Incest Porn Kahani Rishta - Page 18 - SexBaba
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Incest Porn Kahani Rishta

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थैंक्स सो मच
 
अपडेट 92

तभी मोहनलाल आ गया और रुचिका को मुंबई शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू हो गयी. मुंबई आकर उससे हॉस्पिटल में एडमिट करवा दिया. हॉस्पिटल में किसी को भी रहने की इज़ाज़त नहीं थी बस मिलने के वक़्त hi मिल सकते थे.

मोहनलाल ने रहने के लिए जब होटल बुक करवाना चाहा तू सूरज ने जिद करके उससे अपने घर पर रहने के लिए मजबूर कर दिया.

मोहनलाल को सूरज के घर पर एक अलग कमरा दे दिया गया था. रुचिका के एडमिट होने के बाद मोहनलाल काफी गमगीन था. वो हॉस्पिटल में डॉक्टर्स से सलाह मशविरा करता और रुचिका की हालत की जानकारी लेता रहता.

फिर एक दिन उसकी तबियत ख़राब होने लगी तब डॉक्टर्स ने उससे सलाह दी की उसकी रेडिएशन थेरेपी करनी पड़ेगी जो की अब चल रही थी और इसमें काफी जयादा कमजोरी आ जाती है और उससे हॉस्पिटल में रहना पद रहा था. वो हर पांचवे दिन घर जा सकती थी, लेकिन घर में वो सुविधा नहीं मिलती, इसलिए उससे हॉस्पिटल में hi रखा गया.

रुचिका जब हॉस्पिटल में थी तू वो अकेली थी और थेरेपी की वजह से काफी कमजोरी भी आ जाती है. एक दिन वो आधी नींद में थी और उससे वो सब याद आने लगा की वो वंहा हॉस्पिटल में कैसे पंहुची. वो याद कर रही थी

असल में रुचिका पिछले करीब 2 साल से भी जयादा से कैंसर से जूझ रही थी और दवाइयों पर थी. पहले तू काफी वक़्त तक पता hi नहीं चला. जब उसके सीने में दर्द हुआ तू डॉक्टर्स की समझ में बीमारी आ hi नहीं रही थी. उसके सीने में दर्द होता था और बुखार उत्तरता hi नहीं था.

काफी वक़्त तक मोहनलाल उससे अपने साथ पुणे में ले आया और अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाया लेकिन कोई फायदा नहीं. फिर एक दिन सूरज और दिया ने उन्हें मुंबई ले गए और वंहा पता चला की उससे कैंसर है. डॉक्टर्स ने मोहनलाल को बता दिया की इसकी हालत अच्छी नहीं है और इस हालत में इसके साथ सेक्स बिलकुल नहीं करना है नहीं तू इसको दिल का दौरा भी पद सकता है जो उसकी जान पर भरी होगा. मोहनलाल ने यह बात कभी भी रुचिका को नहीं बताई लेकिन खुद पर नियंत्रण रखा. उसके लिए रुचिका की जान उसके लिए जीने और मरने जैसा था.

डॉक्टर्स की सलाह को मानते हुए उसने रुचिका का पूरा ख्याल रखा. मोहनलाल उससे इतना प्यार करता था की सब कुछ भूलकर उसके लिए महंगी से महंगी दवाई लता और अपने बिज़नेस पर भी उसका ध्यान काम होता चला गया.

मोहनलाल की देखभाल और अच्छी दवाइयों की वजह से रुचिका की हालत में काफी सुधर भी आ गया था. बीच में तू ऐसा लगने लगा की जैसे उसकी बीमारी बिलकुल ठीक हो गयी हो.

जब रुचिका कुछ ठीक हो गयी तू वो और मोहनलाल घर भी गए लेकिन अलग अलग. रुचिका घर पंहुच कर बहुत भावुक हो गयी और माँ से मिलकर उससे अपने ऊपर शर्म भी आने लगी लेकिन अब बात बहुत आगे बढ़ चुकी थी. रुचिका कुछ दिन घर पर hi रुकी रही और दवाइयों की वजह से उससे काफी नींद आती थी.

