Himmat-wala (incest .. adultery .. action .. thriller) - Page 30 - SexBaba
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Himmat-wala (incest .. adultery .. action .. thriller)

थैंक्स..!!

ये भी किस्मत का hi एक चक्कर था.. ऊपरवाला भी इंसानो से अजीब अजीब खेल खेलता है.. कहाँ तो श्वेता की किस्मत में रंजीत भी नहीं था, तो कहाँ श्वेता की लाइफ में मालिक उसका अपना hi बीटा बन गया.. श्वेता ने कभी सोचा नहीं था वो बिना शादी के hi प्रेग्नेंट हो जाएगी और फिर अपने hi बेटे से शादी भी उसकी हो जाएगी..

दन्न से दुश्मनी के चलते बौह्त कुछ होना था.. श्वेता फिर भी कैसा न कैसे करके फस hi जाती. दन्न श्वेता को छड़ाने वाला नहीं था.. श्वेता की एक ग़लती ने उस घर में जनम लेने वाली सभी पहिलायों को सेफ भी कर दिए था... .......................................................... ऊपरवाला क्या क्या करता है इंसान कभी समझ hi नहीं सकता ... श्वेता के साथ उसके अपणु ने ज़ुल्म किया. लेकिन फिर श्वेता एक दलदल से निकल वो कुछ भी पा गई जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी
 


अपडेट :::136


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पार्टी बहुत देर तक चली.... रात बहुत हो चुकी तो सबसे कल ग्राउंड में मिलने का बोल कर मैं और महक कोठी क लिए निकल पड़े.. जल्द hi हम अपनी कोठी पर थे.

थकन नाम की कोई चीज़ हमारी लाइफ में नहीं थी.. हाँ बहुत ज़यादा और रेगुलर जान जोखम वाला काम किया जाए तो फिर थकन बनती थी... लेकिन यहाँ ऐसा कोई काम नहीं तो हमें फर्श फ्रेश hi थे..

कोठी पर पोहंचे तो रात के 2 बजने वाले हो गए थे..

दर्वाइंग रूम में पोहंचे तो महक पेट पकड़ कर हस्सन लगी.. हस्ते हस्ते वो लूट पूत होने लगी.. फिर अचानक से hi वो सीरियस भी हो गई.. मैं महक को hi देख रहा था.

महक:- अच्छा हुआ विजय जो मनजोत सिंह का ताँता जल्दी ख़तम होने वाला है... नागराज मिशन बाद में सही.. पहले मनजोत सिंह और उसके बेटों को सबक़ सीखा कर उस घर में लड़कियों और औरतों को रिहाई दिला दें.. सब मौत से बदतर ज़िन्दगी जी रही हाँ.. कल का मुकाबला ख़तम होते hi हम सीधा वही जायेंगे और सबको एक आज़ाद लाइफ की खुशखबरी भी सुनाएंगी.... (महक बहुत ज़यादा साद हो गई थी) विजय कही ख़ुशी सहन न करते हुए उन्हें कुछ हो गया तो..

विजय:- कुछ भी होना मुमकिन है महक.. जैसी लाइफ वो सबब जी रही हाँ, कैसे वो ये सबब सहन कर सकती हाँ.. हमें एक दो डॉक्टर्स को भी साथ लेके चलना पड़ेगा..

महक:- जूली से कह के वही से डॉक्टर मंगवा लो.. हम कोई रिस्क नहीं ले सकते.. और फिर सब को फ़ौरन hi दिल्ली भी शिफ्ट करना है.. यहाँ नागराज और कई दूसरे भी हमपर नज़र रखे हुए होंगे, हमें ये सबब दूसरों की नज़रों में ए बिना hi करना पेड़गा.

महक की बात सुनकर मैंने कम को साल मिला दी.. वो सो रहे थे, तो मैंने उन्हें सब बता कर एक चार्टर्ड प्लेन क लिए बोल दिया.. ये सबब सेक्रेटली रखना है ये भी बोल दिए.. कम ने मुझे "विजय बीटा सब होजायेगा" बोल दिए... जूली से भी बात हुई जूली को भी प्लेन का बता दिए.. वो भी सो रही थी.. फ़ौरन hi काम पर लग गई.. मुझसे बात होने hi वो काम पर लग गई..

विजय:- चलो ये काम तो हमारा हो गया.. अब्ब मुकाबला भी कल 3 बजे है.. तब तक क लिए हम फ्री हाँ.. तो क्यों न मुकाबले के बेच के समय का भरपूर मज़ा लिया जाए.... मैं महक के मस्त फिगर को चेक करने लगा..

महक भी मुझे मुस्कुरा कर देखने लगी..

महक:- जैसे पहले कुछ नया किया था.. मेरे अंदर के तार हिला कर रख दिए थे.......... आज भी कर के दिखाओ दो और ले लो वो मज़ा मुझसे जो तुम लेना चाहते हो..

लेकिन शर्त वही है.. पहले मेरे लिए तुम्हे कुछ स्पेशल करना होगा. जिससे मुझे भी लगे क हाँ अब्ब मेरे भी मज़े हाँ.. महक अपने कातिल फिगर को मुझे बल खा कर दिखते हुए बोली.. वो भी अब्ब पूरी मूड में थी.. उसके अंदर का सब बदलने लगा था, मेरा उसपर और उसका मुझपर पूरा हक़ बनता था.. प्यार की भी शुरुआत हो चुकी थी, तो फिर नए नए रंग तो देखने बनते hi थे..

मुझे भी महक के साथ कुछ हटके करने का मैं होने लगा था... और इस सबब में मज़ा भी बहुत था..

विजय:- अगर मैंने कुछ स्पेसेल कर दिखाया तो क्या छूट मिलने के भी चांस हाँ..

हहहहहहहह महक हस्सन लगी..... चांस बन भी सकते हाँ.. पर कल मुकाबला है तो हम दोनों को hi एक्टिव रहना पड़ेगा.. तुम्हारी तो खैर है.. अगर तुमने सच में hi कुछ स्पेशल कर दिखाया और मई अपनी छूट की ओपनिंग के लिए रेडी भी हो गई, तो कल मैं तो चलने फिरने से जाऊँगी.. जितना मोटा तगड़ा तुम्हारा लुंड है.. वो तो मेरी छूट की धज्जियाँ hi उदा कर रख दे गए.. मई भले hi स्ट्रांग हों.. पर मेरी छूट नहीं.

महक हस्ते हुए बोली.. महक की बात पर मैं भी हस्स पड़ा.. महक साली कितनी पियरी लगती थी ऐसी बातें करते हुए.. पहले तो सिर्फ लुंड को काटने वाली फीलिंग्स की मालिक थी पारर अब्ब वो बदल गई थी, तो ऐसी बातें करते हुए उसके फेस के एक्सप्रेशन देखने से ताल्लुक़ रखते थे.. मेरे लुंड में कुछ हलचल सी होने लगी तो मैं महक को देखते हुए एक स्माइल देते हुए अपने लुंड को मसलने लगा..

महक फिरसे हस्सन लगी... हाहाहाहाहा देखा कैसे बिना छेड़ छड़ के hi तुम्हारा लुंड खड़ा कर दिए..

विजय:- अब्ब खड़ा हो hi गया है तो इसका कुछ ख्याल hi कर लो.. मैंने महक को खेंच कर अपने पास hi बिता दिए.. पहले वो कड़ी थी..

महक:- ये तो तुम पर है.. कैसे मुझे खुश करके तुम मुझसे अपने लुंड को ख़ुशी दिलवा सकते हो.. मैं ऐसे hi तो नहीं तुम्हारी या तुम्हरे लुंड की सेवा करने वाली.. पहले तुमने मुझे अंदर से इस सबब के लिए एक्टिव करना पड़ेगा. मेरे अंदर के तार एक बार फिरसे हिलने पेदेंगे.. तभी मैं तुम दोनों को प्यार और मज़ा दे सकती हों.. महक ने ये बात मेरे लुंड को पकड़ कर मसलते हुए बोली.. लेकिन उसकी पकड़ मेरे लुंड को डिस्टर्ब करने वाली थी. मज़ा देने वाली नहीं थी... वो एक शेरनी थी, खूंखार शेरनी..'

शेरनी भी शेर को अपनी छूट ऐसे hi तो नहीं दे सकती थी.. मुझे hi कुछ सोचना पड़ेगा.. वर्ण आज का मिलने वाला मज़ा छूट जायेगा.. महक से मस्ती का तो मज़ा था hi लेकिन महक से सेक्स रोमांस का भी अपना hi एक मज़ा था...

मैं अंदर तक्क खुश हो जाता था. पूरा बदन में hi मीठा मेथा दर्द सा होने लगता था.. लास्ट टाइम भी महक की छूट का पानी निकला था.. मेरे लुंड का महक ने कोई ख्याल नहीं किया था. वो पहले टाइम था तो मैंने भी महक को माफ़ी दे दी थी..

पारर आज मैं महक को माफ़ी नहीं देने वाला था.. पारर ऐसा क्या करून के महक को मज़ा मिले तो फिर वो मुझे भी मेरे हिस्से का पूरा पूरा मज़ा दे..

अब मैं सोच रहा था, और महक मुझे मुस्कुराते हुए देख रही थी.. मैं भी महक को देख कर सोच में डूबा हुआ था.. महक भी दिल से चाहती थी क मैं कुछ ख़ास कुछ स्पेसेल उसके लिए सोच लोन, वो भी तो अब्ब नयी जग चुकी फीलिंग्स का मज़ा ले रही थी..

कुछ देर सोचने के बाद मुझे कोई आईडिया नहीं मिला तो मैं महक को देखने लगा.. महक मुझे देख के मायूसी से बोली.... "नहीं मिला कोई आईडिया, अब ऐसे hi सोना पड़ेगा क्या"

मुझे महक को ऐसे देख के अच्छा नहीं लगा.. महक का मुझसे भी ज़यादा दिल कर रहा था, सेक्स रोमांस के लिए, मेरे साथ प्यार भरी लम्हे बिताने क लिए..

मुझे कुछ तो करना hi था.. तो एक बात मेरे मंद में आई, अब्ब पता नहीं वो महक को पसंद आती भी या नहीं, लेकिन तरय तो किया hi जा सकता था.. शायद इससे काम बन्न जाए..

मैं खड़ा हुआ, महक मुझे देखने लगी.. मैंने अपने कपडे उतारने शुरू कर दिए, महक मुझे हैरत से देखने लगी.. महक बोल पड़ी...

महक:- नहीं मैं ऐसे कुछ नहीं करने wali,kuch स्पेशल करो, वर्ण कपडे पहन लो, बीएड रूम में चलते हाँ, और चल कर सोते हाँ..

मैं नंगा हुआ और महक को पकड़ कर खड़ा कर dia..mehak मुझे देख रही थी, क अब्ब मैं क्या करने वाला हों.. महक की आँखों में एक बार देखने के बाद मैंने महक की शर्ट को गले के नीचे से पकड़ा और एक झटके में hi खेंच कर पहाड़ दिए.. महक को भी झटका लगा था, वो ज़रा सा लड़खड़ा गई थी.. एक हाथ से मैंने महक को थमा और दसूरे हाथ से महक की पंत को भी पकड़ा और एक झट देते हुए महक की पंत भी पहाड़ दी.. पंतय भी पंत के साथ hi फट गई थी.. महक मुझे हैरत से देख रही थी.. पहात चुके कपडे मैंने महक के बदन से अलग किये.. महक को अपनी बहन में उठाया और छत पर जाने लगा..

जितना टाइम हो चूका था, आस पास के सबब hi सो चुके थे.. मैं महक को लिए छत पर पोहंचा.. महक मुसलसल मुझे hi देख रही thi..uski आँखों की चमक फिरसे बढ़ गई थी.... महक को हट कर कुछ करने की आदर थी.. फाॅर्स सेक्स और रोमन्स भी हट कर था, तो महक की ऑंखें मेरे ऐसा करने से चमक उठी थी..

हम दोनों नंगे छत पर पोहंचे तो मैं छत पर देखने लगा... ऊपर एक रूम भी था.. और उसमे क्या कुछ था मैं जानता था..

मैंने महक को नीचे छत पर खड़ा किया और रूम में जा घुसा.. अंदर देखने पर मुझे एक रस्सी मिल गई.. मैंने वो उठाई और लेकर बहार आ गया.. महक मेरे हाथ में रस्सी देख कर हैरान हुई

महक:- इस रस्सी का क्या करने वाले हो विजय.?

विजय:- बस देखती जाओ.. कुछ तो करूँगा इस रस्सी से.. महक को जवाब दे कर मैं छत पर देखने लगा... कोठी की एक साइड में खली जगा थी. उस तरफ किसी के होने के चांस नहीं था. वो किसी हद तक वरन एरिया था.. छत पर लोहे की ग्रिल लगी हुई थी.. मैंने महक का हाथ थमा और छत के कार्नर पर जा पोहंचा.. वहां ग्रिल लगी हुई थी... वहां पोहंच कर मैंने महक के दोनों हाथ रस्सी से बांध दिए महक मुझे चमकती आँखों से देख रही थी.. छत से नीचे खली जगा पर भी देख रही थी.. रस्सी का दूसरा सिरा मैंने ग्रिल से बांध दिए..

