Incest पाप ने बचाया - Page 3 - SexBaba
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Incest पाप ने बचाया

Update-20

पुर्वा आकर अपनी जगह पर लेट गयी।

पुर्वा- रजनी बहन! सो गई क्या?

रजनी- नही पुर्वा बहन, नींद कहाँ आ रही है।

पुर्वा- परेशान मत हो बहन, सब ठीक हो जाएगा, जो होता है अच्छे के लिए ही होता है, सो जाओ।

रजनी- हां बहन सो तो है।

पुर्वा- आपके बाबू सो गए।

रजनी- हां वो तो कबके सो गए।

पुर्वा- तो तुम भी सो जाओ।

रजनी- हूं, ठीक है, और तुम जगती रहोगी क्या?

पुर्वा- नही, कुछ देर में सो जाउंगी।

फिर रजनी और उदयराज सो जाते हैं।

कहते है कि किसी भी चीज़ को अगर दिल से चाहो और उसके लिए सच्ची तड़प हो तो नियति या कायनात उसे तुमसे मिलाती जरूर है, या यूं कहें कि उसे तुमसे मिलाने के लिए परिस्तिथियाँ तैयार करने लगती हैं, यही हुआ आज नीलम के साथ।

आज सुबह उसने जो देखा उससे वो बहुत बेचैन हो गयी, गेहूं फैला कर वो किसी तरह नीचे आयी, तो उसकी माँ ने उसे खाना बनाने का लिए बोल दिया। बिरजू घास लेके आया और उसने घास अपने जानवरों को दी और उदयराज के घर जाके उनके जानवरों को भी दिया, नीलम अभी घर में खाना ही बना रही थी और बिरजू नहाने चला गया, खाना बनने के बाद नीलम ने उनको खाना परोसा, हमेशा वो चुन्नी डाले रहती थी पर आज उसने जानबूझ के नही डाली। बिरजू को देखते ही नीलम की आंखों के सामने वो दृश्य घूम गया, कितना बड़ा और मोटा लंड है मेरे बाबू का, शर्म की लालिमा चहरे पे आ गयी और वो थाली रखने नीचे झुकी, मदमस्त मोटी चुचियाँ का भार नीचे की ओर हुआ जैसे वो मानो सूट से निकलकर बाहर ही आ जाएंगी।

नीलम- बाबू हरी मिर्च भी लाऊं, प्याज़ के साथ।

बिरजू ने जैसे ही सर उठाया सीधी नज़र गोरी गोरी भरपूर फूली हुई चूचीयों पर चली गई, नीलम मुस्कुरा दी, ये देखकर की बिरजू की नज़र कहाँ है।

बिरजू झेंप गया और सकपका के बोला- नही बेटी, प्याज़ ही बहुत है, मिर्च रहने दे।

नीलम मुस्कुराते हुए चली आयी, बिरजू खाना खाने लगा, मन में उसने सोचा कि नीलम को क्या हुआ आज मैंने इस तरह उसे कभी नही देखा, भूलकर भी वो मेरे सामने ऐसे कभी नही आई, खैर भूल गयी होगी चुन्नी लेना, लेकिन भूलेगी क्यों, पहले तो कभी नही भूली, एक बार और बुला कर देखता हूँ अगर भूल गयी होगी तो इस बार चुन्नी डालकर आएगी

बिरजू- नीलम, नीलम बेटी

नीलम- हां बाबू

बिरजू- सिरका है

नीलम रसोई में से- हां बाबू है, लायी

इस बार फिर नीलम ने चुन्नी नही डाली और कटोरी में सिरका डालकर थाली के पास रख दिया और जब बिरजू की ओर देखा तो वो उसकी हिलती चूचीयाँ देख रहा था, जैसे ही बिरजू की नजरें मिली नीलम मुस्कुरा दी, बिरजू भी हल्का सा मुस्कुरा कर झेप सा गया।

बिरजू थाली में देखने लगा, नीलम पलट कर जाने लगी, पता नही क्यों बिरजू ने दुबारा नीलम को देखने के लिए नज़रें उठायी और आज वो पहली बार अपनी सगी बेटी को जाते वक्त पीछे से निहार रहा था कि तभी नीलम पलटी और अपने बाबू की तरफ देखा तो वो उसे ही देख रहा था, इस बार वो नीलम को देखता रहा, नीलम भी रसोई के दरवाजे पर रुककर कुछ देर देखती रही फिर हंस दी और बिरजू भी मुस्कुरा दिया, नीलम की नज़रों में आमंत्रण था ये तो बिरजू को समझ आ चुका था अब।

तभी नीलम बोली- बाबू कुछ चाहिए हो तो बता देना।

(न जाने इस बात में भी बिरजू को आमंत्रण सा लगा)

बिरजू - हां बेटी, जरूर, और खाना खाने लगा।

नीलम मुस्कुराई और मटकती हुए रसोई में चली गयी।

बिरजू ने खाना खाया और काम से बाहर चला गया।

नीलम मन ही मन बहुत खुश थी कि शायद तीर निशाने पर लगा है, नही तो उसके बाबू उसको डांटते, कुछ तो है बाबू के मन में भी।

नीलम ने घर का काम किया, अपनी माँ को भी

खाना खिलाया और खुद भी खाया, फिर उसकी माँ सोने चली गयी दोपहर में और वो भी सो गई।

शाम को नीलाम सो के उठी तो देखा उसकी माँ सुबुक सुबुक के रो रही थी

नीलम- अम्मा क्या हुआ, रो क्यों रही हो। क्या हुआ बताओ न। क्या कोई बुरा सपना देखा क्या?

माँ- हां

नीलम- क्या सपना देखा? ऐसा क्या देखा, क्या कोई डरावना सपना देखा क्या? भूत प्रेत का।

माँ- नही रे! मैं डरती हूँ क्या भूत से।

नीलम- अरे तो फिर ऐसा क्या देखा जो रोने लगी।

माँ- कुछ नही

नीलम- अम्मा बता न, कुछ बता नही रही और रोये जा रही है। बता न

माँ- बोला न कुछ नही, तू क्या करेगी सुनके।

नीलम- अम्मा तू रो रही है, मुझे दुख हो रहा है, नही बताएगी न, इसका मतलब मैं तेरी बेटी नही न

माँ- ये क्या बोल रही है

नीलम- तो बता फिर, बता तुझे मेरी कसम है।

माँ- तू कसम क्यों दे रही है। (रोते हुए)

नीलम- नही बताएगी तो दूंगी न कसम।

माँ- बहुत गंदा सपना था

नीलम- गंदा, कैसा गंदा?, क्या गंदा?

थोड़ी देर सोचने के बाद

माँ- मुझसे नही बोला जाएगा।

नीलम- अरे माँ, बता न, तेरी बेटी ही तो हूँ, अब कसम दे दी फिर भी नही बताओगी, कसम की भी लाज नही न। ठीक है

एकाएक नीलम की माँ बोल पड़ी

माँ- सपने में तेरे बाबू चाट चाट के तेरा पेशाब पी रहे थे वो भी सीधा बू.......

सुनते ही नीलम आश्चर्य से उसे देखने लगी

नीलम- क्या? छि छि, हे भगवान, इतना गंदा सपना, और क्या बोली अम्मा तू वो भी सीधा किससे? कहाँ से?

माँ- कहाँ से क्या, जहां से पिशाब निकलता है उसी से, सीधा बू........बूर से, हे भगवान मैं मर क्यों नही गयी ये सब देखते ही, क्या होने वाला है, तेरे बाबू बहुत बीमार थे सपने में, उनकी आंखें तक नही खुल रही थी, आंगन में यहीं लेटे थे खाट पे, दिन का समय था, तू आयी, सिर्फ साया ब्लॉउज पहना था तूने।

नीलम- फिर, फिर... अम्मा (उत्सुकता से)

माँ- फिर क्या, तू खाट के बगल में खड़ी हो गयी, और बोली बाबू, बाबू उठो न, वो नही उठ रहे थे, फिर एकाएक तूने अपना सीधा पैर उठाकर उनके दाहिने कंधे के ऊपर खाट के सिरहाने पर रखा और अपनी बूर खोलते हुए उनके मुँह पर हल्का हल्का मूतने लगी, पेशाब मुँह पर पड़ते ही तेरे बाबू की आंखें खुल गई और बूर देखकर जैसे उनके मुँह में पानी आ गया फिर पेशाब पीते हुए उन्होंने लपककर बूर को मुँह में भर लिया और चाटने लगे, बूर से निकल रही पेशाब की धार से उनका पूरा चेहरा भीग गया, तेरी और उनकी आँखों में वासना थी फिर न जाने कहाँ से एक आवाज गूंजी जैसे आकाशवाणी हुई हो कि पी ले बिरजू, पी ले यही तुझे जीवनदान देगी। एक झटके से मेरी आँख खुल गयी और मैं रोने लगी, न जाने क्या होने वाला है, इतना गंदा सपना मैंने आज तक नही देखा, क्या अनर्थ होने वाला है। बताओ एक बेटी अपने बाप को....हे ईश्वर!

ये सुनकर नीलम का तन बदन एकदम रोमांचित हो गया, शर्म से चेहरा एकदम लाल हो गया, पर फिर भी अपने को संभालते हुए बोली- इतना गंदा सपना आपको कैसे आया अम्मा, महापाप है ये तो, मुझे तो सोचकर भी शर्म आ रही है, कैसे..छि, क्या अर्थ है इस सपने का, और बीमार क्यों पड़े अम्मा, आपको पता है न बीमार पड़ने का मतलब क्या है इस गांव में, इस कुल में।

माँ- वही तो चिंता अब मुझे खाये जा रही है बेटी, तूने उनके साथ जो किया और उन्होंने तेरे साथ जो किया, पाप पुण्य तो बाद कि बात है, वो बीमार ही क्यों पड़े, क्यों ईश्वर ने उन्हें बीमार किया।

नीलम- अम्मा छोड़ो न, ये बस एक सपना था, गंदा सपना।

माँ- नही बेटी, मेरा दिल नही मानता, सपने का कुछ अर्थ जरूर होता है, आजतक तो कभी मुझे ऐसा सपना नही आया पर अब ही क्यों? कुछ तो गड़बड़ है मेरी बिटिया, तेरे बाबू को कुछ हो गया तो?

