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सुनैना एक बार फिर से कल्लू के हाथ से बच गई थी,,, कल्लू के इरादे को सुनैना आप अच्छी तरह से समझ गई थी जिस तरह से उसने उसे खींचकर अपनी बाहों में कस लिया था और उसके नितंबों कहां कर रखा था वह जान गई थी कि वह उसकी इज्जत से खेलना चाहता है,,,,, उसकी हरकत को देखकर और जंगल जैसे एकांत में वह घबरा गई थी,,, उसे लगा था कि आज उसकी इज्जत नहीं बचेगी लेकिन तभी सुझ-भुज दिखाते हुए अपने घुटने का वार कल्लू के गुप्तांग पर की थी,,, जिसकी वजह से वह चारों खाने चित हो गया था,,,।
लेकिन इस बारे में सुनैना ना तो सोनु की मां को कुछ बताइ और ना हीं अपनी पड़ोसन को,,, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि कोई उसके बारे में गलत समझे उसकी बदनामी हो और उसके साथ कल्लू का नाम जोड़कर गांव भर में चर्चा हो,,, क्योंकि वह जानती थी कि अगर कल्लू का नाम उसके साथ जुड़ गया तो लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगेंगे और सबको यही लगने लगेगा कि सुनैना में ही दोष है जो ऐसे आदमी के साथ उसका नाम जुड़ रहा है,,,। इसलिए वह नहीं चाहती थी की बात का बतंगड़ बने,,,।
घर पहुंचते पहुंचते अंधेरा हो चुका था,,,, लेकिन जब वह रसोई घर में पहुंची तो अच्छी रानी चुल्हा जलाकर रोटी पका रही थी यह देखकर सुनैना को भी संतोष हुआ और वह तुरंत सामान का थैला रखकर ,, हाथ पैर धोने लगी,,,, रानी भी अपनी मां को देखकर बहुत खुश हुई क्योंकि वह जानती थी कि उसकी मां उसके लिए समोसे जरूर लाई होगी इसलिए रोटी को तवे पर रखते हुए वह खुश होते हुए बोली,,,,।
मां तुम समोसे तो लाई होना,,,
हां हां जरूर लाई हूं,,,,
तब तो अच्छा है,,, मैं तुम्हारा बहुत इंतजार करी जब अंधेरा होने लगा तो मैं खुद ही चुल्हा चला दी,,,।
चल बहुत अच्छा की तुने,,,(अपनी साड़ी में हाथ को पोछते हुए बोली,,,)
लेकिन मैं इतना देर क्यों लगा दी ऐसा तो पहले कभी नहीं होता था,,,,।
तेरे समोसे के चक्कर में ही देर हो गए,,,, उसके पास तैयार पडा नहीं था और वह ताजा-ताजा बना रहा था इसलिए बैठना पड़ा,,,, अब तू हट जा सब्जी काट दे मैं बना देती हूं,,,,
ठीक है,,,(इतना कहने के साथ ही रानी अपनी जगह से उठकर रसोई घर से बाहर आ गई और सुन लेना रसोई घर में जाकर रानी की जगह बैठ गई और रोटी पकाने लगी तभी वह रोटी को तवे से हटाते हुए बोली,,,।)
अरे सूरज कहां चला गया,,,,!
भैया कुछ देर पहले ही आया था,,,,, वापस चला गया,,,,।
कहां चला गया,,,? कुछ बताया है कि नहीं...?
