Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा ) - Page 12 - SexBaba
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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

जाने उसके जहन में यह बात क्यों आई कि कहीं सितारा भी 'डसी' तो नहीं गई है। यह अन्देशा जाता रहा तो उसने उसके पेट पर कमीज सही की और फिर गिलास से पानी लेकर उसके मुंह पर छीटें मारने लगी। उसके जहन में यही सवाल था कि आखिर सितारा उसके कमरे में आकर बेहोश कैसे हो गई?

कुछेक क्षणों बाद सितारा के बदन में हल्का हल्का कम्पन हुआ तो हिना ने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर कहा "...सितारा...आंखें खोलो सितारा...।" सितारा ने फौरन आंखें खोल दीं। हिना को देखकर उसे इत्मीनान -सा हुआ। पर फिर जैसे ही उसे याद आया कि वह क्या देखकर बेहोश हुई थी...तो वह घबराकर एकदम उठकर बैठ गई।

"बीवी...।"

उसने फटी-फटी आंखों से पूरे कमरे का जायजा लिया - "वो...वो...।"

कुछ देखा है तूने कमरे में...?" हिना ने उसका हाथ पकड़ उसे उठाते हुए पूछा।

"हां...बीवी... हां... । वो...वो...।" सितारा के चेहरे पर घबराहट छा गई।

"परेशान मत हो । अब मैं आ गई हूं। बेड पर बैठ...।" हिना ने तसल्ली दी।

सितारा ने उसका हाथ मजबूती से थाम लिया। फिर वेड पर बैठने के बाद ही उसका हाथ नहीं छोड़ा। वह बेहद डरी हुई थी। हिना ने पानी का गिलास उसे थमा दिया। सितारा जल्दी-जल्दी सारा पानी पी गई और फिर डरी-डरी निगाहों से हिना की तरफ देखने लगी।

"डर क्यों रही हो?" हिना उसके दोनों हाथ थामते हुए बोली-"मुझे वताओ, क्या मामला है?"

"बीवी...मैं आपके कमरे में सफाई के लिए आई थी। रोज ही आती हूं। पर आज से पहले वो मुझे कभी नजर नहीं आया था।" सितारा खुद को सम्भालते हुए बोली।

"वो... कौन...? सांप था कोई...?" हिना ने अपना अनुमान लगाया।

"अरे नहीं बीवी! वो सांप नहीं था। वो जाने कौन था। यहीं बैठा था...जहां इस वक्त आप बैठी हैं। उसका पूरा बदन काले लिबास में ढंका हुआ था। चेहरा भी छिपा हुआ था। एक घूंघट-सा निकाला हुआ था... और उधर खिड़की की तरफ देख रहा था। मैं दरवाजा खोलकर जैसे ही अन्दर आई... उसने गर्दन घुमाकर मेरी तरफ देखा और

फिर तेजी से उठकर मेरी तरफ आया। मैं इतनी खौफजदा हो गई कि मेरी चीख भी न निकली। मेरी तो आंखों के आगे एकदम अंधेरा छा गया और मैं चकराकर गिर पड़ी...।" यह बताते-बताते सितारा की हालत फिर असामान्य होने लगी।

"डर मत... अब यहां कोई नहीं आ सकता...।" हिना धीरे से बोली।

"अल्लाह का शुक्र है बीवी कि आपने मेरी बात का यकीन कर लिया... वरना मेरा तो ख्याल था कि आप मेरा मजाक उड़ाएंगी...।"

"सितारा मैं जानती हूं कि तू सच कह रही है। फिर आखिर तुझे कोई ड्रामा करने की जरूरत भी क्या है। अच्छा, यह बता क्या तूने उसका चेहरा देखा था?"

"नहीं बीवी! मैंने बताया है ना कि उसने घूंघट-सा निकाल रखा था । "

"अच्छा, अब मेरी बात गौर से सुन। तू यह बात किसी को नहीं बताएगी। यहां तक कि अपनी मां को भी नहीं...।" हिना ने उसे सचेत किया।

"आखिर क्यों बीवी...।" वह परेशान हो गई।

"इसलिए कि सुनने वाले खामखां परेशान हो जाएंगे...।"

हिना ने समझाया- "तेरी मां का तो बुरा हाल हो जाएगा। वह तो वैसे ही जिन्न भूतों से बहुत डरती है।"

"हाय बीवी! क्या वो जिन्न था...?"

"अल्लाह जाने...।" हिना उसे टालते हुए बोली।

"बीवी...यह भी अच्छा हुआ कि आपने मुझे बेहोशी की हालत में देखा। अम्मा तो यही समझ रही होंगी कि मैं इतनी देर में यहां सफाई-सुथराई में लगी हूं। अगर वह देख लेती तो फिर उनसे कुछ छिपाना मुश्किल हो जाता।"

"मैं यह बात अब्बू को जरूर बताऊंगी...।" हिना कुछ सोचते हुए बोली- "बस और किसी को नहीं। उनको बताना जरूरी है।"

"जैसी आपकी मर्जी! वैसे यह बात सुनकर मालिक मुझे डांटेंगे तो नहीं...?" सितारा बोली।

"डाटेंगे क्यों...?" हिना अपनत्व से बोली-"जाओ, अब तुम भागो। खाने का इन्तजाम करो। बहुत भूख लगी है...।"

"आप मुंह-हाथ धोयें...।' सितारा बोली-"और डाइनिंग देती हूं।"

टेबल पर आ जाएं। मैं खाना लगा सितारा उठ गई। समीर राय कोठी पर ही थे और अभी उन्होंने भी खाना नहीं खाया था, हिना उन्हें खुद उनके कमरे से बुला लाई। दोनों ने मिलकर खाना खाया। खाने के बाद समीर राय का कॉफी पीने का मूड बना तो हिना बोली - "अब्बू, आप मेरे कमरे में चलें। मैं कॉफी बनाकर लाती हूं।"

"खैर तो है...?" समीर राय उठते हुए बोले।

"हां अब्बू...! खैर ही है। बस मेरा जी चाह रहा है कि आज मैं खुद आपको कॉफी बनाकर पिलाऊं...।" हिना ने हंसते हुए कहा।

हिना के किचन में जाने के बाद समीर राय उसके कमरे में आ गया और नर्म कोमल तकिये कमर के पीछे रखकर इत्मीनान से बैठ गया।

कमरे में हल्की-हल्की अजीब सी खुशगवार खुशबू फैली हुई थी। समीर राय ने दो-तीन गहरे सांस लिए। उसने 'खुशबू' पहचानने की कोशिश की। खुद समीर राय को परफ्यूम इस्तेमाल करने का वेहद शौक था। परफ्यूम की विभिन्न व आला

शीशियों से उनका ड्रैसिंग रूम भरा पड़ा था, लेकिन इस खुशबू की शिनाख्त वह भी न कर पाये।

हिना थोड़ी ही देर में ट्रे उठाये कमरे में दाखिल हुई। उसने ट्रे सेन्टर टेबल पर रखी व कपों में कॉफी उंडेलन लगी तो समीर राय ने पूछा-

"हिना यह कौन-सी खुशबू है...?"

हिना ने चारों तरफ देखा। उसका ख्याल था कि शायद अब्बू की निगाह किसी परफ्यूम की शीशी पर पड़ी है, लेकिन उसे कोई शीशी या स्प्रे नजर नहीं आया तो वह बोली-

"कहां अब्बू...?"

"जो इस वक्त तुम्हारे कमरे में महसूस हो रही है। कोई एयर-फ्रेशर है क्या...?" समीर राय कप थामे हुए बोले।

"नहीं अब्बू...!" हिना ने लम्बा सांस लेते हुए कहा- "यह खुशबू तो मेरे कमरे में आती रहती है। कभी-कभी तो यह बहुत तेज हो जाती है...।"

"हैरत है...।" वह बड़बड़ाये और दो-तीन लम्बे गहरे सांस लिए ।

हा अब्बू.... हाँ अब्बू हैरत ही हैरत है...।"

"क्यों, क्या हुआ...?" हिना के लहजे में कुछ ऐसा था कि समीर राय चौंक गया।

"अब्बू... आज जब मैं कालेज से वापिस आई तो सितारा मुझे इस कमरे में बेहोश मिली...।" हिना पापा के पैरों के निकट बैठते हुए बोली।

"हैं...!" समीर राय वाकई हैरान रह गया- “लेकिन मुझे तो किसी ने कुछ नहीं बताया।"

"किसी को कुछ मालूम होता तो आपको बताता..." हिना वोली-"वैसे अब मैंने सितारा को मना कर दिया है कि वह किसी को कुछ न बताये...।"

"हुआ क्या था...?" समीर राय ने पूछा।

...जब वह कमरे में सफाई के लिये आई तो उसने वेड पर एक शख्स को बैठे हुए देखा

"एक शख्स को बैठे हुए देखा...! कौन था वो...?" समीर राय की आंखों से रोष झलकने लगा। वह कुछ और समझा। वह समझा शायद घर के किसी नौकर-चाकर ने यह धृष्टता की है।

"अब्बू... मेरा यकीन है कि वो शख्स वह था... जिसे मैं अक्सर ख्वाब में देखती हूं। काले कपड़े में सिर से पैरों तक ढंका हुआ... ऊंचा लम्बा...।"

"यह तुम क्या कह रही हो...?" समीर राय ने उसे अविश्वास से देखा।

"मैं सच कह रही हूं अब्बू...।" हिना ने बताया- "सितारा को देखकर वह उठा व तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ गया...।"

"फिर...?

"बस अब्बू, फिर क्या... सितारा के लिए इतना ही काफी था। वह ऐसी खौफजदा हुई कि चीख भी न सकी। गिरी और बेहोश हो गई...।" हिना ने बात पूरी की।

"ओह...यह तो बहुत खतरनाक बात है। समीर राय चुसकना भूल गया-"तुम्हारे ख्वाब में आने वाला तुम्हारे कमरे में आ गया। बेटी! मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा...।"

"अब्बू...! अब मैं क्या कहूं...? मेरी तो खुद की समझ काम नहीं कर रही...।"

समीर राय कुछ क्षण खामोश रहा, फिर बोला-"अच्छा, फिर ऐसा करते हैं...।" उसे भविष्यवक्ता व तांत्रिक युवती अरुणिमा का ख्याल आ गया-"हम देवी अरुणिमा से मिलने चलते हैं। तुम मेरे साथ चलोगी। अब इस मामले में हमें देवी अरुणिमा की मदद लेनी होगी...।"

यूं समीर राय अगले दिन सुबह-सुबह ही अपनी बेटी हिना के साथ... भविष्यवक्ता आमिल देवी अरुणिमा से मिलने के लिए निकल लिया था।
 
कार में उसके साथ दो सशस्त्र गार्ड भी थे। गाड़ी समीर राय खुद चला रहा था और गार्ड व ड्राइवर पिछली सीट पर बैठे हुए थे। समीर राय को गाड़ी स्पीड से चलाने की आदत थी। उसकी कार उड़ी चली जा रही थी।

हिना उसके साथ वाली सीट पर खामोश बैठी थी।

यह करीब दस बरस पहले की बात थी, जब समीर राय इस तांत्रिक भविष्यवक्ता देवी अरुणिमा से मिला था...तब इस अरुणिमा ने ही उसकी बिछुड़ी बेटी हिना को उनसे मिला दिया था... और हिना की मां नमीरा के मुर्दा जिस्म को भी आजाद करा दिया था, जो एक अघोरी साधू औघड़नाथ के कब्जे में था।

देवी अरुणिमा की इन मेहरबानियों पर समीर राय एक बार उसका शुक्रिया अदा करने गया था। उसके बाद वह फिर कभी नहीं गया। वैसे इस भविष्यवक्ता अरुणिमा ने स्वयं भी मना कर दिया था...कहा था- "चूंकि आपकी समस्याएं अब खत्म हो चुकी हैं... इसलिए आइन्दा आने की जरूरत नहीं... ।"

और शुक्र था कि यह दस साल सुकून से बीत गये थे। यह अब पहली बार ही कुछ उलझन पैदा हुई थी।

कितनी विचित्र व अविश्वसनीय बात थी कि हिना को जो शख्स ख्बाव में निरन्तर दिखाई दे रहा था... वो अब सशरीर साक्षात् उसके कमरे तक आ पहुंचा था।

समीर राय सिर्फ इतना ही तो जानता था और असली बात से वह अभी अनजान था कि एक साप उसका बटी का जाना हराम किए हुए है कि वा अचानक कमर कहीं से नमूदार होता है और उसे 'डस' कर चला जाता है। अगर यह बात हिना अपने बाप को बता देती तो जाने उसकी क्या हालत होती।

समीर राय ने भविष्यवक्ता नजूमी अरुणिमा के घर के बाहर गाड़ी रोक दी। उसने हिना को अपने साथ लिया और ड्राइवर व गार्डों को गाड़ी में ही बैठे रहने की हिदायत दी।

समीर राय ने चलने से पहले ही हिना को इस देवी अरुणिमा के बारे में बहुत कुछ बता दिया था। हिना इस वक्त उद्विग्नता का शिकार थी, वह चमत्कारी युवती बड़ी जिज्ञासू थी... जिसकी उम्र इस वक्त चौबीस-पच्चीस बरस थी... और जो चौदह-पन्द्रह बरस की उम्र से ही काम आमिल बुजुर्ग की तरह करती आ रही थी। समीर राव उस मकान को भूला नहीं था। वो पूरे यकीन के साथ उस मकान पर पहुंचा था। घर जैसा ही था...बस सिर्फ हाल ही में उसकी सफेदी पेन्ट हुई नजर आ रही थी।

समीर राव ने कॉलबेल बजाई और थोड़ा पीछे आकर खड़ा हो गया।

कुछ देर बाद भीतर का दरवाजा खुलने की आवाज आई और साथ ही एक मर्दाना आवाज सुनाई दी- "कौन है...?"

