A wedding ceremony in village - Page 21 - SexBaba
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A wedding ceremony in village

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लखन सिंह उस पुरे मेले की हर दूकान का टहल टहल कर निरिक्षण करने लगे. उनके दिमाग में वो सुबह वाला पत्र का एक एक शब्द चल रहा था की वो कौन सी वास्तु हो सकती है जो देवी एफ्रोडाइट को सबसे अधिक प्रिय थी. लखन सिंह जिस भी दूकान के सामने से गुज़रते वह मौजूद महिला उनका अभिवादन करते हुए अपनी दूकान में मौजूद सामान दिखते हुए ऐसे दर्शा रही थी की उसकी दूकान hi सही दूकान है और उसके पास hi सही नक्शा है.

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लखन सिंह बिंदी की दूकान के सामने से गुज़रे तो वह तरह तरह की सुन्दर बिंदिया थी. एक पल को उनके दिमाग में आया की बिंदी लगाने से औरत की सुंदरता बहुत बाद जाती पर क्या बिंदी सही वास्तु है.

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आगे सिन्दूर की दुकान थी उनके मन में ख़याल आया की सिन्दूर से hi औरत का सुहाग होता है बिना सिन्दूर के औरत सुहागन नहीं क्या सिन्दूर हो सकता है. जब वो इत्र की दूकान के सामने से गुज़रे तो वह से आती तरह तरह के इत्र की सुगंध ने बरबस hi उनका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया. इत्र का शौक तो उनको भी बहुत था और वह ऐसे ऐसे नेचुरल इत्र थे जिनकी कभी उन्होंने महक नहीं सूंघी थी. वो वह मौजूद अलग अलग इत्र को सूंघ कर उसका आनंद लेने लगे. वो भूल hi गए वो यहाँ एक महत्वपूर्ण कार्य से आए है. वह मौजूद महिला ने hi उन्हें उनका वास्तविक कार्य याद दिलाया.

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महिला: आपने बिलकुल सही चुनाव करा है, आप इतनी साड़ी दुकानों के सामने से गुज़रे पर कही आपका ध्यान विचलित नहीं हुआ पर इस दूकान से आती इत्र की मादक सुगंध ने आपको अपनी तरफ आने को मजबूर कर दिया. अब आप खुद hi सोचिये इससे ज्यादा महत्वपूर्ण वास्तु और क्या हो सकती है स्त्री के श्रृंगार की जो पुरुष को अपनी तरफ आकर्षित होने को मजबूर करदे.

लखन सिंह को भी कही न कही उसकी बाते सही लग रही थी. उन्होंने एक पल को मन में चिंतन करा और फिर उस दूकान से एक बेहद सुगन्धित इत्र की शीशी लेली. शीशी के साथ उस महिला ने एक नक्शा भी लखन सिंह के हाथो में थम दिया. लखन सिंह ने वो पत्र खोला जिसमे एक मार्ग दिशाओ के अनुसार दर्शाया गया और यहाँ से 20 कम दूर वो भवन दिखाया जा रहा था. लखन सिंह बिना देर किये वो इत्र की शीशी और वो नक्शा लेकर उस सफ़ेद घोड़े जिसपर बैठकर वो आए थे पर सवार होकर उस नक़्शे में दर्शाए मार्ग से होते हुए तेज़ गति से मंज़िल की तरफ बाद चले तकरीबन डेड घंटे में वो उस नक़्शे में दर्शाई जगह पर पहुंच चुके थे पर यहाँ भवन तो दूर दूर दूर तक कोई झोपडी भी नज़र नहीं आ रही थी.

जिसे ये तो साफ़ हो गया था की लखन सिंह ने गलत वास्तु चुन ली थी. उन्हें उस महिला पर बहुत गुस्सा आ रहा था पर यही तो परीक्षा थी कही न कही वो खुद से भी गुस्सा थे उन्होंने अपने चुनाव में थोड़ा और ध्यान देना चाहिए था. उन्होंने अपने सर के ऊपर चमकते सूर्य को देखा उसकी स्थिति से स्पष्ट था की अभी सूर्यास्त होने में लगभग 3 घंटे का समय शेष था यानि वो अब भी वापस जाकर सही वास्तु चुन सकते थे. वो बिना एक भी पल की देर किये दुबारा घोड़े पर सवार हो गए और तेज़ गति से वापस उस मेले की तरफ दौड़ पड़े. इस बार घोड़े की गति पहले से थोड़ी धीमी थी वो समझ गए की घोडा भी लगातार चलने के कारन प्यासा है. रास्ते में उन्हें एक तालाब दिखा जहा उन्होंने खुद भी पानी पिया और घोड़े को भी पानी पिलाया पर इस सबमे भी उनका कुछ समय व्यर्थ हो गया.

लखन सिंह (घोड़े को सहलाते हुए): दोस्त मेरे पास ज्यादा समय नहीं है मुझे तुम्हारी सहायता की ज़रूरत है प्लीज दोस्त मेरी मदद करो.

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जानवर भी प्यार की भाषा अच्छे से समझते है लखन सिंह के इस प्यार दुलार को देख उस श्वेत अश्व ने उत्तर में अपना सर झुका दिया. लखन सिंह ने आगे बाद कर उसके माथे को चूम लिया और दुबारा उस पर सवार हो गए. इस बार तो उस घोड़े की तेज़ी देखते hi बन रही थी. पानी पीने में समय लगने के बावजूद उस घोड़े ने डेड घंटे का सफर एक घंटे में पूरा करके लखन सिंह को दुबारा उस मेले तक पंहुचा दिया. लखन सिंह दुबारा मेले में दाखिल हो गए. सबसे पहले उन्होंने वो इत्र की दूकान ढूंढ़नी चाही पर वो हैरान थे क्युकी वो दूकान अब वह से गायब थी. शायद लखन सिंह को भ्रमित करने का उसका काम पूरा हुआ इसलिए वो दूकान हटा दी गई.

अब लखन सिंह बाकी दुकानों को ध्यान से देखने लगे, वो जानते थे की अब उनके पास बस एक मौका और है क्युकी अगर इस बार फिर उन्होंने गलत वास्तु चुनी तो दुबारा इतनी दूर जाकर वापस आना और फिर तीसरी बार कोई वास्तु लेकर सूर्यास्त से पहले अपनी मंज़िल तक पहुंच जाना संभव नहीं होगा और शायद ये घोडा भी इतना सफर नहीं कर पाएगा. इसलिए इस बार उन्हें जो भी चुनना है बड़े ध्यान से दिमाग लगा और सुबह का पत्र याद करके hi चुनना होगा. उन्हें समझ नहीं आ रहा था वो क्या चुने सिन्दूर, बिंदी, लिपस्टिक अचानक वो साड़ी की दुकान के सामने पहुंचे और साड़ी की दूकान को निहारने लगे. वह दूकान में तरह तरह आकर्षक साड़ी थी.

लखन सिंह (मन में) : क्या साड़ी वो वास्तु हो सकती है.

