Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा ) - Page 2 - SexBaba
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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

वह गाड़ी लेकर कब्रिस्तान की तरफ चल दिया। अभी वह आधे रास्ते में ही था कि उसे एकाएक ब्रेक लगाने पड़े।

वह शख्स बिल्कुल अचानक ही गाड़ी के सामने आया था।

समीर ने फुर्ती से पांव ब्रेक पर न रख दिया होता तो गाड़ी यकीनन उस शख्स पर चढ़ जाती। वो कोई फकीर था। उसक सिर के बाल लम्बे व उलझे हुए थे। मूंछ व दाढ़ी के बाल भी बेतहाश बढ़े हुए थे। उसका जिस्म एक सफेद चादर में लिपटा हुआ था। वह सांवले रंग व ऊंचे कद का आदमी था। उसकी काली आंखों में एक खास किस्त की चमक थी।

एक फकीर का यह दुस्साहस देखकर समीर को गुस्सा आया। जागीर में कौन ऐसा शख्स था, जो समीर राय से वाकिफ न था? मालिक की गाड़ी आते देखकर उसे सामने आकर रोकना तो बड़े दिलगुर्दे का आत्मघाती कदम था। समीर वैसे भी अपने आपे में नहीं था। वह उसे देखकर गुस्से से चीख उठा

"क्या है.?"

उस फकीर पर, उस ऊल-जुलूल शख्स पर समीर के गुस्से को कोई असर न हुआ। वो गाड़ी के सामने से हटकर समीर के करीब आ गया और अपनी तीखी पैनी नजरों से उसे घूरते हुए बोला

"मूर्ख, कब्रिस्तान में क्या रखा है? वहां क्यों जाता है? अरे.....जाना है तो रेगिस्तान में आ । खाली कब्रों में तुझे क्या मिलेगा...?"

इतन कहकर वह मलंग रुका नहीं। वो घूमकर गाड़ी के पीछे आया और फिर सड़क से उत्तर पेड़ों के झुण्ड में चला गया।

समीर उसकी बात सुनकर एकदम चौंका। वह फौरन गाड़ी से उतरकर बाहर आया, ताकि उस अजनबी शख्स से सवाल-जवाब कर सके, उससे पूछे सके कि उसे कैसे मालूम हुआ कि वह इस वक्त कब्रिस्तान जा रहा है? कब्रों और रेगिस्तान में तलाश से उसकी क्या मुराद थी?

उसने गाड़ी से उतरकर देखा तो मलंग, पेड़ों के झुण्ड में जा रहा था।

"ठहरो....सुनो....।" समीर उसे पुकारता हुआ उसके पीछे लपका।

लेकिन जब समीर उसके पीछे पेड़ों के झुण्ड में दाखिल हुआ तो वो रहस्यमय शख्स उसे कहीं नजर नहीं आया। इतनी देर में वो न जाने कहां छिप गया था? वो गायब हो चुका था।

समीर निराश होकर गाड़ी की तरफ लौटा व फिर गाड़ी स्टार्ट कर कब्रिस्तान की तरफ चल दिया।

समीर का दिल तो पहले ही अपने काबू में नहीं थां नमीरा की अचानक वव दर्दनाक मोत की इत्तला उसे खून के आंसू रुला रही थी। दिल का दर्द बढ़ता ही जाता था। उसे अपने बाप पर बहुत गुस्सा कि आखिर उन्होंने उससे यह खबर क्यों छिपाई थी? इसमें उसका क्या हित था? मां ने कहा था उसकी बेहतरी के लिए ही उसे यह इत्तला नहीं भेजी गई थी। उसकी क्या बेहतरी हो सकती थी? मां ने जरूर उसकी तसल्ली के लिए ही ऐसा कहा है।

समीर के जहन में सोचों के झंझावात उठने लगे।

फिर यह मलंग..? कौन था वो? अचानक सामने आया और अचानक ही गायब भी हो गया। देखने में वो भिखमंगा लगता था...लेकिन उसने भीख तो न मांगी थी?

वो तो कुछ रहस्यमय बोल बोलकर चला गया। समीर कहां जा रहा है, क्यों जा रहा है? यह कोई नहीं जानता था, फिर इस मलंग ने कैसे अंदाज लगाया? उसने खाली कब्रों का जिक्र क्यों किया ? रेगिस्तान की बात जुबान पर क्यों लगाया..? आखिर कौन था वो? क्या चाहता था?

समीर इन्हीं तपती सोचों के साथ गाड़ी ड्राइव करता रहा।

फिर उसे दूर से कब्रिस्तान का गेट नजर आया। गेट बन्द था। उसने गेट बन्द देख गाड़ी का हॉर्न बजाना शुरू कर दिया और गाड़ी की रफ्तार भी कम कर ली।
 
कब्रिस्तान का 'गौरकन-पोखर जो इस वक्त एक कब्र के गिर्द लगे पौधों में पानी दे रहा था...गाड़ी क हान्न सुनकर चौंका। वो जानता था कि इधर आने वाले गाड़ी मालिक की ही हो सकती है। वह फौरन गेट की तरफ भागा और जल्दी से गेट के दोनों पट् खोल दिये।

समीर को गेट खुलने का इन्तजार नहीं करना पड़ा। वह गाड़ी को कब्रिस्तान में लेता चला गया, फिर जब वह इंजन बन्द करके उतरा तो गौरकन (कब्र खोदने वाला) पोखर, हाथ बांधे उसके सामने खड़ा था।

समीर राय को देखकर, पोखर की सिट्टी-पिट्ट गुम हो गई थी। वो अन्दर-ही-अन्दर कांप रहा था।

समीर ने एक भरपूर निगाह, हाथ बांधे खड़े पोखर को देखा, फिर नर्म लहजे में पूछा-"पोखर .....! मालकिन कहां है?"

"वो.....उस तरफ, मालिक | पोखर ने अपनी कंपकंपाती आवाज पर काबू पाते, एक कोने की तरफ इशारा किया।

समीर उस तरफ बढ़ गया। पोखर, हाथ बांधे व सिर झुकाये उसके पीछे था।

कब्रों के लिए न दिखने वाला हिस्सा चुना गया था। कबें पेड़ों की आड़ में थी....दूर से देखने पर नजर न आती थीं। कर्को पक्की हो चुकी थीं। उन्हें सफेद पत्थर से बनाया गया था।

कब्रों को देखकर समीर अधीर हो उठा। उसने बड़ी बेताबी के साथ नमीरा और अपनी बच्ची की कब्र के गिर्द एक चक्कर लगाया। जब्त का बन्द टूट चुका था...वह प्रयत्नोपरान्त भी अपने बहते आंसुओं को न रोक सका।

वह कुछ देर यूं ही खामोश खड़ा आंसू बहाता रहा। उसकी नजरें कभी अपनी बीवी नमीरा की कब्र पर टिक्ती..और कम अपनी मासूम बच्ची की कब्र पर | आंसुओं से भरी आंखों के सामने कभी कळ धुंधला जाती....कभी साफ दिखाई देने लगतीं।

