भाग 166
सोनी के मन में सरयू सिंह के उस 'वज्र' जैसे पौरुष की छवि कौंध गई, जिसकी उसने कल्पना की थी। सुगना की बातों ने उसके भीतर एक ऐसा रोमांच भर दिया था कि वह उस 'अज्ञात' के प्रचंड प्रहार को सहने के लिए मानसिक रूप से व्याकुल हो उठी। उसे लगा कि वह लहंगा ऊपर उठाना और उस अदृश्य पुरुष का उसके भीतर समा जाना ही उसकी नियति का सबसे बड़ा सच होने वाला है।
सुगना ने सोनी को गले लगा लिया। सोनी का तपता हुआ शरीर गवाही दे रहा था कि वह उस 'दिव्य महात्मा' के प्रचंड वेग को झेलने के लिए पूरी तरह तैयार है।
बिसात बिछ चुकी थी….
अब आगे…
सुगना ने अगले दिन सरयू सिंह के सामने मिलन की रूपरेखा रखी, तो उसने एक और पासा फेंका। वह जानती थी कि सरयू सिंह को औरतों के श्रृंगार और पहनावे में कितनी रुचि है।
"बाबूजी, एगो बात मन में रहे," सुगना ने उन्हें चाय देते हुए कहा, " वह दिन पूजा पाठ करके ई ऊ सब काम कईल जाई। सोनी के उस दिन हमारा बहुत सजावे सवारे के मन बा। ऊ दिन ओकरा जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन होके के चाहि।
सरयू सिंह बेहद ध्यान से सुगना की बातें सुन रहे थे.. और बेहद गंभीरता के साथ बोले” बात तो सही कहत बाडू…”
सुगना ने आगे कहा …सलेमपुर में जब हमार कोठरी में मिलन होई , त उ कवनो साधारण मेहरारू ना, बल्कि साक्षात रति लागे के चाहीं। रउआ से बढ़िया औरतन के कपड़ा के पहचान केकरा बा? शहर जाईं त अपना हाथ से ओकरा खातिर एगो गुलाबी लहंगा-चोली ले ले आईब। जवन रउआ पसंद कर देब, ओकरा से सुंदर कुछ हो ही ना सकेला।"
सरयू सिंह की आँखों में एक चमक आ गई। सुगना ने उनकी पुरानी रग छेड़ दी थी। अपनी मूँछों पर ताव देते हुए उन्होंने हामी भर दी।
शाम को सरयू सिंह बनारस के सबसे नामी और पुराने 'वस्त्र भंडार' के सामने खड़े थे। दुकान का मालिक, खन्ना जी, उन्हें देखते ही गद्दी से उठ खड़े हुए।
"अरे सरयू बाबू! बड़े दिनों बाद पधारे। आज सलेमपुर की सरकार को क्या सेवा चाहिए?" खन्ना जी ने हाथ जोड़कर पूछा।
सरयू सिंह ने अपनी तशरीफ टिकाई और गंभीर स्वर में बोले, "खन्ना जी, बिटिया खातिर एगो बहुत खास उपहार खरीदे के बा। एगो अइसन गुलाबी लहंगा दिखावऽ जवना के चमक के आगे गुलाब भी फीका पड़ जाय।"
सरयू सिंह ने यह संबोधन बड़ी सोच समझकर किया था शायद अपनी गरिमा के अनुरूप और अपने कामुकता पर आवरण डालने के लिए।
खन्ना जी ने मुस्कुराते हुए अपने सबसे कुशल कारीगर को बुलाया। "सुना आपने? बाबूजी को उनकी लाडली बिटिया के लिए सर्वश्रेष्ठ लहंगा चाहिए। निकालो वो रानी गुलाबी शिफॉन और नेट वाला पीस।"
जब सेल्समैन ने मखमली मेज पर वह गुलाबी शिफॉन का लहंगा फैलाया, तो सरयू सिंह की अनुभवी आँखें उसे ताकने लगीं। कपड़े की महीन बनावट और उस पर हुआ सुनहरी गोटे का काम देख कर उनके मन में सोनी का गदराया हुआ बदन कौंध गया।
सरयू सिंह उस लहंगे के पैकेट के ऊपर लगी उस सुंदरी की तस्वीर को देख रहे थे जिसने यह गुलाबी लहंगे को इसके प्रचार के लिए पहन कर दिखाया हुआ था। उसे लहंगे में उसे सुंदरी का गोरा चिकन पेट और जांघों का कटाव स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था सरयू सिंह उस स्त्री की जगह सोनी की कल्पना करने लगे।