समीर को थोड़ी हैरत हुई... क्योंकि वह जब भी यहां जाया उसने घर में किसी मर्द को नहीं पाया था। दरवाजा देवी अरुणिमा की मां रजनी ही खोला करती थी। अरुणिमा खुद दरवाजे तक न आती थी।

समीर राय क्या जवाब देता कि वह कौन है?

कोई जवाब न पाकर आने वाले ने गेट खोला व उन दोनो को हैरान होकर देखा, फिर बोला--"जी कहिये...?"

वह एक करीब पचास साला शख्स था... नजर का चश्मा लगाए हुए! कुर्ता-पाजामा पहने हुए था और सूरत से पढ़ा-लिखा मालूम होता था, समीर राय ने एक कदम आगे बढ़कर कहा-

"मेरा नाम समीर राय है। मुझे देवी अरुणिमा से मिलना है...।"

"अरुणिमा...!" उसने हैरत से दोहराया फिर बोला--"ओह! आज शायद वर्षों बाद यहां आए हैं। खैर, देवी अरुणिमा अव यहां नहीं रहती। उन्हें गये हुए एक अरसा हो गया है।"

"अरे... कहां गई वह...?" समीर राय परेशान हो गया। "कुछ साल पहले उनकी शादी हो गई थी। उनकी शादी के बाद उनकी मां का स्वर्गवास हो गया। उसके बाद उन्होंने अपना यह घर बेच दिया। हम पहले उनके पड़ोसी थे... हमने यह घर ले लिया।

"अब वह कहां रहती हैं...?" समीर राय ने पूछा।

"पहले तो वह यहीं इसी शहर में रहती थी...लेकिन अब सुना है कि वह अपने पति के साथ अमेरिका चली गई है।" उस शख्स ने बताया।

"जी...बहुत शुक्रिया जनाब! आपको कष्ट हुआ...!"

"नहीं... कोई बात नहीं। आप कहीं शायद दूर से आए हैं...?" उसने पूछा।

"जी... मुम्बई से...।"

"आप अगर आराम करना चाहें तो घर हाजिर है... चाय-वाय पीकर चले जाइयेगा...।"

"जी आपकी इस इनायत का शुक्रिया! हम वापिस जाएंगे। हम अपनी गाड़ी में आए हैं।"

समीर राय को बड़ी हताशा हुई। वह तो बड़ी उम्मीदों के साथ यहां आया था। उसे विश्वास था कि यह चमत्कारी भविष्यवक्ता उनकी समस्या का समाधान कर देगी, लेकिन वह तो यहां से हमेशा के लिए जा चुकी थी। अब उससे कभी मिल पाने की आस ही नहीं रही थी।

"अब क्या करें बेटी...?" वह गाड़ी की तरफ लौटते हुए बोला।

"अब्बू... रोशनगढ़ी चलें। मुझे दादी याद आ रही हैं। उन्हें देखे काफी दिन हो गये हैं...।" हिना ने इच्छा व्यक्त की।

"ओह हां। यह ठीक है...।" समीर राय ने सहमति दर्शाई

समार का इकट्ठ देखकर नफासा बगम का खुशी का ठिकाना रहा।

उन्होंने अपनी पौत्री को खूब भींच भींच कर प्यार किया। समीर राय यह सब देख खुश हुआ था।

वह हंसते हुए बोला- "मां, सारा प्यार पोती पर ही लुटा दोगी...आखिर मैं भी तो हूं...।"

"हाँ, तू क्यों नहीं बेटा। आ....मेरे पास जा...।" नफीसा बेगम ने कहा और फिर उसके दोनों हाथ थामकर उसका चेहरा देखते हुए बोली- "बेटा, तू दुबला हो रहा है।"

"मैं बिल्कुल ठीक हूं, अम्मी जान! वैसे हर मां को अपना बेटा कमजोर हो गया ही दिखाई देता है...।" समीर ने हंसकर कहा।

"वो क्यों अब्बू...?" हिना ने पूछा।

"ताकि कहीं नजर न लग जाये।"

"क्या मां की भी नजर लग जाती है...?" हिना ने हैरत दर्शाई।

"मेरे ख्याल से तो नहीं लगनी चाहिये...लेकिन अम्मी शायद ऐसा ही सोचती हैं...। क्यों अम्मी...?"

नफीसा बेगम ने उसके सिर पर हाथ फेर कर हल्के से गले लगाया, फिर बड़े दुलार से बोली-" आज मैं बहुत खुश हूं, बेटा।"

"वह क्यों अम्मी...?" समीर राय ने शोखी से कहा।

"तुम दोनों को देखकर... अभी कल ही मैंने तुम दोनों को ख्वाब में देखा था...।"

"तभी तो... हम इसीलिए तो चले आए हैं...।"
 
जब से समीर राय ने मां को हिना के लिए आइन्दा कोई रिश्ता पसन्द न करने को कहा था...तब से मां उससे नाराज थी। उसे बेटे की यह बात बहुत बुरी लगी थी। इसीलिए वह बेटे के पास मुम्बई भी नहीं गई थी। हिना तो खैर कभी भूले-भटके ही रोशन गढ़ी आती थी...समीर जरूर चक्कर लगा लिया करता था, लेकिन मां के हिना का रिश्ता तय कर देने के बाद उसने ही इधर का रुख नहीं किया था। ऐसे में मां का खुश होना स्वाभाविक ही था। बाप-बेटी के आने से हवेली में जैसे जश्न का-सा समा बंध गया।

नौकर-चाकर समीर के आगे-पीछे मंडरा रहे थे। हिना की मौजूदगी ने हवेली को जैसे जगमगा दिया था। खास नौकरानी लोंगसरी तो हिना का साया ही बनी फिर रही थी।

नफीसा बेगम ने वहां अपनी बहन के गांव भेजा दिया था। उन्होंने मायरा और उसके घर वालों को बुला भेजा था। वह मायरा को समीर के लिए पसन्द किये बैठी थी और चाहती थी कि समीर उसे अपने 'निकाह' में ले ले। मायरा को बुलाने की बात उन्होंने समीर को नहीं बताई।

यूं लंच से कुछ देर पहले ही मायरा अपने मां-बाप के साथ आ पहुंची। मायरा को देखकर समीर राय का चेहरा खिल-सा गया... मायरा भी उसे देखकर महक उठी थी। उसने हिना को बड़ी मुहब्बत से गले लगाया...उसका कुशल क्षेम पूछा।

हिना चहकती-सी बोली- "मैं खुश हूं मायरा फूफी। आपने तो मुम्बई आना ही छोड़ दिया।"

"क्या करें भई, कोई बुलाता ही नहीं...।" मायरा सम्बोधित तो हिना से थी...लेकिन कनखियों से देख समीर राय को ही रही थी...जो निकट ही बैठे थे।

हिना बच्ची न थी। मायरा का आशय समझ वह अपने अब्बू से सम्बोधित हुई- "सुना आपने अब्बू ! फूफी आपसे कुछ कह रही है"

"क्या कह रही हैं...?" समीर ने अबोध बनकर पूछा।

"कुछ नहीं...।" मायरा बोल उठी।

"यह कह रही हैं कि आप इन्हें मुम्बई बुलाते ही नहीं...।"

"बेटा... इनसे कह दो कि वो घर इनका अपना है। जब जी चाहे आएं... जितने दिन चाहें रहें।" समीर राय ने सादगी से कहा।

"फूफी, अब तो आपको दावत मिल गई। अब तो आ' आएंगी ना...?" हिना शरारत से बोली। वह भी जानती थी कि उसकी मां की मौत के बाद नफीसा बेगम की ख्वाहिश थी कि उसके अब्बू समीर, इस मायरा फूफी से निकाह कर लें कि पहाड़-सी जिन्दगी अकेले नहीं कटती।

"ऐसी जबरदस्ती की दावत का क्या मान...?" मायरा ने समीर की तरफ देखे बिना कहा।

"चलो भई, खाना लग गया है...सब आ जाओ...।' नफीसा बेगम ने पुकारा तो बात वहीं की वही रह गई। सबने मिलकर खाना खाया। इस शोर-शराबे में खाने का हिना को बहुत मजा आया। मुम्बई में तो बस वे दो जने ही लम्बी-चौड़ी डायनिंग टेबल पर होते थे और कभी-कभी तो हिना अकेली ही टेबल पर होती थी।

खाने के बाद रात गये तक बातें होती रहीं। फिर समीर राय को नींद आने लगी तो वह अपने कमरे में चला गया। हवेली में कमरों की कमी नहीं थी, लेकिन हिना ने अपनी दादी के साथ ही सोना पसन्द किया।

हिना व नफीसा बेगम के साथ मायरा भी रही। वे लोग सुबह चार बजे तक बातें करते रहे। जब हिना बैठे-बैठे झपकियां लेने लगी तो मायरा उठकर चली गई।

देर तक जागने का परिणाम यह निकला कि हिना सुबह देर तक जागती रही। नफीसा बेगम हालांकि जल्दी उठ गई थी...लेकिन उसने हिना को उठाने की कोशिश नहीं की। हिना की आंख लगभग साढ़े ग्यारह बजे खुली। वक्त देखा तो वह हड़बड़ाकर बेड से खड़ी हो गई। उसने मुंह-हाथ धोया व फिर तलाश करती हुई अपने अब्बू के कमरे में पहुंच गई। समीर राय उठ चुका था और अपनी मां नफीसा बेगम से बातें कर रहा था।

"लो अम्मी...! वह हिना भी आ गई...।" समीर उसे कमरे में प्रवेश करते देख बोला ! हिना ने दोनों को सलाम किया और अपने बाप के बेड पर उनके साथ बैठ गई।

"कहो भई, कैसी कटी रात...?" समीर ने पूछा।

"अब्बू... रात को बड़ा मजा आया। खूब बातें की। मायरा आ खूब बातें करती हैं और दादी ने भी पुराने किस्से सुनाये...जाने हां-कहां के। सच अब्बू, बहुत अच्छा लगा...।" हिना चहकी थी

"फिर बेटा, ऐसा करते हैं...इधर ही रह जाते हैं। छोड़ो पढ़ाई-वढ़ाई।" समीर ने हंसकर कहा ।

"नहीं अब्बू...!" हिना एकदम संजीदा हो गई "मैं अपनी पढ़ाई नहीं छोडूंगी..." "मैं तो मजाक कर रहा था...।" समीर मुस्कुरा दिया।

"अब्बू...! कब्रिस्तान चलेंगे?" हिना ने जाने क्या सोचकर पूछा।

"क्यों... खैरियत...?" समीर ने चौंककर ही उसकी तरफ खा था।

"मैं अम्मी की कब्र पर जाना चाहती हूं...रात मैंने उन्हें ख्वाब देखा है...।"

"ठीक है बेटा! नाश्ता कर लो... फिर चलते हैं...।"

फिर नाश्ता करने के बाद समीर, हिना के साथ अपने खानदानी कब्रिस्तान पहुंच गया। उसने गाड़ी कब्र के निकट ही लाकर की थी।

नमीरा की कब्र एक ऊंची जगह पर चारदीवारी के अन्दर और घनें पेड़ों के बीच थी। हिना कब्र के सिरहाने सिर झुकाकर बैठ गई।

समीर राय ने नमीरा की कब्र से चन्द सूखे पत्ते उठाकर एक ओर फेंके और फिर हिना के करीब खड़े होकर 'दुआ' के लिये हाथ उठा दिये।

'फातहा' पढ़कर जब उसने हिना को देखा तो वह अभी भी सिर झुकाये बैठी नजर आई। वह उसके निकट ही बैठ गया और कोमलता से उसके सिर पर हाथ रखा। हिना ने सिर उठाकर अपने बाप की तरफ देखा। उसकी आंखें आंसुओं से भरी हुई थीं।

समीर राय ने ये आंसू अपने हाथ से साफ किये और हिना का हाथ पकड़कर चारदीवारी से निकल आया, उसका खुद का दिल तो भर आया था।

वह हिना का हाथ थामे खामोशी से गाड़ी की तरफ बढ़ा।

फिर अभी उसने गाड़ी का दरवाजा खोला ही था कि सहसा ना बोली- अब्बू... वो...।"

समीर राय ने उस तरफ देखा, जिधर हिना देख रही थी।

सामने एक पेड़ की ओट में एक शख्स खड़ा हुआ था। उसका आधा शरीर नजर आ रहा था। वो एक आंख से उन दोनों को बड़े गौर से देख रहा था।

"यह कौन है....?" समीर राय ने जैसे अपने आपसे पूछा था-"यह पहले तो यहां नहीं था...।"

"हां अब्बू...! जब हम यहां आए थे तो यह यहां नहीं था...।" हिना बोली।

"कोई फकीर है शायद...।" समीर ने अपना ख्याल जाहिर किया।

"हो सकता है...।" हिना उधर ही देखे जा रही थी।

"बेटी, तुम गाड़ी में बैठो... मैं देखता हूं...।"
 
समीर उस पेड़ की तरफ बढ़ गया...जो लगभग बीस गज के फासले पर था। समीर राय के पेड़ के पास पहुंचने तक वो शख्स टस से मस नहीं हुआ... वो वैसे ही पेड़ की ओट में खंड़ा एक आंख से समीर को अपने पास आते देखता रहा। न डरा.. ना सहमा और ना ही उसने भागने की कोशिश की।

समीर राम ने उसके करीब पहुंच तनिक सख्त स्वर में पूछा "कौन हो तुम...?"

"अल्लाह के बन्दे हैं... और कौन हैं...?" वो शख्स शांत संयत लहजे में बोला। "यहां छिपे क्यों खड़े हो...?"

"छिपे तो नहीं खड़े... छिपाये खड़े हैं..."

"क्या छिपाये खड़े हो...?" उसका अंदाजा समीर को बस लगा था।

"अपनी जात... और क्या...?" अजीब जवाब मिला।

"क्या मतलब...? वह क्या उल्टी बात कर रहे हो?"

