Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 95 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 129

सुगना को जैसे ही एहसास हुआ कि सोनू उसकी गुदाज गांड़ को देख रहा है उसने अपने कूल्हे सिकोड़ लिए और झटके से उठ खड़ी हुई और थोड़ी तल्खी से बोली…




“अब बस अपन मर्यादा में रहा ज्यादा बेशर्म मत बन..”

सोनू सावधान हो गया परंतु उसने जो देखा था वह उसके दिलों दिमाग पर छप गया था…

सुगना अद्भुत थी अनोखी थी…और उसका हर अंग अनूठा था अलौकिक था। आधे घंटे का निर्धारित समय बीत चुका था..



सोनू और सुगना एक दूसरे के समक्ष पूरी तरह नग्न खड़े थे सोनू की निगाहें झुकी हुई थी वह सुगना के अगले निर्देश का इंतजार कर रहा था…

अब आगे…

इंतजार …इंतजार …. हर तरफ इंतजार…उधर बनारस में सोनी और लाली, सुगना और सोनू का इंतजार करते-करते थक चुके थे। रात के 11:00 रहे थे और अब उनका सब्र जवाब दे रहा था।

सोनी अपने कॉलेज का कार्य निपटाकर सोने की तैयारी में थी और लाली भी सोनू का इंतजार करते-करते अब थक कर सोने का मन बना चुकी थी। उसने अपनी सहेली और सोनू के लिए खाना बना कर रखा था परंतु ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे अब उनके आने की संभावना कम ही थी।

रात गहरा रही थी और उधर लखनऊ में सुगना अपने छोटे भाई सोनू की मनोकामना पूरी कर रही थी..जो अनोखी थी और निराली थी..

छोटा सोनू अब शैतान हो चुका था परंतु सुगना तब भी उसे बहुत प्यार करती थी और अब भी।

अगली सुबह पूरे परिवार के लिए निराली थी…

सोनू और सुगना के बीच बीती रात जो हुआ था वह अनूठा था…सोनू और सुगना ने आज मर्यादाओं की एक और सीमा लांघी थी जिसका असर सोनू के दाग पर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था और अब वह बरबस सब का ध्यान खींच रहा था..

सुबह जब सुगना गुसल खाने से बाहर आई सोनू दर्पण में अपने इस दाग को निहार रहा था।

सुगना को अपनी ओर देखते हुए जानकर सोनू ने कहा ..

“दीदी तु साच कहत बाडू…देख ना दाग कितना बढ़ गईल बा । “

सुगना ने भी महसूस किया दाग कल की तुलना में और बढ़ा हुआ था।

“देख सोनू तू जवन रात में हमारा साथ कईला ऊ वासना के अतिरेक रहे अपना मन पर लगाम लगवा और हमारा से कुछ दिन दूर ही रहा… हमारा लगता कि हमारा से दूर रहला पर तहर ई दाग धीरे-धीरे खत्म हो जाए।”

सुगना यह बात महसूस कर चुकी थी कि सोनू की गर्दन का दाग और सरयू सिंह के माथे के दाग में निश्चित ही कुछ समानता थी। जब-जब सरयू सिंह सुगना के साथ लगातार वासना के भंवर में गोते लगाते और उचित अनुचित कृत्य करते उनके माथे का दाग बढ़ता जाता।

यद्यपि सुगना की सोच का कोई पुष्ट आधार नहीं था परंतु दोनों दागों के जन्म उनके बढ़ने और कम होने में समानता अवश्य थी…

लगभग यही स्थिति सोनू की भी थी बीती रात उसने जो किया था नियति ने उसकी कामुकता और कृत्य का असर उसके गर्दन पर छोड़ दिया था नियति अपनी बहन के साथ किए गए कामुक क्रियाकलापों के प्रति सोनू को लगातार आगाह करना चाहती थी।

सोनू को इस बात का कतई यकीन नहीं हो रहा था कि इस दाग का संबंध किसी भी प्रकार से सुगना के साथ किए जा रहे संभोग से था। वैज्ञानिक युग का पढ़ा लिखा सोनू इस बात पे यकीन नहीं कर पा रहा था…

परंतु सोनू को इस बात का इलाज ढूंढना जरूरी था। इतने सम्मानित पद पर उसका कई लोगों से रोज मिलना जुलना होता था निश्चित ही यह दाग आम लोगों की नजर में आता और सोनू को बेवजह लोगों से ज्ञान लेना पड़ता या अपनी सफाई देनी पड़ती।

दाग हमेशा दाग होता है वह आपके व्यक्तित्व में एक कालिख की तरह होता है जिसे कोई भी व्यक्ति स्वीकार नहीं कर सकता सोनू के लिए दाग अब तनाव का कारण बन रहा था।

सुगना ने सोनू को अपने दाग पर क्रीम लगाकर रखने की सलाह दी और उसे इस बात को लाली से और सभी से छुपाने के लिए कहा विशेष कर यह बात कि इस दाग का असर कही न कहीं सुगना के साथ कामुक संबंधों से है।

“ ते लाली से नसबंदी और पिछला सप्ताह हमनी के बीच भइल ई कुल के बारे में कभी बात मत करिहे “

सोनू ने मुस्कुराते हुए सुगना की तरफ देखा और उसे छेड़ता हुए बोला..

“हम त बतायब हमरा सुगना दीदी कामदेवी हई….”

सुगना प्यार से सोनू की तरफ उसे मारने के लिए आगे बढ़ी पर सोनू ने उसे अपने आलिंगन में भर लिया।

सोनू खुद भी यह बात सुगना से कहना चाह रहा था। भाई बहन इस राज को राज रखने में अपनी सहमति दे चुके थे यही उचित था परंतु इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपाते यह बात शायद सोनू और सुगना भूल चुके थे।

कुछ ही देर बाद सोनू सुगना और दोनों बच्चे बनारस के लिए निकल चुके थे छोटा सूरज भी अपने मामा के गर्दन पर लगे दाग को देखकर बोला

“ मामा ये चोट कैसे लग गया है…”

सोनू किस मुंह से बोलता कि यह उसकी मां को कसकर चोदने के करने के कारण हुआ है..सोनू मन ही मन मुस्कुराने लगा था। सुगना स्वयं सूरज के प्रश्न पर अपनी मुस्कुराहट नहीं रोक पा रही थी।

सोनू ने सूरज के प्रश्न का उत्तर न दिया अपितु आइसक्रीम के लिए पूछ कर उसका ध्यान भटका दिया।

सोनू और सुगना सपरिवार हंसते खेलते बनारस की सीमा में प्रवेश कर चुके थे और कुछ ही देर बाद उनकी गाड़ी सुगना के घर पर खड़ी थी। लाली की खुशी का ठिकाना न था वह भाग कर बाहर आई और अपनी सहेली सुगना के गले लग गई। आज भी वह सुगना से बेहद लगाव रखती थी। सोनू ने आगे बढ़कर गाड़ी से सारा सामान निकाला और घर के अंदर पहुंचा दिया। सोनू ने एक बार फिर लाली के चरण छूने की कोशिश की परंतु लाली ने सोनू को रोक लिया और स्वयं उसके आलिंगन में आ गई यह आलिंगन भाई-बहन के आलिंगन के समान भी था और अलग भी।

आलिंगन से अलग होते हुए लाली सोनू के सुंदर मुखड़े को निहार रही थी तभी उसका ध्यान सोनू के गर्दन के दाग पर चला गया

“अरे तोहरा गर्दन पर ही दाग कैसे हो गइल बा ?”