ग्रिल 4 फ़ीट ऊंची थी.... मेरे कहने पर महक ने भी ग्रिल की सलाखों को अपनी मुठियों में कस लिया. महक की पीठ मेरी तरफ थी.. महक फेस कोठी के बहरी तरग था...

मैंने नीचे बैठा महक को पैरों से पकड़ कर उठ खड़ा हुआ.. महक ग्रिल के बराबर हो गई..

तो मैंने महक के पैरों को खोल कर महक की दोनों जाएंगें अपने कंधे पर रख दीं, मैंने सीधा हुआ तो महक की छूट वाला एरिया उसके हाथों से ऊंचा था..

महक:- वूऊऊ that's सो अमेजिंग विजय.. क्या नज़ारा है.. ऐसे hi स्टंट करने की तो मैंने आदि................ siiiiiiiiiiiiiiiiii maaaaaaaaaaaaaaaaaaaa अह्ह्ह्हह्हह

महक की बात के बीच में hi मैंने अपनी जीब महक की छूट पर लगा दी थी, जिस के कारन महक की बोलती hi बंद नहीं हुई, महक की सिसकी भी निकल गई..

यहाँ रौशनी काम थी तो महक की छूट के सही से दर्शन नहीं हो सकते थे... बास मज़ा लिया और दिया जा सकता था.. महक की छूट की खुशबु भी आखिर कार मैंने पा ली थी..

रात के अढ़ाई बजे का टाइम था... साडी दुन्या सो रही थी.. और हम कोठी की छत पर अजीब ो गरीब अंदाज़ में ओरल सेक्स का मज़ा ले रहे थे..

महक की छूट ऐसे कस गई थी तो मेरी जीब सही से महक की छूट में नहीं घुस पा रही थी.. छूट में जीब घुसने की ज़रूरत hi क्या थी.. लुंड जो मेरे पास वही घुसा सकता था.. महक की अध् खुली छूट मेरे सांमने थी.. महक सेक्स ड्रग्स के चलते अपनी छूट की फिंगर्स से hi काफी लोउसे कर चुकी थी.. ये महक ने hi मुझे बता दिए था.. उसे ये सबब बताने में कोई शर्म नहीं आई थी...

महक की पीठ आसमान की तरफ थी..

महक;- अह्हह्ह्ह्ह विजय मेरे पैरों को थोड़ा सा और खोलो, फिर सही से जीब आगे जाएगी.. कैसे कैसे अजीब तरीके फूँद लेते हो तुम....... बी गॉड क्या मज़ा मिल रहा है.. मैंने कभी सोचा भी नहीं था.. क मैं ये सबब और ऐसे सबब करुँगी..

मेरे दोनों हाथ महक के चुत्तड़ो के ऊपर थे.. महक के चूतड़ों को कलहोलटे हुए मैं महक की गांड के छेड़ पर भी अपनी उँगलियाँ चलने लगा.. महक से सहन नहीं हुआ aiiiiiiiiiiiiiiii विजय मेरी गांड पर भी ऊँगली घुमा रहे हो.. हम्म्म्म

अह्हह्ह्ह्ह अछ्हा है थोड़ी सी अंदर भी कर दो.. नाख़ून से थोड़ा सा कुरेद भी दो..

अहह कैसा समा बना दिए है तुमने विजय, ोीी मा विजय आज पूरा पूरा मज़ा दे दो विजय मुझे, आज मैं तुम्हे नहीं रोकने वाली.. आह आह आह ओह्ह

मेरी जीब जितनी महक की छूट में घुस सकती थी मैं उसे घुसाए स्पीड से मूव कर रहा था... महक बुरी तरह से मचलने लगी थी.. महक ने कब ऐसा सब सोचा होगा, अपनी पहली hi छूट चुसाई भी महक को एडवेंचर लिए हुए थी.. महक मज़े से दुहरी होने लगी, मेरी गरम जीब और छत पर ठंडी हवा महक से सहन करना मुश्किल हो रहा था.. मेरी उँगलियाँ महक की गांड में तो जीब महक की छूट में तो कभी छूट को नीचे से ऊपर तक चाट रही थी..

महक स्ट्रांग गर्ल थी, लेकिन छूट के मामले में वो बहुत hi सेंसिटिव थी.. कुछ मिनटुटेस में hi महक की कुंवाणी छूट ने मेरे जीब पर hi अपनी रस छोड़ना शुरू कर दिए........... पहले महक सिसकियाँ ले रही थी, अब्ब महक की सांस छत की ख़ामोशी को भांग किये हुए थी...

मैं नहीं रुका था, अपनी शेरनी की छूट का पानी पीने में लगा रहा.. कुछ देर महक ने खुद की सांस पर काबू पाया तो

महक:- थैंक्स विजय एक बार फिरसे नया और भरपूर मज़ा देने क लिए. अब्ब कुछ और नया करो, अब मुझे कुछ और भी अलग कर दे दिखाओ, हर बार मेरे अंदर मुझे कुछ नया नया फील होने लगता है.. कब जी थी मैंने ऐसी लाइफ.. तुमने मुझे ऐसी लाइफ दे कर बौह्त ख़ुशी दी है.. मज़े की तो बात hi अलग है.. ऐसा मज़ा तो मैं कभी स्टंट करके भी प्राप्त नहीं कर पाई थी..

महक की बात के बीच में hi मैंने महक की छूट पार्स जीब हाडा ली थी.. महक की बात सुनके मैंने महक को आगे का मज़ा भी देना का सोच लिया..

मेरा लुंड तो महक को देखते hi नीचे ड्राइंग रूम में hi खड़ा हो गया था... अब्ब तो वो पूरी फार्म में पुई अकड़न में था.. महक के दोनों पैरों को मैंने बारी बारी करके ड्रिल के बीच में फंसा दिए.. महक के दोनों पेअर पुरे hi खुले हुए थे.. महक ने भी सब समझते हे अपने आप को पूरी तरह से एडजस्ट क्र लिया था..

मैं महक के जिस्म को घूरने लगा, मेरा लुंड मुझे उसका रहा था क मैं महक की छूट पहाड़ डॉन, अब जैसा समय था, जैसी फीलिंग्स में महक थी, महका भी अब मेरे लुंड को लेने के मोड़ में थी, पर अभी मैं महक को चुद नहीं सकता था, कल का दिन बहुत hi खास था, मेरी या महक की ख़ुशी और मज़े से बढ़कर थी मेरी नानी मेरी माइयों और बहनो की रिहाई.. उन सब को एक नई लाइफ देना मेरी और महक की खुशियों से कही बढ़कर था..

महक को मैं पीछे से चूमने लगा.. साथ hi महक के जिस्म पर हाथ भी फेरने लगा, महक मेरे एक एक सुपर्ष पर एक एक किश पर सिसकियां ले रही थी, महक ने पहले कब इतने मज़े लिए थे, वो फुल मस्ती में होकर सिसकियाँ भर रही थी..

मैं महक की पीठ को चूमते सहलाते हुए नीचे महक की गांड तक आया, कुछ महक की गांड को छठा और फिर अपने लुंड को थाम कर महक की गांड और छूट से रगड़ना शुरू कर दिए...

अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह माआआआ छूट पर पहली बार लुंड को महसूस क्र प् रही हों.. कितना मज़ा कितना सुकून दे रहा है..... लव यू विजय हम्मम्मम्मम्म उफ्फ्फफ्फ्फ़ विजय माय लव...

मैं महक की कमर को पकडे हुए महक की छूट और गांड पर अपने लुंड को रगड़ रहा था.. महक का बास नहीं चल रहा था, वर्ण वो पुरे जोश से चीखती हुई अपने मज़े के बारे में सबब को बताने लगती..

जल्द hi फिरसे महक की छूट ने गरम होना शुरू कर दिए था.. अगले 5 मिंट में फिरसे महक की छूट ने पानी छोड़ दिए..

महक सुरूर की इन्तहा पर थी.. अपनी ख़ुशी और मज़े का िन्हार वो अजीब अजीब लफ़्ज़ों में कर रही थी... महक की ख़ुशी देखने लायक थी..

कुछ देर में मैंने महक को छोड़ दिए, महक के हाथ भी खोल दिए.. महक खुद से hi छत पर आ गई और मेरे चेहरे को थाम कर मेरे होंठ पर टूट पड़ी.. कब महक की छूट ने दो बार मज़े से पानी छोड़ा होगा.. महक के अंदर के रंग उसकी छूट के पानी के साथ बहार निकले तो महक बाहर हलकी फुल्की और फ्रेश हो गई थी.

महक कुछ देर मुझे पुरे जोश से किश करती रही, मेरे होंटो पर सूख चुके अपनी छूट के पानी को चोम चाट चुकी तो वो मुझसे अलग हो गई..

मेरी आँखों में देखती हुई वो बोली

महक:- विज्जउ........... महक ने मुझे विज्जू कह दिए.. पहले कभी उसने मुझे विज्जू नहीं कहा था.. और आप तो जानते hi हाँ क मुझे विज्जू कौन कहता है..

विजय:- विजजूउउउउउ....... मई महक को देखते हुए बोलै

महक:- हाँ अब्ब से तुम मेरे लिए भी विज्जू hi हो.. तुमसे मुझे भी उन सबब में शामिल कर दिए है तो जिनके लिए तुम विज्जू हो.. महक स्माइल देते हुए बोली.. महक बहुत खुश थी..

विजय:- चलो अब तुम भी नीचे बैठ कर मेरे लुंड को अपना प्यार दो.. उसका भी आज बिना प्यार किये सोने का मन नहीं है.. उसे भी हल्का होना है..

महक ने मेरे लुंड को देखते हुए अपने हाथ में थम लिया और फिर मेरी आँखों में देखती हुई बोली

महक:- जब ये किसी को अपना अपना लगे तो वो फिर उसका hi होकर रह जाता है, जैसे बाकी सब इस्पे अपना हक़ समझते हाँ, आज से मेरा भी इसपर पूरा पूरा हक़ है. और अणि चीज़ों का ख्याल तो फिर हर एक को रखना पड़ता है.. मैं भी करुँगी न इससे प्यार, करुँगी इसके अंदर का पानी निकल कर इसे हल्का.. महक शरारती स्माइल देते हुए नीचे झुकी और मेरे लुंड को दोनों हहतों की मुठियों में दबा दबा कर चेक करने लगी.........

महक:- विज्जू कितना हार्ड है न तुम्हारा लुंड.. सही किया जो तुमने इसे मेरी छूट में नहीं डाला, वर्ण तो सच में hi मई चलने लायक नहीं रहती..

महक ने मेरे लुंड को किश करना शुरू कर दिए, मेरे हाथ महक के सर्र पर पोहंचे तो मैंने महक के बालों से खेलने लगा..

महक ने कुछ देर मेरे लुंड को चूमने के बाद थोड़ा सा अपने मोहन में दाल लिए और फिर महक ने मुझे वो मज़ा दिए क क्या बताओ, महक मेरे लुंड को तब तब चूमती चूसती रही जब तक मेरे लुंड का पानी नहीं निकल गया.. महक ने मेरे लुंड का पानी पाने मोहन से नहीं गिरने दिए.... महक के लिए ये फर्स्ट टाइम था, तो वो एक एक पल का मज़ा ले रही थी.. मेरे लुंड के माल को भी महक टास्ते कर लेना चाहती थी... महक तो सबसे आगे की चीज़ थी... उसे शर्म भी नहीं थी और झिझक भी नहीं थी.. महक पुरे मज़े से मेरे लुंड से खेली थी..

जितना हो सका महक ने मेरे लुंड को अपने मोहन में लेकर चूसा था.. मसला था, अण्डों को भी अपने मोहन में लेकर उसका भी सवाद लिए था महक ने...

3 बजे जे करीब हम दोनों लगने hi बैडरूम में जा घुसे थे, नंगे hi एक दूसरे से लिपट कर सो गए थे.. सोने से पहले महक ने एक बार फिरसे मेरे लुंड को खड़ा कर दिए था.. और फिर मेरे ऊपर आ कर मेरे लुंड को अपनी टांगों के बीच अपनी छूट से सत्ता क्र सो गई थी..




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पुणे क्रिकेट स्टेडियम में इस समय आधा पुणे मौजूद था.. पूरा स्टेडियम खचा खच भरा हुआ था, हर तरफ शोर मचा हुआ था.. इतने शोर में भी कोई डिस्टर्ब नहीं था. क्रिकेट मैच तो लोगों ने बेशुमार देखे होंगे.. लेकिन जैसा मैच आज इस स्टेडियम में हो रहा था.. वैसा न तो कभी किसी ने देखा था और न hi कबि देख पायेगा..

मैच था hi ऐसा........... मनजोत सिंह का सैम कुछ तो दो पर लगा हुआ था hi, इज़्ज़त भी उसकी दो पर लग चुकी थी.. वो मनजोत सिंह जो पुणे सिटी के चाँद गिने चुने खानदानो में से एक था..

