Incest मटकनी गांड का कमाल - Page 9 - SexBaba
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Incest मटकनी गांड का कमाल

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तृप्ति का यह पहला प्रेम पत्र था जिसका एहसास उसे पूरी तरह से भिगोने लगा था,,, पत्र में लिखो एक-एक शब्द को वह बार-बार पढ़ रही थी,, ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे वह उसकी प्रेम पत्र नहीं बल्कि उसकी कुंडली हो जिसमें वह अपना भविष्य ढूंढ रही थी,,, वैसे तो ट्यूशन से आते समय संदीप ने जिस तरह की हरकत उसके साथ किया था उस हरकत को लेकर तृप्ति उससे काफी नाराज भी थी क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि संदीप इस तरह की हरकत करके उसकी नजर में गिर जाए,, और इस गलती के चलते संदीप ने उससे माफी भी मांग लिया था और तृप्ति ने उसे माफ़ भी कर दी थी,,,। और इस वजह से दोनों के बीच का रिश्ता टूटते टूटते बचा था,,,।

संदीप के द्वारा दिए गए प्रेम पत्र को पढ़ने के बाद तृप्ति उसे नोटबुक में वापस रख दी थी और उसे प्रेम पत्र के चलते अपने बदन में काफी उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,, क्योंकि वैसे तो वह प्रेम पत्र एकदम सीधे-सादे सरल भाषा में था लेकिन तृप्ति उस पत्र के एक-एक शब्द से काफी उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,, ऐसा लग रहा था कि पत्र में लिखें हर एक शब्द उसके बदन से उसके वस्त्र को उतार रहे हो और ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि तृप्ति उस पत्र को संदीप की हरकत से जोड़ रही थी जो कि वह भी अनजाने में एकाएक अपनी हरकत को अंजाम देने लगा था और इस समय भी यह पत्र भी अचानक ही उसे दे दिया था इसलिए अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,,।

बिस्तर पर लेटे-लेटे तृप्ति सलवार के ऊपर से ही अपनी गुलाबी बुर को मसल रही थी,,,। ऐसा नहीं था कि तृप्ति के दिलों दिमाग पर वासना का भूत सवार हो जाता हो वह ऐसी लड़की बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन कभी कबार उसके बदन में कामुकता की फुहार उठने लगती थी जिसकी नमी में वह अपनी दोनों टांगों के बीच की उस पतली गली को गीली कर लेती थी,,,, इस समय भी उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी और वह अपनी आंखों को बंद करके उसे पल को सोच रही थी,,जो उसके साथ घटीत हो चुका था,,, उसी दिन संदीप ने जो कुछ भी उसके साथ किया था वह काफी हैरान कर देने वाला था और काफी उत्तेजित कर देने वाला भी था क्योंकि धीरे-धीरे संदीप की हथेली उसकी सलवार के अंदर तक पहुंच चुकी थी,,, संदीप अपनी हरकत को अंजाम तक पहुंचाते हुए अपनी हथेली से तृप्ति की बुर को ढक लिया था और हथेली की गर्माहट तृप्ति को अंदर तक गर्म कर रही है वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी तृप्ति को ऐसा लग रहा था कि संदीप अब रुकने वाला नहीं है एक तरफ उसे मजा भी आ रहा था दूसरी तरफ वह घबरा भी रही थी क्योंकि उसके जीवन का यह पहला वाक्या था जब किसी मर्दाना हाथ को वह अपने जिस्म पर महसूस कर रही थी,,,।

तृप्ति पूरी तरह से मदहोशी के आलम में डूबने लगी थी संदीप की हरकत की वजह से उसकी आंखों में खुमारी छा रही थी बदन में चार बोतलों का नशा होने लगा था,,, उसके पैरों में कंपन हो रहा था वह ठीक से अपना संतुलन नहीं बना पा रही थी उसे ऐसा लग रहा था कि आज उसका कौमार्य भंग हो जाएगा जिसमें वह खुद सहभागी बनेगी,,, क्योंकि संदीप पूरे जोश के साथ उसके खूबसूरत बदन से खेलना शुरू कर दिया था खड़े-खड़े ही वह उसकी बुर को गीली कर दिया था यहां तक की पेंट में उसका कठोर लंड अपनी कठोरता का एहसास उसके नितंबों पर दिला रहा था कुल मिलाकर तृप्ति संदीप की इच्छाओं और उपासना के जाल में पूरी तरह से लिप्त होने लगी थी वह किसी भी वक्त घुटने टेक देना चाहती थी लेकिन तभी पीछे से आ रही मोटर साइकिल की लाइट की वजह से उसकी तंद्रा एकदम से भंग हुई और वह एकदम से जमीन पर आकर गिर गई वह एकदम होश में आ चुकी थी और संदीप की हरकत का विरोध करते हुए गुस्से में वहां से चली गई,,,,।

और यही एहसास इस समय तृप्ति को अपने बिस्तर पर हो रहा था उसे दिन की तरह अपने कौमार्य को जिस तरह से उसने बचा ली थी आज भी बहुत तुरंत अपनी हथेली को अपनी सलवार में से बाहर निकली थी और गहरी गहरी सांस लेते हुए कुछ देर तक अपने आप को दुरुस्त करने लगी थी,,,, भले ही वासना का तूफान उसे अपने साथ ले जाने को उसे मजबूर कर देता था लेकिन इन मौके पर वह अपने आप को संभाल ले जाती थी क्योंकि तृप्ति दूसरी लड़कियों की तरह बिल्कुल भी नहीं थी हां दूसरी लड़कियों की तरह उसके भी अरमान मचल जाते थे बदन में मदहोशी छा जाती थी लेकिन वह इतनी कच्ची नहीं थी कि तुरंत घुटने टेक दे,,,,।

अपने आप को दुरुस्त कर लेने के बाद वह बिस्तर पर से उठी और एक गिलास ठंडा पानी पीकर वापस बिस्तर पर लेट गई और दूसरे दिन संदीप मिलने की आतुरता दिखाते हुए नींद की आगोश में चली गई,,,।

दूसरी तरफ सुगंधा एक मां से पहले एक औरत थी और एक औरत के मन में उसके तन में भी कुछ चाहत होती है और यही चाहत उसमें जाग चुकी थी जिसके चलते वह अपने ही बेटे को अपनी जवानी के जाल में फसाने की पूरी तरकट रच रही थी जिसमें उसका बेटा पूरी तरह से आ भी चुका था,,, और भला जब सुगंध जैसी खूबसूरत जवान से लदी हुई औरत हो तो ऐसा कौन सा मर्द होगा जो उसके चंगुल में फंसने के लिए आतुर ना हो उसके जाल में खुद आने के लिए व्याकुल ना हो,, शुरू शुरू में सुगंधा को अपनी हरकत पर शर्मिंदगी महसूस होती थी उसका मन उसे रोकने की कोशिश करता था,,, और वह भी अपने आप को आगे बढ़ने से रोकना चाहती थी इसलिए रोज कोई ना कोई कसम खाकर ऐसा गलती दोबारा न करने का वचन लेती थी लेकिन दूसरे दिन फिर उसका मन मचलने लगता था,,, और वह फिर से लाचार और निसहाय अपने आप को महसूस करने लगती थी,,, लेकिन अब तो उसे मजा आ रहा था मदहोशी में वह डूबने लगी थी उसे अपने बदन पर गर्व होने लगा था कि इस उम्र में विवाह किसी भी मर्द का पानी निकालने में पूरी तरह से सक्षम है,,।

दूसरे दिन अंकित पढ़ने जाने के लिए तैयार हो चुका था,,, उसकी मां रसोई घर में बाकी का काम निपटा रही थी तृप्ति पहले ही तैयार होकर कॉलेज के लिए निकल चुकी थी और वैसे भी उसे आज संदीप से मिलने की व्याकुलता कुछ ज्यादा ही थी इसलिए कुछ जल्दी ही वह घर से पढ़ाई का बहाना बना कर निकल गई थी,,, घर से निकलते निकलते अंकित को शरारत सुझ रही थी,,, वह रसोई घर के दरवाजे पर खड़े होकर अपनी मां को ही देख रहा था और खाना बनाते समय उसकी मां किसी काम देवी से काम नहीं लग रही थी क्योंकि उसने साड़ी को उठाकर कमर से खून रखी थी उसके नितंबों का उभार साड़ी के कसाव की वजह से और भी ज्यादा उभर कर दिखाई दे रहा था,,, और साड़ी का पल्लू उसने इस तरह से गोल-गोल घुमा कर अपने कंधे पर डाली थी कि उसके साड़ी का पल्लू उसकी दोनों चूचियों के बीच से होकर गुजर कर उसकी कमर तक आ रहा था जिसे वह कमर में खोंस रखी थी,,,।

अपनी मां को इस रूप में देखते हुए अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि उसकी मां को इस रूप में अगर कोई देख ले तो जरूर उसका लंड खड़ा हो जाए क्योंकि लड़कों को और क्या चाहिए एक खूबसूरत औरत उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां उसकी बड़ी-बड़ी गांड बस इतने से ही तो उनकी उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच जाती है जैसा कि उसकी खुद की उत्तेजना उसे मुठ मारने पर मजबूर कर देती थी,,, इस समय भी उसका यही हाल हो रहा था सादगी में भी उसकी मां कयामत लग रही थी,,, पर जिस तरह वह बर्तनों को इधर से उधर कर रही थी उसके साथ उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां भी लहर मार रही थी जिसे देखकर अंकित के मुंह में पानी आ रहा था,,,।

कुछ देर तक अंकित दरवाजे पर खड़ा होकर अपनी मां के रूप खूबसूरती को देखता ही रह गया,,, सुगंधा का ध्यान दरवाजे पर बिल्कुल भी नहीं था वह अपने काम में एकदम मशगुल थी लेकिन जैसे ही उसकी नजर दरवाजे पर गई तो दरवाजे पर अंकित को खड़ा देखकर मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,।

क्या हुआ अभी तक गया नहीं,,,

बस जा ही रहा था,,, मैं कह रहा था कि आते समय,,, तुम्हारे लिए लंबे-लंबे और मोटे केले लेकर आऊं क्या,,,।

(अपने बेटे के मुंह से इस तरह की बात सुनकर पल भर में ही सुगंध के बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी उसे मार्केट में कहीं अपनी बात याद आ गई,,, और वह मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

क्यों तुझे पता है क्या कि मुझे कैसे केले पसंद है,,,

फिर क्या तुम ही ने तो कल बताई थी मार्केट में,,

वह तो ठीक है पर तुझे कैसे मालूम कि मुझे मोटे और लंबे केले पसंद है,,,,

अब मम्मी तुम्हें देखकर लगता ही नहीं की छोटे और पतले केले से तुम्हारा कुछ हो पाएगा,,,,,(इस बार अंकित दो अर्थ वाली बातें कर रहा था जिसे सुगंधा अच्छी तरह से समझ रही थी और अंदर ही अंदर उत्तेजित हो रही थी,,,)

तुझे कैसे पता कि पतले केले से मेरा कुछ नहीं हो पाएगा,,,

अब तुम्हारा शरीर देखो लंबी कद काठी की हो,,, कसा हुआ बदन है तुम्हारा,,, ऐसे में मरेला सा पतला सा केला तो तुम्हें कुछ एहसास ही नहीं दिला पाएगा,, ।

(अंकित। केले का नाम लेकर एक तरह से अपनी मां को लंड के बारे में बातें कर रहा था क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां की कद काठी बेहद उच्चस्तर किस्म की थी,,, ऐसे में उसके बदन की प्यास केवल मोटा तगड़ा लंड ही बुझा सकता था)

सही कह रहा है तू मुझे तो मोटा और लंबा लं,,, (इतना कहते ही उसकी जुबान एकदम से रुक गई,, आगे का शब्द उसके गले में ही अटक कर रह गया ,, और सुगंध जल्द ही अपने कहे शब्दों को सुधारते हुए बोली,,,) मेरा मतलब है कि मोटा और तगड़ा केला ही पसंद है,,,,,,(अपनी बातों को संभालते हुए वह पसीने से तरबतर हो चुकी थी उसके मुंह से अनजाने में भी लंड शब्द का आगे वाला शब्द निकल चुका था,,, जिसे उसके बेटे ने बखुबी सुन लिया था,,, अपनी मां के मुंह से इस तरह के शब्द सुनकर उसके भी होश उड़ गए थे,,, उसकी भी सांसों पर नीचे होने लगी थी और वह समझ गया था कि उसकी मां को क्या पसंद है,,,, लेकिन फिर भी ऐसा जताने लगा कि मानो जैसे वह अपनी मां के मुंह से अश्लील शब्द को सुना ही नहीं और बोला,,,।

ठीक है मम्मी में मार्केट से आते समय तुम्हारी पसंद का केला लेते आऊंगा,, (अपनी मां से दो अर्थ में बात करते हुए उसे भी बहुत मजा आ रहा था जिसका असर उसकी दोनों टांगों के बीच हो रहा था पेट का आगे वाला भाग उभरने लगा था जिस पर सुगंधा की नजर चली गई थी और वह मन ही मन उत्तेजित हो रही थी उसे भी अपनी बुर गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, और वह सहज होते हुए बोली,,,।

ठीक है लेते आना लेकिन पैसे तो लेता जा,,,

कोई बात नहीं मम्मी पैसे मेरे पास है मैं आते समय लेते आऊंगा,,,,(और इतना कहते हुए घर से बाहर चला गया और सुगंधा रसोई घर के दरवाजे तक आकर उसे जाते हुए देखते रह गई,,, और अपने मन में ही बोली,,, मुझे जिस तरह का केला पसंद है वह तो तेरे पास है,,,।)

............................
 
अपनी मां से हुई बातचीत की वजह से अंकित अपने तंबदन में अजीब सी हलचल का अनुभव कर रहा था आज साफ-साफ उसकी मां के मुंह से लंड शब्द पूरा निकलते निकलते रह गया था,,, अपनी मां के मुंह से केवल लं,,,, शब्द सुनकर ही अंकित चारों खाने चित हो चुका था क्योंकि आज तक उसने अपनी मां के मुंह से एक भी शब्द अश्लीलता के नहीं सुना था यह पहली बार था कि अपनी मां के मुंह से अश्लील शब्द सुन रहा था जो कि वह पूरा बोल नहीं पाई थी अपने शब्दों को अपने होठों में ही दबा ले गई थी ,, लेकिन अंकित अपनी मां के मुंह से निकलने वाले शब्दों को अच्छी तरह से समझ गया था वह जानता था कि उसकी मां क्या कहना चाह रही थी इसीलिए तो उसका खुद का लंड एकदम से खड़ा हो गया था,,,। अभी भी उसकी सांसे उत्तेजना का एहसास दिला रही थी,,,।

रास्ते में फुटपाथ पर चलते हो गई वह अपनी मां के बारे में ही सोच रहा था,,, वह जानता था कि उसकी मां एक शिक्षिका थी,, और एक शिक्षिका के व्यवहार को लेकर वह अच्छा खासा परिचित था वह जानता था कि एक शिक्षिका का व्यवहार कैसा होता है क्योंकि वह बचपन से ही अपनी मां को देखता आ रहा था,, और आज तक उसने अपनी मां के मुंह से ऐसा कोई भी शब्द नहीं सुना था जो मोहल्ले की आम औरतें आपस में बात करते हुए करती है,, कहीं औरतों के मुंह से तो उसने गाली गलौज तक सुना था और वह भी मां बहन की और वह अपने मन में यही सोचता था कि अच्छा ।हुआ उसकी मां इस तरह के शब्दों का प्रयोग नहीं करती किसी से गाली गलौज नहीं करती,,, और दिल सेवा अपनी मां की इज्जत भी करता था लेकिन धीरे-धीरे अंकित का खुद का रवैया बदलता जा रहा था ,,, अपनी मां को लेकर उसकी सोच बदलती जा रही थी,,, अंकित अपने मन में सोच रहा था कि अच्छा ही हुआ कि उसने केले वाला जिक्र छेड़ दिया था उसे अकेले की वजह से पता तो चला कि उसकी मां को क्या पसंद है जो कि उसके मुंह से निकली गया था कि उसे मोटा तगड़ा लंड पसंद है भले ही इशारे में उसकी मां के लिए बोल रही थी लेकिन केले का बोलते समय भी उसके मुंह से उसके मन की बात निकल ही गई थी,, और अपनी मां के मन में क्या चल रहा है एहसास अंकित को होते ही उसके तन बदन में आग लग गई थी बात ही बात में उसे पता चल गया था कि उसकी मां को मोटा और तगड़ा लंड पसंद है,, जोकि दुनिया की हर औरतों को पसंद है और इसीलिए उसकी मां भी दूसरी औरतों से अपवाद बिल्कुल भी नहीं थी भले ही चरित्र दूसरों से अलग था लेकिन औरत की जरूरत दूसरी औरतों से बिल्कुल भी अलग नहीं थी,,,।

अंकित पूरी तरह से उत्तेजना का अनुभव कर रहा था वह अपने मन में ही चलते हुए कल्पना कर रहा था कि उसकी मां मोटे तगड़े लंड से चुदवाना चाहती है,,, वैसे भी उसकी गांड इतनी बड़ी-बड़ी है कि छोटा और पतला लंड उसकी जवानी की आपको बुझा ही नहीं सकता उसे मोटा तगड़ा लंड चाहिए एकदम मेरी तरह,,, यह सब सोचते हुए अंकित अपने आप से ही बात करते हो बोल रहा था कि स्कूल से छूटने के बाद वह मोटे और तगड़े केले खरीद कर घर ले जाएगा,,,।

जहां एक तरफ बेटे के मन में इस तरह के खयालात चल रहे थे वहीं दूसरी तरफ मां का भी बुरा हाल था रसोई का काम पूरा कर चुकी थी लेकिन फिर भी वह रसोई घर में ही थी किचन फ्लोर पर अपनी गांड टीकाकर वह कुछ देर पहले की बात चीत के बारे में ही सोच रही थी,,, वह अपने मन में सोच रही थी कि नूपुर के बेटे से मिलकर उसका बेटा भी उसकी तरह होता जा रहा है और यह उसके लिए अच्छा ही दिशा निर्देश करते हैं आज पहली बार उसका बेटा दो अर्थ में बातें जो किया था,,, और इस बात को सुगंधा अच्छी तरह से समझ गई थी क्योंकि आज से पहले उसने कभी भी घर में कुछ भी खरीद कर लाने की बात नहीं की थी ,,, और इसीलिए तो उसके खुद के तन बदन में आग लगी हुई थी क्योंकि आज अनजाने में ही केले की जगह उसके मुंह से लंड निकल गया था,,,।

वैसे भी औपचारिक रूप से किले को देखकर अक्सर औरतें एक मोटे तगड़े लंड की कल्पना करने ही लगती हैं,,, क्योंकि केले का आकार एकदम लंड के आकार से मिलता जुलता रहता है,,, इसीलिए अनजाने में केले की जगह आज उसके मुंह से लंड शब्द निकलते निकलते रह गया था,,, सुगंधा इस बात से हैरान थी कि उसका बेटा उसके कहे शब्दों को जरूर समझ गया होगा उसका बेटा समझ गया होगा कि उसकी मां क्या चाहती है,,, और इसी बात से जहां एक तरफ हुआ परेशान नजर आई थी वहीं दूसरी तरफ अनजाने में अपने मुंह से लंड शब्द निकल जाने की वजह से वह अपने बदन में मदहोशी का एहसास कर रही थी और अपने आप से बात करते हुए बोल रही थी कि अच्छा युवा की उसके मुंह से आज वह निकल गया जो वह चाहती है खास उसका बेटा उसके कहने का मतलब कुछ समझ जाता तो उसकी भी रातें रंगीन हो जाती,,, अपने मन में इस तरह की बातें सोचते हुए उसके तन बदन में आग लग रही थी उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी उसे भी स्कूल जाना था ,,, वरना बाथरूम में जाकर वह अपनी जवानी की प्यास अपनी उंगली से बुझाने की भरपूर कोशिश करती,,,,।