संध्या ने एक दो बार पूछा भी लेकिन वो ताल गयी. मोहनलाल उससे घर पर छोड़कर कुछ दिनों के लिए टूर पर चला गया. ऐसे hi एक दिन रुचिका की तबियत कुछ जयादा hi ख़राब होने लगी तब उससे एक लोकल डॉक्टर को दिखाया तू उसने रुचिका की पुराणी रिपोर्ट्स देखने के लिए कहा तू वो रुचिका के बैग में थी. वो बेख्याली में अपनी माँ को उन्हें लेन के लिए बोल गयी, लेकिन बाद में उससे बड़ा पछतावा हुआ. डॉक्टर तू दवाई देकर चला गया लेकिन इस हादसे से हलचल मच गयी.

संध्या को पता लग गया की रुचिका को कैंसर है और उससे ये भी पता लग गया की उसने अपने hi पापा से गुपचुप शादी कर ली है. संध्या के तू पैरों टेल ज़मीं hi निकल गयी. वो अपना माथा पकड़कर बैठ गयी. वो करे भी तू क्या करे. कैसे अपनी जान से प्यारी बेटी से लाडे जो पता hi नहीं कब तक जीवित बचेगी. उससे तू अपने पति पर गुस्सा आ रहा था. उससे लग रहा था की उसके पति ने उसके साथ धोखा किया है.

उसने ठन्डे दिमाग़ से सोचा की क्या करें. एक दिन मोहनलाल का फ़ोन आया और रुचिका सो रही थी. संध्या ने सोचा की बात करे लेकिन उसने बात न करके फ़ोन रुचिका को दे दिया और बहार खड़े होकर उनकी बातें सुनती रही लेकिन कुछ न करने का निश्चय करके उसने किसी को भनक नहीं लगने दी की उससे सब पता लग गया है. वो अपने में मन hi मन घुट्टी रही लेकिन कुछ न किया. होठों पर मुस्कान और दिल में दर्द समेत लिया.

कुछ दिन रहने के बाद रुचिका चली गयी और मोहनलाल के साथ कभी पुणे में तू कभी दिल्ली में लेकिन अब दिल्ली वो हॉस्टल की बजाये एक फ्लैट में रहती थी और उसकी देखबहाल के लिए एक माइड को भी रख दिया गया था.

ऐसे hi रुचिका की हालत कभी ठीक तू कभी ख़राब. एक दिन संध्या ने हिम्मत करके उससे बात कर ली और उससे सांत्वना दी की वो उसके और मोहनलाल के बीच नहीं आएगी. रुचिका का यह सुन्ना था की वो बहुत भावुक हो गयी और उसने मोहनलाल को छोड़ने की बात भी कही. संध्या ने उससे मन कर दिया और कहा की 'अगर वो तुझे छोड़ भी दे तू मेरे पास अब उस अधिकार से नहीं आ पाएंगे और खुद को दोषी मानेंगे, उससे क्या फायदा होगा. मेरे से तू वो अब दूर जा चुके हैं और अब इस वक़्त तुम्हे मुझसे जयादा जरुरत है'

रुचिका कहने लगी 'माँ मुझे माफ़ कर दो'

संध्या 'तुम यह समझ लेना की मेरी जिंदगी भी तुम जीणरहि हो और कभी भूल से भी उन्हें कुछ न बताना नहीं तू अगर उन्होंने पश्चाताप में आकर कोई उल्टा सीधा कदम उठा लिया तू बहुत गलत हो जायेगा. तुम्हारा इलाज भी नहीं हो पायेगा, मैंन्तु हर तरफ से लूट जाउंगी. अब तुम मुझसे वादा करो की कभी भी ये बात अपनी जुबां पर तू छोडो किसी हाव भाव में भी उन्हें पता नहीं चलने डौगी'

रुचिका 'लेकिन माँ फिर आपक क्या होगा'

