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- Dec 5, 2013
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समीर राय के होश उड़ चले - "यह... यह सब क्या है, बेटी?" वह बौखला कर बोला। "अब्बू...यह सब मेरे बचपन से मेरे साथ हैं...।"
हिना अब संयत व संजीदा थी- "मैं आपको अपने बचपन की बहुत-सी बातें बता चुकी हूं। जो बातें उस वक्त मेरे छोटे से जहन में साफ नहीं थीं.....वो अब स्पष्ट होकर मेरे सामने आ गई हैं। मैं बहुत कुछ समझ पा रही हूं...।"
"हां, बताओ बेटा। जो कुछ भी तुम जानती हो... समझ पा रही हो....सब पूरे इत्मीनान के साथ बताओ...।" सब कुछ जानने को आतुर समीर राय ने उसे हौसला दिया।
"मेरा बचपन एक तिलस्मी माहौल में बीता था, अब्बू... हिना याद करते बोली- "वहां एक हालनुमा कमरा था। उस कमरे में हजारों 'ताख' बने हुये थे और हर 'ताख' में एक बुत रखा हुआ था। उस कमरे का फर्श सुर्ख ईंटों का था, मैं उस फर्श पर दौड़ती-फिरती थी। वहां बेशुमार सांप होते थे। मैं उनमें खेला करती थी...।"
हिना की आंखों में यादों का अलाव रोशन था और वह यादों में खोई धीरे-धीरे बोल रही थी
"अब्बू...वहां उस मायावी लोक में उन 'बुतों का एक देवता था। चाहें तो आप उसे सांपों का बादशाह कह लें। उसके सिर पर एक सुनहरा सांप कुंडली मारे ताज की तरह सजा रहता था। उस बादशाह का नाम परमान था। सांपों के इस बादशाह ने मुझे अपने बेटे के लिए चुन रखा था। उसके बेटे का नाम रनतारो था। मैं जब तक वहां रही...मैंने कभी रनतारो को नहीं देखा था, बस उसके बारे में अजीब-अजीब किस्से सुने थे... जो उस वक्त मेरी समझ से ऊपर थे, लेकिन अब हर चीज आईने की तरह साफ हो चुकी है।
'अब्बू... कुछ अर्सा पहले रात की रानी पर जो सांप दिखाई देता था...वो रनतारो ही था। फिर बर्थ-डे वाली रात 'वो' मुझ तक पहुंचा।
उस रात उसने मुझे 'डंसा', अब उसका जब जी चाहता है, आता है और 'डंस' कर चला जाता है और अब शायद उसने रूप बदल लिया है। 'वो' अब स्याह लिबास में होता है और बिना आवाज' के मुझसे बातें करता है। अब्बू... 'वो' मेरे दिमाग में बोलता है। उसने मुझे धमकी दी थी कि अगर कोई उसके और मेरे बीच में आया तो ' वो' उसे बर्बाद कर देगा। अब्बू इसीलिए मैंने निकाह से इंकार कर दिया था। आपने मेरी बात नहीं मानी अब्बू...। अब आप नतीजा देख लें...।" हिना का स्वर भर्रा गया।
समीर राय की हैरतें बढ़ी थीं और बदहवासी भी। लेकिन उसने खुद को संभाला और बेटी को तसल्ली देते बोला- "तुम परेशान मत होवो, हिना। तुम्हारा बाप इतना कमजोर नहीं है कि वह एक सांप से डर जाए।"
उसने हिना के दोनों हाथ मजबूती से पकड़ लिए.... हिना के हाथ ठण्डे हो रहे थे। समीर राय कुछ क्षण बेटी के चेहरे को निहारता रहा, फिर आगे बोला-"यह तुमने बहुत अच्छा किया कि सब कुछ मुझे बता दिया। अगर पहले बता देती तो और भी अच्छा होता। खैर, कोई बात नहीं। तुम फिक्र छोड़ दो। मैं देखता हूं कि इस बारे में क्या किया जा सकता है...।"
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अगले दिन !