अपने मन को काबू में करके वह स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगी,,, और थोड़ी देर में वह भी स्कूल जाने के लिए निकल गई,,,,।

दूसरी तरफ,, त्रप्ती संदीप से मिलने के लिए व्याकुल नजर आ रही थी कॉलेज में पहुंच जाने के बावजूद भी उसे संदीप कहीं नजर नहीं आ रहा था,,, क्लास में बैठकर वह संदीप के बारे में ही सोच रही थी ,,वह जल्दी से जल्दी संदीप से मुलाकात करना चाहती थी और प्रेम पत्र के बारे में बातें करना चाहती थी,,, प्रेम पत्र को लेकर उसके मन में कोई शिकायत नहीं थी वह खुशी-खुशी संदीप से मिलकर इस बारे में बात करना चाहती थी इसीलिए उसका मन किसी काम में लग नहीं रहा था और जल्द से जल्द छुट्टी होने का इंतजार कर रही थी क्योंकि वह जानती थी कि संदीप अगर इस समय नहीं मिला है तो छुट्टी में जरूर मिलेगा क्योंकि वह भी इसी कॉलेज में पढ़ता था,,,, धीरे-धीरे समय अपनी रफ्तार से गुजर रहा था इस बीच तृप्ति कई बार संदीप के द्वारा लिखे गए प्रेम पत्र को चोरी-चोरी पढ़कर उसे बैग में रख ले रही थी,,, उससे रहा नहीं जा रहा था,,, आखिरकार अपने समय पर छुट्टी की घंटी बाज ही गई,,,।

एक तरफ छुट्टी की घंटी बज गई दूसरी तरफ तृप्ति के दिल की धड़कन बढ़ने लगी,,, संदीप से मिलने से पहले वह कभी सोची भी नहीं थी कि वह प्यार व्यार के चक्कर में पड़ जाएगी वह अपने आप से ही दृढ़ निश्चय कर चुकी थी कि वह दूसरी लड़कियों की तरह अपने कदम डगमगाने नहीं देगी प्यार व्यार के चक्कर में कभी नहीं पड़ेगी,,, लेकिन यह जो उम्र होती है यह बहुत ज्वलनशील होती है इस उम्र की जलन में जो जल गया तो समझो वह झुलस गया और जो इसकी तपन से बच गया तो वह आगे निकल गया वह अपना करियर बना ले गया क्योंकि यही उम्र होती है डगमगाने की,,, और जो बच गया सो बच गया वरना सब बर्बाद और यही इस समय तृप्ति के साथ हो रहा था,,,। वह अपने आप को संभालने में नाकामयाब साबित हो रही थी,,,,, वह कुछ समझ नहीं पा रही थी वह भूल गई थी कि इस उम्र का प्यार बिस्तर पर जाकर खत्म हो जाता है और संदीप उसे अपने बिस्तर पर ले जाना चाहता था,,, उसके रुप यौवन से खेलना चाहता था,,,, क्योंकि सुगंधा की तरह ही उसकी बेटी भी बला की खूबसूरत थी,,,।

आखिरकार दोनों का मिलन हो ही गया ,, संदीप थोड़ा त्रप्ती से घबरा रहा था क्योंकि पहले बार का अनुभव अच्छी तरह से जानता था,,, तृप्ति के रवैये से अच्छी तरह से वाकीफ था,, इसलिए घबरा रहा था कि कहीं फिर से वह नाराज ना हो जाए,,, इसलिए उससे मुंह छुपा रहा था,,, लेकिन तृप्ति बहुत खुश थी,,, वह संदीप से बोली,,,।

बगीचे में चलो तुमसे कुछ बात करना है वहीं बैठकर बातें करेंगे,,,

बगीचे में,,,(थोड़ा डरते हुए बोला)

हां बगीचे में हरकत जो तुमने इस तरह की किए हो की ,,

मैंने क्याकिया,,,

अब अनजान बनने की कोशिश मत करो यहां सड़क पर मैं कुछ कहना नहीं चाहती,,,

ठीक है चलो,,,(इतना कहकर संदीप आगे बढ़ गया तकरीबन 5 मिनट की दूरी पर ही बगीचा था जहां पर अक्सर लोग बैठकर बगीचे की ठंडक का एहसास करते हुए आपस में बातचीत करते थे और प्रेमी प्रेमिका प्रेमालाप करते थे,,, संदीप जानबूझकर बगीचे में सबसे पीछे वाली जगह पर गया जहां पर बड़े-बड़े पेड़ थे और यहां पर ज्यादा लोग आते भी नहीं थे,,, बड़ी-बड़ी घनी झाड़ियां होने की वजह से दूर से देखे जाने का डर भी नहीं था,,। दोनों टेबल पर अपना अपना बैग रख कर बैठ गए तृप्ति संदीप को ही देखे जा रही थी और संदीप डर के मारा अपनी नजर को नीचे झुका कर बैठा था वैसे तो लड़कियों से बातचीत करने में बिल्कुल भी घबराते नहीं था और ना ही तृप्ति से डरता था तृप्ति से इस बात से डरता था कि कहीं वह उसे नाराज होकर उससे दूरी न बना ले क्योंकि वह किसी भी कीमत पर तृप्ति का जिस्म पाना चाहता था,, उसे भोगना चाहता था,,,, कुछ देर की खामोशी के बाद बात की शुरुआत करते हुए तृप्ति बोली,,)

तुमने नोटबुक में क्या लिख कर दिए थे,,,।

क्या लिख कर दिए थे,,, मुझे क्या मालूम क्या लिख कर दिए थे,,,( संदीप जानबूझकर अनजान बनता हुआ बोला,,,)

अब बनने की कोशिश बिल्कुल भी मत करो,,, मैं सब जानती हूं,,, और तुम्हें पता होना चाहिए कि अगर किसी के हाथ लग जाता तो क्या होता,,,।

(संदीप तृप्ति की बात सुनकर कुछ बोला नहीं बस खामोश रहा तृप्ति संदीप की तरफ ही देख रही थी और संदीप की हालत देखकर मन ही मन खुश हो रही थी क्योंकि उसे ऐसा लग रहा था कि संदीप घबरा रहा है जबकि वह घबरा नहीं रहा था बस नाटक कर रहा था,,, तृप्ति अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)

तुम मुंह से भी तो कह सकते थे,,,

मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी,,,

वैसे तो बहुत हिम्मत दिखाते रहते हो इतना कहने में हिम्मत नहीं हो रही है,,,

सच में मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं तुम्हारी बहुत इज्जत करता हूं और मैं कुछ ऐसा नहीं करना चाहता जिससे तुम्हें बुरा लग जाए और तुम मुझे छोड़ दो,,,

मुझे तुम्हारी बात का बुरा नहीं लगता,,,, मैं भी तुमसे बहुत प्यार करती हूं,,,,(इतना कहते हुए दोनों एक दूसरे की आंखों में देखने लगे तृप्ति मदहोश होने लगी क्योंकि संदीप धीरे-धीरे अपने होठों को उसके करीब ले जाने लगा उत्तेजना वश तृप्ति भी अपने होठों को हल्के से आगे की तरफ बढ़ा दी यह उसकी तरफ से संदीप के लिए आमंत्रण था और इस आमंत्रण को स्वीकार करते हुए,, संदीप अपने प्यासे होठों को त्रप्ती के लाल लाल दहकते हुए होंठों पर रख दिया,,, महीनों बाद तृप्ति फिर से मदहोश हो गई,,, संदीप इस खेल में माहिर था वह पल भर में ही तृप्ति के लाल लाल रस भरे होठों को अपने होठों के बीच रखकर उसका रसपान करने लगा संदीप का यह चुम्मन तृप्ति को पूरी तरह से मदहोश कर रहा था,,, तृप्तिकेतन बदन में आग लगने लगी,,,, और इस बार मौका देखकर संदीप ने फिर से अपनी हथेली को उसकी छाती पर रख दिया,,, उसके संतरे को अपनी हथेली में हल्के से लेकर दबा दिया और तृप्ति के मुंह से घुटी-घुटी सी आह निकल गई,,,।

तृप्ति को इस चुंबन में बहुत मजा आ रहा था इस बार तृप्ति खुद पागलों की तरह संदीप के होठों को भी अपनी होठों के पीछे लेकर चूसना शुरू कर दी थी कोशिश बात का अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि संदीप उसकी चूची को दबा रहा था और चूची को दबाने में जो मजा उसे प्राप्त हो रहा था उससे भी ज्यादा मजा तृप्ति को महसूस हो रहा था वह मदहोश हुए जा रही थी,,,। लेकिन यह चुंबन और स्तन मर्दन का क्रियाकलाप कुछ देर और चल पाता इससे पहले की किसी के आने की आहट दोनों के कानों में सुनाई दी और दोनों तुरंत अलग हो गए,,, क्योंकि वहां पर कुछ आवारा लड़के आ रहे थे और अब वहां पर ज्यादा देर तक ठहरना उचित नहीं था इसलिए दोनों अपनी जगह से खड़े हो गए और जल्दी से वहां जाने लगे लेकिन जाते-जाते ही उनमें से एक लड़का बोला,,,।

चुदाई का प्रोग्राम था क्या,,, हमसे गलती हो गई थोड़ी देर बाद आना चाहिए था ताकि चुदाई का खेल अपनी आंखों से देख लेते,,,,।

(उसे हमारे लड़के की बात को अनसुना करके दोनों वहां से निकल गए लेकिन भले बात को अनसुना कर गए थे लेकिन जो बात उस आवारा लड़के ने बोली थी चुदाई वाली,,, उसे बात का तृप्ति के मन पर बहुत गहरा असर पड़ रहा था उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी थी,,, उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वास्तव में वह बगीचे के कोने वाली जगह पर चुदवाने के लिए गई थी,,, दोनों बगीचे से बाहर निकाल कर कुछ देर साथ चलकर अपने-अपने रास्ते हो लिए,,,

वादे के मुताबिक अंकित स्कूल से छूटने के बाद वास्तव में मोटे तगड़े और बड़े-बड़े केले खरीद लिया था एकदम अपने लंड के साइज का क्योंकि वह समझ गया था कि उसकी मां को इस माप का ही जरूरत है,,। वह जानता था कि घर पर केला ले जाते ही उसकी मां की नजर जैसे ही कैला पर पड़ेगी उसकी मां की बुर पानी छोड़ने लगेगी,,, वह जल्दी-जल्दी घर पहुंच गया,,, शाम के 5:00 बजे रहते और इस समय घर पर उसकी मां के लिए रहती थी इसलिए अंकित मन ही मन खुश हो रहा था लेकिन जैसे ही घर पर पहुंचा तो घर पर तृप्ति भी मौजूद थी वह पढ़ाई कर रही थी,,, और घर पर तृप्ति को देखकर उसके अरमानों पर पानी फिर गया,,, तृप्ति की नजर जैसे ही अंकित के हाथों में केले के थैले पर गई तो मोटे-मोटे तगड़े केले को देखकर तृप्ति बोली,,,।

यह क्या उठा लाया तू,,,

क्यों दीदी तुम्हें पसंद नहीं है क्या,,,?

तूने कभी देखा मुझे केला खाते हुए,,,,

हां सही बात है देखा तो नहीं हुं,,,

फिर तु यह सब क्यों लेकर आया,,,

अरे दीदी तुम्हें नहीं पसंद है तो क्या किसी को पसंद नहीं आएगा मम्मी को तो पसंद है ना,,,,

तो यहां लेकर क्यों खड़ा जा मम्मी को दे दे,,,,

( ओर इतना सुनकर अपने कमरे से सुगंधा बाहर निकल कर आ गई,,, अपने बेटे के हाथ में केला देखकर उसकी साइज देखकर उसकी मोटाई देखकर मन ही मन उत्तेजित होने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

तु कितना ख्याल रखता है मेरा,,, और एक यह है जो आज तक कुछ नहीं लेकर आई,,,(तृप्ति की तरफ इशारा करते हुए बोली तो अंकित बोल पड़ा)

मां का ख्याल हमेशा हम लड़कों को ही रखना पड़ता है लड़कियों से थोड़ी ना कुछ होता है,,,,।

(अंकित दो अर्थ वाली बात कर रहा था जो कि उसकी मां अच्छी तरह से समझ रही थी और अपने बेटे के कहने के मतलब को समझ कर वह अंदर ही अंदर सिहर उठी,,,,,, वह जानती थी किसका बेटा मां का ख्याल लड़के रखते हैं ऐसा क्यों किया है क्योंकि लड़कों के पास लंड होता है जिनकी प्यास हर एक मां को होती है जिससे वह अपनी जवानी की प्यास बुझा सकती है,,,, यह सब सुनकर तृप्ति बोली,,,)

चलो कोई बात नहीं मैं जैसी हूं वैसी ही ठीक हूं अब मम्मी जल्दी से चाय बना दो,,,

को देखो महारानी के नखरे चालू हो गए,,,,।

(इतना कहकर सुगंधा रसोई घर में चली गई और पीछे-पीछे अंकित भी अकेला लेकर अपनी मां के पीछे चला गया और वही किचन फ्लोर पर रख दिया दोनों में और कुछ बात हो पाती से पहले तृप्ति भी वहीं आ गई और बोली,,,)

अच्छा लाओ मैं ही बना देती हुं,,,

(और तृप्ति चाय बनाने लगी तृप्ति की मौजूदगी में दोनों मां बेटे किसी भी तरह से दो अर्थ वाले संवाद नहीं कर पा रहे थे जिससे दोनों के अरमानों पर पानी फिर गया था,,,,।
 
रात को अपने कमरे में सुगंधा अपने बेटे के द्वारा खरीद कर लाए गए मोटे तगड़े केले को लेकर गई,, और बिस्तर पर लेट गई और अपने मन में कल्पना करने लगी अपने बेटे के लंड को लेकर उसके हाथ में लिया हुआ अकेला उसे अपने बेटे का लंड लग रहा था क्योंकि वह केला वाकई में बेहद दमदार और मोटा और तगड़ा और काफी लंबा था ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके बेटे ने केला नहीं बल्कि अपना लंड ही उसे खाने के लिए दे दिया हो वह उस केले को अपने हाथ में लेकर अपने अंगूठे और उंगली का छल्ला बनाकर उसके अंदर केले को धीरे-धीरे इस तरह से प्रवेश करने लगी मानव की जैसे वह उसकी उंगलियों के द्वारा बनाया गया छल्ला नहीं बल्कि उसकी खुद की गुलाबी बुर हो और वह केला उसके बेटे का लंड हो जिसमें वह धीरे-धीरे प्रवेश कर रहा हो,,,, सुगंधा को मन में कल्पना करते हुए बहुत मजा आ रहा था,,,।

सुगंधा केले से मस्त होती हुई

अपने मन में कल्पना करते हैं वह धीरे-धीरे अपने वस्त्र उतारने लगी और देखते ही देखते वह बिस्तर पर पूरी तरह से नंगी हो गई उसके अरमान पूरी तरह से मचल उठे थे,,,, वह अपने दोनों टांगों को फैला कर उसके लिए को इसकी मोटाई को धीरे-धीरे अपनी गुलाबी पत्तियों पर रगड़ रही थी पर ऐसा महसूस कर रही थी कि जैसे यह क्रिया उसका बेटा उसकी दोनों टांगों के बीच जगह बनाकर अपने लंड को हाथ में पकड़ कर अपने गरम सुपाड़े को उसके गुलाबी पत्तियों पर रगड़ रहा हो,,, यह कल्पना बेहद मदहोश कर देने वाली थी वह पूरी तरह से उत्तेजना के सागर में गोते लगाने लगी वह मदहोश होने लगी,,, उसकी कल्पनाओ के आज कुछ ज्यादा ही पर लग गए थे,,, वह केले को धीरे-धीरे अपनी बुर पर थपथपा रही थी,,, वह पागल हो जा रही थी और कल्पना कर रही थी कि जैसे उसका बेटा अपने लंड को हाथ में लेकर उसकी बुर पर उसकी चोट मार रहा हो ,,जिससे उसे दर्द तो हो रहा था लेकिन मजा भी बहुत आ रहा था।

सुगंधा से बिल्कुल भी रहा नहीं जा रहा था अपनी दोनों टांगों को खोल दी और फिर धीरे-धीरे उसकेले को जो कि उसके मदन रस से पूरी तरह से गिला हो चुका था धीरे-धीरे अपनी गुलाबी पत्तियों के बीच प्रवेश कराना शुरू कर दी,,, उसे बहुत मजा आ रहा था क्योंकि किला का साइज बहुत ज्यादा ही मोटा था और अपने मन में सोच रही थी कि काश ऐसा मोटा तगड़ा लंड मिल जाता तो उसकी तो जिंदगी बन जाती,,, और वह ऐसा सोचते हुए धीरे-धीरे केले को आधा से ज्यादा अपनी बुर में प्रवेश करा दी और उसे अंदर बाहर करने लगी और अपनी आंखों को बंद करके महसूस करने लगी की जैसे उसका बेटा उसकी दोनों टांगों के बीच जगह बनाकर उसकी बुर में अपना लंड डालकर उसे चोदना शुरू कर दिया है,,, उसे बहुत मजा आ रहा था वह मदहोशी में अपने सर को दाएं बाएं पाठक रही थी और अपने हाथ को जोरो से चला रही थी जैसे-जैसे अकेला अंदर बाहर हो रहा था वैसे-वैसे उसकी रगड़ का एहसास उसे पागल बना रहा था,,,।

उसकी आंखें पूरी तरह से बंधी थी वह कल्पनाओं की दुनिया में पूरी तरह से खो चुकी थी अपने बिस्तर पर संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में वह कामांध हो चुकी थी,,, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस अपनी कल्पनाओं में वह पूरी तरह से खो चुकी थी तेज चलते हैं हाथों के साथ-साथ उसकी कल्पनाओं का घोड़ा बड़ी तेजी से दौड़ रहा था वह अपने मन में यही सोच रही थी कि उसका बेटा उसे अपनी बाहों में लेकर जोर-जोर से अपनी कमर हिला कर धक्के पर धक्का लगा रहा है,,,, पल भर में उसकी सांसे बड़ी तेजी से चलने उखड़ने लगी वह पागलों की तरह अपने सर को इधर-उधर पटकने लगी पसीने से तरबतर उसका गोरा नंगा बदन पूरी तरह से ट्यूबलाइट की रोशनी में चमक रहा था वह चरम सुख के बेहद करीब पहुंच चुकी थी और देखते ही देखते उसके मुंह से हल्की सी चीज निकाली और उसकी कमर ऊपर उठ गई वह अपनी भारी भरकम गांड को पल भर के लिए ऊपर उठाकर झड़ना शुरू कर दी,,, और देखते ही देखते हैं उसकी बुर से गरम लावा पिचकारी का रूप धारण करके निकलना शुरू कर दिया,,,,।

वासना का तूफान शांत हो चुका था,,, वह अपनी बुर में से केला बाहर निकाली जो की पूरी तरह से उसके मदन रस में डूब चुका था और वह धीरे से उसे टेबल पर रख दी उसकी सांसे अभी भी ऊपर नीचे हो रही थी और थोड़ी ही देर बाद वह नींद की आगोश में चली गई,,,।

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अपने बेटे के द्वारा ले गए मोटे तगड़े और लंबे केले से रात को अपनी जवानी की प्यास बूझाकर सुगंधा उस केले को वहीं टेबल पर रखकर गहरी नींद में सो गई

