रोटी घर में व बना के ुद्दीक करे है के तू खावे फेर वाह निश्चिन्त हो के टूक टॉड सके. अक्षरा फेर भी हांड ले है लेकिन अनुपमा तेरी आवाज सुने पाछे हे बहार लिकडे है. मैंने मारन का जी कर रहा होगा तेरा लेकिन जी और कड़ा कर ले. सुशीला ने जुंग शुरू की थी या जड़ उसका ब्याह भी कोन्या होया था. चार परिवार एक थे आरर खूब प्यार था आपस में.", बिजेन्दर सच में गुस्से से अपने मां को देख रहा था.

"मार दिए लेकिन पूरे 10 मिनट दे मैंने भी. तेरी माँ कोणी आती आड़े आज."

"मैं सुनु हु तू बोल मां."

"सुशीला मरे थी शंकर पे लेकिन उसका प्यार थी मधुलता. शंकर ने तेरी माँ बेबे कह के ताल दी थी इस नोहरे में हे जड़ फ़तेह, उमेद बहार दारू पीवे थे. या गुस्से में कर गई बयार तेरे बाप गइल ार साथ ले मरी मधुलता ने, पंडित जी ने न्यू कह के शंकर ने तेरी माँ गइल जबरजस्ती कारन की कोशिश की. 3 परिवार जुड़े थे रामेस्वर जी के गइल आरर शंकर चुसक्या बी कोणी जड़ मधुलता तेरी चची बना दी गई. बाप की िज्जात्त आरर सबका भला हे सोच्या था उसने. लेकिन सुशीला आरर शीला ने मिलके जो आ आग लगाई उसमे सब झुलस गए फेर. गोली चाली, रघुबीर का परिवार आधा ख़तम होया आरर फेर बेरा नई के कुछ होया जो मैं कह कोणी सकू. शंकर गइल मेरा 36 का आकड़ा है या बात मैं कहु हु. मैं तेरी माँ की वजह से जेल गया आरर पाछे उसने तेरी मामी फसा ली. लेकिन वा 2 आदमिया की लड़ाई है, परिवार की कोन्या. तेरी माँ बिंदु गइल मिलके तेरी दादी न मरवा दे तोह कहिये बीटा. या महारे बाप के भी हाथ न आवे थी तोह हम तोह खैर छोटे हां.", मोहर सिंह ने हुक्के को बुझते देखा तोह काश खींचने लगा उधर बिजेन्दर के चेहरे पर हवाइयां उड़द रही थी.

"मां, तेरी एक भी बात साची होइ तोह मैं घर छोड़ दूंगा."

"तू घर संभल बीटा. अनुपमा के कमरे में घुस एक बरी आरर देख वा पागल के चाहवे है. यु जायदाद के 4 हिस्से है लेकिन ब्याह कर आरर 3 तेरे एक सुशीला का. लेकिन जोर जबरदस्ती कोणी. हाँ शंकर के साथ टक्कर लें की सोचो हो तोह ये Bheem-Bhum नीरे खस्सी है उसके स्यामि. तेरी गर्दन पकड़ के रबर सी खींच देगा इस उम्र में भी वह.", बिजेन्दर हैरान था ये सुनकर

"उसका छोरा लपेटन के चक्कर में हु मैं.", बिजेन्दर ने सीढ़ी बात की.

"बॉलीगाँड हो गया तू. किसकी बात करे है बेरा है? तेरी दादी ने फ़ोन लगा लिए आरर नंबर न हो तोह मेरे से लेले. खुदखुशी का यु आईडिया भी तेरी माँ का होगा.", मोहर सिंह शायद जरुरत से ज्यादा जानता हुआ भी चुप रहता था.

"के मतलब है मां? वह छोटा बालक है 17-18 का."

"तेरी मर्जी भाई. और सबने पता है के तू उसने कोणी मारे. तेरा चाचा लागे है न शंकर, तेरी माँ ने तोह ब्याह होये बाद भी थाम दोनुआ ने कोणी रोक्या था मिलान से. भड़के तोह बहोत थी वाह लेकिन मकसद था के तू शंकर जिससे बने. बन्न न सकता जितने मर्जी जनम लेले. कौशल्या जी शंकर ने जनन सके थी और जाम्या भी. एक तेरी दादी के स्यामि कोई छाती चौड़ी कारक बैठ सकीय है तोह कौशल्या चची है बाकी सब तोह आँख न था के देख सकदे.", मोहर फिर से हुक्का गुदगुदाने लगा.

"तू अर्जुन के बारे में कुछ बतावे था मां."

"ना कुछ न बताता मैं. मेरी बकवास बहोत होगी आरर देख कोई आया है.", ये अनुपमा हे थी जो सर पे पीला दुपट्टा लिए बिजेन्दर से नजर न मिलती बड़ा पीतल का गिलास सामने करती हुई बोली.