फिर समीर ने रुमाल से अपने आंसू पोंछे वे 'फातह पढ़ने के लिए हाथ उठाए। अभी उसने 'फातह पढ़नी शुरू ही की थी कि अचानक उसके कानों से उस रहस्यमय मलंग की आवाज टकराने लगी। उसके बोल.....कानों में गूंजने लगे। उस 'फातह पढ़नी मुश्किल हो गई।

'फातह पढ़ने के बाद...एक दूसरा ख्याल समीर के दिमाग में कौंधा और अपने इस ख्याल पर उसने फौरन ही अमल करने की भी ठान ली। उसेन एक नजर पोखर पर डाली....वो बदस्तूर हाथ बांधे और सिर झुकाये खड़ा था। समीर को हटता देखकर वो फौरन एक तरफ हो गया। समीर उसके पास से गुजरता हुआ बोला

"आओ, पोखर!"

"जी, मालिक...!" वो बड़े आदर से उसके पीछे हो लिया।

रास्ते में समीर ने उससे कोई बात नहीं की। वह इत्मीनान से गाड़ी में आकर बैठा.गाड़ी स्टार्ट की और सामने खड़े पोखर को अपने निकट आने का इशारा किया।

वो भागकर खिड़की के सामने आ गया-"जी मालिक.....हुक्म.?"

"आओ, गाड़ी में बैठो..।" समीर ने कोमल स्वर में कहा।

"जी, मालिक...!" पोखर के मुंह के निकला, लेकिन वह अपनी जगह से हिला तक नहीं। वो तो जैसे पत्थर हो गया था।

___ उसका पत्थर का होना स्वाभाविक था। किसी जागीरदार ने अपने मुलाजिक को, वह भी एक 'गौरकन' को अपनी गाड़ी में अपने साथ बैठने की पेशकश न की होगी। ये तो वे लोग थे, जो खुद को खुदा समझते थे । इन हुक्मरानों से कोई नौकर ऐसा आशा कर भी कैसे सकता था? वह यह तो सोच सकता था कि 'मालिक उस गाड़ी के नीचे कुचलकर गुजर सकते हैं। लेकिन उस यह तवक्कों हरगिज नहीं हो सकती थी कि कोई मालिक उसे अपनी गाड़ी में साथ बैठने का निमंत्रण दे।

"पोखर, आओ.... | मेरे पास वक्त कम है।" समीर संजीदा लहजे में बोला।

"जी, मालिका...!" वो डरते-डरते पिछला दरवाजा खोलकर बैठने लगा।

"नहीं, पोखर....! इधर आओ।" समीर ने उसे अपेन साथ अगली सीट पर बैठने का ईशारा किया।

पोखर को अपेन कानों पर यकीन न आ रहा था। मालिक उसे अपने बराबर बैठने के लिए कह रहा था। उसका हुक्म न मानना भी खुद को मुसीबत में डालने वाली बात थी।
 
इस कब्र खोदने वाले पोखर का घर भी कब्रिस्तान ही में था। वो अपनी बीवी-बच्चों के साथ रहता था। उसने अपने कच्चे मकान पर दूर ही से नजर मारी। वह कच्चा घर देखते-ही-दोते धुंधला गया। जोन क्या सोचकर पोखर की आंखों में आंसू आये थे। उसने गाड़ी में बैठते हुए कन्धे पर पड़े हुए अंगोछे से तेजी से अपने आंसू पोंछे और फिर सिकुड़-सिमट कर गाड़ी में बैठ गया।

गाड़ी एक झटके से आगे बढ़ गई।

समीर राय ने कब्रिस्तान से निकलने के बाद हवेली की तरफ जाने की बजाय जंगल की तरफ जाने वाला रास्ता अपनाया था।

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पोखर का तो जैसे खून ही सूख रहा था।

उसके होंठ सख्ती से भिंचे थे और उसके दिल पर सन्नाटा छा गया था। गाड़ी जब जंगली में दाखिल हुई तो पोखर को यकीन हो गया कि अब उसका आखिरी वक्त आ पहुंचा है। उसने कांपती आवाज में पूछा

"मालिक, मुझसे कोई गलती हो गई?"

"नहीं, पोखर, आओ.... | जरा जंगल की सैर करें...।" यह कह समीर गाड़ी से उतर आया।

"जी, मालिका....! वो डरता-डरता गाड़ी से उतर आया।

"पोखर, पिछली सीट पर मेरा रिवाल्वर पड़ा है...वह निकालकर मुझे दे दे....."

"जी मालिका.....!"

जब पोखर न कांपते हाथों से गाड़ी का पिछला दरवाजा खोला तो पीछे से समीर की आवाज आई-"रहने दो, पोखर..."

"अच्छा, मालिक....।" उसने फौरन दरवाजा बन्द किया और समीर राय के पीछे हो लिया..जो जंगल के अन्दर जा रहा था।

कुछ दूर अन्दर जाकर समीर एक घने पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। पोखर भी रुक गया। समीर ने उसका ऊपर से नीचे तक जायजा लिया और फिर उसके दोनों कन्धों पर हाथ रखकर धीरे से बोला

"पोखर.....देखो, तुम मुझसे झूठ न बोलना। जो पूलूंगा, उसका जवाब सच-सच देना। अगर तुमने झूठ बोला तो यह बात अच्छी तरह जान लो कि मैं यहां से अकेला जाऊंगा। मेरे अकेले जोन का मतलब तुम अच्छी तरह समझ गये होंगे। अगर तुमने सच-सच बता दिया तो मेरी-तुम्हारी इस मुलाकात का किसी को भी पता नहीं लगेगा। यहां तक कि मेर मालिक को भी नहीं। यह मेरा तुमसे वायदा है....."

"जी मालिक! पूछे..... | आप जो भी पूछेगे उसका जवाब सच-सच दूंगा।" पोखर ने कांपते हुए कहा।

"शाबाश..!" समीर ने मुस्कुराकर दिखाया, फिर पूछा-"पोखर, क्या ये दोनों कā तुमने खोदी थीं....?"

"नहीं मालिक..।" उसने जवाब दिया।

"ओह....!" समीर हैरान हुआ था-"लेकिन यह काम तो तुम्हारा है.....यह काम फिर किसने किया?"

"रौली ने..." पोखर ने धीरे से जवाब दिया।

"कब्रों में जनाजे किसने उतारे...?" समीर का अगला सवाल था।

__ "मुझे नहीं मालूम........।" पोखर ने इस सवाल का जवाब सुकून से दिया।

" क्या तुमने जनाजे भी नहीं देखे..?" समीर की हैरत बढ़ती जा रही थी।

"नहीं, मालिक.....।"

"तुम कब्रिस्तान में मौजूद नहीं थे? आखिर तुम कहां थे...?"

