Incest मटकनी गांड का कमाल - Page 8 - SexBaba
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Incest मटकनी गांड का कमाल

जवान हो चुके अंकित के लिए यह काम बेहद कठिन नजर आ रहा था क्योंकि आज तक कुछ नहीं कभी औरत के ब्लाउज की डोरी नहीं बांधी थी यह पहला मौका था जब उसकी मां खुद ही अपने बेटे से ब्लाउज की डोरी को बंधवाने जा रही थी,,, अंकित ठीक अपनी मां के पीछे खड़ा हुआ था उसके पेट में अच्छा खासा तंबू बना हुआ था जो की एक कदम आगे बढ़ने से ही उसका तंबू उसकी मां की भारी भरकम नितंबों पर स्पर्श करने लगता उस पर रगड़ खाने लगता,,, और शायद इसी रगड़ को सुगंधा महसूस करना चाहती थी क्योंकि वह भी तिरछी नजर से अंकित के पेट में उभरे हुए तंबू को देख चुकी थी और इतना तो समझ ही गई थी कि उसके बेटे का लंड क्यों खड़ा है और इसी के चलते उसे अपनी जवानी पर अपने कसे हुए बदन पर गर्व महसूस हो रहा था,,,, कुछ पल के लिए कमरे के अंदर खामोशी छा चुकी थी मां बेटे दोनों खामोश थे आईने में अंकित की नजर अपनी मां की भारी भरकम छातियों पर टिकी हुई थी जिसके बीच से गुजरती हुई गहरी लकीर किसी नहर से काम नहीं लग रही थी और इसी नहर में अंकित डुबकी लगाना चाहता था,,,, अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि ब्लाउज के अंदर उसकी मां कितना बेश कीमती खजाना छुपा कर रखी है,,, जिसे देखने के लिए उसका मान कितना ललाईत हो रहा है और अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि काश उसकी मां राहुल की मां की तरह होती तो कितना अच्छा होता,,, तो उसे भी इस समय अपनी मां की नंगी चूचियों को देखने का सुख प्राप्त हो जाता गली साड़ी में बड़ी-बड़ी चूची और उसके कड़े निप्पल,,,उफ्फ ,,,, यही सब सोच कर अंकित मन ही मन खुश हो रहा था कि तभी उसकी मां बोली,,,।

अरे अब देख क्या रहा है बंद भी करेगा कि खड़ा ही रहेगा मार्केट भी जाना है,,,।

मैंने कभी बंद नहीं किया ना इसलिए समझ में नहीं आ रहा है,,,।

अरे तो सीख लेना चाहिए था, , आखिरकार यह सब आगे चलकर काम आएगा,,,,।

(अपनी मां की बातें सुनकर अंकित अपनी मां के खाने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रहा था और मन ही मन प्रसन्न भी हो रहा था वह धीरे से अपना हाथ आगे बढ़े और अपनी मां के ब्लाउज की डोरी को अपने दोनों हाथों से थाम लिया,,,, ब्लाउज की डोरी पकड़ने में उसकी हालत खराब हो रही थी माथे से पसीना को पकने लगा था जबकि कमरे में पंखा चल रहा था और गर्मी का एहसास सुगंधा को बिल्कुल भी नहीं हो रहा था और वही वह पसीने से तरबतर होता जा रहा था,,,, यह सब सुगंधा आईने में अच्छी तरह से देख पा रही थी,,,। देखते ही देखते अंकित ब्लाउज की डोरी को बांधने लगा,,, उसकी उंगलियां कांप रही थी,, अपने बेटे की हालत देखकर सुगंधा को भी शक हो रहा था कि कहीं उसका बेटा सच में उसकी डोरी बांध पाएगा या नहीं,,,,।

डोरी को बांधते समय अंकित की उंगलियां अपनी मां की चिकनी पीठ से स्पर्श हो जा रही थी और इतने सही अंकित के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी वह मदहोश हुआ जा रहा था,,, उसे अपनी मां की नंगी पीठ का स्पर्श भी बेहद आनंददायक लग रहा था,,,, वह अपनी मन में सोच रहा था कि उसकी मां की चिकनी पीठ कितनी कोमल है अगर ब्लाउज उतार दिया जाए तो बस केवल ब्रा की पतली सी पट्टी ही नजर आती है कोई भी शख्स पैसे में उसकी मां की नंगी चिकनी पीठ की कल्पना कर सकता है कि बिगर ब्रा और ब्लाउज की कैसी दिखती होगी,,,,।

यही हाल सुगंधा का भी था,, जब जब उसे अपनी पीठ पर अपने बेटे की उंगली का स्पर्श होता तब तब उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगती थी,,, देखते ही देखते एक गिठान मार कर अंकित दूसरी गिठान मार रहा था,,, उत्तेजना से अंकित की हालत बहुत खराब होती जा रही थी और यही हाल सुगंधा का भी था,,, सुगंधा किसी तरह से अपने बेटे के पेंट में बने हुए तंबू का स्पर्श अपनी नितंबों पर करना चाहती थी लेकिन कामयाब नहीं हो पा रही थी वह हल्के-हल्के अपने नितंबों में हरकत भी दे रही थी कि पीछे की तरफ जाकर बस स्पर्श हो जाए लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था,,,, ऐसे में ब्लाउज की डोरी बांधते हुए अंकित की नजर अपनी मां की गांड पर गई तो उसके होश उड़ गए गांड का उभार बहुत ही गजब का था,, नजर नीचे करने पर उसे साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी मां की बड़ी-बड़ी गांड और उसके लंड के बीच केवल दो तीन अंगुल का ही फासला रह गया था हल्का सा कमरक्ष आगे कर देता था उसका लंड उसकी मां के नितंबों से रगड़ खा जाता। लेकिन ऐसा करने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी उसे इस बात का डर था कि अगर उसकी मां की गांड पर उसका लंड स्पर्श करेगा तो उसकी चुभन से वह कैसा महसूस करेगी,,, नाराज हो जाएगी यही सब सो कर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी जबकि उसकी मां तो चाहती थी कि किसी भी तरह से उसके बेटे का लंड उसकी गांड से रगड़ खा जाए बस इतने से ही सुगंधा प्रसन्न हो जाती और अंकित मत हो जाता लेकिन फिर भी आगे बढ़ने से डर रहा था,,,।

देखते ही देखते अंकित अपनी मां के ब्लाउज की डोरी की गिठान को मार दिया था,,,, और बोला,,,।

लो हो गया,,,,।

बाप रे तूने तो बहुत कस के डोरी बांध दिया है,,,, आगे से देख,,,(एकदम से अंकित की तरफ घूम कर एक बार फिर से अपनी छाती की गोलाई दिखाते हुए) कितना बाहर निकल गया,,, एकदम उभरा हुआ दिख रहा है,,,,।

(अपनी मां की हरकत और उसकी छातिया को देखकर अंकित की आंखें फटी की फटी रह गई क्योंकि वह एकदम से छाती को तानकर अपनी दोनों गोलाईयों को दिखा रही थी,,, अंकित की हालत एकदम खराब होती जा रही थी वह आंख फाड़े अपनी मां की छातियो को ही देख रहा था और सुगंधा को भी अपने बेटे को अपनी चूची दिखाने में मजा आ रही थी भले ही ब्लाउज के ऊपर से लेकिन आनंद बेहद प्राप्त हो रहा था,,,। अपनी मां की हरकत से पूरी तरह से मदहोश हो चुका अंकित अपनी मां की चूचियों की तरफ देखते हुए ही बोला,,,)

सच में यह तो एकदम बड़ी-बड़ी नजर आने लगी लाओ में गिठान खोल देता हूं,,,।

नहीं नहीं रहने दे अच्छी लग रही है,,, क्यों सच कह रही हो,,,।

(अब अंकित क्या बोलता वह तो एकदम से हक्का-बक्का रह गया,,, सीधे शब्दों में उसकी मां खुद अपनी ही मुंह से अपनी चूचियों की तारीफ कर रही थी और कोई झूठ तारीफ नहीं कह रही थी वाकई में उसकी चूची इस समय कुछ ज्यादा ही बड़ी और बेहद आकर्षक लग रही थी,,, इसलिए गहरी सांस लेते हुए अंकित भी बोला,,,)

सच में मम्मी बहुत अच्छी लग रही है,,,।

हां तभी तो,,, चलिए सब जाने दे बस पीछे से जरा ब्रा की पट्टी को ब्लाउज की डोरी के नीचे कर देना तो वरना दिखेगी तो खराब लगेगी,,,,(इतना कहने के साथ ही एक बार फिर से सुगंधा आईने की तरफ मुंह करके खड़ी हो गई और अब जिस तरह की बातचीत हुई थी उसके चलते और ब्रा की पट्टी को ठीक करने के नाम से ही अंकित पूरी तरह से अपने बदन में चुदवासा पन महसूस कर रहा था,,,,,, अपनी मां की बात सुनकर एक बार फिर से अंकित की उंगलियां उसकी नंगी चिकनी पीठ को स्पर्श करने लगी और एक औरत के बदन पर उसकी ब्रा की पट्टी को छुने का सुख अंकित प्राप्त करने लगा,,, और अपनी उंगलियों को अपनी मां की ब्रा की पट्टी के नीचे सरका कर वह पट्टी को एकदम ठीक करने हेतु,,, अपनी तरफ खींच जो कि एकदम कसी हुई थी और खींचने की वजह से सुगंधा का बैलेंस एकदम से गड़बड़ क्या और वह एकदम पीछे की तरफ गिरने लगी,,, और उसे संभालने के लिए अंकित तुरंत अपनी बाहों को खोल दिया और पीछे से अपनी मां को अपनी बाहों में ले लिया लेकिन सुगंधा का शरीर थोड़ा गदराया हुआ था जिसके चलते अंकित भी ठीक तरह से अपनी मां को संभाल नहीं पा रहा था और दो-तीन कदम पीछे की तरफ आ गया उसकी मां भी साथ में उसके बाहों में पीछे से उसके ऊपर गिरती हुई और खुद ही बचने की कोशिश करते हुए दोनों बिस्तर के करीब आ गए,,,, लेकिन आखिर में अंकित अपने आप को अपनी मां के भार को संभाल नहीं पाया और बिस्तर पर गिर गया गनीमत थी कि बिस्तर तीन कदम पीछे ही था,,,, इसलिए दोनों बिस्तर पर गिरे वरना नीचे जमीन पर गिर जाते तो दोनों को चोट लग जाती ,,,,,।

इसके बावजूद भी बेहद अद्भुत और मादकता से भरा हुआ नजारा बन चुका था,,, अंकित नीचे था और उसकी मां उसके ऊपर थी,,, पीछे से अपनी मां को बाहों में भरा हुआ था और ऐसे हालात में इसकी भारी भरकम गांड उसके मोटे तगड़े लंड के ऊपर टिकी हुई थी जो की पूरी औकात में आकर खूंटा बना हुआ था,,, पर सीधे-सीधे साड़ी सहित गांड की दोनों फांकों के बीच रास्ता बनाता हुआ,,, उसकी बुर के मुहाने दस्तक दे रहा था,,,,,, जिसका एहसास सुगंधा को एकदम बराबर हो रहा था,,, अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड को साड़ी के ऊपर से ही अपनी बुर पर महसूस करते ही वह पूरी तरह से मचल उठी,,,, एकदम से मदहोश हो गई,,, पहले तो बिल्कुल अपरा तफरी का माहौल था क्योंकि गिरते गिरते बची थी लेकिन जैसे ही उसे एहसास हुआ कि वह बिस्तर पर गिरी है और बच गई है तो राहत की सांस थी लेकिन तभी उसकी यह राहत मदहोशी में बदल गई जब उसे अपनी गांड के बीचों बीच कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ,, और उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी सुगंधा के लिए,,, अनुमान लगाना कोई बड़ी बात नहीं देखी उसकी गांड के बीचों बीच जो चीज चुभ रही है वह क्या है,,, और जब उसे यहां एहसास हुआ कि वह चीज कुछ और नहीं बल्कि उसके बेटे का मोटा तगड़ा लंड है तो यह एहसास ही उसकी बुर को मदन रस से भिगोने लगी वह चारों खाने चित हो चुकी थी,,,।

और यही हाल अंकित का भी था जब उसे भी इस बात का एहसास हुआ कि उसका लंड उसकी मां की गांड के बीचों बीच जाकर कहीं फस गया है तो वह भी एकदम से मदहोश हो गया और वैसे भी वह पीछे से अपनी मां को बाहों में झगड़ा हुआ था और उसे बचाने के चक्कर में अनजाने में उसकी दोनों हथेलियां उसके दोनों खरबुजो पर चली गई थी जिसे वह संभालने के चक्कर में दबा दिया था,,,, और शायद यह एहसास सुगंध को नहीं हो पाया था क्योंकि वह अपनी दोनों टांगों के बीच के एहसास में पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी,,,।

कुछ देर तक दोनों इसी अवस्था में बिस्तर पर पड़े रहे दोनों की सांस ऊपर नीचे हो रही थी दोनों मदहोश हो चुके थे उत्तेजना दोनों के सर पर सवार हो चुकी थी लेकिन जैसे तैसे करके सुगंध अपने आप को संभाली और यह बोलते हुए उठने लगे की,,,, अच्छा हुआ बिस्तर पर गिरे वरना चोट लग जाती,,,।

और फिर दोनों मार्केट की तरफ निकल गए,,,।।

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घर में रोमांच कारी भिड़ंत के बाद मां बेटे दोनों मार्केट के लिए निकल चुके थे,,, वैसे तो अक्सर सुगंधा मार्केट जाने के लिए ऑटो करती थी लेकिन आज वह अपनी बेटी के साथ पैदल ही जाना चाहती थी वह देखना चाहती थी कि उसका बेटा चलते समय उसके मचलते अंगो की तरफ देखता है या नहीं और वैसे भी,,, सुगंधा खुद अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करने में कोई कसर बाकी रखना नहीं चाहती थी,,, कुछ देर पहले कमरे में जो कुछ हुआ था वह बेहद अद्भुत था,,, पहली मर्तबा हिम्मत करके सुगंधा अपने बेटे को अपने ब्लाउज की डोरी बंद करने के लिए पूरी और वैसे भी बरसों बाद वह डोरी वाला ब्लाउज पहन रही थी क्योंकि वह जानती थी की डोरी वाला ब्लाउज में उसकी चिकनी गोरी पीठ कुछ ज्यादा ही दिखाई देती थी और डोरी को कस के बांधने की वजह से चुचियों का आकार कश्मीरी सेब से खरबूजा बन जाता है,,,।

वैसे उसे पक्का यकीन तो नहीं था कि उसके कहने पर उसका बेटा उसके ब्लाउज की डोरी बांधने के लिए कमरे में आ जाएगा लेकिन जिस तरह के हालात दोनों के बीच पैदा हो रहे थे उसे देखते हुए सुगंधा को अपनी चाल पर पूरा भरोसा था क्योंकि वह अपने बेटे में आए बदलाव को अच्छी तरह से समझ रही थी उसके नजरीए को समझ रही थी,,, और इसीलिए उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी सुगंधा को पूरा विश्वास था कि जवान हो चुका उसका बेटा एक औरत के ब्लाउज की डोरी को बढ़ने के लिए जरूर ललाईत होगा और ऐसा ही हुआ,,,, लेकिन जो कुछ भी हुआ उम्मीद से ज्यादा हुआ सुगंध तो सिर्फ अपने बेटे से अपने ब्लाउज की डोरी बंधवाना चाहती थी लेकिन जिस तरह से उसके खुद के पर डगमगाए थे और वह अपने आप को समान नहीं पाई थी उसे संभालने के लिए उसका बेटा उसे हाथ बढ़ाकर जिस तरह से उसे अपनी बाहों में भरा था और नरम-नरम बिस्तर पर गिरा था ऐसी हालत में उसे अपनी गांड के बीचो-बीच अपने बेटे का मर्दाना खुंटा गजब का चुभता हुआ महसूस हो रहा था जो कि सीधे उसकी बुर पर दस्तक दे रहा था वह मंजर वह पल सुगंधा के जीवन का अद्भुत फल था बरसों बाद किसी मोटे तगड़े लंड को अपनी गांड के बीचों बीच महसूस कर रही थी उसकी गर्मी को अपनी बुर के अंदरूनी भाग में महसूस कर रही थी जिसकी वजह से उसकी बुर पसीज रही थी,,, सुगंधा कमरे में ही चारों खाने चित हो चुकी थी अगर उसका बेटा जरा भी होशियार होता तो कमरे में ही उसकी बुर का उद्घाटन कर देता,,,, और जिसमें सुगंध को जरा भी एतराज नहीं होता,,,,।

धीरे-धीरे इस खेल में सुगंधा को बहुत मजा आ रहा था,,, तालाब के पानी की तरह शांत हो चुकी जिंदगी को मानो जैसे नदी में प्रवेश करने का मौका मिल गया हो और वह नदी की तरह उछलती कूदती बांहें फैलाए आगे बढ़ती चली जा रही थी,,, यही तो चाहिए था सुगंधा को यही सुख था जिसे वह ढूंढ रही थी,,, यह वही सुगंधा थी जो अपने अरमानों को पर लगाकर आसमान में उड़ जाना चाहती थी लेकिन पति के देहांत के बाद ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके पर कट गए हो,,, लेकिन अब ऐसा लग रहा था कि अंकित की वजह से उसे नए पर उग आए हो,,,,।

मार्केट जाते समय सड़क के फुटपाथ पर सुगंधा आगे आगे चल रही थी और तकरीबन 2 मीटर पीछे अंकित चल रहा था,,, जब इस तरह की माहौल घर में नहीं थे मां बेटे के बीच इस तरह का आकर्षण नहीं था तो अक्सर अंकित अपनी मां के बराबर चलता था और खुद सुगंधा ही उसे अपने बराबर लेकर चलती थी,,, लेकिन दोनों की नजरिए में बदलाव आ चुका था,, दोनों का एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था दोनों रिश्तो में मां बेटे सिर्फ दूसरों के लिए रह गए थे दोनों के रिश्ते बदल चुके थे,,एक मर्द बन चुका था और दूसरी औरत बन चुकी थी,,, दोनों एक दूसरे में प्रेमी प्रेमिका ढूंढ रहे थे जो कि पति-पत्नी की तरह एक दूसरे के शरीर से सुख प्राप्त करना चाहते थे अपनी जवानी की गर्मी को बुझाना चाहते थे और ऐसे हालात में दोनों के पास दोनों के सिवा और कोई दूसरा चारा भी नहीं था,,, दोनों के मन में अंदर ही अंदर सब कुछ परिपूर्ण हो चुका था बस देर थी आगे बढ़ने की मर्द और औरत के बीच के रिश्ते को आगे बढ़ाने की,,, दोनों बढ़ाना भी चाहते थे लेकिन कैसे यह दोनों को नहीं मालूम था लेकिन दोनों अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे थे ज्यादातर कोशिश सुगंधा की तरफ से ही हो रही थी तभी तो वह अपने बेटे को राहुल के पास भेजी थी ताकि राहुल से कुछ सीख पाता और उसका यह नुस्खा कुछ हद तक काम करने लगा था,,,

