Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा ) - Page 11 - SexBaba
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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

"हिना, बेटी....।" मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है। कुदरत ने हमारे साथ अजीब खेल खेला है। जिस माहौल से मैं तुम्हें बचाकर और खुद बचकर यहां आया..उन हालात ने हमारा अभी तक पीछा नहीं छोड़ा है। बेटा...आदामी अच्छा बनना भी चाहे तो उसका बुरा और खून-आलूदा अतीत उसे अच्छा बनने नहीं देता। अभी तो इस गौतक या सुहेल को हमारे बारे में कुछ नहीं मालमू.अगर मालूम हो जाएगा तो वह इस रिश्ते को भी भूल जाएगा। उस पौत्री से कौन शादी करेगा..जिसका दादा लड़के के बाप का कातिल हो...।

"लेकिन अब्बू..! हम तो कातिल नहीं...। आपने तो किसी का कत्ल नहीं किया। गौतम के वालिद तो किसी के कातिल नहीं थे...।" हिना उत्तेजित-सी बोली-"फिर हम क्यों डरें ?'

"मैं भी इसी नतीजे पर पहुंचा हू कि हमें अपना यह भयानक अतीत भूलना होगा।

हिना कुछ क्षण खामोश रही, फिर ठिठकते हुए व संजीदा लहजे में बोली-"अब्बू ! आप अगर मेरी मानें तो जाकर गौतम के मामू को यह सब कुछ साफ-साफ बता दें। अगर उन लोगों ने इंसानियत होगी...अतीत को भूलने की ख्वाहिश होगी और दसूरों को माफ करने का जज्बा होगा...तो ठीक है। वर्ना वो अपने घर खुश और हम अपने घर... ।'"हिना ने अपना दो टूक फैसला सुना दिया।

समीर राय उसे बड़ी खुशगवार हैरत से देखने लगा। जो फैसला वह खुद इतने दिनों से नहीं कर पाया था, वह फैसला हिना ने कुछेक क्षणों में ही कर दिया था ।समीर राय ने एक बहुत बड़ा बोझ अपने जहन से उतर गया महसूस किया था।

:: समाप्त::
 
सर्पहार

सुबह फिर वही समस्या सामने थी।

ऐसा दूसरी बार हुआ था। आज भी हिना का कमरा अन्दर से बन्द था और नौकरानी सितारा दरवाजा बजा-बजा कर तंग आ चुकी थी। सितारा ने कितनी ही बार ड्राइंगरूम के फोन से हिना के कमरे के फोन की घन्टी भी बजाई थी, लेकिन हिना पर कोई असर ही नहीं हो रहा था।

फिर कोई बारह बजे के करीब, हिना ने रिसीवर उठाया व भर्राई हुई अवाज में मुश्किल से बोली- “हेल्लो...।"

"बीवी...दरवाजा खोलें...।" सितारा तेजी से बोली।

"कहां का दरवाजा खोलूं...?"

हिना की नशे में डूबी-सी आवाज आई।

"अरे बीवी! अपने कमरे का और कहां का ?" सितारा हैरान-सी बोली।

"अच्छा...!" कहते हुए हिना ने रिसीवर रख दिया। हिम्मत कर अपनी समूची ताकत संजोई... जैसे-तैसे दरवाजा खोला और फिर धम्म से बिस्तर पर गिरी।

जब सितारा कमरे में दाखिल हुई तो हिना बेड पर बेसुध पड़ी हुई थी। सितारा उसकी हमउम्र थी...हिना उसे नौकरानी नहीं अपनी सखी समझती थी। सितारा ने निस्संकोच उसे हिलाया व बदहवास-सी बोली-"हाय! बीवी! क्या हुआ? क्या आपकी तबियत खराब हो रही है?"

"हां...।" हिना ने मुश्किल से ही अपनी आंखें खोली व फिर तुरन्त ही बन्द भी कर ली-"जी खराब हो रहा है, मतली-सी आ रही है...।"

"पानी में नींबू डालकर लाऊं...?"

"हां... जल्दी...।" वह आंखें मूंदे मूंदे ही बोली।

सितारा लपककर किचन में पहुंची और एक गिलास पानी में नींबू निचोड़ते हुए दौड़ी-दौड़ी वापिस आई। हिना उसी तरह आंखें बन्द किए पड़ी थी।

सितारा ने उसके सिर के नीचे दो तकिये रखे, फिर उसका सिर अपने हाथ में थोड़ा और ऊंचा करके उसे पानी पिलाया। हिना गटगट करके सारा पानी पी गई... जैसे जन्म-जन्म की प्यासी हो।

"बीवी... अम्मा कोठरी में है, क्या उसे बुलाकर लाऊं...?" सितारा चिंतित-सी बोली। उसकी मां सरवरी भी इसी कोठी में नौकर थी और हिना उसका दाई मां का सा आदर करती थी।

"नहीं सितारा...तू मेरे पास बैठ... मैं अभी ठीक हो जाऊंगी...।"

और फिर हिना वास्तव में ही आश्चर्यजनक तौर पर ठीक हो गई। नींबू-पानी ने ही उसके हवास वहाल कर दिए थे। उसने मुस्कुराकर सितारा की तरफ देखा।

"तू परेशान मत हो... मैं ठीक हूं...।"

'आपका चेहरा जर्द हो रहा है बीवी । यह आपको क्या हो जाता है...?"

"पता नहीं सितारा...।" हिना उठकर बैठ गई।

सितारा ने उसकी कमर के पीछे तकिये लगा दिये तो हिना ने टेक लगा ली।

और फिर हिना की नजरें अपने कमरे में यूं घूमी... जैसे कुछ खोज रही हो। कमरे में एक मध्यम- मध्यम खुशबू अब भी फैली हुई थी, बाकी सब ज्यों-का-त्यों था।

"बीवी... क्या देख रही हैं...? आपको कुछ चाहिये...?" सितारा ने उसका हाथ थामते हुए पूछा।

"कुछ नहीं देख रही। मुझे कुछ नहीं चाहिये। बस तू मेरे पास बैठी रह ।" हिना उसे प्यार भरा नजरा से दखत हुए हुए बाल की।

"मैं बैठी हूं बीवी। मैं आपको छोड़कर क्यों जाऊंगी...?"

"क्या वक्त हो रहा है?" हिना ने गर्दन घुमाकर साइड टेबल पर रखी घड़ी देखने की कोशिश की।

"सवा बारह हो रहे हैं वीवी! आज आप कालेज भी नहीं गई...!"

"हां...।" हिना ने एक गहरा सांस लिया, "कैसे जाती...आंख ही नहीं खुली। अब्बू हैं घर में?"