नीलम- क्या बोले जा रही है अम्मा तू (और नीलम ने अपनी माँ को गले से लगा लिया) मत बोल ऐसा, ऐसा कुछ नही होगा।

माँ- क्यों वो कोई लोहे के बने है? अरे वो भी तो मेरी तेरी तरह इंसान ही है न।

नीलम- हां तो, ऐसे तो मैं और तू भी इंसान है, हम भी बीमार पड़ सकते है।

माँ- हां पड़ सकते हैं, पर सपने में तो वही बीमार थे न, क्या पता इस सपने का अर्थ ये तो नही की आने वाले वक्त में वो बीमार पड़ जाए, अगर उन्हें कुछ हो गया तो क्या करूँगी मैं, कहाँ जाउंगी मैं, मैं तो ऐसे ही मर जाउंगी।

सपने से उसकी माँ काफी डर गई थी।

नीलम- क्यों ऐसा बोल रही है अम्मा तू, क्यों ऐसा सोच रही है, ये सिर्फ सपना है अम्मा, ईश्वर अगर मुसीबत देता है तो कहीं न कहीं उसका हल भी होता है

नीलम की यह हल वाली बात पर उसकी माँ के दिमाग में एक बात ठनकी

माँ- अरे हां देखो इस बात पे तो मेरा ध्यान ही नही गया।

नीलम- किस बात पे अम्मा?

माँ- देख ईश्वर की माया, अगर उन्होंने तेरे बाबू को बीमार किया तो ठीक होने का हल भी बताया, वो आकाशवाणी क्या कह रही थी, यही न कि "यही तुझे जीवनदान देगी।"

इतना कहते हुए नीलम की माँ ने नीलम का चेहरा अपने हांथों में ले लिया और जैसे भीख मांग रही हो, बोली- हे बिटिया, मुझे तो लगता है तू ही उनकी जीवनदायिनी है, चाहे पाप हो चाहे पुण्य हो, तू मुझे वचन दे कि जीवन में अगर उन्हें ऐसा कुछ हुआ, तो तू लोक लाज छोड़कर, पाप पुण्य को न देखते हुए, वही करेगी जो मैंने सपने में देखा, देख बेटी ना मत कहना, एक पत्नी अपने पति के लिए तेरे से भीख मांग रही है, अपनी ही बेटी से उसके पिता की जीवन की भीख मांग रही है, जीवन से बड़ा कुछ नही, आखिर तेरे बाबू को कुछ हो गया तो तू भी बिना बाप की हो ही जाएगी न और मैं तो विधवा हो ही जाएंगी, हमारे कुल हमारे गांव में न जाने कौन सी समस्या है जिसके चलते न जाने कितने लोग चले गए, पर देख तेरे बाबू कितने भाग्यशाली है कि ईश्वर ने सपने के द्वारा इसका हल बताया।

नीलम की मां पागलों की तरह बोले जा रही थी और नीलम अवाक सी सुने जा रही थी।

माँ- बेटी, अब तेरे बाबू की जीवनरेखा तेरे हाथ में है, तू मुझे वचन दे बेटी, की ऐसा करके उनकी रक्षा करेगी, वचन दे बेटी।

नीलम को तो मानो मुँह मांगी मुराद मिल गयी थी, बस वो सिर्फ दिखावा कर रही थी

नीलम- माँ ये तू क्या कह रही है, पहली बात तो यह सिर्फ एक सपना है, और क्या मैं चाहूंगी कि मेरे बाबू को कुछ हो, कभी नही, मैं अपनी जान भी दे दूंगी पर अपने बाबू को आंच नही आने दूंगी, ये तन बदन क्या चीज़ है अम्मा, तू चिंता मत कर मैं वचन देती हूं, मैं वही करूँगी जो तू कहेगी, वही करूँगी जो तूने देखा है सपने में, पर अम्मा बाबू मानेंगे क्या?, वो तो खुद ही मर जायेंगे पर ऐसा महापाप कभी सपने में भी नही करेंगे।

माँ- वो तू मुझपे छोड़ देना बेटी, मैं उन्हें मना लूंगी, देख बेटी तेरी माँ हूँ आज तुझे खुलकर बोलती हूँ ये जो मर्द होता है न, ये बूर का भूखा होता है, खुली बूर इसके सामने हो तो वो कुछ नही देखता, न बेटी, न माँ, न बहन, और यही हाल स्त्री का भी होता है, ये कुदरत का बनाया खेल है, लन्ड और बूर का कोई रिश्ता नहीं होता बिटिया, ये बस बने हैं तो एक दूजे के लिए, मैं उन्हें समझा दूंगी, अगर कभी ऐसा होता है तो। बस तू मेरे सुहाग की रक्षा करना।

नीलम- माँ मैंने आपको वचन दिया न, जो आप कहोगी वो मैं करूँगी, अब आप रोओ मत, और चिंता छोड़ दो।

नीलम के मन में खुशियों की बहार आ गयी, जैसे एकदम से काले काले बादल छा गए हो और रिमझिम बरसात शुरू हो गयी हो, आज नियति पर वो इतना खुश थी कि क्या बताये, अभी सुबह ही वो सोच रही थी कि रजनी आ जायेगी तो वह उसको अपने मन की व्यथा बताएगी उससे रास्ता पूछेगी, डर था उसे की छुप छुप के ये सब कैसे हो पायेगा, उसके बाबू उसके मन को पढ़ पाएंगे भी या नही, पर नियति ने देखो कैसे एक पल में सारा रास्ता बना दिया, दूसरे की तो बात ही छोड़ो खुद उसकी सगी माँ इस व्यभिचार में उसके लिए रास्ता बनाएगी, माँ का संरक्षण मिल गया था अब तो, और जब माँ का ही संरक्षण मिल जाये, उसकी ही रजामंदी मिल जाये तो तब डर कैसा, रास्ता तो उसकी माँ खुद बनाएगी उसके लिए, एक बार को बाबू पीछे भी हटे तो माँ खुद उन्हें मेरा यौन रस चखने के लिए मनाएगी, पर ऐसा है नही आज बाबू को देखा था मैंने कैसे मेरी चूची को घूर रहे थे। वक्त ने अचानक ऐसी पलटी मारी की सारा खेल आसान हो गया।

लेकिन नीलम ये समझ गयी कि मां ये सब उस सपने की वजह से कह रही है, अगर बाबू बीमार पड़े तो मुझे ऐसा करना होगा, लेकिन अगर मान लो वो बीमार नही पड़े तो?

इसके लिए मुझे माँ से बातों बातों में बाबू के रूखे यौनजीवन की चर्चा करनी होगी, उनकी तड़प की चर्चा करनी होगी, जीवन में उन्हें जो यौनसुख नही मिल रहा उसपर बात करनी होगी, मुझे लग रहा है कि अम्मा मेरा यौनमिलन बाबू से जरूर करवा देंगी, बाबू को तो मैं अपने बलबूते पर भी तैयार कर लुंगी रिझा रिझा के, पर अगर इस काम को अम्मा करे, ये सब उनकी सहमति से हो तो मजा और भी दोगुना हो जाएगा।
 
प्रिय पाठकों

मैं अभी travelling में हूँ, यह अपडेट मैं जल्दी में दे रहा हूँ।

Sorry for late update

धन्यवाद
 
Update-21

उदयराज और रजनी सो गए कुछ देर बाद पुर्वा भी सो गई, सुबह हुई, पुर्वा और रजनी एक साथ जगे, रजनी ने काकी को जगाया और तीनों ने सुबह की नित्य क्रिया करके नहा धो लिया, पुर्वा और काकी नाश्ता बनाने लगी, आज रजनी ने नीली रंग की साड़ी काले ब्लॉउज के साथ पहनी थी जिसमे वो गज़ब ढा रही थी, उसका गोरा बदन दमक रहा था, ब्लॉउज में भारी भारी चूचीयाँ बाहर आ जाने को कसमसा रही थी, नितंबों ने अलग ही हाहाकार मचाया हुआ था। ऐसा लग रहा था स्वर्ग से उतरकर कोई अप्सरा जंगल में आ गयी हो।

रजनी कुटिया में उदयराज को जगाने के लिए गयी।

रजनी- बाबू उठो, (कहते हुए उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा और फिर अपने बाबू के गाल पर झुककर एक भीगा सा चुम्बन जड़ दिया)

तपाक से उदयराज की आंखें खुल गयी, अपनी शादीशुदा बेटी का ये रूप देखकर और इस तरह चुम्बन देकर उठाना उसे इतना मधुर लगा कि वो उसे देखता रह गया, कामुक भीगे हुए रसीले होठों के गीले गीले चुम्बन का अपने गालों पर अहसास उदयराज को मदमस्त कर गया

नीली साड़ी में अपनी ही शादीशुदा बेटी को देखकर उसका मन मचल उठा, तभी उसकी नज़र रजनी के ब्लॉउज पर गयी, पल्लू सीने से गिर चुका था, गोरी गोरी चूचीयों के बीच बनी गहरी घाटी में जैसे वो थोड़ी देर के लिए डूब गया, रजनी समझ गयी कि उसके बाबू कहाँ खोए हैं। उसने अपने बाबू की ठोढ़ी को तर्जनी उंगली से उठाते हुए कहा- उठो न बाबू, रात में देखके जी नही भरा।

उदयराज- गज़ब की बिटिया पाई है मैंने, इससे भला अब मेरा जी भरेगा, आज तूने मेरा दिन बना दिया।

रजनी- अच्छा जी! मैंने भी तो दुनियां का सबसे अच्छा पिता पाया है, चलो अब उठो न बाबू कोई आ जायेगा।

उदयराज- ऐसे नही उठूंगा

रजनी- फिर कैसे उठोगे, उठो न

उदयराज- नही, पहले जरा सा दिखा दे न, चखने का मन कर रहा है

रजनी- क्या?