मामा सुखदेव, सुहेल के साथ हॉस्पिटल पहुंचे। टैस्ट रिपोर्ट आ चुकी थीं। वह रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के कमरे में पहुंचे ही थे कि समीर राय भी वहां पहुंच गया।
डॉक्टर ने रिपोर्ट पढ़ीं व फिर बोला "रिपोर्ट तो सारी क्लीयर हैं। इन्हें गले की कोई 'प्रॉब्लम' नहीं है। अब एक मशवरा मैं आपको दूंगा।"
वह मामा सुखदेव से सम्बोधित थे।
"जी, कहिये..." मामू बोले।
"अगर आप उचित समझें तो इन्हें किसी मनोवैज्ञानिक को दिखा लें। कभी-कभी कोई भावनात्मक... सैन्टीमेंटल 'प्रॉब्लम' बोलने की ताकत को प्रभावित कर देती है...।" डॉक्टर ने मशवरा दिया।
"ठीक है, डॉक्टर! आपका शुक्रिया।" सुखदेव ने सहमति में गर्दन हिलाते कहा व उठ खड़ा हुआ। उसने समीर राय व सुहेल को भी उठने का इशारा किया था।
वे डॉक्टर का शुक्रिया अदा कर कमरे से बाहर निकल आए।
"क्या ख्याल है...साइकोटिस्ट को दिखाएं...?" सुखदेव ने समीर की राय जाननी चाही।
"दिखाने में क्या हर्ज है...।" समीर राय ने सहमति जतलाई । वह उन्हें हकीकत से आगाह कर खौफजदा नहीं करना चाहते थे। हालांकि हकीकत अब उससे छिपी नहीं थी।
फिर शहर के एक बड़े मनोवैज्ञानिक से अप्वाइंटमेंट लेकर उसी दिन सुहेल को उसे दिखाया गया। इस डॉक्टर ने लगभग एक घंटा सुहेल से एकांत में बातचीत की थी। डॉक्टर के तमाम सवालों के जवाब सुहेल ने लिख कर दिए। इन जवाबों को डॉक्टर ने बड़े गौर से पढ़ा और फिर सुहेल को अंदर ही छोड़कर खुद बाहर आ गया।
उसने मामू सुखदेव से सिर्फ एक सवाल पूछा- "किसी किस्म का कोई जहनी सदमा तो नहीं पहुंचा इन्हें...?"
"नहीं, ऐसा कुछ नहीं है।" मामू ने जवाब दिया, फिर एकदम ने बोले-"हां, एक बात जरूर है।"
"वह क्या...?"
"इसका निकाह हुआ है... एक दिन पहले! यूं समझें कि रात को निकाह हुआ और सुबह यह अपनी आवाज खो बैठा था।" सुखदेव ने बताया- "और डॉक्टर, आपके किसी सवाल से पहले मैं एक बात बिल्कुल साफ तौर पर बता देना चाहता हूं कि इसकी शादी इसकी मर्जी व पसन्द से हुई है। इस निकाह से उसे किसी सदमे की बजाय दिली खुशी है, हां, अगर इस खुशी के मारे यह गुंग होकर रह गया है तो मैं कह नहीं सकता...।" सुखदेव ने यह कहते हुए एक निगाह समीर राय पर डाली और पुनः डॉक्टर की तरफ आकर्षित हो गया।
डॉक्टर मुस्कुरा दिया, बोला- "कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लोग अचानक खुशी की खबर सुनकर मर जाते हैं... उनका हार्टफेल हो जाता है। लेकिन यहां शायद यह मामला नहीं है। बहरहाल, मैं एक दवा लिखे देता हूं। इन्हें सात दिन खिलाएं, फिर आकर मुझे बताएं।"
डॉक्टर ने पर्ची पर दवा लिखकर मामू सुखदेव के हवाले की और फिर अपने असिस्टेन्ट को इशारा करके सुहेल को बाहर बुलवा लिया।
समीर राय, सुहेल के कंधे पर हाथ रख उसे बाहर ले आया समीर समझ रहा था
यह नहीं है, यह है... उसका, जो एक बिल्ली के बच्चे के साथ फुटपाथ पर बैठा है।