संध्या 'मैं जी लुंगी, जैसे तैसे करके'

रुचिका 'आप किसी से शादी कर लेना'

संध्या 'बीटा ये आसान नहीं है और मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगी'

रुचिका 'एक वादा आपको भी करना होगा की आप अब मेरी जिंदगी जियेंगी और अपनी उम्र काम करवा कर आदित्य की गर्लफ्रेंड बनाकर उसके साथ अपनी जिंदगी को संवार लो'

संध्या 'आदित्य ऐसा क्योँ करेगा'

रुचिका 'पता नहीं मुझे ऐसा क्योँ लग रहा है की वो आपसे मन hi मन प्यार करता है'

संध्या 'तू कुछ भी सोचती है'

रुचिका 'आप ये सब कोशिश तू कर सकती हो'

ये सोचते हुए उसकी कब नींद खुल गयी और हमेशा अपने आप को इस सब का दोषी मैंने लगी. वक़्त बीता रहा.

ऐसे hi 6 हफ्ते बीत गए और रुचिका की रिपोर्ट्स भी आ गयी जो काफी अच्छी थी और रुचिका को घर ले जाने की इज़्ज़ज़त दे दी गयी. उससे अभी सूरज और दिया के घर पर लाया गया. उसकी हालत में काफी सुधर था लेकिन वो काफी कमजोर हो चुकी थी. उसकी देखबहाल के लिए एक नर्स को भी रखने के लिए कहा तू दिया ने मन कर दिया और कहा की वो देख लेगी.

डॉक्टर्स ने मोहनलाल को बता दिया था की अभी खतरा टाला नहीं है और उसका शरीर काफी कमजोर हो चूका है, इसलिए गलती से भी उसके साथ सेक्स नहीं करना है, लेकिन उससे यह बताना भी नहीं है. उससे एहसास दिलाना है की वो उससे प्यार करता है और उससे कभी भी दुखी नहीं करना है.

जब रुचिका वापिस आयी तू उसकी हालत धीरे धीरे ठीक होने लगी और जब कुछ अच्छी हो रही थी तू उसने एक दिन मोहनलाल से सेक्स के लिए ज़िद की तू मोहनलाल ने बड़े hi प्यार से समझा दिया की 'वो उसके साथ सेक्स तब करेगा जब वो पूरी तरह ठीक हो जाएगी और जो उस रात होटल में नहीं हो सका, उससे पूरा करेगा'

इधर दिया के मन में मोहनलाल के प्रति प्यार बढ़ता hi जा रहा था और वो उससे बहुत hi ललचाई नज़रों से देखा करती थी. वो कई बार ऐसे इशारे से चुकी थी जो की रुचिका की नज़रों से चुप न सके.

एक दिन मोहनलाल और सूरज किसी काम से बहार गए हुए थे, तब दोनों बैठकर गप्पे मार रही थी और रुचिका उसके हाथ को पकड़ कर कह रही थी 'यार एक वादा करेगी मुझसे'

दिया 'क्या'

रुचिका 'वादा कर न'

दिया 'बता तू सही क्या वादा चाहिए'

रुचिका 'तेरी जान चाहिए'

दिया 'तू ले ले न'

रुचिका 'यार जान देने को तैयार है लेकिन वादा नहीं करेगी'

दिया 'यार ऐसा मत बोल, चल दिया वादा'

रुचिका 'अगर कल को मुझे कुछ हो जाये तू तुम इन्हे पत्नी का प्यार डौगी'

दिया गुस्से से चीखी 'तुझे कुछ नहीं होगा'

रुचिका 'यार बीमार बहिन पर गुस्सा होती है'

दिया 'तुम ऐसी उलटी सीढ़ी बात करोगी तू गुस्सा नहीं आएगा'

रुचिका 'यार मुझे मेरी हालत मालूम है, पता नहीं कब क्या हो जाये'

दिया 'कुछ नहीं होगा, ान तू तुम पहले से काफी अच्छी हो गयी हो'