उदयराज ने अपनी हथेली रजनी के बायीं मोटी चूची पर रख दिया और हल्का सा दबा दिया।

रजनी हल्का सा - uuuiiiimmmaaa

रजनी- अभी रात को तो सब किया था मेरे बाबू, जी नही भरा (सिसकते हुए)

उदयराज- क्या कोई रात को खाना खा ले तो सुबह नाश्ता नही करता क्या? सुबह तो फिर उसे भूख लगेगी न,

रजनी- बदमाश! ये दिन है बाबू रात की बात अलग थी, यहां सब हैं कभी भी कोई आ सकता है।

उदयराज- बस जल्दी से, एक बार बस, बहुत देखने का मन कर रहा है, फिर उठ जाऊंगा पक्का।

रजनी- बदमाश बाबू! अच्छा लो देख लो जल्दी से

रजनी मुस्कुराते हुए पीछे पलट के देखती है, भाग्यवश उस वक्त कोई इधर नही आ रहा था।फिर उसने अपने ब्लॉउज के नीचे के दो बटन खोले और ब्रा और ब्लॉउज को ऊपर खींचकर एकदम से दोनों ही बड़ी बडी चूचीयों को एक साथ अपने बाबू के सामने उजागर कर दिया, दोनों बड़ी बड़ी चूचीयाँ उछलकर उदयराज की आंखों के सामने आ गयी, आज उदयराज दोनों चुचियों को एकसाथ देखकर वासना से सराबोर हो गया, लंड उसका धोती में खड़ा हो गया, इतनी गोरी गोरी चूची उसकी खुद की शादीशुदा बेटी की ही होगी उसने कभी सोचा नही था और उसपर ये मोठे मोठे गुलाबी रसीले निप्पल, अभी रात में ही उदयराज ने एक चूची को खोला था पर अंधेरा होने की वजह से अच्छे से देख नही पाया था पर इस वक्त सुबह की रोशनी में दोनों ही चूचीयाँ उसके सामने नग्न थी। उदयराज उन्हें निहारने लगा, रजनी शर्मा गयी

उदयराज ने दोनों हाँथ बढ़ा के दोनों चूची को हथेली में भर लिया और एक बार कस के दबा कर निप्पल को मसल दिया रजनी की aaahhhhhhh निकल गयी मचलते हुए वो बोली- बाबू बस करो कोई आ जायेगा

उदयराज- अच्छा मेरी बेटी एक बार पिला दे दोनों

रजनी ने ब्लॉउज को और ऊपर चढ़ा कर छोड़ दिया और अपने दोनों हाँथ उदयराज के दोनों कंधों के ऊपर रखकर उसके ऊपर झुक गयी और अपनी बायीं चूची का निप्पल मुँह में डालते हुए बोली- लो जल्दी पी लो

उदयराज ने लपककर जितना हो सके चूची को मुँह में भर लिया और पीने लगा रजनी की जोश में आंखें बंद हो गयी, पीते वक्त उदयराज बीच बीच में हल्का काट लेता और जब उसकी जीभ निप्पल से टकराती तो रजनी दबी आवाज में सिसक उठती iiiiiiiiiissssssshhhhhh. aaaaaaaahhhhhhhhhh, रजनी वासना से भर उठी वह डर भी रही थी कि कहीं कोई आ न जाये।

तभी रजनी बोली- बाबू अब बस करो जल्दी से दूसरी पियो देखो कोई आ जायेगा और उसने बायीं चूची उदयराज के मुंह से निकाल कर दायीं चूची उसके मुँह के सामने कर दी निप्पल मुँह से निकलने पर दूध की एक दो बूंदे उदयराज की मूंछों के आसपास गिर गयी जो कि देखने मे बहुत खूबसूरत लग रही थी।

उदयराज ने जीभ निकाल कर रजनी को दिखाते हुए उसे चाट लिया और रजनी हंस पड़ी

और फिर रजनी ने अपनी दायीं चूची के निप्पल को अपने बाबू के होंठों से छुआया उदयराज ने अपनी जीभ निकल के निप्पल के चारों ओर घुमाने लगा तो रजनी वासनामय होते हुए बोली- बाबू चुसो न जल्दी, जरूर कोई आ जायेगा, खेल बाद में करना इसके साथ बदमाश।

उदयराज लप्प से चूची मुँह में भरकर पीने लगा, उसके तो दिन ही बदल गए थे इतनी मदमस्त चूचीयाँ पीने को मिलेंगी वो भी अपनी ही सगी शादीशुदा बेटी की उसने सोचा नही था। आज तो वो झूम उठा था, रजनी की आंखें मस्ती में बंद थी, एक बार फिर उसने मुड़कर दरवाजे की तरफ देखा अभी तक भी रास्ता साफ था रजनी एकाएक बोली- बाबू थोड़ा रुको

उदयराज रुक गया, रजनी ने चूची पकड़कर उसके मुह से बाहर निकाली और बोली- मुँह खोलो, आ करो

उदयराज ने बच्चे की तरह आ कर लिया, रजनी ने एकाएक अपनी चूची को जोर से दबाकर दूध की धार उदयराज के मुंह में डाल दी, चिर्रर्रर्रर की आवाज के साथ दूध की धार से उदयराज का मुँह कुछ ही पल में आधा भर गया, रजनी ने हस्ते हुए बोला मेरे बाबू जी अभी इतना पी लो बाकी का बाद में दूंगी तो खाली कर लेना, इतना कहकर रजनी अपनी चुचियों को ढकते हुए उठ खड़ी हुई, उदयराज उसे देखते हुए गट गट करके दूध पी गया और जैसे ही रजनी मुस्कुराते हुए जाने को पलटी उसने रजनी का नरम मुलायम हाँथ पकड़ लिया।

रजनी- अब क्या बाबू, जाने दो न, जरूर कोई आ ही जायेगा।

उदयराज- फिर कब दोगी।

रजनी- जब मौका मिलेगा, सब्र करो सब दूंगी अपने बाबू को

उदयराज- सब दोगी

रजनी- हां...दूंगी

उदयराज- सब.....वो भी (उदयराज का मतलब बूर से था)

रजनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया और धीरे से बोली- dhaaaatttt बाबू, कोई अपनी शादीशुदा सगी बेटी की "वो" मांगता है। मेरे बेशर्म बाबू।

उदयराज- किसी का तो पता नही पर मुझे तो चाहिए वो, जरूर चाहिए, दोगी न

उदयराज ने हाँथ छोड़ दिया और रजनी मुस्कुराके जाने लगी फिर दरवाजे तक जाके रुकी, पलट के देखा और बोली- हां वो भी दूंगी, खूब दूंगी, जी भरके दूंगी, पर घर पहुँच के, थोड़ा सब्र बाबू, अब उस पर आपका ही हक़ है वो हमेशा से ही आपकी थी और हमेशा रहेगी और मुस्कुराते हुए भाग गई, उदयराज ने अपने लंड को धोती के ऊपर से ही मसल दिया और किसी तरह adjust करके उठा और बाहर आ गया।

काकी और पुर्वा नाश्ता बना चुकी थी, पुर्वा ने रजनी को देखते हो बोला- अरे बहन तुम्हारे बाबू जी उठ गए।

रजनी (अपने को संभालते हुए)- हां उठ गए नहा कर आ रहे हैं।

पुर्वा- ठीक है मैं नाश्ता लगती हूँ

रजनी- नही बहन तुम रहने दो मैं लगा देती हूं तुम अपनी माता जी के पास जाओ शायद वो बुला रही थी तुम्हे।

रजनी और काकी नाश्ता लगाने लगती हैं

सुलोचना ने रात भर मंत्र जागृत करके सात ताबीज़ तैयार कर दिए थे जिसको पीपल के पत्ते से लपेटा हुआ था और उसको काले कपड़े में बांधकर एक डोरी से जोड़ना था ताकि हाँथ पर बांधा जा सके, पुर्वा ने उसे तुरंत तैयार कर दिया, सुलोचना भी फिर नहा कर तैयार हो गयी, सबने नाश्ता किया।

सुलोचना- मैंने ताबीज़ तैयार कर दी है, पुर्वा को छोड़कर सबलोग इसको अपने हाँथ पर बांध लो, छोटी बच्ची और बैलों को भी बांध देना पुत्र।

उदयराज- हां माता जी

और उदयराज सबको वो ताबीज़ बांध देता है जाके बैलों के गले में भी बांध आता है।

सुलोचना- मेरे ख्याल से हमे सुबह जल्दी ही निकल जाना चाहिए, ताकि शाम तक वहां पहुंच जाएं, पुर्वा यही रहेगी

काकी- बहन अगर हम शाम तक वहां पहुचेंगे तो हम वापिस तो कल ही आ पाएंगे तो ऐसे में क्या पुर्वा रात भर इस जंगल में अकेली रहेगी, आखिर वो भी एक लड़की है, बच्ची ही है, मेरे ख्याल से हमे उसे अकेला नही छोड़ना चाहिए। आप हम लोगों की इतनी चिंता कर रही है तो हमारा भी फ़र्ज़ बनता है कि हम भी आपलोगों का ख्याल रखें।

