Incest Katha Chodampur Ki - Page 23 - SexBaba
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Incest Katha Chodampur Ki

पापा ने घी उठाने के लिए खुद को उठाया और आगे हुए तो उनका शरीर बिलकुल भाभी के शरीर से सात गया और पापा का खड़ा लुंड भाभी के पेट पर पाजामे के अंदर से चुभने लगा… जिससे भाभी के अंदर से एक आह निकल गयी..

अपडेट 131

पापा ने घी का डिब्बा उतर कर नीचे स्लिप पर रखते हुए कहा- क्या हुआ बहु तेरी आह क्यों निकली?

प भाभी: कुछ नहीं चाचाजी वो वो घर का काम करते हुए थोड़ी कमर लचक गयी शायद तो उसी में हल्का हल्का सा दर्द है.

पापा- अरे कमर लचक गयी और तू यहाँ भी काम कर रही है मालिश की?

प भाभी: क्या करू चाचाजी काम भी तो ज़रूरी है न..

पापा- पर शरीर का ख्याल रखना भी तो ज़रूरी है, मालिश की?

प भाभी: नहीं चाचाजी घर पर कोई था hi नहीं मुझसे लगती नहीं पीछे है न… और पल्ली और चची भी नहीं हैं जिनसे लगवा लेती..

पापा- वो सब तो ठीक हैं बीटा पर अगर बाम नहीं लगवायेगी तो ये दर्द बढ़ता जायेगा. और फिर बिलकुल नहीं कर पायेगी कुछ भी झुकना भी मुशील हो जायेगा… तेरी चची की भी लचक गयी थी एक बार तीन दिन तक झुकना तक मुश्किल हो गया बेचारी का..

प भाभी: है ढैय्या तीन दिन में तो मेरी जान hi निकल जाएगी..

भाभी ने अपनी कमर पर हाथ रखते हुए कहा जैसे उन्हें दर्द हो रहा हो…

पापा- तभी तो बोल रहे हैं बहु, की मालिश करवले, नहीं तो परेशानी बढ़ जाएगी.

प भाभी: पर कैसे कोई घर नहीं है यहाँ पर भी चची नहीं है…

पापा: वो तो है बीटा पर अभी मज़बूरी है क्या कर सकते हैं.

प भाभी: चाचाजी अगर आप बुरा न माने तो आप कर देंगे मालिश..

पापा तो जैसे ये hi सुनने के लिए बेक़रार बैठे थे, और मन hi मन खुश हो गए पर अपनी ख़ुशी को सँभालते हुए बोले- हमें तो कोई परेशानी नहीं है बहु तुझे तो कोई आपत्ति नहीं?

प भाभी: परेशानी तो मेरी है चाचाजी बस थोड़ी शर्म आ रही है..

पापा- शर्मा मत बहु वैसे भी दर्द का इलाज़ पहले ज़रूरी है.

प भाभी: ग चाचाजी पर ये बात बहार किसी को पता न लगे नहीं तो लोग क्या समझेंगे..

पापा- चिंता मत कर बहु किसी को कुछ नहीं पता चलेगा.. वैसे भी न तू बताएगी और न हम.. तो कैसे पता छलेगा

प भाभी: ठीक चाचाजी तो आप खाना खा लीजिये तब तक मैं यहाँ का कान निपटा देती हूँ फिर कर देना..

पापा- जैसी तेरी ीचा बहु..

पापा खुश होकर बहार आंगन में आकर बैठ गए और भाभी ने उन्हें खाना दिया जिसे पापा ने जितनी जल्दी हो सकता था खाने की कोशिश करने लगे.

उधर जब तक पापा ने खाना ख़त्म किआ तब तक भाभी ने भी रसोई की साफ़ सफाई कर दी… इधर पापा खाकर तैयार थे भाभी बहार आई आंगन में तो देखा पापा बिलकुल तैयार खड़े थे..

भाभी ने पापा के पास से बर्तन उठाये और अंदर रसोई में रखकर आई.. और फिर बहार पापा के सामने आ गयी पर कुछ बोलने से शर्मा रही थी,

पापा भी कुछ देर तक कुछ नहीं बोले पर समय निकलता देख उनसे रहा नहीं गया और खुद बोल पड़े: बहु चलें फिर तेरी मालिश कर दें.

प भाभी- चाचाजी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा क्या ये सही रहेगा.

पापा को बात बिगड़ती दिखी तो तुरंत बोले- अरे बीटा कुछ गलत थोड़े hi कर रहे हैं हाँ अगर नहीं किआ तो गलत होगा और तेरा दर्द और बढ़ जायेगा.. चल अब ज्यादा मत सोच बहु.

प भाभी- ग चाचाजी, तो फिर कहाँ यहीं पर.

पापा- यहाँ नहीं मेरे हमारे कमरे में चल वहीं राखी है बाम भी तेरी चची कभी कभी लगाती हैं न.

भाभी अकेले पापा के साथ कमरे में जाने की बात सुनकर थोड़ा असहज भी हुई पर साथ hi उनकी उत्तेजना भी बढ़ने लगी.. वहीं पापा तो बस भाभी के चेहरे के भावों को देखकर समझने की कोशिश क्र रहे थे की उनका प्रयास कितना कामयाब हो रहा है

प भाभी- ठीक है चाचाजी चलिए..

पापा भाभी की हाँ सुनकर जल्दी से कमरे की और चल दिए भाभी ने उन्हें जाते देखा और भाभी चेहरे पर एक शरारती मुस्कराहट आ गयी.

कमरे में पापा जल्दी से इधर उधर बाम देखने लगे वही भाभी भी पीछे पीछे पीछे कमरे में दाखिल हुई.. कुछ hi पालो में पापा ने बाम ढूंढ निकली और भाभी को देखते हुए बोले- ऐसा कर बहु तू बिस्टेर पर लेट जा मैं लगा देता हूँ..

प भाभी- ठीक है चाचाजी

और भाभी बिस्तर पर पेट के बल लेट गयी, पापा भी बड़ी जल्दी से उनके पास बिस्तर के किनारे बैठ गए… पापा की नज़र भाभी की चिकनी पीठ जो की साड़ी और ब्लाउज के बीच नज़र आ रही थी उस पर hi रुक गयी थी… गोरी गोरी चिकनी माखन जैसी त्वचा..





pix host

पापा ने बाम की डिब्बी खोल ली और बाम को अपनी उँगलियों से लगाया और बोले- बहु?

प भाभी- हनमं

पापा- लगाऊं?

प Bhabhi-haan चाचाजी…

बस भाभी की सहमति मिलते hi पापा ने अपने हाथ चलने शुरू कर दिए.. अपने हाथों को वो भाभी की चिकनी पीठ पर चलते हुए बोले- किस तरफ दर्द है बहु..

प भाभी- थोड़ा सा नीचे की और चाचाजी.

पापा ने जहाँ साड़ी बंधी थी उसके बिलकुल किनारे अपनी उँगलियों को फिराया और पुछा यहाँ??

प भाभी- थोड़ा सा और नीचे…

पापा- बहु यहाँ तो साड़ी बंधी है इसके नीचे हटाने के लिए साड़ी हटानी होगी.

प भाभी- हाँ? ओह्ह्ह ठीक चाचाजी..

ये बोलकर भाभी ने अपने हाथ थोड़े पीछे किये और अपनी साड़ी को नीचे खिसका दिया थोड़ा सा… पापा का लुंड भाभी के बदन को देखकर बिलकुल कड़क हो चूका था…

पापा ने फिर जितनी साड़ी नीचे खिसकी थी उतनी जगह पर बाम मलना शुरू कर दिया.. या कहो हाथों से hi भाभी के चिकने बदन को भोगने लगे..

भाभी थोड़ी देर तो ऐसे hi लेते हुए मालिश करवाती रही पर थोड़ी देर बाद बोली- चाचाजी थोड़ा सा और नीचे दर्द हो रहा है..

पापा थोड़ा सा हैरान हुए पर जब बात समझ आई तो खुश होते हुए बोले- पर बहु यहाँ तो साड़ी बंधी है इससे नीचे बाम लगाने के लिए तो तुझे साड़ी हटानी होगी.

प भाभी- ुहँन ाचा चाचाजी ये कहकर भाभी थोड़ा सा सोचने लगी और फिर बोली- चाचाजी आप थोड़ी देर के लिए बाहर चले जायेंगे?

पापा ने कुछ सोचा और फिर बोले

पापा- हाँ हाँ क्यों नहीं

और पापा कमरे से बहार चले गए और बहार जाकर खड़े होकर सोचने लगे की कहीं इसे बुरा तो नहीं लग गया, या की मैं कुछ ज़्यादा बोल गया, इतना मज़ा आ रहा था क्या चिकना बदन है बहु का ये हाथ से नहीं जाना चाहिए ..

पापा ये सब hi सोच रहे थे की अंदर से भाभी की आवाज़ आई- चाचाजी आ जाओ अंदर.

पापा तुरंत अंदर गए और जैसे hi उनकी नज़र अंदर के नज़ारे पर पड़ी पापा की आँखें फटी की फटी रह गयी, उनके पेअर वहीं के वहीं जैम गए, सामने भाभी बिना साड़ी के सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में कड़ी थी और उनका बदन इतना मादक और कामुक लग रहा था की पापा का मन कर रहा था अभी जाकर भोग लें… पापा का लुंड अकड़ कर झटके खाने लगा… पर उनका ध्यान तो सिर्फ भाभी पर था, गहरी गोल कामुक नाभि चिकना सपाट पेट और उसके ऊपर ब्लाउज में कैद बड़ी बड़ी छुछियां जो आधी ब्लाउज के बहार झाँक रही थी.





पापा को ऐसे अपने बदन को घूरते हुए देख भाभी के चेहरे पर एक अलग सी मुस्कान थी और फिर वो बोली- चाचाजी अब हो जाएगी न मालिश आराम से?

पापा- उह्ह्ह? हैं?? हाँ हाँ हाँ बहु अब आराम से हो जाएगी टी.. टी टट्टू लेट जा न..

पापा ने एक बार फिर से भाभी के पूरे बदन को आँखों में उतारते हुए कहा तभी पापा को एक बात थोड़ा अलग लगी.. और सोचने लगे की बहु ने साड़ी तो उतरी है पर ब्लाउज के ये दो ऊपर के हुक भी तो खुले हुए हैं.. ये पहले तो लगे हुए थे जहाँ तक मुझे याद है.. कमर की मालिश के लिए ब्लाउज के हुक क्यों खोलना… फिर पापा ने खुद hi मन में कहा की क्या सोच रहे हैं हम भी इतनी गदराई जवान औरत हमारे सामने है और खोला hi है बंद नहीं किआ तो मज़े लो इस हुस्न पारी बहु के साथ..

इतनी देर में भाभी लेट चुकी थी पीठ के बल और पापा भी बगल में आकर बैठ गए और फिर भाभी की कमर को मसलने लगे पापा की नज़रें रह रह कर भाभी की नंगी गोरी पीठ से लेकर नीचे पेटीकोट में उभरे हुए चूतड़ों पर दौड़ रही थी, साथ hi उनके हाथ मालिश के बहाने भाभी की पीठ पर घूम रहे थे, चची के मुँह से हलकी हलकी ुहम्म्म्म जैसी सिसकियाँ निकल रही थी…

पापा का लुंड पाजामे में बेहद कड़क हो चूका था और झटके पर झटके देकर बहार आने को फड़फड़ा रहा था …

पापा थोड़ी हिम्मत करते हुए अपने हाथों को पीठ के साथ साथ थोड़ी बगल में भाभी की कमर तक ले जाने लग्र धीरे धीरे पापा की उंगलिया भाभी की कमर तक जा रही थी जिसपर भाभी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर पापा खुश थे, और आगे बढ़ रहे थे

भाभी का पेटीकोट उनकी पीठ के बिलकुल निचले हिस्से पर था जिससे की पापा पीठ पर अचे से मालिश कर सकें अगर पेटीकोट को थोड़ा सा और नीचे सरका दिया जाता तो भाभी के चूतड़ों की मांग नज़र आ सकती थी.. पापा के मन में भी भाभी के चूतड़ों को देखने की एक जिज्ञासा जागने lagin…aur वो मालिश करते हुए पेटीकोट को धीरे धीरे उँगलियों से नीचे खिसकने की कोशिश करने लगे पर क्यूंकि पेटीकोट भाभी के पेट से दबा हुआ था इसलिए कामयाब नहीं हो रहे थे… फिर भी पापा ने हिम्मत नहीं हरी और कोशिश करते रहे..

भाभी का पेटीकोट बिलकुल उनके चूतड़ों की सीमा तक पहुंच चूका था और पापा को यकीन था की अगर एक इंच भी और खिसकने में कामयब हुए तो भाभी के दोनों सुन्दर पर्वतों के बीच की वो घाटी की झलक ज़रूर पा लेंगे और इसके लिए उन्होंने इरादा भी पक्का कर लिए, भाभी बस आँखें मूंदे पापा के हाथों को अपने बदन पर चलता हुआ महसूस करके मज़े ले रही थी…

पापा ने इस बार सोच लिए की वो थोड़ा ज़ोर लगा कर पेटीकोट को नीचे खिसका hi देंगे और पहले वो हाथ ऊपर की तरफ ले गए और फिर नीचे की तरफ जैसे hi पेटीकोट को खिसकने के लिए लाये तभी…

खत खत खत… दरवाज़े पर आवाज़ हुई जिसे सुनकर पापा और भाभी चौंक गए और भाभी तो तुरंत उठ कर बैठ गयी वहीं पापा भी चौंक गए,

प भाभी- चाचाजी आप देखो मैं कपडे पहन कर आती हूँ..

पापा ये न तो ये चाहते थे की वो बहार जाएज और न hi ये की भाभी कपडे पहनें पर क्या कर सकते हैं.. पापा ने हामी भरी और भरी मन से कमरे से बहार निकल गए पर उससे पहले भाभी ने उनके पाजामे में बने तम्बू को ाचा से देख लिए… पापा की भाबी के चूतड़ों को देखने की ीचा पूरी नहीं हो पाई .

पापा ने गुस्से में जाकर दरवाज़ा खोला तो देखा रज्जो चची थी ,

रज्जो चची- भाई साहब तुम्हारी भैंस खुल गयी है खेत भर में दौड़ रही है, यही बताने आये थे.

पापा- अरे खुल गयी अभी जाकर बांधता हूँ निकम्मी को..

रज्जो चची- ठीक भाई जल्दी जाओ वैसे तो हम hi पकड़ लेते पर वो मुई मरखनी भी तो बहुत है इसलिए हम नहीं गए.

पापा- ाचा किआ रज्जो बेकार में मार वार देती.

रज्जो Chachi-acha भाई साब हम चलते हैं.

Papa-theek है.

ये कहकर रज्जो चची चली गयी और पापा भाग कर कमरे में आये तो देखा भाभी साड़ी पहन चुकी थी,

प भाभी- कौन था चाचाजी?

पापा- रज्जो थी दीनू की घरवाली, कह रही थी भैंस खुल गयी है..

प भाभी- अरे दिया..

पापा- एक काम करना बहु हम जा रहे हैं पकड़ने तू जाये तो टाला लगा कर चाबी दरवाज़े के ऊपर सच्चे में रख जाना.

प भाभी- ठीक चाचाजी अआप जाओ जल्दी.

पापा जल्दी से घर से निकल गए

(अस कर्मा)

वहीं दूसरी तरफ कालक गाओं में हम सब लोगो ने खूब देर तक बातें की और बात करते करते शाम हो गयी.. इसके बाद साल ऐसे hi अलग होकर घूमने लगे इधर उधर… मैं चित्रावती को ढूंढने लगा न जाने क्यों उससे बात करने को मन हो रहा था.. पर वो कहीं नहीं दिखी तो फिर जहाँ पहले पिल्लों के साथ देख रही थी वहां जाकर देखा तो वहां भी नहीं दिखी पर वो छोटे छोटे पिल्लै ज़रूर दिखे जिन्हे देखकर मुझे उनपर प्यार आने लगा और मैं उन्हें खिलने लगा. बहुत ाचा लग रहा था उनके साथ खेलने में की तभी अचानक से पिल्लै मुझे छोड़ कर एक तरफ भागने लगे…

मैंने मुद कर देखा तो पाया चित्रावती वहीं कड़ी थी





सरे पिल्लै उसकी तरफ दौड़ कर गए थे. उसने एक पिल्लै को गॉड में उठाया और मेरी तरफ आई..

चित्रावती- आकाश में जितने टारे हैं, ये सब उनसे भी ज़्यादा प्यारे है.

में- हाँ प्यारे तो बहुत हैं..

मैंने ये बोलै तो वो मुझे घूर के देखने लगी…

में- क्या हुआ, ओह्ह्ह हाँ ाचा समझा..

क्या फ़र्क़ पड़ता है कितने टारे आकाश में है,

मुझे तो बस इनसे प्यार है जो हमारे पास में हैं.

ये सुनकर उसके चेहरे पर एक बहुत hi सूंदर सी मुस्कान आ गयी..

चित्रावती- वैसे हिम्मत तो बहुत तुमने दिखलाई,

पर अफ्शोष आखिर में मात hi खाई.

में- तारीफ है ये या मज़ाक उदा रही हो,

मेरी हार पर तुम बहुत मुस्कुरा रही हो.

चित्रावती- नहीं हमारा मतलब वो नहीं था तुमने गलत हमें जाना है,

और वैसे भी तुम्हारी हार का मज़ाक उड़ाकर हमें क्या मिल जाना है.

में- हाँ बात तो ये भी सही है,

जो तुमने अभी कही है.

चित्रावती- बहुत hi बहादुरी दिखाई तुमने सच तुम्हे हम बताते हैं.

बहुत से लोग तो कालजंग को देख डरके बिना लाडे भाग जाते हैं.

में- फिर भी इस बहादुरी के बाद भी रोना है,

न जाने आगे के मुक़ाबले में और क्या होना है.

चित्रावती- ज़रूरी नहीं की जो बड़ा हो बल में..

वो hi बड़ा हो अकाल में.

चित्रावती की ये बात मेरे दिमाग में लगी यार बात तो सही है, वो मुझसे एक जगह यानि ताकत में ज़्यादा है पर हर चीज़ में तो नहीं आ सकता मैं चित्रावती की बात समझ कर मुस्कुराया फिर उसकी और देखकर बोलै- सिर्फ ये पिल्लै नहीं कोई और भी है जो तारों से भी प्यारा है,

किस्मत है हमारी जो उसने ये पल बुमरे है साथ गुजरा है.

चित्रावती ये सुनकर मेरी तरफ सवालिया नज़रों से देखने लगी पर जब मैंने कुछ नहीं बोलै तो बोली- बताओ वो है कौन,

जल्दी बोलो क्यों हो मौन?

में- क्या तुम इतनी भोली हो जितनी बनती हो?

मेरे और इन पिल्लों के अलावा यहाँ कौन है नहीं समझती हो?

चित्रावती- तो तुम्हारे हिसाब से मैं भोली और प्यारी हूँ.

ज़रा बच के रहो मेहमान मैं यहाँ की राजकुमारी हूँ.

चित्रावती ने हँसते हुए बोलै.

में- तो राजकुमारी जी आप ऐसे hi क्यों बतलाती हैं?

एक प्रश्न है की आप हर बात की तुक क्यों मिलती हैं?

चित्रावती- बचपन में हमारी गुरु ने हमें बतलाया था,

एक राजकुमारी की भाषा कैसी होनी चाहिए सिखलाया था.

में- पर ये ज़रूरी तो नहीं, वैसे भी तो बोलिये कभी.

चित्रावती- हमें ऐसे बात करना लगता आसान है,

तुकबंदी में बात करना hi अब हमारी पहचान है.

में- माफ़ कीजिये पर आप शायद इस बात से अनजान हैं.

बोली या जगह से नहीं बस आपसे आपकी पहचान है.

चित्रावती- हम समझे नहीं खुल के बताओ,

अपनी बात का मतलब समझाओ.

में- मतलब यही की ऐसे बात करने से hi सिर्फ आपकी पहचान नहीं है..

चित्रावती- पूरी बात बताओ

पर तुक तो मिलाओ.

में- नहीं राजकुमारी माफ़ कीजिये पर मैं तुक नहीं मिलाऊँगा पर मैं आपको ये समझाना छह रहा हूँ की इस जगह से या आपके तुक मिलाने से या आपके राज कुमारी होने से आपकी पहचान नहीं है.

चित्रावती काफी गंभीर होकर मुझे देखने लगी मैं सोचने लगा की कहीं कुछ ज़्यादा तो नहीं बोल गया..

चित्रावती- सही से बोलो, अपना मुँह खोलो.

उसने मेरी आँखों में देखते हुए बिलकुल गंभीरता से कहा एक पल को तो मैं थोड़ा डरा फिर बोलै- मैं बस इतना कह रहा हूँ राजकुमारी.

चित्रावती- बात सुनो हमारी, मत बोलो हमें राजकुमारी.

अब बोलते जाओ, हमें नाम से बुलाओ.

में- हाँ राज कुमा. नहीं चित्रावती बात ये है की मेरे अनुसार आपकी पहचान वो है जो ये राजकुमारी और तुकबंदी को हटाकर है.. आप चित्रावती हो… सिर्फ चित्रावती… आपकी पहचान आप हो न की ये राजकुमारी का पद या गुरुमा की सिखलाई हुई तुकबंदी.

चित्रावती मेरी तरफ देखते hi जा रही थी उसकी आँखें लग रहा था मेरे जिस्म को भेद कर निकल जाएँगी…

में- ाचा एक बात बताओ की क्या तुक बंदी से आप सब कुछ कह पति हो?