भैया कहां कुछ बताता है बस आया और गया,,, ।(सब्जी काटते हुए रानी बोली)
चल अच्छा सब्जी काट कर तू समोसे खा ले,,, और अपने भाई के लिए भी रख देना,,,।
ठीक है मां,,,,(इतना कहते हुए वहां जल्दी-जल्दी सब्जी काटने लगी क्योंकि उसे समोसे खाने की जल्दबाजी मची हुई थी उसे समोसे बहुत पसंद थी और अगर समोसे के साथ जलेबी मिल जाती तो उसकी खुशी दुगनी हो जाती थी,,,, थोड़ी देर में सब्जी काटने के बाद वह जल्दी से थैले में से सामान निकालने लगी,,, समान निकालते हुए रानी बोली,,)
क्या-क्या लाई हो मां,,,,।
अरे ज्यादा कुछ नहीं लाई हूं बस मुझे चूड़ियां खरीदना था और घर का सामान लाई हूं नमक मिर्च तेल धनिया यही सब है,,,।
हां मां यही सब तो दिख रहा है,,,,,।
( धीरे-धीरे करके रानी थैले में से सारा सामान बाहर निकाल ली यह देखकर सुनैना बोली)
अरे सारा सामान क्यों बिखेर रही है,,,।
कुछ नहीं बस देख रही हूं,,
सिर्फ समोसे बाहर निकाल ले बाकी सब सामान रख दे,,,,।
ठीक है,,,,।
(रानी सारा सामान वापस थैले में रखकर केवल समोसे निकाल कर खाने लगी,,, तभी सूरज भी वहां आ गया,,,,, आते ही उसकी नजर सबसे पहले रानी पर पड़ी रानी को देखते ही वह बोला,,,,)
मां आ गई क्या,,,?
वह तो कब से आई है खाना भी बना रही है तेरा ही ठिकाना नहीं रहता,,,।
अरे मैं कहां गांव से बाहर चला गया हूं यही तो हुं,,,(और इतना कहने के साथ ही वहीं पर बैठ गया और समोसे खाने लगा,,,, दोनों को खाते हुए देखकर सुनैना मन ही मन खुश हो रही थी और अपने मन में सोचने लगी कि उसका परिवार इसी तरह से एकदम खुशहाल था जब उसका पति हमेशा उसकी परवाह करता था उससे प्यार करता था लेकिन अपना जाने क्या हो गया है कि वह घर पर रहता ही नहीं,,,। तभी सूरज बोला,,)
समोसे तो बहुत स्वादिष्ट हे मा,, बस थोड़ा गर्म होता तो मजा आ जाता,,,,
अरे अब इतनी दूर से लाने में ठंडा हो ही जाता है गरम थोड़ी ना रहेगा,,,, वैसे तुम दोनों के लिए जलेबी भी लाई हूं,,,,।
(जलेबी का नाम सुनते ही रानी एकदम से अपनी मां की तरफ देखने लगी और प्रसन्नता भरे स्वर में बोली,,,)
क्या जलेबी,,,,!
हां जलेबी,,,, (मुस्कुराते हुए सुनैना बोली)
लेकिन अभी तक बोली क्यों नहीं और थैली में से तो जलेबी निकाली ही नहीं,,,,(रानी परेशान होते हुए खोली सूरज भी कभी रानी की तरफ तो कभी अपनी मां की तरफ देख ले रहा था)
मैं जानती हूं तुझे जलेबी बहुत पसंद है और मैं देखना चाहती थी कि जलेबी के बारे में पूछता है कि नहीं,,,।
क्या मां मैं तो समझी कि तुम सिर्फ समोसे हि लाई हो और मैं थैली में से जलेबी ही ढूंढ रही थी बस बोली नहीं थी,,,।
लेकिन जलेबी है कहा मां,,,(सूरज भी हैरान होते हुए बोला)
जा दरवाजे के पास टांग कर आई हूं,,, जब मैं आ रही थी तभी ठेले में से निकाल कर उसे वही टांग दी थी,,,।
(सुनैना की बात पूरी भी नहीं हुई थी की रानी एकदम से उठकर खड़ी हो गई और जल्दी से दरवाजे की तरफ चली गई और थोड़ी ही देर में जलेबी लेकर आई,,,, सबसे पहले जलेबी का टुकड़ा मुंह में डालकर उसे खाने लगी और फिर उसमें से एक टुकड़ा लेकर सूरज की तरफ आगे बढ़ाते हुए बोली,, )
लो भाई तुम भी खाओ,,,,।
(अपनी बहन की आवाज सुनते ही सूरज अपने मन में ही बोला मुझे यह जलेबी नहीं खाना है मुझे तो तुम दोनों की टांगों के बीच वाली जलेबी खाना है उसका रस पीना है,,,, मुझे मालूम है तुम दोनों बहुत मजा दोगी,,,,,, अपनी बहन रानी के लिए भी सूरज के मन में गलत भावना जाग चुकी थी क्योंकि वह अपनी बहन को पेशाब करते हुए जो देख चुका था उसकी मदमस्त जवानी से भरी हुई गांड के जो दर्शन कर लिया था,,, अपने भाई को इस तरह से सोच में डूबा हुआ देखकर रानी फिर से बोली,,)
क्या हुआ भैया लो जलेबी खा लो,,,।
(रानी की बात सुनकर जैसे वह नींद से जगा हो इस तरह से हड़बड़ा गया और बोला,,)
ननननननन,,,,हुआ क्या,,,,,?