उदयराज- हां बिल्कुल

सुलोचला- तुम्हारी चिंता जायज है बहन, पर तुम इसकी चिंता मत करो, हमारी आदत है और वैसे भी उसके पास मन्त्रो की शक्ति है उसे कुछ नही होगा, हम कल दोपहर तक आ जाएंगे।

पूर्वा- हां अम्मा आप मेरी फिक्र मत करो मैं कई बार अकेले रह चुकी हूं।

काकी- ठीक है

फिर सभी लोग तैयार हो जाते है उदयराज अपने बैल तैयार करता है सबलोग बैलगाड़ी में बैठ जाते हैं और उदयराज बैलगाड़ी चलाने लगता है।

उदयराज का मन अब बिल्कुल नही लग रहा था उसका लंड बार बार रजनी को देखके खड़ा हो जा रहा था, रजनी भी उसे देख देख के मुस्कुरा रही थी, रजनी का आमंत्रण उसका यौवन उदयराज पर इतना हावी होता जा रहा यह कि एक पल को वो ये भी भूल गया कि आखिर वो किस काम के लिए निकला है, यही हाल रजनी का भी हो रहा था। उनके जीवन में रसभरी बाहर आ चुकी थी, उदयराज ने कभी सोचा भी नही था कि उसे अपनी ही शादीशुदा बेटी से यौनसुख मिलेगा। वो बैलगाड़ी चलता हुआ यही सब सोचे जा रहा था कि तभी उसकी तन्द्रा भंग होती है जब बैलगाड़ी सिंघारो जंगल में प्रवेश कर जाती है, वाकई में ये जंगल मायावी सा था, काफी गहरी घनी छाया थी, बहुत बड़े बड़े वृक्ष थे।
 
प्रिय पाठकों

Update आज रात तक आ जायेगा, थोड़ा busy हो गया था कुछ personal काम था। माफ करना दोस्तों कभी कभी थोड़ा late हो ही जा रहा है।

धन्यवाद आप सबका प्यारे प्यारे comments के लिए
 
Update-22

बैलगाड़ी घने जंगल में दनदनाती हुई आगे बढ़ती जा रही थी, सुबह की शीतल ठंडी हवा चेहरे पर लगकर ताजगी का अहसास करा रही थी, उदयराज बैलों को हाँके जा रहा था, रजनी, काकी और सुलोचला पीछे बैठी हुई थी, काकी और रजनी बार बार सर घुमा घुमा कर जंगल में विचित्र लंबे लंबे पेड़ों को देख रही थी, कुछ पेड़ ऐसे थे जिनकी प्रजाति अभी तक उन्होंने कहीं देखी नही थी।

तभी सुलोचना उठकर उदयराज के बिल्कुल पीछे बैठ गयी ताकि वो उसको आगे का short रास्ता बता सके।

कभी अचानक तेज हवा चलने लगती तो कभी वातावरण बिल्कुल शांत हो जाता, कभी किसी पेड़ की डालियां एकदम हिलने लगती जैसे उन्हें कोई झकझोर रहा हो, कभी जानवरों की आवाज़ें आने लगती कभी सब शांत हो जाता।

रजनी और काकी यही सब देखकर चकित थी पर डर उन्हें लेश मात्र भी नही छू पाया था, अभी सुबह का ही वक्त था, उदयराज भी ये सब देखता हुआ बैलगाड़ी चलता जा रहा था, तभी रजनी को एकाएक एक बहुत बड़ा बरगद के जैसा बिल्कुल पीला वृक्ष दिखाई दिया।

रजनी- काकी वो पेड़ देखो बरगद जैसा एकदम पीला है और कितना बड़ा है।

काकी- हां बेटी ये तो बिल्कुल पीला है।

सुलोचना- उस पेड़ की तरफ ज्यादा मत देखो, ऐसे ही कई मायावी पेड़ हैं इस जंगल में जो बार बार रंग बदलकर आकर्षित और सम्मोहित करते हैं।

काकी- हां बहन ठीक है, तम ठीक कह रही हो हमे अपने रास्ते और मंजिल पर सीधा ध्यान रखना चाहिए न कि इधर उधर।

रजनी- हां बिल्कुल। हमे तो बैलों पर और बैलगाड़ी चलाने वाले पर ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि वही तो हमे मंजिल तक ले जाएंगे। क्यों बाबू? (रजनी हंसते हुए उदयराज को छेड़ते हुए बोली)

उदयराज ने पलट कर रजनी को देखा तो रजनी मुस्कुरा दी, उदयराज बोला- हां क्यों नही, घर भी तो जल्दी पहुचना है अब। उदयराज ने ये बोलते हुए एक बार फिर रजनी को देखा।

रजनी को बात का मतलब समझ आते ही शर्म आ गयी और उसने काकी और सुलोचना की नजरें बचा कर थोड़ा सा जीभ निकाल कर उदयराज को फिर चिढ़ाया, मानो कह रही हो कि तब तक तो बस सब्र करो।

उदयराज ने भी मौका देखके इशारा किया मानो कह रहा हो कि बस मौका मिलने दे बताता हूँ फिर।

रजनी हंस दी, उदयराज भी मुस्कुरा दिया।

सुलोचना उदयराज के पीछे बैठे बैठे रात के लिए मशाल बनाने लगी और बोली- एक बार अपने अपने ताबीज़ को ठीक से जांच लो और अच्छे से बांध लेना, यह मायावी जंगल इसी के सहारे पार किया जा सकता है।

उदयराज अब तेजी से बैलों को हांकने लगा उसे बस अब एक ही धुन सवार थी कि कैसे भी जल्दी काम खत्म करके बस घर पहुचना है।

जैसे जैसे सुलोचला रास्ता बताये जा रही थी वो बैलगाडी उसी रास्ते पर दौड़ाता जा रहा था।

ऐसे ही रास्ता कटता जा रहा था दोपहर हो गयी तभी रजनी ने काकी के कान में कहा- काकी मुझे पेशाब करना है, तेज से लगी है, कब से रोककर बैठी हूँ।

काकी- अरे पगली ये भी कोई रोकने की चीज़ है, बोल देती न। उदय ओ उदय जरा बैलगाडी कहीं रोकेगा की बस ऐसे ही दौड़ाता जाएगा। रुक जरा

उदयराज- क्यों क्या हुआ काकी? उदयराज ने बैलगाडी रोक दी।

सुलोचना- क्या हुआ बहन?

काकी- अरे वो रजनी को जोर से पेशाब लगी है, कब से दबाए बैठी है।

उदयराज ने रजनी की तरफ देखा तो रजनी ने आंखों के इशारों से मिन्नत सी की, कि जरा रोको बाबू।

उदयराज ने बैलगाडी रोक दी

सुलोचला- लेकिन पुत्री रुको

रजनी- क्या हुआ अम्मा।

सुलोचला- ऐसे मायावी जंगल में यूं ही पेशाब करना खतरनाक हो जाएगा, क्योंकि प्रेत, मानव स्त्री के मूत्र की गंध से और प्रेतनी मानव पुरुष के मूत्र की गंध से तुरंत आकर्षित हो जाते है और वो फिर उसका पीछा करने लगते है अभी तो तुमने ताबीज़ पहना हुआ है तो कोई परेशानी नही है पर वो तुम्हारे मूत्र की गंध को अपने अंदर समाहित करके हमेशा तुम्हारे पीछे लगे रहेंगे जैसे ही ये ताबीज़ हटी फिर वो तुम पर हावी हो जाएंगे। तो उन्हें मूत्र को सूंघने से ही रोकना पड़ेगा।

रजनी को जोर पेशाब लगी थी वो तो कसमसा रही थी

काकी- तो फिर कैसे होगा, अब पेशाब तो किसी को भी लग सकती है, हमने तो इसके बारे में चलने से पहले सोचा ही नही था, कितना खतरनाक है ये जंगल, तो कैसे होगा बहन, अब रजनी को तो लगी है न जोर से।

सुलोचला- हल है न, मैं किसलिए हूँ तुम्हारे साथ, देखो मानव मूत्र पर प्रेत या प्रेतनी की छाया पड़ने से पहले अगर मनुष्य योनि के विपरीत लिंग का मूत्र उसपर पड़ जाए तो उस मूत्र पर उसके बाद उसपर पड़ने वाले मूत्र का अधिकार हो जाता है मतलब वह अकेला नही रहता और फिर ऐसी बाधा नही आ पाती।

काकी- मैं समझी नही

रजनी और उदयराज भी असमंजस की स्थिति में सुलोचना को देखने लगे। रजनी तो बार बार अपनी जांघों को भीच ले रही थी, काफी देर से उसने पेशाब दबा रखा था।

सुलोचला- अरे, बहन जैसे कि रजनी के पेशाब करने के बाद अगर कोई पुरुष उसपर पेशाब कर दे तो रजनी सुरक्षित हो जाएगी, उसपर उस पुरुष का अधिकार स्थापित हो गया।

काकी- तो पुरुष तो हमारे साथ केवल इस वक्त उसके बाबू ही हैं।

सुलोचला- हाँ तो क्या हुआ, वो ही करेंगे इसमें क्या हर्ज है अपनी बेटी की रक्षा के लिए करना पड़ेगा।