प्राकृतिक तौर पर अपनी मां के पीछे चलते हुए अंकित की नजर बार-बार अपनी मां की गांड की तरफ ही जा रही थी जो की चलते समय अद्भुत तरीके से लहरा रही थी और वैसे भी उसकी मां ने कुछ ज्यादा ही करके साड़ी बांधी हुई थी जिसकी वजह से गांड की दोनों फांकें बड़े-बड़े तरबूज की तरह बाहर निकली हुई नजर आ रही थी,,, अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड देखकर अंकित के लंड में हरकत होने लगती थी,,। वह अपने मन में सोचने लगता था कि काश इतनी बड़ी-बड़ी गांड उसके हाथों में होती तो कितना मजा आता,,, वह बड़ी-बड़ी गांड से बहुत प्यार करता है अपनी जीभ से चाटता चुंबन लेता उस पर अपना लंड रगड़ता,,, हर वह चीज करता जो एक मर्द औरत के अंगों से करता है उसकी गांड के साथ करता है,,,, सड़क पर चलते समय आते जाते अंकित ने बहुत सी औरतों को देखा था कपड़ों में उनके अंगों को देखा था लेकिन जिस तरह का उपहार उसे अपनी मम्मी की गांड में नजर आती थी उसे तरह का उभार उसने अभी तक किसी औरत में नहीं देखा था कुछ हद तक उसे नूपुर में अपनी मां का अक्स नजर आता था,,, क्योंकि उसकी भी कद काठी उसकी मां की ही तरह थी,,, लेकिन फिर भी नूपुर उसकी मां से उन्नीस ही थी,,,।

अपनी मां के भरावद्दार नितंबों को देखते-देखते उसकी नजर अपनी मां की चिकनी पीठ पर गई और उसकी डोरी पर गई जिसे वह खुद अपने हाथों से बांधा था,, उसे अब एहसास हो रहा था इस ब्लाउज में उसकी मां की चोरी की एकदम साफ नंगी नजर आ रही थी क्योंकि डोरी वाले ब्लाउज में पीछे से ज्यादा कपड़ा नहीं था केवल पतली सी डोरी थी और उसे ब्रा की पट्टी भी साफ नजर आ रही थी ,, जिसे ब्लाउज के डोरी के नीचे छुपाने के चक्कर में ही,,, वह दोनों बिस्तर पर गिर गए थे,,, अंकित को वह पल पूरी तरह से किसी मूवी के दृश्य की तरह याद था उसे अच्छे से याद था कि उसके ऊपर उसकी मां पूरी तरह से लदी हुई थी,,, इसकी भारी भरकम गांड ठीक उसकी दोनों टांगों के बीच आ चुकी थी,,, अद्भुत अवस्था थी एक तरह का यह आसान ही था जिसमें औरत अपनी गांड रखकर मर्द के लंड पर बैठ जाती और नीचे से मर्द का लंड उसकी बुर की गहराई नापने लगता है,,, अंकित इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि किस तरह से उसकी मां उसके ऊपर थी उन दोनों की अवस्था में केवल कपड़े ही बड़ा रूप थे अगर दोनों के बदन पर कपड़े ना होते तो उसे समय उसका लंड उसकी मां की बुर में होता ,,,, और उसे तो इस बात का अहसास तक हुआ था कि उसका लंड उसकी मां की गांड के बीचों बीच धंसा हुआ है,,,,।

इस अवस्था की वजह से पल भर में ही पूरे बदन का लहू अंकित की जननांगों में इकट्ठा हो गया,,, और उसकी सांसे ऊपर नीचे हो गई उसे तब जाकर एहसास हुआ कि वाकई में औरतों की जंननांगो और उनके नितंबों के उभार में कितनी गर्मी होती है क्योंकि अंकित पसीने से तरबतर हो चुका था। , और वही गर्मी का एहसास अंकित को इस समय हो रहा था अपनी मां के पीछे चलते-चलते सुगंधा बार-बार चलते हुए पीछे मुड़कर देख ले रही थी अपने बेटे की तरफ की उसका बेटा क्या देख रहा है और उसे इस बात का अहसास होते ही की उसका बेटा उसके नितंबों की तरफ ही देख रहा है इस एहसास से वह अंदर ही अंदर सिहर जाती थी,,,।

अभी मार्केट थोड़ी दूरी पर था फुटपाथ की दूसरी तरफ जंगल झाड़ी था और काफी दूर तक ढलान था जिसके अंदर जंगली झाड़ियां उगी हुई थी,,, वहीं पर पेड़ के पास एक आदमी खड़े होकर पेशाब कर रहा था और वह आदमी सुगंधा की नजर में चढ़ गया सुगंधा की नजर अनजाने में ही उसकी तरफ चली गई थी और सुगंधा उसे आदमी को पेशाब करते हुए देखने लगी हालांकि वह सहज रूप से चलते हुए ही अपनी नजर को उस तरफ की हुई थी और यह भी वह जानबूझकर ही कर रही थी वह अपने बेटे को दिखाना चाहती थी कि वह मर्दों को पेशाब करते हुए देखने में कितनी उत्तेजना का अनुभव करती है,,,, अंकित को उसे आदमी पर बहुत गुस्सा आ रहा था जो इस तरह से सड़क के किनारे खड़ा होकर पेशाब कर रहा था,,, हालांकि वह जिस तरह से खड़ा था उसका लंड नजर नहीं आ रहा था बल्कि छिपा हुआ था और उसकी इतनी लंबाई भी नहीं थी कि इस अवस्था में दूर से भी दिखाई दे इस बात की खुशी अंकित को जरूर थी क्योंकि अब वह नहीं चाहता था कि उसकी मां किसी दूसरे की तरफ देखें और देखते ही देखते दोनों आगे निकल गए,,,,।

वैसे तो हमेशा ही जब दोनों मां बेटे मार्केट की तरफ जाते थे तो आपस में बातें करते हुए जाते थे लेकिन इस समय दोनों के मन में कुछ और था अंकित अपनी मां को चलते हुए देख रहा था उसके नितंबों के कटाव को देख रहा था उसके उभार को देख रहा था उसकी पतली कमर के बीच की पत्नी लकीर को देख रहा था उसके ब्लाउज की कटिंग के साथ-साथ उसकी उघरी हुई पीठ को देख रहा था,,, और सुगंधा अपने आप को अपने बेटे को दिखाने में व्यस्त थी इसलिए दोनों के बीच किसी भी प्रकार की वार्तालाप नहीं हो रही थी लेकिन दोनों के बीच की खामोशी भी बहुत कुछ कह रही थी,,,,,।

मां बेट दोनों अपनी ही धुन में मार्केट की तरफ आगे बढ़ते चले जा रहे थे सड़क पर वाहनों का आवागमन चालू ही था और आते जाते सबकी नजर उसकी मां पर जरूर पड़ रही थी और इस बात का भी भान अंकित को अच्छी तरह से था लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था,,,, ऐसे ही ठीक उसके पीछे कब दो आदमी उससे थोड़ा फीट की दूरी पर चलने लगे उसे पता ही नहीं चला वह अपनी मां की चाल ढाल को देखने में ही व्यस्त था,,, तभी उसके कानों में जो बात सुनाई थी उसे सुनकर उसके होश उड़ गए जो कि उसके साथ चल रहे हैं दोनों आदमियों में से एक ने बोला था,,,।

बाप रे देख रहा है क्या औरत है इसका बदन कितना गदराया हुआ है,,,(इतना सुनते ही अंकित इधर-उधर देखने लगा लेकिन आगे चल रही है अपनी मां के सिवा और कोई औरत आसपास नहीं थी इसलिए वह समझ गया कि यह आदमी उसकी मां के बारे में ही बोल रहा हूं हालांकि उसे गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन राह चलते किसी भी व्यक्ति से इस तरह से उलझ जाना उचित नहीं था,,,, तभी दूसरे आदमी की आवाज उसके कानों में पड़ी,,,)

यार कसम से इतनी गोरी औरत तो मैं आज तक नहीं देखा ऊपर से नीचे तक मलाई है जब ऊपर से इसका वजन इतना गोरा है तो इसकी बुर कितनी गोरी होगी ,,

अरे यार औरतों की बुर गोरी नहीं काली होती है,,(दूसरे आदमी ने बोला)

अरे वह तो दूसरी औरतों की होती होगी लेकिन मक्खन मलाई जैसी औरत की बुरे तो एकदम गोरी होती होगी कम से इसकी बर देखने के लिए तो मेरा मन तड़प रहा है साली का गांड का छेद भी कितना मस्त होगा,,,।

हां यार तू सच कह रहा है देख नहीं रहा है कैसा गांड मटका के चल रही है इसकी गांड देखकर तो ऐसा ही लगता होगा कि 5-10 मिनट में इसका कुछ पता नहीं होगा कम से कम एक घंटा तक जमकर चुदाई होती होगी तब जाकर इसकी प्यास बुझती होगी,,,।

(उन दोनों आदमियों की बातें सुनकर तो अंकित के काम के साथ-साथ उसका लंड भी खड़ा हो गया था वह दोनों उसकी मां के बारे में बातें कर रहे थे उसकी जवानी के बारे में बात कर रहे थे उसके खूबसूरत जिस्म के बारे में बात कर रहे थे और दोनों अपनी अपनी राय दे रहे थे हालांकि शुरू में अंकित को बहुत गुस्सा आया लेकिन एक तरह से वह दोनों उसकी मां की जवानी की तारीफ कर रहे थे इसलिए ना जाने की उसे अपनी मां के बारे में इस तरह की अश्लील बातें सुनने में आनंद आने लगा,,,, तभी दूसरा वाला आदमी बोला)

कसम से इसको देखते ही मेरा लंड खड़ा हो गया अभी तो किस्मत ही बेकार है हमारे घर ऐसी औरत होती तो,,, घर छोड़कर कहीं जाने का मन ही नहीं करता,,,

मैं तो दिन रात उसकी बुर में लंड डालकर पड़ा रहता,,,

जो भी इसकी लेट होगा वह दुनिया का सबसे खुशकिस्मत वाला आदमी होगा जिसे यह देती होगी अपनी टांगें खोलकर अपनी बड़ी-बड़ी चूची पिलाती होगी,,,,।

अरे यार ऐसी बातें मत करनी तो मेरा यही पानी छूट जाएगा,,,

मेरा भी तो यही हाल है अब घर पर जाकर बीवी की चुदाई करनी पड़ेगी जो कि इसके पैर की धूल के बराबर भी नहीं है,,,

सही कह रहा है तू तू तो खर्च कर अपनी बीवी को छोड़ने का लेकिन मुझे तो हाथ से हिला कर ही काम चलाना पड़ेगा,,,

क्यों क्याहुआ,,, भाभी देती नहीं है क्या?

अरे ऐसी बात नहीं है वह अपने मायके गई हुई है अपने भैया से गांड मरवाने इतना बोला कि मत जा मेरा मन तेरे बिना नहीं मानता लेकिन मानी नहीं और अपने भाई से गांड मरवाने चली गई,,

वह सब छोड़ अगर यह औरत साड़ी उठाकर सिर्फ अपनी बुर दिखा दे तो भी मैं हजार रुपया देने को तैयार हूं,,,।

तू तो हजार रुपया देने को तैयार है मैं तो महीने भर की तनख्वाह देने को तैयार हूं बस यह साड़ी उठाकर अपनी बुर के दर्शन कर दे क्योंकि मैं देखना चाहता हूं कि इस तरह की हाई क्लास औरत की बुर कैसी दिखती है,,,

सही कह रहा है तू अपनी जिंदगी में तो बस गांव की वही गवार औरत ही लिखी है ऐसी पढ़ी-लिखी अंग्रेज टाइप की औरत के बारे में सिर्फ सोच सोच करें पानी निकालना ही किस्मत है,,,।

(वह दोनों की बातें सुनकर अंकित के तन बदन में उत्तेजना के लहर उठ रही थी उसका पूरा बदन से लग रहा था उसे समझ में आ गया था कि उसकी मां की जवानी देखकर सब लोग यही सोचते हैं रहते हैं लेकिन वह हैरान था कि वह दोनों उसके इतने पास में होने के बावजूद भी इस तरह की बातें आपस में कर रहे थे तभी उसे ख्याल आया कि उन दोनों को क्या मालूम कि मैं उसका बेटा हूं वरना इस तरह की बातें नहीं करते लेकिन अच्छा ही होगा कि वह दोनों की बातें बहुत सुन लिया उसे पता तो चल गया कि उसकी मां कितनी जवानी से भरी हुई और एकदम सेक्सी है,,, उसे इस बात का गर्व भी हो रहा था कि उसकी मां की जवानी देखकर उन दोनों का लंड खड़ा हो गया था,, । अंकित अपने मन में सोच रहा था कि अगर सच में उसकी मां 1 घंटे के लिए भी दोनों को मिल जाए तो 1 घंटे में दोनों उसकी मां की बुर का भोसड़ा बना देंगे इस तरह से पागल हो गए दोनों देखकर,,,, अभी उन दोनों की बातें और सुन पता था इससे पहले ही मार्केट आ चुका था और लोगों की भीड़भाड़ बढ़ने लगी थी,,,,)
 
कौन-कौन सी सब्जी लेना है मम्मी,,,

चल अंदर देखु तो सही,,,।

(इतना कहकर दोनों मार्केट के अंदर की तरफ जाने लगे क्योंकि अंदर की तरफ अच्छी-अच्छी सब्जियां मिलती थी और एक सब्जी के ठेले पर खड़ी होकर वह,,, भिंडी खरीदने लगी,,, अंकित को सब्जी के बारे में कुछ ज्यादा मालूम नहीं पड़ता था इसलिए वह खड़ा होकर इधर-उधर मार्केट देखने लगा,,, जिस ठेले पर उसकी मां सब्जी खरीद रही थी तीन-चार औरतों और भी थी उसी ठेले पर थी तभी एक आदमी पीछे चाहे और एकदम से उसकी मां के पीछे से सट गया और भिंडी वजन करने के लिए बोलने लगा,,, सुगंधा एकदम से चौंक गई क्योंकि वह आदमी सीधे-सीधे उसके नितंबों से सट गया था,,, तभी वह एकदम से पीछे घूम कर देखी और आदमी एक तरफ हो क्या लेकिन इतने में वह अपना काम कर चुका था अपनी अभिलाषा पूरी कर चुका था दूर से ही वह सुगंधा की खूबसूरत बदन को देख रहा था मानो कि जैसे कोई भंवरा खूबसूरत कली के पीछे-पीछे आ गई हो उसका रस चूसने के लिए उसी तरह से वह आदमी भी सुगंधा की मदहोश कर देने वाली जवानी को देखकर अपने लंड को सुगंधा की गांड पर रगड़ खाने की लालच को रोक नहीं पाया और एकदम से आकर उससे सट गया था सुगंधा को भी अपने नितंबों पर,,, उसके सटने का एहसास हुआ था तभी तो गुस्से से पीछे मुड़कर देखने लगी थी और आदमी एकदम से पीछे हट गया था,,, अंकित भी सब कुछ देख रहा था लेकिन कुछ कर सकते की स्थिति में नहीं था वह उसे आदमी पर क्रोधित हुआ जरूर था लेकिन कुछ बोल नहीं पाया था और बोलना भी क्या बोलना क्या एग्जाम लगा था उसे यह कहता है कि तू उसकी मां के बदन से क्यों चढ़ गया क्यों अपने लंड को उसकी गांड से रगड़ाया रगडाया ,, उसके इस तरह के इल्जाम से वह खुद और उसकी मां हंसी के पात्र बन जाते क्योंकि भीड़भाड़ में थोड़ा बहुत सटना सटाना हो ही जाता है इसलिए वह खामोश है कुछ बोल नहीं पाया,,,,,।

भिंडी खरीद लेने के बाद तीन-चार सब्जिया और सुगंधा ने खरीद ली,,, सुगंधा चाहती थी की राहुल की तरह उसका बेटा भी उसके नितंबों पर हाथ रखें उसे महिलाएं लेकिन शायद उन दोनों के बीच राहुल और नूपुर की तरह खुला हुआ रिश्ता अभी नहीं बना था,,, सब्जी खरीद लेने के बाद सुगंधा नाश्ते की दुकान पर गई और समोसे और जलेबियां पैक करवाने लगी,,, अंकित कुछ बोल नहीं पा रहा था क्योंकि आज जो कुछ भी हो रहा था वह पूरी तरह से अंकित को स्तब्ध कर दिया था हालांकि सुगंधा भी पूरी तरह से मदहोश थी लेकिन फिर भी अपने आप को सहज बनाए हुए थी ज्यादातर हैरान दो अजनबी आदमियों की आपस में उसकी मां को लेकर बातचीत ने कर दिया था उन दोनों के विचार उसकी मां के प्रति कितने गंदे थे या फिर उसकी मां की तरह खूबसूरत औरत उन दोनों ने कभी देखा ही नहीं था इसलिए उन दोनों के मन की वासना एकदम से उनके होठों पर आ गई थी जो शब्द के जरिए बाहर निकल रही थी और उनकी बातों को सुनकर अंकित का भी बुरा हाल था,,,,।

तीन-चार दिन की सब्जियां तो हो गई,, और उसके बाद तो बाद में देखा जाएगा,,,,(हाथ में थैला लेकर मार्केट से बाहर निकलते हुए सुगंधा बोली,,,, तभी उसकी नजर केले के ठेले पर गई,,,, और इस समय अंकित की भी नजर केले के ठेले पर गई और अंकित केले के ठेले पर जाकर खड़े होकर केले को हाथ में लेकर देखने लगा जो की काफी छोटा था यह देखकर सुगंध बोली,,,)

ठीक नहीं है बेटा देख नहीं रहा कितना छोटा-छोटा और पतला सा है,,,।

हां सच कह रही हो मम्मी ,,, रहने दो,, (और इतना कहकर दोनों खेल से आगे हो गए और सुगंधा चलते हुए बोली)

केला हो तो मोटा मोटा और एकदम लंबा,,,(सुगंधा बात भले ही केले की कर रही थी लेकिन उसका इशारा दूसरी तरफ था और केले का जिक्र होते ही उसके मोटाई का जिक्र होते ही अंकित भी अपना ध्यान बात की दूसरी तरफ ले गया,,, सुगंधा अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) और उस पतले केले को तो मुंह में ले,,,,(इतना कहने के साथ ही वह तुरंत अपने शब्दों को बदलते हुए बोली) मेरा मतलब है खाने में पता ही नहीं चलेगा कि केला खाए हो,,, अकेले को हमेशा मोटा और लंबा होना चाहिए ताकि एकदम से मन भर जाए एक ही बार में मन भर जाए,,,(यह बोलते समय उसके चेहरे के भाव ऐसी लग रहे थे मानो वाकई में वह बिस्तर पर टांग फैलाए लेटी हुई है और उसकी गुलाबी पुरानी उसके बेटे का मोटा तगड़ा लंड घुसा हुआ है अपनी मां की यह बात सुनकर उसके कहने के मतलब को अंकित अच्छी तरह से समझ गया था,,, इसलिए वह भी हामी भरता हुआ बोला,,)

सही कह रहे हो मम्मी मोटा और लंबा केला की सबसे ज्यादा सुख देता है,,, मतलब की भूख मिटाता है,,,।

