Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 100 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

आपके कमेंट से सच्चाई है तो मेरा कहानी लिखना सार्थक हो गया।यदि यह असत्य है तब भी आपके कमेंट और लगाई गई फोटो देखकर म खुश हो गया।

काश सिर्फ बेहतरीन लिखने वाले या अपडेट की मांग रखने वाले पाठक आप जैसे ही होते...कुछ लिख नहीं सकते तो कहानी से मिलती जुलती एक फोटो ही भेज देते

धन्यवाद...
 
Pooja_69 अरे अपनी राम प्यारी को ज्यादा परेशान मत करिए वरना दो चार एपिसोड पढ़ते पढ़ते छिल जाएगी..

माफ कीजिएगा यह एक मजाक था...

जुड़े रहिए...
 
आपने बिल्कुल सही कहा यह ससुरा रतन मेरे लिए भी परेशानी का सबब बना हुआ है। यह तो कहानी में मोनी की एक प्रमुख भूमिका है जिसके लिए इस रतन को ढोया या जा रहा है वरना जो सुगना का ना हुआ वह किसी का क्या होगा।

बर्दाश्त करते रहीए जैसे नियति कर रही है।
 
फिर ठीक है,

आपका स्वागत है। आप बेशक कहानी पढ़ना कर सकते हैं मिसिंग अपडेट्स कुछ तो मैंने आपको भेज दिए हैं और कुछ भेजता रहूंगा। एक बात और कहना चाहूंगा यह कहानी कब खत्म होगी मुझे खुद भी अंदाजा नहीं लग रहा। लिखने को बहुत कुछ है और पढ़ने को भी। यह तो जीवन के छोटे-छोटे घटनाक्रम है उन्हें जितना विस्तार से लिखिए उतना ही लिखने में भी आनंद आता है और पढ़ने में भी।

आप स्वयं रचनाकार हैं और यह बात समझ सकते हैं।

कहानी में त्रुटियां और समीक्षा देते रहिएगा... मुझे प्रबुद्ध पाठकों की राय और उनके कॉमेंट्स पढ़ना अच्छा लगता है।

पुनः स्वागत
 
भाग 135

बाहर लड़कियां अपनी सहेलियों से आज की घटनाक्रम और अपने अनुभवों को एक दूसरे से साझा कर रही थी …तभी

“अरे मोनी कहीं नहीं दिखाई दे रही है कहां है वो?” एक लड़की ने पूछा..

माधवी भी अब तक उन लड़कियों के पास आ चुकी थी उसने तपाक से जवाब दिया..

मोनी रजस्वला है और कमरे में आराम कर रही है..

नियति स्वयं आश्चर्यचकित थी..

क्या रतन के खेल को माधवी ने खराब कर दिया था या कोई और खेल रच दिया था?



उधर रतन संतुष्ट था तृप्त था वह अब भी मोनी के अविश्वसनीय गोरे रंग के बारे में सोच रहा था।

अब आगे…

सभी लड़कियां कूपे में हुए घटनाक्रम का अनुभव साझा कर रही थीं। मोनी सब की बातें सुन रही थी उसे इस बात का अफसोस भी था कि उसे माधवी ने एन वक्त पर कूपे में जाने से रोक दिया था और यह निर्देश दिया था कि यदि उससे कोई कारण पूछे तो वह अपने रजस्वला होने की बात बता सकती है।

माधवी ने रतन के मातहतों से रतन की प्लानिंग को समझ लिया था और वह मोनी को रतन से मिलने से रोकना चाहती थी। उसे पता था रतन एक नितांत कामुक व्यक्ति था और वह किसी हाल में मोनी को उससे दूर रखना चाहती थी पर माधवी स्वयं वासना की गिरफ्त में आ चुकी थी। और मोनी की जगह स्वयं कूपे में चली गई थी। आश्रम में संभोग वर्जित तो नहीं था परंतु उसके मौके कम ही होते थे अक्सर लोग समूह में ही रहते थे।

कूपे में उसने रतन के साथ जो आनंद उठाया था वह रतन की दीवानी हो गई थी।

10 मिनट के साथ में ही रतन ने उसे न सिर्फ उत्तेजित किया था अपितु उसे चरम सुख भी प्रदान किया था।

माधवी जिस रुतबे और पद पर थी उसे रतन के साथ इस तरह के संबंध रखने में निश्चित ही मुश्किल होती पर वासना की आग अब माधवी के प्यासे बदन में सुलगने लगी थी।

आश्रम का कूपा एकमात्र ऐसी जगह थी जहां माधवी अपनी प्यास बुझा सकते थी…

विद्यानंद का यह आश्रम धीरे-धीरे प्रसिद्धि प्राप्त करने लगा। माधवी द्वारा ट्रेंड की गई लड़कियां उस कूपे में आती और विद्यानंद के अनुयायियों के पुत्र और रिश्तेदार नारी शरीर को समझने के लिए उन कूपों में नग्न लड़कियों के साथ कुछ वक्त बिताते..लड़कियां उनके अलग अलग स्पर्श का अनुभव करतीं कभी उत्तेजित होतीं कभी कभी स्खलित भी हों जाती। लड़कों को सभी कामुक कार्यकलापों की खुली छूट थी यहां तक कि संभोग की भी परंतु यह लड़कियों के हांथ में था आखिरकार बटन उनके पास ही था। यही शायद उन लड़कियों की परीक्षा भी थी। स्पर्श सुख से उत्तेजित होना संभोग सुख से आनंद लेना और चरम सुख प्राप्त करना यह लड़कियों की इच्छा पर था। वह जब चाहे यह खेल बंद कर सकती थी।

यदि उन्हें लड़कों की हरकते नागवार गुजरती तो वो बटन दबा कर अपनी असहमति व्यक्त करती और जबरजस्ती करने पर वो लड़के दंडित किए जाते।

समय के साथ माधवी की कई लड़कियों ने अपना कौमार्य खोया और उन्हें इस सेवा से हटा दिया जाता और उनकी जगह नई लड़कियां ले लेतीं।

महीने में एक बार लड़कियों को ट्रेनिंग दी जाती और रतन के लड़कों को इसका अवसर दिया जाता।

माधवी भी इस दिन का इंतजार करती और मोनी के लिए निर्धारित कूपे में जाकर चुद जाती।

रतन इस बात से आश्चर्यचकित था कि माधवी मोनी को संभोग सुख लेने के बावजूद मौका क्यों दे रही थी। रतन की मोटी बुद्धि चूत में अटक गई थी। उसे आम खाने से मतलब था उसने गुठली गिनना छोड़ दिया ।

इन कूपो में एक विशेष दिन रतन के लड़कों को भी खड़ा किया जाता। विद्यानंद के अनुवाइयो की लड़कियां भी लड़कों के शरीर को समझने के लिए आतीं नियम समान थे पर यह प्रयोग लगभग असफल ही था। पर चालू था।

लड़कों की ट्रेनिंग के लिए माधवी की लड़कियों को लाया जाता पर मोनी को अब तक पुरुषों में कोई रुचि नहीं थी। कभी कभी माधवी इस अवसर का लाभ उठा कर अपनी और रतन की काम पिपासा मिटा लेती।

रतन और माधवी की दोस्ती धीरे धारे बढ़ रही थी। रतन अंजान था और माधवी के इशारे और इच्छानुसार कामसुख भोग रहा था…

मोनी का कौमार्य अब भी सुरक्षित था..और उसका हरण करने वाला न जाने कहां था..नियति ने भविष्य में झांकने की पर वहां भी अभी अंधेरा ही था।

आइए आपको बनारस लिए चलते हैं जहां सुगना का परिवार अपनी लाडली सोनी को याद कर रहा था जो इस समय अमेरिका में विकास के साथ अपना हनीमून बना रही थी।

तभी अचानक फोन की घंटी बजी यह टेलीफोन सोनू ने कुछ ही दिनों पहले सुगना के घर में लगवाया था। कारण स्पष्ट था। जब-जब सोनू जौनपुर में रहता उसे सुगना से बात करने का बेहद मन करता था…आखिरकार अपने पद और पैसे के बल पर उसने अपनी बहन सुगना को यह सुविधा प्रदान कर दी थी, यद्यपि उसने लाली को भी यही बात बोलकर खुश कर दिया था.

सरयू सिंह उस समय हाल में ही उपलब्ध थे उन्होंने झटपट टेलीफोन उठा लिया और अपनी रौबदार आवाज में बोला “कौन बोल रहा है? ”

सामने से कोई उत्तर न आया… सरयू सिंह ने फोन के रिसीवर को ठोका और दोबारा कहा

“ अरे बताइए ना कौन बोल रहा है ?”

तभी सामने से आवाज आई “चाचा जी प्रणाम”

सरयू सिंह का कलेजा धक-धक करने लगा।

आवाज जानी पहचानी थी उन्होंने प्रश्न क्या

“के बोल रहा है? सरयू सिंह ने दोबारा पूछा।

“चाचा मैं सोनी “

सरयू सिंह का कलेजा धक-धक करने लगा अचानक ही उनकी अप्सरा और उसके मादक कूल्हे उनकी आंखों के सामने घूमने लगे दिल उछलने लगा परंतु हलक से आवाज निकालना जैसे बंद हो गया था। फिर भी उन्होंने अपनी भावनाओं को काबू में करते हुए कहा.

“सोनी कैसी हो कैसा लग रहा है अमेरिका में?

“ हम लोग ठीक हैं.आप कैसे हैं? सुगना दीदी कहां है?

सोनी ने बिना उनका उत्तर सुने ही अगला प्रश्न पूछ दिया…

सोनी उनसे बात करने से कतरा रही थी उसे सरयू सिंह से बात करने में झिझक महसूस होती थी।

सरयू सिंह ने आवाज लगाई

“ए सुगना, हेने आवा सोनी के फोन आइल बा बात कर ले “

सुगना भागते हुए फोन के पास आई उसके हाथ आटे से सने हुए थे शायद वह रसोई में आटा गूथ रही थी।

सरयू सिंह ने स्वयं रिसीवर सुगना के कानो पर लगा दिया और उसी अवस्था में खड़े रहे…

“अरे सोनी कैसन बाड़े” सुगना का उत्साह देखने लायक था।

“दीदी फिर भोजपुरी”

“अच्छा मेरी सोनी कैसी है” सुगना मुस्कुराते हुए बोली वो सरयू सिंह की तरफ देखते हुए उसे अपने बाबू जी के सामने हिंदी बोलने में थोड़ी हिचक थी जिसे उसने अपनी मुस्कुराहट से छुपा लिया।

सरयू सिंह के पास ही खड़े थे उन्हें सोनी की आवाज हल्की-हल्की सुनाई पड़ रही थी उन्होंने रिसीवर छोड़ना उचित न समझा और अपनी काल्पनिक माशूका की मीठी आवाज सुनते रहे।

“ठीक हूं दीदी… यहां अमेरिका की दुनिया ही अलग है”

“तुम्हें अच्छा लग रहा है ना ?”

“दीदी बहुत सुंदर जगह है, मैं आप लोगों को जरूर एक बार यहां लाऊंगी”

“चल चल ठीक है जब होगा तब देखा जाएगा विकास जी कैसे हैं ?“

“वो भी ठीक हैं दीदी पास ही खड़े हैं बात करेंगी”

“ हां हां लावो दे दो”

विकास सुगना से बात करने में सकुचा रहा था परंतु फिर भी सोनी के कहने पर वह फोन पर आ गया

“ हां दीदी प्रणाम..”

“ अरे मैं आपकी दीदी थोड़ी हूं” सुगना ने उसे छेड़ते हुए कहा। सुगना बातों में मशगूल थी उसे याद भी नहीं रहा कि सरयू सिंह पास खड़े हैं और रिसीवर उन्होंने ही पकड़ा हुआ है।

सुगना के प्रश्न पर विकास ने मन ही मन मुस्कुराते हुए कहा

“ठीक है …आप मेरी साली है पर उससे पहले आप मेरे दोस्त सोनू की बड़ी दीदी है इसलिए मैं आपको शुरू से दीदी कहता आया हूं यदि आपको बुरा लगता है तो कहीये छोड़ दूं…” बिकास की आवाज फोन के रिसीवर से बाहर भी सुनाई पड़ रही थी।

सुगना मुस्कुराने लगी और कहा..

“ आप जैसा रिश्ता रखना चाहेंगे मुझे मंजूर है… सोनी का ख्याल रखिएगा”

“ ठीक है दीदी ….माफ कीजिएगा साली साहिबा” सुगना की हंसी फूट पड़ी।

सरजू सिंह को अब रिसीवर पकड़ना भारी हो रहा था। सुगना से विकास की यह छेड़छाड़ उन्हें रास नहीं आ रही थी

एक बार सोनी ने फिर फोन विकास के हाथों से ले लिया था और वह सुगना से बोली

“लाली दीदी कहां है? उनसे भी बात करा दो”

लाली भी अब तक पास आ चुकी थी.. सरयू सिंह ने फोन का रिसीवर लाली को दे दिया और अपने दिमाग में आधुनिक सोनी की तस्वीर बनाने लगे। फिल्मों में जिस तरह अंग्रेज हीरोइन चलती है सोनी में उसे जैसी ही प्रतीत हो रही थी बस एक ही अंतर था वह था सोनी के भारी नितंब जो शरीर सिंह का मन मोह चुके थे।

अपना नाम सुनते ही लाली ने फोन सुगना के कान से हटाकर अपने कानों पर लगा लिया और बेहद खुशी से उससे बात करने लगी।

“भाभी कैसी हैं?”

