अपडेट 115
हिना जब से दूकान से लौटी थी, एक कोने में सिमटी हुई बैठी हुई थी. सुप्रिया ने काफी देर उसे तक उसे अपने से चिपकाये रखा, पर उसका दिल फिर भी शांत नहीं हो रहा था. हिना की मासूमियत पर इस मोहल्ले की गन्दी नज़र पद चुकी थी, और यह चीज़ सुप्रिया को और भी परेशान किये जा रही थी. उसने मैं hi मैं ठान लिया था की उसे अब क्या करना था.
रात के करीब 10 बजे, बहार ऑटो के रुकने की आवाज़ आयी. इक़बाल वापस आ गया था.
दरवाज़ा खोलने से पहले सुप्रिया ने एक बार फिर हिना की तरफ देखा, जैसे उसे याद दिला रही हो की उन लोगो ने दिन में क्या बात करि थी. वह नहीं चाहती थी की हिना इक़बाल को इस बारे में कुछ भी बताये. वह दोनों उसके गुस्से से अच्छे से वाक़िफ़ थे, और नहीं चाहते थे की एक बार फिर उसके गुस्से की वजह से उन्हें यहाँ से भागना पड़े.
दरवाज़ा खुला और इक़बाल अंदर आया. आज उसके चेहरे पर कल जैसा गुस्सा नहीं था, बल्कि एक थकी हुई ठंडक थी. उसने आते hi झोले को मेज़ पर रखा और तख़्त पर बैठ गया. सुप्रिया ने कल से अपनी पिछली गलती से सीख ली थी. उसने मुस्कुराते हुए इक़बाल को पानी दिया और फिर उसके लिए खाना लगा दिया.
तब तक हिना भी अंदर कमरे में जाकर लेट चुकी थी.
इक़बाल ने जल्दी से खाना खाया, और सुप्रिया मुस्कुराते हुए चुप बैठी रही, जैसे इंतज़ार कर रही हो इक़बाल खुद hi आज के दिन की बात छेड़ेगा.
इक़बाल ने खाने के बाद अपने कपड़ों से पैसे निकाल कर सुप्रिया के आगे कर दिया - कल से थोड़ा बेहतर था आज. आज पूरे चार सौ की कमाई हुई है. इसमें से 100 सलीम को देने है.
सुप्रिया ने एक हलकी मुस्कराहट के इलावा कोई रिएक्शन नहीं दिखाया. अभी भी कुछ काम सा लग रहा था. वह पहले से hi सोच चुकी थी की उसे इस बारे में कैसे बात करनी है.
उसने इक़बाल के पास बैठते हुए उसके कंधे पर हलके से हाथ रखा और उसकी तरफ देखते हुए पुछा - इक़बाल जी... आप शहर में कौन सा रास्ता ले रहे हैं. किस तरफ ऑटो चलते हैं?
इक़बाल को उसका सवाल सुन कर शायद अच्छा लगा और वह थोड़ा एक्ससिटेड होते हुए बोलै - वही जो सलीम ने बताया है... सुबह सिविल लाइन्स के बहार से शुरू करता हूँ... वहां से जहाँ भी सवारी ले जाये... जैसे आज झलवा तक, और फिर वहां से संगम तक जा कर वहां की सवारी.
सुप्रिया दिन भर में पहले hi थोड़ी रिसर्च कर चुकी थी - आप स्टेशन से क्यों नहीं शुरू करते?
इक़बाल - सलीम कह रहा था वहां पहले से hi काफी ऑटो होते हैं, और लोग काफी मोल भाव करते है...
सुप्रिया ने परेशान होते हुए इक़बाल की तरफ देखा, पर उसकी बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी. ऐसा लग रहा था सलीम jaan-bujhkar इक़बाल को उन रास्तों पर भेज रहा था जहाँ कमाई काम हो. पर वह ऐसा क्यों करेगा? क्या वह चाहता है की इक़बाल अपना क़र्ज़ न चूका पाए? या फिर उसका कोई और मक़सद है?
इक़बाल ने सुप्रिया को परेशान होते देख कहा - क्या हुआ? तुम परेशान मत हो, बोल दो जो बोलना है? मैं बुरा नहीं मानूंगा आज. क्या काम लग रहा है? मैं और 4 घंटे ऑटो चला लूंगा.
सुप्रिया - नहीं नहीं... ऐसा मत करना. मैं बस सोच रही थी की... अगर... अगर एक दिन के लिए मैं भी आपके साथ ऑटो पर चलूँ तोह? मैं शहर और रास्तों को और बेहतर समझ लुंगी. हम दोनों मिल कर शायद बेहतर समझ पाएंगे.
इक़बाल ने झटके में अपना सर उठाया, शायद वह फिर से गुस्सा होने वाला था पर उसने किसी तरह से अपने आप को कण्ट्रोल किया - तुम मेरे साथ ऑटो में बैठोगी? पता भी क्या कह रही हो सुप्रिया?
सुप्रिया - क्यों? इसमें गलत क्या है?
इक़बाल खीजते हुए बोलै - पहले तोह आगे बैठनी की सिर्फ एक hi जगह होती है. दूसरा तुम्हे अंदाज़ा भी है की तुम मेरे साथ आयोगी तोह लोग तुम्हे किस नज़र से देखेंगे. मुझे किस नज़र से देखेंगे? लोग बोलेंगे की अपनी औरत की नुमाइश कर रहा है.