आज उसी खंडन की इज़्ज़त और प्रोपोएर्टय की धज्जियाँ सबके सामने उड़ने वाली थी.. सभी लोग लोग अलग अलग सोच में थे.. सबसे अलग नज़रिये थे, जिनके रिलेशन अच्छे थे, वो जानते थे क मनजोत सिंह और उसके बेटे किसी से कम् नहीं हाँ, जिनकी सपोर्ट मनजोत सिंह किया करता था, वो चाहते थे क मनजोत सिंह क बेटे ये फाइट जीत जाएँ..

जो नागराज मनजोत सिंह के दस हुए थे.. या जिनकी मनजोत सिंह से दुश्मनी थी, जो मनजोत सिंह का कुछ बिगड़ नहीं सके थे... आज वो कुछ ज़यादा hi खुश थे.. वो सबब भी इस स्टडिउम में मौजूद थे..

जहाँ मुकाबला होना था.. वहां पर एक छोटा सा अखाडा बनाया गया था.. क्रिकेट स्टेडियम में अखाडा बनाना आसान नहीं था. ऐसा कभी किसी ने पहले नहीं किया था..

लेकिन आज ये सबब भी हो रहा था.. उसी अखाड़े के दोनों साइड में सिटी व्विप पर्सन बैठे हुए थे.. बड़े बड़े ओहदे दार भी आज मौजूद थे.. कुछ तो मनजोत सिंह के साथ बैठे हुए थे, तो कुछ कम के साथ बैठे हुए थे.. मैं और महक एक और साइड में बैठे हुए थे.. मनजोत सिंह और उसके बेटे मुझे आग बरसाती हुई नज़रों से देख रहे थे.. उनमे से किसी के भी चेहरे पर ऐसे भाव नहीं थे, क वो आज यहाँ पर हार जाने वाले हाँ..

वो घमंडी खंडन से थे, ग़रूर और तकब्बर कूट कूट उनमे भरा हुआ था.. वो कहाँ जानते थे क मुझे भी जग्गू पहलवान ने ट्रेंनेड किया है.. मुझसे लड़ पाना, मुझसे जीत पाना उनमे से किसी क लिए भी आसान नहीं होने वाला..

आज मेरा नहीं मेरे उस्ताद ने जो मुझपर म्हणत की थी, उसका मुकाबला इस ग्राउंड में होने वाला था... मई हार जाता कोई बात नहीं थी.. पारर मेरे हारने से मेरे उस्ताद का नाम मिटटी में मिल जाता.. और मैं मर्डर तो सकता था, लेकिन अपने उस्ताद का नाम मिटटी नहीं होने दे सकता था.... उस्ताद जग्गू एक महान उस्ताद hi नहीं एक महान इंसान भी थे... उनके मान सम्मान क लिए तो मेरी गर्दन तक्क काट जाती, पर उनका नाम मिटटी में नहीं मिल सकता था..

इस मुकाबले की हार जीत से और भी कई ज़िन्दगी जुडी हुई थी. मुझे आज का मुकाबला जीत कर उन सबब को एक नयी ज़िन्दगी देनी थी.. माँ को वो ख़ुशी देनी थी.. जो मेरा पूरा प्यार मिल पाने के बाद भी अधूरी थी..

मनजोत सिंह ने आज तक्क जितने भी ज़ुल्म उस बेबस और लचर मजूबर अपने hi घर की महिलयों पर जो ज़ुल्म किये थे.. उन सब का आज होने वाला था.. आज का सूरज डूबने से पहले बहुत कुछ नया लाने वाला था.

महक से मस्ती भरी रात की अगली सूबा मैंने पैलेस में माँ से और सबसे बात करके उन्हें भी सबब बता दिए था.. माँ और बाकी सबब ये सुनकर बहुत खुश भी हुए थे और दुखी भी.. वो सब भी जल्द से जल्द मनजोत सिंह की कोठी वाली जेल में मौजूद कड़ियों को अपने बीच में देखने की ख्वाहिशमंद थी..

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जूली की रात को विजय से बात हुई तो फिर उसके बाद से सोइ नहीं थी.. वो सबब इन्तेज़ामात करने में लग गई थी..

जूली ने पैलेस में hi पुणे में होने वाले मुकाबले को दिखने का बंदोबस्त क्र दिए था.

कुछ लोगों को जूली ने डस्टर के साथ पुणे प्लेन स्वरा भेज दिए था.... वहीँ से वीडियो लिंक क ज़रिये ग्राउंड में हो रहा सब पैलेस में भी देखा जा रहा था..

सब hi तो सिटींग हाल में जहाँ बड़ी लेद टीवी लगा हुआ था. वहां बैठे हुए थे..

श्वेता की बहुत बुरी हालत थी... ख़ुशी तो थी hi लेकिन इतने सालों बाद अपने पिता और भाइयों को देख कर वो गुज़रा समय फिरसे याद कर बैठी थी.. पूजा और शुष्मा दोनों साइड्स से श्वेता को थामे उसे हौसला दे रही थी.... priya,jhanvi और श्रुति शेता के पीछे कड़ी thee..wo भी दुखी थी अपनी माँ को ऐसी हालत में देख कर उनके दिल भी तड़प रहे थे.....

लेकिन आज श्वेता को हौसला कैसे मिल सकता था... दर्द एक बार फिरसे बढ़ गया था.. दर्द था hi इतना कैसे सहन कर पाती..

अपने hi कसाई पिता और भाइयों ने उसे कोठे की मंडी में बिकने क लिए घर से घक्के मार कर भगा दिए था... कौन अपनी hi इज़्ज़त की ऐसे धज्जियाँ उडाता है..

श्वेता को हौसला देने वाले कहाँ उसके दर्द को ख़तम कर सकते थे.. जो ख़तम कर सकता था.. वो तो उससे बहुत दूर था... लेकिन सामने दिख भी रहा था...

वो वही मौजूद श्वेता को अधूरी रह चुकी खुशियां लौटने क लिए पुणे में मौजूद था.. बास अगर श्वेता के दिल को कुछ करार था. तो अपने स्वामी अपने बेटे अपने राजकुमार के वहां मौजूद होने से था... उसके रहते वो टूटने से बची हुई थी..

आज वही उसका राजकुमार उसकी अधूरी खुशियों को भी ला कर उसकी झोली भर देने वाला था....

सबकी नज़रें लेद टीवी की स्क्रीन पर जमी हुई थी. और सबब बहुत बेचैनी से मैच के शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे..

सब विज्जू और महक को देख रहे थे.. तो कभी मनजोत सिंह और उसके बेटो को.. जिनकी अकड़.. जिनका घमंड आज भी बरक़रार था.. अपनी बेटी को कोठे की ज़ीनत बना कर भी वो अकड़ में थे..

सबकी नज़रे श्वेता की और भी थी.. श्वेता को देख कर सबकी ऑंखें भी नम्म थी.. ख़ुशी का समय भी था और दर्द का भी..

 
इशिता क्लब में नाम बनाना ज़रूरी था, सब प्लान के हिसाब से hi किया जा रहा था.. वही दिलीप मिला और फिर उसी को सामने रखते हुए पार्टी अर्रंगे की गई.. उसी पार्टी में विज्जू और महक ने एक मौका घुंडा और मनजोत सिंह परिवार से भीड़ गए.. सभी के सामने चैलेंज भी थोक दिए.. और सब कुछ दो पर लगा कर मुकाबले क लिए बोल.. मनजोत सिंह अपने घमंड की वजा से हामी भर बैठा.. जैसा अत्तितुट्दै, जैसी पर्सनालिटी जैसी डेरिंग विज्जउ ने दिखाई थी, इशिता इम्प्रेश न होती तो कैसे हो सकता था... जब महक खुद को विज्जू का होने से रोक नहीं पाई तो फिर इशिता तो महक से भी बहुत काम लेवल की है..
 
थैंक्स..!!

महक विजजू को लेके बहुत मूड में रहने लगी है, और विज्जू से अलग किसम के प्यार की कल्पना भी रखती है, विज्जू भी कुछ हैट के सोचता है और महक को सुख देने का इंतेज़ाम करता है... इस बार विज्जू को महक की छूट और गांड का पानी पीने को मिला.. तो महक ख़ुशी से झूम उठी और विज्जू के लुंड को चूम चाट कर अपनी ख़ुशी का इज़हार भी कर दिए...

दोनों का मज़ा और प्यार भी बढ़ गया.. महक भी खुल कर विज्जू से अपने प्यार का इज़हार करने लगी..

श्वेता एक बार फिरसे ग़म में डूब गई.. फिरसे खुशियों के साथ दर्द मिलने जा रहे हाँ श्वेता को.. पर विज्जउ के होने से श्वेता को बहुत हद तक चैन भी है.. एक आस भी है.. एक यकीन भी है.. उसका बीटा विज्जू उसका पति विज्जू उसके ग़म और दर्द को कम् कर देगा
 
अपडेट :::137

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मुकाबला शुरू होने से पहले hi एक मुकाबला शुरू हो चूका था. और वो मुकाबला था. एक दूसरे की आँखों में देखने का मुकाबला.. उन सबब में उतना दुम्म कहाँ क वो मुझसे टक्कर ले सकते मेरी आँखों में रेगुलर देख सकते.. बार बार वो सबब अपनी नज़रें फेर रहे थे..

जब्ब सबब आ गए.. साड़ी व्विप पर्सनालिटीज ग्राउंड में पोहंच चुकी.. तो ढोल पीटा जाने लगा.. कमेंट्री का भी बढ़िया से इंतेज़ाम था.. कुश्ती तो फिर कभी भी कमेंट्री के बिना नहीं लड़ी जा सकती...

जल्द hi सब तैयारी को चेक किया गया.. जजस का भी इंतेज़ाम कम ने किया था..

अंपायर भी मैदान में ाँ पोहंचे.. अंपायर किसी और सिटी से बुलवाये गए थे.. उनका किस से कोई भी कनेक्शन नहीं था.. और उन्हें परखने क लिए जजस की एक टीम भी बनाई गई थी... किसी किसम की चीटिंग का कोई चांस hi नहीं था.. और फिर मेरे और महक के रहते कैसे कोई चीटिंग कर सकता था..

अंपायर के इशारे पर सब अपने अपने कपडे उतार कर एक कच्चे में आ गए.. फिर चलते हुए सबब अखाड़े के अंदर दाखिल हो गए..

नरम मिटटी थी.. और यही वो मिटटी थी, जिससे मेरी माँ को दूर कर दिए गया था..

इसी मिटटी में मेरी माँ की इज़्ज़त को रोल दिए गया था.. इसी मिटटी में आज मेरी माँ को रोल्ने वळून को मैं भी रोले देने वाला था.. साले चूतिये चरों मेरे मामे थे.. नामर्द मामे.. मूर्ख मामे

मई एक एक को घूरने लगा.. वो सबब भी मुझे घूरने लगे.. गरुन्द में वो अपने बहुत से हःतियार आदमी भी लेकर आये थे.. वो ये मुकाबले जीत कर जश्न मानना चाहते थे.. हवाई फायरिंग करना चाहते थे... मुझे अपना घुलम बनाना चाहते थे.. अगर इस सबब में कोई रकावट बनने की कोशिश करे तो अपने आदमियों की मदद से वो उसे मुझसे दूर कर सकें...

विजय:- ये पटाखे फोड़ने वाली चीज़ों लिए हुए क्यों हाँ... मैंने मनोज सिंह से बोलै.. मेरा इशारा उसके आदमियों की और था.. जिनके हाथों में भयंकर हथियार थे.. पुलिस भी थी. लेकिन फिर भी ये सबब अपने आदमी लेकर आये थे.. अपनी वैल्यू को शो करवाने का बड़ा शो था सबको..

मनोज:- बच्चे वो तेरी बारात है.... पटाखे फोड़ने के लिए वो सबब मौजूद नहीं ham.(manoj बहुत गरम होकर बोलै) तुम ने हमसे पन्गा लेकर खुद के साथ अच्छा नहीं किया.

विजय:- क्या करूँ आदत से मजबूर भी hon..kisi की आती नहीं, और मेरी जाती नहीं.. वैसे आप सबब ने मेरी बारात का इंतेज़ाम करके अच्छा hi किया है.. दूल्हा तो मैं सच में hi हों, वो भी तुम्हारे घर का.. जल्द hi तुम्हे इसका पता भी चल जायेगा.. क्यों ग़ुस्सा आने लगा है मेरी बातों पे.

अंकित:- बहुत बोल रहे हो बच्चे.. बस कुछ देर की hi बात है, फिर तुम होंगे हमारे क़दमों, और जो कुछ भी तुम बोल चुके हो, उसका पूरा पूरा हिसाब लिया कयेगा.. माफ़ करना हमने सीखा नहीं है....... साला अंकित मां बोल पड़ा.. इसने hi माँ पर डंडे बरसाए थे.. सबके सब हट्टे काटते थे.. अंकित मां भी किसी पहलवान से कम् नहीं था... तभी कुछ ज़यादा hi अकड़ रहा था.....