"नहीं, कहीं गए हुए हैं।"

"चलो, यह भी अच्छा है, वरना मेरी हालत देखकर वह परेशान हो जाते....।" "अब जल्दी से उठकर हाथ मुंह धो लें और बाहर आ जाएं...।"

-

मुंह-हाथ नहीं धोऊंगी... नहाऊंगी और नाश्ता बाहर नहीं करूंगी...यहीं अपने कमरे में करूंगी।"

"ठीक है, बीवी।" सितारा उठ गई, "मैं आप नाश्ते का बन्दोबस्त करती हूं...।" सितारा के जाने के बाद हिना बेड ले उठी, उसे कमजोरी महसूस हुई। यूं लगा जैसे बदन का जोड़-जोड़ दुःख रहा हो धीरे-धीरे चलती वह आइने के सामने पहुंची। उसके खुले बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे। उसने बाल समेट कर पीछे किये

गाउन की डोरियां खुली हुई थी... उसकी नजर अपने पेट पर गई! अब वहां दो नन्हें-नन्हें नये घाव मौजूद थे। उसने आगे बढ़कर शीशे में इन गड्ढों को देखा। ये नीले रंग के थे और भीतर से लालिमा-युक्त थे। ये नन्हें निशान पहले वाले घावों के निकट ही थे।

अब हिना को कोई सन्देह नहीं रहा था। उसे विश्वास हो गया था कि उसे रात को सर्पपुत्र रनतारो ने डंसा है। सुनहरी चमकदार काया वाले सांप रनतारो के बन्धन में ही वह बेसुध हो गई थी... और... और... ।

एक भयावह ख्याल ने उसे परेशान कर दिया। उसने अपना चेहरा देखा। उसका गुलाबी, खिलाखिला चेहरा जर्द हो रहा था और वह रात की अपनी कैफियत याद करके भयभीत हो उठी। सुनहरी सांप का पांव पर लिपटना.. उसका

लड़खड़ाना...
 
....और बेड पर गिरना... और... और फिर रनतारो का उसके रेशमी बदन पर फिसलना...।

हिना ने एकदम खौफजदा होकर अपने खूबसूरत बदन को देखा। बदन बेदाग व सुरक्षित था। पेट पर काटने के अलावा और कहीं कोई निशान नहीं था।

यह उसके साथ क्या हो रहा है? यही सोचती हुई वह बाथरूम में जा घुसी और पूरा शॉवर अपने सिर पर खोल लिया।

खाना खाने के बाद हिना और उसके अब्बू समीर राय लॉन पर टहल रहे थे।

रात की रानी की मस्त खुशबू चारों तरफ फैली हुई थी।

"हिना बेटी! आज मैं सुहेल के मामू सुखदेव की तरफ गया था।" - समीर राय ने बात आरम्भ करते हुए कहा- "और मैंने जैसा कि तुम्हारा मशविरा था सारे हालात उन दोनों को कह सुनायें। उन्हें हर वह बात बता दी जिसका बताना जरूरी था...।"

"ओह! फिर क्या हुआ अब्बू...?" हिना ने बेचैनी से पूछा।

"जब उन्हें यह मालूम हुआ कि रोशनगढ़ी के जागीरदार रोशन राय मेरा बाप था, तो दोनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं। "

"वे भड़क नहीं उठे थे?" हिना ने शांत भाव से पूछा "नहीं, भड़के तो नहीं... लेकिन यह बात सुनकर परेशान हो गये...।"

"क्या आपने उन्हें मेरी मां के बारे में नहीं बताया कि सुहेल के दादा राजा सलीम मेरी मां के कातिल हैं...?"

"हां... फिर मैंने उन्हें यह भी बताया।" समीर राय बोले- "यह सुनकर तो उनके होश ही उड़ गये...।"

"जाहिर है... ऐसा तो होना ही धा...।" हिना संजीदा थी।

"लेकिन बेटा...! सुहेल ने तो मुझे हैरान कर दिया। मुझे इस नई पीढ़ी के नौजवान से ऐसी उम्मीद न थी....।"

'क्या कहा उन्हान...?"

"वो बोला... मैं अपने दादा के इस भयानक जुर्म की माफी मांगता हूं। मैं शर्मिन्दा हूं कि ऐसे दादा का पोता हूं।" समीर राय ने बताया-"और बेटा, उसके इन जज्बातों से मैं उ बहुत प्रभावित हूं। जो बात मुझे पहले कहनी चाहिये थी...वह उसने कह दी।

बहरहाल, मैंने उसे यही जवाब दिया कि अब मैं क्या कहूं...! मेरे बाप के जुर्म तो इतने भयानक हैं कि मैं तुमसे माफी भी नहीं मांग सकता। बस इतना ही कह सकता हूं कि मेरे बाप रोशन राय के जुल्म नाकावले माफी हैं और मैं उनका बेटा समीर राय उसके हर जुर्म की सजा भुगतने को तैयार हूं...!" मेरी बात सुनकर वह बोला कि- "आप अपने बाप के किये की सजा क्यों पाएं। मेरे मां-बाप तो अब वापिस आ नहीं सकते... जो होना था, वह हो चुका। अब हमें अपने पास्ट' (अतीत) को भुलाकर एक नये दौर की शुरुआत करनी चाहिये।" इतना कह समीर राय कुछेक क्षण के लिए खामोश हो गये, फिर बोला - "बेटा! वह गौतम या सुहेल, ऐसा फ्राखदिल और खुले विचारों वाला लड़का है कि मैं सोच भी नहीं सकता था। हां बेटा! उसने मुझे पहली मुलाकात में ही प्रभावित किया था और मैंने उसे देखकर ही उसे तुम्हारे लिए पसन्द कर लिया था और यह मैं तुम्हें बता भी चुका हूँ। उसकी ये बातें सुनकर मुझे अपने चुनाव पर गर्व ही हुआ है बेटी। बहरहाल, जब अतीत के सारे किस्से बयान हो गए...दिल से अन्देशे... शिकायतें निकल गई और यह तय हो गया कि बीती को बिसार कर एक नए दौर की शुरुआत होनी चाहिये...तब एक और उलझन सामने आई..." समीर राय खामोश हो गये।

"वह क्या अब्बू...?" हिना ने बदस्तूर भावहीन स्वर में पूछा।

"तुम्हारे इस सुहेल की... अपने ताया राजा वकार की बेटी से काफी अरसे पहले मंगनी हो चुकी है।"

"अरे...! लेकिन हेमा ने मुझे इस बारे में कुछ नहीं बताया...।" हिना चौंकी- "यह सुहेल की बहन है तो मेरी भी तो फ्रैण्ड है...।"

"नहीं बताया होगा। पहले मेरी बात सुन लो, परेशान मत होवो! सुहेल ने अपने तौर पर ही इस मामले को साफ कर दिया है। उसने अपने ताया से...जो शादी की तारीख तय करने आये थे...इस शादी से इंकार कर दिया है और राजा वकार उसे धमकी देकर जा चुके हैं...।"
 
"फिर अब्बू... ...?" हिना की सवालिया निगाहें अपने बाप की तरफ उठ गई थीं।

समीर राय चिन्तित नजर आने लगा। वह धीमी आवाज में बोला- "यह कोई मामूली बात नहीं है। इसे एक नई दुश्मनी की निगाह से देखो। राजा वकार उन पुराने जागीरदारों में से हैं... जो दुश्मनियां अपनी जान देकर भी निभाते हैं। वो सुहेल को कभी माफ नहीं करेगा। मुझे अपना बाप याद आ रहा है बेटी, जिसने अपने बेटे की पसन्द की शादी का कितना भयानक इन्तकाम लिया था...फिर वो तो सुहेल का ताया है। फिर सुहेल ने उसकी बेटी को ठुकरा दिया है... अब अगर सुहेल अपनी पसन्द से शादी करता है तो न सिर्फ उसकी जान खतरे में पड़ेगी...साथ ही उसकी बीवी भी जान से जाएगी...। हिना बेटी! अब तुम ही सोचो कि मैं तुम्हारी जिन्दगी को किस तरह दांव पर लगा सकता हूं।"

