घर में रोमांच कारी भिड़ंत के बाद मां बेटे दोनों मार्केट के लिए निकल चुके थे,,, वैसे तो अक्सर सुगंधा मार्केट जाने के लिए ऑटो करती थी लेकिन आज वह अपनी बेटी के साथ पैदल ही जाना चाहती थी वह देखना चाहती थी कि उसका बेटा चलते समय उसके मचलते अंगो की तरफ देखता है या नहीं और वैसे भी,,, सुगंधा खुद अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करने में कोई कसर बाकी रखना नहीं चाहती थी,,, कुछ देर पहले कमरे में जो कुछ हुआ था वह बेहद अद्भुत था,,, पहली मर्तबा हिम्मत करके सुगंधा अपने बेटे को अपने ब्लाउज की डोरी बंद करने के लिए पूरी और वैसे भी बरसों बाद वह डोरी वाला ब्लाउज पहन रही थी क्योंकि वह जानती थी की डोरी वाला ब्लाउज में उसकी चिकनी गोरी पीठ कुछ ज्यादा ही दिखाई देती थी और डोरी को कस के बांधने की वजह से चुचियों का आकार कश्मीरी सेब से खरबूजा बन जाता है,,,।
वैसे उसे पक्का यकीन तो नहीं था कि उसके कहने पर उसका बेटा उसके ब्लाउज की डोरी बांधने के लिए कमरे में आ जाएगा लेकिन जिस तरह के हालात दोनों के बीच पैदा हो रहे थे उसे देखते हुए सुगंधा को अपनी चाल पर पूरा भरोसा था क्योंकि वह अपने बेटे में आए बदलाव को अच्छी तरह से समझ रही थी उसके नजरीए को समझ रही थी,,, और इसीलिए उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी सुगंधा को पूरा विश्वास था कि जवान हो चुका उसका बेटा एक औरत के ब्लाउज की डोरी को बढ़ने के लिए जरूर ललाईत होगा और ऐसा ही हुआ,,,, लेकिन जो कुछ भी हुआ उम्मीद से ज्यादा हुआ सुगंध तो सिर्फ अपने बेटे से अपने ब्लाउज की डोरी बंधवाना चाहती थी लेकिन जिस तरह से उसके खुद के पर डगमगाए थे और वह अपने आप को समान नहीं पाई थी उसे संभालने के लिए उसका बेटा उसे हाथ बढ़ाकर जिस तरह से उसे अपनी बाहों में भरा था और नरम-नरम बिस्तर पर गिरा था ऐसी हालत में उसे अपनी गांड के बीचो-बीच अपने बेटे का मर्दाना खुंटा गजब का चुभता हुआ महसूस हो रहा था जो कि सीधे उसकी बुर पर दस्तक दे रहा था वह मंजर वह पल सुगंधा के जीवन का अद्भुत फल था बरसों बाद किसी मोटे तगड़े लंड को अपनी गांड के बीचों बीच महसूस कर रही थी उसकी गर्मी को अपनी बुर के अंदरूनी भाग में महसूस कर रही थी जिसकी वजह से उसकी बुर पसीज रही थी,,, सुगंधा कमरे में ही चारों खाने चित हो चुकी थी अगर उसका बेटा जरा भी होशियार होता तो कमरे में ही उसकी बुर का उद्घाटन कर देता,,,, और जिसमें सुगंध को जरा भी एतराज नहीं होता,,,,।
धीरे-धीरे इस खेल में सुगंधा को बहुत मजा आ रहा था,,, तालाब के पानी की तरह शांत हो चुकी जिंदगी को मानो जैसे नदी में प्रवेश करने का मौका मिल गया हो और वह नदी की तरह उछलती कूदती बांहें फैलाए आगे बढ़ती चली जा रही थी,,, यही तो चाहिए था सुगंधा को यही सुख था जिसे वह ढूंढ रही थी,,, यह वही सुगंधा थी जो अपने अरमानों को पर लगाकर आसमान में उड़ जाना चाहती थी लेकिन पति के देहांत के बाद ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके पर कट गए हो,,, लेकिन अब ऐसा लग रहा था कि अंकित की वजह से उसे नए पर उग आए हो,,,,।