चित्रावती- हाँ सब कह जाती हूँ, सब कुछ बतलाती हूँ..

में- सच में वो सब जो तुम्हारे दिल में होता है, सब कुछ मन की हर एक बात, तुम्हे किस्से दर लगता है किस बात से ख़ुशी मिलती है कैसा लगता है सब कुछ.

इस बार चित्रावती की आँखें मुझसे हटकर. इधर उधर घूमने लगी..

चित्रावती- अगर हम बता भी पाएं तो उससे क्या होगा.

ये पहली बार था जब मेरे सामने चित्रावती ने कुछ बिना तुकबंदी के बोलै था..

में- उससे क्या होगा मतलब?

चित्रावती- मतलब यही की अगर हम कहेंगे भी तो सुनेगा कौन? कौन जानना चाहता है हमारे मन की बात, बड़ी माँ गाओं को अचे से कैसे चलना है इसमें लगी रहती हैं. वो बड़ी माँ बनने में इतनी खो गयी हैं की भूल गयी हैं की वो मेरी माँ भी हैं सिर्फ बड़ी माँ नहीं… दूसरा न हमारा कोई साथी है, बस है तो ये बेजुबान जानवर और ये पेड़ पौधे, अगर हम बोलेन भी तो किस्से बोलेन मन की बात.

मैं उसके इस तरह बोलने से हिल गया.. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोलै

में- राजकुमारी का तो पता नहीं. पर चित्रावती का तो एक दोस्त है जो उसकी साडी बात सुन्ना चाहेगा..

चित्रावती- सच्ची कौन?

में- एक बहुत hi लम्बा चौड़ा दिखने में बहुत hi सुन्दर बांका नौजवान.

चित्रावती- ऐसा कौन है

में- तुम्हारे सामने खड़ा है..

मेरी बात सुनकर चित्रावती के चेहरे पर मुस्कान आए गयी..

चित्रावती – तो तुम हमारे दोस्त बनोगे सच्ची?

में- हाँ बिलकुल बनूँगा पक्का वाला पर चित्रावती का राजकुमारी का नहीं उससे मुझे दर लगता है..

चित्रावती- मुझसे नहीं लगता.

में- बिलकुल नहीं,

चित्रावती- क्यों?

में- तुम इतनी खूबसूरत हो अछि हो तुमसे क्यों दर लगेगा..

चित्रावती हंसी और बोली- नहीं बुद्धू, हमारा मतलब है क्यों बनना चाहते हो तुम हमारे दोस्त?

में- मैं बस तुम्हे जानना चाहता हूँ..

चित्रावती- तुम तो मुझे जानते हो फिर?

में- नहीं तुम्हे जानना चाहता हूँ, चित्रावती को, तुम्हारे मन की हर बात को, तुम्हारी सबसे अछि यादों से लेकर सबसे बुरी तक, तुम्हारी कर्मियों से लेकर तुम्हारी ताकत तक, तुम्हारे मन में चल रही उथल पुथल, तुम्हारे सपने तुम्हारी प्यारी सी मुस्कान के पीछे का राज. मैं तुम्हे जानना चाहता हूँ.

चित्रावती बस मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी और कुछ सोच रही थी, न जाने उसके मन में क्या चल रहा था पर लग बहुत प्यारी रही थी





उसने ऐसे देखते हुए hi एक कदम लेकर मेरे और करीब आ गयी और बोली- सच्ची?

में- हाँ सच्ची हमेशा के लिए.

चित्रावती- हमेशा के लिए?

और ये कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिए.. मुझे भी उसका मेरा हाथ पकड़ना बहुत ाचा लगा..

में- हाँ हमेशा के लिए.

मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा कुछ देर तक हम यूँ hi आँखों में देखते हुए खड़े रहे तभी एक पिल्लै के भौंकने की वजह से हमारा ध्यान टूटा.

उसने हंस कर उस पिल्लै को अपनी गॉड में उठा लिए और मैंने एक को और पहिए मैं उससे बोलै- तो अब शुरू हो जाओ

चित्रावती- मतलब

में- मतलब तुम्हारे बारे में जानना है मुझे सब कुछ बचपन से लेकर जो भी याद है सब बताओ.

चित्रावती- सचमें अभी?

में- हाँ अभी…

इसके बाद वो अपने बारे में बताती गयी और मैं सुनता गया जितना उसके बारे में जाना उतना hi उसके लिए लगाव और इज़्ज़त बढ़ती गयी.. हूँ करीब 2-3 घंटे तक बात करते रहे जब तक की हमें खाने पर न बुलाया गया…

इसके बाद क्या हुआ सब अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्
 
इसके बाद वो अपने बारे में बताती गयी और मैं सुनता गया जितना उसके बारे में जाना उतना hi उसके लिए लगाव और इज़्ज़त बढ़ती गयी.. हूँ करीब 2-3 घंटे तक बात करते रहे जब तक की हमें खाने पर न बुलाया गया…

अपडेट 132

खाने पर जाकर मैं सब के साथ शामिल हो गया और चित्रावती अपनी माँ के साथ बैठ गयी...

हम सबने मिलकर खाना खाया जिसके बाद बड़ी माँ ने जाने से पहले कल होने वाले मुक़ाबले के लिए हम सब को आगाह किआ.. जिसके बाद हम सब वहीं बैठकर बातें करने लगे... जिसके बाद जब सब लोग सोने के लिए जाने लगे तो मौसी बोल पड़ी- क्यों न सब लोग साथ में hi सोएं?

माँ- साथ में पर कैसे?

मंजू तै- हाँ कमरे में एक hi तो बिस्तर है वो सबके लिए छोटे हैं...

मौसी- अरे सुनो बहन... अगर हम सब साथ में सोना चाहें तो कुछ इंतेज़ाम हो सकता है..

मौसी ने एक सेविका से कहा...

सेविका ने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला दिया..

मौसी- बन गया काम..

उसके बाद हम सब सेविका के पीछे पीछे चल दिए जो की एक अँधेरे से भरे गलियारे से होते हुए हमें एक कमरे में ले गयी जिसमे पूरे कमरे में एक बड़ा सा बिस्तर लगा हुआ था जिसे देखकर पता चल रहा था की बहुत सरे गद्दों को जोड़कर और फिर अचे से चादर से ढककर इसे बिस्तर को तैयार किया गया है.. खैर हमें क्या जो मौसी ने चाहा था वल उन्हें मिल गया था... और वो खुश थी.

पर सब लोग खुश नहीं थे जिनमे अनुज जग्गू और मैं भी शामिल थे...

क्यूंकि हमने रात में अपने अपने लुंड की प्यास बुझाने की सोची थी...

उधर तीनो औरतें बिस्तर पर बैठकर बातें करने लगी हम तीनो लड़के उनसे दूर खड़े होकर बातें कर रहे थे.

जग्गू- अरे यार ये तो गड़बड़ हो गयी.

अनुज- अब क्या कर सकते हैं जग्गू भैया सोचा था रात को सेविका को पकड़ कर जी भर के छोडूंगा मौसी के सोने के बाद..

जग्गू- पर सबके साथ होने से ये बड़ा मुश्किल है.. क्या करें कर्मा..

में- है तो मुश्किल पर.

अनुज- पर क्या भैया.

अनुज उत्साहित होकर बोलै.

में- पर एक काम हो सकता है..

जग्गू- क्या बता न...

में- एक मिनट रुक.. इधर आओ..

मैं उन्हें उस कमरे से बहार की और लाया और जैसे hi पर्दा हटाकर हूँ बहार आये तो बिलकुल अँधेरे गलियारे में आ गए....

जग्गू- अबे तू यहाँ क्यों लेकर आया साला यहाँ तो कुछ दिख hi नहीं रहा...

में- यही तो फायदा है..

अनुज- मतलब.

में- मतलब ये की माँ मौसी और तै के सोने का इंतज़ार करना है और उनके सोने के बाद... सेविका को पकड़ कर यहाँ ले आओ और फिर जो चाहे वो करो...

अनुज- अरे वाह क्या मस्त उपाय सोचा है भैया...

Jaggu-par तीनो में से कोई जाग गया तो?

में- तो हमें देखने बहार hi आएँगी पर यहाँ अँधेरे में हम खुद को नहीं देख प् रहे तो वो क्या देखेंगी..

जग्गू- ये तो सही बात है यार..

अनुज- तो फिर ये hi तय रहा.

में- ठीक पर सबके सोने के बाद ये नहीं की पहले hi निकल लो...

जग्गू- हाँ ठीक है ये hi करते हैं अब अंदर चलो नहीं तो उन्हें शक होगा..

अनुज- ठीक है चलो.

हम तीनो अंदर आ गए तो देखा तीनो लोग अभी भी बातों में लगे हुई थी . इन औरतों की बातें कभी ख़तम hi नहीं होती....

खैर हम लोग भी बिस्तर पर आ गए और फिर सोने की व्यवस्था करने लगे...

तो एक तरफ माँ लेती उनके बगल में जल्दी से मैं कूद पड़ा मेरे बगल में मौसी उनके बगल में अनुज और अनुज के बगल में तै और तै के बगल में जग्गू और जग्गू के बगल में 4 सेविकाएं थी...... सब एक लाइन से लेते हुए थे...

थोड़ी देर तक लेते हुए hi बातें करने के बाद सब धीरे सोने लगे तभी तै ने एक सेविका से लालटेन बुझाने को कहा.... तो उसने कुछ hi पालो में लालटेन बुझा दी और पूरे कमरे में भी गलियारे की तरह hi गुप्प अँधेरा हो गया...

मेरी आँखें खुली हुई थी पर साला इतना अँधेरा हो गया की खुद का हाथ नज़र नहीं ा रहा था... बस फिर क्या था मेरे मन में खुराफात चलने लगी... और चलें भी क्यों न मेरे दोनों तरफ माँ और मौसी जैसी गदराई कामुक घोड़ियां लेती हो और मैं ऐसे hi सो जॉन तो ठु है मुझ पर...

मैंने माँ की तरफ तुरंत करवट ली और उनसे चिपक गया... माँ को भी पता था अँधेरा है तो उन्होंने भी कुछ नहीं बल्कि सीढ़ी होकर लेट गयी... मैंने हाथ को उनके पेट पर रखा और साड़ी के पल्लू को हटा कर उनके पेट पर हाथ फिरने लगा साथ hi अपना चेहरा आगे कर के उनकी गर्दन को चूमने लगा... माँ भी हलके से सिसकने लगी आउट उनका एक हाथ मेरे बालों में चलने लगा...

गर्दन से होंठों का सफर ज़्यादा लम्बा नहीं था पर फिर भी मैं अचे से माँ के चेहरे को हर जगह चूमता हुआ उनके रसीले होंठों तक पहुँच गया और फिर माँ और बेटे के होंठ मिल गए और हम दोनों hi एक अलग दुनिया में खो गए... माँ के रसीले होंठों का रास मेरे मुँह में घुल कर मुझे एक अलग hi एहसास करवा राग था वहीं हम ये बात सोचकर उत्तेजित थे कक सबके होते हुए भी हम दोनों ये सब कर रहे हैं.

मेरा हाथ माँ के पेट पर चल रहा था लगातार और उंगली से उनकी नाभि को टटोल रहा था... साथ hi हमारे होंठों से होकर हमारी जीभें भी एक दुसरे के मुँह में घुसपैठ कर रही थी.. कभी माँ मेरी जीभ चूसती तो कभी मैं उनकी बीच में हम खुद भूल जाते की हम अकेले नहीं हैं...

खैर काफी देर बाद हमारे होंठ एक दुसरे से अलग हुए तो हम दोनों hi हांफ रहे थे...

मैंने इधर उधर सर घुमा कर देखने की कोशिश पर कोई फायदा नहीं था... गुप्प अँधेरा था और न hi कुछ सुनाई दे रहा था.. खैर जब कुछ नहीं था.. तो मैं क्यों अपना समय बर्बाद करूँ मैंने तुरंत फिर से माँ को पकड़ा और टटोलते हुए उनके ब्लाउज को उतरने की कोशिश करने लगा... पर एक तो अँधेरा दूसरा बिना आवाज़ किये करना काम थोड़ा दूभर था तो माँ मेरी मदद को आई और मेरे हाथ हटाकर खुद से अपना ब्लाउज खोलने लगी ...

माँ को ऐसा करते देख मैं खुश हो गया और नीचे होकर उनकी कमर और पेट को चाटने लगा और थोड़ी देर बाद माँ की नाभि में अपनी जीभ घुसा दी..

जिसके घिसते hi माँ के हाथ मेरे सर पर आ गए और मुझे माँ ने कास के पकड़ लिए

मैंने उनकी नाभि को चूसते हुए अपने हाथ ऊपर घुमाये तो मेरे हाथों में माँ की बड़ी बड़ी नंगी छुछियां आ गयी.. मुझे तो मेरा खजाना मिल hi गया समझो...

जहाँ मैं माँ के कामुक गदराये बदन को चूसने चाटने में व्यस्त था वहीं बिस्तर पर पड़े बाकि के लोग भी चोदामपुर के hi थे सिर्फ लेते रहना उनके बस की बात नहीं थी.. बड़ा भाई जहाँ माँ की छूछीयो को मसल रहा था तो वहीं छोटा भाई अपनी मौसी के एक चुकी पर मुँह लगाए उसमे से दूध आने का इंतज़ार कर रहा था...

सेविका के लालटेन बुझाते hi अनुज ने अपना हाथ मौसी के पेट पर रख कर अपनी मनसा जाहिर कर दी थी... और मौसी ने भी हमेशा की तरह hi अपने प्यारे भांजे की प्यास मिटने के लिए अपने ब्लाउज के हुक खोलकर उसे फैला दिया और अपने सूंदर सूंदर थानों को भांजे के मुँह में भर दिया... जिसे भांजा पूरी शिद्दत के साथ चूस रहा था...

यहाँ मौसी भांजा एक दुसरे की प्यास को मिटने की कोशिश कर रहे थे वहीं बगल मैं लेती हुई तै के जिस्म की प्यास कर्मा की नहाते हुए की गयी चुदाई के बाद और बढ़ गयी थी... तै की छूट कुलबुला रही थी... वो छह रही थी की जैसे कर्मा ने उनकी चुदाई की वैसे hi दोबारा वो उनकी छूट को लुंड से भर दे और बस छोड़ता रहे...

तै अपनी छूट की प्यास से जल रही थी तो वहीं बगल में लेता हुआ उनका बीटा उनकी प्यास से बेखबर होकर अपने बगल में लेती सेविका को खुद से चिपका कर उसकी छुछियां चूस रहा था और सब की तरह अँधेरे का पूरा फायदा उठा रहा था...

वहीं अब तक मेरे और माँ के बीच काफी कुछ हो चूका था और मैं और माँ पूरे नंगे थे अभी एक करवट पर लेते हुए थे मैंने माँ को पीछे से पकड़ कर खुद से चिपकाया हुआ था और हम दोनों के होंठ आपस में मिले हुए थे पर साथ hi नीचे से मेरा लुंड माँ की छूट में धीरे धीरे अंदर बहार हो रहा था..





मैं माँ को उतनी hi तेज़ छोड़ रहा था जिससे कोई आवाज़ न हो और हमपर किसी को शक भी न हो..

अब ये कोई कहने की बात तो नहीं की माँ की छूट छोड़ते हुए मुझे कितना मज़ा आ रहा था. मैं बस सब कुछ भूल के उनकी रसीली छूट की गहराइयों में उतर चूका tha...meri और माँ की पीठ मौसी की तरफ थी. उनसे बस थोड़ी सी दूर अगर हाथ बढ़ाएं तो वो हमें पकड़ सकती थी.. पर वो इस बात से बेखबर होकर की उनकी बहन चुद रही है अपने hi बेटे से, क्यूंकि उनका ध्यान अनुज के हाथ और मुँह पर था जो उसकी छुछियां को चूस रहा रहा साथ hi कभी नाभि को छेड़ता तो कभी पेट को मसलता, इन हरकतों से मौसी की छूट गीली होती जा रही थी.

अँधेरे में मुझे सबके होते हुए माँ को छोड़ने में बहुत मज़ा आ रहा था...

जग्गू भी ज्यादा देर तक लुंड की खुजली नहीं सह पाया और बगल में लेती सेविका की छूट में लुंड दाल दिया और उसे छोड़ने लगा...

बगल में लेती हुई उसकी मम्मी भी जिस्म की प्यास में इस कदर जल रही थी की उन्होंने अपने ब्लाउज को खोलकर अपनी हलब्बी छूछीयो को बहार निकल लिए और उन्हें अपने हाथों से मसलने लगी... वहीं उनका एक हाथ उनकी साड़ी को ऊपर करने के काम पर लग गया और कुछ hi पालो में तै की साड़ी कमर पर थी और उनकी उंगलियां उनकी प्यासी छूट को कुरेद रही थी...

अनुज की हालत मौसी की छूछीयो को चूस चूस कर ख़राब हो रही थी उसका लुंड कड़क हो चूका था और धोती में तम्बू बनाकर बार बार मौसी की मोती जांघों पर घिस रहा था जो मौसी को भी महसूस हो रहा था... जो की उनका ध्यान बहुत भटका रहा था... और एक कड़क लुंड का जांघ पर घिसना मौसी की छूट में खुजली बढ़ा रहा था..

मौसी बेचारी किसी तरह से खुद को संभाले हुई थी.. पर अनुज के लिए ये सब उतना hi मुश्किल होता जा रहा था.. उसका लुंड अब दर्द करने लगा था जिसे अनुज कभी कभी हाथ से पकड़ता तो कभी मौसी की जांघ से घिसता पर इसके बाद भी वो मुँह से मौसी की चुकी को निकलने नहीं दे रहा था.. पर उसकी परेशानी को मौसी साफ़ महसूस कर रही थी ..

थोड़ी देर तक कुछ सोचने के बाद अचानक मौसी ने एक फैसला लिए और उनका हाथ एक और को बढ़ा...

और कुछ पल बाद अनुज को अपने लुंड के टोपे पर कुछ छूने का एहसास हुआ और अगली hi पल उसका मुँह मौसी की एक छुच्छी पर कास गया जैसे hi मौसी की उँगलियों ने अनुज के लुंड पर घेरा बना लिए... अनुज को तो मनो यकीन नहीं हुआ की मौसी ने उसके लुंड को पकड़ा हुआ है..

तभी धीरे से मौसी ने अनुज के कान में फुसफुसाया परेशानी हो रही थी न तुझे मैं आराम दिलाती हूँ..

ये कहकर मौसी अपने हाथ को अनुज के लुंड पर चलने लगी... अनुज तो जैसे जन्नत में पहुंच गया.. और तेज़ी से मौसी की छूछीयो को चूसने लगा... हालाँकि कल रात को hi उसने मौसी के सामने सेविका को छोड़ा था पर मौसी का खुद से उसके लुंड को मुठियाना काफी उत्तेजित करने वाला था...

जग्गू सेविका के दोनों पैरों को अपने कंधे पर रखकर उसे अपनी जगह लिटाकर उसकी छूट में लगातार धक्के लगाए जा रहा था पर सावधानी से वहीं तै और गरम हो चुकी थी और सटासट अपनी छूट में उंगलियां पेल रही थी...

पर जब छूट को लुंड चाहिए होता है तो वो उँगलियों से कहाँ शांत होती है यही तै के साथ हो रहा था... तै ने हार मानते हुए और कुछ सोचकर अपनी छूट से उँगलियों को निकला और फिर जग्गू की तरफ करवट लेते हुए एक हाथ आगे बढाकर ऐसे रखा जैसे की नींद में रखा हो...

पर तै को थोड़ा झटका लगा क्यूंकि जहाँ उन्होंने सोचा था की उनका हाथ उनके बेटे के सीने या पीठ पर पड़ेगा पर उनके हाथ में एक झूलती हुई छुच्छी आई जो हर झटके के साथ ऊपर नीचे हो रही थी..

अब तै को इतनी तो समझ थी hi की वो तुरंत समझ गयी की उनका बीटा कल रात की hi तरह सेविका को छोड़ रहा है... तै को ये समझते hi न जाने क्यों जलन हुई साथ hi अपने बेटे जग्गू पर गुस्सा भी आया की माँ को तड़पता छोड़कर ये एक अनजान औरत को छोड़ रहा है...

तै ने कुछ देर अपने हाथ को यूँ hi सेविका की छुच्छी पर रहने दिया पर फिर हटा लिए और कुछ सोचने लगी...

मैं और माँ अपनी जगह बदल. चुके थे और अब हमारा चेहरा मौसी की तरफ था और माँ मेरे से आगे थी उनके और मौसी के चेहरे के बीच ज़्यादा फैसला नहीं था.. मैं पीछे से माँ को खुद से चिपकाये हुए धक्के लगा लगाकर इस फैसले को और काम करता जा रहा था.





माँ भी अब चुदाई के नशे में भरपूर मगन हो चुकी थी और न जाने उनके दिमाग में क्या आया की उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया और जो की सीधा मौसी के नंगे सीने से जाकर लगा...

जिसके पड़ते hi मौसी चौंक गयी... और उन्होंने तुरंत hi दर से अनुज को अपनी छुच्छी से हटा कर अलग कर दिया...

अनुज को भी लगा कुछ गड़बड़ है तो वो भी तुरंत सीधा होकर लेट गया मौसी ने अपना हाथ भी अनुज के लुंड से खींच लिए और जैसी थी वैसी hi लेट कर सोने का नाटक करने लगी...

