Incest मटकनी गांड का कमाल - Page 10 - SexBaba
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Incest मटकनी गांड का कमाल

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दवाई का असर जल्द ही सुगंधा पर हुआ और वह धीरे-धीरे नींद की आगोस में चली गई,,,, कुछ देर तक अंकित अपनी मां के पास ही बैठा रहा बार-बार वह अपनी मां के सर पर हाथ रखकर उसके बुखार को देख रहा था जो की धीरे-धीरे उसका सर ठंडा हो रहा था इसका मतलब था कि उसका बुखार उतर रहा है और बुखार उतरने से अंकित को भी राहत मिल रही थी,,,,।

सुगंधा का तो बुखार उसका बुखार में तपता हुआ शरीर दवा खाकर धीरे-धीरे,, ठंडा होने लगा था लेकिन ,,, अपनी मां की मदहोश कर देने वाली गर्म जवानी देखकर,, अंकित के दिल और दिमाग पर अपनी मां की जवानी का बुखार चढ़ चुका था,,,, अपनी मां को गहरी नींद में सोता हुआ देखकर धीरे से अंकित बिस्तर पर से उठा और कमरे के बाहर आकर बैठ गया और अपनी मां के बारे में सोचने लगा जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोचने लगा उसे पल के बारे में सोचने लगा जो उसके जीवन में अभी-अभी आकर गुजर गया था,,,। लेकिन अंकित इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि जो पल अभी-अभी उसके जीवन में गुजरा था वह पल नहीं था बल्कि आंधी और तूफान था जो उसकी जिंदगी में बहुत बड़ा बदलाव करने के लिए आया था,,,,।

अपनी मां के साथ तो बहुत बार दवा खाने आया गया था लेकिन यह पहली बार था जब वह अपनी मां को दवा खाने लेकर गया था उसे दवा दिलाने के लिए और दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोच कर खुद अंकित की हालत खराब हुए जा रही थी,,,, पहले वाला अंकित होता तो शायद डॉक्टर की हरकत परवाह डॉक्टर को भला बुरा सुना देता या उसे पर हाथ भी उठा देता क्योंकि तब उसमें औरत को लेकर कोई समझदारी नहीं थी वह अपनी मां को एक मां के ही नजरिए से देखा था औरत के नजरिए से नहीं लेकिन अब हालात पूरी तरह से बदल चुके थे,,, क्योंकि अब वह अपनी मां को मां के नजरिए से नहीं बल्कि है जवानी से भरी हुई औरत के नजरिया से देखा था और इसीलिए शायद डॉक्टर की मनसा को अच्छी तरह से समझता था,,,,।

डॉक्टर के चेहरे को देखकर वह समझ गया था कि उसकी मां की गर्म जवानी उसके लावे को पिघलाने के लिए काफी थी,,, दवा खाने के अंदर गुजरा हुआ एक तरफ से किसी फिल्म के दृश्य की तरफ उसकी आंखों के सामने घूम रहा था जब अपनी मां को डॉक्टर के केबिन में ले गया उसे डॉक्टर के सामने कुर्सी पर बैठाया तो डॉक्टर उसकी मां को देखा ही रह गया था खास करके उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों की तरफ से तो उसकी निगाह हट ही नहीं रही थी,,, बुखार के चलते उसकी मां को बिल्कुल भी होश नहीं था और उसके साड़ी का पल्लू उसके कंधे से नीचे सड़क गया था जिसके कारण उसकी मां का भारी भरकम चूची वाला हिस्सा डॉक्टर दिखाई दे रहा था और यह देखकर डॉक्टर के मुंह के साथ-साथ उसके लंड में भी पानी आ रहा था इस बात का एहसास अंकित को बहुत अच्छे से था,,,,।

आला लगकर बुखार चेक करने के बहाने संजू को साड़ी का पल्लू हटाने के लिए बोलना और आला को चूचियों पर रखकर धीरे-धीरे दबाना उंगलियों से उसकी चूची का स्पर्श करना या सब हरकत अंकित को बहुत अच्छे से समझ में आ रहा था लेकिन अंकित कुछ बोल नहीं पा रहा था एक तरह से अंकित अपनी मां की जवानी के आगे डॉक्टर को पिघलते हुए देखने में मजा आ रहा था,,,,, उसके बाद डॉक्टर का सुई लगाना जहां अधिकतर डाक्टर औरत को उसकी मां पर सुई लगाते हैं वही वह डॉक्टर जानबूझकर उसकी मां के नितंबों पर सी लग रहा था एक बहाने से वह उसके गोरी गोरी नितंबों के उधर को देखना चाहता था,,, जिसमें वह सफल भी हो गया था यह सब सो कर अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि उसकी में जब डॉक्टर इस तरह की हरकत कर रहा था अगर वह नहीं होता उसकी मां डॉक्टर की क्लीनिक में अकेले ही होती तो डॉक्टर ना जाने कौन-कौन सी मनमानी उसकी मां के साथ करता,,,,।

यह सब याद करते हुए अंकित की हालत खराब हो रही थी यहां तक की उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो चुका था और वह अपनी मां के कमरे के बाहर से उठकर हुआ अपने कमरे में चला गया और दरवाजा बंद कर दिया और अपने कमरे में जाते हुए धीरे-धीरे अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा हो गया आखिरकार उसे पर भी अपनी मां की जवानी का नशा चढ़ा था और नशे के आधीन होकर अंकित मजबूर हो गया था अपने कपड़े को उतार कर निर्वस्त्र होने में देखते-देखते वह एकदम नंगा होकर अपनी बिस्तर पर लेट गया था पीठ के बाल लाकर वह अपनी मां के बारे में सोच रहा था और इसी बीच उसे बाथरूम वाला वाक्या याद आ गया,,, और इस दिल से को याद करके तो उसके लंड की नसें फटने जैसी हो गई वह पूरी तरह से अपने बदन में उत्तेजना का संचार होता हुआ महसूस कर रहा था वह मदहोश हो चुका था अपनी मां की गदराई जवानी को देखकर,,,।

अंकित इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां बुखार के नशे में थी बेशुध थी उसे बिल्कुल भी होश नहीं था,,,, अंकित को बहुत मौका मिला था अपनी मां की मदद कर देने वाली जवानी के अंगों को छूने को उसे स्पर्श करने को उसे अपने हाथों में लेकर दबाने को लेकिन हालात को देखते हुए अंकित ऐसा नहीं कर पाया था क्योंकि मौका और जगह दोनों अंकित की चाह से विपरीत थे,,,, बाथरूम वाला वाक्या याद करके अंकित अपने खड़े लंड को अपनी मुट्ठी में दबोच लिया और उसे धीरे-धीरे हिलाना शुरू कर दिया,,,। वह गहरी गहरी सांस ले रहा था और अपनी मां के बारे में सोच रहा था,,,।

वैसे तो उसके जीवन में अपनी मां को निर्वस्त्र देखने का सुनहरा मौका मिल चुका था और वह अपनी मां को पेशाब करता हुआ और बाथरूम में निर्वस्त्र होकर नहाते हुए पूरी तरह से वह देख चुका था लेकिन फिर भी हर एक बार उसकी मां का पेशाब करना निर्वस्त्र होना अंकित के नसों में उत्तेजना का संचार और बड़ी तेजी से बढ़ा देता था,,,। अंकित के लिए यह सब किसी कल्पना और खूबसूरत अपने जैसा ही था जिसमें से वह अपने आप को बाहर निकलना नहीं चाहता था क्योंकि वह जानता था कि यह सपना यह कल्पना उसके जीवन का अमूल्य पल है,,,। वह अपने मन में सोच रहा था कि काश ऐसा उसके जीवन में बार-बार हो तो जिंदगी का मजा ही बदल जाए,,,।

लंड की नसें पूरी तरह से फुल कर उभर गई थी अंकित अपने लंड को मुट्ठी में दबोच कर अपनी मर्दाना अंग के मर्दाना ताकत को महसूस कर रहा था और अपने मन में यही सोच रहा था कि अगर किसी भी तरह से अपने लंड को अगर वह अपनी मां की बुर में डालने में कामयाब हो गया तो उसकी मां पूरी तरह से मस्त हो जाएगी,,, लंड की नसों की रगड़ उसकी बुर की अंदरूनी दीवारों को पानी पानी कर देगी,,, ऐसा अपने मन में सोचते हुए,,, फिर से अंकित दवा खाने के बारे में सोचने लगा वह नहीं जानता था की दवा खाने ले जाने पर डॉक्टर पेशाब की जांच करने को रहेगा,,,, और ऐसा कह भी दिया था तो कोई दिक्कत की बात नहीं थी लेकिन जब,,, बाथरूम के पास पहुंचकर सुगंधा खुद अपने बेटे को अंदर आने के लिए बोली तो अंकित के बदन में कंपन होने लगा उसका रोम रोम पुलकित होने लगा वैसे भी वह बहुत बार अपनी मां के साथ बाथरुम में कल्पना कर चुका था लेकिन पहली बार हकीकत में उसे अपनी मां के साथ बाथरुम में जाने का मौका मिल रहा था इधर-उधर देखकर अंकित हिम्मत दिखाते हुए अपनी मां के साथ बाथरुम में प्रवेश कर गया था क्योंकि उसकी मां को चक्कर भी आ रहा था जहां एक तरफ उसे अपनी मां की फिक्र भी थी वहीं दूसरी तरफ बाथरूम में अपनी मां के साथ वक्त गुजारने की चाह भी बड़े जोरों की थी,,,।

और मौके की नजाकत को देखते हुए वह भी अपनी मां के पीछे-पीछे बाथरुम में प्रवेश कर गया और अपनी मां को परखनली भी थमा दिया,,,, अंकित स्थल को याद करके पूरी तरह से उत्तेजना में डूबने लगा था वह धीरे-धीरे इस पल को याद करके अपने लंड को हिलाना शुरू कर दिया था,,, उसे याद आया कि उसकी मां से उसकी चड्डी उतारी नहीं जा रही थी पटना जाने कैसे बुखार के नशे में वह अपनी चड्डी उतारने के लिए खुद अपने बेटे को ही बोल दी थी यह भी सोच रहा था कि अगर उसकी मां को बुखार ना चढ़ा होता है तो शायद ऐसा सुनहरा मौका उसके जीवन में न जाने कभी आता भी या नहीं और उसे मौके का फायदा उठाते हुए अंकित अपनी मां की चड्डी को दोनों हाथों से नीचे उतारा था बहुत कम लोगों को ऐसा मौका मिलता है जब उन्हें खुद अपनी मां की चड्डी उतारने का सुनहरा मौका प्राप्त होता है और उन भाग्यशाली में से अंकित था,,,।

अगर कोई और मौके पर इस तरह का सौभाग्य अंकित को प्राप्त होता तो शायद वह अपनी मां की चड्डी उतारने के साथ-साथ उसके गुलाबी छेद में अपना लंड भी डाल दिया होता लेकिन वह जानता था कि उसकी मां बीमार है उसे चक्कर आ रहे थे इसलिए वह ज्यादा कुछ सोच नहीं पाया लेकिन जो कुछ भी उसने अपनी आंखों से देखा था उसे याद करके वह जोर-जोर से अपने लंड को हिला रहा था और कुछ पल के लिए अपनी आंखों को बंद करके कल्पना करने लगा था दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था उसे विपरीत वह अपने मन में सोचने लगा कि परखनली को अपने हाथों में लेकर मुस्कुराते हुए उसकी मां बाथरूम के दरवाजे पर खड़ी और बाथरूम का दरवाजा खोलकर अंदर प्रवेश करते ही पीछे की तरफ देखकर अपने बेटे को भी अंदर आने का इशारा करती है,,,,।

