- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 31,768
अपडेट 44
नीलगाय
जाने अभी कोनसा पहर था लेकिन ऋतू की आँख खुल गई थी. अर्जुन उसको बाहों में लिए सोया पड़ा था पीछे से पकड़ कर. एक मुस्करात जिसमे सिर्फ ख़ुशी थी khud-ba-khud उसके खिले हुए चेहरे पर तैर गई. 'बस यही तोह सपना था एक. अब अगर ज़िन्दगी यही ख़तम हो जाये तोह कोई शिकवा नहीं.' सोचती हुई ऋतू ने अपने हाथो की उँगलियों में अर्जुन के हाथ की उँगलियाँ प्यार से पीरो दी. उसकी उँगलियों के पूरे पहले से अधिक हे मॉटे लग रहे थे. इतनी काम रौशनी में चोट तोह कही न दिखी बस उनका उभार बता रहा था के कुछ सूजन जरूर थी. आराम से वापिस उंगलिया निकल कर वो फिसलती सी बहार निकल उसकी गिरफ्त से फर्श पर कड़ी हो गई. अर्जुन शायद कुछ थकान की वजह से सोया हे रहा. उंगलिया थोड़ी हिली थी लेकिन नींद नहीं खुली.
ऋतू बाथरूम से मुँह धो कर सीधा रसोईघर में चली गई. रात की बची 2 रोटियां हलकी सी गरम कर सरसों का तेल और हल्दी दाल कर एक प्लेट में राखी. फिर एक चाक़ू और साफ़ सूती कपडा लेकर वापिस कमरे में आ गई. अब यहाँ बड़ी तुबेलिघ्त रोशन थी जिसके उजाले में वह रोटी को किसी पट्टी की तरह काटने लगी थी और साफ़ कपडे की 5-6 लम्बी कतरन बना कर वह अर्जुन के पास बिस्टेर पर आ बैठी. सावधानी से हाथ को अपनी जांघ पर टिका कर उसकी 3 सूजी हुई उँगलियों पर पहले वो गरम रोटी के साफ़ काटे हुए टुकड़े को ाचे से लपेटने लगी और फिर उसको कपडे से ढकने के बाद गांठ लगा दी. अर्जुन इस एहसास से उठ चूका था और चुपचाप बस ऋतू को अपने इस काम में मगन देखता रहा. तीनो उंगलिया पूरी तरह से धक् गई तब अर्जुन ने हलकी आवाज दी.
"इस हाथ की भी ऐसी हे हालत है. वो बॉक्सिंग के समय शायद कही चोट आ गई थी." ऋतू ने जब दूसरे हाथ को देखा तोह वह भी वैसा हे नजारा था. सिर्फ छोटी ऊँगली और अंगूठा सही सलामत थे और यहाँ की भी 3 उंगलिया में सूजन थी.
"रात को हे सब करवा लेते तोह अब तक तोह ठीक भी हो जाते. कोई बात नहीं आप ऐसे हे लेते रहो मई कर देती हु.", एक बार फिर उठ कर कपडे की और कतरन काटने के बाद वही प्रक्रिया इस हाथ पर भी दोहराई. बीच बीच में अर्जुन अपनी chedd-chaad कर हे लेता था. कभी गाउन के ऊपर से खड़ा दीखता निप्पल दबा कर तोह कभी गर्डर और कूल्हे सेहला कर. ऋतू इन छोटी हरकतों का आनंद लेती बस काम करती रही.
"हो गया सब. अब ये तकिया दोनों हाथो के नीचे रखिये और सो जाइये कुछ देर. अभी सिर्फ 3 बजे है. 3-4 घंटे तक उतार दीजियेगा ये.", ऋतू वह से उठने लगी तोह अर्जुन ने फिर पकड़ लिए.
"आप भी यही लेत जाओ न? नहीं नींद नहीं आएगी." अर्जुन ने वापिस बिस्टेर पर करने की कोशिश की ऋतू दीदी को तोह उन्होंने ना में सर हिला दिए.
"अलका के पास वापिस जाना है अभी. वो उठ गई तोह इधर हे आ जाएगी. और आप अकेले में मुझे 'तुम' कहने की आदत दाल सकते हो." ऋतू दीदी अभी तक अपने मिलान वाले रूप में हे थी.
"मई आपको आप हे कहूंगा. और एक बार नाम लिए था लेकिन दिल कहता है की जो इज़्ज़त दी हुई है वह बढ़नी हे चाहिए. तोह आपकी ये बात मई नहीं मानूंगा." उसकी बात पर हलके से मुस्कुराती वह नीचे झुक कर प्यार से गाल चूमती हुई बहार चली गई. फिर से बड़ी लाइट बंद हो चुकी थी. अर्जुन ने एक बार फिर आँखें बंद की तोह ठीक 4:20 पर हे वो उठा. मुट्ठी 2-3 बार khol-band करने के बाद वह उठकर सीधा आँगन में बने बाथरूम में घुसा और टोलिया गीला कर चेहरा साफ़ करने लगा. लेकिन ये भी नहीं कर प् रहा था. ऐसे हे छोड़ कर पेशाब करने के बाद बहार निकला तोह यहाँ भी ऋतू दीदी सामने कड़ी थी.
"अंदर चलो." ब्याह पकड़ती वो अर्जुन को फिर से बाथरूम में ले आई और खुद हे चेहरा साफ़ करने लगी. पजामा नीचे कर सोये हुए अंग को भी हाथ धोने की जगह कर पानी से धोने के बाद तोलिये से साफ़ कर खुद अपने हाथ साबुन से धोये.
"आप सोइ नहीं? मई जा रहा हु आप 8 बजे से पहले नहीं उठना." उन्हें कमरे की तरफ छोड़ कर वो संजीव भैया के पास चल दिया. वो सच में गहरी नींद में सोये हुए थे.
"उठिये भैया. 4:30 बज गए है और आपने कही जरुरी जाना है." घडी एक बार देखता वह उनको हिलने लगा तोह संजीव भैया अंगड़ाई लेते से बिस्टेर पर बैठ गए. नीचे पड़ा पानी का जग उठा कर अर्जुन ने एक गिलास भर के उनकी तरफ बढ़ा दिए और 2 घूँट लेने के बाद वह उठ खड़े हुए.
"थैंक यू छोटे. सही समय उठा दिए भाई. बहोत थकान थी लेकिन अब बेहतर हु." अपने शरीर पर बनियान के ऊपर टीशर्ट डालते हुए वो बोले तोह अर्जुन विदा लेकर अपने कमरे में आ गया. कपडे बदलने में कोई परेशानी न हुई बस जूते पहनते वक़्त उसको लगा के वो उन्हें कस कर नहीं बाँध सकता.
तारा अभी तक वैसे हे एक करवट लिए सफ़ेद चादर के ऊपर लेती थी. जीरो की रौशनी में उसके लुढ़के हुए दोनों उभर किसी का भी दिल धड़का देने के लिए काफी थे लेकिन अर्जुन ने सावधानी से उसके ऊपर चद्दर लपेट दी और दोनों तरफ से उसके शरीर के नीचे दबाने के बाद जीरो का बल्ब भी बंद कर दिए. पीछे जाने वाले रस्ते का दरवाजा अब चिटकनी से बंद हो चूका तोह सब तरफ देख वो बहार निकल आया.
'साइकिल नहीं चलेगी और स्कूटर ले जाना मतलब सबके सवाल.' घडी में देखा तोह 4:40 बता रही थी और फिर कुछ सोचता सा वह बहार निकल कर साढ़े कदमो से दौड़ चालु करता निकल लिए. आज रफ़्तार पहले की मैराथन से लगभग दोगुनी थी उसकी. नए सेक्टर को पार करते हे घडी पर नजर डाली तोह ठीक उसके शीशे पर एक मोटी बूँद पानी की आ कर गिरी. 5:00. बादलो की वजह से अभी तक एक तरह का अँधेरा था लेकिन ये एक बूँद प्रमाण थी वो भी तैयार हो चुके थे बरसने को. इधर गाँव की सड़क पर दौड़ता वो पसीने में भीग चूका था और आज हवा तोह जैसे एकदम रुक चुकी थी. ठीक गाँव की सड़क पर कदम बढ़ाते हे सामने से बरसाती ओढ़े साइकिल पर दूध के कैनस्टा लिए अर्जुन को साधू सिंह जी आते दिखे. पीले रंग की वह प्लास्टिक की चमकती बरसाती अभी उनके सर पर नहीं थी.
"Ram-Ram बीटा. बड़े रफ़्तार में हो आज." हँसते हुए उन्होंने अपनी साइकिल उसके पास रोकी तोह निगाह हाथो पर भी गई.
"है अंकल वह देख रहा था के मेरी क्षमता कितनी है तोह बस यही आ कर रुका हु घर से.", चेहरे को रुमाल से पोंछता वो उनके Ram-Ram का जवाब दे साथ खड़ा हो गया.
"इतनी सुबह ऐसा पसीना आना बता रहा है के लक्ष्य के लिए गंभीर हो बीटा. बहोत ाची बात है ये तोह. नहीं तोह आजकल के लड़के तोह car-motorcyle से नीचे तोह अपने पाँव रखना पसंद नहीं करते. वैसे मौसम आज खराब है और हालात बता रहे के अगले आधे घंटे में बारिश जम्म के होने वाली है."
"सही कहा अंकल जी. लेकिन बारिश हे तोह है. देखिये आप भी तोह उसकी परवाह किये बिना काम पर चल दिए है और फिर मई उतनी कोई म्हणत नहीं करता जितनी आप करते है." अर्जुन समझ चूका था के kisaan-doodhwale की ज़िन्दगी में तोह आराम मुश्किल हे है. वो तोह फिर भी चैन से सो जाता है जब दिल करे.
"आदत हो गई है बीटा इस शरीर को तोह. काम न करू तोह बुखार आ जाये. ाची बात है बीटा कल मिलते है.", इस बार वह चलने लगे तोह बिना सोचे अर्जुन ने साइकिल पर रखे उनके पाँव को छु लिए. उन्होंने भी मुस्कुराते हुए ढेरो आशीर्वाद दे दिए.
"ाचा अंकल जी कल मिलते है." आगे दौड़ता वो निकल लिए और इधर साधू सिंह भी मुस्कुराते हुए अपने रास्ते हो लिए. गाँव शुरू हुआ तोह अर्जुन बस दोनों तरफ देखता आगे बढ़ता रहा. सविता के घर का दरवाजा तोह लगा हुआ था लेकिन बहार आँगन का लकड़ी का गेट हल्का खुला हुआ था. फिर आगे आया तोह साधू सिंह के घर का आँगन भी नजर आया जिसको देखने भर के बाद वो दौड़ लगता सीधा पुलिया पर हे आकर रुका. कदम रुकते हे अर्जुन को महसूस हुआ के उसकी ज़िन्दगी में अब तक की सबसे लम्बी दौड़ थी. उस पुलिया की छोटी दिवार को पकड़ कर वो अभी किसी कुत्ते की तरह हांफ रहा था. अगर इस पल कोई उस से बात भी करता तोह शायद उसके मुँह से एक लफ्ज़ भी न निकलता.
"uhmm..hmmffff.. हहहहहह.. ये कुछ ज्यादा हे हो गया.. हहह हहह." कोई 5 मिनट तक वह ऐसे हे झुका खड़ा रहा था. फिर धीमे कदमो से पुलिया के पर नीचे उतरता वह नहर के पास आ कर बैठ गया. हाथो को देखा तोह हलके भीगे थे लेकिन पत्तिअ वैसे हे थी. यहाँ बेहद शान्ति थी और एक ठंडक जैसी पुलिया के ऊपर तोह बिलकुल न थी.
"तोह आज तुम इस तूफान में भी घर न रुक सके अपने और मेरी सहेली को देखने आ पहुंचे.", पीछे से आई इस आवाज पर अर्जुन ने देखा तोह काजल घाघरा कमीज पहने हाथ में लौटा लिए कड़ी थी.
"तुम्हे कैसे पता चला के मई इस तरफ बैठा हुआ हु?", उसको हैरानी हुई क्योंकि वो तोह उनके खेतो के दूसरी तरफ यहाँ बैठा था जहाँ से नजर तोह वो आ नहीं सकता था और साइकिल आज उसके पास थी नहीं.
"वो तुम जहा बैठे हो वही पर तोह ये घात बना है. और मई आई थी यहाँ पाँव धोने के लिए और तुम दिख गए." उसकी बात सुनकर अर्जुन ने काजल के गोर पाँव देखे जहा थोड़ा कीचड लगा था. फिर जब उसने नजर उसके पीछे की तरफ की तोह काजल ने हे जवाब दिए.
"सविता थोड़ी देर तक आएगी. गाये खेत में बाँध रही है.", इतना बोल कर वह घाघरा ऊपर करती उस ईंटो की एक बड़ी तालाब से घात की दिवार पर कड़ी हो घाघरा ऊपर करती अपने गोर मांसल पाँव उस ठन्डे पानी में दाल कर हौले हौले हिलने लगी. पानी में बनती तरंगे देखता अर्जुन उसके पाँव भी धान से देखने लगा. बेशक वो तंदरुस्त लड़की थी लेकिन गोरी पिंडलियों पर मासपेशिया बता रही थी की वो मेहनती और जानदार भी थी. चांदी की पतली घुंगरू वाली पाजेब हल्का शोर सा करती हर बार हिलने से.
"ये भी मजेदार खेल है." अर्जुन को अपनी पाँव देखते हुए भी नजरअंदाज करती वो मुस्कुराती बोली.
"हाँ. ये पानी की तरंगे कैसे एक लाये में बनती है फिर गायब हो जाती है.", अर्जुन को ाचा लगा के लड़की ने उसके घूरने को नजरअंदाज कर दिए था. अब नहर के पार देखने लगा तोह काजल फिर बोल उठी, " वह सामने न वो जमीन है जो जंगल के साथ वाली, वो साड़ी हमारी है. गाँव में कुल 16 परिवार है लेकिन हमारे पास पूरे 25 किल्ले है. उस जगह पे तोह बेरी के बहोत झाड़ है.", अर्जुन बस इस चुलबुली की बातें सुन रहा था बिना उसकी तरफ देखे. एक अपराधबोध सा महसूस हुआ था जब वह उसके पैरों की सुंदरता निहार रहा था और काजल ने ये देख लिए था.
"इतनी जमीन है फिर भी तुम्हारे पिता जी दूध का काम क्यों करते है?", अर्जुन jaan-na चाहता था उसके परिवार के बारे में.
"अब ऐसा है के बापू सिर्फ उनके घर में दूध डालने जाते है जिनको वह बहोत समय से जानते है. और ये उनकी आदत बन गई है, उनके चक्कर में तोह अब मेरा भाई भी ये सब करने लग गया है. नहीं तोह वो तोह 8 बजे घर से निकलता है और सीधा रात में 7-8 बजे आता है. बापू बस khet-khalihaan और उनकी gaaye-bhains में दुनिया बनाये रहते है." काजल अब कोई ऐसी बात नहीं कर रही थी जैसे वह कल करती दिखी थी. लगता था के जैसे वह बात करना चाहती है लेकिन शायद दोस्त ज्यादा नहीं है.
"और तुम्हारी माँ. वो क्या करती है?", अर्जुन ने भी उसको बोलने का मौका दिए.
"वो पैसे संभालती है और हिसाब किताब देखती है साड़ी जमीन और दूध का. समय मिल जाए तोह मेरी खिंचाई नहीं मेरे भाई को सीने से लगाए रहती है.", इस बार वह हंसती हुई ये बात बोली.
"तुम लड़की ाची हो. मुझे तोह कोई वजह नहीं लगती की वह तुम्हे daant-ti होंगी. और अगर वो तुम्हारे भाई को प्यार करती है तोह इसका मतलब तुम अपने बापू की लाड़ली हो.", अर्जुन के इस सटीक जवाब से वह एक बार फिर मुस्कुरा दी. भरे भरे गाल ाचे लग रहे थे. इतनी देर बाद अर्जुन ने उसकी तरफ देखा था, जो अब घात की तरफ पीठ करके पाँव जमीन पर लटकाये बैठी हुई थी.
"वैसे तुमने नहीं बताया के तुम यहाँ क्यों आते हो? सविता तोह कही बहार जाती नहीं तोह सपने में आने से रही.", अर्जुन उसकी बात पर सहज होता हुआ बोलै.
"नहीं. मई रोज घर से दौड़ लगाने निकलता हु तोह फिर एक दिन तुम्हारे पिताजी गाँव के मदद पर मिल गए थे. बस उनके जरिये पता चल गया के इस तरफ भी हरियाली और शान्ति है तोह मई इधर आने लगा. और सही बताऊ तोह तुम्हारे गाँव का सबसे ाचा हिस्सा यही है जहाँ हम बैठे है.", और फिर वह नहर में बादलो की परछाई देखने लग गया.
"जगह तोह और भी है इस से ाची. आते रहोगे तोह देखोगे. ये तोह फिर भी ऐसी जगह है जहा पुलिया की वजह से dhor-dangar आ जाते है. लेकिन उस तरफ तोह बस जंगल, नहर और कभी कभी koyal-mor-toute होते है. फूल और फल भी लगते है वह लेकिन अब इतने लोग तोह है नहीं हमरे गाँव में न सड़क तोह वह कोई नहीं आता." थोड़ा आगे की तरफ इशारा करती वह चहकती सी बोली.
"तू अभी तक यही बैठी है.?", सविता वह आई तोह अर्जुन को भी देखा और फिर शांत हो गई.
"है तेरी गाये बांध गई? मैंने सोचा तू समय लगाएगी तोह तेरा दोस्त चला न जाये. यहाँ आ गई इसके पास.", सविता उसकी बात पर आँखें दिखने लगी तोह अर्जुन भी उसकी बड़ी बड़ी काली आँखों को देखने लगा. दोनों सहेलियों ने उसकी ये हरकत देख ली थी. अब जहाँ काजल के चेहरे पर नटखट मुस्कान थी वही सविता का चेहरा लाल हो चूका था.
"ये बचे हुए पैसे aapke.",Ek 50 को नोट अर्जुन की तरफ करती वह दूर हे कड़ी रही है.
"ऐसे तोह ये उड़कर मेरे पास आने से रहा.", अर्जुन ने वही बैठे हुए हे कहा और हाथ बढ़ने का कोई उपक्रम न किआ तोह सविता हलके कदम बढाती सी उसकी तरफ जाने लगी थी.
"ये लीजिये.", उसके सर के पास खड़े होते हुए सविता ने हाथ आगे किआ तोह अर्जुन ने पट्टी लगा हाथ सामने बढ़ा दिए.
"तुम हमेशा हे चोट खाये रहते हो क्या?", सविता उसके हाथ को देखते बोली तोह काजल ने अर्जुन से पहले हे जवाब दे दिए.
