Incest Pyaar - 100 Baar - Page 4 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 27

पवित्र मिलान


कॉलेज के सामने पहुंचकर अर्जुन ने समय देखा तोह अभी भी 5 मिनट थे लेकिन लड़किया बहार आ रही थी. कुछ हे देर में सर पर दुपट्टा किये ऋतू दीदी

भी अपनी सहेलियों के साथ आती दिखी. ऋतू दीदी ने हाथ हिलाकर दूर खड़े अपने भाई को अपनी तरफ बुला लिए.

"ये लड़के को तू कैसे जानती है ऋतू?" एक सहेली ने ये बात की तोह ऋतू ने उसकी तरफ प्रश्न भरी नजरो से देखा.

"मुझे तोह ये कोई चालु लड़का लगता है. मिनाक्षी उस दिन यही था न कैंटीन में जो अलका के साथ भी था?" उस लड़की ने एक और साथ कड़ी लड़की से कहा

"है है तोह वही लड़का लेकिन कुछ भी कह पसंद तोह मुझे भी है वो." वो खिलखिला उठी और ऋतू हल्का हंसने लगी.

"तू क्यों हंस रही है?"

"देख मेरे और अलका में कुछ भी अलग नहीं है." उनको चक्कर में उलझा छोड़ वो स्कूटर पर बैठ गई और जाते जाते आँख मार गई.

"यार इनका सही है. दोनों एक हे लड़के के साथ." वो लड़की अपनी सहेली से बोलती हुई सदमे सी हालत में थी.

.

.

"दीदी, बड़ा मुस्कुरा रही हो. क्या बात है?"

"कुछ नहीं रे बस सहेलियों के साथ मजाक की बात थी." ऋतू दीदी इतना बोलकर थोड़ा आगे खिसक के चिपक सी गई अर्जुन से. वो उसको भी नहीं बताना चाहती

थी उसके और अलका के बीच की बात..

"तोह कोनसी फिल्म देखि तूने?" ऋतू दीदी के इस सवाल ने अर्जुन को एक बार तोह सोचने पर मजबूर कर दिए फिर उसने सँभालते हुए कहा, "वो वही वीडियो गेम

की दूकान थी तोह मई गेम हे खेलने लगा. टाइम देख कर यहाँ आ गया." अर्जुन झूठ नहीं बोलता था लेकिन ऐसी फिल्म का नाम भी अपनी दीदी के सामने नहीं

लेना चाहता था.

"ाचा किआ. वैसे अब का क्या प्रोग्राम है तेरा?" अपने भाई की कमर पर हाथ फेरते हुए हे ऋतू दीदी ने पुछा.

"घर जा कर आराम करूँगा. फिर फल खाने के बाद स्टेडियम. वह से आने के बाद जो आप बोलो."

"ठीक है तोह फिर आज की शाम मेरे साथ. अगले 3 दिन तक पेपर नहीं है. और अलका का भी परसो हे है."

"जैसा आप कहो, दीदी. मई तोह खुद चाहता हु आपके साथ और आसपास रहना." अर्जुन की बात सुनकर ऋतू मुस्कुरा दी.

"क्यों रहना चाहता है मेरे पास?" शरारत से ये बात कही तोह अर्जुन ने वैसे हे कहा, "अब आप हो हे इतनी खूबसूरत के दिल करता है आपको साथ में हे राखु.

कही जाने न दू दूर आपको." अर्जुन की बात सुनकर ऋतू दीदी ने उसकी गर्दन चूम ली पीछे से और फिर सीढ़ी हो कर बैठ गई. ऐसे हे दोनों घर आ गए.

.

.

"तोह जनाब का कार्यक्रम व्यस्त हे है छुट्टियों में?" ये छोल साहब थे जो आँगन में रामेश्वर जी के साथ बैठे थे.

"ऐसा कुछ नहीं छोटे दादू. वो आज दीदी का पेपर था तोह साथ गया था. स्कूटरी नहीं आती न उन्हें." आँगन में बैठते हुए हे कहा

"प्रीती बीटा." उन्होंने आवाज दी तो अंदर से प्रीती दौड़ती हुई सी आई. उसके हाथ में कुछ लगा था शायद आता.

"ऋतू को तुम सुबह स्कूटरी सीखा दिया करो. सड़क तोह हमारे घर के सामने खली हे होती है. जब हाथ बेहतर हो जाये तोह पिछले ग्राउंड चले जाना.

साइकिल तोह आती हे है उसको. ये लड़का अपना समय ऐसे कामो में लगाएगा तोह काम नहीं बनेगा. आराम भी देना है थोड़ा इसको."

"जी दादू. कल से सुबह मई सीखा दिया करुँगी." इतना बोलकर वो वापिस अंदर चली गई.

"ले मेरे बचे. अब बता और क्या आराम दिया जाए?"

"और मुझे क्या आराम करके करना है?" अर्जुन ने इतना कहा तोह अब रामेश्वर जी ने एक कार्ड उसके सामने कर दिए. "यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी कार्ड"

"ये तुम्हारा अगला ठिकाना है बीटा. सुबह 9:30 से 12 तक. और ये यही सामने हे तोह है सेक्टर के. मुश्किल से 2 कम. सब्जेक्ट्स की लिस्ट तुम्हे गुरुवार को

दूंगा. 2 दिन कर लो आराम." छोल साहब ने इतना कहा तोह अर्जुन को उनकी मेहरबानी की वजह समझ आ गई.

"देखो जब समय है तोह उसका सदुपयोग करना चाहिए. फिर तुम्हे आगे पढ़ाई में दिक्कत नहीं आएगी. जिस सब्जेक्ट पर पकड़ ाची बनेगी वही ले लेना. और

शंकर से मई बात कर लूंगा. तुम्हे सिर्फ दिए गए सब्जेक्ट्स में से जो पसंद आये वही ग्याहरह कक्षा में लेना. " छोल साहब ने बड़े प्यार से समझाया.

"हांजी. मई तैयार हु." अर्जुन ने भी सकरात्मक जवाब दिए.

"चल फिर जा कर आराम कर और फिर स्टेडियम भी जाना है." रामेश्वर जी ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा.

.

.

रसोईघर का तोह नजारा हे आज अलग था. कौशल्या जी सब्जी चला रही थी और प्रीती रोटियां बैल भी रही थी और सेक भी. एक कढ़ाई प्लेट से

ढंकी राखी थी साइड में. प्रीती के गोर चेहरे पर पसीना आया हुआ था जो उसकी म्हणत बता रहा था. बीच बीच में दादीजी आते के गोले बना

कर उसको दे रही थी.

"ये आपने सही किआ दादी जी. एक कामवाली की सख्त जरुरत थी घर में." ऋतू दीदी ने व्यंग कैसा तोह प्रीती सिर्फ मुस्कुरा दी पलट कर.

"बीटा तू तेरी फ़िक्र कर. काम से का ये काम तोह सीख रही है तू क्या खिलाएगी अपने पति को?" उनकी बात सुनकर प्रीती के हाथ अपनी जगह रुक गए.

और ये बात ऋतू दीदी ने भी देख ली. "जो ये खिला देगी मई भी वही खिला दूंगी." इतना कह कर ऋतू भी प्रीती के पास बैठ गई और दादी वह से

कड़ी हो गई रामेश्वर जी और पूरी जी को बुलाने के लिए. वो दोनों अंदर आये तोह माधुरी दीदी टेबल पर प्लेट्स लगाने लगी और कोमल दीदी खाना

परोसने लगी. "अरे मेरी बच्चियां इतनी बड़ी कब हो गई." छोल साहब ने दोनों की तरफ देखा जहा प्रीती रोटी सेक रही थी और ऋतू दीदी बैल रही थी.

"भाई साहब इनको कुछ काम करने दो अगले घर पता नहीं क्या गुल खिलाएंगी. " कौशल्या जी की बात सुनकर छोल साहब रामेश्वर जी की और देख मुस्कुरा

दिए और वह भी हंसने लगे. इनकी बातें ये हे जाने. फिर ऐसे हे सबने खाना खाया और अंत में प्रीती जब उठी तोह पूरी भीग चुकी थी. "चल बीटा

तुम दोनों भी खाना खा लो. और उस नवाब को भी कोई बुला लाओ. दिन में हे सोता रहता है."

"मई बुला लाती हु दादीजी." प्रीती बिना सुने खुद ऊपर चढ़ गई दूसरी मजिल पर. और देखा तोह अर्जुन तकिये को बाहों में लिए सोया पड़ा था.

"उठो और खाना खा लो. सब बुला रहे है." प्रीती पास बैठ कर जागते हुए बोली तोह अर्जुन ने नजर उठाई और फिर उसको खींच लिए अपने हे ऊपर. "ाचा

तोह फिर खिला दो." बड़ी मासूम शकल बना कर उसने प्रीती को अपने ऊपर लिटाये हुए हे कहा.

"ऐसे कैसे खिला दू? निचे चलो और हिम्मत हो तोह वह कह देना फिर मई भी खिला दूंगी." प्रीती ने इतराते हुए कहा तोह अर्जुन ने प्रीती को थोड़ा झुका

कर उसके लाल होंठ मुँह में ले लिए. कोई 10 सेकंड बाद छोड़ा तोह वह छाती पे हलके से मारते हुए जाने लगी. "सुनो. वो ये सब सिर्फ तुम्हारी महक की

वजह से हुआ था. सोचा थोड़ी खुद पे लगा लू." "धत्त. पागल कही के." कुछ देर बाद अर्जुन निचे आया तोह ऋतू, अलका और माधुरी दीदी के साथ प्रीती

खाना खाने लगी थी. कोमल दीदी खा चुकी थी. "मुझे कोण खिलायेगा?" अर्जुन की बात का इशारा समझ प्रीती तोह मुँह निचे कर बैठ गई. अलका दीदी ने

रोटी का टुकड़ा बनाया और हाथो से अर्जुन को खिलाया. "अरे मई हु न. ऐसे हे खिलाऊंगी साड़ी उम्र तू बोल बस." उनकी द्विअर्थी बात सुनकर ऋतू दीदी भी

प्रीती को कोहनी मारने लगी. माधुरी दीदी खाली प्लेट लेकर चली गई तब ऋतू दीद बोली, "वैसे जिसने रोटी बनाई हो एक बार उसको भी मौका देना चाहिए"

"है है. क्यों नहीं." अर्जुन ने ये बात कही तोह ऋतू दीदी अपनी जगह से उठ कर एक निवाला अर्जुन को खिलने लगी. "रोटी मैंने बनाई थी." प्रीती ने शर्माते

हुए कहा. "है तोह मैंने तोह पहले हे कहा था के जिसने बनाई है वह भी खिला सकता है. मैंने कब कहा के मैंने बनाई है." अलका और ऋतू हंसने लगी.

शरमात हुए एक निवाला प्रीती ने अपनी प्लेट से अर्जुन के मुँह की तरफ बढ़ाया. "ऐसे कोण खिलता है? मुँह में दाल ने इसके" अलका दीदी की बात सुनकर प्रीती

ने डरते हुए निवाला आगे किआ लेकिन अर्जुन ने सिर्फ निवाला खाया. वो प्रीती को सबके सामने आराम से खाने देना चाहता था. "देख लिए. क्या हुआ?" फिर हँसते

हुए सबने खाना खाया. अर्जुन ने अलग से नहीं खाया था. बस 4-5 निवाले खा कर वह उठ गया. "ाचा अब तैयार होता हु. आप लोग अपना काम कीजिये फिर शाम

को मिलूंगा." तैयार होकर अपने फलो की प्लेट खाने के बाद वह कुछ हे देर बाद स्टेडियम निकल चला.

"गयम से सीधा मेरे पास आना." कोच ने बलबीर के साथ जाते अर्जुन से कहा. आज स्टेडियम में बड़ी रौनक सी थी. शायद कोई प्रतियोगिता चल रही थी वह.

दोनों गयम की तरफ चलने लगे तोह बलबीर ने कहा, "आज बास्केटबाल के फाइनल्स चल रहे है. कुछ देर तक परिणाम आ जायेगा. गयम तोह खली मिलेगी.."

"ाची बात है न भैया. आराम से कसरत करेंगे." अर्जुन की बात से बलबीर थोड़ा मायूस था. और हुआ भी कुछ ऐसा हे. मैच तोह लड़कियों के थे लेकिन

यहाँ तोह लड़के भी नहीं थे. "ये क्या ये तोह बिलकुल खाली हे है." अर्जुन ने कहा तोह बलबीर बोल हे पड़ा. "भाई कोच साहब का बस चले तोह हमारे आगे

धागा हे बांध दे. देख सब खेलो के विभाग आज छुट्टी पर है सिवाए बॉक्सिंग के." बलबीर की बात से अर्जुन को भी ध्यान आया के प्रीती भी तोह नहीं आई.

दोनों हे कसरत करने लगे. आज वह भुजाओ (बाइसेप्स) की वर्जिश भी कर रहे थे. बलबीर कहने को पतला था लेकिन बाजू पर मछलिया पूरी निकलती थी. "ये

मेरे कब आएँगी ऐसी हे?"

"तेरे है तोह सही भाई, लेकिन साइज ज्यादा है तेरा तोह थोड़ा टाइम लगेगा निखार आने में. तब देखना यहाँ अपने विभाग में सबसे बड़े डोले तेरे हे होंगे."

ऐसे हे दोनों पसीना बहते रहे. कुछ देर बाद दोनों वापिस अपने मैदान में थे. "बलबीर, चलते हुए अभ्यास किआ था न तुमने?"

"जी कोच साहब कर चूका हु कोई 20-25 बार तोह." उसकी आवाज से नाराजगी झलक रही थी. कोच साहब भी भांप गए.

"ाचा तोह आज तुमने ये पूरी पट्टी का एक चक्कर करना है फिर तुम दोनों आजाद आज के लिए." इतना सुनते हे वो चहक उठा. उसने फिर अर्जुन को समझाया

की कैसे चलते हुए हे पोजीशन बदल बदल कर पंच करना है और लगातार चलना है. कही भी मुक्का धीमा या दिशाहीन नहीं जाना चाहिए. करके दिखने

के बाद दोनों स्टेडियम के किनारे बानी पट्टी पर अभ्यास करते चलने लगे. अर्जुन को इसमें मजा आ रहा था. उसके उलट बलबीर सिर्फ आधे मैं से कर रहा था.

दोनों दूर निकल आये तोह बलबीर बस ऐसे हे कर रहा था और इधर उधर देख रहा था. जैसे हे बास्केटबॉल के ग्राउंड के पास आये तोह वह बहुत साड़ी

लड़किया और उनकी राज्यस्तरीय टीम के प्रतिनिधि आये हुए थे. सभी छोटी स्कर्ट और टाइट टीशर्ट में अपने नंबर के हिसाब से प्रदर्शन दिखा रही थी.

अर्जुन सबसे बेखबर बस हवा में मुक्के चलता, पैरो के तालमेल को ध्यान में रखता किसी कुशल नर्तक की तरह चला जा रहा था. बलबीर कहा रह गया

कुछ पता हे नहीं था. लेकिन कोच साहब तोह दूर से हे उसको देख कर मुस्कुरा रहे थे. "बलबीर तू 2 साल से है यहाँ और ये लड़का आज हे तेरे से आगे

चल दिए. सही बात है शेर का बचा शेर और गीदड़ का गीदड़ हे रहेगा." अपने आप से कहते वह एक बार फिर अर्जुन को निहार कर पार्किंग से अपना स्कूटर

ले चल दिए.

"भाई चल अब वह चलते है." पीछे से लगभग भागता हुआ अर्जुन तक आया जो अब बस खड़ा सांस ले रहा था. बलबीर की बात मानते हुए वो उस तरफ

चल दिए.

"के ों मंजू 3 पॉइंटर दिखा तेरा." कोर्ट के बहार से हे मंजूबाला की सहेलिया उसके नारे लगा रही थी. वो 6 फ़ीट की लड़की भी कमाल हे खेलती थी

और आज भी ऐसा हे दिखा रही थी. फाइनल इम्तिहान में 3 थ्रो हर लड़की को मिलने थे हरयाणा राज्य की टीम के सिलेक्शन में और 5 लड़कियों में से 2 हे

सेलेक्ट होने वाली थी. सभी टक्कर की थी लेकिन 3 लड़किया अपने 2 थ्रो में से 2 बास्केट दाल कर आगे थी बाकी 2 के सिर्फ एक हे डेल थे. उन तीनो में से

एक का चूक गया क्योंकि अब दुरी भी भाड़ा दी गई थी जाली से खिलाड़ी की. यही समय था जब बलबीर जैसे लड़के उनके जाँघे निहार रहे थे और अर्जुन

अपनी जगह से उठ कर चिल्ला दिए. ब्रेथ, फोकस एंड शूट.. यू कैन दो आईटी." बॉल हाथ में लिए मंजूबाला ने एक बार अपने इस नए प्रशंशक की तरफ

देखा और मुस्कुराकर नजर नीचे कर ली. आँखे बंद, खोली, निशाना साधा और सीधा जाली के अंदर. ये तोह उसने भी नहीं सोचा था. खुसी से उछाल

हे पड़ी वो. उसके बाद वाली लड़की ने ये मौका छोड़ दिए और मंजूबाला सर्वोच्च अंक लेकर पहले स्थान पर रही. उसके साथ की दोनों लड़कियों को एक एक बार

और चांस मिला क्योंकि उनके अंक बराबर थे. लेकिन मंजूबाला वह अपना नाम लिस्ट में देखने के बाद बाहर निकल आई. कुछ देर बाद उसने कपडे बदल

लिए थे और अब वो चेरा साफ़ करके दूर से अर्जुन को देख रही थी जो सिर्फ वह बलबीर की वजह से बैठा था. पानी पीने का बोलकर अर्जुन जान छुड़ा

कर निकला वह से. उसकी बोतल बॉक्सिंग के मैदान में थी. "रुक तोह सही जरा. कहा भगा जा रहा तू." पीछे से आती मंजूबाला को देख अर्जुन ने चाल

बिलकुल धीमी कर दी. "बड़ा जोश है तेरे में तोह. मई तोह सोच रही थी तू बस सूखा पटाखा है. सबके सामने हे मंजू बोलने लगा." वो बोल तोह रही

थी जैसे वह अर्जुन को डांटना चाहती हो लेकिन आज उसके शब्द साथ नहीं दे रहे थे. "वो क्या है न मई ज्यादा घुमा फिर के बात नहीं करता. आप एक

ाची खिलाडी होने के साथ साथ एक ाची लड़की भी है. आपकी शुरुवात की दांत में नसीहत थी, मैंने मान ली. लेकिन दोनों है तोह यही एक हे स्टेडियम

में. फिर क्या गुस्सा और क्या नाराजगी." अर्जुन ने ये बात बड़े आराम से कह दी और उस लड़की के पास कोई जवाब नहीं था. "वो फिरंगी कोण है? उसके साथ तू

बहार भी बात करता जा रहा था." मंजूबाला थोड़ा जज्बाती होकर बोली. "दोस्त है मेरी, बचपन की 4 साल की उम्र से साथ हे खेले है. घर भी साथ

में है." अर्जुन ने ये बात कही तोह मंजूबाला कुछ देर सोचती रही फिर बोली, "इतना साफ़ दिल का होना भी नुक्सान है यार." अपनी पानी की बोतल लेकर पहले

उसने मंजू को पुछा तोह उसने ऊपर से एक घूँट ली. कुछ पानी उसकी टीशर्ट के बीच की लाइन में गिरा और कुछ थोड़ी पर बूँद सी बन गया. उसकी तरफ

देखते हुए अर्जुन ने एक घूँट ली. "हॉस्टल में हो?" "हाँ यार अब मेरे शहर से तोह रोज आ जा नई सकती तोह यही कॉलेज है और यही हॉस्टल."

कही कोई नजर नहीं आ रहा था. 5:30 पर हे स्टेडियम का ये भाग वीरान था. दोनों एक सीढ़ी पर बैठे ऐसी हे बातें कर रहे थे की बोतल का ढक्कन

घूमते हु अर्जुन से वह चूत गया. "संभल के." कहती हुई मंजूबाला जाकर उस ढक्कन को उठाने लगी तोह उसकी V-shape टीशर्ट से उसके उभार अंदर

तक अर्जुन को नुमाया हो गए. किसी टेनिस बाल जितने बड़े और एकदम सख्त जान वह उभर आधे कप की टाइट ब्रा में क़ैद थे. अपनी तरफ उसको यु देखता प्

जब मंजू ने अपनी गर्दन से निचे झाँका तोह झट्ट सीढ़ी हो गई. "बता नहीं सकता था क्या?" उसने शर्म और हलके गुस्से से कहा. चेहरा भी लाल हो गया

था. "अगर बताता तोह पक्का मार खता. क्या कहता?" अर्जुन ने हल्का मुस्कुरा कर कहा तोह वह भी हलके से मुस्कुरा दी.

"फिर भी देखना नहीं चाहिए था. ऐसी शिक्षा दी घर वालो ने." हल्का प्यार से झाड़ते हुए उसने बोलै.

"घर वालो ने तोह कहा के ाची चीजे हे देखो. अब बताओ के वह क्या बुरे थे?" अर्जुन आज जैसे हाजिर जवाब हो रहा था वैसा तोह वो कभी भी न था.

"मुझे क्या पता." मंजू को कुछ न सूझा तोह कंधे उचका कर बस यही कहा. "फिर आइंदा मत कहना क्यों देख रहा था." उसने खड़े होते हुए कहा तोह

वो हैरानी से उसकी तरफ देखने लगी जैसे बोल रही हो के नाराज हो गया क्या. "अरे टाँगे सीढ़ी कर रहा हु. और मुझे जवाब नहीं मिला." अर्जुन की

बात सुनकर मंजूबाला ने प्यार से उसका हाथ पकड़ अपने साथ बिठा लिए. "अरे हो चिकने घड़े. मई यही बैठी हु देख. बुरा लगता तोह जाने से पहले

कान लाल करके जाती तेरा. कइयों के करे है मैंने पूछ लिओ स्टेडियम में किसी से भी. तू उन जैसा नहीं है. और जो तू इतनी देर से ये सब बोल रहा है

मुझे भी पता है क्यों बोल रहा है. मई अपना ध्यान सारा दिन की म्हणत से हटा के हलकी हो जाऊ." और अर्जुन की ब्याह उसने कास के थाम ली.

"मतलब अब तुम्हे भी पता चल गया मई क्यों कर रहा था ये सब?" वो हैरान हो गया ये सुनकर. उसने सुना था के खिलाडी की थकान किसी सरप्राइज से

ठीक की जा सकती है. जो उसके खेल से उलट हो और आरामदायक. वो बस मंजूबाला का मैं और शरीर शांत कर रहा था.

"बीटा तू जहा अभी एडमिशन लेके भर्ती हुआ है वह की 4 साल सीनियर हु मई. लेकिन तेरा तरीका ाचा लगा मुझे. थोड़ी देर बैठ जा मेरे पास भी."

और वो बिलकुल सत् के बैठ गई थी अर्जुन से. "अब ये जो मेरे हाथ को छु रहे है इनका क्या करू.?" उसकी बात पर मंजू ने उसकी ब्याह अपनी तरफ खींची

और यही गलती हो गई. बेध्यानी में सीधा अर्जुन के होंठ उसके मुँह से आ लगे. मंजूबाला अर्जुन से 2 साल बड़ी जरूर थी, मस्ती भी करती थी लेकिन इस

सख्त मिजाज हसीना के होंठो पर ये पहला अनुभव था. ऊपर से अर्जुन का तगड़ा शरीर उसके ऊपर हे आ गिरा. अपने आप हे मंजू की आँखे बंद और होंठ

खुल गए. अर्जुन खुद को रोक सकता था लेकिन मंजू के अंदर एक तड़प थी जो वह चाह के भी उस से अलग न हुआ. मंजूबाला को चूमना तोह आता नहीं था

लेकिन जब अर्जुन ने उसके होंठो पर अपनी कलाकारी दिखाई तोह उसकी जीभ खुदसे हे अर्जुन के मुँह में समां गई. हाथ अर्जुन के सर पर, अलग न हो पाए.

एक हाथ सँभालने को अर्जुन ने जहा रखा वह उसकी मुलायम और मांसल झांग थी. उन्माद में खोने के लिए ये पल हे बहोत था. "हँ. ये क्या किया तूने."

अपनी सांस संभालती मंजूबाला ने आश्चर्य से अर्जुन को देखा. वो मुस्कुरा रहा था. मंजूबाला खुद हे उसका एक हाथ अपनी छाती पर दबाये थी और उसकी

एक बॉल अर्जुन के हाथो में थी, बिलकुल कासी सी. धीरे से हाथ अलग किआ तोह मंजू ने उठते हे एक चांटा जड़ दिए अर्जुन के गाल पर और बिना पलट के देखे

गायब हो गई. "सब काम खुद किआ. रोक भी रहा था तोह खुद से हे अपनी छाती पकड़ा दी.. और जाते जाते इनाम भी करारा दे गई." अर्जुन बिना किसी भाव के

वह से उठ कर साइकिल स्टैंड की तरफ चल दिए. मंजूबाला अपनी सहेली को वह से खींचती ले जा रही थी, जिसको भनक भी नहीं थी के क्या हुआ है आज.

दादाजी कही बहार गए थे काम से और दादीजी भी मल्होत्रा जी के घर थी, शादी के बाद हालचाल लेने. 6 से कुछ हे ऊपर समय था जब अर्जुन घर

आया. "माँ, कहा हो?" उसने आवाज दी आँगन में से हे. उसकी आवाज सुनकर ऋतू हे बहार आई. "माँ और ताई जी पड़ोस में गए है. उनके बेटी हुई थी तोह जागरण

रखा है उन्होंने. क्या काम था?"

"वो दूध.." उसने इतना हे कहा था के ध्यान ऋतू दीदी की टीशर्ट की तरफ चला गया. शायद जल्दबाजी में ब्रा पहनते टाइम एक कप पूरा ऊपर नहीं हुआ

था और निप्पल टीशर्ट से उभर कर बहार नजर आ रहा था. ऋतू दीदी ने शरमाते हुए पीठ पलट कर बस एक तानी को सेट किआ तोह वो ठीक हो गया.

"तू बैठ मई देती हु तुझे." वो चुपचाप मुस्कुराती हुई चूल्हे पर दूध गरम करने लगी. "माधुरी और कोमल दीदी भी नहीं दिख रही" अर्जुन ने वही से

कहा. "वो दोनों, अलका और प्रीती सब दादाजी के साथ कैंटीन गए है. वो छोल अंकल ने कुछ सामान लेना था तोह ये सब भी चले गए."

"आप नहीं गई?" अर्जुन ने वाइस हे पुछा.

"हमारी कोई बात तय हुई थी अगर याद हो तोह." शर्माती सी ऋतू दीद दूध का गिलास लेकर जैसे हे अर्जुन के सामने रखने लगी तोह अर्जुन ने हाथ पकड़

कर उन्हें अपनी गौड़ में बिठा लिए. "याद है तभी तोह सबके बारे में पूछ रहा था. मई भी चाहता था के आप फिर मुझे न दांतो के जगा तोह देख लिए

कर." उसने अपनी गौड़ में शर्माती दीदी का चेहरा ऊपर करते हुए कॉलेज जाते समय की बात याद दिलाई.

"वो तोह अभी भी है." हँसते हुए ऋतू दीदी ने बस इतना कहा था के अर्जुन उन्हें वैसे हे बाहो में ले खड़ा हो गया. "एक ऐसी जगह जहा आप ये न कहो

के कोई है, चलो खुद हे ले चलता हु." ऋतू दीदी के कुछ समझने से पहले हे वो उनकी टाँगे अपनी कमर में लपटे और सीने से चिपकाये दूसरी मंजिल

पर चढ़ लिया. ऋतू दीदी ने अपना सर बस उसके कंधे पर टिका लिए था. संजीव भैया के बिस्टेर पर लिटा कर खुद उनके ऊपर झुक सा गया वह. "कभी

कभी लगता है की कमरा बदल लू अपना. फिर सोचता हु अलका दीदी को भी नहीं निकल सकता वह से और तीनो को तोह घरवाले रहने नहीं देंगे साथ."

उसकी बात गौर से सुन रही थी ऋतू दीदी. फिर आराम से उसने दीदी के माथे को चूमा और फिर उनकी बंद पलकों को. खुद बिस्टेर में उनकी बगल में जा लेता.

"इधर देखो न दीदी." उसने इतना कहा तोह दोनों भाई बहिन एक तरफ मुँह कर के आँखों में देख रहे थे. प्यार से अर्जुन ने दीदी के कान के पीछे उंगलिया

फिराई और फिर आँखोने के सामने आते उनके भूरे बाल भी पीछे कर दिए. "पता है जब आपके साथ होता हु तोह ऐसा लगता है दिल तोह यहाँ है लें

धड़कन आपकी तरफ से सुनाई देती है." और उनको अपने ऊपर ले लिए जहा अब दीदी का चेहरा ठीक उसके दिल पर टिका था.

"मेरी धड़कन तोह तू हे है मेरे भाई." अब सबकुछ भुला कर ऋतू दीदी उसके चेहरे के हर हिस्से को चूमने लगी थी. जहा से वापिस छाती की तरफ आते

हुए वो एक बार रुकी फिर उसकी तशीर खींच कर अलग कर दी. अपने भाई की छाती के छोटे निप्पल जीभ सहलाते हुए बोली, "पता है तेरे साथ मुझे ऐसा

लगता है की ये सब मई खुद हु. जैसे सिर्फ 2 अलग शरीर और उनका मालिक एक हे है. मेरी हर सांस तेरी है अर्जुन और मई चाहती हु तू इसपर अपनी निशानी

लगा दे. मुझे आज रात इतना प्यार करे की फिर मेरी आत्मा से भी तेरे जिस्म की महक आने लगे. तभी ये 2 जिस्म एक होंगे. करेगा न बोल?" एक बार फिर उसके

होंठ चूम दोनों छतियो को मुट्ठी में कस्ती वह एक अलग हे दुनिया में थी. अर्जुन उसके साथ हे था. "आपको मई दर्द नहीं देना चाहता हु. कभी भी नहीं तोह

फिर ये कैसे करू? मई चाहता हु के आपको अपने में समां लू. लेकिन बिना दर्द दिए मुमकिन नहीं है." अर्जुन अपनी खुली छाती से लिपटाये ऋतू दीदी की पीठ

सेहला रहा था. "मई रात को यहाँ आउंगी. अगर तू चाहता है की मेरी ख्वाहिश पूरी हो तोह वही करेगा. नहीं तोह फिर मई कभी तेरे पास नहीं आउंगी. मुझे

सब दर्द मजबूर है. लेकिन हर हाल में एक बार मई खुद तुझमे सामना चाहती हु." ऋतू दीदी ने एक बार फिर खड़े हो कर उसके दोनों होंठ चूमे और बहार निकल

गई. अर्जुन वही लेता कुछ सोचता रहा और 8 बजे निचे चला आया. अब तक घर के सब लोग आ चुके थे. छोल पूरी और प्रीती घर चले गए थे. अलका दीदी

कैंटीन से लिया सामान बड़े चाव से सबको दिखा रही थी और दादाजी और दादीजी खाना खा रहे थे. माधुरी दीदी ने आँखों से कुछ इशारा किआ भी अर्जुन

को लेकिन उसने ऐसे दिखाया जैसे वह बहुत थका हुआ हो. कोशिश तोह ललिता जी की भी थी उन्होंने पुछा भी, "अर्जुन, आज तेरे भैया और ताऊजी भी नहीं है

तोह तू निचे सो जाना." रेखा जी ने भी उनका पक्ष लेते हुए हे कहा की वह उनके कमरे में भी सो सकता है. "माँ, वो आज थोड़ा ज्यादा थक गया हु तोह संजीव

भैया के कमरे में हे आराम करूँगा. और जल्दी आप खाना लगा दीजिये." माधुरी दीदी और ललिता जी थोड़ा उदास हो गए लेकिन फिर उसकी बात समझ कर दोनों

ने संतोष कर लिए. खाने के कुछ देर बाद तक सब साफ़ सफाई में लगे थे और अलका भी अर्जुन के साथ बैठी यहाँ वह की बातें कर रही थी. उसने कैंटीन

में आज क्या क्या देखा, वह कितना कुछ था और हर तरह के ब्रांड्स पर कितना डिस्काउंट मिल रहा था. लेकिन इस बीच ऋतू दीदी कही दिखाई न दी. फिर अर्जुन भी

दूध पीने के बाद ऊपर आ गया. ड्राइंग रूम में टहलने के बाद बाथरूम में घुस कर ाचे से नहाया और साफ़ कपडे पहन कर टेलीविज़न चला कर सोफे

पर हे लेत सा गया. शायद उसकी आँख भी लग गई थी. फिर दरवाजा खुला और ड्राइंग रूम का दरवाजा अंदर से बंद हो गया. लाइट ऑफ और टेलीविज़न भी बंद

संजीव भैया के कमरे में अब छोटा बल्ब जल रहा था जो नीले रंग की रौशनी दे रहा था. "अर्जुन चल उठ और अंदर आजा." ऋतू दीदी ने उसके हिलाया और फिर

अंदर चली गई. अर्जुन उठने के बाद एक बार फिर बाथरूम गया दांत और मुँह साफ़ किये और भैया के कमरे में आ गया.

प्यार. अगर दिल और धड़कन एक हो जाये तोह दिल में जान आ जाती है. ऐसा हे तोह सच्चा प्यार होता है. जहा ऐसे हे दो दिल मिलान करते है तोह वह सहरीरिक

मिलान से कही परे एक अध्भुत आत्ममिलन हो जाता है. यहाँ, समय, काम, वासना, दर्द कुछ महसूस नहीं होता. ऐसा मिलान सुख, परमसुख, अनुभूति, असीमता

से होता हुआ एक दिव्यासागर तक पहुंच जाता है. जिसका कोई ताल नहीं होता और कोई सतह नहीं होती. परिपूर्णता का एहसास होना तोह पराकाष्ठा है सच्चे प्यार की"

"यहाँ मेरी आवाज की तरफ." जैसे हे अर्जुन ने कमरे के अंदर कदम लिया बिस्टेर के पास हे ऋतू दीदी का अक्स खड़ा दिखा. उनकी बाहें फैली हुई थी और अर्जुन

चलता हुआ उनके पास जा खड़ा हुआ. नील हलके प्रकाश में वह इस दुनिया से परे की कोई राजकुमारी सी थी. तन्न पर सिर्फ एक कपडा था. जो घुटनो तक आ रहा था.

बाल खुले हुए महक रहे थे. जिस्म से आती खुसबू में अर्जुन उनसे ऐसे जा लिप्त जैसे कोई सर्प चन्दन के वृक्ष से लिपट जाता है. उनका समय यही रुक गया

इस पतली सी कपडे की परत के निचे कुछ भी न तह. और अर्जुन के शरीर पर भी सिर्फ एक हे वस्त्र था. ऊपर से सीना बिलकुल हे साफ़. उसकी बाहो में सुख की

सांस लेती ऋतू धीमे डीएम से उसके होंठो को चूमती छोड़ती फिर चूमती जैसे अठखेलिया सी कर रही थी. अपनी बाजुओं से उनकी दोनों जंघे पकड़ अर्जुन ने

उन्हें ऊपर उठा लिए. कमर के गिर्द टंगे लपेटे हुए उनके होंठ बस किसी संतरे की फैंको से आपस में जुड़े थे. कोई जल्दबाजी नहीं थी दोनों में. पीठ पर

सरकते ऋतू के हाथ अर्जुन के रोये खड़े किये जा रहे थे. वह से उनको उठाये हुए हे अर्जुन ने बिस्टेर के सिरे पर टंगे रखते उनका बाकी हिस्सा बिस्टेर

पर बिछा दिए.

"अर्जुन, मई चाहती हु के आज कोई rok-tok न हो. जैसा तू चाहे और जैसा मई चहु." ऋतू दीदी के इतना बोलते हे अर्जुन ने उनकी पतली गर्दन को चूमना शुरू

कर दिए. उसके हाथ उनकी जांघो पर हुनर दिखा रहे थे. लम्बी सुडोल टांगो की त्वचा किसी शीशे से चिकनी थी जिनपर अर्जुन के हाथ रेंग रहे थे.

होंठ निचे आये तोह उस कपडे के ऊपर से हे उसने सिर्फ ऋतू दीदी का निप्पल मुँह में हलके से लेना शुरू कर दिए. आज तोह वह भी अपनी औकात पे था. तना हुआ

और बहार को निकला. दोनों हाथ कमर को नाप रहे थे और मुँह बारी बारी से उनके चूचक चूस रहा था. अर्जुन का सर अपने दोनों हाथो में थामे ऋतू तोह

बस इस नशे से बहार हे नहीं आना चाहती थी. अर्जुन अब उनके उरोज छोड़ कर अपनी जीब उनके पेट पर लता नाभि पर रुक गया. मुलायम सा वह एक गुदाज छोटा

सा गड्ढा इतना उत्तेजित कर गया ऋतू को की कमर धनुष की तरह ऊपर हवा में उठ गई जहा पाँव अर्जुन के पैरो में उलझे थे. "आह अर्जुन देख कोई जगह न

बचे जहा तेरा नाम तेरा स्पर्श मेरे रोम रोम पर बाकी रह जाए.

अपनी बहिन, अपने प्यार की बात का आदर करते उसे होंठ उस कपडे की सतह के ऊपर से हे पूरा पेट चूमकर जांघो के जोड़ तक आ पहुंचे. ऋतू तोह शायद

एक बार सोच भी लेती की यहाँ रुक जाना चाहिए लेकिन अर्जुन बस हर जगह अपनी चाप लगाने में जूता था. उस मखमली भाग पर उसके लैब टकराये तोह मजे से

ऋतू की आँखें बंद हो गई और गर्दन एक तरफ हो गई. उसका छोटा भाई उसके कौमार्य के ऊपर होंठो से प्यार कर रहा था. अर्जुन ने सब भूलकर इतना प्यार

दिए उन पहले हुए होंठो को की वह से भी बरसात हो गई. निचे आते हुए दोनों जांघो को अपनी जीभ और होंठ से प्यार करते अर्जुन ने उन दूध से साफ़ पैरो

की उँगलियों को मुँह में भर लिए. हर ऊँगली का नमक पीटा वह एक बार फिर से पूरा अपनी बड़ी बहिन की देह पर लेत गया.

"आपका सर्वस्व मेरा है मेरा आपका." इतना बोलकर उसने उन्हें पलटा दिए और फिर वही क्रिया शुरू कर दी. लेकिन शरीर से वह एक मात्रा कपडा भी अब बिस्टेर पर

बेजार सा पड़ा था. ऋतू की चिकनी नंगी पीठ चूमता हुआ अर्जुन उसके हर हिस्से को जैसे जगा सा रहा था. एक मधुर मिलान से पहले जैसे समस्त शक्तिया

जगाने की रसम सी थी. कूल्हों को अपने हाथो में थाम उसने हर जगह होंठो की दबिश दी.

ऋतू ने बाजुओं से अर्जुन को पकड़ कर अपनी जगह लिटा दिया और उसके ऊपर खुद वही दोहराने लगी जो सब उसने किआ था. अर्जुन के भी मुँह से गहरी सीत्कार निकल

गई जब उसकी छाती के निप्पल ऋतू ने चुभलाये. ऋतू के उरूज अब सख्त हो चुके थे और जहा भी वह अर्जुन के शरीर से रगड़ खाती, दोनों को हे अलग सा मजा

आ जाता. पजामा अब जमीन पर था और उन नाजुक गोर हाथो में विशाल लुंड, ऋतू को उस से जरा भी डर नहीं लग रहा था. ऐसे हे थामे उसने अगले हिस्से को

प्यार से चूमा और पूरे लुंड पर जीभ चलती गई. सूपड़ा इतना फूल चूका था की अर्जुन ने भी इतना खून का प्रवाह अपने लुंड में पहल न किआ होगा.

"भाई, मेरे ऊपर आजा." वो खयालो में हे था जब ऋतू दीदी ने एक सफ़ेद कोरी चादर बिस्टेर की चादर पर दाल दी और खुद जनम सी हालत में उस पर लेत

गई.

"दीदी, आप जहा बोलोगी मई रुक जाऊंगा. बस हिम्मत रखना."

"मेरी हिम्मत तू हे तोह है."

अर्जुन ने दोनों हाथो से उनके गाल पकडे और ऊपर आते हुए होंठो को पीने लगा. अब उसका निचला भाग ऋतू दीदी की टांगो को चौड़ा कर उनपर पड़ा था.

एक चुके को हाथ में पकड़ दबाते हुए अर्जुन ने चूसना शुरू किआ. "सीई.. आह अर्जुन. इन्हे काट ले.. " मजे से दोहरी होती ऋतू ने अपने हाथो से हे दूसरा

दबाना सुरु कर दिए. अर्जुन को उनमे से कोई अमृत का स्वाद आ रहा था. 10 मिनट तक दोनों पीने के बाद उसने बीएड की दराज से एक तुबे निकली और दो उंगलियों

से ऋतू दीदी की छूट पर मलने लगा, ऋतू दीदी को तोह ये पता भी न था के अर्जुन कुछ ऐसा करेगा." उसकी ऊँगली का पूरा भी दीदी की छूट में जलन दे रहा

था लेकिन वह बस मजे में सिसकती रही.. कुछ देर तक ाचे से मालिश करने के बाद अर्जुन ने अपने लुंड पर भी ाचे से क्रीम लगाई. "दीदी इसको पकड़ लो

और अपने छेड़ पर चिपका के रखना." अर्जुन ने वापिस ऋतू दीदी के शरीर पर झुकने से पहले उन्हें समझाया. लुंड और छूट आपस में मिले तोह दोनों के शरीर

में करंट और मजे की तरंग उठने लगी. ऋतू ने मजबूती से लुंड अपनी छोटी सी छूट के छेद पर टिकाया हुआ था. छेद भी इतना छोटा था की लुंड से पूरी

छूट हे लगभग ढकी हुई थी. उनके दोनों होंठो को अपने मुँह में दबाकर अर्जुन ने कुछ सोचने के बाद एक प्रचंड धक्का दे दिया. '"ोूमममहह............."

उसके मुँह में ऋतू दीदी की बस इतनी आवाज आई और उनके नाखून अर्जुन की पीठ में आधे तक जा घुसे. लेकिन ऋतू ने भी अपने से अलग नहीं किआ उसको.

निचे छूट अपने जोड़ से चिर्र सी गई थी. झिल्ली के तोह निशाँ भी शायद दीखते. खून की बारीक धार निकलती जांघो को भिगोती कपडे पर गिर रही थी.

4 इंच लुंड छूट में फसा हुआ था. कोई मोटा रबर का चला जैसे लुंड पर कास दिया हो. अपनी दीदी के होंठो को जैस हे आजाद किआ तोह उनकी आंखों में आंसू

देख वो लुंड निकलने हे वाला था. "नहीं भाई. ये तोह एक बार होना हे था. अब तू मुझे इतना प्यार दे के मई ये दर्द क्या अपने सभी दर्द भूल जाऊ." इतना कह

कर ऋतू दीदी अपनी भाई से वापिस लिपट गई.

"दीदी, अब आपको कोई दर्द नहीं दूंगा बस थोड़ा साथ देना." क्रीम को वापिस थोड़े बाहर निकाले लुंड पर लगाने के बाद उसने हलके हलके धक्के देने शुरू किये

हर बार छूट और जोर से चिपक रही थी लुंड से. थोड़ी चिकनाहट होते हे अर्जुन ने फिर से उनके दूध पीने शुरू कर दिए.

"दीदी, आपके ये कितने सुन्दर है न.' माहौल को थोड़ा ठीक करने की कोशिश की तोह ऋतू ने भी साथ दिए.

