Incest पाप ने बचाया - Page 4 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest पाप ने बचाया

Update- 26

सबने फल खाये और आराम करने लगे, उदयराज को अब बहुत सुकून था वह सोच रहा था अब जाके कितने ही सदियों बाद उन्हें उनकी समस्या का हल मिला है। वह खुद को बहुत भाग्यशाली समझ रहा था।

इतने में सुलोचना उठ कर महात्मा जी के पास गई, महात्मा जी ने वो चार कीले तैयार कर पीपल के पत्तों में बांध कर रख दी थी।

महात्मा ने सुलोचना से कहा की केवल उदयराज को उनके दूसरे कक्ष में भेजो। उदयराज गया, उस कक्ष में केवल महात्मा और उदयराज ही थे।

उदयराज- जी महात्मा जी

महात्मा- आओ बैठो, मैंने कीलें तैयार कर दी हैं, इस पीपल के पत्ते में हैं, इसे संभाल कर रखो और कील गाड़ने ले बाद उस पर जो अर्पित करना है वो है बच्चे को स्तनपान करा रही किसी स्त्री का दूध, और इस वक्त तुम्हारे साथ केवल एक ही स्त्री ऐसी है जो बच्चे को स्तनपान कराती है, वो है तुम्हारी बेटी- रजनी।

उदयराज- हां महात्मा जी इस वक्त तो वही ऐसी स्त्री है जो स्तनपान करा रही है। परंतु इसको करेंगे कैसे, और ये तो आप सिर्फ गुप्त तरीके से मुझे बता रहे हैं मैं अपनी बेटी को ये कैसे बताऊंगा?

महात्मा- जो मैं तुम्हे बता रहा हूँ वही मैं सुलोचना को बता दूंगा वो तुम्हारी बेटी को समझा देगी, और इसको करना ऐसे है कि कील गाड़ने के बाद सीधे स्तन से उसको दबाकर एक धार उसपर गिरा देनी है

उदयराज- ठीक है, और महात्मा जी वो कर्म क्या है जो मुझे करना है।

महात्मा ने एक बड़ा सा कागज जिसमे कुछ लिखा था जो गोल गोल मोड़ कर एक सुनहरे धागे से बांधा हुआ था, उदयराज को दिया और बोला- वो कर्म इसमें लिखा हुआ है इसको घर पर जाकर ही एकांत में खोलना और पढ़ना, रास्ते में बिल्कुल नही, संभाल कर रख लेना, मैंने सोचा था कि वो कर्म मैं तुम्हे जुबानी बताऊंगा पर यह उचित नही इसलिये कागज में लिखकर दे रहा हूँ, इसको पढ़ना, जैसा इसमें लिखा है उसका पालन करना, इसके साथ ये एक दिव्य तेल है ये भी मैं तुम्हे दे रहा हूँ, इसका क्या प्रयोग है इस कागज़ में लिखा है

इस कर्म को तुम्हे करना ही होगा नही तो उपाय अधूरा रह जायेगा और विफल हो जाएगा, ये दोनों उपाय और कर्म एक दूसरे के पूरक हैं, एक को भी छोड़ा तो दूसरा विफल हो जाएगा और कर्म पूरा होने के ठीक दो महीने बाद इस कागज़ को मुझे पुनः वापिस करने आना होगा।

उदयराज ने वो कागज और दिव्य तेल की शीशी ले ली और बोला- महात्मा अपने कुल के जीवन की रक्षा से बढ़कर कुछ नही, आप जो कहेंगे जैसा कहेंगे, जो भी कर्म इसमें लिखा होगा मैं उसका पालन करूँगा। परंतु मेरी एक चिंता है।

महात्मा- क्या पुत्र?

उदयराज- अगर इस कागज़ को मेरे खोलने से पहले धोखे से यह किसी के हाथ लग गया और उसने खोल लिया तो क्या होगा?

महात्मा- यह जादुई पत्र केवल तुम्हारे नाम से ही बना है अगर यह किसी के हाँथ लग भी गया और वो उसको खोल भी लेगा तो उसे कुछ लिखा हुआ दिखाई नही देगा, ऐसा ही एक जादुई पत्र मैं तुम्हारी बेटी रजनी को भी दूंगा और यही सारी बात उसे भी कहूंगा, क्योंकि यह कर्म तुम दोनों के द्वारा ही हो सकता है और किसी के नही, इसका मुख्य कारण यह है कि तुम्हारे जिस पुर्वज ने ऐसा किया था वो उस वक्त गांव का मुखिया था और इस वक्त गांव के मुखिया तुम हो, तो ये कर्म तुम्हारे द्वारा ही सम्पन्न होना चाहिए।

उदयराज- जो आज्ञा महात्मा (परंतु उदयराज मन ही मन बेचैन था कि ऐसा क्या कर्म है जिसमे मेरी बेटी का भी सहयोग आवश्यक है बिना उसके ये हो नही सकता, अब खैर जो भी हो वो तो घर पहुँच कर इस दिव्य कागज को खोलकर ही पता चलेगा, और इसको वापिस करने भी आना है)

महात्मा ने फिर रजनी को बुलाया और यही सारी बातें कहते हुए एक और जादुई पत्र उसको दिया जो केवल उसके नाम था, रजनी ने उन्हें प्रणाम किया और वापिस कक्ष में आ गयी और उसने वो कागज संभाल कर रख लिया।

महात्मा ने फिर सुलोचना को बुलाया और उसको अर्पित करने वाली बात समझा कर बोला- ये बात उदयराज की बेटी को समझा दो और अभी रात के 2 बजे हैं आप लोग आराम कर लीजिए और फिर सुबह शीघ्र ही निकल जाइए।

सुलोचना ने ऐसा ही किया, सबने कुछ घंटे विश्राम किया फिर महात्मा जी को प्रणाम करके गुफा से निकल गए, सुबह के 4 बज गए थे, उदयराज ने अपनी बैलगाडी तैयार की और सब वापिस सुलोचना की कुटिया की तरफ रवाना हो गए, उदयराज बहुत खुश था पर असमंजस में भी था कि क्या कर्म है जो उसे करना होगा, यही हाल रजनी का भी था। वह तेजी से बैलगाडी चलाये जा रहा था, दोपहर हो गयी और दूसरा पहर शुरू हो गया, आखिरकार वह उस पीले पेड़ के पास पहुचे।

उदयराज ने बैलगाडी रोक दी और बोला- यही वो पेड़ है न

काकी और सुलोचना- हां यही है

वो पीला पेड़ बहुत बडा और अजीब था, रजनी को भी पता था कि मुझे अब यहां क्या करना है।

उदयराज ने रजनी को देखा तो वो मुस्कुरा पड़ी और मजाक में बोली- बाबू पहली कील यहीं ठोकनी है न

उदयराज- हां बेटी और चौथी घर पे (उदयराज ने भी मजाक में double meaning में बोला)

रजनी- चौथी नही तीसरी बाबू तीसरी, अभी से भूल गए (रजनी अपने बाबू का मतलब तो समझ गयी पर बात बदलते हुए बोली)

उदयराज- मुझे तो कील ठोकने से मतलब है चाहे तीसरी हो या चौथी।

और सब हंसने लगे

रजनी झेंप गयी

उदयराज- चलो अब मैं अपना काम करता हूँ और मेरी बिटिया रानी तुम अपना काम करो, पता है न क्या करना है।

रजनी- हां हां पता है मेरे बाबू जी, अम्मा ने सब बात दिया है। आप अपना काम तो करो पहले

उदयराज में एक कील निकाली और एक हाथ में पत्थर लिया, पेड़ की जड़ के पास गया और बिना उसको छुए कील जड़ में थोक दी, पेड़ की जड़ों के आस पास काफी झाड़ियां थी, कील ठुकते ही पेड़ की जड़ से एक पीला द्रव्य निकला और उसकी बड़ी बड़ी शाखायें काफी तेजी से हिली, हवाएं चलने लगी, ऐसा लगा पूरे जंगल में साएं सायं की आवाजें गूंज रही है अगर वो ताबीज़ न पहनी होती तो डर ही गए होते सब, उदयराज कील ठोकर वापिस आ गया

रजनी ने फिर मजे लिए- बाबू कील ठोक दी, बहुत दर्द हुआ होगा न उसको, तभी तो देखो कैसे शाखायें हिलने लगी, जैसे बेचारा फड़फड़ा रहा हो। अपने बाबू को देखते हुए बोली- बेदर्दी

उदयराज भी मजे के मूड में आ गया- असली कील ठुकती है तो ऐसे ही दर्द होता है

रजनी मतलब समझते ही मुस्कुरा दी और बैलगाडी से उतरी और बोली अब चलो मेरे साथ मुझे भी तो अपना काम करना है चलो दिखाओ कील कहाँ ठोकी है।

उदयराज ने double meaning में बोला- जहां ठोकी जाती है वहीं ठोकी है, अब क्या तुम्हारे बाबू को ये भी नही पता होगा कि कील कहाँ ठोकी जाती है।

रजनी मतलब समझते ही बुरी तरह शर्मा गयी और हंसते हुए बोली- बहुत बदमाश होते जा रहे हैं मेरे बाबू। कोई आस पास है इसका भी ख्याल नही।

और उदयराज रजनी को लेके पेड़ तक जाने लगा, सुलोचना और काकी बैलगाडी में ही बैठी देख रही थी।

उदयराज ने पेड़ के पास पहुँच के रजनी को वो कील दिखाई और बोला जो भी करना पेड़ को बिना छुए करना।

रजनी- ठीक है, पर मेरे बाबू पहले अपना मुँह उधर करो, पीछे घूमो, काकी और अम्मा इधर ही देख रही है, कहेंगी की कैसे बेशर्म पिता हैं, अपनी शादीशुदा बेटी की तरफ ऐसा करते हुए देख रहे हैं, चलो पीछे घूमो जल्दी।

उदयराज पीछे की तरफ घूम गया और धीरे से बोला- मन तो देखने का कर रहा है बहुत, कितने दिन हो गए देखे।

रजनी भी धीरे से बोली- मेरे बेसब्र बाबू, अभी दो दिन पहले ही देखा है, थोड़ा सब्र करो, सबकुछ जल्दी जल्दी करेंगे तो जल्दी घर पहुचेंगे, समझें बुध्धू।

उदयराज अपनी शादीशुदा बेटी की मंशा जानकर झूम उठा

रजनी ने पेड़ की जड़ के पास बैठकर अपने ब्लॉउज के नीचे के 3 बटन खोले और अपनी दाहिनी चूची को बाहर निकाल लिया, दूध से भरी हुई उसकी मोटी मदमस्त गोरी सी चूची उसके हांथों में नही समा रही थी, उसने निप्पल को निशाने पर लगा कर चूची को हल्के से दबाया और दूध की एक पतली धार गड़ी हुई कील पर गिरा दी, दूध लगते ही पेड़ शांत हो गया, सनसनाती हुई हवाएं चलना बंद हो गयी, ये सब देखकर सब चकित रह गए। रजनी ने चूची को अंदर कर ब्लॉउज के बटन लगा लिए और उदयराज के साथ बैलगाड़ी के पास आके अपनी जगह पर बैठ गयी

काकी- सदियों से चली आ रही समस्या के सुधार आ आग़ाज आज मेरी बेटी और मेरे उदय ने कर ही डाला।

सुलोचला- हाँ बहन बिल्कुल, हम सबका आशीर्वाद इन दोनों के साथ है।

काकी- बिना आपके आशीर्वाद के ये संभव नही था बहन, हम आपके बहुत आभारी है।

सुलोचना- ये तो मेरा फ़र्ज़ है, मेरे द्वार सदा आपके लिए खुले हैं, अब हमें शीघ्र ही चलना चाहिए ताकि शाम तक कुटिया पर पहुँच जाएं फिर एक रात मेरी कुटिया पर रुककर कल सुबह तड़के ही निकल जाना

काकी- जैसी आपकी आज्ञा

उदयराज ने बैलगाडी की डोर संभाल ली और तेजी से चलाने लगा।
 
सभी readers को प्यारे प्यारे comments करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, अपना साथ ऐसे ही बनाये रहें, कहानी आगे काफी रोमांचक होने वाली है

धन्यवाद
 
Update-27

उदयराज तेजी से बैलगाडी चलाये जा रहा था और सोचे जा रहा था कि जब वो गांव पहुँचेगा तो लोगों की भीड़ लग जायेगी, लोग पूछेंगे की क्या हुआ, क्या हल निकला, क्या उस दिव्य पुरुष से मिले या नही, सफर कैसा रहा? सफर आसान था या कठिन था, तो उनको मैं क्या बताऊंगा, बिरजू, परशुराम ये सब बड़ी उत्सुकता से इतंज़ार कर रहे होंगे। इसी तरह गांव की स्त्रियां रजनी और काकी से पूछेंगी, तो क्या हमें उन्हें सही सही बताना चाहिए, पूरे गांव में चर्चा करना ठीक नही होगा, चलो एक बार को उपाय तो मैं उनसे बता भी दूंगा पर कर्म का क्या करूँ, उसके बारे में तो मुझे अभी खुद भी नही पता। एक काम करता हूँ गांव वालों को खाली यही बोलूंगा की उपाय बताया है और एक हवन करने को बोला है कुल वृक्ष के नीचे बस, और काकी और रजनी को भी बस इतना ही बताने को बोल दूंगा।

उदयराज ऐसा सोचता हुआ बैलगाडी चलाये जा रहा था।

धीरे धीरे शाम हो गयी और वो सुलोचना की कुटिया पहुँच गए।

सबको बहुत भूख लगी थी क्योंकि रास्ते में वो रुके ही नही, जल्दी पहुचने के चक्कर में।

सब बैलगाडी से उतरे, उदयराज ने बैलगाडी पेड़ से बांध दी और बैलों को घास चरने के लिए लंबी रस्सी से बांध दिया।

पुर्वा सबको देखकर बहुत खुश हुई और सबके लिए तांबे के गिलास में पानी और गुड़ लेके आयी, सब खाट पर बैठ गए और सबने पानी पिया।

सुलोचना ने पुर्वा को जल्दी से खाना बनाने के लिए बोला तो रजनी भी जिद करके उसका हाँथ बटाने चली गयी

बाहर उदयराज, काकी और सुलोचना बैठे थे।

उदयराज- माता जी आपने इस मुश्किल काम में हमारा जो साथ दिया है, हमे जो रास्ता दिखाया और इतना ही नही सदैव हमारे साथ बनी रही उसका अहसान मैं कभी नही चुका पाऊंगा, आपकी वजह से आज हमारी और हमारे कुल की जान बची है, एक तरह से देखा जाए तो आप ही इसकी नींव हो, हम तो घर से बस चल दिये थे ये सोचकर कि आगे जो होगा जैसा होगा देखा जाएगा, आप न मिलती तो मेरा यह प्रण सफल नही होता, मैं अगर आपके किसी भी तरह काम आ पाऊंगा, किसी भी वक्त तो आप निसंकोच मुझसे कहियेगा, आपको मैंने माता माना है मुझसे जो भी बन पड़ेगा मैं आपकी सेवा में करूँगा।

सुलोचना- पुत्र जैसा कि मैंने पहले ही बताया पहली बात तो ये है कि ये तो मेरा फ़र्ज़ है, मैं अपने फ़र्ज़ से बंधी हुई हूँ दूसरा जब तुमने मुझे माँ माना है तो तुम मेरे पुत्र हुए और पुर्वा तुम्हारी बहन हो गयी, तो क्या मैं अपने पुत्र के लिए इतना नही कर सकती। केवल तुम ही मुझे पाकर नही बल्कि मैं और पुर्वा भी तुम सबको पाकर बहुत खुश है, हमने इससे पहले और भी बहुत लोगों की मदद की है पर न जाने क्यों तुम लोगों से एक अजीब सा लगाव हो गया है, पुर्वा को मैंने इतना खुश पहले कभी नही देखा, जितना वो तुम लोगों से मिलकर हुई है।

वो तो मुझसे कह भी रही थी कि अम्मा रजनी कितनी अच्छी लड़की है ऐसी लड़की मैंने आजतक नही देखी, मैं तो अब उसकी पक्की सहेली बन चुकी हूँ, तो मैंने कहा हाँ वो अब खाली तेरी पक्की सहेली नही अब तेरी भतीजी भी हो गयी है, तो वो चौंक कर बोली- क्या वो मेरी भतीजी और मैं उसकी बुआ।

मैं- हाँ, बिल्कुल

तो वो बोली- कैसे अम्मा

तो मैं बोली- उसके बाबू ने मुझे अपनी माँ माना है और मैंने उनको अपना पुत्र, तो हुई न तू रजनी की बुआ और उसके बाबू की बहन।

उसका चहरा मारे खुशी के खिल उठा जैसे उसकी एकांत जिंदगी में किसी ने एक जान फूंक दी हो वो चहकते हुए बोली- पर अम्मा मैं तो रजनी से उम्र में दो तीन साल छोटी हूँ, बुआ छोटी और भतीजी बड़ी, बड़ा मजा आएगा फिर तो और वो मेरी सहेली भी है।