खन्ना जी बोले, "बाबूजी, आप फिकर न करें। ये एकदम नया डिजाइन है। पारदर्शी दुपट्टा और खुबसूरत चोली... आपकी बिटिया इसमें बिल्कुल अप्सरा लगेंगी।"
'बिटिया' शब्द सुनकर सरयू सिंह के मन में एक अजीब सी गुदगुदी हुई। वे जानते थे कि जिसे दुनिया 'बिटिया' के लिए उपहार समझ रही है, उसे वे खुद अपने हाथों से सलेमपुर की उस कोठरी में खोलने वाले है।
लहंगे के रेशमी कपड़े को छूते समय सरयू सिंह की उंगलियाँ सिहर उठीं। उन्होंने कल्पना की कि जब सोनी इस तंग गुलाबी चोली में उनके सामने घुटनों के बल झुकेगी, तो उसकी पीठ की ढलान और कमर का वह गहरा मोड़ इस रेशम के नीचे से कैसा कहर ढाएगा।
सरयू सिंह (मन में): "ई गुलाबी रंग जब ओकरा गोरे बदन पर चढ़ी, त कयामत आ जाई। अउर जब हम अपना हाथ से ई लहंगा ऊपर उठा के ओकर पुष्ट जाँघ देखब... विधाता! ई लहंगा ओकर जवानी के ढँके खातिर नईखे, बल्कि हमार प्यास बढ़ावे खातिर बा।"
यह कल्पना मात्र ही उनके पौरुष में तनाव पैदा कर रही थी। दुकान के भीतर ही धोती के नीचे छिपे उनके 'वज्र' ने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी थी। उन्होंने झटपट भुगतान किया और पैकेट हाथ में लेते हुए उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उन्होंने सोनी की नग्न देह को ही अपनी बाहों मे दबा लिया हो।
हवेली पहुँचते ही उन्होंने वह पैकेट सुगना के हाथों में थमा दिया। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर दबी हुई मुस्कान थी।
"ले... तोहार पसंद के सामान आ गइल," सरयू सिंह ने भारी आवाज में कहा।
लहंगे का रंग और उसे लहंगे में सोने की कल्पना कर सुगना मुस्कुराई और सरयू सिंह की तरफ देखा।
सरयू सिंह सुगना से नजरे मिलाने में कतरा रहे थे।
सुगना ने पैकेट खोला और गुलाबी शिफॉन की उस मादकता को देखकर मुस्कुरा दी। वह समझ गई कि शिकारी अब पूरी तरह जाल में है और वह खुद उस हिरनी का श्रृंगार करने और उसे खा जाने के लिए बेताब है।
सुगना ने सरयू सिंह के जन्मदिन के अवसर को इस 'गुप्त मिलन' के लिए चुना। उसने तय किया कि सोनी की कोख को सींचने का यह अनुष्ठान उसी पुरानी कोठरी में होगा, जहाँ उसने स्वयं पहली बार सरयू सिंह के पौरुष का स्वाद चखा था।
योजना के अनुसार, सुगना और सोनी सुबह-सुबह ही सलेमपुर पहुँच गईं। कोठरी को साफ किया गया, चमेली के फूलों से महकाया गया और परदों से दोपहर की रोशनी को कैद करने की नाकाम कोशिश की गई। सुगना ने सोनी को बताया था कि दोपहर में 'महात्मा जी' का आगमन होगा, जो गुप्त रूप से अपनी दैवीय शक्ति उसे प्रदान करेंगे।
सुगना के निर्देश पर सोनी रसोई में महात्मा जी के लिए भोजन तैयार कर रही थी। विशेष रूप से मालपुआ बनाया जा रहा था, क्योंकि सुगना जानती थी कि यह सरयू सिंह का सबसे प्रिय व्यंजन है। सरयू सिंह अक्सर मालपुए की तुलना स्त्री की योनि से किया करते थे—एक ऐसी तुलना जो उनकी कामुक सोच का चरम थी।