जिसका डर था वही हुआ। सोनू के उत्तर देने से पहले ही सुगना बोल पड़ी

“अरे कुछ कीड़ा काट देले बा दु चार दिन में ठीक हो जाए”

लाली अपने पंजों के ऊपर खड़ी होकर सोनू के गर्दन के दाग को और ध्यान से देखने लगी…

“ सुगना… ऐसा ही दाग सरयू चाचा के माथा पर भी रहत रहे.. हम तो दो-तीन साल तक उनका माथा पर ई दाग देखत रहनी कभी दाग बढ़ जाए कभी कम हो जाए ..कोनो बीमारी ता ना ह ई ?”

“हट पागल देखिए दो-चार दिन में ठीक हो जाए। चल कुछ खाना-वाना बनावले बाड़े की खाली बकबक ही करत रहबे “

सुगना ने इस बातचीत को यही अंत करने का सोचा परंतु सोनू लाली की बातों को बड़े ध्यान से सुन रहा था।

यदि इस दाग का संबंध सुगना के साथ संभोग से है तो यह दाग सरयू चाचा के माथे पर कैसे?। सोनू भली भांति जान चुका था कि सरयू सिंह सुगना के पिता हैं पर सामाजिक रिश्ते में सुगना उनकी बहु थी।

ऐसा कैसे हो सकता है …सोनू का दिमाग कई दिशाओं में दौड़ने लगा। जब-जब सोनू के विचार अपना रास्ता इधर-उधर भटकते सरयू सिंह का तेजस्वी चेहरा और मर्यादित व्यक्तित्व सोनू के विचारों को भटकने से रोक लेता। सोनू को कुछ समझ नहीं आ रहा था। सरयू सिंह और सुगना के बीच इस प्रकार के संबंध सोनू की कल्पना से परे था।

उधर लाली बेहद प्रसन्न थी आज वह और उसकी बुर सोनू के स्वागत के लिए पूरी तरह से तैयार थी। शाम होते होते सोनी भी अपने कॉलेज से आ चुकी थी। सोनू अपने गर्दन का दाग सोनी से छुपा कर उसके प्रश्नों से बचना चाहता था.. परंतु नियति ने यह दाग ऐसी जगह पर छोड़ा था जिसे छुपाना बेहद कठिन था। कुछ ही देर बाद सोनी ने सोनू के दाग पर एक और प्रश्न कर जड़ दिया..

“अरे ई सोनू भैया के गर्दन पर का हो गैल बा”

सोनू को असहज देखकर इस बार सुगना की जगह लाली ने वही उत्तर देकर सोनी को शांत करने की कोशिश की जो सुगना ने उसे दिया था। परंतु सोनी ने नर्सिंग की पढ़ाई की हुई थी वह अपने आप को डॉक्टर से कम ना समझती थी। उसने सोनू के गर्दन के दाग का मुआयना किया परंतु उसका कारण और निदान दोनों ही उसके बस में ना था।

यह दाग जितना अनूठा था उसका कारण भी और इलाज भी उतना ही अनूठा था।

लाली भी सोनू के इस दाग को लेकर चिंतित हो गई थी पर चाह कर भी सरयू सिंह और सोनू के दागों को आपस में लिंक करने में नाकामयाब रही थी।

शाम को पूरा परिवार हंसते खेलते पिछले हफ्ते की घटनाक्रमों को आपस में साझा कर रहा था। सिर्फ सोनू और सुगना सावधान थे। जब-जब जौनपुर की बात आती सुगना सोनू के घर की तारीफ करने में जुट जाती। लाली और सोनी भी सोनू के जौनपुर वाले घर में जाने को लालायित हो उठीं। परंतु सोनू अभी पूर्णतया तृप्त था। सुगना की करिश्माई बुर ने उसके अंदर का सारा लावा खींच लिया था। लाली को देने के लिए न तो उसके पास न

उत्तेजना थी और न हीं अंडकोषों में दम और सोनी के प्रति उसके मन में कोई भी ऐसे वैसे विचार न थे।

सोनू खुद थका हुआ महसूस कर रहा था। और हो भी क्यों ना पिछले सप्ताह सुगना का खेत जोतने में की गई जी तोड़ मेहनत और फिर आज का सफर.. सोनू को थका देने के लिए काफी थे।

उधर सोनू से संभोग के लिए लाली पूरी तरह उत्साहित थी और सोनू अपने दाग को लेकर चिंतित.. सोनू के मन में मिलन का उत्साह न था यह बात लाली नोटिस कर रही थी और आखिरकार उसने सुगना से पूछा ..

“सोनुआ काहे उदास उदास लागत बा देह के गर्मी कहां गायब हो गैल बा। आज त हमारा पीछे-पीछे घूमते नईखे। का भइल बा ?”

सुगना क्या कहती …जिसने सुगना को एक हफ्ते तक लगातार भोगा हो उसे सुगना को छोड़कर किसी और के साथ संभोग करने में शायद ही दिलचस्पी हो..

सोनू तृप्त हो चुका था उसके दिलों दिमाग में सिर्फ और सिर्फ सुगना घूम रही थी..

सोनू के मन में लाली से मिलन को लेकर उत्साह की कमी को सुगना ने भी बखूबी नोटिस किया …जहां एक और लाली चहक रही थी वहीं सोनू बेहद शांत और खोया खोया था।

मौका पाकर सुगना ने सोनू से कहा..

“लाली कितना दिन से तोर इंतजार करत बाड़ी ओकर सब साध बुता दीहे..”

“ आज ना …दीदी आज हमार मन मन नईखे “

“लाली के शक हो जाई ..अपना दीदी खातिर लाली के मन रख ले… मन ना होखे तब भी… एक बार कल रात के खेला याद कर लीहे मन करे लागी..”

सुगना हाजिर जवाब भी थी और शरारती भी. कल रात की बात सोनू को याद दिला कर उसने सोनू का मूड बना दिया.. सोनू के दिलों दिमाग में बीती रात के कामुक दृश्य घूमने लगे.. सोनू का युवराज भी आलस छोड़ उठ खड़ा हुआ।

रात गहराने लगी और सब अपनी अपनी जगह पर चले सोने चले गए। सोनू को लाली धीरे-धीरे अपने कमरे की तरफ ले गई।

घर में सभी सदस्यों के सोने के पश्चात लाली.. सोनू के करीब आती गई और सोनू …बीती रात सुगना के साथ बिताए गए पलों को याद करता रहा और उसका लन्ड एक बार फिर अपनी पुरानी पिच पर धमाल मचाने पर आमादा था..।

लाली ने जी भर कर सोनू पर अपना प्यार लुटाया और सोनू ने भी सुगना को याद करते हुए लाली को तृप्त कर दिया..

