अपडेट 92
तभी मोहनलाल आ गया और रुचिका को मुंबई शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू हो गयी. मुंबई आकर उससे हॉस्पिटल में एडमिट करवा दिया. हॉस्पिटल में किसी को भी रहने की इज़ाज़त नहीं थी बस मिलने के वक़्त hi मिल सकते थे.
मोहनलाल ने रहने के लिए जब होटल बुक करवाना चाहा तू सूरज ने जिद करके उससे अपने घर पर रहने के लिए मजबूर कर दिया.
मोहनलाल को सूरज के घर पर एक अलग कमरा दे दिया गया था. रुचिका के एडमिट होने के बाद मोहनलाल काफी गमगीन था. वो हॉस्पिटल में डॉक्टर्स से सलाह मशविरा करता और रुचिका की हालत की जानकारी लेता रहता.
फिर एक दिन उसकी तबियत ख़राब होने लगी तब डॉक्टर्स ने उससे सलाह दी की उसकी रेडिएशन थेरेपी करनी पड़ेगी जो की अब चल रही थी और इसमें काफी जयादा कमजोरी आ जाती है और उससे हॉस्पिटल में रहना पद रहा था. वो हर पांचवे दिन घर जा सकती थी, लेकिन घर में वो सुविधा नहीं मिलती, इसलिए उससे हॉस्पिटल में hi रखा गया.
रुचिका जब हॉस्पिटल में थी तू वो अकेली थी और थेरेपी की वजह से काफी कमजोरी भी आ जाती है. एक दिन वो आधी नींद में थी और उससे वो सब याद आने लगा की वो वंहा हॉस्पिटल में कैसे पंहुची. वो याद कर रही थी
असल में रुचिका पिछले करीब 2 साल से भी जयादा से कैंसर से जूझ रही थी और दवाइयों पर थी. पहले तू काफी वक़्त तक पता hi नहीं चला. जब उसके सीने में दर्द हुआ तू डॉक्टर्स की समझ में बीमारी आ hi नहीं रही थी. उसके सीने में दर्द होता था और बुखार उत्तरता hi नहीं था.
काफी वक़्त तक मोहनलाल उससे अपने साथ पुणे में ले आया और अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाया लेकिन कोई फायदा नहीं. फिर एक दिन सूरज और दिया ने उन्हें मुंबई ले गए और वंहा पता चला की उससे कैंसर है. डॉक्टर्स ने मोहनलाल को बता दिया की इसकी हालत अच्छी नहीं है और इस हालत में इसके साथ सेक्स बिलकुल नहीं करना है नहीं तू इसको दिल का दौरा भी पद सकता है जो उसकी जान पर भरी होगा. मोहनलाल ने यह बात कभी भी रुचिका को नहीं बताई लेकिन खुद पर नियंत्रण रखा. उसके लिए रुचिका की जान उसके लिए जीने और मरने जैसा था.
डॉक्टर्स की सलाह को मानते हुए उसने रुचिका का पूरा ख्याल रखा. मोहनलाल उससे इतना प्यार करता था की सब कुछ भूलकर उसके लिए महंगी से महंगी दवाई लता और अपने बिज़नेस पर भी उसका ध्यान काम होता चला गया.
मोहनलाल की देखभाल और अच्छी दवाइयों की वजह से रुचिका की हालत में काफी सुधर भी आ गया था. बीच में तू ऐसा लगने लगा की जैसे उसकी बीमारी बिलकुल ठीक हो गयी हो.
जब रुचिका कुछ ठीक हो गयी तू वो और मोहनलाल घर भी गए लेकिन अलग अलग. रुचिका घर पंहुच कर बहुत भावुक हो गयी और माँ से मिलकर उससे अपने ऊपर शर्म भी आने लगी लेकिन अब बात बहुत आगे बढ़ चुकी थी. रुचिका कुछ दिन घर पर hi रुकी रही और दवाइयों की वजह से उससे काफी नींद आती थी.
संध्या ने एक दो बार पूछा भी लेकिन वो ताल गयी. मोहनलाल उससे घर पर छोड़कर कुछ दिनों के लिए टूर पर चला गया. ऐसे hi एक दिन रुचिका की तबियत कुछ जयादा hi ख़राब होने लगी तब उससे एक लोकल डॉक्टर को दिखाया तू उसने रुचिका की पुराणी रिपोर्ट्स देखने के लिए कहा तू वो रुचिका के बैग में थी. वो बेख्याली में अपनी माँ को उन्हें लेन के लिए बोल गयी, लेकिन बाद में उससे बड़ा पछतावा हुआ. डॉक्टर तू दवाई देकर चला गया लेकिन इस हादसे से हलचल मच गयी.