इस तरह की कल्पना अंकित को किसी दूसरी दुनिया में ही लिए जा रही थी अंकित पूरी तरह से मस्त हो चुका था और वह जोर-जोर से अपने लंड को हिलाना शुरू कर दिया था,,,। आंखों को बंद करके उसकी कल्पना एकदम साफ नजर आ रही थी वह अपनी मां के इशारे पर तुरंत बाथरूम में प्रवेश कर गया और अपनी मां के हाथ से परखनली को ले लिया उसकी मां भी मुस्कुराते हुए अपने बेटे को परखनली दे दी और खड़े-खड़े अपनी दोनों टांगों को खोलते हुए अपनी साड़ी को कमर तक उठने लगी यह नजारा बेहद ही उत्तेजना से भरा हुआ था और इस नजारे की कल्पना करके अंकित स्वर्ग का सुख भोग रहा था देखते ही देखते सुगंध अपनी साड़ी को कमर तक उठाकर अपनी दोनों टांगों को खोलकर अपनी गुलाबी छेद में से पेशाब करने लगी और इशारे से ही अपने बेटे को परखनली को बर के छेद पर लगाने के लिए बोली और अपनी मां का आदेश पाकर तुरंत अंकित उसे परखनली को अपनी मां की गुलाबी छेद पर लगा दिया जिसमें पल भर में ही उसकी बुर से निकला हुआ नमकीन की धार से भर गया,,,,।

पेशाब से परखनली भर जाने से अंकित तुरंत परख नदी को हटा लिया और अपनी हथेली से अपनी मां की गुलाबी छेद को बंद करने की कोशिश करने लगा,,, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था क्योंकि उसकी बुर से पेशाब की धार इतनी तेजी से निकल रही थी कि उसकी बौछार इधर-उधर पूरे बाथरुम में फैल रही थी और देखते ही देखते अंकित अपने लंड को अपने पेंट में से बाहर निकाल लिया,,, अपने बेटे के खड़े लंड को देखकर,, सुगंधा के तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी,,, और वह खुद अपने बेटे के लंड को पकड़ कर उसे अपनी गुलाबी छेद पर लगा दी,,, और उत्तेजना भरे स्वर में बोली,,,।

डाल दे मेरी बुर में बेटा,,,,।

(इतना सुनते ही अंकित से रहा नहीं गया और वह एक हाथ में परखनली को पकड़े हुए ही अपने लंड को अपनी मां की बुर में डालना शुरू कर दिया और देखते ही देखे उसका लंबा मोटा लंड उसकी मां के गुलाबी छेद में पूरी तरह से खो गया डूब गया और फिर एक हाथ में परखनली को पकड़े हुए दूसरे हाथ को अपनी मां के कमर में डालकर वह अपनी कमर को हिलाना शुरू कर दिया देखते ही देखते दोनों मां बेटे पूरी तरह से मदहोशी के आलम में बाथरूम के अंदर गहरी गहरी सांस लेते हुए शिसकारी की आवाज छोड़ने लगे,,,।

इस तरह की कल्पना करते हुए अपने ही बिस्तर पर निर्वस्त्र अवस्था में मस्ती करते हुए अंकित अपने लंड को जोर-जोर से हिलाते हुए वीर्य का फवारा छोड़ने लगा,,,, जो कि उसके ही ऊपर गिरने लगा उसे बहुत मजा आ रहा था ईस तरह की कल्पना करने में,,,, और जैसे ही उसके दिमाग से वासना का तूफान शांत होगा वह धीरे-धीरे होश में आने लगा और अपनी स्थिति को देखकर अपनी ही चड्डी से अपने ऊपर गिरी वीर्य को साफ करने लगा और फिर देखते ही देखते वह भी नींद की आगोस में चले गया,,,।

तकरीबन ढाई घंटे बाद जब उसकी नींद खुद ही तो अपनी स्थिति का भान होते ही वह जल्दी-जल्दी कपड़े पहनने लगा क्योंकि उसे याद था कि उसे रिपोर्ट लेने जाना है और घर में जिस तरह की शांति छाई हुई थी उसे देखकर वह समझ गया था कि अभी तक उसकी बहन घर पर वापस आई नहीं थी और उसकी मां भी सो रही थी वह धीरे से अपने कमरे से बाहर निकाला और अपनी मां के कमरे तक जाकर वह धीरे से दरवाजा खोल कर देखा तो उसकी मां गहरी नींद में सो रही थी और वह फिर हाथ में धोकर रिपोर्ट लेने के लिए दवा खाने पहुंच गया,,,,।

दवा खाने पहुंचकर डॉक्टर उसे रिपोर्ट देते हुए बोला कि।

कोई घबराने वाली बात नहीं है बस हल्का सा मलेरिया का असर था मुझे दवाई लिख देता हूं यह दवाई शुरू कर देना तीन दिन में सब ठीक हो जाएगा,,,।

धन्यवाद डॉक्टर,,,(डॉक्टर के हाथ से प्रिसक्रिप्शन लेते हुए अंकित बोला,,,अंकित डॉक्टर के चेहरे की तरफ देख रहा था और अपने मन में सोच रहा था कि इस समय डॉक्टर कितना मासूम लग रहा है उसका चेहरा एकदम मासूम है उसे देखकर कोई समझ ही नहीं पाएगा कि यह खूबसूरत औरत को देखकर डॉक्टर भी दूसरे मर्दों की तरह ही रंग,,, बदलता है,,, अंकित अपने मन में यह बात इसलिए सोच रहा था क्योंकि सुई लगाते समय उसने डॉक्टर के हालात को बड़ी-बड़ी की से निरीक्षण किया था वह साफ तौर पर देखा था कि जब डॉक्टर उसकी मां को सी लग रहा था उसकी साड़ी को थोड़ा नीचे की तरफ करके उसके नितंबों को उसकी गोरी गोरी गांड को देखकर डॉक्टर का भी लंड खड़ा हो रहा था और इस नजारे को अंकित देख लिया था,,,, लेकिन अंकित एक मर्द होने के नाते डॉक्टर की हालत को अच्छी तरह से समझ रहा था इसलिए कुछ बोला नहीं था,,,।

डॉक्टर के द्वारा लिखी गई दवा लेकर घर जाते-जाते शाम ढल चुकी थी अंधेरा होने लगा था घर पर जब पहुंचा तो तृप्ति भी घर पर आ चुकी थी तृप्ति अपनी मां के पास ही बैठी हुई थी और वह थोड़ा चिंतित नजर आ रही थी,,,, अपनी मां के पास पहुंचते ही अंकित अपनी मां से बोला,,,।

मम्मी ब्लू और पेशाब का रिपोर्ट आ चुका है,, और घबराने वाली कोई बात नहीं हल्का सा मलेरिया का असर है,,,,।

अच्छा हुआ अंकित कुछ ज्यादा गड़बड़ नहीं हुई नहीं तो मैं कब से परेशान हो गई थी मुझे तो मालूम ही नहीं था कि मम्मी की तबीयत खराब है घर पर आई तो पता चला,,,, दो-तीन दिन तक मम्मी तुम आराम करना मैं खाना बना देता हूं मैं पहले चाय बना देती हूं तुम चाय के साथ दवाई खा लेना,,,(इतना कहने के साथ ही तृप्ति अपनी मां के पास से उठकर खड़ी हो गई और किचन की तरफ जाने लगी,,,, लेकिन सुगंधा के चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुई थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था अंकित के रिपोर्ट वाली बात सुनकर उसके होश उड़ गए थे,,, और वह भी ब्लड और पेशाब का इन सब के बारे में तो सुगंधा को कुछ पता ही नहीं था इसलिए वह हैरानी से अंकित की तरफ देख रही थी,,,।

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अंकित सही समय पर आकर अपनी मां को दवा खाने ले गया था और वहां से दवा दिला कर वापस घर पर ले आया था शाम के वक्त ब्लड और पेशाब का रिपोर्ट लेने जब दवा खाने गया तो वहां पता चला कि ज्यादा कुछ नहीं बस हल्का सा मलेरिया का असर था,,, रिपोर्ट के बारे में सुनकर अंकित को थोड़ी राहत हुई,,, और वह यह खबर जब घर पर पहुंच कर अपनी मां को दिया तो वह हैरान हो गई,,, अपने रिपोर्ट के बारे में सुनकर नहीं बल्कि ब्लड और पेशाब के सैंपल के बारे में सोचकर,,,।

तृप्ति जब रिपोर्ट के बारे में सुनी तो उसे भी राहत हुई और वहां अपनी मां से बोली की तीन दिनों तक वह बिल्कुल भी काम ना करें मैं दोनों टाइम पर खाना बना लूंगी और घर का काम कर लूंगी और चाय बनाने के लिए वह रसोई घर में चली गई,,, कमरे में केवल अंकित और उसकी मां थी,,,, अंकित इस बारे में बिल्कुल भी नहीं जानता था कि उसकी मां को ब्लड और पेशाब के सैंपल के बारे में कुछ भी पता नहीं है,, इसलिए वह आराम से अपनी मां के पास बैठ गया उसकी मां भी धीरे से उठकर दीवार का टेका लेकर बिस्तर पर बैठी रह गई,,, और पिछले चार-पांच घंटे के बारे में सोचने लगी जो कि उसके जेहन में बिल्कुल भी उसे पल की तस्वीर नहीं छपी हुई थी जिसके बारे में वह सोचने की कोशिश कर रही थी,,, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था वह पूरी कोशिश कर रही थी उन सब के बारे में सोने के लिए लेकिन उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था यह सब कैसे हुआ कब हुआ उसे कुछ मालूम नहीं था और अंकित था कि अपनी मां को सहज होता हुआ देखकर बहुत खुश नजर आ रहा था,,,।

वैसे भी आज बाथरूम में जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोचकर उत्तेजना की चिंगारी रह रहकर उसके तन बदन में जवानी के शोले को भड़का दे रही थी क्योंकि बाथरूम वाला नजारा ही कुछ गजब का था,, क्योंकि वह बार-बार अपने मन में यही सोच रहा था कि जिस तरह का मौका उसे दवा खाने के बाथरूम में मिला अगर वही मौका घर के बाथरूम में मिल जाए तो वह अपनी मां की बुर का भोसड़ा बना देगा,,,, अपनी मां की खूबसूरत चेहरे की तरफ देखते हुए अंकित बोला,,,।

अब कैसा लग रहा है मम्मी,,,?

अभी तो ठीक लग रहा है लेकिन बदन में थोड़ा-थोड़ा दर्द है,,,(अंकित के सवाल पर अंकित की तरफ देखते हुए सुगंधा बोली,,,)

मैं दवा लेकर आया हूं चाय पीने के बाद दवा पी लेना दर्द भी ठीक हो जाएगा,,,,।

वह सब तो ठीक है लेकिन ब्लड और पेशाब की सैंपल का क्या माजरा है,,।

अरे मम्मी तुम्हारी तबीयत ही कुछ ज्यादा खराब थी इसलिए डॉक्टर को ब्लू और पेशाब का सैंपल लेना पड़ा रिपोर्ट के लिए और यह तो अच्छा हुआ कि रिपोर्ट में ज्यादा कुछ निकला नहीं बस हल्का सा मलेरिया कस रही है जो की दवा खाने के बाद दो-तीन दिन में ही सब सही हो जाएगा,,,,।

अरे वह सब तो ठीक है लेकिन जो कुछ भी हुआ मुझे उसके बारे में कुछ भी याद नहीं है,,,।

मम्मी तुम्हारी तबीयत इतनी खराब थी कि मैं ही तुम्हें सहारा देकर घर के बाहर ले गया औटो किया और वहां से दवा खाने ले गया,,,,।

तु मुझे दवा खाने ले गया,,, तो तृप्ति कहां थी,,,,?(एकदम आश्चर्य जताते हुए सुगंधा बोली,,)

तृप्ति कहां थी वह तो ट्यूशन गई हुई थी मै हीं तुम्हें दवा खाने ले गया था,,,,।

मतलब तेरे साथ तृप्ति नहीं थी,,,(फिर से हैरान होते हुए बोली)

क्या मम्मी बता तो रहा हूं कि मैं ही तुम्हें दवा खाने ले गया था तृप्ति को घर पर थी ही नहीं तुम बीमार हो इस बारे में तो तृप्ति को घर पर आने पर पता चला,,, क्या तुम्हें सच में कुछ भी याद नहीं है,,,।

नहीं मुझे तो बिल्कुल भी याद नहीं है मुझे इतनी जोर का बुखार था कि होश ही नहीं था,,,।

तभी तो तुम्हारी हालत देखकर डॉक्टर ने रिपोर्ट निकालने के लिए बोला था,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा के होश उड़ने लगे क्योंकि उसे कुछ भी याद नहीं था,,,, उसके बेटे का घर से सवाल के लिए उसे लेकर जाना सहारा देकर दवा खाने पहुंचाना और वहां से घर लेकर आना यह सब तो ठीक था लेकिन पेशाब और ब्लड की रिपोर्ट के बारे में उसे कुछ भी याद नहीं था और यही सबसे ज्यादा परेशान कर देने वाली बात थी ब्लड की बात तक भी ठीक थी लेकिन पेशाब,,, पेशाब का सैंपल डॉक्टर ने कैसे लिया यही सोचकर परेशानी जा रही थी क्योंकि उसे तो कुछ पता ही नहीं था,,,, अपने बेटे की बात सुनकर,, सुगंधा हैरान होते हुए बोली,,)

सब तो ठीक है लेकिन ब्लड और पेशाब का सैंपल कैसे लिया इस बारे में भी मुझे कुछ भी याद नहीं है,,,।

(अपनी मां की बात सुनकर वह कुछ क्षण तक अपनी मां के खूबसूरत लेकिन आश्चर्य भरे चेहरे की तरह देखने लगा और फिर वह भी हैरान होते हुए बोला)

क्या तुम्हें नहीं मालूम है ब्लड और पेशाब का सैंपल कैसे लिया गया,,,,

मैं तभी तो हैरान हूं मुझे कुछ भी पता नहीं है,,,, तु मुझे शुरू से बता,, क्या हुआ,,,,?

