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घर की लड़किया और उनकी बातें
कमरे में ठण्ड होने से तारा ने तोह चद्दर ली नहीं थी तोह वह खिसक कर अर्जुन की चादर में आ गई. नींद में जैसे सबके साथ होता है. अर्जुन भी मजे से सो
रहा था और भूल गया था के वो किसके साथ है. अपनी बाहों में भर के नींद में हे उसने अपने होंठ तारा से मिला दिए हाथ कमर पर थे. दोनों में से किसी ने
कोई हरकत न की थी लेकिन तारा की नींद टूट चुकी थी अपने होंठो पर इस एहसास के होने से. गौर से उसका चेहरा देखती वो खुद जैसे चाहती थी की अर्जुन एक
बार फिर से उसके होंठो पर अपने होंठ रख दे. लेकिन वो तोह अब बस कास के तारा से चिपका सो रहा था. कुछ और होते न देख तारा वापिस हल्का निचे खिसक उसके
सीने में सर दिए सोने लगी. कोई एक या डेढ़ घंटे बाद अर्जुन की आँख अपने रोज के समय पर हे खुल गई. बाहों में तारा को देख थोड़ा हैरान हुआ फिर चादर
पर नजर गई तोह हल्का मुस्कुराता समझ गया इसका कारण. प्यार से बाजु को उठा कर तकिया निचे रख कर वो बाथरूम में घुसा और थोड़ी देर में तैयार हो कर
नीचे चल दिए. आज तोह दादाजी की तरफ भी शांति थी. आँगन में 2 गाड़िया कड़ी थी जिन्हे एक बार देख वो गेट खोलता घर से बहार आ गया. उधर छोल साहब
के घर का दरवाजा भी खुला तोह प्रीती उसकी तरफ आती दिखी.
"तुमने कसम खाई है एक कभी आना और फिर गायब हो जाना.?" आते हे अर्जुन ने उसको शिकयत हे की. गोरा गुलाबी चेहरा जो अभी तजा धुला था किसी गुलाब सी दिख
रही थी वो.
"जब मुझे कुछ काम होता है तभी मई आती हु. मुझे तुम्हारी तरह पहलवान तोह नहीं ban-na." हलके कदमो से दोनों भागने लगे तोह प्रीती ने बात करि.
"मतलब आज किसको पीटना है?" अर्जुन ने भी मसखरी करि
"है कोई जा ज्यादा परेशां करता है और अभी भी कर रहा है." प्रीती ने हँसते हुए इशारा उसकी तरफ हे किआ
"तोह फिर बताओ आज इतनी सुबह आने की वजह क्या है?" अर्जुन ने अब सीधे मतलब की बात कही.
"रात को मेरे घर आ जाना. दरवाजा कूद के 12 बजे के बाद. यही कहने के लिए इतनी सुबह आई हु और नींद भी नहीं आई." नजरे झुकाती सी वो बोली तोह अर्जुन को
जैसे मौका मिल गया था. "रात को तुम्हहारे घर, वो भी कूद के. मतलब मई हे मिला छोल साहब की गोली खाने क लिए तुम्हे. और गली में किसी ने पकड़ लिए तोह
पिटाई होगी वो अलग." अर्जुन ने वैसे हे जवाब दिए तोह प्रीती ने हलके गुस्से से कहा, "तुम्हे बताया था के आज दादाजी जा रहे है 2 दिन के लिए. ऊपर से अगर तुम्हे
इतना डर लगता है तोह फिर मई आ जाउंगी तुम्हारे घर लेकिन फिर सभी होंगे वह. देखती हु सबके सामने कैसे बोलते हो के मई तुम्हारी जान हु." और वापिस मुड़ने लगी
लेकिन मुड़ते हे अर्जुन ने प्रीती को सीने से लगा लिए. "अभी कह दू सबके सामने के तुम्ही मेरी जान हो. तुम सिर्फ मेरी हो प्रीती.? तुम मेरे साथ मजाक करो तोह ठीक
लेकिन मई करू तोह?" ऐसे हे गले लगाए उसने प्रीती को प्यार से कहा. "और आ जाऊंगा मई तुम्हारे घर. छोल अंकल होंगे तब भी डर नहीं है मुझे. वो घर भी
तोह मेरा हे है." एक बार गाल चूम के आगे बढ़ दिए तोह प्रीती भी खुसी में साथ सत् के दौड़ने लगी. अर्जुन ने फिर से एक शरारत करि. अपनी चाल एक दम धीमे कर
दी तोह प्रीती उस से आगे दौड़ने लगी और वो रुक कर उसको पीछे से देखने लगा. "रुक क्यों गया और क्या देख रहे हो.?" 15-20 कदम दूर से प्रीती ने पुछा तोह अर्जुन
बस वही खड़ा हंस रहा था. दोनों हे सुनसान जगह थे और सुबह 5 बजे कोण यहाँ उन्हें देखता. वो चलती वापिस उसके पास आकर कड़ी हुई तोह अर्जुन ने होल से अपने
हाथ उसके पीछे कर दिए. प्रीती को लगा के फिर से बाहों में लेने लगा है लेकिन जब हाथ अपने कूल्हों पर महसूस हुए तोह एक पल के लिए सास रुकी फिर संभल कर
बोली, "ये क्या है?"
"तुम्हारी बात का जवाब. ये देख रहा था के भागते हुए कितने दिलकश लगते है." और मांसल आकर लिए हे दोनों कूल्हे दबा के खुद से लगा लिए.
"सब तुम्हारा है मैंने कोनसा तुम्हे मन किआ हुआ है." आज ये दोनों तोह अँधेरे में हे laila-majnu बने थे.
"ाचा यार अब चलो यहाँ से. मुझे वापिस भी जाना है. दादा जी 6 बजे निकल जायेंगे." प्रीती ने खुद को अलग करते कहा तोह अर्जुन ने बात मान ली. अगले 20 मिनट
वो सिर्फ दौड़ पूरी करने के बाद घर के बहार खड़े थे.
"ोये पुत्तर. बड़ा पसीने बहा रहा है." घर से बहार निकलते छोल साहब ने अर्जुन को देखा जो प्रीती के साथ हे खड़ा था अभी आ कर.
"गुड मॉर्निंग छोटे दादू. ये लड़की न हार नहीं मानती इस चक्कर में ज्यादा हे दौड़ लग गई थोड़ी." अर्जुन ने प्रीती की तरफ इशारा करते कहा. खुद तोह उसकी
साँसे सम्भली हुई थी लेकिन प्रीती हल्का हांफ रही थी.
"ाची बात है ये तोह. लेकिन बिल्ली हांफ रही है और शेर को सिर्फ पसीना." उन्होंने भी प्रीती को छेड़ते कहा.
"दादू आप भी इसकी साइड लोगे. ये मेरे से कभी नहीं जीत सकता आप खुद पूछ लीजिये के 2 बार हार चूका है मेरे से."
"ओह बीटा जी वो तेरे से हर बार हारेगा क्योंकि कुछ लोग शायद ऐसे हे वो जीत लेते है जो उनके लिए जरुरी होता है." बड़ी गहरी बात उन्होंने कह दी थी.
"और तू भी चल अंदर आ. आज तुझे मई यहाँ का दूध पिलाता हु." अर्जुन को अंदर साथ लिए वह ड्राइंग रूम में आये जहा उनका एक अटेची रखा हुआ था. "पारवती
बीटा, जरा इसके लिए एक गिलास दूध बना के दे, मेवा दाल के और 4 केले भी लेती आना." इतना बोलकर इशारे से बाथरूम दिखाया तोह अर्जुन सीधा वह चला गया.
प्रीती अपने कमरे में बने बाथरूम में जा चुकी थी. दोनों लगभग एक साथ हे वापिस आये ड्राइंग रूम में तोह टेबल पर एक गिलास दूध, एक गिलास जूस और केले रखे थे.
छोल साहब एक कप चाय का लिए वही बैठे थे. "पुत्तर चल शुरू हो जा." इतना कह कर उन्होंने गिलास उसको दिए इधर प्रीती बालो से रबर निकलने के बाद जूस पीने
लगी थी. अर्जुन ने भी अनुसरण किआ तोह कुछ देर बाद 2 केले और दूध का गिलास हजम कर चूका था. "प्रीती बीटा अपनी डाइट के साथ कोई कोम्प्रोमाईज़ नहीं." बचे दोनों
केले उन्होंने उसकी और कर दिए.
"ाचा बीटा मई चलता हु. और प्रीती अगर तुम्हारा दिल करे तोह इनके घर सो जाना नहीं तोह Alka/Ritu को यहाँ बुला लेना." उन्होंने इतना बोलै और दोनों को गले लगा कर
गाडी निकल चले गए. अर्जुन भी प्रीती को bye कह के निकल लिए.
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"दीदी, सब सामान रख लिए मैंने. आप एक बार देख लीजिये." रेखा जी ने ललिता जो को बताया के वो गांव जाने के लिए जितना जरुरी था उतना सामान, कपडे रख चुकी
है. तोह ललिता जी ने रसोईघर से हे हाथ हिला दिए के ठीक है.
आज तोह इतनी सुबह हे नाश्ता बन रहा था. अर्जुन नाहा के अंदर आया तोह माधुरी दीदी, चाचा जी और कोमल दीदी नाश्ता कर रहे थे. ताईजी परांठे बना रही थी.
"आप लोग तोह आज ज्यादा हे जल्दी नाश्ता करने लगे हो." अर्जुन ने वही बैठ कर ये बात कही तोह नरेंदर जी ने जवाब दिए, "मुन्ना अभी आधे घंटे में निकल रहे
है अगर तू कहता है तोह नहीं करते नाश्ता." हंसने लगे वो. कोमल दीदी शांति से बैठी खाना खा रही थी लेकिन माधुरी दीदी तोह बार बार जैसे अर्जुन को देख रही
थी जैसे उनका कोई दिल नहीं था जाने का गांव. "बीटा चल ये पहन ले. पीछे से ऐसे हे नहीं बैठे रहना. और एक बार ऋतू को उठा दे उसका इम्तिहान भी है." टीशर्ट
पकड़ते हुए उन्होंने कहा तोह अर्जुन उसको पहन कर अपनी माँ के गले लगता हुआ बोलै, "ाचा फिर आप जल्दी आना." वो बस अपने बेटे के चेहरे पर हाथ रखती मुस्कुरा दी.
अर्जुन अंदर आया तोह देखा के अलका दीदी वह नहीं थी सिर्फ ऋतू दीदी हे सोइ हुई थी. मतलब छत्त पर से उठने के बाद भी ये अभी यहाँ आ कर सो गई थी. थोड़े मजाक
के मकसद से अर्जुन उनके ऊपर झुका हे था के ऋतू ने किसी बिल्ली की तरह झपट्टा मारते हुए उसके होंठो को चूम लिए और फिर छोड़ते हुए बोली, "तेरा हे तोह इन्तजार
था. मुँह मीठा हो गया तोह पेपर भी ाचा जायेगा." उन्होंने इतना कहा तोह अर्जुन ने हलके से उनके दूध पकड़ते हुए कहा, "दीदी यहाँ दही शक्कर नहीं है लेकिन इधर
से शायद मुँह मीठा हो जाये." टीशर्ट के अंदर उनके उभर खुल्ले थे जिनके निप्पल थोड़े कड़े लग रहे थे. "ोये बस कर और चल उठ मेरे ऊपर से. ये मुँह मीठा बाद
में करेंगे." हंसती हुई वो उसके नीचे से निकल कर उस से पहले हे बहार आ गई.
"बीटा ये तोह अभी उतना समझदार है नहीं. तू हे इसके खाने और कपड़ो का ध्यान रखना." रेखा जी ने ऋतू को समझते कहा और फिर कौशल्या देवी भी पिछले आँगन
में आ गई. "चल बीटा तू सामान रखवा गाडी में और नरेंदर तू भी अब उठ जा बीटा." उनकी बात सुनकर अर्जुन ने बैग, अटेची उठा लिए और अपनी माँ और दीदी के साथ
बहार की तरफ चल दिए जहा पर कोमल दीदी, माधुरी दीदी, दादाजी पहले से हे थे. सब सामान आराम से आ गया तोह रामेश्वर जी ने अर्जुन को एक तरफ बुला कर कुछ
हिदायते दी और अलका ऋतू के सर पर प्यार दिए. सभी लोग बैठ गए तोह चाचा गाडी निकल कर चल दिए. उनकी दोनों बेटियां तोह अभी सो हे रही थी.
"संजीव भैया तोह उठ जाते है." अंदर आते हुए अर्जुन ने अलका दीदी से ये बात कही तोह वो मुस्कुराती बोली, "उठ भी गए थे और चले भी गए. शाम तक आएंगे
वापिस वो. पास के एक गांव में कुछ काम था." उनकी बात सुनकर अर्जुन भी अंदर आ गया तोह ऋतू दीदी तैयार होने चली गई और अलका दीदी घर की सफाई में लग गई. ऐसे
हे घूमता सा वो माधुरी दीदी के कमरे में गया तोह वह पर प्रियंका दीदी और आरती सो रहे थे. अर्जुन की नजर एक जगह का नजारा कर के वही रुक गई. हलके पीले
टीशर्ट के गले से प्रियंका दीदी के उभार दबे हुए बहार को निकल रहे थे और उनकी गेहटी नाभि गोरा पेट भी नुमाया था. "ये तोह बिलकुल कोमल दीदी जैसी हे है."
एक बार ाचे से उन्हें देख कर वो वापिस बहार आया और कुछ सोचता सा ऊपर अपने कमरे की और चल दिए.
बीएड पर लेती तारा को कोई होश नहीं था अपने कपड़ो को. निक्कर का कपडा कूल्हों की दरार में फंसा था, गुलाबी बिना बाजु की टीशर्ट से निप्पल के पहले तक का भाग उजागर
हो रखा था और चेहरा बिलकुल मासूम सा तकिये पे रखा था. चादर कब की बीएड से निचे गिर चुकी थी. अर्जुन ने चादर वापिस उनके बदन पर दाल दी और संजीव
भैया के बीएड पर उल्टा सा लेत गया. "पता नहीं क्या हो रहा है आजकल. जितना सोचता हु ध्यान बार बार एक हे जगह जाने लगता है." ऐसे सोचते हुए उसने खड़े हो
कर संजीव भैया की अलमारी से एक किताब निकाल ली जिसके ऊपर अखबार का कागज चढ़ा था. भैया ने बड़ी सफाई से ये किताब छुपाई थी. "Tantra-sex काम की विधि"
नाम की ये किताब उसने कोमल दीदी से मधुर मिलान करने से पहले 3 भाग तक पढ़ी और देखि थी. कुल 12 भाग थे इसमें. कमरे का किवाड़ ाचे से लगा कर वो आगे
पढ़ने लगा. किताब में नारी पुरुष की विभिन्न शरीर के अनुसार उनके बारे में बहुत कुछ बताया हुआ था. और rati-kriya के कई अलग भाग थे की कैसे क्या करना
चाहिए या क्या नहीं. तक़रीबन हर पृष्ट पर हाथ से बनाये चित्र भी थे. वो पूरे ध्यान से उसमे लिखे घ्यान को समझने लगा और फिर एक घंटे बाद सब वैसे
हे कर के बहार आया. तारा अब बिस्टेर पर नहीं थी और शायद बाथरूम चली गई थी. ऐरकण्डीशन को बंद करते समय उसने घडी की तरफ देखा तोह 8 बज चुके थे.
अब नीचे से भी हलकी आवाज आ रही थी.