मार्केट जाते समय सड़क के फुटपाथ पर सुगंधा आगे आगे चल रही थी और तकरीबन 2 मीटर पीछे अंकित चल रहा था,,, जब इस तरह की माहौल घर में नहीं थे मां बेटे के बीच इस तरह का आकर्षण नहीं था तो अक्सर अंकित अपनी मां के बराबर चलता था और खुद सुगंधा ही उसे अपने बराबर लेकर चलती थी,,, लेकिन दोनों की नजरिए में बदलाव आ चुका था,, दोनों का एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था दोनों रिश्तो में मां बेटे सिर्फ दूसरों के लिए रह गए थे दोनों के रिश्ते बदल चुके थे,,एक मर्द बन चुका था और दूसरी औरत बन चुकी थी,,, दोनों एक दूसरे में प्रेमी प्रेमिका ढूंढ रहे थे जो कि पति-पत्नी की तरह एक दूसरे के शरीर से सुख प्राप्त करना चाहते थे अपनी जवानी की गर्मी को बुझाना चाहते थे और ऐसे हालात में दोनों के पास दोनों के सिवा और कोई दूसरा चारा भी नहीं था,,, दोनों के मन में अंदर ही अंदर सब कुछ परिपूर्ण हो चुका था बस देर थी आगे बढ़ने की मर्द और औरत के बीच के रिश्ते को आगे बढ़ाने की,,, दोनों बढ़ाना भी चाहते थे लेकिन कैसे यह दोनों को नहीं मालूम था लेकिन दोनों अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे थे ज्यादातर कोशिश सुगंधा की तरफ से ही हो रही थी तभी तो वह अपने बेटे को राहुल के पास भेजी थी ताकि राहुल से कुछ सीख पाता और उसका यह नुस्खा कुछ हद तक काम करने लगा था,,,
प्राकृतिक तौर पर अपनी मां के पीछे चलते हुए अंकित की नजर बार-बार अपनी मां की गांड की तरफ ही जा रही थी जो की चलते समय अद्भुत तरीके से लहरा रही थी और वैसे भी उसकी मां ने कुछ ज्यादा ही करके साड़ी बांधी हुई थी जिसकी वजह से गांड की दोनों फांकें बड़े-बड़े तरबूज की तरह बाहर निकली हुई नजर आ रही थी,,, अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड देखकर अंकित के लंड में हरकत होने लगती थी,,। वह अपने मन में सोचने लगता था कि काश इतनी बड़ी-बड़ी गांड उसके हाथों में होती तो कितना मजा आता,,, वह बड़ी-बड़ी गांड से बहुत प्यार करता है अपनी जीभ से चाटता चुंबन लेता उस पर अपना लंड रगड़ता,,, हर वह चीज करता जो एक मर्द औरत के अंगों से करता है उसकी गांड के साथ करता है,,,, सड़क पर चलते समय आते जाते अंकित ने बहुत सी औरतों को देखा था कपड़ों में उनके अंगों को देखा था लेकिन जिस तरह का उपहार उसे अपनी मम्मी की गांड में नजर आती थी उसे तरह का उभार उसने अभी तक किसी औरत में नहीं देखा था कुछ हद तक उसे नूपुर में अपनी मां का अक्स नजर आता था,,, क्योंकि उसकी भी कद काठी उसकी मां की ही तरह थी,,, लेकिन फिर भी नूपुर उसकी मां से उन्नीस ही थी,,,।
अपनी मां के भरावद्दार नितंबों को देखते-देखते उसकी नजर अपनी मां की चिकनी पीठ पर गई और उसकी डोरी पर गई जिसे वह खुद अपने हाथों से बांधा था,, उसे अब एहसास हो रहा था इस ब्लाउज में उसकी मां की चोरी की एकदम साफ नंगी नजर आ रही थी क्योंकि डोरी वाले ब्लाउज में पीछे से ज्यादा कपड़ा नहीं था केवल पतली सी डोरी थी और उसे ब्रा की पट्टी भी साफ नजर आ रही थी ,, जिसे ब्लाउज के डोरी के नीचे छुपाने के चक्कर में ही,,, वह दोनों बिस्तर पर गिर गए थे,,, अंकित को वह पल पूरी तरह से किसी मूवी