सुलोचना- क्या है न पुत्र जब मैं यहां जंगल में आई तो वह काफी छोटी थी, इस घने भयानक जंगल में बस हम दो ही प्राणी है, मेरी तो उम्र कट गई लेकिन वो तो बच्ची है, कभी कभी बहुत अकेलापन महसूस करती है हालांकि मैं उसको तंत्र मंत्र की विद्या सिखा रही हूं तो वो उसमे व्यस्त रहती है परंतु फिर भी अकेलापन तो खलता ही है, हम माँ बेटी आपस में कितनी और कबतक बातें करेंगे, मैं महसूस करती हूं कि उसकी जिंदगी में बहुत अकेलापन और खालीपन है वो भी और बच्चों की तरह दोस्त बनाना चाहती है, लोगों के बीच में रहना चाहती है भरा पूरा परिवार चाहती है पर क्या करें नियति ने यही चाहा था शायद, मुझे अपनी चिंता नही बस उसकी चिंता होती है, मेरी वजह से उस बच्ची का जीवन नीरस होकर रह गया है, यही कारण है कि जब भी कोई फरियादी अपनी फरयाद लेके महात्मा जी के पास जाता है तो यहां रुकता है और हम उसकी मदद करते हैं उस वक्त मेरी बेटी पुर्वा बहुत प्रफ़ुल्लित रहती है पर फिर बाद में लोगों के चले जाने के बाद थोड़ा उदास हो जाती है। परंतु जब से तुम लोग आए हो वो तो बहुत ही खुश है खासकर रजनी से मिलकर और देख लेना तुम लोग जब जाने लगोगे तो रो देगी जरूर।

काकी की आंखें भर आयी ये सुनकर उसने सुलोचना को गले से लगा लिया और बोली- बहन तुमने तो अपने वचन के चलते इस फूल सी बच्ची को बचपन से जंगल की जिन्दगी दी है उसके साथ कितना अन्याय किया लेकिन तुम करती भी क्या? सबकुछ ईश्वर के हाँथ में है वो जो चाहते हैं वैसा ही होता है परंतु तुम्हारे मुँह से ये सब सुनकर अब पुर्वा बेटी की नीरस जिंदगी पर बहुत दुख हो रहा है।

सुलोचना ने आगे कहा- मुझे इससे ज्यादा चिंता इस बात की है कि मेरी काफी उम्र हो चली है मैं कब तक की मेहमान हूँ पता नही, तंत्र मंत्र के सहारे मैं जी रही हूं पर कब तक जिऊंगी, इस दुनियां में जो आया है उसको एक न एक दिन जाना ही है पर मेरे चले जाने के बाद इसका क्या होगा? कहाँ जाएगी? किसके पास रहेगी? कौन इसका होगा जो इसका ख्याल रखेगा? मैंने अपना वचन पालन करने के चक्कर में अनजाने में ही अपनी फूल सी बिटिया का जीवन बहुत कष्टमय कर दिया है, इस बात को सोच सोच कर मैं अपने को बहुत कोसती हूँ पर क्या करूँ, एक को पूरा करती तो दूसरा छूट जाता और ये बात मैंने आजतक किसी से कही भी नही है आज न जाने क्यों तुम लोगों से अपनापन जैसा प्यार मिला तो बोल रही हूं।

इतना कहकर सुलोचना के आंखों में आंसू आ गए लेकिन वो बहुत मजबूत नारी थी उसने तुरंत अपने को संभाल लिया।

उदयराज ने आगे बढ़कर सुलोचना को गले से लगा लिया और उसके आंसू पोछते हुआ बोला- माता ये आप कैसे सोच सकती हैं कि आप अकेली हैं या मेरी बहन पुर्वा अकेली है, उसका भी भरा पूरा परिवार है अब, जब आपने मुझे पुत्र माना है और मेरी इतनी मदद की है तो क्या मैं आपको और अपनी बहन को अकेला छोड़ दूंगा, नही ऐसा नही हो सकता, मेरी एक विनती है मैं आपको और अपनी बहन पुर्वा को अपने गांव विक्रमपुर लेकर जाना चाहता हूं, और आप मेरी बात टालेंगी नही, बोलिये माता, अब आप मेरे साथ ही चलिए।

सुलोचना- पुत्र मैं तुम्हारी इस इच्छा से बहुत कृतज्ञ हूँ पर मैं इस जंगल में रहकर जनमानस की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ नही तो मैं अपने पुत्र के साथ जरूर चलती, मेरी पति का संकल्प अधूरा रह जायेगा।

उदयराज- तो आप मेरी बहन पुर्वा को ही मेरे साथ भेजिए, वो वहां हमारे साथ रहेगी तो उसका जीवन बदल जायेगा, उसकी सारी जिम्मेदारी मेरी हुई अब।

काकी- हाँ बहन, उसे ही हमारे साथ भेज दो, रजनी और उसकी जोड़ी बहुत जमेगी, बुआ भतीजी की।

सुलोचना- पुत्र उसे भी मैं जरूर भेज देती पर अभी उसकी मंत्र विद्या अधूरी है, जो कि 2 महीने बाद पूरी हो जाएगी तो जब तुम महात्मा जी को वो कागज वापिस करने आओगे तो अपनी बहन को साथ लिवा जाना, क्योंकि मैंने प्रण किया था कि मैं अपनी पुत्री को तंत्र मंत्र सीखा कर निपुण बना दूंगी ताकि वह अपने जीवन में आने वाली परेशानियों को स्वयं हल कर सके, उसकी मंत्र विद्या पूरी होने वाली है बस दो अमावस्या उसको मंत्र और जगाना है और उसके लिए दो महीने लगेंगे।

सुलोचना ने आगे कहाँ- पुत्र तुमने तो मेरी सबसे गहरी चिंता को एक पल में दूर कर दिया और सुलोचना ने उदयराज को गले से लगा लिया।

उदयराज ने सुलोचना से कहा- माता जरा मेरी बहन को इस बात से अवगत तो करा दो।

सुलोचना जैसे ही पुर्वा को घर के अंदर से बुलाने को हुई काकी ने रोकते हुए कहा- रुको बहन मैं बुलाती हूं

काकी- रजनी ओ रजनी!

रजनी- हां काकी, आयी

और रजनी भागती हुई बाहर आई

रजनी- हाँ काकी क्या हुआ?

काकी- अरे अपनी बुआ को लेके नही आई।

रजनी- कौन बुआ?

काकी- अरे पुर्वा, वो तेरी बुआ बन गयी है, तुझे नही पता।

रजनी चौकते हुए- क्या! मुझे तो नही पता, कैसे, वो तो मेरी सहेली है पर वो मेरी बुआ भी है अरे वाह! ये हुई न बात। पर कैसे?

काकी- तेरे बाबू ने बहन को माँ माना है तो वो हुई न तेरी बुआ।

रजनी- अरे हां, सो तो है, बुआ ओ बुआ जरा बाहर आओ (रजनी ऐसे बोलते हुए कुटिया में चली गयी और कुछ देर बाद दोनों ही मस्ती करती हुई बाहर आई)

सुलोचना- देखो, दो तीन दिन में ही कितना प्यार है दोनों में। पुर्वा अब तू खुश है न अपनी भतीजी और भैया को पा के।

पुर्वा- हाँ अम्मा, बहुत खुश!

उदयराज ने पुर्वा को देखा और पूछा- खुश तो मैं भी हूँ तुम्हे पाकर मेरी बहन, क्या तुम मेरे साथ हमारे गांव चलना चाहोगी?

पुर्वा और रजनी आश्चर्य से एक दूसरे को देखने लगी

रजनी- बाबू क्या पुर्वा हमारे साथ चल रही है? (रजनी ने चौकते हुए कहा)

उदयराज- अब ये तो पूर्वा के ऊपर है, उसका क्या मन है

पूर्वा- मन तो मेरा भी है भैया पर मैं अम्मा को अकेला छोड़ कर नही जा सकती, और मेरी मंत्र विद्या भी अभी अधूरी है।

उदयराज- हां मेरी बहन हमारी बात हो गयी है, माता जी ने बोला है कि दो महीने बाद मैं तुम्हे लेने आऊंगा, तुम कुछ दिन वहां रहना फिर कुछ दिन यहां रहना, ऐसे करके जब जहां तुम्हारा दिल करे रहना।

पुर्वा सुनकर बहुत खुश हो गयी और सुलोचना के गले लग गयी सुलोचना ने हाथ बढ़ा कर रजनी को भी गले से लगा लिया

काकी और उदयराज भी काफी खुश थे, फिर हंसी खुसी रजनी और पुर्वा कुटिया में चले गए खाना बनाने।
 
Update- 28

रजनी और पूर्वा ने मिलकर फटाफट खाना बनाया और सबने जल्द ही खाना खा लिया, अंधेरा हो गया था, मशालें जल चुकी थी।

दिन में काफी थके होने की वजह से सब सोने की तैयारी करने लगे, काकी ने बच्ची को ले रखा था, रजनी और पुर्वा मिलकर सबका बिस्तर लगा रही थी, आज काफी गर्मी थी तो कुटिया के अंदर किसी का सोने का मन नही था, सबका यही विचार था कि बाहर ही बिस्तर डाल कर यहीं सब सोते हैं।

रजनी और पुर्वा खाट बिछा बिछा के सबका बिस्तर लगा रही थी कुटिया के दरवाजे पर एक मशाल जल रही थी जिससे माध्यम रोशनी फैली हुई थी।

रजनी बिस्तर लगाते लगाते बार बार उदयराज को देखे जा रही थी और उदयराज की नजरें भी रजनी पर टिकी हुई थी तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना रजनी ने नही की थी

उदयराज ने नज़र बचा कर अपनी तर्जनी उंगली अपने होठ पर रखते हुए रजनी से होंठों पर एक kiss मांगी।

रजनी को बिल्कुल भी अंदाजा नही था कि उसके बाबू आज जिंदगी में पहली बार इस तरह kiss मांगेंगे, उनका इस तरह नज़रें बचा कर अपनी शादीशुदा बेटी से kiss मांगना रजनी को रोमांचित कर गया, वो सर झुका के मुस्कुरा उठी।

उदयराज अपने गाल पर हाथ रखकर बैठा था और काकी से बातें कर रहा था, हाथ कुछ इस तरह रखा था कि चुपके चुपके नज़र बचा के kiss मांग सके, जब जब रजनी उसकी तरफ देखती उदयराज बड़ी ही मिन्नत करते हुए इशारे से अपनी उंगली को होंठों पे रखते हुए kiss मांगता।

रजनी ने पुर्वा से नज़र बचा के अपने बाबू को हाथ से पिट्टी लगेगी (पिटाई) का इशारा करते हुए शर्मा गयी। कुछ देर बाद फिर सिर उठा के देखा तो उदयराज ने फिर बड़े ही रोमांटिक अंदाज में kiss मांगा। रजनी के होंठ अपने बाबू के होंठ से मिलने के लिए तरसने लगे, उसने आखों से इशारा किया कि यहां तो सब हैं कैसा होगा?

उदयराज भी इस बात से उदास हो गया कि चांस नही मिलेगा, आज सो भी तो बाहर रहे हैं सब, उस दिन की तरह कुटिया में सोए होते तो मजा आ जाता, पर आज गर्मी थी काफी, अंदर सोना काफी मुश्किल भरा हो सकता था।

तभी बच्ची रोने लगी, शायद गर्मी से थोड़ा परेशान हो गयी थी काकी उठकर उसको घुमाने लगी और घुमाते घुमाते वो थोड़ा दूर बैलगाडी की तरफ चली गयी।

उदयराज को तभी पेशाब लगी और वो कुटिया के पीछे जाने लगा, उसने सोचा कि चांस तो मिलेगा नही आज, छोड़ो।

कुटिया के पीछे temporary बाथरूम बनाया हुआ था जिसमे सुलोचना और पुर्वा नहाते थे उसमे पानी से भरी हुई तांबे की गगरी और एक लोटा रखा हुआ रहता था।

रजनी ने उदयराज को कुटिया के पीछे जाते हुए देख लिया कुटिया के पीछे ओझल होने से पहले उदयराज ने रजनी को एक बार पलट के देखा तो रजनी मुस्कुरा दी। उदयराज कुटिया के पीछे अंधेरे में चला गया।

रजनी और पुर्वा ने बिस्तर लगाने का काम पूरा किया और पुर्वा बोली- रजनी तुम बिस्तर पर लेटो मैं अम्मा को पैर में मालिश करके आती हूँ और जैसे ही पुर्वा कुटिया में गयी। रजनी तुरंत कुटिया के पीछे आ गयी

उदयराज थोड़ी दूर पर पेशाब करके लौटकर बाथरूम में हाथ धो रहा था उसे पता नही था कि रजनी चुपचाप आके उसके पीछे खड़ी हो गयी है जैसे ही वो उठा और मुड़ा, रजनी को देखकर उसका मन मयूर झूम उठा, वहां अंधेरा तो था पर पास की चीजें समझने लायक दिख रही थी

रजनी चुप खड़ी अपने बाबू को देख रही थी और उदयराज भी उसकी आँखों में देखने लगा

धीरे से बोला- मुझे लगा था तुम जरूर आओगी, और लपककर अपनी बेटी को बाहों में कसकर भर लेता है। रजनी भी अपने बाबू की बाहों में समा जाती है, दोनों एक दूसरे के पूरे बदन को इस तरह सहलाने और भींचने दबाने लगते हैं जैसे बरसों से मिले नही हैं,

उदयराज के दोनों हाथ रजनी के पीठ, कमर और भारी नितंबों पर मचल मचल कर चलने लगे, सहलाते सहलाते वह कस कस के पीठ कमर और गांड को दबा देता तो रजनी की aaaaaahhhhhh निकल जाती, सिसकियां गूंजने लगी अब रजनी की।

वो धीरे से उदयराज के कान में बोली- बाबू अब मुझसे बर्दास्त नही होता, आपको क्या लगता है मैं निर्दयी हूँ आपको तड़पाती हूँ, नही मेरे बाबू, मैं आपके बिना खुद नही रह सकती और कस के उदयराज से अमरबेल की तरह लिपट गयी।

उदयराज- oooohhhhh मेरी प्यारी बिटिया, मैंने ऐसा कब सोचा, तू तो मेरी जान है, मैं भी तो तेरे बिना नही रह सकता अब, बहुत प्यास लगी है।

रजनी- घर चलके सारी प्यास खूब बुझा लेना अभी थोड़ा सब्र मेरे बाबू।

उदयराज रजनी की आंखों में देखने लगा, रजनी की मोटी उन्नत चूचीयाँ उदयराज के चौड़े सीने में पिस गयी थी, जो कि उदयराज को जन्नत का अहसास करा रही थी, उसके निप्पल कड़क होकर उदयराज के सीने में चुभ रहे थे।

रजनी की आंखों में देखते हुए उदयराज ने अपने होंठ उसके बाएं गाल पर रखकर एक चुम्बन जड़ दिया, रजनी की सिसकी निकल गयी उसने वासना में आंखें बंद कर ली।

उदयराज गाल पर कुछ देर अपने गीले होंठ रखे रहा फिर धीरे से अपने होंठ रगड़ता हुआ रजनी के होंठ के किनारे पर लाया (जहां पर होंठ खत्म होते हैं) वहां बने हल्के से गढ्ढे में अपनी जीभ निकाल कर डाल दी और फिर जीभ की नोक को लिपिस्टिक की तरह रजनी के होंठ के बाएं किनारे से लेकर दाएं किनारे तक धीरे धीरे रगड़ता हुआ लाया, ऐसा उसने 3 4 बार इधर से उधर किया, रजनी असीम आनंद में पहुँच गयी, जीवन में पहली बार उसके बाबू उसके नरम मुलायम लालिमा से भरे होंठ छू रहे थे वो भी इस तरह, वो सिरह उठी और बुरी तरह अपने बाबू से लिपटने के बाद अपने होंठ खोल दिये, उदयराज ने लप्प से अपनी सगी शादीशुदा बेटी की जीभ अपने मुँह में भर ली और बेताहाशा चूसने लगा, रजनी की सांसें धौकनी की तरह चलने लगी, उसकी उखड़ती सांसे उदयराज को और वासना से भर दे रही थी, आज पहली बार सगे बाप बेटी के होंठ एक दूसरे से इस कदर मिल रहे थे।

तभी अचानक एक जुगनू उदयराज के सर पे आके बैठ गया और उसकी हल्की सी टिमटिमाती रोशनी रजनी की अधखुली वासनामय आंखों में पड़ी और उसे होश आया कि कोई आ सकता है इस तरफ, जगमग जगमग टिमटिमाता हुआ जूगनु उदयराज के सर से उतरकर कंधे की तरफ जा ही रहा था कि लड़खड़ा कर रजनी की चूचीयों पर गिर पड़ा और उदयराज के चौड़े मर्दाना सीने व रजनी की मदमस्त मोटी-मोटी गोरी चूचीयों के बीच आ गया, उसकी मदमस्त टिमटिमाती रोशनी दोनों के बीच गजब का उजाला कर रही थी कि तभी उदयराज की भी नज़र उसपर पड़ी और जैसे ही उसने रजनी के होंठ छोड़े जूगनु मोटी मोटी चूची की घाटी में गिर पड़ा और अंदर चला गया, रजनी ने अपने अंगूठे से ब्लॉउज के सबसे ऊपरी बटन को पकड़ कर ब्लॉउज को आगे की तरफ ताना, तो उदयराज की नज़र मोटी मोटी चूचीयों पर पड़ी, नीचे से पड़ रही जूगनु कि रोशनी ने रजनी की पूरी भारी भारी मोटी चुचियों की गोलाई के दर्शन उदयराज को करा दिए, यहां तक कि उदयराज को रजनी के फूले हुए दोनों कड़क गुलाबी निप्पल भी बखूबी दिख गए, इतना सुंदर और वासनात्मक दृश्य देखकर उदयराज पागल हो गया और झुककर बदहवासी से चूचीयों को ताबड़तोड़ चूमने लगा, कभी बीच की घाटी को चूमता तो कभी ब्लॉउज के ऊपर से ही पूरी चूची को, रजनी aaaaaaaahhhhh, hhhhhhhaaaaaiii bbbaaabbbuuuu करने लगी, जूगनु अंदर फड़फड़ा रहा था, एकाएक उदयराज ने रजनी को पलट दिया और उसकी दोनों वासना से सख्त हो चुकी मोटी मोटी चूची को अपनी हथेली में भरकर बहुत सख्ती से भर भरके दबाने लगा, रजनी एक बार फिर बदहवास हो गयी, aaaaaaaaahhhhhhh mmmeeerrreee bbaabbbuu bbaasssss kkaaro कहते हुए उसने भी अपनी बाहें पीछे कर अपने बाबू के गले में लपेट दी और अपने बाबू के ऊपर ही झूल सी गयी, वासना पूरे बदन में इस कदर रेंग रही थी कि दोनों से ही अब खड़ा होना मुश्किल हो गया था, जहां रजनी की मखमली बूर अब रिसने लगी थी वहीं उदयराज का विशाल लन्ड भी लोहे की तरह शख्त हो गया था। उदयराज ने रजनी के दोनों निप्पल पकड़े और मसलने लगा, रजनी ने वासनामय स्वर में धीरे से बोला- बाबू बस करो नही तो वो जूगनु मर जायेगा अंदर ही, और बहुत देर हो गयी अब जाने दो न कोई आ जायेगा इधर।

उदयराज ने एक बार फिर रजनी को होंठों को अपने होंठो में भर लिया और चूसने लगा रजनी की आंखें फिर बंद हो गयी पर कुछ पल बाद वो बड़ी मुश्किल से बोली- बाबू बस करो नही तो यहीं सब हो जाएगा और सब जान जाएंगे, अब सब्र करो, जल्दी से जल्दी घर चलो फिर जी भरके सब कर लेना।

उदयराज ने बड़ी मुश्किल से रजनी को छोड़ा और वो अपनी उखड़ी सांसों को संभालती और भागती हुई कुटिया के दायीं तरफ से आगे की तरह आ गयी।

काकी बच्ची को लेके खाट पे लेटी थी, रजनी को आता देख बोली- अरे रजनी बिटिया कहाँ गयी थी।

रजनी- काकी वो स्नानघर में जो गगरी रखी है न वो खाली हो गयी थी तो मैंने सोचा उसमे पानी भर दूँ, रात में किसी को जरूरत पड़ जाएगी तो?

