Incest Katha Chodampur Ki - Page 24 - SexBaba
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Incest Katha Chodampur Ki

बड़ी माँ- बहुत अचे तो अब जब दोनों पक्ष तैयार हैं और सरे नियम सबको पता हैं तो जल्दी hi मुक़ाबला शुरू किआ जायेगा… पहले सैनिक कौन बनेगा इसका फैसला सिक्का उछाल कर किआ जायेगा…

एक सिक्का बड़ी माँ ने हम सब को दिखाया जिसमे एक तरफ फूल बना था तो दूसरी तरफ बकरी .

बड़ी माँ यदि बकरी आई तो कालजंग पहले जायेगा.. और यदि फूल आया तो कर्मा..

बड़ी माँ ने सिक्का मुझे दिया और मैंने वो हवा में उछाल दिया…


अपडेट 138 ा
चोदामपुर में पापा आज बड़े चहक रहे थे, और चहकें भी क्यों न सुबह सुबह hi इतनी मस्त छूट छोड़ने को मिल गयी थी सच में पल्ली ने ये काम तो बहुत hi ाचा किआ है, जब आएगी तो उसे उसकी पसंद का एक सूट dilaunga..nashta करके और नाहा धो कर वो मोटरसाइकिल पर शहर की और चल दिए थे खेत के लिए और घर का कुछ सामान जो लेना था मोटरसाइकिल चलते हुए उनके मन में कुछ अजीब अजीब से ख्याल भी आ रहे थे, भाभी की वो बात उनके मन में रह रह कर आ रही थी की मैं दोनों बेटों और बाप तीनो से चुद चुकी हूँ अब…

उन्हें कर्मा और अनुज का ख्याल आया की उनके बच्चे उतने भी छोटे नहीं रहे जितना वो समझते हैं, ममता, पल्ली और प्रेमा बहु तीनो औरतों को वो मेरे से पहले hi छोड़ चुके हैं और मुझे कोई खबर नहीं हुई…

वैसे देखा जाये तो ये उन दोनों की hi बदौलत है जो मैं तीनो को भोग पाया, अगर वो शुरुआत नहीं करते तो शायद ये मेरे पास कभी आती hi नहीं… वैसे इसमें सब कुछ कर्मा का hi किआ धरा होगा, अनुज शरारती है पर इतनी हिम्मत नहीं की इतने बड़े बड़े कदम उठा ले.. चलो एक बात अछि है की दोनों भाई सब कुछ साथ hi कर रहे हैं, चुदाई भी.. ये सोचकर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गयी, पर कुछ और भी उनके दिमाग में आ गया और वो कुछ यादों में खो गए..

सुबह सुबह जल्दबाजी में hi सही पर छूट की कुटाई करवाकर आज भाभी काफी खुश और चहक रही थी, लोक गीत गुनगुनाते हुए घर के सरे काम निपटा रही थी, नीलेश के साथ चाय पि कर राजपाल यानि ससुर जी फिर से चलव गए थे भैंसो को चारा वगेरा करने और जब तक बापिस आये तब तक भाभी ने खाना वगेरा बना कर सब कुछ कर लिए था..

आते hi बहु ने खाना लगा दिया तो राजपाल बैठ गए खाना खाने,

राजपाल ने खाना खाया और हाथ धोते हुए बोले: बहु कोप्ते तो बड़े स्वादिष्ट बनती है तू..

भाभी- तुम्हे पसंद आये पापाजी?

राजपाल- अरे पसंद आये उन्ही की वजह से हम दो रोटी ज़्यादा खा गए.

Bhabhi-to क्या हुआ हम तो कहते हैं और कहानी चाहिए थी..

राजपाल: नहीं बीटा अब तो एक निवाले की भी जगह नहीं है पेट में.. तू भी खा ले अब.

भाभी: हाँ बस लगा hi रहे हैं.

राजपाल- बहुत बढ़िया तब तक थोड़ा सुस्ता लें पेट भर गया है..

कहकव राजपाल हंसने लगे..

वहीं भाभी भी हँसते हुए खाना खाने के लिए बैठ गयी..

खाना खाने के बाद उन्होंने झूठे बर्तन धोये और फिर जब सारा काम निपटा कर फ्री हुई तब तक राजपाल ताऊ भी नींद से उठ चुके थे,

राजपाल- ाचा बहु अब हम निकलते हैं खेत की तरफ, पानी लगाना है तो उसके लिए रास्ता खोदना पड़ेगा.

भाभी- पापाजी हम का सोचरे थे की हम भी चलें का खेत में तुम्हारे साथ?

राजपाल- अरे तू क्या करेगी खेत में?

भाभी- यहाँ हम अकेले परेशां हो जाते हैं पल्ली वगेरा भी नहीं है जो उनके यहाँ चली जाएं.. पूरा घर भी सुनसान है.

राजपाल- ये बात तो सही कही तूने पर खेत में. कहीं तू परेशां न हो जाये.

भाभी- नहीं पापाजी परेशानी कैसी हमें तो ाचा लगेगा..

राजपाल- ाचा ठीक है चल और ऐसा कर दोपहर का खाना भी बांध ले वहीं खा लेंगे.

भाभी- ठीक है पापाजी अभी बांधते हैं

भाभी ने खुश होते हुए कहा और कुछ पल बाद hi ससुर बहु घर में ताला मारकर निकल पड़े.

कालक गाओं

सब की नजर घुमते हुए सिक्के पर थी और सिक्का हवा में घुमते हुए नीचे की और आने लगा और फिर आवाज़ के साथ ज़मीन से टकराया और फिर थोड़ा नाचने के बाद ठहर गया, बड़ी माँ ने आगे बढ़कर सिक्का देखा और पहिए एलान किआ..

सिक्के पर बकरी आई है तो पहली बारी कालजंग की होगी और कर्मा लुटेरा होगा…

ये सुनकर मेरे मन को चैन आया, वहीं मेरे साथ के लोगो ने भी रहत की सांस ली, मौसी और माँ को मुझपर भरोसा तो था पर उतना hi कुछ गलत होने का दर भी था, जो जायज़ भी था पर पहली बारी कालजंग की थी इस कारन दोनों को थोड़े समय के लिए hi सही राहत जरूर मिल गयी थी..

बड़ी माँ- तो कालजंग पहले जायेगा और आखिरी जरूरी बात मुक़ाबला शुरू होते hi सवारियां लुटेरे का विरोध नहीं कर सकती जैसा लुटेरा चाहेगा वो उनके साथ कर सकता है सवारियों को बचने की जिम्मेदारी सैनिक की है…

सबने सहमति में सर हिलाया,

बड़ी माँ- अब सब लोग नाव की और चलो..

मैं, बड़ी माँ कालजंग और उसकी माँ हम एक किनारे कड़ी नाव के पास गए,

तालाब के एक किनारे से दुसरे किनारे की बीच की दूरी करीं 200 मीटर तो थी hi मतलब नाव से एक सवारी को छोड़कर बापिस आना मतलब 400 मीटर की दूसरी और इसी बीच मुझे यानि लुटेरे को लूट मचानी थी…

बड़ी माँ- सब तैयार हैं

मैंने और कालजंग ने हाँ में सर हिलाया माँ और बाकि सब परेशां थे की आगे क्या होने वाला है…

बड़ी माँ- क्यूंकि निर्णायक की भूमिका चित्रावती निभा रही है तो अब से वही सरे निर्देश देगी..

सब लोग चित्रावती की और देखने लगे,

चित्रावती- मुक़ाबला शुरू किया जाये

उसने बिना किसी भाव से बोलै न जाने क्यों वो मुझे अभी भी नाराज लग रही थी पर अभी मेरे पास उन सब चीज़ों से ज़्यादा जरुरी काम था..

मुक़ाबला शुरू होते hi कालजंग ने नाव का चप्पू उठाया और फिर वो जैसे सोचने लगा की पहले किसे ले जाया जाए… उसने एक बार बड़ी माँ को देखा और फिर अपनी माँ को और फिर कुछ सोचकर अपनी माँ का हाथ पकड़ा और नाव की और ले जाने लगा… मैं बस खड़ा हुआ देख रहा था क्यूंकि उनके नाव में बैठने से पहले मैं कुछ नहीं कर सकता था.. बड़ी माँ बिना किसी भाव के ये सब देख रही थी वहीं लोगो में ख़ुसूइ पुसुर हो रही थी की कालजंग ने पहले अपनी माँ को चुना बड़ी माँ से पहले.. खैर किनारे पर पहुँच कर जैसे hi नाव में चढ़ने वाले थे उसने अचानक से अपनी माँ का हाथ छोड़ दिया और बड़ी माँ का हाथ पकड़ लिए और उन्हें खींच कर अपनी नाव में चढ़ा लिए मतलब मैं और उसकी माँ किनारे पर रह गए…

नाव में चढ़ाते मैं भी हरकत में आ गया और उसकी माँ की और बढ़ने लगा, पर तभी कालजंग ने नाव में कुछ ऐसा किआ जिससे मैं क्या सभी लोग हैरान रह गए उसने अचानक से बड़ी माँ को पकड़ा और उनके ब्लाउज में हाथ डाले और उस पकड़ कर चीयर दिया और उनके शरीर से अलग कर दिया…






बड़ी माँ अचानक से बिलकुल ऊपर से बिलकुल नंगी हो गयी उनकी बड़ी बड़ी छुछियां सबकी आँखों के सामने आ गयी, क्या खूबसूरत चूचिया थी बेहद बड़ी पर सुडोल मैं तो उनको देखते hi खो सा गया और मेरे मुँह में पानी आने लगा के आह क्या सुन्दर चूचियां थी उधर बड़ी माँ को ऊपर से नंगा कर कालजंग ने जल्दी से चप्पू उठाया और नाव चलने लगा, मैं बड़ी माँ की छूछीयों की खूबसूरती में खो सा गया था, तभी मुझे माँ की आवाज़ आई कर्मा खड़ा क्यों है कुछ कर…

और मुझे होश आया की बीटा मुक़ाबले पर ध्यान दे, मैं तुरंत कालजंग की माँ की और बढ़ा और उसकी साड़ी को पकड़ कर जल्दी जल्दी खींचते हुए उतर दिया और कालजंग की माँ सबके सामने नीचे से बिलकुल नंगी हो गयी, मेरा एक अंक पक्का हो गया, मैंने एक नजर बड़ी माँ पर डाली जो अभी भी अपनी छूछीयो को बहार किये हुए हमारी तरफ देख रही थी, मेरा लुंड तो बड़ी माँ की छूछीयों को देखकर hi लोहे का हो चुका था कालजंग की माँ के बड़े और नंगे चूतड़ों को देखकर फुंकारें मरने लगा..

मैंने कालजंग की माँ को घुमाया और आगे की तरफ झुककर अपने लुंड को उसकी छूट के द्वार पर टिकाया और बिना किसी देरी के फच्च से घुसा दिया… मेरा लुंड उसकी छूट की दीवारों को फैलता हुआ आधा अंदर चला गया…

एक बार ये नजारा कालजंग ने मुद कर जरूर देखा और देखते hi उसकी गति और बढ़ गयी… वहीं मुझे 4 अंक और मिल गए… वहीं मेरा लुंड कालजंग की माँ की छूट में जाता देख बाकि सब पर भी कुछ अलग hi असर हो रहा था, माँ अपने बेटे को ऐसे खुले में अनजान औरत की चुदाई करते देख गरम हो रही थी उनकी छूट गीली हो गयी थी, वहीं मंजू तै का भी यही हाल था, मौसी की छूट तो गीली हो रही थी पर साथ hi उन्हें आगे क्या होगा इसका दर सत्ता रहा था..


पर उत्तेजना उन पर भी हावी हो रही थी… अनुज और जग्गू का तो और भी बुरा हाल था एक तो इतने लोगो के सामने चुदाई देखना और दूसरो बात अपनी माओं और मौसी के सामने चुदाई देखमा उनकी कामोत्तेजना को एक अलग hi स्टेट पर पहुंचा रहा था, उनकी उनकी धोतियों में तम्बू बन गए थे..

मैंने कालजंग की माँ की छूट में धक्के लगाने शुरू कर दिया था, साथ hi उसे छोड़ते हुए मैं उसके ब्लाउज के बटन खोलने लगा और फिर उसे खोल कर उसके शरीर से अलग कर दिया, मेरे हाथ में दो अंक और आ गए और ये अंक कुछ ज़्यादा hi बड़े और भरी थे, जो की ब्लाउज उतरजाने से खुल कर बहार आ गए थे, जिन्हे में हाथों में लेकर मसलने लगा, कालजंग की माँ. अब पूरी तरह से नंगी थी… और सबके सामने में अपने लुंड को उसकी छूट में दनादन पेल रहा था, कालजंग करीब करीब दुसरे किनारे पहुंच चूका था, मैं अब कालजंग की चाल समझ गया था वो बड़ी माँ की छूछीयों से मेरा ध्यान बहका कर मेरा समय व्यर्थ करवाना चाहता था, वैसे तरकीब बुरी नहीं थी अगर किसी ने पहले चुदाई न की हो आउट वो देखलो बड़ी माँ की छुछियां तो अपना नाम भो जाये मुक़ाबला तो दूर की बात है खैर किस्मत से हमारा छोड़ू होना हमारे काम आ गया यहाँ पर…

थप थप थप की आवाज़ के साथ मेरी जांघें कालजंग की माँ के चूतड़ों से टकरा कर उनमे लहार पैदा कर रही थी..


इसके आगे क्या हुआ इसके part बी में जो की बहुत hi जल्द अपडेट मिलेगी अभी इतनी पोस्ट इसलिए कर रहा हु क्यूंकि आप सब से कमिटमेंट की थी तो पढ़ें और एन्जॉय करें.

धन्यवाद्
 


थप थप थप की आवाज़ के साथ मेरी जांघें कालजंग की माँ के चूतड़ों से टकरा कर उनमे लहार पैदा कर रही थी..





अपडेट 138 बी


कालक

मेरे हर झाके पर कालजंग की माँ के मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकल रही थी, उसकी गरम कासी हुई छूट मरने में मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा था..






पर अभी अपने मज़े से ज़्यादा मुझे किसी और की चिंता थी और वो थी मुक़ाबला जीतने की… मैंने सर घुमाकर अनुज और जग्गू की और देखा जो धोती के ऊपर से चुपके से अपने अपने लोदों को मसल रहे थे और उनसे समय पूछने का इशारा किआ तो अनुज ने तीन उंगलियां उठा कर हाँ में इशारा किआ मैं समझ गया की तीन मिनट हो चुके हैं तो मैंने कालजंग की माँ की छूट से लुंड निकल कर उसे जल्दी से घुमाया और फिर नीचे की और बिठा दिया और बैठते hi बिना किसी समय गंवाए अपने लुंड को उसके होंठों पर रख दिया.

मेरे लुंड का होंठों पर छूटे hi उसकी माँ ने अपने होंठों को खोल कर मेरे लुंड के टोपे को मुँह में भर लिए और चूसने लगी, इतने लोगो के बीच और खासकर अपने बेटे के सामने हुई चुदाई से वो भी उत्तेजित हो गयी थी इसलिए वो पूरी लगन से मेरा लुंड चूसते हुए मेरी आँखों में नशीली आँखों से देख रही थी…

मैं तो जन्नत में था इतने गरम मुँह में लुंड डालकर ऊपर से दो अंक भी मिल गए थे मैं ख़ुशी से कालजंग की माँ के सर को पकड़ा और अपने लुंड को उसके मुँह में अंदर बहार करने लगा…








वहीं मेरी ये क्रिया देखकर सभी पर कुछ न कुछ असर हो रहा था अनुज और जग्गू तो किसी तरह लुंड को दबाये हुए बैठे थे वहीं मंजू तै भी उत्तेजना में अपनी जांघों को आपस में रगड़ रही थी और सोच रही थी काश मेरा लुंड अभी उनकी खुजली मिटा पाटा, वहीं बगल में बैठी माँ को ये देखकर मेरे और उनके साथ बिताये गए पल याद आ रहे थे जब मैं उनके मुँह को भी ऐसे hi बेरहमी से छोड़ता हूँ तो उन्हें कैसा महसूस होता है… मौसी के मन में अजीब उधेड़बुन चल रही थी एक तरफ तो उन्हें ख़ुशी थी की कर्मा को अंक मिल रहे थे वहीं उन्हें न जाने क्यों कालजंग की माँ से जलन हो रही थी… और ऐसा क्यों हो रहा था वो खुद भी नहीं समझ प् रही थी वो ध्यान से कर्मा के तगड़े लुंड को उस औरत के मुँह में अंदर बहार होते हुए देख रही थी और सोच रही थी अगर कर्मा का लुंड मेरे मुँह में जायेगा तो मुझे कैसा लगेगा, क्या मैं इतना अंदर तक ले पाऊँगी, कितना बड़ा और मोटा है कर्मा का लुंड देखो कैसे उसकी आँखों से आंसू निकलवा दिए, कैसा स्वाद होगा कर्मा के लुंड का… ये ख्याल आते hi मौसी ने खुद को झटका दिया और सोची छे की क्या सोच रही हूँ मैं मेरा बीटा है वो..

मैंने कालजंग की माँ के सर को पकड़ा और उसके मुँह को छोड़ने लगा और फिर अपने लुंड को जड़ तक उसके मुँह में घुसा दिया तो आअह्ह्ह्ह क्या गरम एहसास था उस आनंद से मेरा सर ऊपर उठ गया पर तभी मेरी नजर चित्रावती पर चली गयी वो मुझे बिना किसी भाव के आँखें फाड़ कर देख रही थी मैं जैसा था वैसा रुक गया,. मुझे चिंता होने लगी की ये मेरे बारे में क्या सोच रही है अब, न जाने आगे बात भी करेगी या नहीं, मैं यही ख्यालों में डूबा हुआ था की नीचे कालजंग की माँ ने मुझे मेरी जांघ पर मारा और वो चटपटा रही थी क्यूंकि तबसे मैंने उसके सर को पूरी तरह लुंड पर दबा रखा था और मेरा लुंड जड़ तक उसके गले में फंसा हुआ था… मैंने लुंड को उसके मुँह से बहार खींचा तो लुंड के निकलते hi वो बुरी तरह खांसने लगी साथ hi आँखों से आंसुओं की धरा बाह रही थीवो बुरी तरह हांफ रही थी …

एक दो पल बाद मैंने लुंड को दोबारा उसके मुँह में घुसा दिया और फिर से जड़ तक घुसाने के बाद बहार निकला और अनुज की और देखा तो उसने इशारे से 2 का इशारा किआ, मतलब अभी एक मिनट बचा था तो मैं उसका सर पकड़कर लम्बे लम्बे झटको से उसका मुँह छोड़ने लगा मैंने नजर घुमाकर तालाब में देखा तो कालजंग बड़ी माँ को छोड़ चूका था और मुद कर बापिस मेरी तरफ आ रहा था, मतलब समय काम था, मैं उसकी माँ का मुँह लगातार चोदे जा रहा था…








मैंने बापिस अनुज की और देखा तो उसने हाँ में सर हिलाया तो मैंने एक बार कालजंग की और देखा वो आधे से ज़्यादा रास्ता पार कर चूका था, और गुस्से से मेरी तरफ देख रहा था, मैंने एक बार पूरा लुंड उसकी आँखों में देखते हुए उसकी माँ के गले तक डाला और कुछ पल रुकने के बाद निकाल लिए, मेरा लुंड पूरा उसके थूक से लथपथ होकर बहार निकला.. मैंने जल्दी से ककम( कालजंग की माँ) को पकड़ कर घुमाया और वहीं पर घोड़ी बना दिया, मैंने अपना लुंड पकड़ा और उसके पीछे जगह ली तो मुझे आवाज़ सुनाई दी.. nahiiiiiiiiiiiiiiii रुक्खक्क्क्क जाआ…

मैंने मुद कर देखा तो वो कालजंग था जो मुझे रुकने को बोल रहा था, पर मैंने बापिस अपना ध्यान उसकी माँ के बड़े और गोल मटोल चूतड़ों पर केंद्रित किआ, दोनों चूतड़ों के बीच झांकता गांड का छेड़ बेहद कैसा हुआ लग रहा था मानो जैसे इसमें आज तक कुछ गया hi नहीं है… जिसे देखकर मेरे मन में भी उसे भोगने की और लालसा होने लगी…






पीछे से लगातार कालजंग रुकने को बोले जा रहा था…

मैंने अपने लुंड को पकड़कर ककम के गांड के छोटे से छेड़ पर लगाया और थोड़ा सा धक्का दिया hi था कोई भरी सी चीज़ मेरी पीठ से आकर टकराई, और मेरी चीख निकल गयी साथ hi पीठ पर टकराने की वजह से मेरा संतुलन बिगड़ा और मैं आगे की और गिरा और मेरा वजन ककम के ऊपर पड़ा तो भी गिरी और फिर एक और चीख निकली जो ककम की थी, क्यूंकि गिरने की वजह से मेरा लुंड उसकी गांड को खोलता हुआ आधा उसके गांड के कैसे हुए छेड़ में घुस गया था…

मेरे लगते hi सब तरफ से आवाज़ें आने लगी..

माँ और मौसी बुरी तरह चिल्लाये: कर्मा बेटाःह्ह्ह्हह्ह वहीं तै भी…. लललललाहा..

अनुज और जग्गू तो कर्माह और भैया बुलाते हुए मेरी तरफ दौड़े… चित्रावती भी चिल्लायी : कर्माह

मैं वैसे hi ककम के ऊपर पड़ा हुआ था मेरा लुंड उसकी गांड में धंसा हुआ था, और वो नीचे से सुबक रही थी, पर अब पीठ में चोट लगने का असर हो रहा था और तेज़ दर्द शुरूहो गया था, दर्द के कारण मेरा लुंड भी सिकुड़ने लगा… अनुज और जग्गू ने मुझे पकड़ कर उठाया तो पक्क्क की आवाज़ के साथ मेरा लुंड ककम की गांड से निकल गया… उसकी गांड का छेड़ खुला सा रह गया थोड़ी देर के लिए फिर बंद होने लगा…

अनुज और जग्गू ने मुझे वहीं बिठा दिया माँ मौसी तै और चित्रावती भी तब तक भाग कर मेरे पास आ चुके थे, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने मेरी पीठ के दो टुकड़े कर दिए हो… मैंने ये जान्ने की कोशिश की ाखिए हुआ क्या था तो मुद कर देखा तो सारा मामला समझ आ गया…

कालजंग जो मुझे रोकने की कोशिश कर रहा था और मैं नहीं रुका तो उसने एक बड़ा सा पत्थर फ़ेंक कर मेरी पीठ पर दे मारा था और अभी वो नाव से उतर कर मेरी और गुस्से में बढ़ रहा था उसे ऐसे आता देख माँ और मौसी घबरा रही थी वहीं अनुज और जग्गू उससे भिड़ने को तैयार थे, अब वो उसके सामने कितनी देर ठहर पाते ये कहना थोड़ा मुश्किल था…

गुस्सा तो मुझे भी बहुत आ रहा था कालजंग पर, कालजंग हमारे करीब आकर जैसे hi बड़ा तभी एक आवाज़ और आई: कालजंगगगग

ये आवाज़ चित्रावती की थी जो उसके और हमारे बीच में आकर कड़ी हो गयी थी उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था, पहली बार उसे मैं इस तरह देख रहा था, उसे देखकर कालजंग भी रुक गया और कालजंग जे चेहरे पर भी मैंने चित्रावती का दर देखा… वो कालजंगगगग को दांत रही थी या गुस्से में कुवह तो बोल रही थी पर मेरा ध्यान उसपर hi था मुझे एक शब्द तक सुनाई नहीं दिया उसने जो भी कालजुंगा से








इतनी खूबसूरत माँ की गुड़िया जैसी लड़की इतना गुस्सा भी कर सकती है मुझे तो लगा hi नहीं था…

कालजंग कुछ पल ठहरा रहा और फिर एक तरफ जहाँ उसकी माँ थी वहां गया जो अब भी लेती हुई थी कालजंग उसके पास जाकर बैठ गया और उसके नंगे शरीर पर प्यार से हाथ फेरने लगा और तभी उसकी नजर अपनी माँ के थोड़े से खुले और छिले हुए गांड के छेड़ पर गयी तो उसकी आँखों में वक बार फिर से गुस्सा भर आया और उसने गुस्से से मेरी तरफ देखा पर किआ कुछ नहीं बस अपनी माँ को सहलाता रहा….

माँ ने वहीं बैठकर मुझे वहीं लिटा दिया और मेरा सर अपनी गॉड में रख लिए, माँ और मौसी दोनों की आँखों से आंसू बाह रहे थे..

माँ- कर्मा बीटा तू ठीक है न, दर्द हो रहा है..

मौसी तो बस मेरा नाम लेकर रोये जा रही थी…

वहीं तै मेरे पास बैठी बैठी कालजंग को गरियाने पर लगी हुई थी..

में- अरे माँ मौसी चुप हो जाओ तुम लोग इतनी भी नहीं लगी है मुझे…

माँ- तुझे लगी है तू ऐसे hi बोल रहा है..

में- अरे माँ मेरी प्यारी माँ बस चुप हो जाओ और मौसी तुम भी.. मैंने हाथ बढाकर मौसी और माँ दोनों के चेहरों को छुआ और उन्हें छुपाने लगा…

इतनी देर में बड़ी माँ भी घूम कर तालाब के इस तरफ आ गयी थी…

आते hi वो अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गयी उनकी आँखों में गुस्सा साफ़ देखा जा सकता था उनका चेहरा बिलकुल लाल हो चूका था .

बड़ी माँ- कर्मा उसकी माँ और कालजंग और उसकी माँ के अलावा सभी अपनी अपनी जगह पर बैठ जाएँ..

बड़ी माँ ने बोलै,

बड़ी माँ- अभी.

बड़ी माँ का गुस्सा उनकी आवाज़ में साफ़ नजर आ रहा था तो उनके आदेश को टालने की किसी ने हिम्मत नहीं की और सब धीरे धीरे उठ कर अपनी जगह जाने लगे मौसी नहीं जा रही थी पर तै उन्हें पकड़ समझते हुए ले गयी…

जब सब बापिस अपनी जगह बैठ गए तो बड़ी माँ ने बोलना शुरू किआ: हम हमेशा से hi निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मुक़ाबले के पक्षधर रहे हैं, अभी जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था, और उसका हमें खेद भी है…

साथ hi हम कर्मा और उसके परिजनों से इसके लिए खशमा भी मंगाते हैं.. हम सुनिश्चित करेंगे की आगे से उन्हें तकलीफ न हो और मुक़ाबला बिना किसी अड़चन के संपन्न हो.. ये कहकर उन्होंने एक दासी को इशारा किया जो की तुरंत चली गयी..

उन्होंने कालजंग की और नजर डाली और गुस्से से बोली- जो दोषी है उसे सजा दी जाएगी, ये मुक़ाबला संपन्न होने के बाद सबके बीच यहीं सजा दी जाएगी…

कालजंग इस मुक़ाबले से निष्काषित किआ जाता है मुक़ाबला फिर से होगा, और इस बार कर्मा के विरुद्ध कौन खड़ा होना चाहता है,

बड़ी माँ ने सबसे पुछा तो कई सरे लोग हाथ उठा रहे थे पर तभी एक आवाज़ आई जिसे सुनकर सब चौंक गए यहाँ तक की बड़ी माँ भी….

चोदामपुर

पापा का दिन जहाँ शहर में खरीददारी करते हुए निकल रहा था वहीं ससुर और बहु खेत पर समय निकल रहे थे, राजपाल ताऊ फावड़े से पानी का रास्ता साफ़ कर रहे थे, वहीं भाभी आस पास निहार रही थी… कुछ hi देर बाद जब पानी का रास्ता बन गया तो ताऊ ने पानी चलवा दिया, और पानी मेड से होते हुए खेत में बहने लगा भब्बी तुबेल चलते hi उसके पास भाग जार पहुंच गयी और बिलकुल बच्चों की तरह पानी से खेलने लगी…

ताऊजी भी अपनी बहु के बचपने को देखकर बिना मुस्कुराये न रह सके..