गई ,,, रात का अनुभव बेहद उत्तेजनात्मक था सुगंधा अपने बेटे के द्वारा ले गए मोटे तगड़े केले को अपने बेटे का लंड समझकर उसे अपनी गुलाबी छेद में डालकर अपनी जवानी की प्यास बुझा ली थी लेकिन यह प्यास चाय किला कितना भी मोटा और लंबा क्यों ना हो पहले से बिल्कुल भी नहीं पूछने वाली हां कुछ पल के लिए यह गर्मी शांत जरूर हो जाती है लेकिन यह जो जवान की गर्मी है यह जो जवान की प्यास है वह केवल एक मर्द के मोटे तगड़े लंड से ही बुझती है,,,।

सुबह जब नींद खुली तो उसे उठने में 15 मिनट की देरी हो चुकी थी दीवार पर टंगी घड़ी में समय देखते ही वह तुरंत उठकर बैठ गई और बिस्तर से खड़ी हो गई,,, वह अभी भी हल्की-हल्की नींद में थी पूरी तरह से नींद से बाहर नहीं आई थी और वह चलकर दरवाजे तक पहुंच गई और दरवाजे की कड़ी पकड़ कर उसे खोलने वाली थी कि तभी उसे अपने दोनों टांगों के बीच बुर के ऊपर खुजली महसूस होने लगी और वह तुरंत अपना हाथ अपनी बुर पर ले गई और उसे खुजाने लगी,,, और उसे तुरंत एहसास हुआ कि उसने तो कुछ पहनी नहीं है और तुरंत वह एकदम से नींद से बाहर आगे और अपने आप को ऊपर से नीचे की तरफ देखने लगी तो उसे इस बात का एहसास हुआ कि वह संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में थी,,,, उसके बदन पर कपड़े का रेसा तक नहीं था,, तभी उसे याद आया कि रात को वह अपने सारे कपड़े उतार कर केले को अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी शांत की थी और बिना कपड़े पहने ही सो गई थी,,, ।

अपनी स्थिति का अहसास होते ही तुरंत कड़ी पर से अपने हाथ को हटा ली,,, और सहज रूप से उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी,, लेकिन इस बात से वह काफी घबरा गई थी कि अगर एन मौके पर बुर पर खुजली ना आई होती तो वह कमरा का दरवाजा खोलकर नंगी ही कमरे से बाहर निकल गई होती और अगर ऐसे में तृप्ति देख लेती तो क्या होता,,, बाप रे वह मेरे बारे में क्या सोचती,,,, अपने मन में सुगंधा इस बारे में सोच रही थी लेकिन उसे अपने बेटे के द्वारा देखे जाने पर बिल्कुल भी अफसोस ना होता बल्कि वह अंदर ही अंदर बहुत खुश होती है अपने बेटे को अपनी नंगी जवानी दिखाकर और वह भी सुबह-सुबह,,, अपने मन में यह सब सोच कर वह तुरंत बिस्तर के करीब आई और अपने कपड़ों को जोकि नीचे फर्श पर फेक हुए थे उन्हें उठाकर पहनने लगी और थोड़ी ही देर में अपने कमरे से निकल कर बाहर आ गई,,,।

दूसरी तरफ अपनी मां के कमरे में जाने का अंकित को उसे दिन के बाद कभी मौका नहीं मिला था क्योंकि जब वह उड़ जाता था तब उसकी मां उससे पहले ही उठकर घर का काम करती रहती थी या अंदर से कमरा बंद रहता था,,, क्योंकि अपनी मां को अस्त-व्यस्त हालत में देखने की उसकी इच्छा बेहद प्रबल हो गई थी पहली बार जब अपनी मां को अस्त-व्यस्त हालत में देखा था तो उसकी कचोरी जैसी फुली हुई बुर को स्पर्श करने की अपनी इच्छा को दबा नहीं पाया था और अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए अपनी मां की बुर पर हल्के से अपनी उंगली रख दिया था जो कि इतनी मात्रा से ही उसकी हालत पूरी तरह से खराब हो गई थी,,, उसे अनुभव के बारे में जब भी कभी अंकित सोचता था तो उसका लंड पूरी तरह से टनटना कर खड़ा हो जाता था ,,,।

सुगंधा कमरे से बाहर आते ही झाड़ू लेकर घर की सफाई करना शुरू कर दी थी और अंकित भी उठ गया था,,, तृप्ति भी गहरी नींद से जाग चुकी थी लेकिन जागते ही वह संदीप के बारे में सोचने लगी संदीप के दिए प्रेम पत्र के बारे में सोचने लगी और संदीप के साथ बगीचे में जो कुछ हुआ था उन सब के बारे में सोचने लगी,,, जिंदगी का पहला चुंबन बेहद रसीला और उन्माद भरा था,,, वह उसी चुंबन के बारे में सोच रही थी,,, और उसे चुंबन के बारे में सोचकर उत्तेजित हो रही थी पहली मर्तबा संदीप किस तरह की हरकत पर वह पूरी तरह से बिगड़ गई थी और संदीप से नाराज हो गई थी,,,, क्योंकि वह कभी सोची नहीं थी कि संदीप इस तरह से कोई हरकत करेगा और वह भी सड़क पर,,,,।

लेकिन कल जो कुछ भी हुआ था उसमें उसकी खुद की सहमति थी,,, से संदीप की तरफ ऐसे ही किसी हरकत की उम्मीद थी,,, संदीप ने अपनी हरकत की वजह से उसके बदन में हलचल मचा दिया था क्योंकि होठों का रस पीते हुए उसके हाथ उसने अपनी चूचियों पर महसूस कि थी,,, लेकिन उसे रोकने के बजाय उसकी हरकतों का वह खुद आनंद लेने लगी थी पहली मर्तबा उसे अच्छा तो लगा था लेकिन संदीप की हरकत से वह पूरी तरह से क्रोधित हो चुकी थी इसलिए उसे समय मिलने वाला मजा भी उसे जहर लग रहा था,,, लेकिन कल की बात कुछ और थी होठों के साथ-साथ संदीप के द्वारा स्तन मर्दन होते ही वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी और पिघलने लगी थी उसे अपनी दोनों टांगों के बीच थरथराहट से महसूस होने लगी थी,,, और संदीप उसे अपनी हरकत से पूरी तरह से मत किए हुए था।

लेकिन बगीचे में संदीप की हरकत कुछ और ज्यादा आगे बढ़ती इससे पहले ही कुछ अवारा लड़के वहां आ गए थे और वह दोनों उठकर वहां से जाने लगे थे लेकिन तभी उन्हें लड़कों में से एक ने जो बात कहा था वह अभी भी तृप्ति के दिलों दिमाग पर छप सा गया था,,, चुदवाने आई थी क्या,,,? उस लड़के के द्वारा कहे गए इस शब्द को सुनते ही उसके बदन में हलचल सी मचने लगी थी वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी,,, वह अपने मन में सोचने लगी की लड़की कितने बेशर्म होते हैं कुछ भी कह देते हैं ,, लेकिन फिर वह अपने मन में सोचने लगी कि अगर वाकई में उसे लड़के की कही बात सच होती तो कैसा होता,,, अगर वह सच में बगीचे के अंदर संदीप से चुदवाने गई होती तो कैसा महसूस करती,,,।

इस बारे में सोचते हैं उसके बदन में गनगनाहट होने लगी,,, पल भर में वह कल्पना करने लगी,,, कि अगर वह सच में चुदवाने ही गई होती तो क्या होता कैसे होता,,,, वह अपने मन में कल्पना कर रही थी कि वह संदीप को लेकर बगीचे के सबसे कोने वाली जगह पर जाती जहां पर ढेर सारी जंगली झाड़ियां होगी हुई थी जहां पर लोगों का आना-जाना बिलकुल नहीं होता था,,, संदीप के साथ वह उसे जगह पर पहुंचती तो वहां पर पहुंचते ही दोनों एक दूसरे को चुंबन करने लगते हैं एक दूसरे के होठों को अपने मुंह में लेकर उसका रस चूसने लगते हैं और इसी बीच संदीप के हाथ उसकी चूचियों पर आ जाते कुर्ती के ऊपर से ही वह जोर-जोर से उसकी चुचियों को दबाता,,,जिसका आनंद लेते हुए वह मदहोश हो जाती पागल हो जाती और पागलों की तरह उसके होठों को चुस्ती,,,,।

कुर्सी बीच संदीप का हाथ उसकी चूचियों से नीचे की तरफ आते हुए उसकी कमर पर आ जाता है और वह दोनों हाथों से उसकी कमर को कस के दबोच देता जिससे उसके बदन में सनसनी से दौड़ने लगती और फिर सलवार के ऊपर से ही संदीप उसकी बुर को जोर-जोर से मसलना शुरू कर देता ,, और संदीप की हरकत पर वह पूरी तरह से मस्त हो जाती मदहोश हो जाती एकदम चुदवासी हो जाती,,,और चुदासपन के चलते उसके खुद के हाथ अपने आप ही संदीप के लंड पर चला जाता, और वह पेंट के ऊपर से ही उसके लंड को जोर जोर से दबा दी उसे खेलती और फिर ना तो संदीप बर्दाश्त कर पाता और ना ही वह खुद इसके बाद संदीप उसे पेड़ की तरफ घूमर पेड़ पकड़ने के लिए बोलना और फिर अपने हाथों से उसकी सलवार की डोरी खोलकर उसकी सलवार को पेटी सहित खींचकर उसके घुटनों तक ले आता और फिर उसकी नंगी गांड को दोनों हाथों से पकड़ कर सहलाता,,,, और उसके इस क्रियाकलाप को वह खुद नजर पीछे की तरफ घूम कर देखती,,,।

और फिर दिन दुनिया से बेखबर वह अपनी गांड को थोड़ा बाहर निकाल कर संदीप के आगे परोस देती और संदीप अपने लंड को हाथ में लेकर धीरे-धीरे उसको गुलाबी छेंद में अपना लंड डालता और फिर उसे चोदना शुरू कर देता,,, यह सब सोचते हुए कल्पना करते हुए वास्तव में तृप्ति की सांस ऊपर नीचे हो रही थी वह पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी,,, सच में आंखों को बंद करके हुआ ऐसा ही महसूस कर रही थी कि वह इस समय बगीचे में है और अपनी सलवार को घुटनों तक नीचे करके अपनी नंगी गांड संदीप के सामने परोस कर उससे चुदाई का मजा लूट रही है लेकिन तभी एकदम से वह चौंक गई जब दरवाजे पर दस्तक होने लगी,,,।

तृप्ति,,,, अरे अभी तक सो रही है देर नहीं हो रही है कॉलेज जाना है,,,,।

(इतना सुनते ही उसके होश उड़ गए दीवार पर टंगे जब घड़ी में दिखी तो वह 10 मिनट लेट हो चुकी थी कल्पना करने में 10 मिनट गुजर चुके थे लेकिन 10 मिनट में वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी,, )

आई मम्मी,,,,,(इतना कहने के साथ ही वह जल्दी से बिस्तर से उठकर खड़ी हो गई और अपने कमरे से बाहर निकाल कर जल्दी-जल्दी तैयार होने लगी,,,, सुगंधा नाश्ता तैयार कर दी थी और तृप्ति जल्दी-जल्दी नाश्ता करके घर से निकल गई थी क्योंकि अब उसे संदीप से मिलने की उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी थी,,,, लेकिन अंकित अभी भी घर में ही था क्योंकि उसके मोजे नहीं मिल रहे थे वह जूते को टेबल के नीचे रखकर अपने कमरे में मौजा ढूंढ रहा था,,, लेकिन जब उसे बहुत कोशिश करने के बावजूद भी नहीं मिला तो वह रसोई घर में गया और अपनी मां से बोला,,,।

मम्मी मेरे मोजे कहां रख दी हो मिल नहीं रहा है,,,

अरे वही तो रखी थी तेरे कमरे में,,,,(कढ़ाई में चमची चलाते हुए बोली,,)

मैंने अपना पूरा कमरा ढूंढ मारा हूं लेकिन कहीं मिल नहीं रहा है,,,, जल्दी बताओ मुझे देर हो रही है,,,,।

अरे कहां रख दी मुझे खुद याद नहीं आ रहा है,,,, अरे हां याद आया मेरे कमरे में टेबल के ऊपर ही रखा हुआ है कल रात को ही अपने कमरे में लेकर चली गई थी,,,।

शुक्र है तुम्हें याद तो आया,,,,(और इतना कहने के साथ ही अंकित अपनी मां के कमरे में चला गया और टेबल पर देखा तो वाकई में उसके मोजे रखे हुए थे,,,,)

यह रखा हुआ है और मैं ईसे कब से अपने कमरे में ढूंढ रहा हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही अंकित टेबल की तरफ आगे पड़ा और अपने मोजे को उठा लिया लेकिन तभी उसकी नजर टेबल पर रखे हुए मोटे तगड़े किले पर गई और केले को देखते ही उसकी आंखों के सामने उसकी मां की कचोरी जैसी फुली हुई बुर नजर आने लगी जिसे वह अपनी उंगली से छूटकर उसकी गर्मी को महसूस कर चुका था उसने तुरंत टेबल पर पड़ा कीड़ा उठा लिया और उसे गोल-गोल घुमा कर देखने लगा और कुछ देर के लिए हुआ उसे अपनी मुट्ठी में भर लिया और अपनी उंगलियों का छल्ला बना हुआ देखने लगा जिसमें से उसका केलआ गुजर रहा था और वह अपनी मन में सोचने लगा कि अगर इतना मोटा लंड मम्मी की बुर में जाएगा तो क्या होगा,,, अपने मन में ऐसा कहते हुए वह तुरंत अपने दोनों टांगों के पीछे देखने लगा जहां पर थोड़ा-थोड़ा उठाव हो रहा था और वह अपने मन में सोचने लगा,,,, उसका तो अकेले से भी ज्यादा मोटा और लंबा है जब उसका लंड उसकी मां की बुर में जाएगा तब क्या होगा,,, अनायास ही उसके मन में एक ख्याल आया था और इस ख्याल से वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था,,,, तभी उसे केले पर कुछ चिपचिपा सा लगा हुआ महसूस होने लगा,,, लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या लगा है और वह तुरंत केले को छिलना शुरू कर दिया,,,।

दूसरी तरफ,,, सुगंधा अपने मन में सोचने लगी कि पता नहीं अंकित को मिला होगा कि नहीं और वह रसोई घर से निकल कर अपने कमरे की तरफ जाने लगी और जैसे ही दरवाजे पर पहुंची तो अपने बेटे को केला खाता हुआ देखकर उसके एकदम से होश उड गए,,,, पल भर में उसे सब कुछ याद आने लगा रात को जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोच कर उसके होश उड़ गए थे क्योंकि वह अकेले को अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करके केले को उसी स्थिति में टेबल पर रख दी थी और इस समय उसका बेटा उस केले को खा रहा था,,, पल भर में ही सुगंधा के माथे पर पसीने की बूंदे उपसने लगी,,, उसे यह सोचकर बेहद अजीब लग रहा था कि जिस केले को उसने अपनी बुर में डाली थी उसी केले को उसका बेटा खा रहा था,,,।

वह एकदम से कमरे में दाखिल होते हुए बोली,,,।

यह क्या कर रहा है अंकित इस केले को मैं अपने लिए रखी थी,,,।

अरे मम्मी दूसरा केला है खा लेना ना,,

नहीं मुझे यही खाना था तभी तो मैं टेबल पर लाकर रखी थी,,,

लगता है केले की मोटाई और लंबाई देखकर रखी थी,,,,(इस बार अंकित अपनी मां को नीचे से ऊपर की तरफ देखते हुए बोला था सुगंध तुरंत अपने बेटे के खाने के मतलब को समझ गई थी और अंदर ही अंदर अपने बेटे की बात सुनकर सिहर सी गई थी,,, और वह बोली)

नहीं मुझे इसी तरह का केला पसंद है इसीलिए तो लेकर आई थी,,,।

अरे मम्मी मेरे पास ऐसा ही केला है,,, मेरा मतलब है कि जब कहो गई तब खरीद कर ला दूंगा,,,(अचानक ही अंकित के मुंह से अपने मन की बात निकल गई थी जिसे सुनकर सुगंधा के तन बदन में आग लग गई थी और वह अपने मन में बोली तेरा ही केला तो मैं चाहती हूं नहीं तो इस्केले से इस जवानी की प्यास कहां बुझने वाली है,,, और अंकित पूरा केला खा लेने के बाद बोला,,,)

शाम को दूसरा खरीद कर ला दूंगा इससे भी ज्यादा लंबा और मोटा एक में ही खुश हो जाओगी,,,(अंकित अपनी मां से दूसरे शब्दों में बात कर रहा था और उसकी मां उसकी कहीं बात को समझ भी रही थी,,,, अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)

लेकिन मम्मी केला एकदम चिपचिपा था,,,।

(अपने बेटे की इस बात से सुगंधा एकदम से चौक गई और उसे याद आया कि केले को वह इस हालत में टेबल पर रख दी थी जिस हालत में उसने अपनी बुर से बाहर निकाली थी उसे पर उसकी बुर का मदन रस लगा हुआ था या यू। कह लों की पूरा केला उसके मदन रस में डूबा हुआ था,,,, सुगंधा ज्यादा कुछ कह नहीं पाई बस इतना ही बोली,,,।)

धोकर खाना चाहिए था ना पता नहीं कहां-कहां से निकल कर आता है,,,।

कोई बात नहीं मुझे तो ऐसा ही बहुत स्वादिष्ट लग रहा था,,,,।

(इतना कहकर अंकित अपनी मां के कमरे से बाहर निकल गया और तैयार होकर स्कूल के लिए निकल गया सुगंध उसे देखते ही रह गई वह हमारे शर्म के पानी पानी हो रही थी क्योंकि उसके बेटे ने उसकी बुर से निकला हुआ केला पूरी तरह से गटक लिया था,,,।)

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अंकित स्कूल के लिए जा चुका था,,,, लेकिन अपने पीछे अपनी मां को पूरी तरह से मदहोश कर चुका था अंकित नहीं जानता था कि उसने कौन सा केला खाया है उसे तो एहसास तक नहीं था कि उसे केले को उसकी मां ने किस उपयोग में लिया था वह पूरी तरह से अनजान था,,,,, वह तो उस केले को सामान्य केला समझ कर ही जल्दी-जल्दी छीलकर खा गया था,,,। लेकिन वह केला सामान्य बिल्कुल भी नहीं था,, क्योंकि उसके लिए नहीं एक बेहद खूबसूरत औरत की गुलाबी छेद की गुलाबी सुरंग के अंदरूनी भाग तक चक्कर लगा लिया था और एक खूबसूरत औरत के गुलाबी छेद की परिक्रमा कर लेने के बाद वह केला बिल्कुल असामान्य हो चुका था खास करके ऐसे लड़कों के लिए जो जवानी की दहलीज पर अभी-अभी कदम रखे हैं।

अगर कोई ऐसा व्यक्ति उसकेले के बारे में जनता की उसकेले को सुगंध जैसी खूबसूरत औरत अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की प्यास बुझाई है तो शायद उसके लिए को लेकर पहले उसके छिलके को छिलका नहीं बल्कि सुगंधा की खूबसूरत बुर के मदन रस का स्वाद लेने के लिए,,, केले को पूरी तरह से जीभ से चाटता उसके मदन रस का खारा सवाद लेता,,, और जी भर कर उसका स्वाद लेता उसके बाद कहीं जाकर उसकेले को खाता,,,, और शायद इस बात को अगर अंकित जानता तो वह भी यही करता लेकिन वह जानता नहीं था इसलिए बेझिझक उस केले को छीलकर खा गया था,,, हालांकि उस केले को खाते हुए सुगंधा ने देख ली थी लेकिन जब उसकी नजर पड़ी तब तक उसका बेटा आधे से ज्यादा केला खा चुका था,, उसे रोकने का बिल्कुल भी फायदा नहीं था और क्या कह कर रुकते की यह केला मत था लेकिन क्यों मत खा यह बता सकने कि उसमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी,,,।

