इन्सेस्ट रिश्ता - SexBaba
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इन्सेस्ट रिश्ता

hotaks

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Dec 5, 2013
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मैं एक बार आप सब के बिच में फिर से हाज़िर हु और आप सब के लिए एक और कहानी लेकर हाज़िर हु.

यह कहानी भी पारिवारिक सम्बन्धो पर आधारित है. यह कहानी भी स्लो सेडक्टिव होगी और आशा है की आप सब को पसंद आएगी.

आप सब से एक hi आशा है की इस कहानी को भी आपका प्यार मिलेगा और दिल खोलकर कमैंट्स कीजिये. आप को पसंद आये तू भी और न आये तो आप अपने सुझाव दीजिये ताकि कहानी को इस तरह से लिखा जाये जिससे आप सब आनंदित हो सके.

धन्यवाद

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इंडेक्स





फॅमिली इंट्रोडक्शन♡



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अपडेट 1

यह कहानी एक ऐसे परिवार की है जिसने पिछले कुछ सैलून में गाओं से आकर इस शहर में अपनी पहचान बनाई है.

इस परिवार में कुल मिलकर 4 लोग hain,naukaron को छोड़ कर. सबसे पहले इस परिवार के मुखिया मोहन लाल कोठरी जो करीब 42 साल के हैं, लेकिन देखने में कंही से भी 30 से जयादा नहीं लगते थे बल्कि उससे भी काम दिखते हैं. ये बहुत hi हैंडसम, 6 फ़ीट की हाइट और वेल बिल्ट है. इनके सिक्स पैक्स बॉडी है और आज भी अचे अचे नौजवानों को धूल छठा सकते हैं. ये डेली एक्ससरसीसे करना नहीं भूलता चाहे कुछ भी हो जाये. ये एक व्यापारी हैं.

दूसरे सदस्य है मोहनलाल की पत्नी संध्या जो 41 साल की हैं. संध्या 5फट 4 इंच की है और उसका फिगर (36 24 36) बुहत मस्त है, वह 39 की होने के बावजूद अपनी बॉडी को कैसा हुआ रखे हुए है जिससे ये भी 30-32 से जयादा नहीं लगती. संध्या का रंग गोरा, 36 साइज की बहुत hi गोरी चूचियां जिन के ऊपर हलके भूरे रंग के दो moṭe दाने, पतली कमर और उसके नितम्ब बहुत ज़यादा moṭe तो नहीं थे पर भरे हुए हैं जो उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगते हैं. संध्या को पहली नज़र में देखने वाले का ख्याल उसकी चूचियों और उसके नितम्बों पर ही जाता था. वह जयादातर सदी hi पहनती है और धार्मिक विचारों वाली महिला है. ये एक हाउसवाइफ हैं.

तीसरी सदस्य है इस घर की बेटी रुचिका जो 22 साल की है. उसका आज का फिगर 34 23 34 है और वो 5 फट 7 इंच की हाइट की होने की वजह से बहुत लम्बी दिखाई देती है. उसकी रंगत ऐसे है जैसे किसी ने दूध मैं केसर मिला दिया हो, बिकुल गोरा रंग लाल सुर्ख गाल, खूबसूरत चेहरा प्यारी आंखें, गुलाब की पंखडिओं जैसे होंठ, मम्मी तोह ऐसे की, मनो रबर की बॉल्स हो जो हमेशा कैसे हुए लगते हैं. रुचिका की जो चीज़ सबसे जायद कातिलाना है वो है उसके बाहिर को निकली हुई गोल मटोल नितम्ब, जो बहुत hi कैसे हुए और परफेक्ट शेप में हैं. उसके रेशमी लम्बे काले बाल जो उसकी कमर के नीचे तक आते है. कुल मिला कर रुचिका किसी फिल्म एक्ट्रेस से काम नहीं लगती hai.Isne अभी अभी ब की पढ़ाई पूरी की है.

इस घर का सबसे छोटा और प्यारा सदस्य है आदित्य जो 20 साल का है और 5 फ़ीट 10 इंच की हाइट और वेल बिल्ट बॉडी का मालिक है. इसकी भी सिक्स पैक्स बॉडी है और खेल कूद और पढ़ाई में हमेशा ावाल आता है. यह बहुत hi शांत और हंसमुख है. छोटा होने के कारन सबका प्यारा है लेकिन अपनी बड़ी बहिन के साथ हमेशा नोक झोंक करता रहता है, लेकिन उससे प्यार भी बहुत करता है. यह अभी इंजीनियरिंग कर रहा है और फाइनल ईयर में है.

आज इस परिवार में बहुत hi ख़ुशी का दिन था क्यूंकि घर की बड़ी बेटी आज अपनी पढ़ाई पूरी कर के वापस घर आ रही थी.

घर में उसकी माँ (संध्या) आज अपनी beti(Ruchika, जिसको घर में रूचि बुलाया जाता था) की पसंद का कहना बना रही थी और उसका भाई (आदित्य) अपनी बहिन के लिए अच्छा सा गिफ्ट लेने के लिए बाजार गया हुआ था.

मोहनलाल रुचिका को रिसीव करने एयरपोर्ट गए हुए थे. एयरपोर्ट पर वो फ्लाइट के आने का इंतज़ार कर रहे थे, अभी फ्लाइट आने में वक़्त था, इसलिए वो पुराणी यादों में खोये हुए थे की कैसे वो उसे कॉलेज छोड़ने और कई बार लेने जाते थे. उसकी फ्रेंड्स उसको बड़ी हसरत भरी नज़रो से देखा करती थी और रुचिका को चढ़ती थी.

अभी वो उसकी यादों में खोये हुए थे की फ्लाइट आने का अनाउंसमेंट हुआ और वो एग्जिट गेट की तरफ बढ़ गए और उसके आने का इंतज़ार करने लगे. थोड़ी देर बाद मोहनलाल का मोबाइल बजा तू देखा की ये तू रुचिका का फ़ोन है. उसने फ़ोन पिक किया और

मोहनलाल: Hello

रुचिका: Hello, मैं लैंड कर चुकी हु

मोहनलाल: वैरी गुड, मैं बहार वेट कर रहा हु.

रुचिका: मैं अपना सामान कलेक्ट करके बहार आ रही हु

मोहनलाल: ठीक है, मैं वेट कर रहा हु

उसके बाद मोहनलाल फिर से इंतज़ार करने लगे और उनके चेरे पर मुस्कराहट और बैचैनी के मिले जुले भाव थे.

