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खैर हम वहां से निकले तो गाओं के बहार तक एक सेवक साथ आया और उसने हमें तीनो तालाब के रास्तों से अवगत कराया तो ज़रूरी सामान और जानकारी लेकर और जल्दी hi मिलने का वादा कर हम लोग तीन जोड़ो में बांटकर निकल गए..
मैं और मौसी- उत्तर के तालाब की और, माँ और अनुज- पश्चिम, जग्गू और तै- पूर्व.
आगे देखना था ये सफर क्या क्या नए नए अनुभव करवाने वाला था...
अपडेट 145
जग्गू और मंजू
दोनों माँ बेटे बताये हुए रस्ते पर धीरे धीरे बढ़ने लगे, दोनों में hi कुछ झिझक थी एक दुसरे को लेकर, जग्गू मन में वही चल रहा था की कैसे कर्मा ने चची को सबके सामने अपनी hi माँ को सबके सामने छोड़ लिए क्या होता अगर उसकी जगह मैं और मम्मी होते तो, मम्मी का बदन भी काम गदराया हुआ थोड़े hi है... मम्मी की क्या प्रतिक्रिया होगी अगर मैं उन्हें छोड़ने की कोशिश करूँ तो... इन्ही सब सवालों में उलझा हुआ जग्गू सोच में पड़ा हुआ था...
वहीं मंजू का तो कालक गाओं आकर पूरा नजरिया hi बदल गया था, अपने बेटे को सेविकाओं की चुदाई करते देखना, फिर कर्मा और अनुज से एक साथ छोड़ना और अंत में कर्मा और सभ्य की, माँ बेटे की चुदाई देखना, अब मंजू के लिए कुछ सही गलत नहीं था वो बस साडी परिस्थितियों में खुद को रखकर देख रही थी...
और कहीं न कहीं सभ्य और कर्मा की चुदाई के बाद उसके मन में भी अपने और जग्गू को लेकर अजीब अजीब से ख्याल आने लगे थे...
मंजू ने देखा की जग्गू काफी देर से कुछ बोल नहीं रहा तो उसने खुद चुप्पी छोड़ने की सोची
मंजू- का हुआ बचुआ कछु बोल नहीं रहा, कोई नात है का?
जग्गू- नहीं मम्मी कुछ बात नहीं है बस ऐसे hi..
मंजू- हुंका तो यकीन नहीं हो रहा की हम लोग मुक़ाबला जीत गए...
जग्गू- पर हम जीत गए मम्मी यकीन करलो...
मंजू- पर जीतने के लिए भी न जाने क्या क्या करना पड़ा तब जाकर जीते हैं..
मंजू ने ये बात कही तो दोनों के hi मन में कर्मा और सभ्य की चुदाई की तसवीरें उभर आई..
Jaggu-haan जीते तो बड़ी मुश्किल से हैं...
मंजू- हिम्मत है कर्मा और बन्नो की...
जग्गू- कैसी हिम्मत मम्मी.?
मंजू- यही सब करने की जो भी मुक़ाबला जीतने के लिए करना पड़ा... उनकी जगह कोई नहीं कर पता..
जग्गू- क्यों मम्मी अगर उनकी जगह तुम होती तो हिम्मत नहीं दिखती का??
मंजू जग्गू के इस सवाल से थोड़ी असहज हो गयी और बोली- ुहम्म्म्म हम पता नहीं...
जग्गू- बात मुक़ाबला जीतने की होती तो करना पड़ता न..
मंजू- वही तो पता नहीं कर भी सकते थे या नहीं भी... तू बता तू कर पता...
जग्गू- हाँ बिलकुल इतनी दूर से आकर खली हाथ थोड़े hi जाते, मैं बिलकुल करलेता..
मंजू को जग्गू के इस जवाब से ये एहसास हो गया की जग्गू के इस बारे में क्या विचार हैं...
मंजू- मतलब तू कर लेता हुनर साथ भी जो कर्मा एयर सभ्य ने किआ...
इस बार जग्गू ऐसे सीधे प्रश्न से हिल गया और बात टालते हुए बोलै- ओह्हो मम्मी हम भी कहाँ की बातों में लग गए सच तो ये है की जो होना था हो चूका...
मंजू- हम्म्म हाँ ये भी है, थोड़ा पानी तो दे प्यास लगी है..
जग्गू ने कंधे पर लटका थैला उतरा और उसमे से पानी की बोतल निकल कर मंजू को दी... तो मंजू बोतल से पानी पीने लगी पानी पीते हुए जग्गू ध्यान से अपनी माँ को देख रहा था, भरा हुआ बदन, मांसल कूल्हे, हल्का चर्बीदार पेट, कमर पर पसीने की बूँदें जो मोतियों सी फिसल रही थी...
मंजू ने पानी पीकर बोतल बापिस दी और फिर से दोनों चलने लगे...
मंजू- ऐ लल्ला हम सही रस्ते पर तो हैं न..
जग्गू- हैं मम्मी बताया तो यही था...
मंजू- इतनी देर हो गयी चलते चलते हमारे तो पेअर थकने लगे हैं ऊपर से ये गर्मी...
जग्गू- रुक जाते हैं थोड़ी देर मम्मी..
मंजू- नहीं थोड़ी देर और चल लेंगे अभी हम फिर रुकेंगे तो खाना भी खा लेंगे...
जग्गू- ठीक है मम्मी..
अनुज और सभ्य
ये दोनों भी काफी देर से चले जा रहे थे, गर्मी के कारन दोनों पसीने से नहाये हुए थे, सभ्य की छूछीयो पर तो जैसे ब्लाउज चिपक सा गया था, वो तो भला हो साड़ी के पल्लू का जिससे उसकी भरी हुई छुछियां ढकी हुई थी वर्ण बिना ब्रा के गीले ब्लाउज में सभ्य की बड़ी छुछियां कहाँ छुपती...