इसी बीच भाभी मेड में आते हुए पंक में उतर गयी उन्होंने अपनी साड़ी को थोड़ा ऊपर उठा लिए पानी का ठंडा एहसास पैरों पर उन्हें बहुत ाचा लग रहा था वहीं फावड़ा चलते हुए ताऊजी की नजर अपनी बहु पर पड़ी तो ठहर गयी… गोर चिकने पेअर पर साथ hi उन्हें भाभी की चिकनी गदराई कमर और गोल नाभि भी नजर आने लगी जिसे देखकर ताऊजी का गाला एक पल के लिए सूख hi गया पर अगले hi पल उन्होंने खुद को दुत्कारा छे की क्या देख रहा है बहु है तेरी वो..

और ताऊजी ने अपनी नजरें फेर ली, पर मन कहाँ मंटा है कुछ पल तो काबू किआ पर फिर से नजरें उसी नज़ारे पर टिक गयी…

मन में ख्याल आने लगे की सच में बहु है बड़ी मादक, और भाग नालायक है जो ऐसी बीवी के होते हुए दुसरे नशे में डूबा रहता है.. कितना मादक जिस्म है हाय ते कमर और नाभि कितना मजा आता होगा इन्हे चाटने में, मुझे मौका मिले तो घंटों इस नाभि में जीभ डालकर चूसता रहूं…








तभी भाभी की नजर अपने ससुर पर गयी तो पाया वो उन्हें hi देख रहे हैं, और जब उन्होंने ध्यान से देखा तो पाया वल उनकी कमर के हिस्से की तरफ है ये देख वो थोड़ा नुस्क़ुरै और फिर ताऊजी से पुछा क्या हुआ पापाजी?

राजपाल- अरे कुछु नहीं बहु तुझे ऐसे खेलते देख ाचा लग रहा है..

भाभी- हमें भी बहुत मजा आ रहा है पपपजि

राजपाल- खेल बहु तू आराम से..

ये कहकर ताऊजी अपने काम में लग गए पर साथ hi भाभी के बदन पर भी नजर लगातार बनाये हुए थे… ऐसे hi खेल चलता रहा भाभी लगातार पानी से खेलती रही और थोड़ी hi देर में उनकी साड़ी और कपडे भीग चुके थे..

साड़ी उनके मादक जिस्म से पूरी तरह पारदर्शी होकर चिपक रही थी और उनके हर अंग को और लुभावना करके प्रदर्शित कर रही थी..






इधर ताऊजी जो तुबेल बंद करने गए थे जब बापिस आकर बहु को इस हाल में देखा तो उनकी आँखें जैम सी गयी साथ hi धोती में भी तनाव आने लगा, मन को खुद से समझने लगे की ये सब गलत है पर आँखें थी की हटने का नाम hi नहीं ले रही थी…

इधर भाभी ने ससुरजी को देखा तो जल्दी से अपने कपडे सही करने लगी पर साड़ी सही होने की जगह उलझ रही थी इधर ताऊजी के कदम खुद बा खुद भाभी की और बढ़ने लगे, वहीं भाभी अपने पल्लू से लड़ रही थी, उन्हें पता hi नहीं चला की कब उनके ससुरजी उनके पीछे आकर खड़े हो गए, पैरों की आहात से जब उन्होंने पलट कर देखा तो पाया ससुरजी कुछ कदम दूर सामने hi खड़े हैं पर वहीं ताऊजी तो जैसे hi बहु मुड़ी उस नज़ारे को देखकर सब भूल hi गए और जय करें नज़ारा hi कुछ ऐसा था पल्लू नीचे पड़ा हुआ था, पूरा ब्लाउज भीगा था जिसमे से ब्रा में झांकती हुई बड़ी बड़ी छुछियां बिलकुल बाहर आने को बेताब थी…






ताऊजी तो ये नजारा देख बस सुन्न रह गए वहीं बेचारी भाभी शर्मा रही थी…

भाभी- वो पापाजी कपडे गीले हो गए तो इसलिए ठीक कर रही हूँ..

राजपाल- कोई बात नहीं बहु आराम से करले..

पर इसके बाद भी ताऊ ने न तो नजरें अपनी बहु से हटाई और न hi खुद मुड़े, भाभी ने एक पल इंतज़ार किआ की ससुरजी नुदे पर ऐसा न होने पर उन्होंने कुछ सोचा और फिर ऐसे hi साड़ी को झटका और फिर पल्लू को निचोड़ने लगी .. दोनों को hi पता था की ये गलत है और ससुर बहु की मर्यादा के खिलाफ है पर किसी को परवाह नहीं थी दोनों पर hi उत्तेजना का नशा चढ़ा हुआ था..

उधर ताऊजी को तो होश hi नहीं था जो वो कुछ और करते भाभी को भी अपने ससुर के सामने ये सब करने पर एक अलग सा रोमांच प्राप्त हो रहा था..

इधर भाभी ने जब अपने कपडे ठीक कर लिए तब जाकर ताऊजी ने अपनी नजर हटाई और फिर भाभी बोली- चलिए पापाजी खाना निकलडेति हूँ..

राजपाल- हाँ बहु.. लगादे .

इसके बाद राजपाल खाने के लिए बैठ जाते हैं और भाभी खाना लगाने लगती है.

सरलपुर गाओं

रमन: अरे समझो न ये हमारे लिए बहुत ज़रूरी है, तुम नहीं चाहती हम बड़े अफसर बनें और 3 महीने की hi तो बात है…

रिम- अभी शादी हुए भी तीन महीने नहीं हुए और तुम तीन महीने के लिए जाने की बात कर रहे हो…

रमन- हाँ मेरी जान जनता हूँ, पर तुम भी समझती हो न… मैं तुम्हे साडी खुशियां देना चाहता हूँ और उसके लिए ये बहुत जरूरी है..

रिम- पर तुम ये भी जानते हो न मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊँगी..

रमन आगे बढ़कर उसे खुद से चिपका लेता है और उसका एक हाथ पकड़ कर नीचे लेजाते हुए अपने पाजामे के सामने रखता है और बोलता है :- ाचा मेरे बिना या इसके बिना…

रिमी- दोनों के.. और ये बोलकर पाजामे के ऊपर से hi रमन के लुंड को पकड़ लेती है… और सहलाने लगती है..

रमन: मेरी कमी तो मैं आकर मिटा दूंगा पर इसकी कमी पूरी करने का तरीका मैंने तुम्हे बताया hi है…

रिम- धत्तत्त बड़े ख़राब हो तुम .

रमन- ख़राब क्या बिलकुल सही है छोटी सी ज़िन्दगी है मज़े लो..

रिम- तो उसके बदले में आपको क्या करना है ये भी तो मैं बता चुकी हूँ…

रमन- वो थोड़ा मुश्किल है…

रिम- मैं मदद करू तो बिलकुल नहीं…

रमन- क्या सच में तुम मदद करोगी…

रिम- और नहीं तो क्या अभी तुम्हारे जाने में कितने दिन हैं..

रमन- 2 हफ्ते क्यों?

रिम- तो बस हमारे पास यही दो हफ्ते हैं अगर कामयाब हुए तो हुए नहीं तो कोई बात नहीं..

रमन- क्या सच में तुम राज़ी हो?

रिम थोड़ा रमन की तरह hi एक्टिंग करते हुए बोलती है: छोटी सी ज़िन्दगी है मज़े हेहेहे..

रमन उसे ख़ुशी से गले लगाकर उसके होंठों को चूमलेता और फिर धीरे धीरे दोनों गरम होने लगते हैं और कुछ देर बाद hi रिम की साड़ी और पेटीकोट उसकी कमर पर इकठा था और वो बिस्तर पर घोड़ी बानी हुई थी और रमन का लुंड उसकी छूट में सटासट अंदर बहार हो रहा था..








अरे हाँ ये रिम और रमन को आपने न पहचाना हो तो मैं बताता हूँ,

रिम यानि रिमझिम कर्मा की बड़ी बुआ की लड़की जिसकी शादी में कर्मा गया था और वहां चुदाई का जो महोत्सव शुरू हुआ था आप लोग भूले तो नहीं होंगे… और रमन सिंह हैं उसके पति पुलिस वाले हैं, अभी तो सी के पद पर हैं पास hi के शहर के ठाणे में पर तरक्की के लिए आवेदन किआ था परीक्षा में भी उत्तीर्ण हुए तो अब ट्रेनिंग के लिए तीन महीने के लिए बुलाया है उसी बात पर उनकी पत्नी थोड़ा रूठी हुई हैं…

बाकि रही बात कौनसा प्लान है जो ये दोनों पूरा करना चाहते हाँ वो भी एक निश्चित समय में अब वो तो समय hi बताएगा…

खैर आगे क्या होगा ये सब अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.

 
सुबह की कोशिश है भाई लोग
 
कालजंग इस मुक़ाबले से निष्काषित किआ जाता है मुक़ाबला फिर से होगा, और इस बार कर्मा के विरुद्ध कौन खड़ा होना चाहता है,

बड़ी माँ ने सबसे पुछा तो कई सरे लोग हाथ उठा रहे थे पर तभी एक आवाज़ आई जिसे सुनकर सब चौंक गए यहाँ तक की बड़ी माँ भी….



अपडेट 139


कालक

ये आवाज़ और किसी की नहीं बल्कि चित्रावती की थी,

जिसे सुनकर सब हैरान रह गए..

चित्रावती- हाँ हम करेंगे मुक़ाबला,

बड़ी माँ- ये क्या बोल रही हो बेटी, तुम क्यों यहाँ इतने लोग हैं और कोई भी कर सकता है

चित्र:- नहीं बड़ी माँ हमें करने दीजिये, हम सच में करना चाहते हैं.

बड़ी माँ ने एक पल को कुछ सोचा और फिर मुस्कुराई,

बड़ी माँ- ठीक है, कर्मा के मुक़ाबले में अब चित्रावती होगी..

ये सुनकर मुझे समझ नहीं आ रहा था की खुश होऊं या या दुखी, क्यूंकि बुद्धि की बात थी तो एक बार को कालजंग को हराना आसान था पर चित्रावती को नहीं वही मेरी तरह सब लोग थोड़ी असमंजस में थे…

तभी जिस सेविका को बसदि माँ ने इशारा किआ था वो एक कटोरी में कुछ लेकर आई तो बड़ी माँ ने मेरी तरफ इशारा किआ.. सेविका ने वो कटोरी ला कर माँ को दी और माँ समझ गयी क्या करना है उन्होंने मेरी पीठ पर उस कटोरी में से लेप लगाना शुरू कर दिया, मुझपर एक बार नजर मार कर बड़ी माँ ने बोलना शुरू किआ..

बड़ी माँ- तो अब से थोड़ी देर बाद मुक़ाबला शुरू होगा तब तक हम चाहते हैं कर्मा का उपचार हो जाये..

में- जहाँ से मुक़ाबला ख़त्म हुआ था वहीं से शुरू होगा क्या?

बड़ी माँ- नहीं मुक़ाबला शुरू से होगा पर क्यूंकि तुम्हारे साथ गलत हुआ है तो तुम्हे एक परिस्थिति चुनने का अवसर मिलेगा…

अब साला और टेंशन अब क्या चुनना होगा क्या नहीं..

में- मतलब

बड़ी माँ- पहले तुम उपचार करवालो फिर समझा दिया जायेगा …

तो कुछ देर के लिए सब इधर हो कर बातें करने लगे इधर माँ मेरी पीठ पर लेप लगा रही थी,

बड़ी माँ भी उठ कर चली गयी खैर थोड़ी देर बाद hi उस लेप ने जादुई काम किआ और मेरी पीठ का दर्द तो बिलकुल गायब hi हो गया, और ऐसा लग रहा था जैसे मुझे कुछ लगी hi नहीं…

इधर हम सब ये सोचने में लगे थे की चित्रावती से कैसे मुक़ाबला करना है…

तभी बड़ी माँ बापिस आकर बैठ गयी और उन्हें देखकर बाकि सबने भी अपनी जगह ले ली..

सब का ध्यान बड़ी माँ की तरफ था तो बड़ी माँ ने बोलना शुरू किआ: तो अभी जब कर्मा ठीक है तो हम आगे बढ़ सकते हैं..

तो तुम्हारे साथ जो हुआ उसके लिए हमें दुःख है पर अब मुक़ाबला दोबारा से शुरू होगा अन्यथा एक सच्चा और निष्पक्ष मुक़ाबला नहीं हो पायेगा.. क्या सब लोग मेरी इस बात से सहमत हैं?

सबने हाँ करके बड़ी माँ को जवाब दिया..

में- बढ़ी माँ मुझे एक असमंजस है की अंक अर्जित करने के लिए मुख मैथुन या गुदा मैथुन या योनि मैथुन होता है तो चित्रावती ये कैसे करेगी?

मेरा प्रश्न सुनकर सब के चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गयी… चित्रावती भी हँसते हुए मेरी तरफ देखने लगी

बड़ी माँ- मैथुन के लिए उँगलियों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है

बड़ी माँ ने मुस्कुराते हुए कहा..

चित्रावती- तुम हमारी फ़िक़र छोडो बस इतना देखना की मुक़ाबला बीच में न छोड़ दो..

में- बीच में छोड़ने का सवाल hi नहीं उठता है..

चित्रावती- वो तो देख लेंगे….

बड़ी maa-bahut बढ़िया तो अब मुक़ाबले के लिए आगे बढ़ा जाये, तो मुक़ाबला बिलकुल पहले की तरह hi होगा पर क्यूंकि कर्मा के साथ अनुचित हुआ तो हम उसे एक बढ़त देंगे वो भी उसकी पसंद की,

कर्मा के पास ये अधिकार है की वो खेल के जो शुरू के दो पड़ाव थे उनमे से एक को पिछले की तरह रख सकता है, जैसे अगर वो चाहे तो सिक्का नहीं उछाला जायेगा, यवो चाहे तो साथियों यानि सवारियों का चुनाव दोबारा कर सकते हैं…

बड़ी माँ की बात सुनकर मैं और बाकि सब सोच में पद गए क्यूंकि दोनों hi ज़रूरी थे किस्मत से पिछली बार सिक्का पक्ष में गिरा था पर ज़रूरी नहीं इस बार भी ऐसा हो और दूसरा ये भी है की अगर साथी बदल जायेंगे तो माँ और मौसी की भी परेशानी ख़तम हो जाएगी.. दूसरी बात जो मैंने सोचा था उसके हिसाब से मुझे बाद में hi जाना चाहिए था…

मैंने माँ से पुछा और बाकि सब से तो उन्हें यही सही लगा की सिक्का दोबारा न उछाला जाये,

पर साथ hi माँ ने बोलै की ऐसा हो जाये की सवारियों को चुनना खुद hi हो जाये तो साडी परेशानियां hi ख़त्म

मौसी- हाँ ये तो सबसे सही होगा कर्मा तू यही बोल कर देख की अपनी सवारियों का चुनाव सैनिक खुद करेगा.

में- ठीक है मैं कोशिश करूँगा माँ उन्हें मानाने की.

फैसला करने के बाद मैंने बड़ी माँ को बता दिया साथ hi एक बात भी बोली- बड़ी हम लोग नहीं चाहते दोबारा सिक्का उछाला जाये, पर आपसे एक विनती है क्या ऐसा हो सकता है की अपनी अपनी साथियों यानि सवारियों का चुनाव हम खुद करें…

बड़ी माँ- हो सकता है पर अगर दोनों पक्ष सहमत हो तो..

मैंने चित्रावती को देखा उसने भी मेरी तरफ देखा,

बड़ी माँ- चित्रावती क्या तुम सहमत हो…

चित्रावती- हाँ बड़ी माँ मुझे कोई परेशानी नहीं है मैं सहमत हूँ,

पर अभी ये अचे से सोचले बाद में कोई नियम या फैसला बदलने को न कहें और साथ hi मुक़ाबले को पूरा खेलेंगे तो hi मुझे सहमत हूँ.

बड़ी माँ- क्या तुम चित्रावती की बात से सहमत हो कर्मा, इसके बाद कोई फेरबदल नहीं होगा किसी भी पक्ष से और अब तुम्हे मुक़ाबला पूरा करना होगा.

साडी चीज़ें तो पक्ष में लग रही थी बस मुझे चित्रावती की मुस्कान से दर लग रहा था पर ऐसा कुछ मुझे समझ नहीं आ रहा था जिससे कोई परेशानी हो और हम बीच में मुक़ाबला छोड़ें..

मैंने माँ और बाकि सब की तरफ देखा तो वो लोग भी राजी दिखे तो नैने बड़ी माँ को आगे बढ़ने के लिए सहमति दी..

Chitrawati-bahut बढ़िया अब होगा असली मुक़ाबला

ये कहकर वो मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई पर उसकी इस मुस्कराहट में कुछ अलग था.

बड़ी माँ- ठीक है तो सवारियों का चुनाव दोबारा होगा और हम आपसे विनती करते हैं की खेल को अचे से चलने के लिए हमें न चुनें और हमें मुक़ाबले का निरिक्षण hi करने दें…

सब इस बात से सहमत दिखे.

बड़ी माँ- कर्मा अभी तुम पहले अपनी सवारियों को चुनो…

में- ग बड़ी माँ,

मैंने एक बार चित्रावती को देखा तो वो मुझे hi देख रही थी पर एक चमक सी थी उसकी आँखों ने और चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान, जैसे वो कुछ छुपा कर बैठी हो और दिखते hi कुछ बड़ा करने वाली हो…

मैंने आसपास नज़र घुमाई और देखा तो गाओं की hi एक सुन्दर सी औरत थी उसे चुना, और फिर दुसरे नंबर पर मैंने सबको चौंकाते हुए KKM(Kaaljung की माँ) को चुना.

ककम और बाकि सब को थोड़ी हैरानी जरूर हुई पर नियम तो नियम हैं.

तो वो दोनों औरतें मेरे बगल में आकर कड़ी हो गयी कालजंग की माँ शायद मुझसे थोड़ा नाराज थी पर अभी कुछ नहीं बोल सकती थी.

में- मैंने अपना चुनाव कर लिए है बड़ी माँ.

बड़ी माँ- ठीक है अब चित्रावती तुम अपनी सवारियों को चुनो.

इस बात पर चित्रावती ने मुस्कुराकर मेरी तरफ देखा, और फिर अपनी नजरें इधर उधर घुमाई और फिर एक तरफ उंगली उठा कर बोली- हम आपको चुनते हैं..

माईनस सर घुमाकर उसकी उंगली का इशारा देखा तो चौंक गया मेरे साथ साथ बाकि सब भी चौंक गए.

में- ये कैसे हो सकता है वो तो..

चित्रावती- क्यों नहीं हो सकता, हम जिसे चाहे सुन सकते हैं, आइये आप.

चित्रावती ने एक बार फिर बोलै उंगली का इशारा करके, उसकी उंगली और किसी की नहीं बल्कि मेरी मौसी की तरफ थी वो अपनी सवारी के रूप में मेरी मौसी को चुन रही थी, क्या चाल खेली थी उसने ये सोचकर hi मेरा सर घूमने लगा, मौसी को तो जैसे कुछ समझ hi नहीं आ रहा था ये क्या हुआ, वो धीरे से उठी और मेरी और बाकि सब की और देखते हुए चित्रावती के पास आकर कड़ी हो गयी…

मैं तो ये सब सोचकर hi पागल हुए जा रहा था की ये मैंने पहले क्यों बही सोचा की वो ये भी कर सकती है..

बड़ी माँ- चित्रावती अपनी दूसरी सवारी चुनो…

अब उसकी उंगली दोबारा उठी और मैं उसकी चाल समझ चूका था तो मन hi मन सोच रहा था की जो मैं सोच रहा हूँ वो न हो..

पर जब उसकी उंगली एक जगह जाकर रुकी और मैंने देखा कहाँ तो मैंने सर पकड़ लिए अपना, अनुज और बाकि सब भी बिलकुल स्तभ्द थे उसकी उंगली जो मैं सोच रहा था उसी पर रुकी थी और वो थी मेरी माँ…

माँ भी बिलकुल हैरान परेशां सी मेरी तरफ देख रही थी वहीं मेरा सर चक्र रहा था, मैं खुद को कोस रहा था की मैंने ये बात क्यों नहीं सोची… इससे ाचा तो जब वो मेरे साथी hi थे तब था..

मौसी और माँ जब दोनों चित्रावती के पास जाकर कड़ी हो गयी तो उन्होंने आपस में कुछ बात की और माँ बोली:- बड़ी माँ हम कुछ देर के लिए आपस में बात करना चाहते हैं.

बड़ी माँ- मुझे कोई आपत्ति नहीं है बस एक बार चित्रावती से पूछ लो क्यूंकि अभी तुम उसकी साथी हो..

माँ और मौसी ने चित्रावती की और देखा और चित्रावती ने हाँ में सर हिला दिया..

माँ मौसी ने एक तरफ होकर मुझे बुलाया और बाकि अनुज जग्गू और तै भी वहीं आ गए हम सब इकठे हो गए…

मौसी- जीजी ये तो बहुत गलत हुआ उस कमीनी चित्रावती ने हम दोनों को चुन लिए है इसका मतलब..

माँ- गलत तो है पर अभी क्या करें?

मौसी- क्या करें क्या जीजी, तुम समझ भी रही हो अगर आगे खेले तो कर्मा को हमारे साथ भी वो करना होगा जो उसने ककम के साथ किआ… और वो कितना गलत होगा जानती हो na,wo हमारा बीटा है कैसे हम उसके साथ..

ये बोलते हुए मौसी रुक गयी हालाँकि मन में वो हैरान थी की ये सब सोचकर जो की इतना गलत है उन्हें उत्तेजना क्यों महसूस हो रही है..

माँ ने मेरी और आँखों में देखा… हम दोनों पहले hi माँ बेटे के बीच की मर्यादा को लाँघ कर बहुत आगे बढ़ चुके थे पर ये बात सिर्फ हम दोनों जानते थे और बात अकेले की होती तो मैं और माँ ख़ुशी ख़ुशी एक दुसरे पर चढ़ जाते पर यहाँ बात थी सबके सामने करने की, और इससे भी बड़ी बात अपने परिवार के सामने करने की, कैसे माँ या मौसी मुझसे सम्भोग करलेती ये जानते हुए की वहीं अनुज और बाकि सब हमें बैठकर देख रहे हैं..

मंजू तै – ये सही कह रही ये बिलकुल ठीक नहीं है बन्नो आज अगर ये हो गया तो सरे नाते रिश्ते बदल जायेंगे, आज कर्मा तुम्हार साथ तो कल जग्गू फिर हमारे साथ..

ये कहते hi मंजू तै की छूट गीली होने लगी, अनुज और जग्गू पूरी बात समझ चुके थे, पर उन्हें भी समझ नहीं आ रहा था क्या करें..

अनुज को एक अलग एहसास हो रहा था कैसा लगेगा उसे जब उसका भाई उसकी माँ या मौसी के साथ वो सब करेगा इस ख्याल से hi उसके शरीर में सिरहन हो रही थी, साथ hi उसका लुंड भी तन रहा था… वो जनता था ये गलत है नहीं होना चाहिए पर उसे ये भी था की अगर ऐसा हो तो क्या होगा…

जग्गू के मन में भी उथल पुथल थी की कैसा लगेगा अगर उसका दोस्त अपनी सगी माँ या मौसी के साथ ये सब करेगा, ये सोचकर hi वो उत्तेजित हो रहा था, दोनों hi औरतें बेहद कामुक और खूबसूरत थी बिना कपड़ों के या सम्भोग करते हुए किसी एक को देखना कितना दिलचस्प होगा..

मेरे मन में भी यही चल रहा था इतने लोगो के बीच माँ या मौसी के साथ वो सब करने के ख्याल से hi मैं उत्तेजित हो रहा था, पर फिर बाद में क्या होगा और उसका असर मेरे परिवार पर क्या पड़ेगा उसे लेकर चिंतित भी था…

सबके मन में एक अजीब तरह का द्वंद चल रहा था, एक ऐसी परेशानी थी जिसका हल अभी किसीको नजर नहीं आ रहा था

में- काश मैंने अपनी बरी में आप दोनों को hi चुना होता.

मंजू तै- पर तुझे कौनसा पता था ये सब होगा, हम में से किसी ने ी नाही सोचा था.

माँ- हाँ बीटा तू खुद को दोष मत दे.

मौसी- इसमें तेरी क्या गलती…

जग्गू- मुक़ाबला छोड़ दें.

अनुज- पर मुक़ाबला छोड़ने के लिए पहले hi मन कर चुके हैं. सब ख़तम हो जायेगा.

मौसी- तो अभी क्या करें उनकी बात मान लें और बन जाएं पापी.

माँ- कुछ तो करना होगा

मौसी- पर क्या… हे भगवन कैसी मुसीबत में फंस गए यहाँ आकर,

मंजू तै- सब लोग सहमति से फैसला लेते हैं.. की आगे बढ़ें या नहीं..

Mausi-par इसमें क्या सहमति ये पाप है मर्यादा के खिलाफ है..

माँ- हम सबने hi कभी न कभी कुछ ऐसा करते hi रहते हैं जो मर्यादा के खिलाफ होता है.. भले hi हम उसे चुपके से बिना किसी के पता लगे करते हैं पर होता वो गलत hi है, तो सिर्फ इसीलिए ये गलत है की सबके सामने हो रहा है तो दोबारा सोचना चाहिए.

माँ की इस बात का सबके ऊपर अलग अलग असर हुआ

मौसी के मन में कर्मा के लुंड को देखकर आ रहे ख्याल आ गए वो सोचने लगी गलत तो वो भी है जब मैं कर्मा और अनुज से अपनी छुछियां चुस्वाति हूँ नंगी होकर सोती हूँ, अंताक्षरी वाली रात को हो न हो मैंने अनजाने में hi सही कर्मा या अनुज का लुंड भी चूसा था, गलत तो फिर ये सब भी है… और ये सब सोचते हुए उन्हें अपनी छूट में खुजली होती हुई महसूस हो रही थी…

मंजू तै भी सोचने लगी कैसे छुपकर उन्होंने मोटरसाइकिल पर कर्मा और उसके पापा के साथ मजे लिए, पहले बाप का लुंड चूसा फिर बेटे से छुड़वाया और फिर उस दिन कर्मा को नहलाते हुए रात में भी दोनों भाइयों से एक साथ चूड़ी ये सब पाप नहीं है या मर्यादा के खिलाफ नहीं है… और इससे भी बढ़कर अपने बेटे के साथ ये सब करने के ख्याल तो खुद बा खुद मेरे मन में आते हैं..

वहीं अपनी माँ की तरह जग्गू भी अपने किये हुए कांडों के बारे में सोचने लगा भाभी के साथ पल्ली के साथ चची के साथ कजरी के साथ ये सब कुछ गलत hi तो है पर वो बड़ी ख़ुशी से करता गया.. चची की बात सही है..

अनुज तो बस ये सोच रहा था की ये अगर होगा तो कैसा लगेगा उसे सही गलत की कोई फ़िक़र नहीं थी, और मन के एक हिस्से में वो छह भी रहा था की ऐसा हो, उसने सोचा जब बुआ, ममता चची, मंजू तै, चारु ममी, पल्ली, पूर्वी दीदी, भाभी, सबके साथ कर चुके हैं तो अगर माँ या मौसी के साथ कर भी लिए तो क्या होगा पर माँ के साथ सोचने से hi उसका लुंड बुरी तरह अकड़ने लगा..

माँ और मुझे तो पहले hi पता था सब तो हम बस इस सोच में थे की अगर हम करेंगे भी ऐसा कुछ तो सबके सामने कैसा लगेगा, क्या प्रतिक्रिया होगी सबकी…

में- देखो अभी ज़्यादा समय हम लोग नहीं ले सकते जो फैसला लेना है अभी लेना होगा.

Mausi-kkya फैसला लें फिर..

में- ऐसे तो हम सही गलत की बहस में hi पड़े रहेंगे.. मैंने एक उपाय सोचा है..