माँ को ये पहले से पता था की हमारे बगल में मौसी सो रही हैं तो जैसे hi उनका हाथ उनकी बहन यानि मौसी की नंगी छूछीयो पर पड़ा उनके बदन में एक करंट सा दौड़ गया... छूट में बेटे का लुंड हाथ में बहन की नंगी छुच्छी... माँ बेहद उत्तेजित हो गयी .. उनका हाथ धीरे धीरे से मौसी की छुच्छी को मसलने लगा...

मौसी को जैसे hi ये एहसास हुआ की कोई उनकी छुच्छी को मसल रहा है तो उन्होंने अंदाज़ा लगाया की ये शायद कर्मा होगा तो उन्होंने उस हाथ के ऊपर अपना हाथ रख लिए...

पर जब उन्होंने हाथ को छुआ तो कुछ अलग महसूस हुआ और वो सोचने लगी ये हाथ कर्मा का नहीं हो सकता क्यूंकि उसका हाथ तो कड़क और थोड़ा बड़ा भी है तो मौसी अपने हाथ को उस हाथ फिरते हुए कलाई पर फिर और आगे ले गयी मौसी को अब समझ आ गया था की हाथ उनकी बहन का है और जैसे hi उनके हाथ आगे बढे माँ ने मुझे रुकने के लिए चपत लगाडी क्यूंकि अगर शरीर को हिलता पति तो उन्हें शक हो सकता था तो मैं जैसे था वैसे hi माँ की छूट में लुंड दाल हुए रुक गया साथ उनके पेट और छूछीयो से भी हाथ हटाकर पीछे क्र लिए..

मौसी का हाथ फिरते हुए माँ के सीने और कंधो पर पहुंचा तो मौसी को हैरानी हुई की उनकी जीजी नंगी हैं मौसी जांचने के लिए अपने हाथ को इधर उधर फिरा कर देखने लगी तो इसी बीच उनका हाथ माँ की छूछीयो पर आ गया...

जिससे माँ को भी थोड़ा झटका सा लगा पर माँ अब इतनी गरम हो चुकी थी की उन्हें सही गलत या किसी भी प्रकार की झिझक नहीं थी. तो माँ आगे होकर मौसी से चिपक गयी... माँ के आगे होने से मेरा लुंड उनकी छूट से निकल गया... मुझे लगा शायद मौसी को शक न हो इसलिए माँ आगे हो गयी हैं... इसलिए मैं भी चुपचाप लेता रहा...

मौसी अपनी बहन की हरकत से थोड़ी चौंक गयी.. पर अनुज की हरकतों से वो भी इतनी गरम हो चुकी थी की उन्हें माँ की ये हरकत अछि लगने लगी तो उन्होंने भी अपनी बाहें खोल दी और बड़ी बहन को खुद से चिपका लिए...

दोनों बहनो की बड़ी बड़ी छुछियां आपस में ऐसे घुल गयी जैसे गुब्बारों को आपस में चिपका कर दबा दिया जाये... अपने बदन पर एक दुसरे के नंगे बदन का एहसास पाकर वो दोनों hi सिहर गयी...

मौसी के हाथ माँ के बदन पर घूमने लगे और जैसे उनका हाथ माँ के कमर के नीचे उनके बादराये बड़े बड़े चूतड़ों से टकराया जिसके साथ hi मौसी को ये एहसास हुआ की माँ पूरी नंगी हैं, उनकी बड़ी बहन पूरी नंगी होकर वो भी सबके होते हुए उनसे चिपकी हुई है मौसी की उत्तेजना और बढ़ गयी मौसी का एक मन उन्हें रोक रहा था पर दूसरा कह रहा था की कितना ाचा लग रहा है ऐसे अपनी बहन के बदन को महसूस करना...

माँ भी मौसी के गदराये बदन के नक्से को अपने हाथों से मापने की पूरी कोशिश कर रही थी... पर बीच में मौसी का आधा खुला ब्लाउज और साड़ी बढ़ा बन रहे थे जिसे माँ ने पकड़कर उतरने की कोशिश की तो मौसी ने खुद उनकी मदद करते हुए अपना ब्लाउज अपने बदन से अलग कर दिया... और अपनी बड़ी बहन को अपने नंगे सीने से चिपका लिया... माँ का एक हाथ मौसी के बदन को सहलाते हुए ऊपर की और आया और फिर उनके बड़े छूछीयो पर ा कर ठहर गया...

माँ को हमेशा hi ये देख हैरानी होती थी की उनकी बहन की छुछियां कितनी बड़ी बड़ी और खूबसूरत थी, हालाँकि छुछियां के मामले में माँ भी कुछ काम नहीं थी.. पर मौसी के आगे उनकी भी थोड़ी हलकी पद जाती थी. माँ ने तो दो दो बच्चों को दूध पिलाया फिर भी उनकी चूचियां मौसी से छोटी थी. हालाँकि माँ को उनसे कोई जलन नहीं थी बस वो मौसी के खूबसूरत उभारों को देखकर काफी उत्सुक और हैरान हो जाती थी.

उसी उत्सुकता में माँ ने मौसी की एक छुच्छी को हलके हलके हाथों से दबाना शुरू कर दिया जिसका असर सीधा मौसी की छूट पर हुआ, उनकी बड़ी बहन पूरी नंगी होकर उनसे चिपक कर उनकी छुच्छी को दबा रही है जबकि उनके बच्चे बगल में सो रहे हैं ये सोचकर मौसी की उत्तेजना चरम पर थी... इसी उत्तेजना में मौसी ने अपना चेहरा आगे कर माँ की गर्दन पर चिपका दिया और न जाने क्या सूझा की वो माँ की गर्दन को चूमने लगी...

जिसका असर माँ पर और हुआ और उनके हाथों की पकड़ मौसी की छुच्छी पर और बढ़ गयी..

दोनों बहनें एक दुसरे की हर हरकत से उत्तेजित होती जा रही थी...

वहीं मैं बगल में अकेला लेता हुआ सोच रहा था की न जाने क्या हुआ जो माँ अचानक से अलग हो गयी सब ठीक तो था फिर अचानक क्या हुआ वहीं लुंड तो जैसे बावला हो गया था अधूरे में छूटने की वजह से...

वहीं मौसी के हटाने से अनुज भी अपने खड़े लुंड के साथ सीधा लेता हुआ था वो नहीं यही सोच रहा था की अचानक क्या हुआ ाचा खासा मौसी लुंड को मुठिया रही थी...

उसके बगल में तै जग्गू पर नाराज़ थी की उनका बीटा उनपर ध्यान न देकर सेविका को छोड़ रहा है, तभी उन्होंने ये सोचते सोचते hi दूसरी तरफ करवट ली और जैसे hi करवट बदली उनका हाथ किसी चीज़ से टकराया पहले तो तै को पता नहीं चला तो उन्होंने उसे दोबारा से पकड़ने की कोशिश की और जैसे hi उनके हाथ में वो चीज़ आई..

तै की आँखें अँधेरे में hi बड़ी हो गयी... क्यूंकि उनके हाथ में एक नंगा कड़क लुंड था और वो लुंड किसी और का नहीं बल्कि अनुज का था...

उधर अनुज को जैसे hi अपने लुंड पर हाथ का एहसास हुआ वो सिहर गया और सोचने लगा इस तरफ तो तै सो रही थी तो क्या तै ने मेरा लुंड पकड़ा है..

अनुज थोड़ा सोच में पद गया और वैसे hi लेता रहा ताकि तै को लगे वो सो रहा है...

वहीं तै तो खड़ा लुंड हाथ में पाकर बिलकुल पागल hi हो gayi...wo जानती थी ये लुंड अनुज का है और इन्हे हाथ हटा लेना चाहिए पर उनका हाथ जैसे जैम सा गया हो हिल hi नहीं रहा था...

उनके मन में सही गलत के बोध और हवस के बीच एक युद्ध चल रहा था...

काफी मंथन के बाद तै की छूट की प्यास जीत गयी और तै ने अनुज के लुंड पर हाथ ऊपर नीचे चलना शुरू कर दिया अब उन्हें कुछ भी नहीं सूझ रहा था सिवाए अपने बदन की प्यास के...

उधर जग्गू सेविकाओं को बदल बदल कर छोड़ रहा था... और ज़िन्दगी के पूरे मज़े ले रहा था...

वहीं दोनों बहनें साडी दुनिया से बेफिक्र होकर एक दूजे में समय हुई थी.. दोनों के बदन एक दुसरे से गुटगे हुए थे माँ मौसी के भरे चूतड़ों को मसल रही थी तो वहीं मौसी माँ के ऊपर लेट कर अपने बदन को उन नंगे बदन से रगड़ रही थी जिसमे मौसी को एक अलग hi आनंद मिल रहा था.





हालाँकि दोनों में से hi कोई एक दुसरे के चेहरे को देख नहीं प् रहा था और न hi बोल सकती थी पर दोनों एक दुसरे के बदन की भाषा को अचे से समझ रही थी...

उधर तै सब कुछ भूल कर अनुज के लुंड को मुठिया रही थी वो ये भी नहीं सोच रही थी की अगर अनुज जाग गया होगा तो क्या होगा वो क्या करेगी क्या कहेगी उन्हें बस अभी बस अपने हाथ में उसका कड़क लुंड महसूस हो रहा था...

इधर अनुज आनंद और हैरानी के बीच फंसा हुआ था एक तरफ उसे बहुत ाचा लग रहा था वहीं हैरानी भी थी की तै उसका लुंड पकड़ कर हिला रही हैं...

तै जितना अनुज के लुंड को मुठिया रही थी उतना hi उनकी छूट बाह रही थी... तभी अचानक से अनुज को महसूस हुआ की तै ने अपना हाथ को उसके लुंड से हटा लिए है अनुज तुरंत परेशां हो गया की इतना मज़ा आ रहा था अब अचानक से रोक क्यों दिया...

वहीं बगल में जग्गू इस सब से बेखबर होकर अपनी पीठ के बल लेता हुआ था और एक सेविका उसके लुंड पर उछाल रही थी वहीं दूसरी सेविका उसके मुँह पर बैठ कर अपनी छूट चटवा रही थी..





जग्गू की तो पांचो उंगलियां घी में थी चुदाई का भरपूर मज़ा उसे मिल रहा था.. दो दो गदराई औरतों के साथ...

वो बस चाहता था की उन्हें और तेज़ चिल्ला चिल्ला कर चोदे पर इस वक़्त वो संभव नहीं था पर जितना भी मिल रहा था वो उसमे संतुष्ट था..

अनुज अकेले परेशां होकर लेता हुआ था और सोच रहा था की वो खुद तै से चिपक जाये हो सकता है फिर वो मान जाएं... अनुज तै के मस्त गदराये बदन के बारे मैं सोचने लगा की तै का बदन कितना मस्त है अगर छोड़ने को मिल जाये तो मज़ा hi आ जायेगा ..

ाचा खासा तै लुंड हिला रही थी फिर न जाने क्यों अचानक से रुक गयी...

तभी दोबारा अनुज को लुंड पर हाथ महसूस हुआ और जैसे उसे कोई खोई हुई चीज़ बापिस मिल गयी वो खुश हो गया... तभी उसे एक झटका तब और लगा जब उसे लुंड के टोपे पर एक गरम एहसास हुआ और उसे समझते देर न लगी की ये ये तो मतलब तै ने मेरा लुंड मुँह में लिए है..





अनुज की आँखें मज़े से बंद हो गयी... उधर तै हवस और बदन की भूख में अंधी होकर सब भूल भालकर अपने बेटे से भी छोटे लड़के के लुंड को जो उन्हें तै कहता था उसे मुँह में लेकर पागलों की तरह चूसने लगी... अनुज ने भी अपना आप खो दिया और उसके हाथ तै के सर पर आ गए और वो नीचे से झटके दे देकर तै के मुँह को छोड़ने लगा .

तै अनुज की हरकत से पहले तो थोड़ा घबराई फिर सोचा की अब जब ओखली में सर दे hi दिया है तो जो हो रहा है होने दो...

अनुज मज़े से तै को गरम मुँह का आनंद ले रहा था....

माँ और मौसी तो जैसे किसी नशे में थी और एक दुसरे में समां जाना चाहती थी शुरूआती हिचकिचाहट के बाद अब मौसी भी पूरी तरह से खुल कर अपनी बड़ी बहन के कामुक गदराये बदन को भोग रही थी... इसी उत्तेजना में आकर अचानक से मौसी ने माँ की गर्दन और गलों को चूमते हुए अचानक से अपने होंठ माँ के होंठों पर रख दिए. . जिसके साथ hi दोनों के शरीर में एक करंट सा दौड़ गया... दोनों कामुक गदराई औरतों के रसीले होंठ जब आपस में मिले तो एक अलग hi समां था...

माँ और मौसी दोनों के hi हाथ एक दुसरे के बदन पर कास गए और फिर कुछ पल के अंतराल के बाद मौसी ने पहल करते हुए अपनी बड़ी बहन के निचले होंठ को हल्का सा चूस लिए जिसके साथ hi माँ भी हरकत में आ गयी और अपनी छोटी बहन के होंठों को चूसने लगी .. हर गुजरते पल के साथ दोनों बहनो का चुम्बन और गहरा होता जा रहा था..





ऐसा लग रहा था की दोनों hi एक दुसरे के होंठों को खा जाना चाहती हो...

इसी बीच माँ ने मौसी की मदद से उनकी साड़ी भी उनके बदन से अलग करदी पर बिना अपने होंठों को अलग किये...

अब मौसी भी माँ की तरह पूरी नंगी थी... और माँ के हाथ उनके नंगे चूतड़ों को गूंथ रहे थे और दोनों की hi गीली छूट आपस में रगड़ कर और गीली होती जा रही थी...

होंठों के रस्ते होते हुए जीभें भी एक दुसरे के मुँह में घूमने लगी.. बहनो में प्यार तो बहुत देखा था पर ऐसा प्यार बहुत काम hi देखने को मिलता होगा...

इसके आगे क्या हुआ बहुत hi जल्दी अगली अपडेट में मिलेगा बहुत बहुत धन्यवाद्. प्लीज कमेंट करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्
 
अब मौसी भी माँ की तरह पूरी नंगी थी… और माँ के हाथ उनके नंगे चूतड़ों को गूंथ रहे थे और दोनों की hi गीली छूट आपस में रगड़ कर और गीली होती जा रही थी…

होंठों के रस्ते होते हुए जीभें भी एक दुसरे के मुँह में घूमने लगी.. बहनो में प्यार तो बहुत देखा था पर ऐसा प्यार बहुत काम hi देखने को मिलता होगा…



अपडेट 133


जहाँ दोनों कामुक गदराई बहनें एक दुसरे के भरे हुए बदन को मसलते हुए एक दुसरे के होंठों को चूसने में दुनिया भूल के लगी हुई थी…

वहीं एक बीटा अकेले खड़े लुंड के साथ लेता हुआ था… यानि मैं… यहाँ मेरा लुंड अधूरी चुदाई के दर्द में था और माँ का कोई अत पता नहीं था एक पल को मन कर रहा था आगे खिसक कर हाथों से टटोलकर देखूं क्या माजरा है कहीं माँ सो तो नहीं गयी.

पर अगर कुछ गलत हुआ तो सब गड़बड़ होने का दर था मैं ये रिस्क नहीं लेना चाहता था की नेरे और माँ के बारे में कोई बात खुले…

इसलिए मन मार कर चुपचाप लेता रहा… वहीं जग्गू सेविकाओं की छूट और गांड के मज़े ले रहा था कुल मिलकर मेरे अलावा सब मज़े ने थे..

तै अनुज के लुंड को जड़ तक मुँह में भरकर उसे जन्नत की सैर करवा रही थी और अनुज भी पूरी शिद्दत से उनका मुख्यचौधं कर रहा था… ऐसे hi कुछ देर और चूसने के बाद तै ने लुंड को मुँह से निकला और फिर एक गहरी सांस ली जैसे कुछ फैसला कर रही हो वहीं अनुज को अपने लुंड पर एक खालीपन का एहसास हुआ जो थोड़ी देर बाद भरा जब उसे लुंड पर तै की उंगलियां महसूस हुई और फिर उसे अचानक लुंड के टोपे पर गरम एहसास हुआ और अनुज की आँखें आनंद में बंद हो गयी… उसने इतनी चुदाई तो कर hi ली थी की उसे समझने में देर नहीं लगी की ये गरम एहसास किस चीज़ का है…

अनुज का उत्तेजना और हैरानी से बुरा हाल था उसने कभी सोचा नहीं था की मंजू तै जैसी गदराई भरी हुई औरत को ऐसे अचानक बिना कुछ किये छोड़ने को मिलेगा..

तै ने लुंड को अपनी प्यासी छूट के द्वार पर टिकाया और धीर धीरे से नीचे होने लगी ..वैसे वैसे लुंड उनकी छूट की दीवारों को चीरता हुआ छूट में सामने लगा…

और फिर एक समय ऐसा आया जब अनुज का लुंड जड़ तक तै की छूट में समाया हुआ था…

तै को तो जैसे सुकून मिल गया और वो अपनी छूट में लुंड का एहसास महसूस कर के आनंद लेने लगी… वहीं अनुज को अपने लुंड के चरों तरफ तै की छूट का एहसास हुआ तो वो भी बहक गाय उसके हाथ तै की कमर पर आ गए और उसकी कमर भी नीचे से झटके देने लगी…

धीरे धीरे तै ने भी अपने बड़े बड़े चूतड़ों को ऊपर नीचे उछालना शुरू कर दिया… और दोनों धीरे धीरे चुदाई करने लगे…









मौसी और माँ के होंठ अलग हुए तो दोनों हांफ रही थी.. मौसी ने अपनी बड़ी बहन के चेहरे को एक दो बहार चूमा और नीचे सरकने लगी और सरकते हुए गर्दन को चूमती हुई नीचे बढ़ने लगी .. गर्दन के बाद छाती और फिर जब मौसी का मुँह उनकी बहन की छूछीयों के ऊपर पंहुचा तो मौसी ने जीभ निकल कर दोनों छूछीयों के बीच की दरार को चाट लिए.. इसका असर माँ पर भी अलग हुआ और उनका सीना उठ गया साथ hi उन्होंने मौसी को कास के जकड लिए..… दोनों hi बहनें बेहद उत्तेजित हो चुकी थी एक दुसरे के बदन को पाकर..

मौसी ने एक गहरी साँस लेते हुए मुँह को खोला और माँ की एक छुच्छी को मुँह में भर लिए… माँ अपनी बहन के मुँह में अपनी छुच्छी के एहसास से पागल सी हो गयी… वहीं मौसी पागलों की तरह माँ के छूछीयो को चूसने लगी. माँ ने भी अपनी छोटी बहन के मुँह को अपनी छूछीयो में दबा दिया..









इधर मुझसे अब बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था तभी मुझे कुछ ध्यान आया, जो मैंने अनुज और जग्गू के साथ मिलकर योजना बनाई थी सेविकाओं को गलियारे में ले जाकर छोड़ने की.

मैंने भी सोचा चलो माँ नहीं तो सेविका hi सही काम से काम लुंड को तो आराम मिलेगा.. ये सोचकर मैं अपनी जगह से उठा और अपने बिस्तर से पैरों की तरफ गया और बड़ी सावधानी से टटोलकर अंदाज़ा लगते हुए की मौसी कहाँ सोइ थी और अनुज कहाँ सोया होगा वहीं पहुंचा…

अनुज वाली जगह पहुंच कर मैं हाथ से टटोलकर कर उसके पैरों को ढूंढने लगा… मेरा हाथ अचानक से एक एक पेअर से टकराया मैंने उसे पकड़ा तो मैं निश्चिंत हुआ की ये किसी लड़के का hi पेअर था तो मुझे यकीन हो गायकी ये अनुज hi है…

पर तभी मुझे लगा की उसका पेअर बार बार कुछ हरकत कर रहा है… मुझे कुछ शक हुआ और मैंने अपने हाथ उसके पैरों के साथ ऊपर बढ़ाये तो जांघों पर जाकर मेरा हाथ एक और जांघ से टकराया जिसे चुकार hi मुझे पता चल गया की ये किसी औरत की है…

मैंने मन में सोचा ये बड़ा तेज़ निकला मैंने बहार का सोचा था ये यही शुरू हो गया मैं अपने हाथ उस औरत की जांघों से होते हुए उसके चूतड़ों पर फिरने लगा और उसी के साथ मेरा लुंड बुरी तरह से फड़फड़ाने लगा..

अनुज को जब पेअर पर हाथ का एहसास हुआ तो उसने कोई खास ध्यान नहीं दिया उसे लगा ये तै का hi हाथ है तो वो चुदाई में hi मागन रहा वहीं तै को जब चूतड़ों पर हाथ का एहसास हुआ तो उन्हें लगा की ये अनुज का hi हाथ है तो उन्होंने भी ध्यान नहीं दिया वैसे भी उन्हें बस अभी अपनी छूट में लुंड का ध्यान था और कुछ नहीं…

इधर इतनी मस्त बड़ी सी गांड पर हाथ फिर कर मेरा तो लुंड बिलकुल फटने को होने लगा तो मैंने कुछ सोचा और अपने दुसरे हाथ पर बहुत सारा थूक लगाकर उसे अपने लुंड पर मॉल लिए… और फिर अनुज के पैरों के बीच जगह ली एक हाथ से लुंड को पकड़ा और दुसरे से चूतड़ों को फैलते हुए गांड के छेड़ का अंदाज़ा करते हुए लुंड को गांड के छेड़ पर टिका दिया और तुरंत hi कमर का एक धक्का लगा दिया जिससे लुंड का टोपा गांड के अंदर खछ से घुस गया…








उधर अनुज को तब भनक हुई जब उसे कोई अपनी टांगों के बीच जगह बनाते हुए लगा वो तुरंत समझ गया की क्या होने वाला है इसलिए उसने तुरंत टटोलते हुए तै के मुँह पर हाथ रखलिआ और उन्हें अपनी और झुका लिए और अगले hi पल उसका अंदाजा सही निकला..