विजय:- माफ़ करना तो मैंने भी नहीं सीखा, वो भी तुम जैसों को. मुझे हारता हुआ देखने के सपने तो तुम भूल hi जाओ.. आज तुम सबब हारोगे hi नहीं.. तुम सबकी इज़्ज़त भी आज मैं इसी मिटटी में मिला दूंगा.. जैसे तुम सबब इसी मिटटी में मिला चुके हो.

मनीष:- क्या मतलब.?

विजय:- बास ये मैच ख़तम हो ले.. फिर सबब बता डोंगा. और जल्द hi वो समय भी आने वाला है........ किसी को कुछ बताने की ज़रूरत hi नहीं पड़ेगी, सब सामने आ जायेगा........ कोई कुछ और बोलता.. ुंपिरेस बोल पड़े...... हमें और बातें करने से रोक दिए.. मुझसे पुछा जाने लगा क कैसे और किस्से लड़ना है..

विजय:- मुझे अपने लिए कोई भी टेनिओं नहीं है अंपायर साब.. और हाँ एक बात, मेरी तरफ से आज इन सब को पूरी पूरी छूट है, ये सबब मुझे पहलवानी अंदाज़ में..

या जैसे भी अंदाज़ में लड़ना चाहते हाँ, वो लड़ सकते हाँ.. मुझे किसी के किसी भी तरीके से लड़ने पर कोई दिक्कत नहीं होगी.. आप सबब यहाँ पर चीटिंग को भी देखने क लिए मौजूद हाँ.. वहां जजस भी मौजूद हाँ.. एक बार इन चरों से भी पूछ लें आप. क ये सबब ये कुश्ती hi लड़ना चाहते हाँ या किसी और अंदाज़ में लड़ना चाहते हाँ..

आज मैं इन्हे हर एक अंदाज़ में शाकिस्त देने आया हों.. कही बाद में ये न कह दें,

क महीनो से प्रैक्टिस नहीं की, इस वजा से हार गए हाँ..

मेरी बात पर वो चरों फिरसे ग़ुस्से में आ गए.. लेकिन ुंपिरेस ने फिर भी उन सबब से पूछा.. वो कुश्ती hi लड़ना चाहते थे.. जैसे वो गुंडे थे लड़ाई के और भी तरीके तो वो ज़रूर जानते hi होंगे..

विजय:- अंपायर साब.. मेरी तरफ से एक छूट और भी है.. अगर ये सबब खुद को हारता हुआ पाएं तो फ्रीस्टाइल फाइट भी कर सकते हाँ.. ये 4 हाँ तो मुझे फिर भी इन सब से कोई परेशानी नहीं है.. आज यहाँ सब के बीच में मैं ये एलान करता हों क मुझे कुछ भी हो जाए तो किसी किसम की कोई करवाई नहीं की जाएगी..

ये सब मिलकर मुझसे कैसे भी लड़ सकते हाँ.. ये सब पूरी तरह से आज़ाद हो कर लड़ सकते हाँ, अगर मई इस बीच मारा भी गया तो, इन सबब को किसी किसम की कोई भी परेशानी नहीं उठा नई पड़ेगी.. चाहो तो मैं लिखे कर देता हों..

ये भी उनकी एक इंसल्ट hi थी.. और मई बहुत अच्छे से जानता था क वो फ्रीस्टाइल लड़ाई लड़ने पर मजबूर हो जायेंगे.. जल्द hi उन्हें पता चल जाना था क वो मुझसे कुश्ती में नहीं जीत सकते..

मैंने महक को देखा, वो मुझे देख कर स्माइल देने लगी.... आउट थम्ब्स उप करने लगी...

मैच शुरू हुआ..............

सब अखाड़े में मौजूद थे.. एक साइड में मई था... वो चरों मेरे सामने थे.. वो मुझे घूरते हुए एक दूसरे से फैसला बढ़ने लगे.. वो मुझे चरों और से घेर लेने चाहते थे... मैं किसी की और नहीं घूमा. सामने देखते हुए चरों दिसखाओं में hi नज़र रखने लगा.. चरों के पैरो की एक एक मूवमेंट पर धयान देने लगा.... वो सब मुझे देखते हुए अपने पैरों को हरकत करने लगे...

मुझे घूरते हुए वो चरों झुके, अपने हहतों को आएगी फैलाया और मुझपर टूट पड़ने क लिए तैयार हो गए.. वो अपना फैसला ज़यादा कम् नहीं कर सके थे..

वो भी समझदार थे.. अभी वो मुझे सही से नहीं जानते थे.. तो कुछ फैसला रख कर वो मुझे जाँच भी रहे थे.. एक मां होता तो उसकी उँगलियों में उँगलियाँ फंसा कर मैं अपना ज़ोर दिखा सकता था.. लेकिन यहाँ चार थे.. तो इसका कोई चांस नहीं था..

वो चारों झुके हुए आगे बढे और मुझे अपनी लपेट में लेने की कोशिश करने लगे.. वो अपने हाथ को आगे बढ़ा कर पीछे खेंच लेते थे... ये देखने क लिए क मेरा रिएक्शन क्या होता है.. पर मैं तो किसी उक़ाब की hi तरह से उन सब की एक एक मूवमेंट पर धयान रखे हुए था..... मेरा रिएक्शन न मिल पाने की वजा से वो कुछ कंफ्यूज तो हुए.. लेकिन खुद का स्टैमिना भी टूटने दिए.. मुसलसल मुझे घूरती हुई नज़रों से देख रहे थे.... मेरा कॉन्फिडेंस देख कर वो शॉकेड भी थे.. फ़ौरन hi वो आगे नहीं बढ़ रहे थे..

चरों ने एक दूसरे को देखा और फिर चरों में hi कुछ इशारे बाज़ी होने लगी... मुझसे बढ़ कर इशारे कौन समझ सकता था....

अंकित मां पीछे था. अतुल राइट साइड में मेरे पीछे था... मनीष और मनजोत मां सामने वाली दोनों दिशाओं में थे.. मनजोत और मनीष ने मुझपर चढ़ दौड़ने वाला अंदाज़ दिखाया ज़रूर लेकिन वो दौरान hi पीछे भी हो गए थे.. अंकित फ़ौरन hi आगे बढ़ा.. दोनों हाथों से मेरी कमर को कस के पकड़ लिया....

मेरी कमर से मुझे थाम कर उठाने की कोशिश की. वो मुझे उठा कर अपने पीछे नीचे अखाड़े की कच्ची मिटटी पर फ़ेंक देना था चाहता था..

उसकी पकड़ मज़बूत थी.. लेकिन मुझसे बढ़कर नहीं.. इन्ही हाथो से इस कुत्ते में डंडे मेरी माँ पर डंडे बरसाए थे.. किसी और के पास आने से पहले hi मैंने अंकित के दोनों हहतों की कलेवैं को अपने दोनों हाथों के पंजू में लिया एक झटका दिए.. तो उसकी पकड़ मुझपर से ख़तम हो गई.. मई फ़ौरन hi घूमा और अंकित को दोनों कलाइयों से थाम कर पूरा hi घुमा कर नीचे पटख दिए.. इतनी देर में अतुल भी मुझपर झपटने के लिए आगे बढ़ चूका था... उसकी एक लात अतुल को लग गई.. वो भी गिर पड़ा.. लेकिन जो हालत अंकित की हुई वो देख सबब दम बा खुद रह गए..

अंकित की चीखें सुनने से ताल्लुक़ रखती थीई.. सब एक बार अंकित की और बढ़ गए थे... पर मुझे इस मुकाबले को टूल नहीं देना था.... मनीष और मनोज अंकित की और बढे तो मैंने अतुल को ज़मीन से उठाया.. मनीष या मनोज कुछ करते.. अतुल को अपनी पीठ पर लाड कर मैं पुरे ज़ोर से पीछे अखाड़े की कच्ची मिटटी पारर गिर पड़ा.......... एक और धमाका हुआ और अतुल भी भयंकर अंदाज़ में चीखने लगा..

मिटटी कच्ची थी, पारर मेरी पावर कम् नहीं थी.. मेरा पूरा वज़न hi अतुल के सीने पर पड़ा था.. अतुल कैसे न फील भयंकर चीखता.. उनकी गांड तो फिर फटनी hi थी..

कुछ hi देर में मनजोत सिंह के दो शेर ढेर हो चुके थे.. अब्ब बचे दोनों से लड़ने मुझे कुछ आसानी हो गई थी.... चरों से लड़ना मुष्किल नहीं था.. लेकिन यहाँ मई कोई भी चांस कैसे ले सकता था.. कई ज़िन्दगी मुझसे जुडी हुई थीई. मुझे खुद की वाह वाह भी करनवाने का कोई शोक नहीं था...

मैं खड़ा होकर दोनों मामाओं को देखने लगा... मनीष और मनोज जो पहले अंकित की और बढ़ रहे थे.. अतुल को देख कर मनीष अतुल की और बढ़ गया...

अतुल की रीढ़ की हादी पर अच्छी खासी चोट आ गई थी.. मैंने अपना पूरा hi तो ज़ोर लगा दिए था....

ये पेह्लौं जी का खास गुर्जर था.. और पहलवान जी ने मुझे ताक़त भी तो बहुत दे दी थी.. सुई को काम में लाते हुए आज मैंने ये कर दिखाया था.. वर्ण इतने हट्टे काटते आदमी को ऐसे बेकार कर देना आसान काम नहीं था...

पुरे स्टेडियम में hi कोहराम मचा हुआ था.. कुछ hi पालो में मैंने आधा मैच जीत लिया था.. लोग पुरे जोश से, पूरी आवाज़ से चीख रहे थे..

नारे लगाए जा रहे थे..

ुंपिरेस भी दोनों को देख रहे थे.. कुछ देर दोनों ुंपिरेस अतुल और अंकित को देखते रहे.. हार वो चुके hi थे. दोनों की hi पीठ लग चुकी थी.. बास वैसे hi कुछ देर के लिए सबब रुक गए थे.. मई भी तो रुक गया था.. मैं भी उन्हें कुछ टाइम दे देना चाहता था..

मैंने मनजोत सिंह को देखा........ अब्ब मुझे सही से मज़ा आया मनजोत सिंह को देख कर.. उसके चेहरे पर चिंता की लड़कीन बढ़ चुकी थी... मुकाबले की शुरुआत में hi उसके दो शेर ढेर हो चुके थे.... अब्ब बचे हुए दोनों बड़े बेटे मेरे कैसे सामने कर सकते थे... मैं मनजोत सिंह को देख hi रहा था क उसने अपने एक आदमी को कुछ समझा कर अखाड़े की और दौड़ा दिए... मई समझ सकता था क उसने क्या कहा होगा..

अब टाइम आ गया था फ्रीस्टाइल लड़ाई का... मेरी फुर्ती सब hi देख चुके थे.. तो कुश्ती तो अब वो लड़ नहीं सकते थे.. वो जल्द hi हार जाते...

वही हुआ जैसा मैंने सोचा था.. आदमी मनोज और मनीष से कहा तो मनीष और मनोज ने अपने पिता को देखा, कुछ देर इशारे बाज़ी हुई और फिर मनीष और मनोज ने अंपायर को फ्रीस्टाइल लड़ाई का बोल दिए..

मैं मनजोत सिंह को स्माइल देने लगा.. वो नज़रें चुरा गया.. ये उसकी हार का आग़ाज़ था.. नज़रें चुरा गया था....... उसकी अकड़ और घमंड ख़तम हो चूका था...

अतुल और अंकित को अखाड़े से बहार निकल दिए गया.. उनके बहार जाने के बाद मनीष और मनोज मेरे सामने आ खड़े हुए और मुझे इन्तेहाई ग़ुस्से से देखने लगे..

और मई उन्हें मुस्कान देने लगा.. एक ज़हरीली मुस्कान.. वो और भी आग बगुला हो गए.

मनीष:- बहुत गलत किया है तुमने.. मेरे दोनों भाइयों के साथ तुमने बहुत गलत किया है.. अब्ब तुम नहीं बचोगे हरामी साले..

अंपायर:- प्लस गाली मैट दें.. ये पब्लिक प्लेस है, आप एक रएक्पेक्टेड पर्सन से लड़ रहे हाँ.. और ये कोई लोकल मैच नहीं है..

विजय:- रहने दें अंपायर साब, इन्हे हर एक मामले में पूरी पूरी छोट है मेरी तरफ से............. मनीष और मनोज को देखते हुए मैंने कहा... उनकी ऑंखें बहुत ज़यादा खून उगल रहें थी... कुछ देर में यही ऑंखें मेरे सामने झुकी होंगी...

फिरसे मुकाबला शुरू हुआ और इस बार दोनों सोच समझ कर आगे बढ़ रहे थे.... दोनों एक साथ hi मुझपर जम्प कर गए.. मैं भी घूम कर साइड में हो गया.. दोनों नीचे गिरे.. मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा.. थोड़ा सा पीछे होक खड़ा हो गया..

विजय:- खड़े हो जाओ सिंह साब.. अब मर्दानगी दिखने का समय आया है तो मर्दों की तरह से लड़ो.. ऐसे बच्चों जैसे लड़ के कैसे मुझसे जीतोगे.. शाबाश जल्दी से खड़े हो जाओ और आगे बढ़ो..