Maa-kya ऊपर

सब मेरी तरफ देखने लगे…

में- मत लेते हैं, जो चाहता है हम आगे बढ़ें वो एक बार मत देंगे जो नहीं चाहते वो एक वार जहाँ मत ज्यादा हुए वो हम करेंगे..

मंजू तै- हाँ ये सही रहेगा, क्यों शालू?

मौसी- क्या बताएं जीजी अब और जुच समझ नई आ रहा तो ये hi ठसक है. काम से काम रक का तो फैसला नहीं होगा..

माँ- हाँ मुझे भी ठीक लग रहा है

Jaggu-mujhw भी

अनुज- मुझे भी..

में- ठीक है तो जो चाहते हैं हम आगे बढे मुक़ाबले में वो अपने अपने हाथ उठाएं…

मेरे ये कहते hi सबसे पहले अनुज ने हाथ खड़ा किआ और फिर जग्गू ने, जग्गू को एक बार तै ने देखा और फिर कुछ सोचकर अपना हाथ उठा दिया..

सब माँ और मौसी की तरफ देखने लगे, धीरे धीरे माँ ने हाथ उठाया, तो अनुज की आँखें बड़ी हो गयी और माँ के साथ साथ मौसी ने भी.. बस मैं बचा था तो मैंने भी हाथ उठा लिए .

में- तो सब यही चाहते हैं हम मुक़ाबले में आगे बढ़ें,

सब मत देने के बाद थोड़ा नज़रें मिलाने मेंएक दुसरे से झिझक रहे थे.. शायद सब यही चाहते थे पर एक दुसरे के सामने जाहिर होने से शर्मा रहे थे,

Me-theek अब ये फैसला तो जो गया की क्या करना है अब बहुत ज़रूरी बात सबको ध्यान में रखनी है, अब से लेकर मुक़ाबला ख़त्म होने तक जो भी होगा वो सिर्फ मुक़ाबले के लिए होगा तो हम सभी ये कोशिश करेंगे की इसके ख़त्म होने के बाद हम सब इसे भूल जाएं इसकी बात या जीकर फिर आपस में या किसी और सा न करें तो ाचा होगा क्यूंकि बाद में इसका असर गलत भी पद सकता है… .

माँ- बिलकुल सही कह रहा है कर्मा, जो होगा यहाँ होगा और यही छोड़कर हमें जाना होगा, अभी सिर्फ अपने मकसद के लिए हमने ये फैसला लिए है..

मंजू तै- हैं बन्नो ये सब याद रखकर जिंदाहि भर का बोझ नहीं रखना छाती पर.

मौसी- आप सब ठीक कह रहे हो न जाने ये. सब सोचते हुए हम लोग बापिस जाकर किसी से नजरें भी नहीं मिला पाएंगे.. बच्चों तुम लोग ये खासकर ध्यान रखना..

Anuj-ji मौसी हम कभी किसी से कोई जीकर नहीं करेंगे इसका ..

Jaggu-main भी…

में- तो अभी जब हम खेल hi रहे हैं तो कोशिश यही करनी है की ज़्यादा न सोचते हुए जीतने पर ध्यान दें, ये मुश्किल होगा पर हम लोग. कर सकते हैं…

सब लोगो ने मेरी बात पर सहमति जताई…

खैर जो आगे जो कुछ भी हो सकता था उसके बारे में सोच सोच कर मेरा लुंड अकड़ रहा था और कहीं न कहीं सबका हाल यही था…

जो गाओं वाले देख रहे थे उनके मन में भी यही सवाल था की हम लोग क्या करेंगे…

मैं सबसे अलग हुआ और अपनी जगह जाकर खड़ा हो गया वहीं माँ और मौसी भी चित्रावती के पास चली गयी..

में- हम तैयार हैं बड़ी माँ..

मेरी बात सुनकर चित्रावती ने मुझे मुस्कुरा कर dekha…par थोड़ी हैरानी से..

वही बड़ी माँ मुस्कुराई और कहा: बहुत ाचा, अब आगे बढ़ा जाये..

दोनों पक्ष तैयार हो जाएं और जैसा की सब अवगत हैं, पहले चित्रावती सैनिक होगी और कर्मा लुटेरा…

सरे लोग जितने भी वहां hi वह उपस्थित थे सब को ये जान्ने की इच्छा थी की आगे क्या होने वाला है, क्या सच में बीटा अपनी माँ या मौसी को लूटेगा..

खैर बड़ी माँ ने इशारा किआ कुर हम तालाब किनारे आ गए माँ और मौसी चित्रावती के बगल में कड़ी थोड़ी परेशां लग रही थी, और उनके मन में या सबके मन में यही प्रश्न था की किसे चित्रावती पहले ले जाएगी…

मुक़ाबला शुरू होने के इशारे पर चित्रावती माँ और मौसी की तरफ घूमी और हाथ आगे बढ़ाया…

चोदामपुर

खाना कहते हुए राजपाल ताऊ की नजर बार बार भीगे ब्लॉउज में चिपके हुए अपनी बहु के मस्त मस्त उभारों पर बार बार जा रही थी..





वहीं भाभी अपने ससुर को खाना खिलने में व्यस्त थी.. उनकी नजर ससुर पर पड़ी तो बोल पड़ी:- क्या हुआ पापाजी खा काहे नहीं रहे... ाचा नहीं लग रहा क्या?

राजपाल- अरे नहीं बहु ऐसा नहीं है कछु तू नहीं खा रही अकेले खाने का मन नहीं हो रहा तू भी खा ले..

भाभी- अरे पापाजी मैं अभी आपके साथ कैसे?

राजपाल- अरे तो क्या हुआ खले,

भाभी- नहीं पापाजी किसी ने देख लिए तो गाओं में बदनामी हो जाएगी कैसी बहु है जो ससुर संग बैठ कहती है..

राजपाल- अरे बीटा ये खेत गाओं से दूर है और कौन आ रहा है अभी यहाँ हमें कोई नहीं देख सकता चाहे हम दोनों कुछ भी करें.

राजपाल ने आखिरी के शब्दों पर जोर डालकर कहा जो भाभी को भी कुछ समझ आया तो वो भी मुस्कुरा उठी,

Bhabhi-wo बात भी है पापाजी और साथ hi कपडे भी तो गीले हैं ऐसे में मुझसे खाया न जायेगा...

Rajpal-haan खेलते हुए तूने सरे कपडे भीगा लिए ऐसा कर इन्हे निचोड़ ले जल्दी सूख जायेंगे...

भाभी अपने ससुर की बात से सहमत हुई और एक तरफ जाकर दूसरी और घूम कर अपने पल्लू को पकड़ कर निचोड़ने लगी.. वहीं राजपाल की नज़रें अपनी हसीं बहु के बदन से नहीं हैट रही थी..

पल्लू हटाने से पीछे से राजपाल को बहु की गोरी चिकनी कमर नजर आ रही थी जिसे देखकर राजपाल का मुँह सूख रहा था..





भाभी अपने ससुर की प्यासी नज़रों से बेखबर अपनी साड़ी के पल्लू को सूखने में व्यस्त थी.. राजपाल तब तक अपनी बहु के मदमस्त बदन से आँखें सकते रहे जब तक उसने अपने पल्लू को ठीक से निचोड़ नहीं लिए..

राजपाल ने अब तक खाना खा लिए था और जैसे hi उनकी बहु ने पलट कर उन्हें देखा सँभालते हुए बोले: बहु निचोड़ लिए हो तो खाना खा ले..

भाभी- ग पापाजी खा लुंगी वो,

राजपाल- अरे अब कब खायेगी अब तो मैंने भी खा लिए..

भाभी- वो बात नहीं है पापाजी,

राजपाल- फिर क्या बात है?

भाभी- कुछ नहीं बस ऐसे hi पापाजी ..

राजपाल थोड़ा आगे जाकर पूछता है: बहु क्या हुआ कोई परेशानी है क्या?

Bhabhi-wo पापाजी मुझे वो पे वो मुझे पेशाब जाना है..

भाभी एक सांस में कह जाती हैं..

राजपाल को न जाने ये सुनकर एक झुरझुरी सी बदन में होती है साथ hi उनका लुंड भी कसने लगता है पर वो खुद को सँभालते हुए कहते हैं..

राजपाल- अरे बस इतनी सी बात बहु जा ये बगल में झाड़ियों के पार चली जा.

भाभी- पर वो मुझे दर लगता है..

Rajpal-kiska दर

Bhabhi-koi आ गया तो,

Rajpal-yahan कोई नहीं आएगा बहु..

Bhabhi-phir भी खुला है कोई आ गया तो.

राजपाल- ाचा एक काम कर तू जा मैं यहाँ खड़ा रहूँगा किसी को नहीं आने दूंगा...

भाभी को अपने ससुर के सामने ये बात करने पर बहुत शर्म आ रही थी पर साथ hi एक रोमांच भी मिल रहा था.

भाभी- ठीक हकी है पापाजी पर ध्यान रखना.

राजपाल- ये भी कोई कहने की बात है क्या बहु...

जा इधर से इन झाड़ियों में चली जा,

भाभी ससुर के कहने पर झाड़ियों में घुस गयी उन्हें ससुर के सामने यूँ आने में एक अलग रोमांच और उत्तेजना महसूस हो रही थी वहीं राजपाल के तो वारे न्यारे हो रहे the,bahu के जाते हुए उसका ध्यान बहु के मटकते हुए बड़े बड़े गोल चूतड़ों पर गया जो हर कदम पर मटक रहे थे, अचानक hi उनके मन में ख्याल आया की बहु के चूतड़ कितने मस्त हैं ये नंगे कैसे दीखते होंगे..

बस राजपाल के दिल की धड़कने तेज़ हो गयी उसका दिमाग चलने लगा, की अभी उसके पास सबसे सही मौका है उन आकर्षक पटेलों को देखने का पर खुद को समझने की भी कोशिश कर रहे थे की ये गलत है वो बहु है मेरी, कितना गलत होगा ये, ये कहकर किसी तरह राजपाल ने खुद को रोका हुआ था,

वहीं भाभी झाड़ियों में तो आ गयी पर उन्हें सही जगह hi नहीं मिल रही थी झाड़ियां इतनी बड़ी और घनी थी की कहीं बैठ कर मूतने के लिए जगह hi नहीं मिल रही थी, तभी भाभी को बगल में एक बड़ा सा पत्थर दिखा, भाभी के मन में ख्याल आया इस पर बैठ कर कर लूँ तो? भाभी पत्थर के पास गयी और फिर नजर घुमा कर इधर उधर देखा की कोई देख तो नहीं लेगा पर हर और पेड़ और फसल होने से कोई खतरा नहीं दिखा, घुमा कर एक नजर ससुर की और डाली तो झाड़ियों के बीच हल्का सा साया दिखा जो दूसरी और मुँह करके खड़े थे,. भाभी को न जाने क्यों थोड़ी निराशा हुई पर फिर खुद को hi डांटा की न जाने क्या क्या सोचती रहती हूँ...

इसी ख्याल के साथ भाभी ने झुककर अपनी साड़ी को नीचे से पकड़ कर इकठा करना शुरू किआ और अपने गोल और भरे हुए चूतड़ों को धुप में उजागर करते हुए साड़ी को एक हाथ से कमर पर पकड़ लिए, और फिर दुसरे हाथसे पत्थर को पकड़कर उसपर चढ़ने की कोशिश करने लगी....

वहीं बहार राजपाल के मन में द्वन्द चल रहा था एक मन कह रहा था की ये गलत है अपनी बहु के बारे में ऐसे ख्याल वहीं दूसरा मन ललचा रहा था की सोच फिर न जाने ऐसा मौका कब मिलेगा जब तू अपनी बहु के इतने गोल गोल भरे हुए चूतड़ों को देख पायेगा, और अंत में राजपाल की उत्तेजना ने उसके अंदर की मर्यादा को चित्त करते हुए राजपाल को ये समझा दिया की सिर्फ देखने से क्या हो जायेगा..

बस फिर क्या था राजपाल धीरे से पलटा और थोड़ा आगे झाड़ियों के पास जाकर कांपते हाथों से बहुत हलके से झाड़ियों को हटाकर देखा और इधर उधर सर घुमाया तो जो नज़ारा उसकी आँखों के सामने आया उससे उसकी आँखें चौड़ी हो गयी..





अपनी बहु को इस हाल में देखकर राजपाल का गाला सूखने लगा, बहु के भरे हुए गोल मटोल तरबूज जैसे नितम्भ जो सूरज की रौशनी में पटेलों की तरह चमक रहे थे राजपाल किसी और दुनिया में खो गए,

भाभी ने अपने दोनों पेअर पत्थर पर टिकाये और फिर बैठकर अपनी धार को बहने दिया, भाभी के मूतने से निकलती मधुर आवाज़ जब राजपाल के कानो में पड़ी तो जैसे वो पूरा हिल गए, उनका लुंड बिलकुल कड़क हो चूका था, मन की साडी मान मर्यादा मर चुकी थी अपनी बहु के सुडौल नितम्बों को देखकर उनका मन कर रहा था की अभी पीछे से जाएं और उन दोनों पटेलों के बीच अपना लुंड घुसा कर ज़ोर ज़ोर से बहु की इस मदमस्त गांड को मारें...

पर किसी तरह खुद को रोका हुआ था हाथ धोती के ऊपर से hi लुंड को मसल रहा था, अपनी बहु को पेशाब करता देख उनके मन में ऐसी उत्तेजना महसूस हो रही थी जो कभी नहीं हुई...

उनका मन कर रहा था की अभी जाकर दोनों चूतड़ों के बीच मुँह घुसा दें और गांड के उस भूरे कैसे हुए छेड़ में जीभ घुसा घुसा कर चाटलें...

पर जैसे हर अछि पिक्चर का अंत होता है इसका भी हुआ भाभी की छूट से मूट की धार बंद हुई, और उन्होंने बापिस नीचे कदम रखा और कड़ी हो गयी और इसके बाद अपनी साड़ी को छोड़ दिया जो की नीचे गिर गयी, और राजपाल की ज़िन्दगी की अब तक की सबसे अछि फिल्म का अंत हो gaya...tab जाकर राजपाल को होश आया और वो जल्दी से झाड़ियों के पास से हेट,

इधर भाभी भी मुड़ी बहार आने को तो उन्हें झाड़ियों के पास कुछ महसूस हुआ, उन्होंने तक ताकि लगाकर देखा और फिर न जाने क्यों उनके चेहरे पैट एक मुस्कान आ गयी.

इसके आगे क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.
 
मुक़ाबला शुरू होने के इशारे पर चित्रावती माँ और मौसी की तरफ घूमी और हाथ आगे बढ़ाया…

अपडेट140

कालक

हम सब hi बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे की चित्रावती किसे चुनेगी अपने साथ ले जाने के लिए, मुझे मन hi मन में घबराहट भी हो रही थी साथ hi एक अलग प्रकार की उत्तेजना भी, लुंड बिलकुल कड़क होकर धोती में तम्बू बनाये हुए था,

हम सब तालाब के किनारे मौजूद थे नाव कड़ी हुई थी बस अब सबको चित्रावती के फैसले का इंतज़ार था चित्रावती ने हाथ आगे बढ़ाया और फिर कुछ सोचते हुए माँ के हाथ को पकड़ा, और नाव की तरफ मुड़ी ये देखकर हम सब समझ गए की यानि मौसी यहाँ रह जाएँगी और मुझे मौसी के साथ ये सब करना होगा, मौसी को जब इस बात का अंदाज़ा हुआ तो उनके शरीर में एक अजीब तरह की सिरहन दौड़ गयी, की उनका भांजा उनके साथ वो सब करेगा जो की एक मौसी और भांजे में बिलकुल नहीं होना चाहिए,

वो भी इतने सरे लोगो के सामने, ये कितना गलत होगा पर गलत होतेहुए भी मौसी को न जाने क्यों एक अलग hi उत्तेजना हो रही थी, उनकी छूट रह रह कर बाह रही थी इसी ख्याल के साथ.

मौसी जब इन ख्यालों में डूबी hi थी की चित्रावती ने एक बार फिर से सब को चौंका दिया और माँ का हाथ छोड़कर मौसी का पकड़ लिए, इस फैसले से तो सब चौंक गए.. अगर मौसी को लेजाती तो इसका मतलब मैं और माँ बचते और फिर मुझे माँ के साथ वो सब करके अंक प्राप्त करने होते...

जितने भी देखने वाले और साथ के लोग थे वो सब हैरान थे साथ भी उत्साहित भी ये देखने के लिए की ये माँ बीटा अब क्या करेंगे क्या रिश्तों की मर्यादा लांघ कर इतना आगे बढ़ेंगे, कुछ माँ जैसी गदराई औरत के कपडे उतारते देखने के लिए उत्सुक थे,

अनुज तो अनगिनत ख्यालों से भरा हुआ था उसके मन में अजीब सा द्वन्द चल रहा था, उसका लुंड बिलकुल अकड़ गया था ये सोचकर की उसका भाई उसकी माँ के साथ ये सब करने वाला है, एक तरफ उसके मन में ये भी ख्याल आ रहे थे की अगर उसके भाई की जगह वो होता तो कैसा होता, इसी ख्याल मात्रा से उसका शरीर झनझना रहा था, ममता चची, बुआ और पल्ली और अंत में मंजू तै को छोड़ने के बाद उसे अपनी गदराई और कामुक माँ को छोड़ना कुछ गलत नहीं लग रहा था, वो जनता था की उसने और कर्मा ने अब तक जितनी भी औरतों को छोड़ा है उसकी माँ उन सब से कुछ बढ़कर hi है, वो अपनी माँ के गदराये बदन को भोगने की नज़र से देख रहा था, एक तरफ वो ये भी सोच रहा था की अगर आज उसकी माँ और कर्मा के बीच कुछ हो गया तो हो सकता है आगे के लिए उसका भी कुछ रास्ता खुल सकता है...

जग्गू तो बस ये सोचे जा रहा था की कर्मा चची के साथ यानि अपनी सगी माँ के साथ वो सब करेगा जो उसने अभी कालजंग की माँ के साथ किआ था, ये ख्याल करतव hi उसके मन में अपनी माँ के बारे में ख्याल आने लगे की उसे कैसा लगेगा अपनी माँ के साथ ये सब करते हुए, उसकी माँ का भरा हुआ बदन कैसा लगेगा बिना कपड़ों के, वैसे अगर मुझे मम्मी को छोड़ना होता तो मैं तो ख़ुशी ख़ुशी छोड़ लेता वो मन में सोचने लगा, जब ममता चची को छोड़ने में इतना मज़ा आया था तो मम्मी को छोड़ने में कितना आएगा..

जहाँ जग्गू अपनी मम्मी के बारे में सोच रहा था वहीं उसकी मम्मी के मन में भी कुछ ऐसे hi विचार चल रहे थे, की अगर कर्मा और सभ्य की जगह वो जग्गू होते तो कैसा रहता, क्या इतने लोगो के सामने वो अपने बेटे के साथ ये सब कर pati...ye सोचकर hi मंजू तै की छूट रास बहा रही थी...

बड़ी माँ के चेहरे पर एक मुस्कान थी और क्या था उनके मन में बताना मुश्किल था..

माँ की छूट भी ये सोचकर की उन्हें अपने बेटे के साथ सब के सामने ये सब करना होगा पानी बहा रही थी, अपने बेटे के तगड़े और लम्बे लुंड से तो न जाने वो अपनी रसीली छूट की कुटाई करवा चुकी थी पर वो दोनों अकेले में सब से छुपकर करते थे, पर अभी सामने न जाने कितने लोग थे खासकर सब लोगों में उनके अपने भी थे अपनी बहन और अपने छोटे बेटे के सामने उन्हें बड़े बेटे के साथ हवस का खेल खेलना था जिससे सब की hi ज़िन्दगी बदल सकती thi...maa को कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या होगा कैसे होगा पर सोचकर उत्तेजना महसूस हो रही थी.

जब चित्रावती ने माँ का हाथ छोड़ कर मौसी का हाथ पकड़ा मेरे लुंड ने भी रास की एक बूँद छोड़ दी, मैं भी सोचने लगा की न जाने कैसा होगा, पर माँ को छोड़ने का मौका मिले और मैं पीछे हैट जॉन ये कभी नहीं हो सकता था बस उत्तेजना थी की सबके सामने करने पर क्या होगा और उसका असर बाद में क्या पड़ेगा...

सबके मम में कुछ न कुछ ख्याल चल hi रहे थे की तभी चित्रावती मौसी को लेकर आगे बढ़ी और नाव में चढ़ गयी और कुछ पल बाद नाव चल पड़ी..

अब सबकी आँखें हम पर थी यहाँ तक की नाव चलते हुए चित्रावती और मौसी की भी..

मैं और माँ ऐसे hi खड़े हुए जाती हुई नाव को देख रहे थे, हमें कुछ समाज नहीं आ रहा था कैसे और कहाँ से शुरू करें..

तभी पीछे से आवाज़ आई: अगर मुक़ाबला करना hi नहीं था तो मन कर देते...

दुसरे लोग भी हाँ में हाँ मिलाने लगे..

मैंने एक बार सब को देखा और फिर अनुज जग्गू और तै को भी सब नज़रें गड़ाए हुए थे..

मैंने माँ को देखा तो उनके चेहरे पर भी असमंजस थी पर उन्होंने सर हिलाकर आगे बढ़ने का इशारा किआ,

मैंने सोचा और फिर माँ के पास पहुंचा सबको लगा की मैं माँ की साड़ी उतरूंगा पर साड़ी या ब्लाउज खोलने का मतलब था की नंगा हो जाना क्यूंकि कालक गाओं में अंदर के कपडे यानि ब्लाउज पेटीकोट तो पहनने hi नहीं दिए जाता था.. इसलिए थोड़ा दिमाग लगते हुए मैंने माँ को कंधे पर से पकड़ा और नीचे की तरफ बिठा दिया, माँ थोड़ी हैरान दिखी..

मैंने उन्हें नीचे बिठाकर अपनी धोती हटड़ी और नंगा हो गया मेरा खड़ा लुंड कॉल्स सांप की तरह फुंकार रहा था,

मैंने अपने लुंड को पकड़ा और माँ के चेहरे के पास कर दिया माँ मुझे hi देख रही थी तो कभी मेरे लुंड को उनके चेहरे पर उत्तेजना और साथ hi असमंजस दोनों थी, मैंने हाँ में इशारा किआ तो माँ अपना चेहरा मेरे लुंड के पास ले आई...

अब तो सब की नज़रें माँ और मेरे लुंड पर hi थी, अनुज जग्गू तै मौसी चित्रावती बड़ी माँ सब यही सोच रहे थे की और आगे आने वाले पल का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे, हालाँकि उनको निराशा हुई जो माँ को नंगी देखने की आस लगाए बैठे थे, खैर मैंने और देर न करते हुए अपनी कमर को आगे की तरफ धकेलते हुए अपने पत्थर हो चुके लुंड को माँ के रसीले होंठों पर रख दिया तो मेरे साथ साथ मुझे कई साडी आहें सुनाई दी, अगले hi पल माँ के होंठ खुले और मेरे लुंड का सूपड़ा उनके होंठों के बीच घुस गया

और वहां बैठे सब लोगों की आँखें जैसे वहीं जैम गयी..

अनुज जग्गू मौसी और तै तो टकटकी लगाए हुए देखे जा रहे थे की कैसे एक माँ के मुँह में बेटे का लुंड जा रहा है, मौसी नाव में बैठे हुए ये देख रही थी और उन्हें न जाने क्यों जीवन में पहली बार अपनी बड़ी बहन से जलन सी महसूस हो रही थी,

अपने भांजे के लुंड को देखकर उनकी छूट में अजीब सी खुजली हो रही थी साथ hi उनका गाला भी सूख रहा था वो उसक कड़क लुंड को अपने होंठों पर महसूस करना छह रही थी उसके स्वाद को जीभ से चखना छह रही थी...

अनुज तो अपनी माँ को अपने भाई का लुंड मुँह में लिए देख उत्तेजना से पागल हो रहा था उसका लुंड भी धोती से बहार निकल आया था..

इधर माँ का मुँह खुलते hi मैंने अपनी कमर का हल्का सा धक्का लगाया और लुंड को माँ के मुँह में घुसा दिया...

चाहे अकेले में हो या लोगो के सामने माँ के मुँह में लुंड घुसना एक अलग hi अनुभव होता है.. खैर माँ ने भी धीरे धीरे से लुंड को चूसना शुरू कर दिया

Me-aaahhh माँ तुम्हारा मुह्हह्ह...

माँ ने लुंड मुँह में रखे हुए hi मेरी आँखों में देखा और आँखों hi आँखों में मुस्कुराई जिससे मुझे पता चल गया की माँ भी इसके मज़े लूट रही हैं, क्यूंकि उनकी आँखें मेरे अलावा और कोई नहीं देख सकता था

किसने सोचा था की अपने गाओं से इतनी दूर अनजान और कुछ बेहद अपने लोगो के बीच बैठकर माँ मेरा लुंड अपने बेटे का लुंड चूस रही होगी...

खैर माँ ने अपने मुँह का जादू चलना जारी रखा तो मैं खोने लगा और अपने हाथ उनके सर पर रखकर उनके मुँह को छोड़ने लगा...

सच कहूं तो लोगो के सामने माँ से लुंड चुसवाने में मुझे और मज़ा आ रहा था...

मौसी अनुज जग्गू, तै सब लोग अपनी अपनी साँसे संभालें हमें देख रहे थे अनुज सोच रहा था की काश उसका लुंड होता अभी माँ के मुँह में, जग्गू के ख्याल भी कुछ ऐसे hi थे

वो छह रहा था की काश ये मुक़ाबला वो और उसकी माँ करते तो.. कितना मज़ा आता...

अपनी मम्मी से लुंड चुसवाने के ख्याल से hi वो सिहर उठा, जबसे उसने भाभी को और ममता चची और पल्ली को छोड़ा था तबसे hi उसके मन में अपनी मम्मी को लेकर भी ऐसे ख्याल आने लगे थे पर दर से दबा के रखता था पर आज अपने दोस्त को अपनी माँ से लुंड चुसवाते हुए देख उसके अरमान भी जाग रहे थे,

मैं लुंड चुसवाने में इतना मस्त हो गया और माँ चूसने में की मुझे समय का पता hi नहीं चला, क्यूंकि एक सेविका को मैंने पहले hi बोल दिया था तो तीन मिनट होते hi उसने एक घंटी बजादि जिससे मैं और माँ होश में आये,

मैंने माँ के मुँह से लुंड निकला जो उनके थूक से सना हुआ था साथ hi माँ हांफ रही थी अब मैं और माँ दोनों hi बेहद उत्तेजित भी हो गए थे बस किसी तरह खुद पर काबू कर रहे थे, मुखमैथुन के अंक हमें मिलने पक्के हो गए थे पर अब आगे क्या करूँ समझ नहीं आ रहा था, मैं माँ को इतने सरे लोगो के सामने नंगा नहीं करना चाहता था, मैं नहीं चाहता था की इतने सरे लोग मेरी माँ के मदमस्त बदन को देखें...

अभी तक तो मैं उस में कामयाब हुआ था मैंने कुछ सोचा और नज़र घुमाकर देखा तो चित्रावती अभी दुसरे कोने तक पहुँचाने वाली थी वहीं मौसी लगातार हमें देखे जा रही थी और शायद चित्रावती भी शायद इसीलिए उसकी गति थोड़ी काम थी...

मौसी की छूट बिलकुल गीली हो चुकी थी अपनी बहन को उसके बेटे के लुंड चूसते देख... वो अपनी जांघों को आपस में रगड़ कर खुद को शांत करने की कोशिश कर रही थी...

मैंने अब आगे का सोचा की जो की बहुत hi बड़ा कदम था सबकी नज़रें मुझ पर hi थी की अब आगे ये क्या करेगा क्या अपनी माँ को सबके सामने नंगा करेगा या नहीं, नंगा करने के बाद क्या अपनी सगी माँ के साथ चुदाई कर पायेगा या नहीं...