(अपने बेटे के मुंह से ज्यादा सुख देता है शब्द सुनकर सुगंधा भी समझ गई थी कि उसके बेटे के कहने का मतलब क्या है और मन ही मन प्रसन्न होने लगी,,, मार्केट से वापस लौटते समय अंधेरा होने लगा था और स्ट्रीट लाइट जगमगाने लगी थी,,, मां बेटे दोनों इस जगह पर पहुंच गए थे जहां पर ढलान था और जंगली झाड़ियां होगी हुई थी यहां पर फुटपाथ पर आवा गमन भी बहुत कम था,,,, अब तक जो कुछ भी हुआ था उसे लेकर सुगंधा के तन बदन में आग लगी हुई थी वह किसी तरह से अपने बेटे को अपने अंग को दिखाना चाहती थी और भी बिना कपड़ों के,, इसलिए धीरे-धीरे चलते समय जब वहां घनी झाड़ियां वाली जगह पर एकदम बीचो-बीच आ गई और चारों तरफ देखकर अंदाजा लगा ली कि अभी कोई आ नहीं रहा है तो वह उसी जगह पर खड़ी हो गई,,, और इधर-उधर देखने लगी अपनी मां को इस तरह से बीच रास्ते में कड़ी होता देखकर और इधर-उधर देखा हुआ पाकर आश्चर्य से अंकित बोला,,,)

क्या हुआ मम्मी यहां क्यों खड़ी हो गई ,,

अरे मुझे बड़ी जोरों की पेशाब लगी है,,,(इधर-उधर देखते हुए सुगंधा बोली लेकिन अपने बेटे के सामने जोड़ों की पेशाब वाली बात करके शर्म के मारे उसका चेहरा भी लाल हो गया था और यह बात सुनकर अंकित के लंड में हरकत होना शुरू हो गया था पहली बार उसकी मां खुले शब्दों में उसे पेशाब करने की बात कर रही थी हालांकि अपनी मां को घर के पीछे वह पेशाब करते हुए देख चुका था,, लेकिन अनजाने में उसकी मां को यह नहीं मालूम था कि उसका बेटा देख रहा है,,, ऐसा मानना अंकित का था लेकिन उसकी मां को सब पता था,, लेकिन इस समय मां बेटे दोनों के बदन में उत्तेजना के लिए रुकने लगी थी पेशाब करने के बहाने साड़ी उठाकर सुगंध अपने बेटे को अपनी गांड के दर्शन करना चाहती थी क्योंकि जिस तरह की उत्तेजना उसके तन बदन में हो रही थी वह किसी भी तरह से अपने बदन की सबसे स्वरूप वान और आकर्षक वाले अंग को दिखाना चाहती थी,,, अंकित के मन में भी अपनी मां को पेशाब करते हुए देखने की इच्छा जगने लगी और वह भी इधर-उधर देखते हुए बोला,,,)

यहां कैसे कर पाओगी मम्मी,, यहां तो कोई भी आ सकता है,(इधर-उधर देखते हुए अंकित बोला,,)

मैं जानती हूं लेकिन अभी कोई नहीं आ रहा है ले जल्दी से थैला पकड़ मैं जल्दी से निपट कर आ जाती हूं,,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा अपने हाथ में लिया हुआ था ना अंकित को थमाने लगी और अंकित भी जल्दी से अपनी मां के हाथ में से थेले को थाम लिया,,, पर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली) कोई इधर ना आने पाए,,

ठीक हैमम्मी,,, (और इतना कहने के साथ है अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा और सुगंध स्टेट लैंप के खंभे के सामने ही ढलान की तरफ जाने लगी वह ऐसी जगह जा रही थी जहां से अंकित उसे बड़े आराम से देख सके,,, सुगंधा का भी दिल जोरों से धडक रहा था,, बाथरूम वाली हरकत के बाद यह उसकी दूसरी हरकत थी जो अपनी तरफ से करने जा रही थी,,, अंकित बार-बार अपनी मम्मी की तरफ तो कभी फुटपाथ की तरफ देख ले रहा था कि कहीं कोई यहां तो नहीं रहा है और अपने मन में वह भी प्रार्थना कर रहा था कि इस समय कोई ना आए ताकि वह अपनी मां की नंगी गांड को आराम से देख सके और ऐसा ही हो रहा था दूर-दूर तक से कोई नजर नहीं आ रहा था बस सड़क पर से गाड़ी आ जा रही थी,,,।

देखते ही देखते आंठ दस कदम की दूरी पर जाकर सुगंधा खड़ी हो गई,,, उसकी पीठ अंकित की तरफ थी क्योंकि वह अपने बेटे को अपनी गांड दिखाना चाहती थी और इधर-उधर देखते हुए अपनी साड़ी को हाथ में पकड़ ली और जल्दी से उसे एक झटके से कमर तक उठा दी,,, और साड़ी के कमर तक उठते ही उसकी नंगी गांड एकदम से सामने नजर आने लगी लालटेन की पीली रोशनी में एकदम चमक रही थी,,, अंकित एकदम से हैरान हो गया अपनी मां की नंगी गांड देखकर तो हैरान था ही लेकिन साड़ी के उठते ही अपनी मां की संपूर्ण नंगी गांड को देखकर और इस बात से हैरान था कि उसकी मां साड़ी के नीचे चड्डी नहीं पहनी थी,,,, साड़ी के अंदर वह पूरी तरह से नंगी थी और यह एहसास होते ही उसका दिल जोरो से धड़कने लगा ,, और सुगंधा वहीं खड़े-खड़े एक नजर पीछे की तरफ घूमर अंकित की तरफ अच्छी और अंकित को अपनी तरफ देखता हुआ पाकर एकदम से उत्तेजना से भर गई,,, और तुरंत बैठ गई पेशाब करने के लिए और उसकी बुर से सरसरा कर धार निकलने लगी,,,,

कुछ ईस तरह से

पेशाब करने के लिए बैठने के बाद भी सुगंधा पीछे की तरफ देख रही थी अंकित अपनी मां की तरफ ही देख रहा था दोनों की नजर आपस में टकराई और दोनों एकदम से शर्म से पानी पानी हो गए अंकित शर्मिंदा होने के बावजूद भी अपनी मां की नंगी गांड पर से अपनी नजर को हटा नहीं पा रहा था अगर नजर हटा भी रहा था तो यह देखने के लिए कि कहीं कोई यहां तो नहीं रहा है लेकिन उसकी किस्मत बहुत तेज थी इस समय फुटपाथ पर से उस ओर कोई नहीं आ रहा था,,,, जी भर के पेशाब करने के बाद और जी भर कर अपनी मां की नंगी गांड देखने के बाद सुगंध तुरंत खड़ी हुई और साड़ी के किनारे को कमर पर से नीचे छोड़ दी और एक खूबसूरत नाटक पर पर्दा गिर गया,,, करो मुस्कुराते हुए अंकित की तरफ आने लगी,,, ।

अंकित के पास पहुंचते हैं उसके हाथ से एक थाला अपने हाथ में ले ली और मुस्कुराते हुए बोली,,,।

(अच्छा हुआ कोई आया नहीं नहीं तो मैं कर भी नहीं पाती,,,)

सही कह रही हो मम्मी,,,,।

(इससे ज्यादा अंकित कुछ कह नहीं पाया और अपने बेटे के हाथ में से ठेला लेते हुए उसकी नजर अपने बेटे के पेट के आगे वाले भाग पर पड़ गई थी जिसमें अच्छा खासा तंबू बना हुआ था और वह मन ही मन प्रसन्न होने लगी अंकित के मन में ढेर सारे सवाल थे साड़ी के उड़ने ही अपनी मां की गांड को ढकने वाली पेंटिं को न पाकर वह हैरान हो रहा था,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां आज पेंटिं क्यों नहीं पहनी,,, वह अपनी मां से यह सवाल पूछना चाहता था लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी और दूसरी तरफ साड़ी के नीचे चड्डी ना पहने की युक्ति सुगंधा की ही थीवह अपने मन में ठान कर आई थी कि आज अपने बेटे को रास्ते में किसी भी तरह से अपनी गांड के दर्शन कराएगी और इसीलिए वह चड्डी नहीं पहनी थी क्योंकि वह जानती थी चड्डी पहनने पर उसे उतरते समय दिक्कत होगी और वह सब कुछ जल्दी जल्दी निपटाना चाहती थी इसलिए चड्डी नहीं पहनी थी,,, थोड़ी देर में दोनों घर पर पहुंच गए थे।)

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मार्केट से आते समय जो कुछ भी हुआ था वह बेहद मनमोहक और उन्मादीकता से भरा हुआ था अंकित कभी कल्पना भी नहीं किया था कि यू रास्ते में चलते समय उसे अपनी मम्मी की नंगी गांड देखने को मिल जाएगी,,,, जो कुछ भी हुआ था उससे बहुत कुछ दोनों की जिंदगी में बदलने वाला था,,,, घर पर पहुंचने तक दोनों में से किसी ने एक दूसरे से बात तक नहीं किया था क्योंकि बात करने को बचा ही कुछ नहीं था एक तरह से सुगंधा अपनी कामुक हरकत से अपने बेटे का मुंह बंद कर दी थी,,,।

अंकीत अपनी मां के साथ

घर पर पहुंचने पर भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे हालांकि सुगंध मन ही मन मुस्कुरा रही थी क्योंकि रास्ते में उसने अपने मन की जो कर ली थी जानबूझकर उसने साड़ी के अंदर चड्डी नहीं पहनी थी क्योंकि यह उसके काम यंत्र का ही भाग था जैसे लोग दूसरों को फसाने के लिए षड्यंत्र रास्ते हैं इस तरह से सुगंधा अपने बेटे को अपनी जवानी के जाल में फंसने के लिए काम यंत्र रची थी जिसमें वह सफल हो चुके थे वह जानती थी उसे किस जगह पर अपनी जवानी का बाण चलाना है,,, उसे जगह को वहां अच्छी तरह से जानती थी पहचानती थी और यह भी जानती थी कि शाम ढलते ही वहां पर लोगों का आना जाना बहुत ही कम हो जाता है,,, और इसी का फायदा उठाते हुए उसने उसे स्थान को चुनकर अपने बेटे को पूरी तरह से अपनी आकर्षक के जाल में फांस ली थी,, या यूं कह लो कि वह अपने ही बेटे को अपनी जवानी का गुलाम बना ली थी,,,,

एक औरत होने के नाते और उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच जाने पर सुगंधा में भी मर्दों को पहचानने की कला अच्छी तरह से थी वह मर्दों की फितरत से अच्छी तरह से वाकिफ थी जिसमें से उसका खुद का बेटा भी बाकात नहीं था क्योंकि उसका बेटा भी आखिरकार था तो एक मर्द ही,,,, फुटपाथ के नीचे ढलान वाली जगह पर पहुंचकर वह अपने बेटे को बराबर नजर पीछे करके देख ले रही थी क्योंकि वह जानती थी कि जब तक उसका बेटा उसकी तरफ देखेगी नहीं तब तक उसकी यह क्रियाकलाप फूटी कौड़ी की भी नहीं थी उसकी क्रियाकलाप में चार चांद तभी लग जाता जब उसका बेटा उसे प्यासी नजरों से देखा और ऐसा ही हो रहा था,,,, जब सुगंधा को इस बात का एहसास हुआ कि उसका बेटा उसी की तरफ देख रहा है उसकी नंगी गांड को देख रहा है तो वह अंदर ही अंदर मदहोश हो रही थी उत्तेजित हो रही थी,,,।

घर पर पहुंच कर सुगंधा खाना बनाने के काम में जुट गई थी,,, तृप्ति भी घर पर हाजिर थी और वह भी सब्जी काटने में अपनी मां की मदद कर रही थी,,, सुकांत जो कुछ भी अपने बेटे की आंखों के सामने की थी उसके बारे में सोचकर अंदर ही अंदर प्रसन्न और उत्तेजित हो रही थी,,, और दूसरी तरफ अंकित अपने कमरे में बिस्तर पर बैठकर अपनी मां के बारे में सोच रहा था उसकी हरकत के बारे में सोच रहा था,,, उसे जहां अपनी मां की हरकत बेहद उत्तेजित कर देने वाली लग रही थी वही वह अपनी मां की हरकत से परेशान भी था उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वाकई में उसकी मां अनजाने में ही औपचारिक रूप से पेशाब करने बैठ गई थी या इसमें उसकी तरफ से कोई साजिश थी क्योंकि जितनी दूरी पर उसकी मां जाकर पेशाब करने बैठी थी उसकी मां को भी मालूम था कि इतनी दूर से उसका बेटा सब कुछ देख रहा होगा और ऐसे हालात में वह एकदम खुले में बैठी थी ना कि किसी झाड़ियों के पीछे जहां से उसे कुछ दिखाई ना दे लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था,,, उसकी मां एकदम खुले में बैठकर पेशाब कर रही थी जहां से वह सब कुछ देख रहा था और यही बात तो उसे हैरान कर देने वाली लग रही थी और उससे भी ज्यादा हैरान कर देने वालीं बात यह थी कि उसकी मां चड्डी नहीं पहनी थी जबकि अंकित को इस बारे में अच्छी तरह से पता था कि ज्यादा नहीं तो उसकी मां के पास चार-पांच चड्डी जरूर है और इसके बावजूद भी मार्केट जाते समय,,, उसकी मां चड्डी क्यों नहीं पहनी,,,, जहां एक तरफ अंकित अपनी मां की चड्डी वाली बात से हैरान था वही अपनी मां की चड्डी वाली बात से उत्तेजित भी था,,,।

रास्ते भर वह अपनी मां की हरकत के बारे में ही सोच रहा था और अपनी मां से चड्डी वाली बात करना चाहता था और पूछना चाहता था कि उसकी मां साड़ी के नीचे चड्डी क्यों नहीं पहनी थी लेकिन इस तरह के सवाल करने की हिम्मत अभी उसमें नहीं थी,,,, लेकिन अपनी बिस्तर पर बैठे-बैठे वहां कल्पना में ही अपनी मां से चड्डी के बारे में सवाल जवाब कर रहा था,,,।

क्या मम्मी तुम भी,,, तुम्हारे पास इतनी सारी चड्डीया है फिर भी तुम साड़ी के नीचे चड्डी नहीं पहनती हो,,,

किसने कह दिया तुझसे,,,

अब ऐसा कौन कहेगा मैं जानता हूं,,,

तू कैसे जानता है तो क्या मुझे कपड़े पहनते हुए देखता है क्या,,?(मुस्कुराते हुए सुगंधा बोली)

कपड़े पहनते हुए नहीं देखता हूं लेकिन मार्केट से आते समय जब तुम पेशाब करने के लिए फुटपाथ के नीचे उतर कर गई थी,,,

तो,,,, इसमें क्या हो गया रास्ते में आते जाते समय बहुत सी औरतों को पेशाब लग जाता है तो वह लोग भी यही रास्ता अपनाती है,,,,(एकदम सहज होते हुए सुगंधा बोली,,,)

अरे मैं यह नहीं कह रहा हूं,,, मेरा मतलब है कि तुम जब साड़ी कमर तक उठाई थी तो मेरी नजर तुम पर पड़ गई थी और मैंने देखा कि तुम साड़ी के अंदर चड्डी नहीं पहनी थी,,,।

(ऐसा सुनते ही अंकित के कल्पना में ही उसकी मां एकदम से हैरान होते हुए बोली)

बाप रे तू समय तू मेरी तरफ देख रहा था तुझे शर्म नहीं आई,,,

इसमें शरम कैसी मेरी नजर तो अपने आप ही तुम्हारे पर चली गई थी और तुम जब साड़ी कमर तक उठे तो तुम छुट्टी नहीं पहनी थी तुम्हारी नंगी गांड एकदम साफ दिखाई दे रही थी बड़ी-बड़ी,,,

हाय दैया कैसी बातें कर रहा है तु,,, क्या सच में मेरी गांड बड़ी-बड़ी है,,,,

हां,,,,, एकदम साफ तो दिखाई दे रही थी,,,,

मतलब की तो फुटपाथ पर खड़ा होकर दूसरों को देखने के बजाय मुझे देख रहा था,,,

मैं तो यह देख रहा था कि कहीं तुम ज्यादा दूर तो नहीं जा रही हो लेकिन तुम चड्डी क्यों नहीं पहनी थी,,,,।

अरे तो,,मेरे चड्डी नी पहनने से,,,कोन सा आसमान टुट पड़ा है,,,

आसमान नहीं टूट पड़ा लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि ऐसी कौन सी वजह थी जो तुम चड्डी नहीं पहनी,,,।

(कल्पना में ही अंकित पूरी तरह से अपनी मां से सवाल जवाब करने में मजबूर हो चुका था और कल्पना में ही उसकी मां भी एकदम मदहोश होते हुए अपने बेटे के सवाल से उत्तेजित हुए जा रही थी और अपने बेटे के सवाल पर एकदम सहज होते हुए मुस्कुरा कर बोली)

गीली थी,,, चड्डी सुखी नहीं थी इसलिए नहीं पहनी,,, और तुझे तो पता ही होगा गीली चड्डी पहनने से खुजली हो जाती है,,,।

ओहहहह तो यह बात थी,,, मुझे लगा कि शायद तुम्हारे पास है ही नहीं,,,।

अगर सच में नहीं होती तो क्या करता,,,

नई खरीद कर लाता,,,,

(अपने बेटे की बात सुनकर उसकी मासूमियत भरे चेहरे की तरफ देखकर सुगंधा मुस्कुराने लगी और अचानक ही उसकी नजर अपने बेटे की पेंट के आगे वाले भाग पर गई और वह एकदम से चौंकते हुए बोली,,,)

लेकिन यह तेरे पेंट में तंबू कैसा बना हुआ है,,,।

(उसकी मां का इतना कहना था कि अंकित एकदम से कल्पनाओं की दुनिया से जमीन पर आ गया क्योंकि दरवाजे पर दस्तक हो रही थी उसकी कल्पना टूट चुकी थी लेकिन कल्पना में जिस तरह के सवाल जवाब अपनी मां से कर रहा था वह बेहद मदहोश कर देने वाले थे बाहर उसकी बड़ी बहन खड़ी थी जो उसे खाना खाने के लिए आवाज दे रही थी,,,,)

हांआया,, (ऐसा कहकर अंकित बिस्तर पर पैर नीचे लटका कर बैठ गया और उसका ध्यान अपनी दोनों टांगों के बीच गया तो वह एकदम से स्तब्ध रह गया क्योंकि जिस तरह की कल्पना अपनी मां से बातचीत करते हुए कर रहा था उसे लेकर उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो चुका था इसलिए वह तुरंत बिस्तर से नीचे खड़ा हो गया और कमरे में इधर-उधर तैरने लगा और अपना ध्यान भटकने लगा क्योंकि वह ऐसी अवस्था में कैमरे से बाहर जा नहीं सकता था क्योंकि ऐसी हालत में उसकी पेंट के ऊपर उसकी मां की नजर जा सकती थी,,, । जब सबको शांत हो गया तब थोड़ी देर बाद वहां कमरे से बाहर निकला और तीनों मिलकर खाना खाने लगे,,,,।

खाना खाते समय त्रप्ती कुछ जल्दबाजी दिखा रही थी उसे इस तरह से जल्दबाजी में खाते हुए देख कर सुगंधा बोली,,,,।

