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- Dec 5, 2013
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हम तो उन्हें कोई पानी की चट्टान समझ के अपनी मस्ती में मस्त थे…………
……….जब वो उठ खड़े हुए और सरे पौधे पत्ते हेट तो हमें हमारी गलती का अहसास हुआ. किन्तु तब तक बहोत देर हो चुकी थी.
ऋषि – मूर्खो. ये क्या किया तुम दोनों ने तुम अपनी हवस में इतने अंधे हो गए के तुम्हे किसी और बात का ध्यान hi नहीं रहा? हमारी वर्षो की तपस्या तुमने अपने काम की भेंट चढ़ा दी. क्या तुम लोगो क पास अपना घर नहीं था. जो सम्भोग के लिए सागर के इतने गहरे ताल में चले आये?
सम – क्षमा ऋषिवर हमारा नया नया विवाह हुआ है हम अपने प्रेम में होश खो बैठे थे. कृपया क्रोधित न हो.
ऋषि – क्रोधित न हो? तुम्हे मालूम भी नहीं तुमने क्या किया है. मेरे जागते hi संभवतः कई बुरी शक्तियों को मेरे यहाँ होने का अहसास अब तक मिल चूका होगा. जिनसे छिप कर मए यहाँ तप कर रहा था.
सम – छिप कर?
ऋषि - है छिप कर
सम - किन्तु क्यों ऋषिवर?
ऋषि - ये जानना तुम्हारा काम नहीं है मुर्ख बालक. मए तुम दोनों को श्राप देता हु के जिस पत्नी के जिस्म की चाहत तुम्हे उसके साथ इस सागर के ताल तक ले आयी तुम अपनी उसी पत्नी के साथ इसी ताल में वस् करोगे इस से बहार नहीं जा सकोगे. मरते डैम तक तुम यही रहोगे. तुम्हे एकांत चाहिए थीं ा. अब तुम दोनों सदैव के लिए इसी एकांत में रहोगे. इस अनंत फैले सागर की गहराई से कभी बहार नहीं निकल पाओगे. न hi कोई तुम्हे यहाँ से निकल पायेगा. यदि ऐसा हुआ तो उसी क्षण तुम दोनों की मौत हो जाएगी.
सम - इतना कह कर ऋषि जाने लगा तो मैने और मेरी पत्नी ने उनके चरना पकड़ लिए.
सम – ऋषिवर हमें क्षमा कर दीजिये हमें इस तरह श्राप मत दीजिये . हम नादाँ है. जवानी के जोश में हम से गलती हो गयी ऋषिवर हमारी जिंदगी यु बर्बाद न कीजिये. यदि आप क्षमा नहीं कर सकते तो निसंदेह आप हमें इस क्षण मृत्यु दंड दे दीजिये. भला हम साडी जिंदगी यहाँ कैसे बिताएंगे. हमारे घर का क्या होगा हमारे राज्य का क्या होगा. हमें क्षमा कर दीजिये रिश्वर
ऋषि – नहीं तुम्हे क्षमा नहीं मिल सकती.
गम – आप तो ऋषि है ज्ञानी है, दया के सागर है. ऋषिवर आप तो जगत कल्याण के लिए तप करते है . फिर आप हम जैसे नदनो को क्षमा क्यों नहीं कर सकते. आप hi हमें दंड दे देंगे तो हम किस से क्षमा मांगेगे. कृपया हमें क्षमा कर दीजिये.
ऋषि – मेरा श्राप वापस नहीं जा सकता अब रहना तो तुम्हे यही पड़ेगा. किन्तु तुम दोनों की उम्र और उसके बहकावे में की गयी गलती को देखते हुए मए अपने श्राप की उम्र घटा जरूर सकता हु. मए यहाँ ये मानचित्र जो स्वर्ण मणि तक पहुंचने का मार्ग बताता है. इसी को अपने पास बुरी शक्तियों से बचने के लिए यहाँ छुप कर तप कर रहा था. जिससे मए इसके असली हक़दार के आने तक अपने पास रख सकू. किन्तु तुम दोनों की वजह से अब ये बात उन बुरी शातियो तक पहुंच चुकी है. वो मेरा वध कर के भी ये मांचियरा मुझसे छीन लगे.