सुप्रिया - सीट की बात है तोह साइड में एक छोटी सीट लग जाती है, मैंने देखि है. और लोगों से क्या डरना?
इक़बाल ने अपना सर न में हिलाया - नहीं... और वैसे भी तुम मेरे साथ जायेगी तोह हिना को कौन देखेगा. उसे यूँ अकेले घर में भी तोह नहीं छोड़ सकते.
हिना का नाम सुनते hi सुप्रिया के होंठ सील गए. आज जो हुआ था उसके बाद तोह वह भी हिना को अकेले नहीं छोड़ना चाहती थी.
पर उसके दिमाग में एक और बात थी - ठीक है मैं नहीं जयुंगी, पर हिना का क्या? उसकी पड़े बीच में hi छूट गयी थी. उसे अपनी पड़े पूरी करनी चाहिए. और मैं ऑटो न सही, पर कुछ और काम तोह ढून्ढ hi सकती हूँ न. हम दोनों मिल कर कमाएंगे तोह यहाँ से जल्दी निकल पाएंगे.
इक़बाल का मरदाना घमंड फिर से जाग उठा - नहीं! मैंने कहा न, घर की औरतें बहार काम नहीं करेंगी. मैं मर्द हूँ, कमा रहा हूँ. धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा. आपको याद नहीं, आप एक बार पहले अपने घर से कमाने के लिए निकली थी, और फिर क्या हुआ था?
सुप्रिया ने उसकी बात सुन कर शर्म से अपनी आँखें झुका ली. पर वह जो हुआ था, जिस लड़की के साथ हुआ था, वह कोई और लड़की थी, वह यह सुप्रिया नहीं थी, उसे तोह वह शायद अब पहचानती भी नहीं थी.
सुप्रिया - ठीक है आप सो जायो...
इक़बाल की आँखों में साफ़ दिख रहा था की उसे नींद नहीं आ रही थी, उसे किसी चीज़ की भूक थी जो उसे अंदर hi अंदर तड़पा सा रही थी. पर कल की हुई लड़ाई के बाद वह भी उस चीज़ को माँगना नहीं चाहता था.
अगले चार पांच दिन कुछ ख़ास नहीं बदला. संग के खर्चे के बाद रोज़ कुल दो सौ तीन सौ घर में आ रहे थे. यह देख कर सुप्रिया की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे वह तीनो किसी गहरे दलदल में धीरे धीरे उतर रहे हो, जिसका इक़बाल को एहसास तक नहीं था.
पांचवें दिन की रात जब इक़बाल वापस लौटा, तोह उसकी थकान उसके bache-khuche मरदाना गुरूर को निचोड़ चुकी थी. खाना खाने के बाद वह चुपचाप तख़्त पर लेट गया, पर उसकी बेचैन आँखें लगातार रसोई के परदे के पीछे काम करती सुप्रिया का पीछा कर रही थी. सुप्रिया जब बर्तन रख कर परदे से बहार आयी, तोह उसने इक़बाल की आँखों में वही पुराणी, भूखी और बेचैनी देखि. पर आज उसमे थोड़ी सी गिडगिडाडाहट नज़र आ रही थी.
सुप्रिया ने अंदर के कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया ताकि हिना के कमरे की तरफ अँधेरा रहे. वह dheere-dheere चलते हुए तख़्त के पास आयी. आज उसके चेहरे पर कोई बेरुखी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी गरम सी सुलगी हुई मुस्कराहट थी जिसने इक़बाल के सारे सब्र को एक झटके में पिघला दिया.
वह जैसे hi तख़्त के किनारे बैठी, इक़बाल ने बिना एक पल गवाए उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी तरफ खींचा. उसके जिस्म से दिन भर का पसीना, मिटटी और ऑटो का धुआं महक रहा था, पर उसकी सांसें बिलकुल गरम और तेज़ थी.
इक़बाल ने गहरी, कांपती हुई आवाज़ में कहा, उसका हाथ सुप्रिया की कमर पर कसने लगा - सुप्रिया, मुझसे अब और नहीं रुका जाता... मैं पूरे दिन सड़क पर होता हूँ, पर दिमाग में सिर्फ तुम रहती हो. उस दिन की बात को भूल जाओ... मुझे अपने से दूर मत करो.
इक़बाल की आवाज़ में वह तड़प साफ़ सुनाई दे रही थी, एक आदमी की भूख जो दिन भर की म्हणत के बाद भी बुझती नहीं थी, बल्कि और भड़क उठती थी.
सुप्रिया ने उसे दूर नहीं धकेला. इसके बजाये, वह धीरे से उसके ऊपर झुकी, और अपना सर उसके कंधे पर रख दिया. वह अपने नरम हाथों से इक़बाल के तनाव भरे हाथों को हलके से दबाने लगी. उसका यह नरम स्पर्श इक़बाल के लिए किसी नशे की तरह था.
सुप्रिया अपने होंठ इक़बाल के गाल के बेहद पास ले आयी और एक फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा - मैं कहीं नहीं जा रही... मैं तोह बस आप hi की हूँ.