काकी- हाँ ठीक है, अच्छा किया, ले गुड़िया को दूध पिला दे कब से रो रही है, कितनी देर घुमाती रही मैं इसको, नही तो रो रही थी, भूखी है शायद।

रजनी- हाँ काकी दो।

और रजनी उसको लेकर खाट पे लेट गयी, दूध पिलाने के लिए जैसे ही उसने अपनी साड़ी का पल्लू हटाया, ब्लॉउज के अंदर जूगनु टिमटिमाते हुए रोशनी करने लगा। काकी देखते ही बोली- अरे रजनी ये अंदर कैसे घुस गया?

रजनी हंसते हुए- पता नही काकी, मुझे पता ही नही चला ये कब अंदर चला गया। सब बदमाश हो गए हैं आजकल

और जैसे ही रजनी ने ब्लॉउज के नीचे के तीन बटन खोलकर चूची को बाहर निकाला, मौका पाते ही जुगनू आजाद होकर जगमगाता हुआ ऊपर उड़ गया और उसे देखकर रजनी मुस्कुराती रही।

उदयराज पहले थोड़ी देर वहां खड़ा रहा फिर वो भी कुटिया की बायीं तरफ से धीरे धीरे आ गया और आकर अपनी खाट पर लेट गया, सबकी खाट थोड़ी थोड़ी दूर पर आसपास ही थी, उदयराज सबसे किनारे लेटा था, उसके बाद काकी की खाट थी फिर रजनी और पुर्वा की और दुसरी तरफ सबसे किनारे सुलोचना की।

पूर्वा और सुलोचना भी आ गए और फिर कुछ देर सब बातें करते रहे फिर सो गए।
 
Update-29

सुबह उदयराज की आंख सबसे बाद में खुली, उसने देखा कि सब उठ चुके हैं और तैयारियों में जुटे हैं, वह भी उठ गया फटाफट चलने की तैयारियां करने लगा, नहा धो कर रजनी ने आज गुलाबी साड़ी और मैचिंग ब्लाउज पहना था वहीं पुर्वा ने नीला सूट सलवार पहना हुआ था, रजनी तो कयामत लग ही रही थी पर पुर्वा भी किसी से कम नही थी हालांकि वो रजनी से थोड़ा कम गोरी थी पर उसके तीखे नैन नक्श और भरा पूरा यौवन अनायास ही किसी का भी मन अपनी तरफ खींच लेते थे।

उदयराज कभी साइड से तो कभी सामने से दिख रहे रजनी के उन्नत भारी दुधारू उरोज जिसको वो रात को चूस नही पाया था घूरे जा रहा था, रजनी भी अपने बाबू की नजरें भांप कर शर्मा जा रही थी

तैयार होने के बाद सबने नाश्ता किया और फिर चलने की बारी आई तो सुलोचना ने कहा- पुत्र ये ताबीज़ जो मैंने बना कर दिए हैं, तुम लोग हमेशा अपने पास रखना, और हर दीपावली पे अमावस्या की रात इसको पुनः मन्त्र से सुसज्जित कर इसकी शक्ति बरकरार रखनी है।

उदयराज- पर माता हर दीपावली की रात इसको करेगा कौन? हमे तो ये सब आता नहीं।

सुलोचना- अरे तुम्हे किसने कहा करने को पुत्र, तुम्हारी बहन पुर्वा ये सब किसलिए सीख रही है, मैं उसे हर तंत्र मंत्र विद्या में माहिर बना दूंगी, और वो सदैव अपने परिवार और विक्रमपुर की रक्षा में ढाल बनकर खड़ी रहेगी।

पूर्वा ने बगल में खड़ी रजनी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा- क्यों नही, अभी तो मैं सीख रही हूं, सीखने के बाद देखना, मजाल क्या की मैं अपनी भतीजी और भैया तथा पूरे परिवार पर किसी भी तरह की कोई आंच आने दूंगी।

रजनी - मेरी प्यारी बुआ (और उसका हाथ चूम लिया)

उदयराज ने प्यार से पुर्वा के सर पे हाथ फेरा और माथे को चूमते हुए बोला- मेरी प्यारी बहन, अब तो मेरे पास मेरी बेटी और बहन दोनों हो गयी, कितना भाग्यशाली हूँ मैं, मेरी कलाई पर अभी तक राखी के दिन रजनी ही राखी बांध देती थी ताकि कलाई सूनी न रहे पर अब तो साक्षात बहन ही मिल गयी, कितनी खुशियां दे रहा है ईश्वर मुझे, (ऐसा कहते हुए उदयराज ने रजनी की तरफ देखा तो रजनी नज़रें झुकाकर शर्मा गयी)।

पुर्वा- मैं भी आज बहुत खुश हूं अपने भैया को पाकर, कम से कम मेरा एक भाई तो है जिसको मैं राखी बाँधूँगी।

सुलोचना- हाँ बिल्कुल, क्यों नही। अच्छा! राखी के दिन रजनी बिटिया अपने बाबू की बहन बन जाती थी? (सुलोचना ने आश्चर्य से पूछा)

रजनी- हाँ अम्मा, मैं ही बहन बनकर राखी के दिन बाबू को राखी बांध देती थी, काम चलाऊं बहन हूँ मैं अपने बाबू की (और रजनी खिलखिलाकर हँस देती है), पर लगता है अब ये पद मुझसे छिन जाएगा (रजनी ने मजाक में कहा)

उदयराज भी हसने लगता है- हाँ ये तो मेरी सब कुछ है, बिटिया तो मेरी ये है ही, राखी के दिन बहन भी बन जाती है, बस अब माँ बनना बाकी है

और सब जोर से हंसने लगते हैं।

रजनी- जरूरत पड़ी तो वो भी बन जाउंगी।

सुलोचना - जरूर बन जाना, जो स्त्री पूरा घर संभालती हो वो एक तरह से सब होती है।

पुर्वा- रजनी, मेरी सखी, मेरी भतीजी क्या तुम इस बात से उदास हो गयी कि मैंने तुमसे राखी बांधने का हक़ छीन लिया, मेरे साथ साथ तुम भी पहले की तरह राखी बांधते रहना।

रजनी- अरे नही बुआ मैं तो मजाक कर रही थी, राखी तो मैं अपने बाबू को बाँधूँगी ही, प्यारा प्यारा उपहार जो लेना है (रजनी ने फिर मजाक में कहा और हंसने लगी उसके साथ साथ सब हसने लगे)

उदयराज- क्यों नही, मेरी बिटिया रानी जो तेरा मन करे वो कर।

फिर सुलोचना और पुर्वा ने रजनी की बेटी को गोदी में लेकर काफी प्यार किया और अब सबने निकलने की तैयारी की, उदयराज ने बैलगाडी तैयार की, सबने सुलोचना और पुर्वा से विदाई ली, पुर्वा और रजनी थोड़ा भावुक हो गयी।

रजनी, काकी ने सारा सामान बैलगाडी में रख लिया और बैलगाडी में बैठ गयी फिर उदयराज बैलगाडी लेकर अपने गांव की तरफ चल दिया।

सुबह के आठ बजे रहे थे और 4 बजे से पहले वो गांव पहुचना चाहता था इसलिए अब बिना कहीं रुके उसे बैलगाडी चलाना था, समय बीतता गया, काकी और रजनी एक दूसरे से बातें कर रही थी, एकाएक उदयराज को याद आया कि उसने वो बात तो काकी और रजनी को समझायी ही नही की गांव पहुचने पर क्या करना है। उसने तुरंत बैलगाडी पेड़ की छांव में रोकी तो काकी बोली- क्या हुआ उदय?

उदयराज- काकी मैं एक बात बताना भूल गया।

काकी और रजनी- क्या भूल गए।

उदयराज- अच्छा ये बताओ गांव पहुचकर क्या हमें सारी की सारी बातें जस की तस सबको बतानी चाहिए, कि महात्मा ने ये उपाय बताए हैं और ये कर्म बताया है, जबकि कर्म तो हमे अभी खुद भी नही पता, क्यों काकी? क्या हमें बताने चाहिए?

काकी- हां बात तो सही है, ये सब हमे ही करना है तो हम ही चुपचाप करेंगे, सबको क्यों बताना?

रजनी- पर सब पूछेंगे तो, और आखिर पूछेंगे ही, सबको पता है कि हम किस यात्रा पर निकले हैं?

उदयराज- मैंने सोचा है कि हम गांव वालों को ये बोल देंगे कि एक यज्ञ करना है बस, और दिखावे के लिए सबके सामने एक यज्ञ कर देंगे और वो भी दो महीने बाद जब पुर्वा आ जायेगी तब।

काकी- हां ये ठीक है, गांव वालों को बोल देंगे कि महात्मा ने बोला है उनके यहां से कोई शिष्या आके यहां यज्ञ कराएगी और फिर सब ठीक हो जाएगा वैसे उन्होंने अपनी मंत्र की शक्ति से काफी कुछ ठीक कर दिया है। बस एक यज्ञ करना बाकी है वो दो महीने बाद ही हो पायेगा।

रजनी- पर जब गांव वाले पूछेंगे की इसका कारण क्या था तो क्या बतायेंगे?

उदयराज- वो तो हम सच सच जो भी था बता देंगे।

काकी- हां ये ठीक है

उदयराज- तो फिर तुम लोग भी गांव की स्त्रियों को पूछने पर यही बताना।

रजनी और काकी- हाँ, ठीक है।

फिर उदयराज बैलगाडी चलाने लगा।

करीब 2 बजे के आस पास वो लोग अपने गांव की सरहद पर पहुँचे, सरहद के बाहर ही उदयराज ने बैलगाडी रोक दी।

रजनी ने अपने बाबू को लोटे में पानी पीने को दिया, उदयराज ने पानी पीने के बाद लोटा रजनी को देते हुए कहा- आखिर मेरी बेटी को मेरी प्यास का ध्यान रहता है।

रजनी- रहेगा क्यों नही भला, ये भी कोई कहने की बात है। बेटी हूँ आपकी।

उदयराज- चलो अब यहां पर भी एक कील गाड़ ही देते हैं, उदयराज ने एक कील निकली और सरहद पर बने कुछ दूर एक छोटे से मंदिर के पीछे जाकर गाड़ दी, फिर रजनी बैलगाड़ी से उतरी और उदयराज की तरफ देखकर मुस्कुराती हुए मंदिर तक गयी, उदयराज बैलगाडी के पास आकर खड़ा हो गया, वो उनके गांव की सरहद थी तो वहां किसी भी तरह का कोई डर नही था।

रजनी मंदिर के पीछे गयी जहां कील गाड़ी हुई थी, कील के पास बैठकर उसने अपना ब्लॉउज खोलना शुरू कर दिया, नीचे के तीन बटन खोले, इस बार रजनी ने अपनी दोनों ही दुधारू मोटी मोटी चुचियाँ बाहर निकाल ली और दोनों हथेली में ले ली, धूप सीधी चूचीयों पर पड़ रही थी, रजनी ने एक साथ दोनों चूचीयों को पकड़ा और दोनों ही निप्पल को एक साथ कील पर निशाना लगा के दबा दिया, दूध की दो धार चिरर्रर्रर्रर्रर की आवाज करती हुई कील पर पड़ी, रजनी अपनी ही चूचीयों कि चमक देखके मदमस्त हो गयी, फिर जल्दी से चूचीयों को ब्लॉउज के अंदर डाल दिया और बटन बंद करते हुए बैलगाडी तक आ गयी।

काकी बैलगाडी में छपरी में बैठी थी और उदयराज बाहर खड़ा अपनी बेटी को देख रहा था, रजनी ने अपने बाबू को अपनी तरफ देखते हुए देखकर मुस्कुरा पड़ी और छपरी में काकी के पास जा के बैठ गयी।

उदयराज बैलगाडी चलाने लगा, बैलगाडी अब गांव की सरहद के अंदर प्रवेश कर चुकी थी, कुछ किलोमीटर चलने के बाद उन्हें कुछ लोग आते जाते दिखने लगे। उदयराज को देखकर ही वो जोर जोर से चिल्लाने लगे- उदयराज भैया की जय हो, हमारे मुखिया की जय हो, वो गांव के छोर पर रहने वाले किसान थे, पर जब तक उदयराज गांव के काफी अंदर अपने घर पहुचता पूरे गांव में हल्ला हो गया कि मुखिया जी आ गए।

उदयराज ने सबका प्रणाम स्वीकार किया और बैलगाडी घर की तरफ आगे बढ़ा दी। रजनी और काकी तो बहुत ही प्रसन्न थे। वहां की औरतों ने काकी के पैर छूने शुरू कर दिए, काकी ने सबको बड़ी मुश्किल से समझाया, और सबको आर्शीवाद दिया।

करीब 1 घंटे और चलने के बाद वह अपने घर पहुचा तो देखा कि उसके घर के बाहर गांव वालों की काफी भीड़ पहले से मौजूद थी, और बैलगाडी के पीछे पीछे भी कई लोग आ चुके थे। सबको यही जानना था कि आखिर क्या हुआ? सब दुआ और प्रार्थना करे जा रहे थे कि शुक्र है सब सही सलामत वापिस आ गए।
 
Update- 30

उदयराज ने बैलगाडी अपने घर के बाहर कुएं के पास रोकी, काकी और रजनी बैलगाडी से उतरी, उदयराज, काकी और रजनी कुएँ के पास खड़े हो गए , गांव की सबसे उम्र दराज महिला ने लोटे में जल लेकर एक साथ तीनो के सर के किनारे किनारे सात बार गोल गोल घुमाते हुए आरती उतारी और फिर उस जल को नीम के पेड़ पर अर्पित कर दिया।

बिरजू और परशुराम ने बैठने के लिए पहले से ही खाट बिछा रखी थी, उदयराज सबसे मिला और खाट पर बैठ गया, रजनी और काकी भी बगल वाली खाट पर बैठ गए।

गांव वालों का वहाँ जमावड़ा लग गया था, तभी नीलम भीड़ में से निकलकर आयी और खुशी से रजनी और काकी के गले लग के मिली। उसने उदयराज को भी प्रणाम किया।

नीलम- कैसी है मेरी बहन? काकी आप कैसी हो?

काकी- मैं ठीक हूँ मेरी बच्ची।

रजनी- मैं भी ठीक हूँ, मेरी सखी, तू बता कैसी है।

नीलम- मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ।

बिरजू- नीलम बिटिया हाल चाल बाद में पूछते रहना पहले जा अपनी सहेली, काकी और मेरे परम मित्र मुखिया जी के लिए पानी ले के आ।

नीलम दौड़ी दौड़ी घर में गयी और सबके लिए अपने हाथ से बनाई मिठाई और पानी लेके आयी।

नीलम ने सबको पानी दिया- सबने नीलम के हाथ की बनी मिठाई खाई और उदयराज ने तो खूब तारीफ कर डाली, रजनी और काकी ने भी नीलम की तारीफ करते हुए मिठाई खाई और पानी पिया।

गांव की सभी स्त्रियां और पुरुष आस पास जमावड़ा लगाए खड़े थे, सामने बिरजू और परशुराम बैठे थे।

उदयराज और रजनी को तो जल्दी से जल्दी महात्मा द्वारा दिये गए कागज खोलकर देखने की पड़ी थी, और गांव वाले घेरकर बैठे थे।

तभी बिरजू उदयराज से बोला- भैया अब बताओ, क्या हुआ? कैसा रहा? क्या वो दिव्य पुरुष मिले? हमारी समस्या का हल मिला?