सरयू सिंह का मानना था कि मालपुआ और योनि, दोनों की प्रकृति एक जैसी होती है। मालपुआ जितना घी और चाशनी में सराबोर होता है, उतना ही वह कोमल और रसभरा हो जाता है। वे कहते थे कि जिस तरह एक उत्तेजित स्त्री की योनि स्पर्श मात्र से रसीली और चिकनी हो जाती है, मालपुआ भी उसी तरह अपनी मिठास छोड़ता है। मालपुए का वह घेरा, जो किनारों से थोड़ा कुरकुरा और बीच से एकदम मुलायम और मांसल होता है, उन्हें योनि के कोमल होंठों की याद दिलाता था। वे अक्सर कहते थे:
"मालपुआ अउर मेहरारू के योनि में कवनो फर्क नइखे। जइसे-जइसे तू एकरा के मुँह में ले के चूसबू, ई अउर रस छोड़त जाई। ई त ओही रसीली कोमलता के स्वाद ह, जवन आदमी के रोम-रोम जगा देला।"
सोनी जब मालपुए तल रही थी, तो उसकी अपनी देह की गर्मी उस आंच के साथ मिल रही थी। वह बेखबर थी कि वह जिसके लिए यह प्रसाद बना रही है, वह उसकी योनि के रस का पान करने के लिए कितना आतुर है।
निर्धारित समय पर सरयू सिंह पधार चुके थे। सुगना ने उन्हें अपनी कोठरी में विश्राम करने को कहा और स्वयं सोनी को तैयार करने के लिए आंगन में आ गई।
सुगना ने जब सोनी को उस गुलाबी शिफॉन के लहंगे और कसी हुई चोली में सजाया, तो वह साक्षात स्वर्ग से उतरी अप्सरा लग रही थी। चोली की सिलाई इतनी बारीक और चुस्त थी कि सोनी के पुष्ट उरोजों का उभार और उनके बीच की वह गहरी घाटी, लहंगे के सुनहरे गोटे के साथ मिलकर एक अद्भुत दृश्य रच रही थी। सुगना ने सोनी की आँखों पर रेशमी काली पट्टी बाँधी, जिससे उसका गोरा चेहरा और भी मादक और रहस्यमयी हो उठा।
"दीदी, महात्मा जी के पास जाए में लाज लागत बा..." सोनी ने कांपती आवाज़ में कहा।
सुगना ने उसे थामते हुए कोठरी के भीतर प्रवेश कराया। सरयू सिंह पलंग पर विराजमान थे। जैसे ही सोनी ने चौखट लांघी, सरयू सिंह की अनुभवी आँखें फटी की फटी रह गईं। पट्टी बँधी होने के कारण सोनी का ध्यान अपने डगमगाते कदमों पर था, जिससे उसकी पतली कमर की लचक और चोली के भीतर कैद उसके यौवन का 'कसाव' हर कदम पर एक नई कहानी लिख रहा था।
सोनी ने झुककर भोजन की थाली सरयू सिंह के सम्मुख रखी। उस झुकाव के साथ ही चोली के भीतर से झाँकती उसकी दुग्ध-धवल देह और गहरी नाभि का वह दृश्य सरयू सिंह के मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध गया। उन्होंने अपनी दृष्टि नीची कर ली, पर उनके भीतर वासना का एक ज्वार उठ चुका था।
थाली रखने के बाद सुगना के दिए गए निर्देशानुसार उसने महात्मा जी को उसी अवस्था में झुके झुके ही प्रणाम किया सरयू सिंह ने अपने हाथ सोने के सर पर रखकर उसे आशीर्वाद दिया। न जाने सोनी को ऐसा क्यों लगा कि यह हाथ जाना पहचाना है परंतु शक गुंजाइश नहीं थी।
सोनी धीरे-धीरे पीछे मुड़ी और सधे हुए कदमों से बाहर निकल गई।
सुगना ने चुपचाप पंखा झलना शुरू किया। सरयू सिंह ने थाली में से एक रसीला मालपुआ उठाया। वह घी में तरबतर, किनारों से कुरकुरा और बीच से एकदम मांसल और कोमल था। सरयू सिंह ने उसे अपनी नासिका के पास लाकर उसकी सोंधी महक महसूस की।
सरयू सिंह (अत्यंत भावुक स्वर में): "सुगना, ई भोजन ना ह, ई त कवनो साधना के प्रसाद लागता के बनवले बा?