“ठीक बानी..तुम कैसी हो” लाली कंफ्यूज थी कि वह हिंदी में बात करें या भोजपुरी में।

“ठीक हूं दीदी..”

“ ठीक कैसे हो सकती हो तुम्हारी मुनिया की पूजाई ठीक से नहीं हुई लगता है..”

लाली ने यह देख लिया था कि सरयू सिंह वहां से हट चुके हैं। उसने सोनी को छेड़ा वैसे भी अब वह सोनी की भाभी बनने वाली थी। ननद और भाभी में छेड़छाड़ कुछ देर जारी रही। लाली चली थी सोनी को छेड़ने पर शायद वह भूल गई थी की सोनी अब आधुनिक और हाजिर जवाब हो चुकी थी…सोनी लाली को छोड़ने वाली न थी। नंद भाभी में बातचीत और नोकझोंक चालू थी। सरयू सिंह को सिर्फ लाली की हंसी सुनाई पड़ रही थी और वह यह अनुमान लगा पा रहे थे कि उनकी माशूका भी उधर ऐसे ही खिलखिला कर हंस रही होगी।

आईएसडी कॉल्स इतने सस्ते न थे। सोनी ने न चाहते हुए भी फोन वापस रख दिया पर पूरे परिवार को तरोताजा कर दिया। सुगना और लाली बेहद प्रसन्न थे और सरयूसिंह भी उतने ही खुश थे।

इसी बीच सोनू भी आ गया और सब सोफे पर बैठकर विकास और सोनी की शादी के आयोजनों और अपने-अपने अनुभवों को साझा करने लगे। सोनू ने सरयू सिंह से उस प्रभावशाली आदमी के बारे में जानना है चाहा जो विकास की शादी में आया हुआ था और उसके साथ कई बॉडीगार्ड घूम रहे थे पर उस व्यक्ति के चेहरे पर ढेर सारे दाग थे…

सरयू सिंह हिंदी पूरे आत्मविश्वास से सोनू को बताया

“अरे वो गाजीपुर के विधायक हैं. इजराइल खान.”

दाग का नाम सुनते ही लाली सचेत हो गई और उसके मन में उत्सुकता जाग उठी जिस पर वह काबू न रख पाई और अचानक सरयू सिंह से पूछ बैठी..

“ए चाचा दो-तीन साल पहले तहरा माथा पर जवन दाग होत रहे ओकर जैसन दाग कभी-कभी सोनू के गर्दन पर हो जाला तोहर दाग कैसे ठीक भई रहे?”

सभी के चेहरे फक पड़ गए। …सबको खुश रखने वाली सुगना को आज दाग लगने वाली सुगना कहा जाय वह कतई नहीं चाहती थी।

लाली ने जो प्रश्न किया था उसके बारे में कोई भी बात करना नहीं चाहता था परंतु अब जब प्रश्न आ ही गया था तो सरयू सिंह ने सोनू की तरफ देखते हुए पूछा

“अरे कइसन दाग दिखाओ तो”

यद्यपि सोनु को सुगना से संसर्ग किए कुछ दिन बीत गए थे परंतु वह इस दाग को सरयू सिंह को कतई नहीं दिखाना चाहता था। परंतु यह अवश्य जानना चाहता था की सरयू सिंह के माथे का दाग का भी कोई रहस्य था क्या?

सोनू ने अपनी गर्दन सरयू सिंह की तरफ घुमाई.. दाग लगभग गायब था.. सोनू और सुगना का मिलन वैसे भी कई दिनों से नहीं हो पाया था शादी की तैयारी में दोनों पूरी तरह व्यस्त थे कुछ छोटे-मोटे कामुक प्रकरणों के अलावा उन दोनों को अभी मिलन के लिए इंतजार ही करना था.

सरयू सिंह ने लाली को समझाते हुए कहा

“अरे कभी-कभी कीड़ा काट देला तब भी दाग हो जाला और बीच-बीच में कभी-कभी वह दाग बार-बार दिखाई देला कभी कम कभी ज्यादा । कुछ दिन बाद अपने आप पूरा ठीक भी हो जाला”

नियति मुस्कुरा रही थी सुगना और सरयू सिंह ने दाग का जो कारण बताया था वह लगभग समान था। दोनों ने कामुकता की पढ़ाई शायद एक ही स्कूल में की थी।

यह एक संयोग ही था कि जो सरयू सिंह ने बताया था वह सोनू पर हूबहू लागू हो रहा था।

सोनू और सुगना सुकून की सांस ले रहे थे सोनू के मन में उठा प्रश्न भी अब अपना उत्तर प्राप्त कर चुका था। कुछ देर पूरा परिवार विभिन्न मुद्दों पर और बात करता रहा। सुगना सरयू सिंह की तरफ आदर भाव से देखती अब उसके मन में उनके प्रति आदर और सम्मान जाग उठा था और अब सुगना के कामुक मन पर इस समय सोनू राज कर रहा था।

सरयू सिंह ने सुगना से कहा मुझे स्नान करने जाना है। सुगना ने सारी तैयारी कर दी उनका लंगोट उनकी तौलिया और अन्य वस्त्र यथावत रख दिया।

सोनी ने सरयू सिंह की तड़प बढ़ा दी थी। स्त्रियों के आवाज का मीठा पान भी उनकी कामुकता में चार चांद लगाता है सोनी धीरे-धीरे सरयू सिंह की आत्मा में वैसे की रच बस रही थी जैसे शुरुआती दिनों में सुगना।

परंतु एक ही अंतर था सरयू सिंह को सुगना से प्यार हो गया था और यहां सिर्फ और सिर्फ वासना और कामुकता थी वो भी सोनी के गदराए नितंबों को लेकर।

सरयू सिंह ने स्नान करते समय फिर सोनी को याद किया और एक बार फिर पूरी कामयाबी से अपने लंड का मानमर्दन कर उसे झुकाने और स्खलित करने में कामयाब रहे।

उधर अमेरिका में सोनी और विकास के दिन बेहद आनंद से बीतने लगे.. विकास और सोनी अमेरिका के खूबसूरत शहरों में विभिन्न स्थानों पर घूमते और शाम को एक दूसरे को बाहों में लिए संभोग सुख का आनंद लेते। सोनी भी पूरी तरह तृप्त हो रही थी वह भी बेचारी पिछले कई महीनो से प्यासी थी।

परंतु जब चाह मर्सिडीज़ की हो वह मारुति से कहां मिटने वाली थी। सोनी कार का आनंद ले तो रही थी पर मर्सिडीज़ अब भी उसके दिलों दिमाग पर छाई हुई थी। सरयू सिंह का वह लंड उसकी मर्सडीज थी जिसने उसे पिछले कई महीनो से बेचैन किया हुआ था। वह इस मर्सिडीज़ पर बैठ तो नहीं पाई थी पर उसने उसकी खूबसूरती बखूबी देखी थी और अपनी कल्पना में उसे महसूस भी किया था।

धीरे-धीरे विकास और सोनी दांपत्य जीवन का सुख लेने लगे उन्होंने अपनी गृहस्थी अमेरिका में पूरी तरह सेट कर ली।

समय बीतता गया। अमेरिका की आबो हवा ने सोनी को और भी ज्यादा आधुनिक बना दिया। सोनी में आ रहा बदलाव उसके व्यक्तित्व में आमूल चूल परिवर्तन कर रहा था वैसे भी सोनी बदलाव को बड़ी तेजी से आत्मसात करती थी।

बनारस आने से पहले सोनी अपने गांव सीतापुर में खेती किसानी के काम में अपनी मां पदमा की मदद करती गोबर पाथती, उकड़ू बैठकर सब्जियां काटती खेतों में काम करती। उसे देखकर यह कहना लगभग असंभव था कि आज वह जींस और टॉप पहनकर अपने गदराए हुए चूतड़ों को हिलाते हुए अमेरिका की सड़कों पर तेजी से चल रही थी। उसके बॉब कट बाल उसकी चाल से ताल से ताल मिलाते हुए हिल रहे थे और उसके पीछे चल रहे लोग उसके नितंबों पर लगातार आंख गड़ाए हुए उसकी थिरकन देख रहे थे।

जब वह बनारस में विकास के संपर्क में आई थी तब भी उस पर आधुनिकता ने बेहद तेजी से उसका हाव भाव बदला था। खड़ी हिंदी में घर के बुजुर्गों से भी बिना किसी झिझक के पूरे कॉन्फिडेंस के साथ बात करना , पारंपरिक साड़ी को छोड़ वह आधुनिक वस्त्रों को अपनाना, दोस्तों और सहेलियों के साथ शाम तक बाहर रहना यह साबित कर रहा था की सोनी आधुनिक युग की लड़की है और सुगना से निश्चित ही अलग है।

सोनी यही नहीं रुकी अमेरिका पहुंचने के बाद उसने लॉन्ग फ्रॉक और न जाने कौन-कौन से आधुनिक कपड़े पहनना शुरू किया जो विकास को तो बेहद पसंद था पर शायद उसे बनारस में पहनना मुश्किल था।

ऐसा नहीं था कि बदलाव सिर्फ सोनी के पहनावे में आया था उसका व्यक्तित्व भी तेजी से बदल रहा था वह एक आत्मविश्वास से भरी लड़की पहले भी थी और अब अमेरिका में विकास के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हुए उसका आत्मविश्वास और भी बढ़ गया था वह बेझिझक होकर अंग्रेज लोगों से बात करती उनसे रास्ता पूछतीऔर विभिन्न जानकारियां इकट्ठी करती। विकास सोनी को इसका आनंद लेते हुए देखता और ऐसी आत्मविश्वास से भरी हुई लड़की को अपनी पत्नी रूप में पाने के लिए विधाता को धन्यवाद करता।

विकास और सोनी की सेक्स लाइफ में कुछ ही दिनों में बदलाव आने लगा। आत्मविश्वास से भरी सोनी की कामुकता का रंग भी बदल रहा था। एक तरफ सुगना का अपने प्रेमी में उत्तेजना जागृत करने का तरीका अनूठा था वहीं दूसरी तरफ सोनी में शायद यह अलग ढंग से हावी थी। उसे सेक्स में एक्सपेरिमेंट करना पसंद था। वह वासना और कामुकता से इतर सेक्स पर फोकस करती। बिस्तर पर तो विकास का भरपूर साथ देती पर अपनी कल्पनाओं में खोई रहती। विकास स्वयं अति कामुक व्यक्ति था उसे भी सोनी को भोगने में ज्यादा मजा आता था । वह बाहरी दुनिया से ज्यादा रूबरू था और उसे सेक्स की कई विधाएं मालूम थी यद्यपि वह अपने लिंग से उतना मजबूत न था पर कामपिपासा में कोई कमी न थी।

सोने की कामुकता को नया रंग देने में कुछ ना कुछ विकास का भी योगदान था। सोनी पूरे दिन भर अपनी दुनिया में खोई रहती कभी शॉपिंग करना कभी क्लब और न जाने क्या-क्या वह अमेरिका की हाई-फाई लाइफ जी लेना चाहती थी। शाम को विकास के आने के बाद दोनों बाहर डिनर का आनंद उठाते और रात में बिस्तर पर एक दूसरे से अपनी काम पिपासा शांत करते।

जब तक सेक्स में तड़का ना हो उसमें धीरे-धीरे बोरियत होने लगती है विकास और सोनी ने भी यह महसूस किया और आखिरकार विकास ने सोनी एक पायदान और ऊपर चढ़ा दिया। विकास आज एक अनोखा पैकेट लेकर घर आया था।

विकास जब भी घर आता था वह सोनी के लिए कुछ ना कुछ अवश्य लेकर आता था कभी कपड़े कभी खाने पीने का सामान कभी फूल, चॉकलेट और न जाने क्या-क्या वह हर तरीके से सोने को खुश रखना चाहता था। सोनी भी उसका इंतजार करती पर आज उसे खाली हाथ एक लिफाफा पड़े देखकर उसने विकास से कहा..

कहां देर हो गई? मैं कब से आपका इंतजार कर रही थी

“जानू इसे ढूंढते ढूंढते बहुत टाइम लग गया” विकास ने अपने हाथ में पड़ा हुआ पैकेट हवा में लहराते हुए सोनी से कहा।

“क्या है इसमें” सोनी ने कौतूहल वश पूछा और उसके हाथों से वह पैकेट छीनने का प्रयास करने लगी

“तुम्हारी खुशियों का पिटारा” विकास अब भी उसे वह पैकेट नहीं दे रहा था। सोनी अपने हाथ बढ़ाकर उसे पैकेट को पकड़ने का प्रयास करती और विकास उसकी अधीरता को और बढ़ा जाता। बीच-बीच में वह उसे चूमने की कोशिश करता पर सोनी का सारा ध्यान उसे पैकेट पर अटका था।

आखीरकार सोनी ने वह पैकेट विकास के हाथों से छीन लिया…

सोनी के गुस्से से विकास की तरफ देखा…

ये क्या है?