वहीं अनुज भी धीरे धीरे से अपनी माँ के साथ साथ चले जा रहा था, उसको न जाने क्यों एक अलग ख़ुशी थी की वो माँ के साथ अकेला है...
जबसे कर्मा के साथ मिलकर उसने पहली बार ममता चची को छोड़ने से शुरुआत की थी और फिर अपनी सगी बुआ और उनके परिवार की औरतों को छोड़कर उसके विचार रिश्तों के बारे में काफी बदल गए थे, अपनी माँ के बारे में भी पिछले कुछ समय से ऐसे hi ख्याल आने लगे थे, ऊपर से वो जनता था की जितनी नहीं औरतें उसने भोगी हैं, बदन के मामले में उसकी माँ सबसे इक्कीस hi होगी, घर में भी माँ के बदन को देखकर उसने कई बात लुंड हिलाया था...
और फिर कालक आने पर तो जैसे सब कुछ hi बदल गया और अंत में अपने भाई और माँ की चुदाई देखकर अनुज का दिमाग पूरी तरह खुल गया था, उसके मन में माँ के साथ सब कुछ करने की उम्मीद जागने लगी थी... इसी सोच में साथ hi इस ख़ुशी में की वो माँ के साथ अकेला है चले जा रहा था...
सभ्य अभी तक अनुज से सामने से नज़र मिलाने और कुछ बोलने से बच hi रही थी क्यूंकि मुक़ाबले के दौरान जो कुछ हुआ उसके बाद समझ नहीं आ रहा था की वो अनुज का सामना कैसे करे, वो क्या सोच रहा होगा इसके बारे में, वैसे तो सबने फैसला किआ है की इसके बारे में किसी को नहीं बताएँगे पर कहीं अनुज ने घर जाकर अपने पापा के सामने कुछ बोल दिया तो..
नहीं नहीं मुझे पता करना होगा इसके मन में क्या है और कब तक मैं नज़रें चुराऊँगी या बात नहीं करुँगी तो इससे ाचा है खुद hi पहल करूँ...
सभ्य- लल्ला रस्ते का ध्यान रखियो कहीं भटक न जाएं हम...
अनुज- नहीं माँ हम एक दम सही रस्ते पर हैं.....
अनुज को साधारण तरीके से जवाब देता देख सभ्य को थोड़ी राहत महसूस हुई.
सभ्य- चलो वैसे काफी देर हो गयी हमें चलते चलते...
अनुज- हाँ माँ हो गए होंगे दो तीन घंटे...
सभ्य- पता नहीं कितनी दूर होगा ये तालाब, यहाँ तो कोई मिलता भी नहीं की पूछ लें किसी से...
अनुज- इस बीहड़ में कौन मिलेगा माँ. सिवाए जानवरों के और अभी तो गर्मी में वो भी सुस्ता रहे होंगे...
सभ्य- हाँ सही है चलते रहते हैं थोड़ी देर और खाने के लिए hi रुकेंगे कहीं सही सी जगह देखकर.
अनुज- हाँ माँ अब खाने के लिए hi रुकेंगे...
कर्मा और शालू मौसी
शालू- उस कल्मुये ने तो बोलै था थोड़ी hi दूर है तीन घंटे हो गए चलते चलते आ hi नहीं रहा,
कर्मा- क्या हुआ थक गयी मौसी...
शालू- और का इतनी देर से लगातार चले जा रहे हैं थकेंगे नहीं लल्ला...
कर्मा- तो आराम करलो थोड़ी देर..
शालू- नहीं अनहि नहीं लल्ला जब तू ये थैला उठाकर चल रहा है तो हमारे पास तो कोई बोझ नहीं है हम और चल लेंगे..
मौसी बोझ तो तुम्हारे पास मुझसे भी ज़्यादा है कर्मा ने मौसी की बड़ी बड़ी छुछियां को घूरते हुए मन में कहा..
Karma-therk मौसी पर जब थको तो बता देना...
शालू- बिलकुल लल्ला तू हमारी कितनी फ़िक़र करता है... मन हम थोड़े बूढ़े हो गए पर चल लेंगे..
कर्मा- क्या मौसी तुम और बूढी... अरे अभी तो तुम इतनी जवान हो. जितने जवान लड़के लड़कियां न जवान हो..
शालू- चल चल कछु भी मत बोल....
शालू जान बूझ कर कर्मा से इधर उधर की बातें कर रही थी वो चाहती थी की कर्मा खली न रहे नहीं तो उसके दिमाग में उसके और उसकी माँ के बीच जो कुछ हुआ वो याद आएगा और वो उसके बारे में सोचने लगेगा...
शालू के खुद के मन में बार बार वो तस्वीर आ रही थी जब उसकी बहन को अपने hi बेटे के साथ सम्भोग करना पद रहा था .. इसीलिए वो कर्मा को बातों में लगाने की कोशिश जार रही थी.. और कर्मा को साधारण तरीके से बात करते देख उसे लग रहा था की वो कामयाब भी हो रही है...
कर्मा- सही बोल रहा हूँ मौसी..
Shalu-waise कितनी हरी भरी है जगह है न....
कर्मा- और सुनसान भी.
इसी तरह से काफी देर तक आगे बढ़ने के बाद शालू की नज़र एक जगह पड़ी...
जग्गू और मंजू
मंजू- ऐ लल्ला ये जगह कैसी रहेगी थोड़ी देर आराम कर लेते हैं, कुछ खा भी ले बहुत देर से चल रहा है थक गया होगा...
जग्गू- ाचा मैं या तुम थक गयी हो...
मंजू- हाँ हाँ हम थक गए हैं खुश अब..