"मैंने कहा था के ये पहलवान है अब इसकी उंगलिया बता रही है न." अर्जुन हँसता हुआ पत्तियां खोल कर बोलने लगा.
"पहलवान नहीं वो मई स्टेडियम में बॉक्सिंग सीखता हु तोह कल बस वही अभ्यास करते हुए थोड़ा सूज गई थी.", दोनों सहेलियां उसकी और देखने लगी.
"तुम खिलाडी हो?", काजल ने कहा
"नहीं तोह. बस सीखने के लिए और अपने जोश को सही तरीके से लगाने के लिए मई करता हु." सविता भी अब अपनी सहेली के पास बैठ गई थी. उसका दिल तोह था अर्जुन को jaan-ne का और उस से बातें करने का लेकिन एक झिझक और फिर काजल का वह होना.
"जोश तोह कही और भी दिखा सकते हो और मेहनत भी हो जायेगी.", काजल की द्विअर्थी बात को सविता समझ गई तोह वो उसके हाथ पर मारती नकली गुस्सा दिखने लगी.
"दीदी, बाबा बुला रहे है खेत पे.", ये छोटा लड़का सविता का भाई था जो दूर से आवाज दे रहा था एक हाथ से निक्कर पकड़ कर. उसकी बात सुनकर सविता कुछ इशारा करती काजल को और एक बार अर्जुन की तरफ देख वह से चल दी. अर्जुन ने एक बार उसको जाते देखा और फिर अपनी उंगलिया देखने लगा जो थोड़ी चमक रही थी लेकिन सच में अब वह सूजन नहीं थी.
"चलो जब तक वो आएगी मई तुम्हे मेरी खास जगह दिखती हु." काजल भी कड़ी होती बोली तोह अर्जुन भी बस अपना सर हाँ में हिलता उठ कर उसके साथ चलने लगा. दोनों लड़कियों के साथ ऐसे इतनी सुबह बैठ कर बातें करना उसको बहोत ाचा लगने लगा था. तीसरी हे मुलाक़ात तोह थी लेकिन जैसे वह आज बातें कर रहे थे ऐसा लगता था के तीनो जैसे काफी सालो से एक दूसरे को जानते हो.
"यहाँ आगे कभी कभी सांप भी निकलते है लेकिन मेरे बापू कहते है के ये नहर और खेतो वाले सांप जेहरीले नहीं होते और चूहे खाने के लिए इस तरफ आ जाते है." काजला इठलाती हुई उस 2 फ़ीट चौड़ी झाड़ियों से घिरी पगडण्डी पर इठलाती सी चलती अपना घ्यान बघार रही थी. घाघरे में पीछे से हिलते कूल्हे उसके जिस्म का भूगोल बताते लगते थे. फिर अर्जुन उसके पीछे चलता उसके मुस्कुराते चेहरे को देखने लगता जब वो बार बार मुँह पीछे करती. कानो में छोटी सोने के बाली भी जैसे और आकर्षण बढ़ा दे रही थी.
"तुम बड़ी हिम्मतवाली हो फिर तोह. क्योंकि जितना मई जानता हु लड़कियां तोह कॉकरोच से भी डर जाती है और चूहों से भी." अर्जुन अब घने पेड़ो के बीच से गुजर रहा था और काजल के घाघरे पर भी कही कही झाडिया टकरा रही थी. ये इतनी घनी जगह थी की 6 बजे के लगभग समय भी यहाँ बहोत हे काम उजाला था. ऊपर से घने बादल भी एक वजह थे.
"यहाँ गाँव में तोह सब काम खुद करने होते है. फसल कटाई में देखना कभी कितनी मेहनत लगती है. कमर और हाथ तोह पहले दिन जवाब हे दे जाते है लेकिन अगले दिन आदत हो जाती है.", अर्जुन को पता चल गया था उसके मांसल शरीर का राज.
"ये देखो. ये है मेरी ख़ास जगह." एक छोटा सा घात नहर के पानी से भरा हुआ और ऊपर से घने पेड़ो किसी छतरी की तरह उसके ऊपर झुके हुए थे. छोटे paudho-jhadiiyon पर safed-peele-laal जङ्गली फूल और एक जगह साफ़ पक्की जमीन, शायद वह पगडण्डी का ये आखिरी हिस्सा था. कुछ सफेदे और खैर के पेड़ जमीन के सामानांतर पड़े हुए थे.
"हाँ ये है तोह बड़ी ाची जगह. लेकिन तुम्हे यहाँ अकेले तोह कभी नहीं आना चाहिए." कही कही जमीन और पेड़ के नीचे मिटटी में बने बिल देकते हुए उसने ये बात कही तोह काजल एक गिरे हुए पेड़ पर बैठ कर बोली, "यहाँ तोह सविता भी नहीं आती मेरे साथ. एक दिन नेवला देख लिए था उसके बाद तोह यहाँ आने का नाम लेते हे वह मन कर देती है." काजल हंसती हुई बोली. "लेकिन मुझे ये पसंद है और फिर ये नहर भी तोह है यहाँ. अगर भागना हे पड़े तोह तैरना ज्यादा आसान है."
"बहादुर लड़की हो. ाचा लगा ये जानकार. मई तोह समझा था तुम सिर्फ शरारती और ज्यादा बोलने वाली हे हो." उसके थोड़ा सा पास बैठ ते हुए अर्जुन नहर के उस तरफ देख रहा था जहा घने वृक्ष के बीच हलकी झाड़ियां हिलने लग रही थी.
"वो वह रोज होंगे. कभी कभी खेतो में भी आ जाते है लेकिन कुत्ते पीछे लग जाते है इनके तोह फिर जंगल में भाग जाते है ये.", काजल ने उसकी आँखों का पीछा कर लिए था. और अर्जुन को एक बड़ी सलेटी रंग की हिरण जैसी नीलगाय वह दिखी. ऊंचाई तोह किसी घोड़े के जैसी थी.
"ये नर है. वही इतने बड़े होते है लेकिन इंसानो से दूर हे रहते है ये.", काजल की बात पर अर्जुन ने एक मुस्कराहट के साथ उसकी तरफ देखा तोह वो भी एक बड़ी मोहक मुस्कान से वैसे हे देखने लगी. और अगले हे पल पूरा आसमान safed-lal हो उठा. गर्जना इतनी तेज थी की मुस्कुराती हुई वह हिम्मती लड़की उछलती सी अर्जुन के सीने आ लगी थी. दिल तोह एक बार अर्जुन का भी हिल गया था इस अचानक megh-dahaad को सुन कर. क्योंकि पल भर में साड़ी शान्ति ख़तम सी कर दी थी. पानी की मोटी मोटी बूंदे जब पत्तो पर गिरने लगी तोह एक अलग हे शोर सा भर उठा वह. अर्जुन के एक हाथ भी काजल की पीठ से लगा हुआ था. उसका जोरो से धड़कता दिल और मॉटे दूध उसको अपनी छाती पर महसूस हुए और फिर सॉरी बोलती हुई वो नजरे झुका कर अलग हो गई. नहर की सतह पर पड़ती बारिश एक अलग संगीत सुना रही थी और पत्तो पर गिरती अलग. वो नीलगाय जिसको काजल रोज कह रही थी उन्हें देखकर वापिस जा चुकी थी.
"कोई बात नहीं. सच बोलू तोह डर तोह मई भी गया थो क्योंकि ऐसा तोह बिलकुल भी अंदाज नहीं था.", हँसते हुए उसने इतना कहा तोह हल्का शर्माती सी काजल भी उसका चेहरा देख मुस्कुरा उठी. उसके चेहरे पर भी बारिश के बूंदे गिर रही थी, जो पत्तो से टपक कर आई थी. पलके खोलती झपकती वो अपनी ब्याह से जब उन्हें साफ़ करने लगी तोह उसके कैसे हुए दूध और उभर गए कमीज के ऊपर होने से.
"यहाँ भीग जायेंगे हम दोनों. और उधर नहर पर देखो जरा के बारिश कितनी तेज है. पुलिया तक जाते हुए या तोह पूरे गीले हो चुके होंगे या फिर चिकनी मिटटी में फिसल कर कही गिर पड़ेंगे." काजल कड़ी होती हुई एक बरगद के पेड़ की तरफ चल दी. वही शायद इतना घाना था के कुछ देर तक उन्हें बचा सकता था. नहीं तोह बबूल, सफेदे और नीम के वृक्ष तोह किसी काम के नहीं थे इस समय. अर्जुन भी 15 कदम पीछे इस घने पेड़ के नीचे आ कर खड़ा हो गया था. पगडण्डी भी यही ख़तम होती थी और उसके हे नीचे वो समतल साफ़ जमीन थी जहा दोनों खड़े बस बारिश का ये नजारा ले रहे थे.
"कहते है के जंगल में हे सबसे ज्यादा बिजली गिरती है बारिश के समय." अर्जुन की बात पर काजल थोड़ा सेहम गई और उसकी तरफ देखने लगी जो मुस्कुरा रहा था.
"तुम मुझे डरा रहे हो न? मई सिर्फ इस आसमानी बिजली से हे डर्टी हो और किसी चीज से नहीं. लेकिन ऐसे मत डराओ मेरा दिल घबराता है इसकी आवाज से हे."
'गडढाआजमममममममम तडडडडआककककककककक' की एक भयंकर सी आवाज उनसे शायद 500 गज दूर हे गिरी आसमानी बिजली की हुई तोह पूरा जंगल जैसे थरथरा उठा. पक्षियों की आवाज भी जैसे चीख चीख कर और भयंकर बना रही थी इस पल को. काजल तोह सदमे से उछलती हुई हे लिपट गई अर्जुन से जिसको इस बार कुछ खास फरक नहीं पड़ा था इस गर्जना से लेकिन भीगी हुई काजल का बदन अपनी बाहों में होने से उसके शरीर में भी एक अंग फड़कने लगा था. अर्जुन का एक हाथ उसके भरी नितम्भ पर और दूसरा पीठ से कंधे की तरफ लिप्त हुआ था. नरम दूध सीने से डब्ब चुके थे. और इस बार काजल ने सर पीछे किया तोह उसमे को शर्म नहीं थी जैसा पहली बार हुआ था. बस एक बार गंभीरता से अर्जुन को चेहरे को देखने के बाद अपने भीगे होंठ उसने अर्जुन के मुँह पर लगा दिए. आँखे बंद किये वह इस तगड़े शरीर से कास के लिपटी बस होंठो को चूस रही थी. शायद इस सब में वह उस डराने वाली आवाज को अनसुना कर रही थी. मॉटे कूल्हों को दोनों हाथों में भर के दबाता भी इस जाटनी के शरीर का भूगोल माप रहा था. लुंड महाराज तोह जैसे काजल की नाभि को हे छूट समझ कर हमला करने की सोचने में लगे थे.
"ये गलत होगा." अर्जुन ने खुद को काजल से अलग करते हुए कहा और उस विशाल वृक्ष के तने से पीठ लगा कर आँखे बंद किये खड़ा हो गया. उसकी भी साँसे जोरो से चल रही थी. काजल किसी घायल शेरनी जैसे बस अर्जुन को ऐसे घूर रही थी जैसे उसके मुँह से शिकार छिटक कर वापिस उसको हे चिढ़ा रहा हो. दोनों भारी छात्याँ फूल कर हिल रही थी और गोरा चेहरा उन्माद में लाल हो चूका था. एक लम्बी सांस लेकर वह खुद हे अर्जुन को सामने से चिपकती बोली, "मई तोह अब कर के रहूंगी. सही या गलत वह तुम मुझे बाद में बता देना.", पाजामे के ऊपर से उसका खड़ा लुंड दबती वो एक बार फिर उसके होंठो को जंगली शेरनी से काटने और चूमने लगी तोह अर्जुन भी अब पीछे न हटा. कमीज के ऊपर से हे उसके दोनों बड़े चुनचे हाथो में लेकर दबाता वह उसको अपनी जगह पेड़ के तने से लगा कर चूमने लगा था. इधर पजामा थोड़ा नीचे सरका के काजल अब उसका वो मोटा हथियार बहार निकल कर जैसे मुट्ठ मारना का उपक्रम करने में लगी रही.
"तेरा तोह घोड़े का है रे." अर्जुन का चेहरा हटा कर वो उस से अपने दूध मिंजवाती अब इस फूले हे भूरे लुंड को देखने में लगी थी जीका हत्था उसकी मुट्ठी से बहार था और सूपड़ा भयंकर मोटा और लाल.
"पहले भी तुमने किसी का देखा है क्या?", इस घने जंगल में और बरसते मेघ के बीच बस ये 2 लोग हे थे. जहा काजल अब उसके लुंड को पकडे हुए घूर रही थी और अर्जुन ने अपना एक हाथ घाघरे के ऊपर से उसकी जांघो के बीच दबा रखा था.
"हाँ तोह नहीं क्या. मेरे होने वाले पति का और गाँव में एक 2 लोगो को पेशाब करते हुए देखा था. लेकिन ये तोह सबसे हे बड़ा है जितने आज तक देखे है मैंने.", थोड़ा सच और थोड़ा झूठ बोलती काजल की एक तेज सिसकारी निकल गई जब उसकी छूट पर अर्जुन की उंगलिया महसूस हुई. 'सीईई'
"तुम चाहती हो के हम वो सब करे जो तुम्हारे होने वाले पति के साथ तुम्हे करना चाहिए.?", उसके चेहरे को प्यार से देखते हुए अर्जुन ने ये बात कही तोह काजल ने अपने होंठ उस के साथ जोड़कर अपना जवाब दे दिया. लुंड को छोड़कर काजल ने अपना घाघरा ऊपर उठाना शुरू किआ तोह अर्जुन बस उसकी गोरी मांसल जांघो को अनावृत होते देखने लगा. कमाल का शरीर था उसका. जवान, गठीला, चिकना और मादकता से भरपूर. घाघरे के पूरा ऊपर उठती काजल ने उसके कमर के नाड़े में फंसा लिए था. छूट का लम्बा चीरा और बीच से दिख रही लाल फांक. छोटे छोटे किसी नौजवान की दाढ़ी से बाल छूट के ऊपर पेडू तक थे. लेकिन ये उतने घने या ज्यादा फैले न थे. अपनी उलटे हाथ की पहली ऊँगली से उस लकीर को सहलाते हुए अर्जुन ने छूट का जायजा लेना शुरू किआ तोह काजल पेड़ से लगी थोड़ा कसमसाने लगी थी. मोटी छातियां जैसे उस चोलीनुमा कमीज का कपडा फाड़ने की हद्द तक तन्नै सी उभर चुकी थी. एक बार फिर काजल के हाथ ने मजबूती से उसका लुंड को जकड चूका था क्योंकि एक लम्बी ऊँगली उस की गीली छूट में आधी अंदर बहार होने लगी थी.
"तुम संभल लोगी मेरा या ..", अर्जुन ने दूसरा हाथ उसके कमीज में डालते हुए पूछना चाहा हे था के काजल ने लुंड को खींचते हुए अपनी जांघो के बीच लगा लिए.
"फिर तोह ऐसे शरीर का होना किसी काम का नहीं जो तेरे इसकी मार न सेह पाया तोह. दिल तोह तुझ पे तभी आ गया था जब तू बापू के पास खड़ा था. लम्बा चौड़ा शरीर और जितने प्यार से तू बात करता है. और जब सविता के साथ तुझ से कल मिली थी तोह पक्का कर लिए था के ससुराल जाने से पहले तुझ से अपनी जवानी खिलवा कर हे जाउंगी. लेकिन आज इस मौसम ने मेरी बात 2 दिन में हे मान ली.", बोलिटी हुई वह उसके लुंड को अपनी छूट के होंठो पर रगड़ रही थी जहा अर्जुन की पूरी ऊँगली अंदर धंसी थी.
"चल अब जल्दी कर अगर ये बारिश रुक गई फिर शायद अधूरा न रह जाए ये काम.", काजल को कुछ ज्यादा हे जल्दी थी क्योंकि बादल तोह अभी बरसना रोकने के विचार में कटाई न थे. अर्जुन छूट से अपनी गीली ऊँगली निकलता उसकी कमर को दोनों हाथो से थाम के खड़ा हुआ तोह काजल ने खुद हे छूट की दरार में उसका वह टमाटर सा सूपड़ा फिरते हुए छूट के छेड़ पर लगा लिए.
"जरा रुक एक मिनट.", अपनी हथेली पर थूक लगाकर काजल ने सुपाड़ी पर मसल दिए और एक बार फिर वापिस छेड़ पर टिका लिए. छूट का चीड़ तोह गायब हो गया था इसकी चौड़ाई के पीछे. इधर पेड़ का तना भी बरसते पानी से भीग चूका था लेकिन उनके शरीर पर बस कुछ छोटी छोटी बुँदे हे गिर रही थी.
काजल के होंठो को मुँह में लेते हुए इस बार अर्जुन ने उलटे हाथ से लुंड को पकड़ा और काजल की फैली हुई टांगो के बीच में धक्का जड़ दिए. एक बार तोह अंदर से पूरा वजूद तक हिल गया था काजल का इस करारे धक्के और छूट में घुसे उस मॉटे सुपडे से. लेकिन थी वह ज़िद्दी और हिम्मत वाली जो इस धक्के को अपने तगड़े शरीर पर सेह गई थी. 3 इंच तक लुंड और सूपड़ा छूट को फैलते अंदर जा चुके थे और इधर पहली बार अर्जुन का हाथ कमीज के अंदर से उसके एक नंगे और बड़े गुब्बारे पर टिक गया था.
"सच में बड़ी हिम्मत है तुम में." ाचे से उसके होंठ पीने के बाद अर्जुन ने अब दूसरा हाथ भी कमीज में घुसते हुए कहा तोह दर्द को बर्दाश्त करती काजल ने उसका वह हाथ पकड़ लिए. और खुद हे अपने कमीज को ऊपर खींच कर दोनों बड़े दूध उजागर कर दिए. एक रुपये के सिक्के से कुछ बड़े गोल हलके भूरे घेरे के बीच में किशमिश के जैसे 2 लम्बे नुकीले चूचक जोश से सर उठाये थे. 4-4 किलो के वह दूध के कलश बता रहे थे के इनकी मालकिन की म्हणत की वजह से वह इतने गोश्त से भरे और कड़े है. दोनों हाथो में नीचे से उन्हें पकड़ कर अर्जुन ने एक निप्पल अपने मुँह में भर लिए. खड़े होने की स्तिथि कुछ ऐसी थी की 2 फुट अपने पाँव फैलाये काजल छूट में लुंड लिए पेड़ से चिपकी थी और उसका साथ देता अर्जुन अपने घुटने हलके मदद कर सामान कद बनता उस से चिपका हुआ एक दूध को पकडे दूसरा पीने में लगा था.