के दृश्य की तरह याद था उसे अच्छे से याद था कि उसके ऊपर उसकी मां पूरी तरह से लदी हुई थी,,, इसकी भारी भरकम गांड ठीक उसकी दोनों टांगों के बीच आ चुकी थी,,, अद्भुत अवस्था थी एक तरह का यह आसान ही था जिसमें औरत अपनी गांड रखकर मर्द के लंड पर बैठ जाती और नीचे से मर्द का लंड उसकी बुर की गहराई नापने लगता है,,, अंकित इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि किस तरह से उसकी मां उसके ऊपर थी उन दोनों की अवस्था में केवल कपड़े ही बड़ा रूप थे अगर दोनों के बदन पर कपड़े ना होते तो उसे समय उसका लंड उसकी मां की बुर में होता ,,,, और उसे तो इस बात का अहसास तक हुआ था कि उसका लंड उसकी मां की गांड के बीचों बीच धंसा हुआ है,,,,।
इस अवस्था की वजह से पल भर में ही पूरे बदन का लहू अंकित की जननांगों में इकट्ठा हो गया,,, और उसकी सांसे ऊपर नीचे हो गई उसे तब जाकर एहसास हुआ कि वाकई में औरतों की जंननांगो और उनके नितंबों के उभार में कितनी गर्मी होती है क्योंकि अंकित पसीने से तरबतर हो चुका था। , और वही गर्मी का एहसास अंकित को इस समय हो रहा था अपनी मां के पीछे चलते-चलते सुगंधा बार-बार चलते हुए पीछे मुड़कर देख ले रही थी अपने बेटे की तरफ की उसका बेटा क्या देख रहा है और उसे इस बात का अहसास होते ही की उसका बेटा उसके नितंबों की तरफ ही देख रहा है इस एहसास से वह अंदर ही अंदर सिहर जाती थी,,,।
अभी मार्केट थोड़ी दूरी पर था फुटपाथ की दूसरी तरफ जंगल झाड़ी था और काफी दूर तक ढलान था जिसके अंदर जंगली झाड़ियां उगी हुई थी,,, वहीं पर पेड़ के पास एक आदमी खड़े होकर पेशाब कर रहा था और वह आदमी सुगंधा की नजर में चढ़ गया सुगंधा की नजर अनजाने में ही उसकी तरफ चली गई थी और सुगंधा उसे आदमी को पेशाब करते हुए देखने लगी हालांकि वह सहज रूप से चलते हुए ही अपनी नजर को उस तरफ की हुई थी और यह भी वह जानबूझकर ही कर रही थी वह अपने बेटे को दिखाना चाहती थी कि वह मर्दों को पेशाब करते हुए देखने में कितनी उत्तेजना का अनुभव करती है,,,, अंकित को उसे आदमी पर बहुत गुस्सा आ रहा था जो इस तरह से सड़क के किनारे खड़ा होकर पेशाब कर रहा था,,, हालांकि वह जिस तरह से खड़ा था उसका लंड नजर नहीं आ रहा था बल्कि छिपा हुआ था और उसकी इतनी लंबाई भी नहीं थी कि इस अवस्था में दूर से भी दिखाई दे इस बात की खुशी अंकित को जरूर थी क्योंकि अब वह नहीं चाहता था कि उसकी मां किसी दूसरे की तरफ देखें और देखते ही देखते दोनों आगे निकल गए,,,,।
वैसे तो हमेशा ही जब दोनों मां बेटे मार्केट की तरफ जाते थे तो आपस में बातें करते हुए जाते थे लेकिन इस समय दोनों के मन में कुछ और था अंकित अपनी मां को चलते हुए देख रहा था उसके नितंबों के कटाव को देख रहा था उसके उभार को देख रहा था उसकी पतली कमर के बीच की पत्नी लकीर को देख रहा था उसके ब्लाउज की कटिंग के साथ-साथ उसकी उघरी हुई पीठ को देख रहा था,,, और सुगंधा अपने आप को अपने बेटे को दिखाने में व्यस्त थी इसलिए दोनों के बीच किसी भी प्रकार की वार्तालाप नहीं हो रही थी लेकिन दोनों के बीच की खामोशी भी बहुत कुछ कह रही थी,,,,,।