हिना ने एक लम्बी सोचपूर्ण खामोशी के बाद पूछा-"अब्बू! आप क्या चाहते हैं?" "बेटा! अब मुझे इस रिश्ते से इंकार करना होगा...।"

हिना को यह जवाब सुनकर शायद धक्का-सा लगा था "नहीं अब्बू! ऐसा कैसे हो सकता है...?" वह धीमे से बोली थी।

"बेटा! मैं तुम्हें किसी मुश्किल में नहीं फंसाना चाहता...।"

समीर राय चिन्तित लहजे में बोला।

"अब्बू... अब आप पीछे नहीं हटेंगे... जो होगा देखा जायेगा...।"

"हिना...!" समीर बेचैन हो उठा "तुम नहीं जानती कि झूठी आन-शान रखने वाले ये किस किस्म के लोग होते हैं। ये लोग देखते सब कुछ हैं...बोलते सब कुछ हैं... लेकिन सुनते किसी की नहीं। मैं इन मगरूर संगदिल हस्तियों को अपने बाप के रूप में देख चुका हूं। मैं जिस आग में जल चुका हूँ... उसी आग में मैं अपनी बेटी को किस तरह झोंक सकता हूं...।"

'अब्बू! मैं आपकी फिक्र और आपके जज्बात को समझ सकती हूं। मैं जानती हूं कि मुझे होने वाली जरा-सी तकलीफ भी आपको सूली पर लटका देगी, लेकिन अब्बू आपको हिम्मत करनी होगी...।" हिना के लहजे में दृढ़ता थी, तो कहीं उसकी अपनी एक ख्वाहिश भी।

"हिना... मेरी बेटी... में बुजदिल नहीं हूं। मैं अपनी जान पर खेल सकता हूं, लेकिन तुम्हारी जान को खतरे में नहीं डाल सकता। "

"अब्बू बात अब बहुत आगे बढ़ चुकी है। सुहेल इस रिश्ते से इंकार कर चुके हैं। उ अब हमें उन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहिये...।" हिना ने यह बात बड़ी सादगी से कह दी।

लेकिन उसके इन शब्दों से उसकी इच्छा का अंदाजा लगाया जा सकता था। वह चाहती थी कि सुहेल ने उसी की चाहत में अपने खानदान में जंग का ऐलान कर दिया है तो उसे अकेला नहीं छोड़ा जाये।

"हिना, यह एक खतरों भरा रास्ता है। अपने बाप की जान सूली पर लटकाना चाहती हो?"

"अब्बू...जिन्दगी अपने आप में ही एक खतरे से कम नहीं। हादसों का ही दूसरा नाम जिन्दगी है। कौन जाने अगले क्षण क्या होने वाला है...लगने वाली ठोकर हमें मौत की घाटी में ले जाएगी या खुशकिस्मती के द्वार खोल जाएगी। अब्बू आप जिस खतरे से डरा रहे हैं...हो सकता है, कल किस्मत आपकी बेटी को किसी उससे भी संगीन खतरे में फंसा दे, फिर आप क्या करेंगे...?"

"राजा वकार से बड़ा खतरा और कोई नहीं हो सकता बेटी...।" समीर राय ने जैसे समझाने की कोशिश की-"वो अपनी बेइज्जती और अपनी बेटी के इन्तकाम में अंधा होकर जाने क्या कर गुजरे। मैं तुम्हें जानबूझ कर मौत की तरफ नहीं धकेल सकता...।"

'अबू...क्या पता किस्मत कहां धकेल कर ले जाए...।" हिना गमगीन से लहजे में बोली, "राजा वकार तो गोलियों की ही मौत देगा...एक आसान मौत! कौन जाने तकदीर मुझे किसी ऐसी चिर-यातना में फंसा दे कि मैं मरना भी चाहूं तो न मर सकूँ।" "अरे हिना! यह तुम किस तरह की बात कर रही हो। क्या तुम पागल हो रही हो बेटा?"

हिना के होठों पर फीकी-सी मुस्कान उभरी, वह बोली-"अभी तो मैं पागल नहीं हूं, लेकिन मैं आपको यह बताने की कोशिश कर रही हूं कि कल तकदीर मुझे कहां ले जाएगी... कुछ कह नहीं सकती...!"

"अच्छा... देखा जाएगा। तुम परेशान मत होवो। मैं इस प्रॉब्लम का कोई हल निकालता हूं...।"

यह बात जाने समीर राय ने क्यों कही थी... जबकि वह अच्छी तरह जानता था कि इस समस्या का कोई हल नहीं है। हिना भी अच्छी तरह जानती थी कि इस मामले को सम्भालना आसान नहीं है।
 
समीर राय यह बात भी समझ गया कि सुहेल उसकी बेटी की पसन्द है । वह हिना की ही क्या...खुद उसकी भी पसन्द था। पहली नजर में ही उसने सुहेल को हिना के लिए पसन्द कर लिया था। पर अब हिना की दृढ़ता ने उसे दुविधा में डाल दिया था। वह कायर नहीं था। महज सम्भावित खतरों के खौफ से ही तो वह अपनी बेटी की ख्वाहिश को नहीं कुचल सकता था। पर झूठी मान-मर्यादा के लिये इंतकामी कार्यवाइयां देखी थीं उसने और अंजाम की भयानकता से भी अनजान नहीं था।

उलझन के इन क्षणों में... अंधेरों में एक जुगुनू चमका।

"अब्बू... सुहेल को अब हमें अकेला नहीं छोड़ना चाहिये...।" यह हिना के दिल की आवाज थी...अब यही आवाज उसके दिल की आवाज बन गई।

उसने अंततः तय कर लिया कि वह सुहेल का हर कीमत पर साथ देगा... चाहे इसके लिये उसे कुछ भी क्यों न करना पड़े। समीर राय ने वह पूरी रात जागकर गुजारी। वह करवटें बदलता रहा और सोचता रहा। कभी वह थकी आंखों से छत को घूरता तो कभी आंखें मूंदकर अन्देशों को भगाने की कोशिश करता। वह बहुत-सी बातें सोचता रहा। रह-रहकर अपना बाप रोशन राय उसे याद आता रहा... जिसने उसकी बीवी नमीरा व नवजात बेटी हिना से कितना भयानक इंतकाम लिया था। वह भी इसलिये कि समीर राय ने नमीरा से प्रेम-विवाह किया था।

समीर राय की भारवी उसकी आंखों के सामने घूमती रही।

आखिर सुबह हो गई और समीर राय ने सोचा कि वह जिस नतीजे पर पहुंचा है, → उससे उसे अपनी बेटी को भी आगाह कर देना चाहिये ।

वह अपने कमरे से निकला और नीचे हिना के कमरे के सामने पहुंचा। हिना जाग रही थी और कालेज जाने की तैयारी कर रही थी। अपने बाप को अपने कमरे के दरवाजे पर देखकर वह एकदम चौंक गई।