"मुझे रौली ने हुक्म दिया था कि मैं घर जाकर सो जाऊं और सूरज निकलने से पहले घर से न निकलूं। घर से बाहर झाकू तक नहीं.......।"

"पोखर.... जो कुछ तुम कह रहे हो...सच कह रहे हो?" समीर ने उसकी आंखों से झांकते हुए पूछा।

"हां, मालिक..!'' पोखर ने सहमकर नजरें झुका ली।

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"आओ, फिर मेरे साथ...अब बाकी बातें हम गाड़ी में बैठकर करेंगे......."

"मालिक....मैंने अपनी जिन्दगी दांव पर लगाकर सच बोल दिया है। अगर बड़े मालिक को मालूम हो गया कि मैंने आपको कुछ बताया है तो वह मेरे साथ मेरे बीवी-बच्चों को भी न छोड़ेंगे..... ।"

"मैं जानता हूं पोखर, तू बेफिक्र हा जा । तेरी जिन्दगी का अब मैं जिम्मेवार हूं। मेरे जीत-जी तुझको कोई टेढ़ी नजर से भी ने देख सकेगा। आ, मेरे साथ...।"

समीर तेजी से चलता गाड़ी में जा बेठा। गाड़ी स्टार्ट का उसने पोखर का गाड़ी में आने का इशारा किया।

"मालिक....आप इजाजत दें तो पीछे बैठ जाऊ......।" पोखर ने विनती की।

"ठीक है.... चल, पीछे बैठ जा....."

पोखर जल्दी से पिछला दरवाजा खोलकर गाड़ी में समा गया।

"मालिक, आपका रिवाल्वर..अगली सीट पर रख दूं..?" पोखर ने पूछा।

"नहीं, पोखर....उसे वहीं पड़ा रहने दे।" समीर ने लापरवाही से कहा और जंगल से निकलते ही गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी।

"मां, एक बात पूछू, बताओगी....?" समीर ने मां का हाथ अपने हाथे में ले लिया व उसे आहिस्ता से दबाते हुए बोला।

___ "हां, पूछो बेटा। यह भी क्या कहने वाली बात नफीसा बेगम ने उसे मुहब्बत भरी नजरों से देखतें हुए कहा।

"मां.अपने मेरी नमीरा को आखिरी दीदार तो किया होगा। वह कैसी लग रही थी? और मां, मेरी बच्ची कैसी थी..... वह किस पर गई थी?" समीर ने हसरत भरे लहजे में पूछा था।

"समीर! मैं अपनी बहू और पौत्री के आखिरी दीदार नहीं कर सकी......।" नफीसा बेगम की आवाज में दुख था।

"क्यों मां...?" समीर हैरान हुआ।

"जनाओं को हवेली नहीं लाया गया और मुझे यह बात उस वक्त मालूम हुई....जब उन्हें दफना दिया गया....."

"मां.....दाबा ने ऐसा क्यों किया? आखिर क्यों मां...?"

"अल्लाह ही बेहतर जानता है।" नफीसा बेगम ने इस बहस के कतराने की कोशिश की थी।

"हां मां! उल्लाह यकीनन सब कुछ जानता है, लेकिन उसने अपने बन्दों को भी कुछ जानने के लिए अक्ल में नवाजा है और मेरी अक्ल इस वक्त यह कह रही है कि दाल में कुछ काला है।" समीर ने मां का हाथ छोड़ दिया और हाथ-पांव फैलाकर सोफे पर पसर गया।
 
नफीसा बेगम उसे खाली-खाली निगाहों से देखने लगी।

"मां, मुझसे बड़ी भूल हुई है.... | मैं उसे हवेली में छोड़कर शहर की रंगीनियों में गुम हो गया.....” समीर खोये-खोये से अन्दाज में बोला-"मां.... तुम्हें वह बुरी लगती थी ....।"

"समीर बेटे! ऐसी बाते मत करो......."

"मां..मेरी नमीरा यहां बहुत तन्हा.... बड़ी अकेली थी....वह आखिरी वक्त तक मुझे पुकारती रही और में बहरा हो गया..।

"मैंने उसका बहुत ख्याल रखा.. और तुम्हारे बाबा भी नमीरा पर जान देते थे...।"

"जान देते थे या जान लेने के चक्कर में रहते थे।...।" समीर ने मां की तरफ देखते हुए सर्द लहजे में कहा।

"कैसी बात करते हो, समीर?"

"मां...क्या मेरी नमीरा से कोई कसूर हो गया था....?" सीर ने तड़प कर पूछा था।

"नहीं....।"

"मां, एक तो वह बाहर से आई थी..दूसरे उसने बेटी को उन्म दिया...वह कसूरवार तो थी ही ना, मां।"

"वह कसूरवार थी यह नहीं....यह सवाल तो उस वक्त खड़ा होता बेटा जब वह जिन्दा सलामत हवेली में आ जाती। वह तो हस्पताल ही में चल बसी। न वह रही ना उसकी बच्चे रही। फिर झगड़ा क्या बाकी रह गया..." नफीसा बेगम ने तर्क दिया।

"नहीं, मां। जो बात बाबा जानते हैं, वह आप नहीं जानती और जो आप जानती हैं, वह मैं नहीं जानता और जो मैं जानता हूं वह कोई नहीं जानता। फिक्र मत करो, मां । वह वक्त दूर नहीं, जब सबको सब कुछ मालूम हो जाएगा और वह दिन इस हवेली में रहने वालों के लिए खुशगवार न होगा....।" समीर ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा।

उसके लहजे में कोई ऐसी बात थी कि नफीसा बेगम का दिल कांप गया। वह घबराकर बोली-"देखो, बेटे! किसी गलतफहमी में कोई गलत कदम उठाने से पहले सौ बार सोचना हो सके तो मुझे मशविरा कर लेना...."

"अच्छा मां....।" समीर के होंठों पर फीकी-सी मुरूकुराहट आ गई।

फिर वह एक झटके के साथ उठा और कमरे से बाहर निकल गया।

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समीर राय जब डॉक्टर सहगल के कमारे में दाखिल हुआ तो वह समीर को देखकर उसके सम्मान में उठकर खड़ा हो गया। उसने समीर से बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया और उसका हाल-चाल पूछा।

__ "मिस्टर समीर! कैसी है आपकी बच्ची...?" औपचारिक बातों के बाद डॉक्टर सहलगल ने मुस्कुराते हुए पूछा-"बड़ी प्यारी है आपकी बच्चे।"

यह सवाल सुनकर समीर को एक झटका-सा लगा। उसे तो यही बताया गया था कि नमीरा बच्ची को जन्म देते ही खुदा को प्यारा हो गई थी और उसके देहान्त के कुछ ही देर बाद बच्ची भी चल बसी थी और यह वही हस्पताल था जहां नमीरा को लाया गया था। समीर ने अपनी हैरत को बड़ी कामयाबी से छिपा लिया। वह डॉक्टर से कोई ऐसा सवाल नहीं करना चाहता था कि वह कोई उल्टा सवाल कर बैठे। वह चौंक गये।

उसने कुद सोच धीरे से व उदास लहजे में कहा-"वह बच्ची तो मर गई....."