"ये तुम बाद में पी लेना जितना मर्जी. निकाल तोह दिए मैंने खुद हे बहार लेकिन पहले नीचे वाला काम आगे बढ़ाओ.", उसके कंधे का सहारा लेती काजल बोली तोह अर्जुन ने वैसे हे दूध पीते हुए दूसरा मोटा चुका छोड़ कर हाथ जांघ के नीचे जमाया और हल्का सा फंसा हुआ लुंड बहार कर बड़ा तगड़ा धक्का लगा मारा. इस पूरी कोशिश के बावजूद वो अपनी आवाज न दबा सकीय थी.
"ोुउउउइइइइइइ माँ रीई... मार दिए बहनचोद. छूट फाड़ दी रे तेरे इस लौड़े ने मेरी.. ाःह.", आँखों में दर्द की वजह से आंसू आ गए थे और सर अर्जुन के कंधे से लगाती काजल अब पूरी जमिनदारनि वाली भाषा बोलने लगी थी. 7 इंच के लुंड ने छूट को उसकी औकात दिखते हुए चूड़े हुए छेड़ से भी खून निकाल दिए था. अर्जुन ने उसके दोनों कूल्हे थामते हुए उसको अपने से ाचे से चिपका लिए. पीठ को सहलाता हुए बस वो लुंड घुसाए उसको आराम देने में लगा था लेकिन काजल बड़बड़ाये जा रही थी, थोड़ा थोड़ा.
"मेरे खसम का लिए था मैंने अंदर. साले का बस चुभा था.. आह और तेरे वाले ने तोह.. ुह्ह्ह्ह मेरी माँ छोड़ दी.", अर्जुन को उसकी गालियां और ऐसा बड़बड़ाना जैसे उत्तेजित कर रहा था. कमाल की लड़की थी वह जो न लुंड बहार निकाल रही थी और ना गालिया बंद कर रही थी.
"अब खड़ा रहेगा या ढीली करेगा इसको. फाड़ तोह दी और तोह फटने से रही अब..." दर्द में हल्का सिसकती वह सीने से सर हटा के अर्जुन को देखती बोली. गीले चेहरे पर भी उसकी आँखों की नमी अर्जुन को दिख गई थी. जो की लाज़मी भी था जब इतना मोटा डंडा एक अधखिली कच्ची छूट को फाड़ कर अंदर जा चूका हो. छूट भी किसी बालो में लगाने रबर की तरह लुंड पर कासी हुई थी.
अर्जुन ने प्यार से उसके आँखों में आये पानी को चूम लिए और गाल पर लगी पानी की बुँदे भी. थोड़ा सा कमर को पीछे करता वो अब होंठ पीते हुए वापिस अंदर करने लगा तोह दोनों को हे रगड़ दर्द और थोड़ा मजा दे रही थी.
"आह.. पूरा घोडा है रे तू. सच में पेट तक पहुंचा दिए मेरे तूने.", अब फिर से वह नरमी से बातें करती सिसकारियां लेने लगी थी.
"वैसे गालिया बहोत देती हो तुम." अर्जुन मुस्कुराते हुए आधा लुंड अंदर बहार करता बोलै तो इस 5-6 मिनट के धक्को में वह संभल चुकी और मजे से उस से लिपटी हे बोली, "Gaanv-dehat में तोह सब ऐसे हे बोलते है. अभी तुमने मेरी माँ या पड़ोस की भाभियों की गालियां कहा सुनी. ये तोह मई दर्द में बोल गई.", अब उसको शर्म आ रही थी याद करके की वह कितना गन्दा बोल गई थी गुस्से में. और फिर भी ये उस को प्यार से मन रहा था.
"क्या बोलती है वह? बताओ मुझे भी. मैंने कभी ऐसा सुना नहीं.", अर्जुन ने उसका धड़ वापिस पेड़ से लगते हुए दोनों मॉटे दूध दबाते कहा. Neeli-hari नस्से उन गोर चुंचो पर उभरी हुई अर्जुन को और उकसा रहा थी.
"aah-aah.. आराम से खींच रे. और बड़े न कर नहीं तोह बस सब यही देखेंगे." छूट कृतवती हुई काजल उसके हाथों पर हाथ रख कर अपने चुंचो का मर्दन हौले करने को कहने लगी..
"मेरी माँ जब खेत में काम करने वाली औरतो से बात करती है तोह.. आह.. ाची गालियां देती है. और एक दिन मैंने उन्हें भाभी से कहते सुना था.. आह उम्... की तू दिन में भी अपना भोसड़ा फैलाइये लेती रहती है खसम के सामने आह.. वो चुटिया बिजली वाला तुम्हारी gaand-masti देख रहा था... ऐसे हे मेरी पड़ोस वाली भाभी भी बहोत गलियां या गन्दी बातें करती है." उसकी इन बातों का मजा लेता अर्जुन कमर चलते हुए अब उसके निप्पल जोर से चुसकने लगा तोह वह भी पूरी मस्ती में भरी खुद से दूसरा दबा रही थी.
"वैसे तुम्हारा शरीर सच में सुन्दर होने के साथ हे मजबूत बहोत है काजल. और ये तुम्हारे बूब्स मुलायम भी और सख्त भी, दोनों है." निप्पल उमेठते हुए अर्जुन आराम से हे उसको छोड़ने में लगा था. उसके धक्के अभी तक तेज नहीं हुए थे.
"आठ.. काम से मजबूत हो जाता है लेकिन नहाते हुए दही या malaai-haldi से मालिश करती हु. और सोने से पहले मालिश करती हु जिस से बड़े भी हो गए और लटके भी नहीं." उसके लुंड का मजा लेती वह गहरी सिसकरिअ भर्ती अब थोड़ा थकने लगी थी. कमर से ऊपर दोनों इस समय भीग चुके थे और जमीन पर भी पानी खड़ा होने लगा था.
"आह एक बार रुक जरा." अर्जुन ने उसकी बात मानते हुए लुंड बहार खींचा तोह सूपड़ा बहार निकलते हे थोड़ा दर्द हुआ उसको.. छूट का छेड़ जो पहले सिर्फ एक दाल के दाने जैसा था अब ाचे से फ़ैल चूका था. पाँव वैसे हे खोले वो कराह रही थी लुंड बहार आने के बाद. अपने कमीज को बहार निकाल कर उसने घाघरा भी उतार दिए. ओढ़नी जाने कब से जमीन पर गिरी पड़ी थी और गीली हो चुकी थी.
"देख क्या रहा है, तू भी तोह खोल अपने कपड़ो को. तेरा ये लुंड थकने वाला नहीं क्योंकि मेरा तोह अभी एक बार हो भी चूका है. वह लेत के करते है." अर्जुन को समझ आया था के वह लुंड जब बहार निकला तोह ये कराह नहीं रही थी बल्कि इसका चरम हो चूका था. फिर काजल के इस रोमांचक फैंसले को स्वीकार करता वो अपनी टीशर्ट उतार कर जब पाजामा उतरने लगा तोह काजल ने रोक दिए.
"ये तोह न उतार फिर जूते भी पानी से भर जायेंगे."
"वो वैसे भी भरने वाले हे है तोह यही पेड़ के नीचे रहने देता हु इनको." पूरे कपडे निकल कर वो आदिवासी की तरह नंगे पाँव हे चलता काजल के साथ घात की दिवार पर आ गया. अपनी कमीज और उसके पाजामे को तेह लगाती उसने वो कपडे उस 9 इंच चौड़ी दिवार पर बिछा दिए फिर ऐसे हे अपना घाघरा नीचे बिछाती उसकी मुलायम टीशर्ट को ऊपर फैला कर वह वह लेत चुकी थी. इस जगह ना तोह बारिश की बूंदो से बचा जा रहा था और न हे कोई परवाह की इस लड़की ने. अर्जुन को तोह ये सब जैसे एक सपने सा लग रहा था. उसने नहीं सोचा था के बीच जंगल इतनी बारिश में वह खुले आसमान के नीचे एक ऐसी लड़की की कभी चुदाई करेगा जो शरीर और हिम्मत में उसके टक्कर हे होगी, या थोड़ी ज्यादा हे. उस 2 फुट की दिवार के दोनों तरफ पाँव रख के अर्जुन ने काजल की टांगो को फैलते हुए अपनी कमर के गिर्द लपेटा और उस खूब उभरी हुई छूट पर लुंड रखते हे अंदर तेल दिए.
"आह रे.. कितना खाली लग रहा था जब ये बहार निकल गया था." उसकी बात के साथ हे अर्जुन ने दूसरे धक्के में पहले जितना 7 इंच तक लुंड पेल दिए था.
"मजा आ गया रे पहलवान. तू सच में तगड़ा है." अर्जुन की चौड़ी छाती को निगाह भर देख अपने ऊपर झुकाती वो बीच जंगल में उसके नीचे दबी छुड़वा रही थी.
"पूरा दाल दू क्या?", अपने हाथ से उसके दूध दबोचते हुए ये बात कही तोह काजल हैरान होती उसके देखने लगी. लेकिन आँखों में बारिश की बुँदे गिरी तोह वह झट से बंद हुई और उसकी आँखों का इशारा मिलते हे थोड़ा लुंड बहार खींचे हुए अर्जुन ने कास के पूरा जड़ तक थोकक दिए. वो इस आखिरी डेढ़ इंच में तोह बुरी तरह तड़फ गई. छूट के बहार अर्जुन के अंडकोष भीड़ चुके थे.
"पागल इंसान क्यों भोसड़ा बना रहा है छूट का.? माँ बचा ले ऋ इस dhi-chod से. आ ऋ मेरी छूट.." अर्जुन को अब समझ आया के वह इशारा नहीं था आँखों में पानी की बून्द गिरने से वह गलत समझ बैठा था. वैसे हे वह अब गिर रही थी तोह वो उसके चेहरे के ऊपर तक आ गया था. बदन तोह पूरे हे गीले हो चुके थे और अर्जुन की पीठ पर ताबड़तोड़ पड़ती वो बूंदे उसको ठंडक देती उकसाने में लगी थी.
"गलती से मुझे लगा के तुमने आँखें बंद कर के हाँ कहा है." अर्जुन ने अपने कूल्हे वापिस चलते हुए कहा.
"अब भी कुछ बचा है तोह दाल दे मेरे अंदर और आज हे मार दे. कल तक जिन्दा छोड़ने वाला तोह है नहीं तू. आह.. आह." बात ख़तम होते हे उसको मजा आने लगा था इन गहरे धक्को से. छूट सिकुड़ने लगी थी और ठण्ड की वजह से रोयें भी खड़े होने लगे थे काजल के दूध, जांघ और बाहों पर.
"बड़ा गजब का है रे तू. इतनी देर में कोई दूसरा तोह 2 ख़तम हो चूका होता. आह.. मेरे छूट के अंदर कुछ जोर का हो रहा है. मेरे बूब्बे मसल जरा" उसको न इस दिवार से गिरने का डर था न श्री पर पड़ती रगड़ का. बस काम का बुखार और ये भयंकर चुदाई हे ाची लग रही थी काजल को. अर्जुन अब कस के धक्के मारने लगा था. उसकी दाई टांग कुछ सुन्न होने लगी थी ठन्डे पानी की वजह से तोह जल्दी होने के लिए रफ़्तार पूरी बढ़ा दी थी.
"अरे बूबे समझ नई आते क्या? आह जोर से पेल रे.. ये बूबे." मजे लेती वह खुद अपने दूध पकड़ के अर्जुन को दिखने लगी तोह वह दोनों को मेंजटा दबाता हर बार गांड पर थपकी मार रहा था. बारिश की आवाज के साथ हे वह उनकी चुदाई की आवाज भी गूँज रही थी. 'thapp'thap' .. 'patt-patt' और तेज aaahhh-ummmm और इस बीच अर्जुन ने उसके दूध छोड़कर दोनों टाँगे ऊपर उठा कर हवा में सीढ़ी करते हुए अब तक के सबसे गहरे और तेज धक्के लगाने शुरू कर दिए जीने वह सेह न सही और पेट को भींचती से अकड़ने लगी थी. मॉटे हिलते दूध बारिश की बूंदो से नहाते हुए अपने सूजे निप्पल दिखा रहे थे. इधर अर्जुन का सूपड़ा फूल कर फटने को हो रहा था. जैसे हे उनसे काजल की गांड वापिस दिवार पर टिकाई उसके माल की उड़ती धार सीधा काजल के होंठो और गले पर गिरी और अगली सभी पिचकारियां बाकी शरीर पर. वो बस लेती पड़ी रही. छूट khul-band होती फड़क रही थी और दोनों अपने अपने पांव एक दूसरे की और किये दिवार पर आँखें बंद किये पसरे थे.
'चैपायक' की आवाज से अर्जुन ने आँख खोली और उठकर देखा तोह काजल उस टंकी नुमा घात में डुबकी लगाती खुद को रगड़ कर साफ़ कर रही थी. वो भी अंदर उतर गया तोह थोड़ा हैरान हुआ. नीचे सीढ़ियां थी कोई आधा फ़ीट नीचे हर कदम पर. जब वह काजल के पास आया तोह छाती तक पानी आ चूका था और काजल की थोड़ी तक पानी में थी. अंदर हे उस साफ़ पानी के उसको पकड़ कर अपने पास करने लगा तोह काजल उसके चेहरे की तरफ देखने लगी और फिर जल्दी से बोल उठी
"और नहीं छोड़ना मैंने. साफ़ करने दे खुद को और घर जाने दे. एक बार और किआ तोह कसम से यहाँ से फिर उठा के हे लेके जाना पड़ेगा.", उसकी बात से मुस्कुराता अर्जुन उसके दूध दबा के और होंठ चूम वापिस दिवार की तरफ आ गया. गीले कपडे पहनता वह काजल को हे देख रहा था जो तैरती हुई आ रही थी. उसकी गांड के उभार पानी के ऊपर से नजर आये तोह बस वही नजर रह गई.
"सोचना भी मत जो तुम देख रहे हो उसकी तरफ." आँखे और पाजामे में बनते उभर को समझती वह जल्दी से बहार आई और घाघरा पहन लिए. कमीज पहन ने लगी तोह खुद हे एक बार अपने दूध से पहले कमीज को रोक कर अर्जुन की तरफ देखने लगी. अर्जुन ने एक बार फिर दोनों को मुँह में भर के चूसा तोह कमीज नीचे कर वह शर्माती सी अपनी औढनी लेने चल दी.
"वैसे वह जगह भी खूबसूरत है तुम्हारी." अर्जुन की बात सुनकर चेहरा लाल हो गया लेकिन चुपचाप आती वह ओढ़नी को पानी में साफ़ कर निचोड़ने लगी.
"जवाब नहीं दिया तुमने." अर्जुन वही दिवार पर बैठ कर बात करने लगा और एक नजर अपनी घडी पर डाली. स्पोर्ट्स घडी थी तोह पानी का तोह डर नहीं था लेकिन जो समय वो बता रही थी उस से जरूर वो कुछ सोच में पड़ गया था. 7:01
"वो जगह लेनी इतनी आसान नहीं है. भाभी ने बताया था फाग के समय के मर्द को भरी पिछवाड़ा बहोत पसंद होता है और कुछ तोह ज्यादा वही करते है. लेकिन ये आगे की तरह नहीं होता जैसे ये लचीली होती है और गीली. तोह इसको ध्यान से और आराम से हे कर सकते है. और ये तोह मई तुम्हारे साथ बिलकुल नहीं करने वाली." हंसती हुई वो कड़ी हो कर अर्जुन के पास से भाग निकली.
"और सुनो. 10 मिनट बाद यहाँ से निकलना मेरे जाने के बाद." हवा में चुम्मा उछाल कर वह निकल गई वह से.
'ये भी तोह पूरी घोड़ी हे है.' अर्जुन मुस्कुराता हुआ वह ऐसी हे बारिश में बैठा रहा. आया था सविता से मिलने और हो गया काजल से सम्पूर्ण मिलान. वाह ऋ किस्मत क्या रंग है तेरे. ठीक सवा सात बजे वह पगडण्डी से होता हुआ निकला तोह पुलिया तक जाते हुए कई बार फिसलने से बचा. यहाँ ऊंचाई थी तोह अब जगह ख़राब नहीं थी. कुछ सोचता सा चाल को और धीमा कर चलने लगा. जैसे हे वह साधू सिंह के घर के पास पहुंचा तोह वह भैंसो की छत्त के नीचे बैठे हुक्का गुदगुदा रहे थे. हर तरफ शांति थी बारिश की वजह से.
"अरे बीटा तुम इधर हे अब तक?", उनकी आवाज सुनकर वह उधर हे चल दिए तोह साधु सिंह ने एक प्लास्टिक की कुर्सी कई कुर्स्कियों के ऊपर से नीचे उतार कर उसके लिए रख दी.
"अंकल वो आज जंगल के अंदर चला गया था कुछ ज्यादा. फिर एक नीलगाय दिख कर गायब हो गई तोह उसको देखने और आगे निकल गया.", अर्जुन अपनी बाहे से पानी उतरता बोलै तोह साधू सिंह मुस्कुरा दिए.
"चलो कोई बात नहीं उम्र है अभी घूमने फिरने की लेकिन जंगल इतना ाचा भी नहीं है बीटा और सांप गीदड़ भी है अंदर घने जंगल में. तुम बैठो मई तुम्हारे लिए दूध मंगवाता हु." अर्जुन के बोलने से पहले हे उन्होंने वही से आवाज लगाईं. "Guddi-Bimla, मेरी चाय के साथ एक गिलास दूध लेती आना गरम करके शक्कर वाला. खास मेहमान है." रोबदार आवाज देते उन्होंने कहा तोह प्रतिउत्तर में किसी महिला की अंदर आँगन से आवाज आई, "जी ठीक है."
"अंकल पहले हे देरी हो गई है. मई फिर कभी दूध पी लूंगा अभी चलता हु." साढ़े सात बज चुके थे तोह वह थोड़ा चिंतित हो उठा.
"बीटा पौने एक घंटे से पहले तोह पहुँचने से रहे. मिन्दर भी अभी शहर जाने वाला है तोह मोटरसाइकिल से तुम्हे भी छोड़ देगा." उनके बेटे का नाम महेन्दर था जिसको वह मिन्दर बुलाते थे. उनकी इस बात पर अब अर्जुन को थोड़ी शान्ति हुई. बारिश अभी भी हो रही थी लेकिन पहले से गति थोड़ी काम हो चुकी थी. भैंसे अपना चारा खाती मजे मार रही थी जिनके ऊपर साधू सिंह ने बोरी ुधा राखी थी. इतनी हेर देर में अंदर से छतरी लेकर हाथ में ट्रे लिए काजल हे बहार निकली. गोर बदन पर अब एक काला सलवार कमीज था और सर के ऊपर एक चुन्नी जो सामने से उसेक उभार छुपाये थी.