रुचिका 'यार ये सब कहने की बातें हैं, मैंने इनकी और डॉक्टर की बात सुन ली थी और उनका कहना था की अभी हालत सुधरे नहीं हैं, इसको आराम की सख्त जरुरत है. अब यार तुम सोचों की क्या उन जैसा इंसान मुझसे पत्नी धरम निभाने के लिए कभी कहेगा, कभी नहीं. और मेरा क्या फ़र्ज़ बनता है की मैं उन्हें पति पत्नी का सुख प्रदान करूँ'

दिया 'यार पति पत्नी का रिश्ता सिर्फ शारीरिक मिलान पर hi आधारित नहीं होता, वो तू ात्म्ये मिलान होता है, जो की तुम्हारे और इनके बीच हो चूका है, इसलिए तुम्हे चिंता करने की बिलकुल जरुरत नहीं है'

रुचिका 'क्या कहने, तुम्हारे मुंह से आजकल इनका नाम नहीं लिया जाता, सिर्फ इनके hi निकलता है' और फिर उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ गयी.

दिया 'अरे यार वो तू मैं तुम्हारे लिए कह रही थी'

रुचिका 'मैं सब समझती हूँ, अच्छा इसको छोड़ वो वादा तू नहीं भूल जाओगी'

दिया 'यार तुमने मुझे इस तरह उलझा दिया है की मैं क्या करूँ, लेकिन मुझे यह अच्छी तरह से पता है की तुम्हे कुछ नहीं होगा'

रुचिका ने हाथ बढ़ाते हुए 'वादा कर'

दिया 'मुझे फंसा hi लिया'

रुचिका 'वादा कर'

दिया ने हाथ आगे बढ़ाया और उसके हाथ में हाथ देकर 'वादा रहा'

रुचिका 'अब तू तेरे मन में लड्डू फुट रहे होंगे'

दिया 'शर्म कर कुछ, इतनी बुरी नहीं हूँ की अपनी बहिन को कुछ होने दूँ'

रुचिका 'अच्छा मेरे होते हुए कुछ करना चाहती है'

दिया 'क्या बोल रही है, आज तुझे क्या हो गया है'

रुचिका 'मुझसे इनका दुःख देखा नहीं जाता और जरा सोचो अगर एक बीवी पत्नी का सुख न दे पाए तू दूसरी बीवी को वो सुख देना चाहिए'

दिया 'तुम और सिर्फ तुम उनकी बीवी हो, समझो'

रुचिका 'मैं कुछ भी नहीं भूली हूँ, क्या वो तुम्हारे पति नहीं हैं'

दिया 'मेरे मैंने या न मैंने से क्या होता है. ये उन पर निर्भर करता है की वो मुझे पत्नी मानते हैं या नहीं. जब तक वो मुझे पत्नी नहीं मानते, तब तक सिर्फ और सिर्फ तुम hi उनकी पत्नी हो'
 
आपका इतना विस्तृत विश्लेषण पढ़कर दिल खुश हो गया.

हर व्यक्ति की अपनी समझ होती है और किसी भी बात को वो अपने तरीके से सुलझाने की कोशिश करता है.

कभी भी सो व्यक्ति एक hi समस्या को एक hi तरीके से नहीं सुलझा सकते.

आपने बिलकुल सही कहा है की इस वक़्त पूरी फॅमिली का हर व्यक्ति अपनी अपनी परेशानियों से जूझ रहे हैं. लेकिन अगर मेरी सोच के हिसाब से देखा जाये तू ान इससे फॅमिली कहना क्या उचित होगा.

सबकी सोच अपनी अपनी.

आपके बहुत सरे सवालो का जवाब अगले अंक (अपडेट कर दिया है) में दे दिया गया है, कुछ का उससे आगे के अंको में बहुत जल्दी hi.

बहुत बहुत धन्यवाद्
 
सबसे पहले तू मैं आपका तहेदिल से शुक्रिया करुँगी की आपने इतना कीमती वक़्त निकल कर इतना विशाल विश्लेषण प्रस्तुत किया है.