रजनी के पेशाब करने के बाद उसके बाबू उसपर पेशाब करके उसमें अपना पेशाब मिला देंगे तो रजनी खाली नही रहेगी इसपर उदयराज का अधिकार साबित हो जाएगा और इसके अलावा मैं पानी में मंत्र मारकर और एक फूल दे देती हूँ रजनी और उदयराज थोड़ा दूर जाकर एक साथ खड़े हो जाये फिर रजनी हाथ में पानी लेकर अपने और उदयराज के चारों ओर एक गोला बना लेगी और लोटा उदयराज को देखकर दक्षिण दिशा में विपरीत मुँह करके पेशाब कर लेगी और फिर उसके बाबू भी दक्षिण दिशा में रजनी के पेशाब में अपना पेशाब मिला देंगे फिर दोनों गोले से बाहर आकर जहां पर गोला बंद किया था वहां फूल रख देंगे मैं मंत्र से उसको बंद कर दूंगी। फिर कोई दिक्कत नही है।

उदयराज- लेकिन मुझे तो पेशाब आ ही नही रही अम्मा (उदयराज ने ये कहते हुए रजनी की तरफ देखा तो रजनी कसमसाते हुए झेप गयी)

सुलोचना- अरे बेटा नही आ रहा तो पानी पी ले एक लोटा, लेकिन तू दो बूंद भी अपना पेशाब उसके पेशाब में मिला देगा तो वो सुरक्षित हो जाएगी।

उदयराज- माता मैं तो मज़ाक कर रहा था मैं अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।

सुलोचना- जानती हूं बेटा, जो इंसान पूरे गांव की सुरक्षा के लिए अपने पूरे परिवार को लेके जिसमे एक छोटी सी बच्ची भी है इतने जोखिम भरे रास्ते पर निकल सकता है उसके लिए तो ये कुछ भी नही, पुत्र तुझे इसका फल अवश्य मिलेगा।

और फिर सुलोचना ने एक लोटे में जल लेकर उनमे मंत्र फूंका और रजनी को दे दिया रजनी उसे लेकर बैलगाडी से उतरी उसके पीछे उदयराज भी चलने लगा, कुछ दूर जाकर रजनी ने पलटकर देखा और बोली यहीं ठीक है बाबू थोड़ा ओट भी है।

रजनी ने बताये अनुसार हाथ में जल लेकर अपने और उदयराज के चारों ओर एक घेरा बना दिया फिर लोटा उदयराज को देकर बोली- अब तुम उधर मुह करो पीछे मत देखना बाबू, ठीक है।

उदयराज- किधर?

रजनी- उधर

उदयराज- अरे उधर किधर?

रजनी- दक्षिण दिशा की तरफ, नही उत्तर दिशा की तरफ।

उदयराज- हे भगवान इतना तेज पेशाब लगा है कि कुछ समझ नही आ रहा मेरी बेटी को।

रजनी- हाँ लगी है न बाबू, अब उधर मुँह करो, काकी और अम्मा दोनों इधर ही देख रही है।

उदयराज- देखने दो मैं क्या डरता हूँ उनसे (उदयराज ने मस्ती करते हुए कहा)

रजनी- बाबू करने दो न, अब, मान भी जाओ मेरे बाबू

उदयराज- इससे भी सुरक्षित तरीका सुझा है मुझे।

रजनी- क्या?

उदयराज- इससे अच्छा तो तुम मेरे मुँह में ही पेशाब कर देती, न जमीन पर गिरता न ऐसी ऐसी आफत आती, मेरे मुँह में वो सुरक्षित रहता।

रजनी (जोर से हंसते हुए) - हे भगवान! बदमाश! गंदे!, बहुत बदमाश होते जा रहे हो बाबू तुम, मेरे पेशाब मुँह में लिए फिरोगे, बोलोगे कैसे? तुम न दीवाने होते जा रहे हो बस, अब बाबू धुमो न उधर मुझे करने दो न।

उदयराज- तुम हो ही इतनी हसीन, क्या करूँ।

रजनी- बदमाश!

उदयराज- अच्छा ठीक है पहले बोलो मुझे पिलाओगी न।

रजनी- क्या? दुद्धू, वो तो तुम्हारा ही है मेरे बाबू, क्यों नही पिलाऊंगी (बहुत प्यार से बोला रजनी ने)

उदयराज- वो नही, वो तो मैं पियूँगा ही, मुझे तो ये भी पीना है।

रजनी- क्या?

उदयराज (धीरे से)- अपनी शादीशुदा बेटी का पेशाब

रजनी का मुँह खुला का खुला रह गया-hhaaaiii dddaaaiiiyaa, dhhaaattt, गंदे! हे भगवान बाबू, ये गंदा होता है न

उदयराज- कुछ भी हो मुझे तो पीना है थोड़ा सा ही सही

रजनी शर्म से लाल हो गयी

उदयराज- बोलो न, तभी उस तरफ घूमूंगा!

रजनी- बहुत बदमाश हो तुम बाबू, अच्छा ठीक है पर घर पे और बस थोड़ा सा और पीना नही है बस मुँह में लेकर फिर थूक देना, ठीक

उदयराज- ठीक

रजनी- चलो अब उधर देखो मुझे बहुत जोर से लगी है बर्दाश्त नही होता अब।

और उदयराज उत्तर दिशा की ओर मुह करके खड़ा हो गया, रजनी का किया हुआ वादा सोचके उसका लन्ड फ़नफना उठा पर जल्द ही उसने adjust कर लिया क्योंकि काकी और सुलोचना ज्यादातर इस तरफ ही देख रही थी

रजनी दक्षिण की तरफ घूमी और जल्दी से अपनी साड़ी को थोड़ा सा उठा के उसके अंदर हाथ डाल के पेंटी को घुटनों तक साड़ी के ही अंदर नीचे सरकाया फिर नीचे बैठ गयी और पेशाब की धार छोड़ दी, पेशाब की धार की शीटी सी आवाज उदयराज के कानों तक पड़ी तो उसका मन मचल उठा, रजनी इतना तो समझ गयी कि बाबू पेशाब की धार की आवाज तो सुन ही रहे हैं, रजनी की मखमली बूर की फांकों के बीच से एक मोटी पेशाब की धार जमीन में इतनी तेज लग रही थी की वहां हल्का सा गढ्ढा हो गया, आखिर उसे पेशाब लगा ही इतना तेज था, काफी देर से दबाए हुए थी, पेशाब की धार छोडते ही उसने राहत की सांस ली।

अभी पेशाब करते हुए उसे कुछ सेकंड ही हुए होंगे कि पास के पेड़ की डाल काफी जोर से हिली जैसे किसी ने झकझोर दिया हो

काकी- ये क्या हुआ बहन।

सुलोचला- आ गए हरामजादे, स्त्री का पेशाब सूंघने, अगर अभी ये गोला न बनाया होता तो टूट पड़ते पेशाब पर, और अगर ताबीज़ न बंधी होती तो हावी वो जाते, उदयराज और रजनी ने भी हिलती हुए डाली को देखा पर डरे नही।

काकी- कितना खतरनाक है ये जंगल वाकई में।

रजनी करीब 30 सेकंड तक मूतती रही फिर उठ गई उसकी मखमली मुलायम बूर से निकला हुआ काफी सारा पेशाब जमीन पर था उसने शर्माते हुए उदयराज को देखा और लोटा ले लिया, उदयराज की नज़र जब रजनी के मूत पर पड़ी तो वो उसे मदहोशी से देखने लगा।

रजनी उत्तर की तरफ मुँह करके खड़ी हो गयी फिर उदयराज रजनी के पेशाब के पास बैठ गया और अपना पहले से ही सख्त हो चुके करीब 9 इंच लंबा 3 इंच मोटा काला लंड निकालकर मूतने लगा, उदयराज के लंड से भी पेशाब को धार सुर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर की आवाज के साथ निकलने लगी और रजनी के पेशाब में जा मिली, जैसे ही रजनी ने अपने बाबू के पेशाब की धार की आवाज सुनी और ये सोचा कि मेरे बाबू का पेशाब मेरे पेशाब से मिल गया, उसके तन बदन में मीठी तरंगे दौड़ गयी, आज ये पहली बार हुआ था , बदन गनगना गया उसका। मन ही मन वो सोचने लगी कि बाबू का लंड कैसा होगा? ये सोचते ही शर्म की लालिमा उसके चेहरे पर दौड़ गयी।

उदयराज मूत चुका था वो अब उठ गया, लंड उसने धोती के अंदर करके कुछ इस तरह एडजस्ट किया कि रजनी को भी इसका अहसास न हो कि वो खड़ा है, वो सारे पत्ते एक ही बार में खोलना नही चाहता था।

फिर रजनी और उदयराज उस गोले के बाहर आ गए और रजनी गोले के मुह पर जब फूल रखने लगी तो सुलोचना ने मंत्र पढ़कर उसको बांध दिया

रजनी ने एक नज़र पेशाब पर डाली, अपने पेशाब में अपने बाबू का मिला हुआ पेशाब देखकर उसकी बूर थोड़ी गीली सी हो गयी और अजीब सी गुदगुदी का अहसाह हुआ, फिर उसकी नज़र अपने बाबू पर गयी जो उसे ये देखते हुए देख रहे थे तो वो शर्मा गयी।

उदयराज बोला- लो अब तुम हो गयी मेरी, तुम पर हो गया मेरा अधिकार।

रजनी- वो तो मैं आपकी बचपन से हूँ, मेरे ऊपर आप ही का हक़ है बाबू। अब चलो

उदयराज और रजनी बैलगाडी तक आ गए।

काकी- अब मिली शांति

रजनी- हां काकी, देखो न कितना सुकून है मेरे चेहरे पर।

सब हंस पड़े

काकी- अब जब यहां रुके ही हैं तो खाना पीना खा के थोड़ा आराम करके फिर चलते हैं।

सुलोचना- ठीक है

फिर सबने कुछ दूर एक घने पेड़ के नीचे खाना खाया और कुछ देर आराम करने लगे

कुछ देर आराम करने के बाद उदयराज फिर बैलगाडी सुलोचना के बताए अनुसार चलाने लगा और शाम हो गयी।

