Incest मुझे प्यार करो,,, - Page 21 - SexBaba
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Incest मुझे प्यार करो,,,

धीरे-धीरे सबका अपडेट आता रहेगा
 
अपने बेटे के द्वारा ले गए मोटे तगड़े और लंबे केले से रात को अपनी जवानी की प्यास बूझाकर सुगंधा उस केले को वहीं टेबल पर रखकर गहरी नींद में सो गई

गई ,,, रात का अनुभव बेहद उत्तेजनात्मक था सुगंधा अपने बेटे के द्वारा ले गए मोटे तगड़े केले को अपने बेटे का लंड समझकर उसे अपनी गुलाबी छेद में डालकर अपनी जवानी की प्यास बुझा ली थी लेकिन यह प्यास चाय किला कितना भी मोटा और लंबा क्यों ना हो पहले से बिल्कुल भी नहीं पूछने वाली हां कुछ पल के लिए यह गर्मी शांत जरूर हो जाती है लेकिन यह जो जवान की गर्मी है यह जो जवान की प्यास है वह केवल एक मर्द के मोटे तगड़े लंड से ही बुझती है,,,।



सुबह जब नींद खुली तो उसे उठने में 15 मिनट की देरी हो चुकी थी दीवार पर टंगी घड़ी में समय देखते ही वह तुरंत उठकर बैठ गई और बिस्तर से खड़ी हो गई,,, वह अभी भी हल्की-हल्की नींद में थी पूरी तरह से नींद से बाहर नहीं आई थी और वह चलकर दरवाजे तक पहुंच गई और दरवाजे की कड़ी पकड़ कर उसे खोलने वाली थी कि तभी उसे अपने दोनों टांगों के बीच बुर के ऊपर खुजली महसूस होने लगी और वह तुरंत अपना हाथ अपनी बुर पर ले गई और उसे खुजाने लगी,,, और उसे तुरंत एहसास हुआ कि उसने तो कुछ पहनी नहीं है और तुरंत वह एकदम से नींद से बाहर आगे और अपने आप को ऊपर से नीचे की तरफ देखने लगी तो उसे इस बात का एहसास हुआ कि वह संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में थी,,,, उसके बदन पर कपड़े का रेसा तक नहीं था,, तभी उसे याद आया कि रात को वह अपने सारे कपड़े उतार कर केले को अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी शांत की थी और बिना कपड़े पहने ही सो गई थी,,, ।



अपनी स्थिति का अहसास होते ही तुरंत कड़ी पर से अपने हाथ को हटा ली,,, और सहज रूप से उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी,, लेकिन इस बात से वह काफी घबरा गई थी कि अगर एन मौके पर बुर पर खुजली ना आई होती तो वह कमरा का दरवाजा खोलकर नंगी ही कमरे से बाहर निकल गई होती और अगर ऐसे में तृप्ति देख लेती तो क्या होता,,, बाप रे वह मेरे बारे में क्या सोचती,,,, अपने मन में सुगंधा इस बारे में सोच रही थी लेकिन उसे अपने बेटे के द्वारा देखे जाने पर बिल्कुल भी अफसोस ना होता बल्कि वह अंदर ही अंदर बहुत खुश होती है अपने बेटे को अपनी नंगी जवानी दिखाकर और वह भी सुबह-सुबह,,, अपने मन में यह सब सोच कर वह तुरंत बिस्तर के करीब आई और अपने कपड़ों को जोकि नीचे फर्श पर फेक हुए थे उन्हें उठाकर पहनने लगी और थोड़ी ही देर में अपने कमरे से निकल कर बाहर आ गई,,,।



दूसरी तरफ अपनी मां के कमरे में जाने का अंकित को उसे दिन के बाद कभी मौका नहीं मिला था क्योंकि जब वह उड़ जाता था तब उसकी मां उससे पहले ही उठकर घर का काम करती रहती थी या अंदर से कमरा बंद रहता था,,, क्योंकि अपनी मां को अस्त-व्यस्त हालत में देखने की उसकी इच्छा बेहद प्रबल हो गई थी पहली बार जब अपनी मां को अस्त-व्यस्त हालत में देखा था तो उसकी कचोरी जैसी फुली हुई बुर को स्पर्श करने की अपनी इच्छा को दबा नहीं पाया था और अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए अपनी मां की बुर पर हल्के से अपनी उंगली रख दिया था जो कि इतनी मात्रा से ही उसकी हालत पूरी तरह से खराब हो गई थी,,, उसे अनुभव के बारे में जब भी कभी अंकित सोचता था तो उसका लंड पूरी तरह से टनटना कर खड़ा हो जाता था ,,,।