सुगना ने विनम्रता से कहा, "बाबूजी, सोनी बिहान से ही चूल्हा के आंच सह के ई मालपुआ तैयार कइले बिया। ओकर श्रद्धा अउर ओकर देह के तपिश, दोनों एह प्रसाद में उतर गइल बा।"
सरयू सिंह ने अत्यंत तृप्ति के साथ भोजन समाप्त किया। मालपुए की मिठास ने उनके भीतर एक आदिम भूख जगा दी थी।
भोजन के पश्चात सुगना पात्र समेटकर बाहर चली गई ताकि सरयू सिंह थोड़ा विश्राम कर सकें। जैसे ही द्वार बंद हुआ, सरयू सिंह ने अपनी धोती की गाँठ से एक छोटी सी पुड़िया निकाली। इसमें शहर के मशहूर वैद्य जी से खरीदी हुई शिलाजीत की गोलियाँ थीं।
उन्होंने एक गोली हथेली पर रखी, फिर रुक गए। उनकी आँखों के सामने अभी भी गुलाबी लहंगे में लिपटी सोनी की वह कसी हुई काया और उसके पुष्ट अंगों का उभार नाच रहा था। उन्हें लगा कि वर्षों बाद यह एकमात्र अवसर मिला है, और वे इसमें कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे।
सरयू सिंह (मन में): "आज के मिलन साधारण ना होई। विधाता हमके ई 'रति' सौंपले बाड़न, त हमके भी अपना पौरुष के चरम देखावे के पड़ी”
उन्होंने बिना हिचकिचाए शिलाजीत की दो गोलियां एक साथ गले से नीचे उतार लीं। कुछ ही क्षणों में शिलाजीत का ताप उनके रक्त में घुलने लगा। उनके रोम-रोम में एक नई ऊर्जा और पौरुष का ऐसा तनाव पैदा होने लगा जो मर्यादा की हर ज़ंजीर को तोड़ने के लिए पर्याप्त था।
बाहर आँगन में सोनी अनभिज्ञ थी कि भीतर एक 'शिकारी' अपनी शक्ति को चरम पर पहुँचा चुका है, और कुछ ही देर में वह 'अनुष्ठान' शुरू होने वाला है जिसका इंतज़ार सलेमपुर की ये दीवारें भी बेसब्री से कर रही थीं।
सुगना ने बड़ी कुशलता से सोनी को बिस्तर के ठीक बीचों-बीच उस विशेष मुद्रा में स्थापित कर दिया था। सोनी 'डॉगी स्टाइल' में अपने घुटनों और हथेलियों के बल झुकी हुई थी, उसकी आँखों पर बंधी काली रेशमी पट्टी ने उसे बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट दिया था। उसकी कमर का गहरा ढलान उसके भारी और गदराए हुए नितंबों को पीछे की ओर किसी चुनौती की तरह उभार रहा था। सोनी भी अब इस मिलन का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। उसे अपनी बहन सुगना पर पूरा विश्वास था। इस अद्भुत मिलन कि आस में उसकी बुर पनिया गई थी।
गुलाबी घाघरा सोनी की जांघों के पास थोड़ा सिमटा हुआ था, और जांघों के जोड़ों से उठती इत्र की तीव्र खुशबू पूरे कमरे में मदहोशी फैला रही थी। सोनी का पूरा बदन अनजाने डर और एक अजीब सी उत्तेजना से थरथरा रहा था—वह उस 'दिव्य अंश' को ग्रहण करने के लिए पूरी तरह आतुर थी।
सुगना बाहर गई और सरयू सिंह की कोठरी में जाकर उन्हें आमंत्रित किया।
सरयू सिंह जब सुहाना के कमरे की दहलीज पर पहुँचे, तो सामने का दृश्य देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया। अपनी 'ख्वाबों की परी' को इस समर्पित अवस्था में देखकर उनके पौरुष में एक ऐसी कशिश उठी जो मर्यादा की हर दीवार को ढहा देने के लिए काफी थी।
सुगना ने सरयू सिंह को कमरे के भीतर किया और धीरे से बाहर निकलते-निकलते उसने सरयू सिंह की आँखों में झाँका और बेहद प्यार भरे, दबे स्वर में भोजपुरी में हिदायत दी:
सुगना: "बाबूजी, तनी धीरे से... अभी भी सुकुवार लइका बिया, ख्याल राखब। हम बाहरे बानी।"
किवाड़ बंद होते ही कमरे के भीतर एक भारी सन्नाटा पसर गया, जिसमें केवल दो ध्वनियाँ गूँज रही थीं—एक सोनी की उखड़ती हुई सांसें और दूसरा सरयू सिंह के भीतर धड़कता हुआ उनका मदमत्त पौरुष।