इसीलिए अब तुम दोनों का दंड ये है के तुम दोनों hi यहाँ खतरनाक मगरमच्छ बन के रहोगे और ये मानचित्र तुम्हरी पत्नी के पेट में रहेगा. तुम तक कई शक्तिया आएगी इसे हासिल करने के लिए किन्तु तुम स्वयं ये किसी को नहीं डोज. यदि उन्होंने ये मानचित्र हासिल करने के लिए तुम्हे मरने की कोशिश की तो तुम दोनों के मरते hi ये मानचित्र अनंत में खो जायेगा. फिर ये किसी को नहीं मिलेगा. न hi स्वर्ण मणि किसी को मिलेगी. तुम में से किसी एक को विवश आकर के दूसरे से ये मानचित्र माँगा गया और तुमने दिया तो तुम्हरे शरीरो में एक विस्फोट होगा जिससे तुम दोनों और वो तीसरा सब मरे जाओगे. किन्तु यदि किसी दिन कोई ऐसा आया जो तुम दोनों को मरे बिना तुम्हारी पत्नी के पेट से ये मानचित्र निकल लाएगा. उस दिन तुम लोग अपने असली रूप में आ जाओगे और मेरा श्राप ख़तम हो जायेगा. उसके बाद hi तुम लोग अपने राज्य में वापस जा पाओगे. किन्तु यद् रहे आने वाले हर व्यक्ति को तुम सिर्फ अपना दुश्मन hi मन के चलोगे. क्यों की यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो तुम दोनों की मृत्यु तय है.
इतना बता कर. सम चुप हो जाता है. और देव हाथ जोड़ कर आँखे बंद कर के
देव – हे ऋषिवर आप जो कोई भी है जहा कही भी है मए आपको शाट शाट नमन करता हु. आप जानते थे एक दिन मए यहाँ आउगा और ये मानचित्र हासिल करुगा. इसीलिए आपने इन्हे ये आदेश दिया था. आपकी बड़ी कृपा है जो आपने इस मानचित्र को सुरक्षित रखा. और अब आपके द्वारा कहे हुए सरे वाकया भी पूरे हो चुके है तो कृपया अब इन्हे अपने श्राप से मुक्त कीजिये और इन्हे फिर से इनके असली रूप में ले आइये.
देव के इतना कहते hi कही से एक रौशनी की किरण आती है और दोनों मगरमच्छो पे आकर लगती है. किरण का मगरमच्छो से टकराव होते hi दोनों मगरमच्छ इंसाने रूप में आ जाते है. जहा एक बेहद आकर्षक और सुन्दर राजकुमार खड़ा था. और उसके पास hi एक अति सुन्दर स्त्री जो की उसकी पत्नी थी.
रूद्र – अरे वाह भाई आप दोनों तो बहोत hi सुन्दर लग रहे है. अब अपना परिचय hi करा दो राजकुमार
………. मए वनराज का पुत्र हु राजकुमार वंशराज और ये मेरी धर्म पत्नी वानिकी
रूद्र – अति सुन्दर अब चले क्या यहाँ से बहोत ठण्ड लग रही है यार अभी बहार निकलने में भी समय लगेगा.
वंशराज – नहीं रूद्र कोई देर नहीं लगेगी. इतना कह कर वंशराज अपनी आंखे बंद करता है. तो सब वह से अदृश्य हो जाते है. और पल भर में hi सब निल सागर के किनारे खड़े थे. और अब उनमे से किसी के कपडे तक गीले नहीं थे.
रूद्र - वह यार हम तो तुरंत hi बहार आ गए. अब क्या इरादा है वंशराज और वानिकी. अब फिर से यहाँ समय बिताना चाहे तो हमारा ये महल सामने है जिसमे कल रत हम लोगो ने डेरा डाला था. चाहो तो कुछ दिन फिर से यहाँ नए विवाह का आनंद उठा लो
वानिकी - न बाबा माफ़ कीजिये बहोत आनंद उठा लिया और उसका फल भी मिल गया यदि घर में होते तो हमारे बच्चे घूम रहे होते अब तक. ये सब इनकी वजह से हुआ. अब मुझे जल्दी घर पहुंचना है वही जा कर चैन आएगा मुझे
रूद्र – देखा वंशराज मजा दोनों ने लिया और इल्जाम तुम्हरे ऊपर. ख़ैर परेशां मत हो हर जगह की औरतो का यही हाल है.