अब्बू आप: खरता ह... हिना बाला ब्रुश करते हुए अपना हाथ रोक लिया और अपने बाप को निहारने लगी।

"सब खैर है बेटी...!" समीर मुस्कुराते हुए बोले-"तुम इत्मीनान से कालेज जाओ और हर फिक्र से आजाद हो जाओ। मैंने फैसला कर लिया है, तुम सुहेल को अकेला नहीं छोड़ोगे...मैं उस पर जुल्म नहीं होने दूंगा। देखता हूं, कौन मेरी बेटी की खुशियां छीनता है।"

उन्होंने आगे बढ़कर अपनी बेटी को अपनी बाहों में ले लिया। हिना के नयन वरवस ही भर आये। वह कुछ न बोली और खामोशी से अपने बाप की बालिष्ठ बांहों में छिपी खड़ी रही। यही महसूस कर रही थी वह जैसे उसे एक मजबूत चट्टान की ओट हासिल है। अब उसे किसी तूफान की फिक्र नहीं रही थी।

हिना जब कालेज पहुंची तो बहुत खुश थीं।

कालेज में उसकी नजर सुहेल के बदन और अपनी फ्रेण्ड मेहरो उर्फ हेमा पर पड़ी तो वह उसकी तरफ लपकी और जाते ही उसे अपने गले से लगा लिया।

"मेरी हेमा...!" वह खुशी से चीखी-"तुम्हें मेहरो कहूं या हेमा...?"

"कुछ भी कहो मैं तो मैं ही हूं... तुम्हारी फ्रेण्ड !" हेमा शोखी से बोली-"वैसे यह तुम्हें आज क्या हो गया है...? क्या सुबह-सुबह कोई ख्वाब देख लिया है...?"

"नहीं, मेरी मेहरो। मैं ख्वाबों के सहारे खुश होने वाली लड़की नहीं हूँ। मैं एक हकीकत पसन्द लड़की हूं और ठोस हकीकत ही मुझे खुश रख सकती है। मैं अपने भाग्य पर जितना गर्व करूं कम है।" हिना झूमती-सी बोली।

"अरे भाई, कुछ मुंह से भी फूटेगी या पहेलियां ही बुझाए जाएगी..।"

"वैसे मुझे तुझ से बड़ी शिकायत है...।" हिना सहसा उखड़ी-उखड़ी नजर आने लगी।

"अच्छा...!" हेमा ने आंखें चमकाई-"अब मैंने क्या कर दिया है?"

"जब तेरे भाई की मंगनी तेरी 'कजन' से हो चुकी थी, तो तूने मुझसे यह बात छिपाई किसलिये...?"

"हां हिना ! मैं इस मामले में तेरी मुजरिम हूं और सजा के काबिल भी...।" हेमा भी संजीदा हो गई- "कुछ फैसला ही नहीं कर पाई कि क्या करूं। यह सारा मामला कुछ इस तेजी से उठा कि समझ में नहीं आया कि क्या कहूं... क्या न कहूं। वैसे भाई सुहेल शुरू से ही इस रिश्ते से खुश नहीं थे। फिर शायद तुम्हें देखने के बाद उन्हें सहारा मिल गया। वह फौरन एक फैसले पर पहुंच गए। उन्होंने तय कर लिया था कि तुमसे शादी हो ना हो...लेकिन वह ताया की बेटी नेहा से हरिगज शादी न करेंगे। शायद इसीलिये मैंने इसका जिक्र जरूरी नहीं समझा था। ख्याल आया था, तो यही सोचा था कि किसी मुनासिब वक्त पर तुम्हें बता दूंगी... | "

"और वह मुनासिब वक्त तुझे आज तक नहीं मिला...?" हिना उसे घूरने लगी।
 
"सच बताऊं! आज ही पक्का इरादा था और तू आते ही बरस पड़ी...।" हेमा हंस पड़ी-"आई एम सॉरी हिना। अब तू बता, यह आज तू क्यों इतनी खुश नजर आ रही है?"

"हेमा! पापा ने फैसला कर लिया है।" हिना ने बताया- "और उनका फैसला सुहेल के हक में है। शायद अपनी बेटी की खुशी की खातिर उन्होंने फैसला किया है। इस मामले में वह सुहेल को अकेला नहीं छोड़ेंगे और उसका साथ देंगे।"

"अल्लाह तेरा शुक्र है...।" हेमा ने बेइख्तियार ही आंखें मूंद आकाश की तरफ हाथ फैला दिये थे।

और फिर हेमा यानि मेहरुनिसा ने उसी शाम यह खबर अपने भाई गौतम यानि सुहेल को जाकर सुनाई तो सुहेल की खुशी का भी ठिकाना न था। सुहेल को ताया की तरफ से बदले की आशंका थी...लेकिन अब उसका हौसला बढ़ गया था। समीर राय, हिना और मामू सुखदेव... तीन-तीन सहारे थे उसके साथ। अब तो वह किसी पहाड़ से भी टक्कर ले सकता था...ताया राजा वकार क्या चीज थे।

अब हर बात सामने आ चुकी थी।

सब कुछ साफ व स्पष्ट था। दिल बना लिया था...सो समीर राय चाहता था कि इस रिश्ते को रवायती तौर पर मजबूत कर लिया जाए। इसकी एक सूरत तो यह थी कि कर ली जाए... दूसरा सूरत यह थी कि काह कर लिया जाए।

हिना अभी छोटी थी, इसलिए समीर राय उसकी विदाई नहीं करना चाहता था। यही ख्वाहिश थी कि हिना बी.ए. कर ले...तभी विदाई हो। वैसे हिना की मंगनी या शादी करके वह अपनी मां नफीसा वेगम के परिवार वालों का मुंह बन्द कर देना चाहता था...जो अपने बेटों के लिए हिना को निगाह में रखे हुए थे। हर सगे वाला ही तो हिना के रिश्ते की ख्वाहिश दिल में लिए बैठा था। हिना की मंगनी हो जाने के बाद समीर राय आने वाले उल्टे-सीधे रिश्तों से बच सकता था।

लेकिन सुहेल के साथ रिश्ते के सिलसिले में एक समस्या यह भी थी कि इस रिश्ते की घोषणा नहीं की जा सकती थी। समीर अपनी मां व दूसरे रिश्तेदारों को यह भी नहीं बता सकता था कि वह किस दादा का पोता है। फिर राजा वकार को भी अंधेरे में रखना जरूरी था। विदाई से पहले इस रिश्ते के बारे में जानकर राजा वकार ने खामोश नहीं बैठना था।

समीर राय ने सोचा था कि मंगनी या निकाह के वक्त वह सुहेल की पारिवारिक पृष्ठभूमि से किसी को आगाह नहीं किया जाएगा। खास तौर पर अपने खानदान के लोगों को... अपनी मां नफीसा वेगम को भी नहीं। यूं दो-तीन साल आराम से बीत सकते थे। हालात बदल सकते थे। यह भी हो सकता था कि इस बीच सुहेल का ताया राजा वकार ही चल बसे।

वैसे यह ख्वाहिश पूरी होनी इतनी आसान न थी। राजा वकार जैसे लोगों का इतनी जल्दी बुलावा कहां आता है। सो, समीर राय को भी यकीन था कि राजा वकार जल्दी मरने वालों में से नहीं है।