शेष अगले भाग में…

 
सुप्रभात नए पाठकों का हार्दिक स्वागत है।





सोनी
 
मानसी

प्रिया पाठको

जब तक अगला अपडेट आता है तब तक एक कहानी पोस्ट कर रहा हूं जो एक लघु कहानी है।

आप में से कई लोगों ने यह कहानी नहीं पढ़ी होगी यह मेरी लिखी हुई कहानी है समय निकालकर पढ़िएगा और अपने विचार रखिएगा।

संजीवनी हॉस्पिटल के ट्रॉमा सेंटर में भीड़ लगी हुई थी. दो किशोर लड़कों का एक्सीडेंट हुआ था. उन्हें आनन-फानन में हॉस्पिटल में भर्ती कराया जा रहा था. आमिर तो लगभग मरणासन्न स्थिति में था, दूसरा लड़का राहुल भी घायल था पर खतरे से बाहर था. हॉस्पिटल का कुशल स्टाफ इन दोनों किशोरों को स्ट्रेचर पर लाद कर ऑपरेशन थिएटर की तरफ भाग रहा था. कुछ देर की गहमागहमी के पश्चात ऑपरेशन थिएटर का दरवाज़ा बंद हो गया और बाहर लगी लाल लाइट जलने बुझने लगी.

राहुल के पिता मदन हॉस्पिटल पहुंच चुके थे. उन्हें राहुल का मोबाइल और उसका बैग दिया गया जिसमे उसकी पर्सनल डायरी भी थी. राहुल मदन का एकलौता पुत्र था. राहुल की मां की दुर्घटना में मृत्यु के बाद उन्होंने उसे पाल पोस कर बड़ा किया था. मदन राहुल के बचपन में खोये हुये थे, तभी ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा खुला और सफेद चादर से ढकी हुई आमिर की लाश बाहर आई. उसके परिवार वाले फूट-फूट कर रो रहे थे. मदन भी अपने आंसू नहीं रोक पा रहे थे. तभी दूसरे स्ट्रेचर पर राहुल भी बाहर आ गया. वह जीवित था और खतरे से बाहर था. मदन के चेहरे पर तो आमिर की मृत्यु का दुख था पर हृदय में राहुल के जीवित होने की खुशी.

प्राइवेट वार्ड में आ जाने के कुछ देर बाद राहुल को होश आ गया. वह कराहते हुए बुद बुदा रहा था.... अमिर….आमिर... मैं तुमसे….. बहुत प्यार करता हूं ... मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगा…… उसने अपनी आंखें एक बार फिर बंद कर लीं.

मदन के लिए यह अप्रत्याशित था..कि.जी अपने पुत्र को जीवित देख कर वो खुश थे परंतु उसके होठों पर आमिर का नाम... और उससे प्यार…. यह आश्चर्य का विषय था.

राहुल की पास रखी हुयी डायरी पर नजर पड़ते ही उन्होंने उसे शुरू कर दिया. जैसे-जैसे वह डायरी पढ़ते गए उनकी आंखों में अजब सी उदासी दिखाई पड़ने लगी. राहुल एक समलैंगिक था, वह आमिर से प्यार करता था. यह बात जानकर उनके होश फाख्ता हो गए.

राहुल एक बेहद ही सुंदर और कोमल मन वाला किशोर था जिसमें कल ही अपने जीवन के 19 वर्ष पूरे किए थे. शरीर की बनावट सांचे में ढली हुई थी. उसकी कद काठी पर हजारों लड़कियां फिदा हो सकतीं थीं पर राहुल का इस तरह आमिर पर आसक्त हो जाना यह अप्रत्याशित था और अविश्वसनीय भी.

पूरी तरह होश में आने के बाद राहुल के आंसू नहीं थम रहे थे. आमिर के जाने का उसके दिल पर गहरा सदमा लगा था. मदन उसे सांत्वना दे रहे थे पर उसके समलैंगिक होने की बात पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे.

राहुल के आने वाले जीवन को लेकर मदन चिंतित हो चले थे. क्या वह सामान्य पुरुषों की भाँति जीवन जी पाएगा? या समलैंगिकता उस पर हावी रहेगी? यह प्रश्न भविष्य के अंधेरे में था.

मदन राहुल को वापस सामान्य युवक की तरह देखना चाहते थे पर यह होगा कैसे? वह अपनी उधेड़बुन में खोए हुए थे…तभी उन्हें अपनी सौतेली बहन मानसी का ध्यान आया.

मदन के फोन की घंटी बजी और मानसी का नाम और सुंदर चेहरा फोन पर चमकने लगा यह एक अद्भुत संयोग था.. मदन ने फोन उठा लिया

"मदन भैया, मैं सोमवार को बेंगलुरु आ रही हूं"

"अरे वाह' कैसे?"

"सुमन का एडमिशन कराना है" सुमन मानसी की पुत्री थी.

मदन ने राहुल की दुर्घटना के बारे में मानसी को बता दिया. मानसी कई वर्षों बाद बेंगलुरु आ रही थी. मदन चेहरे पर मुस्कुराहट लिए मानसी को याद करने लगे.

मदन के पिता मानसी की मां को अपने परिवार में पत्नी स्वरूप ले आए थे जिससे मानसी और उसकी मां को रहने के लिए छत मिल गयी थी तथा मदन के परिवार को घर संभालने में मदद. यह सिर्फ और सिर्फ एक सामाजिक समझौता था इसमें प्रेम या वासना का कोई स्थान नहीं था. शुरुआत में मदन ने मानसी और उसकी मां को स्वीकार नहीं किया परंतु कालांतर में मदन और मानसी करीब आ गए और दो जिस्म एक जान हो गए. उनमें अंतरंग संबंध भी बने पर उनका विवाह न हो सका.

मदन और मानसी दोनों एक दूसरे को बेहद प्यार करते थे. मानसी का विवाह चंडीगढ़ में हुआ था पर अपने विवाह के पश्चात भी मानसी के संबंध मदन के साथ वैसे ही रहे.

मानसी अप्सरा जैसी खूबसूरत थी बल्कि आज भी है आज 40 वर्ष की में भी वह शारीरिक सुंदरता में अपनी उम्र को मात देती है. अपनी युवावस्था में उसने मदन के साथ कामुकता के नए आयाम बनाए थे. मानसी और मदन का एक दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण अद्भुत और अविश्वसनीय था.

मानसी के बेंगलुरु आने से पहले राहुल हॉस्पिटल से वापस घर आ चुका था. मानसी को देखकर मदन खुश हो गए. मानसी की पुत्री सुमन ने उनके पैर छुए. सुमन भी बेहद खूबसूरत और आकर्षक थी.

राहुल को देखकर मानसी बोल पड़ी

"मदन भैया, राहुल तो ठीक आपके जैसा ही दिखाई देता है" मदन मुस्कुरा रहे थे

राहुल ने कहा

"प्रणाम बुआ" मानसी ने अपने कोमल हाथों से उसके चेहरे को सहलाया तथा प्यार किया. सुमन और राहुल ने भी एक दूसरे को अभिवादन किया आज चार-पांच वर्षों बाद वो मिल रहे थे.

मानसी के पति उसका साथ 5 वर्ष पहले छोड़ चुके थे. मानसी अपने ससुराल वालों और अपनी पुत्री सुमन के साथ चंडीगढ़ में रह रही थी.

मानसी अपनी युवावस्था में अद्भुत कामुक युवती थी वह व्यभिचारिणी नहीं थी परंतु उसने अपने पति और मदन से कामुक संबंध बना कर रखे थे.

अपने पति के जाने के बाद मानसी की कामुकता जैसे सूख गई थी इसके पश्चात उसने मदन के साथ , भी संबंध नहीं बनाए थे.

रात्रि विश्राम के पहले मदन और मानसी छत पर टहल रहे थे. मदन ने राहुल के समलैंगिक होने की बात मानसी को स्पष्ट रूप से बता दी वह भी दुखी हो गई.

उन्हें राहुल को इस समलैंगिकता के दलदल से बाहर निकालने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था. मदन ने उसके अन्य दोस्तों से बात कर यह जानकारी प्राप्त कर ली थी कि राहुल की लड़कियों में कोई रुचि नहीं है. कई सारी सुंदर लड़कियां उसके संपर्क में आने की कोशिश करती थीं पर राहुल उन्हें सिरे से खारिज कर देता था. उसका मन आमिर से लग चुका था.

"मैं मानसी"

मदन भैया ने अचानक एक पुरानी बात याद करते हुए कहा ….

"मानसी तुम्हें याद है एक दिव्यपुरुष ने तुम्हें आशीर्वाद दिया था की जब भी तुम किसी कुंवारे पुरुष से संभोग की इच्छा रखते हुए प्रेम करोगी तो तुम्हारी यौनेच्छा कुंवारी कन्या की तरह हो जाएगी और तुम्हारी योनि भी कुवांरी कन्या की योनि की तरह बर्ताव करेगी."

मैं शर्म से पानी पानी हो गई मैनें अपनी नजरें झुका लीं.

"हां मुझे याद तो अवश्य है पर वह बातें विश्वास करने योग्य नहीं थी. वैसे वह बात आपको आज क्यों याद आ रही है?"

मदन भैया संजीदा थे उन्होंने कहा

"मानसी, भगवान ने तुम्हें सुंदरता और कामुकता एक साथ प्रदान की है. उस दिव्यपुरुष का आशीर्वाद भी इस बात की ओर इशारा कर रहा है की तुम राहुल को समलैंगिकता से बाहर निकाल सकती हो. तुम्हें अपनी सुसुप्त कामवासना को एक बार फिर जागृत करना है. यह पावन कार्य राहुल की जिंदगी बचा सकता है."

मदन भैया ने अपनी बात इशारों ही इशारों में कह दी थी.

"पर मदन भैया, वह मेरे पुत्र समान है मैं उसकी बुआ हूं"

"मानसी, क्या तुम सच में मेरी बहन हो?"

"नहीं"

"तो फिर तुम राहुल की बुआ कैसे हुई?" मैं निरुत्तर हो गई.

मुझे उन्हें भैया कहने की आदत शुरू से ही थी. जब मैं उनसे प्यार करने लगी तब भी मेरे संबोधन में बदलाव नहीं आया था. मेरे लाख प्रयासों के बाद मेरे मुख से उनके लिए हमेशा भैया शब्द ही निकलता पर हम दोनों भाई बहन न कभी थे न कभी हो सकते थे. हम दोनों एक दूसरे के लिए ही बने थे पर हमारे माता पिता के सामाजिक समझौते की वजह से हम दोनों समाज की नजरों में भाई बहन हो गए थे.

इस लिहाज से न राहुल मेरा भतीजा था और न हीं मैं उसकी बुआ. संबंधों की यह जटिलता मुझे समझ तो आ रही थी पर राहुल इससे बिल्कुल अनजान था. वह मुझे अपनी बुआ जैसा ही प्यार करता था और मैं भी उसे अपने वात्सल्य से हमेशा ओतप्रोत रखती थी.

"मानसी कहां खो गई"

"कुछ नहीं " मैं वापस वास्तविकता में लौट आई थी.

"भैया, मैंने राहुल को हमेशा बच्चे जैसा प्यार किया है. मैंने उसे अपनी गोद में खिलाया है. आप से मेरे संबंध जैसे भी रहे हैं पर राहुल हमेशा से मेरे बच्चे जैसा ही रहा है. उसमें और सुमन में मैंने कोई अंतर नहीं समझा है."

"इसीलिए मानसी मेरी उम्मीद सिर्फ और सिर्फ तुम हो. उसका आकर्षण किसी लड़की की तरफ नहीं हो रहा है. उसका सोया हुआ पुरुषत्त्व जगाने का कार्य आसान नहीं है. इसे कोई अपना ही कर सकता है वह भी पूरी आत्मीयता और धीरज के साथ"

"मम्मी, राहुल को दर्द हो रहा है जल्दी आइये" सुमन की आवाज सुनकर हम दोनों भागते हुए नीचे आ गए.

जब तक भैया दवा लेकर आते मैं राहुल के बालों पर उंगलियां फिराने लगी. राहुल की कद काठी ठीक वैसी ही थी जैसी मदन भैया की युवावस्था में थी.

राहुल अभी मुझे उनकी प्रतिमूर्ति दिखाई दे रहा था. एकदम मासूम चेहरा और गठीला शरीर जो हर लड़की को आकर्षित करने के लिए काफी था. पर राहुल समलैंगिक क्यों हो गया? यह प्रश्न मेरी समझ से बाहर था. एक तरफ मदन भैया मेरे लिए कामुकता के प्रतीक थे जिनके साथ मैने कामकला सीखी थी वहीं दूसरी तरफ राहुल था उनका पुत्र... मुझे उस पर तरस आ रहा था. दवा खाने के बाद राहुल सो गया. मैं और सुमन दोनों ही उसे प्यार भरी नजरों से देख रहे थे वह सचमुच बहुत प्यारा था.

सुमन कॉलेज में दाखिला लेने के पश्चात हॉस्टल में रहने लगी और मैं राहुल का ख्याल रखने लगी. धीरे-धीरे मुझमें और राहुल में आत्मीयता प्रगाढ़ होती गई. राहुल मुझसे खुलकर बातें करने लगा था. उसकी चोट भी धीरे-धीरे सामान्य हो रही थी. जांघों के जख्म भर रहे थे.

मुझे राहुल के साथ हंस-हंसकर बातें करते हुए देखकर मदन भैया बहुत खुश होते एक दिन उन्होंने मुझसे कहा..

"मानसी, मैंने तुमसे गलत उम्मीद नहीं की थी. राहुल का तुमसे इस तरह हंस-हंसकर बातें करना इस बात की तरफ इंगित करता है कि तुम उसकी अच्छी दोस्त बन चुकी हो"

मैं उनका इशारा समझ रही थी मैंने कहा

"वह मुझे अभी भी अपनी बुआ ही मानता है मुझे नहीं लगता कि मैं यह कर पाऊंगी"

उनके चेहरे पर गहरी उदासी छा गई.