"आहे नो. वैरी सैड...!" डॉक्टर चकित रह गया-"पर कैसे? डॉक्टर संध्या ने आपकी बीवी का केस हैंडिल किया था। मैं खुद यहां मौजूद था। रोशन राय साहब खुद हस्पताल आए थे। आपके बारे में मालूम हुआ कि आप मुम्बई में हैं। आपकी बच्ची को मैंने भी देखा था। मैं यह बात यकीन से कह सकता हूं कि आपकी बेटी पूरी तरह से स्वस्थ थी। ऐसी प्यारी और तन्दुरूस्त बच्ची कि आजकल देखने में ही नहीं आती और वह...वह तो खूबसूरत भी बहुत थी। चांद का टुकड़ा.ऐसी कि उसे देखने के बाद निगाहें हटाने को जी न चाहे। आह! यकीन नहीं आता। आखिर उसे हुआ क्या मिस्टर समीर...?" डॉक्टर सहगल जज्बाती हो रहा था।

"मेरे ख्याल में उसे नजर लग गई.?" डॉक्टर समचुच ही दुखी था-"आपकी बेगम का क्या हाल है?"

यह एक और परेशानकल व उलझा देने वाला सवाल था।

"उनकी तबियत भी ठीक नहीं है। कुद टेम्परेचर ओर कमजोरी वगैरह हो गई है। मैं उन्हें बाम्बे ले जा रहा हूं। मैं यहां कुछ काम से आया था, सोचा आपसे भी मिलता चलूं...."

___ "वैरी काइन्ड ऑफ यू मिस्टर समीर..." डॉक्टर आभारी लहजे में बोला-"अगर कहें तो किसी लेडी डॉक्टर को साथ भेज दूं..?"

___ "थैक्स, डॉक्टर! इसकी जरूरत नहीं है। आप बस बुखार वगैरह की कोई दवा लिख दें... मैं लेता हुआ निकल जाऊंगा।" समीर ने सहज भाव से कहा-"आज की रात गुजर जाएगी। कल सुबह तो मैं बाम्बे पहुंच ही जाऊंगा..."

"ठीक है, मिस्टर समीर! मैं कुद दवाएं लिख देता हूं। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं....." डॉक्टर सहगल ने कहा व फिर अपने पैड पर लिखकर, पर्चा उसके हाथ में थमा दिया और फिर उसे दरवाजे तक छोड़ने भी आया।

"ऑल दि बैस्ट....।" कहते हुए उसने समीर राय को विदा किया था।

"मां एक बात पूछू, बताएंगी..?" समीर ने मां के घुटने पकड़ लिए और नीचे कालीन पर बैठ गया।

___ "यह तुझे हो क्या गया है पगले? ऊपर बैड पर आ जा..."

__ "नहीं मां! मैं यहीं ठीक हूं| आप मेरी बात का जवाब दें...."

"हां, पूछ....."

"मां, जिस हॉस्पिटल में मेरी नीर और बच्ची का इंतकाल हुआ... वहां के बड़े डॉक्टर को उन दोनों की मौत के बारे में कोई खबर नहीं...।" समीर ने रहस्योद्घाटन किया।

"यह तुम क्या कह रहे हो.... ऐसा कैसे हो सकता है...?" नफीसा बेगम परेशान हो गई।

___ "ऐसा इस तरह हो सकता है मां कि नमीरा ओर मेरी बच्ची की मौत हस्पताल में नहीं हुई.....।"

"लेकिन तुम्हारे बाबा ने तो मुझे यही बताया..."
 
"मां, बाबा झूठे हैं.....।" समीर उनकी बात काटमे हुए उबल पड़ा और फिर उनके घुटने व सामने सोफे पर जा बैठा।

"बाप को झूठा कहते हो....कैसे बच्चे हो तुम....?"

"झूठे बाप का झूठा न कहूं तो क्या कहूं...?" समीर ने कटुता से कहा-"मां, तुम जानती हो कि मेरी बच्ची कितनी खूबसूरत थी। वह इतनी सेहतमंद और इतनी हसीन व प्यारी थी कि कोई-उसे एक बार देख लेता तो फिर उसे देखता ही रह जाता | उस पर से नजरें हटाना मुश्किल हो जाता था। मां, मैं अब ऐसी बच्ची कहां से पाऊंगा..... कहां से लाऊंगा? मेरे बाप ने मेरे साथ बहुत जुल्म किया हैं

यह कहकर वह कमरे में रुका नहीं।

नफीसा बेगम कहती ही रह गई-"बेटा, सुनो तो...."

समीर अजीब मानसिक द्वन्द्व और उद्विग्नता का शिकार था।

वह हवी के पिछवाड़े के बाग में चहलकदमी कर रहा था। वह टहल रहा था और सोच रहा था.... सोच रहा था और टहल रहा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या है? कैसे हुआ है?

उसकी बीवी और नवजात बच्ची का देहान्त हुआ...मगर उसे इत्तला तक नहीं दी गई। मां ने खबर करवानी चाही तो बाबा ने उन्हें रोक दिया....उसकी भलाई के लिए। भला इसमें उसकी क्या भलाई थी, यही समीर अब तक नहीं समझ पाया था। फिर जनाओं को हवेली नहीं लाया गया... मां ने अपनी पौत्री और बहू के अन्तिम दर्शन नहीं किये। इसमें भला किसी भलाई थी। एक स्थाई 'गोरकन ने कā नहीं खोदी....उसे अपने घर में कैद कर दिया गया। जनाजे कब्रों में किसने उतारे, यह बात 'गोरकन' पोखर को मालूम नहीं। आखिर पोखर को उन कब्रों से दूर क्यों रखा गया? इसमें किसी भलाई थी? मां के कथानानुसार उसकी बीवी और बच्ची का देहान्त हस्पताल में हुआ.... लेकिन जिस हस्पताल में उनका देहान्त हुआ..वहां के डॉक्टर इन्चार्ज का बयान ही कुछ और है। इतना तो तय है कि मां-बेटी हस्पताल में नहीं मरी । जाने मरी भी हैं या नहीं।

हां....अब तक की पूछताछ से जो बात सामने आई थी...वह यह थी कि नमीरा और उसकी बच्ची की लाश किसी ने नहीं देखी थी। तो फिर आखिर उन दोनों के साथ हुआ क्या?