रूद्र की इस बात पर सब हसने लगते है.
देव - चलो अंत भला सो सब भला यहाँ की कहानी का अंत तो हो गया और सुखद अंत हुआ. आप दोनों को अपना घर मिल गया ये सबसे अच्छी बात है. चलिए अब वन में चलते है संभवतः वानरराज भी बेसब्री से हमरी hi प्रतीक्ष कर रहे होंगे.
वर – है देव चलिए घर षाले है.
वंशराज फिर से अपनी आंखे बंद करता है इस बार थोड़ा समय ज्यादा लगा. किन्तु फिर भी जल्द hi वो लोग वन में राजमहल के सामने खड़े थे. वो लोग सीधा अंदर जाते है. जहा वनराज बेचैनी से टहल रहे थे.
वंशराज – प्रणाम पिता श्री
वनराज पलट कर देखता है तो उसकी आँखों में आंसू आ जाते है. वो बहे फैला देते है तो वंशराज और वानिकी दोनों दौड़ते हुए उनके पैरो पे जा कर गिरते है. लेकिन वनराज उन्हें उठा के सेंस से लगा लेता है.
वनराज – मेरे बच्चो तुम लोग आ गए. मुझे यकीन था देव तुम्हे जरूर लाएगा
फिर थोड़ी देर के बाद सब लोग बैठ के बाते करने लगते है.
देव – महाराज आपने हमें पहले hi क्यों नहीं बता दिया के ये आपके पुत्र और पुत्रवधु है?
वनराज – क्यों के मए वह होने वाली लड़ाई को कमजोर नहीं करना चाहता था. यदि तुम जान जाते युराज तो इतनी बहादुरी से नहीं लड़ते तुम्हरे मन में एक संकोच होता प्रहार करते समय और यही पे ये दोनों श्राप के कारन तुम्हे नुकसान पंहुचा देते फल स्वरुप जीतता कोई भी नहीं किन्तु नुकसान जरूर हो जाता. इसीलिए मैने पहले से कुछ नहीं बताया. कई बार चुप रहने में hi जीत होती है. और देख लो जीत मेरी hi हुई आखिर में.
देव – जी महाराज और शायद यही वजह थी जिस वजह से आप हर किसी को इस वन से गुजरने नहीं देते थे.
वनराज – बिलकुल सही कहा आपने देव, क्यों की यदि हर कोई अपनी शक्तियों समेत यहाँ से निकल जाता तो मेरे बच्चो के लिए वह मुश्किलें ज्यादा कड़ी हो जाती . इनकी आधी मुश्किलें तो मए यही रोक देता था किन्तु कभी कभी यहाँ हुई गलतियों की वजह से इनका सामना भी बुरी ताक़तों से हुआ. पर इन्होने मिल के उन्हें हराया हर बार.
रूद्र – महाराज आपका सोचना सही था. इससे इन दोनों को यहाँ बैठे बैठे आप सहायता कर रहे थे. यही एक पिता का कर्त्तव्य भी है.
देव – महाराज अब हमें आज्ञा दे. हमें भी जाना है.
वनराज - ठीक है देव किन्तु अपना वचन मत भूलना अपने विवाह के पश्चात् तुम दोनों को एक लम्बे समय के लिए यहाँ इसी वन में रहना है हम सब के साथ.
देव – जरूर महाराज
वनराज - और मैने जो कहा था उसे भी याद रखना आप को कभी भी हमारी सहायता की आवश्यकता हो तो बेहिचक हमें यद् कीजिये गए हम सेना सहित आपके सामने होंगे.
देव – जी महाराज. अब आज्ञा?
वनराज – जाओ देव और स्वर्ण मणि को हासिल करने में विजय प्राप्त करो.
देवा और रूद्र अपनी आंखे बंद कर के वह से अदृश्य हो जाते है. और कुछ समय बाद वो लोग वापस तिलिस्म नगरी में खड़े थे.