अरे हुआ कुछ नहीं सो गए थे क्या लो जलेबी खा लो,,,,।
नहीं मैं नहीं खाऊंगा मेरे हिस्से का तू ही खा ले और मां को भी दे दे,,,।
नहीं नहीं मैं नहीं खाऊंगी,,, मैं तुम दोनों के लिए ही लेकर आई थी,,,।
और बाबूजी के लिए,,,(जलेबी खाते हुए रानी बोली,,)
घर पर आते हैं तेरे बाबूजी 15 20 दिन तो हो गए हैं कोई ठिकाना नहीं है न जाने क्या हो गया है,,,,
काम के चक्कर में इधर-उधर घूम रहे होंगे,,,(सूरज अपनी मां की तरफ देखते हुए बोला,,,)
अरे दुनिया काम करती है लेकिन अपना घर अपना घर होता है शाम को लौटकर इंसान अपने घर पर ही आता है लेकिन तेरे बाबूजी तो उन्हें तो ऐसा लगता ही नहीं है कि उनके घर परिवार है,,,। इस इंसान को बिल्कुल भी फिक्र नहीं है ना अपनी बीवी की ना अपने बच्चों की,,,,।
अब आए तो उनसे बात किया जाए आखिर हो क्या रहा है यह सब,,,।(सूरज भी चिंता दर्शाते हुए बोला,,,,, फिर थोड़ी ही देर में खाना बनाकर तैयार हो गया था इस बीच सूरज लगातार इस इंतजार में था कि तब उसकी बहन बाहर जाकर पेशाब करती है क्योंकि ना जाने क्यों अपनी बहन को पेशाब करते हुए देखने का नशा उसके दिलों दिमाग पर छा चुका था,,, लेकिन रानी इस बीच घर से बाहर गई ही नहीं,,,,।
तीनों साथ मिलकर खाना खाए,,, और बर्तन साफ करके और घर की सफाई करके सब लोग अपने-अपने कमरे में चले गए सूरज बहुत चाहता था कि उसकी बहन घर के बाहर जाए पेशाब करने के लिए लेकिन वह गई ही नहीं इसलिए वह भी मन मार कर अपने कमरे में चला गया,,,,।
सुनैना अपने कमरे में बिस्तर पर पडते ही करवट बदलने लगी,,, उसे बाजार में पंडित जी की बात याद आ रही थी पंडित जी ने सोनू की चाची का हाथ देख कर साफ-साफ कह दिया था कि उसके हाथ में संतान सुख तो है लेकिन उसके पति से बिल्कुल भी नहीं है किसी और का सहारा लेना पड़ेगा,,, इस बारे में जानकर सुनैना अपने मन में यही सोच रही थी कि सोनू की चाची अपने भाग्य के बारे में जानकर क्या सोच रही होगी क्या सच में वह किसी दूसरे के साथ संबंध बनाएगी क्योंकि पंडित जी ने तो साफ-साफ कह दिया था कि उसके पति से उसकी संतान नहीं होगी और पंडित जी की बात कभी गलत नहीं निकलती,,,,।
सुनैना यह सोचकर विचार में पड़ गई थी कि अपने भाग्य के बारे में जानकर सोनू की क्या सोच रही होगी उसके मन में क्या चल रहा होगा वह दुखी हो रही होगी या इस बात से खुश हो रही होगी,,, सुनैना अपने मन में सोच रही थी कि अपने पति की हालत देखकर तो एक तरह से उसे एक नया जीवन मिल गया था एक नया सहारा मिल गया था एक बहाना मिल गया था दूसरे के साथ संबंध बनाकर अपने जीवन में बहार लाने का क्योंकि उसके तो भाग्य में ही लिखा था दूसरी मर्द से संतान सुख तो ऐसे में दूसरे मर्द के साथ शारीरिक संबंध बनाकर वह अपनी प्यास भी बुझा सकती थी,,, तुमने इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि अपने पति से वह बिल्कुल भी खुश नहीं थी नहीं उसका पति उसे शारीरिक सुख दे पता था और नहीं संतान सुख तो उसके नसीब में साथ लिखा ही नहीं था।