(अंकित हैरान था क्योंकि घर से लेकर के दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था उसकी मां को बिल्कुल भी याद नहीं था अब उसे यह नहीं समझ में आ रहा था कि बाकी मैं उसकी मां को याद नहीं था कि वह जानबूझकर कुछ भी याद न होने का बहाना कर रही है लेकिन फिर वह अपने मन में सोचा कि आखिर उसकी मां ऐसा करेगी क्यों,,,, उसकी तबीयत वाकई में कुछ ज्यादा ही खराब थी बुखार से उसका बदन तप रहा था,,,,,,, यह सब सोते हुए अंकित अपने मन में सोचा हो सकता है वाकई मम्मी सच कह रही है,,,, और थोड़े ही देर में उसके दिमाग में चमक होने लगी उसे शरारत सुझने लगी,,, वह अपने मन में ढेर सारी बातें सोचने लगा और ऐसी बातें सोचने लगा जो उसे अपनी मंजिल तक ले जा सकते थे मां बेटे के बीच की दूरी को खत्म कर सकते थे वह समझ गया था कि वह ऐसी कहानी बनाएगा कि उसकी मां पानी पानी हो,,,, जाएगी,,,,,, अपने बेटे को इस तरह से सोच में डूबा हुआ देखकर सुगंधा बोली,।)

अंकित अपनी मां के बारे में सोचकर

अब तू क्या सोचने लगा क्या तुझे भी कुछ भी याद नहीं है,,,,।

नहीं नहीं मुझे तो सब कुछ याद है लेकिन मैं इस बात से हैरान हूं कि वाकई में तुम्हें कुछ भी याद नहीं है दवा खाने में क्या हुआ कैसे वहां पहुंची डॉक्टर ने क्या कहा सैंपल के बारे में क्या कुछ भी याद नहीं है,,,,।(अंकित अपने मन में उठ रहे शक को दूर कर लेना चाहता था इसलिए पूछ रहा था,,)

अरे बुद्धू मुझे कुछ भी याद होता तो मैं तुझसे भला क्यों पूछती,,,,।

बात तो सही है मम्मी लेकिन फिर भी,,,, कोई बात नहीं बुखार ही इतना ज्यादा था कि इंसान होश में ही ना हो,,,, चलो कोई बात नहीं मैं शुरू से बताता हूं,,,,।

(अंकित का इतना कहना था कि तृप्ति चाय बनाकर तीन कप ट्रे में रखकर और कुछ बिस्किट लेकर अपनी मां के कमरे में दाखिल होते हुए बोली)

लो तैयार हो गई चाय,,,

(अंकित अच्छी तरह से जानता था कि उसकी बड़ी बहन की मौजूदगी में दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था वह बताना उचित नहीं था,,,, और शायद इस बात को सुगंधा भी अच्छी तरह से समझते थे इसलिए तृप्ति की मौजूदगी में उसने उस बात की जिक्र ही नहीं छेड़ी,,,)

अंकित का अपनी मां को लेकर बाथरूम की कल्पना

लो मम्मी,,, एक कप उठा लो,,,,,(अंकित की तरफ ट्रे बढाते हुए,,) ले तु भी ले ले,,,,(अंकीत भी हाथ बढ़ाकर चाय का कप ले लिया,,, और ट्रे में से बिस्कुट लेकर खाने लगा और चाय पीने लगा,,,,, तृप्ति भी एक छोटा सा टेबल अपनी मां के बिस्तर के पास लाकर उसे पर बैठ गई और चाय पीने लगी और चाय पीते हुए बोली,,,,।

मम्मी तुम्हारी तबीयत खराब थी तो सुबह बोलना चाहिए था ना मैं कॉलेज नहीं जाती,,,, खामखा तुम्हे परेशान होना पड़ा,,,,,(चाय की चुस्की लेते हुए तृप्ति बोली,,,)

अरे मुझे अगर पता होता कि मेरी तबीयत इतनी ज्यादा खराब होने वाली है तो क्या मैं दवा नहीं ले लेती,,,, मुझे तो लगा आराम कर लूंगी तो ठीक हो जाएगा क्योंकि बदन में सिर्फ दर्द ही लग रहा था यह तो बाद में एकदम तेज बुखार हो गया और मुझे कुछ पता ही नहीं चला,,,,( सुगंधा भी चाय की चुस्की लेते हुए बोली,,,)
 
बात तो सही कह रही है मम्मी अगर हम दोनों को भी इस बात का पता चला की मम्मी की तबीयत खराब लग रही है तो क्या हम दोनों पढ़ने के लिए जाते नहीं ना,,,, यह तो एकाएक तबीयत खराब हो जाती है,,, मैं भी जब पढ़कर घर पर लौटा तो मुझे नहीं मालूम था कि मम्मी घर पर होगी लेकिन जब देखा,,, दरवाजा बाहर से खुला हुआ है ताला नहीं लगा हुआ है तो मुझे लगा कि शायद दीदी तुम होगी,,,, जब अंदर जाकर देखा तो तुम नहीं थी तो मम्मी के कमरे में गया और मम्मी बेसुध होकर सो रही थी,,,, सो क्या रही थी दर्द से कहर रही थी,,,, मैं दो बार आवाज भी लगाया मम्मी मम्मी की मम्मी तो कुछ बोल नहीं रही थी,,,, और जब मैं मम्मी के माथे पर हाथ रख तो मम्मी का माथा एकदम तप रहा था,,, और फिर मैं दवा खाने ले गया,,,,।

(तृप्ति के साथ-साथ,,, सुगंधा भी बड़े ध्यान से अंकित की बात को सुन रही थी लेकिन अंकित ने ब्लड और पेशाब के सैंपल के बारे में कुछ भी नहीं बताया और तृप्ति के सामने न जाने क्यों सुगंध भी खामोश रही और इस बारे में जिक्र नहीं की क्योंकि उसे अंदर ही अंदर ऐसा लग रहा था कि जरूर कुछ हुआ होगा इसलिए वह इस समय बिल्कुल भी जिक्र नहीं की और अंकित की बात सुनकर तृप्ति बोली,,,।)

अच्छा हुआ अंकित तू घर पर मौजूद था वरना मम्मी की तबीयत और ज्यादा खराब हो जाती सही समय पर तूने मम्मी को दवा खाने लेकर दवा दिलाया यही उनके सेहत के लिए अच्छी बात है,,,,।

(कुछ देर तक तीनों में इसी तरह से बातें होती रही,,, सुगंधा की तबीयत अब दुरूस्त थी,,, वह अंकित से जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सुनना चाहती थी लेकिन तृप्ति की मौजूदगी में ऐसा संभव बिल्कुल भी नहीं था इस बात को सुगंधा भी समझने लगी थी,,, क्योंकि सहज होता तो इसी समय अपनी बड़ी बहन की मौजूदगी में वह सब कुछ बता देता लेकिन अंकित खामोश रहा क्योंकि वह बात नहीं जा रहा था उसी समय तृप्ति चाय लेकर आ गई थी और अगर दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था वह सामान्य होता तो प्रीति के सामने भी बताने में अंकित को कोई हर्ज नहीं होता,,,, सुगंधा को थोड़ा आराम लगने लगा था,,, इसलिए वह अपने बिस्तर से उठने की कोशिश करते हुए बोली,,,)

खाना बनाने का समय हो रहा है मैं खाना बना देती हूं,,,(सुगंधा का इतना कहना था कि तृप्ति तुरंत अपना हाथ उसके कंधों पर रखकर उसे दबाते हुए बैठने का इशारा करते हुए बोली,,,)

बिल्कुल भी नहीं अब दो-तीन दिन तक तुम आराम करो मैं बना दूंगी बस मुझे बता दो बनाना क्या है,,,,।

अरे रहने दे मैं बना लुंगी,,,(फिर से उठने की कोशिश करते हुए सुगंधा बोली तो फिर से तृप्ति उसे रोक दी और बोली)

क्या मम्मी तुम भी दो-तीन दिन आराम करो मैं बना दूंगी ना बस बता दो क्या बनाना है,,,।

हां मम्मी बता दो ना दीदी बना देगी वैसे भी तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है तो दो-तीन दिन तक आराम ही करो,,,,।

अच्छा सुन दाल चावल ही बना दे,,,,।

ठीक है मम्मी,,,,(और इतना कहने के साथ ही खाली कप और ट्रे लेकर कमरे से बाहर निकल गई और उसके जाते ही सुगंधा बोली,,,)

अब बता क्या हुआ था दवा खाने,,,, में,,,,

(तृप्ति के जाते ही जिस तरह से सुगंधा उत्सुकता दिख रही थी दवा खाने के बारे में जानने के लिए उसे देखते हुए अंकित समझ गया था कि उसकी मम्मी भी कुछ और सुनना चाहती है वरना वह तृप्ति के सामने ही जानने की कोशिश करती की दवा खाने में क्या हुआ था,,,, इसलिए तो अपनी मां की उत्सुकता और उसका बेकाबू पन देखकर अंकित के तन बदन में हलचल होने लगी थी उसके लंड में हरकत होने लगी थी और वह धीरे से बोला,,,)

पता नहीं तुम क्या सोचोगी,,,, मेरी बात का यकीन करोगी कि नहीं मुझे समझ में नहीं आ रहा है,,,।

अरे समझना क्या है,,,, तू जो बोलेगा सच ही बोलेगा जो कुछ भी दवा खाने में हुआ है वही बताएगा ना,,,,

हां वह बात तो ठीक है,,,लेकीन,,,(अंकित का इतना कहना था कि तभी तृप्ति कमरे में दाखिल होते हुए बोली और उसके हाथ में पानी का गिलास था,,,)

अरे मम्मी तुमने तो दवा पी ही नहीं लो जल्दी से पी लो,,,।

हां दवा खाना तो मैं भूल ही गई,,,,।

ओहहह बात ही बात में मैं भी दवा देना भूल गया,,,(और इतना कहकर अंकित मेडिकल से लाई हुई दवा निकाल कर देने लगा सुगंधा चाहती थी कि जल्द से जल्द तृप्ति कमरे से बाहर चली जाए और अंकित दवा खाने के बारे में सब कुछ बताएं,,,, और थोड़ी देर में तृप्ति वापस चली गई उसके जाते ही सुगंध फिर से उत्सुकता दिखाते हुए बोली,,,)

अब बता क्या हुआ था,,,,?

मम्मी लेकिन तुम बुरा मत मानना और मेरे बारे में तो बिल्कुल भी गलत मत सोचना,,,,।

अरे मैं कुछ गलत नहीं समझुंगी तु बता तो सही,, ।

ठीक है मैं सब बताता हूं,,,,(उसका इतना कहना था कि फिर से तृप्ति दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई और बाली)

चल अंकित तू मेरी किचन में मदद कर,,,,,, बहुत दिन बाद खाना बना रही हूं इसलिए थोड़ी दिक्कत आ रही है,,,।

अरे मैं क्या करूंगा किचन में आकर,,,,।

किचन में तेरे लायक बहुत कम है चल जल्दी चल,,,,।

(अंकित समझ गया था कि अब उसे जाना पड़ेगा और उसकी मां भी मौके की नजाकत को समझ रही थी इसलिए कुछ बोल नहीं पाई और अंकित वहां से उठकर किचन में चला गया,,,,,,

खाना बनाकर तैयार हो गया था तीनों साथ में मिलकर खाना भी खाएं लेकिन आज तृप्ति सुगंधा और अंकित को अकेले नहीं छोड़ रही थी,,, इसलिए अंकित को मौका ही नहीं मिला सब कुछ बताने का।)

.......................
 