"क्या कहते है इनको"

"बूब्स. आपके पहले तोह इतने सख्त न थे."

"आह भाई.. बस ऐसे हे करता रह.. ये सख्त हुए है तुझे देख कर . इन्हे ढीला भी तुहे करेगा.. ाः.." उनकी छूट चौड़ी तोह खूब हो चुकी थी लेकिन

इस 4 इंच के हिस्से को सहने लगी थी. "बस भाई ऐसे हे मेरे दोनों बूब्स... आठ दबाता जा.. और .. थोड़ा तेजी से कर.. "छूट से कॉमर्स टपकने लगा था

तोह वह भी घर्षण सही से हो रहा था.. अर्जुन ने थोड़े धक्के तेज किये और फिर एक बार सुपाड़ी तक लुंड निकाल दीदी को गौड़ में लिए बैठ गया. पूरा लुंड

उसने बहार नहीं किआ था बस उनको ऊपर उठा बिस्टेर के किनसे से पाँव लटका लिए निचे. होंठो को मुँह में भरे हे उसने ऋतू दीदी का शरीर छूट के पानी से

चिकने हुए लुंड पर निचे झटका दिए. दर्द की तेज लहर दोनों के हे यौनांग पर पड़ी. लुंड तोह वही फंस गया था और एक बार फिर से खून बेहटा सा महसूस हुआ

अर्जुन को जांघ पर. उनको गौड़ में लिए वह कूल्हे सहलाता और उनके माथे को चूमता रहा. दीदी इतनी मजबूत निकलेगी ये उसने सपने में भी नहीं सोचा था. जहा

मोती और थोड़ी बड़ी छूट वाली माधुरी दीदी लुंड लेते समय 6 इंच पर हे अचेत होने लगी थी, ललिता जी जो 3 बचे पैदा करने के बावजूद चीख पड़ी थी

लेकिन ऋतू सबसे दिलेर निकली. लुंड जड़ तक फसा हुआ था. छूट किसी कटे पपीते की तरह फटी हुई लुंड पर चिपकी हुई थी. लेकिन वो आँखों से सिर्फ मोती

गिरती अपने भाई को चूम रही थी. "आपके आंसू मेरे है दीदी." अर्जुन ने उनके कूल्हे सहलाते हुए आँखों को चाट लिए. फिर जोरदार चुम्बन शुरू हुआ और

अपने आप हे ऋतू दीदी ने कमर उठा कर 5=6 बार लुंड पर दे मारी. ये इशारा था के भाई तू कर.

अर्जुन ने वापिस उन्हें लीयते और थोड़ी क्रीम आधे लुंड पर लगा के फिर से हलके धक्के देने शुरू कर दिए.

"आह भाई करता रह. रुक मत मुझे कुछ हो रहा है.. आह मेरे... अंदर कुछ उठ raha..hai.. आह करता रह" दर्द में भी चरमोत्कर्ष पर जाती ऋतू सच में

अलग थी. अर्जुन भी बड़े प्यार से चुदाई कर रहा था. "आह मई गई भाई... पूरा अंदर दाल.. " खुद से चिपकाती वह 5-6 झटके खाने के बाद वापिस अर्जुन

से लिपट गई. वो भी कुछ देर रुका रहा और उनके निप्पल चूसता रहा. अपने भाई का सर प्यार से सहलाती बस उसको अपने दूध में खोये देख मुस्कुरा रही थी.

पीड़ा तोह जैसे इस पल में कही थी हे नहीं. अपनी दीदी को अब ठीक देख अर्जुन ने उनकी टंगे ाचे से खोल कर ऊपर उठा ली. लुंड तीन चौथाई बहार निकल वो

जड़ तक अंदर पेलने लगा था. छूट एक बार खुलकर झड़ने के बावजूद कासी सी लुंड को पकड़ रही थी.

"दीदी, आपके अंदर तोह अभी तक मेरे लुंड की खाल फंस रही है. आह सुबह आपका हाल ख़राब हो जायेगा. आह." हर्र धक्के पारा किसी जानवर सा गुर्रा रहा था वो

ऋतू दीदी लगातार अपने कूल्हे उठा कर एक बार में हे अपनी छूट को उसके लुंड के लायक बनाने में लगी थी.

"तू निचे अजा भाई." उनकी बात मानते हुए जैसे हे पूरा लुंड बहार खींचा "फचाक" की आवाज से मोटा सूपड़ा छूट के पानी और खून में सना बहार निकला

"आह. चल लेत निचे." दर्द में भी हिम्मत बनाये वह अपने भाई की कमर के दोनों तरफ किसी घुड़सवार सी बैठ गई. गांड को उचका कर लुंड के मुँह पर छूट

को रखा और "कच" से निचे हो गई. आधा लुंड तोह उस झटके के साथ हे अंदर बैठ गया था. "आह. रुक एक बार हिलना मत. " अपनी गांड को वही उठाये एक

लम्बी सांस लेकर फिर से खुद को लुंड पर गिरा लिया. आह.. थोड़ी देर ऐसे हे छूट में पूरा लुंड लिए वह उसकी छाती पर लेती रही. छूट तोह सुन्न हे पड़ने लगी

थी. अर्जुन ने प्यार से उनके गाल सेहलते हुए कहा, "दीदी, अब से फिर कभी दर्द नहीं होगा." और सीने से लगा लिए. कुछ हे पल बाद उनकी गांड ऐसे लेते हुए हे

लुंड पर हिलने लगी तोह अर्जुन भी उनके दोनों गुदाज चूतड़ पकड़ कर धक्के देने लगा. "जोर से कर अर्जुन.. पूरा अंदर तक. " दोनों मिलकर हे अपना अपना शरीर उस

जोड़ पर पटक रहे थे. बैठ कर लुंड पर उछलने से उनके चुनचे भी हवा में मटक रहे थे. अर्जुन ने दोनों को मुठी में भर दबाना सुरु कर दिए.

"मई थकने लगी हु भाई. अब तू आजा."

"दीदी, घुटनो के बल हो जाओ." अर्जुन ने उन्हें बीएड पर उतारते हुए कहा. खुद बिस्टेर से निचे खड़ा हो गे और उनकी छूट पर लुंड टिकते हुए फिर से

जड़ तक अंदर थोक दिए. हर धक्के से ऋतू दीदी की सिसकारिया गूँज रही थी.. "आह मेरे भाई .. अब ाचा लग रहा है.. फाड़ दे सबकुछ. आह"

"दीदी, आपके कूल्हे देखो कितने नरम है और मुलायम भी.." उसका हर धक्का पत् पत् की आवाज करता ऋतू की गांड से टकरा रहा था. खाली कमरे में ये मधुर

संगीत इन दोनों को अब हवा में उड़ाने लगा था. दोनों के शरीर अब अकड़ रहे थे. छूट संकुचन करने लगी थी और लुंड फूलने. किसी इंजन सी स्पीड में सब

कुछ भुला कर अर्जुन बस दीदी के हर अंग को हिला रहा था. "अर्जुन.. मुझे थाम ले.. इतना कहती वह आगे बिस्टेर पर लुढ़क गई लेकिन उनका शरीर लगातार

बस झटके खता रहा. एक समय तोह ऐसा लगा जैसे पेशाब हे कर दिए हो. और अर्जुन का भी जोर जवाब दे गया. वो किसी शेर सा दहाड़ता लुंड को बाहर निकल

उनकी पीठ पर हे झड़ने लगा. उसके अंडकोष सूख गए थे जैसे इतना वीर्य उदय था की दीदी के बालो तक पिचक्यारिअ जा लगी थी. ऋतू दीदी उसके निचे बेहोश

पड़ी थी और अर्जुन में जितनी बची खुची हिम्मत थी उसने इकठी कर के बस उन्हें अपने साथ वही छाती से चिपका कर लिटा लिए था.
 
अपडेट 28

दर्द हे दवा है


"भाई.. मुझे बाथरूम ले चल." अर्जुन जिसकी शायद अभी आँख लगी थी, ने अपनी बहिन को अपने सीने पर सर उठाये देखा. चेहरा बस उस हलकी नीली

रौशनी में नुमाया हो रहा था.

"है चलो दीदी." अर्जुन ने अपने ऊपर से दीदी को आराम से पलट दिए और खुद बिस्टेर से निचे उतर कर उन्हें किसी छोटी बची की तरह अपने हाथो में उठा

लिए. "आह.." दीदी की कराह सुनकर उसने रुक कर फिर से उनकी तरफ देखा. "कुछ नहीं हुआ है भाई बस शरीर थोड़ा अकड़ गया है. तू चल" और अर्जुन उन्हें

लेकर वापिस ड्राइंग रूम के साथ अंदर हे बने बाथरूम में लेकर आ गया. दिवार पर लगे लाइट के खटके को दबाया तोह पूरा बाथरूम रौशनी से भर उठा.

उसकी बाहो में पड़ी ऋतू दीदी अल्फ नंगी बस अपने भाई को हे देख रही थी. नजर दीदी के चेहरे से निचे गई तोह गोर फक्क चुचो पर लाल निशान बने हुए

थे और निप्पल अभी तक कड़े थे. श्याद सूज गए थे ज्यादा चुसाई से. गोरी पतली कमर बिलकुल अंदर धसी सी लग रही थी और उसके निचे जहा बालो

की मौजदीगी का कोई आभास न था, उनकी छूट के दोनों होंठ फूल कर सूजे हुए थे. छूट की दरार पर खून किसी पपड़ी सा जमा था और छेड़ शायद अभी

भी हल्का नाम था. जहा कभी वह गोरी छूट किसी कनक के दाने सी थी आज वही फट कर सूज गई थी.

"मेरे पाँव निचे रख जरा." थोड़ी शर्माती सकुचाती वह बोली तोह अर्जुन ने अपनी बाहो में लिए हे उनका सिर्फ जमीन तक पहुंचाया था. वो अभी भी दीदी का

पूरा वजन अपने हे हाथो में लिए खड़ा था, वैसे हे जैसे दीदी थी. एकदम वस्त्रहीन.

"मुझे कोड तक ले चल ऐसे हे." ऋतू दीदी हिम्मत से अपने पाँव बाथरूम के कोने में बने कोड तक भड़ाते हुए बोली. हर कदम छूट में जैसे एक भयंकर

दर्द उत्पन्न कर रहा था. अर्जुन ने भी उन्हें आराम से पकड़ा हुआ था, कमर के भाग से. उनकी पीठ पर भी सफ़ेद पपड़ी सी जमी थी और बालो में भी. गोर

gol-matol कूल्हे अब थोड़ा लाली लिए हुए थे जो हर कदम पर थरथरा से जाते. सहारा दे कर अर्जुन ने उन्हें वह बिठाया तोह एक बार फिर जोरदार सिसकारी

निकल गई. "आपको ज्यादा दर्द है तोह खड़े खड़े हे कर लीजिये." अर्जुन ने देखा की दीदी से बैठ भी नहीं जा रहा तोह उसने उन्हें एहि सलाह दी. "नहीं रे.

पड़े पड़े तोह दर्द जाने से रहा. हिलूंगी तभी तोह फिर ठीक रहूंगी." साथ में हे अर्जुन ने गीजर का बटन भी दबा दिए जिसको दीदी ने भी देखा. और फिर

एक बार उनके चेहरे पर दुनिया जहा का दर्द इकठ्ठा हो गया. "आह भाई." छूट से पहले तोह सिर्फ कुछ बूंदे हे टपकी फिर char-char की आवाज से रुक रुक

कर पेशाब गिरने लगा. शुरू की बूंदे एकदम लाल हे थी जिन्हे दोनों ने हे देख लिए था. "वो अंदर हे जैम गया था न थोड़ा खून तोह इसके साथ हे बहार आ

गया." बस निचे देखती ऋतू दीदी ने इतना हे कहा और कुछ देर वही बैठी रही. उन्हें आज अपना पेशाब भी किसी तेज़ाब सा लग रहा था छूट को जलाता सा.

"आप बस 2 मिनट रुकिए." इतना कहकर वो अपने कमरे से एक सूती साफ़ टीशर्ट लेकर आया और पास में राखी प्लास्टिक की बाल्टी पर बाथरूम में टेंगा अपना पजामा

किसी गद्दी की तरह बिछा, दीदी को उसपे बिठा दिए. ऋतू दीदी बस अपने भाई की हरकतों को देख रही थी जिसके चेहरे गंभीर था.

"थोड़ा फैला लीजिये न इनको." अर्जुन ने उनकी जांघो की तरफ इशारा किआ तोह ऋतू दीदी ने दर्द में भी मुस्कुराते हुए अपनी गोरी जाएंगे फैला ली. छूट का छेद

पूरा नुमाया हो रहा था. गरम पानी से एक डब्बा ाचे से भरकर उसने ऊँगली दुबई देखने के लिए की कितना गरम है. फिर हल्का तजा पानी मिला कर साफ़

टीशर्ट का बीच वाला भाग ाचे से गीला करके उनकी टांगो के सामने बैठ गया फर्श पर. "अगर दर्द हो तोह बता देना दीदी. बस एक बार ाचे से साफ़ कर

दू फिर आपको आराम मिल जायेगा." थोड़ी चिंता अभी थी उसके चेहरे पर.

"मुझे ये दर्द ख़तम करना है भाई. अभी तू कर जो तू कर रहा है. फिर मई करुँगी जो मैंने करना है." दीदी की ये बात अर्जुन को समझ तोह नहीं आई लेकिन

वो बिना कुछ पूछे उस गीली त्शिरस्त से उनकी छूट के बहार जमे खून को साफ़ करने लगा. हलके हाथो से उसने दोनों होंठ और उनपर लगे सूखे खून के

निशाँ बिलकुल साफ़ कर दिए. छूट के छेद के निचे की तरफ भी सूजन और एक छोटा सा चीरा लग गया था, लेकिन वह से अब खून तोह नहीं बह रहा था.

एक बार फिर उसने टीशर्ट को गरम पानी में भिगोया और अब छूट के मुँह से भीड़ दिए. "आयी.... भाई ये तरीका सिर्फ दर्द दे रहा है." अपने हाथ की उँगलियों

से उन्होंने अर्जुन की कलाई मजबूती से पकड़ ली थी. छूट में जैसे और आग लग गई हो अर्जुन की इस हरकत से. लेकिन वो जानता था की छूट के होंठ और छेड़

जितना सूजे हुए है सुबह तक तोह दीदी तंग भी नहीं खोल पाएगी. "बस 5 मिनट दीदी." उसने वापिस ये बात कही और अपना काम करता रहा. "अर्जुन. ये शावर

चला दे." दीदी की बात सुनकर वो एक पल रुका फिर उसको लगा के क्या पता नाहा के दीदी को आराम आ जाये. उसने शावर का हैंडल खोल दिए. बाल्टी पे बैठी हुई

ऋतू दीदी पर फुहार सीढ़ी गिर रही थी. उनके गरम शरीर में इस ठंडी फुहार से एक नै जान से आने लगी. अर्जुन भी पूरा भीगा गया था 2 मिनट में

हे. "शैम्पू लगा तोह मेरे बालो में और जरा ये साबुन भी पकड़ा दे मुझे." दीदी अब अपनी जगह कड़ी हो गई थी. पानी की धरा उनके चेहरे, चुंचो से होती

छूट पर आकर फिर से दोनों जांघो से होती नीचे फर्श तक आ रही थी. गीला भीगता बदन एक बार फिर चमक रहा था. अर्जुन ने दृस्य देखते हुए उन्हें

साबुन पकड़ाया और खुद उनेक पीछे खड़ा हो दोनों हाथो में शैम्पू लगा कर बालो में मलने लगा. शावर ज्यादा उचाई पर नहीं था, बस अर्जुन के सर से 6-8 इंच

हे ऊपर दिवार से जुड़ा था एक 1 फुट की अयस्क की पाइप से. दीदी नई फुहार का रुख बालो से हटा कर अपनी कमर की तरफ कर दिए तह. बालो में झाग बन रहा था

जो थोड़ा गर्डर से होते हुए पीछे पीठ और पेट की तरफ भी जा रहा था. "आह. ऐसा लग रहा है जैसे ये साबुन तेरे हाथो का काम कर रही है." दीदी

के ऊपर के बाग़ पर भी हल्का सफ़ेद झाग साबुन ने बना दिए था. उन्होंने अपने हाथो से अर्जुन के दोनों हाथ सर से हटाकर अपनी छातियों पर रख दिए.

"ाचे से मसल इनको. मालिश कर जरा प्यार से इनकी मेरे भाई." उनकी गांड से चिपका अर्जुन भी दीदी के खुमार को देख उनके साथ हो लिया. पूरे चिकने

गीले शरीर पर उसके बड़े हाथ और उंगलिया रेंगने से लगे. शावर के दाहिनी तरफ दिवार पर लगे शीशे पर ऋतू दीदी की नजर पड़ी तोह वो बस वही

देखती रही और अर्जुन उनके चुके दबाता अपना लुंड गांड पर रगड़ सा रहा था. "ऐसे हे भाई, वह पीछे भी साफ़ करता रह." अपनी दीदी की नजर का पीछा

किआ तोह देखा की चेहरे से लेकर जांघो के निचे तक का हिस्सा शीशे में नुमाया हो रहा था. उनकी आँखों में एक नै चमक थी और अपने होंठ काट टी ऋतू

वही से अपने छोटे भाई के अजगर को अपनी गांड की दरार में रगड़ता देख कर उसके हाथ अपने हाथो से बूब्स और छूट पर दबा रही थी. अर्जुन दाहिने हाथ

से उनका बड़ा चूचा दबा रहा था और अपने बाए हाथ की ऊँगली से छूट के होंठो को प्यार से घिस रहा था. ऋतू दीदी बस सिसकते हुए मचल रही थी

लेकिन नजर वही थी. लम्बा तगड़ा अर्जुन, जिसके खुद के शरीर पर बालो का अभाव था, उसकी गिरफ्त में एकदम गोरी, लम्बी किसी अप्सरा सी ऋतू दीदी जकड़ी थी.

गोर चुके जिनके चूचक अभी तीखे हो चुके थे, वो भी सर उठाये थे. एक दूध इतना बड़ा था के पूरा पकड़ में नहीं आ रहा था अर्जुन के बड़े हाथ में.

शावर को वापिस सर की तरफ किआ तोह पूरा शरीर एक बार फिर शीशे सा चमक उठा. अर्जुन का सर अपने कंधे की तरफ कर ऋतू ने उसके दोनों होंठ मुँह में

भर लिए थे. ऐसा लग रहा था के ऋतू हे सबकुछ निर्देशित कर रही है. पूरी तरह से उसकी तरफ घूम कर अपनी सख्त चाटिया भाई के सीने से रगड़ती

ऋतू ने एक हाथ में उसका लुंड थाम लिए, जो पानी नीचे भी किसी गरम सलाख सा टप्प रहा था. "देख कर तोह नहीं लगता की यही था जो मेरे अंदर चला गया.

लेकिन कुछ भी कह अर्जुन तेरा पेनिस है बड़ा प्यारा. देख जैसे जीरो का लाल बल्ब हो." ऋतू ने लुंड की खाल पूरी पीछे कर दी थी और सुपाड़ी को गौर से निहार

रही थी. यकीन हे नहीं था के किसी टमाटर सा मोटा ये भाग उसकी चार आने जितनी चौड़ी सुरंग में चला गया हो. लेकिन छूट का हाल तोह देखा हे था. अर्जुन

बस अपनी दीदी को हे देख रहा था. उसके चेहरे पर अब कोई चिंता या सोच नहीं थी. बस एक आनंद था. ऐसे हे हाथ चलते हुए ऋतू झुकी और अपनी जीब्ज उस

लाल दहकते हुए टमाटर पर फिरा दी और इधर अर्जुन के मुँह से मजे की सिसकी निकल गई. "ये क्या है दीदी? आह.. कहा से सीखा आपने?"

"किताबे सबकुछ सीखा देती है अगर होनहार और पढ़ने वाले बनो. कामसूत्र के इंग्लिश वर्शन में ये भी था और मेरा दिल किआ इसको चूमने का." मुखमैथुन

की कला भी दुनिया की इस सर्वश्रेष्ठ किताब में हजारो वर्ष पहले हे वर्णित थी और इसका अंग्रेजी संस्करण ऋतू ने भी कॉलेज के पुस्तकालय में पढ़ा था. वो

अपना प्रैक्टिकल आज अंजाम दे रही थी. किसी ने सही कहा है के प्यार में दर्द भी जैसे एक अलग नशा भर देता है. यहाँ ऋतू भी अपने छोटे भाई को शायद

कुछ नए पाठ पढ़ा रही थी जो खुद उसके लिए पहला अनुभव थे. जितना भी मुँह खोल सकती थी उतना खोलकर सूपड़ा मुँह में लेने लगी वह. हल्का दांतो

की रगड़ अर्जुन को असीमित आनंद दे रही थी. 2 मिनट बाद अपनी एक टांग वही बाल्टी पर रख दी जिस से छूट खुलकर नुमाया हो रही थी. अर्जुन ने एक बार

ऊपर से निचे तक उनकी कामनिया काया को देखा जहा पानी की बुँदे बहती, गायब होती दिख रही थी और फिर उनकी छूट को. जा हलके हलके थर्रा रही थी.

बिना किसी अनुभव के वह निचे बैठ कर ध्यान से छूट को देखने लगा और अपने भीगे होंठ geeli-tapti छूट पर रख दिए. ऋतू दीदी की सर खाद हुए

हे पीछे की तरफ हो गया, थोड़े दर्द और अधिक मजे से. अपने भाई का सर वही अपनी छूट पर जोर से सत्ता दिए. "आह अरु.. सससस. जान निकल रही है भाई

मजेईई सीईई.." इधर अर्जुन था तोह नौसिखिया लेकिन उसने अपनी जीभ को उस बहते छेड़ में भिड़ा दिए. कोई घृणा नहीं, कोई ग्लानि नहीं. सिर्फ प्यार से

जैसे उसकी दीदी ने उसके लुंड पर दिए था. हलके हलके छूट को वो कुरेदता दोनों चूतड़ों को मसल रहा था. दीदी ने उसको ऊपर की तरफ खींचा तोह वो सीधा

खड़ा हो गया. लुंड नाभि ने नीचे टक्कर मार रहा था जिसको ऋतू दीदी ने एक बार सेहला कर छूट के छेद से मिला दिए. कॉमर्स से बहती छूट को ये गरम

एहसास एक बार फिर अंदर तक हिला गया. "भाई बस दाल दे." इतना बोलकर लुंड को वही जकड़े उन्होंने अर्जुन का मुँह अपनी तरफ खींच उसके होंठो में दे दिया था.

इधर अर्जुन के घोड़े ने भी लगाम तुड़वा ली थी और झटके से उस चिकनी गरम और बेहद तंग सुरंग में जा फंसा. "भईईई.. बस." अर्जुन जो ऋतू दीदी की

कमर थामे धक्का लगा चूका था वह जहा का तहा ृक्क गया. एक बार फिर पीड़ा से हलके मोती से निकल आये थे ऋतू दीदी की बड़ी गहरी आँखों से. 4 इंच

से ज्यादा लुंड वही कैसा हुआ था. पाँव हल्का लरज रहा था. "दीदी ऐसे ज्यादा दर्द होगा" अर्जुन ने उनको चिपकाये हुए हे कहा. "पागल ऐसे दर्द सबसे काम हे

होगा. जितना यहाँ से वागिना खुल रही है और पेनिस अंदर गया, तुझे पता नहीं चला क्या." खुद को काबू में करती दीदी ने उसको समझाया तोह अर्जुन ने भी देखा

के छूट ाचे से दिख रही है. "वैसे दीदी वागिना को छूट बोलते है और इसको लुंड." और फिर ऐसे हे उन्हें चूमता रगड़ता खड़ा रहा. "हाँ.. भाई मुझे..

ाः.. ऐसे.. हे आह. प्यार कर.. ातच लग रहा है." बोलते हुए खुद हे अपनी गांड हलकी पीछे कर फिर से लुंड पर मार दी. "ोोूहः.." अपने होंठ खुद हे काट

लिए चीख रोकने के लिए जिनपर 2 बूँद खून की उभर आई थी. "बस अब जितना.. आह.. Gaya..haye.. इतने से कर.. Aah..Pehle धीरे.." आवाज हर पल लरज रही

थी. अर्जुन ने देखा के उनकी टांग कम्प रही है तोह जमीन पर राखी तंग के कूल्हे को पकड़ उन्हें वैसे हे दिवार से सत्ता दिए. और बाल्टी को भी. ऋतू दीदी के

पीठ दिवार से चिपकी थी और चौड़ी जांघो के बीच भाई का मूसल छूट के होंठ बुरी तरफ से फैलाये 6 इंच से थोड़ा जयादा हे किसी भैंस के खूठे सा

गदा था. "दीदी बस अब मई प्यार से करूँगा." इतना बोलकर एक बार फिर उनके दोनों होंठ चूसते हुए अर्जुन ने 2 इंच लुंड पीछे कर उतना हे अंदर पेल दिए..

"ूई.. आह... स्सीइ.. " हर धीमे से पड़ते धक्के पर ऋतू दीदी की छूट में आग और पानी दोनों का मिलान सा हो रहा था. और सिसकारिया दोनों की निकल रही थी.

"दीदी, आप जितनी खूबसूरत हो.. आह उतनी हे आपकी ये प्यारी सी छूट है.. आह.. देखो मेरा लुंड अभी तक जकड़ा सा जा रहा है."

"भाई मेरी वग.. मतलब.. आह चूऊत्त की.. आह गलती नाहीई.. है.. तेरा ये.. घोड़े जैसा.. तोह हर चुत का यही .. आह भाई... हाल कर देगा.. आह." जोर से

कर भाई. जितना जोर .. आह से करेगा.. दर्द ख़तम हो जायेगा." लुंड थोड़ा रफ़्तार से जाने लगा था और हर धक्के पर ऋतू दीदी की पीठ दिवार से जा लगती. अर्जुन

ने लुंड फसाये हुए हे उन्हें उठा लिए और धीमे धीमे वापिस बिस्टेर पर पटक कर खुद निचे खड़ा रहा. "अब सारा दर्द ख़तम कर दूंगा दीदी." थोड़े जोश से उसने

ये कहा और सुपडे तक लुंड खींच वैसे हे धकेल दिए. उसने इतनी दुरी राखी थी छूट में की जड़ तक अंदर ना जाए. और ऐसे हे वह उनके दूध दबाता लगा रहा.

"मई गई भाई.." चीखती सी ऋतू दीदी की टांगें अर्जुन की गांड पर कास गई और छूट से बहते पानी में एक तेज धक्के से लुंड भी गहराई में जाकर रुक गया. झड़ने

की चीख के साथ हे दर्द भरी भी निकल गई. आधा हे चरम महसूस किआ था की ये खूंटा जड़ तक बैठ गया. अर्जुन यहाँ नहीं रुका. वो बस तूफानी की गति से

धक्के बरसाने लगा और एक बार फिर ऋतू दीदी के मुलायम चूतड़ थिरकने लगे. उन्होंने उसको अपने ऊपर खींच लिए और किसी नाग नागिन की तरह बदन एक दूसरे

पर लिपटे रेंग रहे थे. धक्के भी छूट की जड़ तक हिला रहे थे जैसे आज हे बच्चेदानी को भी खोल हे देंगे. "मेरा होने वाला है दीदी. " अपने होंठ हटते

अर्जुन ने ये कहा तोह ऋतू ने अपनी टाँगे उसकी गांड पर कास ली. फवररा सा छूट से निकलता लुंड और अंडकोष को भी भिगोने लगा. अर्जुन का लुंड भी फूल चूका

था और जैसे हे बहार खींचा पहली धार सीधा ऋतू दीदी के होंठो और गाल पे गिरी और ऐसे हे चुचो और पेट को भिगोती अंतिम बूँद छूट के फ़ैल चुके होंठो

से ऊपर टपक गई. छूट तोह किसी 2 रुपये के बड़े सिक्के सी खुल गई थी और अंदर से पूरी गहरी लाल.

"अभी नहीं सोना. चल एक बार मुझे साफ़ कर और निचे छोड़ आ." दीदी 5 मिनट बाद हे खड़े होते बोली. लेकिन बात पूरी करते हे दर्द भरी आह निकल गई.

"आपका बुरा हाल हो गया है." अर्जुन ने दवाई का डब्बा उठाते हुए कहा और एक दर्दनिवारक गोली और पानी की बोतल फर्श से उठा कर उनके सामने कर दी.

"तूने मेरे अंदर क्यों नहीं किआ?" दवाई लेती ऋतू दीदी ने के बार उसकी आँखों में देखते हुए कहा और खुद नजर निचे कर ली. "अभी अपने बचो को नाम देने लायक

नहीं हु दीदी. जब ऐसा दिन आएगा तोह मई कुछ पूछूंगा थोड़ी न. जैसे बहार निकलते नहीं पुछा." बचो की बात सुनकर इस पूरी रात में शायद दूसरी बार दीदी

शरमाई थी. फिर दवा खाने के बाद उस चद्दर को समेटा जिसपे दोनों के इस मिलान की कहानी किसी एक फुट के लाल दायरे में लिहि थी, अपनी वही झीनी सी मैक्सी हाथो

में ले हल्का लड़खड़ाती हुई अर्जुन के सहारे बाथरूम के बहार तक आई. अर्जुन ने अंदर से गीली टीशर्ट उठाकर उन्हें पूरा साफ़ किया और होंठो को चूमता बोलै.

"आप ये पहन कर एक मिनट सोफे पर बैठो." और उन्हें प्यार से बड़े सोफे पे लिटाता सा बाथरूम में घूस कर सारा फर्श साफ़ कर, उनके प्यार के सबूत वह से

हटा अपना लुंड साफ़ करता बहार आया. पजामा पहन कर एक बार घडी की तरफ निगाह फेरी. 3:40. दीदी ऊपर 11 बजे आई थी और बीच में मुश्किल से 30 मिनट हे

आराम किआ था. फिर सर झटकता वापिस आया और ऋतू दीदी को बाहों में उठाये निचली मंजिल पर आ गया. "मई यहाँ से चली जाउंगी." धीरे से ये बात कही ऋतू

दीदी ने तोह अर्जुन न में सर हिलता उनके कमरे का दरवाजा, जो सिर्फ ढलका हुआ हे था को खोलकर उन्हें प्यार से अलका दीदी की बगल में लिटा दिए. "आह. भाई." इतना बोलकर

उन्होंने अपने ऊपर झुके अर्जुन को फिर से चूम लिए जिसने खुद भी उनकी चूचियों को एक बार दबा दिए था. और दबे पाँव वो बहार निकल कमरे में आ के नींद के घेरे

में जा लेता.

.

.

.

"अर्जुन. कब तक सोयेगा? 7 बज गए है." अर्जुन की नजर खुली तोह सामने माँ थी जो उसको उठा रही थी. हरी साड़ी और हरे टाइट ब्लाउज में वो हरियाली से बेहद

आकर्षक लग रही थी. ब्लाउज में दिखती गहरी सफ़ेद खाई और उसके बीच में काले मनको में सोने का मंगलसूत्र किसी कामदेवी सा रूप. एक बार तोह अर्जुन खो हे

गया उस दृश्य में. रेखा जी भी बेटे के ऊपर हे झुकी हुई थी.

"उठ गया माँ. आप निचे चलो मई आया अभी बाथरूम से फारिग हो कर." एक बार उसने फिर से नजर उन सफ़ेद गोलों पर डाली जो किसी सख्त गोल नारियल से थे.

एक पल तोह रेखा जी मुस्कुराई फिर उसके ऊपर से hat-te हुए चद्दर पर बने तम्बू को देख थोड़ा हैरान परेशान से ठिठक कर फिर बहार निकल गई. अर्जुन भी

बाथरूम से हो कर 20 मिनट बाद निचे चला गया, नाहा धोकर.

"मुन्ना आज तोह शायद तू सुबह घूमने गया नहीं? तबियत ठीक है तेरी?" कौशल्या जी ने अपने पोते की तरफ दूध का गिलास बढ़ाते हुए कहा तोह अर्जुन शांति से

बोलै, "दादी वो रात को किताब पढ़ते हुए टाइम का पता नहीं चला. फिर शायद ज्यादा हे सो गया आज." और दूध पीने लगा.

"कोई बात नहीं बीटा. पहले सेहत फिर म्हणत. चल तू दूध पीने के बाद एक बार अपने चाचा का फ़ोन मिला कर डीओ एक्सचेंज से. 2 महीने हुए बात नहीं की."

कौशलय जी वह से उठते हुए बोली. अर्जुन ने हां में सर हिला दिए. माधुरी दीदी रसोईघर में चूल्हे की सफाई कर रही थी. और रेखा जी आता लगा रही थी नाश्ते

के लिए. दोनों के खरबूजे ाचे से हिल रहे थे. अर्जुन ने गहरी नजर डालने के बाद धयान हटा लिए. रेखा जी ने तिरछी नजर से अपने बेटे की ये हरकत देख ली

थी. "दादी, लीजिये फ़ोन लग गया. चची जी है लाइन पर." अर्जुन ने अपने चाचा के घर फ़ोन करने के अपनी चची जी से हाल चल पूछने के बाद कौशलय जी

को बुलाया. फिर काफी देर तक दादीजी बातें करती रही और फ़ोन रखने के बाद अर्जुन से बोली, "तेरी चची अभी पहले से ठीक है लेकिन अभी ज्यादा सफर नहीं

कर सकती. वो तेरी दोनों बहनो के इम्तिहान शुक्रवार तक ख़तम हो जायेंगे तोह नरेंदर दोनों को यहाँ छोड़ जायेगा. महीने भर से ज्यादा की छुट्टिया है उनकी."

"वाह प्रियंका और आरती दीदी आ रही है. आखिरी बार तोह उन्हें पता नहीं कब देखा था." अर्जुन ने चहकते हुए ये बात कही थी. पिछली दिवाली पर सिर्फ उसके

चाचा हे आये थे क्योंकि चची की तबइयत ठीक नहीं थी तोह वो और उसकी दोनों लड़किया पंजाब में रुकी थी.

"चल चल अब तू भी अपना खाना पीना कर फिर मेरे साथ पड़ोस में भी चलना है." इतना बोलकर दादी भी कड़ी हो गई. बहार आकर देखा तोह अलका दीदी दादाजी से

बात कर रही थी. वो अभी आई थी स्कूटरी सीख कर. "है तोह आज तू पूरी छुट्टी मन रहा है?" दादा जी ने बैठ ते हुए अर्जुन से कहा तोह वो सिर्फ मुस्कुरा दिए.

कुछ देर उनकी बातें सुनता रहा फिर ऋतू दीदी का ध्यान आया. "वो अलका दीदी ऋतू दीदी कहा है? दिखाई नहीं दे रही." अर्जुन की बात सुनकर अलका दीदी ने मुस्कुराते

हुए कहा, "क्यों क्या कोई जरुरी काम था क्या ऋतू से?"

अर्जुन थोड़ा हिचकिचाया तोह अलका दीदी बोल पड़ी, "वो प्रीती के घर है. उसके दादा जी आज काम से पास के गांव गए है तोह ऋतू उसके घर चली गई. शाम तक आ

जाएगी." अर्जुन तोह सुनकर हे हैरान हो गया के ऋतू दीदी कब चली गई. और अभी तोह खुद अलका दीदी स्कूटरी सीख कर आ रही है तोह प्रीती दीदी मतलब अकेले

उनके घर?" उसको सोच में उलझा देख अलका दीदी बस ख़ामोशी से हंसती रही और फिर सब खाना खाने लगे. अर्जुन भी नाश्ता कर के दादी को पड़ोस के घर छोड़कर

सीधा छोल पूरी के घर चल दिए. उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था. बेल्ल बजाई तोह पारवती ने अंदर का दरवाजा खोल कर गेट पर अर्जुन को देखा. "दीदी अर्जुन

भैया है." उसने अंदर की तरफ आवाज दी फिर जवाब सुनकर वही से बोली, "भैया अंदर हे आ जाओ."

अर्जुन अंदर गया तोह पारवती वापिस रसोईघर में जाकर खाना बनाने में लगी थी. ड्राइंग रूम खाली था लेकिन साथ के कमरे से आवाज आ रही थी. अंदर गया तोह

ऋतू दीदी बीएड से तक लगाए एक तकिया पेट पर रख कर प्रीती से बातें कर रही थी. अर्जुन को देखते हुए सिर्फ मुस्कुराई और वापिस बातें करती रही. दीदी का

चेहरा अभी भी कुछ लाल था लेकिन चेहरे पे कही दर्द नहीं था. प्रीती ने पीछे मुड़कर देखा तोह अर्जुन को देख खुश होते हुए अपनी जगह से उठकर ऋतू दीदी

की बगल में बैठ गई. अर्जुन भी बीएड पर बैठ गया.

"आज बड़े लोग हमारे घर पर कैसे?" प्रीती ने ऋतू दीदी के हाथ पर ताली देते हुए कहा तोह अर्जुन ने उसकी आँखों में भरपूर प्यार से देखते कहा, "वो हमारे

घर की रौशनी आज यहाँ आ गई तोह फिर मई वह अँधेरे में क्या करता." अपने भाई का इस तरह उसकी तारीफ करना ऋतू दीदी के चेहरे पे एक बड़ी मुस्कराहट ले आया.

"वैसे दीदी आप आई कब यहाँ? मैंने तोह आते देख भी नहीं आपको?"

"वो भाई तू सो रहा था और जब छोल अंकल गए तोह प्रीती आई थी घर पे तोह मई इसके साथ आ गई यहाँ थोड़ा सोने के लिए. वह अलका डिस्टर्ब कर रही थी. अभी

बस उठी थी की तू आ गया." उनकी बात सुनकर अर्जुन को बात जाँच गई थी की दीदी अगर घर पर होती तोह सब नहाने और खाने को बोलते फिर शायद वो सवाल भी

करते अगर वह दर्द में दिखती. "ाचा तुम दोनों बातें करो मई नाहा के आती हु." प्रीती उठते हुए बोली तोह अर्जुन ने उसके टीशर्ट को देखा जो सीने पर कासी थी

और कमर थोड़ी दिख रही थी. "चल तू इधर आ के बैठ जा." अर्जुन ने देखा के अब बीएड पर प्रीती नहीं थी, वो गेट पर कड़ी उसको देख रही थी लेकिन ऋतू दीदी

की उस तरफ पीठ थी. ऋतू दीदी के पास बैठते हुए उसने पुछा, "अब कैसी है आप?" अपने भाई को चिंता में देख वो मुस्कुराई, "अरे मई बिलकुल ठीक हु. पेनकिलर

ने अपना काम कर दिए था. और फिर सुबह एक बार बर्फ से मालिश की थी ाचे से. और यहाँ आराम करने के बाद तोह बिलकुल ठीक हु. बस अभी अगले इम्तिहान तक तू

मेरे पास मत आना." सब बात वो दोनों बहुत हे धीमी आवाज में कर रहे थे. दोनों एक दूसरे के बिलकुल मुँह के पास हे थे. ऋतू दीदी ने अपने भाई के होंठो को जल्दी

से चूमा और सीढ़ी हो गई. अर्जुन हैरानी से देखता रहा. "मैंने कहा न तू पास नहीं आएगा. मेरा जब दिल कर मई आ सकती हु." ये बोलते हुए उन्होंने बहार भी

नजर मार ली थी. पारवती का ध्यान काम में हे थे. पारवती ने आवाज दी खाने के लिए कुछ देर में तोह दीदी ने अर्जुन से कहा, "तू ड्राइंग रूम में बैठ मई दूसरे

कमरे का बाथरूम उसे करके आती हु." अंदर भी ये आवाज प्रीती ने सुनी थी जो अपने बदन को पोछने हे लगी थी. ऋतू दीदी उठकर चली गई लेकिन अर्जुन कुछ सोचता

वही खयालो में गुम था. "खटक" हलकी आवाज से बाथरूम का दरवाजा खुला और हलके भीगे बदन पर सफ़ेद टोलिया लपेटे प्रीती बिना कुछ देखे सामने आधे खुले दरवाजे को बंद करने चल दी. दरवाजा बंद करते हे बिना कुछ देखे टोलिया बीएड पर उछाल कर अलमारी के सामने जा कड़ी हुई. एक सफ़ेद दिसिगनेर कच्ची में फसे उसके

दूध से सेफ गोल कूल्हे बहार को उभर कर अपनी ठोसता का आभास दिला रहे थे. अर्जुन का थूक उसके गले में हे अटक गया और प्रीती ने जब अलमारी के शीशे को देखा

तोह वो भी वही जम्म गई. शीशे में उसके नंगे गोल दूध, जो नेव्तोन के ग्रेविटी के सिद्धांत की अवहेलना करते दिख रहे थे उनके गुलाबी निप्पल तने हुए थे. फिर जैसे हे प्रीती को होश आया तोह उसने अपना टोलिया ढूंढ़ना शुरू किआ अपनी छाती पर हाथ रख कर. उसकी फूली हुई छूट भी उस सफ़ेद कच्ची में अपनी लकीर दिखती लगी.

अर्जुन ने नजर फिराते हुए टोलिया उसकी तरफ उछाल दिए. "जब धक् लो तोह बता देना." और नजर दिवार की तरफ कर ली. प्रीती जो पहले सुन्न हो गई थी अब उसका चेहरा

लाल पड़ गया था. "सब देख लिए और अब नजर हटा रहा है." खुद से मैं में बोलती वो टोलिया लपेट कर अर्जुन से बोली, "सॉरी. अब तुम थोड़ी देर बहार बैठो मई आती

हु." प्रीती वही कड़ी बोली. उसकी तरफ एक बार फिर देखते हुए अर्जुन खड़ा हुआ और दरवाजे की तरफ चल दिए लेकिन थोड़ा पहले रुक कर फिर बोलै, "सब मेरा है और

सब खूबसूरत भी है." और बहार निकल गया हँसते हुए. दरवाजा बंद करते प्रीती इतराती हुई बोल पड़ी खुद से हे, "हाथ तोह रख कर देख फिर बताउंगी किसका है."

और कपडे पहनकर बहार आ गई. अब तोह उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी अर्जुन को देखने की. उनको वही छोड़कर अर्जुन वह से निकल कर संदीप के घर की तरफ चल दिए.

किस्मत से संदीप गेट पर हे मिल गया और दोनों हालचाल पूछ कर पिछली मार्किट की तरफ चल दिए.

"वो नितिन है न वीडियो गेम वाला, शायद तुझे नाम नहीं पता लेकिन वही लड़का जिसकी दुकान पर हम गेम खेलते है. उसकी बहिन पता ली तेरे भाई ने." ये संदीप ने

अपना राज अपने जिगरी को बताया

"वो लड़की जो कभी कभी दूकान पर होती थी?" हैरानी से अर्जुन ने पुछा तोह संदीप हँसते हुए बोलै, "हां रे. बड़ी चालु चीज है वह. नितिन तोह गांव गया है

अपनी माँ को लेकर. Subah-shaam उसका बाप देखता है दूकान लेकिन दोपहर को वो अकेली होती है वह. चारु नाम है उसका. है तोह 4 साल बड़ी लेकिन भाई क्या मुट्ठ

मारती है मजा आ जाता है." उसकी बातें सुनकर अर्जुन तोह जैसे अथवा अजूबा देख रहा था. "भाई लड़की तेरी मुट्ठ मारती है?"

"है नहीं तोह अपनी खुद की मारेगी? और मई भी उसके संतरे कास के दबाता हु. बस थोड़ा खर्चा करवा देती है वह. पिछली बार नयी ब्रा मांग रही थी तोह आज

वही लेके जा रहा हु." संदीप ने अपनी कमीज की तरफ इशारा करते हुए हंसकर बताया.