ऐसे में इस मौके का सोनू की चाची को पूरा फायदा उठाना चाहिए अपनी जवानी की प्यास भी बुझा लेना चाहिए और मां बनने का सुख भी प्राप्त कर लेना चाहिए,,,, सोनू की चाची के बारे में इस तरह की बातें सोचकर वह है अपने मन में अपने बारे में सोचने लगी की खास उसकी किस्मत भी ऐसी होती तो मजा आ जाता,,,, लेकिन तभी उसे एहसास हुआ कि नहीं यह गलत है,,, मुझे कौन सी कमी है पति भी है संतान भी है,,, लेकिन तभी उसे अपने वर्तमान स्थिति का भान हुआ तो वह अपने मन में ही बोली,,, पति होने पर भी कौन सा पति का सुख मिल रहा है रात करवट बदलकर ही गुजर जाती है,,,, मुझे अच्छी तो किस्मत वाकई में सोनु की चाची की है क्योंकि उसके तो भाग्य में ही दूसरे मर्द का साथ लिखा है दूसरे मर्द के साथ संभोग करना लिखा है,,, और वह इस बारे में इंकार भी नहीं कर सकती ना जाने वह क्या सोच रही होगी किसके साथ संबंध बनाएगी किसके साथ संबंध बनाकर मां बनेगी यह भी तो एक विचार विमर्श का ही अध्याय है न जाने किसकी किस्मत में उसकी भरी हुई जवानी लिखी होगी,,,।
सुनैना यह सब सो ही रही थी कि तभी उसे सूरज की याद आ गई उसकी पड़ोसन सोनू की चाची को बार-बार सूरज के साथ संबंध बनाने के लिए बोल रही थी सूरज से चुदवाने के लिए बोल रही थी,,, इस बारे में सोच कर सुनैना की हालत खराब हो गई वह अपने मन में सोचने लगी कि क्या वाकई में उसकी पड़ोसन के कहे अनुसार अगर सोनु की चाची सूरत के साथ संबंध बना ली तो क्या होगा सूरत तो उसका दीवाना हो जाएगा जवान लड़के को और क्या चाहिए जवानी में एक खूबसूरत औरत और उसकी बुर चोदने के लिए और वाकई में सोनू की चाची में किसी बात की कमी नहीं है पूरी तरह से जवानी से भरी हुई है उसका बेटा तो उसे पाकर पागल ही हो जाएगा,,,। क्योंकि सूरज भी अब बड़ा हो चुका था और जिस तरह का अनुभव उसने उसे गले लगा कर अपनी दोनों टांगों के बीच महसूस की थी उसे देखते हुए सुनैना अच्छी तरह से समझ गई थी कि उसका बेटा पूरी तरह से मर्द बन चुका था,,, जो वाकई में सोनू की चाची की बुर में उसके बेटे का लंड घुस गया तो वह मां बने बिना नहीं रह पाएंगी और उसका बेटा उसकी जवानी का गुलाम बन जाएगा यह तो सही नहीं होगा,,,।
लेकिन वह कर भी कर सकती है कब तक उसे पर नजर रखेगी दिनभर से बाहर घूमता है और जिस तरह से जवान हो रहा है जिस तरह की उसकी हरकत हो रही है जिस तरह से वह घूरने लगा है। उसे देखते हुए वहां सोनू की चाची के संपर्क में बहुत जल्दी आ जाएगा और वह उसे रोक नहीं पाएगी है भगवान क्या होगा अगर सच में सोनू की चाची उसके बेटे से मां बन गई तो,,,, यही सब सोते हुए वह रात भर अपनी बिस्तर पर करवट बदलती रही वैसे भी जवानी की प्यास उसकी आंखों में नींद नहीं आने देती थी और इसीलिए ही अपने पति की बेरुखी को देख कर ही उसके मन में सोनू की चाची की किस्मत को देखकर जलन हो रही थी,,,।