जिस मौके की तलाश में सुगंध थी इस मौके की तलाश में अंकित भी था,,,,। अंकित समझ गया था कि बुखार के बद हवासी में उसकी मां को कुछ भी नहीं मालूम है की दवा खाने में क्या हुआ था और वही वह जानना चाहती थी और इसीलिए अंकित का मन प्रसन्न हुआ जा रहा था क्योंकि वह अब दवा खाने वाली बात में नमक मिर्च लगाकर बताने वाला था लेकिन मौका नहीं मिल रहा था क्योंकि तृप्ति हमेशा साथ में रहती थी,,, सुगंधा की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी सुगंधा को ऐसा था कि रात में तृप्ति जब अपने कमरे में सोने के लिए चली जाएगी तब वहां अंकित को अपने कमरे में बुलाकर दवा खाने वाली घटना के बारे में पूछेगी,,, लेकिन ऐसा नहीं हुआ,,,, क्योंकि तृप्ति भी अंकित के साथ अपनी मां के कमरे में थी जब तक वह सो नहीं गई तब तक वह भी वहां से नहीं हटी,,।

दूसरे दिन सुबह तृप्ति की नींद जल्दी खुल गई क्योंकि वह जानती थी कि उसकी मां की तबीयत खराब है और उसे ही घर का सारा काम करना पड़ेगा,,, काम क्या करना पड़ेगा अपनी मां की तबीयत खराब होने की वजह से वह खुद ही अपनी मां को बिल्कुल भी काम करने देना नहीं चाहती थी,,, उसकी मां बिस्तर में ही थी और वह घर का सारा काम कर चुकी थी उसने अपने भाई अंकित को भी नहीं जागाई,,, उसे भी स्कूल जाना था लेकिन वह चाहती थी कि उसका भाई उसकी गैर मौजूदगी में घर पर उसकी मां का ख्याल रखे,,, अपने भाई को जगाने के ख्याल से उसे उसे दिन वाली घटना याद आ गई जब वह अपनी मां के कहने पर अपने भाई को जगाने के लिए उसके कमरे में गई थी और जिस अस्तव्यस्त हालत में उसे अपना भाई दिखाई दिया था,,, उसे बारे में सोच कर उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी थी एक पल के लिए तो उसे ऐसा लगा कि वह फिर से अपने भाई को जगाने के लिए उसके कमरे में जाए लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई क्योंकि अपने भाई के लंड को देखकर उसके मन में कुछ-कुछ होने लगा था,,,।

उसे घटना को याद करके उसे संदीप याद आ गया और कॉलेज की मैडम के घर में जो कुछ भी हुआ था पल भर में उसकी आंखों के सामने किसी फिल्म की तरह घूमने लगा और एक बार फिर से वह हैरान हो गई थी संदीप के लंड को देखकर और सुबह-सुबह अपने भाई के लंड को देखकर दोनों के लंड की तुलना करना जमीन आसमान को एक करने जैसा था एकदम नामुमकिन जहां एक तरफ संदीप का लंड छोटा सा था वही उसके भाई का लंड एकदम बम पिलाट की तरह मोटा तगड़ा था,,,। और इसीलिए वह अपने भाई कमरे में नहीं जाना चाहते थे क्योंकि वह जानती थी अगर वह अपने भाई के कमरे में कहीं और एक बार फिर से उसके भाई के लंड के दर्शन उसे हुए तो वह अपना काबू खो बैठेगी,,,।

वह तब तक दोनों को सोने दी जब तक कि वह खाना बनाकर तैयार नहीं हो गई,,,, सब कुछ तैयार हो चुका था वह कॉलेज जाने के लिए तैयार हो गई थी और अपनी मां को जगाने के लिए उसके कमरे की तरफ जा ही रही थी कि अंकित अपने कमरे में से बाहर निकल गया वह बहुत हड़बड़ाहट में था क्योंकि उसे भी देर हो चुकी थी उसे हडबडाता हुआ देखकर तृप्ति बोली,,,।

अरे अरे इतना हड़बड़ा क्यों रहा है,,,?

मुझे देर हो गई है दीदी तुमने मुझे उठाया क्यों नहीं,,,

मैंने तो मम्मी को भी नहीं उठाई हूं और तुझे भी जान बुझ कर नहीं उठाई हूं,,,( तृप्ति अपनी कमर पर हाथ रखते हुए,,, और उसके ऐसा करने पर कमर और नितंबों का जो जोड़ होता है,,, वह एकदम से उभरकर दिखाई देने लगा और उसे पर नजर पडते ही अंकित अपने मन में ही बोला पूरी जवान हो गई है दीदी,,,,)

जानबूझकर मे कुछ समझा नहीं,,,।

अरे बुद्धू मम्मी की तबीयत खराब है कोई तो होना चाहिए घर पर उनका ख्याल रखने के लिए,,,।

(तृप्ति का इतना कहना था कि उसे सब कुछ एकदम से याद आने लगा कि उसे तो दवा खाने वाली बात उसकी मां को बताना है और यही मौका भी सही रहेगा जब उसकी दीदी घर पर नहीं रहेगी वह बड़े आराम से नमक मिर्च लगाकर वह बात बता सकेगा,,,, इसलिए तृप्ति की बात सुनकर वह बोला)

बात तो तुम ठीक कह रही हो दीदी,,, चलो कोई बात नहीं मैं घर पर रुक जाता हूं लेकिन खाना,,,।

उसकी चिंता तो मत कर मैं खाना और नाश्ता दोनों तैयार कर चुकी हूं मैं अब कॉलेज जा रही हूं तू ही मम्मी को जगा देना,,,।

ठीक है दीदी तुम जाओ मैं मम्मी को जगा दूंगा,,,,।

(इतना सुनते ही तृप्ति अपनी कॉलेज का बेग अपने हाथ में ले ली और घर से निकलते निकलते बोली,,)

मम्मी को सही समय पर दवाई खिला देना,,,।

ठीक है दीदी तुम जाओ,,,,,।

(तृप्ति कॉलेज के लिए निकल गई अंकित मन ही मन बहुत खुश हो रहा था वह जल्दी से जाकर दरवाजा बंद कर दिया था अब घर में केवल अंकित और उसकी मां ही थी जो खुद जानने के लिए बेताब थी की दवा खाने में क्या हुआ था अंकित भी इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां भी यह जानना चाहती है कि आखिरकार डॉक्टर को उसके पेशाब का सैंपल कैसे मिला,,,, और यह सब अपने मन में सोच कर अंकित बहुत प्रसन्न भी हो रहा था और तेजी भी हो रहा था क्योंकि वहां जानता था कि आप उसे अपनी मां को क्या बताना है आज उसके पास पूरा मौका था अपनी मां के सामने खुलने का,,, वह अपनी मां से इस तरह की बातें करना चाहता था जिस तरह की बातें एक प्रेमी प्रेमिका और पति पत्नी के बीच होती है,,,, इसलिए वह अपनी मां को बिना जगाए पहले खुद नहाने के लिए बाथरुम में चला कर और बाथरूम में जाते ही अपने सारे कपड़े उतार दिया,,,,।

आज उसके बदन में अजीब सी खुमारी छाई हुई थी,,, आज उसे इस बात का एहसास हो रहा था कि घर में केवल वह और उसकी मां ही है एक अजीब सा है उसके तन बदन को रंगत से भर दे रहा था ऐसा एहसास के बाद उसने किसी से संबंध बनाने के लिए मचल उठता है और उसे इस बात का एहसास होता है कि कमरे में केवल वह और उसके साथी है लेकिन यहां मामला कुछ और था वह अपनी मां से सिर्फ बात करने की उद्देश्य से उत्तेजित और जानता था कि उसकी इतनी जल्दी उसके साथ हम बिस्तर होने वाली नहीं है,,,, क्या कभी ऐसा ना भी हो लेकिन फिर भी न जाने के मन में एक तरह की उम्मीद जगी रहती थी,,,।

इसी के चलते बाथरूम के अंदर उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में खड़ा था,,,, अंकित इस बात को बिल्कुल भी नहीं जानता था कि उसके नंगे लंड का दर्शन उसकी मां के साथ साथ उसकी बहन भी कर चुकी है,,, अगर यह बात वह जानता तो शायद उसकी कल्पनाएं और भी ज्यादा रंगीन हो जाती,,,, फिर भी नहाने से पहले अपनी मां के बारे में सोचकर अपने लंड को हिलाना शुरू कर दिया और थोड़ी ही देर में गरम फवारा झाड़ के वह गहरी गहरी सांस लेने लगा,,,।

अंकित नहा चुका था तैयार हो चुका था और रसोई घर में जाकर अपने लिए और अपनी मां के लिए चाय गरम कर रहा था उसकी बहन पहले से ही चाय बनाकर गई थी बस उसे गरम करने की देरी थी,,, थोड़ी देर में चाय गरम हो गई और वह ट्रे में दो कप चाय लेकर और बिस्किट लेकर अपनी मां के कमरे में पहुंच गया कमरे का दरवाजा पहले से खुला हुआ था क्योंकि रात को वह उसकी बहन कमरे से बाहर निकलते समय दरवाजे को खुला छोड़ रखी थी,,,।

अपनी मां के कमरे में अंकित पहुंचा तो देखा उसकी मां बिस्तर पर अस्त व्यस्त हालत में गहरी नींद में सो रही थी,,, साड़ी पूरी तरह से कमर के ऊपरी भाग से हट चुकी थी और उसका भारी भरकम और जवानी से भरा हुआ शरीर अपनी आभा बिखेर रहा था,,,, अंकित तो कुछ देर के लिए अपनी मां को देख नहीं रही क्या उसकी मदहोश कर देने वाली जवानी का रस अपनी आंखों से पिता ही रह गया,,,, उसकी मां पीठ के पास हो रही थी एकदम बेसुध होकर,,, नीचे से साड़ी घुटनों तक उठी हुई थी जिसकी वजह से उसकी मानसिक पिंडलियों एकदम साफ दिखाई दे रही थी उसकी गोरी चिकनी टांग देखकर और उसकी भरी हुई जवानी देखकर एक बार फिर से उसका लंड एकदम से खड़ा हो गया अभी कुछ देर पहले ही वह अपने हाथ से हिला कर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करके आया था लेकिन अपनी मां की गर्म जवानी देखकर एक बार फिर से वह गर्म हो चुका था,,,,।

सुगंधा अपने बेटे से दमदार चुदाई चाहती थी

जिस हालत में उसकी मां सो रही थी अंकित उसे जगाना नहीं चाहता था,,, ब्लाउज में कसा हुआ उसका पपाया जैसी चुचीया,,, सांसों की गति के साथ ऊपर नीचे हो रही थी जिसे देखकर अंकित की हालत खराब हो रही थी वह कुछ देर तक अपनी मां की जवानी को देखता ही रह गया घूरता ही रह गया,,, चिकना मांसल पेट और बीच में गहरी नाभि किसी गुलाबी बुर के क्षेंद से कम नहीं थी,,,, पल भर के लिए अंकित के मन में ख्याल आया कि क्यों ना अपनी उंगली अपनी मां की नाभि में डालकर देखा जाए की कितनी गहरी है और फिर उसे ख्याल आया कि क्यों ना जीभ से चाट कर अपनी मां की नाभि का स्वाद लिया जाए,,,,, और फिर उसके मन में ख्याल आया कि यह सब करने से अच्छा है कि क्यों ना एक बार अपने हाथ को अपनी मां की चूची पर रखकर उसकी गर्मी को महसूस किया जाए वैसे भी चूचियों की गहरी लकीर ब्लाउज से बाहर उभर कर सामने दिखाई दे रही थी गले में सोने की चेन उसकी खूबसूरती को चार चांद लग रही थी,,,,,,।