"जी आपका दूध ल्याई थी.", बिजेन्दर ने आज पहले बार देखा था मां की बात कुछ हद्द तक ठीक थी अनुपमा के बारे में. वह नजरे नहीं मिलती थी उसके साथ. लेकिन बिजेन्दर का हर काम वही करती आई थी.

"तू 2 मिनट आड़े बैठ अनुपमा मां गइल मैं औ हु.", सकुचाती सी वह बैठने की जगह आगे भैंसो की तरफ चल दी जो बिजेन्दर ने भी देख लिए था. वह अपने बाप को कभी पसंद नहीं करती थी. बिजेन्दर घर की दूसरी मंजिल पर तेजी से चढ़ता हुआ अनुपमा और अक्षरा के कमरों के सामने आ खड़ा हुआ. अनुपमा का दरवाजा सांकल से बंद था जिसको खोलता वह अंदर आ गया.

साफ़ और बिलकुल संभल कर रखा कमरा था वह. हिम्मत करता वह बिस्टेर के पास आया और गद्दा तकिये के पास से उठाते हुए देखा तोह वह 5x7"ki बिजेन्दर की तस्वीर थी जिसपे लिपस्टिक लगे होंठ चप्पे थे. फिर इधर उधर देख तोह कुछ ख़ास न मिला लेकिन अलमारी खोलते हे उसकी स्कूल की शर्ट अनुपमा के कपड़ो में एक तरफ राखी थी. यहाँ 2 पासपोर्ट साइज की दोनों की फोटो अलमारी में बिछे अखबार के नीचे से उसको मिली और साथ हे बंद डब्बी में उसकी दिल के अकार की फोटो पर लिखा 'ी लव बी'. बिजेन्दर के हाथ कांप उठे. वह सब वैसे हे छोड़ता हुआ कमरे से बहार चल दिए, उस हरे टेलीफोन को देखे बिना.

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अन्नू आज स्कूल नहीं आई थी और अर्जुन को ये पता चला था नयी फिजिक्स की टीचर के आने पे. ये एक 40 के लगभग उम्र की महिला थी जो पहले दिन सिर्फ पिछले पढ़ाया jaan-ne के बाद वही दोहरा कर चली गई थी. अभी घंटी हे बजी थी की मिस चारुल, जो पहले हे बहार कड़ी थी अंदर आ गई.

"चलिए फिर सभी लाइन से ग्राउंड में.", अर्जुन उनकी बात सुनकर बाकी सबके हे साथ बहार निकल चला. कोई jaan-pehchan का दिखावा किये बिना. चारुल ने भी कोशिश की थी की वह बात न हे करे ऐसे लेकिन अनदेखी से तीस तोह चुभी थी. सभी बहार आने के बाद अपने mann-mutabik खेल में लग गए थे लेकिन इस बार अर्जुन बास्केटबॉल लिए खुद हे कोर्ट की तरफ जा रहा था. मिस चारुल गौर से देख रही थी उसको क्योंकि बाकी 7 लड़के पीछे हे थे. उनके वह आने से पहले हे अर्जुन ने इस किनारे से 22 फ़ीट दूर जाली की तरफ बॉल उछाल दी थी.

"वाह. सुशिल, देखा क्या?", बॉल लोहे के रिंग में सर्र से घुसती कोर्ट पर आ गिरी लेकिन अर्जुन दिनेश की बात न सुनता बाल की तरफ बढ़ा और फिर उनकी तरफ मुँह करते हुए पीछे से बॉल नेट में डालता सुशिल के पास आ खड़ा हुआ. वह सभी आँखे फाड़े देख रहे थे जो अर्जुन ने 1 मिनट में किआ था.

"माफ़ करना दोस्त. मेरी गेम बराबर की नहीं है और मैं ये खेलना भी नै चाहता.", बाकी हतप्रभ से उसको देखने लगे और वह किनारे पर आ बैठा. टाँगे पसरते हुए.

"भाई सही कह रहा है वह. गेम तोह ऐसी है जैसे कोर्ट का inch-inch पता हो. साले के डोले नई देखे और सटीक थ्रो भी उन बड़े शोल्डर की वजह से हे लगता है. आज उसके बिना हे खेलते है. जो टीम बेस्ट करेगी अर्जुन नेक्स्ट टाइम दूसरी के तरफ से खेलेगा.", दिनेश की बात पर बाकी सबने भी समर्थन जताया लेकिन वह फिर भी हरिआन तोह थे हे.

"डरा रहे हो बचो को?", चारुल वह उसके पास खुद हे चली आई थी. लेकिन स्कूल की वजह से बराबर बैठ नहीं सकती थी.