"उठ गई आप दोनों?" बहार टेबल पर चाय के कप रखे थे और Priyanka/Aarti दीदी बातें कर रही थी अलका दीदी के साथ.
"हमको उठे तोह आधा घंटा हो गया लेकिन तू कहा था अभी तक.?" आरती ने ये बात कही थी. और ऋतू दीदी तैयार हो कर अर्जुन के सर पे हाथ रख बहार निकल गई जहा प्रीती स्कूटरी पर उनका इन्तजार कर रही थी.
"मई वो ऊपर किताब पढ़ रहा था. पहले आपके पास गया तोह आप दोनों हे सो रही थी." उसकी इस बात पर प्रियंका ने आरती की तरफ अजीब तरह से देखा. "है वो क्या
है न ज्यादा आराम नहीं मिला था 2 दिन से तोह कुछ ज्यादा हे नींद आई थी. कल से तेरे साथ उठ जाया करेंगे." कह कर आरती हंसने लगी तोह अर्जुन भी कुर्सी पर
बैठ गया हँसते हुए.
"अर्जुन जब तेरे पास टाइम हो तोह थोड़ा सामान ला देगा यही पास की मार्किट से?" अलका दीदी की बात सुनकर उसने हामी भर दी.
"है जब बहार जाये तोह मई भी साथ चलूंगी कुछ सामान लेना है मैंने भी." निचे उतरती तारा ने ये कहा तोह चारो उसकी और देखने लगे. एक रेशमी सफ़ेद कुरता
जिसकी बाजू न के बराबर थी और, लाल रंग की बिलकुल कासी हुई सलवार और हलके गीले खुले बालो में तोह वह केहर सा ध रही थी.
"तू मार्किट में आग लगा देगी. कपडे fire-brigade के और खुद चलती फिरती आग." प्रियंका दीदी की इस बात पर वो हंसती सी अर्जुन और उनके बीच की कुर्सी पर बैठ गई.
शरीर से बड़ी ाची महक आ रही थी. शायद नहाने के बाद भी 2-3 क्रीम या इत्र लगा कर हे वो आई थी.
"ठीक है जब जाऊंगा तोह तुम्हे बता दूंगा." अर्जुन के जवाब से वो थोड़ा मुस्कुराई लेकिन अलका दीदी की त्योरिया छड्ड गई तू सुनकर.
"ऐसे कबसे बात करने लगा अर्जुन अपने से बड़ो से?" बेशक वो उस से प्यार करती थी लेकिन उन्हें ाचा नहीं लगा उसका ऐसे तारा को बुलाना.
"अलका अब तू हमारे बीच में मत बोल. ये बचपन से मुझे तारा कह के बुलाता है और मई भी इसको नाम से बुलाती हु. हम दोनों को हे यही ठीक लगता है तोह तू टेंशन
मत ले. बाकी सबको तोह दीदी बोलता हे है न?" तारा की बात से अलका अर्जुन को घूरने लगी.
"आपको अगर बुरा लगा तोह सॉरी. अब से नाम ले लिए करूँगा जैसे तारा जी." अलका दीदी को कहता अर्जुन इतना बोलै तोह सभी हंसने लगे. "ये बन्दर नहीं सुधरने वाला.
और तारा जी? सुनकर हे अजीब लगता है." प्रियंका दीदी ने बोलै तोह तारा भी हंसती बोली, "हम दोनों में tu-mai हे ठीक है या Tara-Arjun ये जी वि भूल जा."
फिर कुछ समय बाद प्रियंका दीदी ने सबके लिए खाना गरम किआ और तारा और आरती दीदी को भी परोस दिए. अलका दीदी नहाने चली गई इधर अर्जुन मार्किट जाने के लिए
कपडे बदलने ऊपर आ गया.
"वैसे तारा, तेरी ये ट्रेनिंग किस चीज की है?" आरती दीदी ने उस से पुछा तोह तारा ने थोड़ा खुलकर बात करते हुए बताया, "वो आरती मेरा फैशन डिज़ाइन का कोर्स
चल रहा न दिल्ली में तोह 2 साल के बाद ये 6 महीने की ट्रेनिंग जरुरी थी काम को समझने के लिए. जैसे की कपडा कैसे तैयार करते है, डिज़ाइन और क्वालिटी, फिर
इनके मुख्या मार्किट और डिस्ट्रीब्यूशन कैसे होता है. और जिस कंपनी में ये ट्रेनिंग करनी है तोह एक तोह वो पापा के नोन है दूसरा अकेले दिल्ली में रहके लाइफ ज्यादा
हे बोरिंग हो गई थी. यहाँ पर nana-naani और बाकी सब भी है. इसलिए मैंने सोचा की फिर यही जगह ठीक है. और अब तोह शहर भी ाचा हो गया है आते हुए देखा
था मैंने. ट्रेनिंग के बाद देखते है की जॉब करनी है या मास्टर की डिग्री."
"वाह यार तेरा सही है. इधर तोह वही गर्ल्स कॉलेज में जाओ फिर घर आने के बाद घर के काम और फिर वापिस पढाई. दिल्ली में तोह सुना है ज़िन्दगी हे अलग है." आरती
ने थोड़ा उत्साह से कहा.
"है. ऐसा हे लगता है जब हम जिस जगह नहीं रहते तोह वह शायद ज्यादा ाची लगती है. बड़ा शहर है, आजकल अपनी जनरेशन के लोग थोड़े आज़ाद ख़याल के है लेकिन फिर उसके नुक्सान भी बहोत है." कहने के बाद कुछ सोचने लगी वो.
"क्यों कुछ गलत हुआ क्या तेरे साथ वह?" प्रियंका दीदी ने खाना रोकते हुए ये बात कही थी.
"ऐसा है न दीदी गलत और सही लोग हर जगह हे होते है. बस वह अकेली थी तोह कुछ लोगो पर ज्यादा भरोसा कर लिए था जब नै थी." एक लम्बी सांस लेते वो थोड़ा
खामोश हो गई थी.
"क्या हुआ था जरा बता तोह. कही कुछ?" आरती ने चिंता से ये बात कही लेकिन फिर अधूरी छोड़ दी.
"अरे यार इतना कुछ भी नहीं बस किस्मत थी और शायद ये समझ ले की भगवन ने के सब दिए था मुझे. कहा तोह मैंने आज तक अपने हाथ से प्लेट तक नई उठाई थी
और आज तू खुद बता क्या तुझे मई वैसे दिखती हु? कॉलेज का पहला साल था तोह अपने हिसाब से हे दोस्त बना लिए. किसी के पास गाडी तोह कोई मेरे से ज्यादा मॉडर्न.
दोस्तों में लड़के भी थे और फिर एक दिन पार्टी के बाद 2 सीनियर दोस्त, दोनों हे लड़के थे और एक लड़की. हम सब पार्टी करके वापिस आ रहे थे तोह उन्होंने मेरा फायदा
उठाना चाहा. उस दिन अगर सही मौके पे वह पुलिस की गाडी न आती तोह फिर मई शायद ज़िंदा न होती या मेरा सबकुछ लूट गया होता. लेकिन उसके बाद से मैंने ये
पार्टी और नाम के high-fi दोस्त बंद हे कर दिए. कॉलेज से हॉस्टल और फिर हॉस्टल से घर. लेकिन है पहनती वही हु जो मुझे ाचा लगता है." आखिरी बात कहती
वो हंसने लगी.
"ये तोह बहोत हे बड़ी घटना हो जाती तेरे साथ." आरती ने ये कहा तोह प्रियंका ने भी सर हिला दिए.
"देखो दीदी ये इज़्ज़त विज़्ज़ात जैसी सोच अलग है मेरी. अगर कोई पसंद हो तोह शायद मई उसपे सब वार दूंगी. लेकिन जो वह होने वाला था वो सिर्फ भूक और जबरदस्ती
वाला था. न हे वो लड़के मुझे पसंद थे और न हे वो तरीका. कोई ऐसा जो दिल में उतर जाये तोह उसके लिए मई खुद कपडे उतार दू." खिलखिलाती सी बोली तोह दोनों
बहने एक दूसरी का मुँह देखने लगी.
"ये क्या बात कहने लगी? शादी से पहले ये सब नहीं होना चाहिए. पाप है ऐसा सोचना भी." प्रियंका दीदी की ाअत आधी सच और आधी झूठ हे थी.
"आपको कभी प्यार हुआ है क्या दीदी? एक बार करके देखना फिर आपको ये जिस्म उसके सामने कुछ नहीं लगेगा जब कोई आपकी सीधा रूह में उतर जायेगा. और ये सब ढोंग
है कुंवारापन या लड़की की इज़्ज़त. दिल्ली में आधी से ज्यादा लड़किया या तोह अपने प्रेमी से या फिर दोस्तों के साथ सब कर लेती है. और जो अकेली है वह भी अपने आप को
सुख देना जानती है. लेकिन मैंने भी सोच रखा है के जिस से प्यार करुँगी वो सब उसके साथ. फिर शादी उसके साथ होती है या किसी और के साथ या करनी भी नहीं
वो सब बाद की बात." तारा ने जब ये बात कही तोह अलका नाहा के आ चुकी थी और सब सुन रही थी.
"तोह इसमें गलत बात क्या है तारा? प्यार शायद सिर्फ शरीर से नहीं होता. शारीरिक मिलान उसका एक हिस्सा है लेकिन उसकी गहराई तोह जैसे एक अलग दुनिया तक जाती है."
अलका की बात पर आरती ध्यान से कभी तारा को तोह कभी अलका को देख रही थी.
"अलका सच्चा बता के क्या तुझे कभी प्यार हुआ है? और ऐसे तोह तू ये बात कहने से रही. मई नाम या उसके बारे में नहीं जान न चाहती. बस अगर हुआ है तोह बता."
प्रियंका दीदी की जिज्ञासा इस बार थोड़ी ज्यादा हे हो गई थी.
"हाँ. मुझे प्यार हुआ है और मई खुदको खुशकिस्मत मानती हु. लेकिन मुझे कभी अंजाम की फ़िक्र नहीं है. शादी कहा होगी, कब होगी वो सब घर के बड़े हे फैंसला
करेंगे. लेकिन मेरा दिल, ये मेरा है तोह मई भी चाहती हु के ये किसी के नाम हो. और अब ये है भी." बात ख़तम करती सी वो शांत हो गई.
"यार तू सही है. हम दोनों जब कॉलेज जाती है तोह सिर्फ आवारा किस्म के लड़के हे दीखते है और फिर कभी ध्यान नहीं दिए इस तरफ. कभी कभी लगता है जिंदगी
ऐसे हे काटनी थी तोह फिर मिली हे क्यों? आरती ने गंभीरता से कहा. "सिर्फ फिल्मो में जो देखा उसके सपने देख लेती हु कभी लेकिन वह भी यही होता है के शादी
परिवार की मर्जी से या बगावत."
"देख आरती फिल्म शायद सही उदाहरण नहीं है एक सच्चे प्यार का. क्योंकि जहा तक मेरी समझ है ये जिद्द, बगावत या sach-jhoot से परे है. हांसिल करना कोई
प्यार तोह नहीं. और जब प्यार सच्चा हो तोह फिर इसका ढिंढोरा पीटना भी जरुरी नहीं. बस अपने सपने पूरे करो और जितना हो सके वो लम्हे जीने की कोशिस करो."
अलका ने बात ख़तम करते हुए कहा और कड़ी हो गई.
"मेरी भी यही सोच है आरती. ज़िन्दगी का क्या भरोसा. अगर 2 कतरे किसी के प्यार के मिल जाये तोह क्या दौलत और क्या ये नाम के सुख. खुद का पूरा होना हे ज्यादा
ाचा लगता है." तारा की बात ख़तम हुई थी की अर्जुन एक नीली जीन्स और आसमानी टीशर्ट पहनकर नीचे आ गया. एक पल के लिए तारा और अलका दोनों ने हे उसको
देखा फिर अर्जुन ने कहा, "दीदी, क्या सामान लेके आना है? तारा चलो फिर ये काम निपटा के आते है."
अलका दीदी ने उसको सब सामान बता दिए तोह वह चल दिए. पैसे लेने से मन कर के. तारा भी एक फैंसी चप्पल जल्दी से पहन के उसके साथ चल दी. स्कूटरी पर दोनों
बैठे तोह तारा लड़को की तरह दोनों तरफ पेअर करके बैठी.
"कोई दिक्कत तोह नहीं न? मुझे ऐसे हे बैठना आता है." अर्जुन ने हँसते हुए ना में गर्दन हिला दी और दोनों हे चल दिए. पीठ पर दबते गुब्बारे उसका ध्यान हटा
रहे थे लेकिन वो इस मजे के अनुभव में आराम से मार्किट आ गया.
"आपको क्या लेना है? पहले वही लेते है." अर्जुन ने कहा तोह तारा उसको देखने लगी. "ाचा तुम्हे जो लेना है वो पहले लेते है" अर्जुन की इस बात पर वह हंसती सी
उसके साथ चलने लगी. "पहले तोह मुझे एक डायरी, पेनस और मार्कर लेने है. फिर कुछ चॉकलेट्स और लास्ट में nimbu-jeera वाला सोडा." वो किसी बची की तरह चहक
रही थी. कुछ लड़के भी तारा के हुस्न का दीदार कर रहे थे जो अर्जुन ने भी देखा लेकिन कुछ कहा नहीं. आराम से सब सामान लेकर दोनों एक दूकान से nimbu-jeera
लेकर बहार खड़े पीने लगे तोह तारा ने भी देखा की 2-3 लड़के उनके पास हे खड़े उसको देख रहे थे. "इन्होने लड़की नहीं देखि कभी जो ऐसे घूर रहे है?"
उसकी आवाज में हल्का गुस्सा था लेकिन अर्जुन मुस्कुराते हुए बोलै, "इतनी खूबसूरत शायद नहीं देखि होगी. और देखने से क्या होता है? कोई हरकत तोह नहीं करि न."
उसकी बात पर तारा के चेहरे पे हलकी लाली और मुस्कान दोनों आ गई थी. जब उन्होंने गिलास रखे तोह वह अलका दीदी का सामान लेने बस आगे हे बढे थे की उनमे से
एक मनचले ने आवाज देते हुए कहा, "बिलकुल रेड & वाइट सिग्रेटे है भाई. गरम और कमाल की." शायद वह यहाँ आसपास के नहीं थे. सरकारी स्कूल की वर्दी जिसमे
शर्ट पंत के बहार थी. पतले, थोड़े पक्के रंग के और हलके शरीर वाले.
"कुछ कहा भाई?" अर्जुन ने तारा को वही रोक कर वापिस आ कर आराम से पुछा.
"तुझे कुछ थोड़ी कहा है. अपनी बात कर रहे हम." उस लड़के ने इतना कहा और अपने दोस्तों की तरफ देखने लगा. अर्जुन आराम से वापिस तारा के पास आया और दोनों
किरयाना स्टोर में चले गए. ये सेक्टर की सबसे बड़ी दूकान थी. ठन्डे की बड़ी बोतल, मग्गी, ब्रेड, सॉस और ऐसा हे कुछ सामान लेने के बाद दोनों स्कूटरी की
तरफ चल दिए तोह अब वही 3 लड़के पेड़ के निचे खड़े थे और एक उनकी स्कूटरी पर बैठा था. "उठो भाई हमारी है." अर्जुन ने विनम्रता से ये बात कही थी.