"तोह तूने सबकुछ कर लिए क्या उसके साथ?" अर्जुन को भी मजा आने लगा उसकी बात सुनकर. चारु, 20-22 वर्ष की एक सांवली लेकिन किसी दुधारू गाये जैसी लड़की थी.

उसका बाप एक छोटा सी किरयाने की दूकान चलता था जो घर के बहार थी. घर के अंदर की तरफ से पहले कमरे में उनके बेटे नितिन ने वीडियो गेम का धंदा कर रखा

था जहा 4 गेम और टीवी लगे थे. उसका बाप अजीब आदमी था, पतला सा शरीर, हर समय हँसता सा चेहरा और सबसे ख़ास बात के दोपहर में 12 बजते हे एक पव्वा लगा

कर रोटी खा सो जाता था. फिर सीधा 5 बजे दूकान खोलता था. दोनों दोस्त ऐसे हे बातें करते वह पहुंच गए. गेट खुल्ला था तोह नितिन के नाम की आवाज लगा

कर वीडियो गेम के कमरे में आ गए, जो पूरी तरह से खाली था. वैसे भी यहाँ ज्यादातर बचे शाम में हे आते थे और अभी कुछ के इम्तिहान चल रहे थे या

जिनकी छुट्टिया थी वह ganv-rishtedari में गए होते थे.

खुल्ले गले के एक पीले सूट में उनकी तरफ आती चारु को देख कर अर्जुन भी उसके शरीर को निहारने में लग गया. "ये अर्जुन है मेरा जिगरी." संदीप ने चारु की तरफ

अर्जुन का ध्यान करते कहा और कमीज के अंदर से एक पॉलिथीन निकल उसकी तरफ बढ़ा दिए. वो ये देख कर थोड़ा संकोच करने लगी तोह संदीप फिर से बोलै, "देख ये

अपना सबसे ाचा दोस्त है और ऐसा वैसा लड़का नहीं है." अर्जुन ने हाथ जोड़कर चारु को नमस्ते की तोह वह एकदम से हंस पड़ी. ब्रा की थैली लेते हुए बोली, "है

देख कर हे लगता है जैसे Maa-baap ने ाचे संस्कार दिए है. तुम बैठो में एक बार आई." इतना बोलकर वो पलटी तोह संदीप ने उसकी गांड पर हाथ फेर दिए सलवार

के पर से हे. "पहले देख कर आने दे न." थोड़ा नाराजगी से उसने कहा और फिर अंदर जाने के बाद 5 मिनट बाद वापिस आई. अर्जुन तोह गेम चला कर कोई कार रेस खेल रहा था इधर उसने पीछे चारु एक प्लास्टिक के स्टूल पर संदीप के साथ बैठ गई. अर्जुन के कानो में 5 मिनट बाद सिसकियों की आवाज आई तोह उसने पलट कर देखा

संदीप का लुंड चारु की मुट्ठी में था और वो उसके कमीज में हाथ डालकर बूबे दबा था था. फिर उसने अपना एक हाथ चारु की छूट पर रखा तोह उसने हाथ हटा दिए.

"यहाँ नहीं. पिछली बार वाला काम कर देगा और मई ऊँगली करती रहूंगी सारा दिन." और फिरसे उसका लुंड हिलने में लग गई.

"एक बार करने दे सच कहता हु इस बार निराश नहीं करूँगा. तू जो बोलेगी वही दिलाऊंगा तुझे." संदीप का लुंड, जो चारु की मुट्ठी से एक इंच हे बहार था वो हलकी

पानी की बुँदे निकलता दिख रहा था.

"पक्का? और अगर मुझे बीच में छोड़ दिए तोह फिर दूंगा तोहफा लुंगी तेरे से" चारु कैसी लड़की है ये तोह अर्जुन को थोड़ा समझ में आ चूका था. कामुक, गरम और

लालची. अपनी सलवार निचे करते हुए चारु का ध्यान अर्जुन की तरफ गया तोह बोली, "देख ले शायद जिंदगी में लड़की की छूट कभी देखने के मिले या न." उसका तंज

सुनकर अर्जुन सिर्फ मुस्कुरा दिए लेकिन संदीप हल्का नाराजगी में बोलै, "इसका देख लिए न तोह फिर किसी और का तेरी इसमें नहीं लेगी." चारु ने सलवार के निचे कच्ची नहीं

पहनी थी और उसके मोठे सांवले कूल्हे, भारी जाएंगे खूब मादक लग रही थी. छूट पर बाल भी थे जो शायद 15-20 दिन पहले काटे होंगे. वह से छूट ाचे से

नजर न आ रही थी लेकिन अर्जुन वही बैठा रहा.

"ऐसा है क्या? Kad-kaathi देख कर तोह लगता है तेरे से लम्बा हो लेकिन जैसा तू कह रहा है मुझे नहीं लगता के ऐसा कुछ होगा." चारु ने संदीप की जीन्स भी

उतार दी थी. लकड़ी का 6 फुट लम्बा बेंच पड़ा था जो खेलने वाले ज्यादा हो तोह बैठने के काम का था, चारु दोनों टाँगे फैला उसके ऊपर लेत गई और संदीप

उसके सामने खड़ा हो गया. "ये चढ़ा ले." एक गुलाबी कंडोम जो उसने चील के संदीप को दिया और संदीप ने भी लुंड पर वह पहन लिए. कंडोम भी थोड़ा सा खुला हे

दिख रहा था लुंड के हिसाब से लेकिन रबर की वजह से अटक सा गया था. चारु की कमीज ऊपर सरका कर दोनों बड़े चुनचे बहार निकल संदीप ने अपना लुंड उसकी

छूट पर रखा और एक धक्के में पूरा अंदर. "सीई.. आह." चारु ने सिसकी ली और फिर संदीप बिना देर किये धक्के लगाने लगा. 1 मिनट के बाद वह चारु के

ऊपर पसरा हुआ था. "सच में तू नाह मुट्ठ हे मरवाया कर. देख ले तेरा वादा." इतना बोलकर चारु ने संदीप को धकेल सा दिए और वह खिसियाता हुआ अपने लुंड से

कंडोम उतारने लगा जिसमे 2 बूँद हल्का सफ़ेद पानी था उसका. "तूने पहले ज्यादा हिला दिए था न तोह उसका हे नतीजा है. नहीं तोह मई 10 मिनट तेरी ाचे से लेता."

इतना बोलकर वह पंत बंद करने लगा और अर्जुन बस ख़ामोशी से उनको देखता मुस्कुराता रहा. "तू बड़ा हंस रहा है. तू भी इसके जैसा हे होगा लिख के ले ले मेरे

से." चारु छूट की गर्मी से गुस्साए हुए हे बोली. उसकी चाटिया भी फड़क रही थी. "किसी को जाने बगैर उसके बारे में बात नहीं करते चारु जी."

"तोह वह क्यों बैठा है. मई भी देखु तेरे पास कितना दम है." लगता नहीं था के कोई लड़की ऐसे भी काम में अंधी हो सकती है जो लड़के को खुद बुलाने लगे.

अर्जुन उठकर उसके पास खड़ा हो गया. "ये जगह ठीक नहीं है. दिन का समय है और कोई आ गया तोह दोनों बीच में रह जायेंगे." अर्जुन सिर्फ उसपर तरस खा कर हे

ये बोल रहा था. वो खुद भी उसके साथ कुछ करना नहीं चाहता था. बस उसको शांत करना था.

"बहार का गेट बंद करके कमरे के बहार नजर रख." चारु ने ये बात संदीप से कही थी और उसने वही किआ भी. "तू यहाँ बैठ." उसको बेंच पर बिठाते हुए

चारु ने अर्जुन की पंत पर हाथ रख दिए. "पहले कितनी बार किआ है?" अर्जुन इसलिए पूछ रहा था के कोई मसला न हो जाये. "मई ऐसी वैसी लड़की नहीं हु. एक से

प्यार करती थी उसने 6-7 बार किआ था फिर वह यहाँ से दूसरे शहर चले गए. तेरे दोस्त से पहले बस उसके साथ हे किआ था. अब लगा कर दोनों किसी काम के नहीं रहे."

और फिर उसकी चैन के ऊपर से सहलाने लगी. "सोच लो एक बार फिर से बाद में पछतावा न हो क्योंकि मई तुम्हे प्यार नहीं करता." अर्जुन को ठीक नहीं लग रहा था ऐसे

उसके साथ ये सब करना लेकिन वह तोह खुद अदि हुई थी. "निकल इसको बहार." इतना बोलै तोह अर्जुन ने पंत निचे कर दी और स्प्रिंग की तरह उछलता उसका लुंड बहार निकल

आया. 8 इंच से भी कुछ लम्बा, गुलाबी और किसी लकड़ी सा सख्त. लुंड देख कर हे चारु की छूट ने पसीने बहा दिए. "ये .. ये सच में ऐसा है?" वो घबराई से बोली.

"मैंने तोह पहले हे कहा था तेरे को की मेरे दोस्त का देख कर तेरा क्या हाल होगा." संदीप ने चारु की हालत देखते हुए कहा, वो प्लास्टिक का स्टूल गेट की तरफ

करके बैठा था और गेम चला राखी थी.

"मुझे ये लेना है." चारु ने इतना बोलते हुए अपनी कमीज भी पूरी उतार दी और अर्जुन के लुंड को सहलाने लगी. एक थैली जैसे पर्स से एक और कंडोम निकाल

कर उसने अर्जुन के लुंड पर चढ़ाना शुरू किआ तोह वह फसा हु चढ़ रहा था. अर्जुन ने उसको दोनों लटकते चुनचे पकड़ लिए और मसलने लगा. एक तोह पहले हे

संदीप ने उसको बीच में छोड़ कर आग भड़का दी थी दूसरा इतना तगड़ा लुंड उसके हाथ में, छूट तोह वापिस गीली होने लगी. वो वापिस बेंच पर लेत गई और

अर्जुन को ऊपर खींचने लगी. दोनों चुके हाथ में जकड़े अर्जुन उसके ऊपर आ गया, पेअर जमीन पर हे ठीके थे. एक काले निप्पल को चूसते हुए उसने एक बार फिर

से चारु की आँखों में देखा जिसमे विनती थी की घुसा दे जल्दी से. अपना विकराल लुंड उसने चारु की फैली टैंगो के बीच छूट पर फिराया तोह कंडोम पर भी पानी

चिपक गया. छूट उसके लुंड के सामने धक् से गई थी और निप्पल कड़े हो चुके थे. "ये मुँह में रखो." लेते हुए हे अर्जुन ने जमीन से उसकी कमीज उठा कर दी.

कुछ सोचते हुए चारु ने कमीज एक जगह से तेह लगा के मुँह में दबा ली और इधर अर्जुन ने निशाना लगा दिए उसकी फैली हुई टांगो के बीच में. सारे अवरोध पार

करता उसका लुंड सुपडे से आगे तक छूट के अंदर जा बैठा. चौर तोह हाथ पेअर हिलने लगी पहले हे धक्के से. अर्जुन वही रुक झुके हुए हे उसके गाल सहलाता

दूसरे हाथ से एक दूध मसलता रहा. 2-3 बूँद खून छूट के किनारो से बहार आ चूका था. जब सांस बराबर हुई तोह अर्जुन ने उसके मुँह से कपडा निकाल दिए

"मुझे नहीं लेना ये. बहार निकाल लो." दर्द भरी आवाज में चारु ने ये बात कही तोह अर्जुन लुंड को बहार खींचने हे लगा था के चारु ने वापिस हाथ पकड़ लिए

उसके. "कुछ करो मेरा. प्लीज. एक बार खाली कर दो, चाहे जितना गया है उतने से हे. पूरा तोह मई लेकर मर जाउंगी." अपनी हे बात से पलट ते हुए उसने वापिस

अर्जुन को खींचा. कंडोम चिकना था तोह अर्जुन ने हलके से लुंड थोड़ा बहार किआ और उतना हे अंदर. वो ऐसे हे 5 मिनट तक करता रहा अपने 3-4 इंच लुंड के भाग

से. अब छूट भी थोड़ी तैयार थी तोह दर्द के साथ चारु की सिसकिया भी निकलने लगी.. "आह. ऐसे हे करता रह. मेरा होने वाला है." और फिर 2 मिनट बाद वह

झड़ने लगी. आधे से काम लुंड ने हे उसको झाड़ दिए था. 10 मिनट की इस चुदाई से हे वह बेसुध होने लगी थी. "हो गया तुम्हारा?" अर्जुन ने इतना पुछा तोह दर्द

के साथ चारु के चेहरे पे एक मुस्कान भी आ गई. आँखे झपकते हुए उसने हां कहा तोह अर्जुन ने लुंड बहार खींच लिए. उसपर छूट का खून और पानी दोनों लगे

थे. कंडोम वही फ़ेंक उसने पंत ऊपर की और संदीप को बोलै, "चले भाई?" चारु और संदीप हैरानी से देख रहे थे उसको. "तुम्हारा अभी हुआ भी नहीं?" चारु

ने कहा जो कड़ी होने लगी तोह फिर दर्द की वजह से लेत गई. "कहा था न ये जगह सही नहीं है न इतना समय है. अभी खड़ा नहीं हुआ जा रहा तुमसे. और मैंने

ये सिर्फ तुम्हारी गर्मी शांत करने के लिए किया है." इतना बोलकर वापिस चारु की तरफ जा कर उसने कमीज सीढ़ी कर उसके हाथो में दी और निचे बैठ कर उसके परिओ

में सलवार पहनाने लगा. "पहन कर आराम कर लेना. बिना कपड़ो के किसी ने देख लिए तोह बदनामी हो जाएगी." चारु तोह बस चुपचाप उसको घूर रही थी. कहा तोह

वो जिस्म की आग में रंडी जैसे व्यवहार कर रही थी और दोनों को बुरा भला कह दिए था. और अब उसको पछतावा हो रहा था. आँखों से आंसू तोह तब भी निकले थे

जब उसका लुंड छूट में गया था लेकिन अब पछतावे के आंसू बहने लगे.

"तुम ाची लड़की हो. किसी ने प्यार के नाम पर सिर्फ तुम्हारे बदन से प्यार किआ. वही तुम मेरे दोस्त के साथ करने लगी. बेहतर होगा अगर किसी ाचे लड़के से प्यार

करो या फिर शादी. अगर संदीप पसंद है तोह तुम दोनों हे ये सब करो. और गलती मेरी भी है कही न कही. अपना ध्यान रखो और आराम करो." इतना बोलकर वो तोह

संदीप के साथ निकल लिए लेकिन चारु सिर्फ यही सोचती रही की कैसा लड़का था. सामने नंगी लड़की पड़ी थी और खुद का काम किये बिना वो बस मेरी गर्मी जला के चला

गया. एक बार मेरे होंठ तक नहीं चूमे. फिर लंगड़ाती हुई अंदर चल दी.

"भाई क्या वो लड़की पसंद नई आई थी तुझे?" संदीप ने ये बात घर की तरफ चलते हुए अर्जुन से कही.

"वो बात नहीं है दोस्त. देखा तूने उसको के वो कैसे तड़प रही थी. वो अपना चरित्र और मर्यादा भी भूल गई थी जिस्म की आग में. लेकिन कोई बाजारू लड़की तोह नहीं थी

न?" अर्जुन उसके बारे में बातें करता मालती को भी सोच रहा था. जो पक्की बेशर्म थी लेकिन चारु मजबूर थी.

"लेकिन तू अपना काम तोह कर लेता." संदीप ने फिर कहा.

"उसका दिल ये बात किसी ऐसे पल में ये बात कहता जब हम दोनों अकेले होते और ाचे से jaan-pehchaan, दोस्ती या प्यार होता तोह भाई मई जरूर करता. बुरी लड़की नहीं

है, हो सके तोह तू इसका गलत फायदा मति उठाइयो आगे से. या फिर अगर ठीक लगे तोह दोस्ती कर ले उस से." संदीप अर्जुन की बात ध्यान से sun-samajh रहा था.

उसको घर के बहार हे छोड़ कर वह अपने घर की तरफ चल दिए. ज्योति आस भरी नजरो से बस घर के अंदर से उसको जाते देखती रह गई.
 


अपडेट 29

संयंम (कण्ट्रोल)


घर आने के बाद कुछ देर आराम करने के बाद फलाहार किआ और स्टेडियम चल दिए वह.

स्टेडियम के प्रवेश द्वार में घुसा हे था के प्रीती भी स्कूटरी से बराबर आ गई. लेकिन आज उसने स्पोर्ट्स वाला पजामा पहना था, पहले की तरह स्कर्ट नहीं.

"आज अलग ड्रेस में हो?" उसने बस इतना हे कहा प्रीती से साइकिल कड़ी करते हुए.

"अब दिल नै करता यहाँ स्कर्ट में आने को. वैसे भी ये ज्यादा ठीक है." थोड़ा शरमाते से उसने कहा. कंधे पर उसका राकेट टेंगा था और हाथो में 2 हरी टेनिस

की बॉल थी जो पहले एक प्लास्टिक से स्कूटरी के आगे तंगी हुई थी.

दोनों साथ चलते हुए आगे तक आये फिर प्रीती हाथ हिलाकर अपने अभ्यास कोर्ट की तरफ चल दी जहा पहले हे कुछ लड़किया उसकी तरफ देख रही थी. शायद रोज हे

वो लोग आपस में अभ्यास करती थी.

"कौन थी वो छोटे भाई?" पास से आती इस भारी आवाज को सुनकर अर्जुन मुस्कुराता हुआ पलटा विकास पुनिअ की तरफ जो पीछे हे चलता आ रहा था. एक नीली निक्कर

और लाल बनियान जैसी टीशर्ट में.

"भैया मेरे बचपन से बस एक वही मेरी बेस्ट फ्रेंड है. घर भी साथ है दोनों का. " उसने हाथ मिलाते हुए कहा तोह विकास ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी ब्याह

उसके कंध पर रख दी प्यार से. "देख छोटे भाई लड़की ाची है और जिस तरह एक दूसरे को देख रहे थे तोह हो तोह तुम प्रेमी जोड़े लेकिन चल छोड़ ये सब. दिल

न तोडियो उसका और म्हणत कर जम्म के." वो ऐसे हे चलते जा रहे थे कुछ लोग हैरानी से उन्दोनो की तरफ देख रहे थे लेकिन विकास पहलवान के सामने कोई नै

बोलता था. कोच साहब थोड़ी दूर उस चलने वाली पट्टी पर हे खड़े उनकी तरफ देख रहे थे. विकास ने उनके पास जा कर पहले तोह उनके पाँव छुए फिर संधू जी

ने उसको गले से लगाया. "मेरे बचे. तुझ पे बड़ा नाज है मुझे. देखते देखते बड़ा भी हो गया और इस बार तोह उज़्बेकिस्तान जा रहा है एशिया खेलने."

"गुरु जी आपने हे तोह बॉक्सिंग से हटा के कुश्ती में लगाया था. और इतनी म्हणत तोह हमारे कोच ने भी नहीं की जितनी आप करते आ रहे हो. Maa-baap की हालत न थी

उस टाइम मेरी डाइट की. अब सब आपका दिए हुआ तोह आप हे तोह हो मेरे गुरु, maa-baap." हाथ जोड़े तोह कोच साहब ने भी उसके हाथ पकड़ कर सर सहलाते हुए कहा, "तेरी

म्हणत और तपस्या है ये सब. मैंने कुछ नई किआ मेरे बेटे सब तू हे कर रहा है और भगवन." फिर अलग होने से पहले विकास ने अर्जुन का कान खेंचते हुए गुरूजी से

कहा, "इसकी भी जून सुधार दो गुरूजी. घोड़े जैसा शरीर है इसका थोड़ा सा लोहा ठोको इसके भी." "और छोटे भाई, ये जो भी करते है भले के लिए करते है."

"विकास तुम दोनों ाचे से जानते नहीं शायद एक दूसरे को. यही मिले हो न?" अर्जुन तोह चुपचाप खड़ा उन दोनों की तरफ देख रहा था.

"डॉ. शंकर जी सुपुत्र है ये" संधू जी की बात सुनकर एक बार तोह विकास बस ध्यान से देखता रहा अर्जुन की तरफ फिर जोर से चिपका लिए अपने से. "मई भी बोलू

गुरूजी ये लड़का हे क्यों खास दिखा मुझे. आँखों और शरीर को ध्यान से न देखा मैंने. छोटे भाई तेरे पिताजी भी एक बड़ी वजह है मेरी सफलता के पीछे."

"चल फिर कभी गुणगान कर लिओ. जा अपनी प्रैक्टिस कर और इसको मेरे साथ चलने दे." संधू साहब ले गए खींच कर अर्जुन को कुछ समझ नहीं आया. और जब

विकास कुछ बोलने लगा तोह दोनों को अलग कर दिए.

"बलबीर.. ोये बलबीर. चल कल वाली प्रैक्टिस करवा इसको. कसरत आज 40 मिनट करनी है, 25 नहीं." और फिर वही दोनों गयम की तरफ चल दिए. भुजाओ, कंधे, छाती

की मचिनो पर 3-3 सेट कर के कल की तरह दोनों किनारे पर मुक्केबाजी का चलते चलते अभ्यास करने लगे.

"वो तू उस लड़की को कैसे जानता है भाई? बास्केटबॉल वाली" बलबीर ने बात शुरू की.

"ऐसे हे. बस यही मुलाकात हुई थी. क्यों कोई बात है क्या?"

"भाई थोड़ी खतरनाक है दूर रहियो. थप्पड़ खा चूका हु एक साल पहले उस से और उसकी 2 सहेलियों से." गाल सहलाता हुआ वो याद हे करने लग पड़ा था.

"वो दोस्त है मेरी." थप्पड़ तोह अर्जुन ने भी खाया था लेकिन उसको पता था के वजह क्या थी.

"दोस्त है तोह भी ध्यान रखिओ. टेढ़ी लड़की है कब दिमाग घूम जाये जाटनी का पता नहीं. कुश्ती वाले खिलाडी भी पेल चुकी वह और उसकी सहेलिया." बलबीर के

स्वर में चेतावनी जाहिर थी. लेकिन उसके आँखे अब फ़ैल गई जब सामने से वही चलती उनकी तरफ आ रही थी, मंजूबाला.

"भाई ये तोह इधर आ रही है." बलबीर को लगा जैसे कल लड़कियों की टाँगे ताड़ते देख लिए होगा.

"सुन एक बार." बलबीर की परवाह किये बिना मंजू ने बोहोत धीमे से अर्जुन को देखते कहा फिर नजर निचे कर के बोली, "सॉरी. प्रैक्टिस के बाद एक बार मिलके जैव काम

है कुछ." और बिना कुछ कहे वह से वापिस चली गई.

"ये इसको क्या हो गया? और सॉरी बोली या कुछ और? भाई चल क्या रहा है तेरा इसके साथ?" बलबीर थोड़ा थक गया था तोह आराम करता खड़ा सा पूछने लगा

"कुछ नहीं भाई. कल मेरे हाथ से बोतल चूत कर इसपर गिर गई थी. पानी गिरने की वजह से थोड़ा गुस्सा हो गई थी. बस इतनी सी बात थी." वही खड़ा वो

अपने मुक्के और पेअर चला रहा था. शरीर से पसीना पानी की तरह बह रहा था और बाजु थोड़े फूल से गए थे.

दोनों वापिस अपनी जगह पहुंच गए तोह पहली बार जोगिन्दर जी ने अपने हाथ में लिए छोटे तोलिये से अर्जुन का चेहरा साफ़ करते हुए अपने बेंच पर बिठाया.

"2 दिन और यही प्रैक्टिस करनी है. फिर मई तुझे किट पर हाथ चलने बताऊंगा. हो सके तोह अपनी डाइट बढ़ा और एक निक्केर और सांडो ले लिओ. यहाँ आने के बाद

बदल लिए कार्यो."

"जी सर." उसने इतना हे बोलै तोह कोच ने एक मिनट उसको देखा फिर बोले, "तू सवाल नहीं पूछता कभी कोई. मई जैसे बोलता हु तू करने लग जाता है. कभी दर्द हो

या मैं न हो तोह बता सकता है. मई फौजी नहीं के हर बात किसी पक्के निर्देश की तरह माने चाहे दर्द हो."

"सर, पहली बात तोह दादाजी ने ये सिखाई की शिक्षा के समय कभी संदेह नहीं करना क्योंकि जो गुरु है वह गलत नहीं होता. दूसरी बात के अभी तक तोह आपने खुद

मेरी देखभाल के लिए बलबीर भैया को लगाया हुआ है, गलती कैसे होगी. और जिसदिन आप मेरी क्षमता से अधिक काम लेंगे तभी पता लगेगा की मई सहकर सोना बनूँगा

या टूटकर राख. " उसकी बात और समझदारी देख उन्होंने हाथ फेरा उसकी पीठ पर और बोले, "ाची बात है. वो विकास है न उसकी बात शायद पूरी नहीं हुई तू

ये भी jaan-na चाहता है. सुन, तेरे पिताजी अपनी कुछ कमाई यहाँ भी भिजवाते है. अंडर 16 के समय विकास के पास दिल्ली टूर्नामेंट के लिए न पैसे थे, न उचित

खेल का सामान. डाइट भी बस साधारण सी थी. फिर तेरे पिताजी से मैंने बताया था इसके बारे में की ाचा लड़का है, प्रतिभाशाली है. उन्होंने 10 हजार खुद आ कर

दिए थे इसको. उनकी लगभग पूरी तनख्वाह. और अगले 3 साल तक हर महीने 2 हजार दिए बस बदले में एक वादा लिया था के खेल को ज़िन्दगी बना के रखना है."

अर्जुन चुपचाप सुन रहा था. उसको ाचा लगा था के उसके पिताजी ये भी सब करते है. "चल ाचा अब तू निकल और एक बात याद रखनी है, शरीर का जोर गलत

काम में कभी नहीं लगाना." उनके लफ्ज़ में गंभीरता थी. पहली बार अर्जुन ने झुक कर उनका आशीर्वाद लिए और वह से निकल लिए. जोगिन्दर जी भी थोड़े जोश से बाकी

खिलाड़ियों के साथ लग गए.

"अर्जुन." मंजूबाला की आवाज सुनकर अर्जुन साइकिल स्टैंड पर हे रुक गया. एक सिंपल ट्रैक सूट पहने वो उसकी और हे आ रही थी.

"बताये मिस." अर्जुन ने शरारत से कहा तोह वह एक पल को चुप सी हो गई और उसके चेहरे की तरफ देखती रही. फिर बोली, "कल के लिए सॉरी. वो जो भी हुआ उसमे दोनों

की गलती थी. मुझे तुम्हे मारना नहीं चाहिए था." बोलते हुए मंजू की नजर थोड़ी नीची हो गई कहते हुए. अर्जुन उसके बिलकुल पास चला गया.

"वो क्या है न जिसको आपने गलती कही न मिस, वो शायद एक ाचा एहसास था. और कई बार हम जिस चीज की कल्पना करते है और वो एकदम से हो जाये तोह बर्दाश्त भी

नहीं होता. क्यों? यही हुआ था न? लेकिन इतना खेलने के बाद भी हाथ बड़े नाजुक है." गाल सहलाते हुए अर्जुन ने कहा तोह मंजू ने अपनी आँखें ऊपर करि. लम्बी

पलके और स्याह काली आँखें. तीखे नक्श और छरहरा लम्बा शरीर. होंठ थोड़े पतले लेकिन बड़े कटीले थे. उसको अपनी तरफ ऐसे देखते हुए गरम मिजाज मंजू की

सांसें तेज हो गई. उसको ऐसे लगा जैसे आज तोह दिल हे बहार निकल जाएगा शरीर से.

"बस करो. ऐसे मत देखो न." आखिरी में सिर्फ इतना कहा तोह अर्जुन ने नखरे से कहा. "ठीक है अगर मेरा पास खड़ा होना पसंद नहीं तोह फिर चलता हु."

"रुको. एक बात केहनी थी. वो कल मेरी सुबह की प्रैक्टिस नहीं है और कॉलेज भी बंद है कल. तुम मेरे साथ फिल्म चलोगे? 2 साल पहले सिनेमा गई थी.." और फिर

हलके से उसको देखने के बाद निचे सर कर लिए. "9-12 के समय?" अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा. "नहीं कॉलेज रोड के सिनेमा का समय तो 10-1 है. मई यही स्टेडियम के

बहार 9:30 आ जाउंगी."

"फिर से अगर चांटा मारा तोह देखना. कभी आवाज नहीं सुनूंगा." नखरे से अर्जुन ने कहा तोह मंजूबाला थोड़ा झिझकते हुए बोली, "माफ़ी तोह मांग ली मैंने, वो भी 2

बार. अगर कोई सजा देनी है तोह दे सकते हो. लेकिन फिर कभी मई ऐसा नहीं करुँगी." "ाचा ठीक है. मजाक कर रहा था. वैसे भी ऐसे तोह तुम जितना बार मेरा

गाल सेहला लिए करो." उसने हँसके इतना कहा तोह दूर से हे प्रीती आवाज देती आ रही थी. "सुनो. मई साथ चलूंगी." और पास आ गई. आते हे उसने बिना hil-hujjat के

मंजू का हाट पकड़ के खुद से मिला लिए. "Hello, बड़ी ाची गेम है यार बास्केटबॉल की. कोंग्रटुलतिओन्स फॉर नेशनल एंट्री. मेरा नाम प्रीती पूरी है." इतना बोलकर

वो दोनों की तरफ देखने लगी. "Hello, मई मंजूबाला नैन. वैसे गेम तोह तुम्हारी भी बड़ी ाची है. चर्चे है पूरे स्टेडियम में लेकिन सुना के अपना नाम वापिस ले

लिए तुमने अगले टूर्नामेंट से." मंजूबाला बड़े प्यार से बात कर रही थी जो खुद उसको हैरान कर रहा था क्योंकि उसकी आवाज से सख्ती गायब हे हो चुकी थी जैसे.

"यार क्या ये बिस्कुट कंपनी वाले टूर्नामेंट. अगले महीने ट्रायल है स्टेट के, देखते है वह क्या होता है. वैसे घर में सभी लम्बाई इतनी हे है क्या?" थोड़ा

गंभीर बात के बात प्रीती ने हँसते हुए माहौल ठीक करना चाहा. "हाहाहा. है मेरे पापा 6'3" के है बाकी तोह फिर माँ हे है."

"अब तुम दोनों ने ठान लिए है के रात करनी है तोह मई तोह चलता हु मेरे घर में एक थानेदार साहब है जो इन्तजार कर रहे होंगे." अर्जुन ने देख लिए था के

दोनों लड़किया भूल हे गई जैसे उसको.

"अरे चलते है बस. कल मिलते है मंजू." इतना कहकर वो स्टैंड की तरफ बढ़ गई. स्कूटरी थोड़ी पीछे कड़ी थी.

"लड़की तोह एक नंबर है तेरी दोस्त." मंजू ने ये बात कही तोह अर्जुन ने पलट के कहा, "तुम्हारी भी तोह है अब. चलो कल मिलता हु."

हाथ हिलाते हुए दोनों की तरफ देख मंजू भी हॉस्टल की तरफ चल दी और ये दोनों बहार आ गए.

"है तोह कुछ बोल रही थी. मेरे साथ चलना है. कुछ जरुरी काम है क्या?" अर्जुन थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा.

"वो अकेले दिल नहीं था जाने का." प्रीती ने आगे देखते हुए कहा तोह अर्जुन ने पलट कर जवाब दिए, "कल से मेरी साइकिल पर आ सकती हो अगर चाहो तोह." और हंसने

लगा. "ाचा कहा बिठाओगे. पीछे सीट तोह है नहीं." प्रीती शर्माती सी बात को बढ़ाते बोली

"यहाँ." आगे की तरफ इशारा करके बोलै तोह प्रीती को सुबह की बात याद आ गई और वह चुप हो गई. उसके चेहरे पे चाय लाली सब बया कर रही थी.

"गंदे हो तुम. पूरे गंदे." स्कूटरी को बराबर बनाये वो सिर्फ इतना हे बोली.

"वैसे तुम बहोत सुन्दर हो. और ये गन्दा तोह आज जैसे सुबह जन्नत में पहुंच गया था तुम्हारी वजह से." स्कूटरी के ब्रेक लग गए थे तोह अर्जुन साइकिल घुमा कर

वापिस आया और बराबर लगा दी प्रीती के. दोनों तरफ सिर्फ पेड़ थे और सेक्टर की तरफ जाती सड़क खाली थी यहाँ. प्रीती की आँखों में हलके आंसू थे और उन्हें

देख कर अर्जुन साइकिल कड़ी कर अपने हाथ से उसका चेहरा थम देखने लगा. "अगर तुम्हे बुरा लगा हो तोह मई कबि कोई मजाक नहीं करूँगा. और रही बात सुबह की

तोह समझ लो की मैंने कुछ नहीं देखा." उसके आंसू हटते हुए उसने इतना कहा. "पागल - बेवकूफ. ये आंसू इस वजह से है की मई तुम्हारे इतने पास होकर भी दूर

रहती हु. मेरा दिल करता है तुम्हे गले लगाने का और प्यार करने का. लेकिन क्या तुम प्यार को बरकरार रख पाओगे या कही मेरे से कोई गलती हो गई तोह? बस कई

बार दिल भर जाता है की काश तुम मेरे साथ रहो. चाहे कुछ हे पल लेकिन सिर्फ तब तुम मेरे साथ रहो." और अब आंसू पूरी रफ़्तार से निकलने लगे थे.

"तुम मेरी हो प्रीती, और हमेशा मेरी हे रहोगी. इस दिल में सिर्फ तीन लोग है ऋतू दीदी, अलका दीदी और तुम. वो दोनों एक दिन शायद पराये घर चली भी जाए लेकिन

इस बार तुम्हे मेरे से अलग कोई नहीं कर सकता." और अर्जुन का धैर्य जवाब दे गया. सड़क के किनारे खड़े हे उसने प्रीती का चेहरा थाम रखा था वही उसने उसके

होंठ प्यार से चूम लिए. फिर आँखों पर प्यार करते उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बात जारी करते कहा, "मेरे लिए ये पारी आई थी तोह मेरी हे रहेगी."

अब प्रीती के चेहरे पे बस ख़ुशी थी, आँखें नम्म थी लेकिन एक मुस्कराहट के साथ अर्जुन को देख रही थी. जिसने किसी की परवाह न करते आज बीच सड़क अपना

प्यार जाता दिए था. चाहे सड़क खाली हे थी. "अब यहाँ से चले. वो मई थोड़ी देर बाद घर आउंगी, ऋतू दीदी मेरे घर हे पढाई कर रही होंगी उनको लेकर."

"ये नाराजगी ाचे से दूर करता हु तुम्हारी फिर." हँसते हुए वो दोनों फिर घर चल दिए.

रेखा जी आँगन में हे थी. अर्जुन को टीशर्ट उतार अंदर आते देख उनकी नजर अपने बेटे के शरीर पर हे जम्म गई. साइकिल की वजह से पसीना आया हुआ था और

लम्बा तगड़ा वो था हे. फिर खुद को संभल कर उन्होंने उसको टोलिया देते कहा, "पहले पसीना पॉच ले मई तेरे लिए कपडे निकल कर लाती हु." वो मुड़ी तोह

अर्जुन ने भी एक बार जाती अपनी माँ को देखा. इस उम्र में किसी नवयौवना सा आकर्षण था उनमे और उनकी चाल में. फिर वह पसीना पोछता वही कुर्सी पर बैठ

गया. रेखा जी ने एक साफ़ टीशर्ट और पजामा आज धुले कपड़ो से लाकर उसको दिए और सामने खड़े हो कर उसके बाल सहलाने लगी. ये नै बात नहीं थी कोई लेकिन

जैसे हे आज अर्जुन के चेहरे के सामने माँ का खुला हुआ पेट और उठा ब्लाउज आया, उसने उनकी महक सूंघने की कोशिस सी की. नाक हलकी सी उनके नंगे पेट के

ऊपर छु सी गई. मैं में हे एक आनंद से भरा झटका लगा रेखा जी की अपने बेटे के इस स्पर्श से. सुखद. अर्जुन उठकर सीधा बाथरूम में घुस गया और आँगन

में ऋतू दीदी और प्रीती की आवाज आई. "वो अर्जुन अभी आया नहीं क्या.?" ऋतू ने अपनी माँ से पुछा तोह बिना कुछ बोले बाथरूम की और इशारा करती वह अपने कमरे

में चली गई. "माँ को क्या हुआ है?" ऋतू दीदी ने प्रीती की तरफ देखते खुद से हे कहा. "हुआ तोह दीदी आपको भी बहुत कुछ है. सुबह चलने में कुछ फरक

दिख रहा था लेकिन अब शायद ठीक हो" प्रीती की बात सुनकर उसको गले से लगते बोली, "यार इतना बेध्यानी में थी जब उठी की पाँव फँसल गया. चल आजा मेरे

कमरे में जरा." प्रीती उनके साथ खींची सी चलती बस बाथरूम की तरफ देखती रह गई. "वो भी आ जायेगा क्यों मचल रही है?" उसको छेड़ते हुए कमरे में आई

जहा बिस्टेर पर किताबे फैलाये अलका दीदी सोइ पड़ी थी.

"महारानी जैसे सारा कोर्स ख़तम करके पड़ी है" ऊँची आवाज में ऋतू दीदी ने कहा तोह अलका आवाज पहचान बिना देखे हे बोल गई, "है तूने no कोर्स रात में

किआ वह तोह मेरे बस से बहार है. सोचा यही कर लू." एक बार तोह ऋतू दीदी की सांस अटक गई लेकिन बदलते हुए उन्होंने कहा, "ोये प्रीती आई है तुझसे मिलने."

अलका झटके में उठ कड़ी हुई, हमेशा की तरह उसकी टीशर्ट ast-vyast सी थी. "कभी तेरे सैंट्रो पर छिलका भी रख लिए कर. मान लिए सुन्दर है लेकिन ऐसे प्रीती

तोह तुझे पता है कितनी कमजोर दिल है." मसखरी करती ऋतू दीदी ने प्रीती की कमर पर चुटकी काट ली और वह उचकने के बाद शर्मा गई उनकी बात सुनकर.

"इसके पास भी है ये और मेरे से ज्यादा हे आकर्षक लग रहे ऊपर से देखने पर. इजाजत तोह देख लू जरा सहलाकर." अलका दीदी की बात सुनकर प्रीती हड़बड़ाती

सी अलग होने लगी. "अरे मजाक कर रही है वह. तू बैठ जरा मेरे साथ. अलका यार कॉफ़ी बना ले अपने लिए." ऋतू दीदी अलका दीदी के खड़े होते हे पसर गई

और सिसकी निकल गई छूट पे तकिये की रगड़ से. "ऋतू, यहाँ भी मजे ले रही है क्या?" अलका ने छेड़ते हुए कहा और बहार निकल गई.

"आपको हुआ क्या है दीदी.? बताओ न. चेहरे कुछ अलग बता रहा है और चमक भी रहा है. लेकिन शरीर सुबह से बिलकुल विपरीत इशारे कर रहा है." प्रीती

बिस्टेर से तक लगाती बोली. "अरे इशारे विशारे छोड़ ये बता चेहरा तेरा भी अलग चमक रहा है. अर्जुन ने पकड़ तोह नहीं लिए था तेरे बर्फ के गोलों को."

खिलखिलाती ऋतू दीदी ने ये बात कही तोह प्रीती शर्माती ना में सर हिलने लगी. "मतलब उसने नहीं पकडे लेकिन तेरा दिल है उसको पकड़वाने का?"

"दीदी, बस करो न यार. आप न मेरी सभी ाची दोस्त भी हो और मेरे मजे भी लेती रहती हो." प्रीती ने मायूसी से कहा.

"ाचा ाचा अब सुन मेरी बात जरा. देख प्यार वो भी तेरे को बहुत करता है लेकिन तू खुद हे भागती रहती है. अब ऊपर जाएगा तोह पकड़ ले अकेले में वो बैल

बुद्धि तोह कुछ कहने से रहा अपनी तरफ से." ऋतू दीदी प्रीती की तड़प को ाचे से समझ रही थी.

"आपने भी पकड़ा है क्या उसको?" प्रीती ने नहले पर दहला मारा. "क्योंकि प्यार तोह आपका भी वही है."

"चल तू भी तोह मेरा अक्स हे है, तुझसे क्या छुपाना. मैंने कई बार किश किआ है उसको और उसने भी लेकिन तू जानती है हम दोनों की सिचुएशन में फरक है. तुझे

उसके साथ किसी ने देखा तोह तुम दोनों की शादी पक्की और मेरे अर्जुन की प्यार का कोई भविष्य नहीं है. तोह मुझे जितना मिलता है मई अभी ले लेती हु." ऋतू दीदी

की इस प्यार भरी सचाई में एक विरह का दुःख भी था. फिर वो प्रीती का सर सहलाने लगी. "वो न अभी उतना समझदार नहीं है din-duniya के लिए. बस तू अपने प्यार

से उसका सब दिखा लेकिन हमेशा उसका साथ देना." और अलका कॉफ़ी के 3 कप लेकर अंदर आ गई. "ये Nanad-jethani का हो गया हो तोह कॉफ़ी पी ली जाए." अलका भी

मजे लेने के हे मूड में थी. "ाचा दीदी, अलका दीदी का भी तोह शामे सिचुएशन है." थोड़ा झिझकते हुए प्रीती ने कहा तोह दोनों हंसने लगी. "इसको काम मत समझ

तू, अपने हिस्से का ये भी ले हे लेती है. कॉलेज में तोह सब अर्जुन को हे इसका बर्फ समझते है अब." ऋतू दीदी ने अलका को भी लपेटे में लेते कहा.

"है तोह देख इसको अपने बहिन के बर्फ को अपना भी बता दिए इसने कॉलेज में. अब सोच सब क्या कहेंगे ऐसे?" इतराते हुए अलका दीदी ने ये बात कही तोह दोनों हंस दी

प्रीती की तरफ देख कर. "चल तू भाग यहाँ से वो चला गया ऊपर. देखे आज तेरी हिम्मत भी जरा." ऋतू दीदी ने प्रीती को धकेलते से कहा और उनकी इतनी

देर से ऐसी बातें सुनकर वो थोड़ी हिम्मत से बहार निकल कर ऊपर चल दी. इन सब चीजों से बेखबर अर्जुन बस पजामा पहने बालो में हाथ फेर रहा था और

पीठ दरवाजे की तरफ थी. यहाँ आते हे अर्जुन को ऐसे देख प्रीती की तोह हिम्मत एकदम से जवाब दे गई. कमरे के दरवाजे पर हे वो अर्जुन को देखती कड़ी रह गई

"अर्जुन." बेहदयानी में उसने इतना हे कहा था का अर्जुन ऐसे हे नंगी छाती उसकी तरफ आ गया. "आओ बैठो यहाँ. मेरा कमरा ऐसा हे है अकेला रहता हु तोह कही

भी कुछ भी रख देता हु." उसने बोलते हुए सिंगल बीएड से सारे कपडे उठा कर निचे गिरा दिए और जगह बनाई. धीमे कदमो से प्रीती एक किनारे पर बैठ कर

बस अर्जुन के शरीर को देख रही थी. वो अपने गीले बाल सही कर रहा था. फिर वापिस कड़ी होकर उसने एकदम से सभी गिरे हुए कपडे समेटने शुरू कर दिए.