थोड़ी देर बाद मोहनलाल को सामने से रुचिका ऑरेंज कलर के कमीज और वाइट कलर के सलवार पहने अपने सामान की ट्राली को लेकर आती हुई दिखी तू मोहनलाल की ख़ुशी देखने लायक थी. वो किसी अप्सरा से काम नहीं लग रही थी और मोहनलाल ने आगे बढ़कर उसको अपनी बांहों में भर लिया और कहा "वेलकम डार्लिंग, कैसा रहा सफर" तू रुचिका ने जवाब दिया "सफर अच्छा था, आप कैसे हैं"

मोहनलाल: अब तुम आ गई हो तू मैं अच्छा hi होऊंगा. तुम कैसी हो

रुचिका: मैं भी आप से मिलकर अच्छी हो गयी हु

और फिर दोनों खिलखियकार हंस दिए. अब मोहनलाल ने ट्राली खुद सम्बल ली और रुचिका का एक हाथ अपने हाथ में लेकर बहार आने लगे जंहा टैक्सी पिक करती है. रस्ते में मोहनलाल रुचिका से कहते हैं "आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो"

रुचिका: क्या आप भी न

मोहनलाल: सच में बहुत खूबसूरत लग रही हो

रुचिका: बस न

मोहनलाल: क्यों मेरी बात पर विश्वास नहीं है

रुचिका: ऐसा क्यों कहा

मोहनलाल: क्यों की तुम्हे लगता है के मैं गलत कह रहा हु, तुम एक काम करो मेरी आँखों में झाँख कर देखो, तुम्हे अपन अकास दिखेगा और बताना की मैं झूठ बोल रहा हु या सच.

रुचिका ने अपनी पलके उठाकर मोहनलाल की आँखों में झाँखा तू वंहा जो कुछ दिखा वो उससे बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने अपनी पलके झुका ली और कुछ भी नहीं कहा और शांत हो गई.

मोहनलाल ने भी उसे और कुरेदना उचित नहीं लगा और इस वक़्त शांत रहना hi ठीक लगा और उसने रुचिका का जो हाथ थमा हुआ था उसे अच्छे से दबाकर उसे शांत होने का इशारा किया.

थोड़ी देर में टैक्सी आ गयी और ड्राइवर से सामान रखवाकर टैक्सी की पिछली सीट पर बैठ गए. जब वो टैक्सी में बैठे तू रुचिका और मोहनलाल बिच बिच में एक दूसरे को कभी कनखियोँ से और कभी पलके उठा कर देखते और कई बार उन दोनों की नज़रे मिल जाती तू अपनी अपनी नज़रे चुरा लेते.

थोड़ी देर तक यही चलता रहा और फिर रुचिका ने मोहनलाल का हाथ अपने हाथ में ले लिया तू मोहनलाल ने आँख उठाकर उसकी तरफ देखा और फिर अपना एक हाथ उसके कंधे पर रखकर उसे अपनी तरफ खींच लिया और उसके कंधे को धीरे धीरे सहलाने लगा और बिच बिच में वो एक दूसरे को देख भी रहे थे और फिर रुचिका ने अपना सर मोहनलाल के कंधे पर रख दिया.
 
अपडेट 2



थोड़ी देर तक यही चलता रहा और फिर रुचिका ने मोहनलाल का हाथ अपने हाथ में ले लिया तू मोहनलाल ने आँख उठाकर उसकी तरफ देखा और फिर अपना एक हाथ उसके कंधे पर रखकर उसे अपनी तरफ खींच लिया और उसके कंधे को धीरे धीरे सहलाने लगा और बिच बिच में वो एक दूसरे को देख भी रहे थे और फिर रुचिका ने अपना सर मोहनलाल के कंधे पर रख दिया.

रुचिका: आपने मुझे मिस किया

मोहनलाल: क्यों मैं मिस करूँ

रुचिका: आपने सच में मुझे मिस नहीं किया

मोहनलाल: किसलिए

रुचिका: (बड़े hi अजीब नज़रो से देखते हुए) आप सच नहीं बोल रहे हैं

मोहनलाल: तुम्हे ऐसा क्यों लगता है

रुचिका: क्योँ नहीं किया, मैं तू हमेशा आप को मिस करती हु

मोहनलाल: मिस उसको किया जाता है जो दूर हो, तुम तू हमेशा मेरे पास हो, तू मिस करने का सवाल hi कान्हा पैदा होता है

रुचिका: (आँखे फाड़कर मोहनलाल को देखती है और मन hi मन खुश होती है और उसके हाथ में अपने हाथ का दबाव बड़ा देती है) आपसे बातों में कोई नहीं जीत सकता.

मोहनलाल उसकी बात सुनकर हंस देते हैं और अपने दूसरे हाथ का दबाव रुचिका के कंधे पर बढ़ा देते हैं.

ऐसे hi हंसी मज़ाक करते हुए वो घर पहुंच जाते हैं और टैक्सी से सामान निकल कर घर के अंदर प्रवेश करते हैं.

जैसे hi गेट खुलता है संध्या रुचिका को देखकर उसे अपने गले लगाती है और दोनों भावनाओं में बहने लगते हैं और दोनों की आँखों में ख़ुशी के आंसू थे. तभी मोहनलाल उन दोनों को कहता है की सारा मेल मिलाप यही गेट पर hi करना है या अंदर भी जाना हैं. दोनों मोहनलाल की बात सुनकर च्वोंके और अंदर जाने लगे.

अंदर जाकर सब ड्राइंग रूम में बैठ गए, तब संध्या ने कहा "मैं चाय लेकर आती हु" यह कहकर वह चाय लेने चली गयी और मोहनलाल उसे पीछे से जाते हुए देखता रहा और मन में संध्या की खूबसूरती का आनंद लेता रहा. जब वो यह कर रहा था तब रुचिका ने उसका धयान तोड़ते हुए कुटिल मुस्कान से पूछा "क्या देख रहे हैं"

मोहनलाल पहले तू हड़बड़ा गया, लेकिन थोड़ी देर में संभल गया और उसने रुचिका को चेह्डे हुए कहा "देख रहा था की तुम्हारी माँ जयादा खूबसूरत है या तुम"

रुचिका: फिर क्या देखा

मोहनलाल: (ठंढी सांस भरते हुए) कान्हा देखा, तुम्हारी माँ तू देखने नहीं देती और मौका मिलाने पर तुम भी देखने नहीं देती, अब कैसे बताऊँ

रुचिका: फिर बात को घुमा दिया न

मोहनलाल: कान्हा घुमाया, मैं तू सीधे सीधे कह रहा हु की देखूंगा तभी तू बताऊंगा की कौन जयादा खूबसूरत है

रुचिका: क्या देखना चाहते हो

मोहनलाल: जिस किसी की भी खूबसूरती को बताना हो उसको देखना तू पडेगा hi न

रुचिका: तू क्या आप पहली बार देख रहे हो

मोहनलाल: देखा तू बहुत बार है, लेकिन खूबसूरती बार बार देखने पर भी हर बार कुछ अलग hi आभास देती है और आज तो कुछ अलग hi नज़र आ रहा है

रुचिका: ऐसा क्या अलग देख लिया

मोहनलाल: (मन में फिर से वही सवाल आया की आखिर कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है)

जैसे मेरी निगाह ने देखा न हो कभी; महसूस ये हुआ तुझे हर बार देख कर

उसकी बात सुनकर रुचिका की मादक आँखों ने मोहनलाल की आँखों में झांकर देखा और जैसे पूछ रही हो की "मुझे देख रहे थे या माँ को"

रुचिका: आप तू शायर बन गए है

मोहनलाल कुछ कह पता की तभी संध्या चाय और स्नैक्स लेकर आ गयी और प्लेटो में सर्वे करने के लिए जैसे hi झुकी तू उसका पल्लू उसकी गोरी गोरी चूचियों से हैट गया और मोहनलाल की नज़र वंहा पड़ी तू उसके अरमान भड़काने लगे.