और उनको ये लगा के लड़का सिर्फ शरीर से बड़ा है बाकी कोई ऐसा वैसा हे होगा. इतनी सी पर दोनों बैठ जाओगे. वैसे पिछली सीट गरम बहोत है." ये वही लड़का
था जो पहले तारा के ऊपर फब्ती कास चूका था और अब सीट से उठते हुए भी अपनी मनचली हरकते दिखा रहा था. अर्जुन ने आराम से वो बड़ा थैला जमीन पर रखा
और बिना कुछ कहा सीधे हाथ का करारा थप्पड़ उस डेढ़ पसली के गाल पर जड़ दिए, जो अगले पर पक्की जमीन पर किसी कटी हुई टहनी सा गिर गया था. "समझ नहीं
आती एक बार में. और तुम दोनों को भी कुछ चाहिए क्या?" अर्जुन ने अपनी टीशर्ट को हल्का सा खींचते हुए उन लड़को को कहा तोह वो बस कभी अर्जुन को तोह कभी जमीन
पर घुटने के बल खड़े होते अपने दोस्त को देख रहे थे. गाल और होंठ के जोड़ से खून निकल रहा था और पूरा बड़ा पंजा उसके उलटे गाल पर छप्प चूका था.
"नहीं भाई. हम तोह पेपर देके आये थे और यही लाया था हमे." उनमे से एक ये बात बोलता दूसरे का हाथ पकड़ के पीछे करता हुआ बस बिना वापिस देखे चल दिए.
"और तुझे अभी से सिग्रेटे पसंद है?' जैसे हे वह मनचला थोड़ा सम्भला तोह अर्जुन ने उसकी कालर पकड़ते हुए 2 और कास के उसके गाल पर रसीद कर दिए. बेचारा
छोटे बचे की तरह हाथ जोड़कर रोने हे लगा था. "चल इसको छोड़ अब अर्जुन. गलत इंसान के हाथ चढ़ गया. और तू भाग यहाँ से." तारा ने उसको अलग करते कहा
और इतनी देर में वो सच में वह से भाग गया.
"तू तोह बिलकुल हे हीरो है रे. मई तोह समझी थी की सिर्फ शरीर से पहलवान है." तारा उसके पौरुष पर mar-miti थी और अर्जुन थैला आगे रखता हँसता हुआ बोलै,
"तारा, ये वो काम कर रहे थे जो इनका शरीर भी मन करता है. और मेरी ताक़त का गलत प्रयोग मैं करना नहीं चाहता था. देखा था ने के पहले कैसे आराम से
बात करि थी."
"हाँ. तोह मुझे तोह खुसी हुई की तू समझदार है. और अपने आप को काबू में रखता है. लेकिन कुछ भी बोल मई तोह तेरी फैन हो गई." स्कूटरी चलने लगी तोह तारा
ने अपने दोनों हाथो से जकड़ते हुए कहा. अर्जुन को फिर वही मजा आने लगा लेकिन पहले से भी ज्यादा. "ाचा ये यहाँ सड़क पे नहीं करो ऐसे. अपना घर इधर हे है."
थोड़ा सकुचाते हुए उसने कहा तोह तारा भी मजे लेती हुई बोली, "फिर जहा तू कहेगा वह पकड़ लुंगी. जगह तोह बता जरा." और हंसने लगी खुद को ठीक करने के बाद.
अर्जुन को मूड भी ाचा हो गया था अब और दोनों ऐसे हे घर आ गए. उनके पीछे हे प्रीती और ऋतू दीदी भी आ गई. "क्या लाया है ये सब? और तारा के साथ?"
ऋतू दीदी थोड़ा हैरान होते बोली तोह तारा ने हे जवाब दिए, "क्यों ये मेरे साथ लड़ाई कर सकता है तोह फिर बहार क्यों नहीं जा सकता? हम ये पास से सामान लेके आये
और मेरे ऑफिस के लिए डायरी, पेन." प्रीती से हाथ मिलते तारा ने कहा इधर अर्जुन प्रीती को देख के मुस्कुरा रहा था जहा तारा की पीठ उसकी तरफ थी.
"चलो अंदर. आ प्रीती तू भी आजा." तारा उसका हाथ पकड़ के अंदर ले चली. "स्कूटरी?" प्रीती ने कहा तोह तारा ने कहा के अर्जुन लगा देगा और चाबी उसकी और
उछाल दी.
"है तुम सब महारानियों का नौकर मई हे हु" अर्जुन थोड़ा जोर से ये बात बोल गया तोह ऋतू दीदी ने आँखें दिखाई.
"लो दीदी आपका बताया सब सामान आ गया." अलका दीदी को टहलिए पकड़ने के बाद वो इधर उधर देखने लगा.
"सब ऊपर है." अलका दीदी ने मुस्कान के साथ कहा तोह अर्जुन ने उनको बाहो में भर लिए. "मतलब यहाँ तोह कोई नहीं है फिर." और उनके होंठो को हलके से चूम के ऐसे हे
खड़ा था की पीछे से ऋतू दीदी की आवाज आई, "ये सब अब खुलेआम करोगे तुम दोनों? मतलब घर में कोई बड़ा नहीं तोह कही भी शुरू." आवाज थोड़ी तीखी थी लेकिन फिर
पीछे से अर्जुन के गाल को चूमती हुई कुछ सामान लेकर निकल गई.
"कहा था थोड़ा सबर रखा कर." अलका दीदी हँसते हुए बोली. "सोच अगर यहाँ तारा या Priyanka/Aarti होती तोह"
"सॉरी. बड़ा दिल कर रहा था आपको गले लगाने का. और आपने प्रीती का नाम नहीं लिए." अर्जुन सोचते हुए बोलै
"उसको क्या फरक पड़ेगा." इतना बोलकर वो भी ऊपर चल दी अर्जुन को ऐसे हे सोचते छोड़कर.
"यार ये सच में बहोत सुन्दर है." आरती दीदी प्रीती को ध्यान से देखती बोली "और भगवान् ने इसकी आँखें भी सबसे अलग हे दी है. हाय ऋ मेरी खराब किस्मत."
उनकी बात पर तारा हंसने लगी तोह ऋतू दीदी ने फिर से प्रीती को छेड़ दिए. "सुन रही है न तू. इसलिए हे तोह तू मेरी जान है." और बाकी सबकी तरफ आँख मार दी.
"वैसे सच बात है यार. मई देखती थी की कोमल और ऋतू हे घर में सबसे खूबसूरत लड़किया है. ऐसा नहीं के माधुरी दीदी, अलका, तारा या आरती किसी से काम है,
लेकिन अगर किसी एक को अगर सबसे सुन्दर कहना हो तोह वो ऋतू और कोमल हे लगती है मुझे लेकिन प्रीती को देखती हु तोह ये लगता है की शायद इसकी तोह मिटटी अलग
से बनाई होगी भगवान् ने. ऊपर से देखो तोह कही हलकी सी चर्बी कही भी हो. बस जहा होनी चाहिए वह भी परफेक्ट शेप है." प्रियंका दीदी वैसे तोह इतना
कहती नहीं थी कभी लेकिन आज उन्होंने भी अपने दिल की बात कर हे दी. और प्रीती सर झुका के बैठ गई शर्माती सी जिसको एक तरफ से ऋतू दीदी ने जकड़ा हुआ था.
"कल यही बात तोह मई कह रही थी. सच में यार बता न ऐसा कैसे है? मई लड़का होती तोह पक्का बस यही लड़की मेरा प्यार होती." तारा ने बिना झिझके हे कहा तोह
अंदर आई अलका ने बीएड पर बैठते हुए कहा, "देख सच बोलू तोह अब ये उतनी सुन्दर नहीं रही जितना हमे याद है. क्यों ऋतू?" और उनकी बात पर ऋतू दीदी ने हामी
भरी.
"ये समझ लो की एक गोरी मेम बस अब आधी हिंदुस्तानी हो गई. इनकी मम्मी तोह इस से भी कही ज्यादा सुन्दर होती थी जितना याद है. और ये बिलकुल सफ़ेद, neeli-hari
इन आँखों के साथ किसी गुड़िया जैसी थी. अब भी अगर इसका शरीर इतना कैसा हुआ और तराशा हुआ है तोह ये सब इसकी म्हणत है. रनिंग में अपना अर्जुन इस से हार
जाता है ऊपर से 2-3 घंटे टेनिस खेलती है और चंडीगढ़ में स्टेट लेवल जीत चुकी है. इतनी म्हणत हम में से कोई करती तोह काली जरूर हो जाती और ये गुलाबी
हो गई मैडम." अपनी बात शरारत से ख़तम करती वो भी प्रीती के गले में बाहे दाल उसको छेड़ने लगी.
"अब मेरी बात हो गई हो तोह कुछ और कर ले क्या दीदी?" प्रीती ने शरमाते हुए कहा तोह अलका ने फिर उसको फंसा दिए, "जो करना हो तू ऋतू के साथ कार्यो. यहाँ सिर्फ
बातें हे होंगी." उनकी बात ख़तम हुई तोह ऋतू दीदी ने भी गाल चूम लिए प्रीती के. "अहा. देख ले इसको कैसे tera-mera नाम पक्का कर रही है."
"ाचा यार बस अब कोई इसको नहीं सताएगा. प्रीती जब तू इतनी सुन्दर है, स्पोर्ट्स में भी है ऊपर से चंडीगढ़ रह चुकी तोह पक्का कोई बॉयफ्रेंड तोह होगा." तारा
ने बात को ख़तम करना चाहा था लेकिन यहाँ तोह फिर से बेचारी की बोलती बंद हो गई.
"इसको इस सब में इंटरेस्ट नहीं है रे. इसका रिश्ता पक्का हो चूका है पहले हे और इसने भी काबुल कर लिए घर का फैंसला." ऋतू दीदी को लगा के ज्यादा हो रहा है
तोह उन्होंने अब बात को ख़तम करने से ये कहा.
"वाह. मतलब यहाँ किसी का बॉयफ्रेंड है नहीं और इसका तोह रिश्ता भी हो चूका है." आरती ने थोड़ा हैरान होते कहा तोह अलका दीदी ने झट से कहा, "किसी का हो या
न हो मेरा तोह है." ऋतू दीदी ने भी हाँ कहा तोह ये उनके लिए भी नै बात थी. "ऋतू तेरा भी बॉयफ्रेंड है?" प्रियंका ने हैरानी से कहा
"जब अलका ने कहा के है तोह मान लिए. मई कह रही हो तोह क्या दिक्कत हो गई? ये प्रीती मेरी ख़ास है मतलब ये नहीं के एहि मेरी एक दुनिया है." हँसते हुए उन्होंने
ये कहा तोह प्रीती भी उनके साथ हे हंसने लगी.
"मतलब ये मॉडर्न तारा का भी नहीं और हम दोनों बहनो का भी नहीं. लेकिन तुम तीनो जो हमसे छोटी हो उनका है." प्रियंका दीदी की इस करुणगाथा पर सभी हंसने लगे
थे. "मेरा भी मिल तोह गया है लेकिन पता नहीं की उसको मई पसंद हु या नहीं." तारा ने तोह बम फोड़ दिए ये कह कर.
"अभी 3 घंटे पहले तोह इसको राजकुमार का इन्तजार था और अब वो मिल भी गया? हो क्या रहा है ये?' आरती झुंझलाती सी बोली तोह अलका ने प्रीती के कान में कहा
"ये पक्का हमारे वाला हे है. शर्त लगा ले मेरे से." बात धीमी जरूर थी लेकिन ऋतू ने भी सुन ली थी और तीनो के चेहरे पर मुस्कान तैर गई और ऋतू ने सिर्फ
इतना कहा, "कृष्ण कन्हैया."
"ये तुम तीनो क्या बात कर रही हो." तारा ने उधर ध्यान देते कहा. थोड़ी चिंता हो गई थी उसको.
"अरे बात कहा कर रही है. ये अलका हे बोली की कोई कृष्ण कन्हैया मिल गया लगता है तारा को तोह मैंने वही कहा कृष्ण कन्हैया." ऋतू ने झट्ट से बात
संभल ली थी.
"है कह तोह तुम सच रही हो. कृष्णा जैसा हे है वह." एक हलकी आह सी भर्ती वो बोली.
"ाचा चल तू अर्जुन के लिए फल काट दे ऋतू और मई सबके लिए मग्गी बना के लाती हु." अलका ये कहती कड़ी हुई तोह ऋतू ने प्रीती को जाने का इशारा किया और
वो बिना कुछ कहे अलका दीदी के साथ निचे चल दी.
"तेरा सही है. मतलब प्रीती तोह सच में जैसे तेरे दिल से जुडी हुई है." आरती ने ये कहा तोह मुस्कुराते हुए ऋतू ने भी कह दिए. "यार गहरा नाता है इस से और
प्यार भी बहोत करती है सबसे अपने यहाँ."
फिर कुछ सोच कर आरती बोल पड़ी, "ऋतू बुरा मत मानियो यार लेकिन एक बात बता के ये जो लोग प्यार व्यार की बातें करते है क्या इस सब में फिजिकल रिलेशन जरुरी
होता है?"
"मुझे ऐसा तोह नहीं लगता के जरुरी होता है. है लेकिन एक बात जरूर है के खुद के ladki/aurat होने का सम्पूर्ण एहसास तभी होता है जब प्रेमी दिल के सब तार
छेड़ दे. और मिलान सिर्फ भूख या सेक्स हे न हो. सम्मान, इज्जत और परवाह हो हर एक चुहान में तोह फिर शारीरिक मिलान किसी स्वर्ग जैसा हे लगता है."
"मतलब तू कर चुकी है क्या?" प्रियंका दीदी ने ये बात कही तोह वह हंसने लगी. "क्या दीदी, कुछ भी सोचती हो. ये सब मेरी फीलिंग्स है और कभी हुआ तोह मई
यही सब चाहती हु के मुझे महसूस हो." उसकी बात पर आरती मुस्कुरा दी और तारा भी.
अर्जुन नीचे से हे फल खा कर अपने दोस्त संदीप के घर चला गया था अलका दीदी को बोल कर ये लड़किया बस ऐसे हे 4 बजे तक बातें करती रही और हल्का फुल्का
खा लिए था इन्होने.
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.
"संदीप कहा है दीदी?" घंटी बजने पर ज्योति ने दरवाजा खोला तोह अर्जुन ने पुछा. उसको लगा के शायद वो गलत समय आ गया क्योंकि ये दोपहर का वक़्त था.
"अंदर तोह आ पहले या धुप में खड़ा रहेगा?" ज्योति एक मुस्कान बिखेरती उसको तमीज से अंदर लेकर आ गई.
"बैठ यहाँ मई बस ये थाली रख के आई." टेलीविज़न देखते हुए शायद वो खाना खा रही थी जो लगभग हो चूका था. गांड मटकती वो रसोईघर की तरफ चली
गई और अर्जुन उसके पिछवाड़े को देख रहा था. तभी अंदर के कमरे से संदीप तैयार हो कर वह बहार के बैठक वाल्के कमरे में पंहुचा.
"तू घंटी क्यों बजता है भाई, तेरा भी तोह घर है." वो उसके पास हे बैठ कर बोलै. जूते, कमीज और जीन्स पहने वह कही जाने को तैयार सा लग रहा था.
"हम कही जा रहे है क्या?" अर्जुन ने पुछा उत्सुकता से तोह वो मुस्कुरा कर धीरे से बोलै, "भाई छोटा सा काम है बस अभी आ जाऊंगा. तू यही बैठ."
"चारु के पास?" अर्जुन ने इतना कहा तोह वो मुस्कुरा दिए.