ये मेरे लिए या सबके लिए एक बहुत बड़ा कदम था जिससे हम सबकी ज़िन्दगी बिलकुल बदल सकती थी,

खैर मैंने बुद्धि लगाई औरएक तरकीब सोची और खुद वहीं पीठ के बल ज़मीन पर लेट गया, और माँ से अपने ऊपर आने का इशारा किआ, माँ भी पल भर में मेरी तरकीब समझ गयी, अब बेहद hi महत्वपूर्ण पल था हम सब की ज़िन्दगियों का जिसके बाद सब कुछ बदल सकता था,

ऐसा निर्णायक पल शायद hi किसी की ज़िन्दगी में आता होगा, अब ये हमें देखना था इस रस्ते पर आगे बढ़ना था या नहीं...

खैर अभी हमें जो सही लगा वो हमने किआ...

माँ मेरे पाई आई और मेरी कमर के दोनों तरफ पेअर कर लिए और नीचे बैठ गयी अपने घुटनो पर, और उपाय के अनुसार होनहोने मेरे खड़े लुंड को पकड़ लिए और फिर आएगी खिसकते हुए साथ hi सारी को भी आगे खिसककर मेरे लुंड को साड़ी से धक् लिए साथ hi साड़ी का चरों तरफ घेरा बना lia,ab मेरी कमर के ऊपर माँ बैठी थी और मेरी कमर से लेकर जांघ तक सब कुछ उनकी साड़ी के नीचे दबा हुआ था,

सब लोग बेसब्री से हमें देख रहे थे कुछ लोग माँ के नंगे न होने से निराश भी थे, फिर भी सबकी नज़रें हम पर hi तिकी हुई थी, अनुज जग्गू मौसी तै सब नज़रें गड़ाए देख रहे थे, मैंने माँ को इशारा किआ तो माँ ने एक बार मुझे देखा और फिर सर घुमाकर अनुज और बाकि सब को और फिर मौसी को और फिर अपनी साड़ी के अंदर हाथ डालकर मेरे लुंड को पकड़ लिए और खुद भी थोड़ी ऊपर को उठ गयी किसी को कुछ नहीं दिख रहा था की साड़ी के अंदर क्या हो रहा है,

मुझे मेरा लुंड माँ की छूट के होंठों से छूटा हुआ महसूस हुआ तो मैं सिहरने लगा...

बाकि सब भी कल्पना करने लगे की साड़ी के अंदर क्या हो रहा होगा, माँ ने एक बार फिर से मुझे और बाकि सब को देखा और फिर हाथ हटाकर नीचे को हो गयी और उसी के साथ उनके मुँह से एक आह्ह्ह्हम्म्म्म करके सिसकी निकली, मेरा लुंड टोपा सहित माँ की छूट में फंस गया जिसने की सब को हिला दिया, सब के सामने हालाँकि दिख किसी को नहीं रहा था पर सब जानते थे की एक माँ की छूट में बेटे का लुंड घुस गया है..

अनुज, जग्गू, मंजू तै, मौसी सबकी साँसे अटक गयी और सब मुँह फाडे हमारी तरफ देखे जा रहे थे..

माँ की वो सिसकी सबूत था इसका एक बीटा और माँ कुछ ऐसा कर चुके हैं जो समाज के लिए बिलकुल पाप है, जो बेहद गलत है पर शायद इसलिए उतना hi उत्तेजित करने वाला भी.

अनुज का तो लुंड फटने को हो रहा था जब उसने अपनी माँ की आह्हः सुनी, वो छह रहा था अभी वो भी जाकर उन दोनों के साथ शामिल हो जाये...

वहीं जग्गू का लुंड भी उसी हाल में था, बड़ी माँ भी बहुत ध्यान से देख रही थी वहीं मौसी तो सुन्न होकर देखे जा रही थी...

बाकि कुछ लोग चिल्लाकर शोर मचाते हुए आगे बढ़ने को कह रहे थे तो कुछ साड़ी उतारकर चुदाई के लिए कह रहे थे...

बाकि सब लोगो के लिए जो बिलकुल नया था मेरे और माँ के लिए नहीं था, इस छूट में लुंड डालकर मैं पहले कई बार चुदाई कर चूका था,

हम दोनों के लिए ये बहुत आनंददायक होता था बस नया ये थे पहले चुपके चुदाई होती थी और आज इतने लोगो के बीच हो रही थी...

मेरे हाथ खुद बा खुद माँ की कमर पर पहुंचे गए और मैंने माँ को उछालना भी शुरू कर दिया.. माँ भी मेरा इशारा पाकर ऊपर नीचे होने लगी और साथ hi उन्होंने अपनी आँखें भी बंद कर ली शायद वो खुद को काबू में करने की कोशिश जार रही थी जिससे कुछ गलत प्रभाव न पड़े और ज़रूरी भी था आखिर हर रोज़ तो ऐसा नहीं होता न की एक माँ बड़े बेटे से चुद रही है जबकि छोटा बीटा बहन और गाओं के लोग पास हैं...

धीरे धीरे मेरा लुंड पूरी तरह से माँ ki.choot में समां गया था, और माँ और मेरी गति भी कुछ बढ़ गयी थी,

हमारी जांघों की टकराने की थप थप साफ़ सुनाई देने लगी थी...

माँ मेरे लुंड पर उछलती हुई बेहद कामुक लग रही थी...

बिना ब्रा के ब्लाउज में क़ैद उनकी छुछियां हर झटके के साथ उछाल कूद कर रही हो थी... वहीं साड़ी के अंदर उनकी गरम छूट में लुंड जैसे किसी गरम भट्टी में था और मुझे अद्भुत आनंद मिल रहा था, एक पल को मन हुआ की माँ के ब्लाउज को खोल कर उनकी छूछीयो को खोलकर उन्हें आज़ाद कर दूँ और सबको जालौन दिखा कर, माँ की बड़ी नंगी छूछीयो को देखकर सेबल मुँह में पानी आ जायेगा..

पर फिर खुद को रोक लिए...

मैं हर बढ़ाते पल के साथ भूलता जा रहा था की कहाँ और किन हालातों में हूँ और माँ की रसीली छूट को छोड़ने की आनंद रूपी नदी में बहता जा रहा था,

मैंने माँ की पीठ पर हाथ लगाकर उन्हें खुद के ऊपर झुका लिया और खुद नीचे से तगड़े धक्के लगा लगाकर छोड़ने लगा..

आगे झुकाने से माँ का चेहरा मेरे चेहरे के करीब आ गया और मजन खुद को रोक नहीं पाया और अपने होंठ माँ के होंठों से मिला दिए और उन्हें चूसने लगा...

रहा सहा जो भी होश था वो माँ के होंठों के रास में बाह गया, मेरे माँ के होंठों को चूसने पर मुझे एक तरफ से शोर सुनाई दिया जिसे सुनकर मुझे एक अलग ख़ुसू हुई और ऐसा लगा जैसे मैं कोई क्रिकेट का खिलाडी हूँ और लोग मेरा हौसला बढ़ा रहे हैं जैसे बल्लेबाज के हर शॉट पर शोर मचता है वैसा hi मेरे साथ हो रहा था मैं भी माँ की छूट की पिच पर अपने बल्ले से शॉट पर शॉट मार रहा था..., बस इसी प्रेरणा के साथ मैं और शिद्दत से माँ के होंठों को चूसने लगा और अपने शॉट भी तेज़ कर दिए...

मुझ कुछ देर बाद एक घंटी की आवाज़ सुनाई तो दी पर न मुझे और न माँ को कोई फ़र्क़ पड़ा वो मेरे कंधे पर सर रखकर मेरे ऊपर थी और मैं नीचे से अब ताबड़तोड़ धक्के लगाकर माँ को छोड़ रहा था

हम दोनों hi ये भूल चुके थे की हम कहाँ पर हैं मेरी कमर खुद बा खुद नीचे से धक्के लगा रही थी, और धक्के भी इतने तेज़ हो चुके थे की अब थप थप की आवाज़ सब को अचे से सुनाई दे रही थी...

अनुज जितना इस आवाज़ को सुन रहा था उतना hi उत्तेजित और उतावला होता जा रहा था, और उसे कुछ नहीं सूझा तो वो अपने लुंड को हाथों में लेकर हिलने लगा वहीं जग्गू ने भी ये देखा तो उसने भी यही किआ और अपने लुंड को धोती से निकलकर मुठियाने लगा...

तै जो माँ बेटे की चुदाई देख बेहद गरम हो चुकी थी उनकी नज़र जब अनुज और जग्गू के खड़े नंगे लोदों पर पड़ी तो बेचारी की हालत और ख़राब हो गयी, दोनों सख्त लुंड देखकर उनका गाला सूखने लगा साथ hi ये ख्याल आते hi की एक लुंड बेटे का है तै की छूट रिसने लगी खुद को संभालना मुश्किल हो गया था, सिर्फ अनुज और जग्गू hi नहीं कई गाओं वाले भी चुपके से लुंड निकल कर मुठिया रहे थे, बड़ी माँ के सम्मान की वजह से चुप कर रहे थे,

बड़ी माँ भी ध्यान से देख रही थी माँ बेटे की चुदाई और हौले हौले अपनी दोनों जांघों को आपस में रगड़ रही थी...

मैं शायद hi कभी इतना उत्तेजित हुआ था मुझे याद नहीं है... मैंने माँ को खुद के सीने से चिपका लिए था और नीचे से बहुत hi ताबड़तोड़ धक्के लगा कर माँ को छोड़ रहा था





माँ मेरे कंधे पर सर रखकर बस ुह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आअह्ह्ह की कामुक सिसकियाँ भर रही थी, साड़ी के अंदर जो तूफ़ान आया हुआ था वो सबसे छुपा हुआ था सबके सम्मे होता तो न जाने कितने लोडे अपना पानी छोड़ चुके होते.

उसी उत्तेजना में न मुझे समय का ध्यान था और न hi हालत का बस ध्यान था तो माँ की रसीली छूट पर और अपने लुंड को उसमे घुसा कर छोड़ने पर,

कुछ hi धक्कों बाद माँ का बदन मुझे अकड़ता हुआ महसूस हुआ और फिर एक चीख के साथ वो ढीली पढ़ गयी इसका मतलब साफ था की माँ झाड़ गयी थी... बस इसी ने मेरा खुद से काबू खो गया और मैं भी कुछ तगड़े धक्के लगाने के बाद माँ से चिपक गया और भरभरा के अपनी माँ की छूट में झड़ने लगा अपने लुंड का रास मैंने माँ की छूट में भर दिया,

मुझे और माँ को झाड़ता हुआ महसूस कर देखने वाले भी खुद को रोक नहीं पाए, अनुज और जग्गू ने तो मुठियाते हुए hi पानी निकल दिया और हांफने लगे... तै की छूट भी पानी बहा चुकी थी दुसरे छोर पर बैठी मौसी को जितना दिकज रहा था वो उसी को सोचकर बेहद उत्तेजित थी...

खैर कुछ पल बाद जब चुदाई का तूफ़ान शांत हुआ तो माँ धीरे से मेरे ऊपर से उठी और मैं भी उनके उठने के बाद उठा और देखा चित्रावती भी बापिस आ चुकी थी और नाव रोक रही थी...

वो थोड़ी हैरान ज़रूर लग रही थी शायद उसे लग फाहा था की हम लोग मुक़ाबला नहीं करेंगे...

खैर मैं और माँ खड़े हो गए चित्रावती माँ को लेकर दोबारा नाव में चली गयी और जब वो वहां पहुंच गयी हुए दोनों सवारियों को दूसरी और पंहुचा दिया तो वो बड़ी माँ ने चरण समाप्त की घोसना की और बताया लुटेरे या लनी मुझे

मुख मैथुन के तीन अंक,

सम्भोग के 5 अंक

और अंदर रास छोड़ने के 6 अंक यानि कुल मिलकर,14 अंक थे मेरे पास और कब मुझसे चित्रावती को इससे काम पर रोकना था..

चोदामपुर

राज पल और prema.dono खेत से शाम को घर लौटे और फिर प्रेमा घर के काम काज में लग गए, थोड़ी देर बाद भग्गू भी आ गया जिससे घर का माहौल थोड़ा ख़राब हुआ पर अब उसकी सबको आदत थी तो किसी ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिए...

खाना बन गया तो राजपाल बर्तन में बंधवा कर कर्मा के यहाँ निकल गए. और अपने दोस्त यानि कर्मा के पिता नीलेश के साथ जमकर पेट पूबा की aur.dono ने बहु के खाने की खूब तारीफ की.

वहीं प्रेमा ने घर पर अपने पति को खिलाया और उसके खाने के बाद खुद भी खाने बैठी..

खा पीकर बर्तन धोने चली तब तक ससुरजी भी आ गए तो सारा काम निपटा कर अपने कमरे में गयी तो वहां उसका पति भग्गू पहले से hi इंतज़ार कर रहा था..

प्रेमा: तुम अभी तक सोये नहीं ग.

भग्गू- सोना गया माँ छुड़ाने तू ये बता इतनी देर से क्यों ऐसी..

भग्गू की आवाज़ से साफ़ पता चल रहा था की वो आज भी पीकर आया है और नशे में है...

पर बेचारी प्रेमा ने अब इसे hi अपना नसीब मान लिया था...

प्रेमा: ग वो बर्तन धो रही थी...

भग्गू- बस साली तू बर्तन hi धोती रहियो.. अपने पति की सेवा मत करियो थोड़ी...

प्रेमा: नहीं ग ऐसा नहीं है बताओ क्या करूँ पेअर दबा दूँ??

Bhaggu-zyada लाड में मत आ, इधर आ और चूस इसे..

भग्गू ने अपनी लुंगी को खोलकर अपना मुरझाया हुआ लुंड दिखते हुए कहा

प्रेमा का मन तो नहीं होता था उसके साथ कुछ भी करने का पर पति था मन नहीं करती थी नहीं तो बेकार में कलेस होता घर में इसलिए प्रेमा बैठ गयी उसकी टांगों के बीच और उसके मुरझाये हुए लुंड को हाथों में उठाकर सहलाने लगी...

Bhaggu-hath से hi सहलाती रहेगी क्या, मुँह में इसे तेरी माँ लेगी???

प्रेमा को भग्गू की ऐसी बातें बुरी लगती थी पर बेचारी खुद को समझा कर रह जाती थी..

प्रेमा ने. अपना मुँह आगे किआ और भग्गू के लुंड को मुँह में भर लिए, और जीभ से चाटते हुए चूसने लगी और खड़ा करने की कोशिश करने लगी...

भग्गू- अरे अचे से चूस न जल्दी खड़ा कर...

प्रेमा: ग चूस तो रही हूँ..

भग्गू- ठीक से चूस

प्रेमा थोड़ी और म्हणत से चूसने लगी पर पर उसके बाद भी भग्गू का लुंड खड़ा hi नहीं हो रहा था,

प्रेमा- ग मेरा मुँह दुःख रहा है अब और ये कड़क hi नहीं हो रहा है...

Bhaggu-acha मेरे सामने जो ये फुट भर की जवान चलती है तो नहीं दुखता मुँह और कैसे कड़क होगा जब इतने कपडे लादे रहेगी तो..

ये कहकर भग्गू प्रेमा के कपडे खींचने लगा तो प्रेमा ने उससे बचने के लिए खुद hi कपडे उतरने लगी और अंत में प्रेमा सिर्फ एक पेटीकोट में पति के सामने कड़ी thi,...bhaggu ने पकड़ कर पेटीकोट को भी ऊपर उठाकर कमर पर लपेट दिया तो प्रेमा की नंगी छूट सामने आ गयी,

प्रेमा का कामुक भरा हुआ बदन बेहद आकर्षक लग रहा था

भग्गू - अब कड़ी hi रहेगी चल अब दोबारा चूसना शुरू कर,

प्रेमा फिर से पति के सामने बैठ गयी और उसके मुर्दा लुंड में अपने मुँह से सांसें देने की कोशिश करने लगी पर हम सब जानते हैं मुर्दे कहाँ ज़िंदा होते हैं वैसे hi काफी देर तक कोशिश करने के बाद भी भग्गू का लुंड तस से मास नहीं हुआ...

तो थक कर प्रेमा ने मुँह हटाया और बोली- ग मैं थक गयी पर आपका ये हो hi नहीं रहा है...

भग्गू- ाचा साली तुझसे खड़ा नहीं हो रहा तो मुझे दोष दे रही है...?

Prema-par मैंने तो पूरी कोशिश की अपनी तरफ से..

भग्गू- बहन की लोदी तू कहना क्या चाहती है मेरा लुंड खड़ा नहीं होता, साली तू क्या तेरी माँ की भी चीखें निकलवा सकता हूँ,

इस बात पर प्रेमा को भी गुस्सा आ गया

प्रेमा- मेरी माँ का नाम क्यों ले रहे हो बार बार, गली देनी है तो मुझे दो..

भग्गू इस बात पर गुस्सा हो गया और खड़ा होकर प्रेमा के बाल पकड़ लिए..

भग्गू- साली रंडी की औलाद मेरर सामने जबान चलती है, साली रैंड एक बच्चा तक तो दे नहीं पाई और अब मुझसे बोल रही है की मेरा लुंड खड़ा नहीं होता..

प्रेमा- आह्ह्ह्ह इसमें मेरी क्याआअह्ह्ह ग़लतीय छोड़ो मेरे बहाल..

भग्गू- साली तेरी गलती है सरई रैंड मेरा लुंड तो खड़ा नहीं कर पति और मुझसे जबान लड़ती है इतनी हिमायत तेरी...

ये कहकर भग्गू ने और तेज़ी से प्रेमा के बालों को खींचा जिस पर प्रेमा को दर्द हुआ तो उसने धक्का देकर दूर कर दिए..

भग्गू- भें की लोदी मादरचोद रंडी की औलाद तेरी ये मजाल के तूने मुझे धक्का दिया

आज बताता हूँ तुझे रुक साली आज तेरा वो हाल करूँगा जो तूने सोचा भी नहीं होगा...

और भग्गू ने प्रेमा के बालों को फिर से पकड़ा और कमरे का दरवाज़ा खोल कर बहार खींचते हुए ले गया...

इसके आगे क्या बुआ अगली अपडेट में देरी के लिए माफ़ी चाहूंगा अपना साथ बनाये रखें..

बहुत बहुत धन्यवाद्
 
बड़ी माँ ने चरण समाप्त की घोसना की और बताया लुटेरे या लनी मुझे

मुख मैथुन के तीन अंक,

सम्भोग के 5 अंक

और अंदर रास छोड़ने के 6 अंक यानि कुल मिलकर,14 अंक थे मेरे पास और कब मुझसे चित्रावती को इससे काम पर रोकना था..



अपडेट 141


कालक गाओं

हमारा चरण ख़त्म हो चूका था, तो मौसी भी दूसरी तरफ से बापिस आ गयी थी माँ और मैं अपनी जगह पर खड़े हुए थे, और फिर कुछ समय मिला तो सब एक जगह इकठ्ठा हो गए, मुझे और माँ को साथ hi सबको एक दुसरे से नज़रें मिलाने में झिझक हो रही थी अभी जो हुआ उसके बाद... अनुज मुझे बिलकुल खामोश लग रहा था बस वो बार बार माँ को देख रहा था, मौसी के चेहरे पर भी झिझक साफ़ दिखाई दे रही थी साथ hi ग्लानि भी, जो कुछ भी हुआ था वो हम सबकी ज़िन्दगियों को किस तरह से बदलेगा कोई नहीं जनता था, और कहीं न कहीं उसकी वजह मौसी खुद को मान रही थी... कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोलै, पर थोड़ी देर बाद मौसी खुद को संभल नहीं पाई और माँ के गले लग कर फफक फफक कर रोने लगी, सबने उन्हें सहारा दिया माँ उनकी पीठ को सहलाते हुए समझा रही थी..

मौसी- जीजी हमारी वजह से तुम्हारा परिवार न ख़राब हो जाये kahin..hum खुद को माफ़ नहीं कर पाएंगे.. हम मर जायेंगे जीजी..

माँ- चुप्प्प पागल ऐसे मत बोल और तू भी तो मेरा परिवार hi है, और मुझे अपने परिवार पर पूरा भरोसा है न कभी टूटा था और न टूटेगा,

मंजू तै- और का बन्नो ऐसे कैसे टूट जायेगा, हम कछु नहीं होने देंगे, और सब बहुत समझदार हैं कोई जानकर गलती थोड़े hi की है, मज़बूरी में करनी पड़ी...

जग्गू- हाँ मौसी तुम रो मत हम सब की सहमति से हुआ जो हुआ और ये बात हम यही भूल जायेंगे.. क्यों अनुज?

अनुज से सिर्फ सर हिलाकर जवाब दिया वो कुछ बोलै नहीं..

माँ- और सुन तेरे लिए या तेरे अंचल में ख़ुशी डालने के लिए अगर ऐसा 100 बार भी करना पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूंगी...

माँ ने मौसी की आँखों में देखते हुए कहा,

लेकिन माँ की इस बात पर अनुज ने उन्हें ज़रूर थोड़ा अजीब भाव से देखा, उसके मन में ज़रूर कुछ चल रहा था..

मंजू तै- सबसे ज़्यादा दिक्कत तो कर्मा और तेरी है बन्नो, क्या तुम एक दुसरे से वैसे फिर से नज़रें मिला पाओगे जैसे पहले थे? क्या पहले की तरह तुम लोग रह पाओगे..

में- तै ये मेरी माँ है और मैं दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार करता हूँ, कोई एक हादसा या गलत समय मेरे दिल में मेरी माँ की इज़्ज़त या प्यार काम नहीं कर सकता, वो हमेशा hi रहेगी..

माँ ने ये सुनकर मुझे प्यार से देखा और फिर बोली- मैं तो माँ हु एक माँ के लिए तो उसका बीटा हमेशा hi बीटा रहेगा मेरा व्यवहार कैसे बदल सकता है..

अब तक मौसी भी थोड़ा चुप हो चुकी थी और बोली- जीजी धन्य हो गयी मैं तुम जैसी बहन और इतने समझदार भांजे पाकर...

मौसी ने एक बार फिर से माँ को गले लगा लिए, माँ ने भी मौसी की आलिंगन में भर लिए

maa-ye तो सच है हमारे बच्चे बहुत समझदार हैं ये कहकर माँ ने मेरे चेहरे पर हाथ फिरते हुए अनुज को गले से लगा लिए, अनुज ने भी माँ को खुद से चिपका लिए और कुछ पल बाद जब दोनों अलग हुए तो माँ ने अनुज की और कुछ अजीब नज़र से देखा की तभी दोबारा मुक़ाबले शुरू करने के लिए बड़ी माँ बुलाने लगी..

मौसी- जा कर्मा बीटा अब तुझे जीत कर hi आना है..

maa-haan कर्मा अब कुछ भी हो जाये जीतना hi है.

में- ज़रूर जीतेंगे माँ ये कहकर मैं तालाब के किनारे की और आ गया और वहीं बाकि सब अपनी अपनी जगह पर बैठ गए...

थोड़ी देर बाद hi मुक़ाबला शुरू हो गया अब मेरी बरी थी तो मैं नाव के पास जाकर खड़ा हो गया और मेरी सवारियां भी दोनों मेरे बगल में आकर कड़ी हो गयी, चित्रावती भी लुटेरे की भूमिका में कड़ी थी, हम दोनों की आँखें मिली तो उसने हल्का सा मुस्कुराया तो उसकी मुस्कराहट के जवाब में मैंने भी मुस्कुरा दिया..

बड़ी माँ- तो अगले चरण के लिए सब लोग तैयार हैं???

कर्मा तुम तैयार हो?

में- ग बड़ी माँ..

बड़ी माँ- तो शुरू किया जाये..

इतनी देर में मैं ये सोच चूका था की क्या किया जाये की चित्रावती को कमसे काम अंको पर रोक सकूँ...

बड़ी माँ का आदेश पाकर मुक़ाबला शुरू हुआ तो चित्रावती इंतज़ार कर रही थी की मैं दोनों में से किस सवारी को पहले नाव में बैठता हूँ और मैंने हाथ आगे भी बढ़ाया पर जिसका हाथ मैंने पकड़ा वो देखकर सब हैरान रह गए..

खुद चित्रावती भी क्यूंकि मैंने सबसे पहले चित्रावती का hi हाथ पकड़ा था,

चित्रावती- ये तुम क्या कर रहे हो अपनी सवारी को ले जाओ न,

में- अभी मैं सैनिक हूँ और मेरा काम है सवारी को सुरक्षित ले जाना पर कैसे ये मैं निर्णय लूंगा और मैंने चित्रावती को हाथ पकड़कर नाव में चढ़ा लिए...

सब लोग यहाँ तक की अनुज, माँ, जग्गू, मौसी, तै सब हैरानी से देख रहे थे

की मैं सवारी को ले जाने की बजाय चित्रावती यानि लुटेरे को क्यों ले जा रहा रहा हूँ..

खैर मैंने चित्रावती को नाव में बिठा लिए और नाव चलने लगा, चित्रावती मेरी और देखे जा रही थी, और आखिर बोल पड़ी:

आखिर तुम हमें क्यों ले जा रहे हो करना क्या छह रहे हो...?

में- मुक़ाबला जीतना..

chitrawati-par मुझे लेजाकर कैसे तुम्हे अपनी सवारियों को ले जाना है..

में- ये नियम के खिलाफ है?

चित्रावती- नहीं पर मुझे कुछ समाज नहीं आ रहा..

me-chinta मत करो थोड़ी देर में सब समझ आ जायेगा..

इसके बाद चित्रावती शांत हो गयी तो मैं जल्दी से नाव चलके दुसरे छोर पर ले गया और वहां पर पहुंच कर चित्रावती को उतर दिया...

इस फैसले से कुछ और सवाल लोगो के मन में उठे होंगे पर चित्रावती को दूसरी और उतर कर मैंने बापिस नाव मोदी और इस तरफ के किनारे की और आने लगा और कुछ hi देर में इस तरफ आ गया...

इस तरफ पहुंचकर मैंने एक सवारी को नाव में चढ़ाया और बापिस नाव लेकर दुसरे किनारे को चल दिया...

लोगों के मन में प्रश्न थे पर मुझे मुक़ाबला जीतने से मतलब था...

पहली सवारी को लेकर मैं कुछ hi देर में दूसरी और पहुंच गया जहाँ चित्रावती थी और वहां पहुंच कर मैंने सवारी को उतर दिया तो चित्रावती को लगा की अब जब दूसरी सवारी को लेने जाऊंगा तो उसे अंक अर्जित करने का मौका मिलेगा...

सवारी को वहां उतारते hi मैंने तुरंत फिर से चित्रावती को नाव में बिठा लिए और नाव बापिस इस तरफ के लिए घुमली...

और तभी जाकर चित्रावती को जैसे कुछ समझ आ गया और बोली- ओह्ह्ह्हह अब समझे हम तो ये थी तुम्हारी योजना, मन्ना पड़ेगा सच में बहुत सही बुद्धि का उपयोग किआ है तुमने हम तो समझ hi नहीं पाए थे...

में- मैं भी

चित्रावती- तुम भी मतलब.

में- तुम मेरी योजना नहीं समझ पाई और मैं तुम्हे..

चित्रावती- तुम्हे हमें क्यों समझना है.

में- ऐसे hi, ाचा उस दिन जो मैंने फव्वारे में गलती की थी उससे अब भी नाराज़ हो?

चित्रावती- छोडो उस बात को भूल जाओ,

में- पर मुझे जानना है की तुम नाराज़ हो या नहीं,

चित्रावती- अगर मैं कहूं हाँ हूँ तो क्या करोगे.

me-to मैं तुम्हे मुझे सजा देने के लिए कहूंगा..

चित्रावती- खैर छोडो हम तुमसे नाराज़ नहीं हैं और कोई सजा नहीं देना चाहते..

में- मेरी एक बात मानोगी.

मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा...

चित्रावती- हाँ बोलो न हम ज़रूर मानेंगे..

में- हमारे साथ चलो..

chitrawati-kya??

में- हाँ हमारे साथ चलो मेरे गाओं, मौसी के साथ रह लेना वो तुम्हे अपनी बेटी की तरह रखेंगी .