अरे इतनी जल्दबाजी क्यों है कहीं जाना है क्या आराम से खा ,,,

सुगंधा की कल्पना अपने बेटे के साथ

अरे मम्मी मुझे थोड़े नोट्स पूरे करने हैं मैं तो भूल ही गई थी अभी-अभी याद आया,,,

तो क्या हो गया फिर भी आराम से खा,,,,।

(दोनों मां बेटी आपस में बातें कर रहे थे लेकिन अंकित तिरछी नजरों से अपनी मां को देख रहा था,,, क्योंकि खाना खाते समय उसके कपड़े अपने आप ही अस्त-व्यस्त हो गए थे उसकी सारी कंधे से थोड़ा नीचे सरक गई थी जिसकी वजह से उसके ब्लाउज का ऊपरी वाला भाग एकदम साफ नजर आ रहा था और गर्मी का महीना होने के कारण उसकी मां पहले से ही ब्लाउज के ऊपर वाला बटन खोल रखी थी जिससे दोनों चूचियों के बीच की पतली गहरी लकीर एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,, जिसे देखकर अंकित मत हो रहा था,,,, वैसे भी मर्दों की प्यास औरत के बदन से कभी ना तो बुझती है और ना ही पूरी होती है,,, क्योंकि अंकित पहले भी अपनी मां की खूबसूरत बदन को नग्न अवस्था में देख चुका ,,,, उसकी गांड देख चुका था उसकी चूचियां देख चुका था,,, यहां तक कि वह अपनी मां की बुर भी देख चुका था लेकिन इसके बावजूद भी आलम यह था कि इस समय वह केवल अपनी मां की चूचियों की हल्की सी झलक देखकर ही उत्तेजित हो रहा था और यह बात सुगंधा को पता चल गई थी और अंदर ही अंदर भाभी प्रसन्न होते हुए रोटी अपनी बेटी की थाली बढ़ाने के बहाने वह आगे की तरफ झुक गई जिसे उसकी साड़ी पूरी तरह से कंधे से नीचे उतर गई और उसकी भारी भरकम मदहोश कर देने वाली छातिया एकदम से उजागर हो गई,,,, और यह देखकर अंकित का मुंह खुला का खुला रह गया,,,

तृप्ति का ध्यान दोनों की तरफ बिल्कुल भी नहीं था क्योंकि उसके दिमाग में कुछ और चल रहा था पर जल्द से जल्द खाना खाकर अपने कमरे में जाना चाहती थी उसे तो यह भी एहसास नहीं हुआ था कि उसकी मां उसकी थाली में एक रोटी और रख दी थी वह पूरी तरह से अपने ख्यालों में खोई हुई थी,,,,।

सुगंधा अपनी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिराकर अपने बेटे को अपनी जवानी से भरी हुई छातियों के दर्शन करा कर अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक कर ली थी,,, और ऐसा बर्ताव कर रही थी मानो सब कुछ अनजाने में हुआ हो अपने बेटे को इस तरह से अपने जवानी के दर्शन करने में उसे बेहद उत्तेजना और अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती थी,,, थोड़ी देर में तीनों खाना खा चुके थे और तृप्ति बर्तन की सफाई करने के बाद अपने कमरे में चली गई थी आज वह टीवी देखने के लिए ड्राइंग रूम में भी नहीं आई थी,,,,।
 
कमरे में जाते ही वह अपने किताबों के बैग को बिस्तर पर रखकर उसमें से एक नोटबुक निकाली और उसके पन्नों को पलटने लगी और जल्द ही उसे अंदर रखा हुआ एक पन्ना नजर आया जिसे वह उठाकर पढ़ने लगी,,,।

वह किसी नोटबुक का पन्ना नहीं था,, बल्कि संदीप के द्वारा लिखा गया प्रेम पत्र था जिसे आज ही कॉलेज में उसने नोटबुक में उस पन्ने को रखकर त्रप्ती को थमा दिया था,,, उसे प्रेम पत्र को पढ़ाते हुए तृप्ति का दिल जोरो से धड़कने लगा था क्योंकि उसके जीवन का यह पहला प्रेम पत्र था जिसे संदीप ने लिख कर दिया था,,, उसे प्रेम पत्र में लिखो एक-एक शब्द को पढ़कर तृप्ति के बदन में उमंग जागने लगी उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव नजर आने लगे,,, लेकिन कहीं ना कहीं उसके बदन में उत्तेजना की फुहार भी उठ रही थी,,, वह प्रेम पत्र पूरी तरह से संदीप के प्रेम से भरा हुआ था उसका एक-एक शब्द तृप्ति के तन-बाद में मदहोशी भर रहा था जिसका असर उसे अपने दोनों टांगों के बीच हो रहा था,,, पल भर में उसे अपनी बुर फुलती और पिचकती हुई महसूस हो रही थी हालांकि उसे प्रेम पत्र में अश्लील शब्द बिल्कुल भी नहीं थे ना तो कोई अभद्र भाषा का उपयोग किया गया था लेकिन तृप्ति के जीवन का यह पहला प्रेम पत्र था जो संदीप के द्वारा लिखा गया था और मन ही मन में संदीप को प्यार करने लगी थी और जिस तरह की हरकत उसने पहली बार किया था वही हरकत प्रेम पत्र पढ़ते समय उसके जेहन में उभरने लगा था जिसके चलते वह उत्तेजित हुए जा रही थी,,,, हालांकि ट्यूशन से आते समय संदीप के द्वारा की गई हरकत से उसे समय तो वह काफी क्रोधित हुई थी लेकिन जिस तरह की उन्माद संदीप ने अपनी हरकत से उसके बदन में जगाया था उसके बाद से वह फुहार रह रहकर उसे परेशान करती थी और यह सिलसिला आज तक जारी था इसीलिए संदीप के द्वारा दिए गए प्रेम पत्र को पढ़ते हुए वह पूरी तरह से मदहोश हो गई थी,,,, उसका दिल बड़े जोरों से धड़क रहा था बहुत जल्दी से उसे प्रेम पत्र को इस तरह से मोड कर नोटबुक में रख दी और उसे अपनी बैग में भर दी और बिस्तर पर पीठ के बल लेटे हुए वह संदीप के बारे में ही सोचते हुए कब नींद की आगोश में चली गई उसे पता नहीं चला,,,।

..........................

तृप्ति का यह पहला प्रेम पत्र था जिसका एहसास उसे पूरी तरह से भिगोने लगा था,,, पत्र में लिखो एक-एक शब्द को वह बार-बार पढ़ रही थी,, ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे वह उसकी प्रेम पत्र नहीं बल्कि उसकी कुंडली हो जिसमें वह अपना भविष्य ढूंढ रही थी,,, वैसे तो ट्यूशन से आते समय संदीप ने जिस तरह की हरकत उसके साथ किया था उस हरकत को लेकर तृप्ति उससे काफी नाराज भी थी क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि संदीप इस तरह की हरकत करके उसकी नजर में गिर जाए,, और इस गलती के चलते संदीप ने उससे माफी भी मांग लिया था और तृप्ति ने उसे माफ़ भी कर दी थी,,,। और इस वजह से दोनों के बीच का रिश्ता टूटते टूटते बचा था,,,।

संदीप के द्वारा दिए गए प्रेम पत्र को पढ़ने के बाद तृप्ति उसे नोटबुक में वापस रख दी थी और उसे प्रेम पत्र के चलते अपने बदन में काफी उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,, क्योंकि वैसे तो वह प्रेम पत्र एकदम सीधे-सादे सरल भाषा में था लेकिन तृप्ति उस पत्र के एक-एक शब्द से काफी उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,, ऐसा लग रहा था कि पत्र में लिखें हर एक शब्द उसके बदन से उसके वस्त्र को उतार रहे हो और ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि तृप्ति उस पत्र को संदीप की हरकत से जोड़ रही थी जो कि वह भी अनजाने में एकाएक अपनी हरकत को अंजाम देने लगा था और इस समय भी यह पत्र भी अचानक ही उसे दे दिया था इसलिए अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,,।

बिस्तर पर लेटे-लेटे तृप्ति सलवार के ऊपर से ही अपनी गुलाबी बुर को मसल रही थी,,,। ऐसा नहीं था कि तृप्ति के दिलों दिमाग पर वासना का भूत सवार हो जाता हो वह ऐसी लड़की बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन कभी कबार उसके बदन में कामुकता की फुहार उठने लगती थी जिसकी नमी में वह अपनी दोनों टांगों के बीच की उस पतली गली को गीली कर लेती थी,,,, इस समय भी उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी और वह अपनी आंखों को बंद करके उसे पल को सोच रही थी,,जो उसके साथ घटीत हो चुका था,,, उसी दिन संदीप ने जो कुछ भी उसके साथ किया था वह काफी हैरान कर देने वाला था और काफी उत्तेजित कर देने वाला भी था क्योंकि धीरे-धीरे संदीप की हथेली उसकी सलवार के अंदर तक पहुंच चुकी थी,,, संदीप अपनी हरकत को अंजाम तक पहुंचाते हुए अपनी हथेली से तृप्ति की बुर को ढक लिया था और हथेली की गर्माहट तृप्ति को अंदर तक गर्म कर रही है वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी तृप्ति को ऐसा लग रहा था कि संदीप अब रुकने वाला नहीं है एक तरफ उसे मजा भी आ रहा था दूसरी तरफ वह घबरा भी रही थी क्योंकि उसके जीवन का यह पहला वाक्या था जब किसी मर्दाना हाथ को वह अपने जिस्म पर महसूस कर रही थी,,,।

तृप्ति पूरी तरह से मदहोशी के आलम में डूबने लगी थी संदीप की हरकत की वजह से उसकी आंखों में खुमारी छा रही थी बदन में चार बोतलों का नशा होने लगा था,,, उसके पैरों में कंपन हो रहा था वह ठीक से अपना संतुलन नहीं बना पा रही थी उसे ऐसा लग रहा था कि आज उसका कौमार्य भंग हो जाएगा जिसमें वह खुद सहभागी बनेगी,,, क्योंकि संदीप पूरे जोश के साथ उसके खूबसूरत बदन से खेलना शुरू कर दिया था खड़े-खड़े ही वह उसकी बुर को गीली कर दिया था यहां तक की पेंट में उसका कठोर लंड अपनी कठोरता का एहसास उसके नितंबों पर दिला रहा था कुल मिलाकर तृप्ति संदीप की इच्छाओं और उपासना के जाल में पूरी तरह से लिप्त होने लगी थी वह किसी भी वक्त घुटने टेक देना चाहती थी लेकिन तभी पीछे से आ रही मोटर साइकिल की लाइट की वजह से उसकी तंद्रा एकदम से भंग हुई और वह एकदम से जमीन पर आकर गिर गई वह एकदम होश में आ चुकी थी और संदीप की हरकत का विरोध करते हुए गुस्से में वहां से चली गई,,,,।

और यही एहसास इस समय तृप्ति को अपने बिस्तर पर हो रहा था उसे दिन की तरह अपने कौमार्य को जिस तरह से उसने बचा ली थी आज भी बहुत तुरंत अपनी हथेली को अपनी सलवार में से बाहर निकली थी और गहरी गहरी सांस लेते हुए कुछ देर तक अपने आप को दुरुस्त करने लगी थी,,,, भले ही वासना का तूफान उसे अपने साथ ले जाने को उसे मजबूर कर देता था लेकिन इन मौके पर वह अपने आप को संभाल ले जाती थी क्योंकि तृप्ति दूसरी लड़कियों की तरह बिल्कुल भी नहीं थी हां दूसरी लड़कियों की तरह उसके भी अरमान मचल जाते थे बदन में मदहोशी छा जाती थी लेकिन वह इतनी कच्ची नहीं थी कि तुरंत घुटने टेक दे,,,,।

अपने आप को दुरुस्त कर लेने के बाद वह बिस्तर पर से उठी और एक गिलास ठंडा पानी पीकर वापस बिस्तर पर लेट गई और दूसरे दिन संदीप मिलने की आतुरता दिखाते हुए नींद की आगोश में चली गई,,,।

दूसरी तरफ सुगंधा एक मां से पहले एक औरत थी और एक औरत के मन में उसके तन में भी कुछ चाहत होती है और यही चाहत उसमें जाग चुकी थी जिसके चलते वह अपने ही बेटे को अपनी जवानी के जाल में फसाने की पूरी तरकट रच रही थी जिसमें उसका बेटा पूरी तरह से आ भी चुका था,,, और भला जब सुगंध जैसी खूबसूरत जवान से लदी हुई औरत हो तो ऐसा कौन सा मर्द होगा जो उसके चंगुल में फंसने के लिए आतुर ना हो उसके जाल में खुद आने के लिए व्याकुल ना हो,, शुरू शुरू में सुगंधा को अपनी हरकत पर शर्मिंदगी महसूस होती थी उसका मन उसे रोकने की कोशिश करता था,,, और वह भी अपने आप को आगे बढ़ने से रोकना चाहती थी इसलिए रोज कोई ना कोई कसम खाकर ऐसा गलती दोबारा न करने का वचन लेती थी लेकिन दूसरे दिन फिर उसका मन मचलने लगता था,,, और वह फिर से लाचार और निसहाय अपने आप को महसूस करने लगती थी,,, लेकिन अब तो उसे मजा आ रहा था मदहोशी में वह डूबने लगी थी उसे अपने बदन पर गर्व होने लगा था कि इस उम्र में विवाह किसी भी मर्द का पानी निकालने में पूरी तरह से सक्षम है,,।

दूसरे दिन अंकित पढ़ने जाने के लिए तैयार हो चुका था,,, उसकी मां रसोई घर में बाकी का काम निपटा रही थी तृप्ति पहले ही तैयार होकर कॉलेज के लिए निकल चुकी थी और वैसे भी उसे आज संदीप से मिलने की व्याकुलता कुछ ज्यादा ही थी इसलिए कुछ जल्दी ही वह घर से पढ़ाई का बहाना बना कर निकल गई थी,,, घर से निकलते निकलते अंकित को शरारत सुझ रही थी,,, वह रसोई घर के दरवाजे पर खड़े होकर अपनी मां को ही देख रहा था और खाना बनाते समय उसकी मां किसी काम देवी से काम नहीं लग रही थी क्योंकि उसने साड़ी को उठाकर कमर से खून रखी थी उसके नितंबों का उभार साड़ी के कसाव की वजह से और भी ज्यादा उभर कर दिखाई दे रहा था,,, और साड़ी का पल्लू उसने इस तरह से गोल-गोल घुमा कर अपने कंधे पर डाली थी कि उसके साड़ी का पल्लू उसकी दोनों चूचियों के बीच से होकर गुजर कर उसकी कमर तक आ रहा था जिसे वह कमर में खोंस रखी थी,,,।

अपनी मां को इस रूप में देखते हुए अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि उसकी मां को इस रूप में अगर कोई देख ले तो जरूर उसका लंड खड़ा हो जाए क्योंकि लड़कों को और क्या चाहिए एक खूबसूरत औरत उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां उसकी बड़ी-बड़ी गांड बस इतने से ही तो उनकी उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच जाती है जैसा कि उसकी खुद की उत्तेजना उसे मुठ मारने पर मजबूर कर देती थी,,, इस समय भी उसका यही हाल हो रहा था सादगी में भी उसकी मां कयामत लग रही थी,,, पर जिस तरह वह बर्तनों को इधर से उधर कर रही थी उसके साथ उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां भी लहर मार रही थी जिसे देखकर अंकित के मुंह में पानी आ रहा था,,,।

कुछ देर तक अंकित दरवाजे पर खड़ा होकर अपनी मां के रूप खूबसूरती को देखता ही रह गया,,, सुगंधा का ध्यान दरवाजे पर बिल्कुल भी नहीं था वह अपने काम में एकदम मशगुल थी लेकिन जैसे ही उसकी नजर दरवाजे पर गई तो दरवाजे पर अंकित को खड़ा देखकर मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,।

क्या हुआ अभी तक गया नहीं,,,

बस जा ही रहा था,,, मैं कह रहा था कि आते समय,,, तुम्हारे लिए लंबे-लंबे और मोटे केले लेकर आऊं क्या,,,।

(अपने बेटे के मुंह से इस तरह की बात सुनकर पल भर में ही सुगंध के बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी उसे मार्केट में कहीं अपनी बात याद आ गई,,, और वह मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

क्यों तुझे पता है क्या कि मुझे कैसे केले पसंद है,,,

फिर क्या तुम ही ने तो कल बताई थी मार्केट में,,

वह तो ठीक है पर तुझे कैसे मालूम कि मुझे मोटे और लंबे केले पसंद है,,,,

अब मम्मी तुम्हें देखकर लगता ही नहीं की छोटे और पतले केले से तुम्हारा कुछ हो पाएगा,,,,,(इस बार अंकित दो अर्थ वाली बातें कर रहा था जिसे सुगंधा अच्छी तरह से समझ रही थी और अंदर ही अंदर उत्तेजित हो रही थी,,,)

तुझे कैसे पता कि पतले केले से मेरा कुछ नहीं हो पाएगा,,,

अब तुम्हारा शरीर देखो लंबी कद काठी की हो,,, कसा हुआ बदन है तुम्हारा,,, ऐसे में मरेला सा पतला सा केला तो तुम्हें कुछ एहसास ही नहीं दिला पाएगा,, ।

(अंकित। केले का नाम लेकर एक तरह से अपनी मां को लंड के बारे में बातें कर रहा था क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां की कद काठी बेहद उच्चस्तर किस्म की थी,,, ऐसे में उसके बदन की प्यास केवल मोटा तगड़ा लंड ही बुझा सकता था)

सही कह रहा है तू मुझे तो मोटा और लंबा लं,,, (इतना कहते ही उसकी जुबान एकदम से रुक गई,, आगे का शब्द उसके गले में ही अटक कर रह गया ,, और सुगंध जल्द ही अपने कहे शब्दों को सुधारते हुए बोली,,,) मेरा मतलब है कि मोटा और तगड़ा केला ही पसंद है,,,,,,(अपनी बातों को संभालते हुए वह पसीने से तरबतर हो चुकी थी उसके मुंह से अनजाने में भी लंड शब्द का आगे वाला शब्द निकल चुका था,,, जिसे उसके बेटे ने बखुबी सुन लिया था,,, अपनी मां के मुंह से इस तरह के शब्द सुनकर उसके भी होश उड़ गए थे,,, उसकी भी सांसों पर नीचे होने लगी थी और वह समझ गया था कि उसकी मां को क्या पसंद है,,,, लेकिन फिर भी ऐसा जताने लगा कि मानो जैसे वह अपनी मां के मुंह से अश्लील शब्द को सुना ही नहीं और बोला,,,।

ठीक है मम्मी में मार्केट से आते समय तुम्हारी पसंद का केला लेते आऊंगा,, (अपनी मां से दो अर्थ में बात करते हुए उसे भी बहुत मजा आ रहा था जिसका असर उसकी दोनों टांगों के बीच हो रहा था पेट का आगे वाला भाग उभरने लगा था जिस पर सुगंधा की नजर चली गई थी और वह मन ही मन उत्तेजित हो रही थी उसे भी अपनी बुर गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, और वह सहज होते हुए बोली,,,।

ठीक है लेते आना लेकिन पैसे तो लेता जा,,,

कोई बात नहीं मम्मी पैसे मेरे पास है मैं आते समय लेते आऊंगा,,,,(और इतना कहते हुए घर से बाहर चला गया और सुगंधा रसोई घर के दरवाजे तक आकर उसे जाते हुए देखते रह गई,,, और अपने मन में ही बोली,,, मुझे जिस तरह का केला पसंद है वह तो तेरे पास है,,,।)