"बापू ये लीजिये." ट्रे को एक सरकंडो से बानी गोल स्टूल पर रखती वो चाय का कप देती बोली तोह अर्जुन ने बस एक नजर उसके चेहरे को देख सामने सर कर लिए.
"हाँ बीटा. गुड्डी ये है अपने शहर वाले बड़े थानेदार जी के पोते अर्जुन और बीटा ये है मेरी लाड़ली बेटी काजल. अभी 12 के इम्तिहान दिए है फिर जादो में इसका ब्याह हो जायेगा.", काजल ने हाथ जोड़कर अभिवादन किआ तोह अर्जुन ने भी वैसे हे नमस्ते से जवाब दिए. थोड़ी देर पहले जिसको वो खुले आसमान के नीचे छोड़ रहा था और जो मजे से अपनी टाँगे फैलाइये नीचे पड़ी छुड़वा रही थी, ये दोनों पहली पारिवारिक मुलाकात बिलकुल अजनबियों की तरह कर रहे थे.
"अंकल जल्दी नहीं कर रहे आप इनकी शादी.?", अर्जुन ने वह गधा दूध का गिलास उठाते कहा तोह कुछ सोचते से साधु सिंह बोले
"अरे बीटा मेरी तोह इत्छा न थी अभी इसको ब्याहने की. 18 की तोह हुई पिछले संक्रात पे. वो मेरी धर्मपत्नी के jaan-pehchan के है और इन्होने इसको पसंद कर लिए जब ये अपनी नानी के घर गई थी 16 की उम्र में. फिर बिमला ने भी कह दिए के जमींदार लोग है, ghar-pariwar ाचा है और अकेला लड़का है. मैंने 5 साल मांगे थे की इसका कॉलेज पूरा करवा दूंगा लेकिन उन्होंने कह दिए के कॉलेज वह भी करवा देंगे. इस बार भर्ती हो गई है लड़के की फ़ौज में तोह दिवाली के बाद जायेगी लेकिन दाखिला मई इसका बैसाखी पर करवा दूंगा कॉलेज का." साधु सिंह की बात पर अब अर्जुन ने सर हिला दिए. और काजल बस उनकी बातें सुनती बारिश देखने लगी.
"बड़ा ाचा लगा अंकल ये जानकार के आप पढाई के पक्ष में है. मेरा मतलब भी वही था अपना प्रश्न करने का. तोह इनका ससुराल भी अपने शहर के aas-pas हे है तभी यहाँ कॉलेज में एडमिशन दिलवा रहे है." अर्जुन की इस बात पर काजल उनकी और पीठ किये मुस्कुराने लगी थी.
"हाँ तोह इसका ननिहाल कही दूर थोड़ी है. ये अपनी बड़ी यूनिवर्सिटी से अगला गाँव हे तोह है. ससुराल भी वही हो गया फिर. मेरी लाड़ली को दूर तोह मई भेजने से रहा और फौजी को भी कह दिए के पढ़ाई में दिक्कत आई तोह मई उसका court-marshal कर दूंगा." उनकी इस बात पर वो दोनों हंस दिए और काजला अंदर भाग गई.
"अररि छतरी तोह लेती जा अपनी. देख बीटा अभी तक बचपना नहीं गया लेकिन शादी की बात पर शर्मा के भाग गयी." अर्जुन इस बात पर मुस्कुरा दिए. इधर एक लाल रंग की स्प्लेंडर मोटरसाइकिल बहार निकलता उनका बीटा दिखा, जो एक सर से लेकर पाँव तक बरसात पहने था. बस दूध के कनस्तर नहीं थे उनपे.
"मिन्दर बीटा ये अपना हे बचा है, रास्ते में हे घर पड़ेगा तोह उतार के चले जाना. दूध तोह आज तुम्हे डालना नहीं है वो पहले हे डेरी वाला लेके चला गया था." साधु सिंह ने अपने बेटे से अर्जुन का परिचय करवाया तोह वह भी इस लम्बे चौड़े लड़के को देखने लगा जिसकी अभी दाढ़ी भी न आई थी. महेन्दर एक 20 साल का एक साढ़े पांच फ़ीट का लेकिन सही सेहत वाला युवक था. पीछे से हे एक hatti-katti औरत दरवाजे की चौखट तक आ कड़ी हुई. ये रंग और शरीर से हे बता रही थी की काजल की माँ थी.
"अपने पंडित जा का पौता है क्या ये?", वही कड़ी वह अर्जुन पर नजर डालती बोली और अपने बेटे की तरफ उसका बटुआ बढ़ा दिए.
"है बिमला ये डॉ. साहब का बीटा है और देख के हे लगता है के उनके जैसा है. मामूली सा जरा लम्बा ज्यादा हो चूका है.", अर्जुन ने शिष्टाचार से दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किआ तोह बिमला देवी ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिए. दिवार की ोुत्त से काजल भी झाँक रही थी चुपके से.
"ाचा भाई बैठ जाओ मई तुम्हे छोड़ देता हु फिर आगे भी जाना है.", महेन्दर की आवाज में थोड़ा उतावलापन था जिसको समझते हुए अर्जुन झट्ट से बैठ गया और साधू सिंह को हाथ हिलता उसके साथ बैठ कर निकल लिए.
"भाई तुम न अगर कभी मोटरसाइकिल खरेदो तोह बुलेट हे लेना. मेरी तोह ये हलकी सी फटफटिया तुम्हारे लिए नहीं बानी.", अर्जुन उसकी बात पर हंस दिए.
"हाँ भाई मई भी वही सोच रहा हु लेने की. अगर कोई 15 किलो बढ़ गया 2-3 इंच के साथ तोह फिर इसपर तोह बैठ हे न सकूंगा.
"सही बात है भाई. वैसे कोनसे कॉलेज में हो? तुम्हारे घर वालो में से कुछ को तोह मई भी जानता हु. डॉ अंकल को, संजीव भाई को और दादाजी को तोह ाचे से.", अर्जुन गौर से उसकी बात सुन रहा था.
"भाई अभी तोह ग्याहरवी में जाऊंगा मई. एक साल तोह स्कूल में देरी से भर्ती हुआ था ऊपर से जब हॉस्टल भेजा तोह उन्होंने भी दूसरी कक्षा फिर से करवा di.",Dono हे अगले सेक्टर की सीढ़ी सड़क पर आ चुके थे.
"कमाल है भाई मुझे लगा के कॉलेज के अंतिम वर्ष में होंगे और अखाड़े वेखदे जाते होंगे. साला तुम तोह अभी स्कूल में हो लेकिन कुछ भी कहो भाई शरीर तोह विलायती सांड सा है. बेहतर होगा अगर ये कहु के अरबी घोड़े जैसे हो. चर्बी तोह है नहीं लेकिन चौड़े ाचे खासे हो.", महेन्दर उसके शरीर से खासा प्रभावित था. और गाँव का था तोह सीढ़ी बात हे कह देता था.
"वैसे रोज सुबह 10 कम दौड़ लगता हु और शाम को बॉक्सिंग सीखने स्टेडियम जाता हु जहा थोड़ी कसरत भी करवाई जाती है. शरीर तोह भाई आपका भी काम नहीं है.", अर्जुन ने भी उसकी पलट कर प्रशंशा की तोह वो बड़ा खुश हो गया.
"घर आया करो भाई कभी हमारे भी. Shanivar-ravivaar तोह मई घर हे रहता हु और इस बहाने तुम्हे गांव दिखाऊंगा और बहोत कुछ सीख भी लूंगा.", घर के सामने मोटरसाइकिल रोकते हुए महेन्दर ने कहा तोह हाथ मिलते हुए अर्जुन ने धन्यवाद् करते हुए अंदर आने के लिए कहा. लेकिन फिर कभी आने का बोल वह निकल लिए. पूरे 8 बजे वह अपने घर आ गया था और बारिश अभी तक होने लग रही थी. अंदर आते हे सीधा बाथरूम में घुस के नहाने के बाद वो बहार से हे ऊपर चल दिए. कपडे पहन कर दरवाजा खोला तोह तारा अपने बाल सही करती दिखी.
"आ गए जनाब? वैसे सुबह के लिए थैंक्स." उसके गाल को चूम कर वो पिछले दरवाजे से उसके साथ हे नीचे उतर कर डाइनिंग टेबल की तरफ आ गई. जहाँ सभी थे इस समय.
"इतनी देर तक कहा था तू?", अलका दीदी ने बिना कुछ देखे ये बात बोली तोह ऋतू ने हाथ मारा उसके पिछवाड़े पर.
"वो बारिश तेज हो गई थी तोह वही रुक गया. फिर गाँव से आते एक दोस्त ने यहाँ तक छोड़ दिए.", वह कुर्सी पर आरती की बगल में बैठ गया जो चाय और परांठा खाने लग रही थी. ऋतू दीदी एक गिलास दूध और एक लड्डू उसके सामने रख दिए.
"वह कपडे बता देना रात को शादी में जो पहन कर जाने है. तारा को छोल अंकल उसकी कंपनी छोड़ देंगे और भैया भी 5 बजे तक आ जायेंगे.", ऋतू दीदी ने पूरा कार्यक्रम बता दिए लेकिन अभी वह वैसे हे बर्ताव कर रही थी जैसा पहले करती थी.
"ाचा अपनी पसंद से निकाल देना जो ठीक लगता हो आपको.", अर्जुन की इस बात पर वो वैसे हे मुस्कुराई जैसे ये शब्द उनके पति ने कहे हो. और इसको अलका के साथ आरती ने भी देख लिए था. प्रियंका दीदी ने अलका को बिठाते हुए एक प्लेट में परांठा और मक्खन दिए तोह वह भी सामने बैठ गई और गौर से अर्जुन को देखने लगी.
"मई खाना थोड़ी देर तक खाऊंगा दीदी. मेरा बना कर आप डब्बे में रख देना.", लड्डू ख़तम करता वह उठने हे लगा था के छोल साहब और प्रीती आ गए उनकी तरफ.
"बरखुरदार खाना अभी हे खाओगे. चाहे काम हे सही लेकिन नाश्ता समय पर होगा.", उनकी बात पर वह वही बैठ गया. तारा उठती हुई रसोईघर में प्लेट रख कर हाथ धोने चली गई तोह प्रीती अलका दीदी के साथ बैठ गई.
"दादू आप आज इतनी जल्दी जा रहे हो?", अर्जुन ने उनसे बात शुरू की तोह वह भी एक कुर्सी पर बैठ गए.
"बीटा आर्मी ऑफिस में रेइरेमेंट के बाद भी काम और फाइल ख़तम नहीं होती. फिर दोस्त भी होते है वह तोह shagan-mela कर लेते है. तू शाम को समय से ले जाना इनको शादी में मई तोह वही 10 बजे आऊंगा.", तारा को बैग लिए आते देख वो आरती और अलका के सर पर हाथ रखते बहार चल दिए.
"यार प्रीती तेरे तोह मजे है. आज तू शादी में और हम यहाँ अकेले वही chulha-chauka करते रहेंगे." अलका ने शकल बनाते हुए कहा
"हाँ दीदी. वो आपको मैंने देखा है कितना ज्यादा काम करती रहती हो आप. प्रियंका दीदी और ऋतू तोह मदद भी नहीं करते आपकी." उनकी हे तरह जवाद देती वो बोली तोह अलका उसके कान पकड़ने लगी और बाकी सभी हंसने.
"ले प्रीती तू भी आजा मेरे साथ नाश्ता कर ले.", ऋतू दीदी अपनी प्लेट उसकी बगल में रखती बोली और बैठ गई.
"वैसे तोह मई कर के आई हु लेकिन आपके साथ जरूर खाउंगी.", प्रीती को एक बार देख कर अर्जुन वापिस मुस्कुराते हुए खाना खाने लगा.
"ाचा रसोई के बाद मई ऊपर की सफाई कर दूंगी. और जो कपडे अर्जुन के धोने वाले है वह निकल लुंगी.", अलका प्लेट उठती इतना बोलकर रसोईघर में चल दी तोह आरती भी उनके पीछे चली गई.
"आप मेरे साथ खाना खा के घर चलो, बुआ बुला रही थी आपको. और मुझे भी बहोत कुछ बताना है आपको.", अर्जुन की तरफ एक गहरी मुस्कान दिखती वो बोली तोह अर्जुन को खांसी आ गई.
"लो आप पानी पियो जी." प्रीती ने फिक्र सा कस्ते हुए गिलास उसकी तरफ बढ़ाया तोह उसकी उंगलिया दबाते हुए उसने गिलास ले लिए. और अर्जुन का इतना करना हे प्रीती को चुप करवाने के लिए बहोत था. उठकर वह भी अंदर चली गई अलका दीदी के पास.
"मजा आता है उसको सताने में?", ऋतू दीदी के बात पर वो बस मुस्कुरा दिए. प्रियंका दीदी बेध्यानी में जब अर्जुन के साथ लगती हुई बैठने लगी तोह उनका मोटा बहार को निकला उभर कास के अर्जुन की कोहनी से रगड़ता गया. ऋतू दीदी तब तक उठ चुकी थी लेकिन अर्जुन को तोह ये स्पर्श महसूस होते हे मजा सा आ गया था. एक मुस्कान के साथ उसने प्रियंका दीदी के चेहरे की तरफ देखा तोह अब वो नजरे झुकाये शर्मिंदा सी खुद को ठीक करती बैठी रही.
"हो जाता है ऐसा कभी कभी. आपको नजरे नीची करने की जरुरत नहीं है.", वो अब वह अकेलटी बैठी थी तोह अर्जुन ने साथ देने के इरादे से खुद को बिठाये रखा.
"थैंक यू. ध्यान नहीं था मेरा तोह टकरा गई.", उनका दिल भी अब रफ़्तार पकड़ रहा था धड़कने की. आकर्षित तोह थी हे वह जबसे उसका मोटा उभर उन्होंने देखा था और ऊपर से जितना कुछ पिछले दिनों में उन्होंने देखा और बातें की थी, उनका दिल भी करता था के वो सब कुछ महसूस करे बस एक झिझक और उम्र में अंतर के चलते शर्म सी थी. यहाँ हर गुजरते दिन के साथ अर्जुन जैसे महीनो का अनुभव लेता जा रहा था. अर्जुन को प्रियंका दीदी के मैं में भी कुछ चलता महसूस हुआ था.
"कोई बात नहीं दीदी. वैसे आप है तोह बहोत प्यारी.", अर्जुन की इस तारीफ को प्रियंका दीदी समझ गई थी और अब शरमाते हुए खाना खाने लगी. इधर प्रीती और ऋतू निकल लिए उनके घर की तरफ. जाते हुए प्रीती एक इशारा सा करती गई जो सिर्फ अर्जुन ने हे देखा और मुस्कुरा दिए.
"ाचा आप खाना खाइये मई ऊपर चलता हु फिर दिन में आता हु आपके पास.", आरती दीदी को वह बैठ ते देख कर अर्जुन ने आरती की तरफ भी एक शरारती मुस्क़ुआन उछाल दी जिसको देख वो सर झुका कर मुस्कुराने लगी अपना कॉफ़ी का कप टेबल पर रखते हुए. प्रियंका भी अर्जुन के इस तरफ सीधा बता देने से थोड़ी खुश और थोड़ी सोच में डूब कर नाश्ता करने लगी.
.
.
"कहा रह गई थी ऋ आज सुबह तू? और मई उधर आई थी देखने तोह तू वह पर नहीं दिखी?", सविता अपने घर खाना बनाने के बाद अब काजल के घर उसके कमरे में बैठी थी. सुबह उसको बारिश की वजह से खेत में बानी झोपडी पर हे रुकना पड़ गया था.
"अरे पहले तोह मई वही उसके साथ हे बैठी रही फिर जब कुछ बुँदे गिरने लगी तोह वह जंगल वाले घात पर बैठ कर बातें करते रहे. 7 बजे हे घर आ पाई मई बापू की वजह से.", काजल गॉड में तकिया रखे बिस्टेर पर बैठी अपनी सहेली को बताने लगी.
"इतनी देर तक तू उसके साथ वह अकेली थी?", कुछ सोचती सी वो ये बात बोली तोह काजल मुस्कुराती हुई कहने लगी
"लड़का ाचा है और बातें भी बड़ी ाची करता है. राह तोह वह तेरी भी देख रहा था लेकिन मेरे साथ हे बैठा रहा बारिश की वजह से." वह सोच कुछ रही थी और बोल कुछ.
"यकीन नहीं होता के sava/dedh घंटा तू उसके साथ थी और तुमने कुछ न किआ." सविता को जाने कोनसी चिंता थी.
"जंगल की बातें की, तेरी बातें और गाँव भर की. फिर थोड़ी देर वह बारिश का मिजाज देख नहर में नाहा के चला गया. मेरा भाई हे छोड़ने गया था उसको क्योंकि बापू और माँ उसके परिवार से वाकिफ है. लेकिन तू चिंता न कर मेरी तोह शादी पहले हे पक्की है तोह कल थोड़ा शर्माना छोड़ कर बात कर लिओ दिल की कही ऐसा न हो के वह तेरे इस तरह दूर दूर रहने से कहीं आना हे छोड़ दे और तू फिर कही उस से प्यार करने लगे.", काजल की बात से अब कही सविता के चेहरे पर मुस्कान और शर्म आ गई.
"यार तू जानती हे है मुझे. लड़का ाचा है और बात भी तमीज से करता है लेकिन अगर कल कोई ऊंच नीच हो गई तोह खुद सोच मेरी ज़िन्दगी खराब हो जाएगी.", उसकी बात में गंभीरता थी.
"ऐसे हे खेत और घर पर काम करती मर्डर जाएगी एक दिन. तेरे बापू ने तोह फ़ौज से ब्याह कर रखा है और तेरे बाबा कभी इस तरफ ध्यान नै देते. अगर कोई प्यार करता हुआ तुझे कुछ खुशियां देता जाये तोह बहोत है न इस जकड़ी हुई ज़िन्दगी से तोह. जिस तरह वह तुझे देखता है उस से साफ़ पता चलता है के उसको तू पसंद है. जितने ब्याह नहीं होता काम से काम इतने हे उसके साथ चाँद पल बिता ले. और फिर गलत लगे कुछ तोह मिलना बंद कर देना. और मई इसमें तेरा साथ देने को तैयार हु." काजल की बात पर सविता बस मुस्कुरा दी.
लेकिन यहाँ तोह बिमला और उनका बीटा महेन्दर तोह सविता को इस घर की बहु के रूप में हे देखते थे. साधु सिंह को भी वो बची बेहद पसंद थी लेकिन आज तक उन्होंने ये बात अपने मुँह से न कही थी. वो तोह सोच रहे थे के फसल कटाई के समय सीधा फौजी सम्पत सिंह से हे बात करेंगे रिश्ते की.