वासना का तूफान शांत होते ही लाली ने सोनू से फिर उस दाग को देख रही थी।

लाली कभी दाग को सरयू सिंह के माथे के दाग से तुलना करती कभी उसे सुगना के उत्तर से..

यह दाग अनोखा था और कीड़े काटने के दाग से बिल्कुल अलग था…

सुबह की सुनहरी धूप खिड़कियों की दरारों से रास्ता तलाशती सुगना के कमरे में प्रवेश कर चुकी थी। सूरज की चंचल किरणें सुगना के गालों को चूमने का प्रयास कर रहीं थी.. और इस कहानी की नायिका बिंदास सो रही थी पिछले हफ्ते उसने सोनू की मर्दानगी को जीवंत रखने के लिए लिए जो किया था उसमें वह स्वयं भी तन मन से शामिल हो गई थी।

सुगना के लिए पिछला सप्ताह एक हनीमून की तरह था सोनू और सुगना ने जी भरकर इस सप्ताह का सदुपयोग किया था…

सूरज की किरणों को अपनी पलकों पर महसूस कर सुगना की नींद खुल गई। वह अलसाते हुए बिस्तर से उठी और कुछ ही देर बाद सुगना का घर एक बार फिर जीवंत हो गया..

बच्चों का कोलाहल और सुबह तैयार होने की भाग दौड़ …सोनी भी कॉलेज जाने के लिए तैयार हो रही थी उसे आज तक सोनू और लाली के संबंधों के बारे में भनक न थी।

स्नान करने के पश्चात सुगना की खूबसूरती दोगुनी हो जाती थी । उसका तन-बदन खिले हुए फूलों की तरह दमक उठता था। सुगना के चेहरे पर तृप्ति का भाव था जैसा संभोग सुख प्राप्त कर रही नव सुहागिनों के चेहरे पर होता है।

लाली ने सुगना को इतना खुश और तृप्त कई दिनों बाद देखा था…वह खुद को नहीं रोक पाई और सुगना से बोली..

“लगता सोनूवा तोर खूब सेवा कइले बा देह और चेहरा चमक गईल बा..”

हाजिर जवाब सुगना बोली..

“अरे हमर भाई ह हमार सेवा ना करी त केकर करी?

सुगना ने उत्तर देकर लाली कोनिरुत्तर कर दिया.. सुगना भलीभांति समझ चुकी थी की लाली उससे कामुक मजाक करना चाह रही है पर उसने उसकी चलने ना दी.

“दीदी हम कालेज जा तानी” सोनी चहकते हुए कॉलेज के लिए निकलने लगी। जींस में अपने गदराए हुए कूल्हों को समेटे सोनी पीछे से बेहद मादक लग रही थी। सुगना और सोनी दोनों की निगाहें उसके मटकते हुए कूल्हों पर थीं।

लाली से रहा नहीं गया वह सुगना की तरफ देखते हुए बोली

“सोनी पूरा गदरा गईल बिया …पहले सब केहू आपन सामान छुपावत रहे ई त मटका मटका के चलत बीया”

सुगना भी सोनी में आए शारीरिक परिवर्तन को महसूस कर रही थी पिछले कुछ महीनो में उसकी चुचियों का उभार और कूल्हों का आकार जिस प्रकार बड़ा था उसने सुगना को सोचने पर विवश कर दिया था …कहीं ना कहीं उसे विकास और सोनी के संबंधों पर शक होने लगा था. यह तो शुक्र है कि विकास के परिवार वालों ने स्वयं आगे बढ़कर सोनी का हाथ मांग लिया था और दोनों का इंगेजमेंट पिछले दिनों हो गया था।

लाली की बात सुनकर सुगना मुस्कुराने लगी और लाली से मजाक करते हुए बोली..

“विकास जी सोनिया के संभाल लीहे नू जईसन एकर जवानी छलकता बुझाता सोनी ही भारी पड़ी”

सुगना का मूड देखकर लाली भी जोश में आ गई और सुगना से मजाक करते हुए बोली..

“बुझाता विदेश जाए से पहले विकास जी सोनी के खेत जोत देले बाड़े.. तबे देहिया फूल गइल बा…”

सुगना को शायद यह कॉमेंट उतना पसंद नहीं आया…सोनी आधुनिक विचारों की लड़की थी हो सकता है लाली की बात सच भी हो परंतु सुगना शायद इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती थी।

“चल सोनी के छोड़ , कॉल रात अपन साध बुता ले ले नू” सुगना ने लाली का ध्यान भटकाया और अपने अंगूठे और तर्जनी से उसके दोनों निकालो को ब्लाउज के ऊपर से पकड़ना चाहा..

सुगना की पकड़ और निशाना सटीक था लाली चिहुंक उठी…”अरे छोड़ …..दुखाता” शायद सुगना ने उसके निप्पल को थोड़ा जोर से दबा दिया था।

सोनू के आने की आहट से दोनों सहेलियां सतर्क हो गई।

सोनू करीब आ चुका था और अपनी दोनों आंखों से अपनी दोनों अप्सराओं को देख रहा था । सुगना और लाली दोनों एक से बढ़कर एक थीं ।

यद्यपि सुगना लाली पर भारी थी परंतु वह धतूरे का फूल थी जो प्रतिबंधित था, जिसमें नशा तो था परंतु कांटे भी थे और लाली वह तो खूबसूरत गुलाब की भांति थी जिसमें सोनू के प्रति अगाध प्रेम था । वह सोनी ही थी जिसने सोनू में कामवासना जगाई थी, उसे पाला पोसा था और उसे किशोरावस्था में वह सारे सुख दिए थे जो सुगना ने न तो उसके लिए सोचे थे और न हीं सुगना के लिए वह देना संभव था।

सुगना का ध्यान एक बार फिर सोनू के दाग पर गया दाग कल की तुलना में कुछ कम था…

सुगना ने इसका जिक्र ना किया और सोनू से पूछा..

“जौनपुर कब जाए के बा?”