अनुज को यकीन हो चूका था ये हो बा हो उसका भाई hi है इतना तो वो एक दुसरे को समझते hi थे.. दूसरा उसने मन hi मन पूरी कहानी बनाकर सरे किस्से को भी जो अभी हुआ उसे अपने हिसाब से समझ लिए.

उसे लगा ममता चची और बुआ की तरह कर्मा ने तै को भी पता लिए है और ये उसकी hi योजना होगी तै को उसका पास अचानक से भेजने की और बाद में खुद शामिल होने की.

तै को तब तक कुछ पता नहीं चला जबन तक लुंड उनकी गांड के छेड़ पर न टिक गया हो और फिर जैसे hi टोपा उनकी गांड के अंदर घुसा तै की तो जान hi निकल गयी अगर अनुज ने उनका मुँह नहीं दबाया होता तो वो ज़रूर चीख देती…

तै का पूरा शरीर अकड़ने लगा अनुज ने कास के उन्हें खुद से चिपका लिए तै को लग रहा था की जैसे उनकी गांड जल रही हो… हालाँकि जग्गू के पापा ने भी उनकी गांड को खूब बजाय था पर कर्मा के लुंड का टोपा मोटा था तो तै की गांड को और खोल दिया था उसने खैर शुरूआती दर्द के बाद और कुछ देर ठहरने के बाद कर्मा अपनी कमर हिलनी शुरू की और हलके हलके झटको से तै की मस्त मोती गांड मरने लगा.. और धीरे धीरे पूरा लुंड उनकी गरम गांड में उतर दिया..

तै को शुरूआती मुश्किल के बाद थोड़ी रहत मिली और जब गांड लुंड के अकार की अभ्यस्त हो गयी तो तै को भी आराम मिला…









अब तै को दो दो बड़े कड़क लोरों के अपने अंदर होने का सुख मिलने लगा जिसे एहसास कर तै का रोम रोम खिल उठा ऊपर से एक साथ दो लुंड लेना एक छूट में और दूसरा गांड में ये hi तै के लिए बेहद उत्तेजक बात थी और जिसका नतीजा भी ये हुआ की कुछ hi पलों में तै का बदन कांपने लगा और तै झड़ने लगी.. जिसे दोनों भाइयों ने महसूस किया… कर्मा को अब भी लग रहा रहा था की वो एक सेविका को छोड़ रहा है…

बगल में माँ और मौसी हवस में और एक दुसरे के बदन में पागल हो चुकी थी मौसी माँ के ऊपर थी और अपने बदन को माँ के बदन से रगड़ रही थी माँ भी नीचे से मौसी के बदन से खुद को घिस रही थी मौसी ने अपने कमर को कुछ इस तरह से रखा की अब दोनों बहनों की रसीली छूट एक दुसरे के ऊपर आ गयी जिससे दोनों को hi एक झटका लगा.. और फिर जैसे दोनों के बदन अपने आप काम करने लगे दोनों की कमर खुद बा खुद हिलने लगी और दोनों की छूट आपस में रगड़ने लगी जिससे दोनों को hi एक अलग आनंद की प्राप्ति हो रही थी…








जग्गू एक बार एक सेविका की छूट में झाड़ चूका था और अभी दुबारा से अपना लुंड चुसवा रहा था साथ hi दूसरी सेविका की गांड में अपनी जीभ फंसा कर चाट रहा था…

कर्मा तै की गांड मरते हुए अपने हाथों को आगे ले गया और उनकी छूछीयों को मसलने लगा वहीं अनुज नीचे से धीरे धीरे धक्के लगाकर तै की छूट के मज़े ले रहा था पर उसे उतना मज़ा नहीं आ रहा था क्यूंकि वो खुल के छोड़ नहीं प् रहा था इसीलिए उसने आगे हाथ बढ़ाते हुए कर्मा को थोड़ा आगे खींचा और धीरे से फुसफुसाया- भैया बहार चलते हैं..

जिसे तै ने भी सुना

कर्मा भी समझ गया और उसने तुरंत तै की गांड से लुंड निकला और खड़ा हो गया साथ hi तै को हाथ पकड़कर कर उठा लिए अनुज भी तै के उठने के बाद उठ गया और तीनो hi बड़ी सावधानी से दीवारों को टटोलते हुए गलियारे तक आ गए…

गलियारे में कमरे की अपेक्षा ज़्यादा उजाला था तो काम से एक दुसरे की रूपरेखा को वो लोग महसूस कर प् रहे थे…

थोड़ा सा गलियारे में और आगे बढ़कर ताकि उनकी आवाज़ कमरे में न जाएं कर्मा ने सब को रोक दिया और तै जिसे वो सेविका समझ रहा था उसे घुटनों पर बिठा दिया अपना लुंड जो अभी उनकी hi गांड से निकला था उसे तै के मुँह में ठूंस दिया जिसे तै ने भी बिना पल गंवाए चूसना शुरू कर दिया..

अपने भैया को देख अनुज ने भी वैसा hi किआ और लुंड को तै के चेहरे पर रगड़ने लगा… तै ने कर्मा का लुंड मुँह से निकला और अनुज का मुँह में भर लिए और ऐसे hi बदल बदल कर दोनों के लम्बे लैंदों को चूसने लगी…

अनुज ने धीरे से बोलै- भैया मन्ना पड़ेगा वैसे तुमने तै को कब पता लिए.

अनुज से ये सुनकर तै और कर्मा दोनों hi चौंक गए पर तै के मुँह में लुंड था इसलिए वो कुछ बोल नहीं पाई…

कर्मा- तुझे कैसे पता चला .

अनुज- कैसी बात कर रहे हो भैया तै के मुँह में अभी तुम्हारा लुंड है और तुम बोल रहे हो तुझे कैसे पता चला..

कर्मा एक दम चौंक गया…

कर्मा- क्क्क्य ये तै हैं.

अनुज- हाँ ऐसे चौंक क्यों रहे हो..

कर्मा ने झट से तै के मुँह से लुंड निकला और बोलै..

कर्मा- तै??? ये तुम हो..

तै ने आखिर घबराते हुए बोलै- हाँ बचुआ…

कर्मा- तुम ऐसे अनुज के साथ ये सब कैसे मेरी तो कुछ समझ नई आ रहा .

अनुज- मेरी भी समझ नहीं आ रहा मुझे लगा तै को तुमने ममता चची की तरह ..

उसने इतना बोलै की कर्मा ने उसकी पीठ पर मारकर चुप करा दिया.

तै- क्या ममता की तरह मतलब ममता के साथ तुम दोनों…

कर्मा- वो सब बाद में पहले ये बताओ अभी अनुज के साथ तुन कैसे..

अनुज- जसका मतलब भैया अभी तक तुमने तै को छोड़ा नहीं है ..

कर्मा- अरे छोड़ा है पर..

तै- अरे अब तुम दोनों चुप हो पहले मैं बताती हूँ क्या हुआ उसके बाद तुम दोनों भी बताना…

तै ने कर्मा के उन्हें पहली बार छोड़ने से लेकर अब तक की साडी कहानी बता दी.

जिसे सुनकर अनुज थोड़ा सा हैरान था.. और कर्मा भी…

उसे समझ नहीं आ रहा था की तै इतनी गरम हो गयी जो खुद को रोक नहीं पाई…

तै- अब तुम दोनों मुझे ममता का क्या चक्कर है वो बताओ…

कर्मा- ठीक है सुनो पर चौंकाने मत..

और कर्मा ने तै को ममता चची और पल्ली और अपने बारे में सब बता दिया बस प्रेमा भाभी की बात छुपली… क्यूंकि वो नहीं चाहता था उस वजह से उनके घर में कोई दिक्कत हो…

तै का तो ये सब सुनकर मुँह खुला था

तै- है ढैय्या तुम दोनों तो पूरे सैंड हो रे एक साथ माँ बेटी दोनों के साथ.. और वो दोनों भी ख़ुशी से एक दुसरे के सामने टंगे खोल देती हैं..

अनुज- हम दोनों hi नहीं जग्गू भैया भी.

Tai-kya जग्गू भी इनसब में शामिल है? दिया रे क्या होता जा रहा है सब को

हालाँकि अपने बेटे के शामिल होने की सोचकर तै को और भी उत्तेजना महसूस हुई ..

कर्मा- और अब तो तुम भी हो तै

कर्मा ने तै की एक छुच्छी को मसलते हुए कहा…

तै- ुहम्मम्मम्मा आराम से बेटाःह्ह्ह्हह्ह…

फिर क्या था कर्मा ने झुक कर तै की एक छुच्छी को मुँह में भर लिए और चूसने लगा साथ hi एक हाथ से उनके बड़े चूतड़ों को मसलने लगा..

अनुज भी कर्मा की देखा देखि वैसे hi लग गया तै की छुच्छी को चूसने में.

इधर दोनों बहनें hi अपनी छूट को एक दुसरे से रगड़ते हुए अपने शिखर पर थी… दोनों ने hi एक दुसरे के होंठों में होंठों को दबाकर किसी तरह से खुद को चीखने से रोका हुआ था और फिर एक पल ऐसा आया जब दोनों का hi शरीर अकड़ा और दोनों hi झड़ने लगी…






upload image

छूट के पानी ने एक दुसरे की छूट को गीला कर दिया झड़ने के बाद दोनों बेजान सी पड़ी रही और वैसे चिपके हुए hi दोनों की आँख लग गयी…. औरएक दुसरे को खुद से चिपकाये दोनों बहनें सो गयी…

जग्गू एक सेविका की गांड के कैसे हुए छेड़ में अपने लुंड रास को भर रहा था और पूरी तरह भरने के बाद वो भी थक कर उनके बीच लेटगया और धीरे धीरे सोने लगा.

वहीं गलियारे में अब जब सब बातें सब के सामने आ चुकी थी तो अब वक़्त था चुदाई का और दोनों भाई तै के साथ यही कर रहे थे…

अनुज पहले की तरह ज़मीन पर लेता और तै ने घुड़सवारी के लिए उसके ऊपर जगह ली… और लुंड को पकड़कर अपनी प्यासी छूट में छुपा लिए पीछे से कर्मा ने एक बार फिर से लुंड को गांड का द्वार दिखाया तो लुंड फिर से घुस गया तै की मखमली गांड में… और हो गया चुदाई का ताबड़तोड़ सिलसिला शुरू…









इसके बाद दोनों भाई काफी देर तक तै को आसान और छेड़ दोनों बदल बदल कर भोगते रहे और तै भी कहाँ हार मरने वाली थी दोनों का पूरा साथ दे रही थी ..



















अंत में तीनो hi संतुष्ट होकर चुपचाप से अंदर गए और अपनी अपनी जगह पर जाकर सो गए…

अब देखते है. आने वाली सुबह क्या क्या अपने साथ लेन वाली है..

ये सब अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.

 
अंत में तीनो hi संतुष्ट होकर चुपचाप से अंदर गए और अपनी अपनी जगह पर जाकर सो गए…

अब देखते है. आने वाली सुबह क्या क्या अपने साथ लेन वाली है..

अपडेट 134

सुबह सबसे पहले माँ की आँख खुली तो उन्होंने देखा की वो अपनी बहन को बाहों में लपेटे सो रही हैं और दोनों हो बिलकुल नंगी हैं... ये देखकर माँ को रात हुआ सारा नजारा याद आ गया, जिसे याद करते hi माँ के चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी... उन्होंने बड़ी सावधानी से और बिना ज़्यादा आवाज किये मौसी को हिलाकर जगाया और उनके कान में कहा उठ शालू और जल्दी से कपडे पहन ले.

मौसी ने आँखें खोली और फिर अपना हाल देखा तो उन्हें भी रात की हरकतें याद आ गयी और वो माँ को देखकर एक बार शर्मा गयी तो माँ ने प्यार से उनकी नंगी पीठ पर हाथ फिरते हुए कहा: अब शर्माना बंद कर और कपडे पहन ले जल्दी से..

दोनों बहनों जल्दी जल्दी अपने कपडे पहनने lagi..kapde पहनते हुए मौसी की नज़र एक जगह गयी और वहीं टिक गयी...

माँ ने मौसी को यूँ रुका हुआ देखा तो उनकी नज़र का पीछा किआ और माँ के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान आ गयी..

दरअसल हुआ ये था की तै कर्मा और अनुज गलियारे में चुदाई करने के बाद आकर अपने अपने कपड़ों को टटोलकर पहन कर सो गए थे पर क्यूंकि लड़के सिर्फ धोती पहनते थे तो अभी कर्मा की धोती खुली हुई थी और उसका लुंड बिलकुल सीधा खड़ा होकर सलामी दे रहा था और मौसी की नज़र उसी पर जमी हुई थी..

माँ ने जब अपनी बहन को अपने बेटे के लुंड को घूरते देखा तो उनके बदन में थोड़ी सनसनी फ़ैल गयी वहीं मौसी चाहकर भी नज़रें नहीं हटा प् रही थी... अनुज और जग्गू चादर ओढ़कर सो रहे थे तो उनके साथ ऐसी कोई समस्या नहीं थी...

माँ ने अपनी साड़ी पूरी बांधने के बाद मौसी को देखा तो मौसी अभी बह वैसे hi कड़ी थी... माँ ने मौसी को थोड़ा हिलाया तो मौसी थोड़ा होश में आई और फिर खुद को सँभालते हुए साड़ी लपेटने लगी.. पर अब भी उनकी नज़र रह रह कर कर्मा के खड़े लुंड पर जा रही थी...

जिसे माँ भी बार बार महसूस कर रही थी और सच तो ये भी था की कर्मा के लुंड को देखकर माँ की छूट में थोड़ा थोड़ा गीलापन आने लगा था ..

मौसी ने किसी तरह साड़ी लपेटी और तैयार हुई तो माँ उन्हें पकड़ कर बहार अपने साथ ले गयी... जाते जाते भी मौसी ने एक नज़र कर्मा के लुंड पर ज़रूर डाली.. करीब आधे घंटे बाद hi तै की भी नींद टूटी और उठ कर बैठ गयी...

तै ने आस पास देखा तो पाया सभ्य और शालू नहीं थी.. उन्होंने सोचा वो शायद पहले उठ कर बहार चली गयी हैं... तै भी उठ कड़ी हुई और उनकी नज़र भी कर्मा के तने हुए लुंड पर पड़ी तो उन्हें भी रात की संतुष्ट कर देने वाली चुदाई याद आ गयी... अभी भी मीठा मीठा सा दर्द था बदन में, बिलकुल घोड़े पैदा किये हैं सभ्य ने तै ये सोचकर मुस्कुराने लगी.. हालाँकि एक पल को उनका मन कर्मा के कड़क लुंड को देखकर मचला जरूर पर किसी तरह उन्होंने खुद को संभाला और बहार चली गयी इसके बाद सेविकाओं के कई बार उठाने पर तीनो लड़के उठे और सुबह के तीनो कार्य निपटा कर सबके साथ मिले और नाश्ता हुआ...

बड़ी माँ ने नाश्ते पर hi बताया की थोड़ी देर बाद hi दूसरी प्रतियोगिता होगी कौशल की जिसे सुनकर एक बार फिर से सबके मन चिंता से भर गए...

खैर खाना पीना हुआ और फिर सब साथ बैठ कर योजनाएं बनाने लगे की कैसे प्रतियोगिता को जीतना है अब परेशानी ये थी, की ये भी नहीं पता था की किस कौशल की प्रतियोगिता होगी नहीं तो उसी के हिसाब से उममें से कोई एक चुनते क्यूंकि कोई न कोई किसी न किसी कौशल में ाचा था...

जग्गू को बुनकरी का काफी सही ज्ञान था, घर पर खत हो रस्सी हो छप्पर बनाना हो वो बहुत अचे से बनता था, अनुज कला प्रेमी था, सामने के दृश्य को कागज पर उतरना उसे बहुत पसंद था और अचे स्व आता भी था, कर्मा को खेती का ज्ञान था और संगीत में भी काफी रूचि थी पर समस्या थी की अगर इन तीनो के अलावा किसी पर प्रतियोगिता हुई तो क्या होगा.. किसे चुन कर भेजा जाये क्यूंकि पहले प्रतियोगी चुना जाना था उसके बाद प्रतियोगिता का पता चलना था...

हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था..

कभी किसी के लिए मत बनता तो कभी किसी के लिए.. अंत में जब किसी एक के नाम पर सब राजी नहीं हुए तो अनुज ने एक उपाय बताया और बोलै अब किस्मत पर छोड़ दो..

अनुज- हम तीनो की पर्ची डालते हैं जिसका नाम आएगा वो प्रतियोगिता लड़ेगा...

खैर पर्ची बानी तीनो लड़कोंका नाम लिखा गया और उसके बाद एक पर्ची शालू मौसी ने अपने हाथों से खोली और फिर उस पर लिखा नाम पढ़ कर सबसे पहले कर्मा की और देखा तो कर्मा समझ गया की इस बात भी उसे hi प्रतियोगिता करनी पड़ेगी.. कर्मा ने भी बैंक ज़्यादा सोचे मान लिए और फिर थोड़ी देर बाद hi सेविका बुलाने आ गयी तो सब लोग प्रतियोगिता के लिए पहुंचे एक खली बरामदे में जहाँ सबके लिए बैठने का प्रबंध था और बीच में खली जगह थी सब के बैठने के बाद बड़ी माँ और चित्रावती आई और अपने ऊँचे से आसान पर बैठ कर बोली...

बड़ी माँ: जैसा की आप सभी जानते हैं ये प्रतियोगिता कौशल की है.. प्रतियोगी को एक कौशल में अपने प्रतिद्वंदी को हराना होगा... एक तरफ से कालजंग चुनौती देगा तो आप लोगो ने किसको चुना है?

कर्मा- मैं मुकाबला करूँगा.

बड़ी माँ थोड़ा मुस्कुराई : काफी बहादुर हो जो एक बार हार कर भी दोबारा भिड़ने को तैयार हो.

(अस कर्मा)

मैंने सोचा अब इन्हे क्या बोलू इन्हे क्या पता पर्ची निकल कर ये फैसला किआ है तो मैंने बस सर हिलाड़िया और साथ hi बड़ी माँ के बगल में बैठी चित्रावती को देखा हमारी नज़रें मिली तो हम दोनों के चेहरे पर hi एक मुस्कान फ़ैल गयी है कितनी प्यारी मुस्कराहट थी उसकी और वो सुन्दर गहरी aankhein...khair अभी निगाहें मिलाने का समय नहीं था तो मैंने खुद को किसी तरह से उसके सुन्दर चेहरे से अलग किआ...

बड़ी माँ- कौशल का चुनाव पत्र चयन से होगा..

में- मतलब??

बड़ी माँ- अभी समझ आ जायेगा...

बड़ी माँ ने एक इशारा किआ तो एक सेविका पतली गर्दन वाली एक सुराही नुमा मटके को लेकर आई..

बड़ी माँ- इस मटके में पत्ते हैं और हर एक पत्ते पर एक कौशल लिखा हुआ है जैसे चित्रकला, संगीत इत्यादि तो राजकुमारी चित्रावती एक पत्ता निकलेगी और उस पत्ते पर जो कौशल लिखा होगा उसी की प्रतियोगिता होगी ..

ये सुनकर मेरी फैट गयी... की भेंचो अब ऐसे तो कौनसा पत्ता निकल जाये कहीं कुछ ऐसा निकल गया जो मुझे नहीं आता होगा तो क्या होगा सोच सोच कर गांड फटने लगी... मेरे साथ सभी लोगो का यही हाल था... माँ मौसी तै सब चिंता में थे. अनुज और जग्गू अपना सर खुजा रहे थे..

चित्रावती- कड़ी हुई और उसने उस मटके की गर्दन में हाथ घुसाया तो मुझे लगा ये हाथ गर्दन में नहीं मेरी गांड में घुस रहा है जो की अब फटने वाली है...

चित्रावती ने कुछ देर हाथ अंदर रखा और फिर धीरे से बहार निकला हाथ के साथ साथ एक पत्ता भी निकला, वो पत्ता देख कर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे ये मेरी मौत का फरमान है..

चित्रावती ने पत्ते को खोला और फिर उसे पढ़ा.. मुझे तो हर पल ऐसा लग रहा था की अब क्या होगा अब क्या होगा... दिल धक् धक् कर सीने से बहार आ रहा था..

चित्रावती ने पत्ते को पढ़ा और फिर सबसे पहले नज़र उठाकर मेरी तरफ देखा...

मैं बिलकुल दर सा गया की न जाने क्या लिखा है पत्ते में..

चित्रावती ने पत्ते को पढ़ने के बाद बड़ी माँ की और कर दिया जिसे बढ़ी माँ ने पढ़ा और थोड़ा हैरान हो गयी...

मुझसे इंतज़ार नहीं हुआ तो मैंने खुद hi पूछ लिए- पत्ते में क्या लिखा है बड़ी माँ..

बड़ी माँ ने एक लम्बी सांस ली और फिर मेरी और देख कर बोली: कविता...