समीर टहलता रहा ओर सोचता रहा। तब एकाएक उसके जहन में अपन बाप रोशन राय के 'फरिश्तों का ख्याल आया। समीर उन दोनों की "बाबा के फरिश्ते' ही कहता था। उन दोनों का नाम रौली और होली था।

वो दोनों जुड़वा भाई थे। उन दोनों की शक्लों में समानता थी....लेकिन बहुत ज्यादा नहीं थी। उन दोनों के हुलिये अलग-अलग रहे थे। अलग व भिन्न! एक की घनी-बड़ी मूंछे थीं, तो दूसरे की मूंछे सफाचट थीं। एक ने लम्बे बाल रखे थे.... दूसरे ने सिर मुंडा रखा था। कद दोनों के बराबर थे....बदन भी एक जैसे थे। नाटे और मोटे। देखने में दोनों 'रफ एण्ड टफ थे।

ये वो लोग थे जो रोशन राय के उठने से लेकर बैठ पर जाने तक साथ रहते थे। रोशन राय के साथ जहां कोई और नहीं जा सकता था, वहां ये दोनों या उनमें से कोई एक जरूर होता था। ये दोनों रोशन राय के खास आदमी थे। इतने खास कि जो बात रोशन राय भी अपने बारे में नहीं जानते.... वह ये जानते थे। शायद इसीलिए समीर इन्हें 'बाबा के फरिश्ते कहता था।

समीर ने अभी तक इन दोनों में से किसी को हाथ नहीं लगाया था। छुआ तक नहीं था। वैसे इन दोनों में से किसी को हाथ लगाना या छूना इतना आसाना नहीं था। इन पर हाथ डालते ही रोशन राय को खबर हो जानी थी। और यह 'खबर' खुद समीर के लिए नुकसानदेय भी साबित हो सकती थी।

समीर अपने बाप के मिजाज को जानता था। वह एक संगदिल इंसान था। निर्ममता उसमें कूट-कूट कर भरी थी। अपने किसी काम में किसी का हस्तक्षेप या किसी किस्म की रुकावट, वह किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करता था। अपनी झूठी आन-शान के लिए अपनी औलाद को भी औलाद मानने से इंकार कर सकता था। ऐसे में उन दोनों से पूछताछ करना खतरे से खाली नहीं था।

अब इस समस्या का सिर्फ एक ही हल उसके पास रह जाता था।

समीर इस 'हल पर अमल करने के लिए.. इसके विभिन्न पहलुओं पर गौर करने लगा।

वह टहलता रहा और सोचता रहा, फिर अन्ततः किसी नतीजे पर पहुंचे ही गया।

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रोशन राय इस वक्त हवाखोरी के लिए अपनी जमीनों पर निकला हुआ था। वह घोड़े पर सवार आगे चल रहा था और उसके पीछे रौली और होली...अपने घोड़ों पर सवार चल रहे थे। दोनों ही आधुनिक हथियारों से लैसे थे।

रोशन राय अपने घोड़े की पीठ पर कमर अकड़ाये, गर्दन अकड़ाये और सिर ऊपर उठाये बैठा था। वह अपनी जागीर और अपनी जमीनों पर घूमकर बहुत खुश होता था। एक नशा-सा ही महसूस करता था। वह कभी दिमागी उद्विग्नता का शिकार होता....फौरन रौली-होली के साथ अपनी जमीनों की सैर करने निकल जाता।

जमीनों की सैर करते हुए वह अपनी आंखें उल्लू की तरह खुली रखता था...उसकी आंखों वैसे भी उल्लू की तरह गाल थी....इन्हीं आंखों को वह देखते हुए और अधिक फाड़ लिया करता था।

सैर करते हुए अगर उसे कभी अपनी पसन्द की कोई "शै दिखाई दे जाती थी, तो वह रौली की तरफ इशारा करके कहता-"देखो भई, हमारी जमीनों की शान...."

और रौली-होली को यह समझने में देर न लगती कि 'जमीनों की शान' कहकर किस शान की तरफ इशारा किया गया है। वे इस 'शान' को अच्छी तरह ताड़ लेते और फिर उनमें से एक उस 'शान' के पीछे लग जाता और उस वक्त तक उसके पीछे रहता....जब तक उस 'शान' को मालिक के हुजूर में पेश न कर दिया जाये।

हवाखोरी इस अय्याश जागीरदार का प्रिय शुगल था। इस शुगल के दौरान जमीनों की 'शान' की नहीं...और भी फैसले सुना दिये जाते थे और रौली-होली इन आदेशों पर ऐसे अमल करते जैसे इन्सान नहीं 'रोबट हों। भावनाओं से रिक्त मशीनों।

इस हवेली में पहले रौली आया था। हुलिया तो खैर उसका वही था, जो आज था....गंजा सिर और मोटी मूंछे, ल लेकिन चेहरे पर आज जो खूखारपन व शैतानियत थी, वह न थी। वह यतीम सूरत बनाए रोशन राय के हुजूर में पेश हुआ था। अब से दस साल पहले उसका कोई करीब रिश्तेदार रोशन राय का मुलाजिम था...उसी के जरिये रौली रोशन राय तक पहुंचा था और उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया था- ओर रोशन राय ने उससे कुछ पूछने से पहले उसे सिर से पांव तक तीखी नजरों से देखा था और रौली उसे इस एक ही नजर में काम का आदमी दिखाई दिया था। शायद इसीलिस उसने रौली से नर्म लहजे में बात की थी।

__ "हां, बाबा। अभी कुछ बोलो भी या हाथ जोड़े ही खड़े रहोगे....."

"मालिक, एक फरियाद लेकर आया हूं...।"

"हां बाबा! बोलो। हम इधर बैठे ही किसलिए हैं? हम अगर लोगों की फरियाद नहीं सुनेंगे तो फिर कौन सुनेगा? हां, बाबा...बोलो...तुम्हें किसी ने परेशान किया है? क्या फरियाद हे तुम्हारी ?" रोशन राय ने उसे शह दी थी।

"मालिक....मुझे मेरे चाचा ने बहुत सताया है..।" रौली ने फरियाद की।

"अच्छा बाबा...अभी वह क्या कहता है...कोई जमीन.जायदाद की झगड़ा है क्या..?"

"हां, मालिक जमीन का ही झगड़ा है। आपने बिल्कुल ठीक अंदाज लगाया, सरकार!"

"तुम्हारी जमीन पर कब्जा करना चाहता है...?"

"नहीं मालिक! जमीन उसकी है....।" रौली ने बताया।

"अरे, बाबा...!" रोशन राय उसके इस जवाब पर चौंका था-"अगर जमीन उसकी है तो फिर झगड़ा कैसा...?"