“दोपहर के बाद जाएब” सोनू ने उत्तर दिया। कुछ ही देर में स्कूल के लिए तैयार हो चुके सुगना और लाली के बच्चे सोनू को घेर कर बातें करने लगे और अपने-अपने ऑटो रिक्शा का इंतजार करने लगे।

जिसके पास इतना बड़ा परिवार हो उससे किसी और की क्या जरूरत होगी सोनू ने अपनी नसबंदी करा कर कोई गलत निर्णय नहीं लिया था शायद यही निर्णय उसे सुगना के और करीब ले आया था और वह अपनी कल्पना को हकीकत बना पाया था

वरना सुगना उसके लिए आकाश के इंद्रधनुष की भांति थी जिसे वह देख सकता था महसूस कर सकता था परंतु उसे छु पाना कतई संभव न था।

बच्चों के जाने के पश्चात सोनू ने एक बार इस दाग को लेकर डॉक्टर से सलाह लेने की सोची। सुगना द्वारा बताया गया दाग का रहस्य उसके समझ से परे था। सुगना एक स्त्री थी और सोनू पुरुष । स्त्री पुरुष का संभोग विधि का विधान है इसमें इस दाग का क्या स्थान?

यद्यपि सुगना और सोनू ने एक ही गर्भ से जन्म लिया था फिर भी यह दाग क्यों?

कुछ ही देर बात सोनू अपने ओहदे और गरिमा के साथ डॉक्टर के समक्ष उपस्थित था।

डॉक्टर ने उसके दाग का मुआयना किया.. उसे छूकर देखा, और कई तरीके से उसे पहचानने की कोशिश की परंतु किसी निष्कर्ष तक न पहुंच सका। वह बार-बार यही प्रश्न पूछता रहा कि यह दाग कब से है और सोनू बार-बार उसे यही बता रहा था कि पिछले एक हफ्ते से यह दाग धीरे-धीरे कर बढ़ रहा है।

डॉक्टर के माथे की शिकन देखकर सोनू समझ गया कि यह दाग अनोखा है और शायद डॉक्टर ने भी इस प्रकार के दाग को अपने जीवन में पहली बार देखा है।

सोनू को सुगना की बात पर यकीन होने लगा…

डॉक्टर ने आखिरकार सोनू से कहा

“यह दाग अनूठा है मैंने पहले कभी ऐसा दाग नहीं देखा है मैं इसके लिए कोई विशेष दवा तो नहीं बता सकता पर यह क्रीम लगाते रहिएगा हो सकता है यह काम कर जाए…”

मरता क्या ना करता सोनू ने वह क्रीम ले ली और अनमने मन से बाहर आ गया..

वह दाग के कारण को समझना चाहता था यदि सच में यह सुगना के साथ संभोग के कारण जन्मा था तो यह चिंतनीय था। क्या वह सुगना के साथ आगे अपनी कामेच्छा पूरी नहीं कर पाएगा…

क्या उसके सपने बिखर जाएंगे?

सुगना के साथ बिताए गए कामुक पल उसके जेहन में चलचित्र की भांति घूमने लगे…

ऐसा लग रहा था जैसे उसकी खुशियों पर यह दाग ग्रहण की भांति छा गया था…

अचानक सोनू को लाली की बात याद आई जिसने उसके दाग की तुलना सरयू सिंह के माथे के दाग से की थी।

सोनू अपनी गाड़ी में बैठा वापस घर की तरफ जा रहा था सुगना उसके दिमाग में अब भी घूम रही थी इस दाग का सुगना से संबंध सोनू को स्वीकार्य न था।

सोनू का तेजस्वी चेहरा निस्तेज हो रहा था।

सोनू घर पहुंच चुका था..अंदर आते ही सोनू के चेहरे की उदासी सुगना ने पढ़ ली।

“काहे परेशान बाड़े कोई दिक्कत बा का?”

सुगना सोनू की नस-नस पहचानती थी वह कब दुखी होता और कब खुश होता सुगना उसके चेहरे के भाव पढ़ कर समझ जाती दोनों के बीच यह बंधन अनूठा था।

सोनू ने डॉक्टर के साथ हुई अपनी मुलाकात का जिक्र सुगना से किया और इसी बीच लाली भी पीछे खड़ी सोनू की बातें सुन रही थी। उसने बिना मांगे अपनी राय चिपका दी

“अरे सोनू सरयू चाचा से एक बार मिल के पूछीहे उनकर दाग भी ठीक अईसन ही रहे। अब त उनकर दाग बिल्कुल ठीक बा.. उ जरूर बता दीहें”

डूबते को तिनके का सहारा …सोनू को उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ी। परंतु सुगना की रूह कांप उठी।

सरयू सिंह और सोनू को दाग के बारे में बात करते सोच कर ही उसे लगा वह गश खाकर गिर पड़ेगी..

सोनू ने सुगना को सहारा दिया और उसे अपने पास बैठा लिया..

दीदी का भइल….?

यह प्रश्न जितना सरल था उसका उत्तर उतना ही दुरूह…

नियति सुगना की तरह ही निरुत्तर थी ..

आशंकित थी…

कुछ अनिष्ट होने की आशंका प्रबल हो रही थी…सुगना का दिल धक-धक कर रहा था…

शेष अगले भाग में

आपके आपके कमेंट की प्रतीक्षा में
 
Y

Tku

Tku

Welcome थ्रीसम kaise hoga kuch vichaar vistaar se bataiye

Thnaks
 
थैंक यू

तीन एपिसोड पोस्ट हो चुके हैं। Welcome to you too
 
प्रिय पाठकों,

उत्तेजक कहानी लिखना निश्चित ही लेखक की स्वयं की इच्छा होती है वह अपने फुर्सत के क्षणों में विभिन्न कामुक कल्पनाओं को पन्नों पर उतारता है...

इस फार्म पर ऐसी कहानी पोस्ट करने का एकमात्र उद्देश्य होता है की आदमी अपने फुर्सत के चरणों में कुछ कामुक कल्पनाओं के बारे में बात करें कुछ पाठकों की राय सुने और उनके मन मुताबिक कहानी को आगे बढ़ाएं।

यह कहानी यहां तक पहुंची इसमें आप सभी पाठकों का ही योगदान है परंतु अब मैं महसूस कर रहा हूं की शायद इस कहानी से पाठकों का जुड़ाव कुछ काम हो रहा है या जिनका जुड़ाव है भी वह भी मात्र एकतरफा है।

कहानी पोस्ट करने के बाद मुझे सिर्फ और सिर्फ आपके कमेंट्स और राय का इंतजार रहता है

आज मैं कहानीके कुछ पुराने पेज पढ़ रहा था जहां मुझे कुछ पाठकों के कमेंट मिले जो इस कहानी से उनके जुड़ाव का प्रदर्शन करते थे ऐसे ही पाठक इस कहानी को यहां तक लाए है। यहां मैं कुछ पाठकों के कॉमेंट पोस्ट किए हैं पर ऐसे अनेकों पाठक है जिनके कमेंट्स ने मुझे इस कहानी के कई एपिसोड लिखने को प्रेरित किया।