"आप निराश मत होइए, जो होगा वह भगवान की मर्जी से ही होगा. पर हां मैं आपके लिए एक बार प्रयास जरूर करूंगी"

उन्होंने मुझे अपने आलिंगन में ले लिया और मुझे माथे पर चूम लिया

"मानसी मैं तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भूलूंगा" आज हमारे आलिंगन में वासना बिल्कुल भी नहीं थी सिर्फ और सिर्फ प्रेम था.

मैंने अपना आखरी सम्भोग आज से चार-पांच वर्ष पूर्व किया था. सुमन के पिता के जाने के बाद मुझे कामवासना से विरक्ति हो चुकी थी. जो स्वयं कामवासना से विरक्त हो चुका हो उसे एक समलैंगिक के पुरुषत्व को जागृत करना था. यह पत्थर से पानी निकालने जैसा ही कठिन था पर मैंने मदन भैया की खुशी के लिए यह चुनौती स्वीकार कर ली.

राहुल की तीमारदारी के लिए जो लड़का घर आता था उसे मैंने हटा दिया और स्वयं राहुल का ध्यान रखने लगी. राहुल इस बात से असमंजस में रहता था कि वह कैसे मेरे सामने अपने वस्त्र बदले? पर धीरे-धीरे वह सामान्य हो गया.

आज राहुल को स्पंज बाथ देने का दिन था मैंने राहुल से कपड़े उतारने को कहा वह शर्मा रहा था पर मेरे जिद करने पर उसने अपनी टी-शर्ट उतार दी उसके नग्न शरीर को देखकर मुझे मदन भैया की याद आ गई अपनी युवावस्था में हम दोनों ने कई रातें एक दूसरे की बाहों में नग्न होकर गुजारी थीं. राहुल का शरीर ठीक उनके जैसा ही था. मैं अपने ख्वाबों में खोई हुई थी तभी राहुल ने कहा

"बुआ, जल्दी कीजिए ठंड लग रही है"

मैं राहुल के सीने और पीठ को पोंछ रही थी जब मेरी उंगलियां उसके सीने और पीठ से टकराती तो मुझ में एक अजीब सी संवेदना जागृत हो रही थी. मुझे उसे छूने में शर्म आ रही थी. जैसे-जैसे मैं उसके शरीर को छूती गई मेरी शर्म हटती गई. शरीर का ऊपरी भाग पोछने के बाद मैंने उसके पैरों को पोछना शुरू कर दिया जांघों तक पहुंचते-पहुंचते राहुल ने मेरे हाथ पकड़ लिये. मैंने भी आगे बढ़ने की चेष्टा नहीं की.

धीरे-धीरे राहुल मुझसे और खुलता गया. मैं उसके बिस्तर पर लेट जाती वह मुझसे ढेर सारी बातें करता और बातों ही बातों के दौरान हम दोनों के शरीर एक दूसरे से छूते रहते. सामान्यतया वह पीठ के बल लेटा रहता और मैं करवट लेकर. मेरे पैर अनायास ही उसके पैरों पर चले जाते तथा मेरे स्तन उसके सीने से टकराते. कभी-कभी बातचीत के दौरान मैं उसके माथे और गालों को चूम लेती.

यदि प्रेम और वासना की आग दोनों तरफ बराबर लगी हो तो इस अवस्था से संभोग अवस्था की दूरी कुछ मिनटों में ही तय हो जाती पर राहुल में यह आग थी या नहीं यह तो मैं नहीं जानती पर मैं अपनी बुझी हुई कामुकता को जगाने का प्रयास अवश्य कर रही थी.

मदन भैया ने मुझे राहुल के साथ इस अवस्था में देख लिया था. वो खुश दिखाई पड़ रहे थे. अगले दिन शाम को ऑफिस से आते समय वह मेरे लिए कई सारी नाइटी ले आए जो निश्चय ही मेरी उम्र के हिसाब से कुछ ज्यादा ही उत्तेजक थीं. मैं उनकी मनोदशा समझ रही थी. अपने पुत्र का पुरुषत्व जागृत करने के लिए वह कोई कमी नहीं छोड़ना चाह रहे थे.

राहुल की जांघों पर से पट्टियां हट चुकी थीं. अब पूरी तरह ठीक हो चुका था उसने थोड़ा बहुत चलना फिरना भी शुरू कर दिया था.

राहुल से अब मेरी दोस्ती हो चली थी. मैं उसके बिस्तर पर लेटी रहती और उससे बातें करते करते कभी कभी उसके बिस्तर पर ही सो जाती. हमारे शरीर एक दूसरे से छूते रहते पर उसमें उत्तेजना नाम की चीज नहीं थी. मैं मन ही मन उत्तेजित होने का प्रयास करती पर उसके मासूम चेहरे को देखकर मेरी उत्तेजना जागृत होने से पहले ही शांत हो जाती.

शनिवार का दिन था सुमन हॉस्पिटल से घर आई हुई थी उसने राहुल के लिए फूलों का एक सुंदर गुलदस्ता भी खरीदा था. राहुल और सुमन एक दूसरे से बातें कर रहे थे. उन दोनों को देखकर मेरे मन में अजीब सा ख्याल आया. दोपहर में भी जब राहुल सो रहा था सुमन उसे एकटक निहार रही थी मेरी नजर पड़ते ही वह शर्मा कर अपने कमरे में चली गई. वह जिस प्रेमभाव को छुपा रही थी वह मेरे जीवन का आधार था. सुमन राहुल पर आसक्त हो गई थी पर उसे यह नहीं पता था की उसका यह प्रेम एकतरफा था.

अगले दिन सुमन हॉस्टल जा चुकी थी. राहुल दोपहर में देर तक सोता रहा था. मुझे पता था आज वह देर रात तक नहीं सोएगा. मैंने आज कुछ नया करने की ठान ली थी. मैंने स्नानगृह के आदमकद आईने में स्वयं को पूर्ण नग्न अवस्था में देखकर मुझे अपनी युवावस्था याद आ गई. मदन भैया से मिलने के लिए मैं यूं ही अपने आप को सजाती और संवारती थी. उम्र ने मेरी शारीरिक संरचना में बदलाव तो लाया था पर ज्यादा नहीं.

मेरी रानी (योनि) का मुख घुँघराले केशों के पीछे छुप गया था. वह पिछले तीन-चार वर्षों से एकांकी जीवन व्यतीत कर रही थी. आज कई दिनों पश्चात मेरी उंगलियों के कोमल स्पर्श से वह रोमांचित हो रही थी. मैंने रानी के मुख मंडल पर उग आए बालों को हटाना चाहा. जैसे जैसे मेरी उंगलियां रानी और उसके होंठों को छूतीं वह जागृत हो रही थी. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी कैदी को आज बाहर निकाल कर खुली हवा में सांस लेने के लिए छोड़ दिया गया हो. रानी के होंठो पर खुशी के आँशु आ रहे थे. मेरी उत्तेजना बढ़ रही थी.

जैसें ही मेरी आँखें बंद होतीं मुझें मदन भैया की युवावस्था याद आ जाती अपनी कल्पना में मैं उनके हष्ट पुष्ट शरीर को देख रही थी पर मुझे बार-बार राहुल का चेहरा दिखाइ दे जाता , राहुल भी ठीक वैसा ही था. मैं उन अनचाहे बालों को हटाने लगी. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपनी रानी को एक बार फिर प्रेमयुद्ध के लिए तैयार कर रही हूँ. मेरी उत्तेजना बढ़ रही थी. इस उत्तेजना में किंचित राहुल का भी योगदान था.

राहुल के प्रति मेरा वात्सल्य रस अब प्रेम रस में बदल रहा था. मैं जितना राहुल के बारे में सोचती मेरी उत्तेजना उतनी ही बढ़ती. मेरे पूर्ण विकसित और अपना आकार खोते स्तन अचानक कठोर हो रहे थे. उन्हें छूते हुए मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह उम्मीद से ज्यादा कठोर हो गए हैं. इनमें इतनी कठोरता मैंने पिछले कई सालों में महसूस नहीं की थी. निप्पल भी फूल कर कड़े हो गए थे जैसे वह भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना चाह रहे थे.

मुझे यह क्या हो रहा था? स्तनों को छूने पर मुझे शर्म और लज्जा महसूस हो रही थी. यह इतने दिनों बाद होने वाले स्पर्श का अंतर था या कुछ और? मुझे अचानक दिव्यपुरुष की बात याद आ गई. मुझे ऐसा लगा जैसे शायद उनकी बातों में कुछ सच्चाई अवश्य थी. आज राहुल के प्रति आकर्षण ने मुझमें शर्म और उत्तेजना भर दी थी.

स्नान करने के पश्चात मैं वापस कमरे में आयी और मदन भैया द्वारा लाई खूबसूरत नाइटी पहन ली. मैंने अपने ब्रा और पैंटी का त्याग कर दिया था शायद आज उनकी आवश्यकता नहीं थी. नाइटी ने मेरे शरीर पर एक आवरण जरूर दिया था पर मेरे शरीर के उभारों को छुपा पाने में वह पूरी तरह नाकाम थी. ऐसा लगता था उसका सृजन ही मेरी सुंदरता को जागृत करने के लिए हुआ था. मैंने अपने आप को सजाया सवांरा और आज मन ही मन राहुल के पुरुषत्व को जगाने के लिए चल पड़ी.

खाना खाते समय मदन भैया और राहुल दोनों ही मुझे देख रहे थे. पिता पुत्र की नजरें मुझ पर ही थीं उनके मन मे क्या भाव थे ये तो वही जानते होंगे पर मेरी वासना जागृत थी. मदन भैया की नजरें मेरे चेहरे के भाव आसानी से पढ़ लेतीं थीं. वह खुश दिखाई पड़ रहे थे.

खाना खाने के बाद मदन भैया सोने चले गए और मैं राहुल के बिस्तर पर लेटकर. उससे बातें करने लगी. राहुल ने कहा

"बुआ आज आप बहुत सुंदर लग रही हो"

मैंने उसके गाल पर मीठी सी चपत लगाई और कहा

"नॉटी बॉय, बुआ में सुंदरता ढूंढते हो."

वह मुस्कुराने लगा

"नहीं बुआ मेरा वह मतलब नहीं था.आज आप सच में सुंदर लग रही हो"

मैंने यह बात जान ली थी नारी की सुंदर और सुडौल काया सभी को सुंदर लगती है चाहे वह पुरुष हो या स्त्री या फिर समलैंगिक.

मैंने उसे अपने आलिंगन में ले लिया मेरे कठोर स्तन उसके सीने से सटते गए और मेरे शरीर में एक सनसनी सी फैलती गयी. मेरे स्तनों और कठोर निप्पलों का स्पर्श निश्चय ही उसे भी महसूस हुआ होगा. वह थोड़ा असहज हुआ पर उसने अपनी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. हम फिर बातें करने लगे.

कुछ देर में मैं जम्हाई लेते हुए सोने का नाटक करने लगी. मेरी आंखें बंद थी पर धड़कन तेज. मदन भैया जैसा समझदार पुरुष कामवासना के लिए आतुर स्त्री की यह अवस्था तुरंत पहचान जाता पर राहुल मासूम था.

मैंने अपनी नाइटी को इस प्रकार व्यवस्थित कर लिया था जिससे मेरे स्तनों का ऊपरी भाग स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा था. मैं राहुल की नजरों को अपने शरीर पर महसूस करना चाह रही थी पर वह अपने मोबाइल में कोई किताब पढ़ने में व्यस्त था.

कुछ देर पश्चात वह उठकर बाथरूम की तरफ गया इस बीच मैंने अपने शरीर पर पड़ी हुई चादर हटा दी. नाइटी को खींचकर मैंने अपनी जांघों तक कर लिया था स्तनों का ऊपरी भाग अब स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा था. कमरे में लाइट जल रही थी मेरी नग्नता उजागर थी.

राहुल बाथरूम से आने के बाद मुझे एकटक देखता रह गया. वह मेरे पास आकर मेरी नाइटी को छू रहा था. कभी वह नाइटी को नीचे खींच कर मेरे घुटनों को ढकने का प्रयास करता कभी वापस उसी अवस्था में ला देता. मैं मन ही मन मुस्कुरा रही थी. उसके मन में निश्चय ही दुविधा थी.

अंततः राहुल ने नाइटी को ऊपर तक उठा दिया. मेरी जांघों के जोड़ तक पहुंचते- पहुंचते उसके हाथ रुक गए. इसके आगे जाने की न वह हिम्मत नहीं कर पा रहा था न ही यह संभव था नाइटी मेरे फूल जैसे कोमल नितंबों के भार से दबी हुई थी.

मेरी नग्न और गोरी मखमली जाँघे उसकी आंखों के सामने थीं. वह मुझे बहुत देर तक देखता रहा और फिर आकर मेरे बगल में सो गया. मैं मन ही मन खुश थी. राहुल की मनोदशा मैं समझ पा रही थी. कुछ ही देर में राहुल ने अपना मोबाइल रख दिया और पीठ के बल लेट कर सोने की चेष्टा करने लगा.

मैंने जम्हाई ली और अपने दाहिनी जांघ को उसकी नाभि के ठीक नीचे रख दिया. वह इस अप्रत्याशित कदम से घबरा गया.