अंकित के स्कूल जाते ही,,, सुगंधा सोच में पड़ गई थी क्योंकि वह कभी सोचा नहीं थी कि अपनी ही बुरे में डाला हुआ केला वह अपने बेटे को खिला देगी,,, लेकिन वह जानबूझकर तो मिला ही नहीं थी उसका बेटा खुद ही अपने हाथ से लेकर खा गया था लेकिन फिर भी इस बात का अफसोस सुगंधा को हो रहा था,, लेकिन इस बात को लेकर उसके बदन में अजीब सी हलचल भी थी,,,। वह मदहोश हो रही थी,, क्योंकि उसके लिए भी यह पल बेहद अद्भुत और अतुलनीय था क्योंकि इस बारे में उसने कभी सोची भी नहीं थी,,, वह इस बात को सोच सोच कर हैरान थी कि वह केला पूरी तरह से उसकी बुर की गहराई नाप चुका था पूरी तरह से उसके मदन रस में डूबा हुआ था,,,, सुगंधा उसे केले को फेंक देना चाहती थी लेकिन उसे टेबल पर रखकर भूल गई थी उसे नहीं मालूम था कि उसका बेटा उसके कमरे में आ जाएगा और उसके लिए को खा जाएगा वरना वह सुबह ही उसे कूड़ेदान में फेंक देती,,,,।

सुगंधा इस बारे में सोच रही थी तभी उसे कह रहा है कि उसका बेटा इस बात को बोला था कि केला बहुत चिपचिपा है,, केले को धोई नहीं हो क्या,,,, इस बारे में सोचकर उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी क्योंकि वह जिसके लिए कोई चिपचिपा बोल रहा था उसकी चिपचिपाहट उसके मदन रस की वजह से थी,,, वह हैरान इस बात से थी कि उसका बेटा उसकी बुर से निकले हुए मदन रस को अपने हाथों से स्पर्श किया था भले ही अनजाने मे हीं,,, यह सोचकर उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी,,,, उसकी दोनों टांगों के बीच कंपन महसूस होने लगा लेकिन उसका भी स्कूल जाने का समय हो चुका था इसलिए वह भी जल्दी-जल्दी तैयार होकर स्कूल चली गई,,,।

स्कूल में रिसेश के समय सुगंध और नूपुर लंच बॉक्स खोलकर खाना खा रहे थे,,,, पहले की अपेक्षा नूपुर के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव कुछ ज्यादा ही नजर आ रहे थे वह तरो ताजा और खीली हुई नजर आ रही थी,,, उसके चेहरे की ताजगी के कारण को सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी,,,, दोनों के बीच खाना खाते समय सामान्य रूप से चुपकी छाई हुई थी,, लेकिन इस चुपकी को तोड़ते हुए नूपुर बोली,,,।

अंकित बडा ही प्यारा बच्चा है,, तुम्हें मालूम है वह मेरे घर आया था,,,।

हां मुझे बता रहा था राहुल के साथ क्रिकेट खेलने गया था,,,।

हां सही कह रही हो बहुत ही जल्दी दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई दोनों ऐसे साथ-साथ बातें कर रहे थे ऐसा लग रहा था कि जैसे दोनों के बीच पहले से ही गहरी दोस्ती हो,,,।

मुझे भी अच्छा लगा नूपुर कि मेरा बेटा तुम्हारे बेटे के साथ दोस्ती कर रहा है उसकी संगत में रहेगा तो कुछ अच्छा ही सीखेगा,,,,(सुगंधा जानबूझकर उसकी संगत में अच्छा सीखने वाली बात कर रही थी क्योंकि सुगंधा अच्छी तरह से जानती अच्छी नूपुर और उसके बेटे के बीच किस तरह था रिश्ता बना हुआ है और सुगंधा भी यही चाहती थी कि जिस तरह से नूपुर और उसके बेटे के बीच रिश्ता बना हुआ है इस तरह का रिश्ता उसके और उसके बेटे के बीच भी बन जाए। ,)

हां जरूर क्यों नहीं मेरा बेटा भी बहुत समझदार है,,, वक्त से पहले ही समझदारी और जिम्मेदारी के चलते बड़ा हो गया है,,,,।

(नूपुर की बात सुनकर सुगंध अपने मन में ही बोली राहुल बड़ा नहीं हुआ है बल्कि उसका लंड बड़ा हो गया है,,, तभी तो तेरी प्यास बुझा रहा है,,, इस बात को सुगंधा नूपुर से खुले शब्दों में बोल देना चाहती थी लेकिन ऐसा कहने की उसकी हिम्मत नहीं हुई लेकिन उसकी बात सुनकर खाना खाते हुए बोली।)

अक्सर घर का बड़ा लड़का जिम्मेदार हो ही जाता है अपने परिवार की हालत को देखकर,,, तुम्हारी परेशानियों को देखकर राहुल सही समय पर बड़ा हो गया,,,,।

(सुगंधा की बात सुनकर नूपुर प्रसन्न हो रही थी लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी की सुगंधा दूसरे शब्दों में उससे बात कर रही थी,,,,, अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सुगंधा बोली,,,)

पता नहीं कब अंकीत बड़ा होगा,,,,

हो जाएगा,,, सुगंधा,,, बच्चे संगत में ही सीखते हैं,,,

यह तो तुम सच कह रही हो नुपुर इसीलिए तो मैंने अंकीत को तुम्हारे बेटे के साथ दोस्ती बढ़ाने के लिए बोली हुं,,,,।

वह भी सब सीख जाएगा समझदार है तुम्हारा बेटा,,,,(पानी पीते हुए नूपुर बोली,,,, थोड़ी ही देर में दोनों खाना खाकर लंच बॉक्स रख लिए,,,,, नूपुर आगे आगे चल रही थी सुगंध पीछे-पीछे आगे चल रही नूपुर की मटकती हुई गांड देखकर सुगंधा अपने मन में सोचने लगी,,, वाकई में नूपुर पूरी तरह से चोदने लायक है,,,

बड़ी-बड़ी गांड बड़ी-बड़ी चूची एक मर्द को और क्या चाहिए यही देखकर या यह कह लो यह सब दिखाकर नूपुर अपने बेटे को पूरी तरह से अपनी जवानी के जाल में फंसा ली और फिर उसके साथ जवानी का सुख भोग रही है,,, लेकिन यह सब तो उसके पास भी है उससे बेहतर है फिर भी अंकित अभी तक राहुल नहीं बन पाया यह ऐसा भी हो सकता है कि खुद वही अभी तक नूपुर नहीं बन पाई,,,,,,,, उसके मन में तो आ रहा था कि इसी समय वह नूपुर से पूछ ले कि वह कैसे अपने बेटे को चोदने के लिए मनाई ताकि वह भी अपने बेटे को इस तरकीब से बना सके,,, लेकिन ऐसा पूछने की उसमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी,,,,।)

दूसरी तरफ कॉलेज से छूटने के बाद,,, तृप्ति संदीप के साथ चहल कदमी करते हुए चल रही थी,,, अभी कल ही वह संदीप के साथ चुंबन का अद्भुत रोमांच का अनुभव कर चुकी थी,,,,, इसलिए संदीप से आंख मिलाने में उसे शर्म महसूस हो रही थी,,, लेकिन संदीप मन ही मन बहुत खुश हो रहा था क्योंकि उसकी हरकत का तृप्ति ने बिल्कुल भी विरोध नहीं की थी बल्कि आनंद ने रही थी अपनी मंजिल तक पहुंचने की यह उसकी पहली सीढ़ी थी और उसकी मंजिल थी तृप्ति की दोनों टांगों के बीच पहुंचना,,, और कल हुई हरकत को देखकर वह समझ गया था कि बहुत ही जल्द तुम्हें तृप्ति की दोनों टांगों के बीच पहुंच जाएगा,,, दोनों टहलते टहलते बगीचे के पास आ गए तो संदीप बोला,,,।

चलो बगीचे में चलते हैं,,,

नहीं नहीं बगीचे में मैं नहीं जाऊंगी,,,

क्यों क्या हुआ कल तो तुम खुद बगीचे में लेकर गई थी,,,

हमें जानती हूं कल मैं तुम्हें खुद बगीचे में लेकर गई थी लेकिन देखे थे ना क्या हुआ था वह आवारा लड़के किस तरह से बातें कर रहे थे,,,

किस तरह से बातें कर रहे थे हम लोग तो उनके वहां आने से पहले ही उठकर जाने लगे थे,,,

हां तो जाते हुए ही उनमें से एक लड़का क्या बोला था कुछ याद है,,,(तृप्ति संदीप को याद दिलाते हुए बोल रही थी)

कहां,,, मुझे तो नहीं आते कि उनमें से किसी ने कुछ कहा था,,,

अरे पागल हो गए हो क्या उनमें से एक लड़के ने क्या बोला था नहीं मालूम,,,

तृप्ति सच में मुझे नहीं मालूम तुम ही बता दो,,,

नहीं मैं नहीं बता सकती मुझे शर्म आती है,,,,(शरमाते हुए तृप्ति बोली)

इसमें शर्माने जैसी कौन सी बात है अब मुझसे कैसी शर्म,,,

फिर भी,,, मुझे तो सोच कर ही शर्म आ रही है,,,(तृप्ति के चेहरे पर शर्म की लालिमा साफ नजर आ रही थी लेकिन वह कल वाली बात को बताना चाहती थी,,, लेकिन शर्म के मारे उसका बुरा हाल था,,,)

तब जाने दो नहीं बताना है तो चलो आगे चलते हैं,,,,।

(संदीप बहुत चला था वह जानता था कि कल उन आवारा लड़कों में किसी एक ने गंदे शब्दों का प्रयोग किया था और वह जानता था कि वह लड़के ने क्या-क्या बोला था लेकिन वह जानबूझकर अनजान बन रहा था और तृप्ति के मुंह से सुनना चाहता था,,, इसलिए वह चला कि दिखाकर आगे बढ़ने के लिए बोल रहा था,,, संदीप की बात सुनकर तृप्ति बोली,,,)

तुम तो सच में बहुत भुलक्कड़ हो,,,।

तृप्ति में माफी चाहता हूं मैं सच में भूल गया लेकिन तुम हो की बता भी नहीं रही हो,,,

बताना तो चाहती हूं लेकिन शर्म के मारे मेरा बुरा हाल है,,,।

क्या तृप्ति कल के बाद से तुम अभी भी मुझसे शर्म कर रही हो,,, कल याद है ना कितना गरमा-गरम चुम्मा लिया था तुम्हारा,,,।

(इस बात से तृप्ति एकदम से शर्मा गई,,,,,,, धीरे-धीरे बाद दोनों बड़े से पेड़ के नीचे पहुंच गए थे जहां पर कोई नहीं था इधर-उधर देखने के बाद तृप्ति बोली,,,)

कल उसे आवारा लड़कों में एक नहीं क्या कहा था,,,

अरे वही तो मैं भी पूछ रहा हूं,,,,

कैसे कहूं,,, अच्छा कह देती हूं,,,, जब हम वहां से उठकर जाने लगे तभी उनमें से एक लड़का बोला लगता है ,,चुद,,,,,चुद,,,,चुदवाने आई थी,,,(एकदम से हकलाहट और घबराहट भरे स्वर में बोली,,, पहली बार इस तरह के शब्द बोलकर उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी थी,,, और वह शर्म के मारे अपनी नजरों को नीचे झुका ली थी तृप्ति के मुंह से चुदवाने वाले शब्द सुनकर संदीप का लंड हरकत में आ गया था,,,।)

अच्छा यह बात तो इसमें गलत ही किया था आज नहीं तो कल हम दोनों जाने ही वाले हैं,,,।

(संदीप की आवाज सुनकर तृप्ति एकदम से गुस्से में उसे आंख दिखाने लगी तो घबराने का नाटक करते हुए संदीप बोला)

सॉरी मैं तो मजाक कर रहा था,,, चलो कहीं घूमने चलते हैं,,,(संदीप एकदम से बात बदलते हुए बोला)

कहां चले,,,, अभी तो मेरे पास समय नहीं है घर जाना है,,,,

अरे आज की बात नहीं कर रहा हूं तीन दिन बाद अपने मैडम का जन्मदिन है और उन्होंने हम सबको बुलाया ही है।

लेकिन मेरी मम्मी नहीं जाने देगी,,,

अरे उन्हें समझा देना ना,,,, कह देना मैडम का जन्मदिन है सबको बुलाई है उनकी क्लास के जितने बच्चे हैं सबको,,,

ठीक है,,, लेकिन चलेंगे कैसे,,,?

मैं हूं ना तुम बिल्कुल भी फिकर मत करना,,,

ठीक है,,,,(और इतना कहने के साथ ही दोनों मुस्कुराते हुए अपने-अपने रास्ते चल दिए)

...................................
 
सुगंधा का परिवार पूरी तरह से बदलाव के राह पर चल दिया था,,, एक तरफ मां बेटे थे जो एक दूसरे के आकर्षण में धीरे-धीरे एक दूसरे के सामने खुलते चले जा रहे थे और दूसरी तरफ तृप्ति थी जो अपने ही कॉलेज के सहपाठी के साथ,,, मर्यादा की सीमा लांघने के लिए तड़प रही थी,,, एक तरह से सुगंधा का पूरा परिवार जवानी के नशे में चूम रहा था तीनों की अपनी अपनी ज़रूरतें थी जो वह तीनों पूरा करना चाहते थे,,,, एक तरफ सुगंधा थी जो पति के देहांत के बाद अपने परिवार के पालन पोषण में एकाकी जीवन की रही थी लेकिन कुछ महीनो से उसके अंदर बदलाव आना शुरू हो गया था जवानी की तड़प बढ़ती जा रही थी अपने बदन की जरूरत को वह समझने लगी थी और अपनी जवानी की प्यास को अपने बेटे से बुझाया चाहती थी,,,।

दूसरी तरफ अंकित क्योंकि पूरी तरह से जवान हो चुका था औरतों के अंगों के बारे में जानने लगा था यहां तक की अपनी मां को कई बार वह अर्धनग्न अवस्था में संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में देख चुका था जिसे देखकर वह अपने लंड की कठोरता को शांत करने के लिए मूठ मारना भी शुरू कर दिया था,,,, भाभी अपनी मां की तरह ही अपनी मां के साथ हम बिस्तर होना चाहता था अपनी जवानी की प्यास को अपनी मां की जवानी से बुझाना चाहता था,,, और इन सबसे अलग की तृप्ति जिसका आकर्षक और झुकाव परिवार में नहीं बल्कि बाहर के लड़के में था शुरू-शुरू में उसे लड़के की हरकत से वह परेशान हो चुकी थी गुस्सा हो चुकी थी उसे इस तरह की हरकत अच्छी नहीं लगती थी लेकिन धीरे-धीरे उसे भी संदीप की हरकतें अच्छी लगने लगी चुंबन के साथ-साथ स्तन मर्दन उसकी दबी हुई ख्वाहिश को उभारने लगी थी,,, अगर संदीप अपनी तरफ से अपनी हरकत को आगे बढ़ते हुए उसकी दोनों टांगों के बीच पहुंच जाए तो इसमें अब तृप्ति को भी कोई दिक्कत नहीं थी,,,।

लेकिन तीनों में एक बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी मर्यादा और इज्जत,,,, सुगंधा भी अपने बेटे की हरकत को समझने लगी थी उसके अंदर की तभी ख्वाहिश को देखकर अपने बेटे की इच्छा को समझने लगी थी वह जानती थी कि उसका बेटा उसकी तरफ आकर्षित है लेकिन फिर भी वह इतनी ज्यादा अपने बेटे से खुल नहीं गई थी कि सामने से एकदम निमंत्रण दे दे संभोग करने का,,,, और यही बात सुगंधा में भी थी सुगंधा जवानी से भरी हुई थी खूबसूरत और हुस्न से लदी हुई थी वह चाहती तो एक ही साड़ी पर अपने बेटे को अपनी दोनों टांगों के बीच ले लेती लेकिन ऐसा करना किसी रंडी से कम ना होता वह नहीं चाहती थी कि उसका बेटा उसके कहने पर उसके साथ हम बिस्तर हो वह चाहती थी कि यह खेल धीरे-धीरे ऐसे कगार पर पहुंच जाए जहां पर दोनों एक दूसरे में समाने के लिए व्याकुल हो जाए जिसमें किसी भी तरफ से पल ना हो बस मौके और हालात की नजाकत पर निर्भर रखता हो,,,।

और दूसरी तरफ थी तृप्ति वह भी अपनी मां के दिए हुए संस्कारों से बड़ी बड़ी हुई थी लेकिन कॉलेज में पहुंच चुकी तृप्ति के बदन की भी कुछ ज़रूरतें थी दूसरी लड़कियों की तरह वह भी चाहती थी कि उसे भी कोई प्यार करने वाला हूं जो कि संदीप के रूप में उसे मिल गया था लेकिन वह संदीप की फितरत से वाकिफ नहीं थी संदीप उसके बदन को चाहता था उसे भोगना चाहता था लेकिन इसी में तृप्ति को प्यार नजर आता था और तृप्ति भी उसकी हरकत का आनंद ले रही थी जो कि किसी भी वक्त तृप्ति को उसके बिस्तर तक ले जा सकता था जिसके लिए वह अंदर ही अंदर तैयार भी हो रही थी,,,,।

संदीप से मिलने के लिए तृप्ती की बेचैनी हमेशा बढ़ने लगी थी,,,, लेकिन कॉलेज की मुलाकात से उसका मन नहीं भर रहा था,,, वह संदीप से एकांत में मिलना चाहती थी जैसा कि बगीचे में मिली थी लेकिन बगीचे में भी आवारा लड़कों के आवागमन से वह परेशान हो गई थी इसलिए वह संदीप से किसी और जगह मिलना चाहती थी उसे संदीप ने उसे मिलने का अच्छी जगह और बहाना भी बता दिया था,,, लेकिन वहां जाने के लिए उसे अपनी मां की इजाजत लेनी थी, इसलिए घर का काम कर रही है अपनी मां से वह धीरे से बोली,,,।

मम्मी तुमसे इजाजत लेनी है,,,,

मुझसे,,,, कैसी इजाजत,,,?(झाड़ू लगाते हुए एकदम से रुक कर वह तृप्ति की तरफ देखते हुए बोली)

अरे मम्मी हमारे कॉलेज की मेम का जन्मदिन है और उन्होंने सभी को इनवाइट किया है,,,।

जन्मदिन है,,,(ऐसा कहते हुए फिर से झाड़ू लगाने लगी)

हां उनका जन्मदिन है,,,

कहां पर आमंत्रण दी है,,,(एक बार फिर से झाड़ू लगाना रोक कर तृप्ति की तरफ देखते हुए सुगंधा बोली,,,)

उनके घर पर सुबह 10:00 बजे पहुंचना है और फिर शाम को वापस आ जाना है,,,

कौन-कौन जा रहा है,,,?

क्लास के सभी लोग हैं मेरी सहेलियों भी जा रही है,,,

सहेलियां भी जा रही है तो ठीक है,,,, लेकिन जाना कब है,,,,

कल ही जाना है,,,,

ओहहहह,,,, इसका मतलब है कि कल कॉलेज नहीं जाना है,,,,

नहीं मम्मी,,, जब सभी क्लास के लोग जाएंगे तो क्लास में कौन होगा,,,,

सही कह रही हो,,, लेकिन कल पहनोगी क्या,,,?