"नहीं. बस बताया था के मेरे लिए कुछ भी खेल नहीं है. जब खेलता हु तोह दिल से नहीं तोह नहीं."

"नाराज हो न मुझसे? ी ऍम रियली सॉरी अर्जुन. 3 दिन से मैं ये कहना चाहती थी लेकिन न तुमने मौका दिए न अन्नू ने तुम्हे मेरा सन्देश दिए. मुझे इनकी परवाह नहीं है लेकिन सच में मैं अपने किये पर शर्मिंदा हु. अन्नू का दिल बड़ा है या तुम्हारे कहने पर उसने मुझे माफ़ किआ हो लेकिन मेरी गलती maan-ne के लिए मुझे किसी जगह की परवाह नहीं है.", चारुल कान पकड़ने हे वाली थी की अर्जुन ने ना में गर्दन हिलाते हुए मन कर दिए.

"प्यार करने लगी हो मुझसे? सहेली का दोस्त हु और फिर छोटी बहिन के साथ मेरी बाकी की गिर्ल्फ्रेंड्स? मजाक के वक़्त भी तुम्हारा ध्यान सिर्फ इस बात पर था के क्यों वह इतनी आसानी से आपके दिल की बात कह रही थी. गुलाबी रुमाल को जो भी तुमने समझा वह शायद गुस्से और अनजाने में. लेकिन मुझे तोह गुस्सा नहीं आया बस वह रुकता तोह बात बढ़ जरूर जाती. छोटी बहिन बड़ी को कुछ मेरे सामने कहती तोह अपमान लगता, दोस्ती टूट जाती अन्नू से क्योंकि वह दिमाग तोह आपका भी गरम हे था. कई बार दूर जाना हे बेहतर होता है बजाये के वही रुकने से. मुझे कोई शिकायत नहीं है.", अर्जुन अपने दोस्तों की तरफ देखने लगा जो अब पूरी कोशिश से थ्रो की प्रैक्टिस कर रहे थे बजाये की मैच लगाने के.

"अन्नू संडे को जा रही है और उसने स्कूल छोड़ दिए है. तुम मिले उस से?"

"हाँ कल 6 बजे मैं उसके साथ हे घर पे था. वह समझदार है बस थोड़ा ध्यान देना पड़ता है. शायद आप उसके बाद हे गई होंगी उनके घर.", अर्जुन ने अपने फीते थोड़े ढीले करते हुए पाँव घास पर सीधे कर लिए थे.

"हाँ, डिनर पे गई थी. लेकिन उसने तुम्हारे बारे में कोई ख़ास बात नहीं की."

"आपको बेहतर पता होगा क्यों नहीं की? दोस्त तोह पुराणी है आपकी वह."

"हाँ इसलिए की उसको फिरसे सब याद न आये. लेकिन तुम क्या चाहते हो? मैं यहाँ तुमसे माफ़ी मांगने आई थी और इसकी बड़ी वजह है के मेरा ध्यान नहीं लग रहा. सो नहीं पा रही हु और जैसे पूरी दुनिया को मेरी परवाह नहीं है."

"फिर पिंक पसंद है आपको?", अर्जुन का ये कैसा जवाब या सवाल था. वह बिना चारुल को देखे ऐसी बात कर गया था के चारुल एकटक उसको देखने लगी थी.

"यू मोरोन. तुम सच में एक घटिया इंसान हो. मैं हे जाने क्या क्या सोच रही थी लेकिन तुम डेसेर्वे नहीं करते."

"मतलब पसंद है आपको? ाची बात है. खूबसूरत हो और गुस्सा भी बहोत है आपमें तोह सूट करता है. गोरा रंग गुलाबी तभी तोह होता है.",

"कैसी बातें कर रहे हो तुम? I'm योर पे इंस्ट्रक्टर एंड स्पोर्ट्स इंचार्ज."

"थान यू मस्ट बेहवे लिखे ओने. थिस इस ान एजुकेशनल इंस्टीटूशन नॉट आवर गॉसिप कॉफ़ी टेबल मिस चारुल. िफ़ यू मेक में कम्फर्टेबले स्पीकिंग नक्ससरी फ्रेंडली थिंग्स थान ी मस्ट जो विथ थे फ्लो. सॉरी. यू कैन मार्क माय एब्सेंट और पुनीश अक्सोर्डिंगली, वीथिन प्रोटोकॉल.", अर्जुन का ये स्वरुप बिलकुल अलग था. चारुल चुपचाप वह से चल दी थी. आँखों में आंसू जैसे तैसे रोके वह नजर बचती हुई teacher's बाथरूम की और चल दी. इधर अर्जुन जूते खोल कर उस घांस के मैदान की तरफ चल दिए जो 200 मीटर लम्बा था. हलके कदमो से चलता वह खुदको सहज कर रहा था और फिर कमीज बहार करता दौड़ने के लिए बने अंडकार गोले में भागने लगा.