उदयराज और काकी ने उपाय और कर्म वाली बात छोड़कर बाकी की सारी बातें गांव वालों को बता डाली। इसके हल के लिए उन्होंने यही बोला कि एक यज्ञ कराना पड़ेगा और वो भी एक शिष्या दो महीने बाद आ के कराएगी। ये सब सुनकर गांव वाले हैरान रह गए और कुछ लोगों ने तो अपने उस पूर्वज को ही भला बुरा कहना शुरू कर दिया।

काकी ने उनको समझाया कि जो हुआ सो हुआ पर अब उन्हें भला बुरा कहने से क्या फायदा।

बिरजू उदयराज से- भैया आपको यह कुल भगवान की तरह पूजेगा आपने जो यह अत्यंत कठिन यात्रा परिवार सहित करके अपने कुल की जीवन की रक्षा की है, ऐसा तो आजतक कोई मुखिया न कर पाया, आप ही हमारे मुखिया है और सदा रहेंगे, आज पूरा गांव आपको नतमस्तक कर रहा है, सब युगों युगों तक आपके आभारी रहेंगे।

उदयराज ने बिरजू को गले से लगा लिया और बोला - अरे पगले, तुम सब मेरा परिवार हो, मैं अपने परिवार के लिए नही करूँगा तो और कौन करेगा, ये तो मेरा फ़र्ज़ है, और तुम सबने तो मुझे पहले ही गांव का मुखिया बना कर इतना प्यार और सम्मान दिया है, बल्कि देख मेरा तो सारा काम भी तू ही संभालता है तो क्या मेरा ये फ़र्ज़ नही था कि मैं मुखिया होने के नाते ये सब करूँ, सबकी आंखें नम हो गयी।

उदयराज- वो तो हमारी किस्मत अच्छी थी जो भयानक जंगल में हमे एक माता जी मिली जिनके बारे में मैं बता चुका हूं, वो न होती तो ये असंभव था, हम उस जंगल को पार ही नही कर पाते। पूजा करनी है तो उस देवी की करो और अब वो हमारी माता हैं। मैं उन्हें यहां एक बार सबसे मिलाने जरूर लाऊंगा।

उदयराज ने ये बात नही बताई की उस कागज को वापिस देने जाना है, उसकी जगह पर उसने ये बोला कि मैं सुलोचना को यहां एक बार जरूर लाऊंगा और उनको लेने के लिए जाना पड़ेगा।

बिरजू और परशुराम- हां भैया जरूर, हम भी उस महान देवी से मिलना चाहते हैं, पूरा गांव उनको देखना चाहता है।

उदयराज- हां जरूर दो महीने बाद मैं जाऊंगा उनको और शिष्या को लेने फिर वही लोग यज्ञ कराएंगे।

अब जाके गांव वालों को तसल्ली हुई।

तभी बिरजू और परशुराम गांव वालों से बोले- अच्छा तो हमारे भाइयों अब आप लोग कृपया अपने अपने घर को जाएं बाकी की बातचीत हम बाद में करेंगे, आप लोग समझ सकते हैं हमारे मुखिया और उनका परिवार यात्रा करके काफी थक चुका है तो अब उन्हें आराम करने दें।

सभी उदयराज को प्रणाम कर अपने अपने घर को जाने लगे और घर जाके सबने खुशी के दिये जलाए मानो दीपावली हो आज, पूरा गांव शाम को ही जगमगा उठा। अंधेरा होना शुरू हो गया था।

नीलम और उसकी माँ- आप सब लोगों का खाना आज हमारे घर ही बनेगा, तो आप लोग खाना बनाने के लिए परेशान मत होना, हमारे घर ही खाना है आज।

उदयराज, काकी और रजनी ने मना किया पर नीलम नही मानी और सबका खाना बनाने चली गयी। काकी भी कुछ देर अपने घर का हाल चाल लेने चली गयी।

नीलम की माँ ने रजनी की बिटिया को गोदी में ले कर अपने घर की तरफ घुमाने ले गयी और अब घर में यहां पर बच गए रजनी और उदयराज।

रजनी उठकर घर का ताला खोलने जाने लगी जैसे ही रजनी घर के दरवाजे तक पहुँची उदयराज बोला- रजनी बिटिया रुको पहले मैं दरवाजे की डेहरी पर तीसरी कील गाड़ दूँ।

रजनी- हां बाबू ठीक है।

उदयराज ने तीसरी कील निकाली और एक पत्थर से ठोक कर मुख्य दरवाजे की डेहरी के बीचों बीच कील गाड़ दी।

रजनी ने दरवाजा खोला और अंदर चली गयी घर में अभी कोई दिया या लालटेन नही जल रहा था तो काफी अंधेरा था क्योंकि बाहर भी हल्का अंधेरा हो चुका था तो घर में और अंधेरा था। अभी रजनी घर के अंदर दाखिल हुई ही थी कि उदयराज ने जल्दी से कदम बढ़ा के उसको पीछे से बाहों में कस लिया।

रजनी की aaaaaaaaaahhhhh निकल गयी। उदयराज रजनी की गर्दन, गाल कान के आस पास ताबड़तोड़ चूमने लगा और अपनी बिटिया के गुदाज बदन को मसलने लगा, रजनी ने भी एकांत का फायदा उठाते हुए अपनी बाहें पीछे ले जाकर अपने बाबू के गले में लपेट दी, और अपने गाल आगे बढ़ा बढ़ा के अपने बाबू को चुम्मा देने लगी, उदयराज ने कुछ ही पलों में रजनी का पूरा मुँह चूम चूम के गीला कर दिया, रजनी सिसक उठी और बड़ी मादकता से बोली- बाबू थोड़ा सब्र।

उदयराज पीछे से उसकी चूचीयाँ हथेली में भरकर दबाने लगा और धीरे से बोला- और कितना सब्र मेरी बेटी, अब तो घर आ गए न, कब से तड़प रहा हूँ तेरे लिए। उदयराज कुछ देर तक पीछे से रजनी की चूचीयों को ब्लॉउज के ऊपर से मर्दन करता रहा, कभी पूरा हथेली में भर भर के दबाता तो कभी निप्पल को मसलता, पूरी चूची तनकर सख्त हो गयी थी

रजनी तो हाय... हाय करती हुई बेहाल होने लगी, एकएक उदयराज ने अपने बेटी को अपनी तरफ गुमाया और उसके नर्म बेताब होंठों पर अपने होंठ रख दिये, रजनी की आंखें बंद हो गयी, दोनों एक दूसरे के होंठों को खा जाने की स्थिति तक चूसने लगे, कभी उदयराज रजनी के निचले होंठों को अपने मुँह में भरकर चूसता तो कभी रजनी अपने पिता के होंठों को मुँह में भरकर चूसती, उदयराज के हाँथ रजनी की पीठ, कमर और गांड पर रेंगने लगे, तभी उदयराज ने रजनी की गुदाज उभरी हुई गांड को हथेली में भरकर मीजने लगा, रजनी चिहुँक उठी, और सिसकारियां लेने लगी। साथ ही साथ दोनों एक दूसरे के होंठों का रसपान किये जा रहे थे, कुछ ही देर बाद रजनी ने अपने को बड़ी मुश्किल से अपने बाबू से थोड़ा आजाद करते हुए कहा- बाबू, रुको जरा, थोड़ा सा और सब्र करलो बाबू, बस थोड़ा सा ही।

उदयराज- सब्र तो कर ही रह हूँ मेरी बिटिया रानी, पर अब नही होता (उदयराज की आँखों में वासना साफ झलक रही थी, उसकी आवाज भारी हो गयी थी)

रजनी- सब्र तो मुझसे भी नही हो रहा बाबू, पर रात भर के लिए रुक जाओ, फिर सब दूंगी (रजनी में काम भावना में सिसकते हुए कहा)

उदयराज- सब क्या?

रजनी- वो

उदयराज रजनी को कस के अपनी बाहों में भीचते हुए- वो क्या मेरी बिटिया।

रजनी- वही बाबू, जिसके लिए मेरे पिताजी तड़प रहे हैं। (रजनी धीरे से फुसफुसाके बोली)

उदयराज- किसके लिए तड़प रहा हूँ मेरी बिटिया। बोल न, बोल भी दे, तेरे मुँह से सुनना चाहता हूं उसको क्या बोलते हैं?

रजनी- मुझे शर्म आती है। आप समझ जाइए न बाबू।

उदयराज- मुझे नही समझ आ रहा बता न मेरी बेटी।

रजनी- वही जो दोनों जांघों के बीच में होती है, अब समझें।

उदयराज- नही, क्या बोलते हैं उसको?

रजनी समझ गयी कि उसके बाबू बहुत मस्ती में हैं और उसको भी बहुत मजा आ रहा था ऐसी बातों से

रजनी थोड़ी देर शांत रही फिर धीरे से अपने बाबू के कान के पास अपने होंठ ले जा के बोली- बूबूबूबूरररर, बूर बोलते हैं उसको बाबू, बूर (और ये शब्द बोलते ही और भी कस के अपने बाबू से लिपट गयी उसकी आह निकल गयी), फिर बोली मैं अपने बाबू को रात को अपनी बूर दूंगी खाने को, ठीक, अब खुश।

उदयराज अपनी बेटी के मुंह से ये शब्द सुनकर अवाक रह गया और मदहोश होकर बोला- मुझे अपनी बेटी की बूर खाने को मिलेगी।

रजनी भी ये शब्द बोलने के बाद अंदर ही अंदर गनगना गयी कि आज जीवन में पहली बार वो किस तरह उस खास अंग का नाम अपने बाबू के सामने ही ले रही है और उसे इसमें कितना आनंद आया फिर वो थोड़ा और खुलकर बोली

रजनी (सिसकते हुए) - हाँ और वो भी अपनी शादीशुदा बेटी की, पूरी रात, जी भरके,अब खुश।

उदयराज अत्यंत खुश हुआ और एक बार फिर से उसने रजनी के गालों, होंठों पर ताबड़तोड़ चुम्बन जड़ना शुरू कर दिया। रजनी फिर से सिसकने लगी।

उदयराज- सिर्फ खाने को मिलेगी, पीने को नही।

रजनी- खाना हो खा लेना, पीना हो पी लेना, जो मर्जी कर लेना।

उदयराज- उसमे से जो मूत निकलता है उसको मैं पियूँगा, पिलाओगी न

रजनी- dhaatt,

फिर बोली- जरूर, मेरे बाबू, जरूर, जी भरके पी लेना

उदयराज ने खुश होकर रजनी को अपनी गिरफ्त में से आजाद किया, घर में काफी अंधेरा था, रजनी ने अपने बाबू से एक बात कही- बाबू हमे अभी अपने अपने कागज पढ़ लेना चाहिए, न जाने उसमे क्या लिखा होगा, मैं मंदिर में दिया जला देती हूं और लालटेन भी, इससे पहले की कोई आ जाए हमे वो पढ़ लेना चाहिए कि उसमे क्या कर्म लिखा है दोनों के लिए।

उदयराज- हां मेरी बेटी तू ठीक कहती है।

और रजनी ने मंदिर में दिया जलाया फिर पूरे घर में लालटेन जलाई, उदयराज उसे ये सब करते हुए देखता रहा, जब दोनों को नज़रें मिलती तो दोनों मुस्कुरा देते। फिर रजनी बोली मैं पीछे वाली कोठरी में जा रही हूं पढ़ने और आप बरामदे में बैठ के पढ़ लो।

उदयराज- हां ठीक है

और दोनों ने अलग अलग कमरे में जाके अपना अपना कागज खोला।
 
Update- 31

उदयराज ने अपने किये जाने वाले कर्म को जानने के लिए दिए गए कागज को पढ़ने के लिए खोला, सफेद कागज पर सुनहरे रंग से लिखे अक्षर प्रकट हो गए, उदयराज यह चमत्कार देखकर ही दंग रह गया और पढ़ने से पहले एक बार वो कागज उसने माथे चढ़ा लिया, फिर उसने पढ़ना शुरू किया, उसमे लिखा था-

"उदयराज तुम्हारे पुर्वज द्वारा नियति के नियमों में छेड़छाड़ करने से कुपित नियति द्वारा किये गए अव्यवस्थित संतुलन को दुबारा संतुलित कर सही रास्ते पर लाने के लिये तुम्हे जो कर्म करना होगा वो है "महापाप कर्म"




व्यभिचार के रास्ते पर चलकर तुम्हे एक महापाप करना होगा, और ऐसा कर तुम्हे अपने कुल में पापकर्म को स्थान देकर उसकी स्थापना करनी होगी, इस कर्म की शुरुवात तुमसे होगी जो आनेवाले भविष्य में तुम्हारे कुल के लिए जीवनदायी होगी, तुम्हे यह महापाप अपना कर्म समझकर आनंद लेते हुए करना है।

इसके लिए तुम्हे आने वाली अमावस्या की रात से ठीक सात दिन पहले, अपने घर की किसी ऐसी स्त्री जिससे तुम्हारा खून का रिश्ता हो और जो बच्चे को स्तनपान कराती हो, मेरे द्वारा दिये गए दिव्य तेल से बिना उसका चेहरा देखे और बिना उसका कोई और अंग छुए सिर्फ उसकी योनि (बूर) को रात के 12 बजे छूना है, हाथ में तेल लगा कर उसकी योनि (बूर) का मर्दन 10 मिनट तक करना है और उससे निकलने वाले रस को उंगली से निकलकर पहले स्वयं चाटकर ग्रहण करना है फिर उसे चटाना है, रस को पांच बार चाटना और चटाना है, ध्यान रहे इस दौरान उसके शरीर के किसी भी और अंग पर तुम्हारी नज़र नही पड़नी चाहिए। वह स्त्री उस रात ठीक 12 बजे घर के किसी एकांत कमरे में तुम्हारा इंतज़ार करेगी, उसका शरीर पूर्ण रूप से चादर से ढका होगा, कमरे में कपूर की खुश्बू फैली होगी और कमरे के दरवाजे पर एक हल्की रोशनी का दिया जलता होगा।

ऐसा तुम्हे तीन रात करना है, फिर चौथी रात तुम्हे उस स्त्री को कमर से नीचे निवस्त्र कर उसकी योनि को खोलकर देखना और सूंघना है तथा कमर से नीचे की नग्नता के दर्शन करना है, फिर पांचवी रात पुनः तुम्हे उस स्त्री को कमर से नीचे निवस्त्र कर उसकी योनि को देखना, सूंघना और चुम्बन करना है और निकलने वाले रस को मुँह लगा के उसका रसपान करना है। ध्यान रहे इस दौरान भूल कर भी उसका चेहरा नही देखना और न ही शरीर का कोई और अंग छूना और देखना है, इतना ही नही इन सात दिनों के अंदर दिन में भी तुम्हे उस स्त्री के सामने नही पड़ना है, सिर्फ रात को ये कर्म करना है।

अगली छठी रात अब तुम्हे उसी कमरे में अपना पूरा शरीर चादर से ढककर लेटना है वह स्त्री तुम्हे कमर से नीचे निवस्त्र कर तुम्हारे लिंग का दर्शन करेगी, उसे छुएगी, सूंघेगी, उसका मर्दन करेगी और उसका चुम्बन लेगी, बाकी सब वैसे ही होगा, कमरे में कपूर की महक होगी और दरवाजे पर एक छोटा सा दिया जलता रहेगा।

छठी रात के बाद सातवें दिन, सुर्यास्त के बाद तुम उस स्त्री को देख सकते हो।

दिन में वह स्त्री घर में किसी जगह, कागज पर अपने मन की इच्छा लिखकर, छुपाकर रखेगी तुम्हे वह ढूंढकर पढ़ना है और उस कागज में लिखे अनुसार उस स्त्री की मन की इच्छा की पूर्ति अमावस्या की रात को करना होगा। ठीक उसी रात को तुम्हे कुलवृक्ष की जड़ में चौथी कील भी ठोकनी होगी और स्त्री से दूध भी अर्पित कराना होगा।

वह स्त्री कोई और नही तुम्हारी पुत्री ही होगी, क्योंकि वही एक स्त्री तुम्हारे परिवार में बची है जिससे तुम्हारा खून का रिश्ता है इसलिए यही सब कर्म विधि मैंने तुम्हारी पुत्री के कागज पर भी लिखा है, जिस दिन से ये कर्म शुरू होगा ठीक उसी दिन से तुम्हे न अपनी पुत्री को देखना है न उसके सामने पड़ना है।



मेरा आशिर्वाद सदा तुम्हारे साथ है, धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा, सदा खुश रहो।"

कर्म पत्र पढ़कर तो उदयराज को ऐसा लग जैसे पृथ्वी और आकाश एक साथ विपरीत दिशा में घूम रहे हैं उसने एक बार नही दो तीन बार अच्छे से पूरा-पूरा कर्म को पढ़ा। विश्वास नही हुआ उसे की नियति ये चाहती है जो उसके मन में थोड़ा थोड़ा पहले से ही है, उसका तो मन मयूर ही झूम उठा। तभी वह भागकर रजनी वाले कमरे में गया तो देखा रजनी भी बेसुध सी खड़ी यही सोच रही थी, उसे भी विश्वास नही हो रहा था, दोनों की नजरें मिली तो उदयराज मुस्कुराया और रजनी ने शर्मा के सर नीचे कर लिया।

उदयराज ने रजनी के चेहरे को ठोड़ी पर हाथ लगा के उठाया तो उसकी आंखें बंद थी, उसने धीरे से बोला- आज अमावस्या की रात से ठीक पहले का आठवाँ दिन है, कल सातवां दिन होगा, कल सुबह से मै तुम्हें नही देखूंगा, न तुम्हारे सामने पडूंगा।

रजनी की आंख बंद थी वो सुन रही थी उसके होंठ कंपन से थरथरा जा रहे थे।

उदयराज- मुझे तो लगा था कि आज रात मुझे मेरी अनमोल चीज़ मिल जाएगी पर नियति ने उसे 7 दिन पीछे धकेल दिया है, पर कोई बात नही मैं बर्दाश्त कर लूंगा।

रजनी ने धीरे से आंखें खोल के उदयराज की आंखों में देखा और बोली- बाबू, कल रात से रोज 5 रात तक मैं घर के पीछे वाली कोठरी में आपका रात के 12 बजे इंतज़ार करूँगी, और छठी रात आप मेरा इंतज़ार करना, इस दिनों हम एक दूसरे को न देखेंगे, न एक दूसरे के सामने पड़ेंगे, जैसा कि उसमे लिखा है। फिर सातवें दिन, मैं एक पर्ची में अपने मन की इच्छा उसमे लिख के घर में कहीं छुपा दूंगी आपको वो ढूंढकर उस पर्ची में लिखे अनुसार आगे का कर्म करना है और उस दिन सूर्यास्त के बाद हम एक दूसरे को देख सकेंगे, वह अमावस्या की रात होगी, उसी रात कुलवृक्ष में कील भी गाड़नी है, अब आपके और मेरे सब्र का इम्तहान है बाबू, हमे इसे बखूबी निभाना है।

उदयराज ने रजनी के चहरे को अपने हाथों में लेकर बोला- हाँ मेरी बच्ची, मेरी बेटी, बस आज की रात ही हम एक दूसरे को देख सकते हैं फिर तो 6 दिन बाद ही देख पाएंगे, और उदयराज गौर से रजनी को देखने लगा, उसके चेहरे को निहारने लगा, रजनी भी एक टक अपने बाबू को निहारने लगी फिर एकएक शर्माकर उनसे लिपट गयी, उदयराज ने उसे बाहों में कस लिया।

उदयराज- बेटी लेकिन हमारे बीच कोई तो ऐसा होना चाहिए जो जरूरत पड़ने पर सब संभालता रहे, मान लो मैं दिनभर बाहर रहूंगा और तुम घर में, परन्तु कभी कोई काम ही पड़ गया या तुम्हे मुझे खाना ही परोसना हो, या रात को बच्ची को ही संभालने वाला कोई तो होना चाहिए, ताकि हमे कर्म करने में कोई अड़चन आ आये।

रजनी- बाबू आप उसकी चिंता छोड़िए, वो मैं काकी को समझा दूंगी अपने तरीके से, उनको कुछ बताऊंगी नही पर फिर भी समझा दूंगी, वो सब संभाल लेंगी।

उदयराज- मेरी बेटी कितनी समझदार है, और कहते हुए वो उसके गालों को चूमने लगा।

रजनी ने आंखें बंद कर ली और अपने बाबू से लिपट गयी।

तभी नीलम की अम्मा आवाज लगाती हुई उनके घर की तरफ आ रही थी, ये सुनते ही उदयराज और रजनी झट से अलग हो गए और रजनी ने वो कागज छुपा दिया, भागकर बाहर आई- हाँ अम्मा क्या हुआ? बच्ची रो रही है क्या?