इक़बाल ने उसकी मीठी सी आवाज़ सुनते hi बेचैन होकर उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में भरा और उसके होंठों को चूमने के लिए आगे बड़ा. पर सुप्रिया ने तुरंत hi अपना चेहरा थोड़ा पीछे कर लिया, सिर्फ इतना की इक़बाल उसे पाने के लिए और भी तड़प उठे. उसने अपना हाथ इक़बाल के सीने पर रखा जहाँ उसकी धड़कन तेज़ चल रही थी.
सुप्रिया - मुझे आपकी बहुत फिक्र होती है... आप अकेले सब कुछ संभाल रहे हैं. अगर आपको कुछ हो गया है, तोह पता नहीं हिना और मेरा क्या होगा. आपको पता hi है की यह ज़माना कैसा है.
इक़बाल ने सुप्रिया की नरम सांस अपने चेहरे पर महसूस की, पर उसके पीछे hat-te hi उसकी बेचैनी और बढ़ गयी. सुप्रिया की उँगलियाँ उसके सीने पर हल्का सा दबाव बना रही थी, उसे रोकते हुए भी अपने बेहद करीब रखने के लिए. अजीब सा खेल था यह आज.
इक़बाल की आवाज़ थोड़ी दबी हुई बहार निकली, जैसे अंदर कोई क़ैद जानवर गुर्रा रहा हो - सुप्रिया... आज तुम कुछ ज्यादा hi बोल रही हो... यहाँ आयो न... मेरी बात सुनो...
सुप्रिया थोड़ा सा और पीछे सरकते हुए एक गहरी आवाज़ में कहा. उसकी आवाज़ में एक ऐसी धार थी जो इक़बाल के होश उदा रही थी - सुन तोह रही हूँ... आपकी hi बात तोह सुनने के लिए बैठी हूँ यहाँ.
इक़बाल उसके पीछे पीछे थोड़ा आगे सरका. उसकी पंत में उसका लुंड पूरी तरह खड़ा हो चूका था.
सुप्रिया सरकते हुए कड़ी हो गयी - मुझे बुरा लगता है जब आप पूरे दिन म्हणत करते हो पर आपको उसका सही हक़ नहीं मिलता.
इक़बाल - वही तोह मैं कह रहा हूँ... मुझे मेरा हक़ दे दो आज रात...
सुप्रिया - अगर आपको कुछ हो गया तोह... इस मोहल्ले के... इस शहर के... गंदे लोग मुझे और आपकी बेटी को ज़िंदा चबा जायेंगे... मुझे बस इसका डर है...
इक़बाल सुप्रिया के पीछे लपकता हुआ खड़ा हो गया. इस वक़्त तोह वह सुप्रिया को चबाना चाहता था, उसके जिस्म के हर हिस्से को - मेरे रहते... कोई तुम लोगो को छू भी नहीं पायेगा.
इक़बाल ने आगे बढ़ते हुए फिर से सुप्रिया की कमर को पकड़ लिया.
सुप्रिया ने एक हलकी सी सिसकी ली, वह भी अंदर से बुरी तरह बेचैन हो रही थी - मैं बस यह चाहती हूँ... की हिना अपने पैरों पर कड़ी हो सके... और अगर मैं भी किसी तरह कोई काम करके आपका बोझ हल्का कर सकूँ तोह इसमें बुराई hi क्या है. क्या आप नहीं चाहते की आपका बोझ काम हो ताकि आप मुझे और वक़्त दे पाए.
सुप्रिया ने अपना चेहरा ऊपर करते हुए इक़बाल की आँखों में देखा. उसकी साँसें इक़बाल के होंठों के नज़दीक आयी पर उसने उन्हें मिलने नहीं दिया.
इक़बाल का दिमाग काम करना बंद कर चूका था, उसे कुछ होश नहीं था की सुप्रिया उससे क्या कह रही थी. उसे बस सुप्रिया का जिस्म चाहिए था, अपने जिस्म के नीचे.
उसने हाँफते हुए सुप्रिया की कमर पर अपनी पकड़ बनाये राखी और अपने हाथ कस्ते हुए दीवानो की तरह कहा - हाँ... हाँ... जो तुम कहोगी... वही होगा. मैं कल hi हिना की पड़े की बात करता हूँ... और तुम्हारे लिए भी कुछ... बस अब और दूर मत रहो न मुझसे. तुम मुझे पागल कर रही हो.
सुप्रिया ने हलकी सी मुस्कान दी, पर उसने अपना चेहरा फिर से मोड़ लिया. वह जानती थी की इस खेल में जीत उसकी हो चुकी थी - तोह क्या करें... आपको पागल करना hi तोह मेरा काम है...
इक़बाल ने एक झटके में सुप्रिया को घुमा दिया और उसे दीवार की तरफ धकेलते हुए उसके गले को पकड़ लिया और फिर उसके गर्दन को चूमने लगा. सुप्रिया भी अब अपने आप को खो चुकी थी.
इक़बाल ने पीछे से सुप्रिया के ब्लाउज की डोरी खोल दी और उसकी पीठ को चूमने लगा. इक़बाल के होंठ सुप्रिया की पीठ पर निचे की तरफ बढ़ रहे थे, उसकी गर्दन से लेकर उसकी कमर तक, हलके दांतों के निशाँ छोड़ते हुए. सुप्रिया ने अपने हाथों से दीवार पकड़ ली, उसकी सांसें तेज़ हो रही थी, और वह अपने होंठों को काट कर आवाज़ दबाने की कोशिश कर रही थी.