आपने हर व्यक्ति (पातर) का जो भी इस कहानी में हैं चरित्र विश्लेषण किया है. जो एक बहुत hi दुर्लभ करए है उसके लिए आपको नमन.

मैं दुर्लभ इस लिए कह रही हूँ क्योँकि जब कोई भी ऐसा करता है वो एक बहुत बड़ा खतरा मोल लेता है. वो खतरा होता है लोगों की आलोचना. आपने उससे दरकिनार करते हुए यह करए किया है.

आपने भी बहुत सरे लोगों के दृश्टिकोण यंहा देखे होंगे जो की भिन्न भिन्न हैं. उनमे से कुछ आपसे मेल कहते हैं और कुछ नहीं.

मैं आपकी बात को गलत नहीं कह रही और साथ hi उससे सही भी नहीं कह रही.

किसी का भी व्यक्तित्व चित्तरं जब हम करते हैं तब हम न्यायाधीश बनकर करते हैं.

उस वक़्त हमारा जो भी सोच, समझ और अनुभव होता है उसके अनुसार निर्णय देते हैं, लेकि कोई जरुरी नहीं की वो ठीक हो.

आपने शुरू में hi लिखा है की 'आपके अनुसार'

यंहा तक तू मैं आपसे सौ प्रतिशत सहमत हूँ. लेकिन अपने निर्णय को किसी पर थोपने के खिलाफ हूँ

मेरा यह मन्ना है की हर व्यक्ति अपनी समझ के हिसाब से निर्णय लेता है और मेरे हिसाब से कोई भी निर्णय गलत नहीं होता

मैं कभी नहीं कहती की आप मेरी राइ से इत्तेफ़ाक़ रखे.

अगर आपको बुरा लगा हो तू क्षमाप्रार्थी हूँ.

आपका बहुत बहुत दिल से शुक्रिया
 
नीस रिव्यु,

वेल आईटी वास् नॉट फिल्मी मसाला.

िफ़ यू जो थ्रू थे व्होले स्टोरी वन्स अगेन यू वोउल्ड फंड तहत व्हाटएवर है बीन रिवील्ड इन थिस अपडेट वास् हॉन्टेड मान्य टाइम्स फ्रॉम थे बिगनिंग, इवन फ्रॉम थे फर्स्ट अपडेट.

इन बिटवीन सो मान्य हिंट्स हैवे बीन गिवेन सो तहत रीडर्स कैन अंडरस्टैंड व्हाट थिस स्टोरी इस.

फ्यू रीडर्स दीद पॉइंट आउट सर्टेन हिंट्स एंड इवन प्रेडिक्टेड समथिंग लिखे थिस एंड अस्केद में, बूत एच टाइम ी अस्केद थम तो वेट.

थे स्टोरी लाइन वास् क्रिस्टल क्लियर फ्रॉम थे बिगनिंग एंड थे शामे है बीन रिटेन विथ सलीगत मॉडिफिकेशन्स.

ी वास् नॉट गोइंग तो रेवेअल सो अर्ली अस वन्स यू स्टार्ट रेवेलिंग था स्टोरी केस नियर तो इतस कन्क्लूसिओं.

बूत ी हद तो दो थिस तो अवॉयड अननेसेसरी हीटिड डिसकशंस अमोग्स्त थे रीडर्स.

विथ रेगार्ड्स तो योर ानोथेर क्वेश्चन, तहत वोउल्ड बे अंसवेरेद सून.

थैंक्स सो मच फॉर वैरी गुड एनालिसिस
 
आपसे एक रिक्वेस्ट है की आप किसी भी रीडर का मज़ाक मत उड़ाइये.

हर एक को अपनी राइ रखने का पूरा अधिकार है.

आप जरा सोचो की अगर कहानी को दूसरी तरह से प्रस्तुत किया जाता जिसमे वो सही और आप गलत हो जाते तब वो अगर आपका इसी तरह मज़ाक उड़ाते तू क्या आपको ाचा लगता.