रुचिका की आँखों ने मोहनलाल की आँखों का पीछा करते हुए जब उसे इस नज़ारे को देखते हुए पाया तू उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान ने जनम ले लिया. वो कुछ न बोली और उसको इस तरह देखते हुए देखती रही और जब मोहनलाल की नज़रों का टकराव रुचिका की आँखों से हुआ तू उससे अपनी हरकत का एहसास हुआ और वो बगले झांकने लगा.

फिर वो चुपचाप चाय पीने लगा, लेकिन संध्या ने सन्नाटे को तोड़ते हुए कहा "क्या बात है अभी भी बाप बेटी में लड़ाई चल रही है जो चुपचाप बैठे हो"

मोहनलाल: लड़ाई किस बात की

संध्या: पिछले काफी महीनो से देख रही हु की जब भी बेटी घर आती है तू आप या तू टूर पर चले जाते हो या फिर काम का बहाना करके सुबह उसके उठाने से पहले और चले जाते हो और रात को उसके सोने के बाद आते हो.

मोहनलाल: यह तुम्हारा वहां है, अब काम नहीं करूँगा तू क्या होगा और दूसरा देखो आज तू मैं खुद hi अपने आप को फ्री करके उसको लेकर आया हु

संध्या: पहले तू आपके मुंह पर बस एक hi बात होती थी "मेरी प्रिंसेस रूचि" और उसकी हर फरमाइश पूरी करते थे, लेकिन अब तू ऐसा लगता है की अपनी प्रिंसेस को भूल गए हो

मोहनलाल: नहीं यार, यह तुम्हारा वहां है, वो थकी हुई होगी यह सोचकर मैं उसे डिस्टर्ब नहीं कर रहा था.

संध्या: ऐसी भी कोई नहीं थकी हुई, बल्कि मुझे तू वो खिली हुई लग रही है, आप को तू बस बात न करने के लिए बहाने बनाने हैं

मोहनलाल: Okay okay, बताओ मई क्या करू

संध्या: प्यार से अपनी बेटी को अपने हाथ से मिठाई खिलाओ

मोहनलाल: तुमने भी तू नहीं खिलाई

संध्या ने एक टुकड़ा उठाया और रुचिका को खिलाया. उसने बड़े प्यार से खा लिया, वो तू इस सब में बहुत मज़े ले रही थी. संध्या ने अब मोहनलाल को आँख के इशारे से खिलने के लिए कहा.

मोहनलाल अपनी सीट से उठ कर मिठाई का एक टुकड़ा लेकर रुचिका की तरफ बड़ा और टुकड़ा उसके मुंह के पास ले गया जिससे उसने अपने मुंह में दबा लिया. मोहनलाल खड़ा हुआ था और रुचिका बैठी हुई थी तू उसने देखा की उसकी चुन्नी उसके गले में ऊपर पंहुच गई थी और उसके उरोजों का काफी गहराई तक नज़ारा नुमाया हो रहा था, जिससे देखर मोहनलाल के दिल में हलचल होने लगी थी.

रुचिका धीरे धीरे मिठाई खा रही थी ताकि मोहनलाल को वो नज़ारा देखने के लिया कुछ समय मिल जाये. जब मिठाई ख़तम हो गयी तो मोहनलाल अपनी जगह पर आकर बैठ गया.

संध्या ने रुचिका से कहा की अब वो अपने पापा को खिलाये.

रुचिका जैसे hi उठाने लगी तू उसका कुरता उठाने से कुछ ऊपर उठ गया था तू उसने खींचकर नीचे किया तू थोड़ा जयादा hi नीचे कर दिया, जिससे उसके उरोजों का ऊपरी हिस्सा काफी हद तक नज़र आने लगा और मोहनलाल की आँखे वंहा जाकर जैम गयी. रुचिका मिठाई का टुकड़ा जैसे hi उठाने को झुकी तू उसके उरोजों का काफी सारा हिस्सा और उसके बिच की घाटी दिखाई देने से मोहनलाल की आँखों में चमक आ गयी जो रुचिका से न चुप सकीय और उसने बड़ी स्लो मोशन में मिठाई के टुकड़े को उठा कर बड़ी नज़ाकत से चलते हुए मोहनलाल के पास आयी और उसे मिठाई खिलने लगी. मोहनलाल मन hi मन में बहुत खुश हो रहे थे.

तभी आदित्य की एंट्री हुई और वो दौड़ता हुआ आया और गिफ्ट पैक रुचिका की देते हुए bola"Welcome बैक दी"

रुचिका ने खड़े होकर उसे बांहो में भर लिया तू रुचिका के उरोज आदित्य की छाती में डाब गए और कहा "थैंक्स"

रुचिका को आदित्य की बांहो में देखकर पता नहीं क्यों मोहनलाल को अच्छा नहीं लग रहा था
 
अपडेट 3



रुचिका को आदित्य की बांहो में देखकर पता नहीं क्यों मोहनलाल को अच्छा नहीं लग रहा था.

रुचिका को जैसे hi यह एहसास हुआ की मोहनलाल को ाचा नहीं लग रहा तू उसने आदित्य को और ज़ोर से जकड लिया और कहा "आज कहीं घूमने चले"

आदित्य: हाँ हाँ क्योँ नहीं बोलो कान्हा चलना है

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रुचिका: जंहा तुम्हारा मन करें घुमा दो.

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आदित्य: ठीक है, आप फ्रेश होकर लंच कर लो फिर चलते हैं.

रुचिका: मैं तू तैयार हु, ऐसे hi चलो न

आदित्य: ठीक है जैसे आपकी मर्ज़ी, जब आप कहेगी चल देंगे.

रुचिका कुछ बोलती उससे पहले संध्या ने आदित्य से कहा की क्या अकेला दीदी को hi घुमायेगा या हमें भी ले जायेगा.

आदित्य: क्या माँ आप भी ना, कई बार कहा है घुमा देता हु तब तू मन कर देती हो और अब घूमने जाना है.

संध्या: क्योँ नहीं ले जाना चाहता.