"भाई तू आ गया न तोह मुझे घर पे दांत नहीं पड़ेगी की घर पर दीदी को अकेले छोड़ गया. मई बस 1 घंटे तक आ जाऊंगा तू इतने यही रह. प्लीज." उसकी बात
पर कुछ सोचते हुए बस उसने हां कह दिए. और संदीप उसको गले लगाने के बाद बोलै, "दीदी कुछ पूछे तोह बोल डीओ के एक दोस्त तक गया है अभी आ जायेगा."
और वह वह से निकल लिए बिल्ली के सिरहाने दूध छोड़कर.
उसके जाते हे अर्जुन ने देखा के रसोईघर के बहार दिवार से लगी ज्योति मुस्कुरा रही है. फिर वो उसके सामने से चलती हुई बैठक का दरवाजा बंद कर उसकी गौड़
में आ पसरी.
"कितनी देर का बोलकर गया है वह?
"एक घंटा काम से काम. वैसे उसको आने जाने में इतना टाइम लगेगा." अर्जुन ने खुद पहल करते हुए उस बिंदियो वाले सूट के कमीज के ऊपर से हे दोनों बड़े खरबूजे
पकड़ लिए. "आज तोह मेरा शेर भी जोश में है." और ज्योति उसके गले पर जीभ फिरने लगी. अर्जुन ने भी कमीज के अंदर नीचे से हाथ दाल कर दोनों दूध पकड़
कर दबाने शुरू कर दिए. "चल अंदर चलते है." इतना ज्योति ने कहा तोह अर्जुन ने उसको गौड़ में हे उठा लिए और अंदर बीएड पर पटक कर एक झटके में पजामी अलग
कर दी. वो बिस्टेर पर पड़ी मुस्कुराती उसको देख रही थी. सांवली ज्योति का हर अंग भरा भरा था. मांसल जाँघे चिकिनी मुलायम थी. अर्जुन उसको देखते हुए हे
अपनी जीन्स नीचे सरकने लगा. "ला ये मई करती हु." आगे बढ़ कर ज्योति ने उसका कच्चा निचे किआ तोह gulaabi-laal लुंड पूरे जोशी में उसके मुँह से आ लगा.
"पहले से हे तैयार है ये तोह." हाथो में पकड़ कर वो उसकी आँखों में देखती बोली तोह अर्जुन ने निचे झुक कर उसका कमीज का सीरा दोनों तरफ से पकड़ लिए. "उतार
दे रे ये ले." अपने हाथ ऊपर करती ज्योति ने खुद हे उसका काम आसान कर दिए. यहाँ वो एक घिसी हुई सफ़ेद ब्रा और एक पतली काली कच्ची में थी. उसके सांवले मॉटे
उभार ब्रा में झूल रहे थे और इधर अर्जुन का लुंड मजे की शिद्दत से और फूल रहा था. अपनी गांड उठा के ज्योति ने वो कच्ची निकलने की कोशिश की तोह अर्जुन
ने कूल्हों के निचे से उसको पकड़ कर खींच लिए. छूट पर हाथ रख के सहलाते हुए वह ऐसे हे ज्योति के ऊपर हो गया और दोनों एक दूसरे के होंठ पागलो की तरह
चूसने लगे. लुंड को छूट की दरार में रगड़ते हुए अर्जुन को छूट के गीलेपन का एहसास हुआ. वो पूरी पनिया सी गई थी.
"नीचे तोह बड़ी गीली हो दीदी" उसने अपना चेहरा उठाते हुए कहा तोह ज्योति पूरी बेशर्मी से बोली, "तेरे हे इसको देख के गीली हुई है. अब कर दे इसको ठंडा नहीं
तोह फिर और बुरा हाल हो जायेगा." टाँगे पूरी खोल के अर्जुन की कमर से लपेट ते हुए वह फिर से उसके मुँह को चूमने लगी. इधर अर्जुन ने वो ढीली सी ब्रा ऊपर
करते हुए दोनों बड़े चुके आजाद कर दिए थे जिनको वह अब ाचे से मसल रहा था. "सेह लोगी न मेरा?" एक बार फिर पूछते हुए उसने अपना हाथ नीचे करते हुए
लुंड छूट के छेड़ पर टिकाया जो बुरी तरह से तपने लग रही थी.
"जान भी लेले मेरी लेकिन ये तेरा डंडा अंदर दाल दे रे और मेरी परवाह किये बिना बस जी भर के छोड़ मेरी इस मुनिया को." वो बिलकुल देसी भाषा में बोलती अपनी
छूट उचकने लगी थी लेकिन लुंड का मोटा सूपड़ा ऐसे तोह जाना नहीं था अंदर.
उसके होंठ मुँह में दबाते हुए अर्जुन ने लुंड पकडे हुए हे अपनी कमर जरा तेजी से आगे बढ़ा दी. चुतरस से भीगा मोटा सूपड़ा गच्छ से उस मुलायम गरम छूट में
धस्स गया. एक पल के लिए ज्योति तदपि लेकिन अर्जुन ने एक और धक्का साथ में हे जड़ दिए. आधे से ज्यादा लुंड अब उसकी छूट में कास गया था. ऐसे हे रुक कर उसने
अपनी हथेली में दोनों दूध दबाते हुए ज्योति के होंठ चूसने जारी रखे. वो कसमसाई थोड़ी देर फिर शांत हो गई.
"मार दिए रे तेरे इस लौड़े ने. आह पेट दुखने लगा इसकी मोटाई से." होंठ अलग होते हे ज्योति शिकायत और दर्द से बोली लेकिन अर्जुन बस उसका एक भूरा निप्पल मजे
से चूसक्ता रहा. 2 मिनट बाद हे छूट में गीलापन आने लगा तोह वो भी सिसकने लगी और टैंगो को हल्का ढीला फिर सख्त करने लगी.
"करू?" अर्जुन ने आँखों में देखते हुए कहा तोह ज्योति भड़क गई, "तो क्या सिर्फ यही डालने के लिए अंदर ठोका है. फाड़ दे न इस कामिनी को."
अर्जुन ने 3 इंच लुंड बहार खींचा जिस से उसको हल्का सा दर्द हुआ और वापिस अंदर पेल दिए.
"आह अब बीच में कुछ न बोलियों रे. करता रह है ऐसे हे." अपने दोनों दूध खुद हे दबती वो बोली तोह अर्जुन अब 5-6 इंच तक गहरे धक्के लगाने लगा था. हर
धक्के पर वो खरबूजे हिलते तोह उसको और मजा आने लगता. अपने हाथ ज्योति की मोती गांड के निचे रख कर उसने छूट को और ऊपर उठाने के बाद एक कास के धक्का
लगा दिए. लुंड चाक़ू की तरह चीरता वह तक चला गया जहा पिछली बार नहीं गया था.
"मर्डर गई मम्मी. निकाल ले रे तेरा मूसल... आई मेरी माँ. नहीं छुड़वाना.." दर्द में ज्योति हाथ पेअर पटकने लगी तोह अर्जुन उसका एक दूध दबाता छूट के नीचे
गांड के छेड़ को कुरेदने लगा. चुदाई तोह एक पल के लिए रुक गई थी लेकिन ज्योति बोलने के बाद भी छूट में लुंड लिए पड़ी रही. जब थोड़ी शांत हुई तोह अर्जुन
ने उस 5 फ़ीट की लड़की को ऊपर उठा लिए लुंड छूट में फंसाये हुए हे. ऐसे खड़े हो के एक हाथ पीठ पर रखे वो खुद से चिपकाये वो उसके मुँह को चूम रहा था
और दूसरे हाथ से उसकी गांड की दरार में पूरा पंजा फंसाये था. अपनी बाहे उसकी गर्दन में जकड कर ज्योति ने हिम्मत कर के खुद हे गांड चलनी शुरू की तोह
एक तिहाई लुंड अंदर बहार होने लगा जो उसकी बच्चेदानी तक ाचे से ठोकर मार रहा था. मुश्किल से 4-5 मिनट हुए थे के उसकी बस हो गई.
"Aaahh..mai गई रे अर्जुन.. मजा आ रहा है." वह गिरने को थी तोह अर्जुन ने उसको पकड़ के बीएड पर लिटा दिए. एक पल के लिए लुंड बहार निकल उसको घोड़ी की तरह
करके गीली छूट में फिर से जड़ तक लुंड थोक दिए. "जालिम इंसान.. आह ाचे से मजा.. आह तोह लेने देता." लेकिन अर्जुन बिना कुछ बोले पीछे से उसके दोनों थांन
पकड़के उसको तगड़े झटके देते हुए कास के पेलने लगा. हर धक्के के साथ वह आगे को हो जाती तोह वह उसके दूध खींचता पीछे कर फिर से सुपडे तक लुंड निकाल
वापिस पेल देता था. "दीदी सच में गजब की है तुम्हारी. इतनी गरम और टाइट है जैसे बस मेरे लुंड के नाप से हे बानी है." अब उसके दोनों हाथ ज्योति के कूल्हों की
दोनों फांके अलग करते हुए लुंड को और गहराई में ठेलने लगे थे. एक bhoora-gulabi सा सिलवटों वाला छेड़ ाचे से दिख रहा था अर्जुन को. अपना हाथ छूट पर
2-3 बार फिर कर उसने अपनी पहली ऊँगली गीली करते हुए उस छेड़ के ऊपर धीरे धीरे चलनी शुरू की तोह ज्योति की सीत्कार मजे की अधिकता से और तेज हो गई थी.
लटकते चुचो पर नीली नसे भी नुमाया होने लगी थी जो बता रही थी की वो चरम पर है. और अगले हे पल ऊँगली गांड के छेड़ में आदि बैठ गई थी.
"कमीने क्यों सत्ता रहा है? और ये कहा ऊँगली फंसा दी रे निकल जलन हो रही है." उसकी बात अनसुनी करता अर्जुन धीरे धीरे ऊँगली bahar-andar करने लगा और
छूट के अंदर तक अपना लुंड घुसता रहा.
"आह अब मजा आ रहा है. करता रह रे ये तोह बड़ा अलग मजा आ रहा है. कहा से सीख लिए ये सब." अब खुद हे ज्योति गांड उचकाने लगी थी.
"दीदी, यहाँ करवाऊंगी?" अर्जुन ने वैसे हे धक्के लगते हुए पुछा.
"तू जहा कहेगा करवा लुंगी रे. लेकिन आज सिर्फ आगे कर, मंगलवार को घर में कोई नहीं रहेगा तू आ जैव. आह.. अभी बस.. आह मेरी मुनिया का ध्यान रख."
इतना सुनते हे अर्जुन ने अब ऊँगली बहार निकल ज्योति को वापिस पीठ के बल कर दिए और दोनों टंगे खोल के पूरा लुंड जड़ तक अंदर बहार करना शुरू कर दिए था.
नीचे झुक के उन फुल्ले हुए चुचुक को ाचे से दबा के पीते हुए वह तेज तेज धक्के मरता रहा. उसका लुंड भी फूलने लगा था. मजे की अधिकता में एक 2 जगह
से दूध को काट भी लिए लेकिन दोनों हे लगे रहे. जब ज्योति की छूट में तेज संकुचन होने लगा तोह वो चीखने सी लग गई और यही अर्जुन भी किसी पागल सांड
की तरह तूफानी गति से छूट को उधेड़ने लगा था. जैसे हे छूट ने पानी बहाया अर्जुन ने भी लुंड बहार निकाल कर छूट के होंठो पे 2-3 घिसाई कर दी.
ज्योति के थोड़ी पर पहली सफ़ेद गरम पिचकारी की धार जा लगी और अगली चुचो के बीच में. ऐसे हे तक़रीबन 15 सेकंड तक सफ़ेद लावा उसके शरीर पर बिखेर कर
अर्जुन साथ में बिस्टेर पर लेत गया और साँसे दुरुस्त करने लगा.
"तू असली मर्द है रे. कसम से आह.. ऐसे कास बल ढीले करता है.. आह के एक तरफ दिल करता है के कभी तेरे पास नहीं जाउंगी.. आह लेकिन ये निगोड़ी.. इसको तू
हे पसंद है रे." अपनी कच्ची से सारा वीर्य साफ़ करती वह कपडे पहन कर उसके होंठ चूम बाथरूम चली गई. 3 बज चुके थे तोह अर्जुन ने भी खुद को दुरुस्त किआ
बाथरूम से आती ज्योति के चुके ाचे से हिल रहे थे, जैसे नरम होने लगे हो और टाँगे भी चौड़ा गई थी.
"कमीने पेशाब करते हुए भी जान निकल रही है. और ये तू क्या कह रहा था के कहा करना है?" वो पास बैठ टी बोली तोह अर्जुन ने फिर से उसकी गांड के नीचे
हाथ घुसेड़ते हुए नरम मांस पकड़ते कहा, "यहाँ जो छेड़ है वह. मैंने एक किताब में देखा था तोह मेरा दिल है की आपके इन गोल मटोल कूल्हों के बीच एक बार
मई भी कर के देखु."
"ोये पागल. यहाँ आगे तोह मैंने कभी ऊँगली और मोमबत्ती करि थी तोह तेरा लेने को तैयार हो गई लेकिन उस जगह अगर ये गया तोह पता है के बैठने लायक भी
नहीं रहूंगी. और कहा पढ़ी थी वो किताब तूने? कही इस संदीप के बचे के काम तोह नहीं जो ये उलटी सीढ़ी शिक्षा तेरे दिमाग में भरने लगा हो.?" अरजुन वह
से उठकर संदीप के कमरे में गया. उसको उम्मीद थी की वो किताब शायद अब भी वही होगी और वो वही मिली जहा छुपाई थी.
"ये देखो न दीदी" उसने वो रंगीन किताब का वही पन्ना ज्योति के सामने कर दिए जहा अंग्रेज लड़की गांड में हब्शी का लुंड लिए थी. ज्योति ने किताब को खुद पकड़
के देखा और हैरान होते वो चित्र देखने लगी. लड़की की गांड तोह उसके बराबर हे मोती थी. लुंड भी अर्जुन जैसा था उस काले आदमी का जो आधा गांड के चले
के अंदर फंसा हुआ था. पन्ना पीछे करते हे उसको 4 चित्र और दिखे. जहा वो फिरंगी लड़की कला मोटा लुंड मुँह में ले रही थी, एक में वो उसकी छूट चाट रहा था,
एक जगह वो एक लुंड चूसती एक छूट में लिए थी और सबसे नीचे वाले में गांड, छूट और मुँह में लुंड भरे हुए थे.
"ये सब क्या है रे? कैसे कर लेती है ये? मई तोह तेरे इस एक से हे मर्डर गई लेकिन ये छिनाल तोह 3-3 खा रही है."
"प्रैक्टिस है दीदी. लेकिन आपको 3 लेने की जरुरत नहीं मई अकेला हे बहोत हु."
"ओह मई भी ऐसी नहीं के तेरे सिवा किसी को हाथ लगाने भी दू. तू हे है जो इसका मालिक है और फिर मैंने वडा कर दिए मंगलवार का तोह पक्का है. बस सुबह घर
आ जैव 11 बजे तक." फिर कुछ देर दोनों प्यार भरी चुहल करते रहे. कभी वो दूध दबाता तोह कबि ज्योति उसकी गॉड में बैठ कर चूमने लगती. कोई आधे घंटे
बाद जब संदीप ने घंटी बजाई तोह अर्जुन ने बहार जा कर गेट खोला इधर ज्योति बैठक में टेलीविज़न के सामने बैठने का दिखावा करती रही. दोनों दोस्त संदीप
के कमरे में घुस गए और फिर आधे घंटे बाद अर्जुन घर निकल लिए.