जग्गू- ाचा ठीक है चलो इस पेड़ के नीचे बैठते हैं...
मंजू- हाँ लल्ला हमारी तो हालत ख़राब हो गयी चालत चालत..
और मंजू धम्म से जाकर पेड़ के बगल में जाकर बैठ गयी और पीछे से पेड़ से तक lagali..aur अपने घर की तरह अगले hi पल अपने पल्लू को नीचे गिरा दिया...
जग्गू ने बैठते हुए जब सामने का नज़ारा देखा तो कुछ पल के लिए उसकी आँखें वहीं रुक गयी...
पल्लू के गिरनेसे उसकी मम्मी की आधी सी ज़्यादा चूचियां गदराया मांसल पेट गहरी नाभि सब सामने था...

लम्बी सांस भरने के बाद जब मंजू की नज़र ने जग्गू की नज़र का पीछा किआ तो पाया उसका बीटा उसकी छूछीयो और नंगे पेट को घूर रहा है, तो मंजू को न जाने क्यों एक अलग सा एहसास हुआ... जग्गू ने खुद को संभाला और खाना निकलने लगा...
दोनों माँ बेटे खाना खाने लगे बीच बीच में जग्गू अपनी माँ के बदन से आँखें सेक रहा था, उसने देखा पसीने की बूँद उसकी माँ के पेट पर फिसलती हुई उसकी नाभि में घुस गयी..
जग्गू का तो मनो गाला सूख गया उसका मन किआ अभी जीभ डालकर चतले वो अपनी माँ की नाभि को चूस ले, उसकी धोती में उसका लुंड कड़क हो गया.... और ये मंजू ने भी देखि , की उनके बेटे के धोती के सामने उभर है... और फिर मंजू ने अपनी तरफ देखा तो पाया की भीगे ब्लाउज में उसकी बड़ी बड़ी छुछियां लगभग नंगी hi दिख रही हैं वहीं पल्लू हटाने से सामने का हिस्सा पूरा बेटे के सामने है, पर मंजू ने खुद को ढकने या छुपाने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि ऐसे hi बैठ कर कहती रही...
अनुज और सभ्य
अनुज- अब जाकर थोड़ा चैन मिला है न माँ, तुम्हारा पेट तो भर गया??
सभ्य- हाँ लल्ला बिलकुल भर गया और सही कह रहा है चलते चलते थक गए थे अब खाना खाकर कुछ ाचा लग रहा है..
अनुज- वही तो वैसे अब क्या करें चलें या थोड़ा रुकना है...
सभ्य- थोड़ा रुकते hi हैं, खाकर मुझसे तो चला नहीं जायेगा...
Anuj-ye तो है माँ, चलो फिर कुछ देर आराम कर लेते हैं.
सभ्य- हाँ तू भी आराम करले....
माँ बेटे दोनों घास में hi लेट गए, सभ्य ने अपने सर के पीछे हाथ लगा लिए और अनुज को बोली- आ लल्ला इधर लेट जा अपना सर मेरी गॉड में रख ले...
बस अनुज की तो जैसे मन मांगी मुराद पूरी हो गयी.. मन ने लड्डू फूटने लगे... अनुज तुरंत अपनी माँ की जांघ पर सर रखकर लेट गया...
अनुज का लुंड बस इतनी सी बात पर खड़ा हो गया, उसे अपनी माँ के करीब होने भर से hi एक अजीब सा एहसास हो रहा था, सभ्य जहाँ आँखें बंद जिए हुए लेती थी वहीं अनुज ने करवट लेकर अपना चेहरा सभ्य के ऊपर के हिस्से की और कर लिए...
अनुज को अपनी माँ की हर सांस के साथ ऊपर नीचे होती हुई चूचियां दिखी जिन्हे देखकर उसका मन किआ की अभी ब्लाउज उतारकर उन्हें अपने मुँह में भर के चूसले...
उसने अपने सर को खुजलाने के बहाने से हाथ से माँ के पेट पर पड़े साड़ी के पल्लू को थोड़ा साइड खिसका दिया जिससे उसकी माँ का भरा हुआ चिकमा मांसल पेट और नाभि ुनगर हो गयी...
जिसे देखकर hi अनुज की नज़रें चमक उठी, उसनर एक बार माँ को ध्यान से देखा और कोई प्रतिक्रिया न पाकर चैन में आ गया, माँ का चिकना पेट थोड़ा पसीने की वजह से और चमक रहा था उसे सामने पाकर उसके मुँह में पानी आ रहा था साथ नाभि को देखकर उसका मन बार बार उसे चूसने का हो रहा था...
पर मन में दर भी था, अनुज ने एक बार फिर से सर खुजाने के बहाने हाथ ऊपर रखा और फिर सर खुजाकर नीचे ले जाने की वजह माँ के पेट पर hi रख दिया...
माँ के पेट की नंगी त्वचा को अपने हाथ पर. महसूस कर अनुज के पूरे शरीर में एक अलग सी ऊर्जा दौड़ गयी उसका लुंड झटके खाने लगे,
गर्मी के मौसम में उसे और गर्मी लगने लगी... अनुज इस बात का भी ध्यान रख रहा था की उसके कुछ भी करने पर माँ की क्या प्रतिक्रिया है पर अभी तो वो आँखें बंद किये लेती थी और कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी.....
इससे अनुज का हौसला थोड़ा थोड़ा बढ़ता जा रहा था... उसने अपने सर को खिसका कर जांघ से ऊपर अपने माँ के पेट पर रख लिए....