लेकिन इस बारे में सुनैना ना तो सोनु की मां को कुछ बताइ और ना हीं अपनी पड़ोसन को,,, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि कोई उसके बारे में गलत समझे उसकी बदनामी हो और उसके साथ कल्लू का नाम जोड़कर गांव भर में चर्चा हो,,, क्योंकि वह जानती थी कि अगर कल्लू का नाम उसके साथ जुड़ गया तो लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगेंगे और सबको यही लगने लगेगा कि सुनैना में ही दोष है जो ऐसे आदमी के साथ उसका नाम जुड़ रहा है,,,। इसलिए वह नहीं चाहती थी की बात का बतंगड़ बने,,,।
घर पहुंचते पहुंचते अंधेरा हो चुका था,,,, लेकिन जब वह रसोई घर में पहुंची तो अच्छी रानी चुल्हा जलाकर रोटी पका रही थी यह देखकर सुनैना को भी संतोष हुआ और वह तुरंत सामान का थैला रखकर ,, हाथ पैर धोने लगी,,,, रानी भी अपनी मां को देखकर बहुत खुश हुई क्योंकि वह जानती थी कि उसकी मां उसके लिए समोसे जरूर लाई होगी इसलिए रोटी को तवे पर रखते हुए वह खुश होते हुए बोली,,,,।
मां तुम समोसे तो लाई होना,,,
हां हां जरूर लाई हूं,,,,
तब तो अच्छा है,,, मैं तुम्हारा बहुत इंतजार करी जब अंधेरा होने लगा तो मैं खुद ही चुल्हा चला दी,,,।
चल बहुत अच्छा की तुने,,,(अपनी साड़ी में हाथ को पोछते हुए बोली,,,)
लेकिन मैं इतना देर क्यों लगा दी ऐसा तो पहले कभी नहीं होता था,,,,।
तेरे समोसे के चक्कर में ही देर हो गए,,,, उसके पास तैयार पडा नहीं था और वह ताजा-ताजा बना रहा था इसलिए बैठना पड़ा,,,, अब तू हट जा सब्जी काट दे मैं बना देती हूं,,,,
ठीक है,,,(इतना कहने के साथ ही रानी अपनी जगह से उठकर रसोई घर से बाहर आ गई और सुन लेना रसोई घर में जाकर रानी की जगह बैठ गई और रोटी पकाने लगी तभी वह रोटी को तवे से हटाते हुए बोली,,,।)
अरे सूरज कहां चला गया,,,,!
भैया कुछ देर पहले ही आया था,,,,, वापस चला गया,,,,।
कहां चला गया,,,? कुछ बताया है कि नहीं...?
भैया कहां कुछ बताता है बस आया और गया,,, ।(सब्जी काटते हुए रानी बोली)
चल अच्छा सब्जी काट कर तू समोसे खा ले,,, और अपने भाई के लिए भी रख देना,,,।
ठीक है मां,,,,(इतना कहते हुए वहां जल्दी-जल्दी सब्जी काटने लगी क्योंकि उसे समोसे खाने की जल्दबाजी मची हुई थी उसे समोसे बहुत पसंद थी और अगर समोसे के साथ जलेबी मिल जाती तो उसकी खुशी दुगनी हो जाती थी,,,, थोड़ी देर में सब्जी काटने के बाद वह जल्दी से थैले में से सामान निकालने लगी,,, समान निकालते हुए रानी बोली,,)
क्या-क्या लाई हो मां,,,,।
अरे ज्यादा कुछ नहीं लाई हूं बस मुझे चूड़ियां खरीदना था और घर का सामान लाई हूं नमक मिर्च तेल धनिया यही सब है,,,।
हां मां यही सब तो दिख रहा है,,,,,।
( धीरे-धीरे करके रानी थैले में से सारा सामान बाहर निकाल ली यह देखकर सुनैना बोली)
अरे सारा सामान क्यों बिखेर रही है,,,।
कुछ नहीं बस देख रही हूं,,
सिर्फ समोसे बाहर निकाल ले बाकी सब सामान रख दे,,,,।
ठीक है,,,,।
(रानी सारा सामान वापस थैले में रखकर केवल समोसे निकाल कर खाने लगी,,, तभी सूरज भी वहां आ गया,,,,, आते ही उसकी नजर सबसे पहले रानी पर पड़ी रानी को देखते ही वह बोला,,,,)
मां आ गई क्या,,,?