नीलम की अम्मा- हाँ बिटिया ये रो रही है, ले इसको दूध पिला दे और सब लोग चलो अब, खाना भी बन गया है, सब लोग खाना खा लो, काकी भी वहीं बैठी हैं, बस सब तुम लोगों का ही इतंज़ार कर रहे हैं।

रजनी- हाँ अम्मा चलती हूँ।

उदयराज ने भी अपना कागज छुपा के रख दिया और फिर रजनी और उदयराज दोनों लोग नीलम की अम्मा के साथ उसके घर आ गए।

आज पूरा गांव दिए कि रोशनी से जगमगा रहा था, बिरजू के घर सबने एक साथ खाना खाया, काफी बातें और हंसी मजाक भी हुआ फिर रजनी, काकी और उदयराज उन लोगों का धन्यवाद करके अपने घर आ गए।

उदयराज ने पहले की तरह अपनी खाट कुएं के पास लगाई और सोने के लिए लेट गया।

रजनी और काकी ने भी पहले की तरह अपनी खाट नीम के पेड़ के नीचे लगाई और लेटकर बातें करने लगी।

रजनी ने काकी को अपनी तरह से समझा दिया, उसने असल बात नही बताई, बस अपनी तरह से समझा दिया।

काकी ने भी उसको निश्चिन्त होकर कर्म करने के लिए बोला, काकी को भी लगा कि कोई ऐसा कर्म है जो गुप्त रूप से करना है।

फिर काकी सो गई पर रजनी की आंखों में नींद नही थी, वो बेचैन थी, वही हाल उदयराज का भी था वो भी अपनी खाट पर करवटें बदल रहा था। काफी देर सोचते सोचते फिर न जाने कब दोनों की आंख लग गयी।
 
Update- 32

अगले दिन सुबह उदयराज जल्दी ही उठ गया, उसे लगा वह काफी जल्दी उठ गया है कहीं रजनी पर उसकी नज़र न पड़ जाए, पर रजनी तो उससे भी पहले उठकर घर में जा चुकी थी।

काकी उठकर अपनी खाट पर बैठी थी, उदयराज ने सुबह का नित्यकर्म किया और काकी ने उसको नाश्ता लाकर दिया, उसने नाश्ता किया और आज अमावस्या की रात से ठीक सातवें दिन का पहला दिन था, रात का उसे बहुत बेसब्री से इंतज़ार था, अपनी किस्मत पर वो फूला नही समा रहा था, सोच सोच कर अपने में ही मुस्कुराये जा रहा था फिर अपने दिल पर काबू करते हुए वो उठा, बैलों को तैयार किया और खेतों की तरफ जाने लगा, बिरजू के घर के नजदीक आकर उसने सोचा एक बार बिरजू से मिल ले।

वह वहीं बैलों को एक पेड़ के पास बांधकर बिरजू के घर गया, बिरजू अभी नाश्ता कर रहा था उदयराज को देखते ही उठ खड़ा हुआ।

बिरजू- अरे भैया आप इतनी सुबह सुबह, आओ बैठो, नीलम, ओ नीलम, अपने बड़े बाबू के लिए नाश्ता ले आ (नीलम उदयराज को बड़े बाबू कहकर बुलाती थी)

उदयराज- अरे नही बिरजू मैं नाश्ता करके आया हूँ, मैं जरा खेतों में जा रहा था बैल लेके सोचा तेरे से मिलता चलूं। (इतना कहते हुए उदयराज खाट पे बैठ गया)

तभी नीलम उदयराज के लिए चाय और महुवे का नमकीन पोहा लेके आयी और आते ही उसने उदयराज को प्रणाम किया।

उदयराज ने नाश्ता किया हुआ था लेकिन फिर भी नीलम की जिद पर उसे ठूस ठूस के खाना पड़ा।

उदयराज- नीलम तू मेरी बिटिया रजनी से कम नही है, वो भी मुझे ऐसे ही जिद करके खिलाती है।

नीलम- बड़े बाबू आपका पद तो पिता से भी ऊंचा है आप तो मेरे बड़े बाबू हैं तो भला मैं आपकी सेवा में क्यों पीछे रहूँगी।

बिरजू- ये बात तो सही है भैया, भले ही बेटा एक बार को पिता की सेवा में पीछे हट जाए पर ये बेटियां कभी पीछे नही हटती, इसलिए ये बेटियां पिता के दिल के इतने करीब होती हैं (बिरजू ने नीलम को देखते हुए कहा)

उदयराज- दिल के करीब नही रहती बिरजू, बल्कि दिल में बसी होती हैं।

नीलम यह सुनकर गदगद हो गयी और अपने बाबू बिरजू को तिरछी नजरों से देखकर शर्मा कर घर में चली जाती है।

उदयराज बिरजू से कुछ गांव के काम की बात करता रहा फिर उठकर अपने खेतों में चला गया।

उदयराज बार बार अपने ध्यान को दूसरे कामों में लगाने की कोशिश करता रहा पर बार बार उसका मन रात में मिलने वाली खुशी को महसूस कर वासना से भर जाता। वो बार बार सोचता कि आज रात को जिंदगी में पहली बार वो अपनी ही सगी बेटी के साथ ऐसा करेगा, कितना मजा आएगा, कैसी होगी रजनी की? कैसा लगेगा जब मैं उसको छुउंगा, बरसों से मैं स्त्री की योनि के लिए तरस गया हूँ और आज मैं अपनी ही बेटी की बूर छुउंगा, उसको छेड़ूँगा, मसलूंगा, यही सब सोच सोच के वो कामोन्माद में पागल हुआ जा रहा था।

यही हाल घर में रजनी का भी था, उसके लिए भी दिन काटना किसी पहाड़ से कम नही था, आज उसने अपनी बेटी को दिन में सुलाया ही नही ताकि वो रात भर सोती रहे और उसे रात में कोई परेशानी न हो, वो निश्चिन्त होकर अपने बाबू के साथ महापाप कर उसका आनंद ले सके।

उदयराज दोपहर को भोजन करने के लिए घर आया, काकी ने उसको खाना दिया, खाना खाकर वो फिर से खेतों में चला गया।

खैर किसी तरह दिन बीता शाम हुई और उदयराज घर आया, बैलों को हौदे में बांधकर चारा डाल दिया।

नाहा धोकर तरो ताज़ा हो गया, फिर खाट उठायी और कुएं के पास जाकर लेट गया, अंधेरा हो चुका था, दिल की धड़कने बढ़ गयी थी।

खाना अभी बना नही था, रजनी घर में जल्दी जल्दी बना रही थी, बेटी तो उसकी आज जल्दी ही सो गई थी, दिन में रजनी ने सुलाया जो नही था।

आखिर खाना बन गया और काकी ने उदयराज को खाना बाहर ही लाकर दिया, उदयराज के खाना खा लेने के बाद घर में रजनी और काकी ने भी खाना खाया, फिर काकी बाहर आके रजनी की बिटिया को अपनी खाट पे लेके लेट गयी।

उदयराज भी अपनी खाट पे लेट के बड़ी बेसब्री से इतंज़ार करने लगा, अभी तो रात के 10 बजे थे, सीधा सीधा 2 घंटा बचा था, बिस्तर पर करवटें बदल बदल के उसका बुरा हाल हो गया, कभी लेटता, कभी उठकर धीरे धीरे टहलने लगता, फिर लेट जाता।

उधर रजनी ने आज घर की पीछे वाली कोठरी में जा के उसके अंदर पड़ी खाट बाहर निकाल कर उसमे एक चटाई बिछा दी, दिन में फूलों से बनाई हुई मालाओं से उसने पूरी कोठरी सजा दी और उसमे मिट्ठी की कटोरी में कुछ कपूर रखकर जला दिए, कपूर और फूलों की महक ने पूरी कोठरी को सुगंधित कर डाला, यहां तक कि उसकी सुगंध आंगन तक आ रही थी।

फिर रजनी आंगन में आके पड़ी हुई खाट पर लेट गयी अभी काफी वक्त बचा था, इंतज़ार तो उससे भी नही हो रहा था।

आखिरकार जैसे तैसे 11:30 हो गए, रजनी की सांसे तेज चलने लगी, वह खाट से उठी और एक हल्का पीला चादर लिया, घर के सारे दिये और लालटेन बुझा दिए बस एक छोटा सा घी का दिया जलाकर कोठरी के दरवाजे पर रख दिया।

बाहर का मेन दरवाजा खुला हुआ था बस वैसे ही उसके किवाड़ सटाये हुए थे।

रजनी कोठरी में जाके चादर ओढ़कर चटाई पर लेट गयी, और बेसब्री से अपने बाबू का इंतज़ार करने लगी, सांसे उसकी भारी हो चली थी। मंद मंद वो मुस्कुराये जा रही थी, आज क्या होने वाला है।

रात का सन्नाटा छा चुका था, सब सो गए थे।

उदयराज धीरे से अपनी खाट से उठा, धीरे धीरे चलता हुआ वो घर की तरफ बढ़ने लगा, जब काकी की खाट के पास से गुजरा तो देखा कि काकी सो रही थी।

आखिरकार वो घर के मेन दरवाजे पर पहुँचा, दरवाजा हल्का सा आपस में सटाया हुआ था उसने हल्का हाथ लगा के दरवाजा खोला, बस इतने से ही रजनी जान गई कि उसके बाबू घर में आ गए हैं वो सिरह उठी, चादर को उसने अच्छी तरह तान के अपना पूरा बदन उससे ढक लिया।

जैसे ही उदयराज ने दरवाजा खोला पूरे घर में फैल चुकी कपूर और फूल की महक उसके नथुनों में पड़ी, इस महक ने काम वासना को और भड़काने में आग में घी का काम किया।

घर के अंदर दाखिल होकर उदयराज दरवाजे को अंदर से धीरे से बंद कर आगे बढ़ा, गुप्प अंधेरा था बरामदे में, अंदाजे से वो अलमारी के पास गया और दिव्य तेल की शीशी उठा ली, जैसे ही आंगन में आया तो देखा सबसे पीछे बनी कोठरी के दरवाजे पर दिया रखा हुआ है जिसकी मध्यम हल्की रोशनी आस पास तक ही फैली हुई थी।

दरवाजा खुला हुआ था, वातावरण बिल्कुल शांत था, जैसे ही उदयराज दरवाजे तक आया रजनी को इसका अहसास हो गया वो कसमसा उठी, उदयराज ने उसे देखा, जमीन पर चटाई बिछा कर सर से लेकर पाँव तक पीले रंग का चादर ओढ़े उसकी सगी शादीशुदा बेटी लेटकर पाप का आनंद लेने के लिए अपने पिता का इंतज़ार कर रही है, इस बात को सोचकर वो झूम उठा, आखिर वो पल आ ही गया। चादर से पूर्ण रूप से ढके होने के बाद भी अपनी बेटी के पूर्ण शरीर की लंबाई चौड़ाई देखकर उसे जोश चढ़ गया। रजनी पीठ के बल बिल्कुल सीधी लेटी थी हाथों को उसने सर के ऊपर ले जाकर मुठ्ठी से चादर तान कर चादर को पकड़ा हुआ था जिससे उसकी मोटी मोटी दोनों चूची तन कर ऊपर को उठ गई थी और उसके उभार चादर के ऊपर से ही दिख रहे थे, काम वासना से वशीभूत होकर तेज चलती हुई सांसों की वजह से उसके उन्नत मोठे उरोज सांसों के साथ साथ ऊपर नीचे होते हुए बहुत मादक लग रहे थे। कुछ देर उदयराज पास खड़े होकर उसके पूर्ण शरीर को बहुत बेशर्मी और कामुक नज़र से निहारता रहा फिर एक नज़र उसने पूरी कोठरी में डाली, पूरी कोठर फूलों से सजी थी, मानो वो उसका सुहागरात कक्ष हो, खुद रजनी ने उसे सजाने में इतनी मेहनत कर डाली थी तो इसका मतलब ये था कि खुद उसकी सगी बेटी उसके साथ पाप का सुख भोगने के लिए कितनी बेताब है। इतना मजा तो उसे बहुत वर्ष पहले सुहागरात में अपनी पत्नी के साथ भी नही आया था जितना आज सगी बेटी के साथ आ रहा था जबकि अभी तो उसने कुछ शुरू भी नही किया था, आखिर छुप छुप कर सगे रिश्ते में किये गए व्यभिचार और पाप में कितना मजा छिपा होता है।

फिर वह एकाएक चादर के ऊपर से ही सांसों के साथ ऊपर नीचे होते हुए रजनी के भारी चूचीयों को निहारते हुए उसके दायीं तरफ कमर के पास बैठ गया।

रजनी ने कसमसा कर अपनी जांघे भीच ली, उदयराज ने तेल की शीशी बगल में रखी, अपना सीधा हाथ उसने चादर के अंदर डाला और धीरे धीरे रजनी की नाभि पर रखा, रजनी स्पर्श महसूस कर गनगना गयी उसके मुँह से हल्की ही aaahhhh निकल गयी, फिर उदयराज अपना हाँथ नाभि के नीचे की ओर बढ़ाने लगा रजनी कंपन से थरथरा उठी, उदयराज की उंगलियां नाभि के नीचे बंधी साड़ी के छोर से टकराई, रजनी बार बार वासना में अपनी जाँघे भीच ले रही थी, उदयराज ने अपनी उंगलियां साड़ी के अंदर प्रवेश करा दी पर तुरंत उसे साड़ी के नीचे बंधे साये के नाड़े ने रोक दिया, उदयराज ने तुरंत चादर में ढके रजनी के मुंह की तरफ मदहोश आंखों से देखा, रजनी को महसूस हुआ कि उसके बाबू उसकी तरफ देख रहे हैं वह चादर के अंदर ही वासना से वशीभूत हो मुस्कुरा उठी।

फिर एकाएक उदयराज ने नाड़े की डोरी को सर्रर्रर्रर्रर से खींचकर खोल दिया, डोरी खुल गयी, रजनी ने लाज के मारे अपनी जाँघे और भीच ली, माना कि वो खुद बेताब थी अपने बाबू की उंगलिया अपनी बूर पर महसूस करने के लिए पर एक सगी बेटी होने के नाते और आज जीवन में ये पहली बार हो रहा था कि उसके बाबू उसके साथ ये कर रहे थे तो वह लज़्ज़ा से गड़ी भी जा रही थी। उसकी सांसे भारी हो चली थी, माथे और चेहरे पर वासना की गर्मी से पसीना आना शुरू हो गया था।

उदयराज ने अपना हाथ साये के अंदर डाल दिया और उसकी उंगलियां बूर के ऊपरी हिस्से पर जा पहुँची, बूर के उस हल्के फूले हुए ऊपरी हिस्से (जो हल्के बालों से भरा था) पर उदयराज अपनी उंगलियां चलाने और सहलाने लगा, एकाएक उसने अपनी बीच की उंगली जहां से बूर की फांक की शुरुवात होती है उसपर रखा और बूर की दरार में हल्का सा उंगली डुबोते हुए पूरी बूर को हथेली में भर लिया।

रजनी ने aaaaahhhhhh bbaaabbbuuu की हल्की सी मादक आवाज निकालते हुए अपनी जाँघे हल्का सा खोलकर अपनी मक्खन जैसी बूर अपने बाबू को छूने के लिए परोस दी।

उदयराज होश खो बैठा, आज वो अपनी सगी शादीशुदा बेटी की बूर छू चुका था, क्या मक्खन जैसी बड़ी बड़ी फांकों वाली बूर थी उसकी अपनी ही सगी बेटी की, बूर की फांकों पर भी हल्के बाल थे, फांकों की साइड में भी हल्के बाल थे, उदयराज ने चार पांच बार बूर को पूरा पूरा हथेली में भरकर भींचा, रजनी होशो हवास खो चुकी थी।