चित्रावती- तुम ये क्या बोल रहे हो?

में- सही बोल रहा हूँ मैं चाहता हूँ तुम हमारे साथ चल कर रहो कुछ दिनों के लिए hi सही यहाँ से बहार निकलो बहार की दुनिया देखो.. मैं तुम्हे शहर भी घुमाऊंगा.. सब जगह दिखाऊंगा नयी नयी तुम्हे बहुत पसंद आएगा..

चित्रावती- ये संभव नहीं है कर्मा,

में- पर कैसे, सब कुछ संभव है बस एक बार चल के तो देखो, तुम्हारा बहुत ख्याल रखेंगे हम लोग, बहुत खुश रखेंगे..

चित्रावती- पर हम कालक को छोड़कर नहीं जा सकते, बड़ी माँ कभी नहीं चाहेंगी की हम यहाँ से दूर जाएं कभी..

में- पर तुम क्या चाहती हो?

कभी खुद की चाहत पर भी तो ध्यान दो, वो करो जो तुम चाहती हो...

चित्रावती- नहीं कर्मा हम नहीं जा सकते तो नहीं जा सकते बस हम इस बारे में कुछ और बात नहीं करना चाहते...

इसके बाद नाव में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा हो गया हम किनारे से कुछ hi दूरी पर थे मैं नज़रें झुकाये चप्पू चलाये जा रहा था और वो लगातार मुझे देखे जा रही थी कुछ पलों बाद चित्रावती उठकर मेरे पास आई और सामने बैठ गयी और बोली:- हम तुमसे नाराज़ हैं और रही बात तुम्हारी सजा की तो वो तुम्हे ज़रूर मिलेगी..

मैंने बिना उससे नज़रें मिलाये बोलै

में: जो भी सजा होगी मुझे मंज़ूर है...

चित्रावती- अछि बात है तो तैयार हो जाओ..

और इसके बाद चित्रावती ने जो किआ उससे मैं बिलकुल हैरान रह गया और शायद मेरे साथ साथ वहां मौजूद हर शख्स जिसकी भी नज़र हम पर रही होगी सब हैरान hi होंगे यहाँ तक की बड़ी माँ भी...

चित्रावती ने आगे झुककर अपने होंठ मेरे होठों से लगा दिए थे और इतना hi नहीं वो मेरे होंठों को चूस भी रही थी, कुछ पल तो मैं यु सुन्न hi रहा पर जब अंदाज़ा हुआ क्या हो रहा है तो मैंने भी उसके रसीले होंठों का रसपान शुरू कर दिया आह्ह्ह्हम्म्म्म क्या मज़ा आ रहा था.. मैं तो नाव चलना भूल hi गया था....

हम दोनों एक दुसरे के होंठों में जुड़े हुए थे होश में तब आये जब नाव खुद बा खुद जाकर किनारे से टकराई और हम गिरने से ज़रा सा बचे...

इसके बाद चित्रावती नाव से उतरी और मैंने दूसरी सवारी को चढ़ा लिए पर मेरी नज़र चित्रावती से हैट hi नहीं रही थी, मुझे ये देखता देख चित्रावती बोली- हम जो चाहते हैं वो ज़रूर करेंगे कर्मा...

इसके बाद वो मुड़कर चली गयी.. मैं चित्रावती में इतना खो गया था की और किसी की तरफ देखना ध्यान hi नहीं रहा बड़ी माँ के बारे में जब ख्याल आया तो थोड़ा दर लगा फिर सोचा जो होगा देखा जायेगा..

इसी तरह सोच विचार करते हुए दूसरी सवारी को भी मैंने उस तरफ पंहुचा दिया और मैं मुक़ाबला जीत चूका था...

वहां पहुंचने के बाद मैं दौड़कर बापिस सबके पास आया तो सबने ख़ुशी से मुझे गले लगा लिए...

सब मुक़ाबला जीतने से बहुत खुश थे.

Jaggu-kya दिमाग लगाया कर्मा भयंकर.. एक अंक तक नहीं मिला उसे..

अनुज- हाँ भैया मुझे तो कुछ समझ hi नाहक आ रहा था की तुम सवारी की जगह चित्रावती को क्यों ले जा रहे हो..

सच में बहुत दिमाग लगाया किसी ने ऐसा सोचा नहीं होगा..

तै- हाय नज़र न लगे हमर बचुआ की बुद्धि को...

मौसी- मैं नज़र क्या इसे कुछ नहीं लगने दूंगी...

ये कहकर मौसी ने मुझे गले से लगा लिए..

मौसी के बाद माँ ने भी मुझे गले से लगा कर माथे पर चूमा..

जग्गू- वो सब तो ठीक है पर ये बता की ये चित्रावती और तेरा क्या चल रहा था...

में- वो तो मैं वो...

अनुज- अरे देखो तो भैया कैसे शर्मा रहे हैं... वैसे भैया मस्त माल है मुझे भी अछि लगती है..

अनुज के ये बोलने पर माँ ने उसके सर पैट एक मारा और बोली- ऐसे बोलते हैं बद्तमीज़ कहीं का...

इस पर सब हंसने लगे..

mausi-phir भी कर्मा बता न क्या चल रहा है तुम दोनों के बीच...

me-kuch चल नहीं रहा मौसी बस मुझे वो पसंद है और कुछ नहीं..

jaggu-aur उसे?

me-uska पता नहीं..

mausi-le इतने लोगो के बीच जो उसने किआ उसके बाद भी तुझे पता नहीं...

में- पर हमारे रस्ते अलग हैं मौसी कहाँ वो यहाँ की राजकुमारी कहाँ मैं..

mausi-to हमारा कर्मा किसी राजकुमार से काम है क्या...

me-abhi इस बात को छोडो मैं थक गया हूँ आराम करते हैब बाद में जो होगा देखा जायेगा...

anuj-dekhna तो पड़ेगा hi जब वो चित्रावती और तुम लग्र हुए थे तब बड़ी माँ ऐसे गुस्से से घूर रही थी न जब क्या करेंगी...

उत्तर तेरी मैंने उनके बारे में तो सोचा hi नहीं... खैर देखते हैं क्या होता है?

चोदामपुर

खा पीकर राजपाल बिस्तर पर तो लेट गए थे पर नींद नहीं आ रही थी, आज दोपहर में खेत पर बीते हुए पल बार बार उनकी आँखों के सामने आ रहे थे, बहु का वो भीगा बदन साड़ी में उसकी भीगी हुई छुछियां हाय और वो पल याद आते hi जब उन्होंने अपनी बहु की नंगी गांड देखि थी जब वो मूतने बैठी थी बस उनके शरीर में एक बिजली सी दौड़ गयी लुंड पूरी तरह से खड़ा हो गया था, फिर भी वो किसी तरह खुद को रोक रहे थे की अपनी बहु के बारे में ऐसा न सोचे एक पल के लिए पजामा नीचे खिसका कर लुंड को बहार निकल लिए साथ hi कुरता भी उतर दिया फिर मुस्कुराये और पाजामे के साथ साथ कच्चे को भी उतर फेंका उनके शरीर में एक अजीब रोमांच पैदा हो रहा था बगल में पड़ी एक धोती को ऐसे hi कमर पर लपेट लिए और फिर उसमे से लुंड को बहार निकल कर लेट गए और लुंड को मुठियाते हुए कल्पना करने लगे अपनी बहु के मखमली बदन की..

दो चार बारे लुंड की चूड़ी को ऊपर नीचे किआ hi था की बहार से रोने चीखने की आवाज़ें आई राजपाल तुरंत धोती को कमर पर लपेटते हुए उठ कर भागे..

बहार के हालात देख कर एक hi पल में राजपाल की आँखों में खून उतर आया उन्होंने देखा की भग्गू ने प्रेमा के बाल पकड़ रखें हैं और उसे घसीट रहा है बस फिर क्या था राजपाल तुरंत फुर्ती में आगे बढे उनका गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच गया आगे बढ़कर राजपाल ने भग्गू की गर्दन को दबोचा और धक्का देकर गिरा दिया, भग्गू के हाथ से प्रेमा के बाल छूट गए तो प्रामा वहीं गिर कर रोने लगी...

पर राजपाल पर तो जैसे खून सवार हो गया था गिरे हुए भग्गू पर उन्होंने लातें बरसाना शुरू कर दिया, भग्गू तो बिलकुल बेसुध सा हो गया था उसके बाद उन्होंने गुस्से में उसे उठाया और दरवाज़ा खोल कर घर के बहार धक्का देकर बहार फ़ेंक दिया और बापिस दरवाज़ा बंद कर लिए, भग्गू आगे होकर गली के किनारे जा गिरा और वहीं बेहोश हो गया...

राजपाल दरवाज़ा बंद करके बापिस मुड़े तो उन्हें प्रेमा का ख्याल आया दौड़कर वो रसोई से पानी लेकर आये और प्रेमा के पास जाकर बैठे और प्रेमा को पानी दिया जो की लगातार रोये जा रही थी...

तभी राजपाल का ध्यान प्रेमा की हालत पर गया, उनकी ककमक भरे बदन की गोरी चिट्टी बहु के बदन पर सिर्फ एक पेटीकोट के अलावा कुछ नहीं था...

प्रेमा की बड़ी बड़ी गोरी छुछियां जो चाँद की रौशनी में नहाकर और गोरी लग रही थी उन पर राजपाल की नज़र पड़ी तो राजपाल का तो पूरा बदन hi कैंप गया, अपनी बहु को इस हालत में देख कर राजपाल बिलकुल बावले से हो गए, वहीं प्रेमा बेचारी रोये जा रही थी... उसे ये ख्याल hi नहीं रहा की उसके बदन पर कपडे के नाम पर बस एक पेटीकोट है और वो अपने ससुर के सामने है

राजपाल को समझ नहीं आ रहा था क्या करें अब और क्या न करें... पर बहु का रोना भी नहीं देखा जा रहा था

किसी तरह खुद को संभाला और बैठ कर बहु को चुप करने लगे साथ hi उसके सर पर हाथ फिरने लगे...

प्रेमा बेचारी को तो बस एक सहारा चाहिए था जिससे ब्याह के आई थी आज वो hi सबसे बड़ा दुश्मन बना हुआ था तो उसकी जगह ससुर ने हाथ फेरा प्यार से तो पिघल गयी और उनके गले लग कर रोने लगी,..

राजपाल- बस मेरी बेटी, मेरी प्यारी बच्ची है न रट नहीं हैं,

प्रेमा- मुझे दर लग रहा है पापाजी

प्रेमा ने फफकते हुए कहा...

राजपाल- दर कैसा बीटा मैं हूँ न... मेरे होते हुए तुझे किसी से डरने की कोई ज़रुरत नहीं है..

प्रेमा का रोना थोड़ा काम हुआ तब तक राजपाल उसे सीने से लगाए सर पर हाथ फिरता रहा पुचकारता रहा अभी दोनों के hi मन में बस दुःख था सहानुभूति थी...

राजपाल- बीटा अब चल अंदर कमरे में आराम कर..

प्रेमा- नहीं पापाजी मुझे अकेला मत छोड़िये मुझे बहुत दर लग रहा है...

राजपाल- नहीं बीटा अकेले कहाँ मैं हूँ न तेरे साथ चल कमरे में ले चलता हूँ मैं तुझे..

ये कहकर राजपाल ने अपनी गदराई हुई बहु को पैरों और कमर से पकड़कर गॉड में उठा लिए और उसे उठाकर अपने बिस्तर की और चल दिए...

ऐसा नहीं था की बहु को उठाने में राजपाल को दिक्कत हो रही थी अभी भी हत्ता कट्टा शरीर था सरे खेत अकेले जोतने का दम रखते थे,

पर ये भी मानना पड़ेगा की बहु भी काम गदराई नहीं थी, उठाने की वजह से प्रेमा का पेटीकोट नीचे सरक गया था और राजपाल ने बहु की नंगी जांघों को थम रखा था वहीं ऊपर हाथ नंगी पीठ पर था और जैसे hi ये ख्याल फिर से दिमाग में घूमे तो फिर से दुःख और सहानुभूति की जगह उत्तेजना और हवस ने ले ली, राजपाल का लुंड फिर से रोड जैसा तन गया और चलते हुए बहु के चूतड़ों पर टक्कर मरने लगा...

प्रेमा को अपने ससुर का इस तरह उसका ख्याल रखना ाचा लग रहा था, हर औरत चाहती है कोई मर्द उसकी रक्षा करे, उसका ख्याल रखे, अपनी बाँहों में भरकर उसे सुरक्षित महसूस करवाए, आज वही सुरक्षा का एहसास प्रेमा को अपने ससुर की बाहों में हो रहा था जो की पति के साथ होना चाहिए था...

राजपाल बहु को लेकर कुछ कदम और बढे hi थे की अचानक से उनकी धोती की गांठ खुल गयी और राजपाल अपने हाथों में बहु के होने के कारन संभल नहीं पाए,

राजपाल को बिलकुल धक्का सा लग गया की बहु अधनंगी गॉड में है और मैं पूरा नंगा हूँ अगर किसी ने हमें इस हालत में देख लिए तो कितनी बदनामी होगी...

राजपाल का खड़ा लुंड अब नंगा होकर और आज़ाद हो गया और बार बार प्रेमा की चूतड़ों की दरार में पेटीकोट के ऊपर से घिसने लगा...

राजपाल के कदम धीरे हो गए न चाहते हुए भी अपने लुंड की बहु की गांड पर घिसन उन्हें अछि लग रही थी राजपाल उत्तेजना के बहाव में आकर बहकने लगे...

वो चलते हुए जानबूझ कर प्रेमा को ज़्यादा ऊपर नीचे करने लगे जिससे उनका लुंड अधिक से अधिक प्रेमा की गांड पर घिसने लगा...

कुछ पल चलने के बाद प्रेमा को भी अपने चूतड़ों पर घिसावट का एहसास हुआ तो उसे समझते देर न लगी की ये क्या है वहीं फिर उसे अपनी हालत का एहसास हुआ तो एक पल के लिए तो वो शर्म से गड गयी की वो अपनी ससुर की बाँहों में सिर्फ एक पेटीकोट में है... प्रेमा का बदन भी इस एहसास से गरम होने लगा, दुःख की जगह दिमाग में उत्तेजना छाने लगी..

अपनी गांड की दरार में ससुर के कड़क लुंड का एहसास उसे ाचा लग रहा था, पति के साथ सम्भोग के प्रयास में जो उत्तेजना उसके बदन में आई थी एक बार फिर से बापिस आ गयी

पर तभी वो हुआ जो शायद दोनों hi नहीं चाहते थे राजपाल बिस्तर तक पहुँच गए, बिलकुल नंगे होने की वजह से राजपाल को एक अलग hi एहसास हो रहा था, वहीं थोड़ा दर भी था की बहु को पता चल गया तो न जाने वो क्या सोचेगी...

अब प्रेमा और भग्गू के कमरे में पड़ा था डबल बीएड और हमारे राजपाल सोते थे छोटी खत पर, जब जग्गू की माँ भी होती थी तो दोनों अगल बगल छोटी खत बिछाकर सोते थे और जब लगता था सब सो गए हैं तो मंजू चुपके से राजपाल की की खत पर आ जाती थी और फिर दोनों छूट और लुंड का खेल खेलते थे और फिर बापिस अपनी अपनी खत पर सो जाते थे..

तो खत दो लोगो के सोने के लिए तो छोटी थी पर कुछ और करना हो तो सही थी क्यूंकि उसमे तो जितनी काम जगह उतनी चिपका चिपकी...

अब उसी छोटी सी खत पर राजपाल ने जाकर बहु को लिटा दिया, एक पल को उनके मन में आया दूसरी खत बिछा लें पर तुरंत दुसरे मन ने मन कर दिया... साथ hi उनकी मदद कुछ प्रेमा ने कर दी जो उसके हाथ से चिपकी हुई थी..

राजपाल ने भी एक लम्बी साँस लेते हुए फैसला किआ और उसी छोटी सी खत पर बहु के बगल में चिपक कर लेट गए... पूरे नंगे होकर अपनी अधनंगी बहु के साथ चिपक कर लेटने के एहसास से hi वो काँप रहे थे, चांदनी रात थी तो बरामदे में ज़्यादा उजाला तो नहीं था पर इतना था की हर चीज़ की रूपरेखा तो समझ सकें...

ससुर को लेटता देख प्रेमा ने भी जितना हो सकती थी उतना आगे खिसककर उनके लिए जगह बनाई पर इस खिसकने में नियति ने एक काम और कर दिया... खिसकने की वजह से जो पेटीकोट पहले से hi जांघों पर सिमटा हुआ था वो और ऊपर चढ़ गया और कमर पर इकठा हो गया जिससे प्रेमा के दोनों गोल मटोल चूतड़ नंगे हो गए..

इधर राजपाल ने जैसे hi लेटने के बाद अपने लिए जगह बनाई और पीछे से प्रेमा से चिपका तो दोनों को hi एक बात से करंट लगा क्यूंकि राजपाल का नंगा लुंड प्रेमा की नंगी गांड की दरार में घुस गया...

प्रेमा को अब तक ये एहसास नहीं था की उसका ससुर नंगा है या उसका लुंड बहार है पर अब चिपकने की वजह से अपनी पीठ और चूतड़ों पर महसूस कर प् रही थी की उसके ससुर जी बिलकुल नंगे होकर उसके साथ लेते हैं...

ये एहसास जैसे hi प्रेमा को हुआ उसके शरीर में बिजली सी दौड़ गयी गांड में धंसा हुआ कड़क लुंड एक अलग hi गर्मी दे रहा था उसे... वो अपने पति के किये हुए अत्याचारों को भूलकर लुंड की गर्मी में पिघलने लगी..

वो ये सोचने लगी की उसे पता hi नहीं चला कब उसके ससुर ने अपने कपडे उतरे क्या उन्होंने जानकर ऐसा किआ है क्या वो मेरे साथ सच में वो सब करना चाहते हैं... क्या मेरे ससुर मुझे छोड़ना चाहते हैं? मेरी छूट में अपना लुंड घुसा के मेरी छूट को भरना चाहते हैं इसीलिए उन्होंने अपने लुंड को ऐस मेरी गांड में घुसा रखा है... हाय कितना कड़क और गरम है ये.

क्या सच में पापाजी मेरे लिए ऐसे ख्याल रखते हैं और अगर हाँ तो कबसे?

फिर जैसे प्रेमा ने खुद के सवाल का जवाब खुद hi दे दिया.. अपनी हालत देख प्रेमा लगभग पूरी नंगी होकर अपने बदन को किसी के सामने भी लाएगी तो किसी भी मर्द के मन में ये ख्याल आएंगे hi चाहे वो ससुर हो या बाप..

ये तो प्रेमा की मनोदशा थी वहीं उसके पीछे राजपाल लेट चुके थे पीछे से उनका बदन बहु के नंगे बदन से बिलकुल चिपका हुआ था, हालाँकि लुंड का बहु की नंगी गांड में घुसने से उन्हें झटका लगा पर अब वो इतने गरम हो चुके थे की अब वो कुछ और सही गलत सोचना नहीं चाहते थे..

राजपाल ने हाथ बढाकर बहु की नंगी कमर पर रख दिया और धीरे धीरे से उसे सहलाने लगे...

राजपाल- अब तो दर नहीं लग रहा बहु तुझे...

प्रेमा- जब तक तुम साथ हो पापाजी तब तक तो बिलकुल नहीं लग रहा..

ये कहकर और अपनी बात को दर्शनर के लिए प्रेमा ने राजपाल का हाथ जो कमर पर था उसे पकड़ कर हल्का सा दबाया और आगे सरका कर अपने पेट पर रख दिया...

जिससे राजपाल को और ख़ुशी हुई....

राजपाल- मैं तो हमेशा hi तेरे साथ हु बीटा ऐसे hi..

ये बोलकर राजपाल ने प्रेमा के पेट को जकडटव हुए उसे और खुद से चिपकने की कोशिश की जिस कारन उसका लुंड प्रेमा के चूतड़ों के बीच और घुस गया... और जिसका असर ससुर बहु दोनों पर hi हुआ..

पर दोनों hi उससे अनजान बांबे की कोशिश कर रहे थे... जैसे की ये कोई साधारण सी बात हो...

राजपाल- बहु पर तुझे मेरी एक बात माननी होगी..

राजपाल ने बहु के मसल चिकने पेट को सहलाते हुए कहा...

प्रेमा- क्या पापाजी..

राजपाल- तुझे खुद को भी मजबूत बनाना होगा..

इस बार राजपाल ने बहु की नाभि को छेड़ते हुए कहा जिससे प्रेमा की हलकी सी सिसकी निकली

प्रेमा- आह्ह्ह्ह मैं कुछ समझी नहीं पापाजी..

राजपाल- अरे मैं बस इतना चाहता हूँ की अगर भग्गू तेरे साथ कभी कुछ ऐसा दोबारा करे तो तू खुद उसे जवाब दे उसका मुक़ाबला करे...

Prema-ye क्या कह रहे हो पापा तुम.. मैं उनका मुक़ाबला कैसे कर सकती हूँ..

राजपाल- क्यों नहीं कर सकती क्यूंकि तू औरत है इसलिए... बीटा औरत की ताकत को काम मत समझ औरत अपनी पर आ जाये तो अचे ाचों को अपने आगे झुका देती है..

प्रेमा- क्या सच में पापा... पर अगर मैं पति के खिलाफ बोलूंगी तो ये समाज मुझे hi बुरा भला कहेगा..

राजपाल- जब पति तुझे मारता है तो समाज बचने आता है क्या? तो जवाब देने पर समाज की क्या सोचना..

प्रेमा को ससुर की बात समझ आई तो उसके लिए इज़्ज़त और बढ़ गयी..

प्रेमा- पापा तुम बहुत अचे हो..

ये कहकर ख़ुशी से प्रेमा ने खुद को पीछे की और खिसका कर राजपाल से और चिपका लिया वहीं राजपाल ने भी प्रेमा को प्यार जताते हुए और जकड लिए जिसका नतीजा ये हुआ की राजपाल का लुंड सीधा जकड प्रेमा की छूट के होंठों तक पहुंच गया और धीरे धीरे घिसने लगा...

ससुर के लुंड के कड़क गरम टोपे का एहसास छूट पर पाकर उधर लुंड पर बहु के छूट के होंठों की गर्मी का एहसास पाकर दोनों ससुर बहु अब जैसे उत्तेजना में पागल से हो गए दोनों में से कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था... और न hi स्वीकार कर रहा था...



प्रेमा पाने चूतड़ों और कमर को हल्का हल्का हिलाकर छूट को लुंड पर घिस रही तहज वहीं राजपाल भी पीछे से हलके हलके धक्के लगा रहे थे हर पल के साथ दोनों की उत्तेजना बढाती जा रही थी...

राजपाल का हाथ बहु के पेट से फिसलता हुआ बहु की दोनों पापीती जैसी छूछीयो पर पहुंच गया और फिर धीरव धीरे से दबाने लगा...

छुच्छी दबवाने से प्रेमा और गरम हो गयी और पीछे की और कमर के धक्के लगाने लगी... वहीं राजपाल से तो बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया.... दोनों में से कोई नहीं बोल रहा था अब डुबो ससुर बहु की उत्तेजना और हवस बातें कर रही थी.. छूट और लुंड बात कर रहे थे..

राजपाल ने एक चुकी का मर्दन जारी रखते हुए दूसरी छुच्छी पर भी कब्ज़ा कर लिए..

प्रेमा के मुँह से सिसकियाँ निकलने लगी..

प्रेमा के लिए ससुर के लुंड की रगड़ छूट के होंठों पर सहना बहुत मुश्किल होता जा रहा था... छूट रह रह कर पानी बहा रही थी वहीं राजपाल के लिए भी अब बड़ी मुश्किल हो गयी थी, बहु की छूट का पानी रिस रिसकर उनके लुंड के टोपे को भीगा रहा था...

प्रेमा ने फिर भी और अनजान बनते हुए साथ hi राजपाल का हौसला बढ़ने के लिए शायद बोलै- पापाजी मैं सोने जा रही हूँ तुम भी सो जाओ..

राजपाल- उह्ह्ह हाँ हाँ बहु सो ja...main भी सोता हूँ..

हालाँकि दोनों जानते थे की नींद दोनों में से किसी को नहीं आने वाली...

जहाँ प्रेमा सोने का नाटक करने लगी वहीं राजपाल ने कुछ सोचा और फिर अगले hi पल....



सरलपुर



अगली सुबह अचानक एक दर्द के साथ रिमझिम की नींद खुली और जब उसकी आँख खुली तो उसनर खुद को किसी की बाहों में जकड़ा हुआ पाया और दर्द उसके चूतड़ों के बीच में हो रहा था क्यूंकि एक कड़क मोटा लुंड उसकी गांड से अंदर बहार हो रहा था...

उसने थोड़ा आँखें खोल मूँद कर हालत को जांचा और फिर बोली- आह्ह्हह्ह्ह्ह तुम्हे भी सबर नहीं होता न अछि खासी निबड़ ख़राब कर दी...

रमन- सबर hi तो नहीं होता मेरी जान

रमन ने और तेज़ी से रिम्मी की गांड मरते हुए कहा...

रिम- अगर सबर नहीं होता तो दाल देते अपनी बहन की गांड में वैसे भी इतने फैलते जा रहे हैं उसके चूतड़...

रमन- यार फिर से तुमने उसका जीकर कर दिया अब देखो क्या हाल करते हैं हम तुम्हारा...

रिम- करलो बीटा तुम अपने मन की मैंने भी तुम्हारी बहन को गांड नहीं फतवे तो मेरा नाम भी रिम्मी नहीं..

रमन: तुम तो मेरी बहन के पीछे hi पद गयी...

रिम- मैं कहाँ पीछे तो तुम पड़े हो अपनी बहन की गांड के....

रमन- हाय क्या गांड है तेरी आह कितनी टाइट है...

रिम- ओह्ह्ह भैया ऐसे hi मारो अपनी बहन की गांड आह्हः भैया भरदो अपनी बहन की गांड को...

रमन रिम्मी के मुँह से सुनकर और जोश में आ गया और ताबड़तोड़ गांड चुदाई करने लगा रिमझिम की..

इनकी चुदाई तो चली hi रहेगी तब तक थोड़ा इनके बारे में हम जान समझ लेते हैं... रमन और रिम्मी के बारे में तो आप सब जान hi चुके हैं अब जानते हैं इनके परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में..

रमन के पिताजी- चरण सिंह (46).. पहले किसान थे अब बेटे की ज़िद्द की वजह से इलेक्ट्रॉनिक्स का एक शोरूम चलते हैं शहर में.. थोड़े से रंगीन मिजाज़ हैं पर हैं छुपे रुस्तम शरीर अब भी कैसा हुआ कसरत की वजह से.

रमन की माँ- माधुरी(42) ग्रहणी हैं, बिलकुल आम संस्कारी माँ, पर इनके कुछ ऐसे राज़ हैं जो सिर्फ ये hi जानती हैं... बाकि बदन से कामुक हैं गांड तो ढोल से भी ज़्यादा बड़ी लगती है..






रमन की बहन- ख़ुशी(20) पढाई कर रही है भरे हुए शरीर की है पर बिलकुल सही सही जगह से hi शरीर भरा हुआ है, इनका पिछवाड़ा तो ऐसा है की देखकर ट्राफ्फिक रुक जाता है..





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रमन का भाई: चेतन(26) बाप के साथ मिलकर शोरूम चलते हैं, खुशमिजाज किस्म के हैं पर इनकी एक कमज़ोरी है या बीमारी जिसके बारे में आगे पता चलेगा..



रमन की भाभी:- चंचल(24) गाओं की हैं, पर बदन बिलकुल कैसा हुआ और भरा हुआ, बिलकुल सरल स्वाभाव की सीढ़ी सधी, जिसके चक्कर में लोग इन्हे कभी कभी बेवकूफ भी समझ लेते हैं...