दोनों पहले से hi खड़े हो गए थे.. दोनों फिर से मुझपर टूट पड़े.. मैं भी दोनों से खेलने लगा.. दोनों बार मुझपर जम्प करते.. पिछले जनम में ज़रूर ये दोनों बन्दर थे..

कभी कभी वो हाथ और पेअर भी चलने लगते.. लड़ाई में बेहतर नहीं थे... कुश्ती, गन्स और आदमियों के दुम्म कर आज तक्क सबब शेर बने हुए थे.. आज खुद के दुम्म दिखने का समय आया था.. तो ढेर हो रहे थे.. थकते जा रहे थे.. मुझपर उसका कोई दो नहीं चल पा रहा था...

बार बार वो मिटटी में मिटटी हो रहे थे.. दोनों के hi गुलिये बहुत बिगड़ चुके थे.. स्टेडियम में कही कही ज़ोर ज़ोर से हस्सन की आवाज़ें भी सुनाई दे रही थी..

25 मिंट में hi दोनों का पूरा तेल निकल कर मिटटी मिल चूका था.. वो लड़खड़ा रहे थे.. मैं अब्ब उनके बहुत पास जा पोहंचा.. वो दोनों मुझपर फिरसे जम्प करने वाले थे... मैं अचानक से hi हवा में और फिर अपने दोनों पेअर जोड़ कर दोनों को hi एक एक जड़ दिए.. दोनों के hi पेट पर बड़ी ज़बरदस्त चोट लगी.. और वो उड़ते हुए अखाड़े से बहार जा गिरे...

विजय:- आ जाओ फिरसे अंदर और बाकी का बचा हुआ दुम्म दिखाओ.. अंपायर साब ये दोनों अगर हार भी गए हाँ तो दोनों को फिरसे मेरी तरफ से छूट है.. जब तक दोनों मुझसे लड़ सकते हाँ, इन्हे लड़ने दिए जाए..... फिर मनजोत सींघ की और देख कर.

विजय:- manjoooooooooooootttttttttt singggggggggggghhhhhh कोई और भी है तो उसे भी सामने ला सकते हो तुम... खुद तो तुम लड़ नहीं सकते.

मनजोत सिंह जान चूका था क वो और उसके बेटे हार चुके हाँ.. तो आगे उसके साथ ओके बेटों के साथ क्या कुछ होने वाला है... इसी सोच के चलते मनजोत सिंह का चेहरा पूरा पीला पद चूका था.. वो मेरी बात का कोई जवाब नहीं दे सका.......

मनीष और मनोज दोनों पहले से hi बोहत ज़यादा थक चुके थे... पेट पर पड़ते वाली किक्स वो सहन नहीं कर पाए the.wo वही गिरे हुए अपने पेट को पकड़ कर बिलबिला रहे थे..

मुकाबला ख़तम हो चूका था.. लेकिन मई फिर भी सब को पूरा पूरा टाइम दे रहा रहा था.. लेकिन कोई इसका फायदा hi नहीं उठा प् रहा था.. फिर भला मई कुछ और क्या कर सकता था.... कुछ देर मई दोनों को देखता रहा... फिर मैंने अंपायर को इशारा कर दिए.. अब्ब बास

अंपायर ने मैच का फैसला मेरे हक़ में दे दिए.. पुरे स्टेडियम में एक बार फिरसे कोहराम मच गया... पुणे सिटी में एक नहीं हिस्टिरी लिखी जा चुकी थी.. सालों से राज कर रहा एक खंडन अब्ब सिर्फ किस्से कहानियों की नज़र हो चूका था.... अब्ब से लोग इन सबब को एक कायर खंडन के नाम से याद किया करेंगे..

जो एक नौजवान लड़के से चरों भाई मिलकर भी नहीं जीत सके थे.. खुद को पहलवान शो करवाया करते थे.. लेकिन पहलवानी गुर भूल कर फ्रीस्टाइल फाइट करने लगे थे.. वो साले फ्रेस्टिले फाइट भी नहीं जानते थे... भरे पुरे स्टेडियम में, सब लोगों के बीच में किसी बंदर की तरह से उछाल उछाल कर मुझपर हमला कर कर थक गए थे. हमला क्या, वो दोनों तो मुझपर जम्प ज़यादा कर रहे थे, फिर खुद hi मिटटी में गिर कर मिटटी मिटटी हो जाते थे...

बिना मुझसे मार खाये hi ढेर हो गए थे.

चरों एक एक वॉर नहीं सहन कर पाए the..ek मर्दों को कौन मर्द कहेगा.. ऐसों को कौन शेर kahega..gundon के दुम्म पर शेर बन बैठे थे...

मैं चलता हुआ महक के पास पोहंचा तो महक ने मुझे गले से लगा कर मेरे गाल को चूम लिया और मुझे कॉंग्रट्स करने लगी...

अखाड़े में उड़ रही मिटटी से मैं भी मिटटी मिटटी हो चूका था.. आज मिशन का एक मरहला और पूरा हो चूका था..





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रंजीत भी जान गया था क आज मैच है तो जूली से वीडियो लिंक के द्वारा जुड़ते हुए वो भी पहलवान के साथ अखाड़े में मौजूद था.. रंजीत ख़ास इस मैच क लिए अपने दोस्त जग्गू के साथ मौजूद था..

दोनों ने फिर मैच देखा और दोनों hi ाशः ाशः कर उठे.. पहलवान तो ख़ुशी से झूम उठा.. आखिर विजय उसका hi तो पट्ठा था.. उसकी जीत असल में तो पहलवान की hi जीत थी.. वो भी बहुत खुश था.. रंजीत और दोनों मिलकर इस ख़ुशी को सेलिब्रेट करने लगे..





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जैसे hi मैच शुरू हुआ तो श्वेता खुद पर काबू पा कर मैच पर धयान देने लगी थी.. फिर जैसे जैसे मैच आगे बढ़ रहा था.. वैसे वैसे सबकी आवाज़ें भी गूंजने लगी थी...

जब्ब विजय ने अंकित को उठाया.. फिर घुमा कर नीचे पटख दिए तो पैलेस का सिटींग हाल गर्ल्स मण्डली की धुवां धार सीटियों से गूँज उठा.. और फिर जब्ब विजय ने अतुल को भी उठा कर पीठ के बॉल पीछे की और पट्खा तो

प्रिय पार्टी... शीतल पार्टी, राज अनिल मिलकर शोर मचाते हुए नाचने लगे... कुछ देर के लिए श्वेता पहले वाले ग़म से बहार निकल कर सब को नाचते देख कर ख़ुशी से झूमने लगी... दर्द जितना भी हो.. जब्ब अपने खुश हों तो दर्द कही पीछे जा छुपता है.. श्वेता फिरसे पहले जैसी हो गई.. सब फिर से मैच पर धयान देने लगे........................ जब विजजू ने मनीष और मनोज को भगा भगा कर थका मारा था.. तो सब बहुत ज़ोर ज़ोर से हस्सन लगते थे.... सब hi विज्जू को

यही बैठे बैठे मश्वरे दे रही थी....... विज्जू कहाँ इन सबब की सुन्न रहा था.. वो तो पुणे में मैच लड़ रहा था... लेकिन मज़ा लेते हुए फिर भी बोल रही थी...........

जब मैच ख़तम हुआ. विज्जउ की जीत का एलान कर दिए गया तो....

श्वेता अचानक से hi उठी फिर फर्श पर गहतनो के बल बैठ कर ऊंची ऊंची आवाज़ में रोनी लगी... पूजा हुए शुष्मा भी खुद को नहीं रोक पाएं.. वो भी घुटनो पर आएं और ऊंची ऊंची आवाज़ में रोने लगी.. आज से पहले कभी पूजा ऐसे नहीं रोइ थी...

पारर आज का रोना हट कर था. आज के रोने की वजा कुछ और थी.. ये सबब ख़ुशी का रोना था.. आज वो जुंग जीत ली गई थी.. जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी....

ये रोना उस घर में क़ैद अपणु के लिए था.. उनके दर्द को सोचते हुए ख़ुशी के साथ दर्द को भी याद करके सब रोने लगी थी..

ये जुंग उस घर में क़ैद महिलयों में लिए लड़ी जाने वाली जुंग थी.. इस जुंग की जीत की ख़ुशी किसी से सहन नहीं हुई.. श्वेता, शुष्मा और पूजा रोयें तो फिर बाकी सबब भी रोने लग पड़े.

सबब hi उस घर में सालों से मर्डर रहे अपणु के दर्द को महसूस करने लगे थे.. असली दर्द तो उस घर में क़ैद महिलाओं का अब्ब शुरू होने वाला था.. वो तो सब इस ज़िन्दगी को अपनी किस्मत का लिखा समझ कर साँसे पूरी कर रही थी..

श्वेता का दर्द इतना ज़यादा था.. कोई भी सहन नहीं कर पाया था..

पारर उस घर में पल पल सिसक सिसक कर मर रही श्वेता की माँ, श्वेता की भाभियाँ, और श्वेता की भतीजियां एक ऐसी लाइफ जी रही थी......... जिनका दर्द श्वेता से कम् भी नहीं tha..jinke ज़ख़्म श्वेता के ज़ख्मो से कम् नहीं थे... श्वेता के पास तो विज्जु और तीनो बेटियां थीई... कोठे पर रही थी.. हमेशा दर्री हुई लाइफ जी थी.. प्रिय, जहान्वी और षुरूति का क्या होगा. ये सब सोच सोच के कभी चैन से सो भी नहीं पायी थीं....... लेकिन इस सबब के बावजूद भी तीनो ने मिलकर विज्जू के साथ कई साल हस्ते खेलते गुज़र दिए थे......

दर्द के साथ कुछ खुशियां भी उन्हें मिल गई थी......... पारर वो सबब...

वो सबब तो उस घर में एंटर होने के बाद...... उसके घर में पैदा होने के बाद से ख़ुशी क्या होती वो जान hi नहीं पाई थी.. एक hi घर में... अपणु के बीच में रहते हुए भी वो सबब की सबब आधी मर्डर चुकी theeeeeeeeeee...

जो भूल चुकी थी, ख़ुशी क्या होती है..... जो नहीं जानती थी क ख़ुशी क्या होती, कैसे वो इस समय को झेल पाएंगी............

जो जानती हाँ क खुशियां क्या होती हाँ. कैसे वो सहन कर पाएंगी क अब्ब से सच में hi उन्हें खुशियां मिलने वाली हाँ..................

उन सबब की दर्द भरी खुशियों को याद करते हुए सिटींग हाल में मौजूद hi रोने लगे थे... राज, अनिल और कारन भी खुद की आँखों में आंसू आने से नहीं रोक पाए थे...

जूही अपनी माँ के गले लगी हुई रोने लगी थी. वो भी अपनी माँ से उन बेबस और लचर दर्द से तड़प रहे अपणु के बारे में बात कर रही थी..

प्रिय जहान्वी और श्रुति भी अपनी माँ, अपनी दीदी और मौसी के पास बैठ कर दहहदें मार मार रोने लगी थी.. खुशियां भरा माहौल पल भर में hi मातम में बदल गया था..

अजित भाई जो अपनी जवानी क दिनों अपनी बेहेन पद्मा को खो कर रोये थे.. फिर अपनी बेहेन के मिलने पर रोये थे... वो आज फिरसे रोने लगे थे....

हर्ष चौहान की फॅमिली वो भी तो एक इमोशनल फॅमिली थी, कैसे खुद को सब इस समय के दर्द और ख़ुशी को झेल सकते थे... ये वही फॅमिली थी.. जिसके घर की इज़्ज़त को विज्जू ने बचाया था.. तो उसी पल से सब एक सब विज्जउ के हो गए थे..

वो भी पूरी तरह से इस समय की ख़ुशी और दर्द में डूब गए थे... एक बार फिरसे

हर्ष चौहान की आँखों में पानी आ गया था.... दीक्षा एक हाथ से हर्ष को थामे हुए रो रही थी..

लाली जो कोठे की कुछ औरतों और लड़कियों के साथ वही मौजूद थी.. वो भी तो अब्ब विज्जू के बच्चे को जनम देने की खवाहिश दिल में पाल चुकी थी... वो भी तो अब्ब सबब में शामिल हो चुकी थी... वो भी रोने वळून की लिस्ट में शामिल थी..

रानी नताशा के गले लगी रो रही थी.. तो मालिकान, सोना, पद्मा और भाभी चरों मिलकर कर रो रही थीई.............

अपर्णा जो अब्ब श्वेता को अपनी माँ मान चुकी थी.. इस नयी मिलने वाली लाइफ में वो हर दुम्म hi ख़ुशी से चहकती रहती थी.... वो hi श्वेता के दर्द को पूरी तरह से समझ रही थी... वो सबसे हट कर अपने घुटनो पर बैठी हुई दहाड़ें मार मार रो रही थी......... आज उस नाज़ुक से दिल वाली अपर्णा को कोई चुप करने वाला नहीं था, कोई उसे दिलासा देने वाला नहीं था... किसी में हिम्मत रही hi कहाँ thi.jo किसी का दर्द बाँट सकते... सब के सब hi तो दर्द से तड़प रहे थे.. सब के सब बिना एक दूसरे को देखे फूट फूट कर रो रहे थे... किसी का भी धयान टीवी पर नहीं था... वहां अब्ब कुछ रहा भी तो नहीं था.. वहां पर ख़ुशी का समा था.. पर जो ख़ुशी सब को मिली थी..............