दोनों के शरीर का कोई भी अंग नही छू रहा था बस उदयराज रजनी की साड़ी में हाथ डाले उसकी बूर को सहला और मसल रहा था।

उदयराज अपनी चारों उंगलिया बूर पर फिराने लगा, कभी वो बूर के ऊपरी हिस्से को सहलाता कभी फांकों और दरार को सहलाता हुआ बूर के नीचे तक हाथ ले जाता, इतना मजा तो उसे अपनी पत्नी की बूर चोदकर भी नही आया था जितना बेटी की खाली छूकर ही आ रहा था।

कामवासना में रजनी की बूर फूलकर खुल चुकी थी, पर उसका कसाव बरकरार था, रजनी को चुदे हुए कई साल हो गए थे, बूर उसकी जल्द ही रिसना चालू हो गयी, और रस उदयराज की उंगलियों को गीला करने लगा, चादर के अंदर रजनी बेसुध पसीने पसीने हो गयी थी, वासना में उसकी आंखें बंद थी, अपने होंठों को वो बड़ी कामुकता से दांतों से काट ले रही थी, मन तो उसका बेसब्र हो चुका था कि कस के बाबू से लिपट जाए पर....क्या करे, सब्र तो करना ही था।

रजनी ने अब अपनी जाँघे और खोल दी, उदयराज ने फांकों को उंगलियों से फैलाकर बूर की भगनासा (cliteries) पर उंगली गोल गोल घूमने लगा रजनी का बदन थरथरा गया, नस नस गनगना गयी, मुँह से न चाहते हुए भी hhhhaaaaiiiiiiii bbbbaaaabbuuuu, aaaaaahhhhhhhh, oooooooohhhhhhh, mmmmaaaaaaa सिसकते हुए बोल ही पड़ी।

तभी उदयराज को तेल का ध्यान आया उसने झट हाथ बाहर निकाल कर वो दिव्य तेल अपनी अंजुली में शीशी से निकालकर उड़ेला वह लाल रंग का दिव्य तेल था दिए कि हल्की रोशनी में वह चमक रहा था और उसकी मन मोहक खुशबू पूरी कोठरी में फ़ैल गयी, अब कोठरी में फूल, कपूर और तेल की मिश्रित खुशबू फैल कर सम्मोहित सा कर दे रही थी उदयराज एक हाँथ पर तेल को अंजुली में लिए रहा और दूसरे हाथ से साड़ी को उठा कर तेल वाला हाथ साड़ी में डालकर बूर पर तेल उड़ेल दिया, बूर पर तेल गिरते ही रजनी फिर गनगना गयी।

तेल को उसने पूरी बूर पर अच्छे से मला, फिर हाथ बाहर निकाल कर और तेल लिया और एक बार फिर साड़ी में हाथ डाल कर बूर पर अच्छे से तेल लगाया और बूर सहलाने लगा, तेल की मनमोहक गंध ने समा बांध दिया, हाथ से उसने बूर को थपथपाया, फांकों को सहलाया, रजनी हाय हाय करने लगी।

पूरी बूर तेल से सन गयी थी, फूल कर उसका आकार बड़ा हो गया था, भगनासा खिलकर बाहर हो उठ आया था। बूर की फांकें मुँह खोल चुकी थी। बूर ने थरथरा कर कामरस छोड़ना शुरू कर दिया था, उदयराज भगनासा को सहलाता जा रहा था, कभी वो अपने हाथ को बूर की दरार में चलाता हुआ नीचे ले जाता और फिर वापिस ऊपर लाता कभी चार उंगलियों को एक साथ भगनासा पे रखकर गोल गोल रगड़ने लगता।

रजनी haaaai bbaabu, uuuuufffc bbbbaaau, uuuhhhiii mmaaaannn, hhhhhhaaaaiiiiiii ddddaaaiyyyyyaaa, न चाहते हुए भी बोले जा रही थी।

एकएक उदयराज ने बूर की दोनों फांक को तर्जनी और अनामिका उंगली से फैलाकर चीरा और बीच वाली उंगली से बूर की छेद पर गोल गोल सहलाने लगा, रजनी की बूर अब बेताहाशा कामरस छोड़ने लगी। रजनी उदयराज के इस प्रहार से थरथरा गयी और वह अपनी दोनों जांघों को कस के भीचते हुए hhhhhhaaaaiiiiiiii bbbaaaaabbuuuuu बोलते हुए बायीं ओर पलट गई, उदयराज का हाँथ बूर पर था और जांघ भिचने से दब गया था उसने वहां से अपना हाथ निकाला और मुस्कुराते हुए चादर के ऊपर से रजनी के नितम्ब देखने लगा, फिर उसने पीछे से हाथ को साड़ी में डालना शुरू किया, रजनी समझ गयी और मुस्कुरा पड़ी, उदयराज ने भारी नितम्ब को न छूते हुए सीधा अपना हाथ पीछे की तरफ से ले जाकर बूर पर रख दिया, रजनी चिहुँक उठी और उसकी जोर से सिसकी निकल गयी, उदयराज फिर से पीछे से बूर सहलाने लगा, उसने बूर के संकरी छेद पर फिरसे उंगली घुमाना चालू कर दिया

उदयराज अचंभित था कि शादीशुदा होने के बाद भी और एक बच्ची होने के बावजूद उसकी सगी बेटी की बूर का छेद कितना संकरी था, जैसे की वो कुवारी हो।

कितना छोटा सा नरम नरम मुलायम सा मनमोहक छेद था उसकी अपनी ही सगी बेटी की मक्खन जैसी बूर का।

आग की भट्टी की तरह धधकने लगी थी बूर उसकी, कितना गर्म था वो छोटा सा बूर का छेद, वो समझ गया कि उसके दामाद के बस का नही था इस बूर को फाड़ना, इसलिए ये अभी तक कुंवारी जैसी है।

उदयराज ने रजनी के बूर के छेद से निकलते हुए कामरास को बीच वाली उंगली से ऐसे उठाया जैसे मक्ख़न के भरे हुए डिब्बे में से उंगली डाल कर कोई मक्खन उठाता है।

फिर उस कामरस में भीगी हुई उंगली को उसने अपनी नाक के पास ला के सूंघा।

पेशाब और कामरस की भीनी भीनी महक ने उदयराज को पागल ही कर दिया, उसके मुँह से आखिर निकल ही गया- aaaaaahhhhhhh bbeeeettttiiii, hhhhhaaaaaiii

रजनी के मुंह से भी uuuuuuffffff bbbbaaabbbuuuu निकला। वह सिसकारियों पे सिकारियाँ ले रही थी।

उस कामरस में पेशाब की महक ज्यादा थी जिसने उदयराज को बदहवास कर दिया। मन तो उसका कर रहा था कि लप्प से बूर को मुँह में भर के खा जाए, पर.....क्या करे, सब्र तो करना ही था।

कामरस सूंघने के बाद उसने उसे चाट लिया, फिर हाथ साड़ी के अंदर डाला और हाँथ बूर से दुबारा लगते ही रजनी फिर गनगना गयी, उदयराज ने फिर बूर की संकरी छेद से रिसते कामरस को उंगली से उठाया और फिर चाट गया ऐसा उसने पांच बार किया, पूरे मुँह में उसके रजनी का कामरस लगा हुआ था।

रजनी बेचैन होकर सिसकते हुए फिर पीठ के बल लेट गयी और उदयराज ने फिर से साड़ी में हाथ डाल दिया, फिर बूर को सहलाने लगा, बूर ने और कामरस छोड़ा, उदयराज ने इस बार वो कामरस उंगली में लगाया और चादर के अंदर रजनी के मुँह तक ले गया, अपनी ही पेशाब और कामरस की गंध से लिपटी अपने बाबू की उंगली को सूंघकर रजनी भी मचल उठी, पहले उदयराज ने उंगली उसकी नाक के पास ले जाकर उसे सुंघाया फिर एकाएक रजनी ने स्वयं ही वासना से आसक्त होकत अपने होंठ उस कामरास को चाटने के लिए खोल दिये।

उदयराज ने उंगली रजनी के मुँह में डाल दी और वो उसे बहुत की कामुक अंदाज़ में चाटने लगी, उदयराज ने रजनी को भी पांच बार उसी की बूर का कामरस चटाया, रजनी पूरी तरह मदहोश हो चुकी थी।

ये सब करते करते लगभग दस मिनट या उससे भी ज्यादा हो गया था, उदयराज ने बेमन से अपनी बेटी की बूर से हाँथ हटा लिया और तेल की शीशी उठा कर अपनी तड़पती बेटी को कोठरी में छोड़कर जाने लगा, उसने पलटकर एक बार फिर रजनी को देखा और कोठर से बाहर निकल गया, रजनी तड़पती सिसकती रह गयी, उदयराज का लंड तनकर विकराल रूप ले चुका था, उसने बरामदे में आकर लंड को adjust किया और शीशी को अपनी जगह पर रखा फिर धीरे से घर से बाहर निकल गया और जाकर अपनी खाट पर औंधे मुंह लेट गया, आज जो हो चुका था उसपर उसे विश्वास ही नही हो रहा था और लग रहा था कि उसके हाथ अब भी अपनी सगी बेटी की बूर को सहला रहे हैं काफी देर तक मदहोश होकर वो यही सब सोचता रहा की कितनी मस्त मक्खन जैसी बूर है रजनी की, कितना छोटा सा छेद है बूर का, और अब जल्द ही वो मुझे देखने को मिलेगी और फिर भोगने को और फिर न जाने कब आंख लगी कुछ पता नही।

रजनी भी काफी देर तक कोठरी में पड़ी सिसकती रही, उसे अभी भी ऐसा लग रहा था कि उसके बाबू की उंगलियां उसकी बूर को छेड़ रही हैं, सहला रही हैं, फांकों को फैला रही हैं। उसमे इतनी भी हिम्मत नही बची थी कि वो उठकर बाहर आ जाये, कामाग्नि में पूरी तरह जल रही थी वो, बहुत देर तक सिसकते सिसकते कब उसकी आंख लगी कुछ पता नही।
 
Update- 33

अगले दिन उठते ही उदयराज को ऐसा महसूस हुआ कि जैसे नया युग आरंभ हो चुका हो, मन और तन में अद्भुत खुमारी का अहसास हो रहा था, मन इतना खुश था कि मानो संसार की सारी खुशियाँ आज उसकी झोली में हो, जैसे कोई ऐसा कठिन युद्ध जीत लिया हो जो असंभव था, उसने अपने हांथों को देखा और सोचने लगा बीती रात को किस चीज़ को छुआ था इन्होंने uuuuffff, मानो अभी भी बूर पर रेंग रहे हों, वो नरम नरम बूर की फांकें, उसकी गंध, सुबह उठते ही जैसे उसके नथुनों से वही गंध हवा में मिलकर टकरा रही हो। पाप का आगाज हो चुका था।

रजनी तो वहीं कोठरी में पड़ी पड़ी सिसकते हुए सो गई थी, सुबह 5 बजे करीब उसकी आंख खुली तो ऐसा लगा जैसे नई दुनियां में आ गयी हो, सब कुछ वही था, वही घर, वही आंगन, पेड़, पशु, सब वही था पर फिर भी सब नया नया सा लगने लगा, उसके साथ उसके अपने ही पिता ने रात को क्या किया?, कैसे किया? ये सोचते ही सुबह सुबह ही उसकी बूर फिर तड़प उठी, बहुत बेचैन हो गयी वो, फिर जैसे तैसे उठी, और आज फिर होने वाले उसी पापकर्म को सोचकर मुस्कुराते हुए घर के काम में लग गयी।

उदयराज कल की तरह आज भी जल्दी नाश्ता करके खेतों में चला गया।

दोपहर हुई, दोपहर से शाम हुई और शाम से रात, खाना खा के उदयराज आज फिर बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था, जैसे ही घड़ी की सुई ने 11:45 बजाए, वो तुरंत उठा और घर की तरफ चल दिया, दरवाजा कल की तरह खाली भिड़ाया हुआ था, धीरे से दरवाजा खोलकर अंदर गया, तेल की शीशी उठायी और कोठरी की तरफ चल दिया, सामने कोठरी के दरवाजे पर आकर रजनी को देखा तो वो आज भी कल की तरह पूरा चादर ओढ़े लेटी तो थी पर कुछ खास तरीके से, दरअसल रजनी बायीं तरफ करवट होकर लेटी थी, उसके नितम्ब दरवाजे की ओर थे, उसके पैर घुटनो तक मुड़े हुए थे जिससे उसकी भारी मदमस्त गांड उभरकर पीछे को निकल आयी थी।

अपने बाबू की आहट पाकर वो हल्का सा कसमसाकर हिली।

रजनी का दरवाजे की तरफ गांड करके लेटने का अर्थ उदयराज को समझ आते ही उसके चेहरे पर कामुक मुस्कान आ गयी वो समझ गया कि उसकी बेटी चाहती है कि वो आज उसकी बूर को पीछे से हाथ डाल के सहलाये।

उदयराज ने देखा कि ठीक कल की तरह आज भी रजनी ने कोठरी को नए फूलों से सजा रखा था और फूल तथा कपूर की खुशबू से कोठरी महक उठी थी।

उदयराज धीरे से आ के रजनी की गांड के पास बैठ गया, और अपना हाथ धीरे धीरे नाभी की ओर बढ़ाया, साड़ी के अंदर हाथ डालकर उसने नाड़े को खींचकर खोल दिया, साड़ी और साये की पकड़ अब ढीली हो गयी थी, रजनी सिसक उठी aaaahhhhhhh, उसकी बूर तो आज पहले ही रस छोड़ रही थी।

फिर उदयराज ने वहां से अपना हाथ निकालकर गांड की तरफ से गांड को न छूते हुए अपना हाथ सीधा बूर पर रख दिया, रजनी oooooohhhhh bbbaabbuuu कहकर चिहुँक उठी, उसका पूरा बदन थरथरा और गनगना उठा, उदयराज को हाथ लगाते ही ये महसूस हुआ कि उसकी बेटी की बूर तो पहले से ही भट्ठी की तरह जल रही है, मदहोश हो गया वो इतनी नरम और गरम बूर को छूकर, बूर तो फूलकर अपने सामान्य आकार से काफी ज्यादा बड़ी हो चुकी थी पर उसका प्यारा सा नरम नरम संकरी छेद वैसे ही कसा हुआ था, बूर की फांकें संभोग की आग में गरम होकर जल रही थी। उदयराज अपनी सगी बेटी की

पूरी बूर को हथेली में भरकर मीजने लगा, फांकों पर तर्जनी उंगली से दबाने लगा, पूरी बूर का मानो मुआयना कर रहा हो, कभी अपनी बीच वाली उंगली को बूर की दरार में डुबोता तो कभी फांकों पर हल्के हल्के बालों को सहलाता।

रजनी का बदन अब थरथराने लगा, उत्तेजना चरम सीमा तक इतनी जल्दी चढ़ जाएगी ये रजनी को विश्वास नही था, उसकी बूर नदी की तरह बहकर कामरस छोड़ने लगी।

रजनी हाय हाय करने लगी, उसको असीम आनद की अनुभूति होने लगी, काफी देर उदयराज अपनी सगी बेटी की बूर को छेड़ता, सहलाता, और भींचता रहा, कभी वो cliteries को दो उंगलियों से पकड़कर सहलाता, कभी अपनी तर्जनी उंगली cliteries पर गोल गोल घुमाता और फिर कभी उँगलियों से बूर के मदमस्त नरम नरम छोटे से छेद को छेड़ता। जैसे ही उदयराज अपनी सगी शादीशुदा बेटी की बूर के भागनाशे को छेड़ता रजनी बुरी तरह थरथरा जाती, उसका पूरा बदन ऐंठ जाता और उसके मुंह से

aaaaaahhhhhhh, hhhhaaaaaiiiiiiiii, uuuuuuuuuuffffffffff, bbbaaaaabbbbbuuuuu, धीरे धीरे सिसकारियों के साथ निकलने लगता। रजनी को इतना मजा अभी तक कभी नही आया था वो तो जैसे जन्नत में पहुँच गयी थी।

रजनी के काम रस से उदयराज की पूरी उंगली काफी पहले ही भीख चुकी थी, उदयराज ने अपना हाथ साड़ी के अंदर से निकाला और दिव्य तेल को हाथ पर उड़ेला, फिर हाथ को बड़ी सावधानी से बचाते हुए की वो भारी नितंबों को न छू जाए, बूर तक ले गया और सारा तेल बूर पर उड़ेलकर मर्दन करने लगा, उदयराज कुछ पल तक कस कस के बूर का मर्दन करता रहा, रजनी को एकाएक लगा कि वो अब झड़ जाएगी, इतना उनसे बर्दाशत नही हो पायेगा अब, तो एकदम से उसने चादर के अंदर से ही अपने बाबू का हाथ पकड़ लिया और कुछ देर पकड़े रही, अपनी उखड़ती सांसों को काबू करती रही। वो नही चाहती थी कि वो यूँ ही सिर्फ हाथ से सहलाने से झड़े, कई वर्षों से वो चुदी नही थी, वो अपने बाबू का लंड खाकर उसकी जबरदस्त चुदाई से झड़ना चाहती थी।

उदयराज रजनी के इस तरह उसका हाथ पकड़ने से समझ गया कि रजनी क्या बोल रही है, उसने अपना हाथ कुछ देर रोककर बूर पर रखे रहा फिर उंगलियों को अपनी नाक के पास लाके सूंघा और कामरस को चाटने लगा