समीर राय ने इस बारे में मामू सुखेदव से विचार-विमर्श किया तो उसने 'निकाह' पर जोर दिया। उसका यह भी ख्याल था और शायद सही ही था कि रिश्ते-मंगनी की बातें ज्यादा देर तक छिपी नहीं रहतीं कि हो सकता है यह मालूम होने पर कि सुहेल का निकाह हो गया है...वो ठण्डा होकर बैठ जाए... लेकिन मंगनी की खबर मिलने पर हो सकता है... वो मंगनी तुड़वाने की कोशिशें करें।

मामू सुखेदव की यह मंगनी...पर निकाह वाली सलाह समीर राय को जंची।

बस फिर क्या था। सहमति हो जाने के बाद यह भी तय हो गया कि अगले महीने ही सुहेल और हिना को इस पवित्र बंधन में बांध दिया जाए। इसके लिए अगले माह की पाँच तारीख फिक्स हो गई।

यानि कि निकाह होने में सिर्फ पच्चीस दिन बाकी थे।

हिना नर्म गुदाज तकिये पर सिर रखे एक पत्रिका पढ़ रही थी कि सहसा फोन की घंटी बजी। वह बेअख्तियार चौंक पड़ी। वह एक संजीदा लेख पढ़ने में इतनी लीन थी कि उसे अपने आसपास की सुध भी न रही थी।

उसने पत्रिका एक तरफ रख रिसीवर उठाया व कान से लगाते हुए बोली- "हैल्लो..."

"क्या कर रही हो यहां...?" उधर से आवाज आई।

"अच्छा...यह तू है हेमा..." हेमा की असलियत और उसका असली नाम जानने के बाद भी हिना के मुंह से उसके लिए हेमा का सम्बोधन ही निकलता था--"मैं तो 'मजाज' की शायरी में गुम थी कि तेरी काल की घंटी ने मुझे चौंका दिया.. और सुना तू कैसी है?"

"मैं ठीक हूं, लेकिन मेरे आसपास के 'लोग' कुछ ठीक नहीं!"

"क्यों, 'लोगों को क्या हुआ...." हेमा का आशय समझ हिना हंसते हुए बोली। "कहते हैं बात कराओ...।" हेमा बदस्तर शोखी से बोली हिना ने अनजान बनते हुए पूछा - "मैं समझी नहीं तू किस की बात कर रही है।"

"भई वाह ! यह भी खूब कही। निकाह सिर पर है और अजनबियत का यह आलम । क्या तू सचमुच नहीं समझी, बन्नो...?"

"ओह, अब समझी तू क्या बकवास कर रही है...।" हिना बोलो।

"अब तृ समझ गई है तो ले सम्भाल अपने उन को... मैं रिसीवर दे रही हूं...।" ओर फिर हिना ने उसे सुहेल से कहते सुना-"लें भाई, बात करें...इत्मीनान से बातें करें। मैं नीवे जा रही हूं।'

हिना कुछ नही समझ पाई

एक आवाज़ उसके कानों से टकराई, फिर कोई जैसे बहुत दूर से बोला-

"हेल्लो हिना...!"

"जी, मैं बोल रही हूं। कैसे हैं आप...?" हिना धीमे से बोली।

"मैं ठीक हूं। आपकी आवाज सुनकर कुछ ज्यादा ही ठीक हो गया हूं। " सुहेल की आवाज खुल गई।

"एक बात बताएं! क्या आपकी याददाश्त खासी खराब है...?" हिना ने अजीब-सा सवाल किया।

"जी नहीं...मेरे हिसाब से तो मेरी याददाश्त का जवाब नहीं है...।"

"तो फिर यह फोन हेमा से क्यों मिलवाते हैं...?"

"जी, मैं समझा नहीं...।"

" आपको मेरा फोन नम्बर याद नहीं रहता क्या?"

"आपका नम्बर तो मेरे दिल पर लिखा हुआ है। कोई अगर बेहोशी में भी पूछे तो सही-सही बता दूं...।" सुहेल बोला।

"आइंदा...आप मुझे फोन करें तो बिना 'आपरेटर' की हैल्प के कीजिएगा...।" हिना हंसी

"ओके। ऐसा ही होगा...।"

'और सुनाएं...।" हिना ने जैसे उसे 'शह' दी।

"किसी दिन चोपाटी पर चलें.. समुद्र किनारे...।"

सुहेल ने एकदम छलांग लगाई, उसने दावत दे डाली थी।

"हां, समुद्र पर जाने को तो मेरा भी जी चाहता है...लेकिन इस मामले में पहले अब्बू से बात करनी होगी। इजाजत मिल गई तो फिर प्रोग्राम बना लेंगे...।"

"फिर आज ही कर लें ना अबू से बात...।" सुहेल बेताब हो उठा था।

"यह नेक काम आप ही क्यों नहीं करते... मैं अब्बू के मोबाइल का नम्बर दे देती हूं... उनसे बात कर लें। सिर्फ इतना ही तो कहना है कि मैं हिना को चोपाटी पर ले जाना चाहता हूं...।" हिना अपनी हंसी दबाते हुए बोली।

"क्या इरादा है? अब्बू से डांट पड़वाना चाहती हो मुझे...।"

"हां, चाहती तो यही हूं...लेकिन अफसोस, वह इतने अच्छे हैं कि आपको एक लफ्ज न कहेंगे...।"

"पर... पर.. यह और आखिर मुझे डांट पड़वाना क्यों चाहती हैं? "

"ऐसे बन्दे के साथ... ऐसा ही होना चाहिए...।"

"क्या मतलब? कैसा हूं मैं...?"

"बुजदिल..." हिना ने बड़े तीखे लहजे में कहा और रिसीवर रख दिया।

समीर राय ने दिल पर पत्थर रखकर उन्हें सागर तट पर जाने की इजाजत दे दी। लेकिन साथ ही यह हिदायत भी दे दी कि बिना 'बाँडीगार्डों के न जाएं और वहां 'गार्डों की निगाहों से ओझल होने की कोशिश न करें।
 
समीर राय नहीं चाहता था कि वे दोनों किसी पब्लिक प्लेस पर इकट्ठे नजर आएं। एक तो उनकी जोड़ी...चांद-सूरज की थी... चमकती दमकती... किसी की नजर न लगे। दूसरे वह नहीं चाहता था कि राजा वकार के किसी बन्दे की नजर उन पर पड़े। लेकिन वह यह भी नहीं चाहता कि इन दोनों की किसी खुशी में रुकावट डाले। इसलिए अल्लाह का नाम लेकर दोनों को जाने की इजाजत दे दी।

हिना व सुहेल बहुत खुश थे।

चलते वक्त उन्होंने हेमा से भी साथ चलने को कहा था, लेकिन, हेमा ने यह कहकर इंकार कर दिया था कि वह कबाब में हड्डी नहीं बनना चाहती। यूं हिना व सुहेल सागर तट पर अकेले ही आ गए थे।

दो सिक्योरिटी गार्ड उनके साथ थे, जो दीवार पर सतर्क-चौकन्ने बैठे थे और हिना और सुहेल बातें करते धीरे-धीरे किनारे पर आती-जाती लहरों की तरफ बढ़ रहे थे। दीवार से समुद्र काफी दूर था। यहां पब्लिक भी कम थी। एक-दो परिवार ही थे जो समुद्र की लहरों से अठखेलियां करते नजर आ रहे थे।