सरयू सिंह ने जैसे ही अपनी धोती की गाँठ खोली, उनका 'वज्र' किसी म्यान से निकली तलवार की तरह झटके के साथ आज़ाद हो गया। शिलाजीत की दोहरी खुराक और सामने सजी-धजी सोनी की उस 'समर्पित मुद्रा' ने उनके रक्त में जैसे आग लगा दी थी। उन्होंने गर्व से नीचे झुककर अपने उस अंग को निहारा, जो आज अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ तना हुआ था।
उनका लिंग महज़ मांस का टुकड़ा नहीं, बल्कि वर्षों की संचित वासना और आज की उत्तेजना का एक जीवंत प्रमाण लग रहा था। गहरा कत्थई रंग, जिस पर उभरी हुई नीली नसें किसी पर्वत पर बहती हुई धाराओं की तरह साफ़ दिखाई दे रही थीं। अग्रभाग (सुपारी) उत्तेजना के मारे गहरा लाल और चिकना हो चुका था, जिससे काम-रस की एक छोटी सी बूंद रिसकर उसे और भी चमकीला बना रही थी। उसकी कठोरता ऐसी थी कि जैसे उसे छूने पर उंगलियाँ सिहर जाएँ। सरयू सिंह को महसूस हुआ कि आज उनका यह 'अस्त्र' सलेमपुर की उस पुरानी कोठरी में एक नया इतिहास लिखने के लिए व्याकुल है।
पलंग के बीचों-बीच 'डॉगी स्टाइल' में झुकी हुई सोनी को देखकर सरयू सिंह की आँखों में एक शिकारी जैसी चमक आ गई। गुलाबी शिफॉन का वह लहंगा जिसे वे खुद बनारस से चुनकर लाए थे, अब सोनी के उभरे हुए नितंबों पर किसी रेशमी चादर की तरह फैला हुआ था। चोली की कसी हुई डोरियों के बीच से झाँकती उसकी गोरी पीठ की ढलान और कमर का वह गहरा मोड़ उनके भीतर की रही-सही मर्यादा को भी भस्म कर रहा था।
सरयू सिंह के मन में विचारों का एक बवंडर उठ खड़ा हुआ:
"विधाता! ई कवनो हाड़-मांस के पुतली नईखे, ई त साक्षात रति हवे। जवना देह के हम सपना देखत रहनी, आज ऊ हमरा सोझा एह तरह झुकल बिया कि जइसे कवनो बलिदानी वेदी पर आहुति देवे के इंतज़ार करत होखे।"
उन्हें रह-रहकर उस गुलाबी दुपट्टे और पारदर्शी चोली के भीतर कैद सोनी के यौवन पर प्यार और वासना का मिला-जुला अहसास हो रहा था। उन्हें अपनी पसंद पर नाज़ हो रहा था—वही गुलाबी रंग, वही शिफॉन की छुअन, और वही सलेमपुर की गंध।
सरयू सिंह अपने मजबूत और भारी कदमों से सोनी की तरफ बढ़े, कदमों की धाप न सिर्फ कोठरी में बल्कि सोनी के कलेजे में भी हलचल पैदा कर रही थी। सोनी की आँखों पर बँधी पट्टी ने उसे लौकिक रूप से अनजान रखा था कि 'महात्मा जी' अब उसके बिल्कुल करीब हैं, लेकिन उनके कदमों की थाप और उसकी घटती दूरी और अब भारी और गर्म सांसें अब सोनी को अपने पास महसूस होने लगी थीं। सरयू सिंह ने अपनी थरथराती उंगलियों से उस गुलाबी लहंगे के घेरे को छुआ सोनी सिहर उठी। उन्होंने उसे धीरे से ऊपर उठाना शुरू किया।
जैसे-जैसे कपड़ा ऊपर सरक रहा था, सोनी की दूध जैसी सफेद जाँघें और उनके बीच का वह प्रतिबंधित द्वार उजागर होने लगा। इत्र और शरीर की स्वाभाविक गंध ने सरयू सिंह के दिमाग को सुन्न कर दिया।
उन्होंने अपने वज्र को अपने हाथ में थामा और उसकी कठोरता को महसूस करते हुए मन ही मन बोले:
"आज ई वज्र जब एह गुलाबी कली के भीतर जाई, त बंजर कोख धन्य हो जाई। सोनी हमार रानी , तू जानत नईखू कि तोहार ई सजल देह आज कवन प्रलय ले आवे वाला बा।"
शिलाजीत का ताप अब उनके संयम की अंतिम डोर को भी काट चुका था।
उन्होंने एक हाथ सोनी की पतली कमर पर रखा। स्पर्श होते ही सोनी का शरीर बिजली के झटके की तरह काँप उठा, उसका रौवा रोवा खड़ा हो गया। सरयू सिंह ने यह महसूस किया और अपना चेहरा उसके नितंबों के करीब ले आये…
सोनी की रेशमी बुर अपने अघ खुले होंठों पर वासना की मीठी लार लिए उनका इंतजार कर रही थी
शेष अगले भाग में…