वो,,,, मम्मी दिवाली पर जो सूट सलवार खरीदी थी ना वही पहन लूंगी अच्छी भी लगती है,,,

हां यह ठीक रहेगा चलो कोई बात नहीं चली जाना लेकिन समय पर घर पर आ जाना वैसे भी लड़कियों का ज्यादा देर तक घर के बाहर रहना ठीक नहीं है,,,।

मम्मी हमारी मेम अच्छी तरह से जानती हैं इसीलिए तो दिन में बुलाएंगे ताकि शाम होते होते सब लोग अपने-अपने घर पहुंच जाए,,,

बहुत समझदार है तुम्हारी मैडम,,,,, अच्छा तो जल्दी से सब्जियां काट दे,,,, मैं तब तक सफाई कर देती हूं,,,

ठीक है मम्मी,,,(और इतना कहने के साथ ही वह भी खुशी-खुशी सब्जी काटने लगी वह इस बात से खुश थी कि मैडम के जन्मदिन पर जाने की वजह से कुछ देर से संदीप के साथ वक्त गुजारने को जो मिल जाएगा,,, वक्त गुजारने के साथ-साथ संदीप की हरकतों का आनंद लेने की उत्सुकता उसके अंदर बढ़ती जा रही थी वह जानती थी कि संदीप अगर उसके पास रहेगा तो उसकी हरकत भी जारी रहेगी वह एक नया एक बहाने से उसके अंगों को स्पर्श करेगा तब आएगा छूएगा चुंबन करेगा और यह सब उसे अच्छा लगेगा,,,,।

अपनी मां से इजाजत मिलने के बाद मैं बहुत खुश थी वह रात को ही पहनने के लिए अपना सूट सलवार निकाल ली थी जो की पीले रंग का शूट ओर ब्राउन रंग की सलवार उसके गोरे रंग पर बहुत अच्छी लगती थी,,,, सुबह जल्दी उसकी नींद खुल गई और वह तैयार होने के लिए बाथरूम में चली गई,,, बाथरूम में प्रवेश करते ही वह अपने बदन से एक-एक करके सारे कपड़ों को उतार कर एकदम नंगी हो गई और अपने नंगे बदन को ऊपर से नीचे नजर उठाकर घूमा कर देखने लगी,,,, अपने गोरे रंग पर और अपने बदन की बनावट पर तृप्ति को गर्व महसूस हो रहा था और अपनी चूची की तरफ देखकर तो अपने आप ही उसके गोरे गाल शर्म के मारे सुर्ख लाल होने लगे,,, उसे अपनी चूची देखकर संदीप की हरकत याद आ गई जो कुर्ती के ऊपर से उसकी चूची को जोर-जोर से दबा रहा था,,,, और अपनी चूची चाहिए बात करते हुए धीरे से बोली,,,।

बड़ा जालीम है ना संदीप,,, तुम्हें बहुत जोर से दबाता है ना,,, तुम कुछ कहती क्यों नहीं उससे कहना चाहिए ना कि दर्द होता है धीरे से दबाए,,,,(ऐसा कहते हुए अपने दोनों हाथों से अपनी चूची को थाम ली और अपने आप ही उसे दबाते हुए बोली,,) लेकिन कर भी क्या सकती हो तुम्हें दबाने से उसे मजा भी तो बहुत आता है,,,,सहहहह जालिम अगर हरामजादे को ना रोको तो उसका बस चले तो तुम्हें खा ही जाए,,,,(ऐसा कहते हुए उसकी नजर अपनी दोनों टांगों के बीच चली गई तो देखी कि उसकी बुर पर हल्के हल्के बाल उगे हुए हैं और अपने बुर पर उगे हुए हल्के बालों को देखकर उसे याद आया कि उसकी मम्मी बाथरूम में ही बीट क्रीम को छुपा कर रखती हैं,,, जिसका वह खुद कई बार उपयोग कर चुकी है बीट क्रीम का ख्याल आते हैं उसकी दोनों टांगों के बीच उस पतली दरार में हलचल मचने लगी,,,।
 
वह तुरंत बाथरूम के अंदर ही ऊपर की तरफ थोड़ी सी जगह थी उसे जगह में थोड़ा कपड़ा भरा हुआ था जब वह उसे कपड़े को हटाई तो अंदर बीट क्रीम पड़ा था और बीट क्रीम को अपने हाथ में लेकर उसके चेहरे पर मुस्कान करने लगी वह जल्दी से क्रीम निकाल कर उसे अपनी बुर के बालों पर अच्छी तरह से लगा ली,,, और 5 10 मिनट तक इंतजार करने लगे उसे अपनी बर पर क्रीम लगाने में आज बेहद शर्म और उत्तेजना का अनुभव हो रहा था वैसे तो उसे संदीप के साथ केवल वक्त गुजारना था लेकिन उसे खुद समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी बुर क्यों चिकनी कर रही थी,,, अपने मन में उठ गए इस सवाल का जवाब उसे खुद समझ में नहीं आ रहा तेरे कर उसके मन में अनजाने में ख्याल आ जा रहा था कि संदीप से चुदवाने जा रही है,, और अपने ही मन में आए इस तरह के ख्याल से वह शर्म से पानी पानी हो जा रही थी,,,,।

देखते ही देखते 10 मिनट गुजर जाने के बाद अपनी पेंटिं को हाथ में लेकर उससे बुर पर लगी क्रीम को साफ करने लगी जिसके साथ उसकी झांट के बाल भी एकदम साफ होते जा रहे थे और देखते ही देखते उसकी पूरे एकदम मलाई की तरह चीकनी हो गई अपनी बर देखकर खुद उसके मुंह में पानी आ रहा था और वह अपनी हथेली को अपनी बर पर रखकर अपनी गुलाबी पतली दरार को अपनी हथेली के नीचे छुपा ली और अपने मन में सोचने लगी की जब इस पर संदीप का हाथ स्पर्श करेगा तब उसकी क्या हालत होगी,,, यह सोचकर उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी,,,,, और फिर जल्दी-जल्दी नहा कर वह बाहर आ गई,,,।

उसकी मां भी उठ गई थी और वह झाड़ू लगा रही थी,,, झाड़ू लगाते हुए वह उससे बोली,,,।

तू छोड़कर तैयार हो गई है लेकिन अभी राजकुमार सो रही जाकर उन्हें भी तो जगा दो,,,,।

अभी अंकित उठा नहीं,,,!(आश्चर्य जताते हुए दीवार में टंगी घड़ी की तरफ देखते हुए तृप्ति बोली)

नहीं अभी नहीं उठा है जाकर जल्दी से जगा दे,,,,।

ठीक है मम्मी पहले कपड़े पहन लु,,,(वह केवल टावल में ही थी,,,,)

ठीक है लेकिन जल्दी करना देर हो रही है फिर जल्दी-जल्दी करेगा तो नाश्ता किए बिना चला जाएगा,,,,

ठीक है मम्मी मैं जल्दी से जगा देती हूं,,,(और इतना कहने के साथ ही तृप्ति अपने कमरे में चली गई और फिर जल्दी-जल्दी कपड़े पहन कर अंकित को जगाने के लिए उसके कमरे में जाने लगी दरवाजे पर पहुंची तो दरवाजे की कड़ी बंद नहीं थी क्योंकि दरवाजे पर हाथ रखते ही दरवाजा अपने आप खुल गया था और वह धीरे से कमरे में प्रवेश कर गई,,,, वह अपनी ही धुन में थी देखते देखते हो अपने भाई के बिस्तर के करीब पहुंच गई और जब वह अपने भाई को आवाज लगाने ही वाली थी तो उसकी नजर अंकित पर पड़ी और अंकित पर नजर पढ़ते ही उसके तो हो सके उसकी आंखें फटी की फटी रह गई और उसका मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया,,,।

इसमें तृप्ति का दोष बिल्कुल भी नहीं था,,,,, नजर ही कुछ ऐसा था कि अगर उसकी जगह कोई और होती तो उसकी भी हालत तृप्ति की तरह ही होती,,,, तृप्ति की सांस ऊपर नीचे होने लगी थी क्योंकि बिस्तर में उसका भाई उनकी पूरी तरह से नग्न अवस्था में सोया हुआ था उसके बदन पर ना तो कपड़ा था और ना ही चादर और पूरी तरह से नंगा बिस्तर पर सोया हुआ था और इस हालत में उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर छत की तरफ मुंह उठाई खड़ा था,,, तृप्ति को अपने भाई के कमरे में इस तरह के नजारे की अपेक्षा बिल्कुल भी नहीं थी इसलिए तो उसके होश उड़ गए थे और वह कभी सोचा नहीं थी कि वह अपने भाई को इस रूप में देखेगी,,,।

तृप्ति को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें बार-बार उसकी नजर ना चाहते हुए भी अपने भाई के खड़े लंड पर चली जा रही थी,,,, तृप्ति अपने जीवन में पहली बार एक जवान लड़के के लंड को देख रही थी और वह भी अपने ही भाई के,,, उसे तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था वह तो हैरान इस बात से थी कि क्या लंड ऐसा होता है इतना मोटा तगड़ा लंबा एकदम मुसल की तरह बाप रे,,, उसके मन में ही यह शब्द निकल पड़े वाकई में तृप्ति के लिए लड की लंबाई और चौड़ाई उसकी मोटाई सब कुछ हैरान कर देने वाली थी वह बड़ी गौर से अपने भाई के लंड को देख रही थी और दरवाजे की तरफ देख ले रही थी उसे इस बात का डर था कि कहीं उसकी मां दरवाजे पर न जाए,, वह खुद कमरे से बाहर निकल जाना चाहती थी लेकिन जवानी की कशिश उसे रोके हुए थी बार-बार वह अपने भाई के लंड को ही देख रही थी,,, और अनजाने में ही उसके मन में यह खेला गया कि संदीप का भी क्या ऐसा ही होगा,,,, इस ख्याल से उसके तन-बदन में अजीब सी हलचल होने लगी,,,।

तृप्ति को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें अगर इस अवस्था में वह अपने भाई को जगाती है तो उसके भाई के साथ-साथ वह खुद शर्मिंदगी से भर जाएगी और अगर बिना जगाए चली जाती है तो उसकी मां जगाने के लिए कमरे में आ जाएगी और अपने बेटे की इस हालत को देखकर वह भी न जाने क्या सोचेगी और वह भी समझ जाएगी की उसकी बेटी तृप्ति ने भी इस नजारे को अपनी आंखों से देख ली है,,,, इसलिए वह सोच समझ कर धीरे-धीरे कमरे से बाहर गई और दरवाजे को बाहर से बंद करके उसकी कड़ी को जोर-जोर से बजाने लगी,,,।

अंकित,,, कब तक सोता रहेगा ऊठ जा देर हो रही है,,, (तृप्ति के एक दो बार आवाज लगाने से अंकित की नींद खुल गई और वह अपनी हालत को देखा तो एकदम से घबरा गया रात को हुआ अपनी मां के ख्यालों में अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा हो गया था और अपनी मां को याद करके अपनी मां के बारे में गंदी कल्पना करके अपने लंड को हिलाकर मुठ मारा था उसे सब कुछ याद आते ही जल्दी से बिस्तर पर से उठा और बोला,,,)

हां दीदी आया,,,,।

(उसकी आवाज सुनकर तृप्ति अपने मन में ही बोली शुक्र है उठ तो गया,,,,)

चल जल्दी तैयार हो जा देर हो रही है,,,।

आया दीदी,,,,(इतना कहकर वह भी जल्दी से अपने कपड़े पहनने लगा,,,,,।

दूसरी तरफ नाश्ता करके तृप्ति जाने के लिए तैयार हो गई थी जाने से पहले वह रसोई घर में काम करिए अपनी मां से बोली,,,)

मम्मी में जा रही हूं सहेलियां इंतजार कर रही होगी,,,।

ठीक है समय पर आ जाना,,,,

जल्दी आ जाऊंगी मम्मी तुम चिंता मत करो,,,,

(और इतना कहकर वह घर से निकल गई,,,, संदीप ने उसे पहले ही बता रखा था कि कहां आना है इसलिए उसके बताएं अनुसार इस जगह पर तृप्ति पहुंच गई और थोड़ी ही देर में वहां संदीप भी आ गया अपनी मोटरसाइकिल लेकर,,,, मोटरसाइकिल को देखकर तृप्ति बोली,,,)

तुम्हारे पास मोटरसाइकिल भी है,,,।

दो है एक पापा ले जाते हैं एक ऐसे ही पड़ी रहती है जब कभी काम पड़ता है तो मैं ही चलाता हूं,,,

तब तो अच्छा है जल्दी जाएंगे जल्दी आ जाएंगे,,,,

हां इसीलिए तो मैं मोटरसाइकिल लेकर आया हूं और वैसे आज तो तुम एकदम माल लग रही हो,,,,(तृप्ति को ऊपर से नीचे की तरफ चलते हुए संदीप बोला तो अपने लिए माल शब्द सुनकर तृप्ति गुस्सा दिखाते हुए बोली,,,)

क्या बोले,,,,,?

कककक ,,, कुछ नहीं मैं तो यह कह रहा हूं कि आज तो तुम एकदम परी लग रही हो,,,(उसका इतना कहते हैं संदीप के साथ-साथ तृप्ति मुस्कुराने लगी और वह उसके पीछे मोटरसाइकिल पर बैठकर जल्दी मैडम के घर,,,)

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

तृप्ति घर से निकल गई थी एक नए सफर के लिए,,, यह पहली बार था जब वह कहीं जाने के लिए अपनी मां से इजाजत मांगी थी और उसकी मां भी खुशी-खुशी उसे जाने की इजाजत दे दी थी क्योंकि वह कहीं और नहीं बल्कि अपने ही कॉलेज की मैडम की जन्मदिन पर जा रही थी पर वह भी शाम तक वापस लौट आना था इसीलिए उसकी मां ने उसे इजाजत दे दी थी,,,, तृप्ति बहुत खुश थी पीले और ब्राउन रंग के सूट सलवार में वह परी लग रही थी,,,, और इस कपड़े में देखकर संदीप भी लार टपकाने लगा था,,, तभी तो वह तृप्ति को माल कहकर संबोधन किया था जिसका तृप्ति ने भी हंस कर स्वागत की थी,,,,। संदीप अपना मोटरसाइकिल लाया था यह जानकार तृप्ति बहुत खुश थी,,, क्योंकि खुद का मोटरसाइकिल होने की वजह से आने जाने का समय बच जाता,,,,।

तृप्ति मोटरसाइकिल के पीछे बैठ गई थी,,, यह उसका पहला मौका था जब वह कीसी लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर बैठी थी,,, वैसे तो आते जाते वह कई लड़कियों को इसी तरह से जवान लड़कों के पीछे बैठकर आते-जाते देखी थी और उन्हें देखकर वह भी अपने मन में यही सोचती थी कि उसका दिन कब आएगा जब वह अभी इसी तरह से मोटरसाइकिल पर बैठकर शहर घूमेगी,,, और ऐसा लग रहा था कि जैसे आज बहुत दिन आ गया था जब वह अपनी ख्वाहिश पूरी कर रही थी,,,,।

तर्प्ति बहुत खुश थी,,, लेकिन तभी उसे सुबह वाला वाक्या याद आ गया,,, और पल भर में उसके चेहरे पर सुर्ख लालीमा छाने लगी,,, उस पल के बारे में सोचकर,,, तृप्ति की सांसें ऊपर नीचे होने लगी, क्योंकि वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि अपने भाई के कमरे में उसे इस तरह के दृश्य देखने को मिलेगा,,, वह कभी सोची नहीं थी कि उसका भाई सारे कपड़े उतार कर नंगा होकर सोता होगा,,, तृप्ति इतना भी बर्दाश्त कर लेती लेकिन अपने भाई को नंगा देखने पर और उसके नंगे पन की चरम सीमा को देखकर खुद उसके होश उड़ गए थे,,,, जिंदगी में पहली बार वो किसी मर्दाना लंड को अपनी आंखों से देख रही थी और वह भी किसी गैर मर्द के नहीं बल्कि अपने ही भाई के लंड को,,,।

लंड की शक्ल सूरत और उसका भूगोल देखकर उसके होश उड़ गए थे,,, वह कभी सपने भी नहीं सोची थी कि मर्दों का लंड इतना बम पिलाट होता है,,, इतना मोटा लंबा और तगड़ा जिसमें बिल्कुल भी लचक नहीं थी और छत की तरफ मुंह उठाए खड़ा था,,, जवान लड़की के लिए यह दृश्य पूरी तरह से कामोत्तेजना से भरा हुआ होता है,,, लड़की के ही क्यों हर उस औरत के लिए जिनकी टांगों के बीच जवानी बरकरार रहती है,,, ऐसी हर एक औरत के लिए यह दृश्य,,, मादकता का काम करती है,,,, और वही मादकता तृप्ति के दिलों दिमाग पर छाया हुआ था,,,, वह मोटरसाइकिल पर बैठकर संदीप के साथ कॉलेज की मैडम के वहां जा रही थी लेकिन उसका दिमाग पूरी तरह से अपने भाई के लंड पर टिका हुआ था,,, कॉलेज में पढ़ने वाली पढ़ी लिखी लड़की होने के साथ-साथ तृप्ति, पूरी तरह से जवान हो चुकी थी,, मर्द औरत के बीच के रिश्ते को अच्छी तरह से समझती थी और वह यह भी जानती थी कि उत्तेजित होने पर ही मर्द का लंड खड़ा होता है,,, और यही जानकारी उसे अचंभित कर रही थी अपने भाई के पक्ष में,,, क्योंकि सुबह-सुबह उसका भाई तो पूरी तरह से गहरी नींद में सो रहा था उत्तेजित करने वाली एक भी वस्तु या स्त्री उसके भाई के समीप बिल्कुल भी नहीं थे तो उसका भाई किसी भी उत्तेजित हो रहा था और उसकी उत्तेजना का मापदंड तृप्ति उसके लंड के खड़े होने पर लगा रही थी और इसीलिए तो वह हैरान थी,,,।

लेकिन वह इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि सहज और प्राकृतिक रूप से सुबह-सुबह हर मर्द का लंड खड़ा ही रहता है,,, ज्यादातर पेशाब की तीव्रता की स्थिति मे,,, लेकिन ईस ज्ञान से तृप्ति पूरी तरह से अंजान थी,,,, अपने भाई का ख्यालों से पूरी तरह से उत्तेजित किए जा रहा था जिसका असर उसे अपनी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में महसूस हो रहा था,,, उसे अपनी पेंटिं गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, क्योंकि उसकी बुर से कम रस टपक रहा था,,,, तृप्ति कुछ बोल नहीं रही थी,,, वह खामोश थी,, और उसे खामोश देखकर संदीप बोला,,,।

क्या हुआ तर्प्ति कुछ बोल क्यों नहीं रही हो,,,।

नहीं कुछ नहीं,,,बस ऐसै ही,,,,।

(तृप्ति अपनी और संदीप के बीच हाथ रख कर बैठी हुई थी और ऐसा लग रहा था कि जैसे वह अपनी और संदीप के बीच हाथ की दीवार खड़ी करके रखी हो ताकि दोनों का बदन आपस में स्पर्श न हो और संदीप बार-बार कोशिश भी कर रहा था ब्रेक लगा कर की झटका खाकर त्रप्ती का बदन उसकी पीठ से स्पर्श हो जाए,,, लेकिन तृप्ति के कारण ऐसा हो नहीं पा रहा था इसलिए संदीप बोला,,,)