"इतनी सीधी बात तुम्हारी समझ में नहीं आ सकती तो हम क्या करें।"

वो शख्स अभी भी पेड़ की ओट में था।

"इस कब्रिस्तान में खड़े होने की वजह...?" समीर राय उलझ-सा गया था।

"हम जानते हैं कि यह तुम्हारा खानदानी कब्रिस्तान है और हमें यहां पूछकर खड़ा होना चाहिये। तुम्हारा बाप अपनी जमीनों पर बहुत अकड़ता था। देख लो उसे तीन गज जमीन से ज्यादा हासिल नहीं। कल तुम्हें भी बस इतना ही मिलना है...।"

"माफी चाहता हूं बाबा...।" समीर बोला-"मेरा यह मतलब हरगिज नहीं था।"

"जा माफ किया...।" वो बड़े शाहाना स्वर में बोला- "उस बच्ची की खबर लो...उसके लिए यह बहुत मुश्किल घड़ी है...।" -

समीर चौंका, जाहिर था उसके सामने कोई पहुंचा हुआ बंदा था... उसने एकदम नर्म पड़ते जैसे अपनी मजबूरी बयान की--"मैं क्या करूं बाबा! आप ही कुछ बताएं...।"

"अरे, हमसे क्या पूछता है। हम तो यहां हैं... उससे जाकर पूछ जो तेरे इलाके में है...।"

"कौन बाबा...किससे पूछूं...?" समीर राय का दिल धड़कने लगा।

"जिस शहर से आया है...वहां की बात करते हैं...। 'वो' वहां बैठा है। उसे 'पेशवा हस्पताल' की दीवार के साये में तलाश कर...।" इस रहस्यमय व्यक्ति ने जैसे राह दिखाई।

"मैं पहचानूंगा कैसे...?"

"उस 'जबरदस्त' की बड़ी आसान पहचान है। एक बिल्ली का बच्चा होता है उसके पास...।"

"अच्छा... उनसे क्या कहूं...?"

"कुछ न कह... बस पीछा कर और उस वक्त तक पीछा कर जब तक 'वह' पीछे पलटकर न देख ले और तुझसे मुखातिब न हो जाए। वही तेरे मसले का हल बताएगा। हम तो यहां बैठे हैं...हम क्या कर सकते हैं। इस बच्ची का ख्याल रखना। इसके इर्द-गिर्द खतरनाक गेबी प्राणी मंडरा रहे हैं। अल्लाह रहम करे...।" यह कहकर वो शख्स तने के पीछे पूरा छिप गया।

"बाबा...मेरी बात सुनें...।" समीर राय जल्दी से बोला । 'खतरनाक प्राणी के जिक्र पर समीर राय का ध्यान उस काले लबादे वाले की तरफ चला गया था...जो हिना को पहले ख्बावों में और फिर सितारा को कमरे में नजर आया था। आखिर वो कौन है? और क्या चाहता है? समीर यही पूछना चाहता था।

उस पेड़ के पीछे से जब कोई जवाब नहीं मिला और ना ही वो शख्स दोबारा सामने आया तो समीर राय ने आगे बढ़कर पेड़ के पीछे देखा, लेकिन अब वहां कोई नहीं था। समीर राय ने जल्दी से पेड़ के गिर्द चक्कर लगाया, लेकिन वो शख्स कहीं न था। आसपास भी कहीं नजर नहीं आया था।

समीर राय गाड़ी के पास लौट आया।

हिना फ्रन्ट सीट पर बैठी सामने की तरफ देख रही थी। समीर राव ने स्टेयरिंग सम्भालते हुए पूछा- "क्या तुमने उस शख्स को देखा...?".

"हां अब्बू, देखा। लेकिन वो अचानक कहां गायब हो गया?" हिना बोली- "मैं उस पर बराबर नजर रखे हुए थी। 'वो' देखते-ही-देखते गायब हो गया। आप उसे ढूंढ रहे थे ना। मैंने उसे पेड़ के पीछे से निकलते हुए नहीं देखा...।"

अजीब आदमा आर अजीब बात करक चल बस बटा, अल्लाह तुम पर मेहरबान है। वो नजूमी देवी अरुणिमा नहीं मिली तो अल्लाह ने तुम्हारे लिए एक और सहारा पैदा कर दिया।" और फिर समीर राय ने गाड़ी चलाते हुए हिना को वे बातें बता दी, जो उसकी उस रहस्यमय शख्स से हुई थीं।

समीर राय जब मुम्बई में 'पेशवा हस्पताल पहुंचा तो उसे 'वो' दूर ही से नजर आ गया। 'वो' हस्पताल के गेट के पास ही दीवार से पीठ लगाये बैठा था। उसके दायीं तरफ एक फटा-सा बैग रखा था और इस बैग के ऊपर ही एक बिल्ली का बच्चा बैठा था। वह एक छोटा व कमजोर-सा बिल्ली का बच्चा था। ऐसा लगता था जैसे बेचारे को कुछ खाने-पीने को न मिलता हो। बिल्ली का यह बच्चा सफेद रंग का था। उसके दोनों कान व दुम अलबत्ता काले रंग की थी। उसके गले में एक डोरी थी, जिसमें एक घुंघरू बंधा हुआ था। था। हुलिया फकीरों जैसा और 'वो' शख्स खुद सांवले रंग का था। मैले से कपड़े पहने हुए था। अधेड़ उम्र का था। सिर और दाढ़ी के बाल काले थे। 'वो' दीवार से पीठ लगाए एकटक सड़क की तरफ देख रहा था।

समीर राय ने गाड़ी फुटपाथ की तरफ पार्क कर दी और फिर एक तरफ खड़ा हो उस शख्स को देखने लगा। शाम के साये बढ़ रहे थे। सूर्य अस्त होने को था।

सवाल यह था कि वह 'उसका' पीछा कैसे व क्यों करे? 'वो' तो इत्मीनान से बैठा था... और बस सामने की तरफ देखे जा रहा था। जबकि कब्रिस्तान में मिलने वाले उस रहस्यमय शख्स का यही निर्देश था कि-'उसका पीछा करना, जब तक 'वो' पलटकर न देखे और उससे सम्बोधित न हो...।

जबकि वह बिल्ली के बच्चे वाला एक जगह इत्मीनान से बैठा सामने शून्य में ही निहारे जा रहा था। ना ही वो किसी से मुंह से कुछ मांग रहा था.... और ना ही उसका हाथ खिचा हुआ था। उसके सामने न कोई कटोरा था और ना ही कपड़ा बिछाया हुआ था। समीर नहीं जानता था कि 'वो' यहां से किस वक्त उठता है...या फिर यहीं पड़कर सो जाता है। करीब ही एक जूस वाले की रेहड़ी थी। मालूमात के लिए समीर उसकी तरफ बढ़ गया। उसने एक गिलास जूस का ऑर्डर दिया और बात चलाई "भई, यह बाबा भी खूब हैं। इस बिल्ली के बच्चे को कुछ खिलाते-पिलाते भी हैं? बच्चा कैसा सूखा हुआ है..?"

"साहब जी...उसके बैग में रोटी होती है...बस, वही उसको खिलाता रहता है।" जूस वाले ने हंसकर कहा।

"यह बाबा क्या इसी तरह बैठा रहता है...?" समीर ने अपने मतलब का सवाल किया।

"हां साहब जी । यह सुबह से शाम तक बस इसी तरह बैठा रहता है। किसी की भी तरफ नहीं देखता। कुछ खाता-पीता भी नहीं। एक-दो बार मैंने जूस देने की कोशिश की...लेकिन उसने इंकार कर दिया। एक अजीब बात यह भी है कि यह किसी से कुछ मांगता भी नहीं... और मैंने किसी को इसे भीख देते हुए भी नहीं देखा... जबकि इस फुटपाथ से सुबह से शाम तक हजारों लोग गुजरते हैं..." जूस वाले ने उसकी तरफ जूस का गिलास बढ़ाते हुए कहा।

"कमाल की बात है...!" समीर ने हैरत दर्शाई-"क्या यह बाबा रात को यहीं सोते हैं?"

"नहीं जी! सूरज डूबने से कुछ पहले ही उठ जाते हैं और वो जो सामने आप पुल देख रहे हैं...उसी तरफ कहीं जाते हैं। पुल के उस पार एक छोटी-सी आबादी है। मेरा ख्याल है कि इनका बसेरा वहीं-कहीं होगा।" जूस वाले ने बताया ।

समीर राय तो बस इतना ही जानना था कि 'वो' वहां से कब उठता है। सूर्य डूबने में अब ज्यादा देर नहीं थी। इतना वक्त तो वह अपनी गाड़ी में भी गुजार सकता था।

उसने अपनी गाड़ी एक ऐसी जगह लाकर पार्क की, जहां से वो इस बाबा पर नजर रख सके।

इंतजार के क्षण उसने स्टीरिओ पर गजलों की एक कैसेट सुनते बिताये।
 
इंतजार के क्षण उसने स्टीरिओ पर गजलों की एक कैसेट सुनते बिताये।

और फिर सूरज अस्त होने को था तो बिल्ली वाले बाबा ने अपना बैग उठाकर कन्धे पर डाला, बिल्ली का यह बच्चा बैग के अन्दर ही था... और आराम से मुंह बाहर निकाले बैठा हुआ था। बाबा वहां से चल दिया। उसका रुख सामने वाले पुल की तरफ ही था।

समार राय गाड़ी निकल आया। उसने गाड़ा लाक का आर उसके पाछ चल दिया।

सड़क पार करके पुल का रास्ता पकड़ा। वो अपनी धुन में मग्न सीधा चला जा रहा था। पुल की सीढ़ियां चढ़ते हुए भी उसने रुककर या पलटकर देखने की कोशिश नहीं की। फिर वो पुल' क्रास कर गया। पुल की सीढ़ियां उतरने से पहले भी उसने पलटकर नहीं देखा...हालांकि अब समीर राय उसके पीछे उसके बहुत करीब था। पुल के निकट ही कुछ झोपड़ियां थीं। झोपड़ियों के सामने बच्चे खेल रहे थे। वो उन बच्चों के करीब से गुजरकर झोपड़ियों के बीच बने एक तंग से रास्ते में दाखिल गया। यह रास्ता कुछ कदम बाद ही दायीं तरफ मुड़ जाता था।

वो बाबा दायीं तरफ मुड़ गया।

अब समीर राय का आगे जाना बेकार था। वह झोपड़ियों दाखिल नहीं हो सकता था। वह निराश होकर वापिस पलट आया उसने कब्रिस्तान वाले उस रहस्यमय बाबा की हिदायत पर पूरा-पूरा अमल किया था, लेकिन बिल्ली वाले बाबा ने उससे सम्बोधित होना तो दूर... उसकी तरफ पलटकर भी नहीं देखा था।

वो पूरे चांद की रात थी।

रात की रानी की मुग्ध कर देने वाली खुशबू पूरे बंगले में फैल हुई थी और हिना सितारा के साथ लॉन में टहल रही थी। हिना ने चुप्पी साध रखी थी। सितारा ने एक- दो बार इधर-उधर की बात छेड़ने की कोशिश की थी...लेकिन हिना ने 'हूं... हां' के सिवाय कोई जवाब नहीं दिया तो फिर सितारा के और बोलने की हिम्मत नहीं हुई। वह समझ गई कि इस वक्त 'बीवी का कुछ बोलने का मूड नहीं है।

लगभग पौन घंटा टहलने के बाद हिना अपने कमरे में आ गई। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। वह कुछ थकान सी महसूस कर रही थी। वह दरवाजा बन्द करके अपने बेड पर धम्म से गिरी... और बिस्तर पर फैल-सी गई।

आज शाम से ही हिना के दिल को करार नहीं था। एक बेचैनी-सी थी। एक बेनाम- सी कसक। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसे क्या हो रहा है। बस, किसी काम में उसका दिल नहीं लग रहा था।

बिस्तर के हवाले हो उसे कुछ सुकून मिला, लेकिन यह सुकूर पांच-सात मिनट से ज्यादा का नहीं था। फिर वही बेकरारी शुरू हं गई। यही महसूस हो रहा था, जैसे उसकी कोई चीज गुम हो गई है... और वह उस चीज की तलाश में है, लेकिन उसे न तो यह मालूम हो रहा था कि उसकी क्या चीज गुम हुई है और ना यह समझ आ रहा था कि वह उस चीज को कहां तलाश करे।

वह चाह रही थी कि 'कोई आये लेकिन कौन आये और क्यों आए, मालूम नहीं था।उसे प्यास लग रही थी, लेकिन उसका मन पानी पीने को नहीं चाह रहा था। चाय-कॉफी का भी मूड नहीं था।

फिर सहसा किसी ने जैसे उसके कान के निकट सरगोशी की...जैसे कहा हो- "जाओ... नहा लो...।"

हिना ने फौरन तकिये पर दायें-बायें सिर घुमाकर देखा...लेकिन वहां कोई न था, लेकिन यह आवाज उसके कानों में निरन्तर गूंजती रही। यहां तक कि वह बाथरूम में जाने के लिए मजबूर हो गई। जब वह नहाकर बाहर निकली तो उसके दिल को किसी हद तक चैन आ गया था। वह नाइट गाउन में आइने के सामने खड़ी अपने बाल सम्भालती रही और रह-रहकर अपने को निहार भी लेती थी। अपनी ही खूबसूरत आंखों में झांकते... यह अहसास जोर मारने लगता कि उसे किसी का इन्तजार है... वह किसी के इन्तजार में है... लेकिन किस का इन्तजार... यह उसे मालूम नहीं था।

और तभी...कमरे में मंत्र-मुग्ध कर देने वाली खुशबू फैल गई। यह खुशबू उसकी जानी-पहचानी थी। इस खुशबू को महसूस करके उसकी बेचैनियों को करार आने लगा। लगा जैसे इन्तजार के पल खत्म हो गए हों।

उसके होठों पर मुस्कान नाच गई। उसने अपने सामने आइने में ही देखा था कि सुनहरी सांप रनतारो बेड पर फन फैलाये बैठा था।

हां...हिना को उसी की तो इन्तजार थी।

सितारा बड़े यत्न करके हार गई और हिना ने अपने कमरे का दरवाजा न खोला तो फिर वह मजबूर होकर समीर राय के पास चली गई।

समीर राय अखबार देख रहे थे। उन्होंने सितारा को परेशान हाल कमरे में प्रवेश करते देखा तो चौंककर पूछा- "क्या हुआ...?"