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लखन सिंह वह मौजूद सारियो को हाथ में लेकर महसूस करने लगे. वह कांचीवरम, बनारसी, जोधपुरी, बंगाली तरह तरह की साड़ी. मन hi मन वो विनीता जी को इन सरियो में इमेजिन कर रहे थे की इन सरियो में कितनी सुन्दर लगेगी. वो विनीता जी के लिए ये साड़ी लेना छह रहे थे उनका दिल कह रहा था की यही सही वास्तु है सती. अचानक उनकी नज़र एक साड़ी पर पड़ी जिसमे छोटे छोटे कांच के गोल टुकड़े लगे थे जिसमे लखन जी को अपना प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा था. और उस शीशे पर नज़र पड़ते hi उनके ज़हन में सुबहब वाले पत्र की वो लाइन क्लिक करि की देवी एफ्रोडाइट को श्रृंगार का बहुत शौक था और उनका काफी समय खुद को आईने में निहारते हुए बीतता था. और लखन सिंह उन सारियो को वही छोड़ कर उस दूकान को ढूंढ़ने लगे जहा उन्हें वो वास्तु मिलने वाली थी जो देवी अफोर्डिते को सबसे अधिक प्रिय थी. और जल्द hi लखन सिंह उस दूकान थी और वो दूकान थी दर्पण की दूकान.

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लखन सिंह ने वह से एक सुन्दर सा दर्पण लिया और उस दर्पण के साथ उस महिला ने उन्हें एक और नक्शा दिया. नक़्शे में 12 कम दूर की एक जगह दिखाई गई थी.

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लखन सिंह ने उस महिला को धन्यवाद करा और एक बार फिर अपने घोड़े पर सवार होकर उस नक़्शे में बताई जगह के लिए निकल पड़े. सूर्यास्त होने में अब भी लगभग 1:30 घंटे का समय बाकी था और लखन सिंह का घोडा तेज़ गति से अपनी मंज़िल की तरफ दौड़ा जा रहा था. लखन सिंह 10 कम का सफर पूरा कर चुके थे पर इसके आगे उन्हें रुक जाना पड़ा क्युकी आगे एक महिला उनका रास्ता रोके कड़ी थी. उस जगह पर आस पास के वातावरण में उन्हें बेहद भीनी भीनी मादक कामुक सुगंध आ रही जिसके सामने उस इत्र की सुगंध भी फ़ैल थी. लखन सिंह ने उस महिला से रास्ता रोकने का कारन पुछा.

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लखन: देवी जी आप मेरा मार्ग क्यों रोके हुए है मुझे कही पहुंचना है जल्द से जल्द.

महिला: मई जानती हु और मेरी यहाँ उअप्स्थिति इस बात का प्रमाण है की आप सही रस्ते पर है पर आपका रास्ता मुझसे होकर hi आगे जाता है.

लखन: मतलब मई कुछ समझा नहीं.

महिला: आपको ये भीनी भीनी सुगंध महसूस हो रही है.

लखन: है हो तो रही है बहुत hi अच्छी सुगंध है.

महिला: ये मेंहदी के पौधों की सुगंध है. आपको सुबह जो पत्र मिला था उसमे भी मेंहदी का ज़िक्र था याद है न आपको.

लखन सिंह( याद करते हुए): है याद आया उस पत्र में बताया गया था की देवी एफ्रोडाइट के शरीर से मेंहदी की बड़ी hi मादक सुगंध आती थी जिसे सूंघने वाला दीवाना हो जाता था.

महिला: मतलब अपने वो पत्र बड़े ध्यान से पड़ा था बिल्कुक सही कहा आपने. अब इस मेंहदी की भी आज की पूजा में महत्वपूर्ण जगह है, यहाँ से थोड़ी hi दूर मेंहदी के पौधों का बाग़ है. आपको वह जाना है और वह से मेंहदी की पत्तिया तोड़ kar.unhe पीस कर उसका लेप इस पत्र में भरकर मेरे पास वापस लाना है. (महिला ने एक जग नुमा पत्र लखन की तरफ बड़ा दिया जो लगभग 1 लीटर का होगा). पत्तो को पीसने के लिए सिलबट्टा और पत्थर वही रखा है.

लखन सिंह ने सोचा था वो सूर्यास्त से पहले hi जल्द अपनी मंज़िल तक पहुंच जाएगा पर इस नए कार्य ने उसकी समस्या को बड़ा दिया उसे जल्द से जल्द ये कार्य करना होगा.

महिला: किस सोच विचार में डूब गए आप मेंहदी तो आपको लानी hi होगी क्युकी आपकी लाइ गई इस मेंहदी से hi आपकी पत्नी का श्रृंगार होगा उनके हाथ पैरो में आपकी लाइ हुई मरनहदि hi लगाई जाएगी.

जब लखन सिंह को ये पता चला की उसकी लाइ हुई मेंहदी से hi विनीता जी का श्रृंगार होगा अब तो उन्हें हर हालत में विनीता जी के लिए अच्छी से अच्छी मेंहदी लानी hi थी वो भी नियत समय के अंदर. लखन सिंह ने तुरंत वो जग उस महिला के हाथ से ले लिया और उस सुगंध की दिशा में चल पड़ा. कुछ hi पल बाद वो उस मेंहदी के बाग़ में पहुंच चुके थे.

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पूरा वातावरण मेंहदी की सुगंध से महक रहा था. वही पास में रखा सिलबट्टा और पत्थर भी लखन सिंह को दिख गया. लखन सिंह ने समय व्यर्थ न करते हुए मेंहदी के पौधों की कुछ बड़ी बड़ी डालिये तोड़ ली और उनके पत्ते छांटकर उन्हें सिलबट्टे पर रखकर पीसना शुरू कर दिया. लखन सिंह को घर पर सिलबट्टे पर चटनी पीसने का एक्सपीरियंस था इसलिए ये काम उनके लिए नया नहीं था. बस समस्या थी समय जो बिना रुके लगातार आगे बढ़ता जा रहा था और यहाँ लखन सिंह सिलबट्टे पर मेंहदी पीस रहे थे.

लखन सिंह के हाथ तेज़ तेज़ चल रहे थे वो पत्ते तोड़ तोड़ कर सिलबट्टे पर लेकर उसे पीस पीस कर उसका लेप उस जग में भरते जा रहे the.Aadhe घंटा हो चूका था पर अभी भी वो जग पूरा नहीं भरा था पर फिर भी वो थोड़ा रिलैक्स थे क्युकी यहाँ से केवल 2 कम का सफर शेष था जो घोड़े पर बैठकर वो आराम से 10 मं में पूरा कर लेंगे और सूर्यास्त से पहले अपनी मंज़िल तक पहुंच जाएंगे. 15 मं और पीसना बहाने के बाद लखन सिंह ने वो पूरा जग मेंहदी के लेप से भर दिया. काम समाप्त कर वो तेज़ी से वो जग लेकर उस जगह पर वापस लौटे जहा वो महिला कड़ी उनका इन्तेज़ाआर कर रही थी पर अब वो लखन सिंह के घोड़े पर बैठी थी. लखन सिंह वो जग नुमा पात्र लेकर उस महिला के हाथ में दे दिया.

महिला: वाह आप ले आए पर काफी ज्यादा समय लग गया आपको. खैर मई उसी भवन पर जा रही आप भी सूर्यास्त से पहले वह पहुंच जाइएगा मई आपको वही मिलूंगी. और है आपका घोडा ले जा रही अब 2 कम का सफर पैदल थोड़ी न जाउंगी. शीघ्रता करिये सूर्यास्त होने में अब सिर्फ आधा घंटा hi शेष है.