"मालिक, मेरा चाचा..बिल्कुल अकेला है...न जोरू ना बच्चे.. और पांव भी कब्र में हैं। मैं कहता हूं कि जमीन मेरे हवाले कर दे...पर करता नहीं। देखें ना मालिक, यह जमीन कल भी मेरे नाम ही होनी है तो वो फिर जमीन का कब्जा छोड़ता क्यों नहीं...?" रौली ने बड़े भोलेपन से कहा।

यह सुनकर रोशन राय ने जोरदार कहकहा लगाया था और फिर मुस्कुराते हुए बोला था-"बाबा, बात तो तुम ठीक कहते हो। तुम्हारी फरियाद बड़ी जायज है। पर बाबा, अमी मैं इसमें क्या करूं..? देखो, कभी किसी चीज को हासिल करने का बस एक ही तरीका मेरी नजर में है.. अगर कोई तुम्हारा हक देने पर राजी न हो तो उससे छीन लो। तुम्हारा चाचा तुम्हारी होने वाली जमीनों पा सांप बना बैडा है तो बाबा, लाठी उठा और उसका सिर कुचल दे। जवान हो, ताकतवार हो, तुम्हारे लिए यह काम मुश्किल तो नहीं...."

___ "पुलिस से डरता हूं." रौली ने साफनाई से कहा था

"और पुलिस हमसे डरती है..?" रोशन राय ने सवाल भी किया व जवाब भी दिया ।

__ "जी, मालिक...!" रौली ने फिर हाथ जोड़ दिए थे।

"पुलिस को हम देख लेंगे। तुम अपने चाचा का देखो...."

रोशन राय ने फैसला सुनाया।

रौली खुश हो गया। वो रोशन राय की सरपरस्ती पाने को ही यहां आया था। उसके शुभचिन्तकों ने उसे यही मशवरा दिया था कि अगर मालिक ने तेरे सिर पर हाथ रख दिया तो तेरा बेड़ा पार है। मालिक ने भी उसके सिर पर यूं ही हाथ नहीं रखा था..इतनी बड़ी जागीर थी.....जागीर को सम्भालने के लिए हर किस्म के बन्दों की जरूरत थी। रौली उन्हीं बन्दों में से एक था।

बस फिर क्या था, मालिक का आशीर्वाद मिलते ही रौली ने अपने चाचा का 'कल्याण कर दिया था।

___ अपने चाचा को कत्ल करके जब वह फरार होकर हवेली की तरफ आ रहा था तो पुलिस ने उसे रास्ते में ही धर लिया था। साथ उससे 'आला कत्ल भी बरामर कर लिया था। थानेदार को रोशन राय ने यही हुक्म दिया था।
 
रौली की गिफ्तारी की खबर रोशन राय को फौरन ही मिल गई थी, लेकिन उसने दो रातों तक रौली की कोई खबर नहीं ली। रौली लॉकअप में बन्द मालिक की तरफ से किसी मदद का इन्तजार करता रहा। दो रातें बीतने के बाद उसके छक्के छूट गए थे। वह अपने चाचा के कत्ल के इल्जाम में 'आला कत्ल के साथ पकड़ा गया था। अब फांसी के फन्दे से कोई नहीं बचा सकता था।

जब निराशा अपनी हदों को छूने लगी तो रोशन राय का चेहरा चमका। उसने थानेदार से दिखावे का 'सौदा किया और रौली पर यह जाहिर करके कि उसने पच्चीस हजार की मोटी रकम, नजराना अदा करके उसे छुड़ाया है...रौली को हमेशा के लिए अपने जाल में फंसा लिया।

रौली अब रोशन राय के लिए 'जर खरीद गुलाम' था।

वो रोशन राय के लिए बड़े काम का आदमी साबित हुआ और धीरे-धीरे वो रोशन राय का खास आदमी बन गया।

फिर एक साल बीतने के बाद रौली ने अपने जुड़वा भाई 'होली' का जिक्र रोशन राय से किया। होजल उस वक्त मुम्बई से फरार होकर अपने गांव पहुंचा था। रौली ने उसे रोशन राय की सेवा में पेश करने का इरादा कर लिया। रोशन राय ने होली के बारे में सुना तो वह भी उसे अपने काम का आदमी मालूम हुआ।

उसने रौली से कहा-"हां, बाबा....लाओ उसे....हम भी देखों बम्बई में वारदात करने वाले को.।"

फिर होली को एक नजर देखते ही रोशन राय ने उसे भी अपने साथ रखन का इरादा कर लिया। यूं जल्दी ही दोनों भाई रोशन राय के विश्वास के बन्दे बन गये।

अब एक लंबे समय से वे दानों रोश नराय के पास थे। दोनों साये की तरह उसके साथ रहते थे।

इसीलिए समीर उन्हें 'बाबा के फरिश्ते कहता था। ऐसे 'फरिश्ते जिनके बयान पर बाबा पकड़े जा सकते थे।

रोशन राय ने अचानक ही अपने दौड़ते हुए घोड़े की लगाम दे उसे रोका और घोड़े का रुख जरा-सा मोड़कर पीछे देखा। रौली ओर होली ज्यादा पीछे न थे। वे कुछ ही क्षणों में रोशन राय के निकट पहुंच गये....और खामोशी से उसकी तरफ देखने लगे।

रोशन राय ने अपने फरिश्तों की तरफ बारी-बारी गौर से देखा व फिर कदरे चिन्तित स्वर में बोला-"बाबा.....अपने इस लाडले समीर राय की अभी कुछ समझ में नहीं आ रही है। अभी तुम लोग उस पर नजर रखो.....।"

"जी, मालिका....।" रौली ने आदर के साथ कहा।

"देखो, जरा होशियारी से। उसे मालूम नहीं होना चाहिये कि कोई उसके पीछे लगा हुआ है....वरना वह उसे गोली मार देगा। उसे जब गुस्सा आ जाता है तो वह कुछ नहीं देखता।" रोशन राय अपने बेटे के मिजाज से भली-भांति वाकिफ था।

"जी, मालिक....आप फिक्र न करें....।" इस बार होली बोला-"मैं इस बात का ख्याल रखूगा।"

___ "आओ, अब वापिस चलें। शाम होने को है....।" कहते हुए रोशन राय ने अपने घोड़े को 'ऐड दी और घोड़ा देखते-ही-देखते हवा से बातें करने लगा।

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समीर ने जो सोचा था और जो कदम उठाने का फैसला किया था....उसे अंजाम देने के लिए उसने पोखर का ही चुना था।

समीर ने 'गोरकन पोखर को उस काम पर लगा दिया था।

पोखर जानता था कि यह खतरनाक काम है और इसकी भनक भी अगर बड़े मालिक को पड़ गई तो वह उसे बीवी-बच्चों सहित कुत्तों के आगे डलवा देंगे। पर उधर बड़े मालिक थे, तो इधर छोटे मालिक थे। छोटे मालिक भी कम न थे। वो अगर इंकार कर देता तो जान फिर भी सलामत न थी। एक तरफ खाई थी तो दूसरी तरफ कुआं। उसने अपनी जान जोखिम में डालकर समीर राय का साथ देने का इरादा कर लिया। पोखर को समीर से हमदर्दी हो गई थी।