"ये पागल है क्या? नंगे पाँव कबसे दौड़ रहा है. लेकिन स्टैमिना बहोत है यार देख तोह जरा.", ये लड़की उनकी हे क्लास की थी और कोयल से बात कर रही थी अर्जुन को लगातार 15 मिनट से भागते देख कर. चारुल भी अब इधर सीढ़ियों के पास आ गई थी और इनकी बातें सुनाई दे गई थी उसको. एक नजर अर्जुन को देख कर वह कोयल की बात sunn-ne लगी.

"पनिशमेंट होगी जैसे मिस अन्नू ने दी थी. ाचा है लेकिन थोड़ा सीढ़ी बात कर देता है बेचारा. मिस चारुल ने भी लगा दिए आज दौड़ने इसको.", कोयल बात ख़तम करती पीछे बैठने आई तोह अपनी टीचर को देख कर सेहम सी गई. फिर सॉरी बोलती थोड़ी दूर जा कर किताब खोले बैठ गई.

'ये ऐसे नहीं मानेगा कभी. हर बात की हद्द तक जाने का जूनून है तोह फिर ऐसे हे सही.' मिस चारुल अर्जुन को देखती हुई खुदसे कह रही थी. वह एकसार रफ़्तार से अब 20 मिनट से ज्यादा देर से दौड़ रहा था.

"क्लास मई जो नाउ.", चारुल की इस आवाज पर सभी चुपचाप लाइन से अंदर की तरफ बढ़ लिए और अर्जुन जैसे अपनी धुन में हे लगा रहा. ग्राउंड खली होते हे चारुल उसकी तरफ चल दी.

"रुक जाओ अर्जुन.", इस आवाज से जैसे वह धीमा होता कुछ आगे जा कर रुक गया. कमीज गीली हो कर पसीना टपका रही थी और चेहरा अभी भी शांत लेकिन पसीने से सना हुआ.

"जी मिस."

"सॉरी. और मैं कंफ्यूज थी. मुझे तुमसे बात करनी है स्कूल के बाद."

"आज पॉसिबल नहीं है. और आपको सॉरी कहने की जरुरत भी नहीं."

"भाव खा रहे हो?", चारुल ने उसके चेहरे को देखते हुए कहा

"लड़की नै हु मैं. और आज जरुरी काम है इसलिए मुमकिन नहीं. कल मैं समय निकाल लूंगा अगर अन्नू से मिलना न हुआ तोह."

"अन्नू फिर बीच में आ गई? मुझे तुमसे बात करनी है, अकेले में."

"ठीक है अन्नू कमरे से चली जाएगी. कल 3 बजे उसके हे घर. अब चलता हु.", घंटी की आवाज सुनते हे वह अंदर दौड़ गया. चारुल को एक और परेशानी में छोड़ कर.

बाकी पीरियड भी आशा अनुरूप हे गुजरे लेकिन छुट्टी के वक़्त मेनका खुद अर्जुन के साथ स्कूल से निकली थी. उसकी कार से. अर्जुन आराम से बैठा कार के डैशबोर्ड में रखा सामान देख रहा था जो कुछ ख़ास न था.

"सब ठीक तोह है?"

"हाँ, क्यों आपके साथ ठीक नहीं है क्या?", अर्जुन ने जैसे हे मेनका को सड़क पर ध्यान देते देखा तोह सवाल कर लिए.

"सब ठीक है. मेरा मतलब था के तुम आये नहीं न घर इसलिए."

"अब मंजू के सामने तोह मैं कुछ करने से रहा. परसो आऊंगा फिर देखते है के लंच करवाती हो आप या डिनर.", अर्जुन की मस्ती देख वह भी गंभीर माहौल ख़तम करती हंसने लगी.

"तुम सच में अलग हे हो यार. शाम को क्या इरादा है फिर?"

"स्टेडियम और फिर घर. आज सिर्फ ताईजी है घर पे और आरती दीदी. आप भी चलो न, वही खाना खा लेना."

"नहीं अर्जुन, आज नहीं कल. चलो तुम उतरो मैं निकलती हु. मंजू के साथ थोड़ा मार्किट जाना है. मिलती हु जल्द.", घर के बहार उसको उतरती वह आगे चल दी लेकिन अर्जुन खड़ा देखता रहा जाती हुई मेनका को. मेनका बेचैन थी और कुछ छुपा भी रही थी क्योंकि मंजू की स्कूटी उसके घर के बहार कड़ी थी इस वक़्त.
 
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