इतना कहकर वो महिला घोडा लेकर चली गई और लखन सिंह बेचारा सा मुँह लेकर वही खड़े रह gae.Ab बेचारे लखन सिंह क्या कह और कर सकते थे. वो तो इस उम्मीद में थे की घोड़े पर बैठकर जल्द hi ये सफर पूरा कर लेंगे पर घोडा तो वो महिला ले गई और अब बचे हुए 2 कम उन्हें पैदल hi पुरे करने थे. लखन सिंह ने नक़्शे को गौर से देखा और तेज़ गति से पैदल hi अपनी मंज़िल की दिशा में दौड़ पड़े.

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सूर्य धीमे धीमे अस्त होने की तरफ बढ़ता जा रहा था और लखन सिंह अपनी पूरी ताकत से अपनी मंज़िल की तरफ दौड़े जा रहे थे. सूर्य और लखन सिंह में एक अलग hi रेस सी चल रही थी देखना था ये रेस कौन जीतता है.
 
प्लीज जब स्टोरी को रीड करे तो ऊपर जहा थ्रेड रेटिंग के स्टार्स बने है वह ज्यादा से ज्यादा स्टार्स देकर इस स्टोरी की रेटिंग को इम्प्रूव करे जब स्टोरी को छोड़ा था तब 5 स्टार थे अब केवल 2 स्टार hi दिख रहे और मुझे नहीं लगता की मेरी स्टोरी 2 स्टार डेसेर्वे करती है जो लोग कमेंट नहीं करते वो एटलीस्ट इतना तो कर hi सकते hi की थ्रेड रेटिंग में फाइव स्टार्स दे.
 
लखन सिंह अपनी पूरी जान लगाकर दौड़ रहे थे और साथ hi सूर्य के अस्त होने की तरफ भी अपनी नज़रे जमाए हुए थे. कुछ hi मिनट बाद लखन सिंह को सामने थोड़ी दूर पर एक सुन्दर भवन नज़र आने लगा था जो रंग बिरंगी रौशनी से जगमगा रहा था और जिसके द्वार पर देवी एफ्रोडाइट की एक प्रतिमा भी कड़ी थी. यानि यही वो जगह था जहा इस गृह शांति पूजा का ग्रैंड फिनाले यानि आखिरी चरण पूरा होना था.

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लखन सिंह ने अपनी गति और तेज़ करदी और सूर्यास्त होने से पहले वो उस भवन के गेट पर पहुंच भी गए पर गेट पर खड़े द्वारपाल ने उन्हें अंदर घुसने से रोक दिया. और हैरानी की बात ये थी की वो द्वारपाल भी एक महिला थी. आज की ग्रहपूजा में उन्हें सुबह से केवल और केवल महिलाए hi मिली थी.

द्वारपाल: ठहरिये आप देवी एफ्रोडाइट के इस भवन में ऐसे अंदर प्रवेश नहीं कर सकते.

लखन सिंह (हफ्ते हुए): फिर ह्म्म्मम्फ़्फ़ हम्म क्या ह्म्मम्फ़्फ़ करना होगा ह्म्मम्फ अंदर जाने के लिए.

Dwaarpaal:Arpan और समर्पण

लगन: अर्पण ह्म्मम्फ समर्पण मतलब.

द्वारपाल: पुष्प अर्पण इस भवन के चारो तरफ पुष्प वाटिका है जहा तरह तरह के पुष्प लगे है आपको वह से देवी एफ्रोडाइट के प्रिय पुष्प को लेकर देवी एफ्रोडाइट के चरणों में अर्पण करना है और पुष्प का चुनाव ध्यान से करना अगर आपने गलत पुष्प चुना तो इस भवन के द्वार आपके लिए बंद हो जाएंगे. और शीघ्रता कीजिये सूर्यास्त होने में कुछ hi पल शेष है.

इतना सुनते hi लखन सिंह उस भवन के बगल में बानी पुष्प वाटिका में घुस गए. वह तरह तरह के पुष्प लगे बेला, चंपा, चमेली, Mogra,Gulaab, राजनीगँधक, गेंदा, गुड़हल और भी कई. पर इस बार लखन सिंह के मन में कोई दुविधा नहीं थी उन्हें पता था उन्हें कौन सा फूल चुनना है, वो सीधा गुलाब के पौधे के पास गए और वह से एक सुन्दर गुलाब का फूल ले लिया और तेज़ी से देवी एफ्रोडाइट की प्रतिमा के पास पहुंच गए. उन्होंने वो गुलाब का पुष्प उस द्वारपाल महिला को दिखाया और उसने भी मुस्कुराते हुए सहमति में अपना सर हिला दिया.

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द्वारपाल: अब आपको ये पुष्प देवी एफ्रोडाइट के चरणों में अर्पित करते हुए खुद को उन्हें समर्पित करना होगा. आपको अपना पूर्ण समर्पण करना होगा की आगे आज की साधना में जो भी कार्य होंगे आप बिना पीछे हेट उन्हें पूरा करेंगे. ऐसा करने के बाद hi आपको अंदर प्रवेश मिलेगा. पर ध्यान रहे एक बार समर्पण करने के बाद आप पीछे नहीं हैट सकते.

लखन सिंह के लिए पीछे हटने का तो सवाल hi नहीं उठता था. और अब तक एंटनी साडी विधिया पूरी करने के बाद इस आखिरी पड़ाव पर पीछे हटने का तो सवाल hi पैदा नहीं होता था. इसलिए उन्होंने बिना देर किये वो गुलाब का पुष्प देवी एफ्रोडाइट के चरणों में अर्पित करा. और खुद के समर्पण की भी शपथ ली.

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लखन सिंह: मई लखन सिंह पुत्र श्री दर्शन सिंह आज की साधना के लिए खुद को पूरी तरह से देवी एफ्रोडाइट को समर्पित करता हु, आगे इस साधना में जो भी कार्य होगा मई बिना पीछे हेट उन्हें पूरा करूँगा. हे देवी कृपया मुझे अपने भवन में प्रवेश करने की अनुमति दे.

इसी के साथ उस द्वारपाल महिला ने उस भवन के दरवाज़े खोल दिए और लखन सिंह उसे भी धन्यवाद करके भवन के अंदर प्रवेश कर गए. अंदर वही महिला जिसे उन्होंने मेंहदी वाला पात्र दिया था उनका इन्तेज़ाआर कर रही थी

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महिला: आखिर आप समय से यहाँ आ hi गए. मानना पड़ेगा इस उम्र में भी आपकी फुर्ती और तेज़ी किसी नौजवान युवक को भी पीछे छोड़ दे. सुना है अपने दंगल में अपने से आधी उम्र के खुद से तगड़े पहलवान को हरा दिया था. और सभी ग्रहो की पूजा के सभी चरणों को बड़ी कुशलतापूर्वक पार कर लिया. सच में इसके लिए आप बधाई के पत्र है.

लखन: वैसे इन सबमे मई अकेला नहीं था इनसबमे विनीता जी का भी बराबर का योगदान या यु कहु शायद उनका योगदान मुझसे भी ज्यादा था. मई तो अपने परिवार के लिए ये सब कर रहा था पर उन्होंने जिस तरह बिना किसी स्वार्थ के ये सब करा उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती.