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आदित्य: ठीक है सब चलेंगे, लेकिन लंच करने के बाद

संध्या: अगर मन नहीं हैं तो रहने दे

आदित्य: अब जब कह रहा हु की चलो तू आप अब मन कर रही हु

संध्या: बेमन से ले जा रहा है तू क्योँ जाना है

आदित्य: (अपनी माँ के गले में बांहे डालकर उसकी आँखों में झांकते हुए) प्लीज चलो न माँ

संध्या: अब इतने प्यार से कह रहा है तू ठीक है, चलूंगी

मोहनलाल जो काफी देर से ये सब देख रहा था उसे पता नहीं क्यों बेचैनी hi रही थी तू उसने कहा "चलो मैं ऑफिस चलता हु और आप सब एन्जॉय करो"

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संध्या: अब आप ऑफिस क्योँ जा रहे हो, आपने तू आज का दिन हमारे लिए फ्री रखा था

मोहनलाल: कुछ काम याद आ गया

संध्या: जब देखो काम, काम और काम, क्योँ हम सब तू आपको बुरे लगते है न

मोहनलाल: नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, बस मैं चाहता हु की आप एन्जॉय करें और अगर मैं काम नहीं करूँगा तू आप एन्जॉय कैसे करोगे.

संध्या: जो भी आज आप नहीं जायेंगे.

मोहनलाल ने बारी बारी सब की तरफ देखा और जब उसने रुचिका को गुस्से में देखा तू उसने मन में सोचा की "इनके साथ जाने में hi फायदा है'

मोहनलाल: अब तुम इतना कह रही हो तू ठीक है मैं भी चुलुंगा.

उसके बाद यह तय हुआ की वो सब लंच के बाद घूमने जायेंगे. लंच में रुचिका की पसंद की डिशेस बानी था और सब दिंनिंग टेबल पर पंहुच गए.

मोहनलाल और आदित्य टेबल के एक साइड बैठ थे. आदित्य मोहनलाल के बांयी साइड में था और रुचिका और संध्या खाने की बाकि डिशेस लेकर इस तरह बैठी की रुचिका मोहनलाल के ठीक सामने और संध्या आदित्य के सामने. खाना सर्वे करने के लिए संध्या जैसे hi उठाने लगी तू रुचिका ने कहा की "आज मैं सर्वे करती हु", लेकिन संध्या ने उसे रोक दिया और खुद hi सर्वे करने लगी तू रुचिका ने भी जयादा ज़िद नहीं की.

खाना कहते हुए कई बार मोहनलाल की आँखों ने रुचिका के उरोजों और उसकी घाटी का नज़ारा किया तू वो कई बार कहते कहते रुक जाते तब रुचिका ने टेबल के नीचे से अपने पेअर से उनके पेअर पर सेहला कर उनका धयान भांग करके अपनी आँखों के इशारे से उन्हें वापिस खाना खाने के लिए कहा. मोहनलाल तब इधर उधर देखते की कंही उनकी हरकत किसी ने देखि तू नहीं और जब वो बाकियों को खाना कहते देखकर उन्होंने चैन की सांस ली.

थोड़ी देर बाद खाना ख़तम करने के बाद सब चलने के लिए तैयार हुए तू कैब बुलाकर उसमे चलने लगे तू आदित्य आगे ड्राइवर के साथ बैठ गया. संध्या को विंडो के पास बैठना था क्योँकि उससे बिच में बैठने में प्रॉब्लम होती थी, उसके बाद रुचिका और फिर मोहनलाल. कैब चल पड़ी और सबने फोर्ट जाने का फैसला किया.

अब सिचुएशन यह थी की आदित्य तू अपने ब्लूटूथ कान में लगाकर गाने सुन रहा था, संध्या काफी समय बाद घर से बहार आयी थी तू उससे बहार के नज़रों में दिलचस्पी थी. बाकि बचे मोहनलाल और रुचिका जब वो बैठे तू पिछली सीट पर तीन लोग होने की वजह से फंस कर hi बैठे थे.

उन दोनों की टाँगे एक दूसरे की टांगों से मिली हुई थी जिससे कैब के चलने की वजह से वो आपस में हिरशन हो रहा था और उन दोनों के अरमानो को भड़का रहा था. दोनों बिच बिच में एक दूसरे को निहार रहे थे और रुचिका के शरीर से उठाने वाली खुस्भु और उसके परफ्यूम की महक के समागम ने मोहनलाल को तू मदहोश करने में कोई कसार hi नहीं छोड़ी थी.

उधर रुचिका मोहनलाल को इतने समय के बाद अपने इतने समीप पा कर उसके अरमानों ने भी आकाश में उड़ने की तयारी कर ली थी. इसी वजह से उसने अपनी बाजु को जो मोहनलाल की बाजु से छू रही थी को थोड़ा उठाकर आगे कर लिया, जिससे मोहनलाल की बाजु थोड़ा पीछे हो गयी और वो रुचिका को चुने लगी और मोहनलाल के बाज़ू की कोहिनी रुचिका के उरोज को चुने लगी और कैब के चलने से थोड़ा दबाव भी डालने लगी जिससे दोनों मोहनलाल और रुचिका आनंद के सागर में जाने लगे.

अभी इनका खेल खुश और आगे बढ़ता वो सब फोर्ट पंहुच गए.

जब कैब वाले को पैसे देने लगे तू उसने पूछा की साहब और कहीं जाना है तू उसे कहा गया की अभी नहीं बता पाएँगे तब उसने कहा की "साहब अगर आप कान्हे तू मैं यही वेट करता हु और आप से सिर्फ आधे दिन के पैसे लूंगा और आप जंहा चाहेगे वंहा घुमा दूंगा." उसकी बात मान गए और अंदर जाने लगे.

टिकट्स लेकर वो सब अंदर जाने लगे तू वंहा पर ऊपर की तरफ जाने के लिए काफी लम्बा रैंप था. आदित्य और रुचिका आगे चल रहे थे और मोहनलाल और संध्या उनके बिलकुल पीछे चल रहे थे. थोड़ी दूर चले hi थे की रुचिका की ऊँची एड़ी की सैंडल उबड़ खाबड़ पथरो के रस्ते पर पता नहीं किस चीज़ में अटक गयी तू वो गिराने लगी, जब तक यह होता तब तक आदित्य दो कदम आगे बढ़ चूका था और रुचिका को पीछे से गिराने से बचने के लिए मोहनलाल ने बड़ी फुर्ती से पकड़ लिया तू उसका बांया हाथ कमर से होता हुआ बांये उरोज के निचले हिस्से को छू रहा था बल्कि दबा रहा था और दांया हाथ उसके कंधे के पिछले हिस्से को संभल रहा था और उसकी उँगलियों ने ब्रा के स्ट्राप जो की उजागर हो गया था को छू रही थी. रुचिका दर गयी थी और अपनी आँखे बंद कर राखी थी. मोहनलाल ने उसे पकड़कर बड़े प्यार से खड़ा कर दिया और पूछा "कंही लगी तू नहीं"

तब तक संध्या ने भी आगे बढ़ कर रुचिका को सँभालते हुए पूछा "रूचि बीटा ठीक हो न" और आदित्य भी मुड़कर वापिस आ गया और कहने लगा "दी, अरे यू ऑलराइट, सॉरी मेरा ध्यान कंही और था"

रुचिका: मैं बिलकुल ठीक हु, वो बस मेरे सैंडल अटक गया था

मोहनलाल ने रुचिका की आँखों में आँखे डालकर उसके ठीक होने की पुष्टि के बारे में पूछा तू उसने आँखों के इसशरए से उसे आश्वस्त कर दिया.