"बुआ, ठीक से सो जाइए" उसकी आवाज मेरी कानों तक पहुंची पर मैंने उसे नजरअंदाज कर दिया. अपितु मैंने अपने स्तनों को उसके सीने से और सटा दिया मेरी दाहिनी बांह अब उसके सीने पर थी. और मेरा चेहरा उसके कंधों से सटा हुआ था.

मैं पूर्ण निद्रा में होने का नाटक कर रही थी. वह पूरी तरह शांत था. उसकी नजरें मेरे स्तनों पर थी जो उसके सीने से सटे हुए थे. हम दोनों कुछ देर इसी अवस्था में रहे राहुल धीरे-धीरे सामान्य हो रहा था.

मैंने अपनी दाहिनी जांघ को नीचे की तरफ लाया मुझे पहली बार राहुल के लिंग में कुछ तनाव महसूस हुआ. मेरी कोमल जांघों ने उस कठोरता का महसूस कर लिया. जांघों से उसके आकार को महसूस कर पाना कठिन था पर उसका तनाव इस बात का प्रतीक था कि आज मेरी मेहनत रंग लाई थी.

मैं कुछ देर तक अपनी जांघ को उसके लिंग के ऊपर रखी रही और बीच-बीच में अपनी जांघों को ऊपर नीचे कर देती. राहुल के लिंग का तनाव बढ़ता जा रहा था. मेरे लिए बहुत ही खुशी की बात थी.

कुछ देर इसी अवस्था में रहने के बाद मैंने राहुल के हाथों को अपनी पीठ पर महसूस किया वह मेरी तरफ करवट ले चुका था मैं अब उसकी बाहों में थी मेरे दोनों स्तन उसके सीने से सटे हुए थे और उसके लिंग का तनाव मेरे पेट पर महसूस हो रहा था. मेरी रानी प्रेम रस से पूरी तरह भीगी हुई थी और मैं मन ही मन में संभोग के आतुर थी.

मुझे पता था मेरी जल्दीबाजी बना बनाया खेल बिगाड़ सकती थी. आज हम दोनों के बीच जितनी आत्मीयता बड़ी थी वह काफी थी. मैं राहुल को अपनी आगोश में लिए हुए सो गयी.

सुबह राहुल मेरे उठने से पहले ही उठ चुका था. उसने मेरी नाइटी व्यवस्थित कर दी थी मेरा पूरा शरीर ढका हुआ था. निश्चय ही यह काम राहुल ने किया था. उसे नारी शरीर की नग्नता और ढके होने का अंतर समझ आ चुका था.

" बुआ उठिए ना, मैं आपके लिए चाय बना कर लाया हूँ." राहुल मुझसे प्यार से बातें कर रहा था. कुछ ही देर में मदन भैया आ गए. मेरा मन कह रहा था कि मैं मदन भैया को अपनी पहली विजय के बारे में बता दूं पर मैंने शांत रहना ही उचित समझा अभी दिल्ली दूर थी.

अगले कुछ दिन मैने राहुल के साथ कोई कामुक गतिविधि नहीं की. मैं उसमें पनप रही उत्तेजना को बढ़ता हुआ देखना चाह रही थी. वह मुझसे प्यार से बातें करता और उसके चेहरे पर खुशी स्पष्ट दिखाई पड़ती. मैंने उसके साथ रात को सोना बंद कर दिया था. उसकी आंखों में आग्रह दिखाई पड़ता पर वह खुलकर नहीं बोल सकता था उसकी अपनी मर्यादा या थी मेरी अपनी.

सुमन आज घर आयी थी. आज राहुल के चेहरे पर खुशी स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी. वह दोनों आपस में काफी घुलमिल गए थे जब तक सुमन घर में थी मैं राहुल से दूर ही रही. सुमन जब राहुल के पास रहती उसके चेहरे पर भी एक अलग ही खुशी दिखाई पड़ती. मुझे मन ही मन ऐसा प्रतीत होता जैसे वह राहुल को प्यार करने लगी है. उसे शायद यह आभास भी नहीं था कि राहुल समलैंगिक है. मैंने उन दोनों को एक साथ छोड़ दिया सुमन का साथ राहुल के पुरुषत्व को जगाने में मदद ही करता. वह दोनों जितना करीब आते मेरा कार्य उतना ही आसान होता आखिर सुमन भी मेरी पुत्री थी उतनी ही सुंदर और पूर्ण यौवन से भरी हुई.

अगले दिन सुमन के हॉस्टल जाते ही राहुल फिर उदास हो गया. शाम को उसने मुझसे कहा बुआ आप मेरे पास ही सो जाइएगा. उसका यह खुला आमंत्रण मुझे उत्तेजित कर गया. मैंने मन ही मन आगे बढ़ने की ठान ली.

एक बार फिर मैं उसी तरह सज धज कर राहुल के पास पहुंच गयी. आज पहनी हुई नाइटी का सामने का भाग दो हिस्सों में था जिसे एक पतले पट्टे से बांधा जा सकता था तथा खोलने पर नाइटी सामने से खुल जाती और छुपी हुयी नग्नता उजागर हो जाती. राहुल मुझे देख कर आश्चर्यचकित था . उसने कहा

"बुआ, आज तो आप तो आप परी जैसी लग रहीं है. यह ड्रेस आप पर बहुत अच्छी लग रही है"

मैंने मुस्कुराते हुए कहा

"आजकल तुम मुझ पर ज्यादा ही ध्यान देते हो" वह भी मुस्कुरा दिया.

हम दोनों बातें करने लगे सुमन के बारे में बातें करने पर उसके चेहरे पर शर्म दिखाई पड़ती. वह सुमन के बारे में बाते करने से कतरा रहा था. कुछ ही देर में मैं एक बार फिर सोने का नाटक करने लगी

एक बार फिर राहुल बाथरूम की तरफ गया उसके वापस आने से पहले मैंने अपनी नाइटी की की बेल्ट खोल दी. नाइटी का सामने वाला हिस्सा मेरे शरीर पर सिर्फ रखा हुआ था. मैरून रंग की नाइटी के बीच से मेरी गोरी और चमकदार त्वचा एक पतली पट्टी के रूप में दिखाई पड़ रही थी. मैने अपनी रानी को अभी भी ढक कर रखा था.

राहुल बाथरूम से वापस आ चुका था. मैं होने वाली कयामत का इंतजार कर रही थी. उसकी निगाहें मेरे नाभि और स्तनों पर घूम रही थी दोनों स्तनों का कोमल उभार नाइटी के बीच से झांक रहे थे और अपने नए प्रेमी को स्पर्श का खुला आमंत्रण दे रहे थे.

राहुल से अब और बर्दाश्त नहीं हुआ. उसने नाइटी को फैलाना शुरू कर दिया जैसे-जैसे वह नाइटी के दोनों भाग को अलग करता गया मेरे स्तन खुललकर बाहर आते गए. शरीर का ऊपरी भाग नग्न हो चुका था राहुल मुझे देखता जा रहा था कुछ ही देर में मेरी जाँघे भी नग्न हो गयीं मेरी योनि को नग्न करने का साहस राहुल नहीं जुटा पाया और कुछ देर मेरी नग्नता का आनद लेकर मन में उत्तेजना लिए हुए मेरे बगल में आकर लेट गया.

उसने चादर ऊपर खींच ली उसकी सांसे तेज चल रही थी. आगे बढ़ने की अब मेरी बारी थी मैंने एक बार फिर अपनी जांघों से उसके लिंग को महसूस किया उसका तनाव आज और भी ज्यादा था. कुछ देर अपनी जांघों से उसे सहलाने के बाद मैंने अपनी हथेलियां उसके लिंग पर रख दीं. मैंने बिना कोई बात किये उसके पजामे का नाड़ा ढीला कर दिया. हम दोनों का शरीर चादर के अंदर था सिर्फ राहुल का सर बाहर था.

मैंने अपनी हथेलियों से उसके लिंग को बाहर निकाल लिया लिंग का आकार मुझे मदन भैया के जैसा ही महसूस हुआ. मेरे हाथों में आते ही उसके लिंग में तनाव बढ़ता गया. मुझे खुशी हुयी मेरी हथेलियों का जादू आज भी कायम था. राहुल की धड़कनें तेज थीं. मेरे कान उसके सीने से सटे हुए उसकी धड़कन सुन रहे थे.

मेरी जाँघें उसकी जांघों पर आ चुकीं थीं. मेरी नग्नता का एहसास उसे हो रहा था. मेरी उंगलियों के कमाल ने राहुल के लिंग को पूर्ण रूप से उत्तेजित कर दिया था. मेरे थोड़े ही प्रयास से राहुल स्खलित हो सकता था. मैंने इस स्थिति को और कामुक बनाना चाहा. मैंने उसके कुरते को अपने हाथों से ऊपर कर उसके सीने को नग्न कर दिया और अपने नग्न स्तनों को उसके सीने से सटा दिया.

मेरी उत्तेजना भी चरम पर पहुंच रही थी. मेरी रानी उसकी नग्न जाँघों से छू रही थी. मेरी वासना उफान पर थी. मेरी रानी लगातार प्रेम रस बहा रही थी. अपने स्तनों की कठोरता और सिहरन महसूस कर मैं स्वयं भी अचंभित थी.

यह में मुझे मेरी किशोरावस्था की याद दिला रहे थे. मैं चाह रही थी कि राहुल स्वयं अपने हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ ले पर राहुल शांत था. कुछ ही देर में राहुल ने मेरी तरफ करवट ली मेरे दोनों स्तन उसके सीने से टकरा रहे थे. उसकी हथेलियां मेरी नंगी पीठ पर घूम रहीं थी .

मेरी उंगलियों ने उसके लिंग को सहलाना जारी रखा कुछ ही देर में मुझे राहुल के लिंग का उछलना महसूस हुआ. मेरे स्तनों पर वीर्य की धार पड़ रही थी राहुल स्खलित हो रहा था. मैंने सफलता प्राप्त कर ली थी राहुल का पुरुषत्व जागृत हो चुका था.

उसने अभी तक मेरे यौनांगों को स्पर्श नहीं किया था पर आज जो हुआ था यह मेरी उम्मीद से ज्यादा था.

अपनी रानी की उत्तेजना मुझसे स्वयं बर्दाश्त नहीं हो रही थी. मैं भी स्खलित होना चाहती थी. मैंने राहुल का एक पैर अपने दोनों जांघों के बीच ले लिया तथा अपनी रानी को उसकी जांघों पर रगड़ने लगी. मेरे कमर की हलचल को राहुल ने महसूस कर लिया वो मुझे आलिंगन से लिए हुए अपनी मजबूत बाहों का दबाव बढ़ता गया. यह एक अद्भुत एहसास था. मेरी सांसे तेज हो गई और मेरी रानी ने कंपन प्रारंभ कर दिये मेरा यह स्खलन अद्भुत था. हम दोनों उसी अवस्था मे सो गए.

मैं बहक रही थी. राहुल का पुरुषत्व जाग्रत करते करते मेरी रानी सम्भोग के लिए आतुर हो चुकी थी. कभी कभी मुझे शर्म भी आती की मैं यह क्या कर रही हूँ? राहुल ने अपना वीर्य स्खलन कर लिया था यह स्पष्ट रूप से इंगित करता था कि उसका पृरुषत्व जागृत हो चुका है. मेरा कार्य हो चुका था पर अब मैं स्वयं अपनी रानी की कामेच्छा के आधीन हो चुकी थी.

मेरे मन में अंतर्द्वंद चल रहा था एक तरफ राहुल जो मेरे बच्चे की उम्र का था जिसके साथ कामुक गतिविधियां सर्वथा अनुचित थीं दूसरी तरफ मेरी रानी संभोग करने के लिएआतुर थी.

अगले तीन-चार दिनों तक में राहुल से दूर ही रही. वह बार-बार मेरे करीब आना चाहता. उसने मुझसे फिर से रात में सोने की गुजारिश की पर मैने टाल दिया.मैं जानती थी की राहुल का पुरुषत्व अब जाग चुका है मेरे और करीब जाने से संभोग का खतरा हो सकता है.

इसी दौरान सुमन के कॉलेज में छुट्टियां थीं. वो घर आयी हुयी थी. राहुल और सुमन के बीच में नजदीकियां बढ़ रहीं थीं. वह दोनों एक दूसरे से खुलकर बातें करते बाहर घूमने जाते और खुशी-खुशी वापस आते. ऐसा लग रहा था जैसे सुमन और राहुल करीब आ चुके थे.

मैंने अपने कामुक प्रसंग को यहीं रोकना उचित समझा. मैने मदन भैया से सब कुछ खुलकर बता दिया. वह अत्यंत खुश हो गए उन्होंने मुझे अपनी गोद में उठा लिया ठीक उसी प्रकार जैसे वह मेरे विवाह से पूर्व मुझे उठाया करते थे आज उनकी बाहों में मुझे फिर से उत्तेजना महसूस हुई थी. वह बहुत खुश दिखाई पड़ रहे थे. उन्होंने कहा

" मानसी, लगता है दिव्यपुरुष की बात के अनुसार राहुल ही वह व्यक्ति है जिसके साथ संभोग करते समय तुम्हारी योनि को एक कुंवारी योनि की तरह बर्ताव करना है? क्या सच में तुममें कुंवारी कन्या की तरह उत्तेजना जागृत हो रही है?"