कंधे पर हाथ रख कर बैठ जाओ,,,, तब आराम से बैठ पाओगी,,,,।

(संदीप जानबूझकर तृप्ति को अपने कंधे पर हाथ रखने के लिए बोल रहा था क्योंकि वह जानता था कि जब वह उसके कंधे पर हाथ रखेगी तो उसका हाथ ऊपर की तरफ हो जाएगा और ऐसे हालात में,,, जब भी ब्रेक लगाने पर उसका बदन उसकी पीठ से स्पर्श होगा तो उसकी चूचियां भी उसकी पीठ से रगड़ खा जाएंगी,,,, और ऐसा ही हुआ,,, संदीप के कहने पर तृप्ति अपना हाथ उसके कंधे पर रख दी थी,,, और जब जब संदीप ब्रेक लग रहा था तब तब उसके एक तरफ का संतरा उसकी पीठ से दब जा रहा था और उसकी नरमाहट संदीप को अपनी पीठ पर बहुत अच्छे से महसूस हो रही थी जिसके कारण वह अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव कर रहा था,,, उसे बहुत मजा आ रहा था और इस बात का एहसास तृप्ति को भी हो रहा था तृप्ति को भी पता चल रहा था कि जब-जब संदीप ब्रेक लग रहा था तब तक वह एकदम से संदीप से सट जा रही थी,,, और उसकी चूची भी उसकी पीठ से दब जा रही थी,,,।

इन सबके बावजूद भी तृप्ति को बिल्कुल भी संदीप से ऐतराज नहीं हो रहा था बल्कि ना जाने क्यों उसके बदन में मदहोशी का आलम उबाल मार रहा था उसे संदीप के हरकत बहुत अच्छी लग रही थी जब जब ब्रेक लगाने पर उसकी चूची संदीप की पीठ से रगड़ खाती थी तब तब उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगती थी,,,,,,एक तो अपने भाई के लंड का ख्याल और ऊपर से संदीप की हरकत की वजह से उसकी चुचियों का उसकी पीठ से रगड़ खाना कुल मिलाकर उसकी पेंटिं को पूरी तरह से गीली करने पर उतारू हो गए थे,,,,,,।

पहली बार इस तरह का एकांत दोनों को मिला था लेकिन फिर भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे क्योंकि दोनों अपने-अपने तरीके से एक दूसरे से मजा ले रहे थे,,,, तर्प्ति की चूची की रगड़ से संदीप का लंड खड़ा हो गया था,,, और इस एहसास से तृप्ति की बुर पानी छोड़ रही थी,,, और इसी आनंद की पराकाष्ठा में दोनों एक दूसरे से बात करना भूल गए थे नतीजन मैडम का घर आ गया था,,,, वैसे तो दोनों यही सोच रहे थे कि यह सफर कभी खत्म ना हो लेकिन एक दूसरे में दोनों इस तरह से डूब गए थे कि सफर की दूरी का पता ही नहीं चला,,,।

यही है मैडम का घर,,,,(संदीप एकदम बड़े से दरवाजे के आगे मोटरसाइकिल रोक दिया था जिससे तृप्ति अंदाजा लगाते हुए बोल रही थी और वाकई में जिस दरवाजे के आगे दोनों रुके थे वही घर मैडम का था,,,,,)

हां यही है,,,,।

लेकिन देख कर लग तो नहीं रहा है कि मैडम का जन्मदिन है,,,,

,,, हां,,, ऐसा भी हो सकता है कि हम दोनों सबसे पहले पहुंच गए हो,,,,चलो चलकर देखते हैं,,,,

(संदीप मोटरसाइकिल खड़ी करके गेट खोल के अंदर जाने लगा और पीछे-पीछे तृप्ति भी जाने लगी,,,, दरवाजे के आगे पहुंचकर संदीप डोर बेल बजा दिया,,, थोड़ी ही देर में दरवाजा खुला और दरवाजे पर मैडम खड़ी थी दोनों को देखकर मुस्कुराने लगी,,, मैडम को देखकर संदीपबोला,,,)

हैप्पी बर्थडे मैडम,,,, साथ में त्रप्ती भी मैडम को जन्मदिन की बधाई दी,,,।

(मैडम एकदम से खुश होते हुए बोली)

अच्छा हुआ संदीप तुम पहले आ गए,,,

पहले आ गए मतलब,,,,।

मेरा मतलब है कि अभी बाकी बच्चों का आना बाकी है और अच्छा हुआ तुम आ गए,,, क्योंकि जल्दी आ गए हो तो काम में हाथ भी बंटा लोगे,,,।

यह तो हमारा सौभाग्य है मेडम,,(संदीप बोलता है इससे पहले ही तृप्ति बोल पड़ी,,, और तृप्ति,, की तरफ देखते हुए मैडम बोली,,,)

तुम्हारा नाम,,,,,,(कुछ सोचते हुए मैडम बोली)

मैडम इसका नाम तृप्ति है और यह भी अपनी ही कॉलेज में पढ़ती है,,,(संदीप मैडम से तृप्ति को मिलाते हुए बोला,,,,)

ओहहहह,,,,, तुम दोनों बाहर क्यों खड़े हो आओ जल्दी अंदर आओ,,,, और जल्दी से मेरे काम में हाथ बंटाओ,,,।

(इतना कहकर मैडम इन दोनों को घर में ले आई और उन दोनों को एक कमरे में लेकर गई जहां पर वह खुद सब्जी काटने बैठी हुई थी,,,, और वह संदीप और तृप्ति से बोली,,,)

बाकी का सब काम तो हो गया है लेकिन सब्जियां काटना रह गया है बस यही काम हो जाए तो छुटकारा हो जाए वैसे भी मेरे बच्चे केक लेने गए हैं,,, वैसे मैं ज्यादा लोग को बुलाई नहीं हूं लेकिन बहुत खास खास को बुलाई हुं ,,,,,(इतना कहकर मैडम वहीं पर बैठ गई और फिर से सब्जी काटने लगी मैडम को सब्जी काटता हुआ देखकर तृप्ति बोली,,,)

अरे अरे मैडम यह आप क्या कर रही है मेरे होते हुए आपको यह सब करने की जरूरत नहीं है,,,,।

(इतना सुनते ही मैडम तृप्ति की तरफ देखने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

तुम कर लोगी ना,,,,

जी मैडम मैं कर लूंगी मेरा तो रोज का काम है,,,,।

हां,,, हां,,,, मैडम हम दोनों यह काम कर लेंगे मैं भी सब्जी काटने में अपनी मां की मदद करता ही रहता हूं,,,,।

ओहहहह ,,, तुम दोनों कितने अच्छे हो,,,,,।

हम कर लेंगे मैडम आप चिंता ना करें आप दूसरा काम संभालो,,,,(इतना कहते हुए तृप्ति वहीं बैठ गई सब्जी काटने के लिए और तृप्ति की बात सुनकर मैडम बोली,,,)

तुम दोनों कितने अच्छे हो अच्छा हुआ तुम दोनों पहले आ गए वैसे तो अब कुछ काम बचा नहीं है बस मुझे नहाना है और अगर तुम दोनों यह काम कर लोगे तो हमें जल्दी से जाकर नहा लूंगी और फिर खाना तो जल्दी बनजाएगा,,,।

कोई बात नहीं मैडम आप जल्दी से जाकर नहा लीजिए तब तक हम दोनों सब्जी काट लेते हैं,,,,।

ठीक है,,,,(और इतना कहने के साथ ही मैडम नहाने के लिए चली गई,,,, मैडम के जाते ही तृप्ति बोली)

लो यहां तो अभी खाना ही नहीं बना है,,,, लगता है सारा काम हम लोगों को ही करना होगा,,,।

अरे वह बात छोड़ो लेकिन यह तो देखो मैडम हम दोनों को कमरे में अकेला छोड़ कर चली गई नहाने,,,,

तोक्या हुआ,,,?(सब्जी काटते हुए तृप्ति बोली,,,)

तो क्या हुआ,,,, समझ नहीं रही हो एक जवान लड़का और एक जवान लड़की कमरे में इस तरह से अकेले रहेंगे तो क्या होगा,,,,।

क्या होगा,,,,?(तृप्ति संदीप के खाने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रही थी इसलिए संदीप की तरफ देखे बिना ही वह शर्म के मारे नजर नीचे झुकाए हुए सब्जी काटते हुए बोली)

यह पूछो क्या नहीं होगा,,,,,(और इतना कहने के साथ ही बैठे-बैठे ही संदीप अपने प्यास होठों को तृप्ति के देखते हुए होठों की तरफ आगे बढ़ने लगा संदीप की हरकत से तृप्ति के बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी,, एक तो सुबह का नजारा और फिर बाइक पर चुचियों का रगड़ खाना यह सब पहले से ही तृप्ति के तन बदन में आग लगाया हुआ था,, और अभी यह कमरे में एकांत कुल मिलाकर तृप्ति को मदहोश कर रहा था और देखते ही देखते संदीप भी अपने होठों को एकदम उसके होठों के करीब ले गया इतना करीब कि दोनों की सांस एक दूसरे के गालों पर अपनी गर्माहट का एहसास दिलाने लगी,,,, संदीप की हरकत की वजह से तृप्ति के बदन में मदहोशी का नशा छाने लगा उसकी सांस उखड़ने लगी और उसकी आंखें अपने आप बंद हो गई यही मौका देखकर संदीप अपने प्यासे होठों को,,, तृप्ति के दहकते हुए होठों पर रख दिया,,, और मानो,,, तृप्ति भी इसी मौके का इंतजार कर रही हो वह तुरंत अपने होठों को खोल दी और गरमा गरम चुंबन में पूरा सहकार देने लगी दोनों पूरी तरह से पागल हो गए दोनों के हाथों से सब्जी काटने वाला चाकू छोड़कर नीचे गिर गया और दोनों एक दूसरे की बाहों में समाने लगी देखते ही देखते संदीप अपना हाथ आगे बढ़ाकर कुर्ती के ऊपर से ही,,, उसकी चूचियों को दबाना शुरू कर दिया।
 
संदीप की हरकत से तृप्ति के बदन में उत्तेजना और गर्माहट दोनों पूरी तरह से अपना असर दिखाने लगी,,, उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी वह पागल हुए जा रही थी देखते ही देखते संदीप उसके दोनों संतरों को पकड़ कर दबाना शुरू कर दिया,,,, जिस उत्तेजना के साथ संदीप उसकी चूचियों को दबा रहा था उसे तृप्ति,, को दर्द का एहसास तो हो ही रहा था लेकिन आनंद भी बेहद मिल रहा था,,, दोनों का चुंबन इतना गहरा था कि दोनों के लार और थुक एक दूसरे के मुंह में आदान-प्रदान हो रहे थे,,, दोनों पूरी तरह से पागल हो जाएंगे उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं थी कि दरवाजा खुला हुआ है वह तो गनीमत था कि मैडम नहाने के लिए बाथरुम में चली गई थी,,,।

दोनों की हालत खराब हो गई थी इस तरह के एकांत में तृप्ति पूरी तरह से उत्तेजित हो गई थी उसकी बुर से मदन रस लगातार बह रहा था,,,, उसकी बाहों को पड़कर संदीप उसे खड़ी कर दिया और कुछ पल के लिए उसके होठों से अपने होठों को दूर करके उसके खूबसूरत चेहरे को देखने लगा पल भर में ही तृप्ति का गोरा चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया था,,, तृप्ति की सांस ऊपर नीचे हो रही थी साथ में उसकी चूचियां भी लहरा रही थी,,,।

संदीप,,, हमें यह नहीं ,,,, करना चाहिए,,,,(एकदम मदहोश होते हुए गहरी सांस लेते हुए वह बोली तो संदीप बोला)

ऐसा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा तृप्ति,,,,

लेकिन समझने की कोशिश करो मैडम भी इधर ही है,,,।

( खेला खाया संदीप,, तृप्ति की बातों से ही समझ गया कि उसका भी मन है,,,, इसलिए वह धीरे से दरवाजे को बंद करतेहुए बोला,,,)

मैडम की चिंता मत करो वह बाथरूम में है,,,,।

तो,,(गहरी सांस लेते हुए तृप्ति बोली)

तो,,, क्या,,, इस मौके का फायदा उठाना चाहिए,,,,(और इतना कहने के साथ ही फिर से अपने होठों को उसकी तरफ आगे बढ़ाने लगा और देखते ही देखते फिर से दोनों एक दूसरे के होठों को चूसना और चबाना शुरू कर दिए,,,, तृप्ति पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना है बस वह संदीप की हरकतों का मजा ले रही थी और संदीप अपनी हरकत को धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहा था,,,, उसकी चूचियों पर से उसके दोनों हाथ नीचे की तरफ फिसलते उसकी कमर पर आ गए थे और कमर पर आते ही वह धीरे से अपने हाथों को उसकी गोल-गोल नितंबों पर रख दिया था नितंबों पर संदीप के हाथों का स्पर्श इसे पूरी तरह से मदहोश कर रहा था वह पागल हुए जा रही थी और पागलों की तरह संदीप के होठों को चूस रही थी संदीप भी अपनी हरकत को अनजान देते हुए उसके नितंबों को दोनों हथेलियां में कसकर दबा दबा कर मजा ले रहा था,,,,,।

संदीप समझ गया था कि तृप्ति चुदवाने के लिए तैयार हो गई है,,,, इसलिए उसकी गांड को दोनों हाथों से पकड़ कर उसे एकदम से अपने लंड पर सता लिया और ऐसा करने पर उसका लंड जो कि पेंट में तनकर खड़ा हो गया था वह सीधे-सीधे उसकी दोनों टांगों के बीच जाकर उसकी बुर पर दस्तक देने लगा,,, तृप्ति को संदीप के लंड का एहसास अपनी बुर पर बहुत अच्छी तरह से हुआ था इसलिए उसके मुंह से हल्की सी शिकारी फूट पड़ी थी,,, और उसकी सिसकारी की आवाज सुनकर संदीप एकदम से चुदवासा हो गया और उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ कर उसे उठाते हुए पास में ही पड़े टेबल पर बैठा दिया,,,,।

संदीप से अब रख पाना बहुत मुश्किल था क्योंकि जवानी का पर पूरी तरह से पार कर गया था इससे अच्छा मौका संदीप को मिलने वाला नहीं था इस तरह का एकांत उसे फिर दोबारा मिलने वाला नहीं था ऐसा एहसास उसके मन में होते ही वह तुरंत तृप्ति के सलवार की डोरी को खोलने लगा,,,, संदीप को इस तरह से सलवार की डोरी खोलता हुआ देखकर वह अपना हाथ बढ़ाकर उसे रोकने की कोशिश करने लगी लेकिन वह उसका हाथ हटा दिया और दोबारा तृप्ति में उसे हटाने की रोकने की कोशिश भी नहीं की क्योंकि अंदर से वह भी यही चाहती थी जो संदीप चाहता था देखते-देखते वह है तृप्ति की सलवार की डोरी खोलकर उसकी सलवार को ढीली कर दिया था और पेटी सहित उसे पड़कर उसके घुटनों तक खींच दिया था,,,,।

संदीप की हरकत से तृप्ति पानी पानी हो रही थी उसकी बुर लगातार पानी छोड़ रही थी,,, दोनों के बीच किसी भी प्रकार की वार्तालाप नहीं हो रही थी लेकिन पूरे कमरे में दोनों की गरमा गरम सांसो की आवाज ही गुंज रही थी,,,, संदीप की हर हरकत तृप्ति को बहुत ही अच्छी लग रही थी तृप्ति पूरी तरह से मदहोशी के आलम में हो गई थी,,, वह जवानी के नशे में डूब चुकी थी संदीप उसकी दोनों टांगों को उसके घुटनों से मोड कर उसकी गोल गोल गांड को देख रहा था और गांड की बीच उसकी गुलाबी बुर को देख रहा था,,, और उसकी बुर को देखकर उसके मुंह में पानी आ रहा था,,,, क्योंकि उत्तेजना के मारे उसकी बुर फुलकर कचोरी हो गई थी,,, संदीप की अनुभवी आंखें में तृप्ति की बुर को देखकर पहचान लिया था कि आज ही उसने क्रीम लगाकर उसे साफ की थी,,,, तृप्ति संदीप के हर हरकत को देख रही थी,,,,।

संदीप का मन तो कर रहा था कि तृप्ति की बुर को जीभ लगाकर चाटे,,, लेकिन वह जानता था कि इतना समय उसके पास बिल्कुल भी नहीं है वह तृप्ति की बुर में अपनी विजय पताका लहराना चाहता था,, इसलिए वह इस समय ज्यादा कुछ ना करते हुए अपनी हथेली को उसकी बुर पर रखकर उसे ज़ोर से मसलते हुए अपनी पेंट का बटन खोलने लगा,,,,।

संदीप के द्वारा हथेली से बुर को रगड़ने की वजह से उत्तेजना के चलते तृप्ति की आंखें एकदम से बंद हो गई थी,,,, और वह गहरी गहरी सांस लेने लगी थी लेकिन फिर वह अपनी आंखों को खोलकर संदीप की तरफ देखने लगी थी उसकी हरकतों को देखने लगी थी वह अपनी पेंट खोल रहा था और देखते-देखते वह अपनी पेट को घुटनों तक नीचे खींच दिया था लेकिन जैसे ही तृप्ति की नजर संदीप के लंड पर गई तो उसके होश उड़ गए,,,, वह अपने मन में ही सोचने लगी कि सुबह जो देखी थी उससे तो इसका आधा भी नहीं है,,,, तृप्ति,,, को कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,, जब तक वह अपने भाई का नहीं देखी थी तब तक उसके मन में लड के आकार को लेकर वास्तव में संदीप के लंड के आकार का ही वास्तविक लंड नजर आता था,,, लेकिन सुबह अपने भाई के बम पिलाट लंड के दर्शन करने के बाद संदीप का लंड उसे बहुत छोटा लग रहा था,,,,।

लेकिन फिर भी उसकी उत्तेजना परम सीमा पर थी वह पूरी तरह से चुदवाने के लिए तैयार हो चुकी थी,,, और संदीप उसे चोदने के लिए तैयार हो गया था,,,, लेकिन जैसे ही संदीप ने थूक को लगा कर अपने लंड को गीला किया वैसे ही डोर बेल बजने लगी,,, उसके तो होश उड़ गए उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,,, समय की सीमा रेखा को देखकर ही वह तृप्ति की बुर को चाटने का सुख छोड़कर एक बार उसने अपना लंड डालना चाहता है अपनी ख्वाहिश पूरी करना चाहता था और इसके लिए वह पूरी तरह से तैयार भी हो चुका था दरवाजे की घंटी बजाने के बावजूद भी वह एक हाथ में लंड पड़कर दूसरे हाथ से तृप्ति की दोनों टांगो को ऊपर उठाते हुए उसकी बुर में डालने जा रहा था कि लगातार डोर बेल बजाने की वजह से बाथरूम में से ही उसके मैडम ने आवाज लगाते हुए बोली,,,)

संदीप जल्दी से दरवाजा खोल दे बच्चे आ गए होंगे,,,,।

रहने दो संदीप,,,(लगातार डोर बैल और मैडम की आवाज सुनकर तृप्ति एकदम से घबरा गई और तुरंत टेबल पर से नीचे उतर कर अपनी सलवार की डोरी बांधने लगी,, संदीप भी समझ गया था कि अब उसके बस में कुछ भी नहीं है इसलिए वह भी अपने आप को व्यवस्थित करके दरवाजा खोलने के लिए चला गया,,, और तृप्ति वापस से सब्जी काटने लगी,,, देखते ही देखते घर में मेहमानों की संख्या बढ़ने लगी और फिर कब शाम हो गई पता ही नहीं चला,,,,।

रास्ते भर संदीप और तृप्ति एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे तृप्ति तो शर्म के मारे संदीप से बात नहीं कर पा रही थी और संदीप हाथ में आया । मौका चला गया था इसलिए कुछ बोल नहीं रहा था

.......................
 