एक तरफ अपनी मां की मदद उसका देने वाली जवानी की लालच और दूसरी तरफ चाय ठंडा होने की फिक्र उसके दिलों दिमाग पर दबाव सा डाल रहा था,,, आखिरकार चाय ठंडी होने की फिक्र में वह अपनी मां को जगाने लगा,,,।

मम्मी मम्मी कह कर दो बार पुकारा लेकिन उसकी मां दवा के नशे में गहरी नींद में सो रही थी इसलिए वह एक हाथ में प्लेट लेकर दूसरे हाथ से अपनी मां के कंधे को पकड़कर उसे हिलाते हुए जगाने लगा,,,, उसके ऐसा करने पर उसकी मां की आंख हल्के से खुली,,, वह होश में आती इससे पहले ही अंकित बोला,,,।

लो मम्मी तुम्हारे लिए चाय लाया हूं,,,,।

(अंकित की बात सुनकर वहां अपनी दोनों आंखों को सिकुड़ कर खोलते हुए उसे बड़े गौर से अच्छी ऐसा लग रहा था कि जैसे उसे पहचानने की कोशिश कर रही है,,, क्योंकि वह अभी भी नींद में थी लेकिन थोड़ी देर में उसे समझ में आने लगा और जल्दी से उठकर बैठ गई और इधर-उधर देखने लगी दीवार पर टंगी घड़ी में दिखी तो एक घंटा लेट हो चुका था वह एकदम से घबरा गई उसकी घबराहट हडबड़ाहट को अंकित अच्छी तरह से समझता था इसलिए,, जल्दी से अपने हाथ को उसके कंधे पर रख दिया और उसे समझाते हुए बोला,,,,)

आराम से मम्मी आराम से,,,,,।

अरे मुझे तो देर हो गई है,,,,।

तो क्या हो गया मैं ही तुम्हें जगाना नहीं चाहता था,,,।

लेकिन क्यों नहीं जगाना चाहता था,,,?(आश्चर्य से अंकीत की तरफ देखते हुए बोली,,,)

मम्मी तुम्हारी तबीयत खराब है और दो-तीन दिन तक तुम घर पर लेकर आराम करो तुम्हें कोई काम करने की जरूरत नहीं है जब एकदम ठीक हो जाना तब स्कूल जाना और घर का काम करना,,,,।

(अंकित का इतना कहना था कि सुगंधा की नजर अपनी हालत पर गए तो एकदम से उसके होश उड़ गए उसकी साड़ी एकदम बिस्तर पर बिक्री हुई थी कमर के ऊपर वह सिर्फ ब्लाउज में की बाकी उसका पूरा गदराया बदन एकदम से दिखाई दे रहा था,,, एकदम से शर्म से पानी पानी हो गई और तुरंत अपनी साड़ी को व्यवस्थित करने लगी अपनी मां का इस तरह से हडबढ़ाना और शर्माना,,, और शर्माने के साथ-साथ अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करना अंकित और भी ज्यादा उत्तेजित कर गया था,,,,।)

तुम मम्मी बिल्कुल भी चिंता मत करो खाना और नाश्ता दीदी तैयार करके कॉलेज चली गई है,,,।

क्या कह रहा है अंकीत,,,,!(एकदम आश्चर्य से अंकित की तरफ देखते हुए बोली)

हां मम्मी मै सच कह रहा हूं दीदी ने सब कुछ तैयार कर दिया घर की सफाई भी कर दि है,,, और सब कुछ करने के बाद कॉलेज के लिए चली गई,,,।

(अंकित की बात सुनते ही सुगंध मन ही मन बहुत खुश हो रही थी खुश इसलिए हो रही थी कि उसकी दोनों बच्चे उसका बहुत ख्याल रख रहे थे और यही तो चाहिए रहता है मां-बाप को अपने बच्चों से,,,,, सुगंधा अपने बेटे के हाथ में चाय के ट्रे को देख रही थी और अपना हाथ आगे बढ़कर चाय का कप उठा ली और बोली,,,)

वैसे तो तू जानता ही है कि बिना नहाए धोए में चाय नहीं पीती लेकिन आज मुंह बुखार की वजह से ठीक-था लग रहा है इसलिए पीना पड़ रहा है।(चाय के कप को होठो से लगाते हुए बोली,,,)

मैं जानता हूं मम्मी,,, तुम बिना नहाए चाय नहीं पीती लेकिन मैं जानता था कि बुखार की वजह से मन सही नहीं रहता,,, इसलिए मैं चाय गरम करके लेकर आया था,,,,।

तूने बहुत अच्छा किया,,, तू भी पी ले,,,।

हां मम्मी मैं पी रहा हूं,,,,(इतना कहने के साथ है यह अंकित भी चाय का कप हाथ में लेकर अपनी मां के पास ही बिस्तर पर बैठ गया और चाय पीने लगा,,,, और मर ही मन सोचने लगा कि उसकी मां दवा खाने में क्या हुआ था इस बात का जिक्र छेडे तो मजा आ जाए,,,, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था उसकी मां कुछ बोल नहीं रही थी वह सिर्फ अपने मन में यही सोच रही थी कि जब उसका बेटा कमरे में आया था तब वह कितनी अस्त व्यस्त हालत में थी जरूर उसके बेटे की नजर उसके चिकनी कमर उसका चिकना पेट और उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों पर गई होगी,,, उसकी नजर उसकी गहरी नाभि पर भी गई होगी,,, और गहरी नाभि को देखकर पता नहीं क्या सोच रहा होगा,,,, यही सब सो कर सुगंधा के तन बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी वह अपने बेटे से कुछ बोल नहीं पा रही थी,,,,। थोड़ी देर में सुगंधा और अंकित दोनों चाय पी चुके थे,,, अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे बात की शुरुआत की जाए,,,, कुछ देर खामोश रहने के बाद वह बोला,,,,।)

मम्मी तुम दवा भी पी लो,,,, रुको मे देता हूं,,,(और इतना कहने के साथ ही अपनी मां के बिस्तर पर से उठकर खड़ा हो गया और सामने टेबल के ड्रोवर में से,, दवा निकालने लगा जो की रात को उसने ही रखा था,,,, टेबल पर ही मग भरकर पानी पड़ा था उसे धीरे से गिलास में डालकर दवा और पानी दोनों अपनी मां के पास लाया अपनी मां के हाथों में थमा दिया,,, सुगंधा अपने बेटे के हाथ में से दवा में पानी दोनों लेकर पीने लगी,,,, अंकित का मन मचल रहा था बात की शुरुआत करने के लिए लेकिन कैसे की जाए उसे समझ में नहीं आ रहा था कि तभी उसे ख्याल आया और वह बोला,,,)

अरे मम्मी कल की रिपोर्ट कहां पड़ी है दोबारा दवा खाने जाओगी तो रिपोर्ट दिखाना पड़ेगा,,,,।

वही ड्रोवर में ही होगा,,,,(सुगंधा टेबल की तरफ देखते हुए बोली और तुरंत अंकित टेबल के पास गया और ड्रोवर में से रिपोर्ट निकाल कर अपने हाथ में ले लिया,,,, और फिर तुरंत अपनी मां के पास आ गया और दोनों रिपोर्ट को अपने हाथ में संभाल कर रखते हुए बोला,,,)

राहत की बात यह है की रिपोर्ट एकदम नॉर्मल है दो-तीन दिन में तो एकदम आराम हो जाएगा,,,,।

(जानबूझकर अंकित रिपोर्ट वाली बात कर रहा था ताकि उसकी मां को याद आ जाएगी उसे कौन सी बात करनी है और ऐसा ही हुआ रिपोर्ट की बात सुनते ही सुगंधा को भी एकदम से याद आ गया कि वह जानना चाहती थी की दवा खाने में क्या हुआ था,,, इसलिए दवा पीने के बाद वह तुरंत बोली,,,)

अरे हां मैं तो भुल ही गई थी,,, तूने बताया नहीं की दवा खाने में क्या हुआ था,,,,?

अरे हां मम्मी मैं तो भूल ही गया था,,, ठीक है तुम नहा धोकर तैयार हो जाओ तो तुम्हें भी तरोताजा लगने लगेगा,,,।

नहीं नहीं तु मुझे अभी बता दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था वह मुझे बिल्कुल भी याद नहीं है,,,।

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अपनी बड़ी बहन के कॉलेज जाने के बाद अंकित नहा धोकर तैयार हो गया था और अपनी मां को चाय नाश्ता के साथ दवा भी दे दिया था तभी वह बार-बार अपनी मां को रिपोर्ट के बारे में याद दिला रहा था कि उसकी मां को सैंपल वाली बात याद आ जाए और ऐसा ही हुआ सुगंधा को सैंपल वाली बात याद आ गई थी,,,, और वह जिद करने लगी थी की दवा खाने में क्या-क्या हुआ था उसे बताएं क्योंकि उसे कुछ भी याद नहीं है,,, और ऐसा अंकित खुद चाहता था वह अपनी मां को क्लिनिक वाली बात नमक मिर्च लगाकर बताना चाहता था और वह भी तड़प रहा था अपनी मां को सब कुछ बताने के लिए उसके भी अरमान मचल रहे थे आज उसके पास बहुत ही बेहतरीन मौका था,,, एक औरत के साथ गुफ्तगु को करने का,,,,,, मां के साथ नहीं बल्कि एक औरत के साथ क्योंकि वह अपनी मां मैं मां नहीं बल्कि एक प्यासी औरत को देख रहा था,,,।

मम्मी तुम नहा धोकर तैयार हो जाओ फिर मैं बाद में बताता हूं,,,।

नहीं नहीं बिल्कुल भी नहीं वैसे भी मुझे अभी नहाने का मन नहीं कर रहा है तो मुझे पता क्या-क्या हुआ था मैं जाने के लिए बेकरार हूं क्योंकि मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि तू मुझे कब दवा खाने लेकर गया कब सैंपल दिया कुछ भी मुझे याद नहीं है,,,, ऐसा मेरे साथ पहले कभी नहीं हुआ था,,,।

अरे मम्मी में भागा थोड़ी जा रहा हूं,,, मैं सब कुछ बता दूंगा लेकिन पहले ना धोकर फ्रेश तो हो जाओ,,,।

और मैं भी तुझे बता दी हूं की अभी मैं नहीं नहाउंगी तुझे मेरी कसम सब कुछ सच-सच बता,,,।

(अपनी मां की बात सुनकर और उसकी दी हुई कम को सुनकर अंकित एकदम शांत हो गया कुछ देर के लिए कमरे में खामोशी छाई रही तो इस खामोशी को खुद सुगंध तोड़ते हुए बोली,,)

क्या हुआ तु चुप क्यों हो गया बताता क्यों नहीं,,,!