"क्या कर रही हो?" अर्जुन ये देख कर रुक गया लेकिन प्रीती सभी कपड़ो को समेत कर वही पड़ी एक कुर्सी पर रखने लगी. अर्जुन ने ऐसे हे उसको पीछे से पकड़

लिए. "अभी से आदत दाल रही हो क्या? अभी बहुत टाइम है. कमरे से ज्यादा मुझपर ध्यान देना चाहिए तुम्हे." अपनी गर्दन प्रीती के कंधे पर रख उसके गाल चूमते

कहा तोह वह सिमट सी गई लेकिन अर्जुन को अलग न किआ. उसको अपनी कमर पर अर्जुन के हाथो का घेरा ाचा लग रहा था. लेकिन खुद के झुक जाने से प्रीती के दूध

वही बाहो पर टिक से गए थे. "छोड़ो न प्लीज. फिर कोई आ जायेगा."

"ऊपर कौन आएगा?" प्रीती को अपनी तरफ घूमते अर्जुन ने कहा और उसके चमकते चेहरे को थाम कर होंठो को मुँह में भर लिए. प्रीती की आँखें बंद हो गई थी

और हाथ अर्जुन की पीठ पर कास गए थे. कितने दिन और रात वो इस सबके बारे में सोचती तड़पती रहती थी लेकिन अर्जुन के इस एक स्पर्श से उसका पूरा शरीर महक

गया था. थोड़ी हे देर में उसने भी अपने होंठ चलने शुरू कर दिए. दोनों के हाथ एक दूसरे के पीछे थे. बस अर्जुन के हाथ प्रीती की पीठ से फिसलते उसकी

कमर पर रुके और उसने प्रीती को खुद से चिपका लिए. ऐसे हे जकड़े दोनों इस मधुर चुम्बन में तब तक डूबे रहे जब तक सांस लेना हे मुहाल न हो गया हो. फिर अलग

हुए तोह अर्जुन प्रीती के चेहरे को प्यार से देखने लगा लेकिन प्रीती ने उसकी छाती पर हाथ रखते हुए बिस्टेर पर धकेल दिए. "बस लेते रहो." Neeli-hari आँखों

के डोरे लाल हो गए थे और दोनों पेअर अलग दिशा में करती वह उसके ऊपर बैठ कर वापिस उसके होंठ चूमने लगी. दोनों हाथ अर्जुन की छातियों पर फिर रहे थे. होंठ

छोड़कर जैसे हे अर्जुन की कमर पर बैठी वापिस उछाल गई. "तंग कर रहे हो." उसको लगा की अर्जुन ने जान बूझकर उसकी वागिना को सलवार पर से हे टच किआ.

"मैंने क्या किआ.." दोनों हाथ दिखते कहा तोह प्रीती वापिस बैठी और फिर अपने कूल्हों के बीच उस दहकती मोटी रोड को फील करने लगी. बिना कुछ कहे उसके माथे

पर शिकन सी आ गई. "तुम एब्नार्मल हो?" प्रीती ने ऐसे हे कहा तोह अर्जुन ने प्यार से उसके गाल पर हाथ रखते वैसे हे जवाब दिए, "गिफ्टेड. बूत वे अरे नॉट गोइंग

तहत वे." और उसको अपने सीना पर लिटा लिए. ऐसे हे उसकी पीठ सहलाता वो बोलने लगा, "मेरा दिल बस यही करता है. तुम्हारा धड़कता दिल मेरे सीने से लगा रहे."

प्रीती भी देख रही थी की अर्जुन ने न उसके हिप्स पर हाथ रखा था, न किश करते हुए ब्रेअस्ट्स पर. बस वो उस से दिल से प्यार कर रहा था. "तुम्हे बुरा लग रहा

होगा न की मई इस से आगे कुछ नहीं कर रही?" प्रीती ने ये बात कही तोह अर्जुन मुस्कुराते हुए बोलै, "तुम्हारा दिल है आगे बढ़ने का? लेकिन मई तोह चाहता हु बस ऐसे

हे तुम्हे देखता राहु और चूमता राहु. एक बार आगे बढे तोह जो दर्द तुम्हे होगा उसकी कल्पना मई नहीं कर सकता." फिर से उसका चेहरा अर्जुन ने चूम लिए.

"मेरा दिल है लेकिन. सिर्फ इतना की तुम मुझे यहाँ से पकड़ के एक किश करो. एक हॉलीवुड मूवी में देखा था मैंने. फील करना चाहती हु." प्रीती ने अपने कूल्हों की तरफ

इशारा करते कहा तोह अर्जुन बैठ गया उसको अपनी तरफ मुँह किये हे, गौड़ में लिए. एक होंठ को अपने दोनों होंठो में दबाये वो प्रीती के दोनों गुदाज कूल्हे दबाने लगा.

फिर जीब को चूसते हुए कूल्हों की दरार को हलके अलग करता गर्दन पर जीब फिरने लगा था. उसका अजगर अब प्रीती के खजाने पर रगड़ खा रहा था और कूल्हे दबाये

जाने से प्रीती भी अपनी कमर अर्जुन के लुंड पर घिसने सी लगी थी. सख्त गुब्बारों पर आने से पहले हे उसने अपना चेहरा दूर कर लिए. और मजे से आँखे बंद करके

बैठी प्रीती को देखने लगा. उसकी कमर चलते चलते हे रुक गई और अपनी बड़ी बड़ी आँखोने से अर्जुन को देखती जैसे पूछ रही हो, रुक क्यों गए.

"अगर इस से आगे गए तोह फिर घर नहीं जा पाओगी. और फिर 2 दिन बिस्टेर पर रहने का क्या जवाब डौगी?" अर्जुन की बात का मतलब समझ शर्मा कर उसकी नंगी छाती

पर हलके मुक्के चलती बोली, "ऊपर ऊपर से भी तोह.."

"कुछ भी ऊपर से नहीं होगा अगर मुझे वो नजारा दिखा फिर से जो सुबह दिखा था. मुझ में संयम है लेकिन तुम्हे एक बार फिर से वैसे देखा तोह नहीं रहेगा." और चुमतेहुए प्रीती को बाहों में लिए उठ गया. प्रीती का शरीर हल्का नहीं था लेकिन अर्जुन ऐसे उठाये हुए हे निचे खड़ा हो गया. "खाने का समय हो गया है. अब

जरूर माधुरी या कोमल दीदी आएँगी ऊपर. चलो खुद हे चलते है. एक बार बाहों में भर के फिर दोनों निचे आ गए.

अर्जुन हाथ धोने बाथरूम में गया तोह ऋतू दीदी ने प्रीती को पकड़ लिए. "आ गई मानो मलाई खा कर?" "पूछ लेना आप हे खुद." और अपने घर की तरफ दौड़ सी गई.
 
विल पोस्ट अपडेट टुमारो मॉर्निंग.
 
अपडेट 30

रेंज बिस्टेर


"वो कल कोई जरुरी काम तोह नै कर रहा कोई?" खाने के वक्त आज रामेश्वर जी भी वही बैठे थे और अर्जुन से बात शुरू करते उन्होंने पुछा.

"बताइये दादाजी. कही जाना है क्या?" अर्जुन तोह यही सोच रहा था के अलका दीदी का इम्तिहान तोह परसो है और ऋतू दीदी का उस से अगले दिन. तभी तोह मंजूबाला को उसने

है बोल दिए था चलने के लिए.

"वो कल एक बार बड़ी मार्किट चले जाना टाइम मिले तोह. तेरी बॉक्सिंग की ड्रेस लेनी है और वही पंसारी से ये सामान भी लेते आना." एक पर्ची उन्होंने ऊपर की जेब

से निकल कर दी और साथ में 2000 रूपए.

"वो दादाजी हमे भी कुछ चाहिए थे." ये अलका दीदी की आवाज आई जो सामने ऋतू दीदी के साथ हे बैठी थी.

"बोलो लुक्मी बीटा. जो भी चाहिए बताओ." दादा जी ने प्यार से कहा तोह अलका दीदी ने ऋतू दीदी की तरफ देखा जैसे उनसे इशारो में कुछ पूछ रही हो.

"ट्रेडमिल." ऋतू दीदी ने इतना बोलै और फिर चुप हो निचे देखने लगी.

"टाडेमिलल? तुम वह दौड़ने वाली मशीन की बात तोह नहीं कर रही कही बीटा?" चौंकते हुए रामेश्वर जी ने कहा तोह दोनों सेहमी सी हाँ में सर हिलने लगी.

"हाहाहा. ाची बात है ये भी लेकिन वह ये कहा ला पायेगा. अर्जुन मार्किट के प्रवेश द्वार पर हे जीवन की खेल के सामान की दूकान है. उसको बोल देना की पंडित

रामेश्वर शर्मा के घर एक ट्रेडमिल भिजवा दे. और बाकी बात फ़ोन पर कर लेगा." एक तरफ से ऋतू दीदी और एक तरफ से अलका दीदी ने दादा जी झप्पी दाल ली.

"दादा जी आप बेस्ट हो. थैंक यू सो मच." दोनों बस यही बोलने लगी तोह रामेश्वर जी हँसते हुए हे बोले. "अररि मेरी बच्चियों ने इतनी ाची चीज की फरमाइश करि

है भाई, ये नालायक तोह सड़क पर दौड़ता है लेकिन तुम दोनों ने सही बात करि. और फिट होना तोह सबसे जरुरी है." कौशल्या देवी जी रोटी प्लेट में रखते हुए

हे बोली, "कल को वो बन्दुक मांगेंगी फिर भी कह देना के ाची बात है." वो ऐसा कभी नहीं बोलती थी पता नहीं क्या सोच कर उन्होंने ये कहा. "वो तोह भगवान

अब तुम्ही दिला सकती हो. मई तोह अदना सा हवलदार हु थानेदारनी का." उनकी बातों पर सब हंसने लगे लेकिन दादी तोह आज कुछ सोच के हे बैठी थी.

"ये दोनों पहले हे घर का कोई काम नहीं करती. शादी होगी फिर घरवाले को क्या खिलेंगी? माधुरी का रिश्ता तोह इस बार मई करके हे आउंगी इस बार कृष्ण ने

एक लड़का देखा है. फिर उसके जाने तक इनको काम तोह सीखना पड़ेगा या वह शादी तक घिसती रहेगी?" कौशल्या जी का सख्त मिजाज देख कर दोनों बहनो का मुँह

उतर गया था. "ये दोनों जो चाहे वो करेंगी. एक ने डॉक्टर बन कर घर का नाम रोशन करना है दूसरी ने ब करके बहार जाना है. 2 कामवाली रख लो घर में

लेकिन तुम इन्हे कुछ नहीं कहोगी." रामेश्वर जी नाराजगी से बोलकर चुप हो गए लेकिन ऋतू अलका ने जब आपस में ताली मारी तोह उन्होंने अपनी घरवाली को भी हँसते

देखा. "ये शैतान की नानी है दोनों. खुद इन्होने कहा था मुझे आपको ये बोलने के लिए और आपने भी इनका साथ देकर दिखा दिए की घर में ये 2 आपकी जान क्यों

है." और हँसते हुए चूल्हे की और चल दी जहा ललिता जी और लोगो के लिए प्लेट लगा रही थी और रेखा जी रोटी सेक रही थी.

"इतना आगे का कैसे सोच के रखती हो तुम?" रामेश्वर जी ताज्जुब से बोले. "वो आपने हे कहा था न दादाजी, आज के साथ आने वाला कल भी तैयार रखकर चलो.

दादी ने जब कहा के अब आप लोग दीदी के रिस्ता पक्का करने वाले हो और हमको घर का काम करना पड़ेगा तोह मैंने उन्हें बोल दिए था के हमारे दादाजी कामवाली

रखवा देंगे लेकिन हमारी पढाई के बीच में किसी को नहीं आने देंगे. और दादी ने शर्त लगाईं थी अब वो हार गई." ऋतू ने चहकते हुए कहा और अलका के गले

लग गई.

"तोह थानेदारनी जी शर्त में क्या हार गई आप?" रामेश्वर जी ने अपनी बीवी को छेड़ते कहा तोह उन्होंने सामने से कहा, "वो मूई दौड़ने वाली मशीन पर pehan-ne

वाले कपडे और जूते." एक बार फिर सब हंस दिए. अर्जुन तोह बस अपने घर को देख रहा था जो हमेशा इतना खिला खुश रहता था. और जब कृशनचंद शर्मा

का जीकर हुआ तोह वो अपने दादाजी से बोलै. "गांव वाले दादाजी आएंगे यहाँ या आप जाएंगे वह?"

"तेरे विनोद चाचा के कल लड़का हुआ है. 6 दिन बाद पूजा है और फिर गेहूं भी तैयार है. उसने तोह कहा था सबको आने के लिए लेकिन तेरी दादी ने कहा के

ऋतू, अलका तोह अभी जा नहीं सकती और पीछे संजीव भी है. फिर प्रियंका और आरती भी होंगी यहाँ तोह सिर्फ घर के बड़े हे जा रहे है. माधुरी और कोमल

को साथ लेकर." रामेश्वर जी ने खाना ख़तम करते ये कहा.

"मतलब ये हुआ की आप, दादीजी, taauji-taaiji, मेरी माँ, माधुरी दीदी, कोमल दीदी और मई?" अर्जुन ने चहकते हुए कहा तोह दादाजी ने उसकी शकल देखते कहा

"तू यही रहेगा और तेरा बाप भी जा रहा है वह पे. गर्मी की छुट्टियों में चला जाइयो गाँव अभी तुझे इस शहर से एक दिन के लिए भी कही भेजना. वैसे

भी अगर हम 1-2 दिन के लिए जाते तोह भी बात थी. वह तोह पूरा हफ्ता लग जायेगा. लड़के वाले भी आएंगे, फिर कुलदेवी के मंदिर जाना है और जमीन के

कागज़ का भी कुछ काम है कचहरी में." और उठ गए वह से.

"कब जा रही हो दादी आप लोग?" अर्जुन ने उदास स्वर में ये बात कही तोह दादी जी हंस पड़ी. "बीटा नरेंदर आ जाये फिर जायेंगे. और देख तेरी भलाई के लिए

हे कहा है तेरे दादा जी ने."

"और पापा वह कैसे जायेंगे. वो तोह छुट्टी करते नहीं?" थोड़ा हैरान होते कहा उसने

"उसका बाप बुलाये तोह उसको भी जाना पड़ता है." हंसती हुई सी वो अंदर की और चल दी अपनी थाली हाथ में लिए.

अर्जुन ने देखा तोह माधुरी दीदी बार बार उसकी तरफ हे देख रही थी. जैसे कोई बात करना चाहती हो उस से. अर्जुन ने ध्यान दिए तोह ऊँगली के इशारे से वह

ऊपर का इशारा कर रही थी. उसने सिर्फ हलके हां में सर हिला दिए दीदी को देखते हुए. ऐसे हे सब खाना खा चुके तोह कौशल्या जी ने अलका को अर्जुन को बुलाने

भेजा जो अपने कमरे में थे ऊपर. अलका दीदी अर्जुन के कमरे की और चल दी. इस समय एक हल्का खुल्ला सूती कुरता और खुली सलवार में पतंग सी उड़ती अलका दीदी

जा पहुंची ऊपर जहा अर्जुन कोई किताब बड़े ध्यान से पढ़ रहा था सोफे पर अकेला बैठा. कुछ देर तोह अलका दीदी ने देखा की ये सच में हे पढ़ रहा है या वैसे

टाइम पास कर रहा है लेकिन उसको थोड़ी देर बाद पन्ना पलट ते देखा तोह दबे पाँव उसके पीछे जा कड़ी हुई और जैसे हे उसकी तरफ अपने हाथ बढ़ाये, अर्जुन

ने साइड हो कर उनके दोनों हाथ पकड़ अपने हे ऊपर गिरा सा लिए. "मेरे कान हर तरफ रहते है दीदी और फिर आपके हाथ तोह आ भी रौशनी की तरफ से रहे थे."

बोलता हुआ वो उनके चेहरे पर झुक गया. 1 मिनट बाद जब दोनों के होंठ अलग हुए तोह अलका दीदी जैसी प्यासी सी उसको देखने लगी. "आप शायद किसी काम से आई

थी क्योंकि इस समय अगर मेरे पास मिलने आती तोह ऐसे आने की जगह मेरी गॉड में आ जाती." अर्जुन की बात सुनकर अलका दीदी ाचे से उसके गॉड में आकर बैठ

गई. "कर ले 2 दिन और इन्तजार तू. फिर ये तेरी गफ तुझे बताएगी ये शरारत कितनी महंगी पड़ती है." और चूमकर फुर्ती से कड़ी हो गई. "दादी बुला रही है

तुझे. चल आजा साथ लेकर आने को कहा है." मुस्कुराती से दरवाजे पर जा कड़ी हुई. कुछ हे देर में दोनों हे रामेश्वर जी के कमरे में थे. अलका तोह बिस्टेर पर

बैठ गई दादी के सिरहाने और अर्जुन खड़ा था. "हांजी आपने बुलाया मुझे?" Dada-dadi की तरफ देखते पुछा.

"तू यहाँ बैठ और ये पूरे ख़तम करने है. और लुक्मी बीटा तू खुद रसोईघर में जा और बड़ा गिलास दूध का बना के लेकर आ." कौशल्या जी ने पिस्टे और काजू

से आधी भरी कटोरी अर्जुन को थमते हुए अलका दीदी को दूध लाने को भेजा.

"आज से ये रोज तेरी खुराक का हिस्सा है. कोई हो या न हो ये सामने दोनों डब्बे रखे है जहा से इतना हे रोज शाम को सोने से पहले लेने है और एक गिलास दूध."

ये बात रामेश्वर जी ने कही. अर्जुन ने आराम से वो खाने शुरू किये तोह रामेश्वर जी ने आगे बात बधाई, "सुन बीटा, मेरी तोह उम्र ज्यादा हो चली है. ज्यादा

bhaag-daud नहीं होती. तेरा बाप और ताऊ कभी भी घर के लिए समय नहीं निकाल पाते. अब संजीव ने भी साफ़ मन कर दिए है के वो 2 साल नौकरी कर के अपना

कारोबार शुरू करेगा." कुछ देर रुक कर उन्होंने अपनी धर्मपत्नी की तरफ देखा तोह उन्होंने हामी भरी. "ऐसा अर्जुन अभी गाँव जाने का कारण है एक जो नहीं बताया

लेकिन जो मई अब बताऊंगा वो बात तू मानेगा, अगर तुझे मेरे फैंसले पर कोई शक या दिक्कत हो तोह अभी बता देना उठने से पहल." अर्जुन को तोह बात का पता नहीं था

उसने सिर्फ हां कहा.

"तेरे छोटे दादा शुरू से हमारी जमीन की भी देखभाल करते आये है. उस से होने वाला मुनाफा आधा उनको मिलता है क्योंकि सबकुछ वही देखते है लेकिन अब कुछ

बदलाव आ गए है उनके परिवार में भी. उनके 3 बचे, तेरी 2 बुआ और तेरा चाचा विनोद आजकल थोड़ा ठीक व्यवहार नहीं कर रहे मेरे छोटे भाई से. उसने कल मुझे

बताया था की अब जमीन की अलग रेगिस्टरी करवा लो कही कल को कुछ ऊंच नीच न हो जाये. तेरे बाप और ताऊ को मैंने बताया था तोह वो मेरे साथ जाने के लिए

तैयार है लेकिन ये सब वो भी नहीं संभालेंगे. तोह ये तेरे नाम करने का फैंसला हुआ है. बस मेरी इत्छा है की हमारे चले जाने के बाद तू उसको बेचना मत.

विनोद ने तोह तेरे कृष्ण दादा के हिस्से की आधी जमीन बेच कर होटल खोल लिए, कुछ उसमे से अपनी बहनो की तरफ भी कर दिए. ये जमीन हमारे पास पीढ़ियों से

रही है और पहली बार इसमें से कुछ हिस्सा बेच दिए गया. जब तक किरशन जिन्दा है वह देखभाल करता रहेगा तेरे नाम होने के बाद और मई भी वह साल में 4

बार जाता रहूँगा. लेकिन फिर ये जिम्मेदारी तुझे उठानी पड़ेगी बीटा. और तेरे चाचा नरेंदर को उसकी आमदनी हर साल देनी पड़ेगी. कर पायेगा ये सब?"

"आपने जो भी कहा कभी मैंने मन किया क्या? और अभी तोह आप सब है हे तब की तब देखेंगे लेकिन जैसा आपने कहा वैसा हे होगा. बस पहले जो भी लक्ष्य है

उनपे हे काम करते है न." सुलभ मैं से अर्जुन ने ये बात कही तोह रामेश्वर जी ने उसको थपथपाते हुए कहा, "बस बीटा पाना आचरण और संस्कार मत बदलना.

तू हे इस परिवार को परिवार बना के रख सकता है, ये मई जानता हु. चल अब तू आराम कर अपने कमरे में." और अर्जुन कुछ सोचता सा वह से उठकर खाली गिलास

ले रसोईघर में आ गया जहा उसकी माँ रेखा जी और माधुरी दीदी बर्तन और चूल्हा साफ़ कर रहे थे. "आ गया मेरा बचा. आज कहा सोयेगा?" रेखा जी की आँखों

में एक अलग हे प्रश्न था लेकिन अर्जुन ने बिना कुछ समझे सिर्फ इतना कहा, "ऊपर छत्त पर माँ. वैसे कल मेरा दिल है के आपके साथ सोउ अगले 2-3 रात. फिर आप

चली जाएँगी एक हफ्ते के लिए." बेटे का प्यार देख कर उन्होंने अपने दिल की बात दबा कर सर पे हाथ फिर दिए. "है तोह जब भी दिल करे तू आ सकता है मेरे

पास सोने. अब रात हो गई है चल तू जा." फिर अर्जुन दीदी की तरफ देखता पहले छत्त पर बिस्टेर लगाने चला गया और वह से अपने दूसरी मंजिल वाले बाथरूम

में नहाने. वह भी वो प्रीती को याद कर के मुस्कुरा रहा था. कीतिनि ाची है और कैसे नासमझो वाली बातें कर देती है. लेकिन है तोह मेरी हे वह. देखते

है जब घर कोई नहीं रहेगा तब क्या करते है.

ऐसे हे सोचता वो कुछ ज्यादा हे देर तक नाहटा रहा फिर बिना कच्चे के पजामा पहन ऊपर छत्त पर चल दिए. दीदी शायद पहले हे आकर लेत गई थी. थोड़ा मजे

में वो भी उनकी चद्दर में जा घुसा. दीदी को पकड़ कर उनके होंठ चूसने लगा अपना एक हाथ सीधा उनके बड़े दूध पर रख कर. वो शायद कुछ ज्यादा हे टाइट लगे

तोह मैं का वहां समझ बस ऐसे हे दोनों होंठ मुँह में भर के बारी बारी चूसने लगा. अब दीदी भी उसके सर पर हाथ फेर रही थी. टीशर्ट की अंदर हाथ

डालकर जैसे हे अर्जुन ने उनका एक मुलायम बड़ा चुका पकड़ा तोह उसको पता चल गया के ये माधुरी दीदी नहीं है लेकिन अब दीदी तोह उसका हाथ कास कर अपने चुके

पर दबाने लगी थी. "कोमल दीदी" इतना हे सोच पाया था के छत्त पर किसी के चढ़ने की आवाज सुनकर दोनों अलग हो गए और कोमल दीदी ने तोह मुँह चादर से बहार

हे निकल लिए. "वो अर्जुन, रात को छत्त पर कितनी शान्ति और ठंडक होती है न? कूलर की हवा में बी इतना मजा नहीं आता." कोमल दीदी जैसे बातें करने का

नाटक करने लगी और इधर माधुरी दीदी पानी की बोतल और 2 तकिये उठाये उनके पास आ गई. "ाचा तोह आज तू भी ऊपर हे सोने आ गई?" उन्होंने तोह आते हे

कोमल दीदी को पहचान लिए, अर्जुन सोचने लगा की उसके साथ ये गलती कैसे हो गई. शायद वो ज्यादा हे मस्ती में था.

"नीचे दिल नहीं था सोने का तोह मैंने सोचा मई आज ऊपर आ जाऊ? आपको ाचा नहीं लगे क्या?" कोमल दीदी माधुरी दीदी से बड़ा प्यार करती थी और माधुरी दीदी

भी. "अरे नहीं रे ऐसा थोड़ी कभी हो सकता है. बस तू इस साइड हो और मुझे बीच में सोना है." वो उन दोनों के बीच आती हुई बोली. दोनों को पता था के दीदी

थोड़ी डर्टी है तोह हँसते हुए उन्होंने उनको जगह बना दी. अर्जुन ऐसे हे उन दोनों की बातें सुनता रहा कुछ देर लेकिन कुछ देर बाद कोमल दीदी की आवाज आणि बंद

हो गई तोह उसने अपने हाथ माधुरी दीदी के ऊपर रख कर कुर्ती के ऊपर से हे उनके दूध सहलाने शुरू कर दिए. एक हे मिनट में उनके निप्पल कपडे पर से हे उभर

कर अर्जुन की उँगलियों में दबने लगे थे.

"आराम से करना भाई. संभल कर कही कोमल न जाग जाये, वैसे ये कुम्भकर्ण उठेगी तोह नहीं." और अर्जुन की तरफ मुँह करके दोनों एक दूसरे को चूमने लगे.

"दीदी आपकी स्किन कितनी मुलायम है लेकिन यहाँ से ये कितने टाइट है. ऐसा क्यों?" अर्जुन ने होंठ हटा कर उनके दोनों बड़े दूध मसलते हुए कहा तोह वह अँधेरे

में मुस्कुराती बोली, "भाई ये भी ढीले हो जाते है बस एक लम्बे आरसे तक कोई इन्हे मसले और पीले तोह. लेकिन मई चाहती हु मेरी शादी होने तक बस तू इन्हे

नरम कर दे." और फिर भावुक हो कर अर्जुन को चूमने लगी और खुद हे उसके हाथ से अपने मॉटे चुके उस से मसलवाने लगी. "इनको ाचे से रगड़ और दबा.

कभी कभी तोह सोचती हु हर रात तेरे कमरे में चली औ जब तू ऊपर नहीं होता." सिसकती सी माधुरी दीदी अब बुरी तरह उत्तेजित हो चुकी थी और एक हाथ

से अपनी छूट को सलवार के ऊपर से रगड़ रही थी. "दीदी आप कपडे खोलो कही फिर ऐसा न हो के बीच में रह जाए. या फिर नीचे चलते है वह ज्यादा सुरक्षित

है." अर्जुन ने समझते हुए कहा. माधुरी दीदी ने अपने दोनों हाथो से सलवार निचे कर दी और कमीज ऊपर चढ़ा लिए. "ये आज बहार नहीं निकलती अगर कोमल जाग भी

तोह बस निचे करना है." दोनों के ऊपर एक चादर करते हुए उन्होंने अपने दोनों दूध बेपर्दा कर लिए थे. पूरी छाती पर जैसे वह दो बड़े चुके हे थे, और

उतना हे बहार को लटके हुए. अर्जुन ने पजामा घुटनो से नीचे कर माधुरी दीदी की टाँगे चौड़ी कर अपना लुंड उनकी चिकनी पानी बहती छूट पर हलके हलके

घिसना शुरू कर दिए. "भाई इन्हे ाचे से चूस." माधुरी दीदी के चुके उन्हें परेशां कर रहे थे जिनपर अब अर्जुन झुक कर मुँह रख चूका था. निप्पल मुँह

में ले चुसकते हुए दूसरे वाले को वह दबाता अपनी कमर भी उनकी छूट के बीच हिला रहा था. "दीदी आज आप पहल से हे गीली हो?"

"अरे जितनी बार तुझे देखती हु तभी ये पानी बहाने लगती है. इसको अब तेरी आदत होने लगी है. अब खोल दे इसका मुँह जरा." आज उनपर शायद काम का नशा

पूरा हावी हो चूका था. अर्जुन भी चाहता था के जल्दी हे फारिग हो जाये. दिन में 3 बार उसका खड़ा हो कर बैठा था तोह अभी ज्यादा हे फूल चूका था.

"लो दीदी. बस चीखना मत." उसकी बात सुनकर माधुरी दीदी ने अपने मुँह पर तकिये का सीरा रख लिए और अर्जुन ने अपने मोठे सुपडे को छूट पर टिका कर एक

माध्यम सा धक्का लगा दिए. "कछह" और हर बार की तरह माधुरी दीदी की छूट इस तगड़े लुंड के अंदर जाने से रबर के चले की तरह फ़ैल कर लुंड के

ird-gird चिपक गई. "आह दीदी. अंदर से ये आज ज्यादा गरम है." गीली गरम छूट में लुंड 4 इंच तक फिसल गया था. थोड़ी देर उनके मॉटे दूध दबाते वह

उनके कान को चूमने लगा. दीदी ने आज ाचे से बर्दाश्त कर लिए था उसका लुंड. कुछ देर बाद उन्होंने होल से उसके कान में कहा, "पूरा दाल दे इस बार." अर्जुन

ने अभी तक तोह उतने लुंड से हे धक्के नहीं लगाए थे. दीदी की बात सुनकर वह चुपचाप सा उनका चेहरा देखने की कोशिसत करने लगा. "दाल दे फिर सीधा काम

शुरू कर डीओ." एक बार फिरसे इतना बोलकर अब उन्होंने तकिया वापिस मुँह पर रख उसके चूतड़ों पर थपकी सी दी जैसे कह रही हो के चल चढ़ाई कर दे. अर्जुन ने

हल्का सा लुंड पीछे किआ तोह उसको भी छूट गीली महसूस हुई. घुटनो को ाचे से थाम कर उसने करारा धक्का दे मारा और लुंड लगभग पूरा अंदर जा घुसा.

माधुरी दीदी को इतना दर्द हुआ के बढ़ानी में उन्होंने कोमल का हाथ कास के पकड़ लिए. अर्जुन ने कुछ देर तक उन्हें पहले की तरह हे सहलाना जारी रखा और फिर

उनपर झुक कर लुंड थोड़ा खींच कर अंदर बहार करने लगा. छूट तोह अभी भी किसी कोरी लड़की जैसी हे थी. ाची रगड़ के साथ लगते धक्को से माधुरी दीदी

भी दर्द और थोड़े मजे में सिसकती अपना हाथ कोमल की कलाई पर दबती रही, जो अब आँखे खोलकर कुछ समझने की कोशिसत कर रही थी. उसको ये सब दिख रहा

था की कैसे अर्जुन दीदी के ऊपर चढ़कर धक्के लगा रहा था और माधुरी दीदी की गर्दन कभी अकड़ती तोह कभी वह अर्जुन को अपने ऊपर खींच लेती. कुछ देर तक बस हलके धक्को की ठप्प ठप्प, माधुरी दीदी की हलकी सिसकियाँ हे सुनाई दे रही थी. फिर अर्जुन की नजर जब कोमल दीदी पर पड़ी तोह वो उसको हे देख रही थी.

जैसे हे अर्जुन के धक्के तेज होने लगे तोह माधुरी दीदी के आहे अब खुलकर निकल रही thi..."Aah अर्जुन ऐसे हे .. आई माँ. श्श्श.. पूरा अंदर भर .. आह

जोर से मेरे भाई.." "दीदी मजा आ रहा है?" अर्जुन भी किसी घोड़े के जैसे अपने नीचे दबी माधुरी दीदी के गदराये बदन को मसलता बोलै. कोमल और अर्जुन बस

एक दूसरे को देख रहे थे. उसने अब बेरहमी से लम्बे धक्के लगाने शुरू कर दिए. माधुरी दीदी तोह उसकी ताकत देखते हुए किसी बारिश सी झड़ने लगी लेकिन छूट के ज्यादा गीले होते हे अर्जुन ने उनके कूल्हे पकड़ उनको घूमने को कहा. वो अब बिना बोले खुलकर हे करना चाहता था. "पलटो न दीदी." अभी अभी झड़ी माधुरी दीदी न चाहते हुए भी पलटी तोह उनको घुटने पे कर अर्जुन ने लुंड सेट करते हुए करारा धक्का लगा दिए और बच्चेदानी तक सूपड़ा भीड़ गया इस गहरे धक्के से. "आह माँ. जानवर मत बन भाई. दुखता है. "सर तोह जैसे निचे हे लुढ़क गया था दीदी का. अर्जुन आराम से कर रे." अर्जुन एक लयबद्द तरीके से उनको पीछे से हे छोड़ने लगा और दोनों कूल्हे फैला कर गांड के छेद पर अपनी एक उंगली फेरने लगा. "तू वह क्यों छेड़ता है भाई. वैसे एक मस्ती सी छड्ड जाती है जब तू वह हाथ लगता है." माधुरी दीदी किसी गदराई गाये से खुद अपनी गांड हिला रही थी. "एक बार एक किताब में देखा था दीदी की लड़की यहाँ भी ले रही थी." अपनी ऊँगली निचे कर छूट के बहार से गीली करते हुए अर्जुन ने वापिस गांड के छेड़ पर रगड़ते अंदर डालनी शुरू कर दी. एक पूरा हे अंदर गया था की दीदी ने एक पल के लिए गांड हिलना रोक दिए. "पागल है क्या? जहा तेरी ऊँगली है वह जगह ये तेरा घोड़े जैस हथियार नहीं ले सकती. और वो गन्दी होती है." कुछ सोचता अर्जुन बस चुपचाप धक्के मारता रहा. अब तोह लुंड सुपडे तक बहार आ कर अंदर जा रहा था. पीछे पूरी ऊँगली अंदर बहार हो रही थी तोह दीदी की कमर भी थिरकने लगी. अर्जुन को ऐसे धक्के देने में दिक्कत होने लगी तोह उसने ऊँगली निकाल ली. "भाई, आह रहने देता न.. कोई नई.. यह मई गई रे.." इतना कह कर वह झड़ने लगी लेकिन अर्जुन हचक कर धक्के लगता रहा. वो निचे देह गई थी लेकिन अर्जुन का नहीं हुआ था. "भाई कुछ देर रुक जा. जलन होने लगी है."

"दीदी आप ऐसे हे लेती रहो." बिना कुछ और कहे उसने अपना choot-ras से गीला लुंड उनकी गांड की फांको में दबा उनके ऊपर लेटकर लम्बे धक्के देने लगा. लुंड

जितनी बार गांड के छेद से रगड़ खता आगे जाता दीदी सिसक उठती. कोई 2 मिनट बाद हे अर्जुन ने उनकी पीठ और गांड की दरार रास से भर दी. कोमल दीदी ने सारा

कार्यक्रम देखने के बाद एक बार प्यार भरी निगाह अर्जुन पर डाली तोह उसने हलके से उनका एक दूध दबा दिए और खड़ा हो कर पजामा पहन ने लगा. "ऐसे हे खड़ा

हो गया? कोमल देख लेती तोह?" माधुरी दीदी ने निगाह दोनों तरफ घूमते थोड़ा हलके शब्दों में अर्जुन को झाड़ा. निचे झुक कर उसने एक बार कास के दीदी को चूमा

और बाथरूम का बोलकर निकल गया. माधुरी दीदी भी एक साइड हो अपने कमीज से पीठ को साफ़ कर पसर गई. उनकी छूट इतनी लम्बी चुदाई से दुखने सी लगी थी. ऐसे

हे उनकी आँख लग गई. इधर अर्जुन एक बार फिर ाचे से नाहा के आया और कोमल दीदी के साथ आ कर चिपक गया.

"निचे चल." धीरे से इतना बोलकर कोमल दीदी बिना कुछ बोले चल पड़ी और अर्जुन तोह हैरान सा उनके पीछे हो लिए. वो तोह सोचा था के दीदी सो चुकी है और अगर

जाएगी भी तोह कण्ट्रोल करके उसके साथ बस सोयेंगी.

दोनों दूसरी मंजिल के ड्राइंग रूम में खड़े थे. "कब से चल रहा है ये सब?" कोमल दीदी का सवाल सुनकर अर्जुन ने कुछ न छुपाते हुए बोलै, "आज चौथी बार था.

और आपने तोह देखा भी था."

"देखा तोह था मैंने लेकिन ये तोह नहीं सोचा था के दीदी और तू इतना आगे हो. मुझे लगा के तुझे मई पसंद हु." कोमल दीदी की बात सुनकर अर्जुन ने उन्हें अपनी बाहो

में लेते कहा, "मैंने कभी मन किआ क्या दीदी आपको? और माधुरी दीदी तोह आपसे भी बड़ी है उनका भी हक़ है मेरे पर." कोमल दीदी ने भी अपनी बाहें उस पर कास

ली और बोली, "है तोह मई तोह शायद उनके जैसी नहीं लगती तुझे?'

अपनी दीदी का नखरा देख वो मुस्कुराते हुए उनका चेहरा थाम अपने होंठ उनके मुँह के पास ले आया, जीने बिना कुछ बोले कोमल दीदी ने भी अपने होंठो में भर लिए. कुछ

देर ऐसे हे चूमने के बाद अर्जुन बोलै, "दीदी ये हम आराम से करेंगे ऐसे जल्दबाजी में नहीं. आप बस अभी आराम से सो जाये ऊपर चलकर फिर जब भी आप बोलेंगी

मई आपके पास होऊंगा." साथ हे उनके कूल्हे सेहला दिए. थोड़ा शर्माती सी कोमल अपने छोटे भाई की बात समझ कर गर्दन हिला वापिस चलने लगी तोह अर्जुन ने उनका

हाथ पकड़ लिए. "लेकिन सोना मेरे साथ ऊपर चलकर." और फिर दोनों ऊपर आ गए. कोमल दीदी को पीछे से पकड़ कर वह चिपक के उनसे लेत गया. थोड़ी देर उनके आजाद

बड़े बूब्स मसलता वो उन्हें अपने से चिपकाए हे गहरी नींद में जा चूका था.
 
अपडेट 31

सिनेमा - एक और सफर


मैं के अलार्म से अर्जुन की आँख खुली तोह अपने हाथो पर मुलायम बड़ा और मांस से भरपूर अंग पाया. कोमल दीदी अपने भारी पिछवाड़े को उसके लुंड से दबाये मीठी

नींद के सफर में थी और उनका एक बड़ा उभर पूरा बहार अर्जुन के हाथ में सम्भला हुआ था. ऐसे दृश्य से एक मीठी सी झुरझुरी अर्जुन के दिल और लुंड दोनों में

हुई. अभी बड़ी बहिन के हलके फूले गाल को चूमता वो उठकर नीचे बने बाथरूम में चल दिए. कोई 15 मिनट बाद अपने घर के बहार निकला तोह सामने प्रीती को

तैयार खड़े देख ठिठक गया. "क्या बात? इतनी जल्दी हम फिर मिल रहे है?" उसने हलके कदमो से उसकी तरफ बढ़ते कहा तोह वह सीधा हे आगे की तरफ चलने लगी.

"मई तोह 4:30 बजे से हमारे घर से देख रही थी. तुम हे 20 मिनट लेट हो आज." अर्जुन को उसके समय से लेट होने का आभास कराती वो हलके कदमो से दौड़ रही

थी. अर्जुन कुछ सोचता सा साथ में हो लिए. प्रीती कल शाम की तरह बिलकुल नहीं थी. "वो मई 5 से पहले हे निकलता हु लेकिन न कोई पक्का रास्ता है न कोई ऐसा

पक्का समय." अर्जुन ने बस इतना कहा. "रास्ते पक्के न हो लेकिन लक्ष्य और उनसे जुड़े इंसान होने चाहिए." अर्जुन बस उसकी सुनता हुआ साथ दौड़ता रहा.

कुछ देर तक दोनों हे चुप थे और बस दौड़ते जा रहे थे. प्रीती ने कोई 5 मिनट बाद कहा. "वैसे तुम्हे क्यों नहीं लगा के मई इतनी सुबह नहीं आ सकती? पार्क में भी

तोह मिले थे न?"

"है. शायद संयोग था और ये भी है के एक अकेली लड़की हलके अँधेरे में ऐसी वीरान जगह नहीं जाती, आमतौर पर."

"अकेली कहा हु मई? उस दिन तुम्हारे पीछे थी और आज तुम्हारे साथ." हँसते हुए उसने जवाब दिए तोह अर्जुन सब समझते हुए मुस्कुराते सा उसकी और देख वैसे हे

हलके पाँव से आगे बढ़ता रहा. "वैसे एक बात तोह है प्रीती. ये बात मई कई बार सोचता हु. देखो जैसे अभी किसी सफ़ेद गुलाब सी हो, फिर जब धुप खिलती है

तोह बिलकुल गुलाबी होने लगती हो. सबके सामने तुम्हारे पास आने लगता हु तोह पीले गुलाब की तरह सेहम जाती हो और अकेले में जब मेरी बाहों में होती हो तोह किसी

सुर्ख लाल गुलाब सी हो जाती हो. भगवान् ने शायद किसी फूलो के बाद में बैठकर तुम्हे तैयार किआ होगा." ये बात अर्जुन के प्रेम ने कैसे कह दी खुद उसको नहीं

पता चला और अब वो दौड़ नहीं रहे थे बस पेड़ो के नीचे जुड़े हुए से तेज चल रहे थे. "ऐसे भी कोई तारीफ करता है? कितने गए गुजरे आशिक़ सी बातें करते

हो तुम." इतराते हुए प्रीती ने बात पूरी भी नहीं की थी की अर्जुन ने अपनी एक ब्याह उसके गले में दाल कर साथ हे चिपका लिए. "ये हॉलीवुड की फिल्म जैसे इजहार

करू? जैसे कल किआ था" इतना बोलते हे प्रीती एक बार अर्जुन के चेहरे को देखती उसकी पकड़ से निकल आगे दौड़ गई. "हाथ नहीं आने वाली मई ऐसे मिस्टर. और ये

हॉलीवुड भी तुम्हारे बस का नहीं." उसका दिल जोरो से धड़क गया था अर्जुन की इतनी खुली हरकत और हिम्मत से लेकिन दोनों वह आ चुके थे जहा अर्जुन पहले

दौड़ने आता था, खाली पड़े अगले सेक्टर में. एक बार ाचे से सांस भर के अर्जुन ने रफ़्तार बधाई और फिर से प्रीती को पकड़ लिए. "अब देखो तुम हॉलीवुड." इतना

बोलकर उसने प्रीती को अपनी तरफ घुमा कर कास के चूम लिए. एक पल को तोह प्रीती ठगी सी रह गई फिर उसकी बाजू भी अर्जुन के शरीर पर कास गई. दोनों अलग हुए

तोह अर्जुन हलके हलके मुस्कुरा रहा था लें प्रीती किसी नशे में उसके चेहरे को देखती रही. फिर शर्माती सी गर्दन निचे कर कड़ी हो गई.

"अब तुम्हे क्या हो गया?" अर्जुन ने उसकी झुकी नजर की वजह से पुछा.

"तुम हमेशा अपने दिल की कर लेते हो. और फिर मेरा क्या?" प्रीती की बात समझते हुए अर्जुन ने कहा, "ये डोर ऐसी हे बानी रहने दो न प्रीती. एक बार अगर ये खींच

गई और हम जुड़ गए तोह फिर थोड़ा सा भी अलगाव बर्दाश्त नहीं होगा. तुम मेरे से ज्यादा समझदार हो." वो उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए बोलै.

"अर्जुन, अगर हमारे पास आने वाला कल हे न हो तोह? और अगर मई खुद तुमसे ये कहु की मुझे jee-bhar के प्यार करो?" ये 2 सवाल प्रीती ने कर तोह दिए थे लेकिन

अर्जुन के दिल पे जैसे हथोड़ा पड़ा हो. उसने कास के प्रीती को दिल से लगा लिए. "फिर से ये बात मत कहना कभी. तुम जैसा चाहोगी मई वैसा करूँगा बस ये मत कहना

के हमारा कोई कल नहीं होगा. मेरा तोह सबसे बड़ा लक्ष्य हे तुम्हारे साथ जीने का है." प्रीती का दिल इतना सुनकर हे शांत सा हो गया था. वो खुद भी जानती

थी की अर्जुन उस से कितना प्यार करता है बेशक कुछ साल दोनों दूर रहे लेकिन ये सख्त नौजवान उसके लिए वैसे हे पिघलता और तड़पता है जैसे बचपन में था.