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अपने बेटे में आए बदलाव से सुगंध बेहद खुश थी राहुल की संगत में कुछ तो असर हुआ था जिसके चलते उसके बेटे ने उसकी खूबसूरती की तारीफ किया था यह इशारा था कि अब वह पूरी तरह से बड़ा हो चुका है औरतों के प्रति आकर्षण उसके में भी स्वाभाविक रूप से आ चुका है वह भी समझ चुका है की औरतों का कौन सा अंग बेहद आकर्षक होता है,,, क्योंकि सुगंध अपने बेटे की नजर को अच्छी तरह से पहचानती थी काम करते वक्त वह काम में जरूर मन लगाती थी लेकिन उसकी नजर हमेशा अंकित के ऊपर ही रहती थी और उसकी तिरछी नजरों के बाण को अपने बदन पर चलता हुआ वह देखकर अंदर ही अंदर बहुत खुश होती थी,,,।

एक दिन बाहर मार्केट जाने के लिए तैयार हो रही थी और अपने साथ अंकित को भी ले जा रही थी वह अपने कमरे में तैयार हो रही थी,,, और अंकित तैयार होकर कमरे से बाहर कुर्सी पर बैठकर इंतजार कर रहा था,,, और अपनी मां के बारे में ही सोच रहा था,,, अब वह अपने मन में यही सोचता था कि काश उसकी मां राहुल की मां की तरह होती तो कितना मजा आ जाता घर में ही खुला वातावरण देखने को मिलता ,,, क्योंकि राहुल की मां को देखकर मन ही मन वह भी यही चाहता था कि उसकी मां भी राहुल की मां की तरह ही घर में रहे मां बेटे के बीच में किसी प्रकार का पर्दा ना हो सब कुछ देखने को मिले जैसा कि वह खुद अचानक उसके घर पर पहुंच कर देख चुका था उसकी मां का कामुक रूप बड़ी-बड़ी चूचियां उस पर गीली साड़ी,,,उफ्फ,,,, उस दृश्य को याद करके अभी भी अंकित का लंड खड़ा हो जाता था। और इस समय भी उसका यही हाल था,,, राहुल की मां के बारे में सोचकर ही उसका लंड ठुनकी मारता हुआ अपनी औकात में आ चुका था,,,।

बाहर बैठा हुआ अंकित बार-बार अपनी घड़ी की तरफ देख रहा था क्योंकि मार्केट जाने का समय कुछ ज्यादा ही होता जा रहा था,,, वह बाहर से ही आवाज लगाता हुआ बोला,,,।

मम्मी तैयार हुई कि नहीं देर हो रही है,,,

अरे हां तैयार हो गई हूं बस थोड़ा सा रह गया है यह ब्लाउज की डोरी बंद नहीं हो रही है,,,।

(उसकी मां का इतना कहना था कि अंकित की कल्पनाओं का घोड़ा पल भर में ही गति पकड़ लिया वह अपनी मां के बारे में कल्पना करने लगा अपनी मां के डोरी वाले ब्लाउज के बारे में कल्पना करने लगा वह अपने मन में सोच रहा था कि उसकी मां डोरी वाले ब्लाउज में कितनी खूबसूरत लगती होगी हालांकि वह पहले भी अपनी मां को डोरी वाले ब्लाउज में देख चुका था लेकिन इतना ध्यान नहीं दिया था लेकिन जब से उसका आकर्षण अपनी मां की तरफ बढ़ा था तब सेवा अपनी मां की हर एक हरकत और उसके रूप को देखकर उसके बारे में गंदी-गंदी कल्पना किया करता था और इस समय भी उसके मन में यही हो रहा था अपने मन में यही सोच रहा था कि उसकी मां की बड़ी-बड़ी चूचियां कैसे छोटे से ब्लाउज में समा जाती होगी,,, वह अपने मन में यह सोच रहा था कि पता नहीं उसकी मां कौन से रंग का ब्रा पहनी होगी,,, और अपने ब्लाउज की डोरी को कैसे बांधती होगी,,,,उफ्फ,,, कितना गजब का नजारा होगा अपने मन में इस तरह की कल्पना करके अंकित अपनी मां को इस रूप में देखना चाहता था अपनी मां को कपड़े पहनते हुए देखना चाहता था ब्लाउज पहना हुए देखना चाहता था उसे अंतर्वस्त्र पहनते हुए देखना चाहता था लेकिन वह जानता था ऐसी हालत में अपनी मां को देख पाना नामुमकिन सा है,, क्योंकि जब भी कपड़े पहनना होता था तो उसकी मां अपने कमरे में चली जाती थी और दरवाजा बंद कर लेती थी हां यह बात और ठीक ही वह अपनी मां को अस्त-व्यस्त हालत में धीरे-धीरे कई बार देख चुका था, ।

घर के पीछे रात को पेशाब करते हुए उसकी नंगी गांड के दर्शन करके वह अपने आप को धन्य समझने लगा था और उस समय का पल उसके लिए बेहद उत्तेजनात्मक था,,, और वह बाथरूम में भी अपनी मां को पूरी तरह से नंगी होकर नहाते हुए देख चुका था उसके हर एक अंग को देख चुका था और उसे दृश्य को देखकर वह इस समय अपने लंड को हिला कर अपनी घर में शांत करने की लालच को रोक नहीं पाया था और हस्तमैथुन करके अपनी जवानी की गर्मी को शांत करने की कोशिश किया था और फिर उसके बाद सुबह-सुबह जब वह अपनी मां के कमरे में उसे जगाने के लिए गया था तब का दृश्य देखकर तो उसके लंड की नसे फटने को हो गई थी क्योंकि कमर के नीचे उसकी मां पूरी तरह से नंगी थी और उसकी कचोरी जैसी फुली हुई बुर को देखकर अंकित अपनी लालच को रोक नहीं पाया था और हल्के से अपनी मां की बुर को छूने का सुख प्राप्त कर लिया था,,,। अंकित यही सब अपनी मां के बारे में सोच ही रहा था कि तभी फिर से कमरे के अंदर से आवाज आई,,,।

अरे अंकित देखा तो ब्लाउज की डोरी बंद नहीं हो रही है जरा आकर बंद कर देना तो,,,।

(इतना सुनते ही अंकित की आंखों की चमक एकदम से बढ़ गई उसे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था और यह फैसला भी सोच समझ कर सुगंधा ने ली थी ऐसा नहीं था कि वह अपने हाथ से ब्लाउज की डोरी बंद नहीं कर पा रही थी बल्कि वह अपने बेटे के हाथ से अपनी डोरी को बंद करवाना चाहती थी और उसे उत्तेजित कर देना चाहती थी वह आदम कद आईने के सामने खड़ी थी,,,। और ऐसे हालात में,,, आईने में उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां ब्लाउज में कैद नजर आ रही थी वह अच्छी तरह से जानती थी कैसे हालात में डोरी बातें जैसे मैं उसकी नजर आई नहीं पर जरूर पड़ेगी और वह उसे समय अपने बेटे के चेहरे पर बदलने वाले भाव को देखना चाहती थी उसके दोनों टांगों के बीच की स्थिति को महसूस करना चाहती थी देखना चाहती थी,,,,। अंकित अभी इसी कसमकस था कि उसकी मा सच में उसे अंदर बुलाई है या ऐसे ही उसके कान बज रहे हैं,,, और फिर कुछ देर तक अंकित की तरफ से कोई भी हरकत ना होता हुआ देख कर उसकी मां फिर से बोली,,,,।)

अंकित बेटा जरा अंदर आना तो मेरे ब्लाउज की डोरी बंद नहीं हो रही है जरा बंद कर दे तो,,,,।

(इतना सुनते ही उसकी मां प्रसन्नता से भर गया उसकी मन भंवरा बनकर उड़ने लगा कि उसके कान नहीं बज रहे थे बल्कि सच में उसकी मां यही बोल रही थी जैसा कि वह सुन रहा था वह तुरंत अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया और अपनी मां के कमरे के पास जाने लगा दरवाजा अंदर से बंद जरूर था लेकिन सिटकिनी नहीं लगाई हुई थी,,, और हल्के से दरवाजे पर हाथ रखते ही दरवाजा एकदम से खुल गया,,, आंखों के सामने जो दृश्य नजर आया उसे देखकर अंकित के पेट के अंदर हलचल बढने लगी,,,, दरवाजा खुलते ही पीछे ब्लाउज की डोरी को दोनों हाथों से पकड़े हुए उसकी मां दरवाजे की तरफ देखने लगी ऐसी हालत में अंकित की नजर एकदम साफ तौर पर देख पा रहे थे कि उसकी मां आसमानी रंग का ब्रा पहनी हुई थी क्योंकि पीछे के साइड से ही दिख रही थी आगे से तो ब्लाउज का कपड़ा होने की वजह से सिर्फ चुचियों का उभार ही दिख रहा था,,,। अपनी मां की तरफ कामुक नजर से देखते हुए अंकित औपचारिकता निभाते हुए बोला,,,)

क्या हुआ मम्मी,,,?

अरे देख नहीं रहा है ब्लाउज की डोरी बंद नहीं हो रही है,,,,।

अरे कैसे बंद नहीं हो रही मम्मी,,,,

बहुत दिनों बाद यह ब्लाउज पहन रही हुं,,,,

रोज ही तो पहनती हो,,,(अपनी मां की तरफ आगे बढ़ते हुए अंकित बोला)

अरे पागल हो गया है क्या कहां रोज पहनती हूं,,,।

क्या मम्मी तुम भी बिना ब्लाउज के रहती हो क्या रोज,,,,(अपनी मां के एकदम करीब पहुंचते हुए बोला,,,,, अपनी मां के साथ बात करते हुए ब्लाउज जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए उसके बदन की उत्तेजना और बढ़ती जा रही थी और सुगंधा के तन बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी,,,)

अरे बुद्धू डोरी वाला बहुत दिन बाद पहन रही हूं तो हाउस तुम्हें रोज पहनती हूं लेकिन कभी उसकी डिजाइन तूने देखने की कोशिश किया है तुझे क्या मालूम मैं क्या पहनती हूं क्या नहीं पहनती हूं,,, पहले जो ब्लाउज पहनती थी उसका बटन आगे से,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा तुरंत अपने बेटे की तरफ घूम गई और अपनी छाती दिखाते हुए बोली) बंद होता है लेकिन इस ब्लाउज में बटन भी आगे से बंद होता है और पीछे से डोरी को भी बांधी जाती है समझ में आया तुझे कुछ,,,(ऐसा कहते हुए जिस तरह से सुगंध अपने बेटे की तरफ घूम कर अपनी छाती दिख रही थी हालांकि वह अपने ब्लाउज का बटन दिखाना चाहती थी लेकिन उसका उद्देश्य अपनी चूचियों को दिखाना ही था और वाकई में सूरज की नजर बटन पर तो बाद में लेकिन उसकी भरी हुई छाती पर पहले गई थी जिसे इतने करीब से देख कर पेंट में हलचल सी मचने लगी थी,,,। अंकित क्या कहता है कुछ समझ में नहीं आया उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी और यह बदलाव सुगंधा की नजर में आ चुका था वह अंदर के अंदर खुश हो रही थी,,,,, कुछ देर तक वह इस स्थिति में खड़ी रही पीछे से ब्लाउज खुला हुआ था उसकी ब्रा की पिछली पट्टी साफ दिखाई दे रही थी,,, यह किसी भी जवान लड़के की तरह मदहोश कर देने वाला दृश्य था इस तरह के दृश्य देख कर कोई भी मर्द उत्तेजित होकर जुगाड़ ना होने की स्थिति में हस्तमैथुन करके अपने घर में शांत करने की कोशिश जरूर करता और इसमें अंकित की भी हालत खराब हो रही थी वह कुछ सेकेंड तक अपनी मां की भारी भरकम चूचियों की तरफ देखते हुए औपचारिकता वश बोला,,,।)

तो यह बात है मुझे क्या करना है,,,,,।

तुझे ज्यादा कुछ करना नहीं है बस इस ब्लाउज की डोरी को बांधना है,,, इतना तो तुझे आता ही है ना,,,,

ठीक है मम्मी,,,,।

( अंकित की मां इतना सुनते ही वापस आईने की तरफ घूम गई और अपनी चिकनी पीठ को अपने बेटे की तरफ कर दी,,, अंकित तो यह दृश्य देख कर मदहोश हुआ जा रहा था,,, अपनी मां के ब्लाउज की डोरी को बांधने के नाम से उसके बदन में उत्तेजना भारी कंपन हो रही थी,,,, वह नजर उठा कर आईने की तरफ देखा उसकी मां सीधे-सीधे आईने में नहीं देख रही थी क्योंकि वह जानती थी कि उसका बेटा आईने की तरफ देखेगी और उस नजर मिलते ही वह अपनी नजर को घुमा लगा और ऐसा हुआ नहीं चाहती थी वह चाहती थी कि उसका बेटा खुली नजरों से ब्लाउज में कैद उसकी चूचियों को देखें चूचियों के बीच से गुजरती हुई पतली दरार को देखें और ऐसा ही हुआ,,, सूरज नजर उठा कर आईने में देखने लगा जिसमें उसकी मां का खूबसूरत चेहरा और उसकी मां की मदद कर देने वाली ऊभरी हुई उन्नत छाती नजर आ रही थी जिस पर साड़ी का पल्लू नहीं था और साड़ी कमर तक भरी हुई थी और साड़ी का पल्लू नीचे जमीन पर लहरा रहा था एक तरह से यह दृश्य कामोतेजना से भर देने वाला था,,,। अगर इस समय स्त्री से पर किसी और की नजर पड़ जाती तो औपचारिक रूप से इस दृश्य के चलते मां बेटे के बीच गलत संबंध के रिश्ते का ठप्पा लग जाता और वैसे भी इस तरह के दिल से अक्षर प्रेमी प्रेमिका और पति पत्नी के बीच ही देखने को मिलता है और अगर इस समय यहदृश्य तृप्ति देख लेती तो शायद उसकी मां और उसका भाई दोनों उसके नजर से गिर जाते लेकिन इस समय दोनों निश्चिंत्य थे क्योंकि तृप्ति कोचिंग के लिए गई हुई थी,,,,,।

जवान हो चुके अंकित के लिए यह काम बेहद कठिन नजर आ रहा था क्योंकि आज तक कुछ नहीं कभी औरत के ब्लाउज की डोरी नहीं बांधी थी यह पहला मौका था जब उसकी मां खुद ही अपने बेटे से ब्लाउज की डोरी को बंधवाने जा रही थी,,, अंकित ठीक अपनी मां के पीछे खड़ा हुआ था उसके पेट में अच्छा खासा तंबू बना हुआ था जो की एक कदम आगे बढ़ने से ही उसका तंबू उसकी मां की भारी भरकम नितंबों पर स्पर्श करने लगता उस पर रगड़ खाने लगता,,, और शायद इसी रगड़ को सुगंधा महसूस करना चाहती थी क्योंकि वह भी तिरछी नजर से अंकित के पेट में उभरे हुए तंबू को देख चुकी थी और इतना तो समझ ही गई थी कि उसके बेटे का लंड क्यों खड़ा है और इसी के चलते उसे अपनी जवानी पर अपने कसे हुए बदन पर गर्व महसूस हो रहा था,,,, कुछ पल के लिए कमरे के अंदर खामोशी छा चुकी थी मां बेटे दोनों खामोश थे आईने में अंकित की नजर अपनी मां की भारी भरकम छातियों पर टिकी हुई थी जिसके बीच से गुजरती हुई गहरी लकीर किसी नहर से काम नहीं लग रही थी और इसी नहर में अंकित डुबकी लगाना चाहता था,,,, अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि ब्लाउज के अंदर उसकी मां कितना बेश कीमती खजाना छुपा कर रखी है,,, जिसे देखने के लिए उसका मान कितना ललाईत हो रहा है और अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि काश उसकी मां राहुल की मां की तरह होती तो कितना अच्छा होता,,, तो उसे भी इस समय अपनी मां की नंगी चूचियों को देखने का सुख प्राप्त हो जाता गली साड़ी में बड़ी-बड़ी चूची और उसके कड़े निप्पल,,,उफ्फ ,,,, यही सब सोच कर अंकित मन ही मन खुश हो रहा था कि तभी उसकी मां बोली,,,।

अरे अब देख क्या रहा है बंद भी करेगा कि खड़ा ही रहेगा मार्केट भी जाना है,,,।

मैंने कभी बंद नहीं किया ना इसलिए समझ में नहीं आ रहा है,,,।

अरे तो सीख लेना चाहिए था, , आखिरकार यह सब आगे चलकर काम आएगा,,,,।

(अपनी मां की बातें सुनकर अंकित अपनी मां के खाने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रहा था और मन ही मन प्रसन्न भी हो रहा था वह धीरे से अपना हाथ आगे बढ़े और अपनी मां के ब्लाउज की डोरी को अपने दोनों हाथों से थाम लिया,,,, ब्लाउज की डोरी पकड़ने में उसकी हालत खराब हो रही थी माथे से पसीना को पकने लगा था जबकि कमरे में पंखा चल रहा था और गर्मी का एहसास सुगंधा को बिल्कुल भी नहीं हो रहा था और वही वह पसीने से तरबतर होता जा रहा था,,,, यह सब सुगंधा आईने में अच्छी तरह से देख पा रही थी,,,। देखते ही देखते अंकित ब्लाउज की डोरी को बांधने लगा,,, उसकी उंगलियां कांप रही थी,, अपने बेटे की हालत देखकर सुगंधा को भी शक हो रहा था कि कहीं उसका बेटा सच में उसकी डोरी बांध पाएगा या नहीं,,,,।

डोरी को बांधते समय अंकित की उंगलियां अपनी मां की चिकनी पीठ से स्पर्श हो जा रही थी और इतने सही अंकित के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी वह मदहोश हुआ जा रहा था,,, उसे अपनी मां की नंगी पीठ का स्पर्श भी बेहद आनंददायक लग रहा था,,,, वह अपनी मन में सोच रहा था कि उसकी मां की चिकनी पीठ कितनी कोमल है अगर ब्लाउज उतार दिया जाए तो बस केवल ब्रा की पतली सी पट्टी ही नजर आती है कोई भी शख्स पैसे में उसकी मां की नंगी चिकनी पीठ की कल्पना कर सकता है कि बिगर ब्रा और ब्लाउज की कैसी दिखती होगी,,,,।

यही हाल सुगंधा का भी था,, जब जब उसे अपनी पीठ पर अपने बेटे की उंगली का स्पर्श होता तब तब उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगती थी,,, देखते ही देखते एक गिठान मार कर अंकित दूसरी गिठान मार रहा था,,, उत्तेजना से अंकित की हालत बहुत खराब होती जा रही थी और यही हाल सुगंधा का भी था,,, सुगंधा किसी तरह से अपने बेटे के पेंट में बने हुए तंबू का स्पर्श अपनी नितंबों पर करना चाहती थी लेकिन कामयाब नहीं हो पा रही थी वह हल्के-हल्के अपने नितंबों में हरकत भी दे रही थी कि पीछे की तरफ जाकर बस स्पर्श हो जाए लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था,,,, ऐसे में ब्लाउज की डोरी बांधते हुए अंकित की नजर अपनी मां की गांड पर गई तो उसके होश उड़ गए गांड का उभार बहुत ही गजब का था,, नजर नीचे करने पर उसे साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी मां की बड़ी-बड़ी गांड और उसके लंड के बीच केवल दो तीन अंगुल का ही फासला रह गया था हल्का सा कमरक्ष आगे कर देता था उसका लंड उसकी मां के नितंबों से रगड़ खा जाता। लेकिन ऐसा करने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी उसे इस बात का डर था कि अगर उसकी मां की गांड पर उसका लंड स्पर्श करेगा तो उसकी चुभन से वह कैसा महसूस करेगी,,, नाराज हो जाएगी यही सब सो कर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी जबकि उसकी मां तो चाहती थी कि किसी भी तरह से उसके बेटे का लंड उसकी गांड से रगड़ खा जाए बस इतने से ही सुगंधा प्रसन्न हो जाती और अंकित मत हो जाता लेकिन फिर भी आगे बढ़ने से डर रहा था,,,।