वो..................

एक एक ऐसा दर्द भी लेकर आयी थी, जिसे सहन कर पाने की शक्ति किसी में नहीं थी.

कौन लाता खुद में इतनी हिम्मत...

अब्ब तो पैलेस में रह रहे सभी की खुशियां श्वेता के परिवार की महिलयों के साथ जुड़ चुकी थी.. जब तक उन्हें एक आज़ाद और खुशियों भरी ज़िन्दगी का एहसास नहीं हो जाता, तब तक क लिए पैलेस में भी खुशियां ख़तम हो कर रह गई थी..

जब सब को यकीन आ जाता क वो सबब एक आज़ाद लाइफ हासिल कर पाने में सफल हो चुके हाँ तो तब hi सबब को मिलने वाली खुशियों को पुरे मैं से सेलिब्रेट कर सकेंगे..

पुरे सिटींग हाल में मातम छाया हुआ था.. सब के सब ग़म में डूबे हुए थे..

धीरे धीरे सबका रोना धोना कम् पड़ने लगा था, पारर gham,dard किसी का भी कम् नहीं हो रहा था.. इस पैलेस में विज्जउ और श्वेता के खुश रहने से सबब खुश थे, तो विज्जू और श्वेता के दुखी रहने से दुखी..

सबके सब दोनों के ग़म और ख़ुशी से जुड़ चुके थे.. कुछ देर में विजजूउ का राब्ता फिर से विडोलिंक के द्वारा सबसे होने वाला था.... जब विज्जू श्वेता के घर में जायेगा और फिर वही बैठे हुए अपनी माँ, अपनी पत्नी से बात चीत करेगा, वही श्वेता की माँ से राब्ता बनाएगा.................

तो कैसे श्वेता या कोई और ये सहन कर पायेगा... रो रो कर सब थक चुके थे, पारर आने वाला समय को लेके अंदर hi अंदर डर भी रहे थे.. जाने उनकी कैसी हालत देखने को मिलने वाली थी..

 
थैंक्स भाई..!!

ऐसे लोगों के पसस पावर होती hi कहाँ है भाई.. लोगों के दुम्म में हुकूमत करते है. और कुश्ती लड़ने क लिए, जीतने क लिए कहिनो पहले से hi प्रैक्टिस भी करते रहते हाँ ऐसे लोग.. फिर प्रेशर दाल के जीत भी जाते हाँ. और खुद को मर्द कहलवाते हाँ.. सब विज्जू को सही से जानते नहीं थे.. उसे एक बच्चा समझ कर सब के सब हार गए.. विज्जू भी सबसे खेलते खेलते जीत गया.. सबको थका मारा.. पर कोई भी विज्जू के सामने टिक नहीं पाया
 
थैंक्स भाई..!!

मैंने सोचा था क कुछ तो दम्म ख़म होगा मनजोत सिंह के शेरोन me..par वो तो कुछ भी नहीं निकले.. उनके शरीर ढोल के जैसे थे, अंदर से पुरे खली.. वो सब अपने आदमियों के बल पर लड़ने वाले थे.. किसी मुकाबले क लिए महीनो पहले से ट्रैंनिंग लेने वाले इंसान थे.. यहाँ विज्जू भी लड़ाई को बढ़ा कर रिस्क नहीं लेना चाहता था... विज्जू हर एक बात में बेस्ट है... लेकिन एक गलती और बाज़ी हाथ से गई.. और विज्जू यहाँ कोई भी ऐसा चांस नहीं ले सकता था.. इस मुकाबले के साथ विज्जू की दौलत और इज़्ज़त hi नहीं दो पर लगी थी... कई और ज़िन्दगियों का भी सवाल था.. तो विज्जू ने मनजोत के दो शेर पहले hi वॉर में ढेर कर दिए.. उसके बाद दोनों बड़े शेर भी कुछ नहीं कर पाए.. वो भी विज्जू के सामने टिक नहीं पाए.. वो बूढ़े और विज्जू जवान था.. विज्जू का सामने करने क लिए उन्हें 10 बार जनम लेना पड़ना था.. फिर जा के वो विज्जू से टक्कर लेने लायक बनते..

श्वेता और उसके परिवार का दुःख सच में hi बहुत बड़ा है.. इतना बड़ा है क सहन कर पाना आसान नहीं है.... अब्ब नेक्स्ट विज्जउ जो भी करेगा, वो ज़रूर कुछ स्पेशल होगा.. ऐसे कामों में विज्जू का दमाग चलता भी बहुत है.. विज्जू मनजोत सिंह की कोठी पर पोहंच कर जैसा भी करेगा.. वो सबब आप सबब को यकीनन बहुत पसंद आएगा..

मुकाबले के बाद मनजोत सिंह या उसके बेटे क्या कुछ करते हाँ... वो भी नेक्स्ट अपडेट में पता चल जाएगा.. असल में दन्न hi एक विजू की टक्कर का दुश्मन था.. जब वो कुछ नहीं कर पाया तो बाई बचे हुए गुश्मन तो विज्जू के एक हहत की मार सहने की शक्ति खुद में नहीं रखते..

आपकी इमेजिनेशन को सलाम भाई.. कुछ न कुछ आपकी इमेजिनेशन के हिसाब से ज़रूर होगा.. महक से रिलेटेड कुछ नहीं कह सकता... वो क्या कुछ करती है... क्यों की स्टेडियम में आधा सिटी मौजूद है तो सिचुएशन कुछ भी हो सकती है.. महक या विज्जू का सामना कर पाने की हिम्मत तो वैसे भी किसी में नहीं है..

थैंक्स फॉर थे बेस्ट कमेंट... थैंक्स फॉर थे सुग्गेस्टिव...
 


अपडेट :: 138


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हम सबब स्टेडियम से बहार आ चुके थे.. साडी कार्रवाई पूरी हो चुकी थी.. पेपर्स पर सबके सामने मनजोत सिंह और उसके बेटो के सिग्न करवाए जा चुके थे.. ये एक ओपन चैलेंज tha.bade बड़े लोगों के सामने मनजोत सिंह इस सबब की हामी भरी थी..... .. वो पीछे नहीं हट सकते थे... मनजोत सिंह पूरी तरह से टूट चूका था.. वो कुछ भी बोल नहीं पा रहा था...

मनोज और मनीष ने अपने आदमियों की मदद से चालाकी करने की कोशिश की थी...

लेकिन पुलिस कम के रहते वो ऐसा कुछ नहीं कर पाए.. मनजोत सिंह के आदमियों से हःतियार ले लिए गए थे... और दो दिन क लिए उन सबब को नज़र बंद रखने का आर्डर दे दिए था..

ये सब मेरे और महक के hi कहने पर किया गया था.. मनजोत सिंह तो कुछ नहीं करता.. लेकिन मेरे मां वो कैसे ये सबब सहन कर सकते थे.. वो आगे की जिंदगी कैसे हमारी ग़ुलामी में रहते हुए गुज़र सकते थे.. वो कैसे भी करके हमारे चुंगुल से निकल भागते और बाकी की लाइफ किसी और कंट्री में गुज़रते.. पैसा तो उनके पास बहुत सा था.. दूसरे कई मुमालिक में भी उनका पैसा सेव था.. बहुत बड़े बिजनेसमैन था.. खुद को कैसे किसी की ग़ुलामी में दे सकते थे.....

एक बन्दे के मरने पर कम ने पुलिस की मदद से सब हालत पर काबू प् लिया था. मनोज सिंह के इशारे पर उसके एक गुंडे ने मुझे भरे मजमे में शूट करने की कोशिश की थी........ महक के रहते कैसे ये सबब हो सकता था.. गोली मुझपर चलाई गई थी.. लेकिन मैं उसे देख नहीं पाया था.. मैं तब्ब कम से बात कर रहा था.. और मेरी पीठ पीछे वो आदमी था.. महक ने एक जम्प लगा कर मुझे और कम को नीचे गिरा दिए था.. गोली कम के बाज़ो को छोटे हुए गुज़र गई थी..

महक ये सब करके भी एक गोली चला गई थी.. और गोली सीधे उसी गुंडे की दोनों आँखों के बीच में जा घुसी थी..

कम को गोली लगी तो फ़ौरन hi पुलिस ने मनजोत सिंह के आदमियों पर अपनी गन्स तान दी थी..

सालों बाज़ नहीं आये थे.. कोशिश कर लेने से क्या वो सबब मेरे चुंगुल से बच निकलते....... इतना सबब हो गया था.. फिर भी समझ नहीं पाए थे..

जब ये सबब हो गया था.. तो मनजोत सिंह की बची खुची हिम्मत और वक़ार भी ख़तम हो गया था.. वो भी कुछ नहीं कर पाया था.. या करने की हिम्मत खो बैठा था. अब्ब वो बूढा हो गया था.... उसके बेटों ने hi उसकी नाक कटवा दी थी..

सरे आदमी कब्ज़े में आये.. सबको नज़र बंद करने ऑर्डर्स मौका कर hi जारी हो गए... चरों भाइयों को मेरी ग़ुलामी में आने क लिए कह दिए गया......

मनोज और मनीष बहुत पहदपहड़िये थे, वोन खुद को मेरी ग़ुलामी में नहीं देना चाहते the..ankit और अतुल साइड में पड़े हुए अभी कराह रहे थे.. उनकी हलकी फुल्की ट्रीटमेंट भी हो चुकी थी.. वो भी सर्र झुकाये हुए थे. वो भी मेरी ग़ुलामी में नहीं आना चाहते थे...

मनोज और मनीष अपने अमीर दोस्तों को घूर कर देख रहे थे... आँखों hi आँखों में कह रहे थे.. हमारी मदद karo....hum अपना सब कुछ ऐसे hi तो नहीं दे sakte..hum खुद को कैसे किसी की ग़ुलामी में दे सकते हाँ.. साडी ज़िन्दगी hi तो हमने पुणे सिटी पर हुकूमत की है.... हमे क्या मालूम था क हम हार जायेंगे...

कुछ ऐसी hi सोचें उनके दमाग में चल रही थी...........

स्टेडियम से बहार आ कर उन पांचो को मेरे आदमियों ने अपने अंडर में ले लिया था.. कोई भी कुछ नहीं कर सका था........ मैं कौनसा किसी को गोली मार देने वाला था.. जैसा तय हुआ था, बाकी बचाई जिंदगी वो सबब मेरी ग़ुलामी करेंगे, अगर मैं जीत गया तो.. और मई जीत भी गया था...... तो किसी को कोई दिकत कोई परेशानी नहीं थी....

पुलिस की दो गाड़ियों के साथ अपने आदमियों के साथ मैं मनजोत सिंह के इलाके में पोहंचा......... नागराज भी अपने बेटों और पोतों के साथ दो गाड़ियों में मौजूद था..

वो भी सब के सब इतने खुश थे... जितने आज से पहले कभी नहीं हुए होंगे... उनका एक बड़ा दुश्मन आज ज़ेर हो गया था........ 50 मीटर की दूरी पर गाड़ियां रोक दी गईं... सबसे पहले मैं गाडी से उतरा, नागराज की अपनी गाडी से बहार आया..

वो फिरसे मुझसे मिलकर अपनी ख़ुशी का इज़हार करने लगा.. स्टेडियम में भी वो मनजोत सिंह के सामने मुझसे पुरे जोश से मिला था.. अब्ब फिरसे मिल रहा था..

जो आदमी जूली ने दिल्ली से भेजे थे.. उनमे 2 लेडी डॉक्टर भी थी.. प्लान के हिसाब से वो सबब पहले से hi मनजोत सिंह की कोठी पर जा पोहंचे थे... वो अंदर मौजूद सभी को पावर के इंजेक्शन लगाने वाले थे.. एक दोसे पहले से hi दे देना अच्छा था.. बाद में ज़यादा प्रॉब्लम नहीं रहती..

नागराज मुझसे मिलने के बाद बोलै........ आस पास कोई नहीं था तो नागराज बिला झिझक मुझसे बात कर रहा था..

नागराज:- सुरिया बीटा, अब्ब तुम इन सबब के साथ क्या करने वाले हो.? अब तो ये सबब तुम्हारे घुलम बन चुके हाँ..

मैंने नागराज को देखा

विजय:- अगर मैं आपसे दोस्ताना अंदाज़ में बात करों, जैसे आप मेरी hi आगे क हाँ तो.......... नागराज ख़ुशी ख़ुशी बोलै

नागराज:- हाँ हाँ क्यों नहीं.. तुम बोल सकते हो, और वैसे भी मैं बूढा थोड़ी न हों.. मुझसे दोस्तों के जैसे बात कर सकते हो...... नागराज हस्ता हुआ बोलै..