तो ये है रिमझिम का ससुराल और बैकस्टोरी ये है की रिमझिम को तो आप जानते hi हो इतना सेक्सी बदन और रूप देखकर रमन रोज़ पिघल्जाते हैं और ऐसी hi एक दिन चुदाई के दौरान रिमझिम के आगे अपने दिल के सरे राज़ खोलते चले गए जिसमे ये भी था की वो अपनी छोटी बहन पायल के भरे हुए बदन को मसलकर छोड़कर बहनचोद बनना चाहते हैं, उन्हें लगा रिमझिम को अजीब लगेगा पर हमारी रिमझिम जो एक साथ भाई बाप चाचा का लुंड खा चुकी हो उसके लिए क्या अजीब बस फिर क्या था पति की बात सुनकर रिमझिम की छूट भी गीली हो गयी और तबसे hi मिलकर दोनों योजना बना रहे हैं की कैसे पायल को रमन के लुंड के नीचे लाया जाये पर रिम्मी ने अपने पति के आगे एक शर्त भी राखी है अगर रमन से उसने पायल को छुड़वा दिया तो उसे रिम्मी की एक बात माननी होगी...

बस तभी से उनकी ये योजना और नोकझोक चलती रहती है पर इन सब बातों से अनजान बेचारी पायल का ध्यान तो सिर्फ पढाई पर है..

तो इसके आगे क्या होता है ये सब अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.

 
anuj-dekhna तो पड़ेगा hi जब वो चित्रावती और तुम लग्र हुए थे तब बड़ी माँ ऐसे गुस्से से घूर रही थी न जब क्या करेंगी...

उत्तर तेरी मैंने उनके बारे में तो सोचा hi नहीं... खैर देखते हैं क्या होता है?



अपडेट 142
कालक

मैं सीधा गया और नहाया बहार सब लोग कक्ष में बातें कर रहे थे और खुश नज़र आ रहे थे आखिर जो हम करने आये थे वो हो चूका था.. ख़ुशी तो होगी hi वो भी इतनी मुश्किलों के बाद...

खैर नहाने के बाद बहार निकला तो मौसी ने पहले से hi सेविकाओं से खाना मांगकर रखा था वो खाया वैसे भी भूख लग रही थी उसके बाद मौसी की गॉड में सर रखकर लेट गया और मेरी देखा देखि अनुज माँ की, तो जग्गू क्यों पीछे रहता उसनर भी अपनी मम्मी की गॉड में सर रख लिए और तीनो औरतें हमारे सर पर हाथ से सहलाने लगी...

जिससे मुझे दूसरो का पता नहीं पर मुझे नींद आने लगी मैं मौसी की गॉड में hi सर रखकर सो गया...

नींद में एक परेशानी की वजह से नींद में से उठा साला खाने पीने की वजह से मूट आ रहा था बड़ी देर से पर मैं आलस और नींद की वजह से जा hi नहीं रहा था पर जब सहा नहीं पाया तो उठा और सीधा भगा शौचालय की और अह्ह्ह्ह रुके हुए मूट का त्याग करने में भी एक अलग आनंद है, उस आनंद को प्राप्त करके बापिस आया तो देखा अगल बगल नज़र दौड़ाई तो पाया मेरे अगल बगल भी सब सोये पड़े थे मेरे एक तरफ मौसी लेती हुई थी, सोते हुए उनकी साड़ी का पल्लू हैट गया था और नंगा पेट और नाभि साथ hi ब्लाउज में आधी चूचियां बहार दिख रही थी जिसे देखकर hi मेरे मुँह में पानी आने लगा,

मन किआ अभी गोल गहरी नाभि में जीभ डालकर चूसलून, तभी नेरी नज़र बगल में लेती माँ पर पड़ी तो नज़ारा कुछ और hi था, माँ की साड़ी का पल्लू भी नीचे पड़ा हुआ था मौसी की तरह माँ का भी हाल था पर माँ की नाभि नहीं दिख रही थी क्यूंकि उस पर अनुज ने कब्ज़ा जमाया हुआ था अनुज माँ की तरफ करवट लेकर सो रहा था और उसका हाथ माँ के नंगे पेट और नाभि को थामे हुए था.., वहीं अनुज जे पीछे तै अनुज की और करवट करके सो रही थी और जग्गू भी अपनी मम्मी के पेट को थामे उनसे पीछे से चिपका हुआ था अब अगर जग्गू का लुंड खड़ा हुआ होगा तो तै की गांड ने ज़रूर चुभ रहा होगा पर अभी तो सब मस्ती में सोते हुए नज़र आ रहे थे...

तो मैं भी मौसी और माँ के बीच अपनी जगह पर लेट गया और क्यूंकि माँ से तो अनुज चिपका हुआ था तो मैंने मौसी की तरफ करवट ले ली और अपने हाथ से उनके मांसल पेट को जकड लिए और उनके पैरों पर एक तंग चढ़ा दी और सोने लगा ...

तीनो गदराई औरतों पर तीनो जवान लड़के चढ़े हुए सो रहे थे... मेरा मन हुआ की मौसी के ब्लाउज को खोल कर थोड़ा स्तनपान किआ जाये पर क्यूंकि दिन था और उजाला भी सब बगल में सोये हुए थे तो ये प्लान थोड़ा रिस्की सा रिस्की लगा...

इसलिए मैंने अभी हवस को थोड़ा शांत करते हुए लेट गया मौसी को पकड़कर और मेरी नींद भी लग गयी...

न जाने कितनी देर बाद नींद खुली तो देखा माँ बगल में बैठी अंगड़ाई ले रही हैं.. धीरे धीरे आँखों को खोला और उठ कर देखा तो बाकि सब सो रहे थे अनुज अब सीधा होकर लेता हुआ था मैंने सबकी और नज़रें दौड़ाई तो देखा जग्गू भी तै से चिपक कर सो रहा था माँ ने अपना पल्लू सही किआ और फिर मेरी और देखा मुझे जगा पाकर वो मुस्कुराई और बोली- उठ गया बीटा... चाहता है तो और सो जा मैं जगा दूंगी...

में- नहीं माँ अब तुम्हे hi सुलाना पड़ेगा..

माँ- मैं कैसे स्कूलों बीटा तू खुद जाग गया है तो..

में- मैं अपनी बात नहीं कर रहा..

हुए ये बोलकर मैंने लुंड की और इशारा किआ जो बिलकुल तनाव में था..

माँ ने मेरी नज़र का पीछा किआ तो उन्हें भी खड़ा लुंड दिखा तो मेरी जांघ पर हलके से मारा और boli-dhattt बदमाश... दोपहर में सबके सामने मन नहीं भरा...

मैंने एक नज़र सब पर दोबारा डाली और फिर खड़ा हुआ और खड़ा होकर माँ को भी हाथ पकड़ कर उठा lia...aur फिर लेकर दुसरे कक्ष में आ गया

माँ- क्या कर रहा है लल्ला? यहाँ क्यों ले आया..

me-ise शांत कार्डो न माँ.

मैंने धोती को खोलकर लुंड बहार निकलते हुए कहा..

maa-ek तू और ऊपर से तेरा ये मुझे चैन से रहने कहा देते हो...

फिर मैं मुस्कुराते हुए पीछे बिस्तर पर बैठ गया...

माँ ने भी अपने बाल पीछे किये और मेरे सामने बैठने जा hi रही थी की मैंने पकड़ कर एक बार उनके होंठो को चूसा और फिर छोड़ दिया माँ मेरे पैरों के बीच बैठ गयी और फिर अपने हाथों से मेरे लुंड को पकड़ा. कुर फिर हाथ ऊपर नीचे फिरने लगी अगले hi पल सर झुककर लुंड के टोपे को अपने गरम मुँह में भर लिए...

मेरे मुँह से एक ाः निकल gayi..maa सर आगे पीछे कर कर के लुंड चूसने लगी





मुझे बेहद मज़ा आ रहा था, और मैं अपने हाथों को माँ के सर पर रखकर उन्हें लुंड पर दबाने लगा...

करीं 15 मिनट की तगड़ी लुंड चूसै के बाद मैंने अपना रास माँ के मुँह में hi भर दिया जिसे माँ एक अछि माँ होने के नाते जातक गयी...

कपडे वगेरा ठीक करके हम बहार आये और बापिस कक्ष में गए तो देखा मौसी बस उठ hi रही थी..

तो बिलकुल सही समय पर हम लोग बापिस आ गए थे...

इसके बाद ज़्यादा कुछ नहीं हुआ थोड़ा बहुत मैं बहार घूमा फिर अँधेरा हो गया तो सबने खाना खाया खाने के समय hi बड़ी माँ ने बताया की आगे की विधि वो कल सुबह पूजा के बाद बताएंगी उसके बाद हम लोग यहाँ से जा सकेंगे... जिसे सुनकर सब खुश हो गए..

खाना खाकर हम लोग बापिस कक्ष में आये और बातें करने लगे खुश होने लगे की अब कल घर जा सकेंगे.. की तभी एक सेविका आई और उसने मुझे एक परचा दिया...

मैंने वो परचा खोला तो उसमे एक सन्देश था जो बड़ी माँ की और से था उसमे लिखा था: कर्मा मुक़ाबला जीतने पर तुम्हे बधाई, क्यूंकि तुमने बहादुरी बूढी और लगन का पूर्ण परिचय देकर जीत हासिल की है तो अब तुम्हे कालक की परंपरा अनुसार पुरस्कार भी मिलेगा इसके लिए कुछ देर बाद सेविका के साथ तुम्हे मुख्या कक्ष में आना होगा.

औरतें आपस में बातों में लगी थी पर अनुज ने मेरे पढ़ने के बाद वो परचा पढ़ा और फिर जग्गू ने इतने में मौसी बोली- क्या लिखा है रे पर्चे में

अनुज- भैया को मुक़ाबला जीतने पर बड़ी माँ पुरुष्कार देगी इसलिए थोड़ी देर में बुलाया है...

माँ- कैसा पुरुष्कार मिलेगा...

में- ये तो मुझे भी नहीं पता..

Maa-phir रहने दे मत जा.

Anuj-kyun नहीं जाना अभी पुरुस्कार मिलने की बरी आई है तो..

Jaggu-aur क्या मैं तो कहता हूँ हम भी चलेंगे..

Anuj-main भी ..

तै- अरे हाँ हाँ तुम बच्चा लोग hi जाना हम औरतें यही रहेंगी..

माँ- और क्या पता नहीं का ढकोसला हो..

ऐसे hi बातें चल रही थी की सेविका दोबारा बुलाने आई तो मैं अनुज और जग्गू उसके साथ चल दिए..

मुख्या कक्षा में पहुंचे तो बड़ी माँ अपने सिंघासन जैसी कुर्सी पर बैठी थी...

बड़ी माँ- पुरुस्कार के लिए तो हमने सिर्फ तुम्हे बुलाया था कर्मा तुम साथियो को भी ले आये

में- जीता मैं ज़रूर हूँ ओर योगदान हम सबका है तो पुरुस्कार भी सबका होगा..

मेरी बात सुनकर बड़ी माँ ने कुछ सोचा और मुस्कुराई.

बड़ी माँ- अब पुरुस्कार तुम्हारा है चाहे अकेले रखो या साथियों में बाँट दो ये तुम्हारी इच्छा है, खैर आओ हमारे पीछे...

बड़ी माँ उठ कर चलदी और हम लोग उनके पीछे पीछे, चलते हुए मेरी नज़र बड़ी माँ के मटकते छतादो पर hi थी क्या मस्त भरी चूतड़ थे बड़ी माँ के.. अगर इनका स्वाद एक बार मिल जाता तो नाज़ा hi आ जाता...

हम सब गलियारे से होते हुए एक बड़े कक्ष में पहुंचे जिसके चरों तरफ परदे लगे हुए थे बीच में एक बड़ा सा बिस्तर था ऐसा लग रहा था ये बड़ी माँ का कक्षा है..

खैर बड़ी माँ बीच कक्षा में जाकर रुक गयी..

हम तीनो ने एक बार एक दुसरे को देखा जैसे जानना छह रहे हो क्या हो सकता है...

बड़ी माँ ने एक लम्बी ख़ामोशी के बाद बोलना शुरू किआ,

बड़ी माँ- तो आप सब को कालक की एक परंपरा के बारे में बताती हूँ, महारानी कालक ने जब ये मुक़ाबले की नीति राखी तब hi ये पुरुस्कार की रीति भी शुरू की जिसमे जो भी बताये हुए मुक़ाबले को जीतेगा उसे कालक की और से एक यादगार पुरुष्कार मिलेगा ऐसा पुरुष्कार जो कालक के लिए बहुत hi महत्वपूर्ण है या सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा. और वो पुरुस्कार और कुछ नहीं है वो होगा रानी का यौवन.

हम सब लोग असमंजस में उनकी तरफ देखने लगे तो बड़ी माँ बोली- सरल शब्दों में कहें तो विजेता यानि तुम्हे हमारा बदन मिलेगा आज की रात हम अपना बदन तुम्हारे सामने परोसते हैं...

और तुम चाहो वैसे हमारे बदन को अपनी संतुष्टि के लिए उपयोग कर सकते हो..

हालाँकि ऐसा पहली बसर हो रहा है की पुरुष्कार तीन लोगो में बनता जा रहा है पर विजेता का निर्णय सर्वोपरि है जो की तुम हो...

बड़ी माँ की बात सुनकर हमारी तो आँखें फटी रह गयी.. अनुज और जग्गू को समझ नहीं आ रहा था क्या करें..

बड़ी माँ ने हमें देखा और फिर अपने कपडे उतरने शुरू कर दिए. .

हम लोगो को जब समझ आया की इसका मतलब क्या है उससे पहले हमारे लोडे तन चुके थे..

मतलब जिस गांड को मैं चखने के सपने देख रहा था वो सपना सच होने वाला था....

मैंने जल्दी से आगे बढ़कर बड़ी माँ को पकड़ लिए तब तक वो ऊपर से नंगी हो चुकी थी उनकी छुछियां देखकर मुझसे रहा न गया और मैंने अपना मुँह उनपर लगा दिया और चूसने लगा.

. मुझे देख कर अनुज और जग्गू कहाँ पीछे रहने वाले थे वैसे भी दोपहर से मेरी और माँ की चुदाई देखकर भरे पड़े थे अनुज भाग कर आया और दूसरी छुच्छी पर कब्ज़ा कर लिए वहीं जग्गू बड़ी माँ का पेट चाटने लगा नाभि को चूसने लगा......

जबसे कालक गाओं आये थे सबसे ज़्यादा बड़ी माँ ने hi हमें तड़पाया था अब हमारी बरी थी...

बड़ी माँ के पूरे बदन पर बस एक पेटीकोट था, मैं और अनुज बेरहमी से उनकी छूछीयो को चूस रहे थे, कुछ देर बाद मैंने छुच्छी को छोड़ा और जिस चीज़ का मुझे इंतज़ार था उसके पीछे पद गया मैंने पीछे से बड़ी माँ का पेटीकोट उठाया और नीचे बैठ गया मेरे सामने उनके दोनों बड़े बड़े चूतड़ और बीच का भूरा छेड़ आ गया बस फिर मुझसे न रुका गया और मैंने अपना मुँह बड़ी माँ की गांड पर लगा दिया और उनके चूतड़ों को चाटने लगा बीच बीच में काट भी रहा था हाथों से मसल रहा था...

वहीं बड़ी माँ की छुच्छी पर मेरी जगह जग्गू ने ले ली..

बड़ी माँ बस आँखें बंद किये हुए सर उठाये तीन लड़को से अपना बदन मसलवा रही थी बीच बीच में उनके होंठों से हलकी हलकी सिसकियाँ निकल रही थी...

काफी देर तक हम बड़ी माँ के बदन को चाटते चूसते रहे फिर थोड़ी देर बाद हमने उन्हें बिस्तर पर लेजाकर लिटा दिया और उन्हें घुमा कर उनका पेटीकोट भी उनकी कमर से खींचकर उतर दिया





बड़ी माँ कालक की मुखिया जिनकी मर्ज़ी के बिना एक पत्ता तक नहीं हिलता था वो हमारे सामने बिलकुल नंगी थी...

उनके नंगे गोर और गदराये हुए बदन को देखकर हम तीनो की hi धड़कन तेज़ हो गयी और लुंड तन गए...

कुछ तो अलग था उनके बदन में जो मुझसे रुका नहीं जा रहा था उन्हें पूरा नंगा करके मैं बड़ी माँ के पैरों के बीच आया और अपना मुँह उनकी छूट पर टिका दिया और चाटने लगा, उनकी छूट जो रिस रिस कर पानी बहा रही थी मेरी जीभ लगते hi और गीली हो गयी..

वहीं अनुज और जग्गू बड़ी माँ के चेहरे के दोनों और बैठ गए और बड़ी माँ के हाथ अपने खड़े लुंड पर रख दिए साथ hi अपने हाथों से उनकी छूछीयो को रगड़ने लगे...

बड़ी माँ तो इस चारो तरफ के हमले से तड़प रही थी... बार बार उनके मुँह से सिसकियाँ निकल रही थी पर वो भी ज़्यादा देर नहीं निकल पाई क्यूंकि इतने में अनुज ने अपना लुंड उनके मुँह में घुसा दिया...

इधर मुझसे भी और नहीं रुका गया और दोनों टैंगो को छोड़कर मैं बीच में बैठा और फिर अपने दहकते हुए लुंड को बड़ी माँ की उबलती हुई छूट पर रख दिया बड़ी माँ मेरे लुंड को अपनी छूट पर महसूस कर मचलने लगी...

वो अनुज और जग्गू का लुंड बदल बदल कर चूस रही थी और ऊपर एक बार देखते हुए मैंने एक करारा धक्का दिया और लुंड बड़ी मा की छूट की मखमली दीवारों को चौड़ा करता हुआ अंदर घुस गया...

वहीं उनके मुँह से एक घुट्टी हुई आवाज़ निकली क्यूंकि मुँह में जग्गू का लुंड घुसा हुआ था... हम तीनो hi न जाने क्यों बड़ी माँ के साथ थोड़ा सख्ती से और बेरहमी से पेश आ रहे थे जैसे उन्हें हमें इतना सताने की सजा दे रहे हो पर उसके बाद भी ऐसा कहीं नहीं लगवरः था की बड़ी माँ परेशां हो..

मैं थोड़ी hi देर में अछि गति से बड़ी माँ को छोड़ने लगा..





ऊपर की तरफ अनुज और जग्गू बड़ी माँ के मुँह को बरी बरी से छोड़ रहे थे...

जब हम लोग यहाँ आये थे तो सोचा नहीं था ये भी करने को मिलेगा पर जो होता है अचे के लिए होता है..

मेरे हर धक्के के साथ बड़ी माँ की छुछियां आगे पीछे नाच रही थी...

अनुज- आअह्ह्ह्ह लो बड़ीई maaaahhhhhhhhhhhh अह्ह्ह्हह्हह पूराआ चूस लोओओओओओओ आह्ह्ह्हह्ह..

जग्गू- ुहममम कभी सोचा नहीं था की बड़ी माँ को छोड़ने को मिलेगा आह्हः मज़ा आ रहा है...

में- आह्ह्हह्ह्ह्ह क्या गरम और कासी हुई छूट हो ऐसा लगता है कोई कुंवारी लड़की होऊ.... अह्ह्ह्ह.

बड़ी माँ बेचारी कुछ बोलने की हालत में नहीं थी मुँह में लुंड फंसा हुआ था...

थोड़ी देर मैंने छोडंर के बाद अपना पुरुस्कार बनता और मेरी जगह अनुज बड़ी माँ को घोड़ी बनाकर छोड़ने लगा वहीं वो जग्गू का लुंड चूस रही थी...

मैं पीछे लेता हुआ इस ाड़णहुत नज़ारे का आनंद लेते हुए लुंड हिला रहा था..

थोड़ी देर छोडंर के बाद अनुज की जगह जग्गू ने ले ली, और उसने भी बुरी तरह से बड़ी माँ को छोड़ा हम तीनो के छोड़ने के दौरान बड़ी माँ कई बार झाड़ चुकी थी... हम तीनो ने एक एक बार और उनकी छूट को बारी बारी से छोड़ा और फिर उनके मुँह में अनुज और जग्गू ने और मैंने उनकी छूट में अपना रास भर दिया...

इतनी चुदाई के बाद बड़ी माँ की हालत तो पतली हो गयी थी पर हम लोग अभी नहीं थके थे लुंड कुछ hi देर में फिर से कड़क हो गए तो फिर से चुदाई का दौर चालू हुआ पर इस बार बड़ी माँ के लिए थोड़ी अलग मुश्किल थी क्यूंकि इस बार हमने छूट की गजगाह उनके गांड के भूरे छेड़ को चुना...

सबसे पहले मैंने उन्हें बिस्तर पर झुककर अपना लुंड पीछे से उनकी गांड में घुसाया तो बेचारी की चीख निकल गयी पर मैं नहीं रुका और फिर धीरे धीरे बड़ी माँ की अद्भुत और राजकीय गांड मरने लगा...







बड़ी माँ की गांड मरने में छूट से भी ज़्यादा मज़ा आ रहा था, उनकी गांड मेरे लुंड को जकड़े हुई थी और बेहद मखमली एहसास दे रही थी...

बड़ी माँ भी हर धक्के के साथ आह्ह्ह्हम्म्म्म ओह्ह्ह्हह्ह जैसी सिसकियाँ निकल रही थी..

करीब 10 मिनट तक बड़ी माँ की गांड छोड़ने के बाद मैं हटा तो जग्गू उनकी गांड के पीछे लग गया कुछ देर उसने मरी तो उसके बाद अनुज ने बुरी तरीके से गांड को पेला...

पर इस सबके बाद भी हम लोग नहीं रुके और जग्गू नीचे लेट गया और बड़ी माँ को अपने ऊपर छूट ने लुंड लेकर बिठा लिए जिसके बाद अनुज ने पीछे से बड़ी माँ की गांड में लुंड पेल दिया और मैंने मुँह में तो अब बड़ी माँ के तीनो छेड़ में एक लुंड था और उन्हें आनंद दे रहा था...





करीब 20 मिंट की टिहरी चुदाई के बाद बड़ी माँ तो बिलकुल थक कर गिरने लगी वहीं हम लोग भी उनके एक एक छेड़ में झाड़ गए मैं मुँह में जग्गू छूट में और अनुज गांड में झाड़ गया...

जब हम लोग बड़ी माँ से अलग हुए तो उनकी हालत ऐसी थी की उन्होंने सर उठाकर हमें एक बार देखा तक नहीं या देख hi नहीं पाई..

अपने कपडे पहनकर हम लोग बापिस अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा औरतें पहले hi सो चुकी थी हम लोग भी बड़ी माँ की चुदाई से संतुष्ट और थके हुए थे तो हम लोग भी सो गए...

सुबह तैयार होकर हम सब बड़ी माँ के साथ पहुंचे उन्हें रात में जिस हाल में देखा और फिर अभी देखकर थोड़ा अजीब लग रहा था पर उनका बर्ताव पहले जैसा hi था...

उनके साथ हमने ुबके पूर्वजों की पूजा की पूरी विधि के साथ और उसके बाद उन्होंने एक सुराई नुमा कलश जो की एक कपडे से ढाका हुआ था उसमे से कुछ निकला वो भी तीन बार और फिर उन्हें अलग अलग पोलियों में रख lia...aur फिर तुरंत उसे कपडे से बांध दिया

उसके बाद बड़ी माँ बोली- इन तीनो पोटलियों में वही फल हैं जिनके लिए आप लोग यहाँ आये हो क्यूंकि आपने मुक़ाबला जीता है तो फल आपके हुए परन्तु इन फलो के प्रयोग के लिए सावधानी बरतनी होगी.. इन पोटलियों को तभी खोलना जब उपयोग करना हो उससे पहले नहीं दूसरी और बहुत hi ज़रूरी बात आप लोगो ने यहाँ के सरे कार्य तो निपटा लिए पर एक कार्य अभी भी बचा है जिसके बिना ये फल किसी योग्य नहीं होंगे...

बड़ी माँ की बात सुनकर हम परेशां हो गए...

चोदामपुर

हालाँकि दोनों जानते थे की नींद दोनों में से किसी को नहीं आने वाली...

जहाँ प्रेमा सोने का नाटक करने लगी वहीं राजपाल ने कुछ सोचा और फिर अगले hi पल....

कमर को आगे बढ़ाते हुए जब राजपाल को ये महसूस हुआ की लुंड प्रेमा की छूट के द्वार पर है तो उन्होंने उसकी कमर थम के एक करारा धक्का लगाया जिसका नतीजा ये हुआ की उनके लुंड का टोपा उनकी बहु की छूट में फंस गया...

प्रेमा- ahhhhhhhhhh पापाआजीई...

राजपाल- ओह्ह्ह्हह ुहममम बहहू क्याआअह्ह्ह हुआअह्ह...

प्रेमा- अहम कुछ नहीं बस शायद नस खिंच गयी ..

प्रेमा ने अभी भी अनजान बनते हुए कहा तो राजपाल जो की थोड़ा बहुत सोच रहा था की बहु क्या कहेगी उसकी तो बाँसहें खिल गयी उसने सोचा अब बहु राजी है तो फिर मज़े hi मज़े...

राजपाल- नस चढ़ गयी रुक बहु अपने पेअर ऐसे करले फिर तुझे आराम आएगा

ये कहकर राजपाल ने बहु के पेअर ऐसे मोड़ दिए जिससे उसे छोड़ने में और आसानी हो..

राजपाल- अब ठीक है बहु??

प्रेमा- ुहम्म्म्म

ये जवान सुनते hi राजपाल ने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए हर धक्के के साथ राजपाल का लुंड बहु को छूट में थोड़ा थोड़ा धंसता जा रहा था, उन्हें यकीन नहीं हो रहा था की उनका लुंड उनकी खुद की बहु की छूट में है, इस ख्याल से hi राजपाल का पूरा शरीर गंगना गया...

वहीं अपनी छूट में अपने ससुर का लुंड पाकर भाभी की हालत भी ख़राब हो रही थी उनकी छूट झरने की तरह बहे जा रही थी...

वो अनजान बनने की पूरी कोशिश कर रही थी क्यूंकि उन्हें समझ नहीं आ रहा था की कैसे वो अपने ससुर का सामना करें पर उनके ससुरजी तो एक अलग hi दुनिया में खोये हुए थे... राजपाल अब सब भूल कर अपनी बहु की मखमली छूट के सुख के दरिया में बाह चले थे, उन्होंने बहु को और कास के पकड़ लिए राजपाल की उत्तेजना चरम पर थी उसे लग रहा था अभी रहत नहीं मिली तो उसका दिमाग और लुंड दोनों फैट जायेंगे इसीलिए उसने बहु को कास के पकड़ा और फिर पीछे सर दनादन धक्के लगाने शुरू किये अपनी बहु की गरम छूट में....





प्रेमा जो अनजान बनने का नाटक कर रही थी उसके मुँह से हर धक्के के साथ आह्ह्ह्हह्ह ahhhhhhhhhhjhh पायःहःपिआजीइ...

निकल रहा था

राजपाल पर तो जैसे भूत सवार हो चूका था और एक मशीन की तरह वो थप थप थप बहु को तेज़ी से लगातार चोदे जा रहा था और करीब 5 मीन्स की ऐसी hi धुआंधार चुदाई के बाद राजपाल का शरीर अकड़ा और ढीला पद गया... उसके लुंड से रास निकलकर बहु की छूट में भर गया जिसके बाद कहीं जाकर राजपाल को थोड़ी शांति मिली .. अपनी छूट में अपने hi ससुर का रास भरता महसूस कर प्रेमा भी न सह पाई अजर झड़ने लगी दोनों लेते हुए थोड़ी देर तक हांफते रहे फिर राजपाल बहु से अलग हुआ.. अलग होते hi राजपाल को न जाने क्या सूझा और वो तुरंत बिस्तर से उठ खड़ा हुआ जिसपर प्रेमा भी हैरान थी पर अगले hi पल राजपाल ने कुछ ऐसा किआ की प्रेमा और हैरान हो गयी...

