- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 84,650
लखन सिंह उस पुरे मेले की हर दूकान का टहल टहल कर निरिक्षण करने लगे. उनके दिमाग में वो सुबह वाला पत्र का एक एक शब्द चल रहा था की वो कौन सी वास्तु हो सकती है जो देवी एफ्रोडाइट को सबसे अधिक प्रिय थी. लखन सिंह जिस भी दूकान के सामने से गुज़रते वह मौजूद महिला उनका अभिवादन करते हुए अपनी दूकान में मौजूद सामान दिखते हुए ऐसे दर्शा रही थी की उसकी दूकान hi सही दूकान है और उसके पास hi सही नक्शा है.
लखन सिंह बिंदी की दूकान के सामने से गुज़रे तो वह तरह तरह की सुन्दर बिंदिया थी. एक पल को उनके दिमाग में आया की बिंदी लगाने से औरत की सुंदरता बहुत बाद जाती पर क्या बिंदी सही वास्तु है.
आगे सिन्दूर की दुकान थी उनके मन में ख़याल आया की सिन्दूर से hi औरत का सुहाग होता है बिना सिन्दूर के औरत सुहागन नहीं क्या सिन्दूर हो सकता है. जब वो इत्र की दूकान के सामने से गुज़रे तो वह से आती तरह तरह के इत्र की सुगंध ने बरबस hi उनका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया. इत्र का शौक तो उनको भी बहुत था और वह ऐसे ऐसे नेचुरल इत्र थे जिनकी कभी उन्होंने महक नहीं सूंघी थी. वो वह मौजूद अलग अलग इत्र को सूंघ कर उसका आनंद लेने लगे. वो भूल hi गए वो यहाँ एक महत्वपूर्ण कार्य से आए है. वह मौजूद महिला ने hi उन्हें उनका वास्तविक कार्य याद दिलाया.
महिला: आपने बिलकुल सही चुनाव करा है, आप इतनी साड़ी दुकानों के सामने से गुज़रे पर कही आपका ध्यान विचलित नहीं हुआ पर इस दूकान से आती इत्र की मादक सुगंध ने आपको अपनी तरफ आने को मजबूर कर दिया. अब आप खुद hi सोचिये इससे ज्यादा महत्वपूर्ण वास्तु और क्या हो सकती है स्त्री के श्रृंगार की जो पुरुष को अपनी तरफ आकर्षित होने को मजबूर करदे.
लखन सिंह को भी कही न कही उसकी बाते सही लग रही थी. उन्होंने एक पल को मन में चिंतन करा और फिर उस दूकान से एक बेहद सुगन्धित इत्र की शीशी लेली. शीशी के साथ उस महिला ने एक नक्शा भी लखन सिंह के हाथो में थम दिया. लखन सिंह ने वो पत्र खोला जिसमे एक मार्ग दिशाओ के अनुसार दर्शाया गया और यहाँ से 20 कम दूर वो भवन दिखाया जा रहा था. लखन सिंह बिना देर किये वो इत्र की शीशी और वो नक्शा लेकर उस सफ़ेद घोड़े जिसपर बैठकर वो आए थे पर सवार होकर उस नक़्शे में दर्शाए मार्ग से होते हुए तेज़ गति से मंज़िल की तरफ बाद चले तकरीबन डेड घंटे में वो उस नक़्शे में दर्शाई जगह पर पहुंच चुके थे पर यहाँ भवन तो दूर दूर दूर तक कोई झोपडी भी नज़र नहीं आ रही थी.
जिसे ये तो साफ़ हो गया था की लखन सिंह ने गलत वास्तु चुन ली थी. उन्हें उस महिला पर बहुत गुस्सा आ रहा था पर यही तो परीक्षा थी कही न कही वो खुद से भी गुस्सा थे उन्होंने अपने चुनाव में थोड़ा और ध्यान देना चाहिए था. उन्होंने अपने सर के ऊपर चमकते सूर्य को देखा उसकी स्थिति से स्पष्ट था की अभी सूर्यास्त होने में लगभग 3 घंटे का समय शेष था यानि वो अब भी वापस जाकर सही वास्तु चुन सकते थे. वो बिना एक भी पल की देर किये दुबारा घोड़े पर सवार हो गए और तेज़ गति से वापस उस मेले की तरफ दौड़ पड़े. इस बार घोड़े की गति पहले से थोड़ी धीमी थी वो समझ गए की घोडा भी लगातार चलने के कारन प्यासा है. रास्ते में उन्हें एक तालाब दिखा जहा उन्होंने खुद भी पानी पिया और घोड़े को भी पानी पिलाया पर इस सबमे भी उनका कुछ समय व्यर्थ हो गया.
लखन सिंह (घोड़े को सहलाते हुए): दोस्त मेरे पास ज्यादा समय नहीं है मुझे तुम्हारी सहायता की ज़रूरत है प्लीज दोस्त मेरी मदद करो.
जानवर भी प्यार की भाषा अच्छे से समझते है लखन सिंह के इस प्यार दुलार को देख उस श्वेत अश्व ने उत्तर में अपना सर झुका दिया. लखन सिंह ने आगे बाद कर उसके माथे को चूम लिया और दुबारा उस पर सवार हो गए. इस बार तो उस घोड़े की तेज़ी देखते hi बन रही थी. पानी पीने में समय लगने के बावजूद उस घोड़े ने डेड घंटे का सफर एक घंटे में पूरा करके लखन सिंह को दुबारा उस मेले तक पंहुचा दिया. लखन सिंह दुबारा मेले में दाखिल हो गए. सबसे पहले उन्होंने वो इत्र की दूकान ढूंढ़नी चाही पर वो हैरान थे क्युकी वो दूकान अब वह से गायब थी. शायद लखन सिंह को भ्रमित करने का उसका काम पूरा हुआ इसलिए वो दूकान हटा दी गई.
अब लखन सिंह बाकी दुकानों को ध्यान से देखने लगे, वो जानते थे की अब उनके पास बस एक मौका और है क्युकी अगर इस बार फिर उन्होंने गलत वास्तु चुनी तो दुबारा इतनी दूर जाकर वापस आना और फिर तीसरी बार कोई वास्तु लेकर सूर्यास्त से पहले अपनी मंज़िल तक पहुंच जाना संभव नहीं होगा और शायद ये घोडा भी इतना सफर नहीं कर पाएगा. इसलिए इस बार उन्हें जो भी चुनना है बड़े ध्यान से दिमाग लगा और सुबह का पत्र याद करके hi चुनना होगा. उन्हें समझ नहीं आ रहा था वो क्या चुने सिन्दूर, बिंदी, लिपस्टिक अचानक वो साड़ी की दुकान के सामने पहुंचे और साड़ी की दूकान को निहारने लगे. वह दूकान में तरह तरह आकर्षक साड़ी थी.
लखन सिंह (मन में) : क्या साड़ी वो वास्तु हो सकती है.