हम तो उन्हें कोई पानी की चट्टान समझ के अपनी मस्ती में मस्त थे…………
……….जब वो उठ खड़े हुए और सरे पौधे पत्ते हेट तो हमें हमारी गलती का अहसास हुआ. किन्तु तब तक बहोत देर हो चुकी थी.
ऋषि – मूर्खो. ये क्या किया तुम दोनों ने तुम अपनी हवस में इतने अंधे हो गए के तुम्हे किसी और बात का ध्यान hi नहीं रहा? हमारी वर्षो की तपस्या तुमने अपने काम की भेंट चढ़ा दी. क्या तुम लोगो क पास अपना घर नहीं था. जो सम्भोग के लिए सागर के इतने गहरे ताल में चले आये?
सम – क्षमा ऋषिवर हमारा नया नया विवाह हुआ है हम अपने प्रेम में होश खो बैठे थे. कृपया क्रोधित न हो.
ऋषि – क्रोधित न हो? तुम्हे मालूम भी नहीं तुमने क्या किया है. मेरे जागते hi संभवतः कई बुरी शक्तियों को मेरे यहाँ होने का अहसास अब तक मिल चूका होगा. जिनसे छिप कर मए यहाँ तप कर रहा था.
सम – छिप कर?
ऋषि - है छिप कर
सम - किन्तु क्यों ऋषिवर?
ऋषि - ये जानना तुम्हारा काम नहीं है मुर्ख बालक. मए तुम दोनों को श्राप देता हु के जिस पत्नी के जिस्म की चाहत तुम्हे उसके साथ इस सागर के ताल तक ले आयी तुम अपनी उसी पत्नी के साथ इसी ताल में वस् करोगे इस से बहार नहीं जा सकोगे. मरते डैम तक तुम यही रहोगे. तुम्हे एकांत चाहिए थीं ा. अब तुम दोनों सदैव के लिए इसी एकांत में रहोगे. इस अनंत फैले सागर की गहराई से कभी बहार नहीं निकल पाओगे. न hi कोई तुम्हे यहाँ से निकल पायेगा. यदि ऐसा हुआ तो उसी क्षण तुम दोनों की मौत हो जाएगी.
सम - इतना कह कर ऋषि जाने लगा तो मैने और मेरी पत्नी ने उनके चरना पकड़ लिए.
सम – ऋषिवर हमें क्षमा कर दीजिये हमें इस तरह श्राप मत दीजिये . हम नादाँ है. जवानी के जोश में हम से गलती हो गयी ऋषिवर हमारी जिंदगी यु बर्बाद न कीजिये. यदि आप क्षमा नहीं कर सकते तो निसंदेह आप हमें इस क्षण मृत्यु दंड दे दीजिये. भला हम साडी जिंदगी यहाँ कैसे बिताएंगे. हमारे घर का क्या होगा हमारे राज्य का क्या होगा. हमें क्षमा कर दीजिये रिश्वर
ऋषि – नहीं तुम्हे क्षमा नहीं मिल सकती.
गम – आप तो ऋषि है ज्ञानी है, दया के सागर है. ऋषिवर आप तो जगत कल्याण के लिए तप करते है . फिर आप हम जैसे नदनो को क्षमा क्यों नहीं कर सकते. आप hi हमें दंड दे देंगे तो हम किस से क्षमा मांगेगे. कृपया हमें क्षमा कर दीजिये.
ऋषि – मेरा श्राप वापस नहीं जा सकता अब रहना तो तुम्हे यही पड़ेगा. किन्तु तुम दोनों की उम्र और उसके बहकावे में की गयी गलती को देखते हुए मए अपने श्राप की उम्र घटा जरूर सकता हु. मए यहाँ ये मानचित्र जो स्वर्ण मणि तक पहुंचने का मार्ग बताता है. इसी को अपने पास बुरी शक्तियों से बचने के लिए यहाँ छुप कर तप कर रहा था. जिससे मए इसके असली हक़दार के आने तक अपने पास रख सकू. किन्तु तुम दोनों की वजह से अब ये बात उन बुरी शातियो तक पहुंच चुकी है. वो मेरा वध कर के भी ये मांचियरा मुझसे छीन लगे.