नीलगाय
जाने अभी कोनसा पहर था लेकिन ऋतू की आँख खुल गई थी. अर्जुन उसको बाहों में लिए सोया पड़ा था पीछे से पकड़ कर. एक मुस्करात जिसमे सिर्फ ख़ुशी थी khud-ba-khud उसके खिले हुए चेहरे पर तैर गई. 'बस यही तोह सपना था एक. अब अगर ज़िन्दगी यही ख़तम हो जाये तोह कोई शिकवा नहीं.' सोचती हुई ऋतू ने अपने हाथो की उँगलियों में अर्जुन के हाथ की उँगलियाँ प्यार से पीरो दी. उसकी उँगलियों के पूरे पहले से अधिक हे मॉटे लग रहे थे. इतनी काम रौशनी में चोट तोह कही न दिखी बस उनका उभार बता रहा था के कुछ सूजन जरूर थी. आराम से वापिस उंगलिया निकल कर वो फिसलती सी बहार निकल उसकी गिरफ्त से फर्श पर कड़ी हो गई. अर्जुन शायद कुछ थकान की वजह से सोया हे रहा. उंगलिया थोड़ी हिली थी लेकिन नींद नहीं खुली.
ऋतू बाथरूम से मुँह धो कर सीधा रसोईघर में चली गई. रात की बची 2 रोटियां हलकी सी गरम कर सरसों का तेल और हल्दी दाल कर एक प्लेट में राखी. फिर एक चाक़ू और साफ़ सूती कपडा लेकर वापिस कमरे में आ गई. अब यहाँ बड़ी तुबेलिघ्त रोशन थी जिसके उजाले में वह रोटी को किसी पट्टी की तरह काटने लगी थी और साफ़ कपडे की 5-6 लम्बी कतरन बना कर वह अर्जुन के पास बिस्टेर पर आ बैठी. सावधानी से हाथ को अपनी जांघ पर टिका कर उसकी 3 सूजी हुई उँगलियों पर पहले वो गरम रोटी के साफ़ काटे हुए टुकड़े को ाचे से लपेटने लगी और फिर उसको कपडे से ढकने के बाद गांठ लगा दी. अर्जुन इस एहसास से उठ चूका था और चुपचाप बस ऋतू को अपने इस काम में मगन देखता रहा. तीनो उंगलिया पूरी तरह से धक् गई तब अर्जुन ने हलकी आवाज दी.
"इस हाथ की भी ऐसी हे हालत है. वो बॉक्सिंग के समय शायद कही चोट आ गई थी." ऋतू ने जब दूसरे हाथ को देखा तोह वह भी वैसा हे नजारा था. सिर्फ छोटी ऊँगली और अंगूठा सही सलामत थे और यहाँ की भी 3 उंगलिया में सूजन थी.
"रात को हे सब करवा लेते तोह अब तक तोह ठीक भी हो जाते. कोई बात नहीं आप ऐसे हे लेते रहो मई कर देती हु.", एक बार फिर उठ कर कपडे की और कतरन काटने के बाद वही प्रक्रिया इस हाथ पर भी दोहराई. बीच बीच में अर्जुन अपनी chedd-chaad कर हे लेता था. कभी गाउन के ऊपर से खड़ा दीखता निप्पल दबा कर तोह कभी गर्डर और कूल्हे सेहला कर. ऋतू इन छोटी हरकतों का आनंद लेती बस काम करती रही.
"हो गया सब. अब ये तकिया दोनों हाथो के नीचे रखिये और सो जाइये कुछ देर. अभी सिर्फ 3 बजे है. 3-4 घंटे तक उतार दीजियेगा ये.", ऋतू वह से उठने लगी तोह अर्जुन ने फिर पकड़ लिए.
"आप भी यही लेत जाओ न? नहीं नींद नहीं आएगी." अर्जुन ने वापिस बिस्टेर पर करने की कोशिश की ऋतू दीदी को तोह उन्होंने ना में सर हिला दिए.
"अलका के पास वापिस जाना है अभी. वो उठ गई तोह इधर हे आ जाएगी. और आप अकेले में मुझे 'तुम' कहने की आदत दाल सकते हो." ऋतू दीदी अभी तक अपने मिलान वाले रूप में हे थी.
"मई आपको आप हे कहूंगा. और एक बार नाम लिए था लेकिन दिल कहता है की जो इज़्ज़त दी हुई है वह बढ़नी हे चाहिए. तोह आपकी ये बात मई नहीं मानूंगा." उसकी बात पर हलके से मुस्कुराती वह नीचे झुक कर प्यार से गाल चूमती हुई बहार चली गई. फिर से बड़ी लाइट बंद हो चुकी थी. अर्जुन ने एक बार फिर आँखें बंद की तोह ठीक 4:20 पर हे वो उठा. मुट्ठी 2-3 बार khol-band करने के बाद वह उठकर सीधा आँगन में बने बाथरूम में घुसा और टोलिया गीला कर चेहरा साफ़ करने लगा. लेकिन ये भी नहीं कर प् रहा था. ऐसे हे छोड़ कर पेशाब करने के बाद बहार निकला तोह यहाँ भी ऋतू दीदी सामने कड़ी थी.
"अंदर चलो." ब्याह पकड़ती वो अर्जुन को फिर से बाथरूम में ले आई और खुद हे चेहरा साफ़ करने लगी. पजामा नीचे कर सोये हुए अंग को भी हाथ धोने की जगह कर पानी से धोने के बाद तोलिये से साफ़ कर खुद अपने हाथ साबुन से धोये.
"आप सोइ नहीं? मई जा रहा हु आप 8 बजे से पहले नहीं उठना." उन्हें कमरे की तरफ छोड़ कर वो संजीव भैया के पास चल दिया. वो सच में गहरी नींद में सोये हुए थे.
"उठिये भैया. 4:30 बज गए है और आपने कही जरुरी जाना है." घडी एक बार देखता वह उनको हिलने लगा तोह संजीव भैया अंगड़ाई लेते से बिस्टेर पर बैठ गए. नीचे पड़ा पानी का जग उठा कर अर्जुन ने एक गिलास भर के उनकी तरफ बढ़ा दिए और 2 घूँट लेने के बाद वह उठ खड़े हुए.
"थैंक यू छोटे. सही समय उठा दिए भाई. बहोत थकान थी लेकिन अब बेहतर हु." अपने शरीर पर बनियान के ऊपर टीशर्ट डालते हुए वो बोले तोह अर्जुन विदा लेकर अपने कमरे में आ गया. कपडे बदलने में कोई परेशानी न हुई बस जूते पहनते वक़्त उसको लगा के वो उन्हें कस कर नहीं बाँध सकता.
तारा अभी तक वैसे हे एक करवट लिए सफ़ेद चादर के ऊपर लेती थी. जीरो की रौशनी में उसके लुढ़के हुए दोनों उभर किसी का भी दिल धड़का देने के लिए काफी थे लेकिन अर्जुन ने सावधानी से उसके ऊपर चद्दर लपेट दी और दोनों तरफ से उसके शरीर के नीचे दबाने के बाद जीरो का बल्ब भी बंद कर दिए. पीछे जाने वाले रस्ते का दरवाजा अब चिटकनी से बंद हो चूका तोह सब तरफ देख वो बहार निकल आया.
'साइकिल नहीं चलेगी और स्कूटर ले जाना मतलब सबके सवाल.' घडी में देखा तोह 4:40 बता रही थी और फिर कुछ सोचता सा वह बहार निकल कर साढ़े कदमो से दौड़ चालु करता निकल लिए. आज रफ़्तार पहले की मैराथन से लगभग दोगुनी थी उसकी. नए सेक्टर को पार करते हे घडी पर नजर डाली तोह ठीक उसके शीशे पर एक मोटी बूँद पानी की आ कर गिरी. 5:00. बादलो की वजह से अभी तक एक तरह का अँधेरा था लेकिन ये एक बूँद प्रमाण थी वो भी तैयार हो चुके थे बरसने को. इधर गाँव की सड़क पर दौड़ता वो पसीने में भीग चूका था और आज हवा तोह जैसे एकदम रुक चुकी थी. ठीक गाँव की सड़क पर कदम बढ़ाते हे सामने से बरसाती ओढ़े साइकिल पर दूध के कैनस्टा लिए अर्जुन को साधू सिंह जी आते दिखे. पीले रंग की वह प्लास्टिक की चमकती बरसाती अभी उनके सर पर नहीं थी.
"Ram-Ram बीटा. बड़े रफ़्तार में हो आज." हँसते हुए उन्होंने अपनी साइकिल उसके पास रोकी तोह निगाह हाथो पर भी गई.
"है अंकल वह देख रहा था के मेरी क्षमता कितनी है तोह बस यही आ कर रुका हु घर से.", चेहरे को रुमाल से पोंछता वो उनके Ram-Ram का जवाब दे साथ खड़ा हो गया.
"इतनी सुबह ऐसा पसीना आना बता रहा है के लक्ष्य के लिए गंभीर हो बीटा. बहोत ाची बात है ये तोह. नहीं तोह आजकल के लड़के तोह car-motorcyle से नीचे तोह अपने पाँव रखना पसंद नहीं करते. वैसे मौसम आज खराब है और हालात बता रहे के अगले आधे घंटे में बारिश जम्म के होने वाली है."
"सही कहा अंकल जी. लेकिन बारिश हे तोह है. देखिये आप भी तोह उसकी परवाह किये बिना काम पर चल दिए है और फिर मई उतनी कोई म्हणत नहीं करता जितनी आप करते है." अर्जुन समझ चूका था के kisaan-doodhwale की ज़िन्दगी में तोह आराम मुश्किल हे है. वो तोह फिर भी चैन से सो जाता है जब दिल करे.
"आदत हो गई है बीटा इस शरीर को तोह. काम न करू तोह बुखार आ जाये. ाची बात है बीटा कल मिलते है.", इस बार वह चलने लगे तोह बिना सोचे अर्जुन ने साइकिल पर रखे उनके पाँव को छु लिए. उन्होंने भी मुस्कुराते हुए ढेरो आशीर्वाद दे दिए.
"ाचा अंकल जी कल मिलते है." आगे दौड़ता वो निकल लिए और इधर साधू सिंह भी मुस्कुराते हुए अपने रास्ते हो लिए. गाँव शुरू हुआ तोह अर्जुन बस दोनों तरफ देखता आगे बढ़ता रहा. सविता के घर का दरवाजा तोह लगा हुआ था लेकिन बहार आँगन का लकड़ी का गेट हल्का खुला हुआ था. फिर आगे आया तोह साधू सिंह के घर का आँगन भी नजर आया जिसको देखने भर के बाद वो दौड़ लगता सीधा पुलिया पर हे आकर रुका. कदम रुकते हे अर्जुन को महसूस हुआ के उसकी ज़िन्दगी में अब तक की सबसे लम्बी दौड़ थी. उस पुलिया की छोटी दिवार को पकड़ कर वो अभी किसी कुत्ते की तरह हांफ रहा था. अगर इस पल कोई उस से बात भी करता तोह शायद उसके मुँह से एक लफ्ज़ भी न निकलता.
"uhmm..hmmffff.. हहहहहह.. ये कुछ ज्यादा हे हो गया.. हहह हहह." कोई 5 मिनट तक वह ऐसे हे झुका खड़ा रहा था. फिर धीमे कदमो से पुलिया के पर नीचे उतरता वह नहर के पास आ कर बैठ गया. हाथो को देखा तोह हलके भीगे थे लेकिन पत्तिअ वैसे हे थी. यहाँ बेहद शान्ति थी और एक ठंडक जैसी पुलिया के ऊपर तोह बिलकुल न थी.
"तोह आज तुम इस तूफान में भी घर न रुक सके अपने और मेरी सहेली को देखने आ पहुंचे.", पीछे से आई इस आवाज पर अर्जुन ने देखा तोह काजल घाघरा कमीज पहने हाथ में लौटा लिए कड़ी थी.
"तुम्हे कैसे पता चला के मई इस तरफ बैठा हुआ हु?", उसको हैरानी हुई क्योंकि वो तोह उनके खेतो के दूसरी तरफ यहाँ बैठा था जहाँ से नजर तोह वो आ नहीं सकता था और साइकिल आज उसके पास थी नहीं.
"वो तुम जहा बैठे हो वही पर तोह ये घात बना है. और मई आई थी यहाँ पाँव धोने के लिए और तुम दिख गए." उसकी बात सुनकर अर्जुन ने काजल के गोर पाँव देखे जहा थोड़ा कीचड लगा था. फिर जब उसने नजर उसके पीछे की तरफ की तोह काजल ने हे जवाब दिए.
"सविता थोड़ी देर तक आएगी. गाये खेत में बाँध रही है.", इतना बोल कर वह घाघरा ऊपर करती उस ईंटो की एक बड़ी तालाब से घात की दिवार पर कड़ी हो घाघरा ऊपर करती अपने गोर मांसल पाँव उस ठन्डे पानी में दाल कर हौले हौले हिलने लगी. पानी में बनती तरंगे देखता अर्जुन उसके पाँव भी धान से देखने लगा. बेशक वो तंदरुस्त लड़की थी लेकिन गोरी पिंडलियों पर मासपेशिया बता रही थी की वो मेहनती और जानदार भी थी. चांदी की पतली घुंगरू वाली पाजेब हल्का शोर सा करती हर बार हिलने से.
"ये भी मजेदार खेल है." अर्जुन को अपनी पाँव देखते हुए भी नजरअंदाज करती वो मुस्कुराती बोली.
"हाँ. ये पानी की तरंगे कैसे एक लाये में बनती है फिर गायब हो जाती है.", अर्जुन को ाचा लगा के लड़की ने उसके घूरने को नजरअंदाज कर दिए था. अब नहर के पार देखने लगा तोह काजल फिर बोल उठी, " वह सामने न वो जमीन है जो जंगल के साथ वाली, वो साड़ी हमारी है. गाँव में कुल 16 परिवार है लेकिन हमारे पास पूरे 25 किल्ले है. उस जगह पे तोह बेरी के बहोत झाड़ है.", अर्जुन बस इस चुलबुली की बातें सुन रहा था बिना उसकी तरफ देखे. एक अपराधबोध सा महसूस हुआ था जब वह उसके पैरों की सुंदरता निहार रहा था और काजल ने ये देख लिए था.
"इतनी जमीन है फिर भी तुम्हारे पिता जी दूध का काम क्यों करते है?", अर्जुन jaan-na चाहता था उसके परिवार के बारे में.
"अब ऐसा है के बापू सिर्फ उनके घर में दूध डालने जाते है जिनको वह बहोत समय से जानते है. और ये उनकी आदत बन गई है, उनके चक्कर में तोह अब मेरा भाई भी ये सब करने लग गया है. नहीं तोह वो तोह 8 बजे घर से निकलता है और सीधा रात में 7-8 बजे आता है. बापू बस khet-khalihaan और उनकी gaaye-bhains में दुनिया बनाये रहते है." काजल अब कोई ऐसी बात नहीं कर रही थी जैसे वह कल करती दिखी थी. लगता था के जैसे वह बात करना चाहती है लेकिन शायद दोस्त ज्यादा नहीं है.
"और तुम्हारी माँ. वो क्या करती है?", अर्जुन ने भी उसको बोलने का मौका दिए.
"वो पैसे संभालती है और हिसाब किताब देखती है साड़ी जमीन और दूध का. समय मिल जाए तोह मेरी खिंचाई नहीं मेरे भाई को सीने से लगाए रहती है.", इस बार वह हंसती हुई ये बात बोली.
"तुम लड़की ाची हो. मुझे तोह कोई वजह नहीं लगती की वह तुम्हे daant-ti होंगी. और अगर वो तुम्हारे भाई को प्यार करती है तोह इसका मतलब तुम अपने बापू की लाड़ली हो.", अर्जुन के इस सटीक जवाब से वह एक बार फिर मुस्कुरा दी. भरे भरे गाल ाचे लग रहे थे. इतनी देर बाद अर्जुन ने उसकी तरफ देखा था, जो अब घात की तरफ पीठ करके पाँव जमीन पर लटकाये बैठी हुई थी.
"वैसे तुमने नहीं बताया के तुम यहाँ क्यों आते हो? सविता तोह कही बहार जाती नहीं तोह सपने में आने से रही.", अर्जुन उसकी बात पर सहज होता हुआ बोलै.
"नहीं. मई रोज घर से दौड़ लगाने निकलता हु तोह फिर एक दिन तुम्हारे पिताजी गाँव के मदद पर मिल गए थे. बस उनके जरिये पता चल गया के इस तरफ भी हरियाली और शान्ति है तोह मई इधर आने लगा. और सही बताऊ तोह तुम्हारे गाँव का सबसे ाचा हिस्सा यही है जहाँ हम बैठे है.", और फिर वह नहर में बादलो की परछाई देखने लग गया.
"जगह तोह और भी है इस से ाची. आते रहोगे तोह देखोगे. ये तोह फिर भी ऐसी जगह है जहा पुलिया की वजह से dhor-dangar आ जाते है. लेकिन उस तरफ तोह बस जंगल, नहर और कभी कभी koyal-mor-toute होते है. फूल और फल भी लगते है वह लेकिन अब इतने लोग तोह है नहीं हमरे गाँव में न सड़क तोह वह कोई नहीं आता." थोड़ा आगे की तरफ इशारा करती वह चहकती सी बोली.
"तू अभी तक यही बैठी है.?", सविता वह आई तोह अर्जुन को भी देखा और फिर शांत हो गई.
"है तेरी गाये बांध गई? मैंने सोचा तू समय लगाएगी तोह तेरा दोस्त चला न जाये. यहाँ आ गई इसके पास.", सविता उसकी बात पर आँखें दिखने लगी तोह अर्जुन भी उसकी बड़ी बड़ी काली आँखों को देखने लगा. दोनों सहेलियों ने उसकी ये हरकत देख ली थी. अब जहाँ काजल के चेहरे पर नटखट मुस्कान थी वही सविता का चेहरा लाल हो चूका था.
"ये बचे हुए पैसे aapke.",Ek 50 को नोट अर्जुन की तरफ करती वह दूर हे कड़ी रही है.
"ऐसे तोह ये उड़कर मेरे पास आने से रहा.", अर्जुन ने वही बैठे हुए हे कहा और हाथ बढ़ने का कोई उपक्रम न किआ तोह सविता हलके कदम बढाती सी उसकी तरफ जाने लगी थी.
"ये लीजिये.", उसके सर के पास खड़े होते हुए सविता ने हाथ आगे किआ तोह अर्जुन ने पट्टी लगा हाथ सामने बढ़ा दिए.
"तुम हमेशा हे चोट खाये रहते हो क्या?", सविता उसके हाथ को देखते बोली तोह काजल ने अर्जुन से पहले हे जवाब दे दिए.