विजय:- तो फिर मैं आप को ये बताना चाहता हों, क मुझे छूट और गांड की खुशबु का पागलपन की हद्द तक नशा है.. मनजोत सिंह परिवार अब्ब से मेरा घुलम है. इस घर के मर्द मेरे घुलम, इस घर की औरतें भी मेरी घुलम.. मैं तो सबब को hi दबा दबा कर छोडूंगा.. सालों से hi घर में क़ैद हाँ, पुरे खालिस माल है सबका सब.. छोड़ने में बहुत मज़ा आने वाला है.......... मज़े से चटखारे लेते हुए मैंने नागराज को सबब बताया........ मेरी बात पर पहले तो नागराज बहुत हैरान हुआ, फिर अचानक से hi उसकी आँखों की चमक बढ़ी. फिर ऐसी बढ़ी के छुपाये न छुप सकीय.. वो ख़ुशी से कुछ बावला हो गया, और वो बोल गया जो शायद उसे नहीं बोलना चाहिए था.... मैं तो पुणे में आया hi गेम खेलने क लिए था, ये बूढ़े घोड़े कैसे मेरी गेम को समझ सकते थे..

नागराज:- दिल खुश कर दिए तुमने सुरिया बीटा.. मैं भी कुछ ऐसे hi विचारो का मालिक हों.... मैंने एक बात तुम्हे नहीं बताई क मेरी इस खंडन से सालों पुराणी दुश्मनी है, उसी के चलते मैं भी इस खंडन की लकियों और औरतों को छोड़ना छटा हों... अगर तुम्हे मेरी बात बुरी लगी है ,तो सुरिया बीटा प्लस मम...

विअज्य:- नहीं नहीं नागराज साब आप खुल कर सबब बोल दें.. मुझे बुरा नहीं लगेगा.

नागराज:- तो फिर सुरिया बीटा, मुझे इस खंडन की हर एक लड़की या औरत को एक एक बार छोड़ना है... और मेरी बीवी को भी अपना कुछ हिसाब इन सबब से चुकता करना है.. तो बदले में तुम भी जो चाहो मांग सकते हो.. नागराज बेसब्री से बोल बैठा, अपने बदले क लिए वो ुतलवा होने लगा..

विजय:- देख लो नागराज जी मैं कुछ भी मांग सकता हों.. अब्ब तो आप भी जान hi गए होंगे, क मुझे सबसे ज़यादा किश काम में मज़ा आता है......... मैं लम्बी सांस लेते हुए बोलै.. ये एक सिग्नल था नागराज क लिए.. जैसे मैं किसी अनदेखी छूट की स्मेल ले रहा हों..

नागराज:- अरे यार तुम उसकी चिंता मैट करो........... नागराज साला एकदुम्म से hi मुझे बेटे से यार बना बैठा.. कुत्ता साला बदले के चक्कर में खुद hi जाल में फँस रहा था..

विजय:- तो फिर ठीक है.. मैं यहाँ से फ्री होकर आपसे कांटेक्ट करता हों.. हाँ एक बात और मैं आपको बता डॉन.. वो ये क मैं मनजोत सिंह को और उसके परिवार को दिल्ली अपनी राजधानी भेज रहा हों.. आपसे बार से बात होती रहेगी.. अगर आप को उन सबब के मज़े लेने हाँ.. तो पहले आप सबको पुरे परिवार के साथ मेरी दावत पर आना होगा....

नागराज:- अरे यार दिल्ली कौनसा दूर है हमारे लिए .. पालक झपकी और हम वहां होंगे.. तुम यहाँ से फ्री हो जाओ.. सब को अपनी राजधानी शिफ्ट कर दो.. फिर मिल बैठते हाँ..... नागराज मुझसे मिलकर ख़ुशी ख़ुशी वापिस अपनी गाडी की और बढ़ गया.. मई भी महक के पास जा पोहंचा.. महक जो अब्ब तक्क मनजोत सिंह और उसके बेटो को बहार निकल चुकी थी.. हमारे गार्ड्स चरों और पहले हुए थे.. वो सबब आस पास का धयान भी रखे हुए थे और मनजोत सिंह के साथ उसके बेटों पर भी उनकी नज़र थी..

पुरे एरिया में hi शोर मचा हुआ था.. ये मनजोत सिंह का एरिया था.. और वो अपने hi एरिया में किसी का घुलम बना रोड पर अपने बेटों के साथ मौजूद था.. पीछे पुलिस भी मौजूद थी.. इलाके के लोग बहुत ज़यादा शोर मचा रहे थे..

कान पड़ी आवाज़ भी सुनाई देना मुश्किल था.. मैं महक के पास पोहंच गया..

महक:- अब्ब चलें इन सबब का जनाज़ा लेकर कोठी की तरफ........... महक शोर की वजा से ऊंची आवाज़ में बोली थी....... पहले शोर कुछ काम था.. पारर अब्ब बहुत बढ़ चूका था.. मैंने एक नज़र मनजोत सिंह और उसके बेटो को देखा.. अंकित और अतुल भी मौजूद थे...

मनजोत सिंह का सर्र पूरा hi झुका हुआ था.. तो उसके बेटो के सर्र नीचे ज़रूर थे.. पारर उनके चेहरे ग़ुस्से और बेइज़्ज़ती के कारन पुरे लाल पद चुके थे..

मैंने महक की बात के जवाब में उसके चलना शुरू कर दिए... मनजोत सिंह और उसके शेर बेटे भी गार्ड्स के घेरे में आगे बढ़ने लगे.......

भरे पूरे बाजार में मनजोत सिंह की इज़्ज़त का जनाज़ा निकला जा रहा था.. सब लोग जान चुके थे....... पूरा पुणे hi तो आज के हुए मुकाबले बारे इन्फो रखता था.. मनजोत सिंह के इलाके के तो सब hi जान गए थे... सबके साथ चलते हुए महक का हाथ थामे हुए मैंने एरिया के लोगों को देखने लगा...

ज़यादा लोग इस सबब का भरपूर मज़ा ले रहे थे.. तो कुछ ऐसे भी थे, जिनके मनजोत सिंह से करीबी रिलेशन थे... वो आग बरसाती नज़रों में मुझे और महक को देख रहे थे.. मेरे गार्ड्स को देख रहे थे.. लेकिन कोई भी कुछ कर नहीं सकता था..

धीरे धीरे सब मनजोत सिंह की कोठी की और बढ़ रहे थे.. जैसे जैसे हम आगे बढ़ रहे थे.. वैसे वैसे मजमा भी साथ hi आगे बढ़ रहा था.. सामने भी हरजोन लोग मौजूद थे.......... हर घर की छत्त लड़कियों औरतों मर्दों की भरी हुई थी........... दूर दूर से लोग ये सबब देखने क लिए उमड़ आये थे......

शायद hi कभी कोई ऐसा समा किसी ने देखा होगा.. शायद hi किसी की किसी की इज़्ज़त का ऐसा जनाज़ा देखा होगा.......... मनजोत सिंह और उसके बेटे सर्र झुकाये हुए हमारे साथ hi आगे बढ़ रहे थे..

धीरे धीरे हम सबब मनजोत सिंह की कोठी के सामने जा पोहंचे....... वही रुक कर मैंने जब पीछे मुद कर देखा तो लोगों के सर्र hi सर्र मुझे नज़र आ रहे थे...

सबब के सबब साले हरामज़ादे थे... तमाशा किसी किसम का भी देखते बड़े शोक से हाँ........... इज़्ज़त किसी की भी उछली जा रही हो...... किसी बेबस लड़की की हो. या किसी इज़्ज़त दर आदमी की.. जब भी उतरती है तो बजाये दुःख के ख़ुशी से झूम उठते हाँ... किसी को इससे क्या लेना देना.. सबब तो इस समय का पूरा पूरा मज़ा लेते हाँ.. फिर सालों ऐसी किसी घटना को लेकर तब्सरे करते रहते हाँ......

सब पर एक निगाह गलत दाल कर मैंने अपने गार्ड्स को इशारा दिए... वो सबब मनजोत सिंह और उसके बेटों को अंदर कोठी में लेकर चलते बने....

पुलिस का काम ख़तम हो चूका था.. अब्ब से सबब हमारी खुद की ज़िम्मेदारी थी.. पुलिस को थैंक्स बोल कर हमने रवाना कर दिए..........

क्राउड तो ख़तम होने वाला था नहीं....... उसे ख़तम करने के लिए दूसरा तरीका इस्तेमाल करना पड़ा... महक तो ऐसे सब कामों के लिए मास्टर थी.... महक ने कुछ बचे हुए गार्ड्स को इशारा कर दिए....... तो गार्ड्स ने अपनी गन्स का रुख क्रूड की तरफ कर दिए.......................

बस फिर क्या था..................

जो लोग सबसे आगे थे... वो अपने पीछे मौजूद लोगों को कुचलते हुए चीखते हुए पीछे भागने लगी....... गार्ड्स ने भी फिर फायरिंग शुरू कर दी.........

शोर पहले भी मचा था.... चीखो पुकार पहले भी हुई थी... फायरिंग यही तो शोर भी बढ़ा और चीखें भी फिरसे गूंजने लगी थी...

साले चूतिये लोग... ऐसे डर कर भागे.. जैसे उन सबब को यही पर भून दिया जायेगा.. सब के सब डर के मारे चीखने लगे थे...

10 मिंटो में hi पूजा मजमा तित्तर बित्तर हो गया.. छतों पर अभी भी इक्का दुक्का आदमी नज़र आ रहे थे...... गार्ड्स ने उनकी तरफ गन्स का रुख क्या तो.... तो साले ऐसे भागे......... ऐसे भागे. जैसे किसी टूर्नामेंट में हिस्सा ले रहे हों.....

आस पास का सारा कचरा साफ़ हुआ तो मैं महक के साथ अंदर एंटर कर गया..

नानी ममियां और बहने अभी कोठी की बैक साइड वाले एरिया में थीं.. पता नहीं उन्हें कुहक बताया गया था या नहीं......... प्लान के हिसाब से उन्हें अभी कुछ नहीं बताया जा सकता था. सबब मैं hi बताने वाला था...

मैं अंदर दाखिल हुआ तो ड्राइंग रूम में जूली की भेजी टीम थी.. लेडी डॉक्टर नहीं थी, वो अंदर hi दूसरे पोरशन में थी.. गुरदस भी पोजीशन लेकर खड़े हो गए थे......................................

मनजोत सिंह और उसके बेटों की नज़रें अब्ब नहीं झुकी हुई थी. अब वो सबब मुझे आग अबरसति आँखों से देख रहे थे.... जिनके सामने उन सबब की ऑंखें झुकी थी.. वो सबब अब्ब यहाँ मौजूद नहीं थे..... सबके तेवर बदल चुके थे...

vijay:-(mehak के कान) मुझे लग रहा है.. जैसे मुकाबले के बाद मनजोत सिंह ने कोई प्लान बना लिए हो... मुझे कुछ तो गड़बड़ लग रही है.. वर्ण इतने गार्ड्स एक रहते ये सबब ऐसे नहीं दिख सकते थे..

महक;- हाँ मुझे भी कुछ ऐसा hi लग रहा है.. महक इतना बोल कर गॉर्डस को चेक करने लगी.. बहार जा कर गार्ड्स को अच्छे से निगरानी क लिए बोल दिए...

कुछ देर में महक अंदर आ गई.. तो मैंने मनजोत सिंह और उसके बेटो को अपने सामने घुटनो पर बैठने क लिए कह दिया.. वो तो बैठने वाले थे नहीं... गार्ड्स ने उन्हें ज़बरदस्ती बिठा दिए.......

विजय:- हाँ तो मनजोत सिंह तुम अपनी ज़ुबान से फिर रहे हो.. तुम हार चुके हो तो अब्ब तुम मेरे घुलम बनने क लिए तैयार क्यों नहीं हो...... मैं वो वजा जानना चाहता हों... मैं मनजोत सिंह की आँखों में देखते हुए बोलै....

मनजोत सिंघग बरसाती आँखों से मुझे देखते हुए बोलै......

मनजोत सिंह:- मैं या मेरे बेटे कभी भी किसी से कुश्ती में हारे नहीं थे.. लेकिन तुम पहले से hi ट्रेंनेड हो के आये हो.. पहले से hi प्लान करके ए हो.. मेरे बेटों ने तो प्रैक्टिस भी नहीं की थी... तुम नजाने कितने दिनों की प्रैक्टिस करते रहे हो. यहाँ आ के तुमने सबब कुछ प्लान के हिसाब से hi किया है.... ऐसा क्यों किया है, मैं नहीं जानता.... तुमने पार्टी में मुझे और मेरे बेटों को मुकाबले के लिए उकसाया था.. मतलब तुम पहले से hi कुछ ऐसा सोचे हुए थे.. ये सबब चीटिंग नहीं है तो क्या है.......... इसलिए मैं या मेरे बेटे खुद को तुम्हारी ग़ुलामी में नहीं देने वाले.............

मैं और महक हस्सन लगे...