सुहेल और हिना के चांद चेहरे को देखते हुए चल रहा था। उसके होठों पर बार- 3 बार मुस्कुराहट खेल जाती थी।

आखिर हिना से रहा न गया, वह पूछ बैठी-"यह आप इतना क्यों मुस्कुरा रहे हैं। सुना है...जो जितना मुस्कुराता नजर आता है...भीतर से उतना ही गमजदा होता है...।"

"अरे गमजदा हों हमारे दुश्मन! मैं तो इस वक्त खुद को दुनिया का सबसे खुशनसीब शख्स समझ रहा हूं...।"

"खुशनसीब या बेवकूफ...!" हिना ने शोखी से उसे छेड़ा।

"अरे हां! बेवकूफ ही कहना चाहिये...तुम्हारे साथ जो चल रहा हूं...।" सुहेल ने भी शोखी अपनाई "साथ का असर तो होता ही है ना...।"

हिना ठिठककर रुक गई, फिर तिरछी नजरों से उसकी तरफ देखते हुए बोली- "अच्छा हमारी बिल्ली हमीं को म्याऊं...।"

"खबरदार जो मुझे बिल्ली कहा... मैं बिल्ला हूँ...।"

"तो फिर आप दो टांगों पर क्यों खड़े हैं? चारों हाथ-पैरों पर छलांग लगाइये ना...।" "मैं तैयार हूं... बशर्ते कि 'बिल्ली' भी ऐसा करने को तैयार हो।"

"आप वो खुशनसीबी की क्या बात कर रहे थे...।" हिना खुद ही सीधी राह पर आ गई... उसने विषय बदलते हुए पूछा।

"हिना! सच तो यह है कि मुझे अभी तक अपने नसीब पर यकीन नहीं हो रहा है। हर लम्हे यही लगता है, जैसे यह ख्वाब है कि बस किसी पल भी आंखें खुल जाएंगी और मेरे ताया अपनी बेटी के साथ मेरे सामने खड़े होंगे।"

"अच्छा तो फिर यूं कहिये ना कि शकीला याद आ रही है।"

"मेहरू (हेमा) ठीक कहती है...।"

"यह मेहरू अचानक बीच में कहां से आ गई?"

"वह कहती है...।" सुहेल उसकी अनसुनी करते हुए बोला- "कि कभी-कभी हिना से बात करना बड़ा मुश्किल हो जाता है।"

"बकवास करती है वह। आप उसकी बातों में न आ जाइयेगा...।" हिना ने मुस्कुराकर टोका - "खैर, तो आप क्या कह रहे थे...?"

"मैं कुछ नहीं कह रहा था। मेरी तौबा जो कुछ कहूं...।"

"फिर अब...?"

अब यह कि...।" सुहेल ने उसकी बांह थामी और उसे लहरों की तरफ दौड़ाता ले गया। फिर वे पानी में खासी दूर तक चले गए।

लहरें भी जैसे इस खूबसूरत जोड़ी को देखकर बड़ी गर्मजोशी के साथ इनकी तरफ बढ़ीं। एक बड़ी लहर आई और दोनों कमर तक भीग गए। हिना के कदम डगमगा गये थे। वह तो सुहेल ने उसका हाथ मजबूती से पकड़ रखा था... वरना सम्भावना थी कि वह नीचे गिर जाती ।

लहर जब वापिस गई तो हिना को अपने दायें पांव में कोई चीज लिपटी हुई महसूस हुई। पानी अभी उसके पांवों तक था... इसलिए वह देख न सकी कि क्या चीज है। फिर जैसे ही पानी कम हुआ और उसने घबराकर अपना पांव ऊपर उठाया तो सुहेल उसके कोमल-गुलाबी पांव की तरफ देखकर कांप गया।

हिना के पांव में सुनहरे रंग का एक पतला-सा सांप लिपटा हुआ था।

"हिना...सांप...।" सुहेल ही सिट्टी एकदम से गुम हो गई। लेकिन हिना बिल्कुल भी परेशान नहीं हुई थी।

उसने टांग उठाकर अपने पांव में पायल की मानिन्द लिपटे सांप को एक नजर देखा और फिर निस्संकोच हाथ बढ़ाकर उसे मुंह के पास से पकड़कर अपनी तरफ खींच लिया। सांप किसी चिकनी चीज की तरह सहज ही में खिंचकर उसके हाथ में आ गया।

वह कोई दो-ढाई फुट लम्बा पतला-सा सांप था। हिना ने उसे दोनों हाथों से पकड़कर अपने गले में डाल लिया और उसकी उजली-उजली गर्दन पर बड़ा ही आकर्षक लग रहा था यह सुनहरी 'सर्पहार" ।

लेकिन यह सब कुछ सुहेल नहीं देख सका था। उसने तो हिना के पांव में सांप लिपटा देखकर ही दीवार की तरफ दौड़ लगा दी थी।

उसने हाथ हिला-हिलाकर और 'सांप-सांप चिल्लाकर दीवार पर बैठे दोंनों गार्डों अपनी तरफ आकर्षित किया

गार्डों ने जैसे ही आवाज़ सुनी उन्होने सुहेल के 'हाय-तौबा मचाने का शोर सुना, वे दीवार से कूद उसकी तरफ दौड़ पड़े।

सुहेल उन्हें आता देखकर फिर वापिस पलटा ।

अब उसके सामने एक नया ही दृश्य था।

हिना सांप अपने गले में डाल चुकी थी। वह बिल्कुल ही खौफजदा नहीं थी और बड़े आराम से खड़ी थी।

"अरे हिना! यह क्या है। यह हार नहीं सांप है। इसे गले से निकाल फेंको...काट लेगा...।" सुहेल बेअख्तियार चिल्लाया।

"कुछ नहीं होगा...।" हिना मुस्कुरा दी-"सारे सांप जहरीले नहीं होते। यह एक आम-सा सांप है...।"

“आम-सा ही सही...लेकिन सांप तो है...।" सुहेल चीखा-"इसे गले से निकाल फेंको...।"

"आप इधर आएं...इसे हाथ में लेकर देखें...।"

"नहीं, मैं तो कभी न पकडूं...।" सुहेल यथास्थान जमा खड़ा रहा।

"आपने गार्डों को खामखां ही बुलाया है...।" हिना की नजरें गार्डों की तरफ उठ गई थीं- "बेचारे दौड़े चले आ रहे हैं।"

"आपकी जान को खतरा था और मैं उन्हें न बुलाता...।"

"ठीक है। आप उन्हें वापिस करें। मैं इस सांप को समुद्र में फेंकती हूं।" हिना ने सांप को अपने गले से खींचकर अलग किया व वापिस जाती लहर की तरफ उछाल दिया।

कुछ क्षणों बाद उस सांप का पता भी नहीं चला कि किधर गया।

"क्या हुआ सर...?" एक गार्ड ने सुहेल के करीब आकर पूछा।

"मिस हिना के पांव में एक सांप लिपट गया था...।" सुहेल ने बताया- "पर उसे अपने पांव से छुड़ाकर उन्होंने दोबारा पानी में फेंक दिया है।"