"मैंने कहा था के ये पहलवान है अब इसकी उंगलिया बता रही है न." अर्जुन हँसता हुआ पत्तियां खोल कर बोलने लगा.
"पहलवान नहीं वो मई स्टेडियम में बॉक्सिंग सीखता हु तोह कल बस वही अभ्यास करते हुए थोड़ा सूज गई थी.", दोनों सहेलियां उसकी और देखने लगी.
"तुम खिलाडी हो?", काजल ने कहा
"नहीं तोह. बस सीखने के लिए और अपने जोश को सही तरीके से लगाने के लिए मई करता हु." सविता भी अब अपनी सहेली के पास बैठ गई थी. उसका दिल तोह था अर्जुन को jaan-ne का और उस से बातें करने का लेकिन एक झिझक और फिर काजल का वह होना.
"जोश तोह कही और भी दिखा सकते हो और मेहनत भी हो जायेगी.", काजल की द्विअर्थी बात को सविता समझ गई तोह वो उसके हाथ पर मारती नकली गुस्सा दिखने लगी.
"दीदी, बाबा बुला रहे है खेत पे.", ये छोटा लड़का सविता का भाई था जो दूर से आवाज दे रहा था एक हाथ से निक्कर पकड़ कर. उसकी बात सुनकर सविता कुछ इशारा करती काजल को और एक बार अर्जुन की तरफ देख वह से चल दी. अर्जुन ने एक बार उसको जाते देखा और फिर अपनी उंगलिया देखने लगा जो थोड़ी चमक रही थी लेकिन सच में अब वह सूजन नहीं थी.
"चलो जब तक वो आएगी मई तुम्हे मेरी खास जगह दिखती हु." काजल भी कड़ी होती बोली तोह अर्जुन भी बस अपना सर हाँ में हिलता उठ कर उसके साथ चलने लगा. दोनों लड़कियों के साथ ऐसे इतनी सुबह बैठ कर बातें करना उसको बहोत ाचा लगने लगा था. तीसरी हे मुलाक़ात तोह थी लेकिन जैसे वह आज बातें कर रहे थे ऐसा लगता था के तीनो जैसे काफी सालो से एक दूसरे को जानते हो.
"यहाँ आगे कभी कभी सांप भी निकलते है लेकिन मेरे बापू कहते है के ये नहर और खेतो वाले सांप जेहरीले नहीं होते और चूहे खाने के लिए इस तरफ आ जाते है." काजला इठलाती हुई उस 2 फ़ीट चौड़ी झाड़ियों से घिरी पगडण्डी पर इठलाती सी चलती अपना घ्यान बघार रही थी. घाघरे में पीछे से हिलते कूल्हे उसके जिस्म का भूगोल बताते लगते थे. फिर अर्जुन उसके पीछे चलता उसके मुस्कुराते चेहरे को देखने लगता जब वो बार बार मुँह पीछे करती. कानो में छोटी सोने के बाली भी जैसे और आकर्षण बढ़ा दे रही थी.
"तुम बड़ी हिम्मतवाली हो फिर तोह. क्योंकि जितना मई जानता हु लड़कियां तोह कॉकरोच से भी डर जाती है और चूहों से भी." अर्जुन अब घने पेड़ो के बीच से गुजर रहा था और काजल के घाघरे पर भी कही कही झाडिया टकरा रही थी. ये इतनी घनी जगह थी की 6 बजे के लगभग समय भी यहाँ बहोत हे काम उजाला था. ऊपर से घने बादल भी एक वजह थे.
"यहाँ गाँव में तोह सब काम खुद करने होते है. फसल कटाई में देखना कभी कितनी मेहनत लगती है. कमर और हाथ तोह पहले दिन जवाब हे दे जाते है लेकिन अगले दिन आदत हो जाती है.", अर्जुन को पता चल गया था उसके मांसल शरीर का राज.
"ये देखो. ये है मेरी ख़ास जगह." एक छोटा सा घात नहर के पानी से भरा हुआ और ऊपर से घने पेड़ो किसी छतरी की तरह उसके ऊपर झुके हुए थे. छोटे paudho-jhadiiyon पर safed-peele-laal जङ्गली फूल और एक जगह साफ़ पक्की जमीन, शायद वह पगडण्डी का ये आखिरी हिस्सा था. कुछ सफेदे और खैर के पेड़ जमीन के सामानांतर पड़े हुए थे.
"हाँ ये है तोह बड़ी ाची जगह. लेकिन तुम्हे यहाँ अकेले तोह कभी नहीं आना चाहिए." कही कही जमीन और पेड़ के नीचे मिटटी में बने बिल देकते हुए उसने ये बात कही तोह काजल एक गिरे हुए पेड़ पर बैठ कर बोली, "यहाँ तोह सविता भी नहीं आती मेरे साथ. एक दिन नेवला देख लिए था उसके बाद तोह यहाँ आने का नाम लेते हे वह मन कर देती है." काजल हंसती हुई बोली. "लेकिन मुझे ये पसंद है और फिर ये नहर भी तोह है यहाँ. अगर भागना हे पड़े तोह तैरना ज्यादा आसान है."
"बहादुर लड़की हो. ाचा लगा ये जानकार. मई तोह समझा था तुम सिर्फ शरारती और ज्यादा बोलने वाली हे हो." उसके थोड़ा सा पास बैठ ते हुए अर्जुन नहर के उस तरफ देख रहा था जहा घने वृक्ष के बीच हलकी झाड़ियां हिलने लग रही थी.
"वो वह रोज होंगे. कभी कभी खेतो में भी आ जाते है लेकिन कुत्ते पीछे लग जाते है इनके तोह फिर जंगल में भाग जाते है ये.", काजल ने उसकी आँखों का पीछा कर लिए था. और अर्जुन को एक बड़ी सलेटी रंग की हिरण जैसी नीलगाय वह दिखी. ऊंचाई तोह किसी घोड़े के जैसी थी.
"ये नर है. वही इतने बड़े होते है लेकिन इंसानो से दूर हे रहते है ये.", काजल की बात पर अर्जुन ने एक मुस्कराहट के साथ उसकी तरफ देखा तोह वो भी एक बड़ी मोहक मुस्कान से वैसे हे देखने लगी. और अगले हे पल पूरा आसमान safed-lal हो उठा. गर्जना इतनी तेज थी की मुस्कुराती हुई वह हिम्मती लड़की उछलती सी अर्जुन के सीने आ लगी थी. दिल तोह एक बार अर्जुन का भी हिल गया था इस अचानक megh-dahaad को सुन कर. क्योंकि पल भर में साड़ी शान्ति ख़तम सी कर दी थी. पानी की मोटी मोटी बूंदे जब पत्तो पर गिरने लगी तोह एक अलग हे शोर सा भर उठा वह. अर्जुन के एक हाथ भी काजल की पीठ से लगा हुआ था. उसका जोरो से धड़कता दिल और मॉटे दूध उसको अपनी छाती पर महसूस हुए और फिर सॉरी बोलती हुई वो नजरे झुका कर अलग हो गई. नहर की सतह पर पड़ती बारिश एक अलग संगीत सुना रही थी और पत्तो पर गिरती अलग. वो नीलगाय जिसको काजल रोज कह रही थी उन्हें देखकर वापिस जा चुकी थी.
"कोई बात नहीं. सच बोलू तोह डर तोह मई भी गया थो क्योंकि ऐसा तोह बिलकुल भी अंदाज नहीं था.", हँसते हुए उसने इतना कहा तोह हल्का शर्माती सी काजल भी उसका चेहरा देख मुस्कुरा उठी. उसके चेहरे पर भी बारिश के बूंदे गिर रही थी, जो पत्तो से टपक कर आई थी. पलके खोलती झपकती वो अपनी ब्याह से जब उन्हें साफ़ करने लगी तोह उसके कैसे हुए दूध और उभर गए कमीज के ऊपर होने से.
"यहाँ भीग जायेंगे हम दोनों. और उधर नहर पर देखो जरा के बारिश कितनी तेज है. पुलिया तक जाते हुए या तोह पूरे गीले हो चुके होंगे या फिर चिकनी मिटटी में फिसल कर कही गिर पड़ेंगे." काजल कड़ी होती हुई एक बरगद के पेड़ की तरफ चल दी. वही शायद इतना घाना था के कुछ देर तक उन्हें बचा सकता था. नहीं तोह बबूल, सफेदे और नीम के वृक्ष तोह किसी काम के नहीं थे इस समय. अर्जुन भी 15 कदम पीछे इस घने पेड़ के नीचे आ कर खड़ा हो गया था. पगडण्डी भी यही ख़तम होती थी और उसके हे नीचे वो समतल साफ़ जमीन थी जहा दोनों खड़े बस बारिश का ये नजारा ले रहे थे.
"कहते है के जंगल में हे सबसे ज्यादा बिजली गिरती है बारिश के समय." अर्जुन की बात पर काजल थोड़ा सेहम गई और उसकी तरफ देखने लगी जो मुस्कुरा रहा था.
"तुम मुझे डरा रहे हो न? मई सिर्फ इस आसमानी बिजली से हे डर्टी हो और किसी चीज से नहीं. लेकिन ऐसे मत डराओ मेरा दिल घबराता है इसकी आवाज से हे."
'गडढाआजमममममममम तडडडडआककककककककक' की एक भयंकर सी आवाज उनसे शायद 500 गज दूर हे गिरी आसमानी बिजली की हुई तोह पूरा जंगल जैसे थरथरा उठा. पक्षियों की आवाज भी जैसे चीख चीख कर और भयंकर बना रही थी इस पल को. काजल तोह सदमे से उछलती हुई हे लिपट गई अर्जुन से जिसको इस बार कुछ खास फरक नहीं पड़ा था इस गर्जना से लेकिन भीगी हुई काजल का बदन अपनी बाहों में होने से उसके शरीर में भी एक अंग फड़कने लगा था. अर्जुन का एक हाथ उसके भरी नितम्भ पर और दूसरा पीठ से कंधे की तरफ लिप्त हुआ था. नरम दूध सीने से डब्ब चुके थे. और इस बार काजल ने सर पीछे किया तोह उसमे को शर्म नहीं थी जैसा पहली बार हुआ था. बस एक बार गंभीरता से अर्जुन को चेहरे को देखने के बाद अपने भीगे होंठ उसने अर्जुन के मुँह पर लगा दिए. आँखे बंद किये वह इस तगड़े शरीर से कास के लिपटी बस होंठो को चूस रही थी. शायद इस सब में वह उस डराने वाली आवाज को अनसुना कर रही थी. मॉटे कूल्हों को दोनों हाथों में भर के दबाता भी इस जाटनी के शरीर का भूगोल माप रहा था. लुंड महाराज तोह जैसे काजल की नाभि को हे छूट समझ कर हमला करने की सोचने में लगे थे.
"ये गलत होगा." अर्जुन ने खुद को काजल से अलग करते हुए कहा और उस विशाल वृक्ष के तने से पीठ लगा कर आँखे बंद किये खड़ा हो गया. उसकी भी साँसे जोरो से चल रही थी. काजल किसी घायल शेरनी जैसे बस अर्जुन को ऐसे घूर रही थी जैसे उसके मुँह से शिकार छिटक कर वापिस उसको हे चिढ़ा रहा हो. दोनों भारी छात्याँ फूल कर हिल रही थी और गोरा चेहरा उन्माद में लाल हो चूका था. एक लम्बी सांस लेकर वह खुद हे अर्जुन को सामने से चिपकती बोली, "मई तोह अब कर के रहूंगी. सही या गलत वह तुम मुझे बाद में बता देना.", पाजामे के ऊपर से उसका खड़ा लुंड दबती वो एक बार फिर उसके होंठो को जंगली शेरनी से काटने और चूमने लगी तोह अर्जुन भी अब पीछे न हटा. कमीज के ऊपर से हे उसके दोनों बड़े चुनचे हाथो में लेकर दबाता वह उसको अपनी जगह पेड़ के तने से लगा कर चूमने लगा था. इधर पजामा थोड़ा नीचे सरका के काजल अब उसका वो मोटा हथियार बहार निकल कर जैसे मुट्ठ मारना का उपक्रम करने में लगी रही.
"तेरा तोह घोड़े का है रे." अर्जुन का चेहरा हटा कर वो उस से अपने दूध मिंजवाती अब इस फूले हे भूरे लुंड को देखने में लगी थी जीका हत्था उसकी मुट्ठी से बहार था और सूपड़ा भयंकर मोटा और लाल.
"पहले भी तुमने किसी का देखा है क्या?", इस घने जंगल में और बरसते मेघ के बीच बस ये 2 लोग हे थे. जहा काजल अब उसके लुंड को पकडे हुए घूर रही थी और अर्जुन ने अपना एक हाथ घाघरे के ऊपर से उसकी जांघो के बीच दबा रखा था.
"हाँ तोह नहीं क्या. मेरे होने वाले पति का और गाँव में एक 2 लोगो को पेशाब करते हुए देखा था. लेकिन ये तोह सबसे हे बड़ा है जितने आज तक देखे है मैंने.", थोड़ा सच और थोड़ा झूठ बोलती काजल की एक तेज सिसकारी निकल गई जब उसकी छूट पर अर्जुन की उंगलिया महसूस हुई. 'सीईई'
"तुम चाहती हो के हम वो सब करे जो तुम्हारे होने वाले पति के साथ तुम्हे करना चाहिए.?", उसके चेहरे को प्यार से देखते हुए अर्जुन ने ये बात कही तोह काजल ने अपने होंठ उस के साथ जोड़कर अपना जवाब दे दिया. लुंड को छोड़कर काजल ने अपना घाघरा ऊपर उठाना शुरू किआ तोह अर्जुन बस उसकी गोरी मांसल जांघो को अनावृत होते देखने लगा. कमाल का शरीर था उसका. जवान, गठीला, चिकना और मादकता से भरपूर. घाघरे के पूरा ऊपर उठती काजल ने उसके कमर के नाड़े में फंसा लिए था. छूट का लम्बा चीरा और बीच से दिख रही लाल फांक. छोटे छोटे किसी नौजवान की दाढ़ी से बाल छूट के ऊपर पेडू तक थे. लेकिन ये उतने घने या ज्यादा फैले न थे. अपनी उलटे हाथ की पहली ऊँगली से उस लकीर को सहलाते हुए अर्जुन ने छूट का जायजा लेना शुरू किआ तोह काजल पेड़ से लगी थोड़ा कसमसाने लगी थी. मोटी छातियां जैसे उस चोलीनुमा कमीज का कपडा फाड़ने की हद्द तक तन्नै सी उभर चुकी थी. एक बार फिर काजल के हाथ ने मजबूती से उसका लुंड को जकड चूका था क्योंकि एक लम्बी ऊँगली उस की गीली छूट में आधी अंदर बहार होने लगी थी.
"तुम संभल लोगी मेरा या ..", अर्जुन ने दूसरा हाथ उसके कमीज में डालते हुए पूछना चाहा हे था के काजल ने लुंड को खींचते हुए अपनी जांघो के बीच लगा लिए.
"फिर तोह ऐसे शरीर का होना किसी काम का नहीं जो तेरे इसकी मार न सेह पाया तोह. दिल तोह तुझ पे तभी आ गया था जब तू बापू के पास खड़ा था. लम्बा चौड़ा शरीर और जितने प्यार से तू बात करता है. और जब सविता के साथ तुझ से कल मिली थी तोह पक्का कर लिए था के ससुराल जाने से पहले तुझ से अपनी जवानी खिलवा कर हे जाउंगी. लेकिन आज इस मौसम ने मेरी बात 2 दिन में हे मान ली.", बोलिटी हुई वह उसके लुंड को अपनी छूट के होंठो पर रगड़ रही थी जहा अर्जुन की पूरी ऊँगली अंदर धंसी थी.
"चल अब जल्दी कर अगर ये बारिश रुक गई फिर शायद अधूरा न रह जाए ये काम.", काजल को कुछ ज्यादा हे जल्दी थी क्योंकि बादल तोह अभी बरसना रोकने के विचार में कटाई न थे. अर्जुन छूट से अपनी गीली ऊँगली निकलता उसकी कमर को दोनों हाथो से थाम के खड़ा हुआ तोह काजल ने खुद हे छूट की दरार में उसका वह टमाटर सा सूपड़ा फिरते हुए छूट के छेड़ पर लगा लिए.
"जरा रुक एक मिनट.", अपनी हथेली पर थूक लगाकर काजल ने सुपाड़ी पर मसल दिए और एक बार फिर वापिस छेड़ पर टिका लिए. छूट का चीड़ तोह गायब हो गया था इसकी चौड़ाई के पीछे. इधर पेड़ का तना भी बरसते पानी से भीग चूका था लेकिन उनके शरीर पर बस कुछ छोटी छोटी बुँदे हे गिर रही थी.
काजल के होंठो को मुँह में लेते हुए इस बार अर्जुन ने उलटे हाथ से लुंड को पकड़ा और काजल की फैली हुई टांगो के बीच में धक्का जड़ दिए. एक बार तोह अंदर से पूरा वजूद तक हिल गया था काजल का इस करारे धक्के और छूट में घुसे उस मॉटे सुपडे से. लेकिन थी वह ज़िद्दी और हिम्मत वाली जो इस धक्के को अपने तगड़े शरीर पर सेह गई थी. 3 इंच तक लुंड और सूपड़ा छूट को फैलते अंदर जा चुके थे और इधर पहली बार अर्जुन का हाथ कमीज के अंदर से उसके एक नंगे और बड़े गुब्बारे पर टिक गया था.
"सच में बड़ी हिम्मत है तुम में." ाचे से उसके होंठ पीने के बाद अर्जुन ने अब दूसरा हाथ भी कमीज में घुसते हुए कहा तोह दर्द को बर्दाश्त करती काजल ने उसका वह हाथ पकड़ लिए. और खुद हे अपने कमीज को ऊपर खींच कर दोनों बड़े दूध उजागर कर दिए. एक रुपये के सिक्के से कुछ बड़े गोल हलके भूरे घेरे के बीच में किशमिश के जैसे 2 लम्बे नुकीले चूचक जोश से सर उठाये थे. 4-4 किलो के वह दूध के कलश बता रहे थे के इनकी मालकिन की म्हणत की वजह से वह इतने गोश्त से भरे और कड़े है. दोनों हाथो में नीचे से उन्हें पकड़ कर अर्जुन ने एक निप्पल अपने मुँह में भर लिए. खड़े होने की स्तिथि कुछ ऐसी थी की 2 फुट अपने पाँव फैलाये काजल छूट में लुंड लिए पेड़ से चिपकी थी और उसका साथ देता अर्जुन अपने घुटने हलके मदद कर सामान कद बनता उस से चिपका हुआ एक दूध को पकडे दूसरा पीने में लगा था.