महिला: बिलकुल सही कहा आपने उनकी जितनी प्रशंशा की जाए कम है. और ये सब आप दोनों के सम्मिलित प्रयासों का hi परिणाम है जो आप इस साधना के आखिरी पड़ाव तक पहुंच गए है. बस आपकी गृह शांति की पूजा संपन्न होने केवल आज की रात शेष है बस जिस तरह अब तक आप दोनों का सहयोग करके पूजा के हर चरण को पूरा करा है आज रात के बचे हुए चरण और पुरे कर ले.

लखन: बिलकुल हमारा भी यही प्रयास रहेगा. वैसे विनीता जी कहा है क्या वो भी इसी भवन में है.

हम्म वो भी यही है पर आप उनसे अभी नहीं मिल सकते क्युकी वो भी इस वक़्त अपनी एक अलग तरह की साधना में लीं है और अब आपकी और उनकी मुलाकात रात में hi हो पाएंगी. पूजा के आगे के चरण आपके और उनके साथ रात 9 बजे तक hi प्रारम्भ होंगे तब तक आप 3-4 घंटे विश्राम कर ले ताकि रात की पूजा के लिए आपको किसी तरह की थकावट न रहे, आइये मई आपको आपका विश्राम कक्ष दिखा देती हु.

वो महिला लखन सिंह को एक कमरे तक ले आई.

महिला: अब आप यहाँ 3-4 घंटे आराम करिये, मेरी आपकी मुलाकात अब रात 9 बजे पूजा के अगले चरण के समय hi होगी ठीक है.

इतना कह कर वो महिला वह से चली गई. कमरे में एक आरामदायक बिस्तर था बिस्तर के किनारे ताज़े फलो की टोकरी राखी थी. और खिड़कियों से आती हवा अलग hi आनंद की अनुभूति करा रही थी. लखन सिंह सुबह से भूके भी थे उन्होंने पहले तो बिस्तर के सिराहने रखे फल खाए और फिर बिस्तर पर लेट गए. इस पूजा के प्रारम्भ से अब तक लकह सिंह को कभी ज़मीन, कभी जंगल कभी पत्तो पर सोना पड़ा था अब जेक उन्हें एक आरामदायक बिस्तर नसीब हुआ था इसलिए बिस्तर पर लेटते हुए सफर से थके होने के कारन उन्हें नींद आ गए. पूजा के शुरूआती चरण तो लखन सिंह ने थोड़ी बहुत दिक्कत के बावजूद बड़ी सरलता से पुरे कर लिए थे अब देखना ये था की आगे आने वाले चरणों में क्या नै चुनौती उनकी प्रतीक्षा कर रही थी.

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एंड थैंक्स माय डिअर रीडर्स

मेरी एक रिक्वेस्ट के बाद hi स्टोरी की थ्रेड रेटिंग तवो स्टार से थ्री स्टार हो गई जो डेफिनेटली कुछ रीडर्स जिन्होंने थ्रेड रेटिंग में फाइव स्टार टच करने से हुआ है सो जिन रीडर्स ने भी उन स्टार्स को टच करके रेटिंग को बढ़ाया है उनका शुक्रिया पर अब भी थ्री स्टार्स hi ही इसे फाइव स्टार बनाने में हेल्प करे क्युकी मुझे लगता है थिस डेसेर्वेस तो बे फाइव स्टार.

तो प्लीज जिन रीडर्स ने भी थ्रेड रेटिंग में स्टार्स नहीं दिए पेज सिलेक्शन के बगल में दी गई थ्रेड रेटिंग में फाइव स्टार सेलेक्ट करके इस स्टोरी को फाइव स्टार बनाने अगर आपको मेरी राइटिंग पसंद है और आप इस स्टोरी को रेगुलरली रीड कर रहे है तो इसकी रेटिंग भी तो बढाइये. आईटी डोंट टेक ुर मच टाइम जस्ट ा क्लिक.
 
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इधर श्रृंगार भवन में हुए श्रृंगार के बाद आज विनीता का रूप रंग अलग hi निखार कर आ रहा था. उसके बदन की पूरी वैक्सिंग की गई थी जिस वजह से बदन पर एक भी बाल नहीं था. यहाँ तक की उसकी छूट भी आज पूरी तरह साफ़ और चिकनी थी. एक खास तरह के तेल से उसके बदन की ऊपर से नीचे तक मालिश करि गई थी जिससे उसके बदन की त्वचा में अलग hi निखार आ गया था और सिर्फ इतना hi नहीं उस मालिश की वजह से उसके त्वचा में थोड़ा कसाव भी आ गया था और सिर्फ उसके बदन की hi नहीं उसके स्तनों की भी मालिश करि गई थी जिस वजह से विनीता के स्तन में भी काफी कसावट आ गई थी, हलाकि आज तक उसकी सुहागरात नहीं हुई थी जिस वजह से उसके स्तन पहले hi काफी कैसे हुए थे पर इस खास तेल ने तो उन्हें ऐसा बना दिया था की देखने में किसी 28 साल की महिला के नहीं बल्कि 18 साल की लड़की के स्तन लग रहे थे.

उसके चेहरे पर एक खास तरह का लेप लगाया गया था जिससे उसका चेहरा किसी नै जवान हुई लड़की जैसा प्रतीत हो रहा था. उसके अधरों पर एक खास प्राकृतिक रास का लेपन किया गया था जिससे विनीता के होंठ एकदम गुलाब की पंखुड़ियों से प्रतीत हो रहे थे. और उसके बाल उफ़ उनका तो कहना hi क्या वनो में पाए जाने वाले एक ख़ास प्रक्त्रिक जल से उसके बालो को धोया गया था जिससे विनीता की ज़ुल्फो ने उसकी सुंदरता को और भी ज्यादा बड़ा दिया था. स्वर्ग की अप्सराए उर्वशी रम्भा मेनका बहुत सुन्दर थी ये तो बस सुना है पर अगर वो आज विनीता को देख लेती तो शायद उन्हें भी उससे ईर्ष्या हो जाती.

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श्रृंगार का प्रथम चरण पूरा हो चूका था अब यहाँ से विनीता को उसी भवन में जाना था जहा लखन जी को जाना था. और जहा लखन जी की लाइ हुई मेंहदी से भी विनीता का श्रृंगार होना था.

वो महिला : हमारी बग्घी तैयार है अब हमे यहाँ से अपने अगले पड़ाव के लिए प्रस्थान करना है जहा आपकी गृह शांति पूजा के बाकी के सभी चरण पुरे होंगे. लखन जी अपने दिए सारे कार्य पुरे करके वही पहुंच जाएंगे.

विनीता : जी

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विनीता और वो महिला बग्घी में बैठ कर उसी भवन के लिए निकल पड़े जहा लखम सिंह गए थे. करीब 3 घंटे के सफर के बाद विनीता उसी भवन पर पहुंच गए जहा देवी एफ्रोडाइट की प्रतिमा लगी थी. वह वही महिला उनका इन्तेज़ाआर कर रही थी जिसने आगे चल कर लखन सिंह को उनका कमरा दिखाया था.

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दूसरी महिला : इस भवन में प्रवेश करने से पहले आप देवी एफ्रोडाइट की प्रतिमा को प्रणाम करे और उनके सामने ये समर्पण करे की अब आगे इस पूजा में देवी एफ्रोडाइट को प्रसन्न करने का हर संभव प्रयास करेंगी.