"अब चलो यहाँ से देखो रौशनी भी हो रही है." दिल तोह नहीं था उसका भी इन बाँहों के घेरे से निकलने का लेकिन फिर दोनों वापिस चल दिए घर की तरफ.

"स्टेडियम साथ चलना आज मेरे." प्रीती ने बस इतना कहा घर पहुंचने पर और अर्जुन उसको घर छोड़कर अपने घर की और मुस्कुराता आ गया.

दूध और अपने दादाजी से फारिग हो कर वो पिछले आँगन में आया तोह वह उसकी माँ रेखा जी और ललिता जी सफाई में लगी थी. एक काला ढीला ब्लाउज और गहरी हरियाली

साड़ी पहनकर ललिता जी फर्श पर पानी दाल रही थी. उनके बड़े बड़े मांसल उरोज कपडे को फाड़ कर बहार हे निकलने को तड़प से रहे थे. इधर गुलाबी ब्लाउज और वैसी साड़ी में झुक कर तीली वाली झाड़ू से पानी बहती रेखा जी का यौवन भी ज़हर हे था. उनकी गोरी पिण्डलिया ऐसे बैठने की वजह से नुमाया हो रही थी और

बार बार घुटनो से टकराते वो गोर खरबुझे तोह अलग हे काम का रंग फैला रहे थे. अर्जुन सोचता रहा के किसकी तरफ ध्यान दे लेकिन फैसला न कर बस वो दोनों

के मादक शरीर को अपनी आँखों में भरने सा लगा. ये सब उसके साथ पहले कभी नहीं होता था लेकिन जाने क्या नया रोग था की उसको अपनी माँ और ताईजी भी अब एक

खूसूरत महिला की तरह हे नजर आने लगी थी. खुद पर काबू रख वह बाथरूम की तरफ बढ़ा तोह माँ की आवाज आई, "ये एक बाल्टी दे जरा भरी हुई इधर. फिर

नाहा लेना मई कपडे ला दूंगी." अर्जुन ने अंदर ताज़ी भरी बाल्टी दरवाजे के पास रख दी. जैसे हे रेखा जी ने खड़े हो कर वो बाल्टी उठाई अर्जुन को उनके उभार वह

तक दिख गए जहा की त्वचा गहरी और गोल होती है. रेखा जी ने भी अपने बेटे की नजर पढ़ ली थी. थोड़ा शर्म और प्यार से बस वो बाल्टी उठा चल दी. अर्जुन

दरवाजा बंद कर अपने नहाने के कार्यक्रम में लग गया, हलके खड़े उभर के साथ. उसके मैं में भी कुछ विचार चल रहा था. माँ को भी उसने रात का सोने का बोल दिए

था और फिर कोमल दीदी को भी. कल अलका दीदी का इम्तिहान है और परसो ऋतू दीदी का. और कल शायद चाचा जी भी आएंगे. हर तरफ दुविधा हे तोह थी. क्या करे

और कैसे. बस ऐसे हे वह बहार आ गया और तार पर टंगे अपने कपडे लेकर कमरे में पहन ने लगा.

"तैयार भी हो गया तू?" माधुरी दीदी चलती हुई उसके कमरे में आ गई. उनके उभर इस वक्त भी पूरे हिल रहे थे. अर्जुन की नजर अपने चुचो पर देख कर वो हंसती

हुई उसके सर पर थपकी मारती बिस्टेर पर बैठ गई. "नजर हर समय न घुमाया कर. हर जगह अकेले नहीं होते." अपनी आकर्षक मुस्कान के साथ उन्होंने ये कहा तोह

अर्जुन ने खड़े हुए हे थोड़ा झुक कर उनका एक उभर सूट के ऊपर से पकड़ लिए. थोड़ा सेहला के निप्पल को हल्का दबाया और फिर छोड़ दिए. दीदी की तोह आँखे हे बंद हो

गई थी इस मजे भरी हरकत से. "यही देख रहा था के ये इतना हिल क्यों रहे है. पता चल गया के पिंजरा नहीं है अभी." शरारत से अर्जुन ने कहा तोह माधुरी

दीदी ने भी उसकी पंत के ऊपर हाथ फेरते कहा, "पिंजरा ाचा नहीं होता ज्यादा देर तक. अपने इसका हे हाल देख ले कैसे तड़प रहा है."

"रात में मई इसको पूरा आराम दे देता हु बस दिन के समय हे थोड़ा सख्ती बरतनी पड़ती है दीदी. आप हे कहती है न के हर समय ठीक नहीं होता." और एक बार उनके

होंठ चूमकर आने का कारण पुछा. "सोचा था के आज मई ऊपर नाहा लेती हु, और तू भी ाचे से रगड़ देगा लेकिन तू तोह नाहा के तैयार भी हो गया तोह मेरा आना

बेकार हो गया." नखरे से अपनी बात कहती माधुरी दीदी ने चाहत से एक बार उसके चेहरे को देखा.

"आज काम है दीदी थोड़ा लेकिन कल पक्का वडा है के साथ में हे नहाऊंगा आपके." उसको पता था के कुछ देर और रुका तोह सय्यम भी जाता रहेगा तोह जूते पहन कर

निचे की और चल दिए. माधुरी दीदी बाथरूम में घुस गई मैं मार के. अर्जुन ये भी सोच रहा था के दीदी आज कुछ ज्यादा हे देर सो गई. नहीं तोह 7:30 बजे तक तोह

वो रसोईघर में काम कर रही होती है रोज. फिर निचे आया तोह कोमल दीदी चूल्हे पर काम कर रही थी और साथ में ताईजी. अपने कमरे से साफ़ कपडे पहनकर आती

रेखाजी भी दिखी तोह अर्जुन वही टेबल पर बैठ गया.

"हो गया तू तैयार?" साथ बैठते हुए ऋतू दीदी ने पुछा तोह अर्जुन ने अपनी बहिन की तरफ देखा. गीले बाल, बड़ी आँखें, शरीर से आती महक. खूबसूरत.

"बस कर सब देख रहे है." बिलकुल धीमे से लेकिन सख्त आवाज में ऋतू दीदी ने कहा तोह उसका ध्यान हटा. दीदी अब मुस्कुरा भी रही थी. "आप सच में बहुत सुन्दर हो."

अर्जुन ने भी धीमी आवाज में ये बात कही तोह मुस्कुराती ऋतू दीदी ने बस पलके झुका ली.

"तुम दोनों मेरे बिना हे लग गए.?" अलका दीदी ने आते हे कहा तोह दोनों ने खली प्लेट दिखा दी. "अभी शुरू हे कहा किआ." अर्जुन ने कहा तोह दोनों बहने हंसने लगी.

थोड़ी देर तक लगभग सभी सदस्य नाश्ता कर चुके थे. बस माधुरी दीदी, कोमल दीदी, रेखा और ललिता जी हे रह गई थी. अर्जुन वह से उठकर थोड़ी देर के लिए

ऋतू दीदी के कमरे में हे लेत गया, जहा अभी कोई नहीं था. कोई 20-25 मिनट हुए थे की प्रीती की आवाज सुनाई दी. आँगन में वो शायद दादीजी से बात कर रही थी

फिर ऋतू दीदी और अलका दीदी के साथ कमरे में आई तोह अर्जुन आँखें मुंड के लेटने का नाटक करने लगा. "ये यहाँ सो रहा है? अर्जुन, चल बिस्टेर खली कर." ऋतू

दीदी उसको झकझोरते हुए बोली. "उठ रहा हु न थोड़ी देर बस." अर्जुन ने इतना कहा तोह ऋतू दीदी ने उसको परे धकेल दिए, बिस्टेर के किनारे पर. "बैठो यार. पड़ा रहने

दो इस आलसी को yahi."Wo अर्जुन की पीठ से तक लगाती बैठी और दोनों को भी बिठा लिए बिस्टेर पर.

"तोह फिर आपकी ट्रेडमिल पक्की?" प्रीती ने ये कहा तोह ऋतू दीदी सोचती सी बोली, "यार वो तोह ठीक है आज आ जायगी लेकिन उसको रखेंगे कहा? ऊपर वाले ड्राइंग रूम

में तोह बिलकुल नहीं. कोई ऐसी जगह जहा इत्मीनान से रनिंग और एक्सरसाइज कर सके. और एक शीशा भी हो." उनकी बात पर दोनों लड़कियों ने सर हिला दिए. अर्जुन

खामोश पड़ा सुन रहा था. जब कोई अगली आवाज न आई तोह सीधा खड़ा होता बोल पड़ा, यहाँ ऋतू दीदी लुढ़क गई. "वो ऊपर न चाचा वाला कमरा ठीक है आप सबके

लिए. और दीदी किसी का सहारा नहीं लेना चाहिए." बहार भाग गया.

"ये मार खायेगा. हाय सर बच गया मेरा." ऋतू दीदी उसकी हरकत पर हल्का गुस्सा हुई फिर सोच कर बोली, "सही कहा इसने तोह. चाचा जी वाले कमरे भी तोह साफ़

और खुले है. वही ठीक रहेंगे और वो पीछे भी है तोह कोई शोर नहीं होगा."

"वो हमेशा हे सही बात कहता है." ये बात प्रीती ने कही तोह अलका दीदी ने सर पे चपत लगते कहा, "बड़ा पसंद है तुझे. सावन की अंधी हो गई है तू प्रीती.

किसी दिन जब गलत करेगा फिर पूछूँगी." आँख मारते हुए उन्होंने कहा तोह ऋतू दीदी ने भी ताली लगाई.

"मई तोह उसको खुद कह चुकी हु. लेकिन देख लो फिर भी नहीं आगे बढ़ता." अब प्रीती ने इतना कहा तोह दोनों हे उसके हँसते चेहरे को देख सन्न से हो गए.

"तूने उसको कह दिए? और उसने मन कर दिए?" ऋतू दीदी ने चौंकते हुए पुछा.

"है मैंने तोह कह दिए क्योंकि अब सच में मुझे उसकी जरुरत सी होने लगी है. लेकिन उसको लगता है के अभी ये सब नहीं. है वो प्यार तोह करता हे है लेकिन उसको

पता नहीं कैसा डर है." प्रीती सोचती सी बोल रही थी.

"शाबाश. तू दिलेर लड़की है इस अलका की तरह डरपोक नहीं. आगे पीछे घूम लेगी लेकिन पास आते हे गाला बंद हो जाता है." ऋतू दीदी ने पैसा अलका की तरफ फ़ेंक दिए.

"2 दिन बाद बताउंगी की कोण कितना दिलेर है. देख लेना तुम दोनों का नंबर मेरे बाद आएगा." अलका दीदी ने भी थोड़े गरूर से ये बात कही तोह ऋतू दीदी की हंसी चूत

गई.. प्रीती को ये हंसी कुछ कहती सी लगी तोह उसने पूछ हे लिए. "मतलब.. आप.. पहले हे?"

"वाह. बड़ी देर से सही लेकिन तूने हे समझा तोह सही. है. जिस दिन तेरे घर थी मई."

"मतलब पेअर नहीं मुदा था. कोई चोट नहीं लगी थी और वह रहकर बस आप सबकी नजरो से बची रही." एक एक बात समझती और बोलती प्रीती जोरो से मुस्कुराती गई.

"कामिनी, मुझे तोह लगा के तूने रात भर उसके साथ सिर्फ ऊपर से मजे किये होंगे. तभी तू आते हे सो गई." अब अलका दीदी ऋतू से चिपक गई.

"है रे. बता नहीं सकती के कैसे कर लिए. लेकिन ऐसा लगता है के एक बार मौत देख कर बस सीधा स्वर्ग में हे चली गई थी. फिर जब होश आया तोह दर्द और थकान.

उसने दर्द की गोली न दी होती तोह मई फंस हे गई थी. लेकिन प्यार से किया चाहे जितना दर्द हुआ हो. अब है हे ऐसा तगड़ा के कोई भी हो एक बार तोह जान पक्का हे

निकलेगी." याद सा करते हुए ऋतू ने ये बात कही तोह प्रीती भी उनकी बातों में खोई उस दिन महसूस किये उस सख्त और मोठे लिंग को याद करने लगी.

"दीदी, वो तोह कपड़ो पर से इतना बड़ा लगता है." नासमझी में प्रीती ने अपने हाथो के इशारे से ऋतू दीदी की तरफ अर्जुन का लुंड अकार बताया तोह वो खिलखिला उठी.

"teri-meri कलाई जैसा है और आगे से तोह और भी वाइड." उन्होंने हे अब सचाई बता दी.

"यार ऋतू, ये तोह इतनी सी हे है." अलका ने थोड़ा फ़िक्र से अपनी मुनिया का आकर उंगलियों से बनाते कहा तोह प्रीती ने भी इस बात का समर्थन किआ.

"तभी तोह कहा के एक बार जान जाएगी. लेकिन बुक्स में नहीं पढ़ा क्या वागिना मसल्स के बारे में? ये रबर जैसे स्ट्रेच और फिर वापिस कंप्रेस हो जाती है. हैमेन

टाइम तोह पैन होता हे है नार्मल इंटरकोर्स में. और इसका तोह किसी डंकी जैसा है, ek-do साल में पूरा डंकी हो जायेगा."

ऐसे हे इनकी kaam-shiksha और व्यथा चलती रही इधर अर्जुन दादाजी को बता कर 9:15 पर घर से निकल लिए.

काली कमीज और तंग सफ़ेद पजामी पहने मंजूबाला कुछ झिझक और शर्म से अर्जुन को खुद की तरफ देखते प् कर उसके स्कूटर की और चल दी.

"आज शायद मई एक नै मंजू को देख रहा हु. पहले तोह ये कभी नजर नहीं आई." एक बार और निहार कर अर्जुन ने अपने पीछे की और जाती मंजू से कहा तोह वो

हल्का सा मुक्का जमती पिछली सीट पर बैठ गई. चेहरे पर चुन्नी कर ली थी. "अब चलो यहाँ से. मई नहीं चाहती कोई देख ले." इतना बोलकर उसने एक हाथ उसके कंधे

पर रख लिए और अर्जुन ने सिनेमा की तरफ स्कूटर का रुख कर लिए.

"वैसे तोह मुझे तुम रोज हे सही दिखती हो लेकिन शायद आज कुछ ख़ास बात है." अर्जुन छेड़ता सा बोलै.

"ऐसी कोई बात नहीं है. अब slawar-kameej में तोह बास्केटबॉल खेलने से रही. तुम सीधा सिनेमा चलो." शर्माती मुस्काती वो इतना बोली और इधर अर्जुन ने एक हाथ से

उसका हाथ अपनी कमर की तरफ कर लिए. "आराम से बैठो, संभल कर." उसकी इस हरकत से तोह मंजूबाला खामोश हे रह गई. कुछ समय बाद दोनों सिनेमा के सामने थे.

स्कूटर को सामने पार्किंग में लगा कर दोनों साथ चल दिए टिकट खिड़की की और. यहाँ इस समय इतनी भी ख़ास भीड़ नहीं थी. जो भी थे कॉलेज जाने वाले हे लोग

थे. दिल तोह पागल है फिल्म चल रही थी इस सिनेमा में. अर्जुन ने 2 टिकट बालकनी की ली तोह मंजू चौंक कर उसकी और देखने लगी.

"कुछ गलत कह दिए क्या मैंने?" अर्जुन को समझ नहीं आया.

"वो बालकनी की क्यों? हॉल की ठीक थी न." मंजू ने अपनी शंका बताई.

"हाहाहा. मई ज्यादा सिनेमा नहीं आया हु. लेकिन इतना जरूर पता है की टूटी सीट पर फिल्म नहीं देख सकते." अर्जुन की बात समझकर थोड़ा सा चिंतन ख़तम हुआ. वो

तोह कुछ और सोचने लगी थी और उस सोच की वजह से हे एक अलग सा डर उत्पन्न हो गया था उसके दिल में. दोनों फिर साथ में हे दरवाजे की और आये जहा टिकट चेक

करवा कर ऊपर की और बढ़ चले. यहाँ अर्जुन ने देखा था का बालकनी का रास्ता हॉल के रस्ते से अलग जाता है. बहार की तरफ अलग सीढ़ियों से तोह वो दोनों ऊपर

हो लिए. परदे पर कोई सन्देश चल रहा था और हलकी रौशनी थी. ये सबसे आखिर में हे आये थे तोह दरवाजा बंद हो चूका था. बालकनी में ाची सीट लगी थी

बढ़ते क्रम में और सिर्फ 4 लोग हे थे उनके शिव वह. 2 प्रेमी युगल जो 2-3 कतार दूर हो कर चिपके बैठे थे. अर्जुन ने सबसे पिछली कतार को हे चुना. जहा से

पर्दा बिलकुल साफ़ नजर आ रहा था.

"बैठ जाओ अब मैडम जी." अर्जुन ने हलके से कहा तोह अँधेरे की वजह से मंजू janch-parakh कर उसके बगल वाली सीट पर बैठ गई. पिक्चर शुरू हो गई तोह अब

सब शांत थे.

"तुम पहले भी आई हो यहाँ?" अर्जुन ने धीमी आवाज में मंजू के कान की तरफ ये बात कही तोह उसके होंठ हलके से टकरा गए वह. मंजू को झुरझुरी हुई लेकिन

उसने ध्यान हटते हुए कहा, "3 साल में दूसरी बार इधर आई हु. एक बार सीनियर के साथ आई थी लेकिन बकवास फिल्म थी. ये ाची है सुना तोह आ गई आज." दोनों के

हाथ सीट की हाथी पर ठीके थे तोह आपस में स्पर्श होने लगा. चुपचाप नजर पिक्चर पर गड़ाए थे की मंजू की नजर उनसे 3 कतार आगे बैठे जोड़े पर गई

जो अँधेरे में मुँह मिला रहे थे. निचे का ज्यादा कुछ दिख नहीं रहा था लेकिन लड़के की हरकत से लग रहा था के वो अपनी प्रेमिका का stan-mardan कर रहा है.

साँसे तेज होने लगी मंजू की भी इस दृश्य से. अर्जुन ने इतना सब खामोश देखा तोह एक बार मंजू की और निगाह करि जो किसी जगह चिपकी सी थी, फिर जब पीछा

किआ नजरो का तोह वो मुस्कुरा उठा. मंजू को ये सब पता था के लड़का लड़की ऐसे भी करते है. उसके साथ रहने वाली कुछ लड़कियों ने भी अपने किस्से सुनाये हुए थे

लेकिन खुद का उसका अनुभव बस एक चुम्बन तक था जो अभी 2 दिन पहले हे इस लड़के ने किआ था जिसके साथ आज सिनेमा आई थी. अर्जुन ने अपने हाथ को हरकत देकर

मंजू की उंगलियों के बीच अपनी उंगलिअ हलके से रख भर दी. जब सामने वाली लड़की की गर्दन मजे में पीछे को हुई तोह खुद उसने अर्जुन का हाथ जकड सा लिए.

दोनों की उंगलिअ बंद हो कर मुट्ठी सी बन गई. पिक्चर में कोई रात का दृस्य चल रहा था तोह अँधेरा भी ज्यादा हो गया था. मंजुए ने अर्जुन की और नजर की तोह

वो पहले हे उसकी तरफ देख रहा था. किसी चुम्बक और लोहे से दोनों के सर एक दूसरे की तरफ खींचे बढ़ गए. मंजूबाला के पतले लेकिन मादक होंठ अर्जुन के होंठो

से खेल रहे थे. जो कुछ देर बाद अब अर्जुन आराम से पीने लगा था. बंद आँखों से मंजू सिर्फ उसका सर सहलाती उसकी पीठ अपनी तरफ खींच रही थी. एक पूरी रात

वो बस इस उधेड़बुन में थी की कही अर्जुन ने ऐसा कुछ किआ तोह? क्या वो उसको दन्त देगी? क्या वो कुछ करेगा भी या सिर्फ उसका वहां है? लेकिन अब साड़ी सोच गायब थी

अर्जुन और मंजू के होंठ खुलकर एक दूसरे की जीभ तक चूस रहे थे. "ये तोह जन्नत है." मंजू इस नशे जैसे मजे में पूरी जकड गई थी. अपने आप हे उसने एक

हाथ अर्जुन का अपनी छाती पर रख कर दबा दिए. अर्जुन भी हौले हौले उस रेशमी कपडे पर से ब्रा में क़ैद उसकी माध्यम आकर की सख्त चूचियों को नरम करने में लगा

रहा. जब होंठ थक गए और सांस उखाड़ने लगी तोह मंजू ने अर्जुन का चेहरा अपने गले से निचे चिपका लिए. अर्जुन के दोनों हाथ bad-ster मंजू की गोलाइयाँ माप

रहे थे और वो उसको अपने से चिपकाये थी. एक बार फिर होंठ आपस में मिले तोह अर्जुन ने एक हाथ मंजू की पीठ के पीछे किया और दूसरा कमीज के अंदर उसके नंगे

पेट पर जमा दिए. "आह." हलकी सिसकी निकली तोह एक बार दोनों की नजरे मिली. उनमे कोई रुकावट, डर या प्रतिवाद नहीं था. मंजू के सपाट मुलायम पेट को ाचे

से महसूस करते हुए अर्जुन का हाथ ब्रा के निचे तक आ गया था. अर्जुन के होंठो ने जब उसकी कान की लौ को चूमा तोह ये आग और बाधक गई. मंजू को तोह कुछ

समझ हे नहीं आ रहा था के हो क्या गया है लेकिन फिर जैसे हे उसकी ब्रा के एक भाग को अर्जुन ने ऊपर से पकड़ा तोह वो फिर से मदहोश हो गई. पहली बार उसकी चुकी

पर किसी मर्द का स्पर्श था. और अभी भी वो पूरी नंगी नहीं थी. ब्रा के ऊपर से हे अर्जुन का हाथ उसको दबाये थे, बस थोड़ा नरम मांस उसको अपने हाथ पर लगता

महसूस हो रहा था. 2 उँगलियों को ऐसे हे ब्रा के कप के अंदर किआ तोह छोटा मुलायम सा चूचक उंगलिओ के बीच में आ गया. "आह.. मर्डर जाउंगी मई ऐसे." मंजू ने

उसके कान में सितकरते हुए बड़ी धीमी आवाज में कहा तोह अर्जुन ने निप्पल हलके हलके मसलना शुरू कर दिए था. मजे से दोहरी होती मंजूबाला एकदम से जैसे बादलो

में उड़ने लगी थी और अगल 30 सेकंड में हे उसकी काछनी पर छूट का पानी फ़ैल चूका था. वो लुढ़कने हे वाली थी की अर्जुन ने उसको थामते हुए सही से सीट पर टिका

दिए और खुद को भी ठीक कर के बैठ गया. मंजू को हस्थमैथुन के बारे में पता था लेकिन जैसा उसके साथ हुआ था अभी वो तोह जैसे उसके किसी नीले बाग़ में ले

गया था, जन्नत जैसे. साँसे संभालती वह कुछ ठीक हुई तोह अब वापिस धरती पर थी. अर्जुन उसको देख मुस्कुरा रहा था जिस से अब वो शर्मिंदा होने लगी थी.

"तुम्हे कुछ कहने की जरुरत नहीं है मंजू. अभी जो भी हुआ वो दोनों ने किआ था, मर्जी से. और शरीर की भी एक जरुरत होती है. तुम्हारा चरमोत्कर्ष को पाना कितना

सुखद लगा तुमको. मई भी जानता हु. ये कोई अपराध नहीं है. अब फिल्म देखो." और अपने ब्याह उसके पीछे करते अर्जुन ने प्यार जताया तोह मंजू भी बेहतर महसूस

करने लगी थी. उसको ये देख कर भी ाचा लगा था के उस से उम्र में छोटा ये लड़का कितने ाचे से उसका ख्याल रख रहा था. जैसा उसकी सहेलियों उसको बताया था

अर्जुन ने वैसा कुछ भी नहीं किआ था. न कपडे उतारे, न जोर लगाया, न चुदाई की. सिर्फ उसको प्यार किआ और सिर्फ उसके tann-mann को एक अजीब सा सुख दिए था. जबकि

सहेलियों के हिसाब से तोह लड़के सिर्फ चुदाई करते है और कपडे निकलने के बाद कभी पहनाने तोह दूर उनसे बात भी नहीं करते. उसकी बाहों में लिपटी वो आज इस सुख

की हांसिल कर खुद को खुशनसीब मान रही थी. इस मजे से वह बहार जब आई जब अर्जुन ने उसको हलके से हिलाया. "मध्यांतर हो चूका है. क्या लोगी बताओ?" मंजू

ने ना में गर्दन हिला दी. "वो बाथरूम जाना है एक बार." पर्स को उठती वो कड़ी हुई तोह अर्जुन उसके साथ चल दिए. महिला प्रसाधनकक्ष के बहार रुक कर हे वो

आने की प्रतीक्षा करने लगा और अंदर जाते हे मंजू ने सलवार उतार कर अपनी गीली कच्ची उतारी. छूट अभी भी हलकी गीली थी तोह उसको फिर से ाचे से पोंछा

और कच्ची को ाचे से teh-laga कर किसी बीड़ी के बण्डल सा बना पर्स में बिलकुल निचे रख दिए. पेशाब करने के बाद सलवार पहन कर हाथ धो कर बहार निकल

आई. "चलो." उसने हलकी शर्म से कहा. कहा 6 फ़ीट की ये हर समय मस्ती या गुस्से में रहने वाली लड़की आज किसी नवब्याहता सी लग रही थी. एक बार मंजू को वापिस

सीट पर बिठा कर अर्जुन ने 2 कोला की बोतल और एक पैकेट मक्की के फुल्लो का ले लिए सिनेमा की कैंटीन से.

"ये लीजिये मैडम." अर्जुन ने एक बोतल मंजू की और बधाई और अपनी बोतल निचे रख दी.

"कोला खिलाडी के लिए ठीक नहीं होती." मंजू ने बोतल पकड़ते हुए कहा तोह अर्जुन ने फुल्लो का पैकेट खोलते कहा, "अभी हम खिलाडी नहीं है. और कभी कभी ऐसा

करना गलत तोह नहीं." और मक्की की नमकीन फुल्ले उसकी तरफ बढ़ा दिए. दोनों हल्का मुस्कुराते कुछ देर कोला पीते और मक्की के दाने कहते फिल्म देखते रहे. लेकिन

फिल्म तोह नाम के लिए हे थी. मंजू ने अपनी बोतल आधी खली कर के साइड में फर्श पर हे रख दी थी जैसे अब अर्जुन रख चूका था. वही दूसरा जोड़ा अब पहले

वाले की तरह कामक्रीड़ा में लगा था. ये दोनों कभी उनको देखते, कबि परदे पर चलती फिल्म को और कभी एक दूसरे को. 2-3 दाने मंजू के हाथ से उसकी झोली में गिरे

जिनको अर्जुन ने भी देखा था. बिना सोचे हे उसने अपने हाथ वह अँधेरे में पंहुचा दिए तोह मंजू उचक सी गई. पाँव हलके फैले हुए थे तोह सीधा हाथ कमीज

और सलवार के ऊपर से छूट पे जा भिड़ा. एक पल को दोनों हे सिहर गए. नरम से उस मांस को अर्जुन ाचे से पहचानता था और इधर मंजू इस समय अपनी छूट पर

कच्ची न होने की अपनी भूल को याद करने लगी. दोनों हे कुछ न बोले तोह अर्जुन ने अपना हाथ आराम से हटा लिए. "सॉरी." उसने इतना कहकर नजर सामने कर ली लेकिन

मंजू को तोह लगा जैसे ये उसकी भी गलती थी. और अर्जुन का एकदम से अपना हाथ हटा लेना अब उसके मैं में प्यार हे बढ़ा रहा था.

"तुम्हारी तोह कोई गलती नै है न. और मेरी भी गलती है इसमें थोड़ी. मैंने हे पंतय उतार दी थी क्योंकि वाशरूम में वह खराब हो गई थी." अर्जुन की बाजु को

पकड़ते हुए उसके साथ लगती मंजू ने कहा तोह अर्जुन ने आराम से उसका माथा चूम लिए. बालकनी में बाकी दोनों जोड़े भी ज्यादा कुछ न करते हुए बस एक दूसरे की

बाहों में थे. शायद कुछ कर भी रहे हो लेकिन प्रतीत ऐसा हे हो रहा था. अर्जुन का एक हाथ वापिस से मंजू की बगल से होता उसके उभर को हलके हलके सेहला रहा

था और वह मंद मंद मुस्कुरा रही थी उसकी ऐसी हरकत पर.

"तुम्हे किसी ने कहा क्या मेरे वह खारिश करने को?" 2 घंटे में हे वो खुद को अर्जुन के करीब कर चुकी थी. जैसा अब उसने अपने आप को सौंप हे दिए था.

"सुना है ऐसा करने से ये थोड़े बड़े भी हो जाते है." अर्जुन ने भी वैसे हे हलकी आवाज में कहते हुए पूरे उबार को पंजे में ले लिए था.

"बड़े मेरा नुक्सान हे न कर दे. खेलते समय. म्हणत से इनको यही रोका हुआ है मैंने." शर्माती इतराती से वह थोड़ा खुलने भी लगी थी. अर्जुन के द्वारा अपने शरीर

को सेहलवाना फिर से उसको मजा देने लगा था.

"नुक्सान तभी करेंगे न जब ये खुले होंगे. और वैसे तोह खेलने से रही. और बड़े होने में कोई बुराई नहीं है." कमीज के ऊपर से हे हाथ डालते हुए अर्जुन ने

जवाब दिए और इस बार एक पूरा दूध उसकी हथेली की पहुँच में था. ब्रा तोह आड़े हे नहीं आई थी इस रस्ते से. "आह. गुदगुदी होती है न." अपने नंगे चुके पर

अर्जुन का बड़ा हाथ महसूस करते हे शरीर में kaam-urja भरने लगी थी मंजू के.

"पहली बार हाथ लगा है न तुम्हारे इनपर?" अर्जुन ने थोड़ी शोखी से ये बात कही तोह मंजू एक बार अपने चुके पर रखे हाथ को वही रोकते कहा, "जान न ले लुंगी

अगर किसी ने इनके पास आने की कोशिश भी की तोह." और फिर हाथ छोड़ दिए जहा वापिस उन्हें किसी पानी के गुब्बारे सा दबाने लगा था.

"तुम्हे ाचा नहीं लगता ये सब? तुम्हारी कोई फ्रेंड भी अपने अनुभव नहीं बताती क्या तुम्हे? लड़कियों के कॉलेज और हॉस्टल में हो. बहार भी खेलने जाती रहती हो. आपस

में तोह सभी बातें करती होंगी?" धीरे धीरे मंजू के निप्पल को कड़ा करता वो बस और jaan-ne की कोशिश कर रहा था. अर्जुन नहीं चाहता था के वो इस लड़की के साथ

कुछ भी जबरदस्ती करे. जहा वो रोक देगी वो रुक जायेगा.

"आह. आराम से ये दुखते भी है." निप्पल ऐंठने से उसको मजा तोह आ हे रहा था लेकिन मंजू नारी शर्म भी दिखा हे रही थी.

"मेरी सहेलिया लड़को से ज्यादा बेशरम है. कइयों के प्रेमी है जिनके साथ कभी वो उनके घर या लॉज में भी जाती. कुछ शहर से बहार घूमने भी और मुझे भी

बताती है. लेकिन मई नहीं चाहती की इस शरीर के मालिक महीने या साल में बदलते रहे. जैसा वो कर देती है. " दोनों के मुँह आमने सामने थे और अब अर्जुन उसकी

बातें सुनता एक हाथ से एक दूध और एक हाथ से कमर सेहला रहा था. मंजू भी अर्जुन की छाती सहलाती, कबि उसके पत् को.

"कुछ ने तोह शायद इतना गिरा लिए है खुद को की अपने खर्चे उठाने के लिए हे नाम भर के प्रेमी है. फिर आ कर मुझे बताती है कैसे उन्होंने किआ और क्या आज दिलाया. और मई सुनती रहती है बस मजे लेती हुई."

"मजे लेती हुई?" नटखटपन से कही अर्जुन की इस बात से मंजू उसकी नाक पकड़ती बोली, "उनकी भी हिम्मत नहीं मेरे हाथ लगाने की. मेरा मतलब ये है की बातें

सुनकर मजा तोह आता हे है. जब वो बताती है की ये दबाये, पीये फिर अंदर किआ. आपस में तोह वैसे हे बातें करती है जैसे तुम लड़के करते हो." और इतना

बोलकर उसके होंठ चूमने लगी. अर्जुन ने भी गले से हाथ निकल कर कमर और जांघो पे हाथे फिरने शुरू कर दिए थे उसको ाचे से चूमते हुए. मंजू की ऐसी

आधी अधूरी बातें, इतना बेहतरीन शरीर और अंदर क़ैद गर्मी अब उसको भी ाची लगने लगी थी.

"तुम्हे नहीं लगता के ये सब कभी तुम भी करोगी.?" होंठ छोड़कर वैसे हे कमर पर निचे की और हाथ चलते अर्जुन ने बात कही तोह मंजू आँखों में देखते हुए

हे बोली, "पहले तोह कभी नै सोचा था लेकिन अब सोचूंगी इस बारे में. लेकिन एक डर भी दिया है मेरी सहेलियों ने. पहली बारी का दर्द और खून ऊपर से फिर चाल

का बदल जाना. बस यही सब सोच कर तोह कभी इस चक्कर में हे नहीं पड़ी. ऊपर से ध्यान सिर्फ अपने खेल में हे लगाया है मैंने. आह्हः." बात कहते कहते हे जब

उसको पता चला की अर्जुन की उंगलिया उसकी छूट के होंठो को छेद रही है तोह अपनी दोनों जाँघे जोर से भींच ली एक सिसकी के साथ.

"दर्द बहोत होगा और शायद खेलना तोह दूर तुम ठीक से चल भी नहीं सकोगी." अर्जुन ने फिर से जांघो पर हाथ रखते कहा तोह वो नासमझी सा चेहरा बनाने लगी.

"यहाँ हाथ रखो." अर्जुन ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर अपनी जीन्स के उभर पर टिकाया तोह मंजू ने हाथ झटके से खींच लिए. "ये क्या है?"

"वही जो तुम्हारी सहेलियों ने बताया हुआ है तुम्हे जो वो अपने प्रेमी के साथ करती है." अर्जुन की बात सुनकर हैरत से हे एक बार फिर मंजू ने अपना हाथ खुद हे

पंत के उस उभर पर रखा और इधर अर्जुन ने उसकी छूट के होंठ ऊपर से सेहला दिए. "सी.. ये ऐसा तोह नहीं होता. उन्होंने कहा था की इतना या इतना होता है. ये

कुछ अलग है और मोटा भी." अपने हाथ हटा लिए थे मंजू ने एक बार ाचे से स्पर्श कर के उस तगड़े लुंड को जो पंत में अकड़ा हुआ एक तरफ को उभरा हुआ था.

"सबके शायद अलग होते होंगे. मेरे पास यही है." और एक बार ाचे से होंठो को चूम लिए. तभी वह धीरे धीरे रौशनी होने लगी तोह दोनों हे सकपका के अलग

हो गए. अर्जुन ने खुद को सही किआ और मंजूबाला ने भी. उसकी नजरे अब जमीन की और थी. दोनों चुपचाप हे सिनेमा से बहार आने लगे. अर्जुन बड़े ध्यान से मंजू

को बहार लेकर आया, जिसके चेहरे पर वापिस चुन्नी थी. "मुझे गेट पर उतार देना." मंजू ने स्कूटर पर बैठते हुए कहा. इस बार बैठने में फरक था. हाथ

खुद हे कमर को पकडे थे और पीठ पर उसका सीना चिपका था.

"ज्यादा मत सोचना इस सब के बारे में. जब साथ हो हम ये तभी ठीक है नहीं तोह ध्यान नहीं लगेगा." अर्जुन समझा भी रहा था उसको

"जी मास्टरजी. लेकिन जो आज हुआ है वह दिमाग से चला भी जाये दिल में हमेशा रहेगा." उसकी गर्दन को अपने चुन्नी से धाखे होंठो से चूमती वो बोली. सड़क

दोपहर के समय लगभग खली थी. वैसे भी university-stadium वाली इस सड़क पर aava-jahi काम हे रहती थी.

"तुम्हे मेरी किसी हरकत या बात का बुरा तोह नहीं लगा?" अर्जुन सोचकर बोलै

"इस बात का बुरा लगा के हम सिनेमा क्यों गए थे. कही रात को खुले खेत में बैठे होते तोह ज्यादा मजा आता." मंजूबाला अपनी हे सोचो में थी अभी तक

"किसी दिन." अर्जुन ने इतना हे कहा और ब्रेक लगा दिए. स्कूटर स्टेडियम के गेट से थोड़ी पहले हे रोक दिए था एक घने पेड़ की छाँव में. "शाम को मिलते है."

मंजूबाला कुछ अलग हे तरीके से चहकती सी प्रवेश द्वार की तरफ बढ़ चली और अर्जुन खड़ा मुस्कुराता देखता था. उसने भी पीछे मुड़कर मुस्कान दिखाई थी.

वह से सीधा जा कर ट्रेडमिल का काम किआ जो फ़ोन पर आपस की बातचीत से हे हो गया बिना ज्यादा कुछ बोले कहे. अपने लिए एक जोड़ी बॉक्सिंग के आभास पर पहन ने के कपडे लेकर फिर पंसारी से पर्ची पर बताया सामान लिए. समय देखा तोह 2 बजने को था, स्कूटर सीधा

घर की तरफ ले लिए.
 
आप सभी से इस लेट अपडेट की लिए माफ़ी. काम की जिम्मेदारी थोड़ी अधिक हो गई है. 1 अक्टूबर तक एक दिन छोड़कर अपडेट देता रहूँगा. उसके बाद कोशिश रहेगी की हर रोज 2 अपडेट दे पाउ. साथ बने रहने के लिए आपका आभार. :)
 
एक हे अपडेट में 2 डबल सन देने की कोशिश करूँगा रात 12 बजे तक. लेंथ वाइज अभी तक की सबसे बड़ी अपडेट.
 
मेगा अपडेट 32

कोमल एहसास


"ये लो दादाजी आपका मंगवाया सामान." रामेश्वर जी को थैला देते हुए अर्जुन ने कहा और वही बैठ गया. उन्होंने वो थैला अपनी धर्मपत्नी की और कर दिए.

"वैसे ये सब है क्या दादाजी?" उसने जानकारी लेनी चाहि तोह रामेश्वर जी बोले, "तेरी विशेष खुराक बनेगी इस सब से. जो तेरी दादी खुद तैयार करेगी."

कुछ देर उनके पास समय बिता कर रसोईघर में भोजन करने आ बैठा. अलका दीदी तोह किसी प्रेमिका की तरह उसको ताड़ रही थी. उनके मैं में सुबह से हे ऋतू

का पढ़ाया कामज्ञान चल रहा था और अब बस उसको सबके गाँव जाने की प्रतीक्षा थी. अर्जुन ने एक बार खाना परोसती कोमल दीदी को देखा जो शर्मा सी रही

थी उसके पास आती जाती. फिर खाना खाने के बाद आराम करने के लिए अपने कमरे में आ लेता. कोई 40-45 मिनट के बाद हे ललिता जी उसके कमरे में दाखिल हुई

एक पालते में कटे हे फलो को लेकर. ऊपर का भाग तोह वस्त्रविहीन था और नीचे पाजामे में अर्जुन का अंग माध्यम अकार तक फुला हुआ था. एक बार बहार की तरफ

देखने के बाद ललिता जी ने जाली वाले दरवाजे के सामने लकड़ी का दरवाजा भी ढाल दिए और अब इत्मीनान से अर्जुन के पैरो के पास बैठकर उसका चेहरा तोह कभी

उसका उभरा भाग देखती. फिर हिम्मत कर उन्होंने अपना हाथ उसकी जांघो की तरफ बढ़ा दिए. हलके से उसको सहलाते हे वो भाग और फूलना शुरू हो गया था. दिन

के उजाले में हे आज उनकी शर्म ख़तम होने लगी थी. थोड़ा कास कर पकड़ते हुए ललिता जी इस बड़े विकराल लुंड का तापमान महसूस सा करने लगी थी. "इतना बड़ा

है मूये का की मुट्ठी भी छोटी पड़ती है" सोचती वह सहलाने लगी हे थी की उनको भी अपने उभारो पर हाथ का अनुभव हुआ.

"ताईजी ऐसे आपको तोह सुख मिलने से रहा." अर्जुन की नटखट मुस्कान देख कर वो भी हंसती सी बोली, "तुझे तोह अपनी ताई का ध्यान हे नहीं. बस अपना हे सोचता

रहता है. मुड़कर न आया एक बार भी तू मेरे पास." झूठा सा तना देती वह बोली तोह अर्जुन ने उनका एक दूध दबाते हुए घडी की और नजर दौड़ाई. "अभी 3:20

हो चुके है ताई जी. मई 6 बजे आऊंगा तब आप ऊपर आ जाना मेरा कमरा ठीक करने. अभी तोह जाने का समय हो गया है. उठते हुए उसने कास के एक बार ललिता जी

के दोनों उभार भींचे और होंठ चूसने के बाद सीधा बाथरूम चला गया. ललिता जी भी इस 2 पल के अनुभव और शाम को मिलने वाले सुख की कल्पना लेती निचे

चल दी.

फल खाने के बाद अपनी अभ्यास वाली ड्रेस को बैग में डालकर निचे आया तोह वह पर पहले हे प्रीती उसका इन्तजार करती मिली.

"चले." प्रीती ने इतना कहा तोह उसने सर हिला दिए.

"वैसे ये ख्याल कैसे किआ साथ चलने का? और दादाजी ने मुझे साइकिल से जाने की हिदायत दी है तोह रोज तोह हम साथ नहीं जा पाएंगे." स्कूटरी को स्टार्ट करते

उसने कहा तोह प्रीती ने सिर्फ इतना कहा की एक बार साथ चल पड़े बस. और दोनों आगे बढ़ चले. वैसे तोह रामेश्वर जी को कोई ऐतराज नहीं होता क्योंकि दौड़ तो

वो सुबह भी लगता हे था. लेकिन अर्जुन को अभी जैसा ठीक लगा उसने कह दिए. अभी कुछ आगे निकले थे की एक स्कूटर उनके बराबर आया और यही पर अर्जुन की

नजर उन 2 लड़को पर पड़ी जो शायद ये नहीं जान पाए थे की अर्जुन भी इस लड़की के साथ हो सकता है. "रोज जो बोलते हो आज नहीं कहोगे कुछ?" प्रीती की इतनी बात

सुनकर अर्जुन ने थोड़ा जोर से आवाज लगाईं "कुलविंदर".. ये थे राणा और कुलविंदर जो अर्जुन के हे स्कूल में थे और काफी बदनाम थे. अर्जुन की आवाज सुनते हे उस

सांवले से माध्यम कद के लड़के ने स्कूटर एक साइड रोक दिए. उसके पीछे बैठा था उसका हरपाल का जोड़ीदार राणा, बिलकुल वैसा हे जैसा कुलविंदर था.

"क्या तकलीफ है तुझे?" ये बात राणा ने स्कूटर से उतारते हुए कही क्योंकि दोनों को पता था की ये लड़का एक होशियार, अकेला और कायर किस्म का है. आज शायद लड़की

साथ है तोह आवाज ऊँची हो गई होगी वार्ना स्कूल में तोह ये किसी पालतू गाये सा हे दीखता है.