मदन भैया द्वारा याद दिलाई गई बातें सच थीं. जब से मैंने राहुल के साथ कामुक क्रियाकलाप शुरू किए थे मेरे स्तनों की कठोरता और मेरी योनि की संवेदना में अद्भुत वृद्धि हुयी थी. मेरी यह योनि पिछले कई वर्षों से मदन भैया और अपने पति के राजकुमार(लिंग) से अद्भुत प्रेम युद्ध करने के पश्चात स्खलित होती थी पर उस दिन वह राहुल की जांघों से रगड़ खा कर ही स्खलित हो गई थी. यह आश्चर्यजनक और अद्भुत था.

क्या सच में मुझे राहुल से संभोग करना था? क्या उससे संभोग करते समय मुझे कौमार्य भंग होने का सुख और दुख दोनों मिलना बाकी था?. क्या उसके पश्चात मेरी योनि एक नवयौवना की तरह बन जाएगी? यह सारी बातें मेरे दिमाग में घूम रही थीं.

मदन भैया भी शायद वही याद कर रहे थे. इन बातों के दौरान मैंने मदन भैया के राजकुमार में तनाव महसूस किया. मेरी हथेलियों का स्पर्श पाते ही वह पूर्ण रुप से तनाव में आ चुका था. नियत अद्भुत ताना-बाना बुन रही थी.

बाहर दरवाजे की घंटी सुनकर हम दोनों अलग हुए. सुमन घर आ चुकी थी. प्रकृति ने हम चारों के बीच एक अजीब सी स्थिति पैदा कर दी थी.

दोपहर में चंडीगढ़ से फोन आया. मेरी सास की तबियत खराब हो गयी थी. मुझे कल ही चंडीगढ़ वापस जाना था.

यह सुनते ही सभी दुखी हो गये. राहुल के चेहरे पर उदासी स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी वह मेरे चंडीगढ़ जाने की खबर से दुखी था. खाना खाने के पश्चात वह मेरे पास आया और आंखों में आंसू लिए हुए बोला

"बुआ मुझे आज अच्छा नहीं लग रहा है क्या मेरी खुशी के लिए आज तुम मेरे पास सो सकती हो?"

उसके आग्रह में वात्सल्य रस था या कामरस यह कहना कठिन था. सुमन घर पर ही थी. सामान्यतः मैं और सुमन एक ही कमरे में सोते थे सुमन की उपस्थिति में उसे छोड़कर राहुल के कमरे में जाना कठिन था.

मैंने टालने के लिए कह दिया

"ठीक है, कोशिश करुंगी"

रात में सुमन मेरे पास सोयी हुई थी. वह खोयी खोयी थी. मैंने उससे पूछा

"तू आज कल खोयी खोयी रहती है क्या बात है?" सुमन के पिता की मृत्यु के बाद मैं और सुमन एक दूसरे के साथी बन गए थे वह मुझसे अपनी बातें खुलकर बताती थी.

"कुछ नहीं माँ"

"बता ना, इसका कारण राहुल है ना?"

वह मुझसे लिपट गयी. उसके चेहरे पर आयी शर्म की लाली ने उसकी मनोस्थिति स्पष्ट कर दी थी. उसने अपना चेहरा मेरे स्तनों में छुपा लिया.

अगली सुबह मेरे जाने का वक्त आ चुका था. मदन भैया मेरा सामान लेकर दरवाजे पर बाहर खड़े थे सुमन और राहुल मेरे पास आए उन दोनों ने मेरे चरण छुए यह एक संयोग था या प्रकृति की लीला दोनों ने मेरे पैर एक साथ छूये. मैंने आशीर्वाद दिया

"दोनों हमेशा खुश रहना और एक दूसरे का ख्याल रखना"

मदन भैया यह दृश्य देख रहे थे.

कुछ देर में उनकी कार एयरपोर्ट की तरफ सरपट दौड़ रही थी. वह मुझसे कुछ पूछना चाहते थे पर असमंजस में थे. मैं बेंगलुरु शहर को निहार रही थी. इस शहर से मेरी कई यादें जुड़ी थी. मैंने इसी शहर में अपना कौमार्य खोया था और कल रात फिर एक बार ….. टायरों के चीखने से मेरी तंद्रा टूटी एयरपोर्ट आ चुका था. मैं मदन भैया की आंखों में देख रही थी उनकी आंखों में अभी भी प्रश्न कायम था. मैंने उनके चरण छुए और एयरपोर्ट के अंदर दाखिल हो गई.

"मैं मदन"

मानसी जा चुकी थी मेरी आंखों में आंसू थे. पिछले कुछ महीनों में मुझे मानसी की आदत पड़ चुकी थी. मानसी ने राहुल में पृरुषत्व जगाने की जो कोशिश की थी वह सराहनीय थी.

ट्रैफिक कम होने के कारण मैं घर जल्दी पहुंच गया. दरवाजे पर पहुंचते ही मुझे सुमन की आवाज आई

"राहुल भैया कपड़े पहन लेने दीजिए फूफा जी आते ही होंगे"

"बस एक बार और दिखा दो राहुल की आवाज आई"

"बाकी रात में" सुमन ने हंसते हुए कहा.

उन दोनों की हंसी ठिठोली की आवाज साफ-साफ सुनाई दे रही थी. मैंने घंटी बजा कर उनकी रासलीला पर विराम लगा दिया था. मुझे इस बात की खुसी थी कि राहुल किसी लड़की से अंतरंग हो रहा था. मानसी को मैं दिल से याद कर रहा था.

तभी मोबाइल पर मानसी का मैसेज आया.

(मैं मानसी)

उस रात सुमन का मन पढ़ने के बाद मैंने राहुल को सुमन के लिए मन ही मन स्वीकार कर लिया. मेरे मन मे प्रश्न अभी भी कायम था क्या राहुल सुमन को वैवाहिक सुख देने में सक्षम था? मेरे लिए यह जानना आवश्यक था.

उस रात मैंने साड़ी और ब्लाउज पहना था उत्तेजक नाइटी पहनने का कोई औचित्य नहीं था सुमन घर पर ही थी. उसके सोने के बाद मैं मन में दुविधा लिए राहुल के पास आ गई. मैने कमरे की बत्ती बुझा दी.

बिस्तर पर लेटते ही राहुल ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया और रूवासे स्वर में बोला

"बुआ आपने मेरे लिए क्या किया है आपको नहीं पता , आपने अपने स्पर्श से मुझ में उत्तेजना भर दी है.आपके स्पर्श में जादू है. उस दिन मेरा लिंग आपके हाथों पहली बार स्खलित हुआ था. मेरे लिए आप साक्षात देवी हैं जिन्होंने मुझमें विपरीत लिंग के प्रति उत्तेजना दी है." मैं उसकी बातों से खुश हो रही थी उधर उसकी हथेलियां मेरे स्तनों पर घूम रही थीं. मेरे स्तनों की कठोरता चरम पर थी और मुझे किशोरावस्था की याद दिला रही थी. उसके स्पर्श से मेरे शरीर मे सिहरन हो रही थी.

धीरे धीरे मेरी साड़ी मेरे शरीर से अलग होती गयी. वह मुझे प्यार करता रहा और मेरे प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करता रहा. जब भी मैं कुछ बोलने की कोशिश करती वह मेरे होठों को चूमने लगता. वह अपने क्रियाकलाप में कोई विघ्न नहीं चाहता था.

कुछ ही देर में मैं बिस्तर पर पूरी तरह नग्न थी. उसने अपने कपड़े कब उतार लिए यह मैं महसूस भी नहीं कर पायी मैं स्वयं इस अद्भुत उत्तेजना के आधीन थी. उसके आलिंगन में आने पर मुझे उसके लिंग का एहसास अपनी जांघों के बीच हुआ. लिंग पूरी तरह तना हुआ था और संभोग के लिए आतुर था.

हमारा प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर था. मेरे स्तनों पर उसकी हथेलियों के स्पर्श ने मेरी रानी को स्खलन के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था. मुझसे भी अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था. धीरे-धीरे राहुल मेरी जांघों के बीच आता गया उसके लिंग का स्पर्श अपनी योनि पर पाते ही मैं सिहर गयी…

मैंने कहा…

"क्या तुम सुमन से प्यार करते हो?"

"हां बुआ, बहुत ज्यादा"

"फिर यह क्या है?"मैंने उसे चूमते हुए कहा

"आपने मुझे इस लायक बनाया है कि मैं सुमन से प्यार कर सकूं. मैं अपने से प्यार से न्याय कर पाऊंगा या नही इस प्रश्न का उत्तर इस मिलन के बाद शायद आप ही दे सकतीं हैं"

राहुल भी मदन भैया की तरह बातों का धनी था. मैं उसकी बातों से मंत्रमुग्ध हो गई. जैसे-जैसे मेरे होंठ उसे चूमते गए उसका राजकुमार मेरी योनि में प्रवेश करता गया एक बार फिर मेरे चेहरे पर दर्द के भाव आये पर राहुल मुझे प्यार से सहलाता रहा राहुल का लिंग मेरे गर्भाशय को चूमता हुआ अपने कद और क्षमता का एहसास करा रहा था. मैं तृप्त थी. उसके कमर की गति बढ़ती गयी मुझे मदन भैया के साथ किए पहले सम्भोग की याद आ रही थी. राहल के इस अद्भुत प्यार से मेरी रानी जो आज राजकुमारी (कुवांरी योनि) की तरह वर्ताव कर रही थी शीघ्र ही स्खलित हो गयी.

राहुल कुछ देर के लिए शांत हो गया. मैं उसे चूम रही थी. मैंने कहा...

"मुझे एक वचन दो"

"बुआ मैं आपका ही हूँ आप जो चाहे मुझसे मांग सकती है"

"मैं तुम्हे सुमन के लिए स्वीकार करती हूँ. मुझे विश्वास है तुम सुमन का ख्याल रखोगे. तुम दोनों एक दूसरे को जी भर कर प्यार करो पर मुझे वचन दो कि तुम सुमन के साथ प्रथम सम्भोग विवाह के पश्चात ही करोगे"

"और आपके साथ" उसके चेहरे पर कामुक मुस्कान थी.

"मैं मुस्कुरा दी" मेरी मुस्कुराहट ने उसे साहस दे दिया वह एक बार फिर सम्भोग रत हो गया कुछ ही देर में हम दोनो स्खलित हो रहे थे. राहुल ने अपने वीर्य से मुझे भिगो दिया मैं बेसुध होकर हांफ रही थी.

तभी मधुर आवाज में अनाउंसमेंट हुई..

"फाइनल कॉल टू चंडीगढ़" मैं अपनी कल रात की यादों से बाहर आ गयी. मैने अपना सामान उठाया और बोर्डिंग के लिए चल पड़ी. जाते समय मैंने मदन भैया को मैसेज किया

"आपकी मानसी ने उस दिव्यपुरुष की भविष्यवाणी को सच कर दिया है. यह सम्भोग एक बार फिर एक कामकला के पारिखी के साथ हुआ है. मैं उसे अपने दामाद के रूप में स्वीकार कर चुकी हूँ आशा है आप भी इस रिश्ते से खुश होंगे."

मैं अपनी भावनायें तथा जांघो के बीच रिस रहे प्रेमरस को महसूस करते हुए चंडीगढ के लिए उड़ चली.

चंडीगढ़ उतरकर मैने मदन भैया का मैसेज पढ़ा...

"मानसी तुम अद्भुत हो मैं तुम्हें अपनी समधन के रूप में स्वीकार करता हूं उम्मीद करता हूँ कि हम जीवन भर साथ रहेंगे. अब तो तुम्हारी जिम्मेदारियां भी खत्म हो गयी है अब हमेशा के लिए बैंगलोर आ जाओ तुम्हारी प्रतीक्षा में…."

मैं मन ही मन मुस्कुरा रही थी. मेरी सास स्वर्गसिधार चुकी थीं। अब चंडीगढ़ में मेरी सिर्फ यादें बचीं थी जिन्हें संजोये हुए कुछ दिनों बाद मैं बेंगलुरु आ गई. मेरे आने के बाद सुमन हॉस्टल से मदन भैया के घर में आ गई. राहुल और सुमन हम दोनों की प्रतिमूर्ति थे उनका अद्भुत प्रेम हमारी नजरों के नीचे परवान चढ़ रहा था. उनके प्रेम को देखकर मैं और मदन भैया एक बार फिर एक दूसरे के करीब आ गए थे. राहुल से संभोग के उपरांत मेरी योनि और उत्तेजना नवयौवनाओं की तरह हो चुकी थी. मदन भैया के साथ मेरी राते रंगीन हो गई वह आज भी उतने ही कामुक थे.

हमारे रिश्ते बदल चुके थे. हम सभी अपनी अपनी मर्यादाओं में रहते हुए अपने साथीयों के साथ जीवन के सुख भोगने लगे.

समाप्त
 
स्वागत है।

आपके विचार अच्छे हैं आपको पूर्ण कहानी पसंद है पर शायद आप यह अनुमान नहीं लग पा रहे हैं कि यह कहानी अभी कई वर्षों तक चलेगी।

मुझे एक बात बताइए यदि यह कहानी किसी बुक स्टाल पर उपलब्ध होती तो तो क्या आप इसके लिए अपनी जेब ढीली करते?