उसकी आवाज़ सिसकी में बदल गयी थी - इक़बाल जी.... हिना... हिना जग न जाए...
इक़बाल ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया. उसने अपने दोनों हाथों से सुप्रिया की साडी का पल्लू हटा दिया, और आगे से उसके पेटीकोट में अपना हाथ दाल दिया. सुप्रिया तुरंत मुड़ी और उसने इक़बाल की गर्दन को कास के पकड़ लिया. वह दोनों एक दुसरे से लिपट गए और इक़बाल उसे वापस तख़्त की तरफ खींचता हुआ ले गया, जहाँ सुप्रिया अपनी पीठ पर जा गिरी और इक़बाल ठीक उसके ऊपर.
इक़बाल उसके ऊपर छढ़ता हुआ उसके मम्मो को ज़ोर से दबाने लगा - कसम से, कितने सख्त हो रखे है तुम्हारे मम्मी... ममममम....
सुप्रिया ने अपने होंठों को और ज़ोर से काट लिया, पर इक़बाल के हाथ उसके ब्लाउज के ऊपर से hi उसके बूब्स को मसल रहे थे. उसने अपनी कमर ऊपर उठाई, जैसे इक़बाल को और पास बुलाना चाहती हो.
इक़बाल की आँखें भूक से लाल हो चुकी थी - चुप क्यों हो गयी? अभी तोह बहुत बोल रही थी... अब जब मैं ऊपर चढ़ गया हूँ तोह आवाज़ निकल गयी साड़ी.
सुप्रिया ने शर्म से अपना चेहरा एक तरफ कर लिया, पर उसकी जांघें अपने आप फैलने लगी थी, और इक़बाल के उसकी जाँघों के बीच में आने से साड़ी अपने आप hi ऊपर हो गयी थी - आप... आप तोह बस... जल्दी करो न... हिना जग जाएगी...
इक़बाल ने एक ज़ोर की हंसी ली, और जल्दी से सुप्रिया के ब्लाउज के हुक खोलने शुरू कर दिए - हिना की फिक्र करना छोडो... अब मेरी फिक्र करो... कितना तड़पाया है तुमने मुझे... तुम्हारे इंतज़ार में देखो कितना बड़ा हो गया है तुम्हारे लिए.
उसने अपनी पंत की ज़िप खोल दी, और अपना गरम, सख्त लुंड निकाल कर सुप्रिया की जांघों के बीच में रगड़ने लगा. सुप्रिया महसूस कर सकती थी उसकी गर्मी और सख्ती, उसकी पंतय हलकी सी गीली हो चुकी.
सुप्रिया की सिसकारी निकल गयी - उफ्फ्फ... कितना गरम है.
इक़बाल ने अपने एक हाथ से सुप्रिया की साड़ी और पेटीकोट को नीचे खींच दिया जिससे वह सिर्फ पंतय में रह गयी थी - गरम तोह होगा hi... पूरे दिन सड़क पर तुम्हे सोच सोच कर इसका यह हाल है... जब भी सड़क पर कोई साड़ी में लड़की नज़र आती तोह ऐसा लगता जैसे तुम hi कड़ी हो... अब देखो इसका असर.
इक़बाल ने अपने हाथ सुप्रिया की पंतय की तरफ बढ़ाये और एक hi झटके में खींचते हुए उसे उतार फेका.
सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली, उसकी सांसें रुक सी गयी थी. इक़बाल ने अपने लुंड का टोपा उसकी छूट के द्वार पर रख दिया, और ज़ोर से रगड़ना शुरू कर दिया. सुप्रिया के अंदर की बेचैनी भी जवाब दे रही थी.
सुप्रिया मिन्नतें करते हुए बोली - अह्ह्ह्ह.. ाःह... दाल दो न..
इक़बाल ने उसे सताते हुए पूछा - क्या डालूं... साफ़ साफ़ बोलो... मुझे सुन्ना है...
सुप्रिया ने शर्म से अपना मुंह हाथों में छुपा लिया, पर उसकी आवाज़ दबी हुई थी - वही... आपका... जो पकड़ रखा है...
सुप्रिया ने अपना हाथ लुंड पर रखते हुए उसे महसूस किया, जिससे लुंड और भी कड़क होने लगा.
इक़बाल ने ज़ोर से धक्का दिया, पर अंदर नहीं घुसाया - बोलो न क्या डालूं? मेरा लुंड? तुम्हारे शौहर का लुंड... दाल दू अंदर?
सुप्रिया ने हाँ में सर हिलाया, उसकी आँखें नाम हो गयी थी. इक़बाल ने धीरे से उसकी छूट में अपना बड़ा सा लुंड घुसना शुरू किया.
सुप्रिया की ज़ोर से चीख निकल गयी पर उसने तुरंत अपने मुँह पर हाथ रख लिया. उसका पूरा जिस्म पर पसीने छूटने लगे थे, ऐसा लग रहा था उसके छोट के मुँह में किसी ने जलता हुआ अंगारा घुसा दिया हो. जैसे जैसे लुंड अंदर घुस रहा था छूट की धारियां खुलती हुई सी महसूस हो रही थी जैसे उसका लुंड उसकी छूट को अंदर से फाड़ रहा हो.