ये सुनकर और ये समझकर की इसका मतलब क्या है मैं तो ख़ुशी से उछाल पड़ा और अपने साथ के लोगो की और ख़ुशी से देखने लगा साथ hi मेटे साथ के सब लोगो को भी थोड़ी ख़ुशी हुई क्यूंकि मैं हमेशा से hi कविता प्रेमी रहा hun...uchhalte हुए hi अचानक मेरे मन में एक ख्याल आया और मैंने तुरंत मुद कर एक चेहरे को देखा और उसे देखते hi मैं सब समझ गया..

वो चेहरा और किसी का नहीं बल्कि चित्रावती का था नज़रों hi नज़रों में जैसे हम एक दुसरे के मन की बात समझ गए.. उसने हल्का सा पलकें झपकाकर मेरे सवाल का जवाब दिए...

मटके में से कविता वाले पत्ते का निकलना कोई किस्मत नहीं था बल्कि ये चित्रावती ने किया था...

जहाँ हम खुश थे कालजंग मुँह लटकाये खड़ा हुआ tha..use खुद भी समझ नहीं आ रहा था ये कैसे हो गया.. खैर प्रतियोगिता तो होनी hi थी तो नदी माँ ने हम दोनों को बीच में आने का इशारा किआ और हम दोनों बीच में आकर खाद हो गए... दोनों को बड़ी माँ ने एक नज़र देखा और बोली

बड़ी माँ- मुक़ाबला शुरू किया जाये..

में-

पिछले मुक़ाबले तूने मेरी चटनी बनाई,

पर इस बार है बारहरि की लड़ाई,

नाम बदल देना, जो चाहे रख देना..

जो इस बार तुझे झूल न छटाई.

मेरी कविता सुनते hi अनुज और बाकि सब चिल्लाकर ताली बजने लगे...

कालजंग: ने मेरी और देखा और फिर कुछ देर शांत रहा और फिर उसके मुँह से निकला... पिछले मुक़ाबला...

मैं और बाकि सब ये सुनकर हैरान रह गए की ये साला बोलता भी है जबसे हम यहाँ आये थे आज पहली बार मैंने इसको बोलते जुए देखस था...

इसके बाद कालजंग थोड़ी सेर चुप रहा और फिर न जाने अचानक क्या हुआ वो मुद कर चला गया...

हम सब बेहद खुश हो गए...

बड़ी माँ थोड़ी सोच में उठी पैट फिर मुस्कुरा कर कहा की ये प्रतियोगिता कर्मा ने जीत ली है और अब मुक़ाबला बराबरी पर आ गया है अगली प्रतियोगिता आखिरी हॉज और जो वो जीतेगा वो जीत जायेगा.

धन्यवाद

इसके बाद बड़ी माँ चली गयी और साथ भी चित्रावती भी पर वो पलट पलट कर मुझे देख रही थी और मैं उसे... इसके बाद घर वाले दौड़कर आये और मुझे गले लगा लिए हम लोग ख़ुशी ख़ुशी अंदर चले गए...

बहुत बहुत धन्यवाद् कृपया साथ बनाये रखें
 




आप सभी को होली का खुशियों और रंगों से भरे त्योहार की बहुत सी प्यार भरी शुभकामनाएं।

आपके जीवन में खुशियों के रंग इतने भर जाएं की दुख का कोई साबुन उन्हें छुड़ा न पाए।

स्वस्थ और सुरक्षित होली खेलें अपने परिवार और दोस्तों के साथ आनंद लें। और साथ ही अपने आसपास जानवरों का खयाल रखें उन पर रंग इत्यादि न फेंके। हम खुद को धो कर साफ़ कर सकते हैं वो नहीं।

हैप्पी होली
 
पहले तो आप सब से माफ़ी चाहूंगा इतना इंतज़ार करवाने के लिए, बस ज़िन्दगी की भागदौड़ में फंसा हुआ था, अब से पूरी कोशिश रहेगी की रेगुलर उपदटेस देता रहूं... It's गुड तो बे बैक.
 
दोस्तों कल से अपडेट पर काम शुरू हो जायेगा इतने दिनों तक साबरा रखने और साथ बने रहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्... जब तक आपके लिए एक मज़ेदार सवाल है..



मान लीजिये अगर इस कहानी के ऊपर अगर कोई फिल्म या वेब सीरीज बनानी हो और एक्टर्स और एक्ट्रेस आप को चुनने हो तो आप किस करैक्टर के लिए किसे चुनेंगे... अपने जवाब ज़रूर दें और जवाब के साथ अगर एक्टर की फोटो या gif डालेंगे तो सोने पर सुहागा होगा..


प्लीज अपना जवान ज़रूर दें बहुत बहुत धन्यवाद्.
 
बड़ी माँ थोड़ी सोच में उठी पैट फिर मुस्कुरा कर कहा की ये प्रतियोगिता कर्मा ने जीत ली है और अब मुक़ाबला बराबरी पबरबारिए या है अगली फै, प्रतियोगिता आखिरी हॉज और जो वो जीतेगा वो जीत जायेगा.

धन्यवाद

इसके बाद बड़ी माँ चली गयी और साथ भी चित्रावती भी पर वो पलट पलट कर मुझे देख रही थी और मैं उसे… इसके बाद घर वाले दौड़कर आये और मुझे गले लगा लिए हम लोग ख़ुशी ख़ुशी अंदर चले गए…



अपडेट 135


एक मुक़ाबला जीतने की ख़ुशी हमारे चेहरों पर बड़ी साफ़ साफ़ दिख रही थी सब भगवन का धन्यवाद कर रहे थे, पर मैं जनता था की भगवन के साथ साथ किसी और का भी धन्यवाद करने की ज़रुरत है, खैर हम सब लोग बहुत खुश थे अनुज और जग्गू कालजंग का मजाक उड़ाते हुए बोल रहे थे की कैसा लगता कालजंग कविता बोलते हुए, तीनो औरतें भी काफी खुश थी.. हम सब लोग ऐसे hi बैठकर अपनी जीत की ख़ुशी मानते हुए बातें करते रहे, थोड़ी देर बाद मैं उठा और बहार निकल कर एक जगह की और निकल गया, बाघ में से होते हुए जब मैं वहां पंहुचा तो निराश हुआ क्योंकि शायद जिस वजह से आया था वो पूरी नहीं हुई थी..

तो फिर वहीं बैठ गया और खूबसूरत कुदरत के नज़रों को देखने लगा… कितनी शांत जगह थी ये साथ hi कितनी सुरीली भी, पक्षियों की आवाज़ें जैसे वो कोई गीत गुंगुना रहे हो, साथ hi तालाब से पानी के बहने की आवाज़, पास hi में खेलते हुए छोटे पिल्लों की आवाज़, मन बहुत ाचा और हल्का महसूस कर रहा था, और इसी बीच एक बेहद सुरीली आवाज़ और मेरे कानो में पड़ी.. मैंने आवाज़ की तलाश में सर घुमाकर देखा और जो दिखा उससे मेरे होंठों पर मुस्कान आ गयी..

सामने बेहद खूबसूरत चित्रावती कड़ी हुई थी,






चित्रावती: लगता है तुम मेरी मनपसंद जगह को हथियाना चाहते हो..

उसने मुस्कुराते हुए कहा.. उसकी मुस्कराहट देख कर कुछ पल के लिए तो मैं खो hi गया… फिर होश में आते हुए बोलै..

में: नननही ऐसा कुछ नहीं है..

चित्रावती: फिर कैसा है, क्यूंकि कई बार देखा है हमने तुम्हे यहाँ..

में- हो सकता है की ये मेरी भी मनपसंद जगह बनती जा रही हो.

चित्रावती: ऐसा कैसे हो सकता है हमारी जगह को तुम अपनी मनपसंद जगह मत बनाओ…

में- कोई जानकार थोड़े hi कुछ पसंद करता है अपने आप hi पसंद आ जाते हैं.

चित्रावती- ाचा ये बात तो सही बोली तुमने,

में- वैसे बोलना तो मुझे और कुछ भी है.

चित्रावती: तो बोलो न..

में- आज के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्, तुम्हारी वजह से hi मैं मुक़ाबला जीत पाया.

चित्रावती- अरे वो तो कुछ नहीं हमने तुम्हारा उधर चुकाया.

में- मेरा उधर मैंने कब तुम्हे उधर दिया?

चित्रावती- तुमने मुझे जो कुछ समझाया वो.. और देख रहे हो न मैं कविता में बात नहीं कर रही हूँ… तो कविता का उधर कविता से..

और वो और मैं खिलखिलाकर हंसने लगे… मैंने आस पास निहारते हुए कहा:

कितनी खूबसूरत जगह है न?

चित्रावती: हाँ इससे खूबसूरत कुछ हो hi नहीं सकता..

में- इससे ज़्यादा तो नहीं पता पर इसके जितना तो है..

चित्रावती: सच में इतना खूबसूरत कुछ और भी है क्या?

मैंने अपनी एक उंगली को चारो तरफ किसी कंपास की तरह घुमाया और फिर उसकी तरफ करके बोलै: तुम..

चित्रावती- क्या हम??? वो भी इतने खूबसूरत,.. नहीं नहीं माना हमने तुम्हारी जीतने में मदद की है पर इसका मतलब ये नहीं की तुम हमारी झूठी तारीफ करो…

में- मैं तो सच्ची hi कर रहा हूँ, मुझे तो बराबर hi लग रही है तुम्हारी खूबसूरती..

चित्रावती- अगर ऐसा है तो तुम ठीक से जानते नहीं हो..

उसने मुझे देखते हुए बोलै

में- मैं जानना चाहता हूँ.

मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा..

चित्रावती- हम जगह की बात कर रहे हैं, तुम अभी इस जगह को ठीक से जानते नहीं हो..

में- और मैं तुम्हारी… .

वो मेरी बात सुनकर मुस्कुराई और फिर बोली- चलो हमारे साथ.

में- कहाँ?

चित्रावती- जानने के लिए… अब चलो..

में- ाचा ठीक है चल रहा हूँ..

और फिर मैं उसके पीछे पीछे चल दिया, बाघ के बगल में एक पेड़ के किनारे से होते हुए एक रास्ता था जो मेरे लिए नया था हम उसमे चल दिए वो आगे आगे चलते हुए मार्गदर्शन कर रही थी मैं मंत्र मुग्धा सा उसके पीछे पीछे चला जा रहा था..

रास्ता आगे जाकर एक गुफा में बदल गया और पतला भी हो गया..

में- कहाँ ले जा रही हो तुम जितना आगे बढ़ते जा रहे हैं रास्ता पतला होता जा रहा है.

चित्रावती- क्यों दर रहे हो क्या?

में- तुम साथ हो तो बिलकुल नहीं..

चित्रावती- बातें बहुत बनाते हो..

में- आदत है शायद..

चित्रावती- अब आराम से आओ रास्ता थोड़ा संकरा है और अँधेरा भी होगा.

ये कहते हुए उसने मुद कर मेरी तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया… मुझे जब समझ आया तो मैंने उसका हाथ थम लिया… उसकी कोमल उँगलियों के स्पर्श मात्रा से hi बादाम में झुरझुरी सी फ़ैल गयी… वो आगे मुद कर चलने लगी मैं पीछे से उसका हाथ थामे चल रहा था.

थोड़ा आगे बढे तो सामनेह से थोड़ी रौशनी आ रही थी.. थोड़ा और आगे जाकर मुझे ठीक से दिखा तो ऐसा लग रहा था की गुफा की दीवार में एक छोटा सा छेड़ हो रखा है तीन फीता चौड़ा 4 फिट के करीब ऊँचा..

चित्रावती हमें उसके पास ले गयी छेड़ के दूसरी तरफ का हिस्सा पत्तियों से ढाका हुआ था इसलिए उस पार क्या था कुछ समझ नहीं आ रहा था…

चित्रावती ने मुड़कर मेरी तरफ देखा और बोली- हम आ गए.

में- ाचा यही लेन वाली थी तुम…

चित्रावती- हाँ तो जानना चाहोगे..

में- बिलकुल..

चित्रावती- तो फिर

में- तो फिर क्या??

चित्रावती- हमारा हाथ..

में- तुम्हारा हाथ.. फिर मुझे समझ आया मैं उसका हाथ पकड़े हुए था और वो बार बार हाथ छोड़ने के लिए इशारा कर रही थी.. पर मुझे उसका हाथ पकड़ कर इतनी ख़ुशी मिल रही थी की मैं छोड़ना hi नहीं छह रहा था.. खैर न चाहते हुए भी मैंने उसका हाथ छोड़ा और फिर उसने पास hi में रखा एक डंडा उठाया, मैं सोचने लगा ये डंडा क्यों भाई और इस डंडे की क्या जरुरत है.. वो डंडा लेकर झुककर उस खिड़की नुमा जगह में बैठ गयी और फिर मुद कर मेरी तरफ देखा और बोली: आओ बैठो..

अपने बगल में बची हुई जगह पर इशारा करते हुए उसने बोलै..

मैं थोड़ा असहज होकर झुककर सावधानी से उसके बगल में उसी की तरह पेअर लटककर बैठ गया क्यूंकि जगह काम थी तो हम दोनों बिलकुल सात कर बैठे थे…

उसके पास होने से उसके बदन की खुशबु से मुझे नशा सा हो रहा था.. जब मैं बैठ गया तो वो बोली- तो तैयार हो?

में- किस लिए

चित्रावती- जानने के लिए.

में- तुम्हे?

चित्रावती- जगह को..

और फिर उसने डंडा जो उसके हाथ में था आगे किआ और लटकती पत्तियों की बेल को डंडे से एक तरफ सरका कर डंडे को एक पत्थर में अटका दिया . और फिर सामने जो नज़ारा था उसे देखकर तो मेरी आँखें खुली की खुली रह गयीं..

हमारे ऊपर से पानी की एक धार नीचे गिर रही थी तालाब में पानी की एक चौड़ी पर पतली सी जैसे चादर हो वो हमारे सामने थी और निरंतर बहती जा रही थी, पानी के पार के फूल पेड़ तालाब उस चादर में देखने पर ऐसे मालूम हो रहे थे जैसे हिल रहे हो सब कुछ एक स्वप्नलोक जैसा लग रहा था… कुछ ऐसा नजारा था की हम झरने के अंदर बैठे हों और ऊपर से पानी निरन्त बाह रहा हो…

सच hi मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी कुछ ऐसा नहीं देखा था.. मैं नज़ारे की खूबसूरती में खोया हुआ था तभी चित्रावती मुझसे बोली: क्यों अब क्या लगता है अब भी हमारे बराबर खूबसूरत है ये…

में- ुहहममम नहीं ये थोड़ा ज़्यादा है… पर कोई नहीं तुम दुसरे नंबर हो.. और वो नंबर भी कुछ बुरा नहीं है…

चित्रावती: हमें नंबर दो बनने में कोई परेशानी नहीं है..

में- वैसे मुझे और भी तुमसे कुछ कहना है

चित्रावती: क्या

में- धन्यवाद.

चित्रावती: वो तो पहले hi कर दिया..

में- उसके लिए नहीं ये नज़ारा दिखने के लिए, या कहूं की खुद से खूबसूरत नज़ारा दिखने के लिए..

चित्रावती: तुम्हे हम खूबसूरत नज़ारा लगते हैं.

में- हाँ बहुत hi खूबसूरत, ऐसा की नज़र hi न हेट हैं बस इससे थोड़ा सा काम…

मैंने सामने की और इशारा करके कहा तो वो हंसने लगी..

चित्रावती- आज तुम कुछ अलग अलग सी बातें कर रहे हो पर नहीं तुम हमेशा hi अलग सी बातें करते हो..

में- इसे मैं अपनी तारीफ समझूंगा…

चित्रावती- और हमने तारीफ न की हो तो??

में- तो…..

मैं उसकी आँखों में देखते हुए बोलै.. एक तो हम इतने करीब बैठे हुए थे उसस्के बदन की खुशबु मुझे बेसुध कर रही थी ऊपर से इतनी पास से उसकी झील सी आँखों में देखते हुए मैं कहीं और hi खोने लगा मुझे ये भी याद नहीं रहा की मैं क्या बोलने जा रहा था.

चित्रावती- क्या हुआ ऐसे क्या देख रहे हो?

बोलू?

में- हँ? ओह्ह मैं तुम्हे देख रहा हूँ..

चित्रावती- हमें क्यों? सामने देखो कितना खूबसूरत नज़ारा है.

में- तुम नज़ारे को क्यों देखती हो?

चित्रावती- हम इसलिए क्यूंकि हमें ाचा लगता है, हमारे मन को ठंडक देता है.. हमारी साँसों की गति को थोड़ा धीरे कर देता है.

में- मैं भी..

Chitrawati-main भी क्या?

में- मैं भी तुम्हे इसलिए देख रहा हूँ क्यूंकि मुझे ाचा लगता है, मन को ठंडक मिलती है, और साँसे थोड़ी धीरे हो जाती हैं.

चित्रावती मेरी बात सुनकर मेरी आँखों में देखने लगी, कोई कुछ नहीं बोल रहा था बहार प्रकृति अपना मधुर संगीत सुना रही थी और हम दोनों एक दुसरे को बस देखे जा रहे थे.. फिर चित्रावती को जैसे कुछ याद आया हो और वो नज़रें हटा कर सामने देखने लगी..

मैं अब भी उसी की तरफ देख रहा था.

में- ाचा मुझे तुमसे कुछ पूछना है?

चित्रावती- और भी पूछना है..? ठीक है पूछो…

में- तुम मेरी एक गलती माफ़ कर सकती हो?

चित्रावती- मतलब हम कुछ समझे नहीं कौनसी गलती?

में- बस ये बताओ क्या तुम मेरी गलती के लिए मुझे माफ़ करदोगी?

चित्रावती- हाँ पर कौनसी गलती की है तुमने जो माफ़ कर दूँ..

में- है एक गलती.. जिसके लिए मुझे तुमसे माफ़ी चाहिए होगी?

चित्रावती- ोहफ़ो अब बोलो भी कौनसी गलती??

में- ये.

और इतना कह कर मैंने आगे झुककर अपने होंठों को उसके रसीले नरम होंठों पर रख दिया आह्हः क्या सुखद एहसास था वो इतने मुलायम और रसीले होंठ जैसे मुँह में रास मलाई भर ली हो.. मैंने बस एक पल के लिए उसके होंठों को चूमा और फिर बापिस हो गया… पर उस एक पल में hi मैंने क्या प् लिए मैं hi जनता था …

वो बिलकुल हैरान हो गयी… उसके चेहरे पर हैरानी के आलावा कोई और भाव नहीं दिखा मुझे…

में- इसी गलती की माफ़ी मांग रहा था मैं.. करदोगी न माफ़.

वो कुछ नहीं बोली बस सामने देखने लगी..

मुझे चिंता होने लगी की कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं कर दिया मैंने…

में- तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही..

थोड़ी देर बाद चित्रावती बोली: अब तुम्हे जाना चाहिए, जल्दी hi तुम्हारी अगली प्रतियोगिता शुरू हो जाएगी..

मैं हैरान और परेशां हो गया मुझे लगने लगा सेल गलती कर दी तूने उसने मुझे जीतने में मदद की और मैं उसको चूमने लगा गधा हूँ मैं बिलकुल. मैंने सोचा अभी कुछ भी करूँगा तो ये और गुस्सा हो जाएगी इससे ाचा इसकी साड़ी बातें मंटा हूँ और बाद में मानाने की कोशिश करूँगा..

में- ठीक है चलते हैं…

वो थोड़ा पीछे खिसकी और फिर कड़ी हो गयी.. और जैसे hi मैं उठने को हुआ वो बोली..

चित्रावती- एक और बात तुम हमारे साथ इस रस्ते से नहीं जाओगे..

में- हैं फिर kaunsseeeeeeeeeeeeeeaaaaaaaaaaaaaaaa.

मैं इतना hi बोल पाया था की उसने मुझे धक्का दे दिया और मैं उस खिड़की नुमा जगह से करीब 20 फ़ीट की ऊंचाई से थप्प्प्प से तालाब में जा गिरा… मेरी तो गांड hi पहात गयी… साला कहाँ वो इतने अचे से बात करती थी जीतने में मदद की और अब सीधा तालाब में फेंक दिए..

ये तूने उड़ती लकड़ी अपने पिछवाड़े में ले ली है कर्मा बीटा… मैं तालाब से निकल कर पूरा घूम कर बापिस सबके पास आया…

इसके बाद क्या हुआ और क्या प्रतिक्रिया होगी चित्रावती की और साथ hi उससे कर्मा और साथियों की क्या मुश्किलें बढ़ेंगी ये सब अगली अपडेट में.. आप सब अपनी कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.
 
अपडेट 136


जहाँ कालक गैन में कर्मा और उसकी मंडली प्रतियोगिताएं में व्यस्त थी वहीं उसके गाओं चोदामपुर में भी काफी कुछ घटित हो रहा था,

कर्मा के पापा बेचारे घर के और खेत के ऊपर से बाघ सारे काम करने में व्यस्त थे वहीं उनकी खुद की काम इच्छा बढाती जा रही थी, लुंड का तनाव रह रह कर परेशां कर रहा था पर राहत मिल नहीं रही थी… कर्मा की माँ की कमी बहुत महसूस हो रही थी…

पूरे दिन काम करने के बाद थक कर पापा आंगन में बैठे hi थे की दरवाजे पर दस्तक हुई, तो कौन हो सकता है ये सोचकर उनके चेहरा खिल उठा.. जल्दी से उठ कर पापा ने दरवाजा खोला तो खिला हुआ चेहरा जैसे मुरझा गया.. क्यूंकि पापा ने तो सोचा था की शायद खाना देने प्रेमा भाभी आई होगी पर सामने भाभी के ससुर यानि जग्गू के परम पूज्य पिताजी खड़े थे हाथ में खाना लिए.