वैसे भी वह छोटे मालिक थे...नौजवान थे..वह 'फातह के लिए हाथ उठाते तो उनकी आंखों भर आती थीं। आखिर इन कब्रों में क्या राज था? उन्हें इन कब्रों से दूर क्यों रखा गया था? इस जिज्ञासा व खुद-वुद ने भी पोखर को इस काम के लिए उकसाया था।

उसने आठ-दस फुट के फासले से ओर एक खास जगह से सुरंग खोदनी शुरू की थी। वहां झाड़ियां बहुत थीं। एक नजर देखने पर कोई अंदाज नहीं लगा सकता था कि वहां से सुरंग खोदी जा रही है। वैसे भी किसी की सोच इस तरफ नहीं जा सकती थी। अगर कब्र को 'पक्का न करा दिया गया होता तो सुरंग खोदने की जरूरत नहीं पड़ती। पोखर रातो-रात कब्र खोदकर दोबारा ज्यूं-का-त्यूं बन्द कर देता। अब ‘पक्की' कब्र को तोड़ा नहीं जा सकता था। तोड़ा जाता तो फिर कुछेक घन्टों में उसका पुनर्निर्माण सम्भव नहीं था और अगर किसी तरह कब्र को पक्का कर भी दिया जाता तो भी भेद खुलने का खतरा था।

बहरहाल, पोखर यह काम रात के अन्धेरे में अंजाम दे रहा था। वह रात के बारह बजे से सुबह चार बजे तक सुरंग खोदने को काम करता था। उसने दो रातों में सुरंग, नमीरा की कब्र तक पहुंचा दी।

फिर जब समीर मुंह-अंधेरे....प्रोग्राम के मुताबिक कब्रिस्तान पहुंचा और सुरंग में दाखिल होकर उसने एमरजेंसी लाइट में कब्र का निरीक्षण किया तो उसका शक यकी में बदल गया।

कब्र खाली थी। उसमें नमीरा की या किसी की भी लाश नहीं थी।

वह सुरंग बन्द करने का हुक्म देकर वापिस हवेली लोट आया। हवेली में सन्नाटा था। हालांकि आकाश पर हल्की-हल्की रोशनी उजागर हो चुकी थी..लेकिन हवेली के वासी अन्धेरों में पड़े नींद के मजे ले रहे थे।

हवेली के असली वासी थे कितने। गिनती के तीन । एक बाबा, एक मां और एक वह खुद। तीन रहने वाले और हवेली इतनी बड़ी कि एक साथ तीन सौ आदमी आसानी से समा जाएं। हवेली की रौनक नौकर-चाकरों सेथी। अगर वे न होते तो हवेली की स्थिति मरघट की-सी होती।

समीर राय को इस सन्नाटे से सख्त चिढ़ थी। शायद इसीलिए उसने होस्टल में रहना पसन्द नहीं किया था। मुम्बई में भी, वह चाहता तो अपने बांद्रा वाले बंगले में रह सकता था, लेकिन वह तो दूसरों के साथ.....दूसरों के बीच रहना चाहता था। हंगामों भरी जिन्दगी का ख्वाहिशमंद था। अपनी बीवी नमीरा को उसने इसी कारण यहां हवेली में छोड़ा हुआ था, लेकिन अब वह पछता रहा था।

काश! उसने नमीरा को हवेली में न छोड़ा होता।

और अब...अब तो वह मामला खासा उलझ गया था । नमीरा की हस्पताल में मृत्यु की बात झूठी थी। नमीरा की लाश भी कब्र में नहीं थी। लाश का न मिलना...इस बात का सबूत था, नमीरा को मौत नहीं हुई

समीर ने बच्चे की कब्र नहीं खुदवाई थी। पर, अब यकीन किया जा सकता था कि वह कब्र भी खाली ही होगी।

अगर मां-बेटी दोनों जिन्दा थीं, तो फिर उनकी मोत का यह नाटक क्यों? उन्हें मुर्दा क्यों जाहिर किया गया?

बहरहाल, कब्र में लाश न मिलने से समीर के दिल को कुछ तसल्ली हुई। उसे अब कम से कम अपनी बीवी व बच्ची के मिलने की उम्मीद तो गई थी।

समीर को हवेली में आए पांच-छ: दिन हो चुके थे, लेकिन उसने अभी तक एक दिन भी नाश्ता अपनी मां नफीसा बेगम के साथ नहीं किया था। इसका मौका ही नहीं मिला था।

आज सुबह मों ने सन्देहा भिजवाया था कि वह नाश्ता उसके साथ करेंगी।

फिर वह अपने हाथों से ट्रॉली धकेलती हुई समीर के कमरे में पहुंची थी।
 
समीर अभी-अभी नहाकर बाथरूम से निकाल था और ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ा बाल संवार रहा था कि आईने में उसे अपनी मां की सूरत दिखाई दी।

वह बाल बनाते-बनाते रुक गया वह अपनी मां की सूरत देखने लगा। नफीसा बेगम ने भी उसकी नजरें अपने चेहरे पर महसूस कर ली....वह धीरे से मुस्कुराई और ट्रॉली मेज के करीब करके उस पर स नाश्ते की चीजें मेज पर रखने लगी।

"मां, हवेली के नौकर-नौकरानियों को क्या हुआ...?" समीर ने पूछा।

"सब हैं। मैंने सोचा आज मैं अपने बेटे को अपने हाथों नाश्ता करवाऊं..." नफीसा बेगम अपनत्व से बोली।

___ "ओह, थैक्स, मां...।" समीर मेज की तरफ बढ़ आया।

"थैक्स...!" नफीसा बेगम ने नागवारी दशाई-"मांक की कैसा थैक्स....? अब तू मां का भी शुक्रिया अदा करेगा....."

"बुरी बात है यह..."

"हां, बहुत बुरी। मां बोली-"आइन्दा मुझसे ऐसी दिखावे भरी बात न करना.....।"

"अच्छा, मां। माफी....!" समीर ने हाथ जोड़ दिये।

"जा माफ किया..।" नफीसा का चेहरा खिल उठा था।

"मां, क्या वाकई तुम कुछ नहीं जानती हो.?" समीर का लहजा एकाएक बदल गया था।

"अब क्या हुआ..?"

"मां, आखिर आपने मुझसे यह सब छिपाया क्यों.?" समीर का लहजा शिकवा भरा था।

"बेटा, मैंने तुमसे कुद नहीं छिपाया हैं कुछ भी नहीं...।"

नफीसा संजीदा होते हुए बोली-"मेरी यकीन करो...।"

"किस का यकीन करूं और किस का यकीन न करूं...मुझे समझ में नहीं आता.....।" समीर के लहजे में सख्ती भर आई थी-"अम्मी! मुझे अब यकीन हो गया है कि मेरी नमीरा और मेरी बच्ची जिन्दा हैं."