मां बेट दोनों अपनी ही धुन में मार्केट की तरफ आगे बढ़ते चले जा रहे थे सड़क पर वाहनों का आवागमन चालू ही था और आते जाते सबकी नजर उसकी मां पर जरूर पड़ रही थी और इस बात का भी भान अंकित को अच्छी तरह से था लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था,,,, ऐसे ही ठीक उसके पीछे कब दो आदमी उससे थोड़ा फीट की दूरी पर चलने लगे उसे पता ही नहीं चला वह अपनी मां की चाल ढाल को देखने में ही व्यस्त था,,, तभी उसके कानों में जो बात सुनाई थी उसे सुनकर उसके होश उड़ गए जो कि उसके साथ चल रहे हैं दोनों आदमियों में से एक ने बोला था,,,।
बाप रे देख रहा है क्या औरत है इसका बदन कितना गदराया हुआ है,,,(इतना सुनते ही अंकित इधर-उधर देखने लगा लेकिन आगे चल रही है अपनी मां के सिवा और कोई औरत आसपास नहीं थी इसलिए वह समझ गया कि यह आदमी उसकी मां के बारे में ही बोल रहा हूं हालांकि उसे गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन राह चलते किसी भी व्यक्ति से इस तरह से उलझ जाना उचित नहीं था,,,, तभी दूसरे आदमी की आवाज उसके कानों में पड़ी,,,)
यार कसम से इतनी गोरी औरत तो मैं आज तक नहीं देखा ऊपर से नीचे तक मलाई है जब ऊपर से इसका वजन इतना गोरा है तो इसकी बुर कितनी गोरी होगी ,,
अरे यार औरतों की बुर गोरी नहीं काली होती है,,(दूसरे आदमी ने बोला)
अरे वह तो दूसरी औरतों की होती होगी लेकिन मक्खन मलाई जैसी औरत की बुरे तो एकदम गोरी होती होगी कम से इसकी बर देखने के लिए तो मेरा मन तड़प रहा है साली का गांड का छेद भी कितना मस्त होगा,,,।
हां यार तू सच कह रहा है देख नहीं रहा है कैसा गांड मटका के चल रही है इसकी गांड देखकर तो ऐसा ही लगता होगा कि 5-10 मिनट में इसका कुछ पता नहीं होगा कम से कम एक घंटा तक जमकर चुदाई होती होगी तब जाकर इसकी प्यास बुझती होगी,,,।
(उन दोनों आदमियों की बातें सुनकर तो अंकित के काम के साथ-साथ उसका लंड भी खड़ा हो गया था वह दोनों उसकी मां के बारे में बातें कर रहे थे उसकी जवानी के बारे में बात कर रहे थे उसके खूबसूरत जिस्म के बारे में बात कर रहे थे और दोनों अपनी अपनी राय दे रहे थे हालांकि शुरू में अंकित को बहुत गुस्सा आया लेकिन एक तरह से वह दोनों उसकी मां की जवानी की तारीफ कर रहे थे इसलिए ना जाने की उसे अपनी मां के बारे में इस तरह की अश्लील बातें सुनने में आनंद आने लगा,,,, तभी दूसरा वाला आदमी बोला)
कसम से इसको देखते ही मेरा लंड खड़ा हो गया अभी तो किस्मत ही बेकार है हमारे घर ऐसी औरत होती तो,,, घर छोड़कर कहीं जाने का मन ही नहीं करता,,,
मैं तो दिन रात उसकी बुर में लंड डालकर पड़ा रहता,,,
जो भी इसकी लेट होगा वह दुनिया का सबसे खुशकिस्मत वाला आदमी होगा जिसे यह देती होगी अपनी टांगें खोलकर अपनी बड़ी-बड़ी चूची पिलाती होगी,,,,।
अरे यार ऐसी बातें मत करनी तो मेरा यही पानी छूट जाएगा,,,
मेरा भी तो यही हाल है अब घर पर जाकर बीवी की चुदाई करनी पड़ेगी जो कि इसके पैर की धूल के बराबर भी नहीं है,,,
सही कह रहा है तू तू तो खर्च कर अपनी बीवी को छोड़ने का लेकिन मुझे तो हाथ से हिला कर ही काम चलाना पड़ेगा,,,
क्यों क्याहुआ,,, भाभी देती नहीं है क्या?