"ये तुम बाद में पी लेना जितना मर्जी. निकाल तोह दिए मैंने खुद हे बहार लेकिन पहले नीचे वाला काम आगे बढ़ाओ.", उसके कंधे का सहारा लेती काजल बोली तोह अर्जुन ने वैसे हे दूध पीते हुए दूसरा मोटा चुका छोड़ कर हाथ जांघ के नीचे जमाया और हल्का सा फंसा हुआ लुंड बहार कर बड़ा तगड़ा धक्का लगा मारा. इस पूरी कोशिश के बावजूद वो अपनी आवाज न दबा सकीय थी.
"ोुउउउइइइइइइ माँ रीई... मार दिए बहनचोद. छूट फाड़ दी रे तेरे इस लौड़े ने मेरी.. ाःह.", आँखों में दर्द की वजह से आंसू आ गए थे और सर अर्जुन के कंधे से लगाती काजल अब पूरी जमिनदारनि वाली भाषा बोलने लगी थी. 7 इंच के लुंड ने छूट को उसकी औकात दिखते हुए चूड़े हुए छेड़ से भी खून निकाल दिए था. अर्जुन ने उसके दोनों कूल्हे थामते हुए उसको अपने से ाचे से चिपका लिए. पीठ को सहलाता हुए बस वो लुंड घुसाए उसको आराम देने में लगा था लेकिन काजल बड़बड़ाये जा रही थी, थोड़ा थोड़ा.
"मेरे खसम का लिए था मैंने अंदर. साले का बस चुभा था.. आह और तेरे वाले ने तोह.. ुह्ह्ह्ह मेरी माँ छोड़ दी.", अर्जुन को उसकी गालियां और ऐसा बड़बड़ाना जैसे उत्तेजित कर रहा था. कमाल की लड़की थी वह जो न लुंड बहार निकाल रही थी और ना गालिया बंद कर रही थी.
"अब खड़ा रहेगा या ढीली करेगा इसको. फाड़ तोह दी और तोह फटने से रही अब..." दर्द में हल्का सिसकती वह सीने से सर हटा के अर्जुन को देखती बोली. गीले चेहरे पर भी उसकी आँखों की नमी अर्जुन को दिख गई थी. जो की लाज़मी भी था जब इतना मोटा डंडा एक अधखिली कच्ची छूट को फाड़ कर अंदर जा चूका हो. छूट भी किसी बालो में लगाने रबर की तरह लुंड पर कासी हुई थी.
अर्जुन ने प्यार से उसके आँखों में आये पानी को चूम लिए और गाल पर लगी पानी की बुँदे भी. थोड़ा सा कमर को पीछे करता वो अब होंठ पीते हुए वापिस अंदर करने लगा तोह दोनों को हे रगड़ दर्द और थोड़ा मजा दे रही थी.
"आह.. पूरा घोडा है रे तू. सच में पेट तक पहुंचा दिए मेरे तूने.", अब फिर से वह नरमी से बातें करती सिसकारियां लेने लगी थी.
"वैसे गालिया बहोत देती हो तुम." अर्जुन मुस्कुराते हुए आधा लुंड अंदर बहार करता बोलै तो इस 5-6 मिनट के धक्को में वह संभल चुकी और मजे से उस से लिपटी हे बोली, "Gaanv-dehat में तोह सब ऐसे हे बोलते है. अभी तुमने मेरी माँ या पड़ोस की भाभियों की गालियां कहा सुनी. ये तोह मई दर्द में बोल गई.", अब उसको शर्म आ रही थी याद करके की वह कितना गन्दा बोल गई थी गुस्से में. और फिर भी ये उस को प्यार से मन रहा था.
"क्या बोलती है वह? बताओ मुझे भी. मैंने कभी ऐसा सुना नहीं.", अर्जुन ने उसका धड़ वापिस पेड़ से लगते हुए दोनों मॉटे दूध दबाते कहा. Neeli-hari नस्से उन गोर चुंचो पर उभरी हुई अर्जुन को और उकसा रहा थी.
"aah-aah.. आराम से खींच रे. और बड़े न कर नहीं तोह बस सब यही देखेंगे." छूट कृतवती हुई काजल उसके हाथों पर हाथ रख कर अपने चुंचो का मर्दन हौले करने को कहने लगी..
"मेरी माँ जब खेत में काम करने वाली औरतो से बात करती है तोह.. आह.. ाची गालियां देती है. और एक दिन मैंने उन्हें भाभी से कहते सुना था.. आह उम्... की तू दिन में भी अपना भोसड़ा फैलाइये लेती रहती है खसम के सामने आह.. वो चुटिया बिजली वाला तुम्हारी gaand-masti देख रहा था... ऐसे हे मेरी पड़ोस वाली भाभी भी बहोत गलियां या गन्दी बातें करती है." उसकी इन बातों का मजा लेता अर्जुन कमर चलते हुए अब उसके निप्पल जोर से चुसकने लगा तोह वह भी पूरी मस्ती में भरी खुद से दूसरा दबा रही थी.
"वैसे तुम्हारा शरीर सच में सुन्दर होने के साथ हे मजबूत बहोत है काजल. और ये तुम्हारे बूब्स मुलायम भी और सख्त भी, दोनों है." निप्पल उमेठते हुए अर्जुन आराम से हे उसको छोड़ने में लगा था. उसके धक्के अभी तक तेज नहीं हुए थे.
"आठ.. काम से मजबूत हो जाता है लेकिन नहाते हुए दही या malaai-haldi से मालिश करती हु. और सोने से पहले मालिश करती हु जिस से बड़े भी हो गए और लटके भी नहीं." उसके लुंड का मजा लेती वह गहरी सिसकरिअ भर्ती अब थोड़ा थकने लगी थी. कमर से ऊपर दोनों इस समय भीग चुके थे और जमीन पर भी पानी खड़ा होने लगा था.
"आह एक बार रुक जरा." अर्जुन ने उसकी बात मानते हुए लुंड बहार खींचा तोह सूपड़ा बहार निकलते हे थोड़ा दर्द हुआ उसको.. छूट का छेड़ जो पहले सिर्फ एक दाल के दाने जैसा था अब ाचे से फ़ैल चूका था. पाँव वैसे हे खोले वो कराह रही थी लुंड बहार आने के बाद. अपने कमीज को बहार निकाल कर उसने घाघरा भी उतार दिए. ओढ़नी जाने कब से जमीन पर गिरी पड़ी थी और गीली हो चुकी थी.
"देख क्या रहा है, तू भी तोह खोल अपने कपड़ो को. तेरा ये लुंड थकने वाला नहीं क्योंकि मेरा तोह अभी एक बार हो भी चूका है. वह लेत के करते है." अर्जुन को समझ आया था के वह लुंड जब बहार निकला तोह ये कराह नहीं रही थी बल्कि इसका चरम हो चूका था. फिर काजल के इस रोमांचक फैंसले को स्वीकार करता वो अपनी टीशर्ट उतार कर जब पाजामा उतरने लगा तोह काजल ने रोक दिए.
"ये तोह न उतार फिर जूते भी पानी से भर जायेंगे."
"वो वैसे भी भरने वाले हे है तोह यही पेड़ के नीचे रहने देता हु इनको." पूरे कपडे निकल कर वो आदिवासी की तरह नंगे पाँव हे चलता काजल के साथ घात की दिवार पर आ गया. अपनी कमीज और उसके पाजामे को तेह लगाती उसने वो कपडे उस 9 इंच चौड़ी दिवार पर बिछा दिए फिर ऐसे हे अपना घाघरा नीचे बिछाती उसकी मुलायम टीशर्ट को ऊपर फैला कर वह वह लेत चुकी थी. इस जगह ना तोह बारिश की बूंदो से बचा जा रहा था और न हे कोई परवाह की इस लड़की ने. अर्जुन को तोह ये सब जैसे एक सपने सा लग रहा था. उसने नहीं सोचा था के बीच जंगल इतनी बारिश में वह खुले आसमान के नीचे एक ऐसी लड़की की कभी चुदाई करेगा जो शरीर और हिम्मत में उसके टक्कर हे होगी, या थोड़ी ज्यादा हे. उस 2 फुट की दिवार के दोनों तरफ पाँव रख के अर्जुन ने काजल की टांगो को फैलते हुए अपनी कमर के गिर्द लपेटा और उस खूब उभरी हुई छूट पर लुंड रखते हे अंदर तेल दिए.
"आह रे.. कितना खाली लग रहा था जब ये बहार निकल गया था." उसकी बात के साथ हे अर्जुन ने दूसरे धक्के में पहले जितना 7 इंच तक लुंड पेल दिए था.
"मजा आ गया रे पहलवान. तू सच में तगड़ा है." अर्जुन की चौड़ी छाती को निगाह भर देख अपने ऊपर झुकाती वो बीच जंगल में उसके नीचे दबी छुड़वा रही थी.
"पूरा दाल दू क्या?", अपने हाथ से उसके दूध दबोचते हुए ये बात कही तोह काजल हैरान होती उसके देखने लगी. लेकिन आँखों में बारिश की बुँदे गिरी तोह वह झट से बंद हुई और उसकी आँखों का इशारा मिलते हे थोड़ा लुंड बहार खींचे हुए अर्जुन ने कास के पूरा जड़ तक थोकक दिए. वो इस आखिरी डेढ़ इंच में तोह बुरी तरह तड़फ गई. छूट के बहार अर्जुन के अंडकोष भीड़ चुके थे.
"पागल इंसान क्यों भोसड़ा बना रहा है छूट का.? माँ बचा ले ऋ इस dhi-chod से. आ ऋ मेरी छूट.." अर्जुन को अब समझ आया के वह इशारा नहीं था आँखों में पानी की बून्द गिरने से वह गलत समझ बैठा था. वैसे हे वह अब गिर रही थी तोह वो उसके चेहरे के ऊपर तक आ गया था. बदन तोह पूरे हे गीले हो चुके थे और अर्जुन की पीठ पर ताबड़तोड़ पड़ती वो बूंदे उसको ठंडक देती उकसाने में लगी थी.
"गलती से मुझे लगा के तुमने आँखें बंद कर के हाँ कहा है." अर्जुन ने अपने कूल्हे वापिस चलते हुए कहा.
"अब भी कुछ बचा है तोह दाल दे मेरे अंदर और आज हे मार दे. कल तक जिन्दा छोड़ने वाला तोह है नहीं तू. आह.. आह." बात ख़तम होते हे उसको मजा आने लगा था इन गहरे धक्को से. छूट सिकुड़ने लगी थी और ठण्ड की वजह से रोयें भी खड़े होने लगे थे काजल के दूध, जांघ और बाहों पर.
"बड़ा गजब का है रे तू. इतनी देर में कोई दूसरा तोह 2 ख़तम हो चूका होता. आह.. मेरे छूट के अंदर कुछ जोर का हो रहा है. मेरे बूब्बे मसल जरा" उसको न इस दिवार से गिरने का डर था न श्री पर पड़ती रगड़ का. बस काम का बुखार और ये भयंकर चुदाई हे ाची लग रही थी काजल को. अर्जुन अब कस के धक्के मारने लगा था. उसकी दाई टांग कुछ सुन्न होने लगी थी ठन्डे पानी की वजह से तोह जल्दी होने के लिए रफ़्तार पूरी बढ़ा दी थी.
"अरे बूबे समझ नई आते क्या? आह जोर से पेल रे.. ये बूबे." मजे लेती वह खुद अपने दूध पकड़ के अर्जुन को दिखने लगी तोह वह दोनों को मेंजटा दबाता हर बार गांड पर थपकी मार रहा था. बारिश की आवाज के साथ हे वह उनकी चुदाई की आवाज भी गूँज रही थी. 'thapp'thap' .. 'patt-patt' और तेज aaahhh-ummmm और इस बीच अर्जुन ने उसके दूध छोड़कर दोनों टाँगे ऊपर उठा कर हवा में सीढ़ी करते हुए अब तक के सबसे गहरे और तेज धक्के लगाने शुरू कर दिए जीने वह सेह न सही और पेट को भींचती से अकड़ने लगी थी. मॉटे हिलते दूध बारिश की बूंदो से नहाते हुए अपने सूजे निप्पल दिखा रहे थे. इधर अर्जुन का सूपड़ा फूल कर फटने को हो रहा था. जैसे हे उनसे काजल की गांड वापिस दिवार पर टिकाई उसके माल की उड़ती धार सीधा काजल के होंठो और गले पर गिरी और अगली सभी पिचकारियां बाकी शरीर पर. वो बस लेती पड़ी रही. छूट khul-band होती फड़क रही थी और दोनों अपने अपने पांव एक दूसरे की और किये दिवार पर आँखें बंद किये पसरे थे.
'चैपायक' की आवाज से अर्जुन ने आँख खोली और उठकर देखा तोह काजल उस टंकी नुमा घात में डुबकी लगाती खुद को रगड़ कर साफ़ कर रही थी. वो भी अंदर उतर गया तोह थोड़ा हैरान हुआ. नीचे सीढ़ियां थी कोई आधा फ़ीट नीचे हर कदम पर. जब वह काजल के पास आया तोह छाती तक पानी आ चूका था और काजल की थोड़ी तक पानी में थी. अंदर हे उस साफ़ पानी के उसको पकड़ कर अपने पास करने लगा तोह काजल उसके चेहरे की तरफ देखने लगी और फिर जल्दी से बोल उठी
"और नहीं छोड़ना मैंने. साफ़ करने दे खुद को और घर जाने दे. एक बार और किआ तोह कसम से यहाँ से फिर उठा के हे लेके जाना पड़ेगा.", उसकी बात से मुस्कुराता अर्जुन उसके दूध दबा के और होंठ चूम वापिस दिवार की तरफ आ गया. गीले कपडे पहनता वह काजल को हे देख रहा था जो तैरती हुई आ रही थी. उसकी गांड के उभार पानी के ऊपर से नजर आये तोह बस वही नजर रह गई.
"सोचना भी मत जो तुम देख रहे हो उसकी तरफ." आँखे और पाजामे में बनते उभर को समझती वह जल्दी से बहार आई और घाघरा पहन लिए. कमीज पहन ने लगी तोह खुद हे एक बार अपने दूध से पहले कमीज को रोक कर अर्जुन की तरफ देखने लगी. अर्जुन ने एक बार फिर दोनों को मुँह में भर के चूसा तोह कमीज नीचे कर वह शर्माती सी अपनी औढनी लेने चल दी.
"वैसे वह जगह भी खूबसूरत है तुम्हारी." अर्जुन की बात सुनकर चेहरा लाल हो गया लेकिन चुपचाप आती वह ओढ़नी को पानी में साफ़ कर निचोड़ने लगी.
"जवाब नहीं दिया तुमने." अर्जुन वही दिवार पर बैठ कर बात करने लगा और एक नजर अपनी घडी पर डाली. स्पोर्ट्स घडी थी तोह पानी का तोह डर नहीं था लेकिन जो समय वो बता रही थी उस से जरूर वो कुछ सोच में पड़ गया था. 7:01
"वो जगह लेनी इतनी आसान नहीं है. भाभी ने बताया था फाग के समय के मर्द को भरी पिछवाड़ा बहोत पसंद होता है और कुछ तोह ज्यादा वही करते है. लेकिन ये आगे की तरह नहीं होता जैसे ये लचीली होती है और गीली. तोह इसको ध्यान से और आराम से हे कर सकते है. और ये तोह मई तुम्हारे साथ बिलकुल नहीं करने वाली." हंसती हुई वो कड़ी हो कर अर्जुन के पास से भाग निकली.
"और सुनो. 10 मिनट बाद यहाँ से निकलना मेरे जाने के बाद." हवा में चुम्मा उछाल कर वह निकल गई वह से.
'ये भी तोह पूरी घोड़ी हे है.' अर्जुन मुस्कुराता हुआ वह ऐसी हे बारिश में बैठा रहा. आया था सविता से मिलने और हो गया काजल से सम्पूर्ण मिलान. वाह ऋ किस्मत क्या रंग है तेरे. ठीक सवा सात बजे वह पगडण्डी से होता हुआ निकला तोह पुलिया तक जाते हुए कई बार फिसलने से बचा. यहाँ ऊंचाई थी तोह अब जगह ख़राब नहीं थी. कुछ सोचता सा चाल को और धीमा कर चलने लगा. जैसे हे वह साधू सिंह के घर के पास पहुंचा तोह वह भैंसो की छत्त के नीचे बैठे हुक्का गुदगुदा रहे थे. हर तरफ शांति थी बारिश की वजह से.
"अरे बीटा तुम इधर हे अब तक?", उनकी आवाज सुनकर वह उधर हे चल दिए तोह साधु सिंह ने एक प्लास्टिक की कुर्सी कई कुर्स्कियों के ऊपर से नीचे उतार कर उसके लिए रख दी.
"अंकल वो आज जंगल के अंदर चला गया था कुछ ज्यादा. फिर एक नीलगाय दिख कर गायब हो गई तोह उसको देखने और आगे निकल गया.", अर्जुन अपनी बाहे से पानी उतरता बोलै तोह साधू सिंह मुस्कुरा दिए.
"चलो कोई बात नहीं उम्र है अभी घूमने फिरने की लेकिन जंगल इतना ाचा भी नहीं है बीटा और सांप गीदड़ भी है अंदर घने जंगल में. तुम बैठो मई तुम्हारे लिए दूध मंगवाता हु." अर्जुन के बोलने से पहले हे उन्होंने वही से आवाज लगाईं. "Guddi-Bimla, मेरी चाय के साथ एक गिलास दूध लेती आना गरम करके शक्कर वाला. खास मेहमान है." रोबदार आवाज देते उन्होंने कहा तोह प्रतिउत्तर में किसी महिला की अंदर आँगन से आवाज आई, "जी ठीक है."
"अंकल पहले हे देरी हो गई है. मई फिर कभी दूध पी लूंगा अभी चलता हु." साढ़े सात बज चुके थे तोह वह थोड़ा चिंतित हो उठा.
"बीटा पौने एक घंटे से पहले तोह पहुँचने से रहे. मिन्दर भी अभी शहर जाने वाला है तोह मोटरसाइकिल से तुम्हे भी छोड़ देगा." उनके बेटे का नाम महेन्दर था जिसको वह मिन्दर बुलाते थे. उनकी इस बात पर अब अर्जुन को थोड़ी शान्ति हुई. बारिश अभी भी हो रही थी लेकिन पहले से गति थोड़ी काम हो चुकी थी. भैंसे अपना चारा खाती मजे मार रही थी जिनके ऊपर साधू सिंह ने बोरी ुधा राखी थी. इतनी हेर देर में अंदर से छतरी लेकर हाथ में ट्रे लिए काजल हे बहार निकली. गोर बदन पर अब एक काला सलवार कमीज था और सर के ऊपर एक चुन्नी जो सामने से उसेक उभार छुपाये थी.