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विनीता ने देवी एफ्रोडाइट को प्रणाम करा और आज की पूजा के लिए खुद को पूरी तरह उन्हें समर्पित करने का वचन दिया. इसके बाद वो दूसरी महिला विनीता को लेकर उस भवन के अंदर एक खास कक्ष में ले गई जहा एक बड़ा सा कमरा था पर कमरे में केवल एक बिस्तर पड़ा था जिसपर एक मखमली गद्दा पड़ा था और उसके सिरहाने एक आरामदायक कुर्सी पड़ी थी. विनीता को लग रहा था शायद ये उसका आराम कक्षा है और ये बिस्तर उसके आराम के लिए है. पर उस महिला ने वो भ्रम तोड़ दिया.

महिला : देवी एफ्रोडाइट यानि गोड्डेस्सेस वीनस से सम्बंधित कुछ बाते लखन जी को और कुछ बाते आपको बताई गई जिन पर अब तक आपकी सभी करिये आधारित रही पर एफ्रोडाइट से सबंधित एक बात है जो अब तक आप दोनों में से किसी को नहीं बताई गई. और आपकी अब होने वाली क्रिया एफ्रोडाइट की उसी बात पर आधारित है. यु तो एफ्रोडाइट को सुंदरता और काम इच्छा की देवी कहा जाता पर समाज एक विशेष वर्ग है जो देवी एफ्रोडाइट को विशेष रूप से पूजता है जिसे समाज काफी तिरस्कार भरी नज़रो से देखता है पर देवी एफ्रोडाइट की उस वर्ग पर विशेष कृपा रहती है. और वो वर्ग है वैश्यों का वर्ग.

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वैश्या समाज देवी अफोर्डिते को विशेष रूप से पूजा जाता है. वैश्याए समाज में अतृप्त लोगो की हर तरह की काम वासना की इच्छाओ को अपना जिस्म देकर पूरा करती है. अगर समाज में ये वर्ग न होता तो शायद कुछ लोगो के अंदर दबी काम इच्छाए पता नहीं कौनसा विकृत रूप लेकर समाज में बहार आती, आए दिन सामने आने वाली बंग की घटनाए इसका जीता जगता सबूत है सोचो अगर वैश्याए न होती तो ऐसी घटनाओ की संख्या कितनी अधिक होती. लोग वैश्याओ को किसी भी नज़र से देखे पर अगर आप ध्यान से सोचे तो कही न कही वो खुद को गन्दा करके लोगो के अंदर छिपी गंदगी को साफ़ करने का काम करती है.

उस महिला की बातो ने कही न कही विनीता के मन पर विशेष प्रभाव डाला था. उसने आज तक वैश्याओ को बड़ी हीं नज़रो से देखा था पर इस तरह से तो उसने कभी सोचा भी नहीं था. पर अब भी उसके दिमाग में एक hi सवाल चल रहा था की अगर देवी एफ्रोडाइट और वैश्याओ का ये सम्बन्ध और विनीता की आज की पूजा की विधियों में क्या सम्बन्ध और विनीता को ये सब क्यों बताया जा रहा है.

विनीता : वैसे आपको देवी एफ्रोडाइट और वैश्याओ की उनमे आस्था के बारे में काफी पता है, और वैश्याओ के बारे में जिस तरह आपने बताया है वो भी काबिले तारीफ है.

महिला : वो इसलिए क्युकी मई भी एफ्रोडाइट की एक उपासक हु और एक वैश्य hi वैश्याओ के बारे में सबसे अच्छे से बता सकती है.

विनीता हैरानी से : मतलब की आप भी एक....

महिला : जी हां मई भी एक वैश्या हु. जो मर्दो को काम सुख देने की हर विधा में महारत रखती हु. और देवी एफ्रोडाइट की आगे की पूजा सिर्फ वही कर सकती है जो इस काम क्रिया में पूर्ण महारत रखती हो.

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विनीता दुबारा हरिआन होते हुए : मतलब आपके कहने का मतलब क्या है यहाँ से आगे की साधना आप पूरी करेंगी.

महिला : नहीं साधना तो आपको hi पूरी करनी है पर इसके लिए आपको अंदर से वैश्या के सामान फील करना होगा, हर स्त्री में काम इच्छाए होती है बस कुछ में वो बेहद कम होती है कुछ में मद्धम और कुछ औरतो में हद से ज्यादा प्रबल आपको भी अपने अंदर प्रबल काम इच्छाओ को जगाना होगा. और एक मर्द को किस तरह चरमसुख तक ले जाया जाता है उस हर क्रिया में आपको महारत हासिल करनी होगी. और वो सब आपको मई सिखाऊंगी वो भी आज यही इसी कमरे में.

विनीता की तो हवइया hi उड़ गई दिन की शुरुआत में जब उसका श्रृंगार हुआ था तब तो उसे लगा था लगता है आज सब नार्मल नार्मल होगा बढ़िया बढ़िया होगा पर अब उसे अंदर से एक वैश्या जैसा फील करने को बोलै जा रहा था और एक वैश्या जिस तरह अपने ग्राहकों को खुश करती है वो सब चीज़े सीखने को कहा जा रहा था. विनीता मन hi मन सोच रही थी की पहले hi नवग्रह पूजा उसे अपनी सहेली के ससुर के साथ क्या क्या करवा चुकी है अब क्या उसे वैश्या बनाने पर तुली है.

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विनीता अपने सोच विचार में डूबी थी, विनीता को इस तरह सोचता देख वो महिला विनीता के मन की दुविधा को समझ गई.

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महिला : क्या हुआ क्या सोचने लगी आप.

विनीता : क्या मई पूछ सकती हु की ये सब मुझे क्यों करना है और आप ये सब मुझे किस तरह सिखाएंगी.

महिला ने कास कर ताली बजे और एक लंगोट धारी हत्ता कट्टा आदिवासी युवक एक दुसरे दरवाज़े से कमरे में दाखिल हुआ. उसके बदन पर लंगोट के अलावा कोई वस्त्र नहीं था और बदन इतना हत्ता कट्टा और कैसा हुआ की कोई भी औरत उसे देख कर कामुक हो जाए.

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पर विनीता का मन उस हटरे काटते मर्द को देख कर अनेक सम्भावनाओ से भर उठा क्या उसे इस मर्द के साथ काम क्रिया करनी होगी नहीं तो कैसे सिखाएंगी ये मुझे.

महिला : मई जानती हु की आपके मन में कई सवाल चल रही आप बेझिझक पूछ सकती है मुझसे.

विनीता : आप मुझे काम क्रियाए सीखने को कह रही है तो क्या मुझे इनके साथ......