"नमीरा जिन्दा है...सच...!" नफीसा बेगम के चेहरे पर खुशी छा गई। जाने यह खुशी सच्ची थी या झूठी?

"हां, मां! नमीरा की कब्र दिखावटी बनाई गई है....।"

"दिखावटी...क्या मतलब? क्या कब्र भी दो नम्बर की बनने लगी हैं...?"

"हां, मां। कब्र में नमीरा की लाश नहीं है....।" समीर ने रहस्योदघाटन किया।

__ "हाय, अल्लाह!" नफीसा बेगम ने हैरान होकर अपने सीने पर हाथ रख लिया।

"मां, आखिर आप मुझे सच बता क्यों नहीं देती...?" समीर उन्हें घूरने लगा।

नफीसा बेगम अभी कुछ कहने ही वाली थी कि एक सेविका घबराई हुई अन्दर दाखिल हुई।

"क्या हुआ...?" समीर ने तेजी से पूछा।

"वो, मालकिन....वो....कब्रिस्तान में आग लग गई है....."

नौकरानी ने अपनी फूली हुई सांस के साथ बताया।

"कब्रिस्तान में आग लग गई है... | क्या बकवास कर रही है निगोड़ी।" नफीसा बेगम ने उसे डांटा।

"कब्रिस्तान में आग..ओह, माई गॉड....!" समीर नाश्ता बीच ही में छोड़ उठ खड़ा हुआ।

"बेटा.तुम नाश्ता करो, कहां जा रहे हो? में तुम्हारे अबू को बताती हूं... वह देख लेंगे।” नफीसा बेगम उठते हुए बोली।

"मां...मैं कब्रिस्तान जा रहा हूं। बाबा सो रहे होंगे....उन्हें सोने दें। मैं खुद जाकर सूरतेहाल देख आता हूं| नाश्ता आकर करता हूं...।" इतना कहकर समीर कमरे से निकल गया। उसने अपनी मां के जवाब का इन्तजार भी नहीं किया था।
 
समीर ने हवेली के दो मुलाजिमों को अपने साथ लिया और गाड़ी में कब्रिस्तान पहुंच गया और कब्रिस्तान में उसने जो कुछ देखा, वह उसके लिए बड़ा कष्टदायक था।

पोखर का कच्चा घर पूरी तरह से शोलों की लपेट में था। इसके अलावा नमीरा और बच्ची की 'जाली कब्रों से भी शोलके उठ रहे थे। यह बड़ा ही हौलनाक मंजर था। समीर ने अपनी जिन्दगी में कभी किसी कब्रिस्तान में 'आगजनी के बारे में नहीं सुना था। यहां कबें जल रही थीं। कोई खुदा बन गया था...उसने कब्रिस्तान को जहन्नुम की आब बना दिया था।

कब्रिस्तान में रोशन राय का एक ‘फरिष्ता मौजूद था। वो आग बुझाने की कोशिश में लगा था। कितने ही मुलाजिम इधर-उधर भाग रहे थे। कब्रिस्तान में एक -सा ट्यूब-बेल लगा हुआ था...उसे चालू कर दिया गया था। कब्रिस्तान के पेड़-पौधों को जिस पाईप से पानी दिया जाता था.... उसी से आग बुझाने की नाकाम कोशिश की जा रही थी।

रौली ने जब समीर की गाड़ी देखी तो वह भागकर उसके पास पहुंचा और बड़े ही उदास भाव से गर्दन झुकाकर खड़ा हो गया।

"यह आग किसने लगाई है..?" समीर दहाड़ा।

" कुछ पता नहीं, मालिक." रौली ने सिर झुकाये-झुकाये जवाब दिया।

समीर गाड़ी से उतरकर कब्रों की तरफ बढ़ने लगा। कळे फासले पर थीं। यहां से धुएं और शोलों के सिवा कुछ नजर नहीं आ रहा था। वह आगे बढ़कर देखना चाहता था कि कब्रों के साथ कैसा खेल, खेला गया है।

___ "छोटे मालिक...!" रौली तेजी से चलता हुआ उसके आगे आया-"छोटे मालिका....! आप उस तरफ न जाएं। वहां आग के सिवाय कुछ नहीं है। लोग आग बुझा रहे हैं। छोटे मालिक, आप हावेली चलें। मैं वहां आकर रिपोर्ट देता हूं। आप बेफिक्र रहें। यह जिस किसी ने भी किया है... मैं उसे जिन्दा नहीं छोडूंगा.....।"

"रौली....तुम कुछ देर जरा मेरी गाड़ी के पास रुको.... | मैं जरा कब्रों को देखकर आता हूं। देखना, कहीं कोई मेरी गाड़ी को आग न लगा दे।" समीर ने उसे तेज निगाहों से घूरा और फिर तेजी से आगे बढ़ गया।

दोनों करें पूर्णतया शोलों की लपेट में थीं। शोले कब्रों से निकल रहे थे। यूं लगता था जैसे पक्की कब्रों को तोड़कर फिर आग लगाई गई हो। समीर ने खुदा का शुक्रिया अदा किया कि वह आज सुबह ही कब्र की हकीकत देख गया था, वरना यह आग इस वक्त उसका दिल चीर रही होती।

गुस्सा उसे अब भी था। वह समझ गया था कि कब्रों को उखाड़कर यह आग क्यों लगाई गई है। आग लगाने वाला चाहता था कि कब्रों की लाशों के वजूद को ही खत्म कर दिया जाये। न रहेगा बांस....न बजेगी बांसुरी। न रहेंगी कळे... ना पढ़ेगा कोई फातह।

फिर समीर को अचानक पोखर का ख्याल आया। वह उसे अभी तक कहीं नजर नहीं आया था। उसका घर जलाकर किस बात का गुस्सा उतारा था? तब फौरन ही उसका माथा ठनका । ओह! कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने पोखर को सुरंग खोदते हुए देखा लिया हो। ओह! जरूरी यही बात हैं इसीलिए उसे उसका घर जलाकर सजा दी गई है।

लेकिन बात केवल इतनी ही नहीं थी।

रोशन राय के आदेश पर समीर राय की निगरानी की जा रही थी। सुबह, सवेरे जब समीर नमीरा की लाश का निरीक्षण करके वापिस हवेली पहुंचा था, तो रौली को फौरन सूचना मिल गई थी। वह फौरन कब्रिस्तान पहुंचा था और उसने पोखर को रंगे हाथों पकड़ लिया था। वह बड़ी तेजी से सुरंग बन्द करने के काम में जुटा हआ था।

रौली ने गर्दन पकड़कर उसे गाड़ी में डाला और हवेली ले आया। रौली जानता था कि रोशन राय रात भर जागने का आदी है। रात बीते ही नींद आती थी। जब इन्सानों के जागने का वक्त होता था, वह शैतानों की तरह सोने लगता था।
 
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