घर की लड़किया और उनकी बातें
कमरे में ठण्ड होने से तारा ने तोह चद्दर ली नहीं थी तोह वह खिसक कर अर्जुन की चादर में आ गई. नींद में जैसे सबके साथ होता है. अर्जुन भी मजे से सो
रहा था और भूल गया था के वो किसके साथ है. अपनी बाहों में भर के नींद में हे उसने अपने होंठ तारा से मिला दिए हाथ कमर पर थे. दोनों में से किसी ने
कोई हरकत न की थी लेकिन तारा की नींद टूट चुकी थी अपने होंठो पर इस एहसास के होने से. गौर से उसका चेहरा देखती वो खुद जैसे चाहती थी की अर्जुन एक
बार फिर से उसके होंठो पर अपने होंठ रख दे. लेकिन वो तोह अब बस कास के तारा से चिपका सो रहा था. कुछ और होते न देख तारा वापिस हल्का निचे खिसक उसके
सीने में सर दिए सोने लगी. कोई एक या डेढ़ घंटे बाद अर्जुन की आँख अपने रोज के समय पर हे खुल गई. बाहों में तारा को देख थोड़ा हैरान हुआ फिर चादर
पर नजर गई तोह हल्का मुस्कुराता समझ गया इसका कारण. प्यार से बाजु को उठा कर तकिया निचे रख कर वो बाथरूम में घुसा और थोड़ी देर में तैयार हो कर
नीचे चल दिए. आज तोह दादाजी की तरफ भी शांति थी. आँगन में 2 गाड़िया कड़ी थी जिन्हे एक बार देख वो गेट खोलता घर से बहार आ गया. उधर छोल साहब
के घर का दरवाजा भी खुला तोह प्रीती उसकी तरफ आती दिखी.
"तुमने कसम खाई है एक कभी आना और फिर गायब हो जाना.?" आते हे अर्जुन ने उसको शिकयत हे की. गोरा गुलाबी चेहरा जो अभी तजा धुला था किसी गुलाब सी दिख
रही थी वो.
"जब मुझे कुछ काम होता है तभी मई आती हु. मुझे तुम्हारी तरह पहलवान तोह नहीं ban-na." हलके कदमो से दोनों भागने लगे तोह प्रीती ने बात करि.
"मतलब आज किसको पीटना है?" अर्जुन ने भी मसखरी करि
"है कोई जा ज्यादा परेशां करता है और अभी भी कर रहा है." प्रीती ने हँसते हुए इशारा उसकी तरफ हे किआ
"तोह फिर बताओ आज इतनी सुबह आने की वजह क्या है?" अर्जुन ने अब सीधे मतलब की बात कही.
"रात को मेरे घर आ जाना. दरवाजा कूद के 12 बजे के बाद. यही कहने के लिए इतनी सुबह आई हु और नींद भी नहीं आई." नजरे झुकाती सी वो बोली तोह अर्जुन को
जैसे मौका मिल गया था. "रात को तुम्हहारे घर, वो भी कूद के. मतलब मई हे मिला छोल साहब की गोली खाने क लिए तुम्हे. और गली में किसी ने पकड़ लिए तोह
पिटाई होगी वो अलग." अर्जुन ने वैसे हे जवाब दिए तोह प्रीती ने हलके गुस्से से कहा, "तुम्हे बताया था के आज दादाजी जा रहे है 2 दिन के लिए. ऊपर से अगर तुम्हे
इतना डर लगता है तोह फिर मई आ जाउंगी तुम्हारे घर लेकिन फिर सभी होंगे वह. देखती हु सबके सामने कैसे बोलते हो के मई तुम्हारी जान हु." और वापिस मुड़ने लगी
लेकिन मुड़ते हे अर्जुन ने प्रीती को सीने से लगा लिए. "अभी कह दू सबके सामने के तुम्ही मेरी जान हो. तुम सिर्फ मेरी हो प्रीती.? तुम मेरे साथ मजाक करो तोह ठीक
लेकिन मई करू तोह?" ऐसे हे गले लगाए उसने प्रीती को प्यार से कहा. "और आ जाऊंगा मई तुम्हारे घर. छोल अंकल होंगे तब भी डर नहीं है मुझे. वो घर भी
तोह मेरा हे है." एक बार गाल चूम के आगे बढ़ दिए तोह प्रीती भी खुसी में साथ सत् के दौड़ने लगी. अर्जुन ने फिर से एक शरारत करि. अपनी चाल एक दम धीमे कर
दी तोह प्रीती उस से आगे दौड़ने लगी और वो रुक कर उसको पीछे से देखने लगा. "रुक क्यों गया और क्या देख रहे हो.?" 15-20 कदम दूर से प्रीती ने पुछा तोह अर्जुन
बस वही खड़ा हंस रहा था. दोनों हे सुनसान जगह थे और सुबह 5 बजे कोण यहाँ उन्हें देखता. वो चलती वापिस उसके पास आकर कड़ी हुई तोह अर्जुन ने होल से अपने
हाथ उसके पीछे कर दिए. प्रीती को लगा के फिर से बाहों में लेने लगा है लेकिन जब हाथ अपने कूल्हों पर महसूस हुए तोह एक पल के लिए सास रुकी फिर संभल कर
बोली, "ये क्या है?"
"तुम्हारी बात का जवाब. ये देख रहा था के भागते हुए कितने दिलकश लगते है." और मांसल आकर लिए हे दोनों कूल्हे दबा के खुद से लगा लिए.
"सब तुम्हारा है मैंने कोनसा तुम्हे मन किआ हुआ है." आज ये दोनों तोह अँधेरे में हे laila-majnu बने थे.
"ाचा यार अब चलो यहाँ से. मुझे वापिस भी जाना है. दादा जी 6 बजे निकल जायेंगे." प्रीती ने खुद को अलग करते कहा तोह अर्जुन ने बात मान ली. अगले 20 मिनट
वो सिर्फ दौड़ पूरी करने के बाद घर के बहार खड़े थे.
"ोये पुत्तर. बड़ा पसीने बहा रहा है." घर से बहार निकलते छोल साहब ने अर्जुन को देखा जो प्रीती के साथ हे खड़ा था अभी आ कर.
"गुड मॉर्निंग छोटे दादू. ये लड़की न हार नहीं मानती इस चक्कर में ज्यादा हे दौड़ लग गई थोड़ी." अर्जुन ने प्रीती की तरफ इशारा करते कहा. खुद तोह उसकी
साँसे सम्भली हुई थी लेकिन प्रीती हल्का हांफ रही थी.
"ाची बात है ये तोह. लेकिन बिल्ली हांफ रही है और शेर को सिर्फ पसीना." उन्होंने भी प्रीती को छेड़ते कहा.
"दादू आप भी इसकी साइड लोगे. ये मेरे से कभी नहीं जीत सकता आप खुद पूछ लीजिये के 2 बार हार चूका है मेरे से."
"ओह बीटा जी वो तेरे से हर बार हारेगा क्योंकि कुछ लोग शायद ऐसे हे वो जीत लेते है जो उनके लिए जरुरी होता है." बड़ी गहरी बात उन्होंने कह दी थी.
"और तू भी चल अंदर आ. आज तुझे मई यहाँ का दूध पिलाता हु." अर्जुन को अंदर साथ लिए वह ड्राइंग रूम में आये जहा उनका एक अटेची रखा हुआ था. "पारवती
बीटा, जरा इसके लिए एक गिलास दूध बना के दे, मेवा दाल के और 4 केले भी लेती आना." इतना बोलकर इशारे से बाथरूम दिखाया तोह अर्जुन सीधा वह चला गया.
प्रीती अपने कमरे में बने बाथरूम में जा चुकी थी. दोनों लगभग एक साथ हे वापिस आये ड्राइंग रूम में तोह टेबल पर एक गिलास दूध, एक गिलास जूस और केले रखे थे.
छोल साहब एक कप चाय का लिए वही बैठे थे. "पुत्तर चल शुरू हो जा." इतना कह कर उन्होंने गिलास उसको दिए इधर प्रीती बालो से रबर निकलने के बाद जूस पीने
लगी थी. अर्जुन ने भी अनुसरण किआ तोह कुछ देर बाद 2 केले और दूध का गिलास हजम कर चूका था. "प्रीती बीटा अपनी डाइट के साथ कोई कोम्प्रोमाईज़ नहीं." बचे दोनों
केले उन्होंने उसकी और कर दिए.
"ाचा बीटा मई चलता हु. और प्रीती अगर तुम्हारा दिल करे तोह इनके घर सो जाना नहीं तोह Alka/Ritu को यहाँ बुला लेना." उन्होंने इतना बोलै और दोनों को गले लगा कर
गाडी निकल चले गए. अर्जुन भी प्रीती को bye कह के निकल लिए.
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"दीदी, सब सामान रख लिए मैंने. आप एक बार देख लीजिये." रेखा जी ने ललिता जो को बताया के वो गांव जाने के लिए जितना जरुरी था उतना सामान, कपडे रख चुकी
है. तोह ललिता जी ने रसोईघर से हे हाथ हिला दिए के ठीक है.
आज तोह इतनी सुबह हे नाश्ता बन रहा था. अर्जुन नाहा के अंदर आया तोह माधुरी दीदी, चाचा जी और कोमल दीदी नाश्ता कर रहे थे. ताईजी परांठे बना रही थी.
"आप लोग तोह आज ज्यादा हे जल्दी नाश्ता करने लगे हो." अर्जुन ने वही बैठ कर ये बात कही तोह नरेंदर जी ने जवाब दिए, "मुन्ना अभी आधे घंटे में निकल रहे
है अगर तू कहता है तोह नहीं करते नाश्ता." हंसने लगे वो. कोमल दीदी शांति से बैठी खाना खा रही थी लेकिन माधुरी दीदी तोह बार बार जैसे अर्जुन को देख रही
थी जैसे उनका कोई दिल नहीं था जाने का गांव. "बीटा चल ये पहन ले. पीछे से ऐसे हे नहीं बैठे रहना. और एक बार ऋतू को उठा दे उसका इम्तिहान भी है." टीशर्ट
पकड़ते हुए उन्होंने कहा तोह अर्जुन उसको पहन कर अपनी माँ के गले लगता हुआ बोलै, "ाचा फिर आप जल्दी आना." वो बस अपने बेटे के चेहरे पर हाथ रखती मुस्कुरा दी.
अर्जुन अंदर आया तोह देखा के अलका दीदी वह नहीं थी सिर्फ ऋतू दीदी हे सोइ हुई थी. मतलब छत्त पर से उठने के बाद भी ये अभी यहाँ आ कर सो गई थी. थोड़े मजाक
के मकसद से अर्जुन उनके ऊपर झुका हे था के ऋतू ने किसी बिल्ली की तरह झपट्टा मारते हुए उसके होंठो को चूम लिए और फिर छोड़ते हुए बोली, "तेरा हे तोह इन्तजार
था. मुँह मीठा हो गया तोह पेपर भी ाचा जायेगा." उन्होंने इतना कहा तोह अर्जुन ने हलके से उनके दूध पकड़ते हुए कहा, "दीदी यहाँ दही शक्कर नहीं है लेकिन इधर
से शायद मुँह मीठा हो जाये." टीशर्ट के अंदर उनके उभर खुल्ले थे जिनके निप्पल थोड़े कड़े लग रहे थे. "ोये बस कर और चल उठ मेरे ऊपर से. ये मुँह मीठा बाद
में करेंगे." हंसती हुई वो उसके नीचे से निकल कर उस से पहले हे बहार आ गई.
"बीटा ये तोह अभी उतना समझदार है नहीं. तू हे इसके खाने और कपड़ो का ध्यान रखना." रेखा जी ने ऋतू को समझते कहा और फिर कौशल्या देवी भी पिछले आँगन
में आ गई. "चल बीटा तू सामान रखवा गाडी में और नरेंदर तू भी अब उठ जा बीटा." उनकी बात सुनकर अर्जुन ने बैग, अटेची उठा लिए और अपनी माँ और दीदी के साथ
बहार की तरफ चल दिए जहा पर कोमल दीदी, माधुरी दीदी, दादाजी पहले से हे थे. सब सामान आराम से आ गया तोह रामेश्वर जी ने अर्जुन को एक तरफ बुला कर कुछ
हिदायते दी और अलका ऋतू के सर पर प्यार दिए. सभी लोग बैठ गए तोह चाचा गाडी निकल कर चल दिए. उनकी दोनों बेटियां तोह अभी सो हे रही थी.
"संजीव भैया तोह उठ जाते है." अंदर आते हुए अर्जुन ने अलका दीदी से ये बात कही तोह वो मुस्कुराती बोली, "उठ भी गए थे और चले भी गए. शाम तक आएंगे
वापिस वो. पास के एक गांव में कुछ काम था." उनकी बात सुनकर अर्जुन भी अंदर आ गया तोह ऋतू दीदी तैयार होने चली गई और अलका दीदी घर की सफाई में लग गई. ऐसे
हे घूमता सा वो माधुरी दीदी के कमरे में गया तोह वह पर प्रियंका दीदी और आरती सो रहे थे. अर्जुन की नजर एक जगह का नजारा कर के वही रुक गई. हलके पीले
टीशर्ट के गले से प्रियंका दीदी के उभार दबे हुए बहार को निकल रहे थे और उनकी गेहटी नाभि गोरा पेट भी नुमाया था. "ये तोह बिलकुल कोमल दीदी जैसी हे है."
एक बार ाचे से उन्हें देख कर वो वापिस बहार आया और कुछ सोचता सा ऊपर अपने कमरे की और चल दिए.
बीएड पर लेती तारा को कोई होश नहीं था अपने कपड़ो को. निक्कर का कपडा कूल्हों की दरार में फंसा था, गुलाबी बिना बाजु की टीशर्ट से निप्पल के पहले तक का भाग उजागर
हो रखा था और चेहरा बिलकुल मासूम सा तकिये पे रखा था. चादर कब की बीएड से निचे गिर चुकी थी. अर्जुन ने चादर वापिस उनके बदन पर दाल दी और संजीव
भैया के बीएड पर उल्टा सा लेत गया. "पता नहीं क्या हो रहा है आजकल. जितना सोचता हु ध्यान बार बार एक हे जगह जाने लगता है." ऐसे सोचते हुए उसने खड़े हो
कर संजीव भैया की अलमारी से एक किताब निकाल ली जिसके ऊपर अखबार का कागज चढ़ा था. भैया ने बड़ी सफाई से ये किताब छुपाई थी. "Tantra-sex काम की विधि"
नाम की ये किताब उसने कोमल दीदी से मधुर मिलान करने से पहले 3 भाग तक पढ़ी और देखि थी. कुल 12 भाग थे इसमें. कमरे का किवाड़ ाचे से लगा कर वो आगे
पढ़ने लगा. किताब में नारी पुरुष की विभिन्न शरीर के अनुसार उनके बारे में बहुत कुछ बताया हुआ था. और rati-kriya के कई अलग भाग थे की कैसे क्या करना
चाहिए या क्या नहीं. तक़रीबन हर पृष्ट पर हाथ से बनाये चित्र भी थे. वो पूरे ध्यान से उसमे लिखे घ्यान को समझने लगा और फिर एक घंटे बाद सब वैसे
हे कर के बहार आया. तारा अब बिस्टेर पर नहीं थी और शायद बाथरूम चली गई थी. ऐरकण्डीशन को बंद करते समय उसने घडी की तरफ देखा तोह 8 बज चुके थे.
अब नीचे से भी हलकी आवाज आ रही थी.