महिला विनीता की बात को बीच में hi काटते हुए : नहीं नहीं आपको कुछ नहीं करना आपके लिए तो आरामदायक कुर्सी राखी है,

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महिला : आपको तो सिर्फ इस कुर्सी पर बैठना और सिर्फ मुझे देखना है जो करना है वो मई करुँगी आपको तो सिर्फ जो मई कर रही हु उसे अंदर hi अंदर महसूस करना है. आपको सिर्फ ऐसा फील करना की जैसे मेरी जगह आप हो ताकि आपको अंदर से एक वैश्या जैसे फीलिंग हो सके. और जिस तरह मई इस मर्द को इसके चरमसुख तक ले जाती हु वो सारे तरीके आपको आत्मसात करने होंगे यानी सीखने होंगे. और रही बात आपके दुसरे सवाल की आपको ऐसा क्यों करना है तो वो सिर्फ इसलिए क्युकी आपकी आज रात की पूजा का आखिरी चरण एक वैश्या की फीलिंग्स के साथ कर सके ताकि आपकी पूजा को देवी एफ्रोडाइट का पूर्ण आशीर्वाद मिले. क्युकी मई आपको पहले hi बता चुकी वैश्याओ पर देवी एफ्रोडाइट की विशेष कृपा रहती है तो अगर उन्हें ऐसा महसूस हो की उनकी पूजा करने वाली स्त्री भी एक वैश्या है तो आपको उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होगा. आप ऐसा न सोचिये की आपको सच में वैश्या बनना है.

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उस महिला की बातो को सुनकर विनीता की थोड़ी सास में सास आई क्युकी वो अब भी अंदर से कुंवारी थी और वो अपना कुंवारापन यही किसी भी अनजान शक्श को नहीं दे सकती थी, ये सब उसके चरित्र के खिलाफ था. एक तरफ गरिमा थी जो चाँद कामुक घटनाओ के वशीभूत होकर इस कदर चरित्रहीन हो गई की एक बाप बेटे से एक साथ सम्बन्ध बनाना भी उसे गलत नहीं लग रहा था वही दूसरी तरफ विनीता थी जो इतने दिन से एक पुरुष के साथ अकेले रह रही थी जिसे साथ साथ पूजा के प्रारम्भ से अब तक कई बार कामुक परिस्थितियों से दो चार होना पड़ा पर इन सबके बावजूद उसका कौमार्य अब तक बरकरार था. विनीता की यही बात उसे बाकी सभी सहेलियों से अलग बनती थी.

महिला : अब तो आपके मन की साड़ी दुविधा समाप्त हो गई.

विनीता : जी

महिला : तो क्या अब हम अपना ये चरण जिसका नाम है वैश्या आकर्षणं यानी एक वैश्या का आकर्षण उसे प्रारम्भ करे.

विनीता : जी

महिला : अच्छा एक बात तो मई आपको बताना भूल hi गई की आपको ये सब देखते हुए मेरी जगह तो खुद को फील करना होगा hi पर इस पुरुष की जगह भी किसी और को फील करना होगा अपने पति को.

विनीता : अपने पति को ( विनीता मन में सोचते हुए की उसके पति और उसके बीच तो कभी किसी तरह का कोई आकर्षण नहीं रहा फिर वो पति को लेकर क्या फील करेगी )

महिला : और है अपने असली पति को नहीं बल्कि जिनके साथ आपका विवाह गदभंडान इस पूजा के प्रारम्भ में हुआ उन्हें इमेजिन करके.

विनीता : मतलब लखन जी को.

महिला : जी है लखन जी को. मुझे और इस पुरुष को वो सब करते हुए देखते हुए और हमारे स्थान पर खुद को और लखन जी को इमेजिन करते हुए आपको वैश्या आकर्षणं की ये विधि पूरी करनी होगी. यही आपकी असली चुनौती है. और ध्यान रखियेगा अगर आपने अपनी फीलिंग्स में ज़रा भी धोका किया तो आपको देवी एफ्रोडाइट का आशीर्वाद बिलकुल भी प्राप्त नहीं होगा और इतने दिनों की आपकी और लखन जी की साड़ी म्हणत बेकार हो जाएगी.

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उस महिला के ये शब्द सुनकर विनीता की नसों में खून का दौडान और तेज़ हो गया उसका थूक हलक से नीचे भी नहीं जा रहा था. अगर केवल देखने की hi बात होती तो वो जैसे तैसे एक पोर्न मूवी की तरह ये सब देख कर ख़तम कर देती पर अब तो उसे खुद को लखन जी के साथ इस सिचुएशन में इमेजिन करना था. भला वो कैसे खुद को लखन जी के साथ ये सब करते हुए इमेजिन कर सकती थी. पर इतने दिनों की साड़ी म्हणत वो यही व्यर्थ भी तो नहीं जाने दे सकती थी. कुछ भी हो उसे ये चरण भी पूरा करना होगा वो भी पूरी सच्चाई के साथ.

महिला : तो बोलिये क्या आप तैयार है.

विनीता : जी मई तैयार हु.

महिला : वैसे आपकी सहायता के लिए मेरे पास कुछ है जिसे आपको लखन जी को इमेजिन करने में थोड़ी सहायता हो जाएगी.

उस महिला ने दीवार पर एक बड़ी सी फोटो लगी थी जिस पर एक पर्दा पड़ा था, महिला ने आगे बाद कर वो पर्दा खींच दिया. वह लखन जी और विनीता की अब तक की सभी की गई पूजा की फोटोज का सोल्लगे बना हुआ था. उनकी शादी की, दंगल की, चेरियट रेस की, लखन जी द्वारा चंद्र पूजा के दौरान विनीता को दी गई मोतियों की माला की, विनीता ने जब पत्तो के वस्त्र पेहेन कर लखन जी के साथ मंत्र जाप किया था, लखन जी और विनीता के मृदा स्नान के लिए बनाए गए कुंड की और इन सब फोटोज के बीच में लखन जी की एक बड़ी सी फोटो थी.

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महिला : ये फोटो शायद आपके लिए उत्प्रेरक का काम करे अब तक आपने लखन जी के साथ जो भी विधिया पूरी करि शायद इन फोटोज को देख कर उन विधियों को याद करते हुए आपको लखन जी को इमेजिन करने में सहायता मिले.

शायद कही न कही वो महिला सच hi बोल रही थी क्युकी उन सब तावीरो को देखने भर से hi विनीता के तन बदन में एक अजीब सिहरन दौड़ने लगी थी. लखन जी के साथ बिताए गए वो सरे पल वो साडी घटनाए उसकी आँखों के सामने ताज़ा सी हो गई थी. विनीता पुराणी घटनाओ के खयालो में खो सी गई थी की तभी उस महिला की आवाज़ ने उसे वापस वर्त्तमान में ले आया.

महिला : शायद आप अभी से बीते दिनों के खयालो में खो गई है यानि मेरा ये फोटो यहाँ लगाने का फैसला सही hi है. तो अब हम क्या वैश्या आकर्षणं की ये विधि शुरू करे आप तैयार है.

विनीता : जी

विनीता की तरफ से सहमति मिल चुकी थी और प्रारम्भ होने वाली थी वो विधि जिसमे विनीता को कुछ नहीं करना था सिर्फ बैठ कर देखना था पर इसके बावजूद ये विधि उसकी आत्मा तक को निचोड़ कर रख देने वाली थी.

प्रारम्भ होने वाली थी वो विधि जिसका नाम था " वैश्या आकर्षणं "

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और रीडर्स प्लीज थ्रेड को रेटिंग भी दे स्टोरी में जो पोल्ल है उसके नीचे थ्रेड को रेट करने का ऑप्शन दिया है वह बस आपको 5 स्टार पर क्लिक करना है तो प्लीज अगर आप स्टोरी रीड करने आए तो वह रेट ज़रूर करे.
 