सुगंधा कमरे से बाहर आते ही झाड़ू लेकर घर की सफाई करना शुरू कर दी थी और अंकित भी उठ गया था,,, तृप्ति भी गहरी नींद से जाग चुकी थी लेकिन जागते ही वह संदीप के बारे में सोचने लगी संदीप के दिए प्रेम पत्र के बारे में सोचने लगी और संदीप के साथ बगीचे में जो कुछ हुआ था उन सब के बारे में सोचने लगी,,, जिंदगी का पहला चुंबन बेहद रसीला और उन्माद भरा था,,, वह उसी चुंबन के बारे में सोच रही थी,,, और उसे चुंबन के बारे में सोचकर उत्तेजित हो रही थी पहली मर्तबा संदीप किस तरह की हरकत पर वह पूरी तरह से बिगड़ गई थी और संदीप से नाराज हो गई थी,,,, क्योंकि वह कभी सोची नहीं थी कि संदीप इस तरह से कोई हरकत करेगा और वह भी सड़क पर,,,,।



लेकिन कल जो कुछ भी हुआ था उसमें उसकी खुद की सहमति थी,,, से संदीप की तरफ ऐसे ही किसी हरकत की उम्मीद थी,,, संदीप ने अपनी हरकत की वजह से उसके बदन में हलचल मचा दिया था क्योंकि होठों का रस पीते हुए उसके हाथ उसने अपनी चूचियों पर महसूस कि थी,,, लेकिन उसे रोकने के बजाय उसकी हरकतों का वह खुद आनंद लेने लगी थी पहली मर्तबा उसे अच्छा तो लगा था लेकिन संदीप की हरकत से वह पूरी तरह से क्रोधित हो चुकी थी इसलिए उसे समय मिलने वाला मजा भी उसे जहर लग रहा था,,, लेकिन कल की बात कुछ और थी होठों के साथ-साथ संदीप के द्वारा स्तन मर्दन होते ही वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी और पिघलने लगी थी उसे अपनी दोनों टांगों के बीच थरथराहट से महसूस होने लगी थी,,, और संदीप उसे अपनी हरकत से पूरी तरह से मत किए हुए था।



लेकिन बगीचे में संदीप की हरकत कुछ और ज्यादा आगे बढ़ती इससे पहले ही कुछ अवारा लड़के वहां आ गए थे और वह दोनों उठकर वहां से जाने लगे थे लेकिन तभी उन्हें लड़कों में से एक ने जो बात कहा था वह अभी भी तृप्ति के दिलों दिमाग पर छप सा गया था,,, चुदवाने आई थी क्या,,,? उस लड़के के द्वारा कहे गए इस शब्द को सुनते ही उसके बदन में हलचल सी मचने लगी थी वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी,,, वह अपने मन में सोचने लगी की लड़की कितने बेशर्म होते हैं कुछ भी कह देते हैं ,, लेकिन फिर वह अपने मन में सोचने लगी कि अगर वाकई में उसे लड़के की कही बात सच होती तो कैसा होता,,, अगर वह सच में बगीचे के अंदर संदीप से चुदवाने गई होती तो कैसा महसूस करती,,,।



इस बारे में सोचते हैं उसके बदन में गनगनाहट होने लगी,,, पल भर में वह कल्पना करने लगी,,, कि अगर वह सच में चुदवाने ही गई होती तो क्या होता कैसे होता,,,, वह अपने मन में कल्पना कर रही थी कि वह संदीप को लेकर बगीचे के सबसे कोने वाली जगह पर जाती जहां पर ढेर सारी जंगली झाड़ियां होगी हुई थी जहां पर लोगों का आना-जाना बिलकुल नहीं होता था,,, संदीप के साथ वह उसे जगह पर पहुंचती तो वहां पर पहुंचते ही दोनों एक दूसरे को चुंबन करने लगते हैं एक दूसरे के होठों को अपने मुंह में लेकर उसका रस चूसने लगते हैं और इसी बीच संदीप के हाथ उसकी चूचियों पर आ जाते कुर्ती के ऊपर से ही वह जोर-जोर से उसकी चुचियों को दबाता,,,जिसका आनंद लेते हुए वह मदहोश हो जाती पागल हो जाती और पागलों की तरह उसके होठों को चुस्ती,,,,।