मुझे लगता है नहीं.. फिर इसे एक बार में लिखकर पोस्ट करना कितना उचित होगा।

यह कहानी एक धारावाहिक के रूप में है जो तारक मेहता के उल्टा चश्मा जैसी आगे बढ़ती रहेगी यह कब खत्म होगी लिखने वाले को पता है पढ़ने वाले को जब तक आनंद आता है जुड़े रहिए

हां अपने विचार जरूर रखते रहिए ताकि आपको गड्ढे दिखाई ही ना पड़े।।

कहानी के पटल पर आने के लिए धन्यवाद जुड़े रहिए
 
भाग 136

“क्या है इसमें” सोनी ने कौतूहल वश पूछा और उसके हाथों से वह पैकेट छीनने का प्रयास करने लगी



“तुम्हारी खुशियों का पिटारा” विकास अब भी उसे वह पैकेट नहीं दे रहा था। सोनी अपने हाथ बढ़ाकर उसे पैकेट को पकड़ने का प्रयास करती और विकास उसकी अधीरता को और बढ़ा जाता। बीच-बीच में वह उसे चूमने की कोशिश करता पर सोनी का सारा ध्यान उसे पैकेट पर अटका था।

आखीरकार सोनी ने वह पैकेट विकास के हाथों से छीन लिया…

सोनी के गुस्से से विकास की तरफ देखा…



ये क्या है?

अब आगे..

सोनी ने जीवन में पहली बार सीडी देखी थी। वो उस सीडी को हाथ में लेकर उसे समझने का प्रयास करने लगी.. अपने काम की चीज ना समझ कर उसने गुस्से से बोला

“हट ..यह क्या चीज है?”

विकास ने सोनी को अपने आगोश में ले लिया और उसके होठों को चूमते हुए बोला इंतजार करो बिस्तर पर बताऊंगा।

सोनी के मन में कौतूहल अब भी था परंतु उसने इंतजार करना ही उचित समझा। दोनों पति-पत्नी ने साथ में खाना खाया। खाना खाते समय विकास ने सोनी को भी आज वाइन ऑफर की जिसे सोनी ने पीया तो नहीं पर अपने होठों से उसे चख अवश्य लिया…उसे उसका स्वाद तो पसंद नहीं आया पर उसके असर के बारे में वह बखूबी जानती थी।

कुछ ही देर बाद विकास और सोनी अपने प्रेम अखाड़े में पूरी तैयारी के साथ उतर चुके थे। अब एक दूसरे के कपड़े उतारने में देर नहीं होती थी। विकास सोनी को अपनी बाहों में लिए चूम चाट रहा था सोनी की नंगी चूचियां विकास के सीने से रगड़ खा रही थी। दरअसल विकास स्वयं अपने सीने से उसकी चूचियों को मसल रहा था।

सोनी का दिमाग अब भी उस सीडी पर अटका हुआ था उसने विकास के होठों को चूमते हुए बोला

“अरे अब बताइए ना आप उसे समय क्या लाए थे… ?”

विकास ने और देर ना कि वह सीडी पहले ही सीडी प्लेयर में लगा चुका था आखिरकार उसने रिमोट का बटन दबा दिया और टीवी पर फिल्म दिखाई पड़ने लगी..

टीवी पर दो युवा आकर अंग्रेजी में कुछ बातें कर रहे थे सोनी बेहद ध्यान से उनकी बातें समझने का प्रयास कर रही थी पर अब भी उसे फिल्मों की अंग्रेजी समझने में कष्ट होता था…

“यह कौन सी पिक्चर है? “

सोनी ने अपना ध्यान टीवी पर लगाए लगाए विकास से पूछा?

विकास ने अपनी हथेलियां से सोनी की चूची मीसते हुए कहा

“मेरी जान बस देखते जाओ”

कुछ ही देर में उस फिल्म का सार सोनी को समझ में आने लगा । दो-तीन मिनट बाद ही वह दोनों युवा पूरी तरह नग्न हो चुके थे और एक दूसरे को चूम चाट रहे थे। सोनी ने एक झलक विकास की तरफ देखा और फिर पूछा








“यही ब्लू फिल्म है क्या?”

“अरे तुम्हें कैसे पता? तुमने कब देखा” विकास को अचानक सोनी पर शक हुआ उसे यह कतई यकीन नहीं था कि सोनी ब्लू फिल्मों के बारे में जानती होगी और उसने पहले कभी इसे देखा होगा।

सोनी ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा और बोला

“ मैं कहां देखूंगी? बनारस में मिलती है क्या? पर हां अपनी सहेलियों से इसके बारे में सुना जरूर था”

सोनी के एक ही उत्तर ने विकास के सारे प्रश्नों का उत्तर दे दिया बनारस में उस समय ऐसे ब्लू फिल्मों की सीडी की उपलब्धता नहीं थी और यदि थी भी तो वह सामान्य जनमानस की पहुंच से बहुत दूर थी।

सोनी उस युवक के लंड पर अपनी नज़रें गड़ाए हुए थी। जो निश्चित ही विकास के लंड से कम से कम डेढ़ गुना होगा। जब लंड के आकार का ध्यान आया तो एक बार फिर सोनी के दिमाग में सरयू सिंह का मजबूत लंड घूम गया जो निश्चित है इस फिल्म स्टार के लंड से काफी बड़ा और सुदृढ़ था।






सोनी टकटकी लगाकर उसे लंड को देख रही थी जिसे उस फिल्म की नायिका अब अपने होठों से चूम रही थी और कुछ ही देर में हुआ लंड उसके गले तक अंदर धंसता चला गया। लड़के ने उसे लड़की के बाल पकड़ रखे थे और अपने लंड को उसके मुंह में जबरदस्ती घुसारहा था। लड़की के गले से गला चोक होने की आवाज निकल रही थी। अचानक वह लंड उसके मुंह से पूरी तरह बाहर आ गया। लंड लार से डूबा हुआ था और वह लार उसके लंड से नीचे टपक रही थी।

सोनी मन ही मन सोचने लगी…क्या कोई लंड को इतना अंदर तक मुंह में ले सकता है?

सोनी गर्म होने लगी थी. आत्मविश्वास से लबरेज सोनी मानती थी कि दुनिया में कोई भी चीज नामुमकिन नहीं। विकास उसके बालों को सहला रहा था उसके मन में भी शायद मुखमैथुन की चाहत थी और वह भी टीवी की तरफ लगातार देख रहा था। उसने शायद सोनी से यह मांग पहले भी रखी हुई थी पर शायद वह सफल नहीं हो पाया था। आज आखिरकार सोनी ने उसे खुश करने का फैसला किया और कुछ ही देर में वह बिस्तर पर नीचे सरकती चली गई और आखिरकार विकास का लंड अपने मुंह में भरने की कोशिश की और कामयाब भी रही।






कारण स्पष्ट था विकास को भगवान ने शायद पैसे रुतबे में कमी ना की थी पर न जाने क्यों उसका हथियार छोटा ही रखा था। यद्यपि वह अपने हथियार और कामुक कार्यकलापों से सोनी को चरम सुख देकर स्खलित करने में लगातार कामयाब रहा था।

परंतु सोनी का क्या उसने जब से मर्सिडीज़ गाड़ी देखी थी रह रहकर उसे उसे पर बैठने और उसका आनंद लेने की कसक सी उठती थी… विकाश ने सोनी को अपनी तरफ खींचा एक बार फिर सोनी और विकास का संभोग प्रारंभ हो गया।

कुछ ही देर में सोनी घोड़ी बन गई और और उसका घुड़सवार उस पर सवारी कर अपनी कमर हिलाने लगा सोनी की आंखें अब भी टीवी पर चल रही फिल्म पर थी। जहां लगभग यही दृश्य चल रहा था। सोनी की निगाहें नायिका की बुर में धंसते और बाहर निकलते लंड पर टिकी हुई थी जो पल भर के लिए बाहर आता और फिर वापस उसी रफ्तार से उस गहरी गुफा में गायब हो जाता। वह अपनी कल्पना में सरयू सिंह के लंड को अपनी बुर के अंदर धंसते हुए महसूस कर रही थी और यह अंदाज लगा रही थी कि वह उसकी गहरी चूत में कितना अंदर जा सकता है। परंतु इस अनुभव को सिर्फ सोचकर प्राप्त करना बेहद कठिन था..

विकास लगातार मेहनत कर रहा था और सोनी अपने दिमाग में उस काल्पनिक लैंड से चुद रही थी जिसने उसकी नींद हराम कर रखी थी। आखिरकार सोनी अपना स्खलन पूर्ण करने में कामयाब रही। इसका श्रेय जितना विकास को था शायद उतना ही सरयू सिंह के उसे दिव्य और अनोखे लंड को भी।

दोनों निहाल होकर बिस्तर पर लेट गए वीर्य सोनी की जांघों से बहता हुआ बिस्तर पर आ रहा था। परंतु सोनी अपने ख्वाबों में डूबी हुई अपनी आंखें बंद की हुई थी।

विकास उसे प्यार से चूम रहा था आखिर में विकास ने उसे चूमते हुए कहा

“कैसा लगा मजा आया ना? “

सोनी क्या कहती सच में इस फिल्म ने उसे सेक्स का एक नया आयाम दे दिया था । जैसे ही फिल्म खत्म हुई दूसरी फिल्म शुरू हो गई इससे पहले की विकास रिमोट से उसे बंद कर पाता सोनी ने उसका हांथ पकड़ लिया।

दूसरी फिल्म का नायक एक नीग्रो था और वह पूरी तरह नग्न अपने सोफे पर बैठा अपने लंड को हिला रहा था।

उस नीग्रो के लैंड को देखकर सोनी की आंखें फटी की फटी रह गई… उसने अपनी आंखें टीवी से नहीं हटाई पर विकास से कहा

“रुक जाओ 5 मिनट… यह क्या है? विकास सोनी की उत्सुकता समझ रहा था उसने फिल्म बंद न की और सोनी को समझाते हुए बोला

“ यह नीग्रो प्रजाति के लोग हैं अमेरिका में भी पाए जाते इनका हथियार जरूरत से ज्यादा बड़ा होता है और ये इसके लिए ही प्रसिद्ध है। “

सोनी की आंखें लगातार टीवी पर टिकी हुई थी वह विकास की बातें सुन तो रही थी पर अब जब दृश्य आंखों के सामने थे किसी व्याख्या की जरूरत नहीं थी।

नीग्रो के लंड का आकार लगभग सरयू सिंह के जैसा ही था। सोनी खुश थी और उस लंड को देख रही थी। विकास सोनी को अपने आगोश में लेकर उसे प्यार करना चाहता परंतु सोनी को शायद इसमें कम आनंद आ रहा था और फिल्म में ज्यादा

जिस उत्सुकता से सोनी फिल्म में उसे नीग्रो के लैंड को देख रही थी विकास आश्चर्यचकित था उसने सोनी को छेड़ते हुए कहा

“अरे मेरी चुलबुली सोनी उतना बड़ा लंड देखकर तुम्हें डर नहीं लगता?”

“डर क्यों लगेगा कौन सा टीवी से निकल कर बाहर आ जाएगा” विकास और सोने दोनों हंसने लगे…

सोनी का ध्यान हटते देख विकास ने तुरंत ही टीवी बंद कर दिया और अपनी सोनी को वापस चूमने चाटने लगा सोनी भी उसके आगोश में आकर नींद की आगोश में जाने लगी अब उसके दिमाग में सरयू सिंह के लंड के साथ-साथ उसे नीग्रो का दिव्य लैंड भी घूमने लगा…

सोनी की कामुकता एक नए रूप में जागृत हो रही थी….

कामुकता मनुष्य में स्वाभाविक रूप से होती है परंतु जब जब कामुकता को जागृत करने के लिए ब्लू फिल्म और अन्य अप्राकृतिक गतिविधियों का सहारा लिया जाता है तो इनका स्पष्ट असर तो दिखाई पड़ता है परंतु यह निरंतर कायम नहीं रह सकता।

मुखमैथुन भी अब दोनों के बीच आम को चला था कभी-कभी तो दोनों मुख मैथुन में ही स्खलित हो जाते और संभोग की नौबत भी नहीं आती ।शायद विकास के अंडकोषों में इतना दम ना था कि वह सोनी को लगातार दो बार चोद सकता। सोनी का क्या था उसे तो सिर्फ अपनी जांघें फैलानी थी और एक के बाद एक चुदाने का आनंद लेना था।

धीरे-धीरे विकास और सोनी अपने सेक्स लाइफ का बेहतरीन समय एक दूसरे के साथ आनंद लेते हुए व्यतीत करने लगे। ब्लू फिल्में भी उनके बेडरूम का हिस्सा बन चुकी थी।

विकास हमेशा यह बात नोट करता था कि जब जब वह नीग्रो का लंड देखती थी उसे और कुछ न सूझता था और कुछ पलों के लिए उसकी वासना एकाग्रचित हो जाती और सोनी की सारी गतिविधियां रुक जाती थी।

जब वह नीग्रो अपना लैंड किसी को भी लकड़ी की चूत में डालकर हिला रहा होता सोनी के बदन में एक गजब सी गंनगानाहट स होती उसकी शरीर और हाथों के रोए खड़े हो जाते। आखिरकार विकास में सोनी को अपनी बाहों में लिए हुए एक बार पूछ ही लिया

“ तुम्हें इस नीग्रो का लंड अच्छा लगता है क्या? “

“ आप ऐसा क्यों पूछ रहे है? पर क्या सच में वह इतना बड़ा होता होगा?

“ हा तो क्या वह झूठ थोड़े दिखाएगा?”

“ हो सकता है कैमरे का कमांल हो”

“हो सकता है ..पर फिर भी इतना बड़ा तो होगा ही”

विकास ने अपनी हथेली फैला कर दिखाया…

“सोनी ने अपनी पलके बंद करते हुए कहा दुनिया में कैसे-कैसे लोग हैं पता नहीं उस लड़की का क्या होता होगा “

विकास न जाने अपने मन में क्या-क्या सोचने लगा। क्या सोनी के दिमाग में किसी पर पुरुष वो भी नीग्रो से चुदवाने की इच्छा है…क्या सोनी यह सोच सकती है…. हे भगवान क्या सोनी सचमुच ऐसी है..