"तकलीफ तोह मई बताती हु तुम्हे. रोज पीछा करते हो मेरा अगले 2 चौक तक. क्या क्या नहीं बोलते हो और कल इसने (राणा) मेरे सामने हाथ भी लगाने की कोशिश की थी

अर्जुन. आज मई इसलिए तुम्हे साथ लेकर आई." ये बात ख़तम भी नहीं हुई थी की स्कूटरी जमीन पर थी और राणा फुटपाथ के साथ बानी दिवार के साथ लगा हवा में 2

फ़ीट ऊपर था. "भारी गलती कर दी तुमने ऐसा कर के." अर्जुन का चेहरा फिर से बदल चूका था और कुलविंदर तोह आँखे फाड़े अपने दोस्त का हाल देख रहा था.

जिसकी आँखे बहार निकलने को हो रही थी. अगले हे पल वो जमीन पर था और एक तेज ठोककर उसकी नाक पर, जहा से खून की धार फुटपाथ पे बहने लगी थी. यहाँ

अपने दोस्त को मार खता देख थोड़ी हिम्मत से कुलविंदर ने अर्जुन की पीठ पर जोरदार मुक्का मारा जिसका शायद उसको पता भी न चला हो. लेकिन कुलविंदर का सर उस

दिवार से जरूर जा टकराया जहा थोड़ी देर पहले उसका दोस्त लटका हुआ था. अर्जुन के अंतर्मनन ने उसको शांत किआ तोह उसने दोनों को वही खड़ा करके सिर्फ थप्पड़ हे

बरसाए जो वो तब तक खाते रहे जब तक की एक पुलिस का मोटरसाइकिल वह न आ गया.

"क्या बदमाशी कर रहा है तू पहलवान?" एक रौबदार मुचो वाला एक सितारा वर्दीधारी पोलिसिअ पीछे से अर्जुन को रोकते हुए बोलै तोह प्रीती ने जवाब दिए, "अंकल मई

रोज प्रैक्टिस को जाती हु तोह ये दोनों मेरा पीछा करते है और हाथ भी मारा था इस वाले ने कल. आज मैंने इन्हे बताया तोह इन्होने इनकी खबर ली."

दूसरा पोलिसवाले उनकी तरफ आता हरियाणवी भाषा में बोलै, "यो बात से भाई जगत. यो पहलवान गलत कोणी ये 2 काले चोरे छत्ते बदमाश है. और पहलवान तोह

मैंने देख्या भी है कड़े न कड़े. शायद यो अपने पंडित जी का तिनगर है." उसकी बात सुनकर जगत नाम वाले इस हवलदार ने ध्यान से अर्जुन को देखा. "है भाई सही

कहा. उनका हे बालक है ये. चलो भाई तुम दोनों अपनी दीदी से जमीन पे नाक रगड़ के माफ़ी मांग लो नहीं तोह फिर इनके श्रीमान दादाजी हमको कहेंगे तोह आप दोनों

की सेवा पत्तो से करनी पड़ेगी." मसखरी करते हुए भी जगतराम की आवाज जोरदार थी. राणा और कुलविंदर तोह किसी आज्ञाकारी कुत्ते की तरह सॉरी बोलते हुए जमीन

पर बार बार नाक रगड़ने लगे थे. उनको बिलकुल अंदाजा नहीं था की उनकी ये ऐसी छोटी मोती मजनूगिरि इतनी भारी पड़ेगी. पुलिस वाले समझदार थे. विद्यार्थी

जानकार उन्होंने भी सिर्फ एक नैतिक शिक्षा का हे पाठ पढ़ाया उन दोनों को. "चल भाग जाओ यहाँ से और फिर दिखे तोह हवालात के दर्शन कर्व दूंगा." Daant-te हुए

उनको वह से भागकर जगतराम ने अर्जुन से कहा, "बीटा शरीर से तगड़ा है लेकिन गुस्सा नहीं करते इतना. सबसे पहले समझाओ, फिर शिकायत करो और फिर daant-dapat.

नहीं माने तोह एक या 2 हाथ. लेकिन एक बार तू लगा तू मार देगा फिर तू इनके थप्पड़ लगाने लगा."

"वो कुछ याद आ गया था अंकल. ऐसे किसी को नहीं मारना चाहिए था. सॉरी." अर्जुन को शायद इन्होने शुरू से उन्दोनो की पिटाई करते देख लिए था.

"चल कोई बात नई चोरे. तू समझदार साई जो रुक गया. तेरा बाप इनकी धुलाई करता तोह हम भी कुछ न कर पाते." ये दूसरे पोलिसिये ने कही thi."Chaal रे जगत

भाई और तुम दोनो भी निकलो." और कुछ लोग भी तमाशा देखने आ गए थे वो भी खिसक लिए थे वह से.

"आगे से कोई कभी तुम्हे कुछ नहीं कहेगा. मई साथ हे चलूँगा अब से तुम्हारे." अर्जुन वापिस स्कूटरी स्टार्ट करता प्रीती को अपने साथ ले चल दिए

"बहनचोद पता नई क्या खता है साला. थोबड़ा हे हिला dia."Kulwinder स्कूटर चलता पीछे बैठे राणा से बोलै जो अपनी नाक पे रुमाल रखे था. दोनों की हालत

साफ़ बता रही थी की तबियत से गाल लाल किये गए उनके.

"वो छोड़ भाई बस याद रखिओ आगे से इस मोहल्ले में आशिकी नई करनी. साला जानवर है रे ये लड़का. पता न चला कब दिवार से चिपका दिए. हाथ भी बहनचोद

तबियत से मारे." राणा की आवाज में उसका दर्द साफ़ पता चल रहा था.

"भाई बंदी भी उसकी, पुलिस भी उसकी और हमारी सिर्फ ठुकाई. ऐसा बलात्कार तोह कभी न हुआ. आता हे नई इस तरफ तोह मई. झुग्गी वाली हे देख लिए करेंगे."

दोनों दोस्त आज अपने से पिछली क्लास के लड़के से मार खा कर असहाये से अपने मोहल्ले में निकल लिए थे.

"तुम चलो जब प्रैक्टिस हो जाये तोह मुझे बुला लेना. नहीं तोह मई पहले आया तोह यही मिलूंगा." स्टैंड पर स्कूटरी लगते अर्जुन ने प्रीती से कहा और एक बार उसके

सर पे हाथ फेर कर आगे चल दिए.

"कोण हे ये हीरो, प्रीती?" एक चुलबुली सी गोरी लम्बी लड़की प्रीती के कंधे पर हाथ रख उसके साथ चलती बोली.

"तुझे क्या लगता है, डिम्पी?" अपनी सहेली से हे हँसते हुए उसने सवाल कर दिए.

"तेरा भाई या रिश्तेदार हे होना चाहिए नहीं तोह मेरा दिल टूट जायेगा." नौटंकी करती इस लड़की ने आँख मारते कहा तोह प्रीती भी उसके लहजे में हे बोली, "हाय

मेरी बेस्टफ्रेंड का आज दिल टूट हे गया. हाहाहाहा."

"कामिनी सच सच बता. तेरा इंटरेस्ट नहीं है न वो? लड़का एक नजर में पसंद आ गया है." डिम्पी अब भी पलट के देखने की कोशिश में थी लेकिन अर्जुन तोह जा

चूका था.

"सच बोल रही हु तेरे से क्या छुपाना. मेरे दिल पर बस उसका हे नाम है जब से होश संभाला है." गहरे प्यार से कही बात सुनकर डिम्पी को भी एहसास हो गया

था के दोनों में प्यार तोह पक्का है.

"लेकिन वो तोह कृष्ण कन्हैया दीखता है." छेड़ते हुए ये बात कही तोह प्रीती ने वैसे हे कहा.

"है तोह वो तोह है हे. अब मैंने कोनसा उसपे नकेल दाल राखी है. गोपियाँ जितनी चाहे हो लेकिन Radha-Rukmani तोह मई हे हु." इतराते हुए बात कहकर दोनों अपना बैग

खोल कर प्रैक्टिस में लग गई बाकी सभी के साथ.

"तेरे हाथ पे ये खून कैसा है?" बलबीर ने कपडे बदलते समय अर्जुन के हाथ को देख कर कहा.

"कुछ नहीं भाई. वो सड़क पर किसी के चोट लग गई थी. उठाते समय मेरे हाथ पे वही लग गया." पास में लगे नल से हाथ धोते उसने जवाब दिए.

दोनों गयम में अभ्यास करके वापिस कोच के पास आये तोह अर्जुन ने उनके पाँव छुए. "आज किट पर 1-2 की ले में सीधे मुक्को का अभ्यास करना है. 2 मिनट के बाद दोनों

अपनी बारी लेंगे. बलबीर, 10 सेट होने के बाद तुम इसको घास पर उठक बैठक करवाओगे साथ में हे लचकता का अभ्यास भी." जोगिन्दर जी ने अर्जुन के शरीर को देखते

हुए सब बताया तोह बलबीर भी सर हिलता अर्जुन को ले गया.

जिस जगह लोहे की रेलिंग और जंजीर से बॉक्सिंग किट लटकी थी ये जगह खुले में थी और सामने हे बास्केटबॉल और हैंडबॉल के कोर्ट थे. बलबीर अर्जुन को सब समझा

कर बस वह खेल रही लड़किओं को देखता रहा. मुश्किल से उसने 3 सेट हे किये थे और इधर अर्जुन की बाजू और छाती पर पसीने की बुँदे चमकने लगी थी. ये

बनियान जैसी टीशर्ट ज्यादा खुली थी तोह उसकी मासपेशिया, छाती सब नजर आ रहा था. शरीर के हिलने पर वह फड़कती एक एक मांसपेशी अर्जुन के शरीर को

निखार रही थी.

"भाई अब बस करो देखना ये सब. लौट आओ वर्तमान में भी. उनमे से कोई इधर नहीं देख रही." अर्जुन ने मजाक करते हुए कहा तोह बलबीर मुँह लटकाये 2 रबर की

दरिया वही बिछाने लगा. "भाई देख भी रही होंगी तोह वो तुझे हे देखेन्गति. मई तोह यहाँ बस अपनी आँखें हे ठंडी कर लेता हु. तू लेत यहाँ." इतना बोलकर

वो फिर से अर्जुन को सब समझने लगा. कैसे पाँव उठाने और घुटने मॉडेने है. कैसे दोनों हाथ सर के पीछे कर के कमर ऊपर उठानी है. फिर अर्जुन भी निर्देश

अनुसार ये कसरत करता रहा.

"देख रही है उस चिकने को. उम्र ज्यादा नहीं लगती लेकिन शरीर और चेहरा देख. मेरा निशाना बस अब यही है." बास्केटबॉल कोर्ट पे कड़ी एक आधुनिक सी दिखती

ये लड़की अर्जुन को देख कर आहे भर रही थी.

"नई आता हाथ तेरे वो भूल जा. ये मैडम भी आजकल उसके चक्कर में है." ये सुमन थी जो मंजूबाला की और इशारा करते हुए उस लड़की से बोली जिसपर मंजू ने कोई

प्रतिक्रिया न दी.

"मंजू, मेरे को तोह कोई ऐतराज नहीं है के तू इसको पतये या प्यार करे. लेकिन बस दिल में एक इत्छा जाग गई है के इसके नीचे जरूर आउंगी यार." ऐसे बोलते हुए

इस लड़की ने मंजू को आँख मारते हुए कहा तोह जहा पहले मंजू को थोड़ा गुस्सा आ रहा था अब थोड़ी हंसी आ गई थी.

"निचे तोह आ जाएगी फेर ज़िंदा रहेगी या नहीं वो भगवान् हे बता सकता है चांदनी." मंजू को याद आ गया था के दिन में कहा हाथ लगाया था.

"ऐसा क्या लगा रे इसके जो जान हे ले लेगा. और तूने कहा देखा?" तीनो अब कोर्ट पर हे बैठ गई थी.

"अरे ऐसा कुछ नहीं है. थोड़ी बहोत बात है मेरी इसके साथ. शरीफ लड़का है लेकिन वो बॉक्सिंग हाल के पीछे कपडे बदल रहा था ये जब मई इधर आई. बस

नजर बाद गई तोह मई बिना रुके इधर हे आई फिर."

"क्या बात कर रही है यार. तेरे अंदाजा तोह बता फिर भी." चांदनी थोड़े हैरानी वाले भाव से बोली तोह सुमन भी मंजू को गौर से देखने लगी

"देख इतना तोह पक्का है और कस्सी के डंडे से मोटा." अपने हाथ को फैलते हुए उसने कलाई से 2-3 इंच निचे तक इशारा करते बताया तोह वो दोनों भी सोच में

पड़ गई.

"मजाक?" चांदनी ने के बात फिर से उसको कहा.

"मई मजाक क्यों करने लगी. अब तोह मुझे डर लगने लगा है. नहीं तोह खुद सोच मेरी चीज पे कोई हाथ रखे और मई चुप राहु. ये लड़का पसंद है मुझे

लेकिन इसकी और भी पसंद है. सिंपल सी बात है अगर दिल करे तोह तरय कर लिओ मैं तोह बातों से काम चला लुंगी." और एक बार फिर हंस पड़ी.

"देख तू तोह जानती हे है यार. वो रमन तोह किसी काम का नहीं और मैंने उसको भगा भी दिए. पैसेवाला था लेकिन वो मेरे पास भी बहोत है. लेकिन जैसा तू कह

रही है ऐसी चीज एक बार देखनी बनती है. रमन का इतना था." दोनों की तरफ अपनी हथेली के बीच ऊँगली रख वो बोली तोह तीनो हंसने लगी.

"यार तेरा तोह मतलब कौमार्य भी ाची तरह नहीं खुला." सुमन, जो शायद खेली खाई थी उसने ये बात कही तोह चांदनी ने हां में सर हिला दिए. "3 बार तोह

ऊपर रखते खाली हो गया था वो. और बाकी 4-5 बार मतलब 2 मिनट ज्यादा से जयादा. उस से ाचा तोह तेरे केशव और जग्गी है." ये बात चांदनी ने सुमन

से कही थी.

"अब तोह वो भी किसी काम के नहीं लेकिन है तेरे वाले से ठीक हे है 5 मिनट साथ देते है." मंजूबाला इन दोनों की बातें सुनती वह अर्जुन को निहार रही थी. कैसे

आज उसने मंजू के जिस्म में आग भरी थी. सिर्फ दूध दबा के हे उसका स्खलन करवा दिए था. है तोह खिलाडी.

"कहा खो गई? तेरी भी ओपनिंग करवा दू किसी को बोलकर?" चांदनी ने हिलाते हुए मंजू से कहा तोह वो मस्ती से उसकी गांड पर चपत लगाती बोली, "मेरी बंद हे ठीक

है तू तेरा सोच. गलती से उसके हाथ लग गई तोह फिर टाँगे 3 दिन तोह खुली रहेंगी."

ये मस्ती मजाक करती रही उधर अर्जुन भी फारिग हो कर स्टैंड की और चल दिए. प्रीती अभी आई नहीं थी.

"ये है डिम्पी और डिम्पी ये है अर्जुन." अर्जुन टहल रहा था के प्रीती के साथ एक उसके अनुपात की हे गोरी सी लड़की आई और अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिए.

"Hello, अर्जुन शर्मा. प्लेअसुरे तो मीट यू मिस डिम्पी." उसने हलके हाथो से हाथ मिला कर छोड़ दिए तोह डिम्पी ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिए.

"बॉक्सर हो?" डिम्पी के सवाल से अर्जुन हंस दिए. "नहीं. सिर्फ सीखता हु. फिलहाल बॉक्सिंग पर हे ध्यान है."

"ओह लेकिन शरीर भी वैसा हे है. किसी रेसलर जैसा एक्चुअली." अब वो टीशर्ट पाजामे में था लेकिन ये भी छाती पर कासी हुई थी तोह प्रीती नई हलके से अपनी

सहेली को हाथ मारा.

"शुरू से हे ऐसा है. अब इसको ठीक करने में लगा हु. पहलवान लग्न बुरा तोह नहीं है.?" लहजा बिलकुल नरम था उसका

"तुम्हारा चेहरा मासूम है और शरीर उसके अपोजिट. बूत यू लुक रियली गुड. okay. फिर मिलते hai.Bye" एक बार फिर हाथ मिला कर वो प्रीती को भी bye कह निकल

गई.

"चले madam?'Arjun ने प्रीती को हिलाया तोह वह भी हंसती हुई हामी भर के स्कूटरी पर बैठ गई. अब उसके दोनों पाँव अलग अलग थे सीट पर बैठने के बाद.

"आराम से चलौ. जल्दी है क्या जाने की?" प्रीती पीछे से चिपकती हुई बोल रही थी. "जल्दी नहीं है लेकिन पता नहीं शायद आज तुम्हारी नियत ठीक नहीं. सोच

रहा हु घर जल्दी पहुंच कर इज्जत हे बचा लू." अर्जुन ने खिलवाड़ करते कहा. उसको भी प्रीती के ठोस उभार पीठ पर मजा दे रहे थे.

"आज बचा लो फिर जल्दी हे तुम मेरे निचे होंगे मिस्टर." बड़े विश्वास से प्रीती की कही बात सुनकर अर्जुन हैरान हो गया.

"मतलब."?

"मतलब साफ़ है. हम तुम एक कमरे में बंद हो .. ता न न न.. " मस्ती भरा जवाब सुनकर भी अर्जुन को शांति नहीं मिली.

"बुद्धू हो तुम. अब तुम्हारे घर वाले जा रहे है गाँव. और 2 दिन के लिए मेरे दादू भी जा रहे है देहरादून, बुआ के पास. तोह तुम कहा जाओगे." एक बार फिर से

अर्जुन को पीछे से जकड़ते उसने प्यार जताया तोह अर्जुन को सब समझ आ गया. वो हल्का मुस्कुराता बस घर की और हे चलता रहा. सेक्टर के बहार एक बार स्कूटरी

रुकवा कर प्रीती वापिस लड़कियों की तरह बैठी और बैठने से पहले अर्जुन का गाल चूमती बोली. "कल भी साथ हे चलेंगे" वो बस हंस दिए.

घर पर वैसे हे शान्ति थी जैसी आम तौर पर रहती थी. अंदर आकर पसीना सूखने लगा तोह देखा दादी रसोईघर में अलग अलग बर्तन में कुछ दाल रही थी.

ये शायद वही सामान था जो लेकर आया था दिन में. माधुरी दीदी ने उसको दूध के लिए पुछा तोह पीछे से हे उनकी माता ललिता जी आवाज आई. "इसको नाहा लेने दे

फिर दूध मई खुद दे दूंगी. तू माजी के साथ थोड़ा काम करवा दे क्योंकि बाकी काम तोह सब बंद हो गया है अब रसोई में तेरे लिए." उनके चेहरे पर शांति सी थी

और माधुरी दीदी जा बैठी कौशल्या देवी की बगल में. अर्जुन ने टोलिया उठाया और नहाने चल दिए. इधर ललिता जी दूध तैयार करने लगी थी और रेखा जी ऋतू

और अलका को साथ लेकर मल्होत्रा जी के घर गई हुई थी. उस दिन के बाद से ऋतू आज पहली बार उस तरफ गई थी. न जाती तोह शायद वो जवाब भी न दे पाती.

शरीर को ाचे से साफ़ करके अर्जुन सिर्फ पजामा पहने बहार आया तोह ललिता जी गिलास देते हुए कहा, "कमरे की saaf-safaai कब की थी मुन्ना? और बिस्टेर अलमारी?"

"ताईजी कोई 5 दिन हुए होंगे." अर्जुन समझ गया था के ताईजी ने ऐसा क्यों कहा है. "चल मेरे साथ फिर. हम लोग चले जायेंगे फिर तोह होने से रहा वो साफ़."

"है बहु, इसका कमरा और बाथरूम दोनों साफ़ कर और इसको भी सीखा ये सब. कल को कभी बहार आना जाना होगा तोह वह तोह इतने गुलाम मिलने से रहे." कौशल्या

देवी ने ये बात कही क्योंकि उन्हें भी पता था की अर्जुन तोह बिस्टेर झड़ने वाला भी नहीं. और कपडे हर जगह बिखरे होंगे. दोनों Taai-bhatija ऊपर चल दिए. गिलास

हाथ में हे था. "वैसे दादी ने कहा है बाथरूम साफ़ करने के लिए तोह पहले वही चलते है ताईजी." अर्जुन ने जैसे कुछ सोच कर कही थी ये बात तोह ललिता

जी भी हामी भर्ती ऊपर आ गई. दोनों दरवाजो के पल्ले लगा कर वो अंदर आये तोह बदन की गर्मी से परेशां ललिता जी पीछे से हे लिपट गई अर्जुन से. उसने खुद

को घूमते हुए अपनी ताईजी को गॉड में उठा लिए. 60-65 किलो की मांसल ललिता जी भी अपने भतीजे के पौरुष और ताकत को देख कर प्रभावित थी. ऐसे हे वो उन्हें

उठाकर बाथरूम के अंदर ले आया जहा ऋतू दीदी से उसने prem-milan किआ था. पांच फ़ीट से थोड़ी ऊंचाई की ताईजी एकदम यौवन से भरपूर लड़ी हुई औरत थी.

गोल आकर्षक चेहरा, विशालकाय मॉटे दूध जो आगे माधुरी दीदी को भी इन्ही से मिले थे फिर गोल मांसल मुलायम पेट और सबसे ख़ास उनके बड़े कूल्हे जो घर में

सबसे भारी और गदराये हुए थे. दोनों को पता था के समय ज्यादा नहीं है तोह अंदर आते हे अर्जुन ताईजी पर झुक कर उनके होंठ पीटा उनकी साड़ी शरीर से अलग

करने लगा. ललिता जी भी अपने ब्लूज़ के हक्क खोलती उसको फर्श पर फेंक साड़ी और पेटीकोट को ढीला करने लगी. अर्जुन के बड़े हाथ उनके मॉटे उभारो को दबा रहे थे

और मुँह उनके होंठ गाल को चूम रहा था. जब उनके शरीर पर सिर्फ ये 2 सफ़ेद कपडे हे रह गए तोह ललिता जी अर्जुन का पजामा खींच कर निचे सरकाया. अपने

पैरो से हे अर्जुन ने उसको अलग कर दिए.

"ये तोह सचमुच हे भयंकर है रे मुन्ना." जैसे हे उन्होंने उसके फनफनाते लुंड को देख वो उसको दोनों हाथो में जकड़ती सी ऊपर निचे करने लगी. इधर अर्जुन ने

भी पीछे से उनकी बड़ी ब्रा खोल दी जो अपने आप से हे उनकी बाहो में झूल गई. एक बार लुंड छोड़कर ललिता जे ने अपनी मोती मांसल जांघो और गांड की दरार में

फांसी कच्ची भी उतर फेंकी और फिर वापिस लुंड पकड़ कर उसपे अपना थूक गिराकर आगे पीछे करने लगी.

a4f32df.jpg


(ताई - ललिता जी)

"ताईजी आपके ये कितने बड़े है न. जैसे 5 किलो के खरबूजे हो." उनके नंगे और बड़े बड़े दोनों दूध को किसी ग्वाले सा दबाता मसलता अर्जुन जैसे अपनी गदराई ताई

के थानों से दूध हे निकलने लगा था.. "हाय बीटा.. सब तेरा हे है.. आह.. मसल जोर से इनको. जैसे तेरा दिल करे"

जब लुंड ाचे से चिकना हो गया तोह अब उसका सूपड़ा और भी खतरनाक लग रहा था. ताईजी की छूट तोह शायद आज हे उन्होंने कोरी की थी. हल्का गुलाबी भाग

थोड़ा नजर आ रहा था जिसके किनारे थोड़े सांवले लेकिन बहार पूरी गोरी थी. दोनों मोती जाएंगे आपस में बिलकुल सटी हुई थी.

"ताईजी आप ऐसे कड़ी हो जाओ." अर्जुन ने ललिता जी को दिवार के ऊपर दोनों हाथ रख के धकेलने की मुद्रा बनाने को कहा. वो भी अनुसरण करती अपने टंगे फैलाये

कड़ी हो गई. पहली बार अर्जुन ने उनकी बड़ी, गोल और ऐसी मजे में थिरकती गांड देखि तोह वो उसकी दरार में हाथ फेरता उनका जायजा लेने लगा. दरार इतनी गेहटी थी

ऊँगली के 2 पोरे अंदर धस रहे थे. ललिता जी की छूट गीली हो रही थी तोह उन्होंने अपनी कमर झटकी. "कर कुछ या ऐसे हे सहलाता रहेगा." उनकी आवाज में भारीपन

सा था और उनकी हालत देख कर अर्जुन हल्का सा उनपर झुका और टैंगो के बीच में से पाना लुंड उनकी छूट की खुली फैंको पर रगड़ने सा लगा. "आह. बस अब अंदर कर

दे रे." उसके लुंड की गर्मी उनकी आग बढ़ा हे रही थी. अर्जुन ने अपने लुंड को जड़ से पकड़ते हुए उनकी छूट पर मजबूती से टिका कर अपने कूल्हे जोर से आगे की तरफ

धकेल दिए. "आई. मर्डर गई रे. बस. कुछ देर आह रुक." 3 बचे निकलने के बाद भी छूट जैसे वापिस बंद हे हो चुकी थी जो आज फिर से इस भीषण लुंड के सुपडे

ने खोल दी थी. "ताईजी. आपकी तोह तपने लग रही है. मेरा तोह अंदर हे फंस गया jaise."Apna आधा लुंड अंदर गुसाई अर्जुन एक हाथ से उनके कूल्हे को दबाता

दूसरे से उनके लटकते मॉटे दूध को मसलने लगा था. छूट किसी गुलाबी डोरी की तरह लिपटी थी लुंड के इर्दगिर्द .

"तेरा ये औजार तोह मेरी जैसी औरत की भी चीखे निकल देता है रे." गांड पीछे को लुंड पर मारती ललिता जी अब थोड़ी सहने की हालत में आ गई थी.

अर्जुन उतने हे लुंड को खींच कर धीरे धीरे आगे पीछे करने लगा. शुरू में तोह छूट की अंदर की खाल भी बहार को साथ निकलती. जैसे जैसे लुंड ने गति

पकड़ी उनकी छूट भी ाचे से जगह देने लगी अर्जुन के मोठे लुंड को. दोनों कूल्हों को थोड़ा ऊपर खींचते हुए अर्जुन ने एक करारा झटका दिए तोह उसके अंडकोष ताईजी

की गद्देदार गांड से टकरा गया और ललिता जी की आँखों में हलकी नमी आ गई. "कमीने.. मर्डर जाउंगी ऐसे.. आह. एक बार में पूरा हे थोक दिए.. आह माँ." दोनों

अब एक दूसरे से चिपक से गए थे लेकिन उनकी गांड का उभार अर्जुन को उत्तेजित करता रहा तोह उसने लम्बे और धीमे धक्के लगाने शुरू कर दिए. "मई गई रे आह..

आह आह.. मुन्ना रुक रे.. कोई 15-20 हे लम्बे धक्को में छूट पूरी भीग गई थी उनकी और शरीर अकड़ गया था. कुछ देर अर्जुन उनसे ऐसे हे चिपका रहा और पीछे

खड़ा दोनों मॉटे बोब्बे दबाता रहा. लुंड की तोह परछाई भी ऐसे नजर नहीं आ रही थी. 2 मिनट के बाद किसी घुड़सवार सा वह बिना ललिता जी की परवाह किये

उनकी छूट को चौड़ा करने में लग गया. "ताई बहोत मजेदार हो आप. आह देखे कैसे जा रहा है आपके अंदर." ललिता जी कास के छोड़ते हुए उसने उन्हें शीशे में दिखाया.

बहार को निकली मोती मटके जैसे गांड के निचे किसी बांस के डंडे सा अर्जुन का लुंड ललितजी को अपने अंदर बहार होता दिखा. कैसे उनके दूध के मटके हर धक्के

पर हिल रहे थे. वो तोह ये दृश्य देख कर मंत्रमुग्ध सी अपनी छूट कुटवानी लगी. होश तब आया जब अर्जुन ने उनकी छूट रास से भीगी अपनी ऊँगली उनकी गांड के

छेद पर दबाई.

"अरे वह नहीं बीटा. आह. आगे हे करता रह.. मेरा पिछवाड़ा तेरा डंडा झेल नहीं पायेगा. आह." इतना हे बोल पाई थी की लुंड जड़ तक अंदर बिठाये अर्जुन ने

अपनी तर्जनी ऊँगली गांड के सुराख़ में पेल दी और एक पल रुक कर उसको आगे पीछे करने लगा. ललिता जी को छूट में तूफ़ान सा आता महसूस हुआ और फिर 3-4 धक्को

के बाद हे उनकी टाँगे कांपने लगी. अर्जुन ने भी उनके पानी को अपने लुंड पर महसूस कर लिए था. "पाछह" की आवाज से लुंड बहार था और ललिता जी निचे बैठी थी.

"रुक जा रे. जान निकल दी तूने तोह. ये कहा से सीखा जो अभी किआ?" उनकी छूट गांड पर हुए हमले से झाड़ गई थी. "पता नहीं ताईजी, बस ये प्यारी लगी तोह मैंने

अंदर ऊँगली दाल दी." और वो उन्हें ऐसे हे नंगे बदन उठाकर कमरे में ले आया. एक घर फिर वो किसी घोड़ी की तरह बिस्टेर पैर थी और अर्जुन बिस्टेर से नीचे खड़ा

उनकी गांड को फ़ैलतीअ अपना लुंड छूट पर रखने लगा. "एक बार में हे दाल डीओ रे." ताईजी की बात पूरी भी नहीं हुई थी की जड़ तक लुंड अंदर था. अगले 7-8

मिनट बस सिसकारियां हे गूंजती रही थी कमरे में और उनकी गांड और चुके दबाता अर्जुन अपनी ताईजी की बच्चेदानी तक सुरंग को खोलता रहा. छूट में इतना तेज

संकुचन हुआ की अर्जुन का लुंड उसमे फस्स के फूलने लगा और ताईजी की हिलती गांड के 2-3 झटको ने लुंड को भी खाली करना शुरू कर दिए. "आह ताईजी.. मेरा भी

आह.. आपके अंदर." इतना बोलकर वह उनकी गांड के ऊपर देहता छूट में वीर्य की बारिश करने लगा था. 5-6 गहरी पिचकारियों ने इतना छूट को भर दिए था के किसी

सफ़ेद धार सा उसका रास छूट से बहार निकलने लगा. दोनों होंठ फैले हुए इस अध्भुत चुदाई का वर्णन कर रहे थे. मॉटे दूध के ऊपर उनके निप्पल तोह किसी छोटे

काळा अंगूर से कड़े और सख्त हो चुके थे.

"सच बोलती हु रे. ऐसा सुख सिर्फ तूने हे मुझे दिए है. एक बार में हे ऐसा लगता है के अब कभी छूट लुंड न मांगेगी लेकिन सुबह फिर इसकी खुजली होने लगेगी

ये याद करते हे." अपने आप को हिम्मत देती सी ताईजी बिस्टेर से कड़ी हुई और टाँगे फैला कर चलती बाथरूम में गई. अर्जुन लेता हुआ उनकी फैली गांड देख रहा था.

"अगली बार यही करूँगा." मैं में खुद से कहता वो भी उठ खड़ा हुआ कपडे पहन ने के लिए. बाथरूम में ताईजी के सामने हे उसने पजामा पहना तोह वो उसको बहार

जाने को कहने लगी. "मुझे पेशाब करना है, तू बहार जा." वो नहीं गया तोह उसके सामने हे बैठ कर मूतने लगी थी की जलन से एक मादक सी आह निकल गई. "कितना

बेशरम हो गया है रे. अब अपनी ताई को मूतने भी अकेले नहीं देगा." रुक रुक कर निकलता पेशाब भी उनको मजा दे रहा था. "ताईजी अगली बार मई वह करूँगा, पीछे." अर्जुन ने अपने पाजामे को नीचे कर साबुन ाचे से धोया फिर मुँह और हाथ भी और बहार आ गया. ललिता जी उसकी बात सुनकर बस मुस्कुरा दी. गांड उनके पति

ने खूब मारी थी. लेकिन पिछले 13-14 साल में तोह जैसे राजकुमार जी का अब उनकी गांड में ढंग से बैठ नहीं पाया था. 7 साल से वो सुनी हे थी. "पिछवाड़ा खुल गया

तोह फिर चलने बैठने से भी जाउंगी मई." खुद से कहती वह बहार आई और उसके कमरे को जल्दी जल्दी ठीक करने लगी. एक घंटा होने को आया था उन्हें ऊपर आये

हुए. 10 मिनट में हे सब ठीक कर वो निचे चल दी. टाँगे अभी भी फैला कर हे चल रही थी वो लेकिन ज्यादा पता नहीं चल पा रहा था साड़ी की वजह से. इधर

अर्जुन बिस्टेर पैर लेत गया था क्योंकि म्हणत कुछ ज्यादा हे हो गई थी.

.

.

.

"रेखा आज तू मेरे कमरे में सो जैव. अकेले रोज सोना मुझे नहीं भाता." ललिता जी ने खाना परोसती अपनी देवरानी को कहा तोह एक बार अपने बेटे की तरफ देखने के

बाद उन्होंने भी हां ठीक है दीदी कह दिए. अर्जुन ने उनको इशारे से कह दिए था के ठीक है. फिर 9 बजे तक सब खाने से फारिग हुए तोह अर्जुन ऊपर वाले कमरे में

बैठकर टेलीविज़न हे देखने लगा. वैसे भी अभी उसको पता था के रात को शायद एक जुंग और करनी पड़ेगी. अलका दीदी कुछ देर उसके साथ प्यार भरी मस्ती करती

रही लेकिन कोमल दीदी के वह आ जाने से वो थोड़ी देर टेलीविज़न देख कर निचे चल दी सोने. 10:30 बजे कोमल दीदी अर्जुन को निचे जाकर आने का बोल चल दी तोह

वो भी खड़ा हुआ. एक लोशन, जो संजीव भैया ने कभी लिए था लेकिन उपयोग नहीं किआ था निकल कर तकिये के नीचे रखा. अपने कमरे से एक पुराण टोलिया, पानी

और दर्द निवारक दवा उसने पहले से हे कमरे में रख दी थी. गुजरते दिनों के साथ हे अब अर्जुन को prem-milan और pratham-milan का अनुभव हो चूका था. अब उसकी

कोशिश थी की काम से काम दर्द और ज्यादा से ज्यादा सुख दिया जाये.

कोई 20 मिनट बाद कोमल दीदी अंदर आई तोह ड्राइंग रूम में कोई नहीं था. अर्जुन का कमरा खली देख कर वो जाने लगी फिर रुक कर संजीव भैया के कमरे में देखा

तोह खुश हो गई. अर्जुन नहाकर आया था और पजामा पहने अपने ऊपर के भाग को पांच रहा था.

"आ जाइये दीदी. हम आज यही सोयेंगे." वो हलकी मुस्कान के साथ बोलै तोह दीदी सकुचाती सी बिस्टेर की तरफ बढ़ी. कमरे में सफ़ेद प्रकाश फैला था और कोमल का

भरपूर जवान जिस्म कुछ ज्यादा हे खिला दिख रहा था. शरीर पर एक सफ़ेद सलवार और कमीज थी, सूती जो शायद रात में सोने में आरामदायक थी. दोनों पाँव

लटकाये वो फर्श की तरफ हे देख रही थी. मैं आगे आने वाले पालो को सोचकर रोमांचित और थोड़ा भयभीत भी था.

"कड़ी तोह हो जाइये के बार." अर्जुन को अपने सामने खड़ा देख उन्होंने अपनी बड़ी बड़ी आँखे ऊपर की तोह वह वो अपने दोनों हाथ उनके कंधो पर प्यार से रख उन्हें

हे देख रहा था. सकुचाती सी वो कड़ी हुई तोह अर्जुन ने उनकी पलके चूम ली. "दीदी आप तैयार तोह हो न? देखो कुछ दर्द होगा शुरू में और अगर हिम्मत हार गई

फिर नहीं कुछ कर पाएंगे." अपने छोटे भाई को खुद क लिए इतना संजीदा देख कोमल ने अपने हाथो में उसका चेहरा थाम गालो को चूम लिए. और गले लग गई अर्जुन

के. "मुझे कुछ नहीं पता भाई के ये सही होगा या गलत. दर्द होगा तोह भी कोई परवाह नहीं लेकिन सिर्फ इतना पता है के मई इस घर से जॉन तोह तेरी होकर हे जॉन."

कोमल दीदी की आवाज में थोड़ा दर्द और ज्यादा प्यार थे. वो ज्यादा बोलने वाली लड़की नहीं थी और घर में शायद हे उसकी ज्यादा आवाज आती थी कभी. एक खूबसूरत,

खामोश और सुलझी हुई लड़की. "दीदी, मई भी प्यार करता हु आपसे और ये आपका दिल भी जानता है. लेकिन आपने जो देखा वो आधा सच था. जिस मजे में माधुरी

दीदी कल रात को थी वह तक का सफर इतना आसान नहीं है." अपनी बहिन की पीठ सहलाता अर्जुन भी इतना प्यार पा कर थोड़ा भावुक सा हो गया था.

"भाई थोड़ी देर मेरे साथ लेत जा." कोमल ने ये बात कही तोह अर्जुन ने अपनी बड़ी बहिन को प्यार से बिस्टेर पर लिटा दिए. उनका सर अपनी बजे पे रख वो भी कोमल दीदी

को बाहों में भर के साथ हे था. "दीदी रात को तोह आप ऐसे नहीं थी." हलकी सी हंसी से उसने इतना कहा तोह कोमल दीदी ने अपना चेरा उसके सीने में लगा लिए.

"पता नहीं क्यों लेकिन आज लग रहा है के जैसे मई भी एक लड़की हु और मुझे भी एक साथी मिल गया हो." अपने हाथ से अर्जुन की छाती सहलाती दीदी ने कहा और

अपनी नजर उसके चेरे की और कर दी. ऐसे हे लेते हुए अर्जुन ने एक बार हलके से उनकी आँखों के ऊपर एक छोटा सा चुम्बन कर फिर उनके ऊपर वाले भरे भरे होंठ

को अपने मुँह में ले लिए. ये शायद उसके अब तक के सबसे बेहतरीन चुम्बन में से था. कोमल दीदी भी उसका एक होंठ अपने मुँह में खींच रही थी. ऐसे हे दोनों के चेहरे

अब बिलकुल सामने आ गए थे. अर्जुन को एहसास हुआ जैसे उसके होंठ पर खून लगा हो. थोड़ा सा दीदी को रोक कर देखा तोह उनके होंठ पर हल्का सा खून लगा था

अर्जुन की इस भरपूर चूसै से. वो मुस्कुराती वापिस उसके होंठो से जा लगी तोह अर्जुन ने अपने एक हाथ को उनके पाजामे के ऊपर से हे नरम कूल्हों को महसूस करना शुरू

कर दिए. अंदर शयद दोनों हे अंतर्वस्त्र नहीं थे. न हे ब्रा और न हे कच्ची. कोमल दीदी की साँसे जब अनियंत्रित सी हुई तोह कुछ देर के लिए होंठ अलग हुए.

कमीज बटन वाली थी तोह अर्जुन ने धीरे धीरे उनके ऊपर के 3 बटन खोल कर आधे दूध बेपर्दा कर दिए. दोनों की ऊपरी हिस्सों को बरी बारी चूमते हुए अब

उसका हाथ दीदी के नरम कूल्हों पर पाजामे के अंदर से हे रेंग रहा था. उनको सहलाता हुआ वो महसूस कर रहा था के ऋतू दीदी और कोमल दीदी में एक बड़ी समानता

थी की उनकी खाल इतनी नरम और नाजुक थी और दोनों हे दूध जैसी थी. जहा भी अर्जुन थोड़ा जोर से चूम रहा था कोमल के उन उभारो पर वह लाल हलके निशान

कुछ देर के लिए बन जाते. एक पल के लिए जब अर्जुन रुका तोह दीदी ने उसके हे निप्पल अपने मुँह में भर लिए थे और अपने नाख़ून से उसके कूल्हों को हल्का हल्का कुरेद

रही थी जिस से सारा शरीर के मजे की लहर में डूब चला था. उनकी एक तंग अपने भाई के ऊपर आ गई तोह अर्जुन का पाजामे के अंदर आजाद लुंड सीधा उनकी छूट

पर रगड़ से करने लगा था.

"इसको थोड़ी देर संभल न." अपना मुँह अर्जुन की छाती से हटते उन्होंने इशारे से लुंड को हटाने को कहा तोह अर्जुन ने ना में सर हिलाया.

Screenshot_20190914-143000.png


"ये दूर नहीं होगा अब. ये आपके पास रहने के लिए हे तोह मचल रहा है." शर्मा के वह वापिस उसकी छाती पर झुकने लगी तोह अर्जुन ने उन्हें रोक कर बाकी बचे 4

बटन भी खोल दिए उनकी कमीज के. इतने गोर और बड़े दूध, जिन्हे पिछली रात उसने दबाया था लेकिन देख आज रहा था. उनकी चूची का दायरा भूरा न हो के

हल्का laal-gulabi था और निप्पल थोड़े लम्बे और गुलाबी, किशमिश के आकर के. अर्जुन बस उन्हें देखता हे रह गया. माधुरी दीदी के अध्भुत, भारी और मॉटे थे, कुछ

उनसे काम सख्त लेकिन उतने बड़े और ज्यादा मॉटे निप्पल वाले ताई जी के थे लेकिन ये वाले बेहतरीन थे. माधुरी दीदी से शायद एक आकर छोटे और ठोस खूबसूरती

बिलकुल ऋतू दीदी के उभारो जैसी थी. "क्या देख रहा है ऐसे?" कोमल दीदी ने बड़े प्यार से अपने ऊपर वाले दूध को मुठी में पकड़ कर उसका निप्पल अपने भाई के मुँह

की और खुद हे कर दिए. "ये मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत ब्रेअस्ट्स है." अर्जुन ने किसी भूखे बचे की तरह उनका गुलाबी निप्पल मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिए.

और फिर दूध चूसते हे hi दीदी को सीधा लिटा कर उनके ऊपर च सा गया. एक मुलायम उभर को प्यार से दबाते हुए दूसरे को पीने में लगा था और यही क्रम वो दूसरे

के साथ करता. "उम्मम्मम.. ये भी ाचा लग रहा है भाई.. उम्म्म.. एक दिन इनमे से असली दूध भी आएगा." अपनी बात कहकर वह खुद हे शर्माने लगी थी. इधर अर्जुन ने

उनकी सलवार दूध चुसकते हुए हे निचे सरकनि शुरू कर दी थी. दूध छोड़ कर वो उनकी गहरी नाभि को चूमने और चाटने लगा तोह कोमल दीदी का कोमल बदन टेढ़ा

होने लगा. "आह.. कोई कसार नहीं छोड़ेगा.. ऐसे कितने बटन होते है भाई शरीर में. तू तोह जैसे हर पल एक नया आनंद दे रहा है." उनकी छूट तोह ऐसे हे गीली

होने लगी थी. मजे की अधिकता में उन्होंने अपने हाथ से उसका मोटा लुंड दबा लिए जो किसी लकड़ी सा सख्त हो रहा था.

"आपके साथ मई वो सब कुछ करूँगा जो किसी भी prem-milan की किताब में वर्णित हुआ होगा." और दोनों हाथो से उनका पजामा प्यार से उतर कर वही साइड में रख दिए.