विनीता की तरफ से सहमति मिलते hi उस महिला ने अपनी साडी की पीछे गर्दन की तरफ बंधी गाँठ खोल दी. गाँठ खुलते hi वो साडी पालक झपकते hi ज़मीन पर आ गिरी. और विनीता तो इस बात को देख कर हैरान रह गई की अंदर उस महिला ने कपडे के नाम पर कुछ नहीं पहना था.

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वो ऊपर से नीचे तक पूरी तरह नंगी थी. वो महिला बड़ी नज़ाकत से चलती हुई उस पुरुष के समीप आई और अगले hi पल उस पुरुष के बदन से इस तरह लिपट गई जैसे किसी मोठे पेड़ के तने से कोई बेल लिपट जाती है.

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और देखते hi देखते वह स्त्री और पुरुष के बीच होने वाला कामुकता का खेल आरम्भ हो गया. पूरा कमरा उस महिला की कामुक सिसकियों और उस पुरुष की भरी भरी सासो और चुम्बन चेतन की आवाज़ों से गूँज रहा था और कमरा एकदम खली होने की वजह से हलकी हलकी आवाज़े भी काफी भरी प्रतीत हो रही थी. वो महिला अपनी काम क्रिया की हर महारत वह इस्तेमाल कर रही थी और विनीता बस निशब्द सी आँखे फाड़े ये सब होते हुए देख रही थी. उसे अब तक अंदाजा hi नहीं था सम्भोग इस तरह भी किया जा सकता है. विनीता का खून का दौडान तब और बाद गया जब उस महिला ने उस पुरुष को उसके नाम से पुकारा "लखन". विनीता को अपने कानो पर यकीन नहीं हुआ की क्या उसने सही नाम सुना क्या उस महिला ने लखन नाम hi लिया है. यानी इस पुरुष का नाम भी लखन hi है. पर विनीता और ज्यादा हैरान तब रह गई जब उस पुरुष ने भी उस महिला का नाम लिया "विनीता".

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अब विनीता समझ चुकी थी यहाँ ये दोनों उसका और लखन जी का hi रोले प्ले कर रहे थे. उन दोनों के मुँह से अपना और लखन जी का नाम सुनते hi विनीता की नज़रे दीवार पर लगी उस तस्वीर पर जाकर टिक गई. और वो दुबारा पिछले कुछ दिनों में घाटी घटनाओ को याद करने लगी. जब उसने और लखन जी ने अग्नि के सात फेरे लिए थे और लखन जी ने उसकी मांग भरी थी.

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उसके बाद उसकी नज़रे उस फोटो पर पड़ी जिसमे वो पत्तो के वस्त्र पहने थी और जिस रात उसने लखन जी की गोड़ में बैठ कर कमल मुद्रा आसान में 1001 मंत्रो का जाप करा था और उस जाप के दौरान किस तरह लखन जी का लिंग तनाव में आ गया था और बार बार उसके कूल्हों पर यहाँ वह छू रहा था और उसे जीवन में पहली बार अपनी योनि के इतने करीब एक मर्द के लिंग का एहसास हुआ था.

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उस दिन का याद करके वो पल भी याद आया जब उसने लखन जी द्वारा डिब्बी में निकला हुआ वीर्य बाथरूम में जाकर अपने पुरे बदन पर माला था और अपने चेहरे पर वो वीर्य मलते मलते कब अचानक से उसके होंठ अपने आप खुल गए थे और उसकी उंगली उसके मुँह में चली गई थी और पहली बार उसे किसी पुरुष के वीर्य के स्वाद पता चला था वो भी लखन जी के वीर्य का.

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ये सब सोचते सोचते hi वो अपने अंदर एक अलग hi उत्तेजना का एहसास कर रही थी. और सामने उस महिला और पुरुष के बीच चल रही काम क्रिया का मदमस्त दृश्य देख कर वैसे hi विनीता की सासे काफी तेज़ चलने लगी और उसे एहसास hi नहीं हुआ कब उसकी ऊँगली उसके होंठो के अंदर दाखिल हो चुकी थी. हलाकि इस वक़्त उसके उंगलियों पर लखन जी का कोई वीर्य नहीं था पर उस कमरे के माहौल ने उसे ऐसा सोचने पर मजबूर कर दिया था और उसे अपनी सूखी ऊँगली में भी लखन जी के वीर्य का स्वाद सा मिल रहा था. और उसे वो पल भी याद आ रहा था जब उसने पहली बार अपने दिल के दर्द को लखन जी पर ज़ाहिर करा था तब जो प्यार और अपनापन उसे लखन जी से मिला था वो कभी अपने खुद के पति से भी नहीं मिला था.

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इसके बाद विनीता की नज़रे उस फोटो पर पड़ी जब उसने जलपरी से वस्त्र पहने थे. और उस दिन का याद करके विनीता के ज़ेहन में वो पल भी ताज़ा हो गया जब उसने लखन जी के लिंग को पहली बार अपने मुँह में लिया था क्या बड़ा अकार था बेशक विनीता ने उस दिन अपनी आँखे बंद राखी थी और इतनी साड़ी पुजाओ के बाद भी लखन जी के लिंग को अपनी आँखों से नहीं देखा था पर उस दिन उसने उसका अकार छू कर तो महसूस करा hi था. और वो किसी भी तरह इस हट्टे काटते मर्द के लिंग से कम तो नहीं था.

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इसके बाद विनीता की नज़रे उस विवाह मंडप वाली फोटो पर पड़ी जहा लखन और विनीता का दुबारा विवाह कराया गया था वो भी 100 अन्य जोड़ो के साथ पर ये विवाह पिछली बार हुए विवाह से थोड़ा अलग था इसी दिन विनीता ने पहली बार लखन जी के प्रति अपने सच्चे प्रेम को पहचाना था. और फिर विनीता के ज़हन में उसी दिन का रात में चंद्र पूजा के समय का मंज़र भी ताज़ा हो गया जब लखन जी पहली बार कपडे के ऊपर से सही उसके स्तनों को स्पर्श करा था उन पालो को याद करते हुए hi विनीता के हाथ खुद बा खुद अपने स्तनों पर पहुंच गए और वो उन्हें हौले हौले दबाने लगी.

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विनीता एक पल उन तस्वीरो को देखती और दुसरे पल अपने सामने चल रही उस महिला और पुरुष की काम क्रिया को देखती. ये तो पूरी तरह सच था की वो महिला काम क्रियाओ में पूरी तरह निपुण थी उसने उस पुरुष की उत्तेजना को चरम तक पंहुचा दिया था. और सिर्फ उस पुरुष की hi नहीं विनीता की उत्तेजना को भी कई गुना बड़ा दिया था. और ऊपर से सामने लगी लखन सिंह की तस्वीरो के कारन विनीता की दिलो दिमाग से ये सोचने पर मजबूर कर दिया था की ये साड़ी काम क्रिया उस महिला और पुरुष के बीच नहीं बल्कि विनीता और लखन के बीच हो रही है. और विनीता के मन में ये भाव को जगाने के लिए वो एक दुसरे को विनीता और लखन जी कहकर hi सम्बोधित कर रहे थे वो भी बड़े कामुक अंदाज़ में. विनीता को अंदाजा भी नहीं था की वो लखन जी के प्रति इस हद तक आसक्त हो चुकी है की किसी और पुरुष में लखन जी छवि को इमेजिन करने भर से उसे अपनी जांघो के बीच गीलापन सा महसूस हो रहा था.