"मालिक...वो बीवी दरवाजा नहीं खोल रही।"

"अरे...।" समीर राय की निगाहें वाल क्लाक की तरफ उठ गईं-"बारह बज रहे हैं। अभी तक सो रही है। कालेज भी नहीं गई...।"

"मैं उन्हें उठाने के सारे जतन कर चुकी हूं...लेकिन आज तो वह उठकर ही नहीं दे रही...।"

"अच्छा ठहरो...।" समीर राय ने मेज की दराज से हिना के कमरे की डुप्लीकेट चाबी निकाली और उसके साथ हो लिया। समीर राय ने यह डुप्लीकेट चाबी अपने पास रखी हुई थी। जब से काले लिबास वाले का चक्कर चला था...समीर थोड़ा सतर्क हो गया था।

हिना के कमरे के दरवाजे पर पहुंचकर पहले समीर ने उसे आवाज दी। कोई जवाब नहीं मिला तो उसने चाबी से दरवाजा खोल लिया।

वह हवा के तेज झोंके की तरह कमरे में दाखिल हुआ। हिना अपने बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी। वह आधी बेड पर थी, आधी बेड से नीचे थी। उसका नाइट गाउन अस्त-व्यस्त था। सितारा लपककर आगे गई और हिना को चादर से ढक दिया। समीर ने उसे बेड पर सीधा लिटाया और सितारा से कहा...

"जाओ, ड्राइवर से कहो कि गाड़ी निकाले"

समीर राय बेटी का मुंह थपथपाने लगा... उसे धीरे-धीरे पुकारा- -"हिना....हिना...हिना बेटी। आंखें खोलो, बेटी..."

तभी सितारा की मां सरवरी घबराई हुई अन्दर दाखिल हुई--"हाय! क्या हुआ बीवी cht...?"

"पता नहीं...।" समीर राय संजीदगी से बोला- "तुम इसके कपड़े बदलो, सरवरी! मैं इसे हस्पताल लेकर जाता हूं...।"

नर्सिंग होम में डॉक्टरों की दो-तीन घन्टे की कोशिशों के बाद हिना को होश आया और होश में आते ही उसने जो पहली बात की, वह होश उड़ा देने वाली थी।

समीर राय के होश आखिर क्यों न उडते? तीन दिन बाद हिना की शादी होने वाली थी... और उसने होश में आते ही कहा था - "अब्बू... मेरा निकाह न करें। मैं अब शादी नहीं करना चाहती...।"

यह भी अच्छा था कि कमरे में इस वक्त कोई और नहीं था... हिना का यह अनुरोध सिर्फ समीर राय ने सुना था। कितनी ही चिन्ताजनक सोचें समीर के दिमाग में भर आईं। समीर ने बेटी की इस विस्फोटक ख्वाहिश पर कोई तीव्र प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की व बड़े ही पुरसुकून लहजे में बोला

"अच्छा बेटा! देखेंगे...जैसा तुम कहोगी...वैसा ही होगा, घर चलकर बात करेंगे...।" डॉक्टर ने ताकत की दवाइयां लिखकर हिना को डिस्चार्ज कर दिया। उसके ख्याल में हिना पूर्णतया स्वस्थ थी। उसे कोई रोग नहीं था...बस कमजोरी थी, तो उसने यह कमजोरी दूर करने के लिए शक्तिवर्द्धक दवाइयां लिख दी थीं।

समीर राय हिना को लेकर घर आ गया।
 
फिर शाम तक हिना की हालत बड़ी हद तक सम्भल गई थी। वह हंसने-बोलने लगी थी। अलबत्ता उसके चेहरे का पीलापन अभी बरकरार था। समीर राय ने उसकी बेहोशी व हॉस्पिटल जाने की कोई सूचना हेमा या सुहेल को नहीं दी थी। वह खामखां उन्हें परेशान नहीं करना चाहता था, लेकिन जब हिना कालेज नहीं पहुंची उ तो हेमा से रहा नहीं गया। उसने कालेज से घर आते ही फौरन हिना को फोन किया।

हिना को उसी वक्त घर लाया गया था। समीर राय ने सितारा से कहलवाया कि हिना की तबियत ठीक नहीं है और वह सो रही है।

इस पर हेमा ने सितारा से कहा-"ठीक है। मैं शाम को हिना को देखने के लिए आउ और फिर वह शाम को सुहेल के साथ आ भी पहुंची थी। समीर राय इस वक्त हिना के पास उसके कमरे में ही था। उन दोनों के आने की इत्तला मिली तो उसने हिना से पूछा-"क्या ख्याल है। उन्हें यहीं बुलवा लें या फिर ड्राइंगरूम में चलें...।"

हिना बोली- "ड्राइंगरूम में ही चलते हैं अब्बू...।"

तब समीर राय सितारा से बोले- "उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाओ और सरवरी से कहो कि चाय का इन्तजाम करें...।"

"जी मालिक...।" सितारा वापिस लौट गई।

सितारा के जाने के बाद हिना भी खड़ी हो गई और बाप से बोली-"आप चलें अब्बू ! मैं जरा फ्रेश होकर आती हूं...।"

समीर राय उसके कमरे से निकल आया।

उसने ड्राइंग रूम का रुख किया था...लेकिन उसका जहन उलझा हुआ था। हिना ने होश में आते ही शादी से इंकार किया था और समीर ने उसे टालने के लिए हामी भर ली थी कि वह जैसा चाहेगी... वैसा ही होगा। फिर इस बारे में हिना से बात करने का मौका नहीं मिला था और अगर मौका मिला भी था तो वह इस विषय में बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था।

अपनी बेटी का यह फैसला समीर राय की समझ से बाहर था। और अब परेशानी यह थी कि वे दोनों आए हुए थे... और अगर हिना ने उन्हें भी अपने इस फैसले से आगाह कर दिया तो स्थिति गम्भीर हो जानी थी और समीर राय ऐसा नहीं चाहता था। वह चाहता था कि पहले हिना से इस बारे में खुलकर बात हो जाये... उसके बाद मौका निकालकर ही उन लोगों से बात करेगा। अभी निकाह में तीन दिन थे। हालात सम्भालने के लिए फिलहाल, किसी भी बहाने शादी की तारीख आगे बढ़ाई जा सकती थी। यही सब सोचते हुए समीर राय ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ। भाई-बहन उसे देखते ही उठ खड़े हुए थे। दोनों ने उन्हें सलाम किया। औपचारिक वार्तालाप के बाद हेमा बोली-

"अंकल, हिना कैसी है? कहां है वह?"

"आ रही है।" समीर राय ने अपनत्व से कहा-"और बिल्कुल ठीक है...बस थोड़ी कमजोरी है...।"

"यह हिना को अचानक क्या हो जाता है...?" हेमा चिन्तित-सी बोली- "अभी कुछ दिन पहले भी उसकी हालत खराब हो गई थी... एकदम ही पीली पड़ गई थी...।"

"कुछ समझ में नहीं आ रहा बेटी...! डॉक्टर बस कमजोरी बताते हैं...।" समीर ने जवाब दिया।

तभी हिना ने ड्राइंगरूम में कदम रखा "लो वह आ गई...।"

सुहेल उसे देखकर खड़ा हो गया और बड़े अपनत्व के साथ पूछा, "कैसी हैं आप ?"

"ठीक हूं...।" हिना ने नीची निगाहों से धीमे से जवाब दिया।

हेमा उसे देखकर आगे बढ़ी, उसे अपने गले से लगाया। व हंसकर बोली-"क्या मुश्किल है...क्यों परेशान कर रही हो?"

हिना ने सोफे पर बैठते हुए बड़े सर्द से लहजे में जैसे औपचारिकता निभाई थी- "तुम कैसी हो हेमा?"

हेमा सोफे पर उसके बराबर बैठ गई- "मैं यहां अपना हाल बताने नहीं आई...तुम्हारा हाल सुनने आई हूं...।".

"मैं ठीक हूं...।" हिना बदस्तूर बेरुखी से बोली।

"लेकिन मुझे तो तू ठीक नजर नहीं आ रही।" हेमा शोखी से बोली- "फ्रेश होकर आने के बाद भी फ्रेश नजर नहीं आ रही हो...।"

"चाय आ रही है। बस, चाय पीते ही चाक-चौबन्द हो जाऊंगी।" हिना ने बात का रुख बदलने की कोशिश की।

और अब हेमा ने उसे जरा गौर से देखा। उसे हिना का रवैया कुछ बदला महसूस हुआ। वह इसकी वजह नहीं समझ पाई। कभी-कभी तबियत ठीक न होने पर भी इन्सान का रवैया बदल जाता है। आदमी चिड़चिड़ा हो जाता है।

तभी चाय आ गई और सब चाय पीने में लग गए। चाय पीते हुए समीर राय सुहेल से बातें करने लगा और हेमा आहिस्ता-आहिस्ता हिना से बतियाने लगी, फिर वे दोनों उठ गईं।

"अब्बू... मैं अपने कमरे में जा रही हूं...।"

"अच्छा बेटा!" समीर राय ने अपनी बेटी के चेहरे की तरफ देखते सर्द आह भरी। अपने कमरे में पहुंचकर हिना धम्म से बेड पर गिरी और तकिये से टेक लगाकर लेट-सी गई।

"बैठो हेमा...।" उसने हेमा से कहा।

"हिना तुम्हारी तबियत क्या खराब हो रही है...?" हेमा उसकी हालत देख परेशान हो उठी थी।

"नहीं, मैं बिल्कुल ठीक हूं...।" हिना ने गहरा सांस लिया।

"फिर तुम यूं निढाल-सी क्यों लग रही हो...?" हेमा ने पूछा।

"वीकनेस है ना। जरा बैठती हूं तो थक जाती हूं...।"

"अच्छा, तुम आराम से लेट जाओ...।" हेमा ने उसके पांव की पकड़कर फैलाने की कोशिश की।

"मैं आराम से हूं...।" कहते हुए हिना ने अपनी आंखों पर हाथ रख लिया।

यही लगता था, जैसे हिना खुद को छिपाना चाह रही हो। वह हेमा से जो कुछ कहना चाहती थी...वह कहने के लिए साहस नहीं जुटा पा रही थी। वह अपनी आंखें बन्द करके ही कुछ कह सकती थी।

"हिना... क्या बात है... यह तुम अपनी आंखें क्यों चुरा रही हो...?" हेमा उसे घूरने लगी।

"हेमा... मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूं...।"

"हां, कहो हिना। क्या बात है...?"

"देखो हेमा! मेरी बात का बुरा न मानना...।" हिना ने हिम्मत जुटाई, उसने अपनी आंखों पर हाथ रख-रखे ही शब्द जैसे तेजी से उगले-“मैं तुम्हारे भाई से शादी नहीं करना चाहती...।"

हेमा को लगा, जैसे किसी ने उसे पहाड़ से धक्का दे दिया हो। एक बेआवाज-सी चीख उसके वजूद में गूंजी और वह फटी-फटी आंखों से हिना को देखने लगी। उसने एक झटके से हिना का हाथ उसकी आंखों से हटाया व उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में लेते हुए बोली-

"हिना, क्या कहा तुमने? क्या यही कि तुम मेरे भाई से शादी नहीं करना चाहती ? हिना, खुदा के वास्ते...कह दो कि मैंने गलत सुना है... तुमने यह नहीं कहा। तुम ऐसा नहीं कह सकती... ।'

"मैंने यही कहा है हेमा। तुमने यही सुना है...।" हिना बदस्तूर संजीदगी से बोली- "मैंने यही कहा है कि मैं सुहेल से शादी नहीं करना चाहती...।"

"आखिर क्यों...?" हेमा चीख ही तो उठी, वह बेकाबू गई थी।

"पता नहीं...।" हिना असहाय-सी बोली ।

"क्या तुम नहीं जानती कि मेरा भाई तुम्हारा इंकार सुनेगा तो मर ही जाएगा...।"

"हेमा, मैं मजबूर हूं। तुम सुहेल को सम्भाल लेना...।" हिना ने जैसे विनती की।

"तीन दिन बाद निकाह है...सारी तैयारियां हो चुकी हैं। सुहेल कितना खुश है, तुम नहीं जानती। हिना प्लीज! सच-सच बताओ मामला क्या है? क्या हमारे ताया की तरफ से कोई धमकी वगैरह मिली है...?"

हेमा का ध्यान अपने ताया वकार की तरफ गया था।

"नहीं हेमा! मैं या मेरे अब्बू... किसी ताया से डरने वाले नहीं...।"

"फिर मेरे भाई के बारे में कोई गलतफहमी हुई है...?" हेमा उसे घूरने लगी- "किसी ने कोई बात कही है. ?

"ऐसो भी कोई बात नहीं है।" हिना ने स्पष्ट किया।

"हर इंकार के पीछे कोई वजह जरूर होती है और... और यह कोई मामूली बात नहीं कि तुम शादी से इंकार कर रही हो...।"

"बस हेमा! मैं इस बारे में ज्यादा बहस नहीं करना चाहती...।"
 
हेमा कुछ क्षण खामोश रही। उसका तो रंग ही उड़ गया था, फिर उसने धीरे से पूछा- "क्या इस इंकार का ताल्लुक तुम्हारी बिगड़ती-सम्भलती सेहत से है...?"