और चेहरा माँ के चेहरे की और कर लिए अनुज का चेहरा माँ के पेट पर था और अपने गाल पर माँ के पेट की नरम त्वचा को महसूस कर अनुज तो फूला नहीं समां रहा था... पर साथ hi उसका लालच भी बढ़ता जा रहा था, इतनी पास माँ का पेट देखकर उसका मन कर रहा था की वो उसे चूमे कहते और बहुत धीरे से वो अपना चेहरा हिलाते हुए अपने होंठों को माँ के पेट पर घिसने लगा...
ऐसे खुले जंगल के बीच अकेले में अपनी माँ के साथ ये सब करने में अनुज को एक अलग आनंद की प्राप्ति हो रही थी...
माँ की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न पाकर अनुज और अपने होंठों से माँ के नंगे चिकने पेट को चूमने लगा पर बहुत आराम से धीरे धीरे,

फिर उसका मन माँ की नाभि को चूसने को हुआ पर वो जनता था की नाभि कितनी संवेदनशील होती है कहीं माँ जाग गयी तो, फिर भी उसने हिम्मत करते हुए माँ की नाभि पर अपने होंठ रखे hi थे की माँ बोल पड़ी: आई लल्ला...
अनुज की तो दर से फटने लगी...
सभ्य- लल्ला पेट से हैट खाना खाया है पेट डाब रहा है .
माँ की बात सुनकर अनुज तुरंत हैट गया अपनी माँ के पेट से पर उसे एक बात की राहत भी मिली की माँ ने उसे उनके पेट को चूमने पर कुछ नहीं बोलै... इसी उधेड़बुन में अनुज भी अब बगल में लेट कर लगा हुआ था...
कर्मा और शालू
शालू- कुछ भी हो कालक वाले खाना बड़ा स्वादिष्ट बनाते हैं.
कर्मा- हाँ मौसी अब मस्त पेट भर गया...
शालू- तो थोड़ी देर सुस्ता लें फिर आगे चलेंगे... वैसर तुझे मिला न खाने को भरपेट किसी चीज़ की कमी तो नहीं रह गयी..
कर्मा- बस एक चीज़ की कमी रह गयी मौसी.
शालू- क्या किस चीज़ की?
कर्मा- दूध की...
शालू- अब दूध यहाँ कहाँ मिलेगा...-
कर्मा- है तो यही मौसी ध्यान से देखो..
कर्मा ने मज़ाक करते हुए कहा और इशारा शालू की और hi किआ..
जब शालू को कर्मा की बात समझ आई तो मुँह बनाते हुए बोली- बड़ा कमीना होता जा रहा है तू,
शालू ने लाड में कर्मा के मरते हुए कहा..
कर्मा- कमीना कहाँ मौसी जो सच है बताया अब दूध पीने का मन है तो है..
shalu-abhi यहाँ पागल है क्या तू...
कर्मा- क्यों चोदामपुर में भी तो मैं और अनुज रोज़ रात को तुम्हारा दूध पि कर सोते थे मौसी..
शालू- तब की बात अलग थी, अभी यहाँ खुले में कैसे..
कर्मा- मौसी ध्यान से देखो हम जंगल में यहाँ ढूंढने से कोई नहीं मिल रहा ऐसे तो आने से रहा..
शालू- मुझे अजीब सा लग रहा है...
कर्मा- इसमें अजीब क्या है मौसी...
शालू ने कुछ सोचा और फिर अपनी साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया कर्मा के सामने उसकी मौसी की ब्लाउज में क़ैद चूचियां और नंगा गोरा पेट आ गया, शालू ने फिर अपने ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किये अब इतनी बड़ी छुछियां बिना ब्लाउज खोले तो बहार नहीं आ सकती थी,
कुछ hi पालो में ब्लाउज खुल गया जबसे कालक गाओं में प्रवेश हुआ था तबसे hi पेटीकोट और ब्रा तो कोई भी औरत पहनती hi नहीं थी तो बचा सिर्फ ब्लाउज और उसके दोनों पत् अलग होते hi कर्मा की आँखों में चमक आ गयी अपनी मौसी की नंगी छूछीयो को देखकर...
रात में घर में देखने पर यहाँ खुले आसमान में मौसी का यूँ ब्लाउज खोलकर अपनी छुछियां बहार निकलना कर्मा को बेहद उत्तेजित कर रहा था उसका लुंड धोती में तम्बू बना चूका था
ब्लाउज को पूरी तरह से खोलकर शालू पेड़ से तक लगाकर बैठ गयी
और बड़े प्यार से बोली- आजा लल्ला ले पीले दूध...
शालू की इस बात में जितना स्नेह झलक रहा था उससे भी कहीं ज़्यादा हवस, पहले जो भी हुआ उससे वो उत्तेजित थी hi और अब अपने भांजे को यूँ बीच जंगल में अपनी छुच्छी चुसवाने के ख्याल से hi अति उत्तेजित महसूस कर रही थी..
कर्मा भी तुरंत आगे बढ़ा और अपनी मौसी के सामने जाकर आगे झुक कद के एक छुच्छी को मुँह में भरते हुए चूसने लगा साथ. Hi हाथ से मसलने भी लगा..

शालू के मुँह से मादकता भरी सिसकियाँ निकलने लगी वहीं कर्मा मज़े से अपनी मौसी की बड़ी बड़ी छुच्छी का रास पि रहा था निचोड़ निचोड़कर...
कर्मा का लुंड बेहद सख्त हो गया था.. आसान को और सजग बनाने के लिए, कर्मा ने शालू को आगे खिसका कर वहीं लिटा लिया और फिर उसके बगल में लेटकर छूछीयो को चूसने लगा, उसका सख्त लुंड शालू की जांघ पर चुभ रहा था जिसे शालू भी बड़े अचे से महसूस कर रही थी और वही उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था, जहाँ कर्मा छूछीयो में खोया हुआ था तभी शालू के दिमाग में एक ख्याल आया और उसने कुछ ऐसा किआ जिससे कर्मा के मुँह से आह्हः निकल गयी...