अब क्या बताऊं मम्मी मैं तुमको नहीं बताना चाह रहा हूं और तुम मुझे कसम दे रही हो सब कुछ सुनाने के लिए मैं नहीं चाहता कि क्लीनिक में जो कुछ भी हुआ मैं तुम्हें बताऊं वह सब तुम्हारा बुखार करना चाहता तुम्हें कुछ भी याद नहीं है और सही है की याद नहीं है वरना तुम ना जाने क्या सोचोगी,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा को बिल्कुल शक होने लगा कि जरूर क्लीनिक में कुछ ना कुछ हुआ है और इसीलिए अंकित बात नहीं रहा है इसलिए वह पूरी तरह से अंकित को विश्वास में लेते हुए बोली,,,)

देख अंकित अगर मेरे मन में कुछ होता तो मैं तुझे बताने के लिए बोलती ही नहीं लेकिन मैं जानना चाहती हूं कि वहां पर क्या हुआ है इसलिए तो मैं तुझसे पूछ रही हूं और बिल्कुल भी चिंता मत करना कुछ बोलने वाली नहीं हूं,,,।

मम्मी तुम मुझे कसम देकर मजबूर कर रही हो,,,, मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता हूं लेकिन अगर तुम मुझे मजबूर कर रही हो तो मैं भी तुम्हें बताने के लिए तैयार हूं लेकिन इससे पहले तुम्हें मेरी कसम खानी होगी,,,।

(ऐसा कहकर अंकित पूरी तरह से अपनी मां को अपनी कसम के दायरे में बांध लेना चाहता था ताकि वह जो कुछ भी बोले,,, उसे पर उसकी मां को विश्वास करने के सिवा और कोई रास्ता ना हो और उसकी बातों को सुनकर वह नाराज ना हो,,,,)

तेरी कसम,,,।

हां मम्मी मेरी कसम ताकि तुम मेरे बारे में कुछ उल्टा सीधा ना सोचो,,,,,।

अच्छा बाबा तेरी कसम खाती हूं मैं तुझे गलत नहीं समझुंगी,,,(कसम खाते हुए सुगंधा का अधिक जोरों से धड़क रहा था वह जल्द से जल्द अंकित के मुंह से सब कुछ सुनना चाहती थी और अंकित अपनी कसम दिल कर अपनी मां को पूरी तरह से अपनी विश्वास में लेकर अपनी बातों को नमक मिर्च लगाकर बताने के लिए अपने लिए अपने आपको तैयार कर चुका था,,, जैसे ही उसकी मां ने उसकी कसम खाई अंकित मन ही मन प्रसन्न होने लगा,,,, और अपनी बात की शुरुआत करते हुए बोला,,,,)

अब जब तुम मेरी कसम खा ही गई हो तो मैं तुम्हें सब कुछ बता देता हूं,,, , देखो दोपहर को जब मैं घर पर लौटा दो बाहर ताला नहीं लगा था तो मैं समझ गया घर पर कोई ना कोई तो आ ही गया है लेकिन यह नहीं मालूम था कि घर पर कौन है,,,,, मैं दरवाजे पर 10 तक दे नहीं बना था कि दरवाजे पर हाथ रखते ही दरवाजा अपने आप खुल गया और मैं धीरे से अंदर प्रवेश किया,,,,,।

(सुगंधा अपने बेटे की बात को बड़ी गौर से सुन रही थी)

ऐसा पहले कभी हुआ नहीं था कि दरवाजा खुला छोड़ा हो इसलिए मुझे थोड़ा अजीब लगा मैं घर में प्रवेश करके इधर-उधर देखने लगा लेकिन कोई नजर नहीं आया तो मैं दीदी के कमरे के पास गया कि दीदी का कमरा भी बंद था,,,,, और जब तुम्हारे कमरे के पास पहुंचा तो तुम्हारे कमरे का दरवाजा खुला हुआ था,,,, मुझे थोड़ा अजीब लगा मैं धीरे से तुम्हारे कमरे में प्रवेश किया तो तुम अपनी बिस्तर पर सो रही थी,,,, सो क्या रही थी मम्मी तुम दर्द से कंहर रही थी,,, मुझे तो कुछ समझ में नहीं आया कि क्या हुआ जब मैं तुम्हारे करीब पहुंचा तो देखा तुम बिस्तर पर बसु धोकर सो रही थी तुम्हारी साड़ी का पल्लू बिस्तर के नीचे लटक रहा था,,,,(अंकित ने जैसे ही साड़ी का पल्लू बिस्तर के नीचे लटक रहा था यह बात किया सुगंधा के तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगी और वह अपने मन में सोचने लगी की साड़ी का पल्लू जब नीचे लटक रहा था तो इसका मतलब है कि उसकी छाती एकदम साफ दिखाई दे रही होगी उसकी चूचियां उसकी सांसों की गति के साथ ऊपर नीचे हो रही होगी और यह सब अंकित अपनी आंखों से देख लिया होगा,,,, यह ख्याल उसके मन में आता है उसकी दोनों टांगों के बीच हलचल होने लगी,,,,, अंकित की बात सुनकर सुगंधा बोली,,,)

तब तूनेक्या किया,,,,?

करना क्या था मेरे तो होश उड़ गए तुम्हारी हालत खराब थी तुम्हें बहुत दर्द हो रहा था और तुम दर्द से कहर रही थी,,, मुझे कुछ समझ में नहीं आया तो अपना हाथ तुम्हारे माथे पर रखकर देखने लगा तुम्हारा माथा तुम्हारा बदन बुरी तरह से गर्म था तुम्हें बड़े जोरों का बुखार था,,, तुम्हारी आदत देखकर मैं समझ गया की हालत गंभीर है मैं तुम्हें उठाने लगा लेकिन तुम अपने होश में नहीं थी,,,, मैं तुमसे बोला भी कितने बड़ी जोरों की बुखार है तुम्हें दवा खाने ले जाना पड़ेगा लेकिन तुम क्या बोली तुम्हें मालूम है,,,।

नहीं मुझे तो कुछ भी नहीं मालूम,,,,।

तुम मुझे बोली कि जाकर मेडिकल से गोली ला दे आराम हो जाएगा,,,,।

फिर तूने क्या किया,,,,?

करना क्या था मैं समझ गया था कि मेडिकल से दवा लाने से काम बनने वाला नहीं है इसलिए मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर उठाने लगा और बोला की दवा खाने चलना होगा,,,, लेकिन तुम तो उठने को तैयार ही नहीं थी तुम जाने को भी तैयार नहीं थी लेकिन मैं जानता था कि अगर इस तरह तुम्हें छोड़ दिया गया तो मामला ज्यादा बिगड़ जाता तुम्हारी तबीयत और ज्यादा खराब हो जाती और तुम्हें दवा खाने में एडमिट करना पड़ता,,,,।

बाप रे मेरी तबीयत इतनी ज्यादा खराब हो गई थी,,,(सुगंधा आश्चर्य जताते हुए बोली,,)

तो क्या मम्मी तुम्हारी तबीयत बहुत खराब थी तुम दवा खाने को जाने को तैयार नहीं घर में कोई था भी नहीं दीदी अगर होती तो शायद मुझे इतनी दिक्कत नहीं होती लेकिन वह भी नहीं थी और तुम्हें दवा खाने ले जाना बहुत जरूरी था मैं जबर्दस्ती तुम्हें उठाकर बिस्तर पर बिठाया,,,,एक तो तुम्हारे में बिल्कुल भी ताकत नहीं थी,,, बिस्तर पर बैठने के बावजूद तुम इधर-उधर लुढ़क जा रही थी तुम्हें संभालना मुश्किल हुआ जा रहा था,,,,, जैसे तैसे करके मैं तुम्हें सहारा देकर खड़ी किया,,,,,,।

(सुगंधा बड़ी गौर से अपने बेटे की बात सुन रही थी उसकी उत्सुकता और ज्यादा बढ़ती जा रही थी कि आगे क्या-क्या हुआ होगा,,, तभी अंकित ने ऐसी बात कह दी सुगंधा की तो बुर से पानीबहने लगा,,,,)

तुम्हें मैं कमरे से जैसे तैसे करके बाहर लेकर आया मैं अपना हाथ तुम्हारी बाहों में डालकर तुम्हें पकड़े हुए था ताकि तुम गिर ना जाओ लेकिन सबसे ज्यादा परेशान कर रहा था तुम्हारे साड़ी का पल्लू जो बार-बार तुम्हारे कंधे से नीचे गिर जा रहा था और सब कुछ दीख जा रहा था,,,,।

(

(सब कुछ दिख जाने वाली बात सुनकर सुगंधा के तन बदन में एकदम से आग लग गई सब कुछ दिख जाने का मतलब अच्छी तरह से समझ रही थी लेकिन फिर भी अनजान बनते हुए बोली।।)

सबकुछ दिख जा रहा था मतलब,,,,।

मतलब की मम्मी साड़ी का पल्लू नीचे गिर जाने से तुम्हारी छाती एकदम से दिखने लगती थी,,,,,, मुझे तो समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करु,,,,।

इसमें समझने वाली कौन सी बात थी साड़ी का पल्लू ठीक कर देता,,,।

ऐसा तो मैं बार-बार किया था लेकिन जब तक घर में थी तब तक तो ठीक था मैं सोच रहा था कि अगर बाहर तुम्हारे साड़ी का पल्लू नीचे गिर गया तो गजब हो जाएगा,,,,।

कैसा गजब हो जाएगा मैं कुछ समझी नहीं,,,।

तेरी मम्मी तुम तो एकदम पूरी हो तुम नहीं जानती बाहर मर्दों की नजर कैसी रहती है एक खूबसूरत औरत की साड़ी का पल्लू अगर कंधे पर से नीचे गिर जाए तो आने जाने वाले सब की नजर औरतों की छाती पर ही गड़ी रह जाए देखकर पागल हो जाए,,,,।

(अंकित बड़ी हिम्मत करके इतना कुछ भूल गया था और अपनी मम्मी का चेहरा देख रहा था उसे साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी कई बातों को सुनकर उसकी मम्मी का चेहरा शर्म के मारे सुर्ख लाल होने लगा है,,,, और सुगंधा भी अपने बेटे की बात सुनकर अंदर ही अंदर उत्तेजना से भर जा रही थी,,,, वह अपने बेटे के कहने का मतलब को अच्छी तरह से समझ रही थी वह यह भी जानती थी कि उसके खुद की बेटी की नजर उसकी छाती पर घूमती रहती है,,,,, अभी कुछ देर पहले ही उसने यह एहसास भी किया था जब वह सो रही थी और उसके साड़ी का पल्लू एकदम से अस्त्र-शस्त्र था और उसकी छाती एकदम से उजागर हुई नजर आ रही थी,,,,)

बाप रे क्या सच में मर्दों की नजर ऐसी होती है,,,।

(सुगंधा एकदम से अनजान बनते हुए बोली लेकिन अपनी मम्मी की बात से अंकित बिल्कुल भी सहमत नहीं था क्योंकि वह जानता था कि उसकी मम्मी भी बाहर मर्दों की नजर से अच्छी तरह से वाकिफ है लेकिन ऐसा जानबूझकर बोल रही है फिर भी वह अपनी मां की बात सुनकर बोला)

तो क्या मम्मी सबकी नजर ऐसी ही होती है,,,।

लेकिन तुझे कैसे मालूम,,,,?

अरे यह सब मालूम हो जाता है मेरे कुछ दोस्त हैं जब भी उनके साथ इधर-उधर घूमने जाओ तो वह लोग औरतो को ही देखते रहते हैं,,,।

क्या कहते हैं तेरे दोस्त,,,,?

पूछो मत मम्मी बहुत खराब खराब बोलते हैं मुझे तो बताने में भी शर्म आ रही है,,,,,।

अरे बता भी दे मुझसे कैसा शर्माना,,,, वैसे भी मैं तेरी कसम खाई हूं तुझे कुछ बोलेगी नहीं,,,।

(अपनी मां की बात सुनकर और उसकी उत्सुकता देखकर अंकित का लैंड खड़ा होने लगा था उसी तरह की बातें करने में बहुत मजा आ रहा था और वह भी अपनी मां से पहली बार अपनी मां से इस तरह की बातें कर रहा था इसलिए वह भी थोड़ा खुल जाना चाहता था इसी बहाने वह भी एक औरत से किस तरह से अश्लील बातें की जाती है वह एहसास महसूस करना चाहता था,, इसलिए बोला,,,)

ठीक है तुम रहती हो तो बता देता हूं वैसे बताने लायक बात नहीं थी मेरे दोस्त हमेशा औरतों को देखकर वैसे तो कोई औरत आगे से आती रहती है तो उन लोगों की नजर औरतों की छाती पर ही जाती है और अगर पीछे से देखते हैं तो औरतों की गांड पर ही उनकी नजर जाती है,,,,,(अपने मुंह से औरतों की गांड शब्द का प्रयोग करके और अभी अपनी मां के सामने वह पूरी तरह से मदहोश होने लगा था,,, सुगंधा भी अपने बेटे के मुंह से औरत की गांड शब्द सुनकर मस्त हुए जा रही थी,,, कोई और समय होता तो शायद उसका बेटा इस तरह की बात नहीं करता लेकिन हालात और मौका दोनों बदल चुके थे सुगंध भी अपने बेटे को इस तरह से बात करने नहीं देती अगर कोई और समय होता तो लेकिन इस समय वह भी मजबूर थी अपनी बेटी के मुंह से इस तरह की बातें सुनकर वह भी मस्त हो जा रही थी इसलिए वह उसे रोकी नहीं,,, और अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)

मैं तो यह सब सुनकर उन लोगों से दूर हो जाता हूं,,,।

औरतों की गांड और छाती देखकर ऐसा क्या कहते हैं तेरे दोस्त जो तू एकदम से उन लोगों से दूर हो जाता है,,,,।