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हिना अब संयत व संजीदा थी- "मैं आपको अपने बचपन की बहुत-सी बातें बता चुकी हूं। जो बातें उस वक्त मेरे छोटे से जहन में साफ नहीं थीं.....वो अब स्पष्ट होकर मेरे सामने आ गई हैं। मैं बहुत कुछ समझ पा रही हूं...।"
"हां, बताओ बेटा। जो कुछ भी तुम जानती हो... समझ पा रही हो....सब पूरे इत्मीनान के साथ बताओ...।" सब कुछ जानने को आतुर समीर राय ने उसे हौसला दिया।
"मेरा बचपन एक तिलस्मी माहौल में बीता था, अब्बू... हिना याद करते बोली- "वहां एक हालनुमा कमरा था। उस कमरे में हजारों 'ताख' बने हुये थे और हर 'ताख' में एक बुत रखा हुआ था। उस कमरे का फर्श सुर्ख ईंटों का था, मैं उस फर्श पर दौड़ती-फिरती थी। वहां बेशुमार सांप होते थे। मैं उनमें खेला करती थी...।"
हिना की आंखों में यादों का अलाव रोशन था और वह यादों में खोई धीरे-धीरे बोल रही थी
"अब्बू...वहां उस मायावी लोक में उन 'बुतों का एक देवता था। चाहें तो आप उसे सांपों का बादशाह कह लें। उसके सिर पर एक सुनहरा सांप कुंडली मारे ताज की तरह सजा रहता था। उस बादशाह का नाम परमान था। सांपों के इस बादशाह ने मुझे अपने बेटे के लिए चुन रखा था। उसके बेटे का नाम रनतारो था। मैं जब तक वहां रही...मैंने कभी रनतारो को नहीं देखा था, बस उसके बारे में अजीब-अजीब किस्से सुने थे... जो उस वक्त मेरी समझ से ऊपर थे, लेकिन अब हर चीज आईने की तरह साफ हो चुकी है।
'अब्बू... कुछ अर्सा पहले रात की रानी पर जो सांप दिखाई देता था...वो रनतारो ही था। फिर बर्थ-डे वाली रात 'वो' मुझ तक पहुंचा।
उस रात उसने मुझे 'डंसा', अब उसका जब जी चाहता है, आता है और 'डंस' कर चला जाता है और अब शायद उसने रूप बदल लिया है। 'वो' अब स्याह लिबास में होता है और बिना आवाज' के मुझसे बातें करता है। अब्बू... 'वो' मेरे दिमाग में बोलता है। उसने मुझे धमकी दी थी कि अगर कोई उसके और मेरे बीच में आया तो ' वो' उसे बर्बाद कर देगा। अब्बू इसीलिए मैंने निकाह से इंकार कर दिया था। आपने मेरी बात नहीं मानी अब्बू...। अब आप नतीजा देख लें...।" हिना का स्वर भर्रा गया।
समीर राय की हैरतें बढ़ी थीं और बदहवासी भी। लेकिन उसने खुद को संभाला और बेटी को तसल्ली देते बोला- "तुम परेशान मत होवो, हिना। तुम्हारा बाप इतना कमजोर नहीं है कि वह एक सांप से डर जाए।"
उसने हिना के दोनों हाथ मजबूती से पकड़ लिए.... हिना के हाथ ठण्डे हो रहे थे। समीर राय कुछ क्षण बेटी के चेहरे को निहारता रहा, फिर आगे बोला-"यह तुमने बहुत अच्छा किया कि सब कुछ मुझे बता दिया। अगर पहले बता देती तो और भी अच्छा होता। खैर, कोई बात नहीं। तुम फिक्र छोड़ दो। मैं देखता हूं कि इस बारे में क्या किया जा सकता है...।"