विकास अब तक जितना सोनी को जानता था उससे सोनी का यह रूप बिल्कुल अलग था..

विकास ने मुस्कुराते हुए कहा

“ देखनहीं रही थी कितना मजा ले रही थी”

सोनी ने फिर अपनी आंखें खोली और बोली

“पर इतना अंदर जाता कैसे होगा”

“अरे तुम्हें याद है जब पहली बार तुम्हारी मुनिया ने इस छोटू को लिया था तुम कैसे चीख पड़ी थी “ विकास सोनी की बुर को शुरुआत में मुनिया कहां करता था।

सोनी अपनी गर्दन झुका कर मुस्कुराने लगी

“पर अब कितनी आसानी से इसे घोंट लेती हो । वैसे ही यह कुदरत ने जांघों के बीच जादुई गुफा बनाई है जिससे एक बच्चा बाहर आ जाता है तो फिर यह नीग्रो की क्या बिसात न जाने वह अपने अंदर क्या-क्या लील सकती है “

धीरे धीरे विकास यह बात नोटिस कर रहा था कि जब-जब वह और सोनी एक दूसरे के आलिंगन में संभोग सुख ले रहे होते या ले चुके होते कभी ना कभी एक बार उस नीग्रो और उसके जादुई लंड का जिक्र जरूर होता।

सोनी उन बातों में पूरी तरह न सिर्फ शरीक होती बल्कि विकास को और भी बातें करने को उत्साहित करती…

कुछ महीनो में ही विकास और सोनी की सेक्स लाइफ मैं ब्लू फिल्मों का योगदान कम होता गया और अब विकास सोनी के मन में वासना जगाए रखने के लिए अन्य उपायों के बारे में सोचने लगा..

नियति सोनी और सुगना को और उनकी कामुकता को देख रही थी और उनकी तुलना कर रही थी। एक ओर सोनी जहां वासना को जागृत करने के लिए तरह-तरह के उपाय खोजती दूसरी तरफ सुगना स्वाभाविक रूप से अब तक कामुकता का आनंद ले रही थी।

अब जब सुगना का जिक्र आ ही गया है तो लिए आपको फिर बनारस लिए चलते हैं जहां सोनी के विवाह के बाद गहमागहमी खत्म हो चुकी थी और सुगना का घर वापस सामान्य स्थिति में आ चुका था।

सोनू और लाली ने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन दे दिया था और अब एक महीने पश्चात उनका विवाह तय हो गया था। ऐसा लग ही नहीं रहा था जैसे कोई नई चीज होने जा रही हो सब कुछ सामान्य जैसा ही था । सुगना के परिवार ने यह पहले ही तय कर लिया था कि विवाह मे ज्यादा टीम टॉम नहीं किया जाएगा।

सोनू और लाली रिश्ते में अवश्य बधने जा रहे थे परंतु उन दोनों में जितनी आत्मीयता पहले थी अब उससे और बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं थी। लाली वैसे भी पूरी तरह से सोनू के लिए समर्पित थी और यह तो सोनू के ऊपर था कि वह उसे कितना आसक्त होता।

सोनू के लाली से विवाह का मुख्य कारण थी सुगना। सोनू के जीवन में जो भूचाल सुगना ने लाया था उसे अब सुगना को ही संभालना था। अन्यथा सोनू जैसे काबिल और हर तरीके से सक्षम युवा के लिए न जाने कितनी कमसिन और अति खूबसूरत लड़कियां लाइन लगाए खड़ी होती परंतु सोनू अपनी बड़ी बहन सुगना की बात नहीं टाल पाया। कारण स्पष्ट था सोनू को सिर्फ और सिर्फ सुगना चाहिए थी वह भी किसी कीमत पर। वह लाली और उसके परिवार को अपना तो पहले ही मान चुका था अब सुगना के कहने पर उसे कानूनी दर्जा देने को तैयार हो गया। उसे सुगना पर पूरा विश्वास था कि वह हमेशा उसका भला ही चाहेगी और उसकी खुशियों का ख्याल रखती रहेगी।

कुछ ही दिनों के जौनपुर प्रवास में उसने सोनू की जिंदगी में इतने रंग भर दिए थे कि उसे यह दुनिया बेहद खूबसूरत स्त्री लगने लगी थी। सोनू को सुगना हर रूप में प्यारी थी बड़ी बहन के रूप में भी, एक सखा रूप में भी , प्रेमिका के रूप में भी और वात्सल्य से ओतप्रोत एक मां के रूप में भी।

ऐसा प्रतीत होता था जैसे सोनू ने स्त्री को जिस जिस रूप में देखा था या अनुभव किया था सुगना हर रूप में आदर्श थी। जब वह सुगना के आसपास रहता उसके शरीर में एक अजब सी ताजगी रहती और सुगना के करीब आने की ललक। उसके पास आकर जैसे वह भूल जाता।

सोनू को भी यह बात बखूबी मालूम थी कि सुगना के पति रतन के अब वापस गृहस्थ जीवन में आने की कोई उम्मीद नहीं थी और आने वाला समय सुगना को भी अकेले ही व्यतीत करना था। निश्चित ही उसे सोनू की आवश्यकता थी और सोनू उसे पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाने को तैयार था अपितु यह कहा जाए कि वह निभा रहा था।

सोनू सुगना और लाली यह तीनो एक त्रिभुज की भांति एक दूसरे से जुड़े हुए थे और अब किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी पर सोनू और सुगना का कामुक रिश्ता लाली के संज्ञान में नहीं था और शायद इसकी जरूरत भी नहीं थी।

सुगना के साथ दीपावली की रात उस वांछित या अवांछित संभोग ने इन तीनों के बीच समीकरण कुछ समय के लिए गड़बड़ा दिया था और पूरे परिवार में तनाव का माहौल हो गया था। परंतु धीरे-धीरे अब सब कुछ सामान्य हो चला था अपितु और भी बेहतर स्थिति आ चुका था। सभी खुश थे और सबकी मनोकामनाएं पूर्ण हो चुकी थी या पूरी होने वालीं थी। परंतु एक बात सोनू को कमी हमेशा खलती थी वह थी लाली से संभोग के दौरान सुगना के बारे में होने वाली बातचीत।

सुगना के प्रति सोनू में उत्तेजना जागृत करने में लाली की भी अहम भूमिका थी परंतु जब से उसने सुगना को उस दीपावली की काली रात सोनू को उत्साहित कर सुगना को मुसीबत में डाला था उसे उसका अफसोस था। वह उसे क्षमा भी मांग चुकी थी और अब उसका नाम कामुक गतिविधियों के दौरान लेने से बचती थी। सोनू के उकसाने के बावजूद वह बेहद चतुराई से बच निकलती।

लाली और सोनू के विवाह के दिन अब करीब आ चुके थे। सुगना एक बार फिर बाजारों की खाक छानने लगी। लाली के लिए खूबसूरत लाल जोड़े की तलाश में न जाने कितनी वह कितनी दुकानें देखी और आखिरकार वह अपनी पसंद का लाल जोड़ा अपनी सहेली और अब होने वाली भाभी के लिए खरीद लाई।

उसने सोनू के लिए भी बेहद खूबसूरत शेरवानी खरीदी शेरवानी खरीदते समय उसकी आंखें नम थी। यदि ईश्वर ने दीपावली की वह काली रात उसके जीवन में न लाई होती तो निश्चित ही वह सोनू की शादी बेहद धूमधाम से करती पर उस काली रात ने उसके जीवन में ऐसा मोड ला दिया था जिससे वह सोनू की शादी धूमधाम से तो नहीं कर पाई पर पूरे परिवार की खुशियां कायम रखने में कामयाब रही थी।

पर अब उन बातों को भूल जाना ही बेहतर था। जब सोनू खुश था तो सुगना भी खुश थी। जब कभी सुगना सोनू के चेहरे पर मिलन का उत्साह और उससे बिछड़ते वक़्त आंखों में नमी देखती उसे नियति और अपने निर्णय पर अफसोस नहीं होता।

विवाह से कुछ दिन पूर्व सोनू सुगना के घर आया हुआ था। वह लाली के लिए एक सुंदर सा लहंगा और चोली खरीद कर लाया हुआ था। यह लहंगा और चोली आधुनिक युग के विवाह में आजकल पहना जा रहा था पर उसका रंग सुर्ख लाल नहीं था। सोनू जब यह जोड़ा खरीद तो रहा था लाली के लिए, पर उसके दिलों दिमाग में कोई और नहीं सिर्फ सुगना घूम रही थी। काश वह सुहाग का जोड़ा सुगना के लिए खरीद पाता….

लाली और सुगना दोनों सोनू द्वारा लाए गए लहंगे को देखकर खुश हो गए तभी सुगना ने कहा..

“अरे कितना सुंदर बा.. पर देख लाली सोनू आजे से बदल गइल “

“काहे का भइल?” सोनू ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा

“अपना बीवी खाती ले आईले और हमारा खातीर ? सुगना ने मुस्कुराते हुए शिकायती लहजे में कहा..

“तू बतावले ना रहलू तहरा का चाही …चल शाम के खरीद देब”

“ए सुगना तोरा ढेर पसंद बा त तेही ले ले …तोरा में ई गुलाबी रंग ठीक भी लागी..” सुगना को यह बात रास नहीं आ रही थी क्योंकि सोनू यह अपनी पसंद से अपनी होने वाली पत्नी लाली के लिए लाया था और इस तरह उसकी पसंद पर बीच में डाका डालना सुगना को कतई गवारा न था। उसने बात बदलते हुए कहा..

“अरे लाली खातिर त सुहाग की जोड़ा हम भी खरीद ले आइल बानी”

सोनू सुगना की तरफ देखने लगा और पूछा

“उ कैसन बा?”

“ए लाली तनी लेके आव और सोनू के दिखाओ त”

लाली झटपट अपने कमरे में गई और सुगना द्वारा खरीदा गया लाल जोड़ा ले आई।

सचमुच सुगना की पसंद बेहतरीन थी जितनी खूबसूरत सुगना थी उसके द्वारा खरीदा गया लाल जोड़ा उतना ही खूबसूरत था।

“अरे ई तो बहुत ही सुंदर बा कहां मिलल”

सोनू ने सुगना की तारीफ करते हुए कहा..

सोनू और लाली दोनों सुगना द्वारा ले गए सुहाग के जोड़े को ज्यादा पसंद कर रहे थे। आखिरकार सोनू ने अपना फैसला सुना दिया..

“लाली दीदी तू ई वाला ही पहनी ह”

सुगना ने सोनू के सर पर फिर एक बार मीठी सी चपत लगाई और बोला

“ते मनबे ना अभियो दीदी बोलत बाड़े”

सोनू बुरी तरह झेंप गया और अगले ही पल बोला

“ए लाली एक गिलास पानी पिलाईए ना” सोनू ने हिम्मत जुटाकर और हिंदी भाषा का प्रयोग कर लाली को आज नाम से संबोधित किया था और उम्र का अंतर मिटाने का प्रयास किया था पर फिर भी “ पिलाइए “ शब्द का प्रयोग कर अब भी उम्र के अन्तर को मिटा पाने में नाकामयाब रहा था।

“हां अब ठीक बा” सुगना ने आगे बढ़कर सोनू के माथे को चूम लिया।

सोनू ने देखा लाली किचन की तरफ जा चुकी है उसने देर ना की सुगना की भरी-भरी चूचियां जो सुगना के झुकने से उसकी निगाहों के सामने आ चुकी थी उसने बिना देर किए सुगना की चूचियों को अपने हाथों में ले लिया।

सुगना ने सोनू का माथा चूमने के बाद तुरंत ही अपने अधर नीचे किये और सोनू के होठों को चूम लिया और उठते हुए बोली…

“ तोर पसंद हमेशा अच्छा रहेला” अब तक लाली आ चुकी थी और उसने सुगना की बात सुन ली थी वह मन ही मन और भी प्रसन्न हो गई थी। उसे शायद यह भ्रम हो गया था कि यह बात सुगना ने उसके लिए कही है।

ग्लास का पानी खत्म कर सोनू ने लाली और सुगना से गुलाबी रंग के लहंगे को दिखाते हुए पूछा..

“अब इ का होई…”

लाली के चट से जवाब दिया..

“ये अब सुगना दीदी पहनेंगी..” लाली ने वह लहंगा अपने हाथों से उठा लिया और उसे सुगना की कमर से लगा कर सोनू को दिखाते हुए पूछा.

“ अच्छा लग रहा है ना?”

सोनू क्या बोलता …उस लहंगे में सुगना की कल्पना कर उसका लंड अब खड़ा हो चुका था।

“अच्छा है…दीदी में वैसे भी सब कुछ अच्छा लगता है”

सुगना मुस्कुरा उठी…और उसकी मुनिया भी..सोनू को अपना कर उसने गलत नहीं किया था।

सुगना सोनू की पसंद का लहंगा उसके विवाह में पहनने वाली थी…सोनू बहुत खुश था…और अब अपने विवाह का इंतजार बेसब्री से कर रहा था…

नियति मुस्कुरा रही थी…और मिलन के ताने बाने बुन रही थी।

शेष अगले भाग में..

 
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