उसके बाद सब आगे चलने लगे तू रुचिका का एक पेअर मुड़ने लगा और वो एक तरफ झुकी तू मोहनलाल ने उसे फिर से थम लिया और इस बार उसकी कमर से पकड़ा तू वो मोहनलाल की छथि से आ टकराई. दोनों के अरमानों को आग लगाती उससे पहले hi संध्या ने पूछा "क्या हुआ रूचि बीटा"

रुचिका ने नीचे झुखकर देखने लगी तू उसके नितम्बों ने मोहनलाल की टैंगो को स्पर्श किया जो की बहुत hi आकर्षक लग रहे थे और मोहनलाल को भड़काने में आग में घी दाल रहे थे.

रुचिका ने देखा की उसकी सैंडल की हील टूट गयी थी तू अब चलना मुश्किल था. मोहनलाल रुचिका को एक तरफ से पकड़ कर चलने लगा तू उसके उरोज बार बार मोहनलाल की साइड में टकराकर उसके रक्त परवाह को बढ़ा रहे थे. मोहनलाल ने आदित्य से कहा "बीटा हम धीरे धीरे आते हैं, तुम ज़रा आगे जाकर देखो की कोई सैंडल ठीक करने वाला बैठा हो या कोई नै जुटी बेचने वाला हो तो अपनी दी के लिए एक नयी जुटी खरीद लाओ"

धीरे धीरे चलते हुए दोनों अपनी प्रेम क्रीड़ा में डूबकर आनंद मगन हो रहे थे और छह रहे थे की यह समां बंधा hi रहे और कभी ख़तम न हो. लेकिन यह संभव नहीं था.

आदित्य थोड़ी देर बाद एक राजस्थानी जुटी ले आया तू रुचिका ने अपने सैंडल उतर कर जुटी पहन ली जो की बिलकुल सही माप की थी और कम्फर्टेबले भी.

रुचिका ने आदित्य को थैंक्स कहा और आगे चल पड़े. थोड़ी देर वो सब नीचे घूमते रहे और कुछ ग्रुप फोटग्राफ्स भी लिए और अब थोड़ा थक गए तू एक स्टाल पर पानी और कोल्ड ड्रिंक्स ले ली और पिने लगे.

आदित्य ने सब से कहा की अब तीन जगह और जाना है तब संध्या ने कहा "बीटा मैं तू अभी से थक गयी हु, तुम ऐसा करो की सब घूम आओ मैं यही इंतज़ार करुँगी"

आदित्य: क्या माँ घूमने आयी हो और कहती हो की यही वेट करुँगी

संध्या: मैं जोश जोश में आ गयी लेकिन अब हिम्मत नहीं हो रही.

मोहनलाल: अगर ऐसी बात है तू एक काम करते हैं की मैं भी तुम्हारे साथ रुक जाता हु और आदित्य और रुचिका घूम आएंगे.

आदित्य: क्या पापा आप भी ना, ऐसा करते हैं की आगे का प्रोग्राम कैंसिल और वापिस चलते हैं.

मोहनलाल: नहीं बीटा तुम दोनों घूम कर यही आ जाना, हम वेट कर लेंगे

आदित्य: पापा मैं तू कई bàar होकर आया हु, लेकिन आपने कभी नहीं देखा, अंदर बहुत अच्छे गार्डन्स, कोर्टयार्ड और सीनरी है. आप और दी चले जाओ, मैं माँ का ख्याल कर लूंगा

पापा: नहीं बीटा, तुम और रुचिका चले जाओ

संध्या: आप hi चले जाइये न रूचि के साथ. हो सकता है थोड़ी लड़ाई ख़तम हो जाये.

मोहनलाल: तुमने अब बात ऐसी कह दी है की मुझे जाना hi पड़ेगा, वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए बता दू की मेरी कोई लड़ाई नहीं है और तुम्हारा वहां दूर करना hi पड़ेगा.

उधर रुचिका इस नोकझोंक का मन hi मन बहुत आनंद ले रही थी, लेकिन प्रत्यक्ष में उसने बोलै, "माँ वापिस चलते हैं और फिर कभी आ जाएँगे". उसकी बात सुनकर संध्या बोली 'अरे बीटा आज इतने दिनों बाद तू बड़ी मुश्किल से हम सरे इक्क्ठे आये हैं, फिर पता नहीं कभी मौका मिले न मिले और तुम ने पहली बार घूमने के लिए कहा है तू बीटा मेरी मनो पापा के साथ घूम आओ, तब तक मैं तुम्हारी वेट करुँगी और आराम से घूमना, आदित्य है मेरी देखभाल के लिए". उसके बाद रुचिका और मोहनलाल दोनों वंहा से जाने लगे और आदित्य अपनी माँ के साथ वंहा एक चूबतरे पर छांव के नीचे आराम से बैठ गए.
 
अपडेट 4



उधर रुचिका इस नोकझोंक का मन hi मन बहुत आनंद ले रही थी, लेकिन प्रत्यक्ष में उसने बोलै, "माँ वापिस चलते हैं और फिर कभी आ जाएँगे". उसकी बात सुनकर संध्या बोली 'अरे बीटा आज इतने दिनों बाद तू बड़ी मुश्किल से सरे इक्क्ठे आये हैं, फिर पता नहीं कभी मौका मिले न मिले और तुम ने पहली बार घूमने के लिए कहा है तू बीटा मेरी मनो पापा के साथ घूम आओ, तब तक मैं तुम्हारी वेट करुँगी और आराम से घूमना, आदित्य है मेरी देखभाल के लिए". उसके बाद रुचिका और मोहनलाल दोनों वंहा से जाने लगे और आदित्य अपनी माँ के साथ वंहा एक चूबतरे पर छांव के नीचे आराम से बैठ गए.

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रुचिका

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मोहनलाल

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संध्या



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आदित्य

रुचिका और मोहनलाल वंहा से जाने के बाद एक बड़े से गेट से दूसरी बिल्डिंग में प्रवेश कर गए. वंहा पर आगे जाकर दो रस्ते थे, एक वंहा से गार्डन्स की तरफ जाता था और दूसरा सीढ़ियों से भवन के अंदर जाता था. मोहनलाल ने रुचिका से पूछा की "पहले कान्हा जाना हैं"

रुचिका ने उसका जवाब दिया की "जंहा चाहे ले चलो, लेकिन मुझे तू आपके पास रहना है"

मोहनलाल: मेरे साथ hi तू जाओगी, अकेले तू नहीं जाने दे रहा न

रुचिका: ऐसे hi कहते हैं, आप तू मुझे आदित्य के साथ बेझ रहे थे

मोहनलाल: वो तू इसलिए भेज रहा था की मुझे लगा तुम मेरे साथ नहीं जाना चाहती.