इक़बाल ने अपने एक हाथ से अपना लुंड और दुसरे हाथ से सुप्रिया की एक टांग को कास के पकड़ लिया - उफ्फ्फ... कितनी टाइट है तुम्हारी... जैसी किसी दर्ज़ी से सिल्वा के आयी हो... इसको एक तोह बार पहले मार चूका हूँ मैं... फिर भी ढीली नहीं हुई है...
सुप्रिया ने ज़ोर से सिसकारी ली, उसकी पीठ पर पसीने की लकीरें बन गयी थी, और उसकी सांसें अटक रही थी. उसके छूट के अंदर दर्द और मज़ा दोनों एक साथ हो रहे थे, पर दर्द ज़्यादा था. वह कांपते हुए बोली - आह... नहीं जायेगा और अंदर... बहुत मोटा है... दर्द हो रहा है... रुको न...
इक़बाल ने मुस्कुराते हुए कहा - कैसे नहीं जायेगा... आज तुम लो इसका असली मज़ा...
उसने अपने दोनों हाथों से सुप्रिया की कमर पकड़ी, जो अब पसीने से भीगी हुई थी और एक ज़ोर का धक्का अंदर की तरफ मारा. सुप्रिया का बदन हिलते हुए ऊपर की तरफ हो गया और वह बुरी तरह झटपटा उठी. उसके होंठों से चीख निकलने वाली थी पर उसने ज़ोर से अपना मुंह दबाया. उसकी छूट पूरी तरह फैल गयी थी, जैसे कोई गरम लोहे की डंडा अंदर घुसा हो.
इक़बाल ने पूरा ज़ोर लगाया, और अपना लुंड सुप्रिया के अंदर घुसा दिया. सुप्रिया की आँखें पहात गयी, और उसके आँखों दर्द के मारे आंसू आ गए. इक़बाल का लुंड पूरी तरह अंदर था, सुप्रिया को ऐसा महसूस हो रहा था की लुंड ने अंदर से उसकी छूट का नक्शा hi बदल दिया था.
इक़बाल ने हाँफते हुए कहा, उसकी आँखें भूख से लाल थी, वह दांत भीचते हुए बोलै - इतने दिन इंतज़ार कराया है... आज मैं तुम्हे पूरा छोडूंगा...
उसने अपनी कमर उठाई, और ज़ोर ज़ोर से धक्के माने शुरू कर दिए. हर धक्के पर सुप्रिया की छूट में दर्द और मज़ा दोनों बढ़ रहे थे. उसके बूब्स ऊपर नीचे हिल रहे थे पसीने से भीगी हुई ब्लाउज में. तख़्त दीवार से टकराता हुआ आवाज़ कर रहा था, छत छत छत छत, जैसे कोई मशीन चल रही हो.
इक़बाल ने अपने हाथों से सुप्रिया के ब्लाउज के बटन खोल दिए, और उसके मम्मी बहार निकाल लिए. वह उसे छोड़ते हुए उन्हें ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा.
सुप्रिया के मम्मी बुरी तरह दर्द करने लगे थे, और उसकी कमर में एक लचक सी आ गयी थी इतनी तेज़ धक्के खाने की वजह से. उसकी छूट बिलकुल गीली हो चुकी थी, जिससे हर धक्के पर छाप छाप की आवाज़ आ रही थी. लुंड हर झटके में सुप्रिया के छूट और भी फैलती जा रही थी. सुप्रिया ने अपने होंठों को kaat-te हुए किसी तरह दर्द को सहा, उसकी आँखें बंद थी पर आंसू अभी भी बह रहे थे. जब इक़बाल ने उसके साथ यह सब पहली बार किया था तब तोह वह अपना होश hi खो बैठी थी, पर आज वह जगी हुई थी, पूरे होश में थी.
इक़बाल ने भारी सांसें लेते हुए पुछा - अह्ह्ह... मज़ा आ रहा है... मुझसे छुड़वाने में...
सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली, उसकी कमर ऊपर उठी हुई थी, उसकी पतली सी आवाज़ बहार निकली - उम्म्म्म... आअह्ह्ह... उफ्फ्फ्फ़.... दर्द हो रहा है... बहुत ज़्यादा... पर... और ज़ोर से करो न... और तेज़... धीरे क्यों हो रहे हो...
सुप्रिया के शब्दों ने तोह जैसे इक़बाल के अंदर और भी जान दाल दी. उसने आगे झुकते हुए एक हाथ से सुप्रिया के बाल पकड़ लिए और दूसरा हाथ उसके गले पर रख दिया. वह सुप्रिया को पकडे हुए और तेज़ी से अपना लुंड अंदर बहार करने लगा.
इक़बाल - ले न... और अच्छे से ले... कब से प्यासी थी तू भी मेरे लुंड के लिए... बस न न करती रहती है हमेशा...
सुप्रिया के गले बस इतना प्रेशर था की वह कुछ बोल न पाए, बस सिसकारियां लेती जाए - अह्ह्ह... उम्म्म.... ुहफ्फ्फ्फ़...
इक़बाल ने एक और ज़ोर का धक्का दिया और अपनी पकड़ हलकी करि - आज रात भर छोडूंगा तुझे... हिना के उठने तक... बीच में सो मत जइयो.
सुप्रिया ने उसकी पकड़ ढीली होते hi अपने पेअर हवा में ऊपर कर लिए इक़बाल को और अच्छे से अपनी छूट लेने के लिए. इक़बाल ने भी आगे झुक कर और तेज़ी से धक्के मारना जारी रखा.