अब उनकी gori-fooli हुई छूट उसके सामने थी. हलके सुनहरी से बाल जो छूट से ऊपर पेट की तरफ थे. 2 इंच के दायरे में. माखन से मुलायम और मॉटे होंठ,

जिनके बीच में हल्का सा शहद की बूँद सा चमकता काम रास था. दरार भी किसी गुलाब की पंखुड़ी जैसी. अपने भाई को खुद के खजाने को ऐसे घूरते देख थोड़ी

शर्म आई लेकिन ये देख के खुसी भी हुई की अर्जुन को ये पसंद आई. अर्जुन ने अपनी जीभ से उस चमकती बूँद को जैसे हे चूहा उसको यहाँ किसी तरह की खराम गंध

न आई. बल्कि उसमे से तोह सच में हे एक ऐसी महक आ रही थी के अपनी नाक से उसने वो खुस्भु अपने अंदर तक भर ली. किसी कस्तूरी सी मादकता वाली महक. और अपने

आप हे उसकी जीभ कोमल दीदी के शरीर में संगीत भरने लगी. छूट की फांको के बीच में जीब का पैना हिस्सा गरम चाकू सा चलने लगा और वो मक्खन सी पिघलने

लगी थी. "नहीं पता था की ये भी होता है भाई.. आआह्ह्ह्हह.. ऐसा खुमार चढ़ रहा है.. " दोनों हाथो से चद्दर पर मुट्ठिया कस्ती हुई कोमल फड़क रही थी.

"ये हे तोह मुखमैथुन हु दीदी. जहा प्रेमी अपनी प्रेमिका के सभी अंगो को जागृत करता है." और अपने हाथो से उनके दोनों कूल्हे ऊपर कर वापिस मुँह सत्ता दिए उस

काम के प्याले में. पहले साँसे उखड़ी, फिर धड़कन बढ़ी, पेट खींचा और छूट भरभरा के झड़ने लगी थी. कोमल का चरमसुख इतना ज्यादा था की आँखों से भी

आंसू बहते गाल तक आ गए थे.. उनकी छूट से मुँह हटाकर वापिस उनको बाहो में लेकर वो लेत गया. बस ऐसा करने से पहले अपना पजामा निकल चूका था.

"आप ठीक हो न दीदी?" उनके उभर सहलाता वो बोलै तोह कोमल दीदी ने भीगी आँखों के बावजूद खुसी से कहा, "मुझे तोह इतनी खुसी मिली है भाई के मई जैसे आज

पहली बार अपने अंदर की औरत का एहसास कर पाई हु. दिल इतना हल्का लग रहा है जैसे सारा बोझ हे उतर गया मेरे शरीर से." बोलते हुए अपनी तंग वापिस भाई के

ऊपर रखती किसी बैल की तरफ अर्जुन रूपी वृक्ष से लिपट गई. मांसल नंगे कूल्हे इस मुद्रा में थोड़े अलग होकर और भी दिलकश लगने लगे थे. कड़े निप्पल अर्जुन

की छाती में तीर की तरह चुभन पैदा करने लगे और कोमल बेतहाशा उसको चूमती रही. लुंड छूट से टकराता नाभि तक चिपक रहा था.

"अब आपको आपके पूर्ण होने का एहसास भी करा देते है." इतना बोलकर तकिये के निचे से बॉडी लोशन की शीशी निकल कर उनके दोनों पैरो के बीच आ बैठा.

अकड़ा हु वो विशालकाय लुंड अब कोमल के दिल में कोई डर नहीं पैदा कर रहा था. वो बस प्यार से अपने छोटे भाई को देख रही थी जो पूरे दिल से उन्हें ख़ुशी दे रहा था. छूट बहार के भाग पर बड़े प्यार से अर्जुन मालिश करने लगा था और साथ हे उनकी कोमल जांघो पर भी. फिर नारियल गिरी का तेल अपने हाथ साफ़ करके

छूट की दरार में डाला तोह इस ठन्डे तरल की अनुभूति भी बेहद मजेदार लग रही थी कोमल को. अपनी ऊँगली जैसे हे छूट के छेड़ में घुसाने लगा तोह पहले अपनी

ऊँगली के नाखून की तरफ देख, सफाई से कटा हुआ था और जरा भी बहार नहीं था. वापिस उस दरार में ऊँगली चलता छूट के छोटी सी मोरी को खोलने लगा. एक इंच

तक ऊँगली जब अंदर बहार होने लगी तोह एक बार फिर थोड़ा तेल टपकाया और ऐसे हे अंदर मालिश करने लगा. फूले हुए छूट के मॉटे होंठ अब फड़कने लगे थे.

इधर ढेर सारा तेल वापिस अपने हाथो पर लगा कर अपने लुंड के सुपडे से जड़ तक धीरे से मलने लगा. "आप हिम्मत रखना." उनको इतना बोलकर कूल्हों के नीचे

एक तकिया और उसके ऊपर पुराण टोलिया दाल अर्जुन अब वापिस अपनी दीदी की टांगो के बीच आकार उनपे लेत सा गया. "कितना भी दर्द हो तू बस करते रहना भाई. ये दर्द

भी ख़तम हो कर एक मजे में बदलेगा. मई इतनी नाजुक भी नहीं सिर्फ नाम हे कोमल है." मुस्कुराती हुई दीदी ने उसके होंठो को मुँह में भर लिए एक बार.

हलके से अपने लुंड को छूट की इस बंद दरार पर फेरते हुए भी अर्जुन का जिस्म कांप सा रहा था. चिकनाई इतनी थी की लुंड छूट के बहार के होंठो पर टिक भी नहीं रहा था और इसका मतलब था के अपने होंठो से वो उनकी आवाज बंद नहीं कर पायेगा. "आप अपने मुँह में ताइये का थोड़ा हिस्सा दबा लो कुछ देर क लिए." हामी भर्ती कोमल

दीदी ने वैसा हे किया. पूरे उजाले में उनका ये मिलान और दोनों के चमकते अंग शायद बहुत कुछ बयां कर रहे थे.

लुंड को मुट्ठी में पकड़ते हुए उसने जैसे हे उनकी छूट के छेड़ पर सूपड़ा दबाया तोह उसकी खुद की सिसकी निकल गई. एक पल के लिए आँखें बंद कर कुछ शांत हुआ

और दबाव डालते हुए साधा हुआ झटका मार दिए. "कच्छ" की आवाज हुई जो सिर्फ इस शांत कमरे में दोनों के कानो तक हे पहुंची थी. सूपड़ा छूट में धंस चूका था

और एक पल के लिए वो जगह सफ़ेद सी हुई फिर लाल. 2-ढाई इंच पर हे उनकी छूट की झिल्ली पहात गई थी लेकिन शरीर बिलकुल भी नहीं तड़पा और न हे कोमल दीदी ने

कोई धक्का हे दिए उसको. "आप ठीक हो.?" चिंतित स्वर में उसने इतना हे पुछा तोह असीम दर्द के बावजूद कोमल ने तकिया मुँह से निकल सिर्फ इतना कहा, "जितने सारा नहीं

दाल जाता तू रुकना मत. मुझे कुछ नहीं होगा." उनका स्वर उनकी आँखों की हालत से बिलकुल विपरीत था. जहाना आँखों में पीड़ा थी स्वर सख्त था. फिर से मुँह में तकिया

दबा वो शांत हो गई और इधर अर्जुन कुछ सोचता सा अब उनकी दोनों जांघो को दबाये जोर इकठ्ठा करने लगा था. अगले हे पल हल्का सा लुंड को बहार खींचते हुए उसने

शरीर का समस्त जोर लगा दिए था. छूट किसी पाकी ककड़ी की तरह fatt-ti चली गई और 7 इंच गहराई पर लुंड जाम हो गया था. छूट के 2 तरफ से खून की धार

बहने लगी थी और पूरा शरीर हल्का पीला सा लगने लगा तोह अर्जुन ने कोमल दीदी के मुँह से तकिया हटा कर उनका चेहरा थपथपया. उनके होंठो से खून आ चूका था.

"दीदी.. दीदी.."

"आह भाई. तेरी बहिन ने आह सब सेहन कर लिए.. बस अब आह मुझे इतना प्यार कर .. की कभी दर्द हे न हो." उनकी बात सुनकर अर्जुन बिना शरीर का भार डाले अपने

हाथो के सहारे उनके होंठ और जीभ चूसने लगा. कोमल दीदी के तोह शरीर में जैसे जान बाकी हे नहीं रह गई थी. लेकिन उनकी आँखें और हरकत करती जीभ गवाह

थी की उनकी हिम्मत का जवाब अर्जुन के पास भी नहीं था. ऋतू दीदी 20 थी तोह ये 21. शरीर को वापिस गरम करने की सोच कर अर्जुन ने उनका stan-mardan शुरू किआ

कभी मुँह में लेके चूसना तोह कभी निप्पल को उंगलियों में कास कर हलके हलके रगड़ना. लुंड तोह ऐसे फंसा हुआ था जैसे वह दोनों इस एक अंग के साथ हे पैदा हुए हो.

शायद उनकी छूट ऋतू दीदी से भी ज्यादा संकुचित थी. जब कोमल दीदी को अपने भाई के हाथो की रगड़ से रहत मिलने लगी तोह उन्होंने अपने पेअर सीधे किये और

एक बार फिर घुटने मोड़ने की कोशिस की. "ाअम्म्म.. कर भाई.. ऐसे साड़ी रात निकल जाएगी.. ासश्च तू कर.."

अर्जुन ने भी उनकी बात सुनकर दिल मजबूत किआ और ऐसे हे लुंड फसाये उनकी जांघो को पकड़ते अपना लुंड बहार की तरफ खेंचने लगा. छूट के अंदर का कुछ मांस

भी साथ चिपका बहार आ रहा था. थोड़ा तेल वह पे लगा कर वापिस उसने वह 1 इंच लुंड अंदर किआ. 10-12 सूक्ष्म धक्को से छूट अब ीनता साथ देने लगी थी की

मांस बहार नहीं निकल रहा था. लेकिन छूट का चला अभी भी कास के लिप्त था. अर्जुन ने दीदी की सिसकिया और आहे सुनते हुए हे थोड़ा जोर से लुंड बहार निकला,

तक़रीबन 4 इंच और वैसे हे अंदर ठोंक दिए.

"आपका तरीका हे ठीक है शायद दीदी. दर्द से हे दर्द ख़तम करने का." ऋतू दीदी ने भी तोह यही किआ था और इतना बोलकर वो एक माधयम गति से उनको आधा लुंड

निकलते डालते हे छोड़ने लगा था. छूट जो इतनी देर से सूखी थी और सिर्फ तेल की हे चिकनाहट थी अब वो भी हलके हलके से अपना रास छूट के अंदर पैदा करने

लगी थी. अब वो उनके ऊपर लेत गया था और कोमल दीदी की दोनों टंगे उसकी कूल्हों से लिपटी थी. "है.. आह भाई.. रुकना मत तू.." आँखों से पानी बहती कोमल को

इस दर्द में भी मजा आने लगा तोह वो बस अर्जुन का हौंसला बढाती रही. मॉटे दूध बुरी तरह अर्जुन की छाती के नीचे कुचल से रहे थे. कुछ छूट के अंदर रुका

खून भी अब इन लम्बे धक्को के साथ बहार आने लगा. लेकिन ये दोनों बिना किसी परवाह के दर्द में भी सुकून लेने में लगे थे. इतना दबाव किसी छूट का नहीं पड़ा था

अर्जुन के लुंड पर जितना आज पड़ा था. लेकिन अब जितना मजा आ रहा था वो भी बयां करने से कही ऊपर था. प्यार से शुरू हुआ ये मिलान एक खतरनाक मंजर की तरह

हो चूका था. 6-7 इंच तक गहरे धक्के और thap-thap की आवाजें हे थी वह. एक बार फिर उनका शरीर अकड़ा लेकिन न हे उन्होंने रुकना था और न हे वो रुकी. चरमसुख

को भी पीछे छोड़ कर वो बस अपने छोटे भाई के इस मजबूत शरीर के नीचे जैसे उसमे समाने को आतुर थी.

"आह दीदी... अब आपको ठीक लग रहा है न?" हफ्ते हुए अर्जुन ने जब देखा की लुंड अब ाचे से अंदर बैठ रहा है और दीदी की आँखें भी अब आंसुओ से भरी हुई

नहीं है तोह सिर्फ इतना हे पुछा.

"तुझे तोह दर्द नहीं हो रहा न भाई.? देख मेरा ये अंग ऐसा हे है. जो होना था वो हो गया.. अब बस मुझे इसको जीने दे. बोल मत जो करना है कर." और आँखें

वापिस बंद करके वो अपने पेट तक गहराई में जाते हुए उसके इस मोठे लुंड को महसूस करके बार बार गीली हो रही थी. "बहोत हिम्मत है आपमें दीदी. आह.. लेकिन

सुबह तक आपके शरीर में दर्द का निशान भी नहीं रहने दूंगा." किसी घोड़े सा हिनहिनाता अर्जुन अपने वैसे हे लुंड से छूट को छोड़ते हुए उनके होंठो और गालो को

चुस्त लगा रहा था. शाम को ताईजी की चुदाई का असर भी थोड़ा बहुत नजर आने लगा तोह कोमल दीदी को भी उसके शरीर में इस परिवर्तन का एहसास हुआ.

"भाई.. आह.. रुक एक बार." अर्जुन जैसे मीलो भाग कर रुका हो. माथे पर पसीने की बुँदे थी और शरीर फड़क रहा था.

"इसको निकल मेरे अंदर से." लुंड की तरफ इशारा करते हुए कहा तोह अर्जुन ने बड़े आराम से अपना लुंड बहार खेंचना शुरू किआ. सुपडे पर आके जैसे छूट के

होंठो ने उसको मुट्ठी में भर लिए था. हलके झटके से लुंड बहार खींचा तोह थोड़ा खून और लिसलिसा सा पानी तार की तरह लुंड और छूट के साथ जुड़ा सा दिखा.

वह से उठकर अर्जुन ने कपडे पर पानी दाल के उनकी छूट को ाचे साफ़ किआ और अपने लुंड को भी. छूट ऐसे दिख रही थी जैसे उसको उधेड़ दिए हो सिलाई करने

के बाद. "यहाँ लेत जा." बड़ी हिम्मत जूता कर दीदी घुटनो पर चलती एक तरफ हुई, इस मुद्रा में भी उनके दोनों चुके सख्त हे दिख रहे थे. अर्जुन आज्ञाकारी बचे

सा बिस्टेर पर लेता था पहली बार दीदी ने उसके लुंड को दोनों हाथो से पकड़ा. एक बार फिर से तेल गिरा कर चमकते हुए वो बिना ज्यादा हरकत किये उसके ऊपर लेत

गई. "मेरे वह पर लगा इसको और बस अब तेरी दीदी को तुझे प्यार करने दे." अर्जुन ने अपना लुंड छूट के छेद पर टिकाया तोह वह जितना उचित हो सका टंगे फैलाये

खुद को उस पर धकेलने सी लगी. "आह." सूपड़ा अंदर समां गया तोह वैसे हे कुछ देर आराम करते हुए उसकी छाती चूमने लगी. अगले हे पल उनकी कमर ने 4-5 इंच का

झटका लिए और जितना लुंड इस से पहले छूट में गया था उतना वापिस वो निगल गई. दोनों हाथ उसकी छाती पर टिकाये कोमल सिसकती सी आंख्ने बंद किये खुद घुड़सवारी

करने लगी थी इस तगड़े घोड़े की. "मसल इन्हे या खा जा." अपने दोनों दूध बुरी तरह दबती वो अर्जुन को ललचा भी रही थी. और इस समय अर्जुन भी उनके शरीर

के इस मादक भाग को ललचाई नजरो से देखने के बाद हाथ बढ़ा कर दबाने लगा था. मॉटे कूल्हे किसी चक्की के पात की तरह लुंड पर चल रहे थे और छूट रास

बहार निकल कर उसके पेट तक पर चिपक रहा था. गुलाबी निप्पल तोह जैसे नीले हे हो चले थे इतनी चूसै और मसलने से.

"दीदी रुको." थोड़ा ऊपर उठकर अर्जुन ने अपने ऊपर सवारी करती कोमल को बाहों में भर लिए और फिर वापिस उन्हें ऐसे हे निचे कर फैली टांगो के बीच खुद हे धक्के

देने लगा. दोनों रबर से बड़े बड़े दूध बारी बारी से चूसता वह अब गहरे धक्के से उनकी पिलाई कर रहा था. वो दोनों हे चरम की उत्तेजना में पागल होने लगे थे.

अगले 3-4 मिनट बस तेज सांसें, गहरे धक्के और मजे की सीत्कार हे सुनाई पड़ी थी. सूपड़ा मोटा होने लगा था और छूट फड़फड़ाने. एक के बाद एक 6-7 लगातार संकुचन छूट के अंदर हुए तोह जैसे वह फिर से एक तूफ़ान आया था. जो पिछले वाले से भी बड़ा और लम्बा चला. Choot-ras किसी थोड़े पेशाब की तरह बाहर

फूट पड़ा तोह अर्जुन ने भी ant-samay पर लुंड बहार खींचा जो दोनों को पसंद भी नहीं आया लेकिन बहार निकलते हे लम्बी सफ़ेद धार पेट और छूट की जड़

तक गिरने लगी थी. अपनी बड़ी बहिन पर कटे वृक्ष सा वो देह गया बिना ये परवाह किये की खुद उसके हे वीर्य से दोनों के बदन लिथड़ चुके है. उधर कोमल का भी

यही हाल था. लेकिन उसका दिल आज पूरा प्यार से भर गया था. जैसे पहली बारिश में तजा अंकुरित हुआ नाना पौधा.

"चलो मई आपको साफ़ कर देता हु दीदी." कोई एक घंटे बाद अर्जुन उठा तोह निचे दीदी वैसे हे सो चुकी थी. लेकिन उसको पता था के शरीर ठंडा हो गया तोह चल

भी नहीं पाएंगी. किसी तरह उन्हें नींद से जगा वह रौशनी से भरे इस कमरे से उठाकर उन्हें बाथरूम में ले आया. कोड पर बिठा कर गीजर चालू कर पहले पूरे

शरीर को ाचे से पानी से धोया और फिर छूट से लेकर गांड तक के छेड़ को. खून के निशाँ वह भी जम्म गए थे. अपने भाई को इतनी परवाह और प्यार करते देख

कोमल भावुक हो गई. "कितना ख़याल रखता है मेरा. काश पहले हे ये दर्द सेह लेती तोह आज बस तेरी बाहों में हर रात प्यार से सोती." वो चेहरा चूमने लगी उसका. दोनों शरीर से बेशक निर्वस्त्र थे लेकिन प्यार दिल से था एक दूसरे के लिए. अब अर्जुन पूरे शरीर को साफ़ कर चूका तोह बाल्टी में गरम पानी दाल गीले तौलिये से

छूट के ऊपर गर्मी देने लगा. "आह थोड़ा दुखता है भाई." उसका हाथ रोकती सी दीदी बोली तोह अर्जुन ने उनका हाथ हटा कर फिर से अपना काम चालू रखा. जब दिखने लगा

की सूजन लगभग जा चुकी है तोह उनके दोनों पाँव भी गरम पानी में डूबा कर हलके हाथो से उन्हें दबाने लगा. "सारा दर्द ख़तम हो जायेगा आपका ऐसे. बस आप अभी

सोने से पहले एक दवा ले लेना और मेरे साथ हे सोना. 11 बजे शुरू हुई ये प्रेमलीला शायद 12:30 ख़तम हुई थी और एक घंटा सोने के बाद 2 बजे वह यहाँ बाथरूम में

थे. एक बार उनको ाचे से तौलिये से पांच कर अर्जुन ने वापिस बाहों में लिए और कमरे में बिस्टेर पर बिठाया. खून से साणे तौलिये को अपने कमरे में छुपा कर वापिस

आ पूरा बिस्टेर साफ़ किआ. दीदी को पानी के साथ दवा देकर उनके पाँव सीधे कर एक चादर उन्हें ुधा दी. खुद बाथरूम में वापिस आने के बाद जल्दी से नहाया और नंगा

हे उनकी चादर में घुस कर उनसे लिपट गया. कमरे की लाइट बंद कर दी थी. "ी लव यू bhai."Didi उसकी तरफ अँधेरे में पलट टी हुई बोली और एक छोटा सा चुम्बन

होंठो पर करने के बाद आँखें बंद कर ली. "ी लव यू तू दीदी" अर्जुन ने होल से कहा और अपने शरीर की गर्मी उनके शरीर में देता हुआ ऐसे हे सो गया.
 
अपडेट 33

Bhaag-daud


Neem-andhere में हे कोमल की आँख खुल गई थी. जांघो के बीच में गरम एहसास होने पर हलकी सी टाँगे हिलाई तोह छूट पर करंट सा लगा था. उसके छोटे भाई

का हथियार फूल कर नन्ही पारी के होंठ को सेहला रहा था हलके हलके. मुस्कुराती हुई वो थोड़ा सा पीछे हुई तोह शरीर में इतना दर्द नहीं था जितना मिलान के

समय और बाद में हुआ था. बिस्टेर से नीचे उतर कर बाथरूम की तरफ चलते हुए जरूर छूट की फांके जलन कर रही थी और पाँव हलके कांप रहे थे. आज

ऐसे नंगे बदन चलना जैसे उसको एक आजादी सी दे रहा था. बैठकर पेशाब करने लगी तोह छूट में से सीटी की आवाज थोड़ी बदल गई थी और एक तेज जलन भी

अलग सुख देने लगी थी. "आह. ये सब इतना ाचा क्यों लग रहा है.?" खुद से सवाल करती वो कड़ी हुई और ठन्डे पानी से छूट साफ़ करके अपना चेहरा ठीक

करने लगी. मॉटे दूध आज और भी अकड़ रहे थे वही हलके हलके मस्ती की निशाँ हर तरफ नुमाया थे शरीर पर. मुस्कुराती सी वापिस कमरे में आ कर घडी

की और नजर डाली तोह 4:15 हुए थे. कुछ सोच कर बॉडी लोशन की शीशी उठाई और फिर कुर्सी पर बैठ के हलके हलके पूरे शरीर पर खुद हे मालिश सी करने

लगी. जांघो के जोड़, कमर और छूट में दर्द तोह था लेकिन आज उन्हें अपना सबकुछ पसंद आ रहा था. कड़ी हो कर अपने कूल्हों और उनकी दरार में भी लोशन लगाया

और अब पूरा शरीर दमक रहा था. जिस्म पर रोये खड़े हो गए थे और निप्पल भी बहार को उभर चुके थे. दर्पण में ाचे से खुद को निहार कर वो वापिस बिस्टेर

पर आ गई. नींद में हे अर्जुन का हाथ उन्हें जैसे ढून्ढ रहा था तोह सीधा उनकी चिकनी छाती पर आ टिका. "मई यही हु मेरे भाई. और अब तोह ये शरीर के साथ

मेरी रूह भी तेरी हे है." प्यार से वो अपने भाई के होंठ चूमती खुद से बोली. एक मिनट के अंतराल में हे अर्जुन की आँख भी खुल गई. अपनी दीदी को यु उठा देख

पहले तोह वह थोड़ा हैरान हुआ लेकिन उनकी मुस्कान देख उनसे लिपट गया. "सुबह सुबह बड़ी महक रही हो आप?" उसने दीदी के कंधे को चूमते हुए कहा. "रात तूने

दिल भर के महकाया है तोह असर रहेगा ये अब." उसका चेहरा थम के ाचे से होंठ मिला दिए. वो भी अपनी दीदी के नरम दूध सहलाता उनके होंठ चूमने लगा.

"चल अभी उठ जा तू मई भी नीचे जा रही हु भाई. 4:30 हो गए है तोह वही थोड़ी देर सो जाउंगी." इतना बोलकर वो उठने लगी तोह अर्जुन उनकी जांघो में सर रख

के लेत गया. "थोड़ी देर प्लीज." और फिर उन्हें अपने ऊपर हल्का सा झुका कर एक गुलाबी निप्पल मुँह में ले किसी बचे की तरह चुसकने लगा और कोमल दीदी भी सर

पे हाथ फेरने लगी. "तुझे ये ाचे लगते है क्या?" थोड़ा मुस्कुराते हुए उन्होंने ये बात कही तोह अर्जुन ने एक पल के लिए मुँह अलग किआ और कहा, "सबसे ाचे. और

अब तोह मुझे इन्तजार रहेगा इनमे से दूध निकलने का." वापिस मुँह में लेकर चूसते हुए दूसरे वाला हलके हलके दबाने लगा. दीदी के तोह मुँह से आहे निकलने लगी थी.

"हट पागल. आह ऐसे थोड़ी दूध आएगा. अब चल उठ मुन्ना तू सच में छोटा मुन्ना बनता जा रहा है." लगभग उसके मुँह से अपना निप्पल खींचने लगी तोह फिर

तेज सिसकी निकल गई. थोड़ी मस्ती के बाद अर्जुन भी खड़ा हो गया. अभी भी नंगा हे था. "ये हर वक़्त ऐसे हे रहता है?" खड़े लुंड की तरफ इशारा करते हुए वो

बोली तोह अर्जुन हँसता सा बोलै, "प्यार का भूखा है न दीदी. आप एक बार जी भर के प्यार कर दीजिये फिर बैठ जायेगा." उसके नितम्ब पर चपत जमती वह हलके

कदमो से बहार निकल गई. अर्जुन भी लुंड का तनाव देख समझ गया था के बाथरूम जाना हे ठीक रहेगा. कोई 5 बजे वो घर के बहार था.

"ये प्रीती क्यों नहीं दिख रही?" हलके कदमो से 2 बार वह प्रीती के घर तक चक्कर लगा आया था लेकिन वो न दिखी. फिर चल दिए अपने नित्यक्रम पर. 6 बजने में

15 मिनट थे तोह घर में प्रवेश किआ. सामने दादा जी दाढ़ी बना रहे थे छोटे शीशे को जमीन पर टिका कर.

"आ गया मेरा शेर?" शायद शेव भी कर चुके थे. तोलिये से मुँह साफ़ करते रामेश्वर जी ने अपने पोते को पास बुलाया.

"थोड़ी देर तक संजीव आ रहा है. त्यार हो कर नाश्ता करने के बाद तू उसके साथ चले जाना. और अलका को इम्तिहान दिलाने प्रीती बिटिया ले जाएगी." उन्होंने अपनी

बात कही तोह अर्जुन के पल्ले कुछ न पड़ा. वो सर खुजाने लगा तोह रामेश्वर जी हंसने लगे और इधर कौशलया देवी भी आ बैठी.

"ऐसा है के नरेंदर और बचे तोह कल आने वाले थे लेकिन वो आज आ रहे है. लेकिन साथ में तारा भी आ रही है." ये आखिरी बात उन्होंने थोड़ी फ़िक्र से कही थी.

"तारा?" अर्जुन कुछ सोचता सा बस इतना हे बोलै.

"है तोह कितनी तारा है जिनको तू जानता है? एक हे है तेरी बुआ की राजकुमारी. वो महारानी भी आ रही है. और कल तेरे बाप का फ़ोन आया था रात में. कोई कार

निकलवानी है इसलिए संजीव भी आज हे आ रहा है." दादी दूध फेंट रही थी साथ में

"बाकी सब भी बता दो भाग्यवान", कौशलय जी को छेड़ते हुए रामेश्वर जी ने कहा तोह अपने पल्लू से हाथ रगड़ती वो फिर बोलने लगी, "अब पिछले 4 कमरे तोह पहले

से हे 8 लोगो को संभल रहे है. चाचा तेरा जितने रहेगा हमारे कमरे में हे रहेगा. दूसीर मंजिल के पिछले 2 कमरे भी आज तैयार हो जायेंगे बीएड, कूलर के साथ.

वह का ड्राइंग रूम तोह ऋतू ने कह दिए के अबसे वो उनका है तोह वो भूल जाओ. तोह तेरे दादाजी ने कहा के चारों लड़कियों को वो हे दोनों कमरे दे देते है. और

नीचे अब घर में जो आएंगे उनके लिए नहीं तोह फिर जिसका दिल करे वो रहेगा."

"दादी तोह इसमें ऐसा कुछ नया तोह नहीं है. वह ऊपर पहले भी तोह चाचा जी आते थे तोह रुकते थे. अब वो नीचे रुक जायेंगे. बीएड हे लगने है. और बाकी का

सामान तोह दीदी लोग खुद हे सेट करेंगी."

"ओह मेरे करमचंद जासूस. तारा को तू भूल गया." रामेश्वर जी ने ये बात कही तोह कौशल्या जी थोड़ा मुस्कुराई.

"तोह मुझे क्या करना है उस से." अर्जुन तारा को पसंद नहीं करता था. बचपन में जब भी आती थी तोह उसके खिलोने टॉड देती या फिर उसकी चीजों पर हक़ जमती थी.

"बीटा वो तुम्हारे ड्राइंग रूम को उसका कमरा बनाने का विचार है. 6 महीने अब वह यही रहने वाली है क्योंकि एक कंपनी में ट्रेनिंग लग गई है इधर उसकी." दादी जी

ने ये बात कही तोह अर्जुन सुन्न हो गया. "और मई कहा जाऊंगा? उस हिटलर को हर बात में दखल देने की आदत है. और अब समझ भी आ गया के नै कार घर में क्यों

आ रही है. ठीक है आप जैसा कहोगे मई करूँगा और तोह कुछ कर नहीं सकता." अर्जुन को अब बहोत बुरा लगा था क्योंकि एक तरह से अब बची हुई आजादी भी जाने

वाली थी.

"मैंने पहले हे कहा था कौशल्या देवी की तुम यहाँ हमारे साथ वाला हे कमरा तारा के लिए तैयार करवा दो." रामेश्वर जी ने अपनी बात राखी

"उसको कमरे में बाथरूम, ऐरक्यूलेर और टेलीविज़न भी चाहिए तोह अब वह भी साथ के कमरे में बनवा देती हु मेरे मंदिर के साथ हे शौचालय." कौशल्या जी धरम

की पक्की थी और बात की भी.

"वो ऐरकण्डीशनर होता है दादी. चलो कोई बात नहीं लगवा दो हमारे ड्राइंग रूम में उसका बीएड और सामान. अब आपके भगवन पर बात आ गई है तोह बेचारे वो

और किसी कमरे में तोह जाने से रहे मंदिर छोड़कर. लेकिन इस डायन को इतना समझा देना के मेरे कमरे और रूटीन में दखल न करे. फिर आप हे बोलोगी के कपूत

है मेरी बची के मार दिया." अर्जुन बोलता हुआ गिलास उठा कर एक सांस में दूध जातक के खड़ा हो गया.

"है बोल दूंगी. वैसे भी अब वो बड़ी हो गई है तोह बचपन वाली बात नहीं है उसमे. और है, कार तेरे बाप ने उसके लिए नहीं हमारे लिए ली है." कौशल्या जी जितना

भी ाची थी अर्जुन और बाकी सबके साथ लेकिन तारा उनकी जान थी लेकिन अभी तारा के रूप उन्होंने कहा देखे थे.

खाने की टेबल पर संजीव भैया बैठे थे तोह अर्जुन तैयार हो कर निचे आया. "भैया." बोलता हुआ उनसे चिपट गया. "कब आये आप? अभी तोह मई ऊपर गया था

नहाने."

"जब तू नहाने गया तोह मई ऊपर आया था. चल बैठ खाना खा ले फिर हमे चलना है." उन्होंने भी प्यार जताते हुए अपने छोटे भाई को साथ हे बिठा लिए. और ऐसे

हे बातें करते दोनों खाना ख़तम कर एक बार संजीव भैया ने कुछ कागज़, एक थैला और फाइल उठाई और स्कूटर की डिक्की में सब रख के अर्जुन को साथ लेके निकल

लिए.

"भैया पहले से हे तोह 2 कार है घर में तोह ये तीसरी क्यों?" अर्जुन शायद अभी तक इस कार के मसले पर अटका हुआ था.

"भाई देख एक कार शंकर चाचा के पास रहती और एक मेरे या मेरे पापा के. घरवाले जैसे अभी गांव जा रहे है तोह अगर दोनों कार नहीं हो तोह फिर कैसे जायेंगे?"

संजीव भैया भी समझते से बोले.

"तोह वो लोग तोह वैसे भी इस एक कार में नहीं आ सकते सभी." और हंसने लगा लेकिन फिर भैया को हँसते पाया तोह चुप होकर बैठ गया.

"ाचा अभी जो गाडी लेने लगे है वह टाटा सफारी है, कुछ दिन पहले हे आई थी और चाचा ने बुकिंग करवा ली थी. शोरूम वाले ने कल फ़ोन किआ था के आज

गाडी तैयार है तोह बस हम वही जा रहे है. 7-8 लोग तोह बड़े आराम से बैठ सकते है इसमें."

"ाचा तोह ऐसा बोलिये की हम बड़ी गाडी लेने जा रहे है. मई इतनी देर से सोच रहा था के एक और छोटी कार." अर्जुन इतना कह पाया था के भैया ने उसकी बात

पूरी कर दी, "तारा को नहीं दिलवा रहे. तू चिंता मत कर और तेरे लिए भी कुछ लेना है लेकिन पहले गाडी उठा ले फिर वापिस मार्किट में काम करना है."

दोनों भाई 10 मिनट बाद टाटा कंपनी के इस बड़े शोरूम पर थे. एक ाचे सभ्य से आदमी ने उनका स्वागत किआ और संजीव भैया से हाथ मिलते हुए दोनों

को कुर्सी भेंट की. "शंकर जी का बस अभी फ़ोन आया था और आपकी गाडी तोह रात तक तैयार हो भी गई थी. बस 5 मिनट दीजिये." और फिर एक लड़का 3 गिलास

पानी सामने रख गया तोह भैया ने वो थैला और फाइल में से एक कागज उन्हें दिए. ये तोह पैसे थे और वो भी बहुत सारे. अर्जुन हैरान सा हो रहा था के एक

लड़की सामने बैठ कर हर नोटों के बंडल को मशीन में दाल रही थी जो दिख नहीं रहा था. "सर, ये पूरे है." कुछ वक़्त जाने क्या बातें होती रही लेकिन

10 मिनट की जगह 30 मिनट हो गए तोह अर्जुन सीट से उठकर इधर उधर देखने लगा. टाटा सूमो, सूमो गोल्ड, ट्रेक्सक्स, इंडिका और पता नहीं कितनी गाड़िया इस शीशे

से बानी chaar-diwar के अंदर थी. बहार एक चांदी के रंग की बड़ी जीप जैसी गाडी आई तोह संजीव भैया उठकर बहार आ गए.

"सर, लीजिये आपकी गाडी तैयार हो गई है. ये कागज है बस आप इसका पंजीकरण करवा लीजियेगा 30-60 दिन के भीतर." एक बार दोनों ने हाथ मिलाये तोह अर्जुन

सिर्फ उस गाडी को हे देख रहा था. ये ऐसी गाडी थी जैसे विदेशी फिल्मो में होती है और आकर्षक भी थी. "चल छोटे अब इसको घर देख लेना. आज के काम

जल्दी ख़तम करने है." स्कूटर की चाबी अर्जुन को देते संजीव भैया उस सफारी गाडी में बैठ गए. दोनों कुछ हे देर में वापिस घर की तरफ चल दिए थे.

जब तक अर्जुन घर पहुंचा था तोह घर का हर सदस्य या तोह गाडी के अंदर था या बहार से उसको निहार रहा था. दादी बोनट पर तिलक लगा रही थी.

"ये तोह बड़ी ाची और ऊँची कार है भैया." स्टीयरिंग हिलती ऋतू तोह किसी बचे की तरह कर रही थी और संजीव भैया मुस्कुरा रहे थे. "तुम दोनों अभी

तक यही खड़े हो?" रामेश्वर जी आवाज सुनकर संजीव भैया तोह खिसक लिए अर्जुन बस उनको पलट कर देखता बहार आ गया.

"मतलब ये गाडी से हमारा कोई लेना देना नहीं है. है न भैया?" अर्जुन तोह दिमाग से सटक सा गया था. गाडी लेने भी गया, इन्तजार भी किआ और लेकर वापिस

आ भी गए. लेकिन गाडी में बैठना तोह दूर हाथ भी नहीं लगा पाया.

"बिलकुल ठीक कहा छोटे. वो गाडी हमारे लिए नहीं है." भैया हँसते से स्कूटर का हैंडल उसकी तरफ कर बोले तोह अब अर्जुन स्कूटर चलने लगा. कभी कभी

भैया ऐसे भी करते थे.

"फर्नीचर मार्किट ले ले छोटे पुल्ल के पास. वह बस बोलना है बाकी काम रेहड़े वाले का है." ये मार्किट ज्यादा दूर नहीं थी लेकिन थी बड़ी मार्किट. वह पहुंचकर

वो बस स्कूटर पर बैठा रहा भैया एक दूकान पर कुछ बोलकर आसपास देखने लगे. फिर एक आदमी आया जो शायद दूकान का मालिक था. दोनों अंदर गए तोह 5 मिनट

बाद हे वापिस भैया स्कूटर के पीछे थे.

"यहाँ क्या हुआ?" अर्जुन खीज चूका था के आज उसका दिन खराब हो गया है. आज लाइब्रेरी भी जाना था और अभी शाम को स्टेडियम लेकिन यही पर 11:30 तोह हो चुके थे.

"वो 3 नए बीएड बनवाये है. चाचा के कमरे वाला एक खराब हो गया है, पुराण था. एक तारा के लिए और एक तेरे कमरे के लिए. इनके गद्दे भी नए स्टाइल के है.

बस अंदर वही देखने गया था. ये अपने आप 1 घंटे तक घर पंहुचा देंगे. यहाँ से मॉडल टाउन वाले अरोरा के शोरूम चल." और फिर शान्ति च गई. अर्जुन तोह

मॉडल टाउन ाचे से जानता था जब अलका दीदी को भी वही लेके गया था. एक पनवाड़ी पर स्कूटर रुकवा कर संजीव भैया ने सिग्रेटे ली और एक गिलास nimbu-jeera का

सोडा बनवा के अर्जुन को थमा दिए. ये पीने के बाद वह थोड़ा ठंडा हुआ तोह स्कूटर पार्किंग में लगा कर ये अरोरा इलेक्ट्रिकल नाम की इस बड़ी दुकान में आये.

"आओ पंडित जी." एक गोरा संजीव भैया की उम्र का लड़का उनसे हाथ मिलता फिर गले मिला. गले में मोती सोने की संगल, सफ़ेद कुरता पजामा बता रहा था के ाचे

पैसे चाप रहे है दूकान पर.

"लकी भाई एक 1.5 टन का लॉएड का ऐरकण्डीशनर घर पे फिट करवाना है. काम जल्दी हो जाए तोह ाचा है." यहाँ वो दोनों बातें कर रहे थे के लकी ने

दूकान पे काम करने वाले छोटू को बहार भेजा. 2 मिनट में 3 गिलास कोला और बर्फ के यहाँ सामने थे. सबने एक एक उठाया तोह dukaan-malik का ध्यान गया अर्जुन पे

"अरे ये मुन्ना है क्या?" और जवाब सुने बिना हे उसके गाल खींच दिए.

"है. बस थोड़ा बड़ा मुन्ना हो गया है. और भाई ये है लकी, अरोरा अंकल का बीटा और मेरा दोस्त. पहले अपने घर के सामने हे रहते थे और तू इनके घर भी

जाता था. वो डिंपल के साथ खेलने."

"भाई डिम्पी के साथ. तू हमेशा नाम गलत हे लेता है उसका." अर्जुन का दिमाग थोड़ा ठीक हुआ ये बात सुनकर. डिम्पी.. कहा सुना था ये. वो सोचने लग गया. इधर

दोनों लोग बातें करते रहे और एक फिटिंग करने वाला आदमी कूलर जैसे डब्बे को रेहड़े पर रखवा वह से चल दिए.

"ले भाई संजीव ये तेरा काम तोह अभी करवा दिए. अब तू भी कभी बियर पिलवा दे. घर तोह तू कभी आने से रहा." लकी ने इतना कहा था के सामने से एक लड़की

हाथ में 3 खाने का टिफ़िन लेके अंदर आ गई. Neela-safed फ्रॉक वाला सूट पहने सीढ़ी कुर्सी पर धम्म सी बैठती संजीव भैया से बोली, "आपके दर्शन हमारे

यहाँ कैसे हो गए भैया?" अर्जुन ने चौंकते हुए नजर घुमाई, वो थोड़ा पीछे बैठा था. "अरे बाप रे तोह ये है डिम्पी. कल हे तोह मिला था." उसको याद आ गया

के प्रीती के साथ हे कल मिला था वो इस खूबसूरत लड़की से और ये उसको बचपन से जानती है.

"अरे गुड़िया तू हे आ जाया कर कभी घर. मेरा तोह आजकल कोई ठिकाना है नहीं काम की वजह से. यही शिकायत तेरा भाई कर रहा था." संजीव भैया ने उसको

जवाब दिए तोह इधर लकी ने इशारा करते कहा, "ये कोण है बता जरा?" अब बारी डिम्पी के हैरान होने की थी लेकिन जवाब मुँह से निकल gaya,"Arjun?"

"कमाल की नजर है तेरी तोह भाई. मान गया." लकी ने ये बात थोड़ी खुसी से कही उसको कुछ पता नहीं था.

"है. देख ले कितना बड़ा हो गया है." संजीव भैया ने बात आगे बधाई तोह डिम्पी बस हैरानी से देखती रही.

"इसका मतलब क्या हुआ? मई तोह इस से कल पहली बार हे मिली थी, स्टेडियम में प्रीती के साथ." दोनों की तरफ देखते उसने कहा फिर के बार चौंकते हुए बोली, "ोये. ये

मुन्ना है?" उसकी बात पर लकी और संजीव हंसने लगे लेकिन वो खुद झेंप गई. अर्जुन तोह अपने आप में गुम्म था.

"ोये तू मतलब अभी इस दुनिया में हे है क्या?" डिम्पी ने सीधा अब उस से हे सवाल किया.

"है. मुझे क्या हुआ है? ाचा भला तोह हु. लेकिन मई तोह खुद हैरान हु के मुझे कुछ याद क्यों नहीं आ रहा." अर्जुन ने भोलेपन से ये बात कही तोह बाकी सब

हंसने लगे. "ाचा तोह फिर अब वो 3 पहिये वाली साइकिल वापिस लेकर आणि पड़ेगी क्या. और तू धक्का लगा के चलाएगा. फिर याद आएगा तुझे?" डिम्पी की इस बात

ने उसके दिमाग पर थोड़ा असर किआ. बचपन में सामने के घर खेलने जाता था और एक लड़की के साथ साइकिल चलता था आँगन में, प्लास्टिक के पहिये वाली.

"उसकी जरुरत नहीं है. आ गया याद के मुझे पीटने वाली कौन थी." और सर झुका के अपनी बात पर हे शर्माने लगा. थोड़ी देर उनकी ऐसे हे बातें होती रही

तोह संजीव इजाजत ले कर वह से निकल आया अर्जुन के साथ.

"मेरा स्टेडियम?" अर्जुन ने ये बात कही तोह संजीव भैया ने साथ हे जवाब दे दिया. "तेरी सोमवार तक छुट्टी है. सोमवार को हे जाना अब स्टेडियम. अब बैठ फिर हम

ये आखिरी काम करके घर चलते है." चुपचाप वो पिछली सीट पर बैठ गया तोह भैया ने रफ़्तार दी स्कूटर को. फिर अगले 2 घंटे उनके मार्किट में हे गुजर गए.

शाम 5 बजे वो लोग बड़ी मार्किट से घर की और चल दिए और आज तोह अर्जुन का दिन पूरा खराब हो चूका था. भैया ने khana-peena मार्किट में हे करवा दिए था तोह

भूख तोह नहीं लगी थी. अब जैसे हे घर के बहार रुके तोह अर्जुन के दोनों हाथो में थैले थे और सामने प्रीती.