हाथ को आया मुंह को ना लगा,,,, संदीप की हालात कुछ ऐसी हो गई थी,,,, जिस चीज को पाने के लिए उसने महीनो तक मेहनत किया,,, इतने पापड़ बेले,,, नखरे सहे,,, वह खूबसूरत चीज उसकी आंखों के सामने थी जिसे वह खुद कपड़े निकाल कर उजागर किया था,,,, लेकिन न जाने संदीप की किस्मत में क्या लिखा हुआ था की आंख के सामने बेस कीमती होश ना का दरिया होने के बावजूद भी वह उसमें डुबकी नहीं लगा पाया,,,, संदीप को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे उसकी किस्मत गधे के लंड से लिखी गई थी,,,, उसकी भाषा में कहे तो उसके अरमान लोड़े लग गए थे,,,, वह बहुत हताश हो चुका था निराश हो चुका था इसलिए तृप्ति को वापस लाते समय वहां निराशा के मारे उससे बात तक नहीं कर पा रहा था,,,।

वैसे भी जिस तरह की हालात बने हुए थे उसे देखते हुए किसी को भी उम्मीद न होती की सब कुछ आंखों के सामने होते हुए भी धरा का धरा रह जाएगा,,,, सब कुछ संदीप के पक्ष में था एकांत जगह एकांत कमरा किसी की भी मौजूदगी नहीं थी,,,, ऐसे में एक मर्द चाहे तो औरत के साथ कुछ भी कर सकता है और वही संदीप तृप्ति के साथ कर नहीं जा रहा था जिसमें तृप्ति की पूरी तरह से सहमति थी संदीप ने अपनी हरकत चतुर्थी को पूरी तरह से गर्म कर दिया था वह भी चुदवाने के लिए तैयार हो चुकी थी,, जिसके लिए संदीप ने उसकी सलवार की डोरी खोल कर उसकी पैंटी सहित उसे घुटनों तक खींच दिया था और उसकी दोनों टांगों को मोड़ दिया था ताकि वह उसके गुलाबी छेद में आराम से अपना लंड डाल सके जिसके लिए वह अपना लंड भी बाहर निकाल लिया था बस उसे डालने की देरी थी,,, लेकिन तभी दरवाजे की घंटी बज गई थी उसे समय संदीप को ऐसा ही लग रहा था कि दरवाजे की घंटी नहीं बल्कि कोई उसके दिल पर हथोड़ा मार रहा हो,,, उस समय घंटी की आवाज से वह पूरी तरह से घायल हो चुका था,,,।

घंटों सोच विचार कर बनाया हुआ प्लान फेल हो चुका था,,,,,, वैसे तो तृप्ति के साथ इस तरह की हरकत करने के लिए वह बीच रास्ते में जंगली झाड़ियां के बीच जगह तय कर लिया था लेकिन मैडम के घर पर ही उसे पूरी तरह से अवकाश मिल गया था लेकिन वह अवकाश नहीं था बल्कि उसके अरमानों का दमन था जो उसे दरवाजे की घंटी ने कर दी थी,,,। अनुभव से भरा हुआ संदीप तृप्ति की गुलाबी बुर को देखकर पागल हो गया था,,, वह समझ गया था कि तृप्ति की बुर अनछुई थी अनचुदी थी,,, जिस पर अभी तक किसी दूसरी मर्द का स्पर्श तक नहीं हुआ था ऐसी खूबसूरत गुलाबी छेद को देखकर संदीप के मुंह के साथ-साथ उसके लंड में भी पानी आ गया था वह अपने लंड को उसे गुलाबी छेद में डालकर अपने अरमान को पूरा करना चाहता था,,,। वह खुशी के मारे पागल हो गया था क्योंकि उसे उम्मीद नहीं थी कि इतनी आराम से त्रप्ती की बुर उसे मिल जाएगी,,, वैसे इतने आराम से तो मिले नहीं थी लेकिन फिर भी उसे उम्मीद नहीं थी कि सिर्फ इतनी जल्दी तैयार हो जाएगी चुदवाने के लिए,,, लेकिन सब कुछ बेकार हो चुका था,,,,।

ऐसा नहीं था कि इस असफलता से केवल संदीप ही परेशान था,,, तृप्ति भी निराश हो गई थी क्योंकि जिंदगी में पहली बार हुआ इस तरह का बड़ा कदम उठाई थी जिसके लिए वह पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी वह देखना चाहती थी कि संभोग में कितना सुख मिलता है वैसे तो वह इतना तो एहसास कर ही चुकी थी कि संभोग के पहले की क्रिया में बहुत मजा आता है इसलिए उसे इतना तो विश्वास था कि संभोग में भी बहुत मजा आता होगा जिसके लिए वह पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी लेकिन इन मौके पर उसके भी अरमानों पर पानी फिर गया था,,,,।

वैसे तो उस समय तृप्ति पूरी तरह से शर्म से पानी पानी हो गई थी जब संदीप ने अपने हाथों से उसकी सलवार की डोरी खोलकर सलवार को चड्डी सहित घुटनों तक खींच दिया था ऐसे हालात में उसकी बुर एकदम से साफ नजर आ रही थी,,, और ऐसे में संदीप को अपनी बर दिखने में उसे बेहद शर्म महसूस हो रही थी यहां तक कि वह शर्म से गड़ी जा रही थी लेकिन चुदाई का मजा लूटने की चाहत में वह इनकार नहीं कर पाई थी लेकिन संदीप के लंड को देखकर वह पूरी तरह से आहत हो चुकी थी वह समझ नहीं पा रही थी कि यह सब क्या है पहले तो संदीप के लंड के आकार की कल्पना उसके मन में रहती थी लेकिन जब से उसने अपने छोटे भाई के लंड के दर्शन की थी,,, उसके बाद जैसे ही संदीप के लंड का दीदार उसे हुआ वह पूरी तरह से आहत हो गई,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि मर्द में इतना बड़ा बदलाव कैसे एक का आधे से भी काम और दूसरे का बम पिलाट गधे का जैसा ,,,।

खैर जो भी हो मुंह लटकाए वह घर आ चुकी थी,,, सही समय पर घर पर पहुंचने पर उसकी मां भी बहुत खुश थी क्योंकि वह आजकल की लड़कियों के तेवर को उनकी हरकतों को अच्छी तरह से जानती थी क्योंकि इसी तरह से लड़कियां सहेली के घर जाने का बहाना करके अपने प्रेमी के साथ बाहर गुलछर्रे उड़ाया करती थी लेकिन सुगंधा को अपनी बेटी पर पूरा विश्वास था,,, वह जानती थी कि उसकी बेटी कभी भी दूसरी लड़कियों की तरह हरकत नहीं करेगी ना ही उसके कदम डगमगाएंगे,,,।

दूसरे दिन कॉलेज में संदीप और तृप्ति दोनों एक दूसरे से नजर मिलाने से भी घबरा रहे थे,,, तृप्ति इसलिए नजर नहीं मिल पा रही थी क्योंकि अब तक वह संदीप को इस तरह की हरकत करने से रोकते आ रही थी और नाराज भी थी,,, लेकिन एकाएक उससे अपनी जवानी का दबाव बर्दाश्त नहीं हुआ,,, और वह उसके सामने टांगे खोलें अपनी बुर उसे परोश दी थी,,, और संदीप इसलिए शर्मिंदा था कि जिस चीज के लिए उसने इतना मेहनत किया था वह चीज उसकी आंखों के सामने होते हुए भी उसमें लंड डालने की तो छोड़ो उसने अपनी उंगली भी नहीं डाल पाया था,,,,।

एक दो तीन ऐसे ही गुजर गए,,,, दोनों फिर से आपस में बात करने लगे लेकिन मैडम के घर पर जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में बात करने में दोनों कतरा रहे थे,,,, दोनों में धीरे-धीरे फिर से मामला सहज होने लगा था की तभी एक सप्ताह बीतने के बाद,,, संदीप ने फिर से एक चिट्ठी लिखा और उसे एक नोटबुक में करके उसे थमा दिया,,,, और उसे नोटबुक देते समय बोला,,,।

इस स्थिति में जो कुछ भी लिखा है उसे घर पर जाकर इत्मीनान से पढ़ना,,,,

क्यों अभी भी कुछ कहना बाकी रह गया है क्या जो कहना था वह तो तुम कह दिए हो,,,।

हां लेकिन जो मैं नहीं कहना चाहता था वह मुझे इस चिट्ठी में लिखना पड़ रहा है और मुझे पूरा भरोसा है कि तुम इस चिट्ठी को पढ़कर नाराज नहीं होगी बल्कि समझदारी से काम लोगी,,,।

ठीक है,,, लेकिन तुमने चिट्ठी में ऐसा क्या लिख दिया है कि इतना भाषण देना पड़ रहा है,,,।

मैं बात नहीं सकता अगर बता सकता तो तुम्हें चिट्ठी देने की जरूरत नहीं पड़ती ऐसे ही बता देता,,,, ठीक है मैं चलता हूं,,,,(इतना कहकर संदीप वहां से चला गया और तृप्ति उसे जाता हुआ देखते रह गई और सोचती रह गई कि आखिरकार चिट्ठी में ऐसा क्या लिखा है जिसे देते समय उसके चेहरे पर उदासी छा गई थी,,,, कहीं उसे दिन के लिए माफी तो नहीं मांग रहा है,,, लेकिन उसे दिन के लिए तो वह खुद नाराज नहीं है तो माफी किस बात की शेर जो भी हो यह तो चिट्ठी पढ़ने के बाद ही मालूम पड़ेगा कि क्या लिखा है,,,,,।

रात के 10:00 रहे थे और वह सब काम निपटाकर अपने कमरे में चली गई और अपना बैग खोलकर नोटबुक निकाल ली और उसमें रखी हुई चिट्ठी को पढ़ने लगी किसी को पढ़ते पढ़ते उसकी आंखों से आंसू निकलने लगी वह एकदम से परेशान हो गई वह कुछ कर भी नहीं सकती थी किसी को बता भी नहीं सकती थी किसी को भी अपनी हालत बयां नहीं कर सकती थी,,,,, गुस्से में वह चिट्ठी को टुकड़े-टुकड़े करके फाड़ कर उसे कचरे के डिब्बे में डाल दी और तकिया को अपने सीने से लगाए बिस्तर पर लेट कर रोने लगी,,,।

ऐसा क्यों किया संदीप तुमने,,, जब जाना ही था तो मुझे दिल क्यों लगाया क्यों मेरे इतने करीब आए,,,,,(ऐसा कहकर वह रो रही थी,,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,, क्योंकि संदीप ने चिट्ठी में लिखा था कि,,,, आज तुमसे आखिरी मुलाकात है मेरे पापा का तबादला हो गया है दूसरे शहर ना चाहते हुए भी हमें जाना पड़ रहा है तुम तो जानती हो कि मेरे पिताजी सरकारी मूलाजीम है,,, जहां तबादला होता है वहां जाना ही पड़ता है,,,, तृप्ति मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं जिंदगी भर करता रहूंगा अगर किस्मत में लिखा रहेगा तो फिर मिलेंगे लेकिन मेरे जाने से तुम उदास मत होना तुम बहुत अच्छी लड़की हो,,,, तुम्हारा संदीप,,,,,।

तृप्ति,, कभी सोची भी नहीं थी कि संदीप इस तरह से उसे छोड़कर चला जाएगा वह तो अपने मन में जिंदगी भर का साथ का सपना देखने लगी थी जहां तक कि वह संदीप के साथ विवाहित जीवन का भी सपना देखने लगी थी लेकिन जल्द ही उसका सपना टूट गया संदीप उसे रोता हुआ छोड़ गया था,,,,, लेकिन तभी उसके मन में ख्याल आया कि अच्छा हुआ मैडम के घर पर कुछ हुआ नहीं अगर कुछ हो गया होता तो वह जिंदगी भर अपने आप को माफ नहीं कर पाती,, क्योंकि अगर उसे बारे में किसी को पता चल जाता तो वह बदनाम हो जाती उसकी इज्जत चली जाती है और वह फिर कभी भी समझ में सर उठाकर जी नहीं पाती,,,,।

एक तरफ जहां वह इस तरह के ख्याल से अपने मन को मनाने की कोशिश कर रही थी वहीं दूसरी तरफ वह संदीप के जाने से बहुत दुखी थी संदीप से वह आखरी बार मिल भी नहीं सकती थी क्योंकि वह लिखा था कि जब तक तुम यह चिट्ठी पड़ोगी तब तक मैं दूसरे शहर के लिए निकल गया होऊंगा,,,।

इस चिट्ठी को पढ़कर तृप्ति, पूरी तरह से टूट गई,, क्योंकि उसे संभालने वाला कोई नहीं था अपने प्यार की बात वह किसी से कह भी नहीं सकती थी,,, इसलिए इस दुख को अकेले झेल रही थी दूसरी तरफ संदीप को त्रप्ती से अलग होने का मलाल बस इतना था कि वह तृप्ति को चोद नहीं पाया था उसकी गुलाबी बुर का स्वाद नहीं चख पाया था,, तृप्ति से उसे बिल्कुल भी लगाव नहीं था उसे लगाव था तो सिर्फ तृप्ति के खूबसूरत बदन से,, और यही बात त्रप्ती समझ नहीं पा रही थी,,, उसे ऐसा ही लग रहा था की संदीप भी उससे दिलो जान से प्यार करता है,,,।

संदीप का काम उसे इतना सता रहा था कि दो-तीन दिन तक तो वह कॉलेज नहीं जा पाई,,, यहां तक कि उसे बुखार आ गया उसकी तबीयत खराब हो गई,,,,, उसकी मां ने उसे दवा दिलाई तब जाकर उसे आराम हुआ,,, लेकिन फिर भी वह संदीप के गम से बाहर निकल नहीं पाई थी,,, मोहब्बत का दर्द होता ही इतना गहरा है कि जिसमें से निकलने में बहुत वक्त लगता है,,,,, तृप्ति का कॉलेज आना जाना तो शुरू हो गया था लेकिन वह उदास रहने लगी थी,,, उसकी उदासी का कारण हमेशा सुगंध जानने की कोशिश करती थी और वह परीक्षा का तनाव बढ़कर बात को टाल जाती थी सुगंधा भी नहीं समझ पाती थी कि आखिरकार उसके बेटी को हुआ क्या है,,,।

जैसे तैसे करके महीना गुजर गया,,,, पिछले कुछ दिनों से सुगंधा और उसके बेटे में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिससे दोनों केतन बदन में उत्तेजना की लहर उठे,,,,,,,,।

दो-चार दिनों से अंकित देख रहा था कि उसकी मां कुछ सुस्त नजर आ रही थी,,,, दो-चार बार वह पूछ भी की क्या हुआ है लेकिन वह ठीक से बता नहीं पाई,,, कि उसे क्या हुआ है उसे ऐसा ही लग रहा था कि जैसे बदन में आलस है जिसकी वजह से वह सुस्त नजर आ रही थी,,,,। दोपहर में जब अंकित घर पर पहुंचा तो देखा उसकी मां अपने कमरे में ही है कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और बिस्तर पर उसकी मां सो रही थी दरवाजे पर खड़े होकर वह अपनी मां की तरफ देख रहा था तो उसे केवल अपनी मां की उठती बैठती हुई चूचियां नजर आ रही थी जिसके चलते उसके बाद में उत्तेजना की लहर उठ रही थी,,, और वह धीरे-धीरे अपनी मां के करीब पहुंच गया उसकी मां सो तो नहीं रही थी लेकिन कुछ परेशान नजर आ रही थी अंकित को थोड़ा अजीब लगा तो वह अपनी मां के सर पर हाथ रख कर देखने लगा तो वह एकदम से चौंक गया क्योंकि उसका माथा एकदम गरम था उसे बहुत बुखार था,,,।

मम्मी तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है दवाई नहीं ली क्या,,,,?

नहीं रे कुछ दिनों से ऐसा लग रहा था की तबीयत खराब है लेकिन आज कुछ ज्यादा ही तबीयत खराब लगने लगी चक्कर आया तो में सोने की कोशिश कर रही हूं लेकिन नींद नहीं आ रही है,,,,।

तुम्हें तो दवा दिलाना पड़ेगा चलो जल्दी से मैं तुम्हें दवा खाने ले चलता हूं,,,,,।

रहने दे मेडिकल पर से बुखार की गोली ले आ उससे आराम हो जाएगा,,,

मेडिकल से नहीं तुम्हें दवा खाने से दवा दिलाना पड़ेगा चलो मैं लेकर चलता हूं,,,।

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सुगंधा को बहुत जोरों का बुखार चढ़ा हुआ था,,, अंकित को इसकी जानकारी होते ही हो अपनी मां को दवा खाना लेकर जा रहा था,,,,, बुखार कुछ ज्यादा ही था तभी तो सुगंधा को चलने तक की ताकत नहीं थी,,, त्रप्ती घर पर नहीं थी,,, वैसे भी कुछ दिनों से उसका घर पर होना ना होना एक बराबर था क्योंकि वह संदीप के ही ख्यालों में खोई रहती थी,,, संदीप सेवा बढ़ चुकी थी संदीप उसे छोड़कर दूसरे शहर जा चुका था लेकिन फिर भी तृप्ति थी कि उसकी याद में पागल हो रही थी,,,, लेकिन जैसे तैसे करके वह धीरे-धीरे इस दुख से निकलने की कोशिश कर रही थी,,,।

तृप्ति के गैर मौजूदगी में अंकित को ही अपनी मां को दवा खाना ले जाना पड़ा,,,, कुछ दूर तक चलने के बाद ऑटो रिक्शा देखते ही उसे हाथ देकर अंकित ने रोका,,,, और फिर दोनों उसमें बैठकर दवा खाने के लिए निकल गए,,,,, बार-बार अंकित अपनी मां के सर पर हाथ रखकर उसके बुखार की जांच पड़ताल कर रहा था वाकई में उसका माथा बहुत ज्यादा गर्म था,, लेकिन ऐसी हालत में भी अंकित की नजर अपनी मां की चूचियों पर चली जा रही थी जो की अस्त-व्यस्त हालत में उसकी चूचियों की दरार एकदम साफ नजर आ रही थी,,,। बहुत दिनों बाद घर में किसी की तबीयत इस तरह से खराब हुई थी,,,, इसलिए अंकित थोड़ा चिंतित भी था,,,।

थोड़ी ही देर में,,, दवाखाना आ गया था ऑटो वाला ठीक दवा खाने के सामने रोक दिया,,,, अंकित धीरे से अपनी मां को सहारा देकर नीचे उतरा और उसे ऑटो वाले का किराया देकर अपनी मां की बांह पकड़कर दवा खाने में ले जाने लगा दोपहर का समय होने की वजह से दवा खाने में कोई दूसरा मरीज नहीं था इसलिए तुरंत ही नंबर आ गया था,,,। यह दवाखाना घर के थोड़ी ही दूरी पर था और अक्सर सुगंधा यहीं से दवा ले जाया करती थी और उसे आराम भी हो जाया करता अंकित भी अपनी मां के साथ दो-तीन बार यहां पर आ चुका था इसलिए उसे मालूम था कि ऐसे हालात में उसकी मां को कहां ले जाना चाहिए,,,।
 
अंकित अपनी मां को सहारा देकर धीरे-धीरे डॉक्टर के केबिन में ले गया डॉक्टर अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ था जब अंकित अपनी मां को सहारा देकर कुर्सी पर बैठने जा रहा था तब उसकी मां की साड़ी का पल्लू उसके कंधे से नीचे गिर गया था और उसकी भारी भरकम छातियां एकदम से उजागर हो गई थी जिस पर डॉक्टर की नजर पड़ते ही उसकी लार टपकने लगी थी,,, डॉक्टर तो सुगंधा की मदहोश कर देने वाली छातिया को देखता ही रह गया,,,वह एकदम प्यासी नजरों से सुगंधा को देख रहा था,,, उसकी नजरों से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे आज तक कुछ नहीं थी खूबसूरत औरत देखा ही नहीं था,,,,।

और वैसे भी सुगंधा का गठीला बदन था ही इतना आकर्षक की कोई भी देखा तो बस देखता ही रह जाता था भारी भरकम,,, तो बिल्कुल भी नहीं कह सकते थे हां लेकिन पूरा बदन जवानी के गुच्छे से भरा हुआ था,,,, एक तरह से सुगंधा जवानी से लदी हुई थी,,,। अंकित भी डॉक्टर की नजर को अच्छी तरह से देख रहा था उसे भी पता था कि डॉक्टर उसकी मां की चूचियों की तरफ प्यासी नजरों से देख रहा है,,, लेकिन न जाने क्यों अंकित ने भी कुछ पल के लिए अपनी मां की साड़ी के पल्लू को ठीक करने की शुध नहीं लिया,,, अंकित जानबूझकर डॉक्टर को अपनी मां की जवानी के दर्शन करवा रहा था और मन ही मन प्रसन्नता के साथ गर्व का अनुभव भी कर रहा था,,, इसलिए की अभी भी उसकी मां की जवानी भरतार थी अभी भी उसकी मां किसी के भी लंड को खड़ा कर देने में पूरी तरह से सक्षम थी,,,। सुगंधा की हालत थोड़ी खराब थी उसे चक्कर भी आ रहा था इसलिए उसे अपने कपड़े की बिल्कुल भी शुध नहीं थी वरना वह कहीं भी जाती थी तो सबसे पहले अपनी साड़ी का पल्लू भी व्यवस्थित करती थी कि कहीं से कुछ दिख तो नहीं रहा है लेकिन आज उसकी बेसुधी का डॉक्टर पूरा फायदा उठा रहा था अपनी आंखों को सेंक रहा था,,,।

वैसे भी सुगंधा की चूचियां बड़े-बड़े खरबुजा की तरह थी,, जॉकी सुगंधा के ब्लाउज में ठीक तरह से समा नहीं पाती थी और पूरी तरह से उजागर हो जाती थी और यही आकर्षण मर्दों को पूरी तरह से सुगंधा का दीवाना बनाने में काफी होता था और इस समय डॉक्टर की भी यही हालत हो रही थी,,,, डॉक्टर के मुंह में पानी आ रहा था,,, अंकित को पूरा विश्वास था कि उसकी मां की बड़ी-बड़ी चूचियों को देखकर डॉक्टर का लंड खड़ा हो गया होगा,,,,,, चूचियों के दर्शन कि समय मर्यादा समाप्त हो चुकी थी,,, इसलिए अंकित अपनी मां के साड़ी के पल्लू को व्यवस्थित करने लगा अंकित को ऐसा करते देख डॉक्टर को भी जैसे होश आया हो वह धीरे से बोला,,,।)

क्या हुआ है इन्हें,,,,?