हर व्यक्ति अपने हिसाब से जितनी कहानी हो चुकी होती है उस को पढ़कर आगे की आकांक्षाओं को सोचता है और उस हिसाब से अपनी प्रतिक्रिया देता है.

ये फोरम एन्जॉय करने के लिए न की किसी का मज़ाक उड़ने के लिए.

मेरी बात अगर बुरी लगी हो तू मैं माफ़ी चाहती हूँ

धन्यवाद्
 
फर्स्ट ऑफ़ आल वेलकम तो थिस थ्रेड एंड थैंक्स तो कामदेव जी बिकॉज़ ऑफ़ हूज एनालिसिस यू अरे हेरे.

एग्री विथ योर रिमार्क्स फुल्ली

यस हे है वेस्ट एंड रिच एक्सपीरियंस व्हिच हे ट्रान्सलेट्स ईंटो हिज पावरफुल वरिटिंग्स, मई बे स्टोरी और रिव्यु और अन्य एनालिसिस अस डेस्क्रिबेद हेरे.

हे है आल थे इंग्रेडिएंट्स तो ट्रांसलेट ईंटो ान इफेक्टिव एंड फ़्रुइटफ़ुल राइटिंग.

थैंक्स सो मच
 
वंडरफुल रिव्यु.

यस थिस अपडेट रिवील्ड मान्य फैक्ट्स एंड no डाउट आईटी वास् ा साद अपडेट. ी कैन अंडरस्टैंड तहत थिस टाइप ऑफ़ अपडेट इस नॉट लिकेड बी रीडर्स ों थिस फोरम एंड थे शामे वास् मेंशनएड व्हेन आईटी वास् अपडेटेड.

बूत बीइंग हेल्पलेस अस थे स्टोरी है तो मूव ों एंड एच पथ ों थे जर्नी can't बे स्मूथ, सम बम्प्स वोउल्ड बे तेरे.

ओने नीड्स तो एन्जॉय बोथ एंड थिंक अबाउट थे डेस्टिनेशन व्हिच वोउल्ड बे फैंटास्टिक.

थैंक्स सो मच
 
अपडेट 93

संध्या उसकी बात को अनसुना करके अपने बैग को पैक करने लगी. आदित्य ने उससे रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नहीं रुकी और वंहा से निकल गयी.

वंहा से निकलने के बाद संध्या को कुछ सूझ नहीं रहा तह की क्या करें और क्या न करें और बिना कुछ सोचे समझे वो वंहा से बस स्टैंड पंहुची और वंहा कड़ी एक बस में सवार हो गयी. उसने ध्यान भी नहीं दिया की वो बस कान्हा जा रही है, बिना सोचे उस बस में बैठ गयी और थोड़ी देर में बस चल पड़ी. काफी लम्बा सफर करके बस अपने गंतव्य पर पंहुच गयी. बस उससे लेकर जिस शहर में पंहुची वंहा पर उससे कोई नहीं जनता था.

वो सोचने लगी की क्या करूँ, उसने एक बार सोचा की वापिस अपने शहर चली जॉन, लेकिन उसका दिल टूट चूका था. वो वंहा पर एक धर्मशाला में रुकी और फिर वंहा पर रुकने पर अपनी जिंदगी के बारे में सोचने लगी.

एक बार तू उसके मन में आया की वो आत्महत्या कर ले, लेकिन किसी बात को सोचकर उसने जिन्दा रहना hi मुनासिब समझा और अपने आप को आने वाली जिंदगी से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया. उसने अब सोच लिया था की अब वो वापिस नहीं जाएगी और नए सिरे से जिंदगी को जियेगी.