इसके बाद क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्

 
इन पोटलियों को तभी खोलना जब उपयोग करना हो उससे पहले नहीं दूसरी और बहुत hi ज़रूरी बात आप लोगो ने यहाँ के सरे कार्य तो निपटा लिए पर एक कार्य अभी भी बचा है जिसके बिना ये फल किसी योग्य नहीं होंगे...

बड़ी माँ की बात सुनकर हम परेशां हो गए...

अपडेट 143

कालक गाओं

साला अब क्या काम रह गया मुक़ाबला भी जीत लिए अब भी कुछ बचा है क्या, हम सब हैरानी भरी नज़रों से बड़ी माँ को देख रहे थे,

बड़ी माँ- बात ये है की महारानी कालक को अंदेशा था की भविष्य में कोई व्यक्ति लालच वश आकर इन फलों को पाने की कोशिश ज़रूर करेगा इसलिए उन्होंने इन फलों की शक्ति को सुला दिया, अतः ये फल अभी उपयोग के योग्य नहीं हैं...

मेरे मन में आया की बहुत जल्दी बता दिया ये इस साली ने अगर रात को इसकी चुदाई न की होती तो इस बात पर गुस्से में एक बार और छोड़ देता, खैर उसका राज्य था हम सिर्फ सुन सकते थे...

Maa-to फिर अब क्या होगा..

बड़ी माँ - इन फलों की शक्ति को जागृत करना होगा..

में - वो कैसे..

बड़ी माँ- तीनो पोटलियों पर देखो नीचे की तरफ एक एक रंग होगा..

हमने देखा तो था..

बड़ी माँ- तो आगे का कार्य ये है की कालक गाओं से उत्तर पूर्व और पश्चिम तीनो दिशाओं में यहाँ से सामान दूरी पर एक एक तालाब है. जिन्हें महारानी कालक ने बनाया था...

पोटली के नीचे दिए हुए रंग के अनुसार आपको उसी दिशा में जाना होगा, जैसे नीला रंग यानि उत्तर दिशा, पीला पूर्व और नारंगी पश्चिम...

हमने देखा तो तीनो पोटलियों के नीचे अलग अलग रंग तवा जैसा बड़ी माँ ने बताया...

में- फिर

बड़ी माँ- उसके बाद पोइरी श्रद्धा से महारानी कालक का ध्यान रखते हुए 3 बार इस पोटली को लेकर तालाब में डुबकी लगनी है और फिर इनकी शक्तियां जाग्रत हो जाएँगी... डुबकी लगाने के बाद आप देखेंगे तो पोटली के नीचे का रंग गायब हो चूका होगा इसका मतलब होगा की फल की शक्तियां जाग चुकी हैं..

में- ठरक है बड़ी माँ हम लोग तालाब मरीन इन्हे धो लेंगे आप बस हमें रास्ता बता देना.

बड़ी माँ- बिलकुल पर क्यूंकि आप लोग तीन जोड़े में हो तो मैं यही सलाह दूंगी की तीनो जगह एक साथ जाने की जगह आप तीनो जगह एक साथ निकालें अलग अलग जोड़ी में जिससे आप लोगो का समय भी बचेगा ..

बड़ी माँ की ये बात मुझे भी सही लगी..

बाकि की जानकारियां लेने के बाद हम लोग बहार आये और अपने कक्ष में जाकर विचार करने लगे की कैसे क्या करना है..

तै- फिर कौन कौन कहाँ जा रहा है कैसे किसके साथ क्या करें..

अनुज- इसमें सोचना क्या है जैसे घर से जोड़ियां बनाकर आये थे उसी हिसाब से चलते हैं बाई दिशा चुन लें अपनी अपनी.

जग्गू- हाँ ये सही रहेगा...

माँ- हाँ इससे बेकार में समय भी बेकार नहीं जायेगा

में- तो फिर मैं और मौसी उत्तर की और जायेंगे अनुज और माँ पश्चिम में चले जाओ तै और जग्गू पूर्व में..

मेरी बात से सब लोग राज़ी दिखे...

में- और जब अपना काम पूरा हो जाये तो हम सब को एक जगह मिलना है और वो जगह मेरे हिसाब से कालक का द्वार सही रहेगी... जहाँ से हमने कालक में प्रवेश किआ था..

माँ- हाँ वो सब ने देखा भी है और ढूंढने में भी आसानी होगी...

जग्गू- जो भी वहां पहुँचता जायेगा वो बाकि सब के लिए इंतज़ार करेगा..

मौसी- हाँ पर बिना सब के पहुंचे वहां से हिलना भी नहीं है....

तै- तो ऐसा करो अभी जल्दी hi निकल लो का पता कितनी देर लग जाये, अँधेरा होने तक द्वार पहुँच जायेंगे तो सही रहेगा...

में- हाँ सही कह रही हो तै ji...me आप सब लोग चलके बड़ी माँ से विदाई लो मैं भी बस 5 मिंट में आता हूँ..

माँ- तू कहाँ जायेगा अभी..

मौसी- जाने दो जिज्जी अभी नाव वाली कहानी पूरी करने जाना होगा...

मैं थोड़ा हिचकिचाया पर सब मुस्कुरा रहे थे सब चल गए और मैं चित्रावती को ढूंढने लगा...

पहले उसके कक्ष मैं देखा तो वो वहां नहीं थी फिर बाघ में वहां भी नहीं मिली..

फिर बस एक आखिरी जगह थी देखने के लिए जहाँ वो हो सकती थी..

मैं अंदरूनी रस्ते से होता हुआ वहीं चित्रावती के झरने वाली जगह पंहुचा तो वहां भी कोई नहीं था निराश होकर मुड़ने वाला hi था, की मेरी नज़र वहां हमेशा रहने वाले डंडे पर पड़ी जिसके नीचे एक परचा सा था.

मैंने डंडे के नीचे से परचा निकला और पढ़ना शुरू किआ...

कर्मा, मुझे पता है तुम हमें अभी ढूंढ रहे होंगे, पर हम तुमसे नहीं मिल सकते या कहें नहीं मिलना चाहते हैं बस ये समझो की नहीं मिल सकता क्यूंकि हम तुम्हारा सामना नहीं कर सकते तुम्हारे जाते हुए,

कर्मा हम पूरे मन से तुम्हे धन्यवाद् कहते हैं, तुमने हमें कई बातें ऐसी सिखाई हैं जिससे हमारी सोच hi ज़िन्दगी को लेकर काफी बदल गयी है.. हम बहुत कुछ करना चाहते हैं पर अपने तरीके से,

तुम हमारी लिए कुछ hi दिनों में काफी कुछ बन गए हो, एक दोस्त, एक साथी, और शायद उससे भी ज़्यादा कुछ इसीलिए हम तुम्हे आगे जाने के लिए बहुत साडी शुभकामनाएं देते हैं, तुम बहुत अचे हो आगे भी इसी तरह रहना..

और आखिरी बात ये की ये आखिरी विदाई नहीं है हम फिर मिलेंगे ज़रूर मिलेंगे कब कैसे ये नहीं बता सकती पर मिलेंगे ज़रूर तब तक के लिए अपना ख्याल रखना.

तुम्हारी साथी

चित्रावती

चित्रावती का परचा पढ़ने के बाद एक बार को मेरा दिमाग घूम गया समझ नहीं आया की वो ये सब सामने आके क्यों नहीं कह सकती, खैर पर उसकी बातें पढ़ कर मन भी भर गया, सच hi था की उससे मुझे भी एक गहरा लगाव हो गया था न जाने क्यों ऐसा लगता था की वो साथ रहे, पर अभी जो उसकी इच्छा उसका सम्मान ज़रूरी था मैंने उसके पर्चे को मोड़ कर अपने पास रख लिए.. और बापिस जाकर सबसे मिला बड़ी माँ ने विदाई देते हुए सर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया...

ऐसा लग रहा था की हमारे जाने का दुःख कहीं न कहीं उन्हें था..

खैर हम वहां से निकले तो गाओं के बहार तक एक सेवक साथ आया और उसने हमें तीनो तालाब के रास्तों से अवगत कराया तो ज़रूरी सामान और जानकारी लेकर और जल्दी hi मिलने का वादा कर हम लोग तीन जोड़ो में बांटकर निकल गए..

मैं और मौसी- उत्तर के तालाब की और, माँ और अनुज- पश्चिम, जग्गू और तै- पूर्व.

आगे देखना था ये सफर क्या क्या नए नए अनुभव करवाने वाला था...

चोदामपुर

राजपाल ने जब अपनी बहु को पकड़ कर उठाया तो एक पल को वो हैरान रह गयी अब इस हालत में जब वो पूरे नंगे हैं तो कहाँ ले जाना छह रहे हैं, पर राजपाल ने बहु को खींच कर खड़ा कर लिए और फिर उसे पकड़कर प्रेमा और भग्गू के कमरे में ले गए, राजपाल ने अंदर पहुँच कर अंदर से दरवाज़े की कुण्डी लगा दी और बत्ती जला दी तो पूरा कमरा रौशनी में नाहा गया और उसी रौशनी में जब रजपाल की नज़र अपनी बहु के नंगे मादक चमकते बदन पर पड़ी तो राजपाल की आँखें बड़ी हो गयी वहीं प्रेमा इस तरह ससुर के सामने नंगी होने की वजह से शर्मा गयी और उसने अपने मुँह को हाथों से छुपा लिए...

प्रेमा की ये हरकत राजपाल को बहुत अछि लगी वो धीरे से आगे बढ़ा और प्रेमा के नंगे बदन को अपनी बाहों में लेकर उसे बिस्तर पर बिठा दिया

राजपाल- आह्हः बहु तू कितनी सुन्दर है, ऐसा रूप ऐसा यौवन आठ मन करता है बस देखता hi रहूं...

प्रेमा- ुहम्म्म्म बस कीजिये पापाजी हमें शर्म आ रही है...

ये कहकर प्रेमा ने अपना चेहरा ससुर की नंगी मरदाना छाती में छुपा लिए, बहु की इस हरकत से राजपाल गंगना गए और बहु को बाजुओं में जकड लिए..

राजपाल- अरे इसमें शर्माना कैसा बिटिया रानी.. सच hi तो बोल रहे हैं..

एक बार की चुदाई की गर्मी निकलने के बाद अब दोनों hi थोड़े शांत लग रहे थे... अब पूरे संयम के साथ ससुर बहु हवस के इस खेल में आगे बढ़ रहे थे...

राजपाल ने एक हाथ से बहु के चेहरे को पकड़ कर ऊपर की तरफ किआ तो दोनों की आँखें मिली प्रेमा की आँखों में शर्म और उत्तेजना का मिला जुला भाव था तो राजपाल की आँखों में स्नेह और हवस, धीरे धीरे दोनों आगे बढे और दोनों के hi उत्तेजना की गर्मी से जलते होंठ आपस में मिल गए, बहु के होंठों का रास अपनी जुबान पर महसूस कर राजपाल तो जैसे स्वर्ग में पहुँच gaye,halanki एक बार बहु की गरम छूट को छोड़ लिया था पर तब सब जल्दी जल्दी हुआ था, पर अभी राजपाल पूरे संयम के साथ अपनी बहु के हर मादक अंग को भोगना चाहते थे...

दोनों एक दुसरे के होंठों को प्यासों की तरह चूस रहे थे न ससुर काम था न बहु, ससुर बहु का ऐसा प्रेम शायद hi कहीं देखने को मिले...

होंठों के रस्ते कब ज़ुबान एक दुसरे के मुँह में अटखेलियां करने लगी दोनों को hi पता न चला, बहु की ज़ुबान को चूसते हुए राजपाल के दोनों हाथ उसके पूरे बदन पर घूम रहे थे...

कभी उसके गोल गोल मटोल चूतड़ों को मसलते तो कभी उन्नत छूछीयो को,

जब दोनों के होंठ अलग हुए तो दोनों बुरी तरह हांफ रहे थे, राजपाल ने बहु को पीछे की तरफ धक्का देकर बिस्तर पर लिटा दिया, और खुद उसके ऊपर आ गए और उसके बदन को चूमने चाटने लगे...

पहले गर्दन को चूमना शुरू किआ तो प्रेमा सिहर उठी, धीरे धीरे से हर एक जगह पर ध्यान देते हुए राजपाल के होंठ बहु की गर्दन से नीचे फिसलते हुए उसके सीने पर आ गए,

जैसे hi राजपाल के होंठ प्रेमा की छूछीयों के पास पहुंचे प्रेमा की साँसे तेज़ हो गयी अपने ससुर की साँसों और फिर होंठों को अपनी छूछीयो की त्वचा पर महसूस कर प्रेमा उत्तेजना से पागल होने लगी उसका सीना खुद बा खुद बिस्तर से उठ गया पीठ अकड़ गयी अपनी छूछीयो को पूरे तनाव जे साथ ऊपर उठा दिया जैसे खुद से राजपाल के मुँह में घुसा देना चाहती हो...

राजपाल ने भी अचे ससुर होने के नाते बहु को ज़्यादा प्रतीक्षा नहीं करवाई और अपने होंठों को बहु की एक छुच्छी पर रख दिया और चूसने लगे..

प्रेमा के मुँह से एक गहरी सिसकी निकल गयी...

उसके साथ ससुर के सर पर चले गए और उसे अपनी छूछीयो पर दबाने लगे...

Prema-uhmmmm ahhhhhhhhhh पापजीई ुह्ह्ह्हह्ह्ह्ह पीलोओओओओ मेरिइइइइ छूछीयों कोऊ और ज़ोर से..

राजपाल ने प्रेमा की बात सुनकर अपना मुँह चुकी से हटाया और बोले- बहु आअह्ह्ह्ह बड़ी मस्त है रे तेरी ये चूचियां ऐसा रास तो ाक तक नहीं पीयआह्ह्ह्ह..

और ये कहकर तुरंत दूसरी चुकी को मुँह में भर लिए...

Prema-haannnn पापा जीइहह्हह आईसीईईई hiiiiiiiiii निचुड़द्द लो मेरा सराआह्ह्ह्ह रॉस..

प्रेमा हर सिसकी के साथ राजपाल का हौसला बड़ा रही थी वहीं राजपाल भी और उत्तेजना के साथ बहु की छूछीयों को पीने में लगे हुए थे... जिस कारन एक बार झड़ने के बाद भी प्रेमा की छूट फिर से रास बहाये जा रही थी साथ hi राजपाल का सख्त लुंड बार बार उसकी छूट पर टक्कर मार रहा था,

काफी देर तक चूचियों का सेवन करने के बाद राजपाल की ज़ुबान और नीचे फिसली और फिर बहु के पेट को चाट और चूसने लगी... जिससे प्रेमा को भी एक अलग एहसास हो रहा था क्यूंकि ये और कोई नहीं बल्कि खुद का ससुर था जो उसके बदन को चूम रहा था...

पेट को चूमते हुए राजपाल की ज़ुबान प्रेमा की नाभि में फिसल गयी जिसके साथ प्रेमा की एक और गहरी सिसकी निकली...

Prema-aahhhhh पापाआजीई मेंननम्नन्न marrrrrrrrrr जाऔनीीी इतना मज़ा आ आ रहा है...

बहु की नाभि को अचे से चूसने चाटने के बाद राजपाल थोड़ा और नीचे की और बढे और उनके सामने बहु की गीली गरम छूट आ गयी,... जिसमे से अब भी उनका रास बहकर बाहर आ रहा था, राजपाल ने पास hi पड़े कपडे से छूट को पोंछा और फिर छूट के डेन को हाथ बढाकर सहलाया तो प्रेमा सिहर उठी...

प्रेमा- आह्ह्ह्हम्म्म्म maaaahhhhhhhhhhhh... Ahhhhhhhhhh...

राजपाल- आअह्ह्ह्ह बहु क्या सुन्दर छूट है तेरी, आअह्ह्ह्हह इतनी स्वादिष्ट लग रही है की मन करता है खा जॉन...

प्रेमा- ुहम्म्म्म आह्ह्हह्ह्ह्ह ससुर जी खा जाओ ना फिर,

प्रेमा अब इतनी गरम हो चुकी थी की अब शर्म आराम सब भूल चुकी थी...

राजपाल के मुँह में बहु की छूट देखकर पानी आ रहा था, और राजपाल से और रहा भी नहीं गया उसने अपने होंठ बहु के निचले होंठों पर रख दिए और फिर जीभ निकल कर बहु की छूट को कुरेदने लगा...

ससुर के इस प्रहार से तो प्रेमा बिलकुल पागल सी हो गयी उसके हाथ राजपाल के सर को उसकी छूट में दबाने लगे, प्रेमा की कमर ऊपर नीचे उछलने लगी और वो छूट को राजपाल के मुँह पर उछाल ूछ्जल कर घिसने लगी...





राजपाल भी एक बार को बहु की गर्मी देखकर हैरान रह गया पर अपनी जीभ पर बहु की छूट का स्वाद पाकर मस्त हो रहा था, प्रेमा की छूट के रास से राजपाल के होंठ जीभ मुँह सब सना हुआ था...

इसी बीच राजपाल ने एक और चाल चली, अपनी जीभ को तिकोना करते हुए उसने बहु की छूट में घुसा दिया और एक उंगली से छूट के दाने को घिसने लगा और लगातार ऐसा करने लगा...

प्रेमा की तो जैसे साँसे hi अटक गयी राजपल का लगातार प्रहार उसे सांस तक नहीं लेना दे रहा था और उसी का नतीजा हुआ की कुवह hi पालो प्रेमा का बदन अकड़ गया उसके मुँह से एक घुटी हुई चीख निकली और वो झड़ने लगी...

राजपाल ने बहु का कांपता बदन कसके पकड़ लिए और छूट तब तक चूसता रहा जब तक की प्रेमा की छूट ने अपना पूरा रास न छोड़ दिया हो, और फिर उसे चाट गया, अपनी बहु की छूट का रास पीकर राजपाल को एक नयी जवानी का एहसास हो रहा था...

उधर प्रेमा ढीली होकर बिस्तर पर गिर गयी और फिर कुछ पल बाद उठी और उठकर उसने राजपाल को बिस्तर पर पीठ से लिटा दिया और खुद उसके एक तरफ बैठ कर अपने ससुर की आँखों में देखते हुए झुकने लगी और एक हाथ बढाकर ससुर के कड़क लुंड को थम लिए...

राजपाल के मुँह से एक सिसकी निकल गयी...

प्रेमा अपना मुँह ससुर के लुंड के बिलकुल पास लेकर उसे ध्यान से देखने लगी साथ hi एक हाथ से उसे मुठियाने भी लगी... राजपाल तो जैसे जन्नत का मज़ा लूट रहे थे...

प्रेमा ने आगे बढ़ाते हुए राजपाल के लुंड के फूले हुए गुलाबी टोपे को जीभ से चाट कर देखा तो राजपाल का पूरा बदन काँप गया... प्रेमा ने एक लम्बी सांस ली और फिर गुप्प से ससुर के लुंड को मुँह में भर लिए... और फिर एक अछि बहु होने के नाते ससुर के लुंड की सेवा करने लगी..

राजपाल तो जैसे पागल से हो गए थे अपने लुंड पर बहु के गरम मुँह और जीभ का जादू देख कर..

उन्हें समझ नहीं आ रहा था क्या करें कभी बहु के सर को दबाते लुंड पर तो कभी ऊपर देखते हुए आहें भरते.. वहीं प्रेमा लगातार ससुर के लुंड पर अपना जाफु दिखा रही थी





प्रेमा राजपाल के लुंड को जितना होसके मुँह में भर के चूस रही थी..

राजपाल - आअह्ह्ह्ह बहु क्याआअह्ह्ह जादू है तेरी जीभ में है माज़आआह्ह्ह्ह आए रहा हैई..

प्रेमा सोच रही थी अभी इसी बिस्तर पर बेटे का लुंड चूस रही थी और अब बाप का क्या क्या बदल गया है मेरी ज़िन्दगी में कुछ hi दिनों में, खैर राजपाल ने उसका सर लुंड पर दबाकर उसका ध्यान फिर से तोडा...

राजपाल के लुंड पर प्रेमा के मुँह का जादू चल रहा था पर राजपाल को लालच आ रहा था तो वो उतनी जल्दी नहीं झड़ना चाहते थे तो उन्होंने बहु को रोका और उसे उठाकर बिस्तर पर पीठ के बल लिटा दिया और खुद उसकी दोनों टैंगो के बीच आ गए..

राजपाल ने अपने सख्त लुंड को जो की प्रेमा के थूक से बिलकुल चिकना हो गया था उसे पकड़ा और प्रेमा की गीली गरम छूट पर रख दिया और हल्का हल्का उसके होंठों को कुरेदने लगे...

प्रेमा अपने ससुर की हरकत से तड़प उठी... बार बार उसकी कामत लुंड को छूट के अंदर लेने के लिए झटके खाने लगी...

राजपाल भी उतना hi उतावला था जितना की उनकी बहु...

राजपाल- बहु दाल दूँ क्या...

Prema-aahhhhmmmm पापाजी एक बार तो दाल hi दिया है, और वैसे भी आपकी बहूऊऊऊह्ह्ह्ह की है तो ापकाः तो हक़ बनता है...

Rajpal-aisi बहु भगवन सब को दे...

और ये कहकर राजपाल ने एक करारा धक् लगाकर लुंड अंदर घुसा दिया.. जिसके साथ hi दोनों की एक आअह्ह्ह्ह निकल गईल

Prema-aahhhhhhh ऐसईईईई बहूऊऊऊह्ह्ह्ह क्यों चहिईयेःठहह क्या सबको अपनीई बहूऊऊऊह्ह्ह्ह छोड़नी है तुम्हारिई तरह पापज्जीय...

Rajpal-ohhhhh बहुउउउ जिस्किई ससुर की तेरे जैसी बहु होगी तो बिना चोदे छोड़ देगा तो नामर्द hi कहलायेगा...

प्रेमा- आअह्ह्ह्ह तो पापाजी आपको मौकाः मिला है छोड़ो मत...

राजपाल- बिलकुल नहीं बहु, ऐसा मौका मैं कभी नहीं छोड़ुंगाःह्ह्ह

और इसी के साथ राजपाल बहु की छूट में दनादन धक्के पेलने लगे...





प्रेमा तो बस अब अपनी छूट में ससुर के लुंड के एहसास से मस्त हो हाई थी और खूब मज़े ले रहक थी...

इसके बाद क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्
 
प्रेमा तो बस अब अपनी छूट में ससुर के लुंड के एहसास से मस्त हो हाई थी और खूब मज़े ले रहक थी...

अपडेट 144

राजपाल भी बहु की कूदती छूछीयो को थमने की नाकाम कोशिश करते हुए, उसकी छूट में धक्के लगाकर और उन्हें कूदने पर मजबूर कर रहा था...

प्रेमा- आअह्ह्ह्ह पापाआजीई अह्हह्ह्ह्ह कैसा लग रहा हैईईई अपनीईई बहूऊऊऊह्ह्ह्ह को छोड़ कररररर अपनी..

राजपाल- आअह्ह्ह्ह बहूह ऐसा मज़ाआ काभीई नाहीई ायाह्ह्ह जो टेरिइइइइ छूट में मिलल रहा हैई नाहहहहह...

प्रेमा- आअह्ह्ह्ह शर्म नहीं अअअअअ रही तुम्हे अपने बेटे की बीवी को उसके बिस्तर पर hi छोड़ते हुए... अह्ह्ह्हह..

राजपाल ने एक पल को जो बहु ने कहा वो सोचा की सच में वो अपने बेटे के बिस्तर पर उसकी hi पत्नी को छोड़ रहा है, इससे राजपाल और उत्तेजित होने लगे...


राजपाल- उस हरामी को तो अकाल होती तो बात hi क्या थीई अह्ह्ह्ह इतनी मस्त गदराई हुई बीवी छोड़ कर नशे में डूबा रहता है... उसकी जगह मैं होता तुह्ह्ह.

राजपाल ने प्रेमा को पकड़ कर थापें लगते हुए कहा..

Prema-aaahhhh ahhhhhhhhhh पापाआजीई अह्हह्ह्ह्ह तो क्याःह्ह्ह??

राजपाल- तो जैससेई अभीयी टेरिइइइइ चुलट में मेरा लोढ़ा है वैसे डेली नाह जाने कितनी बार छोड़्ताःहठ...

प्रेमा- आअह्ह्ह्ह पापाआजीई पर तुम मेरे ससुररररररर हो पति नहीं.

प्रेमा जानकार ऐसी बातें राजपाल से कर रही थी जिससे वो और उत्तेजित होता जा रहा था,

राजपाल- टोह्हह्हह क्या हुआए बहूह देखहहह अभी भी तेरी कासी हुई छूट में मेरा लोदाहहहह है ..

प्रेमा- पर ईव पाप हीी पापजीई, गलतततत हैई...

राजपाल- होनेटीहठ दे गलतततततत बहु...

तू अगर मेरी बेटी भी होती तब भी मैं तुझे छोड़ने से खुद को रोक नहीं पाताहहहह...

राजपाल की इस बात से प्रेमा पूरी तरह गंगना गयी की एक बाप अपनी बेटी को भी छोड़ सकता है, आह्ह्ह्ह कैसा लगता होगाःह्ह्ह्ह एक पल को वो अपने अआप की अपने पापा से चुड़ते हुए कल्पना करने लगी...

ये सोचकर hi उसकी छूट उसके ससुर के लुंड पर कसने लगी...

राजपाल पर भी अपनी बात का वैसा hi असर हुआ, बाप बेटी के रिश्ते के बारे मैं इस ख्याल से वो भी बेहद उत्तेजित होने लगा...

प्रेमा- तुह्ह्ह्ह मैं भी तो तुम्हारी बेटीइ hi हुण्णं पापाहहहह...

राजपालप्रेमा से ये सुनकर और गरम हो गया और कसके धक्के हलगते हुए बोलै- हानंन्न मेरिइइइइ बेटीीिहहहहहह..

प्रेमा- ahhhhhhhhhh पापाः छोड़ो अपनीईई बेटीीिहहहहहह को आअह्हह्ह्ह्ह मारो अपणीइइइइइइ बेटीईई की पीएसीई छूट को...

राजपाल प्रेमा के मुँह ये सब सुनकर जैसे साडी दीं दुनिया भूलता जा रहा था उसके सर पर उत्तेजना उस कदर हावी हो गयी की उसे कुछ नज़र नहीं आ रहा था... अह्ह्ह्ह ahhhhhhhhhh कहहहहह ली बेटीईईई अपने पापाहहहह के लुँड्ड़डडडड कूऊह्ह्ह्ह...

प्रेमा- ahhhhhhhhhh और ज़ोर से पापाहहहह अहह

दोनों hi एक दुसरे को अपनी बातों ऐ उकसा रहे थे और बेहद उत्तेजित हो चुके थे.. राजपाल का लुंड तो मनो फटने को हो रहा था

राजपाल आगे होणार अपनी बहु के ऊपर झुक गए

और दनादन उसे पेलने लगे एक बार फिर से उन्हें अपनी गोलियां फूलती हुई महसूस हुई साथ hi अपना रास लुंड की और भागता हुआ महसूस हुआ... वहीं प्रेमा ससुर के धक्को के प्रहार को साथ hi उत्तेजित बातों को नहीं सह पाई और अपने ससुर के लुंड पर झड़ने लगी...

बहु को झाड़ता पाकर राजपाल खुद को रोक न पाए पर तुरंत उन्होंने मन बना लिए वो करने का जो उन्होंने न जाने कबसे सोचा था...

राजपाल तुरंत बहु के ऊपर से हेट और लुंड को छूट से बहार निकल साथ hi बहु को खींचते हुए अपने सामने घुटनो पर बिठा लिया.... और तुरंत बहु के मुँह में अपने लुंड को घुसा दिया...

प्रेमा जैसे hi झाड़ के शांत हुई hi थी की ससुर ने उसे खींच लिए और जब तक वो कुछ समझ पति तब तक तो उसके मुँह में उसके ससुर का लुंड घुस चूका था जिस पर उसे अपनी छूट के रास का स्वाद भी चखने को मिल रहा था,

और अगले hi पल उसे अपने मुँह में ससुरजी का लुंड फूलता हुआ महसूस हुआ और फिर रास की धार ससुर के लुंड से निकल कर उसके मुँह को भरने लगी... कुछ धार से जब उसका मुँह भर गया तो उसने गटकने के लिए अपना सर पीछे कर के लुंड को बहार निकल दिया और रास जातक लिए इतने में बची हुई धार को राजपाल बहु के चेहरस पर मार कर उसे अपने रास से रंगने लगे...