अरे ऐसी बात नहीं है वह अपने मायके गई हुई है अपने भैया से गांड मरवाने इतना बोला कि मत जा मेरा मन तेरे बिना नहीं मानता लेकिन मानी नहीं और अपने भाई से गांड मरवाने चली गई,,
वह सब छोड़ अगर यह औरत साड़ी उठाकर सिर्फ अपनी बुर दिखा दे तो भी मैं हजार रुपया देने को तैयार हूं,,,।
तू तो हजार रुपया देने को तैयार है मैं तो महीने भर की तनख्वाह देने को तैयार हूं बस यह साड़ी उठाकर अपनी बुर के दर्शन कर दे क्योंकि मैं देखना चाहता हूं कि इस तरह की हाई क्लास औरत की बुर कैसी दिखती है,,,
सही कह रहा है तू अपनी जिंदगी में तो बस गांव की वही गवार औरत ही लिखी है ऐसी पढ़ी-लिखी अंग्रेज टाइप की औरत के बारे में सिर्फ सोच सोच करें पानी निकालना ही किस्मत है,,,।
(वह दोनों की बातें सुनकर अंकित के तन बदन में उत्तेजना के लहर उठ रही थी उसका पूरा बदन से लग रहा था उसे समझ में आ गया था कि उसकी मां की जवानी देखकर सब लोग यही सोचते हैं रहते हैं लेकिन वह हैरान था कि वह दोनों उसके इतने पास में होने के बावजूद भी इस तरह की बातें आपस में कर रहे थे तभी उसे ख्याल आया कि उन दोनों को क्या मालूम कि मैं उसका बेटा हूं वरना इस तरह की बातें नहीं करते लेकिन अच्छा ही होगा कि वह दोनों की बातें बहुत सुन लिया उसे पता तो चल गया कि उसकी मां कितनी जवानी से भरी हुई और एकदम सेक्सी है,,, उसे इस बात का गर्व भी हो रहा था कि उसकी मां की जवानी देखकर उन दोनों का लंड खड़ा हो गया था,, । अंकित अपने मन में सोच रहा था कि अगर सच में उसकी मां 1 घंटे के लिए भी दोनों को मिल जाए तो 1 घंटे में दोनों उसकी मां की बुर का भोसड़ा बना देंगे इस तरह से पागल हो गए दोनों देखकर,,,, अभी उन दोनों की बातें और सुन पता था इससे पहले ही मार्केट आ चुका था और लोगों की भीड़भाड़ बढ़ने लगी थी,,,,)
कौन-कौन सी सब्जी लेना है मम्मी,,,
चल अंदर देखु तो सही,,,।
(इतना कहकर दोनों मार्केट के अंदर की तरफ जाने लगे क्योंकि अंदर की तरफ अच्छी-अच्छी सब्जियां मिलती थी और एक सब्जी के ठेले पर खड़ी होकर वह,,, भिंडी खरीदने लगी,,, अंकित को सब्जी के बारे में कुछ ज्यादा मालूम नहीं पड़ता था इसलिए वह खड़ा होकर इधर-उधर मार्केट देखने लगा,,, जिस ठेले पर उसकी मां सब्जी खरीद रही थी तीन-चार औरतों और भी थी उसी ठेले पर थी तभी एक आदमी पीछे चाहे और एकदम से उसकी मां के पीछे से सट गया और भिंडी वजन करने के लिए बोलने लगा,,, सुगंधा एकदम से चौंक गई क्योंकि वह आदमी सीधे-सीधे उसके नितंबों से सट गया था,,, तभी वह एकदम से पीछे घूम कर देखी और आदमी एक तरफ हो क्या लेकिन इतने में वह अपना काम कर चुका था अपनी अभिलाषा पूरी कर चुका था दूर से ही वह सुगंधा की खूबसूरत बदन को देख रहा था मानो कि जैसे कोई भंवरा खूबसूरत कली के पीछे-पीछे आ गई हो उसका रस चूसने के लिए उसी तरह से वह आदमी भी सुगंधा की मदहोश कर देने वाली जवानी को देखकर अपने लंड को सुगंधा की गांड पर रगड़ खाने की लालच को रोक नहीं पाया और एकदम से आकर उससे सट गया था सुगंधा को भी अपने नितंबों पर,,, उसके सटने का एहसास हुआ था तभी तो गुस्से से पीछे मुड़कर देखने लगी थी और आदमी एकदम से पीछे हट गया था,,, अंकित भी सब