था।

कहानी के वर्तमान पाठकों से उम्मीद करता हूं कि यदि वह इस कहानी को पसंद कर रहे हैं तो कहानी से अपना जुड़ाव दिखाकर मुझे प्रेरित और मार्गदर्शित करते रहें। यदि आपके सुझाव हों यह कहानी कहानी भटक रही हो तो उसे भी आप अपने कमेंट के माध्यम से बता सकते हैं धन्यवाद




कमेंट from one reader

apki kahani bahut hi utejak hai, padhkar bahut hi aanand aaya hai, forum ki behtrin kahaniyo me se hai jisko padkr alag hi lagta hai, aapne har scene ko vastvikta se jod kr rkha hai jo ke sach ke bahut kareeb hai, bas ek do ko chhod kr, aise hi aapki kahani ko aage badhate rhe aur complete avshay kre a
 
भाग 130

“अरे सोनू सरयू चाचा से एक बार मिल के पूछीहे उनकर दाग भी ठीक अईसन ही रहे। अब त उनकर दाग बिल्कुल ठीक बा.. उ जरूर बता दीहें”

डूबते को तिनके का सहारा …सोनू को उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ी। परंतु सुगना की रूह कांप उठी।

सरयू सिंह और सोनू को दाग के बारे में बात करते सोच कर ही उसे लगा वह गश खाकर गिर पड़ेगी..

सोनू ने सुगना को सहारा दिया और उसे अपने पास बैठा लिया..

दीदी का भइल….?

यह प्रश्न जितना सरल था उसका उत्तर उतना ही दुरूह…

नियति सुगना की तरह ही निरुत्तर थी ..

आशंकित थी…

कुछ अनिष्ट होने की आशंका प्रबल थी…


अब आगे…

सोनू सुगना की हथेलियां को अपनी हथेलियां के बीच लेकर तेजी से रगड़ रहा था और उसे चैतन्य करने की कोशिश कर रहा था लाली झट से पानी का गिलास ले आई और सुगना को पानी पिलाने का प्रयास करने लगी अब तक सुगना स्वयं को नियंत्रित करते हुए अपनी चेतना में वापस आ चुकी थी और अपनी सधी हुई जबान में बोली


“अचानक ना जाने का भइल हा एकदम चक्कर जैसन लगल हा”

सोनू और लाली ने सुगना को इस स्थिति में आज पहली बार देखा था अपने स्वास्थ्य और पूरे परिवार का ख्याल रखने वाली सुगना को शायद ही कभी कोई बीमारी हुई हो।

अच्छा ही हुआ बातचीत का टॉपिक बदल चुका था और शायद सुगना भी यही चाहती थी परंतु सोनू के मस्तिष्क पर इस दाग की उत्पत्ति का खरोच लगा चुका था रह रहकर उसका ध्यान कभी दाग की तरफ जाता कभी सरयू सिंह की तरफ..

बहरहाल इस समय सुगना सबका ध्यान अपनी तरफ खींच चुकी थी।

सोनू ने उसकी हथेलियां को एक बार फिर प्यार से सहलाते हुए कहा


“दीदी चल डॉक्टर से चेकअप करा दी”

सुगना ने सहज होते हुए कहा

“अरे कल ही तो डॉक्टर से देखा के आइल बाड़े सब तो ठीक ही रहे अतना छोट छोट बात पर परेशान होईबे तो कैसे चली हम बिल्कुल ठीक बानी ..”

सोनू सुगना की बात से पूरी तरह संतुष्ट न था पर वह चुप ही रहा

“तोरा जौनपुर जाए के रहे नू?”

सुगना के प्रश्न से सोनू को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हुआ उसने घड़ी देखी..

समय तेजी से बीत रहा था दोपहर के एक बज चुके थे सोनू ने सुगना की हथेलियों को आजाद करते हुए

“अरे 1 बज गैल हमरा तुरंत जौनपुर निकल के बा..”

सोनू अपना सामान पैक करने लगा लाली झटपट सोनू के लिए खाना निकालने चली गई सुगना अभी भी अपनी जगह पर बैठे बैठे अपने आपको सहज करने का प्रयास कर रही थी।

कुछ ही देर बाद सोनू घर के हाल में बैठा खाना खा रहा था और उसकी दोनों बहने उसकी पसंद का खाना उसे खिला रही थी सुगना भी अब उठकर लाली का साथ दे रही थी।

जब जब सुगना और लाली सोनू को खाने का सामान देने के लिए नीचे झुकतीं उनकी चूचियां बरबस ही सोनू का ध्यान खींच लेतीं । सुगना की दूधिया चमकती चूचियों को ब्लाउज के पीछे से झांकते देख सोनू मंत्र मुग्ध हो जाता। लाली की भरी-भरी मादक चूचियां भी कम न थी।

रसमलाई और राजभोग की तुलना कठिन थी…जो सुलभ था शायद उसकी कीमत कम थी और जो दुर्लभ था उसकी चाह प्रबल थी।

अपनी दोनों बहनों के बीच घिरा सोनू स्वादिष्ट भोजन का आनंद ले रहा था। और उसकी आंखें उनके गदराए बदन को देखकर तृप्त हो रहीं थी । उसका युवराज पैंट में जकड़े होने के बावजूद सर उठाने की कोशिश कर रहा था।

सोनू ने भोजन किया और अब विदा लेने का वक्त था…

ड्राइवर गाड़ी में सामान रखकर सोनू का इंतजार कर रहा था।

लाली ने सोनू से कहा

“फेर कब आईब?” लाली की आवाज में भारीपन था और आंखों में पानी। वह सोनू से बिछड़ना नहीं चाहती थी।

सुगना ने यह भांप लिया अचानक उसे कुछ याद आया और वह बोली..

“अरे सोनू रुकल रही हे तोरा खाती एगो चीज बनवले बानी”

सुगना भागते हुए किचन की तरफ गई इसी बीच सोनू ने लाली को अपने आलिंगन में भर लिया और उसकी आंसुओं से भरी आंखों को चूमने लगा धीरे-धीरे कब उसके होंठ लाली के होठों से सट गए और दोनों चुंबन में खो गए। सोनू लाली से बेहद प्यार करता था।

सोनू और लाली एक दूसरे के आलिंगन और चुंबन में खोए हुए थे सुगना पीछे आ चुकी थी उसने उन्हें डिस्टर्ब ना किया परंतु सुगना आसपास हो और सोनू को उसका एहसास ना हो यह संभव न था वह लाली से अलग हुआ..

सोनू और लाली दोनों बखूबी जानते थे कि सुगना उनके संबंधों के बारे में पूरी तरह जानती है। और अब तो सोनू अपनी बहन सुगना को लाली से विवाह करने का वचन भी दे चुका था।

छुपाने लायक कुछ भी न था लाली भी सहज थी। लाली और सोनू के बीच का रिश्ता सुगना भी समझने लगी थी और शायद इसीलिए उसने सोनू को लाली से विवाह करने के लिए मना लिया था।

सोनू सुगना की तरफ मुखातिब हुआ और उसके हाथ में पकड़े डब्बे में अपने मनपसंद लड्डू देखकर बेहद खुश हो गया।उसका जी किया कि वह सुगना को चूम ले.. सचमुच सुगना सोनू का बहुत ख्याल रखती थी..