इक़बाल ने अपना मुँह उसके मम्मो में घुसा लिया - कितने प्यारे मम्मी है तेरे... न ज्यादा बड़े... न ज्यादा छोटे... मैं दिन भर बस इनके बारे में hi सोचता रहता हूँ... कब घर आयउँ और इन्हे मसलो.... पर तू मुझे इन्हे छूने भी नहीं देती...
सुप्रिया ने अपने हाथों से इक़बाल के बालों में उँगलियाँ दाल दी, और थोड़ा सा उचकते हुए अपने बूब्स उसके मुँह की तरफ बढ़ा दिए - हाँ... मसलिये... और ज़ोर से... अह्ह्ह्ह.... उफ़.... ोुछः....
इक़बाल ने मुंह हटाकर सुप्रिया की आँखों में देखा – अब घूम जाओ... पीछे से छोडूंगा...
सुप्रिया ने शर्म भरी आँखों से इक़बाल की तरफ देखा - नहीं वहां नहीं... पिछली बार याद है न क्या हुआ था...
इक़बाल थोड़ा सा झल्लाया - अच्छा ठीक है... गांड में नहीं डालूंगा... पर पीछे से कुटिया बना कर तोह छोड़ने दे...
इक़बाल की मुँह से यह गालियां सुन कर सुप्रिया और भी एक्ससिटेड होती जा रही थी. वह इक़बाल के हाथ का सहारा लेते हुए पेट के बल लेट गयी. सुप्रिया ने तैयार होते हुए तख़्त के कोने को अपने हाथ से कास के पकड़ लिया. इक़बाल ने फिर से उसकी कमर पकड़ी और उसे थोड़ा सा ऊपर किया.
इक़बाल - सोचा था आज तेरी छूट के साथ साथ गांड और मुँह भी अच्छे से भरूंगा... पर चल कोई न... हाँ बिलकुल ऐसे... बन गयी न तू मेरी कुटिया...
सुप्रिया की शर्म काम होती जा रही थी - या घोड़ी... जो आप चाहो...
इक़बाल ने अपना लुंड फिर से सुप्रिया की छूट के द्वार पर रख दिया. उसके लुंड के टोपे से थोड़ा सा पानी नीचे टपक रहा था, गीला और एक डैम गरम. पसीने और pre-cum की तेज़ सी स्मेल सुप्रिया की नाक में भरी जा रही थी. उसने अपना चेहरा तख़्त से एकदम चिपका लिया और ज़ोर ज़ोर से सिसकारियां लेने लगी, जैसे वह जानती हो की पीछे से तोह और भी दर्द होने वाला था.
इक़बाल का लुंड सुप्रिया और उसके रास से भीग चूका था. उसने एक hi झटके में अपना लुंड उसकी छूट में घुसा दिया.
सुप्रिया की ज़ोर से चीख निकल गयी, पर उसने अपना मुँह चद्दर में दबा लिया. पर इस बार दर्द के साथ एक अजीब सी गर्माहट भी थी, उसकी छूट के अंदर जैसे कोई बटन डाब गया हो. पीछे से लुंड और भी गहराई तक अंदर जा रहा था. उसके हाथों की उँगलियाँ ने तख़्त की लकड़ी को कास के पकड़ लिया. सुप्रिया ने अपनी टाँगे और फैला दी, उसकी जांघें काँप रही थी, पर अब दर्द काम और मज़ा ज़्यादा होने लगा था.
सुप्रिया की पूरी कमर एक रदम में हिलने लगी थी, इक़बाल के हर धक्के का जवाब देने लगी थी.
सुप्रिया की बेचैन कांपती हुई आवाज़ निकली - अह्ह्ह... वहीँ... और अंदर...
इक़बाल ने ज़ोर ज़ोर से पीछे से सुप्रिया को पेलना शुरू किया. उसके जांघ सुप्रिया की गांड से टकरा रही थी, थप थप थप की आवाज़ के साथ उसके अंदर का मॉस पूरा हिल रहा था. सुप्रिया महसूस कर रही थी की इक़बाल का लुंड उसकी छूट की दीवारों से रगड़ खा रहा था, हर जगह छू रहा था, और उसकी छूट पूरी तरह तानी हुआ थी.
इक़बाल की सांसें तेज़ हो गयी थी, और उसके सीने से पसीना सुप्रिया की पीठ पर टपक रहा था. एहि तोह था जो वह कबसे चाहता था की उसकी मैडमजी को भी उसके जितना hi मज़ा आये. उसने हाँफते हुए पुछा - कैसा लग रहा है, कुटिया बन कर छुड़वाने में...?
सुप्रिया ने अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया, उसकी आँखें अब एक अलग मस्ती में बंद थी. क्या एहि था असली सेक्स का सुख, जिसे वह आज तक बस दर्द समझती रही, आज उसे एक अलग hi एहसास दिला रहा था. मैं कर था बस वह यह करती hi जाए
सुप्रिया - अह्हह्ह्ह्ह... हाँ... और ज़ोर से... और तेज़...
सुप्रिया ने यह कहते हुए अपनी गांड हवा में थोड़ी और उठा दी, उसकी कमर ने अपने आप एक आर्च बनाया, जैसे इक़बाल को और गहराई देने की कोशिश कर रही हो. सुप्रिया ने पीछे मुड़ते हुए इक़बाल की तरफ देखा.