"उठ गई आप दोनों?" बहार टेबल पर चाय के कप रखे थे और Priyanka/Aarti दीदी बातें कर रही थी अलका दीदी के साथ.
"हमको उठे तोह आधा घंटा हो गया लेकिन तू कहा था अभी तक.?" आरती ने ये बात कही थी. और ऋतू दीदी तैयार हो कर अर्जुन के सर पे हाथ रख बहार निकल गई जहा प्रीती स्कूटरी पर उनका इन्तजार कर रही थी.
"मई वो ऊपर किताब पढ़ रहा था. पहले आपके पास गया तोह आप दोनों हे सो रही थी." उसकी इस बात पर प्रियंका ने आरती की तरफ अजीब तरह से देखा. "है वो क्या
है न ज्यादा आराम नहीं मिला था 2 दिन से तोह कुछ ज्यादा हे नींद आई थी. कल से तेरे साथ उठ जाया करेंगे." कह कर आरती हंसने लगी तोह अर्जुन भी कुर्सी पर
बैठ गया हँसते हुए.
"अर्जुन जब तेरे पास टाइम हो तोह थोड़ा सामान ला देगा यही पास की मार्किट से?" अलका दीदी की बात सुनकर उसने हामी भर दी.
"है जब बहार जाये तोह मई भी साथ चलूंगी कुछ सामान लेना है मैंने भी." निचे उतरती तारा ने ये कहा तोह चारो उसकी और देखने लगे. एक रेशमी सफ़ेद कुरता
जिसकी बाजू न के बराबर थी और, लाल रंग की बिलकुल कासी हुई सलवार और हलके गीले खुले बालो में तोह वह केहर सा ध रही थी.
"तू मार्किट में आग लगा देगी. कपडे fire-brigade के और खुद चलती फिरती आग." प्रियंका दीदी की इस बात पर वो हंसती सी अर्जुन और उनके बीच की कुर्सी पर बैठ गई.
शरीर से बड़ी ाची महक आ रही थी. शायद नहाने के बाद भी 2-3 क्रीम या इत्र लगा कर हे वो आई थी.
"ठीक है जब जाऊंगा तोह तुम्हे बता दूंगा." अर्जुन के जवाब से वो थोड़ा मुस्कुराई लेकिन अलका दीदी की त्योरिया छड्ड गई तू सुनकर.
"ऐसे कबसे बात करने लगा अर्जुन अपने से बड़ो से?" बेशक वो उस से प्यार करती थी लेकिन उन्हें ाचा नहीं लगा उसका ऐसे तारा को बुलाना.
"अलका अब तू हमारे बीच में मत बोल. ये बचपन से मुझे तारा कह के बुलाता है और मई भी इसको नाम से बुलाती हु. हम दोनों को हे यही ठीक लगता है तोह तू टेंशन
मत ले. बाकी सबको तोह दीदी बोलता हे है न?" तारा की बात से अलका अर्जुन को घूरने लगी.
"आपको अगर बुरा लगा तोह सॉरी. अब से नाम ले लिए करूँगा जैसे तारा जी." अलका दीदी को कहता अर्जुन इतना बोलै तोह सभी हंसने लगे. "ये बन्दर नहीं सुधरने वाला.
और तारा जी? सुनकर हे अजीब लगता है." प्रियंका दीदी ने बोलै तोह तारा भी हंसती बोली, "हम दोनों में tu-mai हे ठीक है या Tara-Arjun ये जी वि भूल जा."
फिर कुछ समय बाद प्रियंका दीदी ने सबके लिए खाना गरम किआ और तारा और आरती दीदी को भी परोस दिए. अलका दीदी नहाने चली गई इधर अर्जुन मार्किट जाने के लिए
कपडे बदलने ऊपर आ गया.
"वैसे तारा, तेरी ये ट्रेनिंग किस चीज की है?" आरती दीदी ने उस से पुछा तोह तारा ने थोड़ा खुलकर बात करते हुए बताया, "वो आरती मेरा फैशन डिज़ाइन का कोर्स
चल रहा न दिल्ली में तोह 2 साल के बाद ये 6 महीने की ट्रेनिंग जरुरी थी काम को समझने के लिए. जैसे की कपडा कैसे तैयार करते है, डिज़ाइन और क्वालिटी, फिर
इनके मुख्या मार्किट और डिस्ट्रीब्यूशन कैसे होता है. और जिस कंपनी में ये ट्रेनिंग करनी है तोह एक तोह वो पापा के नोन है दूसरा अकेले दिल्ली में रहके लाइफ ज्यादा
हे बोरिंग हो गई थी. यहाँ पर nana-naani और बाकी सब भी है. इसलिए मैंने सोचा की फिर यही जगह ठीक है. और अब तोह शहर भी ाचा हो गया है आते हुए देखा
था मैंने. ट्रेनिंग के बाद देखते है की जॉब करनी है या मास्टर की डिग्री."
"वाह यार तेरा सही है. इधर तोह वही गर्ल्स कॉलेज में जाओ फिर घर आने के बाद घर के काम और फिर वापिस पढाई. दिल्ली में तोह सुना है ज़िन्दगी हे अलग है." आरती
ने थोड़ा उत्साह से कहा.
"है. ऐसा हे लगता है जब हम जिस जगह नहीं रहते तोह वह शायद ज्यादा ाची लगती है. बड़ा शहर है, आजकल अपनी जनरेशन के लोग थोड़े आज़ाद ख़याल के है लेकिन फिर उसके नुक्सान भी बहोत है." कहने के बाद कुछ सोचने लगी वो.
"क्यों कुछ गलत हुआ क्या तेरे साथ वह?" प्रियंका दीदी ने खाना रोकते हुए ये बात कही थी.
"ऐसा है न दीदी गलत और सही लोग हर जगह हे होते है. बस वह अकेली थी तोह कुछ लोगो पर ज्यादा भरोसा कर लिए था जब नै थी." एक लम्बी सांस लेते वो थोड़ा
खामोश हो गई थी.
"क्या हुआ था जरा बता तोह. कही कुछ?" आरती ने चिंता से ये बात कही लेकिन फिर अधूरी छोड़ दी.
"अरे यार इतना कुछ भी नहीं बस किस्मत थी और शायद ये समझ ले की भगवन ने के सब दिए था मुझे. कहा तोह मैंने आज तक अपने हाथ से प्लेट तक नई उठाई थी
और आज तू खुद बता क्या तुझे मई वैसे दिखती हु? कॉलेज का पहला साल था तोह अपने हिसाब से हे दोस्त बना लिए. किसी के पास गाडी तोह कोई मेरे से ज्यादा मॉडर्न.
दोस्तों में लड़के भी थे और फिर एक दिन पार्टी के बाद 2 सीनियर दोस्त, दोनों हे लड़के थे और एक लड़की. हम सब पार्टी करके वापिस आ रहे थे तोह उन्होंने मेरा फायदा
उठाना चाहा. उस दिन अगर सही मौके पे वह पुलिस की गाडी न आती तोह फिर मई शायद ज़िंदा न होती या मेरा सबकुछ लूट गया होता. लेकिन उसके बाद से मैंने ये
पार्टी और नाम के high-fi दोस्त बंद हे कर दिए. कॉलेज से हॉस्टल और फिर हॉस्टल से घर. लेकिन है पहनती वही हु जो मुझे ाचा लगता है." आखिरी बात कहती
वो हंसने लगी.
"ये तोह बहोत हे बड़ी घटना हो जाती तेरे साथ." आरती ने ये कहा तोह प्रियंका ने भी सर हिला दिए.
"देखो दीदी ये इज़्ज़त विज़्ज़ात जैसी सोच अलग है मेरी. अगर कोई पसंद हो तोह शायद मई उसपे सब वार दूंगी. लेकिन जो वह होने वाला था वो सिर्फ भूक और जबरदस्ती
वाला था. न हे वो लड़के मुझे पसंद थे और न हे वो तरीका. कोई ऐसा जो दिल में उतर जाये तोह उसके लिए मई खुद कपडे उतार दू." खिलखिलाती सी बोली तोह दोनों
बहने एक दूसरी का मुँह देखने लगी.
"ये क्या बात कहने लगी? शादी से पहले ये सब नहीं होना चाहिए. पाप है ऐसा सोचना भी." प्रियंका दीदी की ाअत आधी सच और आधी झूठ हे थी.
"आपको कभी प्यार हुआ है क्या दीदी? एक बार करके देखना फिर आपको ये जिस्म उसके सामने कुछ नहीं लगेगा जब कोई आपकी सीधा रूह में उतर जायेगा. और ये सब ढोंग
है कुंवारापन या लड़की की इज़्ज़त. दिल्ली में आधी से ज्यादा लड़किया या तोह अपने प्रेमी से या फिर दोस्तों के साथ सब कर लेती है. और जो अकेली है वह भी अपने आप को
सुख देना जानती है. लेकिन मैंने भी सोच रखा है के जिस से प्यार करुँगी वो सब उसके साथ. फिर शादी उसके साथ होती है या किसी और के साथ या करनी भी नहीं
वो सब बाद की बात." तारा ने जब ये बात कही तोह अलका नाहा के आ चुकी थी और सब सुन रही थी.
"तोह इसमें गलत बात क्या है तारा? प्यार शायद सिर्फ शरीर से नहीं होता. शारीरिक मिलान उसका एक हिस्सा है लेकिन उसकी गहराई तोह जैसे एक अलग दुनिया तक जाती है."
अलका की बात पर आरती ध्यान से कभी तारा को तोह कभी अलका को देख रही थी.
"अलका सच्चा बता के क्या तुझे कभी प्यार हुआ है? और ऐसे तोह तू ये बात कहने से रही. मई नाम या उसके बारे में नहीं जान न चाहती. बस अगर हुआ है तोह बता."
प्रियंका दीदी की जिज्ञासा इस बार थोड़ी ज्यादा हे हो गई थी.
"हाँ. मुझे प्यार हुआ है और मई खुदको खुशकिस्मत मानती हु. लेकिन मुझे कभी अंजाम की फ़िक्र नहीं है. शादी कहा होगी, कब होगी वो सब घर के बड़े हे फैंसला
करेंगे. लेकिन मेरा दिल, ये मेरा है तोह मई भी चाहती हु के ये किसी के नाम हो. और अब ये है भी." बात ख़तम करती सी वो शांत हो गई.
"यार तू सही है. हम दोनों जब कॉलेज जाती है तोह सिर्फ आवारा किस्म के लड़के हे दीखते है और फिर कभी ध्यान नहीं दिए इस तरफ. कभी कभी लगता है जिंदगी
ऐसे हे काटनी थी तोह फिर मिली हे क्यों? आरती ने गंभीरता से कहा. "सिर्फ फिल्मो में जो देखा उसके सपने देख लेती हु कभी लेकिन वह भी यही होता है के शादी
परिवार की मर्जी से या बगावत."
"देख आरती फिल्म शायद सही उदाहरण नहीं है एक सच्चे प्यार का. क्योंकि जहा तक मेरी समझ है ये जिद्द, बगावत या sach-jhoot से परे है. हांसिल करना कोई
प्यार तोह नहीं. और जब प्यार सच्चा हो तोह फिर इसका ढिंढोरा पीटना भी जरुरी नहीं. बस अपने सपने पूरे करो और जितना हो सके वो लम्हे जीने की कोशिस करो."
अलका ने बात ख़तम करते हुए कहा और कड़ी हो गई.
"मेरी भी यही सोच है आरती. ज़िन्दगी का क्या भरोसा. अगर 2 कतरे किसी के प्यार के मिल जाये तोह क्या दौलत और क्या ये नाम के सुख. खुद का पूरा होना हे ज्यादा
ाचा लगता है." तारा की बात ख़तम हुई थी की अर्जुन एक नीली जीन्स और आसमानी टीशर्ट पहनकर नीचे आ गया. एक पल के लिए तारा और अलका दोनों ने हे उसको
देखा फिर अर्जुन ने कहा, "दीदी, क्या सामान लेके आना है? तारा चलो फिर ये काम निपटा के आते है."
अलका दीदी ने उसको सब सामान बता दिए तोह वह चल दिए. पैसे लेने से मन कर के. तारा भी एक फैंसी चप्पल जल्दी से पहन के उसके साथ चल दी. स्कूटरी पर दोनों
बैठे तोह तारा लड़को की तरह दोनों तरफ पेअर करके बैठी.
"कोई दिक्कत तोह नहीं न? मुझे ऐसे हे बैठना आता है." अर्जुन ने हँसते हुए ना में गर्दन हिला दी और दोनों हे चल दिए. पीठ पर दबते गुब्बारे उसका ध्यान हटा
रहे थे लेकिन वो इस मजे के अनुभव में आराम से मार्किट आ गया.
"आपको क्या लेना है? पहले वही लेते है." अर्जुन ने कहा तोह तारा उसको देखने लगी. "ाचा तुम्हे जो लेना है वो पहले लेते है" अर्जुन की इस बात पर वह हंसती सी
उसके साथ चलने लगी. "पहले तोह मुझे एक डायरी, पेनस और मार्कर लेने है. फिर कुछ चॉकलेट्स और लास्ट में nimbu-jeera वाला सोडा." वो किसी बची की तरह चहक
रही थी. कुछ लड़के भी तारा के हुस्न का दीदार कर रहे थे जो अर्जुन ने भी देखा लेकिन कुछ कहा नहीं. आराम से सब सामान लेकर दोनों एक दूकान से nimbu-jeera
लेकर बहार खड़े पीने लगे तोह तारा ने भी देखा की 2-3 लड़के उनके पास हे खड़े उसको देख रहे थे. "इन्होने लड़की नहीं देखि कभी जो ऐसे घूर रहे है?"
उसकी आवाज में हल्का गुस्सा था लेकिन अर्जुन मुस्कुराते हुए बोलै, "इतनी खूबसूरत शायद नहीं देखि होगी. और देखने से क्या होता है? कोई हरकत तोह नहीं करि न."
उसकी बात पर तारा के चेहरे पे हलकी लाली और मुस्कान दोनों आ गई थी. जब उन्होंने गिलास रखे तोह वह अलका दीदी का सामान लेने बस आगे हे बढे थे की उनमे से
एक मनचले ने आवाज देते हुए कहा, "बिलकुल रेड & वाइट सिग्रेटे है भाई. गरम और कमाल की." शायद वह यहाँ आसपास के नहीं थे. सरकारी स्कूल की वर्दी जिसमे
शर्ट पंत के बहार थी. पतले, थोड़े पक्के रंग के और हलके शरीर वाले.
"कुछ कहा भाई?" अर्जुन ने तारा को वही रोक कर वापिस आ कर आराम से पुछा.
"तुझे कुछ थोड़ी कहा है. अपनी बात कर रहे हम." उस लड़के ने इतना कहा और अपने दोस्तों की तरफ देखने लगा. अर्जुन आराम से वापिस तारा के पास आया और दोनों
किरयाना स्टोर में चले गए. ये सेक्टर की सबसे बड़ी दूकान थी. ठन्डे की बड़ी बोतल, मग्गी, ब्रेड, सॉस और ऐसा हे कुछ सामान लेने के बाद दोनों स्कूटरी की
तरफ चल दिए तोह अब वही 3 लड़के पेड़ के निचे खड़े थे और एक उनकी स्कूटरी पर बैठा था. "उठो भाई हमारी है." अर्जुन ने विनम्रता से ये बात कही थी.