सुहेल की इस बात पर गार्डों को कुछ यकीन आया...कुछ न आया। दोनों ने सवालिया नजरों से हिना की तरफ देखा।

"कोई परेशानी की बात नहीं है...।" हिना ने भोनी-भीनी मुस्कान के साथ कहा- "आप जाकर अपनी जगह बैठें। हम दोनों अंधेरा होने से पहले गाड़ी के पास पहुंच जाएंगे .. । "

"यस मैडम...।" एक गार्ड ने कहा और वे दोनों वापिस लौट गए।

" आपको सांप से बहुत डर लगता है...?" हिना सुहेल की तरफ देखकर मुस्कुराई ।

"सांप से किसको डर नहीं लगता...।" सुहेल उसकी सूरत देखते हुए बोला। ।

"मुझे नहीं लगता...।" हिना ने हंसकर कहा-"और यह आपने देख भी लिया है।"

"मैं हैरान हूं।"

"हैरत की कोई बात नहीं। यूं समझें कि जैसा चेहरा पढ़ने वाले... बन्दे का चेहरा देखकर उसके अच्छे-बुरे होने का किसी हद तक अंदाजा लगा लेते हैं... बिल्कुल उसी तरह जब मैं किसी सांप को देखती ह तो जान जाती हूं कि उसमें कैसा व कितना जहर है और यह किसी को कितना नुकसान पहुंचा सकता है। खतरनाक सांप को मैं झटका देकर मार सकती हूं...।" यह कहते हुए हिना ने सुहेल की तरफ देखा तो वह हिना की चमकती हुई जांखों की ताव न ला सका।

उसने घबराकर ही अपना मुंह फेर लिया। हिना मुस्कुराकर रह गई।

…………………………….
 
वह चीखना चाह रही थी...लेकिन आवाज उसके गले से नहीं निकल रही थी। फिर एकाएक ही उसके गले से चीख बुलन्द हुई...और इसके साथ ही हिना की आंख खुल गई।

उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा...पूरा बदन कांप रहा था। उसने एक सपना देखा था और ख्वाब में डर कर चीखी थी। उसकी चीख इतनी ऊंची थी कि समीर राय ने भी सुन ली थी। समीर राय उस वक्त कोई किताब पढ़ रहा था। वह किताब एक तरफ रखकर अपने कमरे से बाहर आया और हिना के बन्द दरवाजे पर जोर से दस्तक दी।

हिना के हवास अभी वहाल नहीं हुए थे... दस्तक सुनकर वह और भी सहम गई।

फिर जल्द उसन अब्बू का आवाज सुना...जो उसे पुकार रहा था

उसके दिल का ढांढस हुई। उसने जल्दी से उठकर दरवाजा खोल दिया।

समीर राय अन्दर आते हुए बोला-"यह तुम्हारी चीख की आवाज थी बेटा?"

"जी अब्बू...!" मैं ख्वाब में डर गई थी...।" हिना ने सच बता दिया।

"अरे, तुमने ऐसा क्या ख्वाब देख लिया- "वह उसके बेड पर बैठता हुआ बोला और हिना का हाथ पकड़कर उसने अपने पास ही बैठा लिया।

बाप को निकट पाकर हिना को हौसला हुआ था। वह अब्बू की तसल्ली के लिए हौले से मुस्कुराई, फिर बोली-"अब्बू...मैं ख्वाब में एक नदी के किनारे खड़ी हूं... कुछ और लोग भी हैं... इनमें औरतें भी हैं और मर्द भी। वे सब एक लाइन में खड़े हैं... मैं भी लाइन में लग जाती हूं। उधर दरिया पर एक शख्स खड़ा हुआ है... जिसने सिर से पांव तक काला लबादा ओढ़ रखा है... यहां तक कि उसका चेहरा भी ढंका हुआ है। वो लोगों को पानी पिला रहा है। जब मेरी बारी आती है तो मैं उसके नजदीक पहुंचती हूं... तो वो शख्स मुझे पानी पिलाने की बजाय, मेरा हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींच लेता है...तो मैं खौफजदा होकर चीखती हूं...।" अपना ख्वाब सुनाकर हिना कुछेक क्षणों के लिए फिर परेशान हो गई।

"वो शख्स कौन था? तुमने पहचाना उसे...?" - जाने क्या सोच समीर राय ने पूछा

"नहीं... वो सिर से पांव तक काले लबादे में ढका हुआ था। हां, वो था एक लम्बे कद का शख्स...।" हिना ने बताया- "अब्बू... यह ख्वाब आज मैंने तीसरी बार देखा है...।"

"बिल्कुल ऐसे ही...इसी तरह...।"

"जी अब्बू...!"

"हर वार चीख उठती हो...।"

"नहीं अब्बू! इस ख्वाब को देखकर खौफ से मेरी आंख जरूर खुल जाती है... लेकिन मैं चीखी आज ही हूं...।" हिना ने बताया।

"यह ख्वाब कब से आ रहा है...?"

हिना सोचते हुए बोली-"मेरा ख्याल है कि जब से 'निकाह' की तारीख फिक्स हुई है...।"

"ओह...!" समीर राय यह सब सुन चिन्तित हो गया, वह बोला- “खैर, तुम फिक्र न करो। सुबह में किसी से इस ख्वाब के बारे में जानने की कोशिश करूंगा। अब यह बताओ, क्या तुम अकेली सो जाओगी या सितारा को उसके क्वार्टर से बुलवाऊं...?"

"अरे नहीं अब्बू...! अब आपकी बेटी इतनी डरपोक भी नहीं है...।" हिना हंस दी थी- "आप जाकर सो जाएं। अब मैं नहीं डरूंगी..."

"दरवाजा अन्दर से लॉक न करना...।" समीर राय ने उठते हुए कहा ।

"जी अच्छा..." वह बोली।

"ओ०के०...गुड नाइट...।" समीर राय दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

"गुड नाइट अब्बू...!" हिना उनके साथ दरवाजे तक आई और फिर उसने दरवाजा बन्द कर लिया...लेकिन अन्दर से लॉक नहीं किया।

इसके बाद उसने कमरे की सभी लाइट जला दी। कमरा एकदम जगमगा गया। वह बेड पर आ लेटी व सोने की कोशिश करने लगी। रात के ढाई बज रहे थे। शीघ्र ही उसकी आंखों में नींद उतर आई।

उधर... 'वो' लटकते परदे के पीछे से फिसलकर कालीन पर आया। उसके कमरे में आते ही एक मस्त कर देने वाली खुशबू फैल गई। यह जानी-पहचानी महक हिना की सांसों में आ मिली तो उसकी बन्द होती आंखें खुल गईं। उसने तकिये से सिर उठाकर इधर-उधर देखा, उसे कोई नजर नहीं आया।

लेकिन फिर जब वह करवट बदलकर सीधी हुई तो उसे 'वो' पैरों की तरफ से बेड पर आता हुआ नजर आया।

'वो' वही सुनहरा सांप था... 'वो' रनतारो था। हिना को जागता देखकर वो अपना फन फैलाकर खड़ा हो गया...और हिना के चांद से चेहरे पर अपनी नजरें गड़ा दीं। हिना उसकी चमकती आंखों के जाटू में आ गई... और मंत्र-मुग्ध व सम्मोहित-सी ही उसे देखने लगी। फिर हिना की आंखों में गुब्बार-सा भरने लगा। सुनहरा सांप अब उसकी रेशमी गुलाबी काया पर फिसल रहा था और वह अपने आपसे बेखबर होती जा रही थी। फिर उसकी आंखों में नशे की बेसुधी-सी फैलती चली गई।

और अब वह इस सुनहरे सांप की दया पर थी। विचित्र अनूठे अहसास थे, जो उसे अपन साथ बहा गए

और फिर...!