सुप्रिया ने जैसे hi अपर सर थोड़ा सा पीछे घुमाया, इक़बाल ने उसे काबू में करते हुए फिर से नीचे दबा दिया. उसने सुप्रिया का पसीने से भीगा हुआ एक हाथ पीछे खींचा, और अब बिना रुके अंदर धक्के मारने लगा.
इक़बाल ने अपना एक हाथ नीचे किया, और सुप्रिया की छूट के बहार के हिस्से को अपनी ऊँगली से मसलने लगा. इससे सुप्रिया का पूरा जिस्म एक झटके में काँप उठा, और उसे और भी ज्यादा मज़ा आने लगा.
सुप्रिया की कमज़ोर सी आवाज़ निकली - नहीं... वहां नहीं...
पर उसकी कमर थोड़ा सा आगे पीछे होते हुए सब सच बता रही थी.
इक़बाल ने मुस्कुराते हुए उसकी छूट को रगड़ना शुरू कर दिया, और साथ में अपना लुंड अंदर बहार करना जारी रखा, एक रदम सा बन गया था, अंदर और बहार दोनों को एक साथ मज़ा मिल रहा था. उसे बहुत एक्सपीरियंस था एक औरत को खुश करने का.
सुप्रिया की सांसें तेज़ चल रही थी, उसके निप्पल्स पूरी तरह सख्त हो गए थे, और वह अपने बूब्स को सख्त से तख़्त पर रगड़ते हुए अपने आप को हर तरह से स्टिमुलते कर रही थी. हर धक्के पर वह और ज़्यादा गरम होती जा रही थी, उसकी छूट एक अब जगह बनाते हुए इक़बाल के लुंड को पूरी तरह जकड़ना शुरू कर दिया.
एक पल के लिए उसे ऐसा लगा जैसे उनके अंदर की आग बस बहार निकलने hi वाली है, और वह कराहते हुए बोली - मैं.... मैं... इक़बाल...
इक़बाल ने तुरंत अपनी स्पीड थोड़ी धीमी कर दी, वह नहीं चाहता था सुप्रिया अभी झाड़ जाये.
इक़बाल उसकी गांड के गोलों को दबाते हुए बोलै - अभी नहीं... साथ में झड़ेंगे दोनों...
दोनों बुरी तरह थक गए थे पर कोई भी ख़तम होने का नाम नहीं ले रहा था. इक़बाल कुछ सेकंड के लिए धीरे हुआ, उसकी कमर में भी बुरी तरह दर्द होने लगा था, वह कितनी देर से सुप्रिया के अंदर धक्के पर धक्का मारे जा रहा था. वह चाहता था की अब वह लेट जाए और सुप्रिया उस के ऊपर चढ़ कर सारा काम करे.
इक़बाल ने सुप्रिया के बाल पकड़ते हुए उसे उठाया. सुप्रिया भी अब पूरी तरह थक चुकी थी, उसका अंग अंग दर्द से चीख रहा था.
इक़बाल उसे बालों से पकडे हुए ऊपर उठाया और उसके पसीने से गीली हो चुकी चादर पर लेट गया - अब तू ऊपर आजा... मुझे बहुत मज़ा आएगा तेरी शकल देखने में...
सुप्रिया ने थोड़ी देर तक सांस ली, उसकी टाँगे अभी भी काँप रही थी दर्द से, पर उसकी छूट में वह गर्माहट अब एक आग बन चुकी थी जिसे वह बुझने नहीं देना चाहती थी. वह धीरे से तख़्त पर चढ़ी, और इक़बाल की टांगों के ऊपर बैठ गयी.
जैसे hi सुप्रिया की नंगी गांड इक़बाल की टांगों पर पड़ी, उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने कोई मुलायम सी चीज़ उसके पेअर पर रख दी हो. इक़बाल ने सुप्रिया की आँखों में झाँका. कितना मस्त सुडोल बदन था उसका, वह कभी सोच भी नहीं सकता की यह जिस्म कभी उसका होगा. पर क्यों न हो, इसे उससे बेहतर कोई नहीं छोड़ सकता था.
इक़बाल ने उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देखा - अपनी मर्ज़ी से दाल अब अंदर... जितना सह सके...
सुप्रिया के चेहरे पर शर्म के साथ साथ एक अलग hi आग सी भी थी. इतनी देर से तोह वह इक़बाल का पूरा लुंड सेह रही थी, अब क्यों नहीं कर पाएगी.
वह अपने आप को सहारा देते हुए थोड़ा ऊपर उचकी और लुंड को हाथ से पकड़ लिया. पहली बार वह खुद कण्ट्रोल में थी, और अब इक़बाल ने अपनी चाबी भी उसे सौंप दी थी. उसने आँखें बंद करते हुए धीरे धीरे नीचे बैठना शुरू किया. हाथ से एडजस्ट करते हुए उसने लुंड से ठीक छूट का निशाना लगा लिया.