रुचिका: आपको ऐसा क्योँ लगा

मोहनलाल: याद करो, घर पर तुमने घूमने के लिए आदित्य को कहा था न की मुझे

रुचिका: वो तू इसलिए कहा था ताकि किसी को कुछ पता न चले

मोहनलाल उसकी बात सुनकर हंसने लगे तू रुचिका को समझ आया की यंहा पर भी आदित्य का नाम इसलिए लिया ताकि उन दोनों को पता न चले की मोहनलाल और वो जाना चाहते थे. जब रुचिका को अपनी गलती का एहसास हुआ तू उसे अपने ऊपर शर्म भी आ रही थी और ाचा भी लग रहा था. फिर उसने मोहनलाल को थैंक्स कहा और गार्डन्स में चलने के लिए कहा.

मोहनलाल उसको लेकर गार्डन्स में चल पड़ा और जब थोड़ा आगे गार्डन्स में जाने लगे तू रुचिका ने मोहनलाल का हाथ अपने हाथ में ले लिया और उसके कदम से कदम मिलकर चल रही थी. मोहनलाल ने भी रुचिका की उँगलियों में अपनी उँगलियों को डालकर उसे जाता दिया की वो भी उसके साथ उतनी hi गरम जोशी से साथ में हैं और उसके साथ hi रहने का एक मूक आश्वासन था. इससे रुचिका को अच्छा लगने लगा.

गार्डन्स बहुत hi सुन्दर थे और इनकी शैली मुग़ल उद्यानों की चारबाग शैली जैसी है. ये एक सितारे के आकार के ताल में लगे केंद्रीय फव्वारे को घेरे हुए शेष भूमि से कुछ निचले स्टार पर धंसे हुए shaṭakoṇaiy आकार के बने हुए थे जिन में संगमरमर की बनी patalee-patalee नालियां पानी ले जाती थी. उद्यान के लिए जल महल के निकास से आता था, इसलिए उद्यान हमेशा हरे भरे रहते थे. ुधयान काफी बड़ा था और कई तरह के पेड़ पौधे आउट फूल थे जिनका बहुत अच्छा ख्याल रखा गया था. आज साप्तहिक अवकाश न होने की वजह से बहुत hi काम लोग थे. उद्यान बिलकुल खली लग रहा था.

मोहनलाल और रुचिका एक कोने में चले गए जंहा पर किसी के आने के संभावना न के अरबार थी. वंहा जाकर दोनों एक पेड़ के नीचे इस तरह बैठ गए की किसी को दिखाई देने की संभावना नहीं थी तू मोहनलाल ने रुचिका को बिलकुल अपने साथ सत्ता काट बैठा दिया और अपना एक हाथ उसकी गर्दन के पीछे से लेजाकर कंधे पर रख दिया. दूसरा हाथ से रुचिका के हाथ को पकड़ा हुआ था. रुचिका के कंधे को धीरे धीरे सेहला रहे थे, लेकिन दोनों hi चुप थे.

रुचिका थोड़ा और खिसककर मोहनलाल के और समीप हो गई जिससे उनके शरीर आपस में जुड़ने लगे और रुचिका ने अपने सर को मोहनलाल के कंधे पर रख दिया जो यह जाता रहा था की मैंने अपनी साड़ी तकलीफे आपके नाम लिख दी है और मुझे इस कंधे पर सुकून मिलता है.

मोहनलाल ने रुचिका के कंधे को सहलाते हुए पूछा "तुम घूमने क्योँ आयी"

रुचिका: मुझे अकेले में आपके साथ वक़्त बिताना था

मोहनलाल: लेकिन तुम्हे अभी आराम की जरुरत है.

रुचिका: मुझे जो आराम आपके साथ मिलता है, वो मुझे कान्हा मिलेगा.

मोहनलाल: वो मैं भी जनता हु, लेकिन अगर तुम्हे कुछ हो गया तू, जानती हो न

रुचिका: मैं आपका साथ पाने के लिए कुछ भी कर सकती हु

मोहनलाल: प्लीज मेरी बात को समझने की कोशिश करो, आज तू तुमने अपने दिल की कर ली, प्लीज आगे से ऐसा मत करना.

रुचिका: नहीं करुँगी, लेकिन आपको भी मुझे वादा करना होगा की आप मुझे बिलकुल भी अकेले नहीं छोड़ोगे.

मोहनलाल: मैं वादा करता हु, लेकिन अभी रात को तुम्हे अकेले hi रहना पड़ेगा.

रुचिका: आप के बिना रहना अब मेरे लिए बहुत मुश्किल है.

मोहनलाल: मुझे थोड़ा सा टाइम दो, फिर तुम्हे शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.

रुचिका: आप बहुत ाचे हैं और मुझे पूरा विश्वास है की आप अपनी बात को जल्दी से जल्दी पूरा करेंगे.

मोहनलाल: अब तुम्हे तू सब पता है, कुछ मजबूरिया है जिन्हे जल्दी hi निपटा कर हम इक्कठे hi रहेगे.

रुचिका ने अपने एक हाथ को मोहनलाल की पीठ पर ले गयी और मोहनलाल के गले लग गयी और भावुक होने लगी तू मोहनलाल ने भी उसे बड़े आराम से गले लगा लिया और फिर धीरे धीरे उसकी पीठ को सहलाने लगे जो की रुचिका को बहुत hi अच्छा लग रहा था और उसका बस चलता तू वो इस वक़्त को यही थम लेती.

वो बोली

"काश यह वक़्त यही थम जाए

काश यह पल हमारे कदम चुम जाए,

हर एक लम्हा तुम्हारे साथ मुझको अच्छा लगता है,

है मेरे दिल को छूटा है.

अकेली थी मैं न अब हु अकेली,

दिल ने तुझे पुकारा, समझ मेरा इशारा है काश यह वक़्त यही थम जाए"

मोहनलाल: वक़्त तू थमेगा नहीं, लेकिन जितना वक़्त अभी हम साथ साथ है, उसका सदुपयोग कर लो

रुचिका: फिर न कहना की न करो

मोहनलाल: मैंने तुम्हे कभी मन hi नहीं किया, वो तू मुझे तुम्हारी चिंता है, इसलिए मन करता हु, बाकि तुम्हारी मर्जी

रुचिका वंही पर मोहनलाल की टैंगो पर सर रख लिया और लेत गयी और कहने लगी, "मुझे यंहा पर बहुत सुकून मिल रहा है"

मोहनलाल ने बड़े प्यार से उसका सर सहलाते हुए कहा "थक गयी न"

रुचिका: हाँ

मोहनलाल: (उसके गलो को बड़े प्यार से सहलाते हुए) मैं इसलिए तू कह रहा था की तुम्हे घूमने नहीं आना था, आराम करना था

रुचिका: अगर नहीं आता तू आपका साथ कैसे मिलता, आपके साथ के लिए तू मैं कुछ भी कर सकती हु

मोहनलाल: जनता हु और तुम्हे क्या लगता है मैं तुम से अलग रहना छठा हु, बिलकुल भी नहीं

इतना कहकर मोहनलाल ने अपने चेहरे को नीचे झुका कर उसके माथे पर अपने होंठ रखकर धीरे से चुम लिया और फिर अपने हाथ से उसके कंधे और हाथ को सहलाने लगा जो की रुचिका को बहुत सुख दे रहा था.