और उनको ये लगा के लड़का सिर्फ शरीर से बड़ा है बाकी कोई ऐसा वैसा हे होगा. इतनी सी पर दोनों बैठ जाओगे. वैसे पिछली सीट गरम बहोत है." ये वही लड़का
था जो पहले तारा के ऊपर फब्ती कास चूका था और अब सीट से उठते हुए भी अपनी मनचली हरकते दिखा रहा था. अर्जुन ने आराम से वो बड़ा थैला जमीन पर रखा
और बिना कुछ कहा सीधे हाथ का करारा थप्पड़ उस डेढ़ पसली के गाल पर जड़ दिए, जो अगले पर पक्की जमीन पर किसी कटी हुई टहनी सा गिर गया था. "समझ नहीं
आती एक बार में. और तुम दोनों को भी कुछ चाहिए क्या?" अर्जुन ने अपनी टीशर्ट को हल्का सा खींचते हुए उन लड़को को कहा तोह वो बस कभी अर्जुन को तोह कभी जमीन
पर घुटने के बल खड़े होते अपने दोस्त को देख रहे थे. गाल और होंठ के जोड़ से खून निकल रहा था और पूरा बड़ा पंजा उसके उलटे गाल पर छप्प चूका था.
"नहीं भाई. हम तोह पेपर देके आये थे और यही लाया था हमे." उनमे से एक ये बात बोलता दूसरे का हाथ पकड़ के पीछे करता हुआ बस बिना वापिस देखे चल दिए.
"और तुझे अभी से सिग्रेटे पसंद है?' जैसे हे वह मनचला थोड़ा सम्भला तोह अर्जुन ने उसकी कालर पकड़ते हुए 2 और कास के उसके गाल पर रसीद कर दिए. बेचारा
छोटे बचे की तरह हाथ जोड़कर रोने हे लगा था. "चल इसको छोड़ अब अर्जुन. गलत इंसान के हाथ चढ़ गया. और तू भाग यहाँ से." तारा ने उसको अलग करते कहा
और इतनी देर में वो सच में वह से भाग गया.
"तू तोह बिलकुल हे हीरो है रे. मई तोह समझी थी की सिर्फ शरीर से पहलवान है." तारा उसके पौरुष पर mar-miti थी और अर्जुन थैला आगे रखता हँसता हुआ बोलै,
"तारा, ये वो काम कर रहे थे जो इनका शरीर भी मन करता है. और मेरी ताक़त का गलत प्रयोग मैं करना नहीं चाहता था. देखा था ने के पहले कैसे आराम से
बात करि थी."
"हाँ. तोह मुझे तोह खुसी हुई की तू समझदार है. और अपने आप को काबू में रखता है. लेकिन कुछ भी बोल मई तोह तेरी फैन हो गई." स्कूटरी चलने लगी तोह तारा
ने अपने दोनों हाथो से जकड़ते हुए कहा. अर्जुन को फिर वही मजा आने लगा लेकिन पहले से भी ज्यादा. "ाचा ये यहाँ सड़क पे नहीं करो ऐसे. अपना घर इधर हे है."
थोड़ा सकुचाते हुए उसने कहा तोह तारा भी मजे लेती हुई बोली, "फिर जहा तू कहेगा वह पकड़ लुंगी. जगह तोह बता जरा." और हंसने लगी खुद को ठीक करने के बाद.
अर्जुन को मूड भी ाचा हो गया था अब और दोनों ऐसे हे घर आ गए. उनके पीछे हे प्रीती और ऋतू दीदी भी आ गई. "क्या लाया है ये सब? और तारा के साथ?"
ऋतू दीदी थोड़ा हैरान होते बोली तोह तारा ने हे जवाब दिए, "क्यों ये मेरे साथ लड़ाई कर सकता है तोह फिर बहार क्यों नहीं जा सकता? हम ये पास से सामान लेके आये
और मेरे ऑफिस के लिए डायरी, पेन." प्रीती से हाथ मिलते तारा ने कहा इधर अर्जुन प्रीती को देख के मुस्कुरा रहा था जहा तारा की पीठ उसकी तरफ थी.
"चलो अंदर. आ प्रीती तू भी आजा." तारा उसका हाथ पकड़ के अंदर ले चली. "स्कूटरी?" प्रीती ने कहा तोह तारा ने कहा के अर्जुन लगा देगा और चाबी उसकी और
उछाल दी.
"है तुम सब महारानियों का नौकर मई हे हु" अर्जुन थोड़ा जोर से ये बात बोल गया तोह ऋतू दीदी ने आँखें दिखाई.
"लो दीदी आपका बताया सब सामान आ गया." अलका दीदी को टहलिए पकड़ने के बाद वो इधर उधर देखने लगा.
"सब ऊपर है." अलका दीदी ने मुस्कान के साथ कहा तोह अर्जुन ने उनको बाहो में भर लिए. "मतलब यहाँ तोह कोई नहीं है फिर." और उनके होंठो को हलके से चूम के ऐसे हे
खड़ा था की पीछे से ऋतू दीदी की आवाज आई, "ये सब अब खुलेआम करोगे तुम दोनों? मतलब घर में कोई बड़ा नहीं तोह कही भी शुरू." आवाज थोड़ी तीखी थी लेकिन फिर
पीछे से अर्जुन के गाल को चूमती हुई कुछ सामान लेकर निकल गई.
"कहा था थोड़ा सबर रखा कर." अलका दीदी हँसते हुए बोली. "सोच अगर यहाँ तारा या Priyanka/Aarti होती तोह"
"सॉरी. बड़ा दिल कर रहा था आपको गले लगाने का. और आपने प्रीती का नाम नहीं लिए." अर्जुन सोचते हुए बोलै
"उसको क्या फरक पड़ेगा." इतना बोलकर वो भी ऊपर चल दी अर्जुन को ऐसे हे सोचते छोड़कर.
"यार ये सच में बहोत सुन्दर है." आरती दीदी प्रीती को ध्यान से देखती बोली "और भगवान् ने इसकी आँखें भी सबसे अलग हे दी है. हाय ऋ मेरी खराब किस्मत."
उनकी बात पर तारा हंसने लगी तोह ऋतू दीदी ने फिर से प्रीती को छेड़ दिए. "सुन रही है न तू. इसलिए हे तोह तू मेरी जान है." और बाकी सबकी तरफ आँख मार दी.
"वैसे सच बात है यार. मई देखती थी की कोमल और ऋतू हे घर में सबसे खूबसूरत लड़किया है. ऐसा नहीं के माधुरी दीदी, अलका, तारा या आरती किसी से काम है,
लेकिन अगर किसी एक को अगर सबसे सुन्दर कहना हो तोह वो ऋतू और कोमल हे लगती है मुझे लेकिन प्रीती को देखती हु तोह ये लगता है की शायद इसकी तोह मिटटी अलग
से बनाई होगी भगवान् ने. ऊपर से देखो तोह कही हलकी सी चर्बी कही भी हो. बस जहा होनी चाहिए वह भी परफेक्ट शेप है." प्रियंका दीदी वैसे तोह इतना
कहती नहीं थी कभी लेकिन आज उन्होंने भी अपने दिल की बात कर हे दी. और प्रीती सर झुका के बैठ गई शर्माती सी जिसको एक तरफ से ऋतू दीदी ने जकड़ा हुआ था.
"कल यही बात तोह मई कह रही थी. सच में यार बता न ऐसा कैसे है? मई लड़का होती तोह पक्का बस यही लड़की मेरा प्यार होती." तारा ने बिना झिझके हे कहा तोह
अंदर आई अलका ने बीएड पर बैठते हुए कहा, "देख सच बोलू तोह अब ये उतनी सुन्दर नहीं रही जितना हमे याद है. क्यों ऋतू?" और उनकी बात पर ऋतू दीदी ने हामी
भरी.
"ये समझ लो की एक गोरी मेम बस अब आधी हिंदुस्तानी हो गई. इनकी मम्मी तोह इस से भी कही ज्यादा सुन्दर होती थी जितना याद है. और ये बिलकुल सफ़ेद, neeli-hari
इन आँखों के साथ किसी गुड़िया जैसी थी. अब भी अगर इसका शरीर इतना कैसा हुआ और तराशा हुआ है तोह ये सब इसकी म्हणत है. रनिंग में अपना अर्जुन इस से हार
जाता है ऊपर से 2-3 घंटे टेनिस खेलती है और चंडीगढ़ में स्टेट लेवल जीत चुकी है. इतनी म्हणत हम में से कोई करती तोह काली जरूर हो जाती और ये गुलाबी
हो गई मैडम." अपनी बात शरारत से ख़तम करती वो भी प्रीती के गले में बाहे दाल उसको छेड़ने लगी.
"अब मेरी बात हो गई हो तोह कुछ और कर ले क्या दीदी?" प्रीती ने शरमाते हुए कहा तोह अलका ने फिर उसको फंसा दिए, "जो करना हो तू ऋतू के साथ कार्यो. यहाँ सिर्फ
बातें हे होंगी." उनकी बात ख़तम हुई तोह ऋतू दीदी ने भी गाल चूम लिए प्रीती के. "अहा. देख ले इसको कैसे tera-mera नाम पक्का कर रही है."
"ाचा यार बस अब कोई इसको नहीं सताएगा. प्रीती जब तू इतनी सुन्दर है, स्पोर्ट्स में भी है ऊपर से चंडीगढ़ रह चुकी तोह पक्का कोई बॉयफ्रेंड तोह होगा." तारा
ने बात को ख़तम करना चाहा था लेकिन यहाँ तोह फिर से बेचारी की बोलती बंद हो गई.
"इसको इस सब में इंटरेस्ट नहीं है रे. इसका रिश्ता पक्का हो चूका है पहले हे और इसने भी काबुल कर लिए घर का फैंसला." ऋतू दीदी को लगा के ज्यादा हो रहा है
तोह उन्होंने अब बात को ख़तम करने से ये कहा.
"वाह. मतलब यहाँ किसी का बॉयफ्रेंड है नहीं और इसका तोह रिश्ता भी हो चूका है." आरती ने थोड़ा हैरान होते कहा तोह अलका दीदी ने झट से कहा, "किसी का हो या
न हो मेरा तोह है." ऋतू दीदी ने भी हाँ कहा तोह ये उनके लिए भी नै बात थी. "ऋतू तेरा भी बॉयफ्रेंड है?" प्रियंका ने हैरानी से कहा
"जब अलका ने कहा के है तोह मान लिए. मई कह रही हो तोह क्या दिक्कत हो गई? ये प्रीती मेरी ख़ास है मतलब ये नहीं के एहि मेरी एक दुनिया है." हँसते हुए उन्होंने
ये कहा तोह प्रीती भी उनके साथ हे हंसने लगी.
"मतलब ये मॉडर्न तारा का भी नहीं और हम दोनों बहनो का भी नहीं. लेकिन तुम तीनो जो हमसे छोटी हो उनका है." प्रियंका दीदी की इस करुणगाथा पर सभी हंसने लगे
थे. "मेरा भी मिल तोह गया है लेकिन पता नहीं की उसको मई पसंद हु या नहीं." तारा ने तोह बम फोड़ दिए ये कह कर.
"अभी 3 घंटे पहले तोह इसको राजकुमार का इन्तजार था और अब वो मिल भी गया? हो क्या रहा है ये?' आरती झुंझलाती सी बोली तोह अलका ने प्रीती के कान में कहा
"ये पक्का हमारे वाला हे है. शर्त लगा ले मेरे से." बात धीमी जरूर थी लेकिन ऋतू ने भी सुन ली थी और तीनो के चेहरे पर मुस्कान तैर गई और ऋतू ने सिर्फ
इतना कहा, "कृष्ण कन्हैया."
"ये तुम तीनो क्या बात कर रही हो." तारा ने उधर ध्यान देते कहा. थोड़ी चिंता हो गई थी उसको.
"अरे बात कहा कर रही है. ये अलका हे बोली की कोई कृष्ण कन्हैया मिल गया लगता है तारा को तोह मैंने वही कहा कृष्ण कन्हैया." ऋतू ने झट्ट से बात
संभल ली थी.
"है कह तोह तुम सच रही हो. कृष्णा जैसा हे है वह." एक हलकी आह सी भर्ती वो बोली.
"ाचा चल तू अर्जुन के लिए फल काट दे ऋतू और मई सबके लिए मग्गी बना के लाती हु." अलका ये कहती कड़ी हुई तोह ऋतू ने प्रीती को जाने का इशारा किया और
वो बिना कुछ कहे अलका दीदी के साथ निचे चल दी.
"तेरा सही है. मतलब प्रीती तोह सच में जैसे तेरे दिल से जुडी हुई है." आरती ने ये कहा तोह मुस्कुराते हुए ऋतू ने भी कह दिए. "यार गहरा नाता है इस से और
प्यार भी बहोत करती है सबसे अपने यहाँ."
फिर कुछ सोच कर आरती बोल पड़ी, "ऋतू बुरा मत मानियो यार लेकिन एक बात बता के ये जो लोग प्यार व्यार की बातें करते है क्या इस सब में फिजिकल रिलेशन जरुरी
होता है?"
"मुझे ऐसा तोह नहीं लगता के जरुरी होता है. है लेकिन एक बात जरूर है के खुद के ladki/aurat होने का सम्पूर्ण एहसास तभी होता है जब प्रेमी दिल के सब तार
छेड़ दे. और मिलान सिर्फ भूख या सेक्स हे न हो. सम्मान, इज्जत और परवाह हो हर एक चुहान में तोह फिर शारीरिक मिलान किसी स्वर्ग जैसा हे लगता है."
"मतलब तू कर चुकी है क्या?" प्रियंका दीदी ने ये बात कही तोह वह हंसने लगी. "क्या दीदी, कुछ भी सोचती हो. ये सब मेरी फीलिंग्स है और कभी हुआ तोह मई
यही सब चाहती हु के मुझे महसूस हो." उसकी बात पर आरती मुस्कुरा दी और तारा भी.
अर्जुन नीचे से हे फल खा कर अपने दोस्त संदीप के घर चला गया था अलका दीदी को बोल कर ये लड़किया बस ऐसे हे 4 बजे तक बातें करती रही और हल्का फुल्का
खा लिए था इन्होने.
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"संदीप कहा है दीदी?" घंटी बजने पर ज्योति ने दरवाजा खोला तोह अर्जुन ने पुछा. उसको लगा के शायद वो गलत समय आ गया क्योंकि ये दोपहर का वक़्त था.
"अंदर तोह आ पहले या धुप में खड़ा रहेगा?" ज्योति एक मुस्कान बिखेरती उसको तमीज से अंदर लेकर आ गई.
"बैठ यहाँ मई बस ये थाली रख के आई." टेलीविज़न देखते हुए शायद वो खाना खा रही थी जो लगभग हो चूका था. गांड मटकती वो रसोईघर की तरफ चली
गई और अर्जुन उसके पिछवाड़े को देख रहा था. तभी अंदर के कमरे से संदीप तैयार हो कर वह बहार के बैठक वाल्के कमरे में पंहुचा.
"तू घंटी क्यों बजता है भाई, तेरा भी तोह घर है." वो उसके पास हे बैठ कर बोलै. जूते, कमीज और जीन्स पहने वह कही जाने को तैयार सा लग रहा था.
"हम कही जा रहे है क्या?" अर्जुन ने पुछा उत्सुकता से तोह वो मुस्कुरा कर धीरे से बोलै, "भाई छोटा सा काम है बस अभी आ जाऊंगा. तू यही बैठ."
"चारु के पास?" अर्जुन ने इतना कहा तोह वो मुस्कुरा दिए.