कुछ देख रहा था लेकिन कुछ कर सकते की स्थिति में नहीं था वह उसे आदमी पर क्रोधित हुआ जरूर था लेकिन कुछ बोल नहीं पाया था और बोलना भी क्या बोलना क्या एग्जाम लगा था उसे यह कहता है कि तू उसकी मां के बदन से क्यों चढ़ गया क्यों अपने लंड को उसकी गांड से रगड़ाया रगडाया ,, उसके इस तरह के इल्जाम से वह खुद और उसकी मां हंसी के पात्र बन जाते क्योंकि भीड़भाड़ में थोड़ा बहुत सटना सटाना हो ही जाता है इसलिए वह खामोश है कुछ बोल नहीं पाया,,,,,।
भिंडी खरीद लेने के बाद तीन-चार सब्जिया और सुगंधा ने खरीद ली,,, सुगंधा चाहती थी की राहुल की तरह उसका बेटा भी उसके नितंबों पर हाथ रखें उसे महिलाएं लेकिन शायद उन दोनों के बीच राहुल और नूपुर की तरह खुला हुआ रिश्ता अभी नहीं बना था,,, सब्जी खरीद लेने के बाद सुगंधा नाश्ते की दुकान पर गई और समोसे और जलेबियां पैक करवाने लगी,,, अंकित कुछ बोल नहीं पा रहा था क्योंकि आज जो कुछ भी हो रहा था वह पूरी तरह से अंकित को स्तब्ध कर दिया था हालांकि सुगंधा भी पूरी तरह से मदहोश थी लेकिन फिर भी अपने आप को सहज बनाए हुए थी ज्यादातर हैरान दो अजनबी आदमियों की आपस में उसकी मां को लेकर बातचीत ने कर दिया था उन दोनों के विचार उसकी मां के प्रति कितने गंदे थे या फिर उसकी मां की तरह खूबसूरत औरत उन दोनों ने कभी देखा ही नहीं था इसलिए उन दोनों के मन की वासना एकदम से उनके होठों पर आ गई थी जो शब्द के जरिए बाहर निकल रही थी और उनकी बातों को सुनकर अंकित का भी बुरा हाल था,,,,।
तीन-चार दिन की सब्जियां तो हो गई,, और उसके बाद तो बाद में देखा जाएगा,,,,(हाथ में थैला लेकर मार्केट से बाहर निकलते हुए सुगंधा बोली,,,, तभी उसकी नजर केले के ठेले पर गई,,,, और इस समय अंकित की भी नजर केले के ठेले पर गई और अंकित केले के ठेले पर जाकर खड़े होकर केले को हाथ में लेकर देखने लगा जो की काफी छोटा था यह देखकर सुगंध बोली,,,)
ठीक नहीं है बेटा देख नहीं रहा कितना छोटा-छोटा और पतला सा है,,,।
हां सच कह रही हो मम्मी ,,, रहने दो,, (और इतना कहकर दोनों खेल से आगे हो गए और सुगंधा चलते हुए बोली)
केला हो तो मोटा मोटा और एकदम लंबा,,,(सुगंधा बात भले ही केले की कर रही थी लेकिन उसका इशारा दूसरी तरफ था और केले का जिक्र होते ही उसके मोटाई का जिक्र होते ही अंकित भी अपना ध्यान बात की दूसरी तरफ ले गया,,, सुगंधा अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) और उस पतले केले को तो मुंह में ले,,,,(इतना कहने के साथ ही वह तुरंत अपने शब्दों को बदलते हुए बोली) मेरा मतलब है खाने में पता ही नहीं चलेगा कि केला खाए हो,,, अकेले को हमेशा मोटा और लंबा होना चाहिए ताकि एकदम से मन भर जाए एक ही बार में मन भर जाए,,,(यह बोलते समय उसके चेहरे के भाव ऐसी लग रहे थे मानो वाकई में वह बिस्तर पर टांग फैलाए लेटी हुई है और उसकी गुलाबी पुरानी उसके बेटे का मोटा तगड़ा लंड घुसा हुआ है अपनी मां की यह बात सुनकर उसके कहने के मतलब को अंकित अच्छी तरह से समझ गया था,,, इसलिए वह भी हामी भरता हुआ बोला,,)
सही कह रहे हो मम्मी मोटा और लंबा केला की सबसे ज्यादा सुख देता है,,, मतलब की भूख मिटाता है,,,।