आदित्य काफी देर तक उसके जाने के बाद सुधबुध खो कर सोचता रहा की ये क्या हो गया. वो यंहा पर संध्या को पटाने, मानाने और अपने काम के लिए राज़ी करने के लिए आया था ताकि उसका प्लान कामयाब हो पाए, लेकिन अब वो प्लान उससे मिटटी में मिलता हुआ दिखा. जैसे hi उसके मन में ये आया तू वो उससे ढूंढने के लिए बहार आया. उस ने उससे ढूंढने की भरसक कोशिश की, लेकिन वो उससे न मिली और थक हारकर वापिस आ गया और होटल से चेकआउट करके अपने घर चला गया. घर पर आकर वो संध्या का इंतज़ार करता रहा. वो पुलिस के पास जाने की हिम्मत न कर सका क्योँकि वंहा उससे संध्या से रिश्ता बताना पड़ता. वो उससे माँ बता नहीं सकता था क्योँकि यंहा लोग उससे उसकी बीवी मानते थे और अगर बीवी बताता है तू वो भी गलत हो जाता क्योँकि उसने संध्या से शादी तू की hi नहीं थी. उसकी समझ में hi नहीं आ रहा था की क्या करे. वो दो दिन इंतज़ार करके वंहा से अपनी जॉब के लिए दूसरे शहर के लिए निकल गया.

उधर संध्या धर्मशाला में hi रह रही थी. उस धर्मशाला में खाने पीने का इंतज़ाम नहीं था, जिसके लिए उससे बहार जाना पड़ता था. उस बाजार में उसकी मुलाकात एक स्त्री से हुई जो पास के किसी बड़े बाजार की दुकान में खाने पीने की दुकान चलती थी, उससे वो खाना लेने लगी.. वो बाजार बहुमंज़िला था. वंहा पर हर प्रकार की दूकान थी. वंहा खाने पीने की सुविधा होने की वजह से संध्या वंहा जाकर अपना खाना पैक करा लेती थी लेकिन कभी भी वंहा बैठकर खाना नहीं खाया. वो वंहा जाती और उसके बाद इधर उधर टहलकर अपना वक़्त बीतती. संध्या को समजह नहीं आ रहा था की वो क्या करे क्योँकि उसके पास जो पैसे थे वो धीरे धीरे काम होता जा रहा था.

ऐसे hi एक दिन उसने उस स्त्री से काम के बारे में बात की तू उसने कहा की यंहा जो महिलाएं काम करती है वो आपस में बात कर रही थी की यंहा पर स्टोर में कुछ महिलाओं की जगह खली है, अगर वो चाहे तू काम का पता कर सकती है. अगले दिन वो उस जगह गयी और जैसे hi वो वंहा पंहुची तू देखती है की दूसरी मंज़िल से एक नन्हा सा बच्चा ऊपर से गिर रहा है. वो सब कुछ भूलकर उस बच्चे को बचने के लिए अपनी बांहे फैला देती है. वो उस बच्चे को बचने के लिए उसके नीचे आने लगती है तो वो बच्चा उसकी झोली में आ जाता है लेकिन उसको बचने के छाकर में खुद भी गिर जाती है और लुड़कने लगती है लेकिन बच्चे को कोई चोट नहीं लगने देती. जब लुड़कते हुए वो रूकती है तू किसी चीज़ से टकराती है और बेहोश हो जाती है.

उधर आकाश जॉब करने में बिजी हो जाता है, लेकिन अब उसके चेहरे पर मुस्खरहाट गायब हो चुकी थी. वो संध्या को ढूँढना भी चाहता था लेकिन कैसे और कान्हा? वो जब भी फ़ोन करता उसका फ़ोन बंद hi आता था. उसका काम में मन भी नहीं लग रहा था. िरा मैडम भी काम के लिए दबाव दे रही थी और नै कंपनी का भी कई बार पूछ चुकी थी, लेकिन आदित्य के पास अभी कोई जवाब नहीं था.