"भाई तू आ गया न तोह मुझे घर पे दांत नहीं पड़ेगी की घर पर दीदी को अकेले छोड़ गया. मई बस 1 घंटे तक आ जाऊंगा तू इतने यही रह. प्लीज." उसकी बात
पर कुछ सोचते हुए बस उसने हां कह दिए. और संदीप उसको गले लगाने के बाद बोलै, "दीदी कुछ पूछे तोह बोल डीओ के एक दोस्त तक गया है अभी आ जायेगा."
और वह वह से निकल लिए बिल्ली के सिरहाने दूध छोड़कर.
उसके जाते हे अर्जुन ने देखा के रसोईघर के बहार दिवार से लगी ज्योति मुस्कुरा रही है. फिर वो उसके सामने से चलती हुई बैठक का दरवाजा बंद कर उसकी गौड़
में आ पसरी.
"कितनी देर का बोलकर गया है वह?
"एक घंटा काम से काम. वैसे उसको आने जाने में इतना टाइम लगेगा." अर्जुन ने खुद पहल करते हुए उस बिंदियो वाले सूट के कमीज के ऊपर से हे दोनों बड़े खरबूजे
पकड़ लिए. "आज तोह मेरा शेर भी जोश में है." और ज्योति उसके गले पर जीभ फिरने लगी. अर्जुन ने भी कमीज के अंदर नीचे से हाथ दाल कर दोनों दूध पकड़
कर दबाने शुरू कर दिए. "चल अंदर चलते है." इतना ज्योति ने कहा तोह अर्जुन ने उसको गौड़ में हे उठा लिए और अंदर बीएड पर पटक कर एक झटके में पजामी अलग
कर दी. वो बिस्टेर पर पड़ी मुस्कुराती उसको देख रही थी. सांवली ज्योति का हर अंग भरा भरा था. मांसल जाँघे चिकिनी मुलायम थी. अर्जुन उसको देखते हुए हे
अपनी जीन्स नीचे सरकने लगा. "ला ये मई करती हु." आगे बढ़ कर ज्योति ने उसका कच्चा निचे किआ तोह gulaabi-laal लुंड पूरे जोशी में उसके मुँह से आ लगा.
"पहले से हे तैयार है ये तोह." हाथो में पकड़ कर वो उसकी आँखों में देखती बोली तोह अर्जुन ने निचे झुक कर उसका कमीज का सीरा दोनों तरफ से पकड़ लिए. "उतार
दे रे ये ले." अपने हाथ ऊपर करती ज्योति ने खुद हे उसका काम आसान कर दिए. यहाँ वो एक घिसी हुई सफ़ेद ब्रा और एक पतली काली कच्ची में थी. उसके सांवले मॉटे
उभार ब्रा में झूल रहे थे और इधर अर्जुन का लुंड मजे की शिद्दत से और फूल रहा था. अपनी गांड उठा के ज्योति ने वो कच्ची निकलने की कोशिश की तोह अर्जुन
ने कूल्हों के निचे से उसको पकड़ कर खींच लिए. छूट पर हाथ रख के सहलाते हुए वह ऐसे हे ज्योति के ऊपर हो गया और दोनों एक दूसरे के होंठ पागलो की तरह
चूसने लगे. लुंड को छूट की दरार में रगड़ते हुए अर्जुन को छूट के गीलेपन का एहसास हुआ. वो पूरी पनिया सी गई थी.
"नीचे तोह बड़ी गीली हो दीदी" उसने अपना चेहरा उठाते हुए कहा तोह ज्योति पूरी बेशर्मी से बोली, "तेरे हे इसको देख के गीली हुई है. अब कर दे इसको ठंडा नहीं
तोह फिर और बुरा हाल हो जायेगा." टाँगे पूरी खोल के अर्जुन की कमर से लपेट ते हुए वह फिर से उसके मुँह को चूमने लगी. इधर अर्जुन ने वो ढीली सी ब्रा ऊपर
करते हुए दोनों बड़े चुके आजाद कर दिए थे जिनको वह अब ाचे से मसल रहा था. "सेह लोगी न मेरा?" एक बार फिर पूछते हुए उसने अपना हाथ नीचे करते हुए
लुंड छूट के छेड़ पर टिकाया जो बुरी तरह से तपने लग रही थी.
"जान भी लेले मेरी लेकिन ये तेरा डंडा अंदर दाल दे रे और मेरी परवाह किये बिना बस जी भर के छोड़ मेरी इस मुनिया को." वो बिलकुल देसी भाषा में बोलती अपनी
छूट उचकने लगी थी लेकिन लुंड का मोटा सूपड़ा ऐसे तोह जाना नहीं था अंदर.
उसके होंठ मुँह में दबाते हुए अर्जुन ने लुंड पकडे हुए हे अपनी कमर जरा तेजी से आगे बढ़ा दी. चुतरस से भीगा मोटा सूपड़ा गच्छ से उस मुलायम गरम छूट में
धस्स गया. एक पल के लिए ज्योति तदपि लेकिन अर्जुन ने एक और धक्का साथ में हे जड़ दिए. आधे से ज्यादा लुंड अब उसकी छूट में कास गया था. ऐसे हे रुक कर उसने
अपनी हथेली में दोनों दूध दबाते हुए ज्योति के होंठ चूसने जारी रखे. वो कसमसाई थोड़ी देर फिर शांत हो गई.
"मार दिए रे तेरे इस लौड़े ने. आह पेट दुखने लगा इसकी मोटाई से." होंठ अलग होते हे ज्योति शिकायत और दर्द से बोली लेकिन अर्जुन बस उसका एक भूरा निप्पल मजे
से चूसक्ता रहा. 2 मिनट बाद हे छूट में गीलापन आने लगा तोह वो भी सिसकने लगी और टैंगो को हल्का ढीला फिर सख्त करने लगी.
"करू?" अर्जुन ने आँखों में देखते हुए कहा तोह ज्योति भड़क गई, "तो क्या सिर्फ यही डालने के लिए अंदर ठोका है. फाड़ दे न इस कामिनी को."
अर्जुन ने 3 इंच लुंड बहार खींचा जिस से उसको हल्का सा दर्द हुआ और वापिस अंदर पेल दिए.
"आह अब बीच में कुछ न बोलियों रे. करता रह है ऐसे हे." अपने दोनों दूध खुद हे दबती वो बोली तोह अर्जुन अब 5-6 इंच तक गहरे धक्के लगाने लगा था. हर
धक्के पर वो खरबूजे हिलते तोह उसको और मजा आने लगता. अपने हाथ ज्योति की मोती गांड के निचे रख कर उसने छूट को और ऊपर उठाने के बाद एक कास के धक्का
लगा दिए. लुंड चाक़ू की तरह चीरता वह तक चला गया जहा पिछली बार नहीं गया था.
"मर्डर गई मम्मी. निकाल ले रे तेरा मूसल... आई मेरी माँ. नहीं छुड़वाना.." दर्द में ज्योति हाथ पेअर पटकने लगी तोह अर्जुन उसका एक दूध दबाता छूट के नीचे
गांड के छेड़ को कुरेदने लगा. चुदाई तोह एक पल के लिए रुक गई थी लेकिन ज्योति बोलने के बाद भी छूट में लुंड लिए पड़ी रही. जब थोड़ी शांत हुई तोह अर्जुन
ने उस 5 फ़ीट की लड़की को ऊपर उठा लिए लुंड छूट में फंसाये हुए हे. ऐसे खड़े हो के एक हाथ पीठ पर रखे वो खुद से चिपकाये वो उसके मुँह को चूम रहा था
और दूसरे हाथ से उसकी गांड की दरार में पूरा पंजा फंसाये था. अपनी बाहे उसकी गर्दन में जकड कर ज्योति ने हिम्मत कर के खुद हे गांड चलनी शुरू की तोह
एक तिहाई लुंड अंदर बहार होने लगा जो उसकी बच्चेदानी तक ाचे से ठोकर मार रहा था. मुश्किल से 4-5 मिनट हुए थे के उसकी बस हो गई.
"Aaahh..mai गई रे अर्जुन.. मजा आ रहा है." वह गिरने को थी तोह अर्जुन ने उसको पकड़ के बीएड पर लिटा दिए. एक पल के लिए लुंड बहार निकल उसको घोड़ी की तरह
करके गीली छूट में फिर से जड़ तक लुंड थोक दिए. "जालिम इंसान.. आह ाचे से मजा.. आह तोह लेने देता." लेकिन अर्जुन बिना कुछ बोले पीछे से उसके दोनों थांन
पकड़के उसको तगड़े झटके देते हुए कास के पेलने लगा. हर धक्के के साथ वह आगे को हो जाती तोह वह उसके दूध खींचता पीछे कर फिर से सुपडे तक लुंड निकाल
वापिस पेल देता था. "दीदी सच में गजब की है तुम्हारी. इतनी गरम और टाइट है जैसे बस मेरे लुंड के नाप से हे बानी है." अब उसके दोनों हाथ ज्योति के कूल्हों की
दोनों फांके अलग करते हुए लुंड को और गहराई में ठेलने लगे थे. एक bhoora-gulabi सा सिलवटों वाला छेड़ ाचे से दिख रहा था अर्जुन को. अपना हाथ छूट पर
2-3 बार फिर कर उसने अपनी पहली ऊँगली गीली करते हुए उस छेड़ के ऊपर धीरे धीरे चलनी शुरू की तोह ज्योति की सीत्कार मजे की अधिकता से और तेज हो गई थी.
लटकते चुचो पर नीली नसे भी नुमाया होने लगी थी जो बता रही थी की वो चरम पर है. और अगले हे पल ऊँगली गांड के छेड़ में आदि बैठ गई थी.
"कमीने क्यों सत्ता रहा है? और ये कहा ऊँगली फंसा दी रे निकल जलन हो रही है." उसकी बात अनसुनी करता अर्जुन धीरे धीरे ऊँगली bahar-andar करने लगा और
छूट के अंदर तक अपना लुंड घुसता रहा.
"आह अब मजा आ रहा है. करता रह रे ये तोह बड़ा अलग मजा आ रहा है. कहा से सीख लिए ये सब." अब खुद हे ज्योति गांड उचकाने लगी थी.
"दीदी, यहाँ करवाऊंगी?" अर्जुन ने वैसे हे धक्के लगते हुए पुछा.
"तू जहा कहेगा करवा लुंगी रे. लेकिन आज सिर्फ आगे कर, मंगलवार को घर में कोई नहीं रहेगा तू आ जैव. आह.. अभी बस.. आह मेरी मुनिया का ध्यान रख."
इतना सुनते हे अर्जुन ने अब ऊँगली बहार निकल ज्योति को वापिस पीठ के बल कर दिए और दोनों टंगे खोल के पूरा लुंड जड़ तक अंदर बहार करना शुरू कर दिए था.
नीचे झुक के उन फुल्ले हुए चुचुक को ाचे से दबा के पीते हुए वह तेज तेज धक्के मरता रहा. उसका लुंड भी फूलने लगा था. मजे की अधिकता में एक 2 जगह
से दूध को काट भी लिए लेकिन दोनों हे लगे रहे. जब ज्योति की छूट में तेज संकुचन होने लगा तोह वो चीखने सी लग गई और यही अर्जुन भी किसी पागल सांड
की तरह तूफानी गति से छूट को उधेड़ने लगा था. जैसे हे छूट ने पानी बहाया अर्जुन ने भी लुंड बहार निकाल कर छूट के होंठो पे 2-3 घिसाई कर दी.
ज्योति के थोड़ी पर पहली सफ़ेद गरम पिचकारी की धार जा लगी और अगली चुचो के बीच में. ऐसे हे तक़रीबन 15 सेकंड तक सफ़ेद लावा उसके शरीर पर बिखेर कर
अर्जुन साथ में बिस्टेर पर लेत गया और साँसे दुरुस्त करने लगा.
"तू असली मर्द है रे. कसम से आह.. ऐसे कास बल ढीले करता है.. आह के एक तरफ दिल करता है के कभी तेरे पास नहीं जाउंगी.. आह लेकिन ये निगोड़ी.. इसको तू
हे पसंद है रे." अपनी कच्ची से सारा वीर्य साफ़ करती वह कपडे पहन कर उसके होंठ चूम बाथरूम चली गई. 3 बज चुके थे तोह अर्जुन ने भी खुद को दुरुस्त किआ
बाथरूम से आती ज्योति के चुके ाचे से हिल रहे थे, जैसे नरम होने लगे हो और टाँगे भी चौड़ा गई थी.
"कमीने पेशाब करते हुए भी जान निकल रही है. और ये तू क्या कह रहा था के कहा करना है?" वो पास बैठ टी बोली तोह अर्जुन ने फिर से उसकी गांड के नीचे
हाथ घुसेड़ते हुए नरम मांस पकड़ते कहा, "यहाँ जो छेड़ है वह. मैंने एक किताब में देखा था तोह मेरा दिल है की आपके इन गोल मटोल कूल्हों के बीच एक बार
मई भी कर के देखु."
"ोये पागल. यहाँ आगे तोह मैंने कभी ऊँगली और मोमबत्ती करि थी तोह तेरा लेने को तैयार हो गई लेकिन उस जगह अगर ये गया तोह पता है के बैठने लायक भी
नहीं रहूंगी. और कहा पढ़ी थी वो किताब तूने? कही इस संदीप के बचे के काम तोह नहीं जो ये उलटी सीढ़ी शिक्षा तेरे दिमाग में भरने लगा हो.?" अरजुन वह
से उठकर संदीप के कमरे में गया. उसको उम्मीद थी की वो किताब शायद अब भी वही होगी और वो वही मिली जहा छुपाई थी.
"ये देखो न दीदी" उसने वो रंगीन किताब का वही पन्ना ज्योति के सामने कर दिए जहा अंग्रेज लड़की गांड में हब्शी का लुंड लिए थी. ज्योति ने किताब को खुद पकड़
के देखा और हैरान होते वो चित्र देखने लगी. लड़की की गांड तोह उसके बराबर हे मोती थी. लुंड भी अर्जुन जैसा था उस काले आदमी का जो आधा गांड के चले
के अंदर फंसा हुआ था. पन्ना पीछे करते हे उसको 4 चित्र और दिखे. जहा वो फिरंगी लड़की कला मोटा लुंड मुँह में ले रही थी, एक में वो उसकी छूट चाट रहा था,
एक जगह वो एक लुंड चूसती एक छूट में लिए थी और सबसे नीचे वाले में गांड, छूट और मुँह में लुंड भरे हुए थे.
"ये सब क्या है रे? कैसे कर लेती है ये? मई तोह तेरे इस एक से हे मर्डर गई लेकिन ये छिनाल तोह 3-3 खा रही है."
"प्रैक्टिस है दीदी. लेकिन आपको 3 लेने की जरुरत नहीं मई अकेला हे बहोत हु."
"ओह मई भी ऐसी नहीं के तेरे सिवा किसी को हाथ लगाने भी दू. तू हे है जो इसका मालिक है और फिर मैंने वडा कर दिए मंगलवार का तोह पक्का है. बस सुबह घर
आ जैव 11 बजे तक." फिर कुछ देर दोनों प्यार भरी चुहल करते रहे. कभी वो दूध दबाता तोह कबि ज्योति उसकी गॉड में बैठ कर चूमने लगती. कोई आधे घंटे
बाद जब संदीप ने घंटी बजाई तोह अर्जुन ने बहार जा कर गेट खोला इधर ज्योति बैठक में टेलीविज़न के सामने बैठने का दिखावा करती रही. दोनों दोस्त संदीप
के कमरे में घुस गए और फिर आधे घंटे बाद अर्जुन घर निकल लिए.