(अपने बेटे के मुंह से ज्यादा सुख देता है शब्द सुनकर सुगंधा भी समझ गई थी कि उसके बेटे के कहने का मतलब क्या है और मन ही मन प्रसन्न होने लगी,,, मार्केट से वापस लौटते समय अंधेरा होने लगा था और स्ट्रीट लाइट जगमगाने लगी थी,,, मां बेटे दोनों इस जगह पर पहुंच गए थे जहां पर ढलान था और जंगली झाड़ियां होगी हुई थी यहां पर फुटपाथ पर आवा गमन भी बहुत कम था,,,, अब तक जो कुछ भी हुआ था उसे लेकर सुगंधा के तन बदन में आग लगी हुई थी वह किसी तरह से अपने बेटे को अपने अंग को दिखाना चाहती थी और भी बिना कपड़ों के,, इसलिए धीरे-धीरे चलते समय जब वहां घनी झाड़ियां वाली जगह पर एकदम बीचो-बीच आ गई और चारों तरफ देखकर अंदाजा लगा ली कि अभी कोई आ नहीं रहा है तो वह उसी जगह पर खड़ी हो गई,,, और इधर-उधर देखने लगी अपनी मां को इस तरह से बीच रास्ते में कड़ी होता देखकर और इधर-उधर देखा हुआ पाकर आश्चर्य से अंकित बोला,,,)
क्या हुआ मम्मी यहां क्यों खड़ी हो गई ,,
अरे मुझे बड़ी जोरों की पेशाब लगी है,,,(इधर-उधर देखते हुए सुगंधा बोली लेकिन अपने बेटे के सामने जोड़ों की पेशाब वाली बात करके शर्म के मारे उसका चेहरा भी लाल हो गया था और यह बात सुनकर अंकित के लंड में हरकत होना शुरू हो गया था पहली बार उसकी मां खुले शब्दों में उसे पेशाब करने की बात कर रही थी हालांकि अपनी मां को घर के पीछे वह पेशाब करते हुए देख चुका था,, लेकिन अनजाने में उसकी मां को यह नहीं मालूम था कि उसका बेटा देख रहा है,,, ऐसा मानना अंकित का था लेकिन उसकी मां को सब पता था,, लेकिन इस समय मां बेटे दोनों के बदन में उत्तेजना के लिए रुकने लगी थी पेशाब करने के बहाने साड़ी उठाकर सुगंध अपने बेटे को अपनी गांड के दर्शन करना चाहती थी क्योंकि जिस तरह की उत्तेजना उसके तन बदन में हो रही थी वह किसी भी तरह से अपने बदन की सबसे स्वरूप वान और आकर्षक वाले अंग को दिखाना चाहती थी,,, अंकित के मन में भी अपनी मां को पेशाब करते हुए देखने की इच्छा जगने लगी और वह भी इधर-उधर देखते हुए बोला,,,)
यहां कैसे कर पाओगी मम्मी,, यहां तो कोई भी आ सकता है,(इधर-उधर देखते हुए अंकित बोला,,)
मैं जानती हूं लेकिन अभी कोई नहीं आ रहा है ले जल्दी से थैला पकड़ मैं जल्दी से निपट कर आ जाती हूं,,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा अपने हाथ में लिया हुआ था ना अंकित को थमाने लगी और अंकित भी जल्दी से अपनी मां के हाथ में से थेले को थाम लिया,,, पर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली) कोई इधर ना आने पाए,,
ठीक हैमम्मी,,, (और इतना कहने के साथ है अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा और सुगंध स्टेट लैंप के खंभे के सामने ही ढलान की तरफ जाने लगी वह ऐसी जगह जा रही थी जहां से अंकित उसे बड़े आराम से देख सके,,, सुगंधा का भी दिल जोरों से धडक रहा था,, बाथरूम वाली हरकत के बाद यह उसकी दूसरी हरकत थी जो अपनी तरफ से करने जा रही थी,,, अंकित बार-बार अपनी मम्मी की तरफ तो कभी फुटपाथ की तरफ देख ले रहा था कि कहीं कोई यहां तो नहीं रहा है और अपने मन में वह भी प्रार्थना कर रहा था कि इस समय कोई ना आए ताकि वह अपनी मां की नंगी गांड को आराम से देख सके और ऐसा ही हो रहा था दूर-दूर तक से कोई नजर नहीं आ रहा था बस सड़क पर से गाड़ी आ जा रही थी,,,।