सर ,,, दो-तीन दिनों से थोड़ी तबीयत खराब थी आज जब मैं घर पर पहुंचा तो बदन तप रहा था तो मैं यहां लेकर आ गया,,,।

हममम,,,, रुको चेक कर लेते हैं,,,,(इतना कहकर इस डॉक्टर ने अपने गले में से आला निकाला,,,, और अंकित की तरफ देखने लगा,,,, अंकित की तरफ देखते हुए उसे डॉक्टर ने अाला को कान में लगाया और अंकित से बोला,,,)

बेटा थोड़ा पल्लू नीचे करना तो,,, बुखार चेक कर लु,,,,।

(डॉक्टर की बात सुनकर अंकित थोड़ा सदमे में था क्योंकि वह जानता था की औरतों को उनका बुखार चेक करते समय डॉक्टर अक्सर उनकी पीठ की तरफ आला लगाते हैं ,, लेकिन यह डॉक्टर तो छाती पर आला लगाना चाहता है इसी बहाने वह मां की चूचियों को देखना चाहता है और स्पर्श करना चाहता है,,,, कुछ पल के लिए अंकित के मन में आया कि डॉक्टर को ऐसा करने से इनकार करते और बोले की औरतों को तो पीठ पर अाला लगाकर चेक किया जाता है,,, लेकिन अंकित अपने मन में सोचा उसकी आंखों के सामने वह डॉक्टर भला इससे ज्यादा क्या कर पाएगा क्योंकि अंकित भी एक खूबसूरत जवान औरत के सामने एक मर्द की स्थिति कैसी होती है उसे अच्छी तरह से बाकी और अच्छी तरह से जान रहा था कि डॉक्टर की हालत खराब हो रही है और इसमें उसे गर्व महसूस हो रहा था इसलिए डॉक्टर की बात मानते हुए वह अपनी मां की साड़ी का पल्लू पकड़ कर थोड़ा सा नीचे किया,,,,। और ऐसा करने में अंकित भी पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था क्योंकि उसकी आंखों के सामने भी उसकी मां की भारी भरकम चूचियां ब्लाउज में कैद एक दम साफ नजर आ रही थी।।।

साड़ी का पल्लू एक बार फिर से नीचे होते ही डॉक्टर का दिल भी जोरों से धड़कने लगा उसकी भी हालत खराब होने लगे उसकी आंखों के सामने एकदम गोरा मक्खन जैसा बदन नजर आ रहा था जिसकी मादक चूचियों की भारी भरकम गहरी लकीर एकदम साफ नजर आ रही थी,,,, सुगंधा को तो जैसे मानो होश ही नहीं था,,,, वह आंखों को बंद करके बस गहरी गहरी सांस ले रही थी जिसकी वजह से उसकी चूचियां भी ऊपर नीचे उठ बैठ रही थी और यह देखकर तो अंकित के साथ-साथ उस डॉक्टर की भी हालत खराब हो रही थी,,,, सुगंधा की मदहोश कर देने वाली बड़ी-बड़ी चूचियों को ब्लाउज में कैद देखकर डॉक्टर तो जैसे होश ही खो बैठा वह बिना पलक झपके सुगंधा की छातियों को ही देख रहा था,,,, अंकित कभी डॉक्टर को तो कभी अपनी मां की छातियों की तरफ देख रहा था,,,, फिर धीरे से अंकित ने बोला,,,,।

आला लगाइए सर,,,,।

(अंकित की बात सुनते ही जैसे डॉक्टर होश में आया हो वह एकदम से हड़बड़ाते हुए बोला)

हं,,,,,हंंं,,,,,(और इतना कहने के साथ ही डॉक्टर में आला को हाथ में लेकर सुगंधा की छाती पर लगा दिया डॉक्टर इतना चालाक था कि वह आला को,,, चूचियों के गोलार्ध की सतह के ऊपरी हिस्से पर लगाने की जगह वह चूचियों के उभरे हुए हिस्से पर लगा रहा था और जानबूझकर अपनी उंगलियों को मोड़कर सुगंधा की चूचियों की नरमाहट को स्पर्श कर रहा था अंकित सब कुछ देख रहा था लेकिन कुछ बोल नहीं पा रहा था,,,,। अगर बोलना चाहता तो भी क्या बोलना क्योंकि डॉक्टर ऐसी वैसी हरकत तो कर नहीं रहा था चाहे जैसे भी वह उसकी मां का बुखार ही चेक कर रहा था,,,,, चूचियों को स्पर्श करने के बहाने लगभग 5 मिनट तक वह चूचियों पर आल्हा लगाकर उसके ऊपर नीचे होते हुए जाकर को अपनी आंखों से देखकर गर्म होता रहा और फिर धीरे से बोला,,,)

मलेरिया का असर दिखाई दे रहा है,,,, पेशाब की जांच पड़ताल करनी पड़ेगी,,,,,।

(पेशाब की जांच पड़ताल वाली बात सुनते ही,,, अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा,,,, अंकित डॉक्टर से बोला,,,)

सर पेशाब की रिपोर्ट के लिए तो पैथोलॉजी जाना पड़ेगा,,,।

नहीं उसकी कोई जरूरत नहीं है यहीं पर सब हो जाता है,,,, यहीं पर पेशाब और ब्लड का टेस्ट हो जाएगा,,,,।

ठीक है,,,, लेकिन जाना कहां है,,,,?

बाहर ही बाथरूम में,,,, वहीं पर परखनली भी होगी उसी में ले लेना,,,,।

ठीक है डॉक्टर ,,,, (इतना कहते ही अंकित अपनी मां का हाथ पकड़ कर उसे कुर्सी पर से उठाने लगा,,, सुगंधा को चक्कर जरूर आ रहा था लेकिन वह जानते थे कि डॉक्टर क्या कह रहा है इसलिए वह भी धीरे-धीरे अपने बेटे का सहारा लेकर दवा खाने में ही बने बाथरूम की तरफ जाने लगी,,, अंकित जैसे ही अपनी मां को डॉक्टर के केबिन से लेकर बाहर निकाला डॉक्टर लंबी सांस भरते हुए अपने लंड को पेंट के ऊपर से ही दबाने लगा,,, और अपने मन में ही बोला क्या औरत है यार,,,,।

अंकित धीरे-धीरे अपनी मां को सहारा देकर उसे बाथरूम में ले आया बाथरूम का दरवाजा खोलकर धीरे से वह अपनी मां को बाथरूम में लेकर आया वही पास में ही,,,, परखनली रखने के लिए ड्रोवर बना हुआ था उसमें से एक परखनली को ले लिया और उसे अपनी मां को देते हुए बोला,,,..

इसमें पैसाब का सैंपल लेना है जांच के लिए,,,,।

(सुगंधा अपने हाथ में उस परखनली को तो ले ली थी,,, लेकिन उसे चक्कर आ रहा था,,, और परखनली अपनी मां को थमा कर अंकित बाथरूम से बाहर जाने लगा तो उसे रोकते हुए सुगंधा बोली,,,)

तु मत जा मुझे चक्कर आ रहा है,,,,।

(और अपनी मां की यह बात सुनकर तो अंकित की हालत और ज्यादा खराब होने लगी उसका लंड खड़ा होने लगा यह सोचकर ही वह उत्तेजित हुआ जा रहा था की दवा खाने में बाथरूम में वह अपनी मां के साथ कैसे उपस्थित रह सकता है जब उसकी मां पेशाब कर रही हो,,, लेकिन वह भी अपनी मां की हालत को समझता था वह जानता था किसकी मां को चक्कर आ रहा है उसकी तबीयत खराब है ऐसे में वह लड खडा कर गिर सकती थी और चोट लग सकता था,,, इसलिए उसे वहां खड़ा रहना जरूरी था लेकिन एक बार वहां देख लेना चाहता था कि कहीं-कहीं देखा तो नहीं रहा है वैसे तो जब वह दवा खाने में आया था तो कोई भी नहीं था और इस समय भी कोई नहीं था लेकिन फिर भी वहां धीरे से दरवाजा खोलकर इधर-उधर देखने लगा लेकिन कोई नहीं डॉक्टर अपनी केबिन में बैठा हुआ था इसलिए जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया और ना चाहते हुए भी वह अपनी मां से बोला,,,)

जल्दी से कर लो,,,,,।

(अंकित की बात सुनते ही सुगंधा धीरे-धीरे अपनी साड़ी ऊपर की तरफ उठने लगी और जैसे-जैसे उसकी साड़ी ऊपर की तरफ पड़ रही थी उसकी गोरी चिकनी टांग मांसल जांघ सब कुछ उजागर होता चला जा रहा था और यह सब देखकर अंकित का लंड फटने के कगार पर आ गया था,,, एक हाथ से वह साड़ी कमर तक उठे खड़ी थी पीछे से सुगंध का पिछवाड़ा नजर आ रहा था वह आसमानी रंग की चड्डी पहनी थी जिसे वह एक हाथ से नीचे करने की कोशिश कर रही थी लेकिन कर नहीं पा रही थी,,,, सुगंधा बुखार की हालत में अपने होश में बिल्कुल भी नहीं थी इसलिए जब अंकित ने देखा कि उसकी मां अपनी चड्डी नहीं उतर पा रही है तो खुद अपना हाथ आगे बढ़कर दोनों हाथों से अपनी मां की चड्डी को उतारने लगा यह बेहद अद्भुत संयोग था ऐसा वह कल्पना में कई बार कर चुका था लेकिन आज हकीकत में करना पड़ रहा था लेकिन घर के कमरे में नहीं बल्कि दवा खाने की बाथरूम में और वह भी इस स्थिति में जहां पर चाह कर भी अंकित मजा नहीं ले सकता था लेकिन फिर भी अपनी मां की नंगी गांड देखकर वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था वह अपने हाथों से अपनी मां की चड्डी को नीचे जांघों तक सरका दिया था,,,, और बोला,,,)

अब जल्दी से बैठकर पेशाब कर लो और परख नली में सेंपल ले लो,,,,।

(अंकित की बात सुनकर सुगंधा धीरे से बैठने लगी बैठने में भी उसे दीवाल का सहारा लेना पड़ रहा था उसका बदन पूरी तरह से टूट रहा था दर्द कर रहा था सर भी दर्द कर रहा था और चक्कर भी आ रहा था,,, सुगंधा पेशाब करने के लिए बैठ गई थी और थोड़ी देर में उसकी बुर से पेशाब की धार की सीटी की आवाज सुनाई देने लगी जिसे सुनकर अंकित की हालत खराब होने लगी उसका लंड एकदम से उबाल करने लगा हुआ पागल हुआ जा रहा था,,, वैसे तो वह अपनी मां को पेशाब करते हुए पहले भी देख चुका था लेकिन आज का हालात कुछ और था आज वह बाथरूम में जरूर अपनी मां के साथ था और उसकी मां ठीक उसके सामने बैठकर पेशाब कर रही थी लेकिन यह नजारा सहज नहीं था क्योंकि यह नजारा दवा खाने के अंदर था इसलिए चाहते हुए भी अंकित इस मौके का फायदा नहीं उठा सकता था लेकिन वह पूरी तरह से उत्तेजना के सागर में डुबकी लगा रहा था मदहोश हुआ जा रहा था,,,।

जहां एक तरफ अपनी मां को पेशाब करता हुआ देखकर वह पूरी तरह से उत्तेजित हुआ जा रहा था वहीं दूसरी तरफ उसके मन में घबराहट भी थी कि कहीं कोई आ ना जाए ,,, अंकित ठीक अपनी मां के पीछे खड़ा था और उसे एहसास हो रहा था कि उसकी मां उसे परखनली को अपनी बुर पर लगाई हुई थी जिसे पेशाब की धार गिर रही थी,,,, मौका होने के बावजूद भी अंकित ठीक तरह से अपनी मां की नंगी गांड को नहीं देख पा रहा था क्योंकि उसे जल्दी से बाथरूम से बाहर निकल जाना था क्योंकि अगर ऐसी हालत में कोई आ जाता तो वह क्या बताता एक औरत के साथ वह खुद बाथरूम के अंदर क्या कर रहा है भले ही वह इस समय बीमारी की हालत में अपनी मां के साथ था लेकिन फिर भी,,,, यह बिल्कुल भी सहज नहीं था।

सुगंधा परखनली में पेशाब का से,पल ले चुकी थी और धीरे से खड़ी होने लगी,,, लेकिन फिर से वह अपनी चड्डी पहनने में असहज थी और इस बार भी अंकित है उसकी मदद करते हैं चड्डी भी जैसे उतारा था वैसे ही पहना दिया,,, थोड़ी देर में परखनली को अपने हाथ में लेकर अंकित बाथरूम से बाहर आ गया और डॉक्टर के केबिन में चला गया डॉक्टर इशारे से उसे परखनली को एक कोने पर रखने के लिए बोला और अंकित ने ठीक वैसा ही किया तब तक धीरे-धीरे चलते हुए सुगंधा डॉक्टर के केबिन में आकर कुर्सी पर बैठ चुकी थी,,,,।

अपनी प्रिसक्रिप्शन बुक में मरीज का नाम लिखकर वह दवा लिख रहा था और बोला,,,,।

वैसे तो लक्षण मलेरिया के ही नजर आ रहे हैं और मेरा अनुमान है कि मलेरिया ही है तुम दो-तीन घंटे बाद आकर रिपोर्ट ले जाना मैं उसके हिसाब से दवा दे दूंगा लेकिन इस समय बुखार की दवा सुई लगा देता हूं थोड़ा आराम हो जाएगा और शाम को आकर रिपोर्ट ले जाना और दवा भी ले लेना,,,।

ठीक है डॉक्टर जैसा आप ठीक समझे,,,,।

लेट जाइए,,, (सुगंधा की तरह मुखातिब होता हुआ डॉक्टर बोला तो अंकित खुद अपनी मां का हाथ पकड़ कर उसे कुर्सी से उठने लगा और,,,, लंबे से टेबल की तरफ ले जाने लगा,,,, सुगंधा धीरे से टेबल पर बैठ गई वह सोच रही थी कि डॉक्टर उसे हाथ में सी लगाएगी तब तक डॉक्टर भी सिरिंज में दवा भरकर टेबल के पास आ चुका था लेकिन सुगंध अभी भी बैठी हुई थी इसलिए डॉक्टर बोला,,,,।

इंजेक्शन भारी है हाथ पर लगाऊंगा तो हाथ बहुत ज्यादा दर्द करेगा इसलिए कमर के नीचे लगाना पड़ेगा तुम लेट जाओ,,,,।

(डॉक्टर की चालाकी को अंकित अच्छी तरह से समझ रहा था अब उसका इरादा उसकी मां की गांड देखने को था उसको स्पर्श करने का था,,, लेकिन फिर भी मामला इलाज का था इसलिए अंकित अपनी मां को लेट जाने के लिए बोला उसकी मां धीरे से पेट के बल लेट गई,,,, अंकित को इस बात का डर था की कही डॉक्टर उसकी साड़ी कमर तक उठाकर उसकी मां की गांड पर इंजेक्शन ना लगे लेकिन ऐसा करना डॉक्टर को भी उचित नहीं लग रहा था क्योंकि ऐसा करने पर हो सकता था उसकी बदनामी हो जाए इसलिए वह धीरे से अपने हाथों से ही सुगंधा की कमर के नीचे वाली साड़ी और पेटीकोट के हिस्से को हल्के से अपनी उंगली को पेटिकोट के अंदर डालकर उसे पकड़ा और धीरे से नीचे की तरफ खींचने लगा जिससे नितंबों का उभारदार गोलाई नजर आने लगा,,, और एक खूबसूरत औरत की नंगी गोरी गोरी गांड देखकर डॉक्टर की हालत खराब हो गई और अंकित ने जब उसके पेंट की तरफ देखा तो उसके भी होश उड़ गए क्योंकि उसके पेट में तंबू बन रहा था, डॉक्टर की हालत को देखकर अंकित अपने मन में सोचने लगा कि अगर उसकी मां के लिए आई होती तो वह अब तक अपना लंड उसकी मां की बुर में डाल दिया होता इलाज करने के बहाने,,,,।

धीरे से डॉक्टर उस उभारदार गोलाई पर सुई लगाने लगा,, नितंबों में हल्के से सुई प्रवेश करने पर सुगंधा को हल्का सा दर्द महसूस हुआ और फिर धीरे-धीरे सिरिंज की सारी दवा उसके नितंबों में उतर गई,,, और फिर डॉक्टर आनंद लेने के हेतु सी वाली जगह पर अपनी हथेली रखकर उसे ज़ोर से गोल-गोल घूमाते हुए मसलने लगा जैसा कि अक्सर डॉक्टर सुई लगाने के बाद ऐसा ही करते हैं, ,,।

अब जा सकते हो लेकिन शाम को जरूर आ जाना,,,

ठीक है डॉक्टर,,,,।

(और फिर अंकित धीरे-धीरे अपनी मां को दवाखाने से बाहर ले गया और ओटो में बैठकर अपने घर आ गया,,,, डॉक्टर की दी हुई दवा खिलाकर वह अपनी मां को सोने के लिए बोल दिया और सुगंधा भी दवाई खाकर,,, सोने लगी।।)

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