इसीलिए अब तुम दोनों का दंड ये है के तुम दोनों hi यहाँ खतरनाक मगरमच्छ बन के रहोगे और ये मानचित्र तुम्हरी पत्नी के पेट में रहेगा. तुम तक कई शक्तिया आएगी इसे हासिल करने के लिए किन्तु तुम स्वयं ये किसी को नहीं डोज. यदि उन्होंने ये मानचित्र हासिल करने के लिए तुम्हे मरने की कोशिश की तो तुम दोनों के मरते hi ये मानचित्र अनंत में खो जायेगा. फिर ये किसी को नहीं मिलेगा. न hi स्वर्ण मणि किसी को मिलेगी. तुम में से किसी एक को विवश आकर के दूसरे से ये मानचित्र माँगा गया और तुमने दिया तो तुम्हरे शरीरो में एक विस्फोट होगा जिससे तुम दोनों और वो तीसरा सब मरे जाओगे. किन्तु यदि किसी दिन कोई ऐसा आया जो तुम दोनों को मरे बिना तुम्हारी पत्नी के पेट से ये मानचित्र निकल लाएगा. उस दिन तुम लोग अपने असली रूप में आ जाओगे और मेरा श्राप ख़तम हो जायेगा. उसके बाद hi तुम लोग अपने राज्य में वापस जा पाओगे. किन्तु यद् रहे आने वाले हर व्यक्ति को तुम सिर्फ अपना दुश्मन hi मन के चलोगे. क्यों की यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो तुम दोनों की मृत्यु तय है.
इतना बता कर. सम चुप हो जाता है. और देव हाथ जोड़ कर आँखे बंद कर के
देव – हे ऋषिवर आप जो कोई भी है जहा कही भी है मए आपको शाट शाट नमन करता हु. आप जानते थे एक दिन मए यहाँ आउगा और ये मानचित्र हासिल करुगा. इसीलिए आपने इन्हे ये आदेश दिया था. आपकी बड़ी कृपा है जो आपने इस मानचित्र को सुरक्षित रखा. और अब आपके द्वारा कहे हुए सरे वाकया भी पूरे हो चुके है तो कृपया अब इन्हे अपने श्राप से मुक्त कीजिये और इन्हे फिर से इनके असली रूप में ले आइये.
देव के इतना कहते hi कही से एक रौशनी की किरण आती है और दोनों मगरमच्छो पे आकर लगती है. किरण का मगरमच्छो से टकराव होते hi दोनों मगरमच्छ इंसाने रूप में आ जाते है. जहा एक बेहद आकर्षक और सुन्दर राजकुमार खड़ा था. और उसके पास hi एक अति सुन्दर स्त्री जो की उसकी पत्नी थी.
रूद्र – अरे वाह भाई आप दोनों तो बहोत hi सुन्दर लग रहे है. अब अपना परिचय hi करा दो राजकुमार
………. मए वनराज का पुत्र हु राजकुमार वंशराज और ये मेरी धर्म पत्नी वानिकी
रूद्र – अति सुन्दर अब चले क्या यहाँ से बहोत ठण्ड लग रही है यार अभी बहार निकलने में भी समय लगेगा.
वंशराज – नहीं रूद्र कोई देर नहीं लगेगी. इतना कह कर वंशराज अपनी आंखे बंद करता है. तो सब वह से अदृश्य हो जाते है. और पल भर में hi सब निल सागर के किनारे खड़े थे. और अब उनमे से किसी के कपडे तक गीले नहीं थे.
रूद्र - वह यार हम तो तुरंत hi बहार आ गए. अब क्या इरादा है वंशराज और वानिकी. अब फिर से यहाँ समय बिताना चाहे तो हमारा ये महल सामने है जिसमे कल रत हम लोगो ने डेरा डाला था. चाहो तो कुछ दिन फिर से यहाँ नए विवाह का आनंद उठा लो
वानिकी - न बाबा माफ़ कीजिये बहोत आनंद उठा लिया और उसका फल भी मिल गया यदि घर में होते तो हमारे बच्चे घूम रहे होते अब तक. ये सब इनकी वजह से हुआ. अब मुझे जल्दी घर पहुंचना है वही जा कर चैन आएगा मुझे
रूद्र – देखा वंशराज मजा दोनों ने लिया और इल्जाम तुम्हरे ऊपर. ख़ैर परेशां मत हो हर जगह की औरतो का यही हाल है.