देखते ही देखते आंठ दस कदम की दूरी पर जाकर सुगंधा खड़ी हो गई,,, उसकी पीठ अंकित की तरफ थी क्योंकि वह अपने बेटे को अपनी गांड दिखाना चाहती थी और इधर-उधर देखते हुए अपनी साड़ी को हाथ में पकड़ ली और जल्दी से उसे एक झटके से कमर तक उठा दी,,, और साड़ी के कमर तक उठते ही उसकी नंगी गांड एकदम से सामने नजर आने लगी लालटेन की पीली रोशनी में एकदम चमक रही थी,,, अंकित एकदम से हैरान हो गया अपनी मां की नंगी गांड देखकर तो हैरान था ही लेकिन साड़ी के उठते ही अपनी मां की संपूर्ण नंगी गांड को देखकर और इस बात से हैरान था कि उसकी मां साड़ी के नीचे चड्डी नहीं पहनी थी,,,, साड़ी के अंदर वह पूरी तरह से नंगी थी और यह एहसास होते ही उसका दिल जोरो से धड़कने लगा ,, और सुगंधा वहीं खड़े-खड़े एक नजर पीछे की तरफ घूमर अंकित की तरफ अच्छी और अंकित को अपनी तरफ देखता हुआ पाकर एकदम से उत्तेजना से भर गई,,, और तुरंत बैठ गई पेशाब करने के लिए और उसकी बुर से सरसरा कर धार निकलने लगी,,,,
कुछ ईस तरह से
पेशाब करने के लिए बैठने के बाद भी सुगंधा पीछे की तरफ देख रही थी अंकित अपनी मां की तरफ ही देख रहा था दोनों की नजर आपस में टकराई और दोनों एकदम से शर्म से पानी पानी हो गए अंकित शर्मिंदा होने के बावजूद भी अपनी मां की नंगी गांड पर से अपनी नजर को हटा नहीं पा रहा था अगर नजर हटा भी रहा था तो यह देखने के लिए कि कहीं कोई यहां तो नहीं रहा है लेकिन उसकी किस्मत बहुत तेज थी इस समय फुटपाथ पर से उस ओर कोई नहीं आ रहा था,,,, जी भर के पेशाब करने के बाद और जी भर कर अपनी मां की नंगी गांड देखने के बाद सुगंध तुरंत खड़ी हुई और साड़ी के किनारे को कमर पर से नीचे छोड़ दी और एक खूबसूरत नाटक पर पर्दा गिर गया,,, करो मुस्कुराते हुए अंकित की तरफ आने लगी,,, ।
अंकित के पास पहुंचते हैं उसके हाथ से एक थाला अपने हाथ में ले ली और मुस्कुराते हुए बोली,,,।
(अच्छा हुआ कोई आया नहीं नहीं तो मैं कर भी नहीं पाती,,,)
सही कह रही हो मम्मी,,,,।
(इससे ज्यादा अंकित कुछ कह नहीं पाया और अपने बेटे के हाथ में से ठेला लेते हुए उसकी नजर अपने बेटे के पेट के आगे वाले भाग पर पड़ गई थी जिसमें अच्छा खासा तंबू बना हुआ था और वह मन ही मन प्रसन्न होने लगी अंकित के मन में ढेर सारे सवाल थे साड़ी के उड़ने ही अपनी मां की गांड को ढकने वाली पेंटिं को न पाकर वह हैरान हो रहा था,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां आज पेंटिं क्यों नहीं पहनी,,, वह अपनी मां से यह सवाल पूछना चाहता था लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी और दूसरी तरफ साड़ी के नीचे चड्डी ना पहने की युक्ति सुगंधा की ही थीवह अपने मन में ठान कर आई थी कि आज अपने बेटे को रास्ते में किसी भी तरह से अपनी गांड के दर्शन कराएगी और इसीलिए वह चड्डी नहीं पहनी थी क्योंकि वह जानती थी चड्डी पहनने पर उसे उतरते समय दिक्कत होगी और वह सब कुछ जल्दी जल्दी निपटाना चाहती थी इसलिए चड्डी नहीं पहनी थी,,, थोड़ी देर में दोनों घर पर पहुंच गए थे।)