पापा- अरे अरे भाई साब आप?

राजपाल- हाँ भैया नीलेश बाबू, चलो खाना ले आये हैं खा लो..

पापा- आपने क्यों परेशानी उठाई बच्चों के हाथ भिजवा देते नहीं तो हम आ जाते लेने.

राजपाल- अरे इसमें परेशानी क्या है और सोचा अकेले हो थोड़ा बतिया भी लेंगे…

पापा- अरे बिलकुल सही किआ भाईसाब, बहुत सही किआ जो आ गए हम भी अकेले में रहते रहते परेशां हो गए थे..

पापा ने उन्हें अंदर आंगन में बिठाते हुए कहा…

राजपाल- तभी तो आये हैं हम बाबू… लियो खाना निकालो..

Papa-haan अभी रसोई से बर्तन लाते हैं..

इतना कहकर पापा रसोई में चले गए और बर्तन लेकर आये और खाना लगाने लगे.

पापा- वैसे भाई साब न जाने कितने समय बाद आज हम साथ में खाना खा रहे हैं न..

राजपाल- हाँ नीलेश आखिरी बार किसी दावत में hi खाया रहा जहाँ तक हमें याद है.

पापा- हाँ अपने अपने कामो से फुर्सत मिले तो साथ कभी मिल बैठ कर खाएं..

राजपाल- बचपन में तो हम तुम राजन दीनू साथ hi चौकड़ी जमके बैठ जाते थे घर में और अम्मा सब परेशां हो जाती थी रोटियां बेलते बेलते…

पापा- हहहह ये बात सही कही भाई साब तुमने, कई बार तो इसी वजह से बेलन भी खाये हैं हम लोग पीठ पर. तुम बड़े थे बच जाते थे पड़ती थी हमारी और राजन की.. दीनू चुपके से निकल जाता था.

राजपाल- अरे दीनू की तो पूछो hi मत याद है पीछे वाली नहरिया में जब हम नहाने गए थे तो हम सब के तो पानी आ रहा छाती पर पर दीनू बेचारा पूरा दुबके बहे जा रहा था.

दोनों ने खाना कहते हुए बात करनी जारी राखी..

पापा- अरे भाई साब उस दिन तो हमें लगो की गया दीनू, हमारी तो फैट के हाथ में आ गयी थी… की घर पर का मुँह दिखाएंगे.

राजपाल- हाँ बाबू पहात तो हउमै भी गई थी वो तो भला हो जो उसका पेअर झाड़ में अटक गया… नहीं तो गजब हो गया होता…

पापा- बचपन के दिन भी क्या दिन थे भाई साब…

राजपाल- हाँ एक बार तुमने हमारी जान भी ले ली होती.

पापा- हमने कब??

राजपाल- ाचा भूल गए का जब ट्रेक्टर में चाबी लगाकर हमारे ऊपर hi चढ़ा दिया था तुमने.. भला हो सुदेस भाई साब का जो ें तटमे पर आ गए और ट्रेक्टर पर भाग के चढ़ के उसे रोक दिया..

पापा ये सुनकर थोड़ा गंभीर हुए

पापा- हाँ भाई साब उस दिन तो हम कुछ ज्यादा hi जोश में आ गए थे ट्रेक्टर चलने के लिए और मौसा की जेबसे चाबी निकल लाये थे… फिर खूब दांत पड़ी.

राजपाल- और बताओ कोई खोज खबर रहती है सुदेश की…

राजपाल का ये सवाल सुनकर पापा बिलकुल शांत पद गए… ये बात राजपाल ने भी देखि और बात बदलने के लिए बोलै..

राजपाल ,- अरे तुमने ये तो बताया नहीं रायता कैसा लगा तुम्हे..

Papa-are भाईसाब कैसी बात कर रहे हो लोकि का रायता कभी हमें ख़राब लग सकता है क्या…

खहैर इसी तरह बातें करते हुए खाना हुआ.. और फिर जब पापा बर्तन वगेरा रख कर बापिस आके राजपाल ताऊ के पास बैठे तो वो बोले.

राजपाल- अरे सुनो हम सिर्फ खाना खिलने hi नहीं आये हैं बस..

पापा- हाँ बात करने आये हैं बा भाई साब.

राजपाल- अरे नहीं बातें निकलवाने..

Papa-matlab..

Rajpal-matlab हम दिखते हैं न… और ये कहकर राजपाल ताऊ ने कुर्ते की जेब में हाथ डाला और बड़े धीरे धीरे से जैसे कोई बच्चा अपना खिलौना निकलता है उसी ख़ुशी और जोश जे साथ बहार निकला.. और पापा की नज़रों के सामने कर दिआ..

जिसे देखकर पापा की आँखें बड़ी हो गयी…

उनके हाथ में एक अधः था

राजपाल- कहो कैसी रही.. करलें गाला गीला…..

पापा- अरे भाई साब मरवाओगे क्या.. बहु को पता चल गया तो सब को बता देगी..

राजपाल- अरे उसका हम इंतजाम करके आये हैं चिंता मत करो.. कभी कभी तो ऐसा मौका मिलता है नहीं तो साडी जिंदगी बच्चों की परेशानी से चैन नहीं मिलता..

अधः देखकर पापा का मन भी बहकने लगा था और सोचा अकेले रात बिताने का ाचा तरीका होगा ये…

तो फिर क्या था आ गए गिलास और मूंगफली को ताल के चखना बना लिए गया… और बैठ गए दोनों लोग गिलास में, दारू और पानी का सही अनुपात में समन्वय हुआ और फिर दोनों गिलास आपस में टकराये गए और फिर अगले hi पल दोनों के होंठ अपने अपने गिलास पर लगे हुए थे…

एक सांस में hi गटकने के बाद दोनों ने परंपरा अनुसार गन्दा सा मुँह बनाया और फिर एक दुसरे को देख मुस्कुराये,

राजपाल- बड़े दिनों बाद मिली है आज,

पापा- हमने तो ली थी अभी दो चार दिन पहले hi राजन लेकर आया था चुपचाप.

राजपाल- बड़े छुपेरुस्तम हो हमें नहीं बुला सकते थे..

पापा- अरे आज की तरह तुरंत वाला hi पिरोगराम बन गया था तब भी और रात भी हो चुकी थी..

राजपाल- बनाओ यार एक और बनाओ..

पापा- आराम से भाई साब इत्ती जल्दी का है?

राजपाल- अरे इतने दिनों बाद अपने भाई के साथ मिलकर पि रहे हैं रहा नहीं जा रहा..

पापा ने राजपाल ताऊ की फरमाइश पर एक और करारा पैक बनाया और इस बार दोनों ने hi थोड़ा संयम दिखाया और घूँट भर भर के पीने लगे…

राजपाल- यार नीलेश बचपन के दिन बड़े याद आते हैं,

पापा- बात तो सही कही भाई साब कितनी मस्ती करते थे हम लोग मिलकर,

राजपाल- अरे मस्ती नहीं उधम मचाते थे पूरा गाओं सर पर उठा लेते थे...

पापा- हाँ और एक hi तरह की मस्ती कहाँ करते थे,

राजपाल- एक hi तरह की मस्ती???

पापा- अरे वोहियी वाली भूल गए का, तुबेल वाला खेत…

राजपाल- अरे वो हाय वो कहाँ भूल सकते हैं बाबू,

पापा- वैसे भाई साब अभी तुम्हे देखकर कोई कह नहीं सकता की तब तुम कितने रंगीले थे,

राजपाल- अरे हटो हम रंगीले थे या तुम, भूल गए तुम्हारे खेत में जो मजदुर काम करता था का नाम रहा…. हाँ चदनसिंघ, उसकी बीवी को घोड़ी बनाये गए तुम पकडे गए थे या हम,

पापा ने झट से गिलास मुँह से लगा कर खली कर दिया और बोले,

पापा- तो हमें ये चोदामपट्टी करना सिखाया कौन था?? तुम… और हम तो चरणसिंघ की बीवी को घोड़ी बनाते थे तुम तो उसकी बहन को भी नहीं छोड़े थे.

राजपाल- ाचा अब सारा बोझ हमाये सर पटक रहे हो… ी ठीक न है बाबू, और भूल गए कितनी बार बचाये हैं हम तुम्हे और कितनी बार hi छूट के दर्शन भी हमारी वजह से हुए रहे तुम्हे.

पापा- हम कहाँ भूले हम भी तो वही कह रहे हैं की अभी देखकर लगता hi नहीं, तुम जवानी में इतने रंगीले रहे होंगे,

राजपाल- अरे बाबू रंगीले तो हम अब भी हैं बस बच्चन की खातिर थोड़ा काबू रखते हैं,

पापा- मतलब अब हु भाभी के ऊपर रोज चढ़ जाते हो,

राजपाल- रोज बाबू रोज, बिना चढ़े तो हम से रहा hi नहीं जाता..

पापा- अब आई है सच्चाई बहार, वैसे रोज चढ़ते हो बच्चों को कभी शक नहीं होता..

राजपाल- अरे घर पर करेंगे तो शक होगा न, दोपहर में जब खेत में खाना देने आती है तब hi साड़ी उठाई और कर ली घुड़सवारी..

पापा- अरे गजाबबबब साला इस मामले तो तुम हमसे भी आगे निकल गए भैया खुले में hi उधम मचाते हो…

राजपाल- और का खुले में चुदाई का मजा hi कछु और है…

पापा- अरे सही है अब तो हम जान गए अब दोपहर को एक चक्कर जरूर मारा करेंगे तुम्हारे खेत की और.

राजपाल- काहे भाई तुम्हारी आदत गयी नहीं अभी हउमै चुदाई चुप चुप के देखन की..

पापा- आदत का भैया बस हम भी देखलेंगे खुले में चुदाई में कितना मजा होता है..

राजपाल- खुले में चुदाई नाही बाबू हम सब समझत हैं तुम्हारा मन क्या चाहता है..

पापा- का चाहता है..

राजपाल- अपनी भाभी को नंगी देखन चाहते हो और का…

पापा- अरे भाई साब नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है..

राजपाल- अरे बाबू शर्माओ मत बचपन से जानत हैं तुम्हे, और जब मंजू को ब्याह के लाये थे तबसे hi तुम और राजन एक मौका नहीं छोड़ते थे. उसकी छातियों को ताकने का, तो अब कैसे छोड़ डोज..

पापा- का भाईसाब तुम भी..

राजपाल- अरे हम भी का, जो है वो है, और मरद हो औरत का बदन देखकन को लालच तो आएगा hi,

पापा- तो भाई साब तुम्हे बुरा नहीं लगा कभी,

राजपाल- अब इसमें बुरा मनन बैठे तो पूरी ज़िन्दगी इसी में न बीत जाये हमारी, तुम्हारी भाभी हमेशा से hi गदराये बदन वाली रही है और मरद लोगन की आँखें ऐसी औरत पे ना छह कर भी टिक जाती हैं तो इसमें गलत का है, बल्कि हम तो खुद को भाग्यशाली मानते हैं, की जिसे सब देखते हैं उसे हम पेलते हैं.

पापा- एक बात कहें भैया,

राजपाल- हाँ बोलो,

पापा- यही बिलकुल हमारी बीवी के साथ भी है, हमारे सामने तो किसी की हिम्मत नहीं होती पर नजर बचा कर सब उसके बदन को ताड़ते जरूर हैं,

राजपाल- हाँ जानते हैं, बहु का बदन भी मंजू से सूत भर भी काम नहीं है, तो लोग तो देखेंगे hi, पर यही तो ख़ुशी की बात है बाबू, अभी हमने बताया न तुम्हे, की जिसे

सब देखते हैं.

हम पेलते हैं.

दोनों ने ख़ुशी से साथ मिलकर कहा,…

राजपाल- अब आई बात तुम्हारी समझ में,

पापा- बात तो आ गयी भाईसाब पर इन बातों से हमारा पजामा तन गया,.

राजपाल- यही हाल हमारा भी है बाबू, जबसे बच्चे गए हैं खुराक नहीं मिल रही है,

पापा- फिर क्या करते हो…

राजपाल- क्या करेंगे, समझते हैं खुद को की कुछ दिन की बात और है.

पापा- हमें लगा,

राजपाल- क्या लगा तुम्हे..

पापा- यही सोचे की अभी कोई मजदूर की बीवी होगी जुगाड़ में.. हाहाहा.

Rajpal-nahi यार अब कहाँ, गलती से पकड़े गए तो बदनामी ऊपर से तुम्हारी भाभी जान ले लेगी हमारी…

पापा- ाचा अगर भाभी को न पता चले तो कर लोगे..

राजपाल- अरे बोले थे न मरद हैं लालच तो आएगा hi, और अब वैसी मजदूर भी कहाँ हैं, क्या बाला थी चरणसिंघ की लुगाई, याद है एक बार तो हमें तुम्हे और राजन तीनो को एक साथ संभाली थी..

पापा- हाँ भाई साब बात तो सही की बड़ा तगड़ा माल था..

दोनों hi याद करते हुए अपने अपने गिलास को ख़तम करते हैं दोनों के hi पजामों में उभै आ गया था..

Rajpal-lo दारू भी ख़तम हो गयी.. भाई नीलेश मजा आ गया..

पापा- हाँ भाई साब मजा तो बहुत आया.

Rajpal-aage जल्दी hi पिरोगराम रखेंगे और मिलते रहा करो…

पापा- बिलकुल भाई साब अब जल्दी जल्दी पिरोगराम बनाएंगे और तब तक राजन भी आ जायेगा तो तिगड़ी जमेगी फिर से..

राजपाल- अरे वाह तब तो मजा आ जायेगा, खैर अब चलते हैं हम,

पापा- अरे रुकजाते थोड़ी देर और,

राजपाल- नहीं बाबू चलना होगा बहु अकेली है घर पर वैसे तो हम बोल आये थे की इंतज़ार न करे और सो जाये बहार से टाला लगा आये थे पर फिर भी ज्यादा देर अकेले रखना ठीक नहीं है..

पापा- हाँ ये बात तो सही कही..

Rajpal-to चलते हैं..

पापा- हम चलें छोड़ने?

राजपाल- अरे बच्चे थोड़े hi न हैं ऐसे बोल रहे हो जैसे हमने पहली बार पि है.

पापा- अरे नहीं भाईसाब ऐसे hi.

राजपाल- ाचा चलते हैं अब…

और फिर राजपाल ताऊ अपने घर चले जाते हैं और पापा भी शराब के सुरूर में लुंड खुजाते हुए बिस्तर पर लुढ़क जाते हैं…

राजपाल ताऊ अपने घर पहुँच कर थोड़ा सा लड़खड़ाते हुए टाला खोलते हैं और फिर दरवाज़ा बापिस लगा कर अंदर आते हैं और कोशिश करते हैं की काम से काम आवाज़ हो जिससे बहु न जागे.. पर जैसे hi वो आँगन में पहुँचते हैं उनकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं..

हालाँकि भाभी को ताऊजी इंतज़ार न करने को और सो जाने को बोल कर गए थे पर दूध देने के चक्कर में भाभी इंतज़ार करती रही और इंतज़ार करते हुए hi वहीं आंगन में पड़े बिस्तर पर वो सो गयी.. पर ताऊजी जी की आँखें चौड़ी होने की वजह भाभी का सोना या आंगन में सोना नहीं था बल्कि वो जिस हालत में सो रही थी वो था, भाभी एक तरफ करवट लेकर सोइ हुई थी साथ hi उनका पल्लू नीचे था ताऊ जी की तरफ भाभी की पीठ थी, और ताऊ जी को भाभी की चिकनी नंगी कमर और पीठ साथ hi साड़ी में तरबूज जैसी गोल गोल गांड दिख रही थी जिसे देखकर hi ताऊजी की आँखें चौड़ी हो गयी थी…





शराब का नशा पिछले कई दिनों से छूट न मिलना और साथ hi नीलेश के साथ हुई बातों से ताऊजी जो पहले hi उत्तेजित थे अपनी बहु के बदन के इस नज़ारे को देखकर और उत्तेजित हो गए उनका लुंड पाजामे में बिलकुल तन गया,

ताऊ जी की नजर भाभी के कामुक बदन से हैट hi नहीं रही थी… मारे शर्म के उन्होंने अपने सर को घुमा लिए और दूसरी तरफ कर के जाने लगे पर.. मरद थे न लालच तो आएगा hi, तो दो कदम बढ़ने के बाद फिर रुक गए और धीरे से पालते और फिर से अपनी बहु के मादक बदन को देखने लगे…

उत्तेजना धीरे धीरे उनकी शर्म पर हावी होने लगी मन में सोचा बहु तो सो रही है किसी को क्या hi पता चलेगा और इसी बहकावे में आकर धीरे धीरे कदम बढ़ाते हुए वो अपनी बहु के और करीब बढ़ गए… खत के बिलकुल पास पहुंचकर देखा बहु का दूधिया बदन जैसे चमक रहा था चिकनी कमर मलाई जैसी लग रही थी, उनका एक मन उन्हें धिक्कार रहा था की अपनी बहु को इस तरह से देख रहा है, वहीं मन की उत्तेजना के आगे सब सही लग रहा था, खुद बा खुद hi ताऊजी का हाथ उनके पाजामे के ऊपर से लुंड को सहलाने लगा और उन्हें खबर भी न हुई उनका सारा ध्यान तो बहु के बदन पर था,

अचानक से ताऊजी का दूसरा हाथ धीरे धीरे से उठने लगा और भाभी की तरफ बढ़ने लगा, हाथ कैंप रहा था, वहीं ताऊजी को जब ये एहसास हुआ तो उन्होंने खुद को रोका और साथ hi अपने लुंड के ऊपर से भी हाथ हटा लिए और एक बार फिर मुड़कर जाने लगे, एक कदम बढ़ाया hi था, की फिर कदम ठहर गए और बापिस बहु की तरफ मुद गए, इस बार एक गहरी सांस ली और फिर से बापिस उसी जगह पर खड़े हो गए, आँखें बहु के बदन पर फिर से फिसलने लगी, दोबारा ताऊजी का एक हाथ उठा और बहु की और बढ़ने लगा, ताऊ जी का दिल राजधानी का इंजन बन गया, और एक फ़ीट की दूरी किलोमीटर में बदल गयी हो जैसे, कुछ पल बाद हाथ बिलकुल भाभी की पीठ के करीब पहुंच गया, ताऊजी का बुरा हाल था और फिर उन्होंने एक सांस ली और फिर हलके से अपने हाथ को अपनी बहु की पीठ पर रख दिया.. और जैसे बहु के बदन को छूटे hi ताऊजी के पूरे बदन में एक बिजली सी दौड़ गयी… नंगी पीठ का वो कोमल एहसास अपनी उँगलियों पर पाकर ताऊजी तो जैसे एक अलग hi दुनिया में पहुंच गए उनका दूसरा हाथ फिर से पाजामे के ऊपर से उनके तने हुए लुंड को सहलाने लगा… ताऊजी ने बड़ी hi सावधानी से अपने हाथ को अपनी बहु की पीठ पर फिरते हुए थोड़ा आगे बढ़ाया और धीरे धीरे नंगी चिकनी मांसल कमर तक पहुंच गए, और जैसे hi ताऊजी के हाथ को भाभी की चिकनी कमर का स्पर्श मिला ताऊजी के अंदर एक अलग ऊर्जा आ गयी, उनके दुसरे हाथ ने तने हुए लुंड को पाजामे से बहार निकल लिए और मुठियाने लगा, वहीं एक हाथ अपनी hi बहु की नंगी कमर पर चल रहा था, ताऊजी का लुंड बिलकुल फटने को हो रहा था, उन्हें यकीन नहीं हो रहा था की वो कभी ऐसा करेंगे और अपनी सोती हुई बहु के मादक बदन से खेलेंगे, और अपनी हवस मिटायेंगे, पर ये सच में हो रहा था साथ hi उन्हें मज़ा भी आ रहा था..

पर इस मजे के बाद भी ताऊजी पूरी सावधानी बारात रहे थे और बहुत हलके से हाथ को भाभी की कमर पर फिरा रहे थे पर उतनी hi तेजी से दूसरा हाथ उनके लुंड पर चल रहा था, ये सोचकर की ये कितना गलत है की वो अपनी सोती हुई बहु के बदन से खेलते हुए मुठिया रहे हैं ताऊजी और उत्तेजित हो रहे थे, हलके से hi उन्होंने अपने हाथ को कमर से थोड़ा आगे की और यानि बहु के पेट की और ले गए और फिर पेट की मांसल नरम त्वचा को महसूस कर गंगना उठे, और जैसे hi ताऊजी की उँगलियों ने बहु की नाभि को छुआ बस वो फिर और न सह पाए बड़ी मुश्किल से उन्होंने खुद को आवाज़ निकलने से रोका पर अपने लुंड से रास की धार को नहीं रोकपाये जो की उनके लुंड से गिरकर ज़मीन पर टपकने लगा, ताऊजी लम्बी लम्बी साँसे लेते हुए झड़ते रहे और जब रास की एक एक बूँद निचुड़ गयी तो जाकर शांत हुए और फिर तुरंत hi उन्होंने अपना हाथ भाभी के पेट से हटा लिए, अब झड़ने के बाद ताऊजी को ग्लानि होने लगी अपनी बहु के साथ ऐसा करने की तो वो जल्दी से वहां से मुड़े और अपने बिस्तर की और चले गए और उसी पर लुढ़क गए शराब के नशे के कारण उन्हें जल्दी hi नींद आ गयी…

सुबह जब प्रेमा भाभी की आँख खुली तो उन्होंने देखा वो आँगन में hi सो गयी थी, उठ कर उन्होंने खुद को देखा और फिर अपनी साड़ी सही की, और सोचने लगी- हम यही सो गए थे न जाने पापाजी कब आये होंगे, दूध भी वैसे का वैसा hi रखा रह गया एक बार देखती हु पापाजी सो रहे हैं क्या या खेत के लिए निकल गए..