देखते ही देखते अंकित अपनी मां के ब्लाउज की डोरी की गिठान को मार दिया था,,,, और बोला,,,।

लो हो गया,,,,।

बाप रे तूने तो बहुत कस के डोरी बांध दिया है,,,, आगे से देख,,,(एकदम से अंकित की तरफ घूम कर एक बार फिर से अपनी छाती की गोलाई दिखाते हुए) कितना बाहर निकल गया,,, एकदम उभरा हुआ दिख रहा है,,,,।

(अपनी मां की हरकत और उसकी छातिया को देखकर अंकित की आंखें फटी की फटी रह गई क्योंकि वह एकदम से छाती को तानकर अपनी दोनों गोलाईयों को दिखा रही थी,,, अंकित की हालत एकदम खराब होती जा रही थी वह आंख फाड़े अपनी मां की छातियो को ही देख रहा था और सुगंधा को भी अपने बेटे को अपनी चूची दिखाने में मजा आ रही थी भले ही ब्लाउज के ऊपर से लेकिन आनंद बेहद प्राप्त हो रहा था,,,। अपनी मां की हरकत से पूरी तरह से मदहोश हो चुका अंकित अपनी मां की चूचियों की तरफ देखते हुए ही बोला,,,)

सच में यह तो एकदम बड़ी-बड़ी नजर आने लगी लाओ में गिठान खोल देता हूं,,,।

नहीं नहीं रहने दे अच्छी लग रही है,,, क्यों सच कह रही हो,,,।

(अब अंकित क्या बोलता वह तो एकदम से हक्का-बक्का रह गया,,, सीधे शब्दों में उसकी मां खुद अपनी ही मुंह से अपनी चूचियों की तारीफ कर रही थी और कोई झूठ तारीफ नहीं कह रही थी वाकई में उसकी चूची इस समय कुछ ज्यादा ही बड़ी और बेहद आकर्षक लग रही थी,,, इसलिए गहरी सांस लेते हुए अंकित भी बोला,,,)

सच में मम्मी बहुत अच्छी लग रही है,,,।

हां तभी तो,,, चलिए सब जाने दे बस पीछे से जरा ब्रा की पट्टी को ब्लाउज की डोरी के नीचे कर देना तो वरना दिखेगी तो खराब लगेगी,,,,(इतना कहने के साथ ही एक बार फिर से सुगंधा आईने की तरफ मुंह करके खड़ी हो गई और अब जिस तरह की बातचीत हुई थी उसके चलते और ब्रा की पट्टी को ठीक करने के नाम से ही अंकित पूरी तरह से अपने बदन में चुदवासा पन महसूस कर रहा था,,,,,, अपनी मां की बात सुनकर एक बार फिर से अंकित की उंगलियां उसकी नंगी चिकनी पीठ को स्पर्श करने लगी और एक औरत के बदन पर उसकी ब्रा की पट्टी को छुने का सुख अंकित प्राप्त करने लगा,,, और अपनी उंगलियों को अपनी मां की ब्रा की पट्टी के नीचे सरका कर वह पट्टी को एकदम ठीक करने हेतु,,, अपनी तरफ खींच जो कि एकदम कसी हुई थी और खींचने की वजह से सुगंधा का बैलेंस एकदम से गड़बड़ क्या और वह एकदम पीछे की तरफ गिरने लगी,,, और उसे संभालने के लिए अंकित तुरंत अपनी बाहों को खोल दिया और पीछे से अपनी मां को अपनी बाहों में ले लिया लेकिन सुगंधा का शरीर थोड़ा गदराया हुआ था जिसके चलते अंकित भी ठीक तरह से अपनी मां को संभाल नहीं पा रहा था और दो-तीन कदम पीछे की तरफ आ गया उसकी मां भी साथ में उसके बाहों में पीछे से उसके ऊपर गिरती हुई और खुद ही बचने की कोशिश करते हुए दोनों बिस्तर के करीब आ गए,,,, लेकिन आखिर में अंकित अपने आप को अपनी मां के भार को संभाल नहीं पाया और बिस्तर पर गिर गया गनीमत थी कि बिस्तर तीन कदम पीछे ही था,,,, इसलिए दोनों बिस्तर पर गिरे वरना नीचे जमीन पर गिर जाते तो दोनों को चोट लग जाती ,,,,,।

इसके बावजूद भी बेहद अद्भुत और मादकता से भरा हुआ नजारा बन चुका था,,, अंकित नीचे था और उसकी मां उसके ऊपर थी,,, पीछे से अपनी मां को बाहों में भरा हुआ था और ऐसे हालात में इसकी भारी भरकम गांड उसके मोटे तगड़े लंड के ऊपर टिकी हुई थी जो की पूरी औकात में आकर खूंटा बना हुआ था,,, पर सीधे-सीधे साड़ी सहित गांड की दोनों फांकों के बीच रास्ता बनाता हुआ,,, उसकी बुर के मुहाने दस्तक दे रहा था,,,,,, जिसका एहसास सुगंधा को एकदम बराबर हो रहा था,,, अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड को साड़ी के ऊपर से ही अपनी बुर पर महसूस करते ही वह पूरी तरह से मचल उठी,,,, एकदम से मदहोश हो गई,,, पहले तो बिल्कुल अपरा तफरी का माहौल था क्योंकि गिरते गिरते बची थी लेकिन जैसे ही उसे एहसास हुआ कि वह बिस्तर पर गिरी है और बच गई है तो राहत की सांस थी लेकिन तभी उसकी यह राहत मदहोशी में बदल गई जब उसे अपनी गांड के बीचों बीच कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ,, और उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी सुगंधा के लिए,,, अनुमान लगाना कोई बड़ी बात नहीं देखी उसकी गांड के बीचों बीच जो चीज चुभ रही है वह क्या है,,, और जब उसे यहां एहसास हुआ कि वह चीज कुछ और नहीं बल्कि उसके बेटे का मोटा तगड़ा लंड है तो यह एहसास ही उसकी बुर को मदन रस से भिगोने लगी वह चारों खाने चित हो चुकी थी,,,।

और यही हाल अंकित का भी था जब उसे भी इस बात का एहसास हुआ कि उसका लंड उसकी मां की गांड के बीचों बीच जाकर कहीं फस गया है तो वह भी एकदम से मदहोश हो गया और वैसे भी वह पीछे से अपनी मां को बाहों में झगड़ा हुआ था और उसे बचाने के चक्कर में अनजाने में उसकी दोनों हथेलियां उसके दोनों खरबुजो पर चली गई थी जिसे वह संभालने के चक्कर में दबा दिया था,,,, और शायद यह एहसास सुगंध को नहीं हो पाया था क्योंकि वह अपनी दोनों टांगों के बीच के एहसास में पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी,,,।

कुछ देर तक दोनों इसी अवस्था में बिस्तर पर पड़े रहे दोनों की सांस ऊपर नीचे हो रही थी दोनों मदहोश हो चुके थे उत्तेजना दोनों के सर पर सवार हो चुकी थी लेकिन जैसे तैसे करके सुगंध अपने आप को संभाली और यह बोलते हुए उठने लगे की,,,, अच्छा हुआ बिस्तर पर गिरे वरना चोट लग जाती,,,।

और फिर दोनों मार्केट की तरफ निकल गए,,,।।

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घर में रोमांच कारी भिड़ंत के बाद मां बेटे दोनों मार्केट के लिए निकल चुके थे,,, वैसे तो अक्सर सुगंधा मार्केट जाने के लिए ऑटो करती थी लेकिन आज वह अपनी बेटी के साथ पैदल ही जाना चाहती थी वह देखना चाहती थी कि उसका बेटा चलते समय उसके मचलते अंगो की तरफ देखता है या नहीं और वैसे भी,,, सुगंधा खुद अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करने में कोई कसर बाकी रखना नहीं चाहती थी,,, कुछ देर पहले कमरे में जो कुछ हुआ था वह बेहद अद्भुत था,,, पहली मर्तबा हिम्मत करके सुगंधा अपने बेटे को अपने ब्लाउज की डोरी बंद करने के लिए पूरी और वैसे भी बरसों बाद वह डोरी वाला ब्लाउज पहन रही थी क्योंकि वह जानती थी की डोरी वाला ब्लाउज में उसकी चिकनी गोरी पीठ कुछ ज्यादा ही दिखाई देती थी और डोरी को कस के बांधने की वजह से चुचियों का आकार कश्मीरी सेब से खरबूजा बन जाता है,,,।

वैसे उसे पक्का यकीन तो नहीं था कि उसके कहने पर उसका बेटा उसके ब्लाउज की डोरी बांधने के लिए कमरे में आ जाएगा लेकिन जिस तरह के हालात दोनों के बीच पैदा हो रहे थे उसे देखते हुए सुगंधा को अपनी चाल पर पूरा भरोसा था क्योंकि वह अपने बेटे में आए बदलाव को अच्छी तरह से समझ रही थी उसके नजरीए को समझ रही थी,,, और इसीलिए उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी सुगंधा को पूरा विश्वास था कि जवान हो चुका उसका बेटा एक औरत के ब्लाउज की डोरी को बढ़ने के लिए जरूर ललाईत होगा और ऐसा ही हुआ,,,, लेकिन जो कुछ भी हुआ उम्मीद से ज्यादा हुआ सुगंध तो सिर्फ अपने बेटे से अपने ब्लाउज की डोरी बंधवाना चाहती थी लेकिन जिस तरह से उसके खुद के पर डगमगाए थे और वह अपने आप को समान नहीं पाई थी उसे संभालने के लिए उसका बेटा उसे हाथ बढ़ाकर जिस तरह से उसे अपनी बाहों में भरा था और नरम-नरम बिस्तर पर गिरा था ऐसी हालत में उसे अपनी गांड के बीचो-बीच अपने बेटे का मर्दाना खुंटा गजब का चुभता हुआ महसूस हो रहा था जो कि सीधे उसकी बुर पर दस्तक दे रहा था वह मंजर वह पल सुगंधा के जीवन का अद्भुत फल था बरसों बाद किसी मोटे तगड़े लंड को अपनी गांड के बीचों बीच महसूस कर रही थी उसकी गर्मी को अपनी बुर के अंदरूनी भाग में महसूस कर रही थी जिसकी वजह से उसकी बुर पसीज रही थी,,, सुगंधा कमरे में ही चारों खाने चित हो चुकी थी अगर उसका बेटा जरा भी होशियार होता तो कमरे में ही उसकी बुर का उद्घाटन कर देता,,,, और जिसमें सुगंध को जरा भी एतराज नहीं होता,,,,।

धीरे-धीरे इस खेल में सुगंधा को बहुत मजा आ रहा था,,, तालाब के पानी की तरह शांत हो चुकी जिंदगी को मानो जैसे नदी में प्रवेश करने का मौका मिल गया हो और वह नदी की तरह उछलती कूदती बांहें फैलाए आगे बढ़ती चली जा रही थी,,, यही तो चाहिए था सुगंधा को यही सुख था जिसे वह ढूंढ रही थी,,, यह वही सुगंधा थी जो अपने अरमानों को पर लगाकर आसमान में उड़ जाना चाहती थी लेकिन पति के देहांत के बाद ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके पर कट गए हो,,, लेकिन अब ऐसा लग रहा था कि अंकित की वजह से उसे नए पर उग आए हो,,,,।

मार्केट जाते समय सड़क के फुटपाथ पर सुगंधा आगे आगे चल रही थी और तकरीबन 2 मीटर पीछे अंकित चल रहा था,,, जब इस तरह की माहौल घर में नहीं थे मां बेटे के बीच इस तरह का आकर्षण नहीं था तो अक्सर अंकित अपनी मां के बराबर चलता था और खुद सुगंधा ही उसे अपने बराबर लेकर चलती थी,,, लेकिन दोनों की नजरिए में बदलाव आ चुका था,, दोनों का एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था दोनों रिश्तो में मां बेटे सिर्फ दूसरों के लिए रह गए थे दोनों के रिश्ते बदल चुके थे,,एक मर्द बन चुका था और दूसरी औरत बन चुकी थी,,, दोनों एक दूसरे में प्रेमी प्रेमिका ढूंढ रहे थे जो कि पति-पत्नी की तरह एक दूसरे के शरीर से सुख प्राप्त करना चाहते थे अपनी जवानी की गर्मी को बुझाना चाहते थे और ऐसे हालात में दोनों के पास दोनों के सिवा और कोई दूसरा चारा भी नहीं था,,, दोनों के मन में अंदर ही अंदर सब कुछ परिपूर्ण हो चुका था बस देर थी आगे बढ़ने की मर्द और औरत के बीच के रिश्ते को आगे बढ़ाने की,,, दोनों बढ़ाना भी चाहते थे लेकिन कैसे यह दोनों को नहीं मालूम था लेकिन दोनों अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे थे ज्यादातर कोशिश सुगंधा की तरफ से ही हो रही थी तभी तो वह अपने बेटे को राहुल के पास भेजी थी ताकि राहुल से कुछ सीख पाता और उसका यह नुस्खा कुछ हद तक काम करने लगा था,,,

प्राकृतिक तौर पर अपनी मां के पीछे चलते हुए अंकित की नजर बार-बार अपनी मां की गांड की तरफ ही जा रही थी जो की चलते समय अद्भुत तरीके से लहरा रही थी और वैसे भी उसकी मां ने कुछ ज्यादा ही करके साड़ी बांधी हुई थी जिसकी वजह से गांड की दोनों फांकें बड़े-बड़े तरबूज की तरह बाहर निकली हुई नजर आ रही थी,,, अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड देखकर अंकित के लंड में हरकत होने लगती थी,,। वह अपने मन में सोचने लगता था कि काश इतनी बड़ी-बड़ी गांड उसके हाथों में होती तो कितना मजा आता,,, वह बड़ी-बड़ी गांड से बहुत प्यार करता है अपनी जीभ से चाटता चुंबन लेता उस पर अपना लंड रगड़ता,,, हर वह चीज करता जो एक मर्द औरत के अंगों से करता है उसकी गांड के साथ करता है,,,, सड़क पर चलते समय आते जाते अंकित ने बहुत सी औरतों को देखा था कपड़ों में उनके अंगों को देखा था लेकिन जिस तरह का उपहार उसे अपनी मम्मी की गांड में नजर आती थी उसे तरह का उभार उसने अभी तक किसी औरत में नहीं देखा था कुछ हद तक उसे नूपुर में अपनी मां का अक्स नजर आता था,,, क्योंकि उसकी भी कद काठी उसकी मां की ही तरह थी,,, लेकिन फिर भी नूपुर उसकी मां से उन्नीस ही थी,,,।

अपनी मां के भरावद्दार नितंबों को देखते-देखते उसकी नजर अपनी मां की चिकनी पीठ पर गई और उसकी डोरी पर गई जिसे वह खुद अपने हाथों से बांधा था,, उसे अब एहसास हो रहा था इस ब्लाउज में उसकी मां की चोरी की एकदम साफ नंगी नजर आ रही थी क्योंकि डोरी वाले ब्लाउज में पीछे से ज्यादा कपड़ा नहीं था केवल पतली सी डोरी थी और उसे ब्रा की पट्टी भी साफ नजर आ रही थी ,, जिसे ब्लाउज के डोरी के नीचे छुपाने के चक्कर में ही,,, वह दोनों बिस्तर पर गिर गए थे,,, अंकित को वह पल पूरी तरह से किसी मूवी के दृश्य की तरह याद था उसे अच्छे से याद था कि उसके ऊपर उसकी मां पूरी तरह से लदी हुई थी,,, इसकी भारी भरकम गांड ठीक उसकी दोनों टांगों के बीच आ चुकी थी,,, अद्भुत अवस्था थी एक तरह का यह आसान ही था जिसमें औरत अपनी गांड रखकर मर्द के लंड पर बैठ जाती और नीचे से मर्द का लंड उसकी बुर की गहराई नापने लगता है,,, अंकित इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि किस तरह से उसकी मां उसके ऊपर थी उन दोनों की अवस्था में केवल कपड़े ही बड़ा रूप थे अगर दोनों के बदन पर कपड़े ना होते तो उसे समय उसका लंड उसकी मां की बुर में होता ,,,, और उसे तो इस बात का अहसास तक हुआ था कि उसका लंड उसकी मां की गांड के बीचों बीच धंसा हुआ है,,,,।

इस अवस्था की वजह से पल भर में ही पूरे बदन का लहू अंकित की जननांगों में इकट्ठा हो गया,,, और उसकी सांसे ऊपर नीचे हो गई उसे तब जाकर एहसास हुआ कि वाकई में औरतों की जंननांगो और उनके नितंबों के उभार में कितनी गर्मी होती है क्योंकि अंकित पसीने से तरबतर हो चुका था। , और वही गर्मी का एहसास अंकित को इस समय हो रहा था अपनी मां के पीछे चलते-चलते सुगंधा बार-बार चलते हुए पीछे मुड़कर देख ले रही थी अपने बेटे की तरफ की उसका बेटा क्या देख रहा है और उसे इस बात का अहसास होते ही की उसका बेटा उसके नितंबों की तरफ ही देख रहा है इस एहसास से वह अंदर ही अंदर सिहर जाती थी,,,।

अभी मार्केट थोड़ी दूरी पर था फुटपाथ की दूसरी तरफ जंगल झाड़ी था और काफी दूर तक ढलान था जिसके अंदर जंगली झाड़ियां उगी हुई थी,,, वहीं पर पेड़ के पास एक आदमी खड़े होकर पेशाब कर रहा था और वह आदमी सुगंधा की नजर में चढ़ गया सुगंधा की नजर अनजाने में ही उसकी तरफ चली गई थी और सुगंधा उसे आदमी को पेशाब करते हुए देखने लगी हालांकि वह सहज रूप से चलते हुए ही अपनी नजर को उस तरफ की हुई थी और यह भी वह जानबूझकर ही कर रही थी वह अपने बेटे को दिखाना चाहती थी कि वह मर्दों को पेशाब करते हुए देखने में कितनी उत्तेजना का अनुभव करती है,,,, अंकित को उसे आदमी पर बहुत गुस्सा आ रहा था जो इस तरह से सड़क के किनारे खड़ा होकर पेशाब कर रहा था,,, हालांकि वह जिस तरह से खड़ा था उसका लंड नजर नहीं आ रहा था बल्कि छिपा हुआ था और उसकी इतनी लंबाई भी नहीं थी कि इस अवस्था में दूर से भी दिखाई दे इस बात की खुशी अंकित को जरूर थी क्योंकि अब वह नहीं चाहता था कि उसकी मां किसी दूसरे की तरफ देखें और देखते ही देखते दोनों आगे निकल गए,,,,।