सोनू हमेशा की तरह एक बार फिर लाली के पैर छूने के लिए नीचे झुका और लाली ने उसे बीच में ही रोक लिया तभी सुगना बोल पड़ी..

“अब लाली के पैर मत छुअल कर …ठीक ना लागेला ”

सोनू को शरारत सूझी अपनी बहनों से बिछड़ते हुए वह दुखी तो था पर खुद को सहज दिखाते हुए उसने सुगना को छेड़ा

“काहे दीदी…?”

सुगना चुप रही।

लाली के समक्ष वह अब भी सोनू से मर्यादित दूरी बनाए रखना चाहती थी।

सुगना तुरंत ही समझ गई की सोनू उसे छेड़ रहा है …उसने उत्तर ना दिया अपितु अपनी गर्दन झुका दी । सुगना पहले भी यह बात कई बार सोनू को समझा चुकी थी उसके और लाली के बीच का रिश्ता अब भाई बहन का रिश्ता नहीं रहा था। और अब वह पति-पत्नी के रूप में परिवर्तित होने वाला था। ऐसे में लाली के पैर छूना सुगना को गवारा न था।

तभी अचानक सोनू ने लाली से कहा..

“दीदी हमार घर के चाबी लगाता तोहरा बिस्तर में पर छूट गइल बा..लेते आव ना..”

जैसे ही लाली अपने कमरे में सोनू की चाबी ढूंढने गई सोनू ने सुगना को अपने आलिंगन में भर लिया और इससे पहले सुगना कुछ कहती उसके फूल जैसे ओंठो को अपने होठों के बीच लेकर चुभलाने लगा..

उसके हाथ सुगना के कूल्हों को जकड़ कर उसे अपने लंड से सटा चुके थे…

कुछ ही पलों के मिलन में सोनू के शरीर में उत्तेजना भर दी.. सुगना उसकी पकड़ से आजाद तो नहीं होना चाहती थी परंतु लाली निकट ही थी.. उसने सोनू के सीने पर अपनी हथेलियां से इशारा किया और उससे दूर हो गई।

तभी कमरे से लाली की आवाज आई

“सोनू बिस्तर पर तो चाभी नइखे कहीं और रख ले बाड़े का?”

सोनू ने अपनी जेब से चाबी निकाल कर सुगना को दिखाते हुए मुस्कुराने लगा उसने झटपट चाबी को पास पड़े सोफे पर फेंक दिया और बोला..


“लाली दीदी आजा चाबी मिल गैल बा सोफा पर रहल हा”

सुगना सोनू के शरारती चेहरे को देख रही थी जिसने उसे आलिंगन में लेने के लिए यह खेल रचा और बखूबी अपनी इच्छा पूरी कर ली। इस प्रेम भरे आलिंगन ने सुगना को भी तरोताजा कर दिया था। सुगना के जीवन में खुशियों की लहर महसूस होने लगी थी।

अब सुगना से विदा लेने ने की बारी थी।

सोनू ने पूरे आदर सम्मान से विधिवत झुक कर सुगना के पैर छुए सुगना ने उसे ना रोका वह उसकी बड़ी बहन की तरह उसके उसके सर पर हाथ रख उसे आशीर्वाद देती रही।

जिस स्त्री ने सोनू की मर्दानगी को बचाए रखने के लिए अपनी हद पार कर उसका साथ दिया था वह सोनू की नजरों में पहले भी पूजनीय थी और अब भी।

सोनू उठ खड़ा हुआ और अपनी बहन सुगना के आलिंगन में आ गया यह आलिंगन पहले की तुलना में अलग था सुगना की चूचियां सोनू से सुरक्षित दूरी बनाए हुए थी और सुगना सोनू का माथा चूमकर उसे आशीर्वाद दे रही थी.

सुगना ने कहा..

“अपन ध्यान रखीहे और जल्दी आईहे हमनी के इंतजार करब जा..”

सोनू मुस्कुरा कर रहा गया। अपनी दोनों बहनों से बिदा लेते समय उसकी आंखें नम थी। गाड़ी में बैठने के बाद सोनू की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह सुगना और लाली की तरफ देखें। न जाने क्यों इस बार उसे सुगना से बिछड़ने में बेहद तकलीफ हो रही थी।

विधि का विधान है मिलना और बिछड़ना परंतु जब प्रेम अपने चरम पर पहुंच जाता है अलग होना बेहद कठिन हो जाता है..

सोनू की गाड़ी आगे बढ़ चुकी थी.. सोनू पलट कर पीछे नहीं देखना चाह रहा था उसे पता था वह खुद भी भावुक होगा और अपनी बहनों को भी भावुक करता रहेगा। दिल पर पत्थर रख वह आगे बढ़ता गया परंतु गली के मोड पर आते-आते उसका भी सब्र जवाब दे गया उसने खिड़की से सर बाहर निकाला और एक झलक अपने घर की तरफ देखा दोनों बहने अब भी टकटकी लगाकर सोनू की तरफ देख रही थी न जाने उन में सोनू के प्रति इतना प्यार क्यों था….

सुगना और लाली दोनों निराली थी और उनका भाई सोनू उनकी आंखों का तारा था…

उधर सलेमपुर में सरयू सिंह अपने दोस्त हरिया और उसकी पत्नी (लाली के माता पिता) का ख्याल रख रहे थे कजरी भी एक आदर्श पड़ोसी की तरह उनके सुख-दुख में शामिल थी..


हरिया और उसकी पत्नी को हमेशा एक ही चिंता सताती कि उनकी पुत्री लाली भरी जवानी में ही विधवा हो गई थी। उन्हें इस बात का इल्म कतई न था की सोनू लाली का पूरी तरह ध्यान रख रहा था और अब सुगना के कहने पर उसे पत्नी रूप में स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार था।

हरिया की पत्नी अपनी पुत्री के लिए हमेशा ईश्वर से मन्नतें मांगती उसके संभावित वर के लिए अपनी नज़रें इधर-उधर दौड़ती परंतु एक विधवा के लिए वर तलाशना इतना आसान न था और यदि कोई मिलता भी तो वह निश्चित ही अधेड़ उम्र का होता।

सोनू को अपने दामाद के रूप में देखने की वह कल्पना भी नहीं कर सकते थे एक तो सोनू उम्र में लाली से कुछ छोटा था दूसरे वह अब एक प्रतिष्ठित पद पर था जिसके लिए लड़कियों की लाइन लगी हुई थी। सोनू के गांव सीतापुर में उसकी मां पदमा के समक्ष कई रिश्ते आते और वह उन्हें सरयू सिंह से संपर्क करने के लिए भेज देती। सोनू का पूरा परिवार भी अब सरयू सिंह को अपने परिवार का मुखिया और बुजुर्ग मान चुका था।

सरयू सिंह के पास सोनू के रूप में एक अनमोल खजाना था जिसके बलबूते पूरे गांव और तहसील में उनका दबदबा चलता था और हो भी क्यों ना?