(सुगंधा भी गांड और छाती का प्रयोग बड़े खुलकर अपने बेटे के सामने कर रही थी,,, जिसे सुनकर अंकित का लंड हलचल महसूस कर रहा था,,,)

अरे मम्मी वह लोग बहुत गंदा गंदा बोलते हैं,,, वह लोग इतने हारामी है कि कुछ भी बोल देते हैं बोलते हैं है इसकी चूचियां कितनी बड़ी-बड़ी है मेरे हाथ में आ जाए तो दबा दबा कर इसका दूध पी जाऊं,,,,।

हाय दैया ऐसा बोलते हैं,,,,(सुगंधा भी जानबूझकर हैरान होने का नाटक करते हुए बोली,,,)

तो क्या मम्मी और फिर किसी औरत की गांड देख लेते हैं बड़ी-बड़ी है तो बोलेंगे इसका आदमी कितना खुश नसीब होगा जो ऐसी औरत पाया है इतनी बड़ी-बड़ी गांड पाकर ना सोता होगा ना सोने देता होगा,,,,,,,।

(हाय दइया तेरे दोस्त इतने बेशर्म है,,,,)

तो क्या मम्मी मेरी तो हाथ खराब हो जाती है उन लोगों की इस तरह की बातें सुनकर ऐसे मम्मी मुझे समझ में नहीं आया कि वह लोग कहते हैं कि ना खुद सोते हैं ना सोने देते इसका मतलब क्या हुआ,,,,!(अंकित जानबूझकर अनजान बनते हुए अपनी मां से पूछ रहा था वह जानना चाहता था इसके मतलब को अपनी मां के मुंह से और यह बात सुनकर सुगंधा के चेहरे पर एकदम से हवाइयां उड़ने लगी और उसका चेहरा शर्म के मरे टमाटर की तरह लाल हो गया वह अपने बेटे की बात सुनकर गोल-गोल जवाब देते हुए बोली,,,)

अरे,,, कोई खूबसूरत औरत को देखकर किसी की नींद उड़ जाती होगी इसी बारे में बोल रहे होंगे,,,,।

हां यह भी हो सकता है,,,,,

अच्छा यह बता फिर तु कैसे ले गया मुझे,,,,(एक पल के लिए सुगंधा का मन कह रहा था कि अपने बेटे से सब कुछ बता डाले औरत और मर्दों के बीच के संबंध को लेकर वह बता दे की मर्द कब सोता नहीं और नहीं औरत को सोने देता है वह चुदाई के बारे में खुलकर अपने बेटे से बात करें लेकिन ऐसा करने से उसे अजीब सा लग रहा था वैसे तो वह अपने बेटे से एकदम से खुल जाना चाहती थी लेकिन न जाने क्यों वह इस तरह की बातें करने से और वह भी खुलकर थोड़ा घबरा रही थी,,,, इसलिए बात को एकदम से घूमाते हुए बोली,,,)

फिर क्या मम्मी जैसे तैसे करके मैं तुम्हारी साड़ी के पल्लू को फिर से ठीक किया और तुम्हें सहारा देकर धीरे-धीरे घर से बाहर लेकर आया तभी ओटो को आवाज देकर बुलाया और उसमें,,, तुम्हें बिठाकर जैसे तैसे करके दवा खाने पहुंचा,,,,।

(जिस तरह की बातें मां बेटे के बीच हो रही थी अंकित की हालात पूरी तरह से खराब हो गई थी उसका लंड अपनी औकात में आकर खड़ा था और पेट में तंबू बनाया हुआ था और वह उसे छुपाने की कोशिश करते हुए बार-बार अपने हाथ से अपने लंड को दबा दे रहा था और उसकी यह हरकत उसकी मां से बिल्कुल भी छुपी नहीं होती सुगंधा भी अपने बेटे की हरकत को देखकर अंदर ही अंदर गर्म हो रही थी,,,,। वैसे उसकी खुद की बुर पानी छोड़ रही थी,,, फिर भी गहरी सांस लेते हुए वह बोली,,,)

फिर क्या हुआ,,,? दवा खाने में तो भीड़ होगी,,,!

नहीं मम्मी किस्मत अच्छी थी दवा खाने में उसमें कोई भी नहीं था और डॉक्टर का कंपाउंडर खाना खाने घर गया था,,।

फिर,,,,(सुगंधा की भी पेंटि गीली रही थी इसलिए वह भी,,, ना चाहते हुए भी अपने हाथ से अपनी पैंटी को सही करते हुए बोली और उसकी यह हरकत को अंकित भी बड़ी गौर से देख रहा था और उत्तेजित हुआ जा रहा था,,,,)

फिर क्या फिर से तुम्हें सहारा देकर में जैसे तैसे करके डॉक्टर के केबिन में पहुंच डॉक्टर अकेले ही आराम कर रहा था,,,,, और फिर मैं तुम्हें डॉक्टर के सामने वाली कुर्सी पर बैठा दिया,,,,।

फिर क्याहुआ,,,?
 
फिर डॉक्टर तुम्हारा चेकअप करने लगा,,,, वैसे मम्मी जब कभी भी मैं तुम्हारे साथ गया हूं तो डॉक्टर अपना आला तुम्हारी पीठ पर लगाकर चेक करता था ना,,,,।

हां और ऐसे ही डॉक्टर को चेक भी करना चाहिए औरतों के मामले में,,,,,।

हां मम्मी मैं भी तो यही सोच रहा था लेकिन डॉक्टर की आंखों के सामने तुम्हारी शाडी का पल्लू एकदम से नीचे गिर गया और साला डॉक्टर तो तुम्हारी छाती को देखता ही रह गया,,,,।

(जिस तरह से अंकित बता रहा था उसकी बात सुनकर सुगंध एकदम से हैरान हो गई और वह एकदम से हैरान होते हुए बोली)

क्या कह रहा है अंकित तु,,,

मैं सच कह रहा हूं मम्मी साड़ी का पल्लू गिरते ही डॉक्टर तुम्हारी छाती की तरफ देखने लगा उसकी तो आंखें फटी जा रही थी मुझे लगा शायद तुम्हारी तबीयत का कुछ जांच पड़ताल कर रहा है लेकिन जल्दी मुझे पता चल गया कि वह क्या देख रहा था,,,

क्या देख रहा था वह,,,,।

मम्मी मुझे तो बताते शर्म आ रही है,,, कोई और समय होता तो मैं उसका मुंह तोड़ देता लेकिन तुम्हारी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी इसलिए मैं कुछ बोल नहीं पाया,,,।

लेकिन क्या देख रहा था वो,,,(एकदम से उत्सुकता दिखाते हुए सुगंधा बोली)

मम्मी अब मैं क्या कहूं तुम्हारी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिरते ही एक बार फिर से तुम्हारी छाती एकदम से उजागर हो गई और वह जो ब्लाउज के बीच में से लकीर दिखती ना गहरी गहरी,,,,,(हाथ की उंगली से अपनी मां के छाती की तरफ इशारा करते हुए और उसके इशारे को देखकर सुगंधा एकदम शर्म से पानी पानी हो गई उसके कहने के मतलब को सुगंधा अच्छी तरह से समझ गई,,, वह समझ गई कि उसका बेटा चूचियों के बीच की उभरी हुई लकीर के बारे में बात कर रहा है,,,,,)

हां,,,,, मैं समझ गई आगे बात,,,,।

हां मम्मी वहीं आंख फाड़े देख रहा था,,,, एक तो तुम इतनी बीमार थी कि अस्त-व्यस्त हालत में हो जा रही थी तुम्हारी साड़ी का पल्लू नीचे गिर जा रहा था कभी तुम्हारा सर इधर-उधर हो जा रहा था वह तो गनी मत था मम्मी के तुम्हारे ब्लाउज का बटन खुला हुआ नहीं था,,,।

तो क्या हो जाता,,,,?(एकदम से तिरछी नजर से अंकित की तरफ देखते हुए बोली)

अरे फिर तो डॉक्टर किसी न किसी बहाने छु देता,, और दबा भी देता,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर तो सुगंधा के बदन में उत्तेजना की चिंगारी फूटने लगी वह अच्छी तरह से समझ रही थी कि उसका बेटा क्या कहना चाह रहा है लेकिन फिर भी अनजान बनते हुए बोली,,,)

अरे किसको दबा देता छु देता,,,।

अरे मम्मी तुम्हारी चू,,,(हाथ का इशारा अपनी मां की छाती की तरफ और अधूरा शब्द बोलकर एकदम से खामोश हो गया और अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा की बुर पानी छोड़ने लगी,,,, उसकी सांसे एकदम से ऊपर नीचे होने लगी क्योंकि उसका बेटा चुची शब्द कहते-रहते रह गया था,,,, फिर भी अपने आप को सहज करते हुए वह बोली)

अरे अगर बटन खुला होता तो क्या तू बंद नहीं करता मुझे तो बिल्कुल भी होश नहीं था तुझे तो बंद कर देना चाहिए था ना,,,।

मुझे तो करना ही पड़ता मम्मी क्योंकि मैं नहीं चाहता कि किसी और की नजर तुम्हारे पर पड़े लेकिन उसे समय में खामोश रहे गया था तुम्हारी तबीयत का जो मामला था,,,,।

इसके बाद तूनेक्या किया,,,?

डॉक्टर की नजर को पहचान कर मैं जल्दी से तुम्हारी साड़ी के पल्लू को ठीक कर दिया लेकिन बुखार नापने के बहाने उस हरामी डॉक्टर ने क्या किया पता है,,,।

क्या किया,,,?

हारामी ने मुझसे बोला कि अपनी मां की साड़ी के पल्लू को थोड़ा हटाओ,,,

फिर,,,,(सुगंधा धड़कते दिल के साथ बोली,,, उसके बदन में भी हलचल होने लगी थी वह जानती थी कि इस तरह की हरकत डॉक्टर करते नहीं है लेकिन उसका बेटा बता रहा था तो हो सकता है डॉक्टर ने इस तरह की हरकत किया हो,,,)

फिर क्या मैं भी हाथ आगे बढ़कर तुम्हारी शादी के पल्लू को तुम्हारी छाती से थोड़ा सा हटा दिया,,,, और डॉक्टर अपने आला को तुम्हारी उस पर,,(एक बार फिर से उंगली से इशारा करते हुए,,,, अंकित अपनी मां की चूची दिखाने लगा सुगंधा के सांस ऊपर नीचे हो रही थी उसकी हालत खराब हो रही थी वह भी अपने बेटे का साथ देते हुए अपनी उंगली से अपनी चूची की तरफ इशारा करते हुए इशारे में ही बात की तो अंकित अपनी मां का इशारा देखकर बोला,,,)

इससे थोड़ा ऊपर,,,,।(अंकित का भी दिल जोरो से धड़क रहा था वह अपनी मां से एक तरह से अश्लील बातें ही कर रहा था ऐसी बातें जो मर्द और औरत के बीच ही मुमकिन होती है एक मां और बेटे के बीच नहीं लेकिन एक मां और बेटे दोनों अपनी मर्यादा को पार कर रहे थे,,, सुगंधा भी अंकित की बात सुनकर थोड़ी बेशर्मी दिखाते हुए अपने हाथ से साड़ी के पल्लू को अपनी छाती से थोड़ा सा हटाते हुए अपनी उंगली को अपनी चूची की गोलाई के ऊपरी भाग पर जहां से गोलाई का शुरूआत होती है वहां पर रख दी,,, अपनी मां की इस अदा पर तो अंकित की हालात पूरी तरह से खराब हो गई वह एकदम से उत्तेजित हो गया उसकी लंड की नशे एकदम से उभर आई,,, और वह एकदम से उत्तेजित स्वर में बोला ,,,)

बस बस मम्मी यहीं पर,,, यहीं पर वह डॉक्टर अपना आला,,, लगाकर तुम्हारा बुखार चेक करने लगा और एक बार नहीं बल्कि काफी बार उसने ऐसा किया,,,।

लगता है उसकी नियत खराब हो रही थी,,,,।

तो क्या मम्मी,,, क्योंकि मैं आज तक इस तरह से डॉक्टर को औरत का चेकअप करते नहीं देखा,,,,।

(अंकित की बातों को सुनकर दीवाल का सहारा लेकर वह ऊपर छत की तरफ देखने लगी और गहरी सांस लेने लगी उसका साड़ी का पल्लू अभी भी उसकी छाती से थोड़ा सा जाता हुआ था और वह जानबूझकर गहरी सांस ले रही थी ताकि सांसों के गति के साथ उसकी ऊपर नीचे हो रही छाती पर उसके बेटे की नजर जाए और ऐसा ही हुआ,,,, अंकित की नजर तुरंत अपनी मां की बड़ी-बड़ी छातियों पर चली गई,, और अपने बेटे की हरकत को,,, सुगंधा चोर नजरों से देख रही थी उसकी हरकत को देखकर मन ही मन उत्तेजित और प्रसन्न दोनों हो रही थी,,, कुछ देर की खामोशी के बाद वह फिर से अंकित की तरफ देखतेहुए बोली,,,।

इसके बाद क्या हुआ,,,,?