"तुम्हारी तोह छुट्टी नहीं थी प्रैक्टिस की?" दिमाग चल नहीं रहा था तोह सिर्फ यही पुछा उसने.

"आज घर पे काम था तोह नहीं गई. और अभी तुम्हारे यहाँ थोड़ा काम करवा के हटी हु. लाओ कुछ सामान मुझे पकड़ा दो." 2 थैले लेती वो भी उसके साथ अंदर चल दी.

सारा सामान खाने की टेबल पर रखते हुए अर्जुन वही पसर गया लेकिन अभी कहा आराम लिखा था. "मुन्ना." दादी की आवाज सुनकर खड़ा होता वह चिढ़ हे गया था

और सामने कड़ी प्रीती हंसने लगी. "अब तुम भी मेरे मजे ले लो. मई बदला जरूर लूंगा." झुंझलाता सा वो अंदर गया तोह सामने नरेंदर चाचा कुर्सी पर बैठे

शरबत पी रहे थे. "चाचा जी." जोर से बोलता वो सीधा उन पर जा चढ़ा. "ोये मेरे शेर जरा देख के यार. तू तोह मेरे से हे बड़ा हो गया." बैठे हुए हे चाचाजी

ने उसको सीने से लगा लिए. नरेंदर जी की शख्शियत हे ऐसी थी की उन्हें बचो से लेकर बड़े तक सब पसंद करते थे. और मजाकिया तोह बस वही थे सबसे ऊपर.

कुछ पल के बाद अलग हुआ तोह देखा के दादाजी के बिस्टेर पर उनके पास 2 लड़किया और बैठी थी.

"इसको आप बादाम हे खिलाती हो न दादी." उनमे से एक बोली तोह दादी भी हँसत हुए कहने लगी, "असर शरीर पे हो रहा है दिमाग पे नहीं आरती." और अर्जुन किसी मस्त

बैल सा उनके भी गले लग गया. "आरती दीदी आप और ये तोह अपनी प्रियंका दीदी है." दोनों लड़कियों ने भी उसको अपने साथ चिपका लिए. "ोये बूट तोह उतर लिए कर

नवाब." रामेश्वर जी अपने परिवार को खुश देख खुद भी मुस्कुरा रहे थे. अर्जुन को फिर उन्होंने याद दिलाया के बिस्टेर पर जूते समेत हे आ गया है. वो झेंपता सा

सॉरी बोलकर ऐसे हे दोनों जूते निचे गिरता वही पसर गया.

"मामाजी, एक बार मम्मी से बात करवा दीजिये." ये आवाज बैठक से चलती आ रही हसीना ने नरेंदर जी को कही तोह अर्जुन का ध्यान उधर गया. खाल से चिपकी

भूरी जीन्स और एक झूलता सा नए फैशन का सफ़ेद टॉप पहने एक लड़की बस उसके सामने कही से प्रकट हुई थी. लेकिन चाचा की आवाज सुनते हे उसने नजर हे घुआं

ली. "तारा बीटा ये फ़ोन इधर खिसका." ये तारा है बस इतना जानते हे अर्जुन शांत हो गया. प्रियंका दीदी इतने दिन बाद मिली थी छोटे भाई से तोह बस वो उसके सर

पर हाथ फेर रही थी. तारा ने लैंडलाइन का फ़ोन जो छोटे स्टूल पर रखा था वो नरेंदर जी की तरफ किआ तोह उसकी नजर सामने बैठे लड़के पर गई. हत्ता कट्टा,

शकल से मासूम और घुंगराले हलके लम्बे बाल. जैसे उसने अपने सपनो के राजकुमार को हे देख लिए हो. लेकिन ये तोह मुँह निचे करे बैठा था.

"तारा अभी एक्सचेंज व्यस्त है कुछ देर में कर लेंगे फ़ोन नहीं तोह खुद हे फ़ोन आ जायेगे हिटलर का." वो मजे लेते से बोले तोह तारा भी हंसने लगी. "मां, एक

बार आप ये बात उनके सामने कहना फिर देखते है आपका क्या हाल होगा."

"इतनी हिम्मत तोह तेरे नाना की नहीं मई क्या चीज हु." उन्होंने अब अपने पिता को भी लपेटे में ले लिए तोह वो भी हंसने लगे साथ में कौशल्या जी भी. तारा अपनी पीठ

अपने नाना जी के पैरो से लगाती बैठ गई. "चल तू फ्रेश हो जा बेटी और कपडे भी बदल ले. सफर बहुत कर लिए होगा. ऊपर तेरा कमरा तैयार करवा दिए है." दादी

ने अपनी नातिन से ये बात कही और खुद बहार चल दी.

"तोह मेरा शेर बीटा क्या कर रहा है आजकल?" नरेंदर जी ने वापिस अर्जुन को पुकारा तोह वो सोच से बहार आया. "चाचाजी मत हे पूछो. ये दादाजी है न इन्होने बस

आर्मी में भर्ती तोह करवा दिए है लेकिन नौकरी नहीं लगी इतना समझ लो." उसकी बात सुनकर रामेश्वर जी भी हंसने लगे और अर्जुन जैसे रूठने हे लगा था.

"दादू ये तोह गलत बात है आपकी. बेचारे से इतना काम क्यों करवा रहे हो.?" आरती अपने दादा जी से लाड करती हुई बोली तोह तारा बस कनखियों से अर्जुन को देख रही

थी. "सुबह अँधेरे में 10 कम दौड़ लगता हु, फिर बगीचे में काम करता हु, बहार अंदर के काम भी मेरे जिम्मे हो गए है क्योंकि संजीव भैया भी नहीं होते, दीदी

लोगो के इम्तिहान दिलवाने भी मई लेके जाता हु फिर 3:30 बजे स्टेडियम और वह से 6 बजे वापिस. नाहा के थोड़ी देर किताब पढ़ना या फिर मानसिक कसरत करना और ऐसे हे

रात होने तक कुछ न कुछ करते रहना. 10 बजे या 11 तक सो जाना. अब सोमवार से 11:30 बजे लाइब्रेरी भी शुरू हो जाएगी." अपनी व्यथा एक सांस में सुना दी अर्जुन ने.

"ोये तेरे भले के लिए तोह करता हु ये सब. और फिर तुझे ाचा भी तोह लगता है. बुद्धा हो गया फिर भी 5 बजे तेरे लिए बादाम कूट के रखता हु. और फिर एक

तू हे तोह है जो मेरे साथ है हमेशा." रामेश्वर जी ने ये बात अपनेपन से कही तोह अर्जुन मस्ती में आरती दीदी को हटा अपने दादा जी से चिपट गया लेकिन उसका

हाथ जैसे हे हल्का सा तारा को छु कर निकला तारा को तोह ये एहसास हे मजा दे गया था. "आप भी तोह मेरे सबकुछ हो."

"वह. ये dada-pote की जोड़ी. शिकयत भी हमसे और प्यार भी हमारे सामने. चल खड़ा हो और अपना हुलिया ठीक कर. तुम तीनो भी जा कर फ्रेश हो जाओ." नरेंदर जी

की बात सुनकर तीनो लड़किया उठ गई और अर्जुन उनके जाने के बाद. नरेंदर जी अपने पिता जी की बगल में बैठ कर बातें करने लगे.

"तुझे क्या हुआ जो ऐसे चुप हो गई?" प्रियंका दीदी ने तारा से कहा जो अब तक खामोश थी. "इसका न स्क्रू टाइट हो गया है शायद." सामने से आती ऋतू दीदी ने

कहा तोह तारा झेंप गई लेकिन नकली गुस्से से बोली, "ऋतू मई तेरे से 2 महीने बड़ी हु. दीदी बोलै कर, हाँ. और मई कोई पागल थी क्या पहले जो अब स्क्रू टाइट हो

गया है?" ऋतू दीदी तारा के गले लगती बोली, "नहीं रे. तू तोह आज भी नकचढ़ी है लेकिन है बड़ी प्यारी. और तुझे दीदी कह के मई तुझे बुद्धि करने से रही."

उनकी बातों पर हंसती वो बहार टेबल पर बैठी थी के कौशलय जी का हुकुम फिर सुनाई दिए. "नाहा धो लो ऋ तुम तीनो. प्रियंका बीटा तू बहार वाले बाथरूम में चली

जा अलका सामान पकड़ा देगी. और आरती तू यही अंदर वाले आँगन में. तारा ऊपर कमरे में बाथरूम है, नाहा के अगर आराम करना हो तोह थोड़ी देर वही कर लिओ. तेरा

बीएड लगवा दिए है वह."

"थानेदारनी." तारा की इस बात पे वह लड़कियां खिलखिला कर वह से उठ गई. बताया गए बाथरूम के अनुसार.

"सॉरी." अर्जुन ऊपर के ड्राइंग रूम से बहार निकल रहा था तोह लकड़ी का दरवाजा खोल सीधा आगे बढ़ा और इधर जाली का खुला दरवाजा देख तारा भी सीढ़ी उस

लकड़ी के दरवाजे पर हाथ रखने लगी थी की बहार निकलता अर्जुन उसके सीने से टकरा गया. एक पल के लिए चेहरा गुस्से में लाल हुआ लेकिन अर्जुन की आवाज और सूरत

देख कर तारा नजरे नीची करती बोली, "इतस ऑलराइट" लेकिन वही कड़ी रही. अर्जुन तोह ये देख कर दांग था के ये हो कैसे गया. ये लड़की और इतनी तमीज से उसके

साथ. "वो मई बाथरूम में सामान रखने आया था. आप उसे कर सकती है." इतना बोलकर बिना कुछ और कहे सीधा नीचे दौड़ गया. ऋतू दीदी के कमरे में प्रीती

बैठी थी अलका दीदी के साथ लेकिन उनकी परवाह किये बिना एक साइड हो कर पसर गया.

"ोये सांड. ये टाइम है क्या सोने का और तू कही भी लुढ़क जाता है?" झूठे नखरे से अलका दीदी ने उसको डांटा तोह वो बिना हिले बोलै, "थोड़ी देर यहाँ सोने दो ऊपर

वो हिटलर आ गई है. विनती करता हु." उसकी बात समझकर दोनों हंसने लगी. "ये तोह अभी तक तारा से डरता है. याद है कैसे वो इसको रुला देती थी?" अलका दीदी

ने हँसते हुए ये बात प्रीती से कही तोह प्रीती ने ना में सर हिला दिए. "मई एक हे बार तोह मिली हु जहा तक याद है. इतना तोह आती नहीं थी तब." वो बातें कर

रही थी और अर्जुन नींद में जा चूका था. कोई एक घंटे बाद किसी का एहसास उसको अपने शरीर पर हुआ तोह थोड़ा नजर खोल कर देखा. बिस्टेर पर Ritu-Alka-Priyanka

दीदी, तारा थे और प्रीती अपनी कमर उसकी कमर से टिका के बैठी थी.

"यार प्रीती तू तोह मेरे से भी कही ज्यादा सुन्दर है." तारा ने इतना कहा तोह अर्जुन के कान खड़े हो गए. तारा सुन्दर या कहे आधुनिक लड़की थी, शरीर खूसूरत

भी था. लेकिन अर्जुन को उसकी सभी बहने खूबसूरत लगती थी और प्रीती की टक्कर में ऋतू दीदी.

"इतनी भी नहीं हु जैसे आप कह रही है. ये ऋतू दीदी को हे देख लीजिये और आप अपने आप को देखिये. यहाँ ये प्रियंका दीदी और अलका दी को. मुझे लगता है मई आप

सबसे बाद में हु. लेकिन अगर ाची लगी आपको तोह थैंक यू." प्रीती ने बातों में हे सबकी तारीफ कर दी थी.

"अरे ये डार्लिंग है मेरी." ऋतू दीदी ने प्रीती की तरफ खिसक कर खुद से चिपका लिए और बाकी लड़कियां ये देख कर हंसने लगी. प्रीती का चेहरा लाल हो गया था

शर्म से. "ऋतू, तुम दोनों सच में फ्रेंड्स विथ बेनिफिट्स हो?" तारा ने ये बात हैरान होते कही क्योंकि जैसे प्रीती शरमाई थी उन्हें तोह वह सच हे लगा.

"अरे पागल हो क्या. ये मर्डर जाएगी इतनी बात सुनते हे. मेरी प्यारी सी गुड़िया है ये और एक ाची बची भी." ऋतू दीदी ने लाड करते हुए प्रीती के गालो पर

स्नेह से छोटा सा किश किआ और उसको सीने से लगा लिए.

"देख ले तारा, इतना प्यार तोह बुआ तुझे नहीं करती होगी जितना ऋतू प्रीती को करती है." प्रियंका दीदी ने यहह तारा को लपेट लिए था.

"कहा दीदी, मेरी माँ के ब्लाउज की सिलवट खराब हो जाएगी ऐसे तोह." और उसके साथ साथ बाकी लोग भी हंसने लगे..

"ये लड़का ज्यादा mel-jol नहीं बढ़ता क्या?" तारा ने अर्जुन के चेहरे की तरफ देखते हुए कही ये बात. जो कास के आँखें बंद किये बस पड़ा हुआ था.

"इसके साथ तोह mel-jol ना हे बधाइओ तू तारा." अलका की अधूरी सी बात पर ऋतू ने ताली मारी तोह किसी को समझ नहीं आया और प्रीती को जोर की हंसी आ गई कुछ

याद करके.

"अब इसको क्या हुआ? और mel-jol से मतलब था मेरा के ये ऐसे चुपचाप हे रहता है क्या?" थोड़ा संकुचाते हुए तारा ने कहा तोह कोमल दीदी अंदर आती बोली, "इतना बोलता

है के फिर चुप नहीं होता. और अगर mel-jol हो गया न तोह फिर तोह तू इस घर से कही जाने से रही. बड़ा प्यारा है मेरा छोटा भाई." और अर्जुन क सर पर हाथ

फेरती उठाने लगी. वो भी अब यहाँ से निकलना चाहता था. "ऐसे कैसे मेरे मुन्ना राजा." ऋतू दीदी उसकी पीठ पर बैठ गई मस्ती करती हुई. अर्जुन ने उन्हें पीठ

पर बिठाये हुए हे हवा में कर दिए तोह वो खुद हे उतर गई. "ऐसी मेरी प्यारी दीदी." और इतना बोलकर कोमल दीदी के साथ बहार निकल गया.

"उसकी बाजू देखि यार. ऋतू तू 55-60 कग की तोह होगी. कैसे उठा लिए उसने एकदम तुझे." तारा का दिल तोह बस अर्जुन अर्जुन कर रहा था.

"बस कर रे. चल सब बहार चलते है घर में और लोग भी है. तारा तू थोड़ा आराम कर ले लगता है ज्यादा हे पढाई कर ली." प्रियंका दीदी ने उठते हुए कहा तोह

सब वह से बहार आ गई. प्रीती अपने घर जाने लगी तोह कौशल्या जी ने रोक लिए. "तेरे दादा भी यही है. आज खाना इधर हे है उनका और तेरा." कौशल्या जी को

भी प्रीती पसंद थी और प्रीती भी उनके साथ खुश रहती थी. रसोईघर में भी प्रीती उनके साथ हे चली गई जहा पर रेखा जी सब्जी बनाने लगी हुई थी और उनकी

जेठानी ललिता जी mirch-lahsun की चटनी, जो उनके लाडले देवर की पसंद थी. "आंटी, मई भी करुँगी." वो रेखा जी के पास बैठ कर बोली तोह उन्होंने बस सर पे

हाथ फेरा और कहा, "तेरे हाथ पे तोह मई गरम सेक भी न लगने दू मेरी बची. कितनी प्यारी है. तू यहाँ मेरे पास बैठ और हमसे बातें कर." दादी तोह पानी

लेकर चली गई थी. वो तीनो हे वह बैठी थी. माधुरी दीदी ऊपर के पिछले हिस्से के कमरों को सेट करने में लगी थी संजीव भैया और अर्जुन के साथ.

"रेखा, बात तोह तेरी एकदम सही है. अब इस घर में है भी कितने लोग. ये 4 चली जाएँगी तोह सजीव की आ जाएगी. तब तक पता नहीं कितने लोग रहे घर में. और 4-5

लोगो का खाना तोह तू और मई कर हे लिया करेंगी. इसके हिस्से तोह काम आना हे नई." ललिता जी की बात पर रेखा जी हंसने लगी लेकिन प्रीती को कुछ समझ नहीं आय.

फिर कुछ देर बाद समझ आया तोह वो शर्मा के उठने लगी तोह ललिता जी ने हाथ पकड़ के बिठा लिए. "अरे मेरी बची. मजाक कर रहे है हम तोह. अब घर में कोई

हमारे साथ तोह बैठता नहीं इसलिए आज तेरे साथ थोड़ा हंस लिए. अर्जुन थोड़ी तुझे पसंद आएगा. कहा वो देसी बैल और कहा तू विलायत की लड़की." ललिता जी की

बातें सिर्फ रेखा जी को समझ आ रही थी जो वो घुमा फिर के कर रही थी लेकिन प्रीती ने नादानी में जवाब दे दिए उसको लगा शायद ताईजी का मतलब है के

अर्जुन ठीक नहीं है. "नहीं नहीं. मैंने ऐसे कब कहा की अर्जुन मुझे पसंद नहीं है." अपनी दबी हुई हंसी रेखा जी से बर्दाश्त न हुई तोह वह हँसते हुए ललिता जी से

बोली, "दीदी, बस कीजिये. बच्ची है वह." और हंसने लगी. बेचारी प्रीती आज अलग हे बातों में फास गई थी. न कहने पर भी और हां कहने पे भी. कुछ देर तक

वो भी वह काम करने लगी थी अपनी दोनों आंटी के साथ हे. "हाथ बचा के सलाद काटना बीटा." ललिता जी अब थोड़ी परवाह सी कर रही थी.

"आंटी जी मई घर पे भी कभी कभी खाना बनती हु. आप क्यों परेशां होती है." वो बोलते हुए काम कर रही थी लेकिन जब रेखा जी ने देखा की उसके माथे पर

कुछ पसीना आ गया है तोह पल्लू से पोछने लगी. जाने उन्हें क्या हुआ के प्रीती को अपने सीने से लगा लिए और वो भी लिपट गई. "संजीव को बोलती हु के रसोईघर

में चिमनी या एक्सहोस्ट पंखा कल हे लगवा कर दे. चल तू बहार जा मेरी बची." रेखा जी ने उसको अलग करते हुए कहा. प्रीती वह से उठकर बाथरूम में मुँह धोने

चली गई.

टेबल पर 8 कुर्सियां थी जिनपर रामेश्वर जी के साथक साहब, नरेंदर जी, अलका, ऋतू, संजीव बैठे हुए थे. माधुरी दीदी कोमल के साथ खाना लगवा रही थी

अर्जुन haath-mooh धो के आया और 2 खली पड़ी कुर्सी में से एक पर बैठ गया. ऋतू दीदी ने प्रीती को आवाज दी तोह वो वह पे आने लगी की तारा उस एक कुर्सी पर

बैठ गई. इस हरकत पर सिर्फ ऋतू दीदी का ध्यान गया था और अर्जुन वह से उठकर गलियारे में चला गया. उसकी प्लेट अभी नै लगी थी तोह किसी को फरक नहीं

लगा सिवाए ऋतू, प्रीती और तारा के.

"दीदी आप बैठो में खाना लगाती हु." प्रीती ने आरती दीदी को कहा तो वह तारा के साथ बैठ गई. अब प्रीती खाना परोस रही थी लेकिन उसके चेहरे पर एक खुसी

भी थी जहा कुछ देर पहले मायूसी चा गई थी.

"मामी जी, मेरे लिए थोड़ा बिना घी के चपाती लगा दीजिये और सब्जी में भी घी मत डालना." तारा जैसे कुछ ज्यादा हे गंभीर थी अपनी फिटनेस के प्रति. रेखा

जी उसकी बात पर मुस्कुरा रही थी और उनके पास कड़ी प्रीती और कोमल दीदी भी.

"इस से कोण काम करवा रहा है भाई?" रामेश्वर जी ने देखा के प्रीती खाना परोस रही है तोह उन्हें ये बात नहीं भाई. लेकिन पीछे आती कौशल्या देवी ने तोह

बात बड़ी हे कह दी. "आपको नहीं खाना तोह रहने दीजिये. मई तोह चाहती हु मेरे आखिरी समय में भी इसके हाथो से खाना लगवा के खो." छोल साहब मुँह की तरफ

चम्मच बढ़ाते हुए रुक कर हंसने लगे. "भाभी अब मेरे भाई तोह इस बात से डर रहे थे के कही आपके पंडित पंजाबी आड़े ना आ जाये." उनकी बात पर प्रीती

वह से गायब हे हो गई जो चूल्हे के पास बैठ गई थी. और पंडित जी हँसते हुए बोले, "सतीश तेरी बात सही थी मई हे गलत था. तेरी भाभी भी इसको उतना हे

चाहती है जितना वो ऋतू या तारा और बाकी बचो को."

"नहीं तोह क्या. मेरी बहु का दूध पीया है तोह वसूल भी करुँगी ाचे से." कौशल्या जी भी अलग हे महिला थी. उनकी इस बात पर जहा दोनों दोस्त गदगद हुए

वही रेखा जी प्रीती को वापिस दुलार सा करने लगी.

"भाभी ये पढ़ लिख जाए पहले. अभी बहुत जिम्मेदारी है और जो बात पहले हे पक्की है उसको क्या दोहराना." छोल साहब ने एक परिवार के सदस्य वाली बात कही थी.

"अंकल आपकी बात बिलकुल सटीक हे होती है. न इधर और न इधर. सही बात है, जो तय किआ है वही तोह होगा. और वैसे तोह हो हे रहा है बस वो बैलबुद्धि

अभी कच्चा है थोड़ा." ये सारे बड़े नरेंदर जी की बात पर हंसने लगे थे. कौशल्या देवी जी ने सबके गिलास में पानी डाला जग से और खाना ख़तम कर के ये 4 लोग

खड़े हो गए और साथ हे संजीव भी. जो बातों के मजे चुपचाप ले रहा था.

"ये सब क्या चल रहा था मेरी समझ से बहार था." तारा ने ऋतू दीदी से पूछना चाहा तोह उन्होंने सिर्फ इतना हे कहा, "यार हम साथ रहती है तब हमको नहीं पता

तोह तुम्हे इतनी जल्दी कहा समझ आ जाएगी."

"लेकिन मुझे सब समझ आ गई है उनकी बातें." प्रियंका दीदी खाना रोकते हुए बोली तोह तारा और ऋतू दीदी उनके चेहरे की और देखने लगे.

"अरे वो लोग शादी की बात कर रहे थे जहा तक मुझे पता लगा है. किसकी या किस से तोह उन्होंने नाम लिए हे कहा था." इस बात पर जहा तारा ने अपने सर पे हाथ

रख लिए वही ऋतू खिलखिला कर हंसने लगी थी.

"ऋतू, भाई को भी बुला ले सबने खाना खा लिए है अब बस हम लोग हे बचे है." ललिता जी, जो बाकी सबकी थाली लगा चुकी थी बोली तोह ऋतू दीदी ने उठकर अर्जुन

को आवाज दी. वो बहार की तरफ से नहाने के बाद सिर्फ पजामा पहने अंदर आ गया.

"ोये टार्ज़न. ये कोनसा नहाने का वक़्त है? चल अब बैठ कर खाना खा ले." ऋतू दीदी ने उसकी ब्याह पकड़ते हुए कुर्सी पर बिठाया. वो भी हँसता सा बैठ गया.

"आरती.. चल आजा तू भी." रेखा जी ने प्रीती को 2 थाली पकड़ते हुए आरती को आवाज दी जो Ritu/Alka के कमरे में जाने किस सोच में डूबी थी. आवाज सुनकर वह

बहार आई तोह अर्जुन के साथ प्रीती बैठी थी एक तरफ और प्रीती के साथ माधुरी दीदी. तारा का भी हो गया था लेकिन वह अर्जुन के सामने वाली कुर्सी बार बैठी

चोरी से उसके शरीर को देख कर कुछ सोचने में हे लगी थी.

"आज तोह भाई के साथ हे खाउंगी मई." आरती अब अर्जुन के दाई तरफ बैठ गई थी.

प्रीती अपने हाथो से प्लेट में रोटी रखने लगी अर्जुन को तोह वह उसके चेहरे की तरफ देखने लगा जो बिलकुल मासूम और इन आँखों से अनजान सा था.

"प्रीती यार मुझे भी रोटी रख दे या साड़ी इस बैल को हे देगी?" आरती ने चहकते हुए कहा तोह शर्माती सी प्रीती ने रोटी का डब्बा उनकी और कर दिए. ऋतू दीदी और

अलका भी वही बैठी थी खली. रेखा जी और ललिता जी अपना खाना ललिता जी के कमरे में खाने लगी थी.

"मुन्ना आज तू कहा सोयेगा रे?" माधुरी दीदी की बात से अर्जुन के साथ साथ कोमल और तारा ने भी उनकी तरफ देखा.

"कहा से क्या मतलब है दीदी? मई तोह वही अपने कमरे में सोऊंगा और अगर वह नींद न आई तोह फिर ऊपर." और खाना खाने लगा. लेकिन अब एक बहस का मुद्दा शुरू हो

गया था वह टेबल पर. "मई क्या कहती हु प्रियंका दीदी, आज हम ऊपर हे सोते है न, सब साथ में. बड़ा मजा आएगा." अलका ने ये बात कही तोह आरती और ऋतू ने

समर्थन दे दिए इस पर.

"बताओ फिर माधुरी दीदी आपका क्या ख्याल है?" प्रियंका दीदी ने अब उनकी भी राइ लेनी चाहि.

"मई क्या बताऊ. मई और कोमल तोह वैसे भी ऊपर हे सोने वाले है." वह हंसती हुई बोली तोह सबने तारा की और देखा जो पता नहीं क्या सोच रही थी लेकिन सबको

ऐसे अपनी और देखते हुए बोली, "बाबा, मई ऊपर नहीं सोने वाली. मच्छर और बन्दर, ये दोनों का डर आज भी है मुझे."

"अररि भोली तारा मैडम, ये कोनसा मौसम है मच्छरों का. और बन्दर इतने पागल तोह नहीं की रात को यहाँ वह घूमते फिरते रहे." अलका की इस बात पर सब हंसने

लगी. इधर अर्जुन और प्रीती आराम से एक दूसरे को चोरी छिपे देखते खाना खा रहे थे. आरती ने भी ये बात महसूस कर ली थी लेकिन वो चुप थी. कुछ देर बाद

सब लग गई बिस्टेर इकट्ठे करने और अर्जुन प्रीती को छोड़ने उसके घर की तरफ.

"तुम्हे ाचा लगा आज घर पे आने पर?"

"वो मेरा हे घर है मिस्टर. तोह ये बात नहीं पूछनी चाहिए. वैसे भी जब साड़ी बातें हो रही थी तुम तोह वह से गायब थे. जरा पूछ लेना ऋतू दीदी से." इतना बोलकर उसने बिजली की तेजी से उसके गाल चूमे गेट के बहार हे और उड़ती हुई अंदर चली गई.

"ये पूरी पागल है. देखता हु ऐसी क्या बात हुई आज खाने पर." खुद से कहता मुस्कुराता वह घर आया तोह दादाजी के पाँव दबाने चला गया.

"आजा मेरे सपूत. थोड़ी थकान है ाचे से दबा दे." रामेश्वर जी ने उस से कहा तोह वह बिना कुछ बोले अपने काम में जुट गया. नरेंदर जी भी कुरता पजामा पहने

वे बैठे थे एक चारपाई बिछाये और सबसे बातें कर रहे थे. तारा तोह कुशलया जी की गॉड में सर रख के पसरी हुई थी. अर्जुन एक बार सब देख कर अपने दादाजी

से बोलै, "गांव कब जायेंगे आप?"

"क्यों भाई क्या हुआ? अभी तक तोह कल का हे प्रोग्राम है मेरा." उन्होंने लेते हुए हे जवाब दिए.

"ाचा. मैं ये पूछ रहा था के आप सब गाडी में आ जायेंगे न.?" अर्जुन अब भी खुलकर नहीं कह रहा था लेकिन रामेश्वर जी ने उसकी शंका दूर कर दी.

"तेरा चाचा गाडी चलाएगा, मई आगे बैठूंगा, तेरी दादी और बहु दोनों बीच वाली सीट पर और पीछे Komal/Maadhuri. अब ये भी बता दू के कहा पर्ची कटेगी

या नहीं?" अर्जुन उनकी बात पे हँसता सा बोलै, "ओह बाबा, मेरा मतलब था के 2 गाडी लेकर जाओगे तोह दोनों को चलाएगा कोण. लेकिन ध्यान आ गया के सब बड़ी गाडी में

आ जायेंगे."

"रहने दे बीटा मई पोलिसवाले हु तू नहीं. तेरा मतलब था के कही कोई और लोग तोह साथ नहीं जा रहे और अगर जा रहे है तोह वो कोण है." अर्जुन उनकी बात पर

हैरान हे रह गया. सीधा हे बता दिए था उन्होंने तोह जो उसके मैं में चल रहा था.

"राजकुमार और शंकर वही आ जायेंगे फिर वही से वापिस नरेंदर को लेकर स्टेशन छोड़कर निकल जायेंगे." उन्होंने अब पूरी रिपोर्ट दे दी थी. अर्जुन सोच रहा था

के अब तोह लग गई पक्का एक हफ्ते उसकी. तारा, प्रियंका और आरती दीदी के होते अब कुछ नहीं होने वाला और संजीव भैया भी.

"वो मई क्या कह रहा था बाउजी, के Somwar-Mangal वॉर को मुझे भी कंपनी का काम है तोह सोमवार रात मई घर नहीं आ पाउँगा." संजीव भैया भी वही थे लेकिन

वो तोह अर्जुन को दिखे नहीं. कोने में बैठे थे अपने चाचा के पीछे. ये उनकी आवाज थी.

"बीटा, एक हे रात की तोह बात है. सतीश पड़ोस में है, मल्होत्रा दूसरी तरफ बाकी पूरी गली अपनी सुरक्षित है चौकीदार और पोइस से तोह अब भला यहाँ कोई क्या

करेगा. और ये पहलवान भी तोह है घर पे जो कभी भी उठ जाता है." रामेश्वर जी से मंजूरी मिलते हे संजीव भी शांत हो गया था. ऐसे हे 10 मिनट तक पाँव

दबाने के बाद उन्होंने बस करने को कहा तोह अर्जुन सबसे विदा लेकर ऊपर आ गया. एक बार फिर हाथ मुँह धोने के लिए अंदर घुसा तोह दरवाजे के पीछे ati-aadhunik

ब्रा लटकी दिखी. गुलाबी लास वाली इस ब्रा के कप भी आधे थे जहा जाली जैसा कपडा लगा था. एक बार हाथ फिरने के बाद कुछ सोच कर उसने उसके ऊपर एक टोलिया

दाल दिए और अपने कमरे में कपडे बदलने के बाद छत्त पर चल दिए.

यहाँ तोह पूरी मंडली लगी थी. अलका, प्रियंका, माधुरी के साथ तारा गड्डो पर बैठी बातें कर रही थी तोह कोमल दीदी और आरती दिवार के पास कड़ी गली में

देखती बातें कर रही थी. "ऋतू दीदी कहा पर है.?" अर्जुन ने अपनी प्यारी बहिन का न देख कर पुछा तोह माधुरी दीदी ने कहा के नीचे गई थी आने वाली होगी.

अर्जुन वापिस नीचे चल दिए और जैसे हे दूसरी मंजिल पर आया सामने से ऋतू दीदी को आते देख उन्हें पकड़ के ड्राइंग रूम में ले गया.

"पागल है क्या? सभी है यहाँ पे और तू ऐसे मुझे अंदर लेकर आ गया." थोड़ा सेहम सी गई थी लेकिन जब देखा की अंदर आ कर अर्जुन वह रखे सोफे बार बैठ

गया है तोह वो नए बीएड के किनारे पर बैठती बोली, "क्या बात हो गई?"

"वो आज खाने के समय कोई बात हुई थी क्या? प्रीती बता रही थी?" अर्जुन खुद को रोक न सका और सीधा मुद्दे की बात बोल उठा.

"अहा. तोह ये बात है. क्यों उसने कुछ नहीं बताया क्या?" ऋतू दीदी मुस्कुराती सी बोली तोह अर्जुन ने ना में गर्दन हिला दी.

"बस यही बात हुई थी की अगर अर्जुन अगर ज़िन्दगी में कुछ नहीं बना तोह फिर प्रीती के लिए और घर देखना पड़ेगा. अंकल ने ये बात कही थी और दादा जी ने भी

उनकी बात का समर्थन किआ था. अब तू सोच ले क्या करना है?" वो मजे लेती हुई बोली तोह एक बार के लिए तोह अर्जुन स्तब्ध रह गया.

"मतलब? कल को अगर दादाजी ने कहा के खेतीबाड़ी सम्भालो तोह फिर प्रीती उनकी वजह से मेरी ज़िन्दगी से चली जाएगी?" ये बात कहने के बाद वह ये भी सोचने लगा

था के प्रीती तोह मुस्कुराती गई. मतलब दीदी उसके मजे ले रही है. उनका जवाब सुने बगैर हे अर्जुन उनके पास गया और दोनों हाथो में उनका चेहरा पकड़ के चूमने

के बाद बोलै. "बस मत बताओ कुछ भी. मुझे पता लग गया है." और एक बार ाचे से गले लगा के बहार आ गया, पीछे हे हंसती सी ऋतू दीदी भी.

"तू तोह तेज हो गया रे. मई तोह सोच रही थी 2-3 दिन तक मजे लुंगी तेरे. लेकिन मेरी बात भी सही है, अगर तू चाहता है के इस में कोई झंझट न आये तोह बस

हर चीज को जरुरी वक़्त देना, नहीं तोह फिर कुछ भी हो सकता है." समझते हुए दोनों सीढ़ियां चढ़ने लगे तोह अर्जुन हामी भरता उनके साथ हे ऊपर आ गया.

सभी ऐसे हे बातें करने में लगे थे की प्रियंका दीदी ने कहा के उनको नींद आ रही है, यही हाल आरती, कोमल और तारा का भी था तोह सभी सोने लगे और

तारा नीचे चल दी. अर्जुन वही कुछ देर तक आसमान में तारो को देखता बैठा रहा और ऋतू दीदी भी उसके साथ वही कर रही थी. "चल भाई अब तू भी आराम कर

ले. सारा दिन bhaag-daud करता रहा है." उनकी बात पर उसने हलके से उनके गाल चूमे क्योंकि अब तक सब सो चुके थे और निचे आ गया.

टेलीविज़न पर गाने चल रहे थे धीमी आवाज में और तारा औंधे मुँह सर उचकाए देखने में लगी थी. सलेटी रंग की एक घुटनो से ऊपर तक की सूती निक्कर और

गुलाबी बिना बाजु की टीशर्ट में. एक बार दोनों ने एक दूसरे को देखा तोह तारा ने मुस्कान से उसका अभिवादन किआ. अर्जुन हलके से सर हिला कर फिर संजीव भैया के कमरे में

आ गया. "भैया सो गए क्या?" जीरो का बल्ब जलता देख उसने धीमे से कहा तोह कोई प्रतिक्रिया न हुई. भैया चित्त लेते थे एक चद्दर ओढ़ कर. बहार ड्राइंग रूम या

अब बेहतर रहेगा ये कहने का ड्राइंग छुम तारा के कमरे का ऐरकण्डीशन चल रहा था जिसकी ठंडक यहाँ तक आ रही थी. वैसे मौसम इतना भी कोई बदला नहीं था.

बहार आ कर अर्जुन ने पहली बार कुछ कहा तारा से, "सुनिए थोड़ा तापमान बढ़ा देंगी जरा. वो अंदर तक कमरे में ठंडक हो रही है."

तारा ने सीधे होते हुए एक छोटा सा सफ़ेद रिमोट उसकी तरफ करते हुए कहा, "ये लो और जितना ठीक लगे उतना टेम्परेचर उप कर लो." आवाज इतनी बुरी भी नहीं थी

और वह बात भी ाचे से कर रही थी. ये सोचता वो रिमोट लेकर '+' निशाँ को दबाने लगा. जब मशीन ने 25 दिखाया तोह रिमोट वापिस करते हुए कहा, "धन्यवाद्.

और इसकी वजह से आपको कष्ट हुआ तोह माफ़ी मांगता हु."

"अर्जुन. सुनो." वो मुड़कर जाने लगा तोह तारा ने उसको आवाज दे कर अपनी तरफ बुलाया.

"कहिये. अगर कुछ चाहिए तोह मैं ला देता हु."

"यहाँ बैठो. एक बार." टेलीविज़न को बंद करती तारा ने निवेदन से कहा तोह अर्जुन बीएड के किनारे पर बैठ गया.

"तुम ऐसे क्यों बात कर रहे हो मेरे साथ? अगर तुम्हे मई बुरी लगती हु तोह फिर मई सामने नहीं आउंगी. लेकिन बात पता हो तोह ज्यादा ठीक लगता है और शायद मई

उस कमी को ठीक करने की कोशिश भी करुँगी."

तारा की बात सुनते हुए अर्जुन बस सोचने हे लग गया के क्या ये वो पुराणी झगड़ालू तारा नहीं रही जो हर बार उसके साथ ज्यादती करती रहती थी, उसकी चीजों पर अपना

हक़ जताती थी. शाम से लेकर तोह वो ाचे से हे पेश आई थी उस से और वो हे तोह था जो दूर दूर था. जबकि वो सबके साथ ाचे से रह रही थी.

"नहीं ऐसी बात नहीं है बस आपको शायद हमारा बचपन याद न हो. तोह मुझे लगा के वो सब अब फिर नहीं दोहराना चाहिए." बोलते हुए पहली बार उसने तारा को ाचे

से देखा था. शरीर पर कही बाल तोह क्या कोई रोया तक न था. बाजू भी चमक रहे थे. गोरी तोह सभी थी लेकिन शारीरिक आकर्षण कुछ ज्यादा हे था या फिर

वो इस समय ज्यादा नुमाया हो रहा था.

"चलो इधर बैठो मेरे साथ." बीएड से तक लगाती तारा ने उसको अपने पास बुलाया तोह थोड़ा झिझकता सा वो दुरी बना के वैसे हे बैठ गया जैसे वो थी.

"अब ये बताओ के क्या तुम भी वही हो जो बचपन में थे? देखकर तोह नहीं लगता के अब तुम खुद वैसे हो लड़ने झगड़ने वाले. बचपन में तोह सभी ज़िद्दी होते है और

मई शायद इस वजह से थी की मई सिर्फ साल में एक बार अपने nana-naani के घर आती थी और फिर अकेली रहती थी जहा सिर्फ मेरी माँ हे होती थी. जैसे हम बड़े होते

है शायद हम ज्यादा परिपक्व और समझदार हो जाते है. तुम्हे क्या लगता है."

"आपने ठीक कहा." इतना बोलकर वो चुप हो गया. उनकी बात सोलह आने सही थी. ज़िद्दी तोह भी पूरा हे था या शायद सबसे ज्यादा वही घर में ऐसा था.

"खुद सोचो के 10 साल बाद मैंने तुम्हे देखा और तुम मुझ से इस तरह पेश आये. क्या ये सही था? काम से काम तुम सिर्फ मुझे hello भी कह सकते थे." तारा को अब

थोड़ा दर्द और तड़प होने लगी थी. "बचपन में हम दोनों की लड़ाई एक हे बात पर होती थी क्योंकि दोनों को वही चाहिए होता था. लेकिन क्या आज मई कुछ ऐसा करुँगी

या तुम?" तारा ने अब अपनी नजर भी अर्जुन से हटा ली थी. शायद एक तोह दिन भर वो उसकी आवाज को तरसती रही, दूसरा अपने दिल में आज उसने किसी के लिए समर्पण की

भावना जागते देखि थी और फिर अर्जुन का बात भी अजीब तरीके से करना. इतना सोचते हे 2 मोती बुँदे आँखों से लुढ़क कर गालो से बहती निचे आने लगी लेकिन अर्जुन

की नजरो से वो छुपी न रह सकीय. उसको भी इस बात से दर्द हुआ की अनजाने में सही लेकिन एक अपराध हो गया. दादाजी भी तोह कहते है की हर इंसान को दूसरा मौका

मिलना चाहिए. "मुझ से गलती हो गई तारा." वो बेशक उस से बड़ी थी लेकिन जो आदत बचपन में थी वही अब तक बरक़रार थी. उसकी आँखों से झरते पानी को देख

अर्जुन ने तारा को बाहों में भर लिए और तारा हिचकिया लेती उसके सीने से लगी रही.

"मई ज्यादा समझदार नहीं हु. और अगर तुमने ध्यान से देखा हो तोह सब मुझे बैलबुद्दि ऐसे हे तोह नहीं कहते. चुप हो जाओ न मई आइंदा से तुम्हारा दिल नहीं

दुखाऊंगा." प्यार से पीठ सहलाता वो बोलता रहा फिर अपने आंसू पांच तारा एक बार और उसके गले से लिपट गई. इस बार शायद वो अपने दिल को ठंडक दे रही थी.

"तुम अब आराम करो हम सुबह बात करते है." अर्जुन जैसे हे अलग होने लगा तारा ने फिर से पकड़ लिए. "प्लीज सिर्फ आज इधर सो जाओ. कल से मई किसी को अपने साथ

सुला लिए करुँगी. अकेले मैं नहीं सो सकती. चाहो तोह बीच में तकिया रख लेना." तारा की आखिरी बात पर अर्जुन हलके से मुस्कुराया.

"ाची बात है. लेकिन तकिये की जरुरत नहीं है. हम दोनों के पास अलग अलग हिस्सा है. तुम रुको मई अपनी चद्दर लेके आया." 2 मिनट बाद वो भी बिस्टेर की एक तरफ

लेता हुआ था. दोनों की आँखें खुली थी लेकिन दोनों चुप थे. "अपना हाथ इधर कर सकते हो?" अर्जुन ने बिना कुछ कहे अपनी ब्याह तारा की तरफ कर दी तोह उसने अपना

तकिया थोड़ा उसकी तरफ खिसका कर कलाई थाम कर आँखें बंद कर ली. "पता है तुम बचपन में भी ऐसे हे रोटी थी और फिर सोती भी ऋतू, अलका दीदी और मेरे

साथ थी." अर्जुन हलकी मुस्कान के साथ बोलै तोह तारा ने थोड़ी आँखे खोलते हुए कहा, "तुम पहले भी मुझे रुलाते थे और आज भी. तब भी नाम से बुलाते थे और आज

भी वैसे हे हो."

"अब नहीं रुलाऊंगा, पक्का वादा. लेकिन नाम से हे बुलाऊंगा हमेशा." अर्जुन ने तारा की तरफ करवट लेकर उसके गाल को हलके सेहलते कहा तो उसने फिर आँखें बंद

कर ली. "मई भी यही चाहती हु के तुम नाम से हे बुलाओ. लेकिन इस बार रुलाया तोह देखना तुम्हारी खैर नहीं." उसका अपने गाल पे रखा हाथ वैसे हे दबाते हुए तारा

ने घुटने मदद लिए. वो ऐसे हे सोती थी और अर्जुन उसको देखते हुए कुछ हे देर में सो गया.

"यादें हमेशा ाची हे रखनी चाहिए, फूलों के जैसी. बुरी तोह हर जगह फैली होती है सूखे पत्तो की तरह." बस ये आखिरी लाइन उसको याद आई और वो गहरी

नींद में चल दिए.
 
Back
Top