वैसे तो हमेशा ही जब दोनों मां बेटे मार्केट की तरफ जाते थे तो आपस में बातें करते हुए जाते थे लेकिन इस समय दोनों के मन में कुछ और था अंकित अपनी मां को चलते हुए देख रहा था उसके नितंबों के कटाव को देख रहा था उसके उभार को देख रहा था उसकी पतली कमर के बीच की पत्नी लकीर को देख रहा था उसके ब्लाउज की कटिंग के साथ-साथ उसकी उघरी हुई पीठ को देख रहा था,,, और सुगंधा अपने आप को अपने बेटे को दिखाने में व्यस्त थी इसलिए दोनों के बीच किसी भी प्रकार की वार्तालाप नहीं हो रही थी लेकिन दोनों के बीच की खामोशी भी बहुत कुछ कह रही थी,,,,,।

मां बेट दोनों अपनी ही धुन में मार्केट की तरफ आगे बढ़ते चले जा रहे थे सड़क पर वाहनों का आवागमन चालू ही था और आते जाते सबकी नजर उसकी मां पर जरूर पड़ रही थी और इस बात का भी भान अंकित को अच्छी तरह से था लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था,,,, ऐसे ही ठीक उसके पीछे कब दो आदमी उससे थोड़ा फीट की दूरी पर चलने लगे उसे पता ही नहीं चला वह अपनी मां की चाल ढाल को देखने में ही व्यस्त था,,, तभी उसके कानों में जो बात सुनाई थी उसे सुनकर उसके होश उड़ गए जो कि उसके साथ चल रहे हैं दोनों आदमियों में से एक ने बोला था,,,।

बाप रे देख रहा है क्या औरत है इसका बदन कितना गदराया हुआ है,,,(इतना सुनते ही अंकित इधर-उधर देखने लगा लेकिन आगे चल रही है अपनी मां के सिवा और कोई औरत आसपास नहीं थी इसलिए वह समझ गया कि यह आदमी उसकी मां के बारे में ही बोल रहा हूं हालांकि उसे गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन राह चलते किसी भी व्यक्ति से इस तरह से उलझ जाना उचित नहीं था,,,, तभी दूसरे आदमी की आवाज उसके कानों में पड़ी,,,)

यार कसम से इतनी गोरी औरत तो मैं आज तक नहीं देखा ऊपर से नीचे तक मलाई है जब ऊपर से इसका वजन इतना गोरा है तो इसकी बुर कितनी गोरी होगी ,,

अरे यार औरतों की बुर गोरी नहीं काली होती है,,(दूसरे आदमी ने बोला)

अरे वह तो दूसरी औरतों की होती होगी लेकिन मक्खन मलाई जैसी औरत की बुरे तो एकदम गोरी होती होगी कम से इसकी बर देखने के लिए तो मेरा मन तड़प रहा है साली का गांड का छेद भी कितना मस्त होगा,,,।

हां यार तू सच कह रहा है देख नहीं रहा है कैसा गांड मटका के चल रही है इसकी गांड देखकर तो ऐसा ही लगता होगा कि 5-10 मिनट में इसका कुछ पता नहीं होगा कम से कम एक घंटा तक जमकर चुदाई होती होगी तब जाकर इसकी प्यास बुझती होगी,,,।

(उन दोनों आदमियों की बातें सुनकर तो अंकित के काम के साथ-साथ उसका लंड भी खड़ा हो गया था वह दोनों उसकी मां के बारे में बातें कर रहे थे उसकी जवानी के बारे में बात कर रहे थे उसके खूबसूरत जिस्म के बारे में बात कर रहे थे और दोनों अपनी अपनी राय दे रहे थे हालांकि शुरू में अंकित को बहुत गुस्सा आया लेकिन एक तरह से वह दोनों उसकी मां की जवानी की तारीफ कर रहे थे इसलिए ना जाने की उसे अपनी मां के बारे में इस तरह की अश्लील बातें सुनने में आनंद आने लगा,,,, तभी दूसरा वाला आदमी बोला)

कसम से इसको देखते ही मेरा लंड खड़ा हो गया अभी तो किस्मत ही बेकार है हमारे घर ऐसी औरत होती तो,,, घर छोड़कर कहीं जाने का मन ही नहीं करता,,,

मैं तो दिन रात उसकी बुर में लंड डालकर पड़ा रहता,,,

जो भी इसकी लेट होगा वह दुनिया का सबसे खुशकिस्मत वाला आदमी होगा जिसे यह देती होगी अपनी टांगें खोलकर अपनी बड़ी-बड़ी चूची पिलाती होगी,,,,।

अरे यार ऐसी बातें मत करनी तो मेरा यही पानी छूट जाएगा,,,

मेरा भी तो यही हाल है अब घर पर जाकर बीवी की चुदाई करनी पड़ेगी जो कि इसके पैर की धूल के बराबर भी नहीं है,,,

सही कह रहा है तू तू तो खर्च कर अपनी बीवी को छोड़ने का लेकिन मुझे तो हाथ से हिला कर ही काम चलाना पड़ेगा,,,

क्यों क्याहुआ,,, भाभी देती नहीं है क्या?

अरे ऐसी बात नहीं है वह अपने मायके गई हुई है अपने भैया से गांड मरवाने इतना बोला कि मत जा मेरा मन तेरे बिना नहीं मानता लेकिन मानी नहीं और अपने भाई से गांड मरवाने चली गई,,

वह सब छोड़ अगर यह औरत साड़ी उठाकर सिर्फ अपनी बुर दिखा दे तो भी मैं हजार रुपया देने को तैयार हूं,,,।

तू तो हजार रुपया देने को तैयार है मैं तो महीने भर की तनख्वाह देने को तैयार हूं बस यह साड़ी उठाकर अपनी बुर के दर्शन कर दे क्योंकि मैं देखना चाहता हूं कि इस तरह की हाई क्लास औरत की बुर कैसी दिखती है,,,

सही कह रहा है तू अपनी जिंदगी में तो बस गांव की वही गवार औरत ही लिखी है ऐसी पढ़ी-लिखी अंग्रेज टाइप की औरत के बारे में सिर्फ सोच सोच करें पानी निकालना ही किस्मत है,,,।

(वह दोनों की बातें सुनकर अंकित के तन बदन में उत्तेजना के लहर उठ रही थी उसका पूरा बदन से लग रहा था उसे समझ में आ गया था कि उसकी मां की जवानी देखकर सब लोग यही सोचते हैं रहते हैं लेकिन वह हैरान था कि वह दोनों उसके इतने पास में होने के बावजूद भी इस तरह की बातें आपस में कर रहे थे तभी उसे ख्याल आया कि उन दोनों को क्या मालूम कि मैं उसका बेटा हूं वरना इस तरह की बातें नहीं करते लेकिन अच्छा ही होगा कि वह दोनों की बातें बहुत सुन लिया उसे पता तो चल गया कि उसकी मां कितनी जवानी से भरी हुई और एकदम सेक्सी है,,, उसे इस बात का गर्व भी हो रहा था कि उसकी मां की जवानी देखकर उन दोनों का लंड खड़ा हो गया था,, । अंकित अपने मन में सोच रहा था कि अगर सच में उसकी मां 1 घंटे के लिए भी दोनों को मिल जाए तो 1 घंटे में दोनों उसकी मां की बुर का भोसड़ा बना देंगे इस तरह से पागल हो गए दोनों देखकर,,,, अभी उन दोनों की बातें और सुन पता था इससे पहले ही मार्केट आ चुका था और लोगों की भीड़भाड़ बढ़ने लगी थी,,,,)

कौन-कौन सी सब्जी लेना है मम्मी,,,

चल अंदर देखु तो सही,,,।

(इतना कहकर दोनों मार्केट के अंदर की तरफ जाने लगे क्योंकि अंदर की तरफ अच्छी-अच्छी सब्जियां मिलती थी और एक सब्जी के ठेले पर खड़ी होकर वह,,, भिंडी खरीदने लगी,,, अंकित को सब्जी के बारे में कुछ ज्यादा मालूम नहीं पड़ता था इसलिए वह खड़ा होकर इधर-उधर मार्केट देखने लगा,,, जिस ठेले पर उसकी मां सब्जी खरीद रही थी तीन-चार औरतों और भी थी उसी ठेले पर थी तभी एक आदमी पीछे चाहे और एकदम से उसकी मां के पीछे से सट गया और भिंडी वजन करने के लिए बोलने लगा,,, सुगंधा एकदम से चौंक गई क्योंकि वह आदमी सीधे-सीधे उसके नितंबों से सट गया था,,, तभी वह एकदम से पीछे घूम कर देखी और आदमी एक तरफ हो क्या लेकिन इतने में वह अपना काम कर चुका था अपनी अभिलाषा पूरी कर चुका था दूर से ही वह सुगंधा की खूबसूरत बदन को देख रहा था मानो कि जैसे कोई भंवरा खूबसूरत कली के पीछे-पीछे आ गई हो उसका रस चूसने के लिए उसी तरह से वह आदमी भी सुगंधा की मदहोश कर देने वाली जवानी को देखकर अपने लंड को सुगंधा की गांड पर रगड़ खाने की लालच को रोक नहीं पाया और एकदम से आकर उससे सट गया था सुगंधा को भी अपने नितंबों पर,,, उसके सटने का एहसास हुआ था तभी तो गुस्से से पीछे मुड़कर देखने लगी थी और आदमी एकदम से पीछे हट गया था,,,

अंकित भी सब कुछ देख रहा था लेकिन कुछ कर सकते की स्थिति में नहीं था वह उसे आदमी पर क्रोधित हुआ जरूर था लेकिन कुछ बोल नहीं पाया था और बोलना भी क्या बोलना क्या एग्जाम लगा था उसे यह कहता है कि तू उसकी मां के बदन से क्यों चढ़ गया क्यों अपने लंड को उसकी गांड से रगड़ाया रगडाया ,, उसके इस तरह के इल्जाम से वह खुद और उसकी मां हंसी के पात्र बन जाते क्योंकि भीड़भाड़ में थोड़ा बहुत सटना सटाना हो ही जाता है इसलिए वह खामोश है कुछ बोल नहीं पाया,,,,,।
 
भिंडी खरीद लेने के बाद तीन-चार सब्जिया और सुगंधा ने खरीद ली,,, सुगंधा चाहती थी की राहुल की तरह उसका बेटा भी उसके नितंबों पर हाथ रखें उसे महिलाएं लेकिन शायद उन दोनों के बीच राहुल और नूपुर की तरह खुला हुआ रिश्ता अभी नहीं बना था,,, सब्जी खरीद लेने के बाद सुगंधा नाश्ते की दुकान पर गई और समोसे और जलेबियां पैक करवाने लगी,,, अंकित कुछ बोल नहीं पा रहा था क्योंकि आज जो कुछ भी हो रहा था वह पूरी तरह से अंकित को स्तब्ध कर दिया था हालांकि सुगंधा भी पूरी तरह से मदहोश थी लेकिन फिर भी अपने आप को सहज बनाए हुए थी ज्यादातर हैरान दो अजनबी आदमियों की आपस में उसकी मां को लेकर बातचीत ने कर दिया था उन दोनों के विचार उसकी मां के प्रति कितने गंदे थे या फिर उसकी मां की तरह खूबसूरत औरत उन दोनों ने कभी देखा ही नहीं था इसलिए उन दोनों के मन की वासना एकदम से उनके होठों पर आ गई थी जो शब्द के जरिए बाहर निकल रही थी और उनकी बातों को सुनकर अंकित का भी बुरा हाल था,,,,।

तीन-चार दिन की सब्जियां तो हो गई,, और उसके बाद तो बाद में देखा जाएगा,,,,(हाथ में थैला लेकर मार्केट से बाहर निकलते हुए सुगंधा बोली,,,, तभी उसकी नजर केले के ठेले पर गई,,,, और इस समय अंकित की भी नजर केले के ठेले पर गई और अंकित केले के ठेले पर जाकर खड़े होकर केले को हाथ में लेकर देखने लगा जो की काफी छोटा था यह देखकर सुगंध बोली,,,)

ठीक नहीं है बेटा देख नहीं रहा कितना छोटा-छोटा और पतला सा है,,,।

हां सच कह रही हो मम्मी ,,, रहने दो,, (और इतना कहकर दोनों खेल से आगे हो गए और सुगंधा चलते हुए बोली)

केला हो तो मोटा मोटा और एकदम लंबा,,,(सुगंधा बात भले ही केले की कर रही थी लेकिन उसका इशारा दूसरी तरफ था और केले का जिक्र होते ही उसके मोटाई का जिक्र होते ही अंकित भी अपना ध्यान बात की दूसरी तरफ ले गया,,, सुगंधा अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) और उस पतले केले को तो मुंह में ले,,,,(इतना कहने के साथ ही वह तुरंत अपने शब्दों को बदलते हुए बोली) मेरा मतलब है खाने में पता ही नहीं चलेगा कि केला खाए हो,,, अकेले को हमेशा मोटा और लंबा होना चाहिए ताकि एकदम से मन भर जाए एक ही बार में मन भर जाए,,,(यह बोलते समय उसके चेहरे के भाव ऐसी लग रहे थे मानो वाकई में वह बिस्तर पर टांग फैलाए लेटी हुई है और उसकी गुलाबी पुरानी उसके बेटे का मोटा तगड़ा लंड घुसा हुआ है अपनी मां की यह बात सुनकर उसके कहने के मतलब को अंकित अच्छी तरह से समझ गया था,,, इसलिए वह भी हामी भरता हुआ बोला,,)

सही कह रहे हो मम्मी मोटा और लंबा केला की सबसे ज्यादा सुख देता है,,, मतलब की भूख मिटाता है,,,।

(अपने बेटे के मुंह से ज्यादा सुख देता है शब्द सुनकर सुगंधा भी समझ गई थी कि उसके बेटे के कहने का मतलब क्या है और मन ही मन प्रसन्न होने लगी,,, मार्केट से वापस लौटते समय अंधेरा होने लगा था और स्ट्रीट लाइट जगमगाने लगी थी,,, मां बेटे दोनों इस जगह पर पहुंच गए थे जहां पर ढलान था और जंगली झाड़ियां होगी हुई थी यहां पर फुटपाथ पर आवा गमन भी बहुत कम था,,,, अब तक जो कुछ भी हुआ था उसे लेकर सुगंधा के तन बदन में आग लगी हुई थी वह किसी तरह से अपने बेटे को अपने अंग को दिखाना चाहती थी और भी बिना कपड़ों के,, इसलिए धीरे-धीरे चलते समय जब वहां घनी झाड़ियां वाली जगह पर एकदम बीचो-बीच आ गई और चारों तरफ देखकर अंदाजा लगा ली कि अभी कोई आ नहीं रहा है तो वह उसी जगह पर खड़ी हो गई,,, और इधर-उधर देखने लगी अपनी मां को इस तरह से बीच रास्ते में कड़ी होता देखकर और इधर-उधर देखा हुआ पाकर आश्चर्य से अंकित बोला,,,)

क्या हुआ मम्मी यहां क्यों खड़ी हो गई ,,

अरे मुझे बड़ी जोरों की पेशाब लगी है,,,(इधर-उधर देखते हुए सुगंधा बोली लेकिन अपने बेटे के सामने जोड़ों की पेशाब वाली बात करके शर्म के मारे उसका चेहरा भी लाल हो गया था और यह बात सुनकर अंकित के लंड में हरकत होना शुरू हो गया था पहली बार उसकी मां खुले शब्दों में उसे पेशाब करने की बात कर रही थी हालांकि अपनी मां को घर के पीछे वह पेशाब करते हुए देख चुका था,, लेकिन अनजाने में उसकी मां को यह नहीं मालूम था कि उसका बेटा देख रहा है,,, ऐसा मानना अंकित का था लेकिन उसकी मां को सब पता था,, लेकिन इस समय मां बेटे दोनों के बदन में उत्तेजना के लिए रुकने लगी थी पेशाब करने के बहाने साड़ी उठाकर सुगंध अपने बेटे को अपनी गांड के दर्शन करना चाहती थी क्योंकि जिस तरह की उत्तेजना उसके तन बदन में हो रही थी वह किसी भी तरह से अपने बदन की सबसे स्वरूप वान और आकर्षक वाले अंग को दिखाना चाहती थी,,, अंकित के मन में भी अपनी मां को पेशाब करते हुए देखने की इच्छा जगने लगी और वह भी इधर-उधर देखते हुए बोला,,,)

यहां कैसे कर पाओगी मम्मी,, यहां तो कोई भी आ सकता है,(इधर-उधर देखते हुए अंकित बोला,,)

मैं जानती हूं लेकिन अभी कोई नहीं आ रहा है ले जल्दी से थैला पकड़ मैं जल्दी से निपट कर आ जाती हूं,,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा अपने हाथ में लिया हुआ था ना अंकित को थमाने लगी और अंकित भी जल्दी से अपनी मां के हाथ में से थेले को थाम लिया,,, पर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली) कोई इधर ना आने पाए,,

ठीक हैमम्मी,,, (और इतना कहने के साथ है अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा और सुगंध स्टेट लैंप के खंभे के सामने ही ढलान की तरफ जाने लगी वह ऐसी जगह जा रही थी जहां से अंकित उसे बड़े आराम से देख सके,,, सुगंधा का भी दिल जोरों से धडक रहा था,, बाथरूम वाली हरकत के बाद यह उसकी दूसरी हरकत थी जो अपनी तरफ से करने जा रही थी,,, अंकित बार-बार अपनी मम्मी की तरफ तो कभी फुटपाथ की तरफ देख ले रहा था कि कहीं कोई यहां तो नहीं रहा है और अपने मन में वह भी प्रार्थना कर रहा था कि इस समय कोई ना आए ताकि वह अपनी मां की नंगी गांड को आराम से देख सके और ऐसा ही हो रहा था दूर-दूर तक से कोई नजर नहीं आ रहा था बस सड़क पर से गाड़ी आ जा रही थी,,,।

देखते ही देखते आंठ दस कदम की दूरी पर जाकर सुगंधा खड़ी हो गई,,, उसकी पीठ अंकित की तरफ थी क्योंकि वह अपने बेटे को अपनी गांड दिखाना चाहती थी और इधर-उधर देखते हुए अपनी साड़ी को हाथ में पकड़ ली और जल्दी से उसे एक झटके से कमर तक उठा दी,,, और साड़ी के कमर तक उठते ही उसकी नंगी गांड एकदम से सामने नजर आने लगी लालटेन की पीली रोशनी में एकदम चमक रही थी,,, अंकित एकदम से हैरान हो गया अपनी मां की नंगी गांड देखकर तो हैरान था ही लेकिन साड़ी के उठते ही अपनी मां की संपूर्ण नंगी गांड को देखकर और इस बात से हैरान था कि उसकी मां साड़ी के नीचे चड्डी नहीं पहनी थी,,,, साड़ी के अंदर वह पूरी तरह से नंगी थी और यह एहसास होते ही उसका दिल जोरो से धड़कने लगा ,, और सुगंधा वहीं खड़े-खड़े एक नजर पीछे की तरफ घूमर अंकित की तरफ अच्छी और अंकित को अपनी तरफ देखता हुआ पाकर एकदम से उत्तेजना से भर गई,,, और तुरंत बैठ गई पेशाब करने के लिए और उसकी बुर से सरसरा कर धार निकलने लगी,,,,