श्रुति के घरवाले भी अब उसकी शादी के लिए जोर देने लगे थे तू उसने एक दिन आदित्य से इस बारे में बात की और उससे अपने दिल का हाल बता दिया. आदित्य ने उससे बताया की वो उससे एक अच्छा दोस्त मंटा है और उससे इस बात के लिए बड़ा दुःख हो रहा है की वो उससे शादी नहीं कर पायेगा. श्रुति रोटी हुए चली गयी. उसकी शादी भी हो गयी और वो उस जॉब को भी छोड़ गयी.

िरा मैडम ने उससे कई बार नै कंपनी के बारे में बोलै तू उसने आर्डर देने वाली कंपनी से बात करके आर्डर िरा मैडम की कंपनी को hi दिलवा दिया और उन्हें कह दिया की अगला प्रोजेक्ट नै कंपनी से करेंगे. वो मान गए और काम चालू हो गया. इस दौरान िरा मैडम ने उससे कई बार नै कंपनी के बारे में बोलै लेकिन बात नहीं बानी.

ऐसे hi 6 महीने और बीत गैर और िरा मैडम के पति का सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया और वो भी काफी हद तक गमगीन हो गयी. उसका मन भी अब काम में काम लगता था लेकिन क्लाइंट्स के दबाव में काम करना पद रहा था.

संध्या जब बेहोश हुई तू उससे हॉस्पिटल पंहुचा दिया गया और वंहा वो होश में आने पर अपनी यादाशत खो चुकी थी लेकिन उसके साथ साथ वो प्रेग्नेंट भी हो चुकी थी. डॉक्टर्स को वो अपने बारे में कुछ नहीं बता प् रही थी. वो बच्चा जिससे उसने बचाया था उस बाजार के मालिक का बीटा था. वो और उसकी पत्नी अपने आप को संध्या के कर्ज़दार समझते थे जिसने उनके बच्चे को बचाया था. दोनों उसका पूरा इलाज़ करवा रहे थे और जब वो कुछ ठीक हो गयी तू उससे अपने घर ले आये और उसकी पूरी देखभाल करने लगे.

वक़्त बीतता रहा और संध्या ने एक खूबसूरत बच्चे को जनम दिया जो की एक लड़का था और संध्या ने अपने आप को उसकी परवरिश में व्यस्त कर लिया.
 
सबसे पहले तू आपका शुक्रिया की आपने एक बार फिर से विस्तृत वर्णन किया है.

आप जो बातें इस में कह रहे हैं वो सब मैं पहले hi कह चुकी हूँ की हर इंसान जो भी फैसला करता है वो सब उसकी सूझ बुझ, उसका अनुभव और सोच के अनुसार hi निर्णय लेता है.

मैं किसी को भी गलत नहीं कह रही क्योँकि हर समस्या के अनगिनित उपाए होते हैं और कोई भी अपने आप को गलत नहीं कहता.

अब आप hi देखिये जैसा की आपने कहा की आप एक संयुक्त परिवार में जन्मे और सब मिलजुलकर समस्या का समाधान करते हैं. बिलकुल सही व्यवस्था है, मैं पैरंटया इस व्यवस्था से सहमत हूँ, लेकिन साथ hi यह भी कहूंगी की कितने लोग इस व्यवस्था को सहमति देंगे.

आप सोचिये जब समाज का निर्माण शुरू हुआ, यही व्यवस्था लगी थी और धीरे धीरे इस व्यवस्था का विघटन शुरू हुआ. क्योँ?

उसके कुछ कारन शिक्षा में वृद्धि, सोच में विभिनत्ता, संसाधन की कमी और आगे बढ़ने की छह.

हम कितना भी किसी व्यवस्था को सहमति दे लेकिन बदलाव सृष्टि का नियम है और हमें वक़्त के साथ बदलना जरुरी है.

मैं आपकी सोच को बदलने के लिए नहीं कह रही और न hi मैं आजकल की व्यवस्था का अनुमोदन कर रही हूँ.

सिर्फ और सिर्फ आपकी बात का जवाब देने की कोशिश भर है.

पता नहीं आपको मेरा जवाब पसंद भी आता है या नहीं.

धन्यवाद
 
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