इसके आगे क्या होता है देखते हैं अगले अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.
मैं और मौसी- उत्तर के तालाब की और, माँ और अनुज- पश्चिम, जग्गू और तै- पूर्व.
आगे देखना था ये सफर क्या क्या नए नए अनुभव करवाने वाला था...
अपडेट 145
जग्गू और मंजू
दोनों माँ बेटे बताये हुए रस्ते पर धीरे धीरे बढ़ने लगे, दोनों में hi कुछ झिझक थी एक दुसरे को लेकर, जग्गू मन में वही चल रहा था की कैसे कर्मा ने चची को सबके सामने अपनी hi माँ को सबके सामने छोड़ लिए क्या होता अगर उसकी जगह मैं और मम्मी होते तो, मम्मी का बदन भी काम गदराया हुआ थोड़े hi है... मम्मी की क्या प्रतिक्रिया होगी अगर मैं उन्हें छोड़ने की कोशिश करूँ तो... इन्ही सब सवालों में उलझा हुआ जग्गू सोच में पड़ा हुआ था...
वहीं मंजू का तो कालक गाओं आकर पूरा नजरिया hi बदल गया था, अपने बेटे को सेविकाओं की चुदाई करते देखना, फिर कर्मा और अनुज से एक साथ छोड़ना और अंत में कर्मा और सभ्य की, माँ बेटे की चुदाई देखना, अब मंजू के लिए कुछ सही गलत नहीं था वो बस साडी परिस्थितियों में खुद को रखकर देख रही थी...
और कहीं न कहीं सभ्य और कर्मा की चुदाई के बाद उसके मन में भी अपने और जग्गू को लेकर अजीब अजीब से ख्याल आने लगे थे...
मंजू ने देखा की जग्गू काफी देर से कुछ बोल नहीं रहा तो उसने खुद चुप्पी छोड़ने की सोची
मंजू- का हुआ बचुआ कछु बोल नहीं रहा, कोई नात है का?
जग्गू- नहीं मम्मी कुछ बात नहीं है बस ऐसे hi..
मंजू- हुंका तो यकीन नहीं हो रहा की हम लोग मुक़ाबला जीत गए...
जग्गू- पर हम जीत गए मम्मी यकीन करलो...
मंजू- पर जीतने के लिए भी न जाने क्या क्या करना पड़ा तब जाकर जीते हैं..
मंजू ने ये बात कही तो दोनों के hi मन में कर्मा और सभ्य की चुदाई की तसवीरें उभर आई..
Jaggu-haan जीते तो बड़ी मुश्किल से हैं...
मंजू- हिम्मत है कर्मा और बन्नो की...
जग्गू- कैसी हिम्मत मम्मी.?
मंजू- यही सब करने की जो भी मुक़ाबला जीतने के लिए करना पड़ा... उनकी जगह कोई नहीं कर पता..
जग्गू- क्यों मम्मी अगर उनकी जगह तुम होती तो हिम्मत नहीं दिखती का??
मंजू जग्गू के इस सवाल से थोड़ी असहज हो गयी और बोली- ुहम्म्म्म हम पता नहीं...
जग्गू- बात मुक़ाबला जीतने की होती तो करना पड़ता न..
मंजू- वही तो पता नहीं कर भी सकते थे या नहीं भी... तू बता तू कर पता...
जग्गू- हाँ बिलकुल इतनी दूर से आकर खली हाथ थोड़े hi जाते, मैं बिलकुल करलेता..
मंजू को जग्गू के इस जवाब से ये एहसास हो गया की जग्गू के इस बारे में क्या विचार हैं...
मंजू- मतलब तू कर लेता हुनर साथ भी जो कर्मा एयर सभ्य ने किआ...
इस बार जग्गू ऐसे सीधे प्रश्न से हिल गया और बात टालते हुए बोलै- ओह्हो मम्मी हम भी कहाँ की बातों में लग गए सच तो ये है की जो होना था हो चूका...
मंजू- हम्म्म हाँ ये भी है, थोड़ा पानी तो दे प्यास लगी है..
जग्गू ने कंधे पर लटका थैला उतरा और उसमे से पानी की बोतल निकल कर मंजू को दी... तो मंजू बोतल से पानी पीने लगी पानी पीते हुए जग्गू ध्यान से अपनी माँ को देख रहा था, भरा हुआ बदन, मांसल कूल्हे, हल्का चर्बीदार पेट, कमर पर पसीने की बूँदें जो मोतियों सी फिसल रही थी...
मंजू ने पानी पीकर बोतल बापिस दी और फिर से दोनों चलने लगे...
मंजू- ऐ लल्ला हम सही रस्ते पर तो हैं न..
जग्गू- हैं मम्मी बताया तो यही था...
मंजू- इतनी देर हो गयी चलते चलते हमारे तो पेअर थकने लगे हैं ऊपर से ये गर्मी...
जग्गू- रुक जाते हैं थोड़ी देर मम्मी..
मंजू- नहीं थोड़ी देर और चल लेंगे अभी हम फिर रुकेंगे तो खाना भी खा लेंगे...
जग्गू- ठीक है मम्मी..
अनुज और सभ्य
ये दोनों भी काफी देर से चले जा रहे थे, गर्मी के कारन दोनों पसीने से नहाये हुए थे, सभ्य की छूछीयो पर तो जैसे ब्लाउज चिपक सा गया था, वो तो भला हो साड़ी के पल्लू का जिससे उसकी भरी हुई छुछियां ढकी हुई थी वर्ण बिना ब्रा के गीले ब्लाउज में सभ्य की बड़ी छुछियां कहाँ छुपती...