महक:- मनजोत सिंह तुम इतने भी मंदबुद्धि नहीं हो, जितना हम समझ रहे थे.. तुम तो सच में hi बौह्त पोहंचे हुए इंसान हो...... पारर अफ़सोस तुमने ये सबब समझने में बौह्त देर कर दी.. अब्ब तो तुम्हारी साड़ी प्रोपोर्टी हमारी हो चुकी है.. और तुम सबब भी हमारे घुलम बन्न चुके हो....

मनोज:- चुप कर साली कुत्तिया, दो कोड़ी की सेक्रेटरी तेरी औकात hi क्या है बोलने की.. हमारी झांट बराबर तेरी औकात नहीं है तेरी, tttttttttt............. वो कुछ और बोलता महक उड़ती हुई उसके सर्र पर जा पोहंची एक मुक्का उसके मोहन पर पड़ा और वो फर्श पर गिर कर फिसलता हुआ 6 फ़ीट दूर जा पोहंचा...

महक ग़ुस्से में नहीं आई थी.... बस उसका मोहन बंद करने क लिए उसने ऐसे किया था...

महक:- जिस झांट की तुम बात कर रहे हो ना.. उसके नीचे का सामान काटने की मैं शौक़ीन हों... तुम्हारे जैसे सैंकड़ों कुत्ते मैंने पाल रखे हाँ..

औकात की बात तो तू कर hi मैट... वो तो आज हमने तुम सबब को दिखा दी है... अब्ब बस कुछ hi देर में बाकी का सबब भी खुल सामने आ जायेगा..

मैंने जूली टीम के मेंबर्स को इशारा दे दे.. वो सबब अंदर चले गए.. कुछ मिनट्स गुज़रे तो नानी और बाकी सब आती हुई दिखें..... उनमे से कुछ तो हैरान थी. लेकिन ज़यादा को इस सब से कोई फर्क hi नहीं पड़ा था....... वो कुछ भी सही से महसूस कर पाने के काबिल hi कहाँ रही थी.. उन्हें इस सस्पेंस से जैसे कोई लेना देना hi नहीं था........ गार्ड्स तो हमेशा से hi इस कोठी में आम देखती hi रहती थी.....

नानी को देख कर मुझे बहुत दुःख हुआ.. नानी की मकर झुकी हुई थी. आँखों पर ऐनक भी लगी हुई थी.. वो हैरान ज़रूर थी.. अपने पति और बच्चो को कभी ऐसे हाल में देखा नहीं था ना....

मैंने एक नज़र सबको देखा.. ममियां और मेरी बहने नार्मल से कपड़ों में थी.. उनके चेहरे मुरझाये हुए थे.. वो सब हमें टुकर टुकर देख रही थी..... मेरे इशारे कर महक ने गार्ड्स को बहार भेज दिए...

अब सिर्फ हम परिवार वाले और जूली टीम के मेंबर्स hi थे कोठी के अंदर.. बाकी सब बहार थे

मनजोत सिंह और उसके बेटे इस बार और भी गुहसे में आ गए थे.. घर की औरतें सबके सामने आ गई थी. जिन्हे उन्हों ने परदे में छुपाया हुआ था..

मनजोत सिंह:- तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई घर की औरतों को यहाँ पर लाने की..

मनोज सिंह:- मरे तो कुत्ते बहुत बुरी मौत मरेगा..

अंकित फिरसे बोलै पड़ा.. वो अपनी चोट को फिलवक्त के लिए भूल चूका था..

अंकित:- इस घर की औरतों को अनजान मर्दों के सामने आने की इजाज़त नहीं है.. इन सबब को अंदर जाने को बोल दो..

मनोज और मनीष भी चुप नहीं रहे.. वो भी कुछ न कुछ बोले

विजय:- क्यों सब को अंदर जाने को बोलों.. तुम सब मेरे घुलम हो तो इस घर की औरतों पर भी अब से मेरा हक़ हुआ..

मनोज:- kutttttttttttttttttttttteeeeeeeeeeeeeee .. ज़ुबान को लगाम दे.. इज़्ज़त हाँ वो सब हमारी.. उनके बारे में ऐसी बात मैट बोलो... वर्ण काट डालूंगा..

महक:- तू बाज़ नहीं आएगा.. पहले की मार भूल चुके हो तुम..

मनोज:- तुझे भी देख लूंगा हरामज़ादी.. कोई भी यहाँ से बच कर नहीं जाएगा..

महक;- जानती हों.. तुम सबब ने कोई तो प्लान बनाया हुआ है.. पारर क्या बनाया है ये नहीं जानती.. लेकिन तुम हमारी चितना मैट करो.. हमारा तुम या तुम्हारे आदमी बाल भी बांका नहीं कर सकते

मैं चलता हुआ नानी के पास जा पोहंचा..... नानी मुझे घोर से देखने लगी..

नानी थकी हुई आवाज़ में बोल उठी

नानी:- बीटा कौन हो तुम और ये सबब क्या है...

विजय:- नानी क्या आप अपने hi खून को नहीं पहचान पा रही हाँ.. महसूस करो मुझे नानी.. मुझे महसूस करो...

नानी:- तुम मुझे नानी क्यों बोल रहे हो बीटा..

एक ममी जो मुझे बड़े घोर से देख रही थी... उससे रहा नहीं वो भी नानी के आस आ पोहंची और नानी के हाथ को थम कर कड़ी हो गई.. नानी ने उसे देखा फिर वो मुझे देखने लगी.. उसकी आँखों में इन्तहा की उदासी थी.. पारर मुझे देख कर वो मुझे पहचानने की कोशिश भी कर रही थी...

ममी:- माँ जी जब श्वेता बेहेन यहाँ से गई थी तो वो प्रेगनत भी तो थी... वो ये बोलते हुए कांप भी रही थी.. उसके दिल में अटल पथल होने लगी थी....

नानी तो ममी की बात सुनकर झटका hi खा गई थी.. माँ का ज़िक्र hi नानी के लिए इन्तहा कर दर्द ले आया था.. मैंने नानी के हाथो को थाम लिया.... नानी मुझे देखने लगी...

नानी कुछ बोली नहीं बास मुझे देखते देखते ानुस बहाने लगी, और सर्र को हिला कर मुझसे जैसे पूछने लगी क ममी ने जो कहा है.. क्या वैसे hi कुछ है.. तो मैंने भी सर्र हिला कर नानी को हाँ बोल दिए....... बास फिर क्या था.. नानी ने इस बार एक बड़ा झटका खाया और बुरी तरह से लड़खड़ा गई..........

ममियां भी मुझे घोरसे देख रही थी.. मेरे सर्र को हिलते देखा तो वही घुटनो पर बैठ गयी और दहाड़ें मारने लगी.. शायद उनके होश ठिकाने थे.. वो शायद कुछ समझ गई थी क अब्ब उनकी रहे के दिन ाँ पोहंचे हाँ..

नानी से खड़ा रहना मुश्किल हो रहा था तो मैंने नानी को अपनी गॉड में उठाया अपनी सूफी की और बढ़ गया.. मनजोत सिंह जो पहले शदीद ग़ुस्से में थे... अब्ब हैरत से मुझे और मामियों को देख रहे थे..

मेरे ममे भी हैरान थे.. पर उनका ग़ुस्सा कम् नहीं हुआ था.. वही खड़े रह कर मैं बोलै.

विजय:- मेरी मामियों मेरी बहनो मई हों आप सबब की श्वेता का बीटा....... आपका बीटा आपका bhaiiiiiiiiiiiiiiiii.. वही खड़े हुए मैंने अपने हाथ पहला दिए... ममियां जो घुटनो पर थी, वो उठी और भाग कर मेरे पास आने लगी.. मेरी 4 बहनो के चेहरों पर मुझे ख़ुशी दिखी लेकिन बाकी सबब नार्मल hi रही.. शायद इन सबब के दिमाग कुछ ज़यादा hi डिस्टर्ब हो गए थे.. जिनकी हालत कुछ बेहतर थी, वो मेरे पास भागी भागी आएं और मुझे थाम कर रोने लगी... सब मेरी बहन में तो नहीं समां सकती थी.. बास मुझसे लग कर ख़ुशी के आंसू बहा रही थी...

महक भी इस सबब सिचुएशन में हमारी जानिब मतवज्जु हो गई थी.. गार्ड्स सबब बहार थे.. तो मनोज सिंह हरमजदगी करने से बाज़ नहीं आया..

पता नहीं कहाँ से एक पिस्तौल उसके हाथ में आ गया..

मनोज सिंह:- हट जाओ सब के सब आज इस हरामी को मैं ज़िंदा नहीं छोडूंगा.. ये हरामज़ादा हमसे बदला लेने आया है.. उस कुत्तिया को मार मार कर घर से भगा दिया था. तो अब्ब उसका बीटा बदला लेने आया है..

मनोज सिंह पिस्तौल हाथ में थाम कर पीछे दीवार से जा लगा था.. उसका रुख मेरी जाणीव था.. लेकिन मुझे सबब hi घेर कर कड़ी हुई थी.. मैंने मनजोत सिंह को देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कान थी....... ओह मनजोत सिंह के पास पिस्तौल था.. उसकी तो तलाशी ली गई थी.. तो फिर उसके पास पिस्तौल कहाँ से आया..

ये इनका hi तो ड्राइंग रूम था.. कही पास में hi कही छुपा कर रखा हुआ था..

महक ने हरकत करने की कोशिश की तो

मनोज सिंह:- वही कड़ी रह हरामज़ादी.. वर्ण सबसे पहले मैं तुझे hi गोली मार डोंगा.. वो बहुत ग़ुस्से में था.. इस समय कोई गार्ड भी आ कर हमारी मदद नहीं कर सकता था.. मनोज सिंह के हाथ में मौजूद पिस्तौल से निकलने वाली गोली मेरी नानी को मेरी मामियों में से किसी को या फिर मेरी बहनो में से किसी को भी लग सकती थी..

यहाँ की सिचुएशन बहुत hi क्रिटिकल हो गई थी... ऐसी सिचुएशन में एक भी गलती बहुत बड़ा नुकसान भी कर सकती थी.. मेरे किसी अपने की जान भी ले सकती थी..

मनजोत सिंह और उसके बेटे अब्ब खुश दिखाई दे रहे थे.. नानी जो सूफी पर थी. वो एक बार फिरसे मारे डर के कांपने लगी थी.. मामियों और मेरी बहने भी दर्री हुई थी.......... जो मेरी बहने मुझसे दूर थी और मुझसे नहीं मिली थी.. वो अभी भी नार्मल hi दिख रही थी.. उन्हें यहाँ पल पल बदल रही सिचुएशन से जैसे कोई ग़र्ज़ hi नहीं रही थी..........

वो नार्मल फेस के साथ सब देख रही थी........

मनजोत सिंह ने मनोज सिंह को देखा. फिर अपने दूसरों बेटों को देखा और फिर अचानक से hi ड्राइंग के रोशन दान की जानिब मोहन खोल कर ऊंची आवाज़ में बोल पड़ा.

fiirrrrrrrrrrrrrreeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee

मनजोत सिंह बूढा था.. पर उसकी आवाज़ में गूँज बहुत ज़यादा थी.. पूरी कोठी और आस पास के इलाके में उसकी आवाज़ गूँज उठी.........

फ़ौरन hi फिर अनगिनत गन्स के चलने की आवाज़ें भी गूंजने लगी थीई..................... कइयों के मरने की ावें भी गूंजने लगी थी.....

हर तरफ चेख़ो पुकार मच गई थी... मेरे आस पास मौजूद मेरे अपणु की चीखें भी उन चीखो में शामिल हो चुकी थीई

 
थैंक्स भाई..!!

झटके सिर्फ विज्जू और महक hi नहीं दे सकते मैं भी दे सकता हों....... हाहाहा........... जस्ट किडिंग............. देखते हाँ नेक्स्ट अपडेट क्या कुहक नया लेकर आती है.. किसके चीखने की आवाज़ें गूँज रही थी.. कौन कौन मर रहा था.. हर बार हीरो hi सेफ रहे ये भी ज़रूरी नहीं......... विलन भी कोई पावर रखते हाँ........ आखिर मनजोत सिंह ने सैलून से आधे पुणे पर राज किया है...... कुछ तो होगा उसके मैं में .. कुछ तो प्लान किया होगा उसने भी.. देखते हाँ.. इस सिचुएशन से विज्जू और महक कैसे निकलते हाँ.. और दूसरों को कैसे निकलते हाँ..
 
थैंक्स..!!

नागराज के आगे विज्जू ने चारा दाल दिए है.. वो भी साला बलदे के चक्कर में खुद चक्कर में आना चाहता है.. देखते हाँ नागराज के साथ विज्जू क्या सलूक करता है.. दोनों मियां बीवी का तो विज्जू और महक बहुत अच्छे से हाल चाल पूछेंगे.. आखिर कर विज्जउ अपनी ननिहाल जा पहंचा.. सब से मिला और सबके दर्द को जाना.. ऐसे मिलाप के मोके पर मनोज ने कही से एक पिस्तौल ढूंढ णिअकाला और विज्जू पर तान दिए......... साला हार कर भी सबब समझ नहीं पाया
 
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