सरयू सिंह का व्यक्तित्व वैसे भी सब पर भारी था ऊपर से जब से वह मनोरमा के संपर्क में आए थे उनका उत्साह दोगुना हो गया था। यह तो विधि का विधान था कि उन्हें अपनी पुत्री सुगना के बारे में अकस्मात ही मालूम चल गया था और वह अपने पाप के बोझ तले दब गए थे अन्यथा उनके उत्साह और दबंगई की कोई सीमा ही ना रहती।


समय सभी घावों को भर देता है। सुगना को अपनी पुत्री रूप में स्वीकार कर अब वह अपने पाप से खुद को मुक्त कर चुके थे। परंतु शायद यह इतना आसान न था। उनकी उत्तेजना को दिशा देने वाली सुगना की छोटी बहन सोनी उनके सुख चैन छीने हुए थी परंतु उनके जीवन में रस भरे हुए थी।

वैसे भी अपनी उत्तेजना के बिना उनका जीवन नीरस था। उनकी उत्तेजना का वेग झेलने के लिए कजरी अब कमजोर पड़ती थी। वह तो सरयू सिंह के मजबूत हाथ थे जो अब भी उनकी उदंड उत्तेजना को समेटे उनके अदभुत लंड को मसल कर उसमें से मखमली द्रव्य निचोड़ लेते थे और उसकी सारी अकड़ खत्म कर देते थे।

उधर सरयू सिंह की उत्तेजना का केंद्र बिंदु सोनी अपनी सहेलियों के साथ कॉलेज की कैंटीन में कुल्फी खा रही थी जिस प्रकार से वह कुल्फी चूस रही थी उसकी सहेली ने उसे छेड़ा..

“अरे सोनी तेरा तो कुल्फी चूसने का अंदाज ही बदल गया है लगता है विकास ने अच्छी ट्रेनिंग दे दी है”

सोनी ने अपनी दोस्त की तरफ देखा वह मन ही मन मुस्कुराने लगी उसे अचानक विकास की याद आ गई जो बार-बार उसे अपना लंड चूसने के लिए आग्रह करता रहता था।

सोनी के लिए यह इतना आसान न था। पर पिछले कुछ वर्षों से सुगना के पुत्र सूरज के अंगूठे को सहलाने के बाद उसकी छोटी सी नूनी को बढ़ाना और उसके बाद उसे अपने होंठ से चूम कर नूनी के आकर को कम करना सोनी के लिए एक अनोखा कृत्य था। सोनी को धीरे-धीरे यह खेल पसंद आने लगा था और सुगना के लाख मना करने के बाद भी वह मौका देखकर अपनी उत्सुकता ना रोक पाती।

सोनी ने मुस्कुराते हुए अपनी सहेली से कहा…

“यह तो एक दिन तुझे भी करना ही है मेरे से ही ट्रेनिंग ले ले… “

दोनों सहेलियां हंसने लगी। सोनी की विडंबना यह थी कि वह विकास के प्रेम में पड़कर इंगेज हो चुकी थी और कुछ महीनो बाद उसकी शादी थी।


विकास से उसके प्यार में कोई कमी न थी परंतु विकास की कामुकता और सोनी की कामेच्छा में कोई मेल न था। विकास अति कामुक था परंतु कुदरत ने उसे न हीं सोनू जैसे हथियार से नहीं नवाजा था न हीं उस जैसे बलिष्ठ शरीर से।

जब से सोनी ने सरयू सिंह का लंड देखा था तब से वह उससे विकास के लंड की तुलना करने लगी थी…

गाजर और मूली की तुलना कठिन थी।

लंड का ध्यान कर सोनी की जांघों के बीच कुछ कुलबुलाहट होने लगी। सोनी अपनी सहेली से विकास के बारे में और बातें करने लगे लगी। विकास एक धनाढ़य परिवार का काबिल लड़का था। सभी सोनी को खुश किस्मत मानते थे जो वह ऐसे घर में ब्याही जा रही थी। विकास भी सोनी से बहुत प्यार करता था यह बात सभी जानते थे।


न जाने ऐसा क्यों होता कि जब भी वह विकास के बारे में सोच सोच कर कामुक होती सरयू सिंह का बड़ा सा लंड बार-बार उसका ध्यान अपनी ओर खींचता।

सोनी अपने विचारों में उत्तेजना को विभिन्न तरीकों से जागृत करती कभी उस अदृश्य लंड को अपने भीतर महसूस करती और इन्हीं में उलझी हुई अपनी उत्तेजना को अपनी उंगलियों से शांत करती।

मानव मन चंचल होता है कामुक पलो में उसकी गति अनियंत्रित होती है वह रिश्ते नाते उचित अनुचित को छोड़ कही भी और किसी रूप में जा सकता है और सोच सकता है उसका मुख्य उद्देश्य अपने स्वामी को एक सुखद स्खलन देना होता है…

उधर सोनू ने जौनपुर पहुंचकर अपना शासकीय कार्यभार संभाल लिया । सांझ ढले जब वह अपने घर पहुंचा घर के नौकर चाकर ने उसका स्वागत किया परंतु घर के अंदर प्रवेश करते ही उसे उसका सूनापन सोनू को खलने लगा। चहकती सुगना और उसके बच्चों की कमी सोनू को महसूस हो रही थी।

वह रुवांसा हो गया। सुगना की कमरे का दरवाजा खोलने की उसकी हिम्मत ना हुई वह वापस अपने ड्राइंग रूम में आ गया और तब तक उसका मातहत चाय का कप और बिस्किट लेकर सोनू के समक्ष था।

“साहब सुगना दीदी नहीं आएंगी क्या?”

इस प्रश्न ने सोनू को और दुखी कर दिया तभी उसे नेपाली मातहत में फिर बोला

“दीदी बहुत अच्छी हैं और उनके बच्चे भी उनके रहने से ये बंगला जगमग रहता था..”

सोनू ने अपनी भावनाओं पर कंट्रोल किया और बोला ..

“हां दोनों बच्चे सब का मन लगाए रखते थे..”