रजनी ने अपना हाथ वहां से हटा लिया और पीठ के बल लेट गयी, उसने महसूस किया कि उसके बाबू बड़े चाव से कामांध होकर उसकी बूर का रस चाट रहे हैं, कोठरी में बहुत कम रोशनी थी और चादर के अंदर से तो बिल्कुल दिख नही रहा था, वह खाली आवाज से ये महसूस कर रही थी कि उसके बाबू उसकी बूर का मक्ख़न चाट रहे हैं, वह मुस्कुरा उठी, उदयराज ने फिर अपना हाथ नाभी की तरफ से साड़ी के अंदर डाला और फूली हुई बूर की दरार में तर्जनी उंगली डालकर मक्ख़न निकाला, जैसे ही उदयराज ने तर्जनी उंगली को बूर की दरार में डुबोया, रजनी के मुंह से फिर से एक बड़ी ही aaaaaaaaahhhhhhhhhh निकल गयी।

पेशाब की महक में सना वो बूर का मक्ख़न उदयराज मदहोश होकर चाट गया, अपनी सगी शादीशुदा बेटी के पेशाब की महक उदयराज को इतनी अच्छी लग रही थी कि उसका मन कर रहा था कि वो बस अपनी बेटी के बूर पर मुँह लगा के उससे निकलने वाला पेशाब जी भरके पी ले, वो देखना चाहता था कि उसकी बेटी की बूर से पेशाब कैसे निकलता है, जब वो बैठ कर मूतती है तो उसकी बूर देखने में कैसी लगती है, वो दृश्य कितना मादक होगा।

पर अभी उसमे कुछ वक्त बाकी था जल्दी ही वो अपना ये ख्वाब पूरा करेगा। यही सब सोचते हुए उसने पांच बार अपनी बेटी की बूर से काम रस रूपी मक्ख़न अपनी तर्जनी उंगली से निकलकर चाटा।

फिर उसने कल की तरह रजनी की ही बूर का मक्ख़न अपनी उंगली में लगा के उसके होंठो तक ले गया, रजनी उसकी महक से फिर मदहोश हो गयी और लब खोल दिये, उदयराज ने उंगली उसके मुँह में डाल दी और वो चाटने लगी जैसे बरसों की प्यासी हो, उदयराज कभी उसके होंठों पर अपनी उंगली से वो रस लिपिस्टिक की तरह लगाता और रजनी जीभ होंठों पर फिरा फिरा के चाटती तो कभी अपनी पूरी उंगली उसके मुँह में घुसेड़ देता और रजनी लॉलीपॉप की तरह चूसती, ऐसे ही उसने पांच बार बूर का रस अपनी बेटी को चटाया।

देखते ही देखते लगभग दस मिनट से ऊपर हो गए थे, उदयराज को अब बेमन से उठकर जाना था, जैसे ही उसने साड़ी की अंदर से अपना हाथ निकाला और तेल की शीशी बंद करने लगा रजनी समझ गयी कि अब बाबू चले जायेंगे, वो मन ही मन बहुत तड़प उठी, जैसे कह रही हो कि बाबू न जाओ, न जाओ मुझे तड़पता हुआ छोड़कर, आपकी छुवन से मेरी बूर में आग लग गयी है इसमें अपना मोटा मूसल जैसा लन्ड डालकर इसको रात भर चोदो, फाड़ डालो इसे बाबू, बहुत प्यासी है ये, अभी न जाओ बाबू, आपकी बेटी आपसे चुदना चाहती है, उसकी बूर सिर्फ आपकी है चोदो उसे।

पर जो कर्म लिखा था उसका पालन तो करना ही था, उदयराज भी बेमन से उठा और एक नज़र उसने रजनी को देखा और वहीं उसी के सामने खड़े खड़े ही, उसे दिखाते हुए उसने अपना मूसल जैसा बलशाली लंड धोती के ऊपर से ही adjust किया, रजनी को साफ साफ तो नही दिखा पर इतना तो जरूर दिखा की उसके बाबू का हाथ उनके लन्ड पर था, ये समझकर उसकी हल्की सी सिसकी निकल गयी कि उसके बाबू का लंड उसकी बूर में जड़ तक घुसने के लिए दहाड़े मार कर खड़ा हो चुका है।

उदयराज कोठरी से बाहर निकल गया और रजनी तड़पती रही।

इसी तरह एक रात और बूर की सहलाई और छुआई में निकल गयी।

उदयराज और रजनी को बेसब्री से इंतज़ार था अब चौथी रात का जिसमे होना था- "नग्न"

कमर से नीचे तक नग्न होकर अपना अनमोल खजाना अपने बाबू की आंखों के सामने लाने के लिए रजनी बेसब्र हो रही थी तो वहीं उदयराज भी अपनी बेटी की मक्ख़न जैसी बूर को देखने के लिए पागल हुआ जा रहा था, वह बार बार ये सोचकर सिरह उठता था कि जब वो रात को कमर से नीचे का जिस्म साड़ी उतारकर पूर्ण नग्न कर देगा तो उस वक्त उसकी अपनी सगी शादीशुदा बेटी का नंगा जिस्म देखने में कैसा लगेगा, उसकी बूर कैसी होगी, बूर की बनावट कैसी होगी, उसकी जाँघे कैसी होंगी, उसकी गांड कैसी और कितनी बड़ी होगी, देखकर कैसा लगेगा, अभी तक तो उसने सिर्फ बूर को ही छुआ था पर अब वो कमर से नीचे का सारा जिस्म नंगा करके देखेगा। यही सब सोचकर वह वासना में गनगना जाता। अब उसे और रजनी को इंतज़ार था तो बस बूर दिखाई की रात का।
 
Update- 34

तीसरी रात जब उदयराज ने अपनी सगी बेटी की बूर का मर्दन करके और बूर का मक्ख़न खा के कर्म को पूरा किया तो वह अपने साथ लाये एक कागज पर कुछ लिखने लगा और लिखकर रजनी के सर के पास रखकर कोठरी से निकल गया, दिन में ये बात उसके दिमाग में आई थी कि कर्म के अनुसार एक दूसरे को देख नही सकते, एक दूसरे से बोल नही सकते पर लिखकर बयां तो कर ही सकते हैं। इसलिए उदयराज ने कागज पर कुछ लिखा और रजनी के पास रखकर चला गया। रजनी को उस वक्त ज्यादा साफ न दिखने से ठीक से पता नही चल पाया कि उसके बाबू क्या कर रहे हैं, उसे ये लगा कि पिछली रात की तरह वो अपने दहाड़ते हुए लन्ड को समझा रहे हैं कि थोड़ा सा और सब्र कर ले, और यह सोचकर वो मुस्कुराकर सिसकते हुए सो गई थी, पर चौथे दिन जब वो सुबह 4 बजे उठी तब उसे वो कागज मिला, रात का दिया तो बुझ चुका था, झट से उसने दिया जलाया और कागज खोला-

"मेरी प्रिय बेटी इतना सुख मुझे जीवन में कभी नही मिला....कभी नही, तू इतनी सुंदर है, तेरा वो अंग इतना कोमल और नरम नरम है कि मैं होश खो देता हूँ, इन तीन दिनों में मैंने जो तेरा काम रस चखा है, उससे मुझे कभी दूर मत करना, तुझे पाकर मैं धन्य हूँ, तेरे हुस्न से, तेरी अदा से मैं कायल हो गया हूँ तू सिर्फ मेरी है सिर्फ मेरी।


तीन रात तो बीत गयी अब चौथी रात होगी, उस रात का मुझे बहुत ही बेसब्री से इंतज़ार है, तब मैं तेरी वो देखूंगा.....वो, जिसको मैं तीन दिन से छू कर महसूस कर रहा था, चौथी रात मेरे जीवन की एक बहुत ही अनमोल रात है। ऊपर के रसीले होंठ को तो मैंने हमेशा देखा है जो कि दुनियाँ में सबसे रसीले हैं पर अब मैं नीचे के भी रसीले और नशीले होंठ देखूंगा, मैं तो दीवाना हो गया हूँ, जैसे कोई दूल्हा अपनी दुल्हन को उसकी मुँह दिखाई पर कुछ उपहार देकर या उसकी कोई मनोकामना पूरी कर उसके तन मन का सम्मान करता है वैसे ही मेरे मन में भी आवाज उठ रही है कि मैं अपनी बेटी को उसकी वो दिखाई पर उसकी मनोकामना पूर्ण कर उसका सम्मान करूँ, बोल मेरी रानी बिटिया मैं तेरी क्या मनोकामना पूर्ण करूँ?"

इतना पढ़ते ही रजनी तो सातवें आसमान में उड़ने लगी, गदगद हो गयी वो, उसने भी जल्द ही एक कागज कलम उठाया और मुस्कुराते हुए कुछ लिखने लगी। जब काकी घर में आई तो उनको देकर बोली- काकी ये पर्ची बाबू के तकिए के नीचे चुपचाप रख देना, कर्म से संबंधित कुछ है।

काकी समझ गयी कि इसको खोलना नही है और तुरंत ही जाकर उदयराज के तकिए के नीचे धीरे से रखकर चली आयी।

अभी थोड़ा अंधेरा था उदयराज सो ही रह था 5 बज चुके थे फिर 5:15 हुए, थोड़ा थोड़ा उजाला होने लगा, उदयराज उठा, आज कौन सा दिन था उठते ही सबसे पहले ये ख्याल उसके मन में आते ही ख़ुशी से पगला गया।

बिस्तर समेटने के लिए जैसे ही तकिए को उठाया, सामने कागज fold कर पड़ा हुआ था, मन मयूर झूम उठा उसका ये जानकर की बेटी ने उसकी उसकी छोड़ी हुई पर्ची पढ़ ली है और ये उसका जवाब है, हो न हो जरूर उसने ये काकी के हाथ रखवाया होगा, मन में तो उसके हुआ कि घर में जाके रजनी को बाहों में भरकर ताबड़तोड़ चूमने लगे, पर वासना और खुशी का घूंट पीकर रह गया। उस पर्ची को उसने उठाकर धोती में ये सोचते हुए खोंस लिया कि खेत में जाके तसल्ली से पढ़ेगा।

जल्दी जल्दी वो तैयार होकर खेतों में हल और बैल लेकर निकल गया, आज उदयराज को अपने दूर वाले खेत की मेड़ पर मिट्टी भी चढ़ानी थी, एक खेत तो उसका कुल वृक्ष के पास भी था पर वो खाली जोतकर छोड़ा हुआ था उस खेत के बाद नदी थी तो उसमें अक्सर वो धान की फसल लगाता था।

उदयराज ने जल्दी से खेत में पहुँचकर वो कागज खोला-


मेरे बाबू, मेरे दिल के राजा, मैं भी आपके बिना अब नही जी सकती, मेरा सिर्फ काम रस ही क्या, सबकुछ आपका है, और आजीवन रहेगा जितना जी भरके चाहो उतना चखो, मैं तो खुद आपकी दीवानी हूँ, मैं सिर्फ आपकी हूँ सिर्फ आपकी, मेरी हर चीज़ आपकी है, मेरे हर अंग पर सिर्फ आपका हक़ है, ऐसा यौन सुख एक बेटी को सिर्फ अपने बाबू से ही मिल सकता है और किसी से नही, और बाबू आज रात को जो आप देखोगे न उसको बूर कहते हैं, बताया तो था अभी कुछ दिन पहले धीरे से आपके कान में मेरे भोले बाबू जी। कितना शर्माते हो आप, अपनी ही बेटी से कोई इतना झिझकता है पगलू कहीं के। बेटी तो अपने बाबू के दिल में बसी होती है छुप छुप कर अपने पिता के दिल में रहती है मां से भी ज्यादा।

आपकी बेटी सिर्फ आपकी है और उसकी बूर सिर्फ आपके लिए है, एक बात बोलूं बाबू, मैं अभी भी कुंवारी जैसी ही हूँ कई वर्षों से, बस आप समझ जाइये की अब आपको मुझे कैसे और कितना प्यार देना है, आज रात का मुझे भी बहुत बेसब्री से इतंज़ार है, मैं आज लाल रंग की साड़ी पहनूँगी और अपने बगल में एक और घी का दिया बिना जलाए रखे रहूँगी क्योंकि बाहर वाले दिये से अच्छे से दिखेगा नही आप जब आना तो वो दिया जला लेना।


और मुझे आपसे जो चाहिए वो है सिर्फ आपका साथ और बस आपका प्यार, लेकिन फिर भी आपका मान रखने के लिए जब वक्त आएगा तब मैं मांग लूंगी अपने बाबू से क्योंकि अभी मुझे सिर्फ आपका प्यार पाने के सिवा कुछ सूझ नही रहा, और आपने ये जो तरीका निकाला है बात करने का उस पर तो मैं वारी वारी जाऊं मेरे बाबू मैं भी आपसे बात करना चाहती थी पर बेबस थी। आज की रात आपकी बेटी बहुत बेसब्री से आपका इंतजार करेगी।"

उदयराज ये पढ़ते ही झूम उठा किसी तरह उसने दिन भर सारा काम किया और शाम को जल्दी ही घर आ गया, काकी द्वार पर बैठी उसका इंतजार कर रही थी, उठकर गयी और पानी लायी, उदयराज ने पानी पिया और जाकर नहा लिया।

रजनी ने जल्दी जल्दी खाना बनाया और काकी ने उदयराज को बाहर ही नीम के पेड़ के नीचे खाना दिया और घर में रजनी और काकी ने भी खाना खा लिया, आज रजनी की बेटी थोड़ा रो रही थी रजनी ने उसे दूध पिलाया फिर काकी उसे काफी देर बाहर घुमाती रही और वो सो गई, काकी उसको लेकर अपनी खाट पर लेट गयी थोड़ी देर बाद उसकी भी आंख लग गयी। जैसे ही वक्त हुआ उदयराज अपनी खाट से उठा, रोज की तरह धीरे धीरे कदमों से चलता हुआ दरवाजे तक पहुँचा, जैसे ही हल्के दरवाजे की खुलने की आवाज हुई उधर कोठरी में लेटी रजनी ने नशे में अपनी आंखें मूंद ली, सांसे तेज चलने लगी, दिल धक धक करने लगा।

उदयराज ने आज तेल की शीशी नही ली बस कागज और कलम लिया।

आज कोठरी से लाल गुलाब की अत्यंत मनमोहक खुशबू आ रही थी जिसमे कपूर की खुशबू भी मिली हुए थी।

उदयराज कोठरी के दरवाजे के सामने आकर खड़ा हो गया, रजनी का दिल रोमांच से भर गया, उसने रोज की तरह कसमसा के अपने बाबू को ये आभास कराया कि वो उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रही है।

आज दिये कि मध्यम रोशनी में लाल गुलाब से सजी कोठरी काम वासना को चरम पर पहुँचा रही थी, उदयराज अपनी बेटी की मेहनत पर गदगद हो गया, आखिर रोज रजनी हमारे इस प्यार को और सुखमय बनाने के लिए कितनी मेहनत कर रही है, मैं कसम खाता हूं कि अपनी बेटी के एक एक अंग को चरम सुख की प्राप्ति कराऊंगा, इतना प्यार दूंगा उसे की रोम रोम पुलकित हो उठेगा उसका। उदयराज ने एक संकल्प किया और एक भरपूर नज़र कोठरी में सजे फूलों पर डाली और उसमे से एक गुलाब तोड़कर हाथ में ले लिया।

उदयराज ने देखा रजनी ने बगल में एक छोटा दिया और माचिस रख दिया था, रजनी आंखें मूंदें चादर ओढ़े अपने बाबू की हर हरकत को भांप रही थी उसके दिमाग में बस अब एक ही बात थी कि अब आगे बाबू क्या करेंगे, अब क्या करेंगे, सारी दुनियां भूल चुकी थी वो।

उदयराज ने एक भरपूर नज़र अपनी बेटी के बदन पर डाली और उसके घुटनों के पास दायीं ओर बैठ गया, कागज और कलम बगल में रखकर कागज के ऊपर फूल जो उसने तोड़ा था उसको रख दिया।

रजनी से बर्दाश्त नही हो रहा था वो बार बार कसमसा के अपने बाबू को यह इशारा कर रही थी कि बाबू खोलो न।

उदयराज ने रजनी के पैरों से दबे चादर को पकड़कर ऊपर की तरफ हटाना शुरू किया जैसे ही रजनी के पैर बाहर दिखे उदयराज अपनी बेटी के गोरे गोरे दोनों पैर देखकर ही सम्मोहित सा हो गया, आज तीन दिन के बाद वो रजनी के पैर देख रहा था, रजनी ने अपने पैर के अंगूठे और उंगलियों को आपस में रगड़कर अपने बाबू को रिझाया।

पैरों में पड़ी पायल और दोनों पैर की उंगलियों में पड़ी बिछिया ने उदयराज का मन मोह लिया, लाल रंग की नेल पॉलिश उस गोरे गोरे पैर पर कयामत ही लग रही थी, कोठरी में हल्की रोशनी थी पर फिर भी रजनी का गोरा बदन चमक रहा था।

उदयराज ने पैरों को घूरते हुए चादर को खींचकर पूरा कमर तक पलट दिया, रजनी की सांसें तेज तेज चलने लगी, उदयराज ने देखा कि रजनी ने लाल साड़ी पहनी हुई थी आज वो दुल्हन की तरह लाल साड़ी पहनकर लेटी थी, चादर खिंचने से रजनी की साड़ी थोड़ा ऊपर चढ़ गई थी जिससे उसके गोरे गोरे पैर और उसपर भूरे भूरे रोएं देखकर उदयराज का लन्ड हरकत करने लगा।