वह तो कब से आई है खाना भी बना रही है तेरा ही ठिकाना नहीं रहता,,,।
अरे मैं कहां गांव से बाहर चला गया हूं यही तो हुं,,,(और इतना कहने के साथ ही वहीं पर बैठ गया और समोसे खाने लगा,,,, दोनों को खाते हुए देखकर सुनैना मन ही मन खुश हो रही थी और अपने मन में सोचने लगी कि उसका परिवार इसी तरह से एकदम खुशहाल था जब उसका पति हमेशा उसकी परवाह करता था उससे प्यार करता था लेकिन अपना जाने क्या हो गया है कि वह घर पर रहता ही नहीं,,,। तभी सूरज बोला,,)
समोसे तो बहुत स्वादिष्ट हे मा,, बस थोड़ा गर्म होता तो मजा आ जाता,,,,
अरे अब इतनी दूर से लाने में ठंडा हो ही जाता है गरम थोड़ी ना रहेगा,,,, वैसे तुम दोनों के लिए जलेबी भी लाई हूं,,,,।
(जलेबी का नाम सुनते ही रानी एकदम से अपनी मां की तरफ देखने लगी और प्रसन्नता भरे स्वर में बोली,,,)
क्या जलेबी,,,,!
हां जलेबी,,,, (मुस्कुराते हुए सुनैना बोली)
लेकिन अभी तक बोली क्यों नहीं और थैली में से तो जलेबी निकाली ही नहीं,,,,(रानी परेशान होते हुए खोली सूरज भी कभी रानी की तरफ तो कभी अपनी मां की तरफ देख ले रहा था)
मैं जानती हूं तुझे जलेबी बहुत पसंद है और मैं देखना चाहती थी कि जलेबी के बारे में पूछता है कि नहीं,,,।
क्या मां मैं तो समझी कि तुम सिर्फ समोसे हि लाई हो और मैं थैली में से जलेबी ही ढूंढ रही थी बस बोली नहीं थी,,,।
लेकिन जलेबी है कहा मां,,,(सूरज भी हैरान होते हुए बोला)
जा दरवाजे के पास टांग कर आई हूं,,, जब मैं आ रही थी तभी ठेले में से निकाल कर उसे वही टांग दी थी,,,।
(सुनैना की बात पूरी भी नहीं हुई थी की रानी एकदम से उठकर खड़ी हो गई और जल्दी से दरवाजे की तरफ चली गई और थोड़ी ही देर में जलेबी लेकर आई,,,, सबसे पहले जलेबी का टुकड़ा मुंह में डालकर उसे खाने लगी और फिर उसमें से एक टुकड़ा लेकर सूरज की तरफ आगे बढ़ाते हुए बोली,, )
लो भाई तुम भी खाओ,,,,।
(अपनी बहन की आवाज सुनते ही सूरज अपने मन में ही बोला मुझे यह जलेबी नहीं खाना है मुझे तो तुम दोनों की टांगों के बीच वाली जलेबी खाना है उसका रस पीना है,,,, मुझे मालूम है तुम दोनों बहुत मजा दोगी,,,,,, अपनी बहन रानी के लिए भी सूरज के मन में गलत भावना जाग चुकी थी क्योंकि वह अपनी बहन को पेशाब करते हुए जो देख चुका था उसकी मदमस्त जवानी से भरी हुई गांड के जो दर्शन कर लिया था,,, अपने भाई को इस तरह से सोच में डूबा हुआ देखकर रानी फिर से बोली,,)
क्या हुआ भैया लो जलेबी खा लो,,,।
(रानी की बात सुनकर जैसे वह नींद से जगा हो इस तरह से हड़बड़ा गया और बोला,,)
ननननननन,,,,हुआ क्या,,,,,?