इसके पश्चात सोनू ने अपने मातहत को कुछ और दिशा निर्देश दिए और अपने कमरे में चला गया। यह वही कमरा था जिसमें लाली की पसंद का पलंग लगाया था।

सुगना के जौनपुर प्रवास के दौरान सोनू इसी कमरे में रहता था। परंतु सुगना के साथ सारी रासलीला उसकी पसंद के पलंग पर ही करता था।

सोनू के बंगले के दोनों प्रमुख कमरे उसकी दोनों बहनों के हो चुके थे बंगले ही क्या सोनू खुद भी अब पूरी तरह अपनी बहनों का हो चुका था और उनके लिए तन मन धन से समर्पित था।

नित्य क्रिया से निवृत होकर सोनू अपने क्लब के जिम में चला गया जहां जाकर जी भरकर मेहनत की और शरीर को पूरी तरह थका डाला उसे पता था घर का एकाकीपन उसे काटने को दौड़ेगा और यह थकावट थी उसे एक सुखद नींद दे सकती थी।

रात्रि की बेला सभी को एकांत और दिनभर की थकान मिटाने का एक अवसर देती है परंतु चंचल मन का भटकाव सबसे ज्यादा इसी समय होता है बिस्तर पर लेटते ही कहानी के सभी पात्र अपनी अपनी मनोदशा से जूझ रहे थे.

लाली अपने विवाह के पश्चात अपने पूर्व पति राजेश के संग बिताए गए दिनों को याद कर रही थी। वो सुहाग के लाल जोड़े में राजेश के घर आना सुहागिनों की तरह घर की विभिन्न पूजा में भाग लेना और रात्रि होते होते राजेश की बाहों में संसार का अनोखा सुख लेना। लाल जोड़ा और सुहागिनों की तरह सज धज कर रहना लाली को बेहद पसंद था परंतु अफसोस राजेश के जाने के पश्चात वह रंग-बिरंगे कपड़े तो जरूर पहनती थी परंतु अपने पति के लिए सजने का जो सुख लाली महसूस करती थी अब वह उसकी जिंदगी से महरूम हो चुका था। पुनर्विवाह न तो उसकी कल्पना में था और उसके हिसाब से शायद संभव भी नहीं था।

उसके जीवन में एकमात्र खुशियां थी वह थी सोनू से उसके जायज या नाजायज संबंध। नाजायज इसलिए क्योंकि सोनू उसका मुंह बोला भाई था और जायज इसलिए कि यह संबंध उसके पति की इच्छा से बना था और उन्हें इससे कोई आपत्ति न थी अपितु इस संबंध को बनाने में उनका ही योगदान था।


हम सबकी प्यारी सुगना भी बिस्तर पर लेटे-लेटे सोनू के बारे में ही सोच रही थी। पिछले हफ्ते सोनू के साथ बिताया सप्ताह उसके जीवन का शायद दूसरा खूबसूरत समय था। अब भी उसे सरयू सिंह के साथ बिताई गई अपनी सुहागरात याद थी सरयू सिंह ने जिस आत्मीयता और प्यार से उसकी कमसिन बुर को धीरे-धीरे जवान किया था और उसकी वासना को पुष्पित और पल्लवित किया था वह उनकी ऋणी थी।

सुगना की जीवन में रंग और बुर में तरंग भरने वाले सरयू सिंह उसके लिए पूज्य थे…वह पूज्य इसलिए भी थे कि वह उसे इस दुनिया में लाने वाले पिता भी थे परंतु सुगना को इसका इल्म न था। अन्यथा सरयू सिंह का वह कामुक रूप सुगना कभी स्वीकार न कर पाती।

यह सोचते सोचते ही उसकी जांघों के बीच एक बार फिर हलचल होने लगी तभी उसके दिमाग में विद्यानंद के शब्द गूंजने लगे..

अपने पुत्र सूरज की मुक्ति का मार्ग जो विद्यानंद ने सुझाया था.. उसे अमल में लाना बेहद कठिन था.

अपनी ही पुत्री को अपने ही पुत्र से संभोग करने के लिए प्रेरित करना या स्वयं अपने ही पुत्र से संभोग करना यह ऐसा दुष्कर और अपवित्र कार्य था जो सुगना जैसी स्त्री के लिए कतई संभव न था पर सूरज उसका एकमात्र पुत्र था जो सरयू सिंह की निशानी थी , जिसे आने वाले समय में सुगना के परिवार का प्रतिनिधित्व करना था। सुगना किसी भी हाल में सूरज को शापित नहीं छोड़ सकती थी।

विद्यानंद ने यह बात सुगना को किसी से भी साझा करने के लिए मना किया था। यद्यपि सूरज और मधु अभी छोटे थे परंतु सुगना अपनी कल्पना में आने वाले समय के बारे में सोचना शुरू कर चुकी थी वह कभी एक दिशा में सोचती कभी दूसरी दिशा में और हर बार मुंह की खाती आखिर कार यह कैसे संभव होगा।

अचानक उसके विचारों में किशोर सोनू की छवि उभर आई अपनी किशोरावस्था में सोनू एक आदर्श भाई की तरह सुगना के साथ-साथ रहता और सुगना भी एक बड़ी बहन के रूप में उसका पूरा ख्याल परंतु नियति ने जाने उनके भाग्य में क्या लिखा था कैसे उन दोनों के बीच का उज्ज्वल और बेदाग संबंध वासना की गिरफ्त में आकर धीरे धीरे बदल चुका था और अब दोनों के कमांग एक दूसरे में समा जाने के लिए तड़प रहे थे…

अपने और सोनू के संबंधों से सुगना को कुछ आंतरिक बल मिला और वह मन में ही मन ईश्वर से यही प्रार्थना करने लगी कि उसकी मंशा पूरी हो और उसका शापित पुत्र उसे अनजाने शॉप से मुक्ति पा सके।

अगली सुबह सोनू ने अपने गर्दन के दाग का मुआयना किया…निश्चित ही दाग कम हो रहा था सुगना का कहा सच हो रहा था अगले दस ग्यारह दिनों में दाग लगभग गायब सा हो गया। सोनू बेहद खुश था अपने दाग से मुक्त होकर वह आत्मविश्वास से लबरेज था…परंतु इन दिनों सुगना और लाली की कमी उसे खल रही थी। दो-तीन दिनों में शनिवार आने वाला था सप्ताहांत में सोनू बनारस जाने की तैयारी करने लगा.. जिसकी सूचना उसने पास के पीसीओ में टेलीफोन करके अपनी बहनों तक पहुंचा दी..


लाली…सोनू का बेसब्री से इंतजार करने लगी…पर सुगना सतर्क थी..उसे सोनू का इंतजार भी था पर एक डर भी था कही सोनू ने फिर…नहीं..नहीं अब बस.. जो हुआ सो हुआ। वह मन ही मन निर्णय लेने की कोशिश कर रही थी पर जांघों के बीच छुपी प्रतीक्षारत बुर सुगना के निर्णय को कमजोर करने की कोशिश कर रही थी।

नियति मुस्कुरा रही थी और विधाता द्वारा लिखी गई आगे की पटकथा को पढ़ने का प्रयास कर रही थी…

शेष अगले भाग में..
 




पिछले सप्ताह ली गई सुगना और सोनू की तस्वीर
 
वो अपडेट कहानी की मान को ध्यान में रखते हुए हटा लिया गया है।

Tku

Hope u enjoyed 101 and 102..

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