संध्या को पता लग गया की रुचिका को कैंसर है और उससे ये भी पता लग गया की उसने अपने hi पापा से गुपचुप शादी कर ली है. संध्या के तू पैरों टेल ज़मीं hi निकल गयी. वो अपना माथा पकड़कर बैठ गयी. वो करे भी तू क्या करे. कैसे अपनी जान से प्यारी बेटी से लाडे जो पता hi नहीं कब तक जीवित बचेगी. उससे तू अपने पति पर गुस्सा आ रहा था. उससे लग रहा था की उसके पति ने उसके साथ धोखा किया है.
उसने ठन्डे दिमाग़ से सोचा की क्या करें. एक दिन मोहनलाल का फ़ोन आया और रुचिका सो रही थी. संध्या ने सोचा की बात करे लेकिन उसने बात न करके फ़ोन रुचिका को दे दिया और बहार खड़े होकर उनकी बातें सुनती रही लेकिन कुछ न करने का निश्चय करके उसने किसी को भनक नहीं लगने दी की उससे सब पता लग गया है. वो अपने में मन hi मन घुट्टी रही लेकिन कुछ न किया. होठों पर मुस्कान और दिल में दर्द समेत लिया.
कुछ दिन रहने के बाद रुचिका चली गयी और मोहनलाल के साथ कभी पुणे में तू कभी दिल्ली में लेकिन अब दिल्ली वो हॉस्टल की बजाये एक फ्लैट में रहती थी और उसकी देखबहाल के लिए एक माइड को भी रख दिया गया था.
ऐसे hi रुचिका की हालत कभी ठीक तू कभी ख़राब. एक दिन संध्या ने हिम्मत करके उससे बात कर ली और उससे सांत्वना दी की वो उसके और मोहनलाल के बीच नहीं आएगी. रुचिका का यह सुन्ना था की वो बहुत भावुक हो गयी और उसने मोहनलाल को छोड़ने की बात भी कही. संध्या ने उससे मन कर दिया और कहा की 'अगर वो तुझे छोड़ भी दे तू मेरे पास अब उस अधिकार से नहीं आ पाएंगे और खुद को दोषी मानेंगे, उससे क्या फायदा होगा. मेरे से तू वो अब दूर जा चुके हैं और अब इस वक़्त तुम्हे मुझसे जयादा जरुरत है'
रुचिका कहने लगी 'माँ मुझे माफ़ कर दो'
संध्या 'तुम यह समझ लेना की मेरी जिंदगी भी तुम जीणरहि हो और कभी भूल से भी उन्हें कुछ न बताना नहीं तू अगर उन्होंने पश्चाताप में आकर कोई उल्टा सीधा कदम उठा लिया तू बहुत गलत हो जायेगा. तुम्हारा इलाज भी नहीं हो पायेगा, मैंन्तु हर तरफ से लूट जाउंगी. अब तुम मुझसे वादा करो की कभी भी ये बात अपनी जुबां पर तू छोडो किसी हाव भाव में भी उन्हें पता नहीं चलने डौगी'
रुचिका 'लेकिन माँ फिर आपक क्या होगा'
संध्या 'मैं जी लुंगी, जैसे तैसे करके'
रुचिका 'आप किसी से शादी कर लेना'
संध्या 'बीटा ये आसान नहीं है और मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगी'
रुचिका 'एक वादा आपको भी करना होगा की आप अब मेरी जिंदगी जियेंगी और अपनी उम्र काम करवा कर आदित्य की गर्लफ्रेंड बनाकर उसके साथ अपनी जिंदगी को संवार लो'
संध्या 'आदित्य ऐसा क्योँ करेगा'
रुचिका 'पता नहीं मुझे ऐसा क्योँ लग रहा है की वो आपसे मन hi मन प्यार करता है'
संध्या 'तू कुछ भी सोचती है'
रुचिका 'आप ये सब कोशिश तू कर सकती हो'
ये सोचते हुए उसकी कब नींद खुल गयी और हमेशा अपने आप को इस सब का दोषी मैंने लगी. वक़्त बीता रहा.
ऐसे hi 6 हफ्ते बीत गए और रुचिका की रिपोर्ट्स भी आ गयी जो काफी अच्छी थी और रुचिका को घर ले जाने की इज़्ज़ज़त दे दी गयी. उससे अभी सूरज और दिया के घर पर लाया गया. उसकी हालत में काफी सुधर था लेकिन वो काफी कमजोर हो चुकी थी. उसकी देखबहाल के लिए एक नर्स को भी रखने के लिए कहा तू दिया ने मन कर दिया और कहा की वो देख लेगी.
डॉक्टर्स ने मोहनलाल को बता दिया था की अभी खतरा टाला नहीं है और उसका शरीर काफी कमजोर हो चूका है, इसलिए गलती से भी उसके साथ सेक्स नहीं करना है, लेकिन उससे यह बताना भी नहीं है. उससे एहसास दिलाना है की वो उससे प्यार करता है और उससे कभी भी दुखी नहीं करना है.