वहीं अनुज भी धीरे धीरे से अपनी माँ के साथ साथ चले जा रहा था, उसको न जाने क्यों एक अलग ख़ुशी थी की वो माँ के साथ अकेला है...
जबसे कर्मा के साथ मिलकर उसने पहली बार ममता चची को छोड़ने से शुरुआत की थी और फिर अपनी सगी बुआ और उनके परिवार की औरतों को छोड़कर उसके विचार रिश्तों के बारे में काफी बदल गए थे, अपनी माँ के बारे में भी पिछले कुछ समय से ऐसे hi ख्याल आने लगे थे, ऊपर से वो जनता था की जितनी नहीं औरतें उसने भोगी हैं, बदन के मामले में उसकी माँ सबसे इक्कीस hi होगी, घर में भी माँ के बदन को देखकर उसने कई बात लुंड हिलाया था...
और फिर कालक आने पर तो जैसे सब कुछ hi बदल गया और अंत में अपने भाई और माँ की चुदाई देखकर अनुज का दिमाग पूरी तरह खुल गया था, उसके मन में माँ के साथ सब कुछ करने की उम्मीद जागने लगी थी... इसी सोच में साथ hi इस ख़ुशी में की वो माँ के साथ अकेला है चले जा रहा था...
सभ्य अभी तक अनुज से सामने से नज़र मिलाने और कुछ बोलने से बच hi रही थी क्यूंकि मुक़ाबले के दौरान जो कुछ हुआ उसके बाद समझ नहीं आ रहा था की वो अनुज का सामना कैसे करे, वो क्या सोच रहा होगा इसके बारे में, वैसे तो सबने फैसला किआ है की इसके बारे में किसी को नहीं बताएँगे पर कहीं अनुज ने घर जाकर अपने पापा के सामने कुछ बोल दिया तो..
नहीं नहीं मुझे पता करना होगा इसके मन में क्या है और कब तक मैं नज़रें चुराऊँगी या बात नहीं करुँगी तो इससे ाचा है खुद hi पहल करूँ...
सभ्य- लल्ला रस्ते का ध्यान रखियो कहीं भटक न जाएं हम...
अनुज- नहीं माँ हम एक दम सही रस्ते पर हैं.....
अनुज को साधारण तरीके से जवाब देता देख सभ्य को थोड़ी राहत महसूस हुई.
सभ्य- चलो वैसे काफी देर हो गयी हमें चलते चलते...
अनुज- हाँ माँ हो गए होंगे दो तीन घंटे...
सभ्य- पता नहीं कितनी दूर होगा ये तालाब, यहाँ तो कोई मिलता भी नहीं की पूछ लें किसी से...
अनुज- इस बीहड़ में कौन मिलेगा माँ. सिवाए जानवरों के और अभी तो गर्मी में वो भी सुस्ता रहे होंगे...
सभ्य- हाँ सही है चलते रहते हैं थोड़ी देर और खाने के लिए hi रुकेंगे कहीं सही सी जगह देखकर.
अनुज- हाँ माँ अब खाने के लिए hi रुकेंगे...
कर्मा और शालू मौसी
शालू- उस कल्मुये ने तो बोलै था थोड़ी hi दूर है तीन घंटे हो गए चलते चलते आ hi नहीं रहा,
कर्मा- क्या हुआ थक गयी मौसी...
शालू- और का इतनी देर से लगातार चले जा रहे हैं थकेंगे नहीं लल्ला...
कर्मा- तो आराम करलो थोड़ी देर..
शालू- नहीं अनहि नहीं लल्ला जब तू ये थैला उठाकर चल रहा है तो हमारे पास तो कोई बोझ नहीं है हम और चल लेंगे..
मौसी बोझ तो तुम्हारे पास मुझसे भी ज़्यादा है कर्मा ने मौसी की बड़ी बड़ी छुछियां को घूरते हुए मन में कहा..
Karma-therk मौसी पर जब थको तो बता देना...
शालू- बिलकुल लल्ला तू हमारी कितनी फ़िक़र करता है... मन हम थोड़े बूढ़े हो गए पर चल लेंगे..
कर्मा- क्या मौसी तुम और बूढी... अरे अभी तो तुम इतनी जवान हो. जितने जवान लड़के लड़कियां न जवान हो..
शालू- चल चल कछु भी मत बोल....
शालू जान बूझ कर कर्मा से इधर उधर की बातें कर रही थी वो चाहती थी की कर्मा खली न रहे नहीं तो उसके दिमाग में उसके और उसकी माँ के बीच जो कुछ हुआ वो याद आएगा और वो उसके बारे में सोचने लगेगा...
शालू के खुद के मन में बार बार वो तस्वीर आ रही थी जब उसकी बहन को अपने hi बेटे के साथ सम्भोग करना पद रहा था .. इसीलिए वो कर्मा को बातों में लगाने की कोशिश जार रही थी.. और कर्मा को साधारण तरीके से बात करते देख उसे लग रहा था की वो कामयाब भी हो रही है...
कर्मा- सही बोल रहा हूँ मौसी..
Shalu-waise कितनी हरी भरी है जगह है न....
कर्मा- और सुनसान भी.
इसी तरह से काफी देर तक आगे बढ़ने के बाद शालू की नज़र एक जगह पड़ी...
जग्गू और मंजू
मंजू- ऐ लल्ला ये जगह कैसी रहेगी थोड़ी देर आराम कर लेते हैं, कुछ खा भी ले बहुत देर से चल रहा है थक गया होगा...
जग्गू- ाचा मैं या तुम थक गयी हो...
मंजू- हाँ हाँ हम थक गए हैं खुश अब..
जग्गू- ाचा ठीक है चलो इस पेड़ के नीचे बैठते हैं...
मंजू- हाँ लल्ला हमारी तो हालत ख़राब हो गयी चालत चालत..