रुचिका: (हँसते हुए) अब चलें, नहीं तू पता चला की हमारी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिक्वा दी गयी है.

मोहनलाल: अब घूमने का मन नहीं हैं

रुचिका: वो तू पहले भी नहीं था, लेकिन इस बहाने आपका साथ मिल गया. लेकिन कुछ फोटो खींच लेते हैं ताकि उनको लगे की हम घूम कर आ रहे हैं. अभी तू ऊपर भी जाना है

मोहनलाल: कैसे जाओगी थक जाओगी.

रुचिका: तू चलो फिर बहार चलते हैं

मोहनलाल: एक काम करते हैं, मैं तुम्हे उठा लेता हु और ऊपर ले जाता हु और वंहा पर सेल्फी ले लेना और फिर वापिस आ जायेंगे.

रुचिका: आपकी बांहो में आने के लिए तू मैं कुछ भी कर सकती हु

ऊपर जाने वाली सीढ़ियों पर जाने से पहले मोहनलाल ने रुचिका को अपनी बांहो में उठा लिया तू रुचिका ने भी अपनी बांहे मोहनलाल के गले में दाल दी तू मोहनलाल ने उसे अपने से चिपका लिया जिससे उसके उरोजोनो ने मोहनलाल की चौड़ी छाती का स्पर्श किया तू दोनों की भावनाओं ने भड़काना शुरू कर दिया.

मोहनलाल धीरे धीरे उसे उठाये उठाये ऊपर चढाने लगे और मोहनलाल की नज़र में उसके उरोजोनो के बीच की घाटी का भी नज़ारा बहुत अच्छे से दिख रहा था जो रुचिका ने भी देख लिया तू उसने पूछा "क्या देख रहे हो"

तब मोहनलाल ने कहा की "सोच रहा हु की स्वर्ग से उतरी अपसरा मेरी बांहों में है, कंही गलती से इससे गिरा न दू"

रुचिका हँसते हुए "मज़ाक अच्छा करते हैं आप"

मोहनलाल: मैं मज़ाक कान्हा कर रहा हु

रुचिका: सुबह तू नज़र कंही और थी

मोहनलाल: कान्हा थी

रुचिका: वो आपको भी पता है

मोहनलाल: वो तू मैं यह सोच रहा था की पुरे जंहा की खूबसूरती तुम्हारे अबदार आ जाये और तुम इस दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की बन जाओ.

रुचिका: बाते बनाना और उनको घूमना कोई आपसे सीखे

अभी और कुछ कहते वो दोनों ऊपर पंहुच गए तू मोहनलाल ने रुचिका को नीचे उत्तर दिया, वंहा से पुरे शहर का नज़ारा दिखाई दे रहा था. वो जगह ऐसी थी जंहा पर राजा की साडी रनिया रहती थी, वंहा एक ऐसी भूल भुलैया थी जंहा पर राजा किसी भी रानी के पास जा सकता था.

वंहा पर दोनों ने कुछ सेल्फी खींची, कुछ तू नार्मल थी, लेकिन कुछ ऐसी भी खींची जिसमे दोनों इंटिमेट हो रहे थे, जैसे की एक दूसरे की बांहो में, एक दूसरे से गले लगे हुए, मोहनलाल रुचिका के पीछे खड़ा होकर हुग करते हुए, रुचिका और मोहनलाल एक दूसरे के गलो पर किश करते हुए, रुचिका मोहनलाल की गॉड में बैठी हुई और मोहनलाल ने रुचिका को अपनी बांहो में उठा रखा है और उसके गलो को किश कर रहा है.

जब इंटिमेट वाली भी सेल्फी खींच ली थी, उन्हें एक सीक्रेट फोल्डर में स्टोर कर लिया और बाकि फोटो उन दोनों को दिखने के लिए.

मोहनलाल और रुचिका ने अब वापिस जाने से पहले ये डीडे किया की रानी का कमरा देख लिया जाये तू वे दोनों वंहा चले गए और उसे देखकर उसकी प्रशंशा करए हुए बहार निकलने लगे तू रुचिका ने मोहनलाल का हाथ पकड़ लिया और एकदम से मोहनलाल के गले लग गयी और अपने हाथो को मोहनलाल की पीठ पर लेजाकर अपने से कास लिया और अपनी एड़ी पर खड़े होकर अपने नरम नरम होंठों को मोहनलाल के गलो से रगड़ने लगी.

मोहनलाल ने भी उसे अपनी बांहो में भर लिया और उसे ज़मीन से ऊपर उठा लिया और अपने गालो को उसके होठों से रगड़ते हुए घुमाकर अपने होंठों को उसके गलो पर रख दिया. फिर धीरे धीरे अपने होंठों को उसके गको को चूमने लगे. रुचिका ने अपने होंठों को मोहनलाल के होंठों पर चिपका दिए और फिर दोनों एक दूसरे को पैशनेट किश करने लगे. दोनों के शरीर एक दूसरे से जुड़े हुए थे और मोहनलाल ने अपनी बाज़ुओं को रुचिका की पीठ को सहलाते हुए उसके नितम्बों पर ले आये और फिर नितम्बों के नीचे ले जाकर रुचिका को संभल लिया और फिर थोड़ी देर में अपने होंठों को अलग करते हुए रुचिका की तरफ देखा तू उसने शर्माकर अपना चेरा मोहनलाल की छथि में छुपा लिया.

फिर थोड़ी देर बाद मोहनलाल ने रुचिका से कहा "अब चलें'

रुचिका अपने चेहरे को मोहनलाल की छाती में छुपाये हुए कहा "मुझे पता नहीं"

मोहनलाल माहौल को हल्का करते हुए बोले "अगर चाहती हो की गुमशुदगी की रिपोर्ट न हो तू चलें'
 
अपडेट 5



मोहनलाल माहौल को हल्का करते हुए बोले "अगर चाहती हो की गुमशुदगी की रिपोर्ट न हो तू चलें'

उधर मोहनलाल और रुचिका के जाने के बाद संध्या और आदित्य वंही बैठे हुए थे तू आदित्य ने बात शुरू करते हुए कहा "माँ आप बहार क्योँ घूमने नहीं जाती"

संध्या: किसके साथ जॉन, तुम्हारे पापा एक तू बहुत व्यस्त रहते हैं और दूसरा उनके टूर भी बहुत लगते हैं

आदित्य: आप उनके साथ टूर पर तू चले जाया करो

संध्या: शुरू में इनके साथ गयी थी लेकिन मुझे इंग्लिश नहीं आती तू बड़ा बुरा महसूस होता था और दूसरे लोगों के साथ जो महिलाये आती थी वो फर्राटेदार इंग्लिश बोलती थी. मुझे लगता था की एक तू खर्चा जयादा करो और कई बार मुझे ऐसा भी लगता था की मेरी वजह से व्यापार में नुक्सान हो गया तू मैंने जाना hi बंद कर दिया.