सुलोचला - यहां से लगभग तीन किलोमीटर का रास्ता और है फिर पहुंच जाएंगे, यहां पर अब भूत प्रेतों का खतरा नही है क्योंकि अब हम महात्मा पुरुष के स्थान की परिधि में प्रवेश कर गए हैं

उदयराज, काकी और रजनी ने देखा कि वहां से बड़े बड़े पहाड़ शुरू हो गए थे, सुलोचना ने बनाये हुए मशाल जलाकर बैलगाडी के side में लगी मशालदानी में लगा दिए, जंगल में कुछ दूर तक रोशनी फैल गयी।
 
Update-23

कुछ ही पलों में जलती हुई मशाल की जगमगाती रोशनी के साथ बैलगाडी पहाड़ों से भरी हसीन वादियों में प्रवेश कर गयी। बैलगाड़ी में बैठी रजनी, काकी और उदयराज को एक असीम शक्ति, और सुकून का अहसास हुआ, पहाड़ों के बीच होते हुए बैलगाडी एक ऐसे दो बड़े बड़े पहाड़ों के पास पहुँची, वहां पर कुछ आदिवासी घूम रहे थे उनके हाथ में भी मशाले थी। सामने दो पहाड़ों के बीच एक छोटी सी गुफा थी उसके द्वार पर दो आदिवासी पहरा दे रहे थे, आस पास चारों तरफ पहाड़ ही पहाड़ थे जिनमें और भी गुफायें थी।

सुलोचना- पुत्र बैलगाडी रोको, हम पहुँच गए हैं यही वो जगह है, वो सामने की गुफा के अंदर उन महात्मा का वास है।

उदयराज ने बैलगाड़ी रोक दी।

रजनी और काकी चकित होकर देख रहे थे, वहां के वातावरण में एक अजीब ही चुम्बकीय शक्ति थी जो अत्यंत ऊर्जा का अहसास करा रही थी।

सुलोचना बैलगाड़ी से उतरी और लाठी के सहारे उस मुख्य गुफा द्वार तक गयी उसे देखते ही वहां पर पहरा दे रहे आदिवासी ने सुलोचना को झुक कर अभिवादन किया, ये देखकर उदयराज, रजनी और काकी चकित रह गए।

सबको बड़ा गर्व हुआ कि वह एक ऐसे इंसान के साथ हैं जिसकी यहां पर इतनी इज़्ज़त है। उदयराज सुलोचना के प्रति खुद को मन ही मन बहुत आभारी और कृतज्ञ महसूस करने लगा। उसने मन ही मन खुद से ये प्रण किया कि वह जिस भी तरह से सुलोचना के काम आ सकता है जरूर आएगा। सुलोचना के इस तरह निस्वार्थ रूप से उसकी मदद करना उसके दिल को गहराई तक छू गया।

सुलोचना ने उस आदिवासी से कुछ बात की फिर पीछे मुड़कर सबको बैलगाडी से उतरकर आने के लिए कहा।

उदयराज ने बैलगाडी एक पेड़ से बांध दी, सुलोचना के इशारे पर एक आदिवासी ने बैलों के चारे के इंतजाम कर दिया, सबलोग गुफा के द्वार पर गए, आदिवासी ने सबको झुककर अभिवादन किया और सब गुफा के अंदर प्रवेश कर गए।

अंदर जाकर उन्होंने देखा कि कई कक्ष बने हुए थे जिसमें से एक में सुलोचना उन्हें ले गयी और बोली- अभी यहीं बैठो।

गुफा के अंदर काफी बड़े बड़े चट्टानो को काटकर बैठने के लिए और लेटने के लिए बनाया हुआ था, सब बैठ गए, तभी एक आदिवासी उनके लिए बांस की बनी बड़ी गिलास में कुछ पेय पदार्थ पीने के लिए लाया।

उस आदिवासी ने सुलोचना से कुछ कहा फिर सुलोचना ने बोला- लो ये पियो, थकान उतर जाएगी।

सबने दिव्य रस पिया और वाकई में उन्हें पीने के बाद काफी ऊर्जा महसूस हुई, उस वक्त शाम के 7 बज चुके थे, बाहर अंधेरा हो गया था, गुफा के अंदर व बाहर मशाले जल रही थी।

सुलोचना ने एक आदिवासी को कुछ बोलकर अंदर भेजा।

उदयराज- माता ऐसा जान पड़ता है ये लोग आपको बहुत अच्छे से जानते हैं।

सुलोचना- हां बिल्कुल, इन लोगों के साथ मैं कुछ महीने रही हूं जब मैं मन्त्र सीख रही थी। ये लोग मुझे बहुत इज़्ज़त देते हैं और बात मानते हैं।

काकी- हां वो तो दिख ही रहा है बहन, पर मान लो आप हमारे साथ न होती तो हम कैसे इनकी भाषा समझते और कैसे आगे बढ़ते। आप तो जैसे वरदान बनकर आयी हैं हमारे लिए।

सुलोचना- नही बहन ये तो मेरा फ़र्ज़ है, अपनी प्रतिज्ञा से मैं बंधी हूँ, जन मानस की सेवा करना ही मेरा धर्म है, इसलिए ही मैंने अपने पति की अधूरी इच्छा को पूरा करने के लिए ये सब सीखा और कई वर्षों से मैं यही कर रही हूँ। अच्छा बहन क्या घर से घर का कुछ चावल लायी हो हमे हवन में उसकी जरूरत पड़ेगी।

उदयराज- हां माता हम घर से कुछ अनाज लाये थे, उसमे चावल भी है।

सुलोचना- ठीक है वो निकाल कर थोड़ा सा एक पोटली में ले लो।

काकी ने वैसा ही किया।

तभी वह आदिवासी आया और उसने सुलोचना से कुछ कहा।

सुलोचना- आओ चलो अब मेरे साथ।

सब सुलोचना के पीछे चल दिये, वो गुफा के अंदर आगे आगे लाठी लिए चल रही थी और उसके पीछे काकी और फिर रजनी और सबसे पीछे उदयराज।

गुफा के अंदर एक छोटी सुरंग थी वो लोग उसी में से आगे बढ़ रहे थे, ये सुरंग अंदर ही अंदर एक बड़ी सी गुफा में जा कर मिलती थी उस गुफा के चारो तरफ भी कई छोटे कक्ष बनाये गए थे।

आखिर वो उस गुफा तक पहुचे जहां वह महात्मा विराजमान थे। उनकी आभा देखते ही बनती थी, उनके अगल बगल एक आदिवासी सेवक और एक सेविका खड़ी थी जो उन्हें मोरपंख से बने पंखे से हवा कर रहे थे। उस गुफा में कई तरह की जड़ीबूटियां, फूल और सुगंधित मालाएं लगी थी। महात्मा के ठीक सामने एक छोटा सा हवन कुंड था, दीवारों पर मशालें जल रही थी लेकिन धुवां नाममात्र भी नही था।

सुलोचना ने उनको प्रणाम किया साथ ही उदयराज और रजनी तथा काकी ने भी प्रणाम किया। सब महाराज के सामने बैठ गए।

महात्मा सुलोचना को देखते ही बोले- आओ पुत्री, कैसी हो?

सुलोचना- महात्मन मैं ठीक हूँ। आपकी कृपा है।

महात्मा- जीती रहो पुत्री।

महाराज ने उदयराज के ऊपर दृष्टि डाली कुछ पल उसे देखा फिर आंखें बंद की, कुछ मंत्र बोले और फिर आंखें खोल कर बोले- विक्रमपुर के मुखिया उदयराज सिंह!, बोलो पुत्र इस वीरान घने जंगल में अपनी पुत्री के साथ कैसे आना हुआ, क्या कष्ट है?

सुलोचना को छोड़कर सब भौचक्के रह गए, क्योंकि सुलोचना उनकी महिमा जानती थी, उदयराज का मुँह खुला का खुला रह गया यह सोचकर कि बिना बताये मंत्रों की शक्ति से ही महात्मा ने उसका नाम, गांव, संबंध सब जान लिया, वह बहुत प्रभावित हुआ, वह समझ गया कि अब उसकी समस्या का समाधान मिल जाएगा। इतना दिव्य महात्मा उसने आज तक नही देखा था और बोली उनकी कितनी सरल है, न कोई घमंड न कोई गुरूर। यही सही सच्चे महात्मा का व्यक्तित्व होता है।

वह हाँथ जोड़कर बोला- महात्मा, ये हमारा सौभाग्य है कि माता सुलोचना की कृपा से आज हमे आपके दर्शन मिले। आपने अपनी शक्ति से स्वयं ही मेरा नाम और गांव जान लिया।

महात्मा- जीते रहो पुत्र, सब ईश्वर की शक्ति और उन्ही की माया है, बताओ क्या कष्ट है?