वह कराहते हुए थोड़ा और नीचे हुई. इस पोजीशन में तोह जैसे और भी दर्द हो रहा था, इससे तोह पहली वाली hi बेहतर थी. इक़बाल ने सुप्रिया को सहारा देने के लिए उसकी कमर को जकड लिया और उसे नीचे धकेलने लगा. लुंड का टोपा तिरछा होता हुआ उसकी छूट की दीवारों को अलग अलग जगह छू रहा था. पर दोनों लुंड और छूट गीले होने की वजह से वह अंदर जाए जा रहा था. वह धीरे धीरे नीचे होती गयी, और फिर पूरा बैठ गयी, इक़बाल का लुंड पूरी तरह उसके अंदर था, और उसे अपने अंदर के अंगो से टकराता हुआ महसूस हो रहा था.
इक़बाल ने अपनी कमर थोड़ी सी ऊपर करते हुए उसे एक हल्का सा झटका दिया जिससे सुप्रिया का पूरा जिस्म बुरी तरह हिल गया - अब तू hi चल... अपनी रफ़्तार से...
सुप्रिया ने अपने हाथों को इक़बाल के सीने पर रखे, उसकी उँगलियाँ उसके घिसे हुए निप्पल्स पर रगड़ गयी, जिससे इक़बाल का बदन काँप उठा. वह अपनी कमर को नीचे करने लगी, पहले धीरे, फिर तेज़, और फिर पूरी ताक़त से. उसकी छूट पूरी तरह खोल गयी थी अब, और हर बार नीचे बैठने पर इक़बाल का लुंड उसकी छूट के किसी न किसी हिस्से को छेड़ रहा था.
इक़बाल ने भी उसे सहारा देते हुए अपने हाथ उसकी गांड पर रख दिए और उसे ऊपर नीचे उछलने लगा.
इक़बाल की आँखें सुप्रिया के उछलते हुए बूब्स पर तिकी हुई थी - कितनी मस्त लग रही तू... बिलकुल वैसी जैसे सोचा था मैंने कई बार अपने सपनो में... शर्म तोह नहीं आ रही अब मुझसे छोड़ने में...
सुप्रिया की धीमी सी आवाज़ बहार निकली - शर्म कैसी..... आप... आप मेरे शौहर हो...
इक़बाल के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी और उसने भी अपनी रफ़्तार डबल कर दी. दोनों के शरीर अब छाप छाप करते हुए ऊपर नीचे हो रहे थे, और दोनों की सांसें तेज़ होती चली गयी. शायद दोनों hi अपने शिखर पर पहुंचने वाले थे.
सुप्रिया की सिसकियाँ अचानक उसके गले में hi अटक गयी और उसकी कमर ऊपर उठी हुई वहीँ जैम गयी. बस अब इक़बाल hi ज़ोर ज़ोर से ऊपर नीचे हिल रहा था.
इक़बाल भी समझ गया था, अब वह पहुंच गयी, वह झड़ना चाहती थी. वह भी अपने आप को और नहीं रोक सकता था. उसने अपना पूरा दम लगते हुए एक आखरी ज़ोर का झटका दिया और तेज़ी से अपना गरम माल उसकी छूट में निकाल दिया. सुप्रिया का पूरा जिस्म उसके गरम माल को महसूस करते hi काँप उठा और फिर फड़कते हुए उसके सारे माल को जैसे अपने अंदर खींचने लगा. पर फिर अचानक एक अलग hi कंपन हुई और उसने अंदर भरा पानी का सैलाब बहार निकलने लगा.
उसने एक ज़ोर की सिसकारी ली और आगे झुकते हुए इक़बाल से पूरी तरह चिपक गयी. दोनों एक दुसरे से चिपक कर कांपते हुए झाड़ रहे थे. सुप्रिया के सुडोल मम्मी इक़बाल के सीने से रगड़ खा रहे थे, और दोनों के शरीर का पसीना आपस में मिल रहा था. इक़बाल का लुंड अभी भी सुप्रिया की कांपती हुई छूट में हिल रहा था.
कुछ देर तक वह वैसे hi रहे, सुप्रिया इक़बाल के ऊपर झुकी हुई थी, उसका मुंह उसके कंधे पर था, और दोनों की सांसें धीरे धीरे नार्मल हो रही थी. इक़बाल ने अपना लुंड धीरे से बहार निकला, और दोनों का मिला हुआ बहार निकलने लगा, गरम और गधा, चादर पर गिरते हुए.
इक़बाल ने सुप्रिया को कास के दबाते हुए कहा - तुम सही कह रही थी... कल से... मैं स्टेशन से hi शुरुवात करूँगा...
सुप्रिया हलके से मुस्कुरायी, शायद यह सब हो जाने के बाद इक़बाल का दिमाग हल्का हो गया था - और वह बाकी सब भी भूल मत जाना जो मैंने कहा था... नहीं तोह फिर कभी नहीं करने दूंगी...
इक़बाल ने सुप्रिया का काँपता हुआ हाथ ज़ोर से पकड़ लिया और उसे अपनी तरफ खींच कर उसके मम्मो को चूमने लगा. उसकी मैडमजी आखिर आज पूरी तरह से उसकी हो गयी थी. अब उसे किस बात की फिक्र थी.
दोनों अपने आप में खोये हुए इस बात से अनजान थे की अंदर कमरे से, दरवाज़े के बीच के एक क्रैक से हिना छिप कर उन्हें यह सब करता देख रही थी.
उसकी छोटी सी छाती तेज़ धड़क रही थी और उसकी सांसें अटक सी गयी थी. वह समझ नहीं पा रही थी की वह क्या देख रही है, पर वह उनसे अपनी आँखें हटा भी नहीं पा रही थी.