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वो गीलापन महसूस होते hi विनीता के हाथ अपनी योनि पर पहुंच गए. और योनि को स्पर्श करते hi विनीता के दिमाग में कल रात की गया पूजा का एहसास ताज़ा हो गया जब पहली बार किसी पुरुष ने उसकी योनि को अपने होंठो से स्पर्श करा था, क्या कामुक एहसास था अगर कल रात वो अलार्म न बजा होता तो शायद कल रात hi वो खुद को पूरी तरह लखन जी को समर्पित कर देती. विनीता उत्तेजना के चरम पर पहुंच चुकी थी और कुछ यही हाल उस महिला और पुरुष का था उनका पूरा बदन पसीने से सराबोर था, तेज़ तेज़ चलती सासो के चलते उनके नंगे सीने ऊपर नीचे हो रहे थे. उस स्त्री के बदन के ज़र्रे ज़र्रे से उस पुरुष का गाड़ा वीर्य बहकर नीचे आ रहा था. कुछ ऐसा hi बहाव विनीता को भी अपनी जांघो से होता महसूस हो रहा था. विनीता ने आज तक कभी पोर्न मूवीज नहीं देखि थी पर उसे क्या पता था की उसे जीवन में लाइव पोर्न देखने अवसर मिलेगा वो भी खुद को उसमे इमेजिन करते हुए.
 
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उस महिला की तेज़ सासो जब थोड़ी संयत हुई तब उसने उस पुरुष को जाने का इशारा किया और वो बिना कुछ बोले चुपचाप अपनी धोती उठाकर उस कमरे से बहार निकल गया. इसके बाद वो महिला नज़रे घुमाकर विनीता से मुखातिब हुई.

महिला : आपके माथे से टपकता पसीना अआप्की तेज़ तेज़ चलती सासे और आपके हाथ जो अब भी आपकी योनि पर है इस बात का प्रमाण है की आपने वैश्या आकर्षणं का ये चरण काफी एन्जॉय करा है.

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महिला की ये बात सुनकर विनीता ने हड़बड़ा कर अपने हाथ अपनी योनि से हटा लिए जिसे देख उस महिला की भी हसी निकल गई. पर इसके बाद वो थोड़ा गंभीर होकर विनीता से बोली.

महिला : देखिये पूजा के इस चरण का नाम था वैश्या आकर्षणं यानि आपको अंदर से एक वैश्या जैसा अनुभव करना होगा और शर्म से वैश्या का दूर दूर तक कुछ लेना देना नहीं है. और आप अब भी शर्मा रही है. अगर आपको आज रात एफ्रोडाइट पूजा के आखिरी चरण में सम्मिलित होना है तो आपको शर्म हाय को पूरी तरह त्याग कर अंदर से एक वैश्या बनना होगा.

विनीता को अपनी गलती का एहसास हो गया और उस महिला की नज़रो में देखते हुए वो दुबारा अपने हाथ अपनी योनि पर ले जाकर उसे मसलने लगी और इस बार विनीता उस महिला को देख कर मुस्कुरा दी.

महिला : बहुत अच्छे बस इसी कॉन्फिडेंस से आपको पूजा की आखिरी विधि भी पूरी करनी है. पर उससे पहले मई ये जानना चाहती हु आज किसी मर्द को उत्तेजित करने के जो तरीके यहाँ मैंने आज आपको दिखाए क्या आप उनमे से कुछ सीख पाई.

विनीता : जी सारे के सारे ( विनीता ने इस बार बिना किसी शर्म के उत्तर दिया )

महिला : चलिए बहुत बढ़िया पर क्या ये सब देखते हुए आप लखन जी के बारे में सोच रही थी. सच बताइयेगा

विनीता : सच बताऊ तो केवल उन्ही के बारे में सोच रही थी.

महिला : क्या उनके बारे में सोचते हुए आपको अपने अंदर कामुकता का संचार होता महसूस हुआ.

न चाहते हुए भी ये सवाल सुनकर विनीता की नज़रे फिर शर्म से झुक गई. पर खुद को फिर संयत करते हुए उसने सहमति में सर हिला दिया.

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महिला : अभी भी आपके अंदर शर्म हाय बाकी है पर आज रात की पूजा से पहले आपको इसे पूरी तरह त्यागना होगा. अभी भी आपके पास काफी समय है, ये कमरा है इसमें पड़ा ये बिस्तर है जो अभी भी हमारी कामरुस की सुगंध से महक रहा है और यहाँ दीवार पर लगी लखन जी की ये तस्वीरें है. आप यही इसी बिस्तर पर आराम करिये और लखन जी को इमेजिन करते हुए हमारे कामरुस की सुगंध को महसूस करते हुए अपनी शर्म को त्याग कर एक रात के लिए वैश्याओ के सामान पूर्ण बेशरम बनने का प्रयास करे. तब तक मई कुछ ज़रूरी काम करके आती हु.

इसके बाद वो बिस्तर से उतारकर कड़ी हुई और उसने ज़मीन पर पड़ा अपना वस्त्र उठाकर दुबारा से अपने नंगे बदन को धक् लिया. और विनीता को आगे की पूजा के लिए बेस्ट ऑफ़ लक कहा.

इतना कहकर वो महिला उस कमरे से से बहार निकल गई. और विनीता उसी बिस्तर पर लेट गई जिस पर कुछ देर पहले वो महिला और पुरुष कामुकता के उन्माद में चूर वासना का खेल खेल रहे थे. बिस्तर से अब भी उनके पसीने और वीर्य की महक आ रही थी और ये महक विनीता को दुबारा उत्तेजित कर रही थी. विनीता उस महक को महसूस करने लगी और उसकी नज़रे खुद बा खुद एक बार फिर दीवार पद लगी लखन जी के तस्वीर पर जा तिकी और उसे पता भी न चला की कब उसके हाथ एक बार फिर कपड़ो के ऊपर से उसकी योनि पर पहुंच गए. और लखन जी की तस्वीर को निहारते निहारते उसकी आँखे बंद होती चली गई. और बंद आँखों से इंसान कल्पनाओ के जिस संसार में पहुंच जाता है वह खुली आँखों से कभी नहीं पहुंच सकता.

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विनीता की बंद आँखों ने उसकी कामनाओ को कल्पना के खुले पंख दे दिए थे और कुछ देर पहले उसकी आँखों के सामने उस महिला और पुरुष के बीच जो कुछ भी हुआ अब वह उसे अपनी और लखन जी की छवि नज़र आ रही थी. खुली आँखों में जो शर्म अब भी विनीता को ज़ंजीरो में जकड़े हुए थी बंद आँखों ने उस बंधन को पूरी तरह खोल दिया था और वो जल बिन मछली की तरह बिस्तर पर यहाँ वह करवाते बदल रही थी अंगड़ाइयां ले रही थी.

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विनीता की तड़प और बेचैनी से ये साफ़ ज़ाहिर था की वो अपनी कल्पनाओ की दुनिया में कितना आगे निकल चुकी थी. पर क्या ये कल्पनाए सच्चाई का रूप ले पाएंगी या फिर विनीता केवल ये काल्पनिक झूठी खुशियों के साथ hi इस गाँव से हमेशा हमेशा के लिए विदा हो जाएगी इन सब सवालो का उत्तर आने में बस कुछ घंटो का hi समय शेष था.
 
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