और मंजू धम्म से जाकर पेड़ के बगल में जाकर बैठ गयी और पीछे से पेड़ से तक lagali..aur अपने घर की तरह अगले hi पल अपने पल्लू को नीचे गिरा दिया...
जग्गू ने बैठते हुए जब सामने का नज़ारा देखा तो कुछ पल के लिए उसकी आँखें वहीं रुक गयी...
पल्लू के गिरनेसे उसकी मम्मी की आधी सी ज़्यादा चूचियां गदराया मांसल पेट गहरी नाभि सब सामने था...

लम्बी सांस भरने के बाद जब मंजू की नज़र ने जग्गू की नज़र का पीछा किआ तो पाया उसका बीटा उसकी छूछीयो और नंगे पेट को घूर रहा है, तो मंजू को न जाने क्यों एक अलग सा एहसास हुआ... जग्गू ने खुद को संभाला और खाना निकलने लगा...
दोनों माँ बेटे खाना खाने लगे बीच बीच में जग्गू अपनी माँ के बदन से आँखें सेक रहा था, उसने देखा पसीने की बूँद उसकी माँ के पेट पर फिसलती हुई उसकी नाभि में घुस गयी..
जग्गू का तो मनो गाला सूख गया उसका मन किआ अभी जीभ डालकर चतले वो अपनी माँ की नाभि को चूस ले, उसकी धोती में उसका लुंड कड़क हो गया.... और ये मंजू ने भी देखि , की उनके बेटे के धोती के सामने उभर है... और फिर मंजू ने अपनी तरफ देखा तो पाया की भीगे ब्लाउज में उसकी बड़ी बड़ी छुछियां लगभग नंगी hi दिख रही हैं वहीं पल्लू हटाने से सामने का हिस्सा पूरा बेटे के सामने है, पर मंजू ने खुद को ढकने या छुपाने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि ऐसे hi बैठ कर कहती रही...
अनुज और सभ्य
अनुज- अब जाकर थोड़ा चैन मिला है न माँ, तुम्हारा पेट तो भर गया??
सभ्य- हाँ लल्ला बिलकुल भर गया और सही कह रहा है चलते चलते थक गए थे अब खाना खाकर कुछ ाचा लग रहा है..
अनुज- वही तो वैसे अब क्या करें चलें या थोड़ा रुकना है...
सभ्य- थोड़ा रुकते hi हैं, खाकर मुझसे तो चला नहीं जायेगा...
Anuj-ye तो है माँ, चलो फिर कुछ देर आराम कर लेते हैं.
सभ्य- हाँ तू भी आराम करले....
माँ बेटे दोनों घास में hi लेट गए, सभ्य ने अपने सर के पीछे हाथ लगा लिए और अनुज को बोली- आ लल्ला इधर लेट जा अपना सर मेरी गॉड में रख ले...
बस अनुज की तो जैसे मन मांगी मुराद पूरी हो गयी.. मन ने लड्डू फूटने लगे... अनुज तुरंत अपनी माँ की जांघ पर सर रखकर लेट गया...
अनुज का लुंड बस इतनी सी बात पर खड़ा हो गया, उसे अपनी माँ के करीब होने भर से hi एक अजीब सा एहसास हो रहा था, सभ्य जहाँ आँखें बंद जिए हुए लेती थी वहीं अनुज ने करवट लेकर अपना चेहरा सभ्य के ऊपर के हिस्से की और कर लिए...
अनुज को अपनी माँ की हर सांस के साथ ऊपर नीचे होती हुई चूचियां दिखी जिन्हे देखकर उसका मन किआ की अभी ब्लाउज उतारकर उन्हें अपने मुँह में भर के चूसले...
उसने अपने सर को खुजलाने के बहाने से हाथ से माँ के पेट पर पड़े साड़ी के पल्लू को थोड़ा साइड खिसका दिया जिससे उसकी माँ का भरा हुआ चिकमा मांसल पेट और नाभि ुनगर हो गयी...
जिसे देखकर hi अनुज की नज़रें चमक उठी, उसनर एक बार माँ को ध्यान से देखा और कोई प्रतिक्रिया न पाकर चैन में आ गया, माँ का चिकना पेट थोड़ा पसीने की वजह से और चमक रहा था उसे सामने पाकर उसके मुँह में पानी आ रहा था साथ नाभि को देखकर उसका मन बार बार उसे चूसने का हो रहा था...
पर मन में दर भी था, अनुज ने एक बार फिर से सर खुजाने के बहाने हाथ ऊपर रखा और फिर सर खुजाकर नीचे ले जाने की वजह माँ के पेट पर hi रख दिया...
माँ के पेट की नंगी त्वचा को अपने हाथ पर. महसूस कर अनुज के पूरे शरीर में एक अलग सी ऊर्जा दौड़ गयी उसका लुंड झटके खाने लगे,
गर्मी के मौसम में उसे और गर्मी लगने लगी... अनुज इस बात का भी ध्यान रख रहा था की उसके कुछ भी करने पर माँ की क्या प्रतिक्रिया है पर अभी तो वो आँखें बंद किये लेती थी और कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी.....
इससे अनुज का हौसला थोड़ा थोड़ा बढ़ता जा रहा था... उसने अपने सर को खिसका कर जांघ से ऊपर अपने माँ के पेट पर रख लिए....
और चेहरा माँ के चेहरे की और कर लिए अनुज का चेहरा माँ के पेट पर था और अपने गाल पर माँ के पेट की नरम त्वचा को महसूस कर अनुज तो फूला नहीं समां रहा था... पर साथ hi उसका लालच भी बढ़ता जा रहा था, इतनी पास माँ का पेट देखकर उसका मन कर रहा था की वो उसे चूमे कहते और बहुत धीरे से वो अपना चेहरा हिलाते हुए अपने होंठों को माँ के पेट पर घिसने लगा...