कुछ ईस तरह से

पेशाब करने के लिए बैठने के बाद भी सुगंधा पीछे की तरफ देख रही थी अंकित अपनी मां की तरफ ही देख रहा था दोनों की नजर आपस में टकराई और दोनों एकदम से शर्म से पानी पानी हो गए अंकित शर्मिंदा होने के बावजूद भी अपनी मां की नंगी गांड पर से अपनी नजर को हटा नहीं पा रहा था अगर नजर हटा भी रहा था तो यह देखने के लिए कि कहीं कोई यहां तो नहीं रहा है लेकिन उसकी किस्मत बहुत तेज थी इस समय फुटपाथ पर से उस ओर कोई नहीं आ रहा था,,,, जी भर के पेशाब करने के बाद और जी भर कर अपनी मां की नंगी गांड देखने के बाद सुगंध तुरंत खड़ी हुई और साड़ी के किनारे को कमर पर से नीचे छोड़ दी और एक खूबसूरत नाटक पर पर्दा गिर गया,,, करो मुस्कुराते हुए अंकित की तरफ आने लगी,,, ।

अंकित के पास पहुंचते हैं उसके हाथ से एक थाला अपने हाथ में ले ली और मुस्कुराते हुए बोली,,,।

(अच्छा हुआ कोई आया नहीं नहीं तो मैं कर भी नहीं पाती,,,)

सही कह रही हो मम्मी,,,,।

(इससे ज्यादा अंकित कुछ कह नहीं पाया और अपने बेटे के हाथ में से ठेला लेते हुए उसकी नजर अपने बेटे के पेट के आगे वाले भाग पर पड़ गई थी जिसमें अच्छा खासा तंबू बना हुआ था और वह मन ही मन प्रसन्न होने लगी अंकित के मन में ढेर सारे सवाल थे साड़ी के उड़ने ही अपनी मां की गांड को ढकने वाली पेंटिं को न पाकर वह हैरान हो रहा था,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां आज पेंटिं क्यों नहीं पहनी,,, वह अपनी मां से यह सवाल पूछना चाहता था लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी और दूसरी तरफ साड़ी के नीचे चड्डी ना पहने की युक्ति सुगंधा की ही थीवह अपने मन में ठान कर आई थी कि आज अपने बेटे को रास्ते में किसी भी तरह से अपनी गांड के दर्शन कराएगी और इसीलिए वह चड्डी नहीं पहनी थी क्योंकि वह जानती थी चड्डी पहनने पर उसे उतरते समय दिक्कत होगी और वह सब कुछ जल्दी जल्दी निपटाना चाहती थी इसलिए चड्डी नहीं पहनी थी,,, थोड़ी देर में दोनों घर पर पहुंच गए थे।)

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मार्केट से आते समय जो कुछ भी हुआ था वह बेहद मनमोहक और उन्मादीकता से भरा हुआ था अंकित कभी कल्पना भी नहीं किया था कि यू रास्ते में चलते समय उसे अपनी मम्मी की नंगी गांड देखने को मिल जाएगी,,,, जो कुछ भी हुआ था उससे बहुत कुछ दोनों की जिंदगी में बदलने वाला था,,,, घर पर पहुंचने तक दोनों में से किसी ने एक दूसरे से बात तक नहीं किया था क्योंकि बात करने को बचा ही कुछ नहीं था एक तरह से सुगंधा अपनी कामुक हरकत से अपने बेटे का मुंह बंद कर दी थी,,,।

घर पर पहुंचने पर भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे हालांकि सुगंध मन ही मन मुस्कुरा रही थी क्योंकि रास्ते में उसने अपने मन की जो कर ली थी जानबूझकर उसने साड़ी के अंदर चड्डी नहीं पहनी थी क्योंकि यह उसके काम यंत्र का ही भाग था जैसे लोग दूसरों को फसाने के लिए षड्यंत्र रास्ते हैं इस तरह से सुगंधा अपने बेटे को अपनी जवानी के जाल में फंसने के लिए काम यंत्र रची थी जिसमें वह सफल हो चुके थे वह जानती थी उसे किस जगह पर अपनी जवानी का बाण चलाना है,,, उसे जगह को वहां अच्छी तरह से जानती थी पहचानती थी और यह भी जानती थी कि शाम ढलते ही वहां पर लोगों का आना जाना बहुत ही कम हो जाता है,,, और इसी का फायदा उठाते हुए उसने उसे स्थान को चुनकर अपने बेटे को पूरी तरह से अपनी आकर्षक के जाल में फांस ली थी,, या यूं कह लो कि वह अपने ही बेटे को अपनी जवानी का गुलाम बना ली थी,,,,

एक औरत होने के नाते और उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच जाने पर सुगंधा में भी मर्दों को पहचानने की कला अच्छी तरह से थी वह मर्दों की फितरत से अच्छी तरह से वाकिफ थी जिसमें से उसका खुद का बेटा भी बाकात नहीं था क्योंकि उसका बेटा भी आखिरकार था तो एक मर्द ही,,,, फुटपाथ के नीचे ढलान वाली जगह पर पहुंचकर वह अपने बेटे को बराबर नजर पीछे करके देख ले रही थी क्योंकि वह जानती थी कि जब तक उसका बेटा उसकी तरफ देखेगी नहीं तब तक उसकी यह क्रियाकलाप फूटी कौड़ी की भी नहीं थी उसकी क्रियाकलाप में चार चांद तभी लग जाता जब उसका बेटा उसे प्यासी नजरों से देखा और ऐसा ही हो रहा था,,,, जब सुगंधा को इस बात का एहसास हुआ कि उसका बेटा उसी की तरफ देख रहा है उसकी नंगी गांड को देख रहा है तो वह अंदर ही अंदर मदहोश हो रही थी उत्तेजित हो रही थी,,,।

घर पर पहुंच कर सुगंधा खाना बनाने के काम में जुट गई थी,,, तृप्ति भी घर पर हाजिर थी और वह भी सब्जी काटने में अपनी मां की मदद कर रही थी,,, सुकांत जो कुछ भी अपने बेटे की आंखों के सामने की थी उसके बारे में सोचकर अंदर ही अंदर प्रसन्न और उत्तेजित हो रही थी,,, और दूसरी तरफ अंकित अपने कमरे में बिस्तर पर बैठकर अपनी मां के बारे में सोच रहा था उसकी हरकत के बारे में सोच रहा था,,, उसे जहां अपनी मां की हरकत बेहद उत्तेजित कर देने वाली लग रही थी वही वह अपनी मां की हरकत से परेशान भी था उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वाकई में उसकी मां अनजाने में ही औपचारिक रूप से पेशाब करने बैठ गई थी या इसमें उसकी तरफ से कोई साजिश थी क्योंकि जितनी दूरी पर उसकी मां जाकर पेशाब करने बैठी थी उसकी मां को भी मालूम था कि इतनी दूर से उसका बेटा सब कुछ देख रहा होगा और ऐसे हालात में वह एकदम खुले में बैठी थी ना कि किसी झाड़ियों के पीछे जहां से उसे कुछ दिखाई ना दे लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था,,, उसकी मां एकदम खुले में बैठकर पेशाब कर रही थी जहां से वह सब कुछ देख रहा था और यही बात तो उसे हैरान कर देने वाली लग रही थी और उससे भी ज्यादा हैरान कर देने वालीं बात यह थी कि उसकी मां चड्डी नहीं पहनी थी जबकि अंकित को इस बारे में अच्छी तरह से पता था कि ज्यादा नहीं तो उसकी मां के पास चार-पांच चड्डी जरूर है और इसके बावजूद भी मार्केट जाते समय,,, उसकी मां चड्डी क्यों नहीं पहनी,,,, जहां एक तरफ अंकित अपनी मां की चड्डी वाली बात से हैरान था वही अपनी मां की चड्डी वाली बात से उत्तेजित भी था,,,।

रास्ते भर वह अपनी मां की हरकत के बारे में ही सोच रहा था और अपनी मां से चड्डी वाली बात करना चाहता था और पूछना चाहता था कि उसकी मां साड़ी के नीचे चड्डी क्यों नहीं पहनी थी लेकिन इस तरह के सवाल करने की हिम्मत अभी उसमें नहीं थी,,,, लेकिन अपनी बिस्तर पर बैठे-बैठे वहां कल्पना में ही अपनी मां से चड्डी के बारे में सवाल जवाब कर रहा था,,,।

क्या मम्मी तुम भी,,, तुम्हारे पास इतनी सारी चड्डीया है फिर भी तुम साड़ी के नीचे चड्डी नहीं पहनती हो,,,

किसने कह दिया तुझसे,,,

अब ऐसा कौन कहेगा मैं जानता हूं,,,

तू कैसे जानता है तो क्या मुझे कपड़े पहनते हुए देखता है क्या,,?(मुस्कुराते हुए सुगंधा बोली)

कपड़े पहनते हुए नहीं देखता हूं लेकिन मार्केट से आते समय जब तुम पेशाब करने के लिए फुटपाथ के नीचे उतर कर गई थी,,,

तो,,,, इसमें क्या हो गया रास्ते में आते जाते समय बहुत सी औरतों को पेशाब लग जाता है तो वह लोग भी यही रास्ता अपनाती है,,,,(एकदम सहज होते हुए सुगंधा बोली,,,)

अरे मैं यह नहीं कह रहा हूं,,, मेरा मतलब है कि तुम जब साड़ी कमर तक उठाई थी तो मेरी नजर तुम पर पड़ गई थी और मैंने देखा कि तुम साड़ी के अंदर चड्डी नहीं पहनी थी,,,।

(ऐसा सुनते ही अंकित के कल्पना में ही उसकी मां एकदम से हैरान होते हुए बोली)

बाप रे तू समय तू मेरी तरफ देख रहा था तुझे शर्म नहीं आई,,,

इसमें शरम कैसी मेरी नजर तो अपने आप ही तुम्हारे पर चली गई थी और तुम जब साड़ी कमर तक उठे तो तुम छुट्टी नहीं पहनी थी तुम्हारी नंगी गांड एकदम साफ दिखाई दे रही थी बड़ी-बड़ी,,,

हाय दैया कैसी बातें कर रहा है तु,,, क्या सच में मेरी गांड बड़ी-बड़ी है,,,,

हां,,,,, एकदम साफ तो दिखाई दे रही थी,,,,

मतलब की तो फुटपाथ पर खड़ा होकर दूसरों को देखने के बजाय मुझे देख रहा था,,,

मैं तो यह देख रहा था कि कहीं तुम ज्यादा दूर तो नहीं जा रही हो लेकिन तुम चड्डी क्यों नहीं पहनी थी,,,,।

अरे तो,,मेरे चड्डी नी पहनने से,,,कोन सा आसमान टुट पड़ा है,,,

आसमान नहीं टूट पड़ा लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि ऐसी कौन सी वजह थी जो तुम चड्डी नहीं पहनी,,,।

(कल्पना में ही अंकित पूरी तरह से अपनी मां से सवाल जवाब करने में मजबूर हो चुका था और कल्पना में ही उसकी मां भी एकदम मदहोश होते हुए अपने बेटे के सवाल से उत्तेजित हुए जा रही थी और अपने बेटे के सवाल पर एकदम सहज होते हुए मुस्कुरा कर बोली)

गीली थी,,, चड्डी सुखी नहीं थी इसलिए नहीं पहनी,,, और तुझे तो पता ही होगा गीली चड्डी पहनने से खुजली हो जाती है,,,।

ओहहहह तो यह बात थी,,, मुझे लगा कि शायद तुम्हारे पास है ही नहीं,,,।

अगर सच में नहीं होती तो क्या करता,,,

नई खरीद कर लाता,,,,

(अपने बेटे की बात सुनकर उसकी मासूमियत भरे चेहरे की तरफ देखकर सुगंधा मुस्कुराने लगी और अचानक ही उसकी नजर अपने बेटे की पेंट के आगे वाले भाग पर गई और वह एकदम से चौंकते हुए बोली,,,)

लेकिन यह तेरे पेंट में तंबू कैसा बना हुआ है,,,।

(उसकी मां का इतना कहना था कि अंकित एकदम से कल्पनाओं की दुनिया से जमीन पर आ गया क्योंकि दरवाजे पर दस्तक हो रही थी उसकी कल्पना टूट चुकी थी लेकिन कल्पना में जिस तरह के सवाल जवाब अपनी मां से कर रहा था वह बेहद मदहोश कर देने वाले थे बाहर उसकी बड़ी बहन खड़ी थी जो उसे खाना खाने के लिए आवाज दे रही थी,,,,)

हांआया,, (ऐसा कहकर अंकित बिस्तर पर पैर नीचे लटका कर बैठ गया और उसका ध्यान अपनी दोनों टांगों के बीच गया तो वह एकदम से स्तब्ध रह गया क्योंकि जिस तरह की कल्पना अपनी मां से बातचीत करते हुए कर रहा था उसे लेकर उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो चुका था इसलिए वह तुरंत बिस्तर से नीचे खड़ा हो गया और कमरे में इधर-उधर तैरने लगा और अपना ध्यान भटकने लगा क्योंकि वह ऐसी अवस्था में कैमरे से बाहर जा नहीं सकता था क्योंकि ऐसी हालत में उसकी पेंट के ऊपर उसकी मां की नजर जा सकती थी,,, । जब सबको शांत हो गया तब थोड़ी देर बाद वहां कमरे से बाहर निकला और तीनों मिलकर खाना खाने लगे,,,,।

खाना खाते समय त्रप्ती कुछ जल्दबाजी दिखा रही थी उसे इस तरह से जल्दबाजी में खाते हुए देख कर सुगंधा बोली,,,,।

अरे इतनी जल्दबाजी क्यों है कहीं जाना है क्या आराम से खा ,,,

सुगंधा की कल्पना अपने बेटे के साथ

अरे मम्मी मुझे थोड़े नोट्स पूरे करने हैं मैं तो भूल ही गई थी अभी-अभी याद आया,,,

तो क्या हो गया फिर भी आराम से खा,,,,।

(दोनों मां बेटी आपस में बातें कर रहे थे लेकिन अंकित तिरछी नजरों से अपनी मां को देख रहा था,,, क्योंकि खाना खाते समय उसके कपड़े अपने आप ही अस्त-व्यस्त हो गए थे उसकी सारी कंधे से थोड़ा नीचे सरक गई थी जिसकी वजह से उसके ब्लाउज का ऊपरी वाला भाग एकदम साफ नजर आ रहा था और गर्मी का महीना होने के कारण उसकी मां पहले से ही ब्लाउज के ऊपर वाला बटन खोल रखी थी जिससे दोनों चूचियों के बीच की पतली गहरी लकीर एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,, जिसे देखकर अंकित मत हो रहा था,,,, वैसे भी मर्दों की प्यास औरत के बदन से कभी ना तो बुझती है और ना ही पूरी होती है,,, क्योंकि अंकित पहले भी अपनी मां की खूबसूरत बदन को नग्न अवस्था में देख चुका ,,,, उसकी गांड देख चुका था उसकी चूचियां देख चुका था,,, यहां तक कि वह अपनी मां की बुर भी देख चुका था लेकिन इसके बावजूद भी आलम यह था कि इस समय वह केवल अपनी मां की चूचियों की हल्की सी झलक देखकर ही उत्तेजित हो रहा था और यह बात सुगंधा को पता चल गई थी और अंदर ही अंदर भाभी प्रसन्न होते हुए रोटी अपनी बेटी की थाली बढ़ाने के बहाने वह आगे की तरफ झुक गई जिसे उसकी साड़ी पूरी तरह से कंधे से नीचे उतर गई और उसकी भारी भरकम मदहोश कर देने वाली छातिया एकदम से उजागर हो गई,,,, और यह देखकर अंकित का मुंह खुला का खुला रह गया,,,

तृप्ति का ध्यान दोनों की तरफ बिल्कुल भी नहीं था क्योंकि उसके दिमाग में कुछ और चल रहा था पर जल्द से जल्द खाना खाकर अपने कमरे में जाना चाहती थी उसे तो यह भी एहसास नहीं हुआ था कि उसकी मां उसकी थाली में एक रोटी और रख दी थी वह पूरी तरह से अपने ख्यालों में खोई हुई थी,,,,।

सुगंधा अपनी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिराकर अपने बेटे को अपनी जवानी से भरी हुई छातियों के दर्शन करा कर अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक कर ली थी,,, और ऐसा बर्ताव कर रही थी मानो सब कुछ अनजाने में हुआ हो अपने बेटे को इस तरह से अपने जवानी के दर्शन करने में उसे बेहद उत्तेजना और अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती थी,,, थोड़ी देर में तीनों खाना खा चुके थे और तृप्ति बर्तन की सफाई करने के बाद अपने कमरे में चली गई थी आज वह टीवी देखने के लिए ड्राइंग रूम में भी नहीं आई थी,,,,।

कमरे में जाते ही वह अपने किताबों के बैग को बिस्तर पर रखकर उसमें से एक नोटबुक निकाली और उसके पन्नों को पलटने लगी और जल्द ही उसे अंदर रखा हुआ एक पन्ना नजर आया जिसे वह उठाकर पढ़ने लगी,,,।

वह किसी नोटबुक का पन्ना नहीं था,, बल्कि संदीप के द्वारा लिखा गया प्रेम पत्र था जिसे आज ही कॉलेज में उसने नोटबुक में उस पन्ने को रखकर त्रप्ती को थमा दिया था,,, उसे प्रेम पत्र को पढ़ाते हुए तृप्ति का दिल जोरो से धड़कने लगा था क्योंकि उसके जीवन का यह पहला प्रेम पत्र था जिसे संदीप ने लिख कर दिया था,,, उसे प्रेम पत्र में लिखो एक-एक शब्द को पढ़कर तृप्ति के बदन में उमंग जागने लगी उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव नजर आने लगे,,, लेकिन कहीं ना कहीं उसके बदन में उत्तेजना की फुहार भी उठ रही थी,,, वह प्रेम पत्र पूरी तरह से संदीप के प्रेम से भरा हुआ था उसका एक-एक शब्द तृप्ति के तन-बाद में मदहोशी भर रहा था जिसका असर उसे अपने दोनों टांगों के बीच हो रहा था,,, पल भर में उसे अपनी बुर फुलती और पिचकती हुई महसूस हो रही थी हालांकि उसे प्रेम पत्र में अश्लील शब्द बिल्कुल भी नहीं थे ना तो कोई अभद्र भाषा का उपयोग किया गया था लेकिन तृप्ति के जीवन का यह पहला प्रेम पत्र था जो संदीप के द्वारा लिखा गया था और मन ही मन में संदीप को प्यार करने लगी थी और जिस तरह की हरकत उसने पहली बार किया था वही हरकत प्रेम पत्र पढ़ते समय उसके जेहन में उभरने लगा था जिसके चलते वह उत्तेजित हुए जा रही थी,,,, हालांकि ट्यूशन से आते समय संदीप के द्वारा की गई हरकत से उसे समय तो वह काफी क्रोधित हुई थी लेकिन जिस तरह की उन्माद संदीप ने अपनी हरकत से उसके बदन में जगाया था उसके बाद से वह फुहार रह रहकर उसे परेशान करती थी और यह सिलसिला आज तक जारी था इसीलिए संदीप के द्वारा दिए गए प्रेम पत्र को पढ़ते हुए वह पूरी तरह से मदहोश हो गई थी,,,, उसका दिल बड़े जोरों से धड़क रहा था बहुत जल्दी से उसे प्रेम पत्र को इस तरह से मोड कर नोटबुक में रख दी और उसे अपनी बैग में भर दी और बिस्तर पर पीठ के बल लेटे हुए वह संदीप के बारे में ही सोचते हुए कब नींद की आगोश में चली गई उसे पता नहीं चला,,,।

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