हिना जब इन अहसासों के ज्वार-भाटा से उबरी...उसके हवास लौटे तो उसने अपने इर्द-गिर्द कुछ आवाजें सुनीं।

उसने आंखें खोलकर देखा तो कई चेहरे उस पर झुके हुए थे। वह फौरन ही उन चेहरों को नहीं पहचान पाई। पहले तो होश में आते ही उसे यह पता नहीं चला कि वह कहां है... फिर जब जरा हवास बहाल हुए तो उसे अंदाजा हुआ कि वह अपने कमरे में अपने बेड पर ही है। अब उसने कई बार अपनी आंखें खोलकर गौर से अपने ऊपर झुके हुए चेहरों को देखा।

इनमें एक चेहरा उसके बाप का था। समीर राय को पहचानते ही उसने उठकर बैठने की कोशिश की।'

"बेटी...लेटी रहो...।" समीर राय ने उसके बाजू पर हाथ रखते हुए कहा।

हिना को तेज चक्कर आ रहे थे और मतली-सी भी हो रही थी।

"बीवी...! लें यह पानी पी लें...।" सितारा हाथ में गिलास लिए खड़ी थी...हिना के आंखें खोलते ही उसने उसकी ओर नींबू-पानी का गिलास बढ़ाया।

लेकिन हिना उठने की पोजीशन में नहीं थी, सितारा ने उसका सिर थोड़ा-सा ऊपर उठाकर गिलास उसके मुंह से लगा दिया था। नींबू-पानी पीने के थोड़ी ही देर बाद हिना सम्भल गई, लेकिन उसके चेहरे पर जो जर्दी थी...वह दूर न हो सकी।

हिना को बेसुधी की अवस्था में देख, समीर राय परेशान हो उठा था और उसने उसे फौरन ही हस्पताल ले जाना चाहा था...लेकिन हिना के इस हालात से आगाह सितारा ने उसे रोक दिया था। उसने कहा था

"मालिक, आप परेशान न हों। बीवी अभी ठीक हो जाएंगी..."

और हिना नींबू-पानी पीते ही सचमुच ही सम्भल गई थी। ठीक हो गई थी।

समीर राय अपनी बेटी की इस अवस्था का कारण रात का ख्वाब समझ रहा था। उसका ख्याल था कि हिना अपने दिल पर उस डरावने ख्वाब का कुछ ज्यादा ही असर ले गई है।

उसे क्या मालूम था कि उसकी कमसिन बेटी के साथ क्या 'जुल्म' हो रहा है। शायद हिना को भी अहसास नहीं था कि वह उस सुनहरे सांप की 'हवस' का शिकार हो रही है।
 
तीन-चार दिन के बाद हिना ने फिर वही ख्वाब देखा। इस बार यह सपना थोड़े से परिवर्तन के साथ दिखाई दिया था। यह सपना उसने रात के बजाय दिन में देखा। कालेज से आने के बाद वह खाना खाकर कुछ देर आराम करती थी। नींद के इस अंतराल में उसे यह सपना दिखाई दिया।

इस बार उसने देखा कि वह दरिया पर लाइन में खड़ी है... जब पानी पीने का उसका नम्बर आता है और वह उस काले लबादे में छिपे शख्स के निकट पहुंचती तो वो अपने चेहरे पर पड़ा हुआ कपड़ा अचानक हटाता है और उसे अपनी गिरफ्त में लेकर कहता है

"याद रखना, तुम मेरी हो...कोई और बीच में आया तो उसे जिन्दा नहीं छोड़गा...।"

हिना उसकी धमकी सुनकर भयभीत हो जाती है और उसकी आंख खुल जाती है। उसका पूरा बदन पसीने में नहाया होता है। वह निश्चल-साकत अवस्था में पड़ी काफी देर तक लम्बे-लम्बे सांस लेती है।

और फिर जब उसके हवास वहाल होते हैं...वह अपने आपको सम्भालती है तो सपने में देखे उस काले लबादे वाले के चेहरे पर गौर करती है...लेकिन उसे कुछ याद नहीं आता कि उसकी शक्ल कैसी थी

लेकिन फिर भी उसके जहन में जाने यह बात क्योंकर कुन्द हो जाती है कि 'वो रनतारो था...सुनहरा सांप।'

फिर एक दिन एक विचित्र घटना घटी। हिना कालेज गई हुई थी। नौकरानी सरवरी... सितारा की मां... किचन में थी। सितारा ने नाश्ता कर लेने के बाद अपनी मां से कहा-

"मैं हिना बीवी के कमरे की सफाई करने जा रही हूँ...।"

"जा...और दीवारें वगैरह भी अच्छी तरह देख लेना कि कोई जाला-वाला न लगा हो। हिना बीवी को जाले देखकर गुस्सा आ जाता है....।" सरवरी ने उसे हिदायत दी।

सितारा हिना के कमरे तक पहुंची और फिर उसने अभी दरवाजा खोलकर कमरे में कदम रखा ही था कि उसका दिल जैसे गले में आ गया।

वह दृश्य ही कुछ ऐसा था।

कमरे में हल्का-सा अंधेरा था...लेकिन इतना भी नहीं कि चीजें नजर न आएं।

'वो' हिना के बेड पर बैठा हुआ था। काला लिबास पहने उस शख्स का चेहरा खिड़की की तरफ था। जब सितारा ने दरवाजा खोला तो उसने एकदम गर्दन घुमाई और फिर फौरन ही बेड से उठ भी गया।

वो एक लम्बा-चौड़ा शख्स था। वो धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ा। सितारा इस मंजर की ताव न ला सकी। उसके मुंह से घुटी घुटी-सी चीख निकली और वह वहीं त्यौराकर गिरी व बेहोश हो गई।

हिना कालेज से वापिस आई तो उसने आशा के विपरीत अपने कमरे का दरवाजा खुला हुआ देखा। उसे बड़ी हैरत हुई। वह तेजी से कमरे में दाखिल हुई। पर भीतर दरवाजे के पास ही सितारा बेहोश पड़ी थी।

उसने किताबें बेड पर फेंकी और सितारा पर झुक गई। सितारा की आंखें बन्द थीं और मुंह खुला हुआ था। हिना ने जल्दी-जल्दी उसका चेहरा थपथपाया और उसका नाम लेकर पूछा-"सितारा... सितारा...।"

फिर सहसा हिना को जाने क्या ख्याल आया सितारा सीधी लेटी हुई थी।

हिना ने उसकी कमीज सरका उसके पेट को देखा। पेट का निरीक्षण कर हिना ने एक गहरी सांस ली। यह सुकून व राहत की सांस थी।
 
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