"मैंने कहा ना कि इस बारे में कोई बात न करो...।"

क्या तुमने यह बात अपने अब्बू को बताई है...

न अब्बू की ब "हां हेमा !" हिना खोये-खोये लहजे में बोली।

"क्या अंकल भी तुमसे सहमत हैं...।"

"हां हेमा ! उन्होंने कहा- जैसा तुम चाहोगी... वैसा ही होगा..." ।

"ओह...!" यह सुन हेमा को और सदमा हुआ। बात काफी आगे बढ़ चुकी थी...समीर राय भी बेटी के फैसले के पक्ष में थे। हेमा उलझन का शिकार होकर रह गई थी। स्वयं हिना की जुबानी सुनकर भी उसे विश्वास नहीं हो पा रहा था। हिना कल तक तो सुहेल पर जान देती थी, हिना तो उसके भाई से मुहब्बत करने लगी थी। समीर राय को भी सुहेल बहुत पसन्द था... उन्होंने राजा रावल की दुश्मनी की परवाह न करते हुए... हिना की खातिर यह रिश्ता जोड़ा। फिर अब अचानक यह इंकार क्यों? अचानकं किसने यह दीवार खड़ी कर दी...थी?

कमरे में पूर्ण अंधकार था।

बाहर चांद आकाश के ललाट पर किसी झूमर की तरह चमक रहा था। चांदनी फैली हुई थी। ठण्डी हवा चल रही थी। यह एक रूपहली रात थी।

कमरे में खुशबू फैली हुई थी। हिना की आंखें बन्द थीं। वह बेड पर लेटी थी, लेकिन उसे यही अहसास हो रहा था, जैसे वह हिंडोले पर झूल रही हो, फिजाओं में उड़ रही हो। पहाड़, बादल, बहते चश्मे, गिरते झरने... फूल, तितलियां, रंगो-नूर, अजीब फिजा के अजीब अहसास है। जाने वह कौन-सी घाटी थी। जाने वो कहां थी? अंगूर की वेल, उनसे रस टपक रहा था। एक बल खाती पगडण्डी दूर एक झोंपड़ी तक चली गई थी। क्षण-प्रतिक्षण बदलते दृश्य थे और एक संगीत-सा बिखरा हुआ था।

कहीं दूर कोई चरवाहा पत्थर पर बैठा वांसुरी की तान उड़ा रहा था। विचित्र आशिकाना मौसम था। रंगो-नूर... खुशबू... ठण्डी हवाएं ... गुनगुनाता सन्नाटा... अंधेरा-उजाला।

हिना की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कहां है। एक जादू-सा उस पर व्याप्त था। सारा वजूद ही झूम रहा था। कितना तीव्र था यह अहसास भी कि कोई उसके कान में मीठी सरगोशी कर रहा था। कोई उसका नाम बड़े मध्यम सुरों में ले रहा था।

"हिना...हिना...हिना...!"

वह बेकरार हो रही थी...कोई उसका सुकून लूट रहा था... और वह पुरसुकून कमरे में अंधेरा था...कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन 'वह' शायद सब कुछ देख रहा था। उसकी आंखों में खुमार और यह नशा चढ़ता ही जा रहा था। अंधेरे में बोल रहा था-"अच्छा किया... मेरी हिना अच्छा किया...।"

"मैंने क्या किया...?"

"तुमने शादी से इंकार करके बहुत अच्छा किया...।"

"वह तो करना ही था। मैं अब तुम्हें नहीं छोड़ सकती...।'

"तुम बहुत अच्छी हो हिना... मेरी हिना... मेरी बरहा...।"

कोई बोल रहा था, हिना सुन रही थी-"आखिर मैंने तुम्हें ढूंढ ही लिया...।"

बरहा... हिना का ही नाम था। उसका बचपन सर्पलोक में बीता था। यह नाम उसे रनतारो के बाप और सर्पराज परमान ने दिया था। रनतारो उस पर आसक्त था... सो वो रनतारो की बरहा थी।

बोल हिना भी रही थी...लेकिन होंठ खामोश थे। यूं महसूस हो रहा था, जैसे कोई उसके दिमाग में बोल रहा हो...या फिर वो खुद से सवाल करती हो और खुद ही जवाब देती हो।

"अब मुझे है तुम्हारा इन्तजार रहने लगा है...।" उसने अपने मन की कही थी।

"रनतारो से...अब बरहा को... उसकी हिना को कोई नहीं छीन सकता। अगर किसी ने छीनने की कोशिश की तो मैं उसे तबाह कर दूंगा...बर्बाद कर दूंगा...।"

महकते अंधेरों में तपती सांसों की महक बढ़ती जा रही थी। हिना अपने आपसे बेगाना होती चली जा रही थी। मस्तियों के हिंडोले पर रनतारो उसके साथ था। वहीं से उसकी तपती ख्वाहिशों के साथ ले उड़ा था।

उसे किसी करवट चैन नहीं था। आंखों में जैसे अंगारे भरे हुए थे। वह आंखें बन्द करती... जलन एकाएक बढ़ जाती। यही महसूस हो रहा था, जैसे वह कांटों पर लेटी हो। वह समझ नहीं पा रही थी कि अपने भाई को यह हृदय विदारक खबर कैसे सुनाए। कैसे कहे उसे कि भाई, अब हिना तुम्हारी नहीं रही। उसने तुम्हारी बनने से इंकार कर दिया है...और इंकार की वजह भी नहीं बताई है।

जाने क्यों एक क्षीण-सी आशा क्यों थी। एक आस थी कि रात के अंधेरे जब छटेंगे... दिन का उजाला जब फैलेगा तो हिना का फोन आ जाएगा और वह कहकहा लगाकर कहेगी

"ओ मेरी हेमा! अरी तू तो सचमुच ही बेवकूफ है... मैं तो मज़ाक कर रही थी...।" दिन का उजाला भी फैल गया...लेकिन ऐसा नहीं हुआ ! कोई घंटी नहीं बजी। हिना का कोई फोन नहीं आया।
 
नाश्ता करने के बाद हेमा ने सोचा कि वह एक बार हिना से और बात करे। हेमा आज कालेज नहीं गई थी। उसे उम्मीद थी। कि हिना भी नहीं गई होगी, क्योंकि उसकी तबियत ठीक नहीं थी। हेमा के जहन में एक ख्याल यह भी आ रहा था कि वह सीधे अंकल समीर से क्यों न बात करे। लेकिन ऐसा करना उसे मुनासिब न लगा। ऐसी बात समीर राय से मामू मामी या फिर उसका भाई ही कर सकता था।

टेलीफोन गोद में रखकर उसने हिना का नम्बर डायल किया और रिसीवर कान से लगा लिया। घंटी बज रही थी। निरन्तर बेल होने के बावजूद भी जब किसी ने रिसीवर नहीं उठाया तो उसने सोचा कि हिना शायद अपने कमरे में नहीं है। उसने घर का दूसरा नम्बर डायल किया...दूसरी घंटी पर किसी ने फोन उठाया।

"हेल्लो...।" वह सितारा थी।

"मैं हेमा बोल रही हं सितारा...।" वह बोली-"हिना फोन क्यों नहीं उठा रही... क्या वह कालेज चली गई...?"

...बीवी जी तो घर में हैं। वह इस वक्त मालिक के कमरे में हैं। " सितारा ने बताया।

"उसे जरा बुलाओगी सितारा...?"

"बीबी... क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप कुछ देर बाद फोन कर लें?" सितारा ने नम्रता के साथ कहा-"मालिक ने कहा था कि कोई फोन आए तो मना कर दूं...। यह बात मैं आपको बता रही हूं...।"

"इसका मतलब है कि हिना से कोई खास बात कर रहे हैं?"

"मैं क्या कह सकती हूं। बस, आपको इतना बता सकती हूं कि उनका दरवाजा बन्द है और किसी के अन्दर आने की मनाही है।"

"ठीक है सितारा! मैं फिर बात कर लूंगी। हिना को इतना जरूर बता देना कि मैंने फोन किया था।"

"जी, बता दूंगी... जरूर बता दूंगी...।"

हेमा ने रिसीवर रख दिया और एक गहरी सांस ली।

कमरे में गहरा सन्नाटा था। बाप-बेटी आमने-सामने बैठे थे और अपनी-अपनी सोचों में गुम थे।

"हिना...!" अंततः समीर राय ने ही सन्नाटे की झील में पत्थर फेंका।

"जी, अब्बू...!" सोचों में गुम हिना एकदम चौंक गई। उसने अपनी भारी पलकें उठाई व खूबसूरत आंखों से अपने बाप की तरफ देखा ।

"हिना...तुम्हारे निकाह में अब सिर्फ एक दिन बीच में है। परसों तुम्हारा निकाह है। हॉस्पिटल में तुमने मुझसे कुछ कहा था। वह क्या था, बेटी...?"

"अब्बू... जो बात मैंने आपसे कही थी वह बात मैंने कल हेमा से भी कह दी है....।" हिना धीरे से बोली।

"ओह...!" समीर राय के दिल पर एक घूंसा सा लगा - "बेटा, यह तुमने क्या किया...?"

"अब्बू ! मैं जानती हूं कि मेरे इस फैसले से आपको दुख पहुंचा होगा। मुझे माफ कर दें अब्बू...।"

बेटा, आखिर इकार की वजह क्या ह... यह रिश्ता ता तुमन खुशी से कबूल किया था। तुमने ही कहा था कि सुहेल को अकेला न छोड़ें। बेटा, जब मैंने उसे अपने साथ ले लिया तो तुम उसका साथ छोड़ रही हो...।"

"अब्बू, मैं क्या करूं...?" हिना असहाय-सी बोली।

"मुझे बताओ...आखिर मामला क्या है...? खुलकर बात करो बेटी। जो दिल में है उसे जुबान पर ले आओ...।" समीर राय ने निगाहें बेटी के चेहरे पर टिका दी थीं।

"अब्बू, मैं मजबूर हूं...।" हिना ने अपने हाथ मले।

"किस बात से मजबूर हो...? इंकार की वजह बताने से या सुहेल के निकाह में जाने से...?"

"दोनों बातों से अब्बू...।"

"हिना... देखो, तुम मुझसे कुछ न छिपाओ...।"

"अब्बू......वो...नहीं अब्बू...।"

"हां बेटा...बोलो... हिम्मत करो... डरो मत... ।"

"अब्बू... वो... वो सब कुछ बर्बाद कर देगा... मैं निकाह नहीं सकती। "

"कौन है वो..." समीर राय उठकर उसके पास आ गया, फिर हिना का एक हाथ अपने हाथ में लेकर बोला- "मैं उसे देख लूंगा...तुम उसका नाम बताओ...।"

"छोड़ें अब्बू...।" हिना तड़पकर बोली-"आप मुझे बहुत प्यारे हैं...। मुझे सुहेल भी बहुत प्यारा है...।"

"क्या तुम यह कहना चाहती हो कि अगर तुमने सुहेल से शादी कर ली तो हम दोनों को कुछ हो जाएगा...हमारी जिन्दगियां खतरे में पड़ जाएंगी? यही बात है ना हिना...?"

"अब्बू, मुझे कुछ नहीं मालूम... मुझसे कुछ न पूछे...।"

"हिना तुम डर रही हो। तुम खौफजदा हो। तुम...तुम तो कभी इतनी बुजदिल न थीं बेटा, तुम तो मुझे हौसला देती रही हो। देखो, हिना ! डरो नहीं! डरो नहीं... तुम्हारा बाप शीशे का नहीं बना है। अगर तुम्हें किसी ने धमकी दी है तो मुझे साफ-साफ बताओ। मैं उसे जिन्दा नहीं छोड़ूँगा ।"

"आप किसको मारोगे अब्बू...? 'वो' कोई नहीं है... 'वो' कोई होता तो आप उसे मारते।" हिना ने यह बात बड़ी शालीनता के साथ कही।

समीर राय ने चौंककर उसकी तरफ देखा। उसे लगा जैसे उसकी बेटी का मानसिक सन्तुलन बहका हुआ है और वह बिल्कुल पागलों वाली बातें कर रही है। समीर राय के जहन में बवंडरं उठने लगे।

………………………………

बिल्ली वाला बाबा अपने खास अंदाज में दीवार से टेक लगाए बैठा था।

वो शून्य में ही जैसे किसी अदृश्य चीज को घूर रहा था। बिल्ली का बच्चा बैग पर उछल-कूद मचाये हुए था। उसके उछलने से उसके गले में बंधा घुंघरू छन्न छन्न बज रहा था।

समीर राय अपनी गाड़ी में बैठा उसके उठने का इन्तजार कर रहा था। वह दो बार इस अनूठे बाबा का पीछा कर चुका था। दोनों ही बार बाबा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा था... ना रुककर उससे सम्बोधित होने की कोशिश की थी।

समीर राय इस बाबा की तरफ से निराश हो चुका था। बस, आज यह सोचकर चला आया था। कि अगर आज भी बाबा ने उसे तवज्जो न दी तो फिर वह उसके पीछे यहां नहीं आएगा।

बाबा हमेशा की तरह...सूर्य अस्त होने से कुछ पहले वह अपना बैग कन्धे पर डाल... और बैग में बिल्ली के बच्चे को बैठा...अपने रास्ते पर चल पड़ा।

समीर राय कुछेक कदम का फासला रखकर उसके पीछे लिया था और फिर आज...। जब पांच-सात कदम ही पीछे था। पीछे मुड़कर देखने के बाद बाबा वहीं रुक भी गया था। 'वो' गर्दन मोड़े तीखी नजरों से समीर राय को देख रहा था।

समीर राय रुका नहीं। वह जो बाबा के निकट पहुंच गया बाबा ने बड़ी-बड़ी आंखों से उसे घूरा व बोला- "तीन दिन हो गए तुझे हमारे पीछे आते...क्या चाहता है...?"