उदयराज- महात्मा, विक्रमपुर गांव में कई पीढियों से एक ऐसी समस्या चली आ रही है जिसका हल न तो हमारे पूर्वज खोज पाए और न ही हम, हमारे गांव की जनसंख्या पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ने की बजाय घट रही है, कई सौ सालों पहले जहां 1000-2000 घर थे आज वो सिमटकर 100-200 ही रह गए हैं, जन्मदर और मृत्युदर में बहुत ही बड़ा अंतर आ गया है, बच्चे जल्दी नही होते है और होते भी हैं तो ज्यादातर कम उम्र में ही खत्म हो जाते हैं।

उदयराज ने आगे कहा- लोग बीमार पड़ते है, इलाज़ कराओ तो मर्ज का पता ही नही लगता और कुछ दिन बाद मौत हो जाती है, धीरे धीरे करके कितने परिवार पूरे के पूरे साफ हो गए उनका अब नामो निशान नही, हर मौजूदा परिवार में लोगों ने अपनो को खोया है और जो परिवार पूरे के पूरे साफ हो गए वो तो हो ही गए। मैन खुद अपनी पत्नी और बेटे को खोया है, ये मेरे साथ मेरी काकी हैं जिन्होंने अपने पति और बेटे को खोया है, महात्मा जी अगर किसी मर्ज का पता हो तो समस्या का हल निकले पर यहां तो कुछ पता ही नही चलता। इस तरीके से तो एक दिन ऐसा आएगा कि हमारा और हमारे कुल का ही नामो निशान मिट जाएगा, कोई बचेगा ही नही। आखिर हमने किसी का क्या बिगाड़ा है

जबकि हम और हमारे कुल के लोग निहायत ही सीधे साधे हैं, न किसी से कोई बैर न किसी से कोई झगड़ा, कभी किसी का अहित नही सोचते, किसी के साथ ग़लत नही करते, ऐसा कोई काम नही करते जिससे किसी का दिल भी दुखे, और ये आज से नही पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। बहुत ईमानदार, शरीफ, भोले भाले सच्चे लोग हैं हमारे कुल में, हमारे गांव में।

बाहरी दुनियां में देखो, कितना अधर्म, कुकर्म, अनैतिक कार्य, कितना ही गलत-गलत काम होता है पर मजाल क्या है हमारे यहां कभी ऐसा कुछ हुआ हो, गलत हम सोच ही नही सकते और न कर सकते हैं, यही हमारी रीति है यही हमारा स्वभाव है और यही हमारी पहचान और मूल है। जो मान मर्यादा हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई है उसकी लाज का पालन आज भी हमारे कुल का एक एक शख्स कर रहा है और करता रहेगा।

बाहरी दुनियां से तो हमने अपने आप को पीढ़ियों से ही अलग कर रखा है ताकि हमारे कुल के लोगों पर कभी पाप, कुकर्म, अनैतिक, गलत काम, अधर्म की छाया भी न पड़े, और हमे मोक्ष प्राप्त हो।

महात्मा जी, सुलोचना, रजनी, और काकी सब ध्यान से सुन रहे थे।

उदयराज ने आगे कहा
 
Update-24

उदयराज ने अपनी समस्या बताते हुए आगे कहा- हे महात्मा हमारी रक्षा कीजिये, नही तो हमारा नाश हो जाएगा, बाहरी दुनियां में पाप, दुराचार, अधर्म सब कुछ हो रहा है, परंतु फिर भी पूरी दुनियां आगे बढ़ रही है, जनसंख्या बढ़ रही है एक संतुलन बना हुआ है, मृत्य हो रही है तो जन्म भी हो रहे हैं, लोग गलत करके भी खुश है, परंतु हम लोग डर और दुख के साये में जी रहे है, आगे हमारे कुल, हमारी सभ्यता का क्या होगा, हमारा तो अस्तित्व ही खतरे में आ गया है, महात्मा हमारी जान बचाइए, कोई रास्ता बताइए जिससे ये पता लगे कि ऐसा क्यों है, क्यों हमारी संख्या अनायास ही घट रही है, क्यों हमारा संतुलन बिगड़ गया है, और इसका हल क्या है? यह कैसे सुधरेगा? इसके लिए क्या करना होगा? इतना सबकुछ विस्तार से बताते-बताते उदयराज की आंखें नम हो गयी थी, महात्मा को इसका अहसास था, अन्य लोग भी काफी उदास हो गए।

महात्मा ने उन्हें सांत्वना दी और बोले- चिंता मत करो हर समस्या का हल होता है, क्या तुम अपने घर से कुछ चावल के दाने लाये हो।

सुलोचना- हाँ महात्मा लाये हैं और सुलोचना ने वह छोटी चावल की पोटली महात्मा को दे दी।

महात्मा ने अपने सामने बने हवन कुंड में कुछ लकड़ियां रखकर जला दी, उसमे कुछ जड़ी बूटियां डाला फिर एक सुगंधित द्रव्य डाला और उदयराज के घर के चावल के कुछ दाने उसमे डाल दिए और बाकी बचे हुए दाने उन्होंने उदयराज, काकी और रजनी को देते हुए कहा इसको मुट्ठी में बंद कर लो और सुलोचना को छोड़कर आप लोग अपने कुल देवता या कुल वृक्ष को आंखें बंद कर ध्यान करो।

उदयराज, काकी और रजनी ने आंखें बंद कर अपने कुलवृक्ष को ध्यान किया।

महात्मा ने मंत्र पढ़ना शुरू किया और ध्यान लगाया, कुछ देर बाद आंख खोला और बोले- ह्म्म्म तो ये बात है।

सबने आँखे खोल दी

महात्मा- मैं जो बताने जा रहा हूँ अब ध्यान से सुनो

ये जो तुम्हारे गांव में बरगद जैसा कुलवृक्ष है वो 500 साल पुराना है।

उदयराज- हां महात्मा लगभग, बहुत पुराना हमारा कुलवृक्ष है वो।

महात्मा- उसी वृक्ष के नीचे बैठकर तुम्हारे एक समकालीन पूर्वज महात्मा ने जो उस वक्त मुखिया भी थे, एक यज्ञ किया था और अपने सम्पूर्ण कुल को मोक्ष दिलाने के लिए बाहरी दुनियाँ से अलग कर बांध दिया था, उन्होंने पहले अपने मंत्र की शक्ति से तुम्हारे कुल के सभी लोगों के अंदर से अधर्म, पाप, गलत सोच, गलत काम का नाश कर उनको पूर्ण स्वच्छ किया और सबकी नीयत को साफ कर पूर्ण कुल को बांध दिया और ये बंधन आज भी लगा हुआ है, उन्होंने ऐसा सोचा कि जब हम लोगों के मन में गलत नीयत होगी ही नही तो हम गलत करेंगे ही नही, बस ईश्वर के बनाये हुए नियम पर चलेंगे, प्रकृति के हिसाब से चलेंगे और बाहरी दुनिया से हमे कोई मतलब ही नही होगा तो हम सब के सब मोक्ष को प्राप्त होंगे, उन्होंने ये सब सम्पूर्ण कुल की भलाई के लिए किया पर ये धीरे धीरे उल्टा पड़ता चला गया और ऐसी स्थिति आ गयी कि संतुलन बिगड़ गया, अब क्योंकि वो महात्मा सिद्ध पुरुष थे तो उनके मंत्र की काट किसी के पास तुम्हारे कुल में नही है और उनके बाद न ही कभी कोई ऐसा सिद्ध पुरुष आया जो इसको समझ पाता और इसको तोड़ पाता। धीरे धीरे जीवन मरण का संतुलन बिगड़ता गया और आज ये स्थिति है कि तुम्हारे कुल के एक तिहाई परिवार खत्म हो चुके हैं।

उदयराज, रजनी और काकी चकित रह गए ये जानकर और अचंभित थे कि कैसे कुछ ही पलों में महात्मा ने उनके कुल की सारी जन्म पत्री खोल कर रख दी थी

उदयराज- तो महात्मा जी क्या जो लोग मर चुके हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ होगा।

महात्मा- नही

उदयराज का अब माथा ठनका।

उदयराज- पर क्यों महात्मा, हम तो सदैव ईश्वर और प्रकृति के बनाये हुए नियम के हिसाब से चल रहे हैं।

महात्मा- जिसकी अकाल मृत्यु हो उसे कभी मोक्ष प्राप्त नही होता, पहले वो प्रेत योनि में भटकता है और जैसा की तुमने बताया कि तुम्हारे गांव में लोग बीमार पड़ते हैं और मर जाते हैं तो ये एक अकाल मृत्यु हुई, और अकाल मृत्यु पाने वाले को मोक्ष प्राप्त नही होता, अकाल मृत्यु का अर्थ है जब कोई जीव अपनी पूर्ण आयु जिये बिना बीच में ही किसी भी कारणवश मर जाये। ऐसे में वो प्रेत योनि में चला जाता है और जब तक उसकी तय आयु पूरी न हो जाये वो वहीं भटकता रहता है, तुम्हारे पूर्वज ने अपनी तरफ से तो अच्छा ही करने की कोशिश की पर वह ये भूल गए कि कोई कितना भी बड़ा महात्मा या सिद्ध पुरुष हो, कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, ईश्वर के बनाये हुए नियम से छेड़छाड़ नही कर सकता और अगर जानबूझ कर करता है तो वह विनाशकारी ही होता है, तुम्हारे पूर्वज ने सोचा कि हम गलत करेंगे ही नही तो सब के सब मोक्ष को प्राप्त होंगे पर नियति ने फिर अकाल मृत्यु देना शुरू कर दिया, और नियमानुसार मोक्ष प्राप्ति विफल हो गयी, क्योंकि मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर के बनाये नियमों का सही से पालन करते हुए पूर्ण आयु को प्राप्त होना होता है तभी वह मिलता है पर कुछ विशेष वजह से यह फिर भी नही मिलता, मोक्ष प्राप्ति इतना आसान नही जितना तुम्हारे पूर्वज द्वारा समझा गया और उनकी इस भूल की वजह से कितनो की जान चली गयी।

उदयराज महात्मा का मुंह ताकता रह गया।

महात्मा- नियति कभी भी अपने बनाये हुए नियम में होने वाले छेड़छाड़ के मकसद से बनाये गए नियम को पूर्ण नही होने देती, सोचो अगर यह इतना ही आसान होता तो दुनियां के सब लोग इसका ऐसे ही पालन करके मोक्ष प्राप्त कर लेते और जीवन मरण के झंझट से मुक्त हो जाते, सब लोगों को स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती और फिर तो नरक भी खाली हो जाता और मृत्यलोक भी, ये संसार ही खत्म हो जाता, जरा सोचो उदयराज सोचो, क्या होगा अगर सब लोग इतनी आसानी से मोक्ष की प्राप्ति कर स्वर्ग को चले जाएं तो?