कुर्सी बीच संदीप का हाथ उसकी चूचियों से नीचे की तरफ आते हुए उसकी कमर पर आ जाता है और वह दोनों हाथों से उसकी कमर को कस के दबोच देता जिससे उसके बदन में सनसनी से दौड़ने लगती और फिर सलवार के ऊपर से ही संदीप उसकी बुर को जोर-जोर से मसलना शुरू कर देता ,, और संदीप की हरकत पर वह पूरी तरह से मस्त हो जाती मदहोश हो जाती एकदम चुदवासी हो जाती,,,और चुदासपन के चलते उसके खुद के हाथ अपने आप ही संदीप के लंड पर चला जाता, और वह पेंट के ऊपर से ही उसके लंड को जोर जोर से दबा दी उसे खेलती और फिर ना तो संदीप बर्दाश्त कर पाता और ना ही वह खुद इसके बाद संदीप उसे पेड़ की तरफ घूमर पेड़ पकड़ने के लिए बोलना और फिर अपने हाथों से उसकी सलवार की डोरी खोलकर उसकी सलवार को पेटी सहित खींचकर उसके घुटनों तक ले आता और फिर उसकी नंगी गांड को दोनों हाथों से पकड़ कर सहलाता,,,, और उसके इस क्रियाकलाप को वह खुद नजर पीछे की तरफ घूम कर देखती,,,।



और फिर दिन दुनिया से बेखबर वह अपनी गांड को थोड़ा बाहर निकाल कर संदीप के आगे परोस देती और संदीप अपने लंड को हाथ में लेकर धीरे-धीरे उसको गुलाबी छेंद में अपना लंड डालता और फिर उसे चोदना शुरू कर देता,,, यह सब सोचते हुए कल्पना करते हुए वास्तव में तृप्ति की सांस ऊपर नीचे हो रही थी वह पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी,,, सच में आंखों को बंद करके हुआ ऐसा ही महसूस कर रही थी कि वह इस समय बगीचे में है और अपनी सलवार को घुटनों तक नीचे करके अपनी नंगी गांड संदीप के सामने परोस कर उससे चुदाई का मजा लूट रही है लेकिन तभी एकदम से वह चौंक गई जब दरवाजे पर दस्तक होने लगी,,,।



तृप्ति,,,, अरे अभी तक सो रही है देर नहीं हो रही है कॉलेज जाना है,,,,।

(इतना सुनते ही उसके होश उड़ गए दीवार पर टंगे जब घड़ी में दिखी तो वह 10 मिनट लेट हो चुकी थी कल्पना करने में 10 मिनट गुजर चुके थे लेकिन 10 मिनट में वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी,, )

आई मम्मी,,,,,(इतना कहने के साथ ही वह जल्दी से बिस्तर से उठकर खड़ी हो गई और अपने कमरे से बाहर निकाल कर जल्दी-जल्दी तैयार होने लगी,,,, सुगंधा नाश्ता तैयार कर दी थी और तृप्ति जल्दी-जल्दी नाश्ता करके घर से निकल गई थी क्योंकि अब उसे संदीप से मिलने की उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी थी,,,, लेकिन अंकित अभी भी घर में ही था क्योंकि उसके मोजे नहीं मिल रहे थे वह जूते को टेबल के नीचे रखकर अपने कमरे में मौजा ढूंढ रहा था,,, लेकिन जब उसे बहुत कोशिश करने के बावजूद भी नहीं मिला तो वह रसोई घर में गया और अपनी मां से बोला,,,।





मम्मी मेरे मोजे कहां रख दी हो मिल नहीं रहा है,,,

अरे वही तो रखी थी तेरे कमरे में,,,,(कढ़ाई में चमची चलाते हुए बोली,,)

मैंने अपना पूरा कमरा ढूंढ मारा हूं लेकिन कहीं मिल नहीं रहा है,,,, जल्दी बताओ मुझे देर हो रही है,,,,।

अरे कहां रख दी मुझे खुद याद नहीं आ रहा है,,,, अरे हां याद आया मेरे कमरे में टेबल के ऊपर ही रखा हुआ है कल रात को ही अपने कमरे में लेकर चली गई थी,,,।

शुक्र है तुम्हें याद तो आया,,,,(और इतना कहने के साथ ही अंकित अपनी मां के कमरे में चला गया और टेबल पर देखा तो वाकई में उसके मोजे रखे हुए थे,,,,)