"मुझे अपनी बेटी के बारे में कुछ बात करनी है।" - समीर याचक स्वर में बोला था।

तूने अपनी बेटी का ब्याह न किया तो 'वो' उसे बर्बाद कर देगा। वो बड़ा शैतान है।" बिल्ली वाले बाबा ने दो-टूक लहजे में कहा।

"लेकिन बाबा...।" समीर राय कहते-कहते रुक गया।

"उसने शादी से इंकार कर दिया है... यही ना...।"

"हां बाबा...।" ‘’

"वह बच्ची है...मासूम है...। उसने तुम्हारी बेटी को बहका लिया है। तू उसकी फिक्र न कर। निकाह कर दे। यह निकाह... मुकर्रर वक्त पर होना चाहिए। तू उसकी मर्जी की फिक्र न कर। समझ गया मेरी बात...।" और बाबा जाने के लिए मुड़ा। और कहने-पूछने की

"जी समझ गया...।" समीर राय कुछ हिम्मत न कर सका।

"समझ गया तो फिर जा। हम भी यहीं बैठे हैं... देख लेंगे उसे ...।" कहते हुए बाबा अपनी राह हो लिया।

समीर राय वहीं खड़ा बाबा को जाते देखता रहा। बाबा ने दोबारा मुड़कर नहीं देखा था। यहां तक कि वह पुल की सीढ़ियां उतरता चला गया। जब बिल्ली वाले बाबा का सिर भी ओझल हो गया तो समीर वापिसी के लिए मुड़ा।

समीर राय ने राहत महसूस की थी। फुटपाथ पर बैठने वाला बाबा तो बड़ी ऊंची चीज निकला था। वो जानता था कि हिना का निकाह होने वाला है। वो यह भी जनता था कि अब हिना को निकाह से इंकार है। उसे इस इंकार की वजह भी मालूम थी...जो उसने साफ नहीं की थी, लेकिन समीर राय इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका था कि हिना द्वारा निकाह से इंकार की वजह कोई बहुत अहम, बहुत खास और रहस्यमय किस्म की है। बाबा ने साफ शब्दों में निकाह, मुकर्रर वक्त पर करने की ताकीद की थी...चाहे हिना इंकार करे या इकरार ।

समीर राय लौटकर अपनी गाड़ी में बैठा तो पूर्णतः सन्तुष्ट व आश्वस्त था। उसने तय कर लिया था कि वह हिना का निकाह पूर्व निश्चित समय पर ही पढ़वा कर रहेगा।

समीर राय बंगले पर पहुंचा।

गाड़ी से उतरते ही उसे सितारा दिखाई दी। इससे पहले कि सितारा कुछ कहती, उसने पूछा- "क्या हुआ. सितारा...?"

"जी...

.वह हेमा बीबी के मामू आए हैं...।" सितारा ने बताया।

"ओह और कौन है उनके साथ...?"

"वह अकेले ही हैं जी...।"

"कितनी देर हुई आये हुए...?"

"जी, देर हो गई है। कहते हैं...आपसे मिलकर ही जाएंगे...।"

"अच्छा... चाय वगैरह पिलाई...?"

"मैंने पूछा था जी...। पर जी, उन्होंने सख्ती से मना कर दिया था...।

"हिना कहां है...?"

"वह अपने कमरे में है जी।" सितारा ने बताया- "मैंने उन्हें हेमा बीवी के मामू के आने की इत्तला दी थी...लेकिन वह उनसे मिलने नहीं गई।"

"अच्छा, ठीक है। तुम चाय का इन्तजाम करो। कुछ देर बाद ले आना। मैं ड्राइंगरूम में जा रहा हूं...।" समीर ने सितारा को हिदायत दी।

"जी मालिक...।" सितारा बोली, फिर पूछा- "क्या हिना बीवी को बता दूं कि आप आ गए हैं...?"

"हां, बता देना...।" समीर राय बोला "और उनसे कहना कि चाय लेकर वह खुद ही आए...।" समीर राय ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ गया।

सुहेल के मामा सुखदेव ड्राइंगरूम में सामने ही सोफे पर बैठे थे... और उनकी नजरें दरवाजे पर ही जमी हुई थीं। समीर को देख वह खड़े हो गए। समीर राय ने आगे बढ़कर उनसे बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया। उनका कुशलक्षेम पूछा और फिर उन्हें बैठने का इशारा करते हुए बोला उठा-

"माफ कीजिएगा...आपको इन्तजार की जहमत उठानी पड़ी..."

नहीं कोई बात नहीं। मामू सुखदेव बड़ी संजीदगी से बोले थे।

"आखिर ऐसी क्या बात हुई...?" समीर राय ने अनजान बनते मुस्कुराकर पूछा।

"क्या आप नहीं जानते...?" सुखदेव समीर की आत्मीयता से उलझा हुआ था।

"क्या नहीं जानते...?"

"सुना है...आपकी बेटी ने निकाह से इंकार कर दिया है...।" मामू सुखदेव ने साफ- सीधे शब्दों में अपनी फिक्रमन्दी जतलाई ।

"जी, सुना तो मैंने भी है...।" समीर ने संजीदगी ओढ़ ली।

"सुहेल पर इस इंकार का बड़ा असर हुआ है। मुझे डर है... वह कुछ कर न बैठे।" सुखदेव परेशान लहजे में बोला- "राय साहब... आखिर हमसे क्या खता हुई...कुछ तो बताएं...।"

"यह मेरी बेटी का फैसला है... मेरा नहीं, इस बारे में मैं उससे बात कर चुका हूं, लेकिन वह वजह नहीं बताती...कोई मजबूरी है।"

"मैं आपके इन शब्दों का मतलब नहीं समझ पाया हूं...।"

"समझ में तो मेरी भी कुछ नहीं आया, सुखदेव जी! आप बहरहाल परेशान न होयें। सुहेल को भी तसल्ली दे दीजिये। मैंने आपको जो जुबान दी है, मैं उस पर कायम हूं। आप कल शाम सुहेल के साथ आ जाइये। मैं हिना का निकाह उसी के साथ करूंगा। फिर जो होगा...देखा जाएगा...।" समीर राय ने दृढ़ शब्दों में कहा।

मामू सुखेदव यह सुनकर खिल उठे। वह उछलकर खड़े हो गये। उन्होंने समीर राय को हाथ खींचकर उठाया और अपने गले से लगा लिया। उसे शायद आशा न थी कि यह मामला...जो उसके भांजे के लिए मौत और जिन्दगी का मामला बन गया था...इतनी आसानी से सुलझ जाएगा।

"राय साहब! आप बहुत ग्रेट आदमी हैं। यूं समझिये आपने सुहेल को नई जिन्दगी दे दी है। वो बड़ा जज्बाती लड़का है। मुझे उसे सम्भालना मुश्किल हो रहा था।" सुखदेव ने उनसे अलग होते बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया।

अभी वह हाथ मिला ही रहे थे कि हिना सितारा के साथ कमरे में दाखिल हुई। उसने बड़ी हैरत से दोनों को हाथ मिलाते हुए देखा।

"ओह हिना बेटी...।" मामू सुखदेव की उस पर नजर पड़ी तो आगे बढ़े।
 
हिना ने बड़े आदर के साथ उन्हें सलाम किया। मामू सुखदेव ने बड़े दुलार के साथ जवाब दिया और बड़ी आत्मीयता के साथ उसके सिर पर हाथ रखा और ढेरों दुआएं दीं।

निकाह का वक्त सिर पर था।

मौलवी आ चुका था। हिना निकाह का जोड़ा पहने बैठी थी। लिखित कार्यवाही के तौर पर निकाह का फार्म भरा जा रहा था। यह निकाह पूरी सादगी व पूर्ण राजदारी के साथ हो रहा था। इस निकाह में सुखदेव मामा के परिवार के अलावा बाहर का कोई आदमी शामिल नहीं था। इधर से भी बस समीर राय की मां नफीसा बेगम शरीक थी। नफीसा बेगम को स्वयं समीर रोशनगढ़ी से आज ही लेकर आया था। उसने मां को कुछ नहीं बताया था। बस, इतना कहा था-" अम्मी आपकी जरूरत है। मैं आपको लेने आया हूं। मेरे साथ चलो...।"

नफीसा बेगम खामोशी से उसके साथ चल दी थी। उसने कुछ न पूछा था। हां, सारे रास्ते उनके दिमाग में खिचड़ी जरूर पकती रही थी। तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे...लेकिन वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी थी। हां, इतना यकीन हो सका था कि कोई खास बात जरूर है...।

खास बात तो थी ही और यह खास बात समीर ने उन्हें उनके कदमों में बैठकर बताई.--"अम्मी! मैं आज शाम हिना का निकाह कर रहा हूं।"

यह सुनकर नफीसा बेगम को एक साथ खुशी व दुख के अहसासों ने आ घेरा । दुख इस बात का कि बेटे ने इस बारे में मशवरा नहीं लिया...उसे पहले नहीं बताया और खुशी इस बात की थी कि उसे अल्लाह ने यह दिन दिखाया। उसने अपने दुख की चादर को खुशी में छिपा लिया और अपने बेटे का चेहरा अपने दोनों हाथों में भरकर बोली-

यह ता बहुत खुशी की बात है, मगर तून यह बात राशनगढ़ में क्यों नही बताइ : मैं न जाने क्या-क्या सोचती रही...।"

"अम्मी...असल बात यह है कि मैं यह निकाह बड़ी एमरजेन्सी में कर रहा हूं। इस मौके पर रिश्तेदारों को इकट्ठा करना मुमकिन नहीं था। इसीलिए आपको चुपचाप वहां से ले आया। मां लड़का बाहर जा रहा है। हम हिना की विदाई दो-तीन साल बाद करेंगे। लड़का बहुत अच्छा है, इसलिए मैंने सोचा कि निकाह फौरन कर दूं, ताकि एक अच्छा रिश्ता हाथ से न निकल जाए। मां, मैंने खास तौर पर तुम्हारे लिए लड़के को बुलवाया है... आप लड़के को देखेंगी तो आपकी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा। लड़का बहुत नेक और बेहद खूबसूरत है..." समीर राय ने अपनी मां को सन्तुष्ट करने के लिए जो उसकी जुबान पर आया कह दिया। समीर राय ने फोन करके सुहेल को बुलवाया, ताकि मां उसे देख सके।

नफीसा बेगम ने सुहेल को देखा तो उनकी बांछे खिल गईं। उसने चटपट ही सुहेल की कई बलाएं ले डालीं। जो थोड़ा-बहुत दुख अपनी अपेक्षा का हुआ था, वह जाता रहा। उसके बेटे ने सच ही में उसकी पोती के लिए एक हसीन दूल्हा ढूंढा था।

मां को खुश देखकर समीर का दिल भी खुश हो गया, लेकिन अभी एक मुश्किल पड़ाव और था और यह कठिन पड़ाव था।

सुहेल के मामू सुखदेव की आमद ने हिना को मानसिक उलझन का शिकार कर दिया था। उसे अंदाजा हो गया था कि निकाह स्थगित नहीं हुआ है... उसे पूर्व निश्चित समय पर ही होना है। तब से वह परेशान थी।

बहुत रात भर उसे डरावने ख्वाब दिखाई देते रहे थे। सुबह होते ही उसे इत्तला मिली कि दादी आ गई है। वह अपने कमरे से नहीं निकली।

वह बन्द दरवाजे पर नजरें जमाए अपनी सोचों में गुम थी कि अचानक दरवाजा खुला और समीर राव ने कमरे में प्रवेश किया। वह अकेला था। अन्दर आकर उसने दरवाजा बन्द किया और फिर बेटी की तरफ बढ़ा।

हिना सम्भलकर बैठ गई... बोली कुछ नहीं। उसके पास अब बोलने को बाकी रहा ही क्या था। वह तो साफ तौर पर इस निकाह से इंकार कर चुकी थी।

समीर राय हिना के पास उसके बेड़ पर आ बैठा और मुस्कुराते हुए वोला-"कैसी हो बेटी?"