इस मृत्यलोक में जीवन की उत्पत्ति तो खत्म ही हो जाएगी, लोग ईश्वर के बनाये हुए नियम पर बड़ी आसानी से चलते हुए अपनी पूरी आयु जीकर मोक्ष प्राप्त कर स्वर्ग में चले जायेंगे, नया जन्म कैसे होगा, धीरे धीरे संसार खाली, नरक के लोग भी अपनी सजा पूरी कर स्वर्ग को प्राप्त हो जाएंगे और नर्क भी खाली हो जाएगा, जब गलत काम होगा ही नही तो एक वक्त तो ऐसा आएगा न की नर्क नगरी में ताला लग जायेगा और मृत्यु लोक भी खत्म।

तो क्या ये इतना आसान है कि कोई इंसान कुछ सिद्धियां प्राप्त करके नियति को ललकारे की देख मैं कुछ छोटी मोटी शक्तियां प्राप्त करके तेरे बनाये नियम को तोड़कर वो कर लूंगा जो मैं चाहता हूँ, क्या ऐसा हो सकता है? सोचो जरा

उदयराज को बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही थी उसके पूर्वज द्वारा किये गए इस बेवकूफी भरे कार्य से

महात्मा ने आगे समझाया
 
Dear Readers

कहानी का update मैं इस वक्त थोड़ा छोटे दे रहा हूँ पर जल्दी जल्दी दूंगा, कहानी अभी इस मोड़ पर है कि बहुत ही सोच समझ कर लिखना पड़ रहा है ताकि एक बेहतरीन प्लाट बन सके, इसलिए अपडेट थोड़ा छोटा रहेगा पर जल्दी जल्दी आएगा, कृपया साथ बनाये रहें मजा जरूर आएगा वो भी बहुत।

धन्यवाद dears
 
Update-25

महात्मा- एक बात को समझने की कोशिश करो इस ब्रम्हांड में अगर कोई भी चीज़ है तो उसका अस्तित्व जरूर है, और सबकुछ ईश्वर ने ही बनाया है, इस संसार को चलाने के लिए सब चीज़ की जरूरत है

देखो जैसे अगर सफेद है तो काला भी है बिना काले के सफेद का अस्तित्व ही नही है

अगर पुण्य है तो पाप भी है और अगर पाप ही नही होगा तो पुण्य के अस्तित्व को पहचानेंगे कैसे? हमे कैसे पता चलेगा कि पुण्य इसको बोलते है, पुण्य का अस्तित्व पाप से है और पाप का पुण्य से

इसी तरह सिपाही का अस्तित्व चोर से है, चोर है तो सिपाही है, चोर नही तो सिपाही का क्या अस्तित्व

उदयराज महात्मा के चरणों में पड़ गया- हे महात्मा मुझे अब समझ आ रहा है कि हमारे पुर्वज ने क्या गलती की, हमने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है, हमे नियति से छेड़छाड़ नही करनी चाहिए थी।

महात्मा- पुत्र इसमें तुम्हारा कोई दोष नही, ये तुम्हारे द्वारा नही हुआ है, इसके लिए खुद को दोषी मत समझो, तुम्हारे पुर्वज ने अपने मंत्र की शक्ति से तुम्हारे कुल को बांध दिया है इसलिए तुम्हारा कोई दोष नही।

उदयराज- तो महात्मा जी इसका हल क्या है? कैसे हम इसको तोड़कर बाहर निकल सकते हैं। कैसे हम खुद को और बचे हुए लोगों को बचा सकते हैं।

महात्मा ने फिर अपनी आंखें बंद की ध्यान लगाया और आंखें खोली, उन्होंने उदयराज, रजनी और काकी को मुठ्ठी में लिए हुए चावल के दानों को हवन में विसर्जित करने के लिए बोला, सबने वैसा ही किया, महात्मा ने फिर एक मुट्ठी चावल लिया और आंखें बंद कर ध्यान लगाया, कुछ देर बाद आंखें खोल कर फिर से उदयराज, काकी और रजनी को चावल के दाने देकर मुट्ठी बंद करने को कहा, सबने वैसा ही किया और महात्मा ने आंखें बंद कर मंत्र पढ़ना शुरू किया। कुछ समय बाद उन्होंने आंखें खोली।

महात्मा- इसका हल है, इसके लिए तुम्हे उपाय और कर्म दोनों करने होंगे, उपाय तुम्हे तुम्हारे पुर्वज द्वारा लगाए गए मंत्र को काटने के लिए करना होगा और कर्म तुम्हे नियति के नियम को दुबारा स्थापित करने के लिए करना होगा जो खंडित हो चुका है इस वक्त। फिर सब धीरे-धीरे सही हो जाएगा।

उदयराज- कैसा उपाय और कैसा कर्म महात्मा जी?

महात्मा- उपाय ले लिए मैं तुम्हे मन्त्र से सुसज्जित करके चार कील दूंगा जिसको तुम्हे मेरे बताये गए जगह पर गाड़ना है?

उदयराज- बताइए महात्मा जी, जो जो आप कहेंगे मैं करने के लिए तैयार हूं।

महात्मा- पहली कील तुम्हे यहां से जाते वक्त जंगल में एक पीला वृक्ष मिलेगा उसकी जड़ों में गाड़ देना है ध्यान रहे उस पेड़ को छूना मत किसी पत्थर से उस पेड़ को बिना छुए कील को ठोककर गाड़ देना और फिर उस पर एक काम और करना है जो मैं तुम्हे और सुलोचना को एकांत में बताऊंगा।

उदयराज, काकी और रजनी को अब वो पेड़ याद आ गया जो उन्होंने आते वक्त देखा था पीले रंग का

काकी- हाँ महात्मा जी, आते वक्त हमने एक पीला बड़ा सा वृक्ष देखा था, बहुत मायावी वृक्ष जान पड़ता था वो।

महात्मा- वो एक शैतान प्रेत है जो किसी श्राप से वृक्ष रूप में वहां सजा भुगत रहा है उसकी सजा पूर्ण होते ही वह पेड़ सूख जाएगा और उसको मुक्ति मिल जाएगी। वह बहुत पुराना वृक्ष है, डरो मत वह तुम्हारा कुछ नही बिगाड़ सकता जब तक तुम सब लोगों ने सुलोचना द्वारा दी गयी ताबीज़ बांध रखी है बस उस पेड़ को छूना मत, कील गाड़ने के बाद उस पेड़ को तुम्हे कुछ अर्पित करना पड़ेगा जो मैं एकांत में उदयराज और सुलोचना को बताऊंगा, वह अर्पित करते ही वह शैतान खुश हो जाएगा और तुम्हारे पुर्वज द्वारा लगाए गए बंधन के मंत्र को काटने में मदद करेगा।

दूसरी कील तुम्हे अपने गांव की सरहद पर गाड़नी है जब यहां से जाते वक्त तुम अपने गांव के सरहद पर पहुँचो तो दूसरी कील सरहद पर गाड़कर गांव में दाखिल हो जाना, और यहां भी कील गाड़ने के बाद उस पर वही अर्पित करना होगा जो पेड़ पर किया था।

तीसरी कील घर की चौखट पर रात के ठीक बारह बजे गाड़नी है और यहां पर कुछ अर्पित नही करना है केवल कील ही गाड़नी है।

उदयराज- और महात्मा जी चौथी? (बड़ी उत्सुकता से)

महात्मा- चौथी कील तुम्हे अमावस्या की रात को ठीक 12 बजे अपने कुलवृक्ष के नीचे उसकी जड़ में गाड़ना है परंतु यहां पर फिर तुम्हे वही चीज़ अर्पित करना है जो तुमने जंगल के पेड़ और गांव के सरहद पर कील के ऊपर की थी, ध्यान रहे खाली घर की चौखट पर गड़ी कील पर कुछ अर्पित नही करना, खाली तीन जगह।

उदयराज- परंतु महात्मा जी हमारा जो कुलवृक्ष है उसकी जड़ के ऊपर तो एक बहुत बड़ा चबूतरा बना हुआ है, उसकी जड़ तो बहुत नीचे है।

महात्मा- तुम कुलवृक्ष के तने में थोड़ा छुपाकर गाड़ देना उससे भी काम हो जाएगा।

उदयराज- ठीक है महात्मा जी

महात्मा- अपने मुट्ठी में लिए हुए चावल के दानों को अब हवन कुंड में डाल दो।

सबने वैसा ही किया

महात्मा ने बगल में खड़े आदिवासी से कुछ कहा और वह एक पात्र में चार कीलें ले आया।

महात्मा ने उसे बगल में रखा।

उदयराज- महात्मा जी ये तो उपाय हो गया और इनके अलावा अपने जो कर्म बताया उनमे क्या करना होगा? वो कौन सा कर्म है? जिसको करके मैं नियति की खंडित हुई व्यवस्था को पुनः स्थापित कर सकता हूँ।

महात्मा- वो मैं तुम्हे एकांत में बताऊंगा, वो कुछ अलग है क्योंकि हर चीज़ की एक मर्यादा होती है और तरीका होता है।

महात्मा ने सबको अभी पुनः थोड़ा विश्राम करने के लिए कहा और सुलोचना सबको लेके बगल के कक्ष में गयी, वहां पर एक आदिवासी ने सबको एक पात्र में कंदमूल और फल तथा दिव्य रस खाने पीने के लिए दिए।

महात्मा ने वो कीलें तैयार करना शुरू कर दिया
 
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