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मामा सुखदेव, सुहेल के साथ हॉस्पिटल पहुंचे। टैस्ट रिपोर्ट आ चुकी थीं। वह रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के कमरे में पहुंचे ही थे कि समीर राय भी वहां पहुंच गया।
डॉक्टर ने रिपोर्ट पढ़ीं व फिर बोला "रिपोर्ट तो सारी क्लीयर हैं। इन्हें गले की कोई 'प्रॉब्लम' नहीं है। अब एक मशवरा मैं आपको दूंगा।"
वह मामा सुखदेव से सम्बोधित थे।
"जी, कहिये..." मामू बोले।
"अगर आप उचित समझें तो इन्हें किसी मनोवैज्ञानिक को दिखा लें। कभी-कभी कोई भावनात्मक... सैन्टीमेंटल 'प्रॉब्लम' बोलने की ताकत को प्रभावित कर देती है...।" डॉक्टर ने मशवरा दिया।
"ठीक है, डॉक्टर! आपका शुक्रिया।" सुखदेव ने सहमति में गर्दन हिलाते कहा व उठ खड़ा हुआ। उसने समीर राय व सुहेल को भी उठने का इशारा किया था।
वे डॉक्टर का शुक्रिया अदा कर कमरे से बाहर निकल आए।
"क्या ख्याल है...साइकोटिस्ट को दिखाएं...?" सुखदेव ने समीर की राय जाननी चाही।
"दिखाने में क्या हर्ज है...।" समीर राय ने सहमति जतलाई । वह उन्हें हकीकत से आगाह कर खौफजदा नहीं करना चाहते थे। हालांकि हकीकत अब उससे छिपी नहीं थी।
फिर शहर के एक बड़े मनोवैज्ञानिक से अप्वाइंटमेंट लेकर उसी दिन सुहेल को उसे दिखाया गया। इस डॉक्टर ने लगभग एक घंटा सुहेल से एकांत में बातचीत की थी। डॉक्टर के तमाम सवालों के जवाब सुहेल ने लिख कर दिए। इन जवाबों को डॉक्टर ने बड़े गौर से पढ़ा और फिर सुहेल को अंदर ही छोड़कर खुद बाहर आ गया।
उसने मामू सुखदेव से सिर्फ एक सवाल पूछा- "किसी किस्म का कोई जहनी सदमा तो नहीं पहुंचा इन्हें...?"
"नहीं, ऐसा कुछ नहीं है।" मामू ने जवाब दिया, फिर एकदम ने बोले-"हां, एक बात जरूर है।"
"वह क्या...?"
"इसका निकाह हुआ है... एक दिन पहले! यूं समझें कि रात को निकाह हुआ और सुबह यह अपनी आवाज खो बैठा था।" सुखदेव ने बताया- "और डॉक्टर, आपके किसी सवाल से पहले मैं एक बात बिल्कुल साफ तौर पर बता देना चाहता हूं कि इसकी शादी इसकी मर्जी व पसन्द से हुई है। इस निकाह से उसे किसी सदमे की बजाय दिली खुशी है, हां, अगर इस खुशी के मारे यह गुंग होकर रह गया है तो मैं कह नहीं सकता...।" सुखदेव ने यह कहते हुए एक निगाह समीर राय पर डाली और पुनः डॉक्टर की तरफ आकर्षित हो गया।
डॉक्टर मुस्कुरा दिया, बोला- "कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लोग अचानक खुशी की खबर सुनकर मर जाते हैं... उनका हार्टफेल हो जाता है। लेकिन यहां शायद यह मामला नहीं है। बहरहाल, मैं एक दवा लिखे देता हूं। इन्हें सात दिन खिलाएं, फिर आकर मुझे बताएं।"
डॉक्टर ने पर्ची पर दवा लिखकर मामू सुखदेव के हवाले की और फिर अपने असिस्टेन्ट को इशारा करके सुहेल को बाहर बुलवा लिया।
समीर राय, सुहेल के कंधे पर हाथ रख उसे बाहर ले आया समीर समझ रहा था
यह नहीं है, यह है... उसका, जो एक बिल्ली के बच्चे के साथ फुटपाथ पर बैठा है।
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