ये सोचकर भाभी उठी और जैसे hi आगे बड़ी उन्होंने देखा बिस्तर के बगल में ज़मीन पर कुछ सफ़ेद सा गिरा हुआ है जो सूख गया है,:- यहाँ दही किसने गिरा दिया उन्होंने मन hi मन सोचा, और फिर पास से एक गन्दा कपडा उठा कर उसे साफ़ करने के लिए बैठी और पास होने से थोड़ी सी गंध जब भाभी की नाक में गयी तो उन्हें थोड़ा शक हुआ की ये दही तो नहीं है, तो उन्होंने और करीब से सूंघ कर देखा और पहचानने की कोशिश करने लगी, तभी उनके समझ में आया तो उन्होंने उंगली से खरोच कर उठाया और अचे से नाक के पास लेकर सूंघा तो भाभी को पक्का यकीन हो गया की ये क्या है, पर ये किसका हो सकता है..

घर में तो मेरे और पापाजी के अलावा कोई नहीं है और मुझे पूरा यकीन है की कल रात तक तो ये निशान यहाँ नहीं था…

तो क्या यहाँ ये पापाजी का है, नहीं नहीं प्रेमा तू भी क्या सोच रही है, पापाजी भला ऐसा क्यों करेंगे… पर उनके अलावा घर में और आया भी कौन और मैं तो यहीं सो रही थी तो क्या रात में पापाजी ने मेरे यहाँ सोते हुए अपना रास यहाँ गिराया, क्या मुझे देखते हुए उन्होंने खुद को संतुष्ट किआ या कुछ और भी किआ होगा, ऐसी क्या वजह होगी जो पापाजी ने यहाँ रास गिराया है, पर ये सब सोचते हुए न जाने क्यों भाभी की छूट पनियाने लगी, और ये सोचकर की उनके ससुर का रास उनके हाथ में हैं भाभी का मन उत्तेजित होने लगा, भाभी ने कपडे से जल्दी से उसे साफ़ किआ और फिर गीले कपडे से अचे साफ़ कर निशान मिटा दिए और फिर चाय बनाने चली गयी, और फिर चाय लेकर ताऊजी के कमरे में गयी तो देखा ताऊजी अब भी सो रहे थे.

भाभी को थोड़ा अलग लगा की वैसे पापाजी कभी इतनी देर तक सोते नहीं हैं न जाने आज क्या हुआ है तभी उनकी नज़र ताऊजी के पाजामे में बने तम्बू पर गयी जो सुबह की वजह से खड़ा हुआ था, एक बार फिर से भाभी की छूट हलकी सी पनिया गयी, कुछ देर यूँ hi घूरने के बाअद भाभी को थोड़ा होश आया तो अपनी नज़रें ससुर के लुंड से हटाई और बोली: उठो पापाजी लो चाय पि लो… ोू पापाजी उठ जाओ.

ताऊ की आँख भाभी की आवाज़ से सुनी और उठ कर बैठे तो सामने प्रेमा भाभी को हाथ में चाय लिए खड़ा देखा , अचव से आँख खोलने के बाद उनका ध्यान लुंड पर गया जिसे उन्होंने देखा तो खुद पर शर्म आ गेज और अचानक से उन्हें रात जा सारा किस्सा याद आ गया ताऊजी ने तुरंत अपनी जांघों पर चद्दर डालकर ढँक लिए…

भाभी: पापाजी लो चाय पि लो…

ताऊजी: उह्ह्ह? हैं हाँ बहु दे दे..

भाभी ने चाय दी और ताऊजी ने एक चुस्की ली तो आँखें अचे से और खुली…

भाभी: कब आये थे पापाजी रात तुम?

ताऊजी: थोड़ी hi देर में आ गया था तुम सो गयी थी तब तक बीटा..

भाभी: हाँ पता hi नहीं चला कब आँख लग गयी..

ताऊजी: कोई बात नहीं बीटा दिन भर घर का काम करती हो थक कर नींद तो आएगी hi न.

भाभी: वैसे पापाजी तुम्हे अपना गदा मलाई दार दूध ख़राब नहीं करना चाहिए..

ये सुनकर तो जैसे ताऊजी की पहात hi गयी और उन्हें रात में अपने गिराया हुआ रास याद आ गया, उनके मन में अनेक चिंताएं घूमने लगी, क्या रात को बहु ने मुझे वो सब करते हुए देख लिए था, क्या उसे पता चल गया था, अब क्या इज्जत रह जाएगी मेरी…. कहीं उसने किसी को बता दिया तो…

यही सोचते हुए उनके मुँह से धीरे से निकला: ककया मतलब?

भाभी: तुम्हारे लिए दूध निकालके रखा था रात को तुमने पिया hi नहीं तो ख़राब हो गया,

ताऊजी की सांस में सांस आई…

ताऊजी: अच्छा ाचा वो नहीं बीटा आगे से ख़राब नहीं होगा चिंता मत कर तू..

भाभी: जी कोई बात नहीं पापाजी..

इतने में ताऊजी ने चाय ख़तम करके गिलास नीचे रख दिया.. और बोले: ाचा अब हम खेत का चक्कर लगा आएं.

भाभी: ठीक पापाजी पर हम बनाएं का आज?

ताऊजी: कछु बनालो बहु जो तुम्हे सही लगे..

भाभी: ुहह्म्म ठीक है पापा जी और ये कहकर भाभी ने झुककर ताऊजी की चाय का गिलास उठाया तो भाभी का पल्लू नीचे सरक गया और भाभी की गोल बड़ी बड़ी छुछियां बहार लटक गयी और झुके होने के कारन तो ऐसा लगा जैसे बिलकुल बहार को hi आ गयी हैं और जिसपर सबसे पहली और अछि नज़र ताऊजी की hi पड़ी,





आँखों से दो फ़ीट की दूरी पर ऐसा नजारा देख कर ताऊजी की आँखें एक बार फिर से बड़ी हो गयी वहीं भाभी ने भी सामने देखा और अपने ससुर की नज़रों के निशाने को देखकर न जाने क्यों उनके चेहरे पर मुस्कान आ गयी पर साथ hi छूट में गीलापन भी, इसी दौरान ताऊजी की नज़र भी एक बार भाभी की नज़रों से मिली तो उन्होंने तुरंत hi अपनी नज़रें हटा ली और भाभी भी तुरंत कड़ी हो गयी और पल्लू संभल लिया…

दोनों एक दुसरे को देखकर एक बार मुस्कुराये और फिर ताऊजी बहार चले गए… पर वहीं भाभी की शरीर की आग भड़क गयी… खैर वो सुबह के क्रियाकर्म निपटने के लिए घुश गयी और नहाकर बहार निकली hi थी की दरवाज़े पर एक दस्तक हुई,

भाभी ने जाकर दरवाजा खोला तो सामने कर्मा के पापा थे,

भाभी: चाचाजी नमस्ते, आइये...

पापा- खुश रहो बीटा, अरे वो ये रात बर्तन भाई साब घर पर hi भूल गए थे तो वो लौटने आये हैं..

भाभी: आपने क्यों तकलीफ की चाचाजी, मैं खाना देने आती तो ले आती...

पापा- अरे बीटा तकलीफ नहीं लालच से आया हूँ..

भाभी: लालच कैसा लालच,

पापा- एक कप चाय का लालच, सोचा बर्तन लौटने के बहाने एक कप चाय भी मिल जाएगी...

भाभी- हेहही चाचाजी आपको किसी बहाने की जरुरत है क्या जब चाहिए तब बोल दो..

दोनों लोग अंदर आ गए

भाभी- बैठो चाचाजी हम बनके लाते हैं..

भाभी रसोई में चाय बनाने चली जाती हैं पापा बैठ जाते हैं और इधर उधर देखने के बाद रसोई की तरफ जाते हैं और बोलते हैं

पापा- भाई साब नहीं दिख रहे,

भाभी- वो तो खेत की तरफ गए हैं थोड़ी देर पहले hi निकले थे..

पापा ये सुनकर मन hi मन खुश होते हैं

पापा- ाचा चलो कोई बात नहीं वैसे बहु तेरी कमर का दर्द अब कैसा है.??

पापा रसोई में खड़े होकर भाभी को पीछे से निहारते हुए कहते हैं..





भाभी- ठीक hi है चाचाजी पहले से राहत है,

पापा- चलो बढ़िया है तू काम भी तो इतना करती है पूरे दिन लगी hi रहती है.. पर तुझे इसे हलके में नहीं लेना होगा...

पापा ने थोड़ा आगे बढ़ाते हुए भाभी से कहा,

भाभी- समझी नहीं चाचाजी.

पापा- मतलब मालिश करवाती रहना रोज़.

भाभी- ाचा वो हाँ वो मैं ध्यान रखूंगी... पर चाचाजी अभी भी न जाने क्यों अकड़न सी है..

पापा तो जैसे इसी मौके की तलाश में थे..

पापा- ाचा कहाँ बता जरा..

और ये कहकर पापा भाभी के बिलकुल पीछे सात कर खड़े गए भाभी के बदन की खुशबु से hi उनका लुंड खड़ा होने लगा...

पापा ने धीरे से भाभी पीठ पर हाथ रखा यहाँ बहु??

भाभी- नहीं चाचाजी अभी बगल में हो रहा है दोनों तरफ..

पापा ने भाभी की साड़ी को थोड़ा हटाया और फिर दोनों और कमर पर हाथ रखा और पुछा- यहाँ पर बहु?

भाभी को पापा के हाथ महसूस करके एक झटका सा लगा और बोली- हाँ बस यहीं चाचाजी...

फिर क्या था पापा हौले हौले भाभी की कमर और साइड को सहलाने लगे...

पापा- बहु थोड़ा तेल दे...

bhabhi-ye ऊपर रखा है चाचाजी उतर लीजिये..

पापा ने तेल उतरने के लिए हाथ आगे बढ़ाया साथ hi खुद भी आगे हुए तो पीछे से बिलकुल भाभी से चिपक गए, पापा का खड़ा लुंड भाभी को अपनी पीठ के निचले हिस्से पर चुभता हुआ महसूस हुआ जिससे भाभी और उत्तेजित हो गयी..

तेल उतारकर पापा ने भाभी को दिया और उन्होंने एक कटोरी में कर लिए जिसमे पापा ने उंगलियां डुबोई और फिर हाथों पर मलकर दोनों हाथों से भाभी की कमर और पीठ को मसलने लगे..

भाभी- आह्ह्ह्हम्म्म्म चाचाजी..

papa-kya हुआ बहु?

भाभी- ाचा लग रहा है ..

पापा- पर बहु तेरी ये साड़ी ख़राब हो जाएगी तेल की वजह से..

पापा ने एक और चल चली...

तो भाभी ने बिना कुछ जवाब दिए अपने पल्लू को नीचे गिरा दिया जिससे भाभी की कमर और पीठ बिलकुल नंगी नंगी हो गयी...

भाभी- अब ठीक है चाचाजी..

पापा की तो आँखें चमक गयी.. हाँ हाँ बहु बिलकुल ठीक है..

पापा हाथों में तेल ले लेकर भाभी की कमर और पीठ को मलने लगे... पापा की हिम्मत बढ़ी तो उन्होंने अपने हाथों को कमर से होते हुए आगे बढ़ाना भी शुरू कर दिया और पेट तक ले जाने लगे...

भाभी- हाँ चाचाजी ुहहममम कमर की करनी थी न पेट की क्यों कर रहे हो...

पापा- क्या है न बहु पेट की त्वचा या बाकि शरीर की त्वचा रूखी सुखी हो जाती है तो तेल की मालिश से वो अछि और मुलायम हो जाती है...

भाभी- ahhhhhhhhhh फिर तो कर दीजिये चाचाजी...

फिर तो जैसे पापा को खुली छूट मिल गयी और वल भाभी की कमर पीठ पेट सबको अचे से मसलने लगे साथ hi नाभि में उंगली दाल उससे भी खेलते... पीछे से भाभी के चूतड़ों में पापा का लुंड घुसने को बेताब हो रहा था और हर बार उनके चूतड़ पर ठोकर मार. रहा था जिससे भाभी की छूट पानी पर पानी बहा रही थी वहीं पापा का भी लुंड फटने को हो रहा था... इसी लिए पापा भी पीछे से अपनी कमर हिला हिला कर अपने लुंड को भाभी के चूतड़ों पर रगड़ रहे थे... जिससे अब भाभी का भी बुरा हाल हो गया था पर तभी अचानक से भाभी बोली- चाचाजी रुको...

पापा को हैरानी तो हुई की क्यों रोक रही है पर पापा रुक गए भाभी एक बारे पापा की तरफ घूमी तो पापा के सामने भाभी का नंगा पेट और आधी नंगी छुछियां आ गयी पापा जब तक कुछ बोल पते इससे पहले भाभी का एक हाथ आगे बढ़ा और पापा के पाजामे के नारे को पकड़ कर खींच दिया, और खींचते hi भाभी तुरंत पलटी और नीचे होकर अपनी साड़ी को थमा और फिर ऊपर उथली और आगे झुकके अगले hi पल पापा के सामने भाभी के नंगे गोर गोल मटोल चूतड़ आ गए, ये सब इतनी जल्दी हुआ की पापा को प्रतिक्रिया देने का समय hi नहीं मिला वो तो बस आँखें फाड़े भाभी की नंगी गांड को देखे जा रहे थे की भाभी ने उनको होश दिलाया...

भाभी- चाचाजी अब जल्दी कीजिये, अब और इंतज़ार नहीं होता मुझसे, भाभी ने अपनी साड़ी कमर के ऊपर उठेर हुए और अपनी बड़ी गांड हिला कर पापा को दिखते हुए कहा...

पापा जब समझ आया की भाभी क्या कह रही हैं तो उन्होंने बड़ी फुर्ती में पाजामे को नीचे खिसकाया साथ hi कच्चे को भी और अपने खड़े लुंड को बहार निकल लिए और एक बार भाभी की और देखा और फिर लुंड का सिरा पकड़ कर भाभी की गीली छूट पर रखा.. जिस एहसास से दोनों की hi ाः निकल गयी... और फिर भाभी की कमर को थाम पापा ने एक धक्का लगाया और लुंड भाभी की छूट को चीरता हुआ आधा अंदर समां गया....

भाभी- ahhhhhhhhhh maaaahhhhhhhhhhhh

papa-ohhhhh बहूऊऊऊह्ह्ह्ह.

भाभी- पापाजी कभी भी आ सकते हैं जल्दी करो चचाजीयी अह्ह्ह्हह

पापा को इससे ज़्यादा अनुमति नहीं चाहिए थी तो उन्होंने लम्बे धक्के लगाने शुरू कर दिए और रसोई में ठप्प ठप्प्प की आवाज़ गूंजने लगी...

bhabhi-ahhhhhhhhhh maaaahhhhhhhhhhhh आह्ह्ह्हम्म्म्म चाचाजी ऐसे होई ..

पापा- आह्ह्ह्हम्म्म्म ओह्ह्ह बहु क्या गरम छूट है तेरी..

पापा ने तेजी से भाभी की छूट में धक्के लगते हुए कहा...





भाभी- ahhhhhhhhhh maaaahhhhhhhhhhhh आह्ह्ह्हम्म्म्म ओह्ह्ह्हह्ह चचाजीई बहुतत्त मज़ाआह आए रहा हैईईई...

पापा- एक आअह्ह्ह बात बता बहूऊऊऊह्ह्ह्ह ये अचानक से कैसी हो गयाहहह..

भाभी- ahhhhhhhhhh कुछ उह्ह्ह अचानक नहीं हुआए चचाजीई अह्ह्ह्ह...

papa-to फिर..

भाभी- ये साडी योजना पल्ली की थी, वो जाने से पहले मुझे उस रात जो हुआ तुम चरों के बीच साथ hi ये भी की तुम्हे सब पता है ये सब बताई थी .. साथ hi उसने hi बोलै था की चाचा का हर तरह से ध्यान रखना...

तब पापा को भी ध्यान आई की पल्ली ने जाते हुए कहा था की वो उनके ख्याल के लिए कुछ करके जाएगी...

पापा को पल्ली पर बड़ा प्यार आया,

पापा- ये पल्ली भी न बड़ी प्याआरी बछहहीी है...

भाभी- ुह्ह्ह्हह्ह हानंन्न प्यारीई भीईई और चूड्डू भी
...

पापा- बिलकुल आह्ह्ह्हह तेरी तरहहहहहह... Ahhhhhhhhhh जब पहले से सब तय था तो ये कमर दर्द वगेरा का नाटक आह्ह्ह्ह क्यों कर रही थीई....

भाभी- उह्ह्ह ुह्ह्ह्हह्ह्ह्ह ुह्ह्ह्ह वो पल्ली नीह तो बोल दिया आह था पर मुझे शर्म आ राहीईई थिई अह्ह्ह पर आअज खुजलिई इतनी बढह गयीईइ की और ृकाः hi नाहीइ गया...

पापा- अरे मेरीए पागल बहुउउउउ पहले अगर शर्म छोड़ी होती तो तेरे चाचा को तेरी इस रसीली छूट के लिए इतना तड़पना नहीं पड़ताःहठ

भाभी- ahhhhhhhhhh अब्ब्ब साडी तड़प मिटा लो चचा जीईओई... आह्ह्हह्ह्ह्ह किटनीय अजीब बात हैई नाहहहहह..

पापा- क्या बहूऊऊऊह्ह्ह्ह

भाभी- याहीईई मैंने अब बाप और बेटों तीनो के साथ कर लिए है...

भाभी की छूट यही सोच कर और कसने lagi...wohin पापा को भी जैसे ये ख्याल आया की इस छूट को उनके बेटे भी छोड़ चुके हैं वो भी बेहद उत्तेजित हो गए...

भाभी ने एक आअह्ह्ह के साथ अपने झड़ने की घोसना कर दी और उनका शरीर ढीला पद गया.. वहीं पापा भी बिलकुल अपने चरम पर थे और कुछ hi झटको में उन्होंने अपने लुंड से रास की धार भाभी की छूट में भर दी.. भाभी की छूट ने भी रास की एक एक बूँद को निचोड़ लिए तो पापा ने अपने लुंड को भाभी की छूट से बहार निकला..

पला- मजा आ गया बहु..

Bhabhi-wo सब तो ठीक है चाचाजी, पर अभी पापाजी आते होंगे तुम आँगन में बैठो मैं चाय लेकर आती हूँ, भाभी ने अपने कपडे. सही करते हुए कहा...

वही पापा ने भी अपना पजामा ऊपर खिसकाया पर बहार आने से पहले एक बार भाभी के होंठों को चूसने से खुद को रोक नहीं पाए...

बाहर आकर बैठे hi थे की तभी दरवाज़ा खुला और ताऊजी भी आ गए...

इसके बाद दोनों को भाभी ने चाय दी... तो दोनों बतियाते हुए पिने लगे . पापा और भाभी के चेहरु पर एक संतुष्टि थी... पर कितनी देर के लिए ये कौन जनता है..

इसके बाद क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्

 
वही पापा ने भी अपना पजामा ऊपर खिसकाया पर बहार आने से पहले एक बार भाभी के होंठों को चूसने से खुद को रोक नहीं पाए...

बाहर आकर बैठे hi थे की तभी दरवाज़ा खुला और ताऊजी भी आ गए...

इसके बाद दोनों को भाभी ने चाय दी... तो दोनों बतियाते हुए पिने लगे . पापा और भाभी के चेहरु पर एक संतुष्टि थी... पर कितनी देर के लिए ये कौन जनता है..



अपडेट 137


कालक गाओं

मैं तालाब से भीगकर मुँह लटकाये हुए बाकि सबके पास पहुंचा तो ज़्यादातर लोग सोये हुए थे, रात में चुप चुप कर सबने चुदाई जो की थी, खैर मैंने भी अपने आप को पोंछा और फिर थोड़ी देर आराम करने के लिए लेट गया और न जाने कब आँख लग गयी… खैर करीब दो घंटे सोया होऊंगा की अचानक से मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मुझे पकड़ कर हिला रहा है, धीरे धीरे आँखें खुली तो देखा मौसी थी,

में- ुहममम हाँ मौसी क्या हुआ,

मौसी- उठ जा बीटा बड़ी माँ ने आखिरी प्रतियोगिता के लिए सबको बुलाया है,

में- क्या? इतनी जल्दी…

मौसी- हाँ और याद रख इस बार बूढी वाली प्रतियोगिता है तो तुझे पूरा दिमाग लगाना होगा…

में: अभी तो मेरा दिमाग सोया हुआ है,

मौसी- सिर्फ दिमाग hi सोया हुआ है, मौसी ने मुस्कुराते हुए कहा.

मैंने उनकी नजर का पीछा किआ तो देखा मेरी धोती में टेंट बना हुआ था, मैं थोड़ा सा झिझका तो मौसी बोली: अब उठ समय नहीं है जल्दी से सबको बुलाया है…

मैं शरमाते हुए उठा अपने खड़े लुंड को छुपाने की नाकामयाब कोशिश करते हुए और उसे नीचे की और दबा दिया जिससे उसका उभर न दिखे और ये सब करते हुए मुझे मौसी ने देखा पर कुछ बोली नहीं पर अपनी नजरें भी नहीं हटाएँ..