अरे हुआ कुछ नहीं सो गए थे क्या लो जलेबी खा लो,,,,।
नहीं मैं नहीं खाऊंगा मेरे हिस्से का तू ही खा ले और मां को भी दे दे,,,।
नहीं नहीं मैं नहीं खाऊंगी,,, मैं तुम दोनों के लिए ही लेकर आई थी,,,।
और बाबूजी के लिए,,,(जलेबी खाते हुए रानी बोली,,)
घर पर आते हैं तेरे बाबूजी 15 20 दिन तो हो गए हैं कोई ठिकाना नहीं है न जाने क्या हो गया है,,,,
काम के चक्कर में इधर-उधर घूम रहे होंगे,,,(सूरज अपनी मां की तरफ देखते हुए बोला,,,)
अरे दुनिया काम करती है लेकिन अपना घर अपना घर होता है शाम को लौटकर इंसान अपने घर पर ही आता है लेकिन तेरे बाबूजी तो उन्हें तो ऐसा लगता ही नहीं है कि उनके घर परिवार है,,,। इस इंसान को बिल्कुल भी फिक्र नहीं है ना अपनी बीवी की ना अपने बच्चों की,,,,।
अब आए तो उनसे बात किया जाए आखिर हो क्या रहा है यह सब,,,।(सूरज भी चिंता दर्शाते हुए बोला,,,,, फिर थोड़ी ही देर में खाना बनाकर तैयार हो गया था इस बीच सूरज लगातार इस इंतजार में था कि तब उसकी बहन बाहर जाकर पेशाब करती है क्योंकि ना जाने क्यों अपनी बहन को पेशाब करते हुए देखने का नशा उसके दिलों दिमाग पर छा चुका था,,, लेकिन रानी इस बीच घर से बाहर गई ही नहीं,,,,।
तीनों साथ मिलकर खाना खाए,,, और बर्तन साफ करके और घर की सफाई करके सब लोग अपने-अपने कमरे में चले गए सूरज बहुत चाहता था कि उसकी बहन घर के बाहर जाए पेशाब करने के लिए लेकिन वह गई ही नहीं इसलिए वह भी मन मार कर अपने कमरे में चला गया,,,,।
सुनैना अपने कमरे में बिस्तर पर पडते ही करवट बदलने लगी,,, उसे बाजार में पंडित जी की बात याद आ रही थी पंडित जी ने सोनू की चाची का हाथ देख कर साफ-साफ कह दिया था कि उसके हाथ में संतान सुख तो है लेकिन उसके पति से बिल्कुल भी नहीं है किसी और का सहारा लेना पड़ेगा,,, इस बारे में जानकर सुनैना अपने मन में यही सोच रही थी कि सोनू की चाची अपने भाग्य के बारे में जानकर क्या सोच रही होगी क्या सच में वह किसी दूसरे के साथ संबंध बनाएगी क्योंकि पंडित जी ने तो साफ-साफ कह दिया था कि उसके पति से उसकी संतान नहीं होगी और पंडित जी की बात कभी गलत नहीं निकलती,,,,।
सुनैना यह सोचकर विचार में पड़ गई थी कि अपने भाग्य के बारे में जानकर सोनू की क्या सोच रही होगी उसके मन में क्या चल रहा होगा वह दुखी हो रही होगी या इस बात से खुश हो रही होगी,,, सुनैना अपने मन में सोच रही थी कि अपने पति की हालत देखकर तो एक तरह से उसे एक नया जीवन मिल गया था एक नया सहारा मिल गया था एक बहाना मिल गया था दूसरे के साथ संबंध बनाकर अपने जीवन में बहार लाने का क्योंकि उसके तो भाग्य में ही लिखा था दूसरी मर्द से संतान सुख तो ऐसे में दूसरे मर्द के साथ शारीरिक संबंध बनाकर वह अपनी प्यास भी बुझा सकती थी,,, तुमने इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि अपने पति से वह बिल्कुल भी खुश नहीं थी नहीं उसका पति उसे शारीरिक सुख दे पता था और नहीं संतान सुख तो उसके नसीब में साथ लिखा ही नहीं था।