"बापू ये लीजिये." ट्रे को एक सरकंडो से बानी गोल स्टूल पर रखती वो चाय का कप देती बोली तोह अर्जुन ने बस एक नजर उसके चेहरे को देख सामने सर कर लिए.
"हाँ बीटा. गुड्डी ये है अपने शहर वाले बड़े थानेदार जी के पोते अर्जुन और बीटा ये है मेरी लाड़ली बेटी काजल. अभी 12 के इम्तिहान दिए है फिर जादो में इसका ब्याह हो जायेगा.", काजल ने हाथ जोड़कर अभिवादन किआ तोह अर्जुन ने भी वैसे हे नमस्ते से जवाब दिए. थोड़ी देर पहले जिसको वो खुले आसमान के नीचे छोड़ रहा था और जो मजे से अपनी टाँगे फैलाइये नीचे पड़ी छुड़वा रही थी, ये दोनों पहली पारिवारिक मुलाकात बिलकुल अजनबियों की तरह कर रहे थे.
"अंकल जल्दी नहीं कर रहे आप इनकी शादी.?", अर्जुन ने वह गधा दूध का गिलास उठाते कहा तोह कुछ सोचते से साधु सिंह बोले
"अरे बीटा मेरी तोह इत्छा न थी अभी इसको ब्याहने की. 18 की तोह हुई पिछले संक्रात पे. वो मेरी धर्मपत्नी के jaan-pehchan के है और इन्होने इसको पसंद कर लिए जब ये अपनी नानी के घर गई थी 16 की उम्र में. फिर बिमला ने भी कह दिए के जमींदार लोग है, ghar-pariwar ाचा है और अकेला लड़का है. मैंने 5 साल मांगे थे की इसका कॉलेज पूरा करवा दूंगा लेकिन उन्होंने कह दिए के कॉलेज वह भी करवा देंगे. इस बार भर्ती हो गई है लड़के की फ़ौज में तोह दिवाली के बाद जायेगी लेकिन दाखिला मई इसका बैसाखी पर करवा दूंगा कॉलेज का." साधु सिंह की बात पर अब अर्जुन ने सर हिला दिए. और काजल बस उनकी बातें सुनती बारिश देखने लगी.
"बड़ा ाचा लगा अंकल ये जानकार के आप पढाई के पक्ष में है. मेरा मतलब भी वही था अपना प्रश्न करने का. तोह इनका ससुराल भी अपने शहर के aas-pas हे है तभी यहाँ कॉलेज में एडमिशन दिलवा रहे है." अर्जुन की इस बात पर काजल उनकी और पीठ किये मुस्कुराने लगी थी.
"हाँ तोह इसका ननिहाल कही दूर थोड़ी है. ये अपनी बड़ी यूनिवर्सिटी से अगला गाँव हे तोह है. ससुराल भी वही हो गया फिर. मेरी लाड़ली को दूर तोह मई भेजने से रहा और फौजी को भी कह दिए के पढ़ाई में दिक्कत आई तोह मई उसका court-marshal कर दूंगा." उनकी इस बात पर वो दोनों हंस दिए और काजला अंदर भाग गई.
"अररि छतरी तोह लेती जा अपनी. देख बीटा अभी तक बचपना नहीं गया लेकिन शादी की बात पर शर्मा के भाग गयी." अर्जुन इस बात पर मुस्कुरा दिए. इधर एक लाल रंग की स्प्लेंडर मोटरसाइकिल बहार निकलता उनका बीटा दिखा, जो एक सर से लेकर पाँव तक बरसात पहने था. बस दूध के कनस्तर नहीं थे उनपे.
"मिन्दर बीटा ये अपना हे बचा है, रास्ते में हे घर पड़ेगा तोह उतार के चले जाना. दूध तोह आज तुम्हे डालना नहीं है वो पहले हे डेरी वाला लेके चला गया था." साधु सिंह ने अपने बेटे से अर्जुन का परिचय करवाया तोह वह भी इस लम्बे चौड़े लड़के को देखने लगा जिसकी अभी दाढ़ी भी न आई थी. महेन्दर एक 20 साल का एक साढ़े पांच फ़ीट का लेकिन सही सेहत वाला युवक था. पीछे से हे एक hatti-katti औरत दरवाजे की चौखट तक आ कड़ी हुई. ये रंग और शरीर से हे बता रही थी की काजल की माँ थी.
"अपने पंडित जा का पौता है क्या ये?", वही कड़ी वह अर्जुन पर नजर डालती बोली और अपने बेटे की तरफ उसका बटुआ बढ़ा दिए.
"है बिमला ये डॉ. साहब का बीटा है और देख के हे लगता है के उनके जैसा है. मामूली सा जरा लम्बा ज्यादा हो चूका है.", अर्जुन ने शिष्टाचार से दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किआ तोह बिमला देवी ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिए. दिवार की ोुत्त से काजल भी झाँक रही थी चुपके से.
"ाचा भाई बैठ जाओ मई तुम्हे छोड़ देता हु फिर आगे भी जाना है.", महेन्दर की आवाज में थोड़ा उतावलापन था जिसको समझते हुए अर्जुन झट्ट से बैठ गया और साधू सिंह को हाथ हिलता उसके साथ बैठ कर निकल लिए.
"भाई तुम न अगर कभी मोटरसाइकिल खरेदो तोह बुलेट हे लेना. मेरी तोह ये हलकी सी फटफटिया तुम्हारे लिए नहीं बानी.", अर्जुन उसकी बात पर हंस दिए.
"हाँ भाई मई भी वही सोच रहा हु लेने की. अगर कोई 15 किलो बढ़ गया 2-3 इंच के साथ तोह फिर इसपर तोह बैठ हे न सकूंगा.
"सही बात है भाई. वैसे कोनसे कॉलेज में हो? तुम्हारे घर वालो में से कुछ को तोह मई भी जानता हु. डॉ अंकल को, संजीव भाई को और दादाजी को तोह ाचे से.", अर्जुन गौर से उसकी बात सुन रहा था.
"भाई अभी तोह ग्याहरवी में जाऊंगा मई. एक साल तोह स्कूल में देरी से भर्ती हुआ था ऊपर से जब हॉस्टल भेजा तोह उन्होंने भी दूसरी कक्षा फिर से करवा di.",Dono हे अगले सेक्टर की सीढ़ी सड़क पर आ चुके थे.
"कमाल है भाई मुझे लगा के कॉलेज के अंतिम वर्ष में होंगे और अखाड़े वेखदे जाते होंगे. साला तुम तोह अभी स्कूल में हो लेकिन कुछ भी कहो भाई शरीर तोह विलायती सांड सा है. बेहतर होगा अगर ये कहु के अरबी घोड़े जैसे हो. चर्बी तोह है नहीं लेकिन चौड़े ाचे खासे हो.", महेन्दर उसके शरीर से खासा प्रभावित था. और गाँव का था तोह सीढ़ी बात हे कह देता था.
"वैसे रोज सुबह 10 कम दौड़ लगता हु और शाम को बॉक्सिंग सीखने स्टेडियम जाता हु जहा थोड़ी कसरत भी करवाई जाती है. शरीर तोह भाई आपका भी काम नहीं है.", अर्जुन ने भी उसकी पलट कर प्रशंशा की तोह वो बड़ा खुश हो गया.
"घर आया करो भाई कभी हमारे भी. Shanivar-ravivaar तोह मई घर हे रहता हु और इस बहाने तुम्हे गांव दिखाऊंगा और बहोत कुछ सीख भी लूंगा.", घर के सामने मोटरसाइकिल रोकते हुए महेन्दर ने कहा तोह हाथ मिलते हुए अर्जुन ने धन्यवाद् करते हुए अंदर आने के लिए कहा. लेकिन फिर कभी आने का बोल वह निकल लिए. पूरे 8 बजे वह अपने घर आ गया था और बारिश अभी तक होने लग रही थी. अंदर आते हे सीधा बाथरूम में घुस के नहाने के बाद वो बहार से हे ऊपर चल दिए. कपडे पहन कर दरवाजा खोला तोह तारा अपने बाल सही करती दिखी.
"आ गए जनाब? वैसे सुबह के लिए थैंक्स." उसके गाल को चूम कर वो पिछले दरवाजे से उसके साथ हे नीचे उतर कर डाइनिंग टेबल की तरफ आ गई. जहाँ सभी थे इस समय.
"इतनी देर तक कहा था तू?", अलका दीदी ने बिना कुछ देखे ये बात बोली तोह ऋतू ने हाथ मारा उसके पिछवाड़े पर.
"वो बारिश तेज हो गई थी तोह वही रुक गया. फिर गाँव से आते एक दोस्त ने यहाँ तक छोड़ दिए.", वह कुर्सी पर आरती की बगल में बैठ गया जो चाय और परांठा खाने लग रही थी. ऋतू दीदी एक गिलास दूध और एक लड्डू उसके सामने रख दिए.
"वह कपडे बता देना रात को शादी में जो पहन कर जाने है. तारा को छोल अंकल उसकी कंपनी छोड़ देंगे और भैया भी 5 बजे तक आ जायेंगे.", ऋतू दीदी ने पूरा कार्यक्रम बता दिए लेकिन अभी वह वैसे हे बर्ताव कर रही थी जैसा पहले करती थी.
"ाचा अपनी पसंद से निकाल देना जो ठीक लगता हो आपको.", अर्जुन की इस बात पर वो वैसे हे मुस्कुराई जैसे ये शब्द उनके पति ने कहे हो. और इसको अलका के साथ आरती ने भी देख लिए था. प्रियंका दीदी ने अलका को बिठाते हुए एक प्लेट में परांठा और मक्खन दिए तोह वह भी सामने बैठ गई और गौर से अर्जुन को देखने लगी.
"मई खाना थोड़ी देर तक खाऊंगा दीदी. मेरा बना कर आप डब्बे में रख देना.", लड्डू ख़तम करता वह उठने हे लगा था के छोल साहब और प्रीती आ गए उनकी तरफ.
"बरखुरदार खाना अभी हे खाओगे. चाहे काम हे सही लेकिन नाश्ता समय पर होगा.", उनकी बात पर वह वही बैठ गया. तारा उठती हुई रसोईघर में प्लेट रख कर हाथ धोने चली गई तोह प्रीती अलका दीदी के साथ बैठ गई.
"दादू आप आज इतनी जल्दी जा रहे हो?", अर्जुन ने उनसे बात शुरू की तोह वह भी एक कुर्सी पर बैठ गए.
"बीटा आर्मी ऑफिस में रेइरेमेंट के बाद भी काम और फाइल ख़तम नहीं होती. फिर दोस्त भी होते है वह तोह shagan-mela कर लेते है. तू शाम को समय से ले जाना इनको शादी में मई तोह वही 10 बजे आऊंगा.", तारा को बैग लिए आते देख वो आरती और अलका के सर पर हाथ रखते बहार चल दिए.
"यार प्रीती तेरे तोह मजे है. आज तू शादी में और हम यहाँ अकेले वही chulha-chauka करते रहेंगे." अलका ने शकल बनाते हुए कहा
"हाँ दीदी. वो आपको मैंने देखा है कितना ज्यादा काम करती रहती हो आप. प्रियंका दीदी और ऋतू तोह मदद भी नहीं करते आपकी." उनकी हे तरह जवाद देती वो बोली तोह अलका उसके कान पकड़ने लगी और बाकी सभी हंसने.
"ले प्रीती तू भी आजा मेरे साथ नाश्ता कर ले.", ऋतू दीदी अपनी प्लेट उसकी बगल में रखती बोली और बैठ गई.
"वैसे तोह मई कर के आई हु लेकिन आपके साथ जरूर खाउंगी.", प्रीती को एक बार देख कर अर्जुन वापिस मुस्कुराते हुए खाना खाने लगा.
"ाचा रसोई के बाद मई ऊपर की सफाई कर दूंगी. और जो कपडे अर्जुन के धोने वाले है वह निकल लुंगी.", अलका प्लेट उठती इतना बोलकर रसोईघर में चल दी तोह आरती भी उनके पीछे चली गई.
"आप मेरे साथ खाना खा के घर चलो, बुआ बुला रही थी आपको. और मुझे भी बहोत कुछ बताना है आपको.", अर्जुन की तरफ एक गहरी मुस्कान दिखती वो बोली तोह अर्जुन को खांसी आ गई.
"लो आप पानी पियो जी." प्रीती ने फिक्र सा कस्ते हुए गिलास उसकी तरफ बढ़ाया तोह उसकी उंगलिया दबाते हुए उसने गिलास ले लिए. और अर्जुन का इतना करना हे प्रीती को चुप करवाने के लिए बहोत था. उठकर वह भी अंदर चली गई अलका दीदी के पास.
"मजा आता है उसको सताने में?", ऋतू दीदी के बात पर वो बस मुस्कुरा दिए. प्रियंका दीदी बेध्यानी में जब अर्जुन के साथ लगती हुई बैठने लगी तोह उनका मोटा बहार को निकला उभर कास के अर्जुन की कोहनी से रगड़ता गया. ऋतू दीदी तब तक उठ चुकी थी लेकिन अर्जुन को तोह ये स्पर्श महसूस होते हे मजा सा आ गया था. एक मुस्कान के साथ उसने प्रियंका दीदी के चेहरे की तरफ देखा तोह अब वो नजरे झुकाये शर्मिंदा सी खुद को ठीक करती बैठी रही.
"हो जाता है ऐसा कभी कभी. आपको नजरे नीची करने की जरुरत नहीं है.", वो अब वह अकेलटी बैठी थी तोह अर्जुन ने साथ देने के इरादे से खुद को बिठाये रखा.
"थैंक यू. ध्यान नहीं था मेरा तोह टकरा गई.", उनका दिल भी अब रफ़्तार पकड़ रहा था धड़कने की. आकर्षित तोह थी हे वह जबसे उसका मोटा उभर उन्होंने देखा था और ऊपर से जितना कुछ पिछले दिनों में उन्होंने देखा और बातें की थी, उनका दिल भी करता था के वो सब कुछ महसूस करे बस एक झिझक और उम्र में अंतर के चलते शर्म सी थी. यहाँ हर गुजरते दिन के साथ अर्जुन जैसे महीनो का अनुभव लेता जा रहा था. अर्जुन को प्रियंका दीदी के मैं में भी कुछ चलता महसूस हुआ था.
"कोई बात नहीं दीदी. वैसे आप है तोह बहोत प्यारी.", अर्जुन की इस तारीफ को प्रियंका दीदी समझ गई थी और अब शरमाते हुए खाना खाने लगी. इधर प्रीती और ऋतू निकल लिए उनके घर की तरफ. जाते हुए प्रीती एक इशारा सा करती गई जो सिर्फ अर्जुन ने हे देखा और मुस्कुरा दिए.
"ाचा आप खाना खाइये मई ऊपर चलता हु फिर दिन में आता हु आपके पास.", आरती दीदी को वह बैठ ते देख कर अर्जुन ने आरती की तरफ भी एक शरारती मुस्क़ुआन उछाल दी जिसको देख वो सर झुका कर मुस्कुराने लगी अपना कॉफ़ी का कप टेबल पर रखते हुए. प्रियंका भी अर्जुन के इस तरफ सीधा बता देने से थोड़ी खुश और थोड़ी सोच में डूब कर नाश्ता करने लगी.
.
.
"कहा रह गई थी ऋ आज सुबह तू? और मई उधर आई थी देखने तोह तू वह पर नहीं दिखी?", सविता अपने घर खाना बनाने के बाद अब काजल के घर उसके कमरे में बैठी थी. सुबह उसको बारिश की वजह से खेत में बानी झोपडी पर हे रुकना पड़ गया था.
"अरे पहले तोह मई वही उसके साथ हे बैठी रही फिर जब कुछ बुँदे गिरने लगी तोह वह जंगल वाले घात पर बैठ कर बातें करते रहे. 7 बजे हे घर आ पाई मई बापू की वजह से.", काजल गॉड में तकिया रखे बिस्टेर पर बैठी अपनी सहेली को बताने लगी.
"इतनी देर तक तू उसके साथ वह अकेली थी?", कुछ सोचती सी वो ये बात बोली तोह काजल मुस्कुराती हुई कहने लगी
"लड़का ाचा है और बातें भी बड़ी ाची करता है. राह तोह वह तेरी भी देख रहा था लेकिन मेरे साथ हे बैठा रहा बारिश की वजह से." वह सोच कुछ रही थी और बोल कुछ.
"यकीन नहीं होता के sava/dedh घंटा तू उसके साथ थी और तुमने कुछ न किआ." सविता को जाने कोनसी चिंता थी.
"जंगल की बातें की, तेरी बातें और गाँव भर की. फिर थोड़ी देर वह बारिश का मिजाज देख नहर में नाहा के चला गया. मेरा भाई हे छोड़ने गया था उसको क्योंकि बापू और माँ उसके परिवार से वाकिफ है. लेकिन तू चिंता न कर मेरी तोह शादी पहले हे पक्की है तोह कल थोड़ा शर्माना छोड़ कर बात कर लिओ दिल की कही ऐसा न हो के वह तेरे इस तरह दूर दूर रहने से कहीं आना हे छोड़ दे और तू फिर कही उस से प्यार करने लगे.", काजल की बात से अब कही सविता के चेहरे पर मुस्कान और शर्म आ गई.
"यार तू जानती हे है मुझे. लड़का ाचा है और बात भी तमीज से करता है लेकिन अगर कल कोई ऊंच नीच हो गई तोह खुद सोच मेरी ज़िन्दगी खराब हो जाएगी.", उसकी बात में गंभीरता थी.
"ऐसे हे खेत और घर पर काम करती मर्डर जाएगी एक दिन. तेरे बापू ने तोह फ़ौज से ब्याह कर रखा है और तेरे बाबा कभी इस तरफ ध्यान नै देते. अगर कोई प्यार करता हुआ तुझे कुछ खुशियां देता जाये तोह बहोत है न इस जकड़ी हुई ज़िन्दगी से तोह. जिस तरह वह तुझे देखता है उस से साफ़ पता चलता है के उसको तू पसंद है. जितने ब्याह नहीं होता काम से काम इतने हे उसके साथ चाँद पल बिता ले. और फिर गलत लगे कुछ तोह मिलना बंद कर देना. और मई इसमें तेरा साथ देने को तैयार हु." काजल की बात पर सविता बस मुस्कुरा दी.
लेकिन यहाँ तोह बिमला और उनका बीटा महेन्दर तोह सविता को इस घर की बहु के रूप में हे देखते थे. साधु सिंह को भी वो बची बेहद पसंद थी लेकिन आज तक उन्होंने ये बात अपने मुँह से न कही थी. वो तोह सोच रहे थे के फसल कटाई के समय सीधा फौजी सम्पत सिंह से हे बात करेंगे रिश्ते की.