ऐसे खुले जंगल के बीच अकेले में अपनी माँ के साथ ये सब करने में अनुज को एक अलग आनंद की प्राप्ति हो रही थी...
माँ की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न पाकर अनुज और अपने होंठों से माँ के नंगे चिकने पेट को चूमने लगा पर बहुत आराम से धीरे धीरे,

फिर उसका मन माँ की नाभि को चूसने को हुआ पर वो जनता था की नाभि कितनी संवेदनशील होती है कहीं माँ जाग गयी तो, फिर भी उसने हिम्मत करते हुए माँ की नाभि पर अपने होंठ रखे hi थे की माँ बोल पड़ी: आई लल्ला...
अनुज की तो दर से फटने लगी...
सभ्य- लल्ला पेट से हैट खाना खाया है पेट डाब रहा है .
माँ की बात सुनकर अनुज तुरंत हैट गया अपनी माँ के पेट से पर उसे एक बात की राहत भी मिली की माँ ने उसे उनके पेट को चूमने पर कुछ नहीं बोलै... इसी उधेड़बुन में अनुज भी अब बगल में लेट कर लगा हुआ था...
कर्मा और शालू
शालू- कुछ भी हो कालक वाले खाना बड़ा स्वादिष्ट बनाते हैं.
कर्मा- हाँ मौसी अब मस्त पेट भर गया...
शालू- तो थोड़ी देर सुस्ता लें फिर आगे चलेंगे... वैसर तुझे मिला न खाने को भरपेट किसी चीज़ की कमी तो नहीं रह गयी..
कर्मा- बस एक चीज़ की कमी रह गयी मौसी.
शालू- क्या किस चीज़ की?
कर्मा- दूध की...
शालू- अब दूध यहाँ कहाँ मिलेगा...-
कर्मा- है तो यही मौसी ध्यान से देखो..
कर्मा ने मज़ाक करते हुए कहा और इशारा शालू की और hi किआ..
जब शालू को कर्मा की बात समझ आई तो मुँह बनाते हुए बोली- बड़ा कमीना होता जा रहा है तू,
शालू ने लाड में कर्मा के मरते हुए कहा..
कर्मा- कमीना कहाँ मौसी जो सच है बताया अब दूध पीने का मन है तो है..
shalu-abhi यहाँ पागल है क्या तू...
कर्मा- क्यों चोदामपुर में भी तो मैं और अनुज रोज़ रात को तुम्हारा दूध पि कर सोते थे मौसी..
शालू- तब की बात अलग थी, अभी यहाँ खुले में कैसे..
कर्मा- मौसी ध्यान से देखो हम जंगल में यहाँ ढूंढने से कोई नहीं मिल रहा ऐसे तो आने से रहा..
शालू- मुझे अजीब सा लग रहा है...
कर्मा- इसमें अजीब क्या है मौसी...
शालू ने कुछ सोचा और फिर अपनी साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया कर्मा के सामने उसकी मौसी की ब्लाउज में क़ैद चूचियां और नंगा गोरा पेट आ गया, शालू ने फिर अपने ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किये अब इतनी बड़ी छुछियां बिना ब्लाउज खोले तो बहार नहीं आ सकती थी,
कुछ hi पालो में ब्लाउज खुल गया जबसे कालक गाओं में प्रवेश हुआ था तबसे hi पेटीकोट और ब्रा तो कोई भी औरत पहनती hi नहीं थी तो बचा सिर्फ ब्लाउज और उसके दोनों पत् अलग होते hi कर्मा की आँखों में चमक आ गयी अपनी मौसी की नंगी छूछीयो को देखकर...
रात में घर में देखने पर यहाँ खुले आसमान में मौसी का यूँ ब्लाउज खोलकर अपनी छुछियां बहार निकलना कर्मा को बेहद उत्तेजित कर रहा था उसका लुंड धोती में तम्बू बना चूका था
ब्लाउज को पूरी तरह से खोलकर शालू पेड़ से तक लगाकर बैठ गयी
और बड़े प्यार से बोली- आजा लल्ला ले पीले दूध...
शालू की इस बात में जितना स्नेह झलक रहा था उससे भी कहीं ज़्यादा हवस, पहले जो भी हुआ उससे वो उत्तेजित थी hi और अब अपने भांजे को यूँ बीच जंगल में अपनी छुच्छी चुसवाने के ख्याल से hi अति उत्तेजित महसूस कर रही थी..
कर्मा भी तुरंत आगे बढ़ा और अपनी मौसी के सामने जाकर आगे झुक कद के एक छुच्छी को मुँह में भरते हुए चूसने लगा साथ. Hi हाथ से मसलने भी लगा..

शालू के मुँह से मादकता भरी सिसकियाँ निकलने लगी वहीं कर्मा मज़े से अपनी मौसी की बड़ी बड़ी छुच्छी का रास पि रहा था निचोड़ निचोड़कर...
कर्मा का लुंड बेहद सख्त हो गया था.. आसान को और सजग बनाने के लिए, कर्मा ने शालू को आगे खिसका कर वहीं लिटा लिया और फिर उसके बगल में लेटकर छूछीयो को चूसने लगा, उसका सख्त लुंड शालू की जांघ पर चुभ रहा था जिसे शालू भी बड़े अचे से महसूस कर रही थी और वही उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था, जहाँ कर्मा छूछीयो में खोया हुआ था तभी शालू के दिमाग में एक ख्याल आया और उसने कुछ ऐसा किआ जिससे कर्मा के मुँह से आह्हः निकल गयी...
इसके आगे क्या होता है देखते हैं अगले अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.


