धोती बांधकर जब मैं तैयार हो गया तो मौसी के साथ निकला, कक्ष के बहार निकलते hi एक सेविका कड़ी थी हाथ में बर्तन लेकर उसे देखकर मौसी बोली- कर्मा ये पीले तेरी नींद खुल जाएगी..

में- क्या है ये मौसी मैंने सेविका से गिलास लेते हुए पुछा सेविका के नंगे बदन को देखकर मेरा खड़ा लुंड और बहकने लगा..

मौसी- अरे चाय है इसे मैंने hi बनाकर लेन को कहा था…

चाय का नाम सुनकर मैं खुश हो गया सोकर उठो और चाय मिल जाये वाह खैर मैंने चाय की चुस्की ली तो मौसी बोली- मैं जा रही हूँ तू जल्दी से पाइक आजा

और ये कहकर मौसी जाने लगी, मेरी नजर साड़ी में हिलते हुए उनके बड़े बड़े हिलते हुए चूतड़ों पर पड़ी तो मेरे लुंड ने बगावत शुरू कर दी…

मैं सोचने लगा

क्या मस्त पिछवाड़ा है मौसी का बिना पेटीकोट के साड़ी पहनने की वजह से और साफ़ साफ़ नजर आ रहे थे… मैं सोचने लगा की नंगे कितने hi मादक होंगे मौसी के चूतड़..

वैसे अजीब था न मेरे बगल में एक नंगी औरत कड़ी थी और मैं अपनी मौसी के ढके हुए नितम्बों को देख कर आहें भर रहा था…

मैं मौसी के चूतड़ तब तक देखता रहा जब तक वो आँखों से ओझल न हो गयी मैंने बापिस नजर हटाकर देखा तो सेविका मुस्कुराते हुए नुझे hi देख रही थी, एक अजीब सी मुस्कराहट के साथ मनो कह रही हो कितना बड़ा हरामी है तू कर्मा…. उसके चेहरे से फिसलती हुई मेरी नजरें उसकी मस्त छूछीयो पर पड़ी तो मन किआ इसे छोड़ लूँ एक बार पर समय की कमी होने की वजह से खुद को रोका और चाय ख़त्म की और मैं भी प्रतियोगिता के लिए तय जगह पर पहुंच गया..

प्रतियोगिता के लिए बड़ी माँ ने तालाब के किनारे बुलाया था सरे लोग तालाब के एक तरफ बानी सीढ़ियों पर बैठे हुए थे वहीं एक बड़ी सी कुर्सी राखी थी जो मुझे पता था बड़ी माँ के लिए hi होगी…

मेरे पहुंचते hi मैं माँ और बाकि सब से मिला थोड़ी योजनाएं बनाई.. और तभी बड़ी माँ और चित्रावती भी आ गयी साथ hi उनसे पीछे पीछे कालजंग और एक औरत जो की माँ की hi उम्र की होगी वो थी और इसे शायद मैंने यहाँ आस पाद देखा भी था पर ये सेविका नहीं थी क्यिंकि उसने पूरे कपडे पहने थे, गदराया शरीर पर मोटा नहीं… सांवला रंग बड़ी बड़ी छुछियां जो ब्लाउज के बहार hi आधी नजर आ रही थी, ब्लाउज और साड़ी के बीच से झांकती नंगी गदरायी कमर बीच में गहरी गोल नाभि…

खैर बड़ी माँ अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गयी और फिर सबको अपनी और आकर्षित करते हुए बोली…

प्रतियोगिता का आखिरी पड़ाव आ चूका है ये सबसे आखिरी मुक़ाबला होगा, दोनों hi प्रतिद्वंदियों ने एक एक मुक़ाबला जीत कर एक दुसरे को कड़ी टक्कर दी है तो ये आखिरी और निर्णायक मुक़ाबला होगा…

मुक़ाबले के नियम बताने से पहले हम चाहेंगे की दोनों प्रतियोगी सामने आकर खड़े हो जाएं…

मैं और कालजंग सामने जाकर ेल दुसरे के बगल में खड़े हो गए… बड़ी माँ ने फिर बोलना शुरू किआ: इस मुक़ाबले के लिए दो दो सदस्यों की आवश्यकता और होगी दोनों hi प्रतिद्वंदियों के वो साथी होंगे..

ये सुनकर सव के चेहरु पर हैरानी के भाव आ गया आपस में खुसर पुसार शुरू हो गयी..

बड़ी माँ- पर दिलचस्प बात ये है की दोनों सदस्य स्त्री होंगी और उससे भी दिलचस्प बात एक और है.

हम सब लोग ये सुन्करर hi हैरान थे की इसमें औरतों को भी शामिल होना है तो दूसरी बात कौन सी थी जो इससे भी ज्यादा दिलचस्प थी सब लोग आपस में खुसर पुसार कर रहे थे, हम सब के hi मन में कई सवाल थे जिनका उत्तर बड़ी माँ को देना था…

बड़ी माँ- और वो दिलचस्प बात ये है, की दोनों प्रतिद्वंदी एक दुसरे की दोनों स्त्री साथियों को चुनेंगे मतलब कालजंग कर्मा की साथियों को चुनेगा और कर्मा कालजंग की…

मैं एक बार फिर सोच में पद गया की अब ये क्या मामला है मेरी साथी मैं चुनूंगा न ये कालजंग क्यों… पर इसीलिए ये शायद बुद्धि की प्रतियोगिता है…

बड़ी माँ- तो कालजंग पहले तुम चुनो कर्मा की दोनों साथियों को.

मैं चिंता में पद गया की ये साला न जाने किसे चुनकर मेरा साथी बनाएगा…

बड़ी माँ की बात सुनकर सब निगाहें कालजंग पर टिक गयी सब उसे बेसब्री से देखने लगे की कौन होगा कर्मा का साथी किसे किसे चुनेगा कालजंग…

कालजंग ने इधर उधर नजरें दौड़ना शुरू किआ और फिर अचानक से उसकी एक उंगली उठी और एक तरफ इशारा किआ मकीने उसकी ऊँगली का पीछा किआ तो मैं थोड़ा और हैरान हो गया क्यूंकि उसकी उंगली माँ की तरफ थी..

बड़ी माँ- कालजंग क्या तुम कर्मा की माँ को चुनते हो?

कालजंग ने हाँ में सर हिलाया.

बड़ी माँ- आप कर्मा के बगल में आ जाएं

बड़ी माँ ने माँ से कहा तो माँ मेरे बगल में आ कर कड़ी हो गयी, हम में से किसी को समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है या क्या होने वाला है…

माँ और मैंने भी एक दुसरे को हैरानी से देखा..

बड़ी माँ- कालजंग कर्मा की दूसरी साथी चुनो..

कालजंग की उंगली एक बार फिर उठी और इस बार मौसी पर जाकर रुकी…

माँ की तरह hi मौसी भी मेरे बगल में आकर कड़ी हो गयी…

बड़ी माँ- तो कालजंग ने तो कर्मा की साथियों का चुनाव कर लिए है अब कर्मा की बरी है कालजंग के साथियों के चुनाव की..

में- पर बड़ी माँ उसने तो मेरी माँ और मौसी को hi चुना है और मुझे प्रतियोगिता के बारे में कुछ नहीं पता तो मैं कैसे चुनूं?

बड़ी माँ- नियम यही है कर्मा साथी चुने गए बिना मुक़ाबले के बारे में नहीं बताया जा सकता…

मैंने माँ और मौसी के विचार जानने चाहे

में- माँ मौसी क्या कहते हो क्या किया जाये,

माँ- यही समझ नहीं आ रहा कुछ पता होता तो उस हिसाब से चुनते पर कुछ पता hi नहीं है..

मौसी- अभी सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं.

माँ- पर चुनना तो है hi किसी न किसी को…

मैंने दोनों की बातें सुनी और फिर कुछ सोचा और फिर इधर उधर नजरें दौड़ाई जैसे किसी को ढूंढ रहा हूँ और फिर मेरी नज़र एक जगह जाकर टिक गयी और मेरी उंगली उठी, और मेरी उंगली के सामने वही औरत थी जो कालजंग और बड़ी माँ के साथ आई थी...

बड़ी माँ- क्या तुम उन्हें चुनते हो..?

बड़ी माँ ने थोड़ी हैरानी से पुछा..

उससे ज़्यादा हैरानी कालजंग के चेहरा पर thi…ke

मैंने हाँ में सर हिलाकर जवाब दिया… तो वो औरत कालजंग के साथ आकर कड़ी हो गयी

माँ- कर्मा उसे क्यों चुना कौन है वो?

में- एक बार उसे देखो माँ और फिर कालजंग को देखो अपने आप पता चल जायेगा…

माँ और मौसी ने दोनों को देखा तो दोनों को hi समझ आ गया..

माँ- कहीं वो कालजंग की माँ तो नहीं..

में- मुझे यही लगता है माँ.

मौसी- ये सही किआ अगर पता नहीं है आगे क्या होने वाला है तो जैसे उसने चुना वैसे हमें भी चुनना चाहिए.

माँ- चल वो सब तो ठीक है पर अब अगला कौन है…

बड़ी माँ- कर्मा अगला चुनाव करो..

में- ग बड़ी माँ, मैंने ये कहकर एकमा और मौसी को देखा..

सब की निगाहें मेरे ऊपर hi थी की मैं किसे चुनूंगा मैंने कुछ सोचा और फिर अपनी उंगली उठाई और मेरी उंगली जिसकी तरफ थी उसे देखकर सब हैरान रह गए...

माँ- ये क्या कर रहा है कर्मा?

में- भरोसा रखो माँ..

मेरी उंगली और किसी की नहीं बड़ी माँ की hi तरफ थी…

में- मैं आपको चुनता हूँ बड़ी माँ..

मेरे इस निर्णय से सब हैरान परेशां थे, और सबके hi चेहरे पर हैरानी के भाव थे आपस में खुसर पुसार हो रही थी, जितने भी लोग थे वहां गाओं वाले, सेविकाएं, चित्रावती, कालजंग, उसकी माँ मेरे साथ वाले सबको मेरे निर्णय ने चौंका ज़रूर दिया था…

बड़ी माँ- क्या तुम सच में मुझे चुनते हो कर्मा…

में- ग हाँ बड़ी माँ,

बड़ी माँ- ऐसा पहली बार हुआ है की किसी मुक़ाबले के लिए मुझे भी चुना गया है पर नियम नियम हैं वो सबके लिए सामान हैं तो हमें कर्मा का फैसला स्वीकार्य है.

बड़ी माँ उठकर कड़ी हुई और अपने बगल में कड़ी चित्रावती को देखा, और बोली: क्यूंकि हम अब एक प्रतियोगी होंगे तो हमारी जगह मुक़ाबले का सञ्चालन और फैसले हमारी पुत्री चित्रावती करेगी…

और बड़ी माँ ने चित्रावती को अपनी बड़ी सी कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा और खुद कालजंग के बगल में आकर कड़ी हो गयी..

बड़ी माँ- क्यूंकि नियम चित्रावती को नहीं पता तो मैं सबके सामने नियम पेश करती हूँ..

बड़ी माँ- मुक़ाबले का नाम है, सैनिक, सवारी और लुटेरा.

खेल के नियम कुछ इस प्रकार हैं..

कर्मा और कालजंग दोनों hi एक एक बार सैनिक बनेंगे…

जब कर्मा सैनिक होगा तो उसकी सवारी उसकी माँ और मौसी होंगी और लुटेरा कालजंग होगा… और फिर इसका उल्टा..

सब खेल के बारे में सुनकर हैरान रह गए लग तो किसी बच्चों के खेल जैसा रहा था चोर पुलिस जैसा पर मुझे अंदाज़ा ज़रूर था की कुछ तो ऐसा होगा जो सबसे अलग होगा..

बड़ी माँ- तो अब आप लोग तालाब के किनारे कड़ी उस छोटी सी नाव को देख रहे हैं वो दोनों hi सैनिको का वाहन होगा, पर उस नाव की बात ये है की उसमे एक समय पर दो से ज़्यादा लोग नहीं जा सकते..

बड़ी माँ जितना समझती जा रही थी सब लोग उतने hi हैरान होते जा रहे थे…

बड़ी माँ- अब सैनिक का काम होगा की अपनी दोनों सवारियों को नाव में बिठाकर तालाब के उस पार पहुंचना… पर इस बात का ध्यान रखते हुए की नाव में एक साथ दो hi लोग जा सकते हैं और नाव सिर्फ सैनिक hi चला सकता है…

अब बरी आती है लुटेरे के काम की तो लुटेरे का काम उसके नाम की तरह hi है लूटना… पर एक शर्त पर लुटेरा तभी लूट सकता है जब सैनिक वहां ना हो…

अजीब था पर थोड़ा दिलचस्प सा खेल था, पर मुझे एक बात समझ नहीं आई तो मैंने बड़ी माँ से पुछा- पर बड़ी माँ लुटेरा लूटेगा क्या,

बड़ी माँ मेरे सवाल पर मुस्कुराई और कुवह अजीब सी प्रतिक्रिया देते हुए कहा… लुटेरा सवारी को लूटेगा.

यदि जो सवारी लूटेरे के पास रह जाएगी लुटेरा उसे लूटेगा और उसी के अनुसार उसे अंक मिलेंगे..

में- अंक कैसे अंक.

बड़ी माँ- यदि लुटेरा सवारी का एक कपडा उतरता है तो 1 अंक दूसरा उतरता है तो 2 पूरी तरह निर्वस्त्र करने पर तीन अंक…

बड़ी माँ की ये बात सुनकर तो हम सब लोग हैरान रह गए… मैं माँ मौसी अनुज जग्गू मंजू तै हम सब चौंक गए की ये कैसा खेल है जिसमे हमारे साथी को इतने लोगो के सामने नंगा होना पड़ेगा…

माँ- ये क्या बोल रही हैं आप, ये कैसा खेल है जो किसी को सबके सामने नंगा होना पड़ेगा..

मौसी- हाँ हमें ये नियम मंजूर नहीं है…

उधर से अनुज जग्गू और तै भी विरोद करने लगे..

में- मुझे भी ये नियम सही नहीं लग रहे…

बड़ी माँ – खेल के नियम सबके लिए बराबर हैं और वही रहेंगे, और अभी तो आपसब ने पूरे नियम सुने hi नहीं है..

माँ- इसके अलावा और क्या करवाओगे अब.

बड़ी माँ मुस्कुराई और बोली: इसके आगे भी ऐसे hi अंको का सिलसिला बढ़ता रहेगा…

Mausi-matlab

बड़ी माँ- सवारी को निर्वस्त्र करने के बाद यदि लुटेरा सैनिक के आने से पहले सवारी के साथ यदि तीन तीन मिनट तक अलग अलग तरह के सम्भोग करता है तो उसी के अनुसार उसे अंक मिलेंगे जैसे मुखमैथुन करने पर 2 अंक, योनि मैथुन पर 4 अंक और गुदा मैथुन पर 5. और यदि लुटेरा अपना लिंग रास सवारी के अंदर गिराने में कामयाब होता है तो अलग से 6 अंक और.. पर. ध्यान रखना है की हर मैथुन की अवधी काम से काम तीन मिनट हो तभी वो मान्य होगा..

बड़ी माँ की ये साडी बात सुनकर तो मेरी गांड से धुआँ निकल गया..

में- आपने ये सोच कैसे लिए की मैं अपनी माँ और मौसी के साथ ये सब होने दूंगा, मुझे ये कटाई मंजूर नहीं है.

अनुज और जग्गू भी उठकर हमारे बगल में खड़े हो गए… और मन करने लगे, वहीं माँ और मौसी भी काफी गुस्से में लग रही थी..

बड़ी माँ- नियम नियम होते हैं इंसान देखकर बदले नहीं जाते, और ये हमारे पूर्वजों के बनाये गए नियम हैं तो बदलने का तो हम सोच भी नहीं सकते..

माँ- बहुत hi घटिया नियम बनाये आपके पूर्वजों ने..

बड़ी माँ- बस्सस मैं अपने पूर्वजों क्र खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकती यदि तुम लोगो को मुक़ाबला करना है तो यही होगा नहीं तो तुम लोग बापिस जा सकते हो..

बड़ी माँ को इस तरह गुस्से में देख एक पल को हम सब भी घबरा गए… और शांत हो गए..

बड़ी माँ- यदि मेरे पूर्वजों ने नियम बनाये हैं तो भले के लिए hi बनाये हैं, और मैं तुम लोगो को या किसी को बुलाने नहीं जाती मुक़ाबले के लिए तुम खुद आये हो और अभी भी मुआबला करना न करना तुम्हारा ऊपर है… और इन्ही नियमों के सम्मान के लिए आज मैं भी इस मुक़ाबले में सम्मिलित हूँ अन्यथा मुझे क्या जरूरत है.. तो जो भी करो पर मेरे पूर्वजों और नियमो के बारे में कुछ गलत नहीं सुनूंगी मैं..

में- बड़ी माँ हमें माफ़ कीजिये पर हमारा वो मतलब नहीं था और न hi आपको ठेस पहुंचनर का कोई इरादा था… पर आप hi बताइएं, बेटे के सामने आप माँ को नंगी करने की बात करेंगी उसके साथ सम्भोग की बात करेंगी तो ऐसी प्रतिक्रिया संभव है…

बड़ी माँ- इस संसार का एक नियम है, बिना बलिदान के कुछ नहीं मिलता, यदि कुछ चाहिए तो उसके लिए कुछ न कुछ बलिदान देना पड़ता है, बलिदान कभी धन का होता है कभी समय का तो कभी शर्म का… ये नियम खास इसी तरह इसी लिए बनाये गए हैं ताकि जिसको सच में ज़रुरत हो जो सच में उस हद तक जा सके अपनी इच्छा के लिए उसे hi मिलें… यदि आप लोगो को मजूर नहीं तो आप मुक़ाबला छोड़ सकते हैं और अपने गाओं बापिस लौट सकते हैं.

बड़ी माँ की बात सुनकर हम सभी सोच में पद गए... मंजू तै भी उठकर हमारे पास आ चुकी थी कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या किया जाये

में- बड़ी माँ हमें फैसला करने के लिए कुछ समय चाहिए..

बड़ी माँ ने सर हिलाकर मुझे स्वीकृति दी..

मंजू तै- क्या करें अब?

Anuj-karna क्या है, चलते हैं बापिस..

जग्गू- और क्या ऐसा खेल नहीं खेलना हमें..

मौसी- मुझे भी कुछ ठीक नहीं लग रहा. हम उस राक्षस को हाथ भी नहीं लगाने दे सकते…

माँ- पर अब तक जो किआ यहाँ आना लड़ना सब बेकार हो जायेगा..

मौसी- तो हो जाने दो बेकार जीजी तुमने सुना न क्या करने को बोल रही हैं वो.. मेरी तो बुद्धि hi भ्रष्ट हो गयी थी जो अपने चक्कर में सबको यहाँ फंसा दिया…

मौसी की ये बात सुनकर खासकर एक शब्द सुनकर मेरा दिमाग घूमा… बुद्धि…

उधर ये बोलकर मौसी रोने लगी.. और सब उन्हें चुप करने लगे समझने लगे…

इधर मैं बार बार वही सोचने लगा जो बड़ी माँ ने अब तक बताया था….. कुछ तो ज़रूर होगा कर्मा सोच सोच सोच.

कुछ देर बाद बड़ी माँ की आवाज़ से मेरा ध्यान टूटा

बड़ी माँ- तो क्या फैसला लिए है आप लोगो ने?

माँ- हम लोग ये मुक़ाबला यहीं….

में- हम मुक़ाबला करेंगे..

मेरी बात सुनकर सब हैरान रह गए…

माँ- कर्मा क्या बोल रहा है तू..

मौसी- पागल हो गया है क्या कर्मा हमें नहीं करना ये मुक़ाबला इतने लोगो के बीच नंगा नहीं होना हमें..

अनुज- हाँ भैया छोडो अब.

जग्गू- कर्मा रहने दे..

में- सब को मुझ पर भरोसा है??

मंजू तै- बात भरोसे की नहीं है बचुआ.

में- बस इतनी बात बताओ माँ मौसी तुम्हे भरोसा है मुझ पर.

Maa-haan बीटा है भरोसा पर.

मौसी- तू समझ नहीं रहा बीटा.. भरोसा है पर कुछ गलत हो गस्या तो.

में- भरोसा है तो मेरा साथ दो मैं किसी को कुछ नहीं होने दूंगा.

सब परेशां थे पर मेरी बात मान गए…

में- हम आगे मुक़ाबला करेंगे बड़ी माँ.

ये बात सुनकर मैंने कालजंग को देखा तो उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट थी मनो मुझे धमकी दे रहा हो की आगे आगे देख क्या होता है…

बड़ी माँ- बहुत अचे तो अब जब दोनों पक्ष तैयार हैं और सरे नियम सबको पता हैं तो जल्दी hi मुक़ाबला शुरू किआ जायेगा… पहले सैनिक कौन बनेगा इसका फैसला सिक्का उछाल कर किआ जायेगा…

एक सिक्का बड़ी माँ ने हम सब को दिखाया जिसमे एक तरफ फूल बना था तो दूसरी तरफ बकरी .

बड़ी माँ यदि बकरी आई तो कालजंग पहले जायेगा.. और यदि फूल आया तो कर्मा..

बड़ी माँ ने सिक्का मुझे दिया और मैंने वो हवा में उछाल दिया…

इसके आगे क्या हुआ और क्या करेगा कर्मा अपनी माँ और मौसी को उस कालजंग से बचने के किये जल्दी hi जानिये अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्

 
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