जब रुचिका वापिस आयी तू उसकी हालत धीरे धीरे ठीक होने लगी और जब कुछ अच्छी हो रही थी तू उसने एक दिन मोहनलाल से सेक्स के लिए ज़िद की तू मोहनलाल ने बड़े hi प्यार से समझा दिया की 'वो उसके साथ सेक्स तब करेगा जब वो पूरी तरह ठीक हो जाएगी और जो उस रात होटल में नहीं हो सका, उससे पूरा करेगा'
इधर दिया के मन में मोहनलाल के प्रति प्यार बढ़ता hi जा रहा था और वो उससे बहुत hi ललचाई नज़रों से देखा करती थी. वो कई बार ऐसे इशारे से चुकी थी जो की रुचिका की नज़रों से चुप न सके.
एक दिन मोहनलाल और सूरज किसी काम से बहार गए हुए थे, तब दोनों बैठकर गप्पे मार रही थी और रुचिका उसके हाथ को पकड़ कर कह रही थी 'यार एक वादा करेगी मुझसे'
दिया 'क्या'
रुचिका 'वादा कर न'
दिया 'बता तू सही क्या वादा चाहिए'
रुचिका 'तेरी जान चाहिए'
दिया 'तू ले ले न'
रुचिका 'यार जान देने को तैयार है लेकिन वादा नहीं करेगी'
दिया 'यार ऐसा मत बोल, चल दिया वादा'
रुचिका 'अगर कल को मुझे कुछ हो जाये तू तुम इन्हे पत्नी का प्यार डौगी'
दिया गुस्से से चीखी 'तुझे कुछ नहीं होगा'
रुचिका 'यार बीमार बहिन पर गुस्सा होती है'
दिया 'तुम ऐसी उलटी सीढ़ी बात करोगी तू गुस्सा नहीं आएगा'
रुचिका 'यार मुझे मेरी हालत मालूम है, पता नहीं कब क्या हो जाये'
दिया 'कुछ नहीं होगा, ान तू तुम पहले से काफी अच्छी हो गयी हो'
रुचिका 'यार ये सब कहने की बातें हैं, मैंने इनकी और डॉक्टर की बात सुन ली थी और उनका कहना था की अभी हालत सुधरे नहीं हैं, इसको आराम की सख्त जरुरत है. अब यार तुम सोचों की क्या उन जैसा इंसान मुझसे पत्नी धरम निभाने के लिए कभी कहेगा, कभी नहीं. और मेरा क्या फ़र्ज़ बनता है की मैं उन्हें पति पत्नी का सुख प्रदान करूँ'
दिया 'यार पति पत्नी का रिश्ता सिर्फ शारीरिक मिलान पर hi आधारित नहीं होता, वो तू ात्म्ये मिलान होता है, जो की तुम्हारे और इनके बीच हो चूका है, इसलिए तुम्हे चिंता करने की बिलकुल जरुरत नहीं है'
रुचिका 'क्या कहने, तुम्हारे मुंह से आजकल इनका नाम नहीं लिया जाता, सिर्फ इनके hi निकलता है' और फिर उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ गयी.
दिया 'अरे यार वो तू मैं तुम्हारे लिए कह रही थी'
रुचिका 'मैं सब समझती हूँ, अच्छा इसको छोड़ वो वादा तू नहीं भूल जाओगी'
दिया 'यार तुमने मुझे इस तरह उलझा दिया है की मैं क्या करूँ, लेकिन मुझे यह अच्छी तरह से पता है की तुम्हे कुछ नहीं होगा'
रुचिका ने हाथ बढ़ाते हुए 'वादा कर'
दिया 'मुझे फंसा hi लिया'
रुचिका 'वादा कर'
दिया ने हाथ आगे बढ़ाया और उसके हाथ में हाथ देकर 'वादा रहा'
रुचिका 'अब तू तेरे मन में लड्डू फुट रहे होंगे'
दिया 'शर्म कर कुछ, इतनी बुरी नहीं हूँ की अपनी बहिन को कुछ होने दूँ'
रुचिका 'अच्छा मेरे होते हुए कुछ करना चाहती है'
दिया 'क्या बोल रही है, आज तुझे क्या हो गया है'
रुचिका 'मुझसे इनका दुःख देखा नहीं जाता और जरा सोचो अगर एक बीवी पत्नी का सुख न दे पाए तू दूसरी बीवी को वो सुख देना चाहिए'
दिया 'तुम और सिर्फ तुम उनकी बीवी हो, समझो'
रुचिका 'मैं कुछ भी नहीं भूली हूँ, क्या वो तुम्हारे पति नहीं हैं'
दिया 'मेरे मैंने या न मैंने से क्या होता है. ये उन पर निर्भर करता है की वो मुझे पत्नी मानते हैं या नहीं. जब तक वो मुझे पत्नी नहीं मानते, तब तक सिर्फ और सिर्फ तुम hi उनकी पत्नी हो'