हिना ने शिकायत भरी नजरों से बाप को देखा व धीरे से बोली-"ठीक हूं अब्बू...।"

"आज शाम को तुम्हारा निकाह है। सारे इन्तजाम हो चुके हैं। तुम्हारी दादी सुहेल से मिलकर बहुत खुश हुई हैं। मेरा ख्याल है कि तुम्हें भी इस निकाह के लिए खुशदिली से राजी हो जाना चाहिये। इसी में तुम्हारी भलाई है..." समीर राय ने उसे

समझाया।

"अब्बू...मैं यह निकाह नहीं कर सकती। आप नहीं जानते कि इस निकाह के बाद कैसी तबाही आएगी...।"

"तुम बेफिक्र हो जाओ...कुछ नहीं होगा। हां, अगर यह निकाह न हुआ तो फिर जो तबाही आएगी उसका अन्दाजा तुम्हें नहीं...।" समीर राय ने उसे ढके-छिपे शब्दों में धमकी दी।

"चाहे कुछ हो.. मैं यह निकाह हरगिज नहीं करूंगी।" हिना का लहजा सहसा

बदल-सा गया था।

उसका लहजा बदलते ही समीर राय ने अपना सीधा हाथ पीछे की तरफ घुमाया व वेड पर रखे उस रिवाल्वर को थाम लिया जिसे वह अपने साथ लाया था। उसने वह रिवाल्वर अचानक ही हिना पर तान दिया व उसे घूरने लगा।

"नहीं अब्बू...।" हिना खौफजदा होकर बोली।

"यह लो...।" समीर राय ने बड़े इत्मीनान से रिवाल्वर उसकी तरफ बढ़ाया- "इसे पकड़ो...।"

"नहीं अब्बू...।" हिना ने अपने हाथ पीछे कर लिए।

"नहीं कैसे?" समीर राय ने उसका हाथ पकड़कर आगे किया व फिर जबरदस्ती रिवाल्वर उसके हाथ में थमाकर बोला- "चलाओ गोली। खत्म कर दो अपने अब्बू को। फिर इत्मीनान से जो चाहे करना।" समीर राय ने अपनी निगाहें उस पर गड़ा दीं।

हिना की आंखें झुकी थीं और हाथ कांप रहे थे। समीर कुछेक क्षण उसके कांपते हाथ देखता रहा, फिर बोला-

"बेटा, यह बात तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैंने उन्हें जुबान दी है। मैं अपनी जुबान से नही फिर सकता। इस तरह निकाह से इकार नही किया जा सकत शरीफों का चलन नहीं है। फिर सुहेल तो तुम्हारी अपनी पसन्द है। तुम्हारी खातिर मैंने यह रिश्ता है किया है। बहरहाल, मैं तुम्हें मजबूर नहीं करना चाहता...। जो मैं बर्बादी आनी है...उसकी शुरुआत हो जाए तो क्या हर्ज। रिवाल्वर हटाओ और मुझे मंजर से हटा दो... दूर कर दो अपने रास्ते की इस रुकावट को... ।'

"नहीं अब्बू...। ऐसा तो मैं ख्वाब में भी नहीं कर सकती...।" हिना ने कांपती आवाज में कहा।

"फिर अपने बाप पर भरोसा करो... मैं तुम पर कोई आंच नहीं आने दूंगा। तुम किसी चीज से... किसी बात से न डरो...। सारे खौफ मेरे लिए छोड़ दो।" उसने बेटी का हाथ थाम लिया। रिवाल्वर छोड़ दिया।

समीर राय के हाथ पकड़ते ही हिना ने और अपने बाप से लिपट गई। फिर उनके कन्धे पर सिर रखकर आंसू बहा रही। समीर ने उसे रो लेने दिया।

कुछ क्षण बाद हिना ने खुद को सम्भाला व जैसे निर्णायक स्वर में बोली- "ठीक है अब्बू, फिर जैसी आपकी मर्जी...।"

समीर राय ने उसके सिर को चूमा।

"यह हुई ना बात...। वह खुश होकर कमरे से निकल गया।

निकाह का वक्त सिर पर था।

निकाह कराने वाला आ चुका था। हिना निकाह का जोड़ा पहने बैठी थी। निकाह का फार्म भरा जा रहा था। बंगले में अजीब-सी खामोशी थी। निकाह पूरी राजदारी से हो रहा था। कुछ ऐसा माहौल था जैसे घर में निकाह न हो, कोई मौत हो गई हो।

हेमा हिना के साथ बैठी थी और अपने तौर पर बातें किये जा रही थी। हिना के होठ सिले हुए थे।

हिना की आंखों में खौफ था। कभी गहरा व ठण्डा सांस लेकर हेमा को देखती । कभी कमरे में चारों तरफ नजरें दौड़ाती जैसे उसे किसी का इन्तजार हो। किसी की आवाज सुनने की उम्मीद हो।

औपचारिकतायें पूरी हुईं। हिना ने निकाह की शर्ते व इस रिश्ते को कबूल किया तो निकाह पढ़ाने वाले ने निकाह पढ़ा दिया। हिना अब सुहेल के साथ पाक-पवित्र बंधन में बंध चुकी थी। चारों तरफ से बधाई व शुभकामनाओं का हल्का-सा शोर उठा। एक-दूसरे को गले लगाया गया। छुआरे खिलाये गए।

मामू सुखदेव ने इत्मीनान का सांस लिया। सुहेल की खुशी देखने वाली थी। हेमा ने हिना को गले से लगाकर भींच लिया। नफीसा बेगम बलाएं लेती दिखी।

और यूं यह निकाह की सादा कार्यवाही अपने अन्त को पहुंची। दूल्हा अपने लोगों के साथ गाड़ी में बैठकर आंखों में हसीन सपने सजाये अपने घर की तरफ रवाना हो गया।

हिना को नींद नहीं आ रही थी। कमरे में हल्की-सी रोशनी थी। हिना आंखें खोले दीवार पर लगी समुद्र की बड़ी-सी पेन्टिंग को घूरे जा रही थी। नजरें कहीं थीं, तो दिमाग कहीं था... और वह खुद कहीं थी।

हिना ने सुहेल को कबूल कर लिया था, लेकिन यह कोई नई बात न थी। सुहेल तो जाने कब से उसके दिल में बसा हुआ था। उसके दिल ने उसे बहुत पहले कबूल कर लिया था। आज उसने दुनिया वालों के सामने उसे अपना कह दिया था।

दिल से चाहते हुए भी अपना बनाते हुए उसका दिल कांपता था। कभी-कभी ऐसा भी होता था कि सुहेल उसके दिलो-दिमाग से उतर जाता और वह किसी और को अपने दिल के करीब पाती। उसका वजूद जैसे दो हिस्सों में बंट गया था। सुहेल उसके दिल में था, लेकिन उसके वजूद पर 'कोई और' छाया हुआ था। इसी खौफ ने उसे निकाह से इंकार करने को मजबूर कर दिया था।

पर अपने बाप की खातिर उसे इंकार, इकरार में बदलना पड़ा था। अब्बू ने बात ही ऐसी कह दी थी और किसी के सामने उसके अब्बू का सिर झुके, यह हिना बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। उसने आंखें बन्द करके सुहेल को कबूल कर लिया था। और अब वह आंखें खोले सोच रही थी। एक अनजाने खौफ से उसका दिल कांप रहा था। अन्देशे उठ रहे थे और उसके होठों पर सुहेल की सलामती की दुआएं थीं।

उसी वक्त 'वो' परदे के पीछे से फिसलकर कालीन पर आया। कमरे में एकाएक मंत्र-मुग्ध कर देने वाली खुशबू फैल गई। इससे पहले कि हिना सिर झुकाकर इधर- उधर देखती...एक स्याह वजूद उस पर छा गया। उसे यूं महसूस हुआ जैसे उस पर किसी ने काली चादर डाल दी हो

फिर एकाएक उसके कान में सरगोशी गूंजी और यह सरगोशी सांप की फुंफकार जैसी थी

"आखिर तुमने मनमानी कर ली।"

"मैंने क्या किया है?

"मैंने तुम्हें अच्छी तरह समझा दिया था कि अगर तुम्हारे और मेरे बीच कोई आया तो उसे बर्बाद कर दूंगा...।"

कोई जैसे हिना के दिमाग में बोला

"किसकी बात कर रहे हो...?" हिना ने बिना होठ 'हिलाये जवाब दिया।

"अनजान बन रही हो...। देखता हूं कब तक अनजान बनी रहोगी...।" कुषित आवाज सुनाई दी...दिमाग में एक फंककार-सी गूंजी।

हिना ने जवाब में कुछ कहना चाहा, लेकिन उसके दिमाग में धुआं-सा भरने लगा। उसे यूं महसूस हुआ जैसे वह नर्म-ओ-मुलायम रूई के ढेर में धंसती जा रही है।

कुछ ही क्षणों में वह अपने आप से बेखबर हो गई। मस्तियों का खुमार जागा... और वह मस्तियों के इस ज्वार-भाटा में डूबने-उबरने लगी।

सुबह पहले की तरह वह देर तक सोती रही। सितारा उसके जागने का इन्तजार करती रही। हिना जब दस बने तक भी न जागी तो उसने हैण्डल पर दबाव डालकर दरवाजा खोता और कमरे में दाखिल हो गई। वह कमरे में दाखिल हो गई तो सबसे पहले एक अजीब-सी खुशबू से उसका वास्ता पड़ा। यह मनमोहक खुशबू ज्यादा तेज न थी। फिर उसने देखा कि हिना एक काली चादर ओढ़े सो रही है। मुंह खुला हुआ था। बाल भी बंधे हुए न थे। उसका चेहरा पीला हो रहा था।

"बीवी...।" सितारा उस पर झुककर धीरे से बोली-"उठे...दस बज रहे हैं...।" हिना शायद गहरी नींद में थी। सितारा की इस धीमी-सी आवाज पर वह जरा-सी भी न हिली। तब सितारा ने झुके-झुके उसका बाजू पकड़कर हिलाने की सोची। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया ही था कि कोई चीज सरसराती हुई बड़ी तेजी से उसकी गर्दन के पास से निकली और चेहरे पर आई। फिर उसने पलटकर देखा और उसके मुंह से तेज फुफकार निकली।

'वो' एक सुनहरा सांप था...जिसका फन फैला हुआ था और दोहरी जिव्हा बार- बार अन्दर-बाहर हो रही थी।

इस सांप को देखकर सितारा की तो जैसे जान ही निकल गई। कुछ सेकण्ड तो वह यूं ही गुमसुम खड़ी रही, फिर उसके बदन में एकाएक हरकत हुई और वह चीखते हुए उल्टे कदमों कमरे से निकल गई।

उसकी मां सरवरी उसकी तलाश में इधर ही आ रही थी। सितारा दरवाजे से निकलते बड़े जोर से अपनी मां से टकराई।

"क्या मुसीबत में..?" उसकी इस बौखलाहट पर मां ने उसे डांटा-"यं क्यों भाग रही है।"

सितारा बड़ी मुश्किल से बोली- "अम्मा...सांप...।"

"ओ बेवकूफ...होश कर... कहां है सांप?" सरवरी ने राहदारी में इधर-उधर देखा। "वह...हिना बीवी के बेड पर... बीवी से लिपटा हुआ है...।" सितारा ने घबराकर बताया।

"और बीवी क्या कर रही हैं...?"

"बीवी...सो रही हैं... या जाने बेहोश पड़ी हैं...।"

"चल मेरे साथ...आ...।"

सरवरी दरवाजे की तरफ बढ़ी। सरवरी एक निडर औरत थी, लेकिन इतनी निडर भी न थी कि सांप का जिक्र सुनकर वह हिना के सिरहाने ही जा खड़ी होती और सांप का करीब से निरीक्षण करने की कोशिश करती। वह दरवाजे में दो कदम बढ़कर ठिठक गई, ताकि दूर से ही सामने का जायजा ले सके। सरवरी अभी कुछ देख भी न पाई थी कि सितारा जो उसके पीछे थी...उसने मां के कन्धे से झांककर देखा और हैरान रह गई।

बेड पर इस वक्त हिना बेसुध लेटी हुई थी। कुछ क्षण पहले ही वह एक काली चादर ओढ़े हुए थी... और एक सुनहरी सांप फन फैलाए हुए था, लेकिन अब वहां काली चादर थी ना सांप। हिना का नाइट गाउन बेड के एक तरफ पड़ा था और हिना को अपनी इस 'हालत' की खबर न थी।

सितारा जल्दी से पलटकर दरवाजा बन्द किया और सरवरी ने नाइट गाउन से हिना के निर्वस्त्र बदन को ढका। उसे सांप कहीं नजर नहीं आया। सितारा ने भी इधर-उधर नजरें दौड़ाई लेकिन व्यर्थ। सितारा हैरान-परेशान थी कि कुछ ही क्षणों में काली चादर और सांप कहां व कैसे गायब हो गया था?

सरवरी ने हिना का चेहरा बड़े गौर से देखा। चेहरा एकदम पीला पड़ा हुआ था। वह मस्ती की गहरी नींद में थी। सरवरी ने उसका बाजू पकड़कर हिलाया- "बीवी... बीवी...।"
 
हिना ने आंखें खोल दीं। उसने पहले उन दोनों को खाली-खाली नजरों से देखा...फिर एकदम झटके से उठकर बैठ गई। फिर उसे अपनी बेलिबासी का अहसास हुआ। वह एकाएक परेशान हो उठी। सितारा ने अलमारी से चादर निकालकर उसकी तरफ फेंकी।

और अब हिना की नजरें अपने पेट पर पड़ीं। वहां दो नन्हें-नन्हें गड्ढों की और बढ़ोत्तरी हो चुकी थी और वह अत्यधिक कमजोरी भी महसूस कर रही थी। वह जैसे-तैसे बेड से उठी। मुंह-हाथ धोकर कपड़े पहने। उसका चेहरा गर्म हो रहा था। यूं लग रहा था जैसे वह आग के सामने से उठकर आई हो।

वह बाथरूम से निकल गई। उसे चक्कर आ रहे थे और मितली-सी भी हो रही थी। सितारा बाथरूम के दरवाजे के बाहर ही खड़ी थी। हिना डोलने लगी तो उसने थाम लिया और सहारा देकर बेड तक ले आई।

हिना निढाल होकर बेड पर गिर पड़ी।

"बीवी... नींबू पानी पीएंगी...?" सितारा ने पूछा।

"हां सितारा! ले आ...। कहां है...?" हिना बेताबी से बोली।

सितारा ने साइड टेबल पर रखा हुआ गिलास उठाकर उसकी तरफ बढ़ाया- "यह लें बीवी! मैं जानती थी आपको इसकी जरूरत पड़ेगी। मैं अभी बनाकर लाई हूं...।"

हिना ने आभारी निगाहों से उसको देखा और गिलास उसके हाथों से लेकर गटागट पी गई। कुछ ही देर में उसकी हालत बेहतर हो गई। उसने आंखें खोल दी व तकिये से टेक लगाकर बैठ गई। सितारा ने उसके पैर अपनी गोद में रख लिए और धीरे-धीरे दबाने लगी।

"बीवी...यह आपको क्या हो जाता है...?" सितारा ने चिन्तित स्वर में पूछा।

"पता नहीं...।" हिना ने नजरें चुराई। वह क्या जवाब देती।

"बीवी...आज तो आपने मेरी जान ही निकाल दी थी...।"

"मैंने... क्यों...?" हिना ने पूछा।

"बीवी... आज जब मैं आपको उठाने के लिए कमरे में आई तो मैंने आपको एक काली चादर में पाया।"

"काली चादर...!" हिना हैरान हुई "काली चादर कहां से आ गई?"