ऐसे में इस मौके का सोनू की चाची को पूरा फायदा उठाना चाहिए अपनी जवानी की प्यास भी बुझा लेना चाहिए और मां बनने का सुख भी प्राप्त कर लेना चाहिए,,,, सोनू की चाची के बारे में इस तरह की बातें सोचकर वह है अपने मन में अपने बारे में सोचने लगी की खास उसकी किस्मत भी ऐसी होती तो मजा आ जाता,,,, लेकिन तभी उसे एहसास हुआ कि नहीं यह गलत है,,, मुझे कौन सी कमी है पति भी है संतान भी है,,, लेकिन तभी उसे अपने वर्तमान स्थिति का भान हुआ तो वह अपने मन में ही बोली,,, पति होने पर भी कौन सा पति का सुख मिल रहा है रात करवट बदलकर ही गुजर जाती है,,,, मुझे अच्छी तो किस्मत वाकई में सोनु की चाची की है क्योंकि उसके तो भाग्य में ही दूसरे मर्द का साथ लिखा है दूसरे मर्द के साथ संभोग करना लिखा है,,, और वह इस बारे में इंकार भी नहीं कर सकती ना जाने वह क्या सोच रही होगी किसके साथ संबंध बनाएगी किसके साथ संबंध बनाकर मां बनेगी यह भी तो एक विचार विमर्श का ही अध्याय है न जाने किसकी किस्मत में उसकी भरी हुई जवानी लिखी होगी,,,।
सुनैना यह सब सो ही रही थी कि तभी उसे सूरज की याद आ गई उसकी पड़ोसन सोनू की चाची को बार-बार सूरज के साथ संबंध बनाने के लिए बोल रही थी सूरज से चुदवाने के लिए बोल रही थी,,, इस बारे में सोच कर सुनैना की हालत खराब हो गई वह अपने मन में सोचने लगी कि क्या वाकई में उसकी पड़ोसन के कहे अनुसार अगर सोनु की चाची सूरत के साथ संबंध बना ली तो क्या होगा सूरत तो उसका दीवाना हो जाएगा जवान लड़के को और क्या चाहिए जवानी में एक खूबसूरत औरत और उसकी बुर चोदने के लिए और वाकई में सोनू की चाची में किसी बात की कमी नहीं है पूरी तरह से जवानी से भरी हुई है उसका बेटा तो उसे पाकर पागल ही हो जाएगा,,,। क्योंकि सूरज भी अब बड़ा हो चुका था और जिस तरह का अनुभव उसने उसे गले लगा कर अपनी दोनों टांगों के बीच महसूस की थी उसे देखते हुए सुनैना अच्छी तरह से समझ गई थी कि उसका बेटा पूरी तरह से मर्द बन चुका था,,, जो वाकई में सोनू की चाची की बुर में उसके बेटे का लंड घुस गया तो वह मां बने बिना नहीं रह पाएंगी और उसका बेटा उसकी जवानी का गुलाम बन जाएगा यह तो सही नहीं होगा,,,।
लेकिन वह कर भी कर सकती है कब तक उसे पर नजर रखेगी दिनभर से बाहर घूमता है और जिस तरह से जवान हो रहा है जिस तरह की उसकी हरकत हो रही है जिस तरह से वह घूरने लगा है। उसे देखते हुए वहां सोनू की चाची के संपर्क में बहुत जल्दी आ जाएगा और वह उसे रोक नहीं पाएगी है भगवान क्या होगा अगर सच में सोनू की चाची उसके बेटे से मां बन गई तो,,,, यही सब सोते हुए वह रात भर अपनी बिस्तर पर करवट बदलती रही वैसे भी जवानी की प्यास उसकी आंखों में नींद नहीं आने देती थी और इसीलिए ही अपने पति की बेरुखी को देख कर ही उसके मन में सोनू की चाची की किस्मत को देखकर जलन हो रही थी,,,।