अपने रास की बची कुछ फुवारों से राजपाल ने बहु के चेहरे को रंग दिया.

पहले से सुन्दर बहु उनका रास चेहरे पर लगाकर और खूबसूरत लग रही थी अपनी बहु को इस हालत में अपने रास से सना हुआ नंगा देखकर राजपाल को बड़ा ाचा लग रहा था...

वहीं प्रेमा के लिए ये नया तो नहीं पर क्यूंकि उसके ससुर का लुंड रास उसके चेहरे पर था तो एक अलग एहसास ज़रूर था.

खैर दो बार की दुमदार चुदाई के बाद राजपाल थोड़ा शांत हुए साथ hi थक भी गए थे, उधर प्रेमा ने कपडे से मुँह पांच कर साफ़ किआ, और फिर बहु को राजपाल ने बाहों में जकड़ा और अपने पास खुद से चिपका कर लिटा दिया दोनों बिलकुल नंगे होकर किसी प्रेमी जोड़े की तरह लेते हुए थे,

राजपाल की आँखें बंद होने लगी और वो बहु को पकड़े हुए सोने लगे, वहीं प्रेमा के मन में ख्याल आने लगे की पिछले कुछ दिनों में उसके साथ क्या क्या हो रहा है, कुछ दिन पहले जहाँ उसको ठीक से चुदाई नसीब नहीं होती थी वहीं अभी इन दिनों में वो अपने पति के अलावा 6-6 लुन्डों से चुद चुकी है.. जिसमे एक hi परिवार के तीन मर्द दो बेटे और उनका बाप (कर्मा, अनुज और उसके पापा), राजन चाचा, उसका देवर और अब अपना ससुर ये सब लोग शामिल हैं...

उसे समझ नहीं आ रहा था इन घटनाओ को कैसे समझे पर सबसे बड़ी हैरानी उसे ये थी की ये सब इतना गलत था फिर भी उसे पसंद आ रहा था, जितना वो नए नए लुंड से चुद रही थी उसकी प्यास और बढाती जा रही थी... खैर न जाने क्या होगा ये सोचकर वो भी ससुर से चिपक कर सोने लगी और कुछ hi देर में चुदाई की थकन की वजह से उसे नींद आ गयी...


भग्गू की जब आँख खुली तो उसने आस पास देखा और खुद को घर के बहार चबूतरे पर पड़ा हुआ पाया, देखकर उसे अंदाज़ा हुआ की सुबह हो चुकी है, साथ hi उसे हल्का हल्का जो रात को हुआ वो याद आने लगा तो उसका मन अपने बाप और बीवी के लिए गुस्से से भर गया और अपनी भड़ास निकलने के लिए उसे बस हमेशा की तरह एक hi चीज़ सूझी और वो थी दारू... तो वो चल दिया उसी की तलाश में...

जहाँ भग्गू तो चल दिया था अपनी मंजिल की तलाश में, तो बाकि लोग कहाँ थे आइये एक बार झांक कर देखते हैं इनके घर में क्या दोनों ससुर बहु अभी भी सो रहे हैं..

अंदर भग्गू और प्रेमा के कमरे में प्रेमा बिलकुल नंगी होकर घोड़ी बानी हुई थी और पीछे से उसके ससुर राजपाल घुड़सवारी कर रहे थे...

और दोनों को hi देख कर लग रहा था की ये खेल शुरू हुए थोड़ी देर हो चुकी है, सुबह उठाते hi दोनों ने सही मूड बना लिए था, हुआ दरअसल ये था की पहले राजपाल की आँख खुली और पास सोइ हुई नंगी बहु को देखा तो उनका मन ललचाने लगा तो वो बहु के बदन को सहलाने लगे उसको चूमने लगे, प्रेमा की आँख उसके बार बार हिलाये जाने से खुली और जब उसने आँख खोल कर देखा तो उसके ससुर जी उसकी एक छुच्छी को पि रहे हैं और दूसरी को मसल रहे हैं... प्रेमा के चेहरे पर मुस्कान फ़ैल गयी... और फिर एक चीज़ से दूसरी चीज़ शुरू हुई..

नतीजा आपके सामने है राजपाल पीछे से बहु के दोनों गोल मटोल चूतड़ों को मसलते हुए बहु की छूट का बाज़ा बजा रहे थे





हर धक्के के साथ थिरकते प्रेमा के चूतड़ राजपाल को सम्मोहित कर रहे थे, इसी तरह कुछ देर चुदाई की गाड़ी चली और तव तक चली जब दोनों सवारी अपनी मंज़िल तक न पहुँच गयी...

सुबह सुबह इतनी मस्त गदराई बहु को छोड़ने के बाद तो राजपाल फूले नहीं समां रहे थे उनके मन में एक अलग ऊर्जा का एहसास हो रहा था, जैसे नए नए जवान हुए हों...

अपनी गर्मी को बहु के बदन पर निकल कर राजपाल चहकते हुए उठे बहु को चूमकर प्यार जताया और फिर बताकर की भैंसों का चारा वगेरा करने साथ hi नित्य क्रिया करके lautenge...ye कहकर घर से निकल दिए,

आज मन बड़ा खुश था काम जी लगजार खुसी से कर रहे थे भैंसो को खूब प्यार से चारा डाला सहलाया..

एक मन खुश भी था वहीं दूजा मन बार बार उन्हें बहु की और खींच रहा था वो उससे दूर नहीं रहना छह रहे थे पर वो जानते थे बाकि सब काम भी कितने ज़रूरी हैं इसलिए खुद को समझते हुए काम में लगे हुए थे...

जहाँ राजपाल का ये हाल था वहीं देखते हैं बहु प्रेमा के क्या हाल चाल हैं.. क्या वो भी ससुर जी के साथ के लिए तड़प रही हैं, चलिए देखते हैं

अरे पर ये क्या यहाँ का तो नज़ारा hi कुछ अलग है...

प्रेमा बिस्तर पर झुकी हुई है उसकी साड़ी कमर पर इकठी हो राखी है बड़े बड़े गोल मटोल चूतड़ नंगे हैं और उन पर एक मरदाना हाथ है जो उन नांसल चूतड़ों को मसल रहा है साथ hi उसके थोड़ा सा नीचे प्रेमा की रसीली छूट में उसी मर्द का लुंड घुसा हुआ है और अंदर बहार हो रहा है...





अब ये कौन मर्द है जो बेचारी प्रेमा को घोड़ी बनाकर उसके मदमस्त बदन के मज़े लूट रहा है ध्यान से देखते हैं,

ाचा तो ये हमारे दोस्त कर्मा के परम पूज्य पिता नीलेश जी हैं...

राजपाल के निकलने पर प्रेमा उठी और थोड़ा बहुत काम निपटा कर चाय चूल्हे पर चढ़ाई hi थी की दरवाज़े पर खटखट हुई और जब प्रेमा ने दरवाज़ा खोला तो सामने नीलेश को पाया, चाचाजी प्रणाम कर उन्हें अंदर किआ...

नीलेश- बहु जाग गया तो सोचा तेरे हाथों की कड़क चाय hi पिता चलूँ...

प्रेमा- हाँ चाचाजी, बैठिये न चाय बस चढ़ाई hi है...

नीलेश- ाचा बहु चढ़ाई है तो थोड़ा समय लगेगा, भाई साब कहाँ हैं?

प्रेमा- वो भैंसों को चारा डालने गए हैं,

Nilesh-to जब तक चाय बनती है तब तक खली समय का सही इस्तेमाल करना चाहिए...

बस उसी खली समय का इस्तेमाल इस प्रकार हुआ की प्रेमा की छूट में नीलेश का लुंड अंदर बहार हो रहा था, साथ hi उनके हाथ बार बार प्रेमा के गदराये चूतड़ों को मसलते हुए पीट रहे थे...

हालाँकि नीलेश तो प्रेमा को बिलकुल नंगा करके छोड़ना छह रहे थे पर प्रेमा ने पकड़े जाने का दर बता कर मन कर दिया, पर कोशिश करने वालों को तो राह मिल hi जाती है तो पीछे से साड़ी उठाकर नीलेश के लुंड ने भी प्रेमा की छूट की राह पकड़ ली...

प्रेमा- ओह्ह्ह्हह्ह हाआनं चचाजीई अह्ह्ह्ह आराम सीईई ओह्ह्ह्ह....

नीलेश- आह्ह्ह्ह बहूऊऊऊह्ह्ह्ह क्या मस्त छूट है रे टेरिइइइहह्हह अह्हह्ह्ह्ह

प्रेमा- आअह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह maaaahhhhhhhhhhhh चचाजीई...

कुछ देर की तगड़ी चुदाई और प्रेमा को झड़ने के बाद नीलेश ने अपने रास का पानी प्रेमा के चूतड़ों पर लगा दिया जिससे शायद वो और बढ़ जाएं...

ये काम निपटा कर नीलेश आँगन में पड़ी खत पर बैठ गए वहीं प्रेमा अपने कपडे ठीक करते हुए सोचने लगी..

कहाँ फँस गयी प्रेमा ऐसे कैसे कोई काम कर पायेगी तू... कुछ देर पहले पापाजी ने थोड़ा और अब चाचाजी ने. छोड़ दिया क्या जीबड़ेगी हो गयी है मेरी... पर ये सब सोचकर भी प्रेमा के चेहरे पर एक मुस्कान फ़ैल गयी इसके बाद उसने चाय को उतरा और नीलेश को दी उसी समय राजपाल भी आ गए आज रोज़ से जल्दी काम ख़त्म करके लौटे थे घर पर नीलेश को देख थोड़े निराश ज़रूर हुए पर फिर खुद को समझाया की धैर्य कितना ज़रूरी है और फिर दोनों बातों में लग गए चाय की चुस्कियां लेते हुए...

वहीं उन्हें देखरे हुए प्रेमा सोच रही थी की अभी दोनों ने hi कुछ देर पहले मुझे छोड़ा है और अब देखो कितने शरीफ बन रहे हैं... दोनों को hi नहीं पता एक दुसरे के राज के बारे में जो मुझसे जुड़ा हुआ है... खैर ये सोचते हुए वो काम में लग गयी, एक नए दिन की शुरुआत हो चुकी थी और प्रेमा के लिए तो काफी रोचक थी ये शुरुआत...

सरलपुर

अरे ध्यान से रिम्मी सारा दूध निकला जा रहा है, चंचल ने गैस बंद करते हुए कहा..

रिम- अरे माफ़ करना जीजी मेरा ध्यान hi नहीं गया...

चंचल- अरे वही तो मैं सोच रही हूँ सामने दूध हाउ और तू बंद hi नहीं कर रही...

रिम- क्या करें जीजी पता नहीं कैसे आँख लग गयी थी..

चंचल- आआँख कैसे लग गयी बन्नो, लगता है देवर जी कुछ ज़्यादा hi वर्तमे लगवा रहे हैं ..

चंचल ने रिमझिम को छेड़ते हुए शरारती अंदाज़ में कहा...

रिम- क्या जीजी तुम भी न...

चंचल- अरे इसमें शर्माना कैसा वो भी मुझसे...

रिम- हमें शर्म आ रही है जीजी...

चंचल- अरे नुझे अपनी जेठानी नहीं सहेली समझो बन्नो रानी...

रिमझिम ने सोचा बात तो सही है अगर चंचल के करीब होना है तो ये बातें hi सही तरीका रहेगा और वो भी नहीं चाहती थी की आगे जाकर कभी और घरों की तरह उसके और चंचल के बीच देवरानी जेठानी वाली तू तू मैं मैं हो...

रिम- अब क्या करें जीजी, करवाते hi हैं तुम्हारे देवर इतनी म्हणत, सोने hi नहीं देते ठीक से...

चंचल- हे भगवन अभी कैसी शर्मीली बन रही थी और अब देखो..

रिम- जीजी तुम पहले देखलो खुद बोली सहेली बनने को और अब तना मर रही हो...

चंचल- अरे हम तना नहीं मार रही लड़ो ये तो ख़ुशी है एक सहेली मिलने की..

रिम- सच जीजी

चंचल- हाँ मेरी रिम्मी रानी, ाचा बता न कितनी बार गाड़ी गुजरी इस पटरी से..

चंचल ने साड़ी के ऊपर से रिमझिम ककी गोल गांड को सहलाते हुए पुछा...

रिमझिम थोड़ा झिझकी चंचल की हरकत से फिर शरमाते हुए बोली- तीन बार...

और ये कहकर अपने मुँह को पल्लू से धक् लिए..

चंचल- आये हाय देखो कैसे शर्मा रही है, वैसे सिर्फ पटरी पर hi चलते हैं देवर जी या पीछे वाले गोदाम में भी कड़ी करते हैं कभी कभी..

रिम- क्या कहें जीजी वो एक बार जब तक गोदाम का चक्कर न लगलें सोने कहाँ देते हैं.

चंचल- अरे वाह बड़े रंगीले सैयां मिले हैं तुझे... मज़े hi मज़े हैं तेरे तो...

रिम- सिर्फ हमारे अपनी भी बताओ कितनी बार हल चला रात में इस खेत पर..

इस बार रिमझिम ने चंचल के फैले हुए कूल्हों को सहलाते हुए पुछा...

चंचल का इस बात पर थोड़ा मुँह बन गया

चंचल- दुखती राग पर हाथ न रख रिम्मी..

रिम- ऐसा क्या हो गया जीजी..

चंचल- हाँ सब ठीक hi है..

रिम- जीजी मैंने तुम्हे सहेली बनाया पर तुम शायद नहीं मानती मुझे..

चंचल- ऐसा कुछ नहीं है ऋ पागल, वो तो बस.

रिम- बस क्या?

चंचल- यही की न जाने तेरे भाई साब को क्या हो गया है को ह ध्यान hi नहीं देते हम पर...

रिम- ऐसा क्यों जीजी, कोई लड़ाई वगेरा तो नहीं हुआ..

Chanchal-nahi ऋ कुछ नहीं हुआ, बस ऐसे hi रहते हैं जैसे उन्हें हममें दिलचस्पी hi न हो...

चंचल ने मुँह लटका के कहा..

रिम- ऐसा नहीं होगा जीजी तुम मुँह न बनाओ...

चंचल- का करें बन्नो शादी के एक दो साल तक बिलकुल तेरा वाला हाल था हमारा भी डेली गाड़ी पटरी पर चलती थी फिर कुछ टाइम बाद काम हो गया और जैसे जैसे समय बढ़ रहा है ये सब काम हो रहा है...

रिम- ऐसा होना तो नहीं चाहिए जीजी..

चंचल- पता नहीं का हुआ है शायद हमारा बदन अब उतना आकर्षक नहीं रहा...

रिम- अरे जीजी तुम्हारा बदन और आकर्षक नहीं रहा, ये गलत बोल रही हो.

चंचल- नहीं सही कह रहे हैं हम...

रिम- गलत है जीजी अगर हम लड़का होते ने तो अभी तक न जाने कितनी बार तुम्हारी पटरी पर अपनी गाड़ी चला चुके होते..

रिमझिम की इस बात पर दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े, और तभी घर की लाड़ली बेटी ख़ुशी ने रसोई में कदम रखा..

ख़ुशी- ाचा तो यहाँ देवरानी जेठानी मिलकर मेरी बुराई कर रहे हो...

चंचल- अरे तूने सुन लिए क्या... हाय हम तो योजना बना रहे थे की जल्दी से तेरा ब्याह कर के भगाएं तुझे यहाँ से...

ये बोलकर चंचल हंसने लगी तो रिमझिम भी मुँह दबाकर मुस्कुरा रही थी...

ख़ुशी- ाचा उससे पहले मैं तुम्हे न भेज दूंगी, मैं नहीं जाने वाली यहाँ से बिलकुल भी नहीं...

चंचल- ाचा तो ये जो तेरा बदन गदराता जा रहा है इसका क्या करेगी..

चंचल ने ख़ुशी की मोती गांड पर चपेट लगा कर कहा...

ख़ुशी- धत्त्त भाभी लगती है..

Chanchal-tabhi तो बोल रही हूँ, ये जो गदराया बदन है उसके लिए पति की ज़रुरत पड़ेगी...

Khushi-mujhe नहीं चाहिए पति आती...

चंचल- तो यहाँ रहकर क्या अपने भैया से मसलवायेगी...

ख़ुशी को जब चंचल की बात समझ आई तो बुरा सा मुँह बनाकर रसोई से भाग गयी...

वहीं रिमझिम मुँह दबाकर हंस रही थी..

Rim-kya जीजी भगा दिया बेचारी को...

चंचल- अरे भगा क्या दिया बादाम देखो इसका कूल्हे तो हमसर भी आगे निकलते जा रहे हैं...

रिम- तो क्या हुआ जीजी निकलने दो एक दिन कोई न कोई चढणर hi वाला है उनपर,

चंचल- वो तो चढ़ेगा hi...khair जो भी होगा जब होगा तब देखा जायेगा...

रिम- और क्या जीजी अभी तो तुम अपने ऊपर चढाने की तयारी करो जेठ जी को..

चंचल- मैं तो तैयार बैठी हूँ वो चढ़ें तो सही.

रिम- जीजी जब पति ऐसे बेरुखी से पेश आने लग जाएं तब हम औरतों को क्या करना चाहिए ऐसा एक आर्टिकल मैंने पढ़ा था..

चंचल- ाचा तो क्या किखा था उसने...

रिम- अभी नहीं, अभी काम निपटा काट दोपहर में खली में अचे से समझाउंगी.

चंचल- हाँ ये ठीक रहेगा..

दोनों फिर घर के काम में लग गयी...

उधर ख़ुशी वहां से मुँह बनाकर भाग तो ज़रूर आई थी पर उसे भी अपनी भाभी के ऐसे मज़ाक कहीं न कहीं अचे लगते थे, उसे उत्तेजित करते थे..

उसने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किआ और कुण्डी लगाकर और सोचने लगी जो अभी उसकी भाभी ने मज़ाक किआ उस बारे में...

ख़ुशी हालाँकि चुदाई के सुखद अनुभव से नहीं गुजरी थी पर ऐसा नहीं था की उसे पता नहीं था इस बारे में, की लड़का लड़की के बीच क्या क्या होता है... यहाँ तक की कई तरह की ब्लू फिल्म देख कर उसने इस विषय पर काफी अछि पकड़ बना ली थी... कई बार उँगलियों का सहारा लेकर खुद को असीम सुख तक भी पहुंचाया था..

पर न जाने क्यों उसकी भाभी के द्वारा किये हुए मज़ाक उसे उत्तेजित कर देते थे...

कमरे को बंद कर वो सोचने लगी अक्सर hi उसकी बड़ी भाभी उसे उसके चूतड़ों के उभर को लेकर उसे छेड़ती थी, क्या भाभी सच कहती हैं क्या सच में मेरे चूतड़ इतने भर गए हैं...

इसी सवाल का जवाब पाने के लिए ख़ुशी शीशे के सामने जा कर कड़ी हुई और अपनी सलवार का नाडा खोल कर सलवार को नीचे सरका दिया और घूम कर अपने चूतड़ों को शीशे की तरफ घुमाकर देखने लगी...





है दिया सच में मेरे चूतड़ तो बढ़ाते hi जा रहे हैं... पर क्या फायदा इन गदराये चूतड़ों का भी जब कोई इन्हे मसलने वाला hi नहीं है... ख़ुशी ने अपने hi चूतड़ को मसलते हुए सोचा, पर मसलवाने से अचानक सर उसे अपनी भाभी की बात आ गयी, की नहीं जाएगी तो क्या अपने भैया से मसलवायेगी...

इसी ख्याल के साथ वो शीशे की और घूम गयी और अपने सूट को पकड़कर ऊपर उठाया और सर से निकल दिया, सलवार पहले hi उतर चुकी थी कच्ची और ब्रा वो घर पर पहनती नहीं थी और अब सूट के निकलते hi वो शीशे के सामने बिलकुल नंगी हो गयी.. अपनी छूछीयो को देखकर और उनके उन्नत उभर देखकर उसे गर्व हुआ और फिर अपनी भाभी की बात को याद करके सोचने लगी की सच में अगर भैया इन्हे मसलेँगे तो कैसा लगेगा, इस ख्याल से hi वो उत्तेजित महसूस करने लगी, और उसका एक हाथ उसकी छूछीयो को मसलने लगा, साँसे भरी होने लगी.

शीशे क्र सामने से हटकर ख़ुशी बिस्तर पर बैठ गयी धीरे धीरे से उसका एक हाथ उसके कुंवारे यौवन की और बढ़ने लगा... उंगलियां चिकनी छूट पर जकड ठहर गयी और छूट के होंठों से खेलने लगी... ख़ुशी अपने भैया के हाथों को अपने नंगे बदन पर महसूस करते हुए खुद से खेलने लगी...





उसका हाथ उसकी छूट को सहलाने लगा और कब सिर्फ एक सवाल का जवाब ढूंढना हस्तमैथुन बन गया ख़ुशी को भी पता नहीं चला...

और ख़ुशी तब तक नहीं रुकी जब तक वो खुद से संतुष्ट नहीं हो गयी... अपनी छूट की गर्मी निकलने के बाद कपडे पहन कर वो बापिस पढाई में लग गयी...

रात को चंचल और रिमझिम दोनों ख़ुशी के कमरे में घुसे हुए थे,

चंचल- मुझे कुछ ठीक सा नहीं लग रहा रिम्मी ऐसे तो मैंने कभी नहीं पहनी.. शर्म आ रही है...

Rim-to भाभी कौनसा बहार जाना है तुम्हे ये पहनके बस भाई साब के सामने hi तो जाना है...

चंचल- पता नहीं मुझे अजीब सा लग रहा है..

रिम- कुछ नहीं होगा जीजी और दोपहर में आर्टिकल में भी ऐसा hi लिखा था न..

चंचल- तू और तेरा article...le अब देख...

Rim-haaye जीजी इतनी प्यारी लग रही हो... आअह्ह्ह्हह मन कर रहा है भाई साह की जगह मैं hi आज तुम्हे पकड़ लूँ.

Chanchal-hatt पागल कही की, सच में सब सही है न इसमें देख सब तो दिख रहा है...

रिम- अरे देखने के लिए hi तो पहनाया है जीजी

चंचल- देख ये ब्लाउज है या ब्रा?? तू एक बार फिर से देख सही तो रहेगा न?





रिम- अरे मेरी जान बोल तो रही हूँ अगर मैं भाई साब होती तो अब तक तुम बिस्तर पर घोड़ी बानी हुई होती...

चंचल- अब वो सब छोड़ तू देख कर आए माँ बाबूजी और रमन भैया कहाँ हैं... और मेरे कमरे में भी देख लेना ये हैं की नहीं ..

रिम- अभी देख कर आई..

रिमझिम बहार चली गयी दोनों जेठानी देवरानी ने दोपहर में आर्टिकल पदज कर आज पूरी तयारी कर्ली थी की कैसे आज चंचल के पति यानि चेतन को क्लीन बोल्ड करना है, तैयारियों के लिए ख़ुशी के कमरे को दुगौत बनाया गया, और ख़ुशी को उतनी देर के लिए रिमझिम ने अपने कमरे में पढ़ने को भेज दिया... खाना पीना सब कुछ हो चूका था अब बरी थी की सब सो जाएं और फिर खिलाडी यानि चंचल रानी मैदान में उतारें...

बहार की तैयारियों का जायजा लेने hi रिमझिम गयी थी उसने सास ससुर के कमरे में चुपके से आधे खुले हुए दरवाज़े से नज़र मारी तो देखा सास लेती हुई थी और ससुर न जाने फ़ोन में क्या देख कर परेशां हो रहे थे उसने सोचा चलो ये लोग तो अब अंदर hi रहेंगे...

वहां से हटी और वो अपने कमरे में गयी... और देखा ख़ुशी बीएड पर बैठकर पढ़ रही हैं और उसके पति वहीं बगल में कुर्सी पर बैठे हुए किताब पढ़ने के बहाने बीच बीच में अपनी बहन की नंगी जाँघों और टीशर्ट के बीच से झांकती छूछीयो को देखकर आँखें सेक रहे हैं...

रिम्मी के आने पर दोनों की नज़रें मिली तो रमन थोड़ा हिचकिचा गया उसे लाग्स उसकी पत्नी ने उसे बहन को घूरते हुए पकड़ लिए है... पर उसकी पत्नी को पहले से hi सब पता था..

ख़ुशी- भाभी अब जॉन मैं अपने कमरे में...?

रिम- नहीं थोड़ी देर और रुक जाओ ख़ुशी दीदी.

ख़ुशी- ओह्हो भाभी क्या दीदी दीदी लगाती रहती हो मैं छोटी हूँ तुमसे ख़ुशी hi बोलै करो न...

रिम- ठीक है जैसा तुम कहो ख़ुशी दीदी..

ख़ुशी- ओहीरसे?!?

रिम- कच्चा बाबा ख़ुशी...

उधर जहाँ नानस भाभी की गुफ्तगू चल रही थी वहीं चरण सिंह यानि रिमझिम के ससुर जी कितनी hi देर से अपने फ़ोन में सुबह के लिए अलार्म लगाने की कोशिश कर रहे थे... बच्चों ने नया स्मार्ट फ़ोन तो दिल्व दिया था पर साला चलना नहीं सिखाया था खूब देर मूड मारने के बाद भी वो नहीं हुआ तो उठ खड़े हुए और जैसे hi रिमझिम इनके दरवाज़े से हटी ौर्ये भी तुरंत फ़ोन लेकर बहार चल दिए और आगे बढ़ गए...

वहां चंचल का बुरा हाल हो रहा था बेचारी गाओं की भोली भली लड़की थी कभी ऐसे कपडे नहीं पहने थे जो ढकने से ज़्यादा दिखने का काम करें तो वही सोच सोच कर घबरा रही थी ऊपर से रिमझिम थी आकर नहीं दे रही थी बार बार खुद को शीशे में निहार रही थी.. इसी बीच दरवाज़ा खुला उसने सोचा की रिमझिम आ गयी बापिस और तुरंत मुद कर दरवाज़े की और देखा तो जैसे वो जमी की जमी रह गयी सामने उसके ससुर जी थे जो हाथ में फ़ोन लिए खड़े थे..

अपनी बड़ी बहु को इस हाल में देखकर चरण सिंह की आँखें hi जैम गयी,

उधर चंचल तो जैसे शर्म से ज़मीन में गाड़ने को हो रही थी... पर जैसे hi उसे कुछ होश आया वो भाग कर बिस्तर पर पड़ी चादर को उठा कर ओढ़ ली...

इधर चरण सिंह को भी एहसास हुआ की अपनी बहु को इस तरह देखना कितना गलत है तो वो भी दरवाज़ा बंद कर तुरंत मुद कर बापिस अपने कमरे की और चल दिए...

कमरे में घुस कर दरवाजा बंद किआ और बिस्तर पर आकर बैठ गए और जैसे hi बैठे वो एक चीज़ से हैरान हो गए की उनका लुंड खड़ा हो गया था...

वो सोचने लगे की मेरा लुंड अपनी बहु को देखकर खड़ा कैसे हो सकता है फिर सोचने लगे वैसे कभी सोचा नहीं था की चंचल अंदर से या इन कपड़ो में ऐसी लगती होगी... मन्ना पड़ेगा क्या भरा पूरा बदन है बहु का.. पर ये पहना क्या था इतना छोटा ब्लाउज तो होता नहीं जिनमे से आधी तो बहार hi थी, और कितनी गोरी और बड़ी बड़ी थी... पेट कमर नाभि सब कुछ कितना गोरा और मस्त था... फिर चरण सिंह ने खुद को एक बार फिर खुद को कोसा और पलट का सोने की कोशिश करने लगे...

अब आगे देखते हैं काङ्कितना कामयाब होता है अपनी आपजी मंजिल के सफर में तब तक के लिए धन्यवाद्...
 
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