यह रखा हुआ है और मैं ईसे कब से अपने कमरे में ढूंढ रहा हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही अंकित टेबल की तरफ आगे पड़ा और अपने मोजे को उठा लिया लेकिन तभी उसकी नजर टेबल पर रखे हुए मोटे तगड़े किले पर गई और केले को देखते ही उसकी आंखों के सामने उसकी मां की कचोरी जैसी फुली हुई बुर नजर आने लगी जिसे वह अपनी उंगली से छूटकर उसकी गर्मी को महसूस कर चुका था उसने तुरंत टेबल पर पड़ा कीड़ा उठा लिया और उसे गोल-गोल घुमा कर देखने लगा और कुछ देर के लिए हुआ उसे अपनी मुट्ठी में भर लिया और अपनी उंगलियों का छल्ला बना हुआ देखने लगा जिसमें से उसका केलआ गुजर रहा था और वह अपनी मन में सोचने लगा कि अगर इतना मोटा लंड मम्मी की बुर में जाएगा तो क्या होगा,,, अपने मन में ऐसा कहते हुए वह तुरंत अपने दोनों टांगों के पीछे देखने लगा जहां पर थोड़ा-थोड़ा उठाव हो रहा था और वह अपने मन में सोचने लगा,,,, उसका तो अकेले से भी ज्यादा मोटा और लंबा है जब उसका लंड उसकी मां की बुर में जाएगा तब क्या होगा,,, अनायास ही उसके मन में एक ख्याल आया था और इस ख्याल से वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था,,,, तभी उसे केले पर कुछ चिपचिपा सा लगा हुआ महसूस होने लगा,,, लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या लगा है और वह तुरंत केले को छिलना शुरू कर दिया,,,।

सुगंधा की नशीली जवानी



दूसरी तरफ,,, सुगंधा अपने मन में सोचने लगी कि पता नहीं अंकित को मिला होगा कि नहीं और वह रसोई घर से निकल कर अपने कमरे की तरफ जाने लगी और जैसे ही दरवाजे पर पहुंची तो अपने बेटे को केला खाता हुआ देखकर उसके एकदम से होश उड गए,,,, पल भर में उसे सब कुछ याद आने लगा रात को जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोच कर उसके होश उड़ गए थे क्योंकि वह अकेले को अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करके केले को उसी स्थिति में टेबल पर रख दी थी और इस समय उसका बेटा उस केले को खा रहा था,,, पल भर में ही सुगंधा के माथे पर पसीने की बूंदे उपसने लगी,,, उसे यह सोचकर बेहद अजीब लग रहा था कि जिस केले को उसने अपनी बुर में डाली थी उसी केले को उसका बेटा खा रहा था,,,।



वह एकदम से कमरे में दाखिल होते हुए बोली,,,।

यह क्या कर रहा है अंकित इस केले को मैं अपने लिए रखी थी,,,।

अरे मम्मी दूसरा केला है खा लेना ना,,

नहीं मुझे यही खाना था तभी तो मैं टेबल पर लाकर रखी थी,,,

लगता है केले की मोटाई और लंबाई देखकर रखी थी,,,,(इस बार अंकित अपनी मां को नीचे से ऊपर की तरफ देखते हुए बोला था सुगंध तुरंत अपने बेटे के खाने के मतलब को समझ गई थी और अंदर ही अंदर अपने बेटे की बात सुनकर सिहर सी गई थी,,, और वह बोली)



नहीं मुझे इसी तरह का केला पसंद है इसीलिए तो लेकर आई थी,,,।

अरे मम्मी मेरे पास ऐसा ही केला है,,, मेरा मतलब है कि जब कहो गई तब खरीद कर ला दूंगा,,,(अचानक ही अंकित के मुंह से अपने मन की बात निकल गई थी जिसे सुनकर सुगंधा के तन बदन में आग लग गई थी और वह अपने मन में बोली तेरा ही केला तो मैं चाहती हूं नहीं तो इस्केले से इस जवानी की प्यास कहां बुझने वाली है,,, और अंकित पूरा केला खा लेने के बाद बोला,,,)

शाम को दूसरा खरीद कर ला दूंगा इससे भी ज्यादा लंबा और मोटा एक में ही खुश हो जाओगी,,,(अंकित अपनी मां से दूसरे शब्दों में बात कर रहा था और उसकी मां उसकी कहीं बात को समझ भी रही थी,,,, अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)



लेकिन मम्मी केला एकदम चिपचिपा था,,,।

(अपने बेटे की इस बात से सुगंधा एकदम से चौक गई और उसे याद आया कि केले को वह इस हालत में टेबल पर रख दी थी जिस हालत में उसने अपनी बुर से बाहर निकाली थी उसे पर उसकी बुर का मदन रस लगा हुआ था या यू। कह लों की पूरा केला उसके मदन रस में डूबा हुआ था,,,, सुगंधा ज्यादा कुछ कह नहीं पाई बस इतना ही बोली,,,।)

धोकर खाना चाहिए था ना पता नहीं कहां-कहां से निकल कर आता है,,,।

कोई बात नहीं मुझे तो ऐसा ही बहुत स्वादिष्ट लग रहा था,,,,।

(इतना कहकर अंकित अपनी मां के कमरे से बाहर निकल गया और तैयार होकर स्कूल के लिए निकल गया सुगंध उसे देखते ही रह गई वह हमारे शर्म के पानी पानी हो रही थी क्योंकि उसके बेटे ने उसकी बुर से निकला हुआ केला पूरी तरह से गटक लिया था,,,।)
 
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