पहले तो उदयराज ने पैर की तरफ से साड़ी ऊपर करने की सोची पर उसने इरादा बदलकर अपना हाथ ऊपर की तरफ बढ़ाया। रजनी समझ गयी और उसने साड़ी का पल्लू जो पीठ के नीचे दबा हुआ था उसको खींचकर लेकर कमर के पास रख दिया ताकि उसके बाबू को दिक्कत न हो, उदयराज ने चादर को और ऊपर तक किया अब रजनी की नाभि दिखने लगी, रजनी की गहरी नाभि देखकर उदयराज मदहोश हो गया एकदम से उसके दिमाग में आया कि योनि चुम्बन की रात तो कल है पर मैं नाभि तो चूम ही सकता हूँ और एकदम उसने नाभि पर एक गर्म जोरदार चुम्बन जड़ दिया।

रजनी को इसका आभास बिल्कुल नही था वह oooohhhhhhh bbbbaabbbuuuu कहकर चिहुँक उठी, उदयराज ताबड़तोड़ किसी बरसों के प्यासे की तरह नाभि और उसके आस पास कई चुम्बन अंकित करने लगा फिर उसने अपनी जीभ रजनी की गहरी नाभि में डाल दिया और डालकर काफी देर घुमाता रहा, कभी चूमता कभी घुमाता, रजनी uuuuuuuuffffffffff bbbbaaaaabbbbuuuuu करते हुए सिसक उठी।

उदयराज ने कुछ देर नाभि और उसके आस पास चूमने के बाद साड़ी के अंदर हाथ डालकर नाड़े की डोर खींचकर नाड़ा खोल दिया, साड़ी ढीली हो गयी और साया भी ढीला हो गया।

रजनी ने खुद ही अब सिसकते हुए अपने दोनों पर फैला कर अपने बाबू को जैसे पैरों के बीच आने का इशारा किया, उदयराज तुरंत समझ गया और उठकर दोनों पैरों के बीच आ गया।

और फिर वो हुआ जिसका बड़ी बेसब्री से इंतज़ार केवल उदयराज और रजनी को ही नही बल्कि नियति को भी था।

उदयराज ने अपने दोनों हांथों से रजनी की साड़ी को कमर से दोनों ओर से पकड़ा और धीरे धीरे नीचे की ओर सरकाने लगा, रजनी ने सिसकते हुए स्वयं ही अपने भारी नितंबों को उठाकर साड़ी को साये सहित नीचे खींचे जाने में अपने बाबू की मदद की, जैसे जैसे साड़ी नीचे सरकती गयी वैसे वैसे रजनी का निचला दूधिया बदन उजागर होता गया, रजनी की लाल रंग की पैंटी जो आज उसने जानबूझकर पहनी थी धीरे धीरे उदयराज की आंखों के सामने आती गयी, मोटी मोटी केले के तने के समान मांसल जांघे और उसमे फंसी छोटी सी लाल रंग की पैंटी ने उदयराज के होशो हवास उड़ा दिए।

जाँघों के बीच पैंटी के अंदर रजनी की फूली हुई बूर का आकार, दिये कि माध्यम रोशनी में साफ दिख रहा था, पैंटी उसकी बूर की फांकों में कुछ अंदर तक धंसी हुई थी और बूर जो वासना में काम रस छोड़े जा रही थी उससे बूर की जगह पर पैंटी गीली हो चुकी थी।

अभी साड़ी और साये को उदयराज ने घुटनों तक नीचे सरकाया था और उसकी नज़र अपनी सगी बेटी की माँसल मोटी मोटी कसी हुई जाँघों से हट ही नही रही थी, बहुत ही कामुक और बेशर्मी से आंखें फाड़े वो अपनी बेटी की टांगें, जांघ, पैंटी और नाभि को निहारता रहा फिर अचानक झुककर उसने दोनों जांघों को चूम लिया, उदयराज के होंठ अपनी जांघों पर लगते ही रजनी के जिस्म में गहराई तक कामुक तरंगे दौड़ गयी, वह सिरह उठी, तन और मन गनगना उठा, "उफ्फ बाबू" की हल्की आवाज निकालते हुए उसका बदन थरथराया।

वो डर भी रही थी कि कहीं बाबू बदहवासी में उसकी बूर को न चूम लें, क्योंकि बूर को चूमने और चाटने की रात कल है आज तो केवल दर्शन और सूंघने की रात है।

उदयराज बदहवासी में जांघों को चूमे जा रहा था और रजनी भी पागलों की तरह छटपटा रही थी, उसके मुंह से धीरे धीरे लगातार uuuuuiiiiimmmmmaaaaaaa........hhhhhhaaaaiiiiiiiiii.....bbbbbbbaaaabbbuuuuuuu, uuuuufffffffff....dddddaaaiiiiiyyyyyaaaaaa

निकले जा रहा था

उसका मन कर रहा था कि वो अपने पैरों की उंगलियों को आपस में रगड़े पर दोनों पैर के बीच उदयराज बैठा था, एकाएक उदयराज ने उठकर उसकी साड़ी को साये समेत खींचकर दोनों पैर से निकालकर बगल में रख दिया, रजनी ने भी अपने दोनों पैर अच्छे से उठाकर साड़ी को पूरा निकलने में अपने बाबू की मदद की। रजनी के बदन पर अब कमर से नीचे सिर्फ लाल रंग की पैंटी रह गयी थी, उदयराज रजनी के दोनों पैरों के बीच खड़ा मंत्र मुग्द होकर अपनी बेटी की मांसल गोरी गोरी जांघे और घुटने फिर नीचे के पैर घूरता रहा कुछ देर देखता रहा, उसका लन्ड फौलाद की तरह तनकर खड़ा हो चुका था, एक पल को उसे लगा कि वो अपना कंट्रोल खो देगा पर जैसे तैसे अपने को संभाला, रजनी ने चादर के अंदर से अपने बाबू को जब अपनी जांघे और पैंटी के ऊपर से बूर को घूरते देखा तो शर्म से अपने हांथों से अपने चेहरे को ढक लिया जबकि उसने चादर ओढा हुआ था फिर भी लज़्ज़ा वश वह सिरह उठी।

उदयराज पागलों की तरह रजनी के नंगे बदन को घूरे जा रहा था, इतनी सुंदर तो उसकी पत्नी भी नही थी जितनी उसकी बेटी थी, क्या मोटी मोटी गोरी गोरी मांसल जाँघे थी, तभी उदयराज नीचे बैठ गया और अपने दोनों हाथ से पैंटी को पकड़ा जैसे ही रजनी को अपने बाबू की उंगलियां अपनी पैंटी पर कमर के दोनों ओर महसूस हुई उसके बदन में हलचल हुई और सांसे और भी उखड़ने लगी, उदयराज ने पैंटी को नीचे सरकाना चालू किया, एक बार फिर रजनी ने धीरे से oooohhhhh mmmeerrrrreeee bbbbbbaaaabbbuuu बोलते हुए अपने भारी मांसल गुदाज नितम्ब को धीरे धीरे ऊपर ऊठाकर पैंटी को आसानी से निकल जाने में अपने बाबू की भरपूर मदद की

और......

उदयराज ने पैंटी को खींचकर नीचे घुटनों तक उतार दिया और जो उसने देखा उससे उसका मन मयूर और झूम उठा, रजनी ने पैंटी के अंदर भी गुलाब के फूलों की पंखुड़ियों से अपनी प्यारी सी मक्ख़न जैसी मादक कसी हुई जवान बूर को छुपा रखा था। जब उदयराज ने पैंटी को घुटनों तक नीचे उतार दिया तो उसने देखा कि रजनी की बूर पर गुलाब के फूलों की पंखुड़ियां रखी हुई है जिससे उसको देख पाना मुश्किल है, उदयराज अपनी बेटी की इस नटखट अदा पर फिदा हो गया और ताबड़तोड़ उसकी जाँघों और नाभि, कमर के आस पास, और पैरों को चूमने लगा, रजनी hhhhaaaaaiiiiiii, hhhhaaaaaiiiiii करती हुई मादक सिसकारी लेने लगी, अपनी इस शरारत पर वो मुस्कुरा भी रही थी। उदयराज को तो होश ही नही था उसको तो जैसे जन्नत मिल चुकी थी जन्नत।

उदयराज ने जब मदहोशी की हालत में चूमकर उठा तो पास रखे घी के दिये को जलाकर थोड़ा पास रख लिया, अब कोठरी में थोड़ा ज्यादा उजाला हो गया, फिर उदयराज धीरे से रजनी की बूर पर झुका और गुलाब की एक एक पंखुड़ी को अपने होंठों से पकड़कर हटाने लगा, जैसे ही उदयराज की सांसें रजनी के बूर पर लगी, वो तो aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.....hhhhhhhhhaaaaiiiiiiiiiiiiii............bbbbbbbaaaaaaaabbbbbbbuuuuu बोलते हुए अपने होंठों को दांतों से दबाकर मचल उठी, उसका निचला बदन हल्का सा थरथरा उठा।

उदयराज ने एक एक करके सारी गुलाब की पंखुड़ियों को हटाकर बूर को पा ही लिया। अब बूर का अंतिम आवरण भी हट चुका था। एक सगी बेटी की बूर उसके पिता के सामने खुल चुकी थी, नियति भी इस महापाप की शुरुवात पर मुस्कुरा उठी।

रजनी की वो प्यारी प्यारी नरम नरम मदहोश कर देने वाली गोरी गोरी बूर उदयराज के आंखों के सामने थी, रजनी अब नीचे से मदरजात नग्न अपने बाबू के सामने पड़ी थी। ऊऊफफ बूर की वो मक्ख़न जैसी फांकें, क्या मस्त बूर थी रजनी की, गोरी गोरी मोटी मोटी मांसल जाँघों के बीच वो बड़ी सी फांकों वाली अपनी सगी बेटी की बूर को देखकर उदयराज बदहवास हो गया, उसे मानो होश ही नही, इतनी सुंदर बूर है उसकी अपनी ही सगी बेटी की, वो फूला नही समा रहा था, उत्तम श्रेणी की बूर थी रजनी की, बड़ी बड़ी नरम नरम फांकें थी बूर की, बूर की फांकों के बीच से हल्का काम रस रिस रहा था, दोनों फांकों पर हल्के हल्के बाल थे और फांकों के बीच प्यारा सा भगनासा हल्का हल्का दिख रहा था, रजनी ने लज़्ज़ा से अपने चेहरे को अपने हांथों से ढक लिया।

बूर के ऊपर हल्के हल्के काले काले बाल थे, बूर के नीचे जाँघों के बीच चटाई पर गुलाब की पंखुड़ियां गिरी हुई थी।

एकएक उदयराज ने बगल में रखा दिया उठा लिया और उसको बूर के पास बूर को अच्छे से देखने के लिए लाया, बूर को दिए कि रोशनी में नजदीक से देखते ही उदयराज ने नशे से एक पल के लिए आंखें बंद कर ली, सांसे उसकी भी उखड़ने लगी, लन्ड ने धोती में हाहाकार मचा रखा था, जैसे अभी इजाजत मिले तो फाड़कर बाहर आ जाये।

एकएक जब रजनी ने देखा कि उसके बाबू दिया उठाकर उसकी बूर नजदीक से देख रहे हैं तो उसने खुद ही अपने दोनों पैर को फैलाने की कोशिश की पर पैंटी अभी घुटनों में फंसी थी।

उदयराज ने ये देखते ही दिया रखकर पैंटी को खींच कर पूरा पैर से बाहर निकाल दिया और बगल में साड़ी के ऊपर रखने ही वाला था कि अपनी सगी शादीशुदा बेटी की काम रस और पेशाब से सनी पैंटी से आती भीनी भीनी महक ने उसका ध्यान खींचा लिया और उसने रजनी को दिखाते हुए उसकी पैंटी को अपनी नाक से लगा के कस के उसे सूंघा और नशे से उसकी आंखें बंद हो गयी, रजनी भी धीरे से खिलखिला के हंस पड़ी पर उसने जल्द ही अपनी आंखें बंद कर ली क्योंकि दो दिए कि रोशनी में अब उसके बाबू चादर के अंदर से हल्के हल्के दिख रहे थे।

उदयराज ने जी भरके पैंटी को सूंघा मानो जैसे को वो अपनी बेटी की कोई भी चीज़ छोड़ना नही चाहता हो, रजनी भी ये सोचकर मुस्कुरा रही थी कि उनकी बेटी की नंगी बूर सामने खुली हुई है और मेरे बाबू अपनी बेटी की कच्छी में उलझे हैं।

पैंटी निकल जाने के बाद रजनी ने धीरे धीरे पैरों को फैलाते हुए घुटनों को मोड़कर अपनी जाँघों को खोलकर फैला दिया, उदयराज ने दिया फिर से उठाकर रजनी की बूर के पास किया।

जाँघों के फैलने से रजनी की बूर फ़ैलती और खुलती चली गयी दोनों फांकों के फैलने से वो प्यारा सा गुलाबी संकरी, छोटा सा बूर का छेद उदयराज की आंखों के सामने आ गया, बूर की cliteries खिलकर बाहर आ गयी और दोनों फांकों के हल्का खुलने से उनके बीच रिस रहे लिसलिसे काम रस से हल्के दो तीन तार बन गए, रजनी की बूर काम रस से सराबोर हो चुकी थी।

बूर की ये आभा देखकर उदयराज से अब बर्दाश्त नही हुआ और कुछ देर बूर को निहारने के बाद झट से उसने दिया बगल में रखा और अपनी नाक अपनी सगी शादीशुदा बेटी के बूर की फांकों के बीच लगा कर एक गहरी सांस खींचकर उसको सूंघा, कामरस और पेशाब की भीनी भीनी गंध उसके रोम रोम तक समाती चली गयी, बूर पर नाक लगाते ही रजनी की जोरदार सिसकी निकल गयी और मचलकर aaaahhhhhhhhhh mmmeeeerrrrreeeee pppppyyyaaaaarrrrrreeeeee bbbaaaaabbbbuuuuuu कहते हुए उसने तड़पकर अपनी कमर से ऊपर का हिस्सा धनुष की तरह ऊपर को मोड़ लिया, जिससे उसकी दोनों विशाल चूचीयाँ ऊपर को उठ गई। उसकी आंखें नशे में बंद हो गयी, एकएक रजनी के हाथ अपने बाबू के सर को पकड़कर अपनी दहकती बूर पर और दबाने तथा बालों को सहलाने के लिए उठे पर कर्म के नियम का ध्यान आते ही वो मन मकोसकर रह गयी और अपनी मुट्ठी भींच कर हाय हाय करने लगी।

उदयराज ने पांच छः मिनट तक रजनी की बूर को खूब जी भरके सूंघा, दोनों हांथों से कभी नरम नरम फांकों को खोलकर सूंघता, और कभी फांकों के बगल, ऊपर, नीचे और भागनाशे को सूंघता, कभी अपनी नाक से भागनाशे को रगड़ता और जब जब ऐसा करता रजनी हाय हाय करने लगती और उसका बदन पूरी तरह हिल जाता, उदयराज का बहुत मन कर रहा था कि वो अपनी सगी बेटी की बूर चाट चाट के खा जाए पर आज रात उसकी इजाजत नही थी। रजनी भी यही चाहती थी पर क्या करे। रजनी की बूर तड़प तड़प कर लिसलिसा काम रस छोड़ने लगी, जो पूरी तरह से उदयराज की नाक और मुँह पर लग चुका था, उदयराज ने बूर से मुँह हटा के काम रस को जीभ निकल कर होठों पे लगे काम रस को चाट लिया, क्योंकि वो आज रात बूर पर न तो जानबूझ कर होंठ लगा सकता था और न ही जीभ।

काफी देर बूर सूंघने के बाद उठकर बैठ गया, मस्त हो चुका था वो अपनी बेटी की बूर सूंघकर, रजनी ने तड़पकर अब अपने पैर सीधे किये और उदयराज पैरों के बीच से उठकर खड़ा हो गया, रजनी ने अपने पैरों को सटा कर बड़ी अदा से एक बार फिर अपनी मदमस्त बूर अपने बाबू के सामने कर दी, खड़े होकर उदयराज ने रजनी की फूली हुए मदमस्त चौड़ी और लंबी बूर को ललचाई नज़रों ने एक बार फिर घूरा, पर अब वक्त पूरा होने वाला था या हो सकता था ज्यादा भी हो गया हो, आज वो अपनी बेटी की बूर देखकर धन्य हो चुका था और अब आगे आने वाले असीम आनंद की कल्पना कर वो वासना से भर गया।

रजनी भी समझ गयी कि अब बाबू जाने वाले हैं वह चाहती तो थी कि अपने बाबू को अपने नितम्ब भी दिखाऊँ पर ये उसने फिर "बाद" पर छोड़ दिया, उदयराज ने बगल में जलता हुआ दिया बुझा दिया और एक बार फिर अपनी बेटी की बूर को झुककर जल्दी से जोर से सूंघा रजनी एकदम से चिहुँक उठी, उदयराज ने फिर बगल में कागज के ऊपर रखे गुलाब की पंखुड़ियों को तोड़ा और और बूर को उससे ढक दिया, रजनी अपने बाबू के इस सम्मान पर गदगद हो गयी, और उदयराज ने साड़ी और साये से रजनी के निवस्त्र हिस्से को ढक दिया फिर चादर उसके ऊपर डाल दी और कागज लेकर वहीं बैठकर कुछ लिखा और अपने खड़े लन्ड को adjust करता हुआ पर्ची को बगल में रखकर कोठरी से बाहर निकल गया।

रजनी काफी देर तक लेटी सिसकती रही उसकी बूर रह रहकर अब भी काम रस छोड़ रही थी।

वो सोचने लगी कि आज आखिर उसके बाबू ने उसकी बूर देख ही ली, एक बाप ने अपनी सगी बेटी की बूर को देख लिया, छू लिया और सूंघ भी लिया, कितना मादक है ये महापाप, ये व्यभिचार, मेरे बाबू मुझे पहले क्यों नही मिले? खैर आखिर मिल तो गए देर से ही सही, कितना मजा आएगा जब वो मुझे तृप्त करेंगे।

यही सब सोचते हुए रजनी काफी देर तक खोई रही फिर सो गई।
 
Back
Top