रूद्र की इस बात पर सब हसने लगते है.
देव - चलो अंत भला सो सब भला यहाँ की कहानी का अंत तो हो गया और सुखद अंत हुआ. आप दोनों को अपना घर मिल गया ये सबसे अच्छी बात है. चलिए अब वन में चलते है संभवतः वानरराज भी बेसब्री से हमरी hi प्रतीक्ष कर रहे होंगे.
वर – है देव चलिए घर षाले है.
वंशराज फिर से अपनी आंखे बंद करता है इस बार थोड़ा समय ज्यादा लगा. किन्तु फिर भी जल्द hi वो लोग वन में राजमहल के सामने खड़े थे. वो लोग सीधा अंदर जाते है. जहा वनराज बेचैनी से टहल रहे थे.
वंशराज – प्रणाम पिता श्री
वनराज पलट कर देखता है तो उसकी आँखों में आंसू आ जाते है. वो बहे फैला देते है तो वंशराज और वानिकी दोनों दौड़ते हुए उनके पैरो पे जा कर गिरते है. लेकिन वनराज उन्हें उठा के सेंस से लगा लेता है.
वनराज – मेरे बच्चो तुम लोग आ गए. मुझे यकीन था देव तुम्हे जरूर लाएगा
फिर थोड़ी देर के बाद सब लोग बैठ के बाते करने लगते है.
देव – महाराज आपने हमें पहले hi क्यों नहीं बता दिया के ये आपके पुत्र और पुत्रवधु है?
वनराज – क्यों के मए वह होने वाली लड़ाई को कमजोर नहीं करना चाहता था. यदि तुम जान जाते युराज तो इतनी बहादुरी से नहीं लड़ते तुम्हरे मन में एक संकोच होता प्रहार करते समय और यही पे ये दोनों श्राप के कारन तुम्हे नुकसान पंहुचा देते फल स्वरुप जीतता कोई भी नहीं किन्तु नुकसान जरूर हो जाता. इसीलिए मैने पहले से कुछ नहीं बताया. कई बार चुप रहने में hi जीत होती है. और देख लो जीत मेरी hi हुई आखिर में.
देव – जी महाराज और शायद यही वजह थी जिस वजह से आप हर किसी को इस वन से गुजरने नहीं देते थे.
वनराज – बिलकुल सही कहा आपने देव, क्यों की यदि हर कोई अपनी शक्तियों समेत यहाँ से निकल जाता तो मेरे बच्चो के लिए वह मुश्किलें ज्यादा कड़ी हो जाती . इनकी आधी मुश्किलें तो मए यही रोक देता था किन्तु कभी कभी यहाँ हुई गलतियों की वजह से इनका सामना भी बुरी ताक़तों से हुआ. पर इन्होने मिल के उन्हें हराया हर बार.
रूद्र – महाराज आपका सोचना सही था. इससे इन दोनों को यहाँ बैठे बैठे आप सहायता कर रहे थे. यही एक पिता का कर्त्तव्य भी है.
देव – महाराज अब हमें आज्ञा दे. हमें भी जाना है.
वनराज - ठीक है देव किन्तु अपना वचन मत भूलना अपने विवाह के पश्चात् तुम दोनों को एक लम्बे समय के लिए यहाँ इसी वन में रहना है हम सब के साथ.
देव – जरूर महाराज
वनराज - और मैने जो कहा था उसे भी याद रखना आप को कभी भी हमारी सहायता की आवश्यकता हो तो बेहिचक हमें यद् कीजिये गए हम सेना सहित आपके सामने होंगे.
देव – जी महाराज. अब आज्ञा?
वनराज – जाओ देव और स्वर्ण मणि को हासिल करने में विजय प्राप्त करो.
देवा और रूद्र अपनी आंखे बंद कर के वह से अदृश्य हो जाते है. और कुछ समय बाद वो लोग वापस तिलिस्म नगरी में खड़े थे.