"आप एक काली चादर ओढ़े हुए थीं और चादर के अन्दर एक सांप था, जब वह सांप चादर से बाहर आया तो उसे देखकर मेरे होश उड़ गए। मैं चीखती हुई बाहर भागी। बाहर अम्मा मिल गई। उसके साथ आई तो यहां वो काली चादर थी न सांप था।" वह बताते हुए सितारा के हाथ-पांव ठण्डे होने लगे-“बीवी...यह सब क्या है?"

"मैं क्या बताऊ सितारा...!" हिना उलझे हुए अंदाज में बोली।

"बीवी....किसी मौलवी... ओझा को दिखायें। आप पर कहीं कोई साया तो नहीं हो गया? आप इतनी खूबूसरत जो हैं...।" सितारा ने अपनी सोच अनुसार अन्देशा व्यक्त किया।

"सितारा शायद तू ठीक कहती है...।" हिना सोचपूर्ण लहजे में बोली- "मेरी खूबसूरती शायद मुझे कहीं का न छोड़ेगी। ऐसी खूबसूरती का क्या फायदा जो जी का जंजाल बन जाये... ।"

"अल्लाह मालिक है बीवी! आप परेशान न हों... सब ठीक हो जायेगा।" सितारा ने उसे तसल्ली दी।

इसी क्षण हिना के दिमाग में किसी सांप की फुफकार गूंजी। वह चौंककर सितारा को घूरने लगी।

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सुबह सुहेल की आंख खुली तो वह बहुत खुश था। खुश होता भी क्यों नहीं। हिना उसकी हो चुकी थी। इस सोच के साथ ही उसके बदन में जैसे बिजली-सी भर गई। वह बिस्तर से उछलकर खड़ा हो गया। दोनों हाथ उठाकर एक बदन तोड़ अंगड़ाई ली और बाथरूम में जा घुसा। बेचारा कहां जानता था कि वह खुशी बस दो पल की है

नहा-धोकर बाहर निकला और ड्रेसिंग टेबल के सामने जा खड़ा हुआ। वह बाल संवार रहा था कि लाउन्ज में रखे फोन की घन्टी बजी। वह कंघा ड्रेसिंग टेबल पर डालकर बाहर निकला और रिसीवर उठाकर 'हेल्लो' कहना चाहा।

लेकिन उसकी आवाज गले में ही फंसकर रह गई। प्रयत्नोपरान्त भी उसकी जुबान पलट न सकी। दूसरी तरफ उसका कोई दोस्त था।

"हेल्लो... हेल्लो।" जवाब न पा उसने ही कहा था-"हेल्लो, सुहेल।"

इधर से सुहेल ने फिर जवाब देने की कोशिश की, लेकिन कुछ बोल न सका। उसकी जुबान पूरी तरह बन्द हो चुकी थी। इस ख्याल के आते ही कि उसकी जुबान बन्द हो चुकी है... वह परेशान हो गया। गूं-गूं के अलावा कोई आवाज ही नहीं निकल रही थीं। उसने घबराकर रिसीवर पटका और अपनी बहन हिना के कमरे की तरफ भागा।

हेमा कमरे में नहीं थी। वह कालेज जा चुकी थी। वह दौड़ता हुआ नीचे आया। मामू के बच्चे स्कूल जा चुके थे। मामू सुखदेव डायनिंग टेबल पर थे मामी किचन में थी! मामू सुखदेव की नजर जब उसके चेहरे पर पड़ी तो वह उछलकर खड़ा हो गया। सुहेल का चेहरा एकदम सुर्ख हो रहा था।

सुहेल वेअख्तियार ही मामू से जा लिपटा।

"क्या हुआ बेटे...?"

खुद से अलग करते मामू ने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में भरते हुए पूछा-- "यह तुम्हारा चेहरा इस कद्र तमतमा क्यों रहा है...?"

सुहेल कोई जवाब देने की बजाय मामू से जा लिपट गया। तभी शोभा मामी नाश्ते की ट्रे लिए किचन से निकल आई। उसने सुहेल को अपने मामा से पागलों की तरह लिपटते देखा तो वह परेशान हो गई।

"अरे, क्या हुआ सुहेल...?" उसने ट्रे मेज पर रखी।

मामी की आवाज सुनकर वह मामू को छोड़कर मामी की तरफ लपका। मामी को कन्धों से थाम वह पागलों की तरह उन्हें देखने लगा। सुहेल का चेहरा लाल-भभूका हो रहा था... और आंखों में आंसू तैर रहे थे।

"खैर तो है, बेटा...?" मामी उसे घूरते हुए पूछा।

"कुछ बोलता ही नहीं...।" मामू सुखदेव ने सहमे लहजे में बताया।

सुहेल उनकी तरफ पलटा और बेबसी से अपने मुंह की तरफ इशारा कर बताया कि वो बोल नहीं पा रहा है।

"क्या! तुमसे बोला नहीं जा रहा है...?" उसका आशय समझते मामू ने तेजी से पूछा।

सुहेल ने सिर हिला हामी भरी।

"अरे, यह कैसे हुआ...?" मामू उसका हाथ पकड़ उसे वहीं पर बैठाते हुए बोले- "तुम इधर आराम से बैठो।"

फिर वह उसकी मामी से सम्बोधित हुआ-"जरा इसको पानी पिलाओ...।"

शोभा भागकर पानी ले आई। सुहेल ने पानी पी लिया, लेकिन उसकी जुबान नहीं खुली। फिर मामी को जितने टोटके आते थे, इस्तेमाल कर डाले... लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। सुहेल के गले में कोई तकलीफ न थी... जुबान में कोई खराबी न थी। इसके बावजूद उसके गले से आवाज नहीं निकल रही थी।

फिर शोभा ने मशवरा दिया-"आप सुहेल को फौरन हॉस्पिटल ले जाए ..इसे गले के स्पेशलिस्ट को दिखाएं...मामला सीरियस लगता है।"

"मैं भी यही सोच रहा हूं...।" सुखदेव ने सुहेल का हाथ पकड़ा - "चला भाई..." मामू सखदेव उसे लेकर एक बड़े हॉस्पिटल में पहुंचे। यहां का एक सीनियर ई.एन •टी• स्पेशलिस्ट सुखदेव का परिचित था। डॉक्टर ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर सुहेल की जुबान व गले की जांच की। उसे कोई खराबी नजर नहीं आई। फिर एहतियातन कुछ टेस्ट लिख दिये। वे टेस्ट करवा कर सुहेल घर आ गया और सुखदेव मामा अपने आफिस चले गये। हेमा कालेज से वापिस आ चुकी थी। मामी ने उसे सब कह सुनाया था। सुहेल ने जैसे ही घर में कदम रखा, हेमा दौड़कर उसके पास पहुंची।

"भाई, कैसे हो...?" उसने तड़पकर पूछा।

सुहेल अब सम्भला हुआ था। उसने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी मुस्कान में भी तो व्यथा छिपी हुई थी।

"तुम्हें क्या हुआ भाई? तुम्हें किसकी नजर लग गई?"

भाई की बेबसी पर हेमा के आंसू निकल आये। उसने भाई के हाथ थाम लिये थे।

सुहेल का सिर 'नहीं' में हिला-जैसे बहन को न रोने को कह रहा हो, फिर उसने बहन के दोनों हाथ अपनी आंखों से लगाये। हेमा ने अपनी उंगलियों पर नमी महसूस की। सुहेल की आंखें भी भीग चुकी थीं।

हेमा भाई को सामने ऊपर अपने कमरे में ले आई और उसके कागज-कलम रखकर बोली- "भाई, मुझे लिखकर बताओ...यह कैसे हुआ...?"

सब सुहेल ने सुबह से अब तक की सारी आपबीती लिख दी। उसने अन्त में लिखा-

"हेमा, मैं बोलने की शक्ति खो बैठा हूं। बोलना चाहता हूँ, लेकिन शब्द अदा नहीं होते। डॉक्टर के ख्याल से बिल्कुल फिट हूं। फिर भी उसने कुछ टेस्ट करवाए हैं... रिपोर्ट कल मिलेंगी। तुम परेशान न हो मेरी बहन । मैं जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा। तुम मेरे लिये दुआ करो... और हां, हिना को बता देना कि उसका सुहेल गूंगा हो गया है। अब वह जिन्दगी भर उसकी सुनेगा...उससे कुछ नहीं कहेगा...।"

जब यह बात हिना को मालूम हुई तो वह तड़प उठी। उसके दिमाग में तत्काल 'किसी' के शब्द गूंजे-"जो मेरे तुम्हारे बीच आएगा...मैं उसे बर्बाद करे दूंगा...।"

और फिर...।

सुहेल उनके बीच आ गया था। हिना उसकी बीवी बन गई थी, तो क्या बर्वादी का सफर शुरू हो गया है? इसीलिए तो वह रोक रही थी। निकाह से इंकार कर रही थी। किसी ने उसकी नहीं सुनी और... और नतीजा सामने था।

हिना बेहद उदास हो गई। उसने हेमा को तसल्ली देने की कोशिश की...लेकिन उसका अपना चैन लुट गया था। यह हृदय विदारक खबर सुनकर वह सीधी अपने बाप के पास पहुंची। तबियत पहले ही ठीक न थी...इस खबर ने तो जैसे उसकी जान ही निकाल ली थी।

हिना निढाल-निढाल-सी समीर राय के कमरे में दाखिल हुई। समीर राय डैक से गजल सुन रहा था। हिना ने बटन दबा डैक बंद किया। आवाज बंद हुई तो समीर राय ने चौंक कर आंख खोली...।

और हिना को सामने पाया।

वह हड़बड़ा कर उठ बैठा। एक तो हिना का इस वक्त कमरे में आना और फिर चलता हुआ 'डैक' बंद कर देना...जरूर कोई असाधारण बात थी।

"क्या हुआ...बेटी...?" समीर राय ने उसका चेहरा गौर से देखा। वह पीली पड़ी हुई थी और आंखों से कमजोरी टपक रही थी।

"अब्बू...कुछ ठीक नहीं है...।" हिना उत्तेजित-सी -'मैंने मना किया था। आप नहीं माने। आपने मेरी एक नहीं बात सुनी...।" हिना बेड पर बैठ गई।

"कोई गड़बड़ हो गई...मुझे बताओ, क्या हुआ है...?"

"उसने सुहेल को गूंगा कर दिया है, सुहेल अपनी बोलने की ताकत खो बैठा है।" हिना उत्तेजना में वो बात भी कह गई जो उसने अभी तक खुल कर नहीं बताई थी।

“यह तुम क्या कह रही हो...क्या हुआ सुहेल को...?"

"वह गूंगा हो गया है, अब्बू।" हिना ने दुखी होकर कहा।

"तुम्हें किसने बताया...?" समीर राय ने तेजी से पूछा।

"अभी हेमा का फोन आया था...'

"अच्छा, तुम आराम से बैठो, मैं उससे बात करता हूं समीर बोला, व फिर बेड पर पड़ा अपना मोबाइल उठाया और हेमा से बात की।

हेमा ने सुबह से अब तक का हाल उन्हें सुना दिया। समीर ने फिर मामू सुखदेव से बात की... उन्होंने हॉस्पिटल में जो कुछ हुआ... वह बता दिया। दोनों ही परेशान थे। दोनों ने एक-दूसरे को तसल्लियां दीं व रिपोर्ट आने तक कोई कदम न उठाने का फैसला किया।

"हिना, तुम्हारे ख्याल में सुहेल के साथ क्या हुआ है... समीर राय ने मोबाइल बंद करके एक तरफ डालते हुए पूछा- ऐसा किसने किया है तुम किसका जिक्र कर रही हो...?"

"अब्बू... मुझे कुछ नहीं मालूम...।" हिना जैसे एकदम सहम गई। उसने घबराकर कमरे में चारों तरफ देखा।

आज सुबह हिना के कमरे में सरवरी और सितारा ने जो कुछ देखा था...समीर राय उससे अनजान था।

"मुझे यूं महसूस हो रहा है जैसे तुम कुछ छिपा रही हो...। 'किसी से डर रही हो। बोलो, बेटा! डरो मत...। हमें अपने दुश्मन के बारे में साफ तौर पर मालूम नहीं होगा तो हम उससे लड़ेंगे किस तरह...।" समीर राय बोला "तुम जो कुछ भी जानती हो मुझे सब साफ लफ्जों में बता दो...।"

"अब्बू... मैं कुछ नहीं जानती..." हिना ने दृढ़ लहजा अपनाने की कोशिश की।

"नहीं, हिना... मैं जानता हूं कि तुम बहुत कुछ जानती हो, तुम झूठ बोल रही हो... मुझसे छिपा रही हो, और मुझसे छिपा कर खुद हलकान हो रही हो। आज 'उसने' सुहेल की आवाज छीन ली है...हो सकता है कल 'वो' मुझे कोई नुकसान पहुंचा दे।" हकीकतन अब समीर को भी अन्देशे सताने लगे थे।

"नहीं, अब्बू। मैं सब कुछ बर्दाश्त कर सकती हूं, लेकिन यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि ' वो ' आपको कोई नुकसान पहुंचाए। अब्बू... मैंने यूं तो बहुत कुछ आपको बता रखा है...। मैंने काले लिबास वाले के बारे में भी आपको बताया था और... और आज सुबह सितारा ने जो कुछ मेरे कमरे में देखा वह भी सुन लीजिए...।"

"सितारा ने क्या देखा...?" समीर राय की परेशानी बढ़ती जा रही थी।

सितारा ने उसके कमरे में जो कुछ देखा था और जैसा देखा था...वह सब हिना ने निस्संकोच व सविस्तार सुना डाला।
 
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