(सुगंधा की बातें सुनकर अंकित समझ गया था कि उसकी मां सबसे ज्यादा उत्सुक सैंपल वाली बात जानने के लिए है,,, इसलिए वह भी बोला,,,)

फिर क्या मम्मी डॉक्टर ने दवाई दिया और बोला ब्लड और पेशाब का सैंपल देना पड़ेगा,,,,।

फिर मुझे तो कुछ मालूम ही नहीं था यह सब कैसे लिया गया,,,,,।

वही तो बता रहा हूं मम्मी,,,, मैं तुम्हें सहारा देकर वापस डॉक्टर के केबिन से बाहर लाया वही दवा खाने में ही बाथरूम है बाथरूम में ही सब कुछ मौजूद था,,,, मैं धीरे-धीरे तुम्हें बाथरूम के पास लाया और तुम्हें सब कुछ बता दिया अंदर ही परखनली भी थी,,,, लेकिन तुम्हारी हालत देखकर मुझे लग नहीं रहा था कि तुम बाथरुम में अकेले जा पाओगी,,,।

(अपने बेटे की बात सुनते ही सुगंध के दिल की धड़कन एकदम से बढ़ गई उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में अजीब सी हलचल होने लगी उसे साफ महसूस हो रहा था कि अपने बेटे की बात सुनकर वह उत्तेजित हुए जा रही थी और उत्तेजना के मारे उसकी बुर कचोरी की तरह फुल रही थी पंचक रही थी,,,, वह और भी ज्यादा उत्सुक हो गई थी आगे की बात जानने के लिए इसलिए बोली ,,,)

फिर तूने क्या किया,,,,?

मैंने क्या किया मैं बाहर ही खड़ा रहा और तुम्हें अंदर जाने के लिए बोला जैसे तैसे तुम दरवाजा खोलकर अंदर जाने को भी लेकिन दरवाजे पर ही खड़ी रह गई तुम्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना है मुझे भी घबराहट हो रही थी कि तुम भला कैसे पेशाब का सेंपल दे पाओगी तुम्हे तो खड़े रहने की भी ताकत नहीं थी,,,, कुछ देर तक मैं खड़ा रहा इधर-उधर देखता रहा लेकिन तुमसे कम भी आगे बढ़ने जा रहा था और तुमने खुद मेरी तरफ देखकर इशारा करते हुए मुझे भी अंदर आने के लिए बोली इतना सुनकर तो मेरी हालत खराब हो गई भला मैं कैसे एक औरत के साथ बाथरूम के अंदर जा सकता हूं अगर यह कोई देख लेता तो कितने शर्म की बात होती,,,,।

(अपने बेटे की बातों को सुनकर सुगंध का बदन उत्तेजना से कसमसा रहा था उसकी बुर लगातार पानी फेंक रही थी वह अपने बदन में अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव कर रही थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और फिर कांपते हुए स्वर मेंबोली,,,)

फिर क्या हुआ,,,,?

फिर क्या मम्मी मुझे ना चाहते हुए भी तुम्हारे साथ बाथरूम के अंदर जाना पड़ा तुम्हें सहारा देखकर मैं बाथरूम के अंदर लेकर और दरवाजा बंद कर दिया ताकि कोई देख ना ले और जल्दी से फर्क नाली को तुम्हारे हाथों में दे दिया और बोला कि तुम इसके अंदर पेशाब का सैंपल ले लेना,,,।

तू मेरे साथ बाथरुम मेंही था,,,,(एकदम से आश्चर्य जताते हुए सुगंधा बोली)

और क्या करता मम्मी मजबूरन मुझे भी अंदर रहना पड़ा तुम अपने हाथ से परखनली तो ले ली और धीरे-धीरे अपनी साड़ी को ऊपर की तरफ उठाने लगी,,,।

(इतना सुनकर सुगंधा के बदन में उत्तेजना की चिंगारी फुट में रखें उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था उसे अजीब सा एहसास हो रहा था उसके बदन में मदहोशी जा रही थी उसे ऐसा लग रहा था कि इसी समय वह अपने बेटे के साथ कुछ कर बैठेगी,,, अपने बेटे की बात सुनकर सुगंध बोली,,,)

और तु मुझे ही देख रहा था,,,.

क्या करता मम्मी मजबूर था मुझे इस बात का डर था कि कहीं तुम बाथरुम में गिर ना जाओ तुम्हें चोट लगने का डर था इसलिए मुझे ना चाहते हुए भी तुम्हारी तरफ देखना पड़ा,,,

फिर मैंने क्या की,,?

तुम तो बुखार के नशे में थी तुम्हें तो बिल्कुल भी होश नहीं था जैसे तैसे करके तुम अपनी साड़ी को कमर तक उठा ली थी,,,।

(अपने बेटे की बातों में सुगंध को नशा महसूस हो रहा था वह उसकी बातों में पूरी तरह से खो चुकी थी और अपनी आंखों के सामने कल्पना करने लगी थी कि कैसा-कैसा बाथरूम में हुआ होगा वह मदहोश हो जा रही थी उत्तेजना उसके धीरे दिमाग पर पूरी तरह से हावी होती जा रही थी,,,,, और अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)

तुम अपनी साड़ी कमर करके उठा लेती लेकिन तुम्हें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना है तुम उसी तरह से ऐसा लग रहा था कि जैसे नशे में झूम रही हो मैं तुम्हें आवाज देते हुए बोला,,,,।

मम्मी पेशाब का सैंपल लेना है,,,,।

मेरी बात सुनकर ऐसा लगा कि जैसे फिर से तुम्हें होश आया हो और तुम मेरी तरफ देखने लगी और अपने एक हाथ से अपनी चड्डी को नीचे करने लगी लेकिन तुमसे हो नहीं रहा था तुमसे अपनी चड्डी ठीक से पकड़ी नहीं जा रही थी तुम अपनी चड्डी नहीं उतर पा रही थी,,,,(अंकित जानबूझकर अपनी मम्मी के सामने चड्डी वाली बात कर रहा था बार-बार अपनी मां के सामने इस तरह चड्डी का प्रयोग करके वह अपनी मां को उत्तेजित कर रहा था और उसकी मां बार-बार अपने बेटे के मुंह से अपनी चड्डी का जिक्र सुनकर मदहोश हुए जा रही थी पागल हुए जा रही थी,,, और वह धीरे से बोली,,,)

फिर मैंने क्या की,,,?

फिर कुछ देर तक तुम कोशिश करती रही लेकिन तुमसे हुआ नहीं तो तुम मेरी तरफ देखते हो मैं तुम्हारी तरफ देखने लगा मुझे भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर सैंपल मिलेगा तो कैसे मिलेगा,,,, और तुम मुझसे बोली,,,,।

तू ही उतार दे मुझसे नहीं हो रहा है,,,।(ऐसा कहते हुए अंकीत का लंड अपनी औकात में आ गया था,,,,,, क्योंकि वह अपनी मां के सामने उसकी ही चड्डी उतारने वाली बात कर रहा था और जिस तरह का सुरूर अंकित के ऊपर छाया हुआ था वही खुमारी उसकी मां के ऊपर भी छाने लगी थी,,, वह अपने मन में कल्पना करने लगी की बाथरूम में कैसा-कैसा हुआ होगा वह कहते हुए कैसा महसुस कर रही होगी वह पूरी तरह से पागल हुए जा रही थी,,, उसकी चड्डी पूरी तरह से गीली हो रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी चड्डी पर कोई पानी डाल दिया हो,,,, अपने बेटे की बात सुनकर वह अपने बेटे से नजर मिलाए बिना ही बोली,,,।)

करना क्या था मम्मी तुम जैसा कहीं मुझे करना ही था क्योंकि मुझे डर कहीं डॉक्टर अगर बाहर आ गया और हम दोनों को बाथरूम में देखेगा तो वह क्या सोचेगा उसे तो खुला मौका मिल जाएगा,,,,, इसलिए तुम्हारी बात मानते हुए मैं अपना हाथ आगे बढ़ाकर,,,,, तुम्हारी चड्डी को दोनों हाथों से पकड़ लिया और उसे नीचे की तरफ खींचने लगा,,,, सच कहूं मम्मी तो मुझे बहुत खराब लग रहा था लेकिन मैं क्या करूं मैं मजबूर हो गया था तुम्हारे पेशाब का सैंपल जो लेना था और देखते ही देखते मैं तुम्हारी चड्डी को तुम्हारी घुटनों का खींच दिया था तुम अपनी साड़ी को कमर तक उठाए खड़ी थी,,,।

फिर,,,,(गहरी सांस लेते हुए सुगंधा बोली, देखते ही देखते कमरे का वातावरण पूरी तरह से उत्तेजना से गर्म हो चुका था मां बेटे दोनों जवानी के नशे में चूर हो चुके थे बस एक कदम आगे बढ़ाने की देरी थी और दोनों एक दूसरे में समाने की पूरी कोशिश में जुट जाते,,, लेकिन फिर भी दोनों अपने आप पर बहुत ही काबू रखे हुए थे,,,,, अपनी मां की बात सुनकर अंकित बनी बनाई खिचड़ी पकाते हुए बोला,,,)

फिर क्या मैं कुछ देर तक फिर से इस तरह से खड़ा रहा,,,, तुम पेशाब करने के लिए बैठ नहीं पा रही थी,,,, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं तुम बार-बार बाथरूम की दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो जा रही थी,,,, तुम्हारी हालत देखकर मैं समझ गया कि तुम बैठकर पेशाब नहीं कर पाओगी,,,।

(अंकित के एक-एक शब्द सुगंधा के कानों में नशा घोल रहा था,,, वह पूरी तरह से कामुकता के सागर में डूबती चली जा रही थी,,,,, अंकित जो कुछ भी कह रहा था सुगंधा अपने मन में उसकी कल्पना कर रही थी आज उसका पिता उसे बहुत खुलकर बातें कर रहा है,,, यही बदलाव तो वह अपने बेटे के अंदर चाहती थी,,,,,, यह बदलाव देखकर सुगंधा अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रही थी क्योंकि जैसा अंकित वह चाहती थी धीरे-धीरे उसका बेटा वही अंकित बनता जा रहा था अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा बोली,,,)

फिर तूने क्या किया,,,,?(गहरी सांस लेते हुए अंकित से बिना नजर मिलाए हुए सुगंधा बोली,,,)

फिर क्या मुझे मजबूरन वही करना पड़ा जो मैंने जिंदगी में नहीं सोचा था,,,।

क्या,,,?

मैंने परखनली तुम्हारे हाथ से ले लिया,,, और फिर मैं अपने मन को एकदम कठोर करके उस परखनली को तुम्हारी,,,(उंगली से अपनी मां की दोनों टांगों के बीच इशारा करते हुए) उस पर लगा दिया और तुम्हें मुतने के लिए बोला,,, और तुरंत तुम पेशाब करने लगी,,,।

खड़े-खड़े,,,,(एक दम हैरान होते हुए सुगंधा बोली,,)

तो क्या तुम बैठ नहीं पा रही थी इसलिए खड़े-खड़े करना पडा,, तब जाकर पेशाब का सैंपल मिला,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा एकदम स्तब्ध हो गई थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अपने बेटे से क्या बोले वह अपने बेटे से शर्म के मारे नजर तक नहीं मिल पा रही थी।।,)

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