आदित्य: आपको पापा ने ऐसा कभी कहा

संध्या: तुम्हारे पापा तू बहुत अच्छे इंसान हैं और कभी भी नुक्सान के बारे में नहीं कहते, लेकिन मुझे महसूस होता था की ऐसा हुआ है . फिर दूसरा कारन यह भी था की हर बार किसी न किसी को तुम लोगों की देखभाल के लिए बोलना पड़ता था जो मुझे अच्छा नहीं लगता था. धीरे धीरे जाना बंद कर दिया और अब आदत पद गयी और मैंने अपने आप को घर की चारदीवारी में hi सीमित कर लिया.

आदित्य: फिर आज कैसे घूमने की हिम्मत कर ली

संध्या: वो आज तुम्हारी दीदी आयी तू मैंने सोचा की तुम सब के साथ मुझे कोई कठिनाई नहीं होने वाली थी, इसलिए आ गयी, लेकिन अब घुटनो के दर्द ने इस आनंद में भी खलल दाल दिया.

उसकी बात सुनकर आदित्य नज़दीक आकर संध्या के एक घुटने पर हाथ रखकर धीरे धीरे मालिश करने लगा तू संध्या ने कहा "रहने दे ऐसे hi ठीक हो जायेगा" लेकिन अपने मन में वो छह रही थी की आदित्य ऐसे hi करता रहे, क्योँकि इस मालिश से जयादा उसे आदित्य के हाथों का अपने शरीर के हिस्से पर स्पर्श एक अलग hi अनुभूति प्रदान कर रहा था और उसके मन के कोने में यह बात आ रही थी की वो ऐसे hi करता रहे.

आदित्य: माँ जब हम यंहा बैठे hi हैं तू मुझे आपकी मालिश करने में क्या परेशानी होगी और इससे आपका थोड़ा दर्द भी काम हो जायेगा

संध्या: ज़िद कर रहा हैं तू मैं तुझे नहीं रोकूंगी लेकिन थक जाये तू बता देना.

आदित्य उसके घुटने की मालिश करता रहा और थोड़ी देर बाद उसने अपने हाथ को दूसरे घुटने पर ले जाने के लिए अपने आप को संध्या के और नजदीक करके उसपर अपने आप को थोड़ा संध्या के ऊपर झुक्का लिया. फिर अपने हाथ को जैसे hi संध्या के घुटने पर लगाया तू संध्या के मुंह से "आह" निकल गयी तू आदित्य ने पूछा "दर्द हो रहा है न"

संध्या: हाँ थोड़ा थोड़ा

आदित्य: (संध्या के शरीर से निकलने वाली सुगंध को महसूस करते हुए हलके हाथ से मालिश करने लगा) आप चिंता न करो, यह दर्द तू क्या मैं आपके हर दर्द को हर लूंगा और आपको साडी खुशियां प्रदान करूँगा.

उसकी बात सुनकर संध्या ने उसे अपने गले से लगा कर उसके माथे को चूमते हुए "मेरा बड़ा ख्याल है"

आदित्य का चेहरा संध्या की चूचियों पर होने की वजह से आदित्य के दिल में एक अलग किसम की हलचल होने लगी थी जो उसको समझ नहीं आ रही थी लेकिन उससे अच्छा लग रहा था और संध्या को भी अच्छा लग रहा था लेकिन दोनों की समझ से परे था की यह कौन सी भावना है.

आदित्य: आपका ख्याल मैं नहीं रखूँगा तू कौन रखेगा, हाँ आपसे एक वादा भी चाहिए की अब आप अपने आप को खुश रखेंगी.

संध्या: कोशिश करुँगी

आदित्य: (मालिश करते हुए) कोशिश नहीं वादा

संध्या: अच्छा वादा

आदित्य: अब आप हर हफ्ते काम से काम एक बार घूमने जाओगी

संध्या: दो बाते हैं, पहली मुझे इंग्लिश नहीं आती और दूसरा मैं किसके साथ जाउंगी

आदित्य: पहली बात आज से आपको इंग्लिश मैं सिखाऊंगा और दूसरा आप से वादा रहा की हफ्ते में एक दिन जरूर आप के साथ जाऊंगा

संध्या: तुम कॉलेज जाओगे और छुट्टी वाले दिन तू तुम क्रिकेट खेलने जाते हो, फिर कैसे जाओगे

आदित्य: आप बिलकुल चिंता न करो, मैं मैनेज कर लूंगा और जरुरत पड़ी तू क्रिकेट छोड़ दूंगा लेकिन आप को घुमाकर लाऊंगा.

संध्या: वो सब ठीक है लेकिन मेरे लिए क्रिकेट नहीं छोड़ना

आदित्य: क्रिकेट तू क्या आपकी ख़ुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकता हु

संध्या: इतना ख्याल है मेरा

आदित्य: (संध्या की आँखों में देखते हुए) क्योँ नहीं होना चाहिए

संध्या: (मन hi मन खुश होते हुए) लेकिन घूमने के लिए पैसे भी तू चाहिए होंगे

आदित्य: पैसे क्योँ चाहिए होंगे

संध्या: क्या हर जगह हमें फ्री में मिलेगा, जंहा भी जायेंगे पैसे लगेंगे

आदित्य: पापा के साथ जाती थी तू पैसे नहीं लगते थे

संध्या: इसलिए तू मैंने जाना छोड़ दिया था. लेकिन कई बार फ्री का टूर भी मिल जाता था तू बिना पैसे के घूमने को मिल जाता था परन्तु मुझे इंग्लिश न आने के वजह से शर्म आने लगी तू जाना बिलकुल बंद कर दिया.

आदित्य: इस लिए पीछे कई बार आपने दीदी को पापा के साथ घूमने भेजा था.

संध्या: Hàan वो बताया न की कई बार फ्री में खाना पीना और रहना मिल जाता था तू मैं सोचती थी की तुम्हारी दीदी को इंग्लिश भी अच्छी आती है तू घूम आएगी और उसे कुछ अनुभव भी हो जायेगा.

आदित्य: लेकिन लोकल घूमने में तू पैसे नहीं लगेंगे

संध्या: पैसे के बिना कुछ नहीं होगा, इसलिए तुम रहने दो

आदित्य: माँ अब आप इंग्लिश séekhane और हर हफ्ते घूमने के लिए तैयार हो जाओ, पैसे अर्रंगे करना मेरा काम है

संध्या: लेकिन कैसे

आदित्य: मैं टुइशनस करके पैसे लाऊंगा, आप चिंता न करो

संध्या: लेकिन एक बात बता, तुम इतने बड़े हो गए तू जब घूमने जाओगे तू क्या कहोगे की माँ के साथ घूमने आये हो. कोई कुछ कह देगा तू तुम्हारा तू पता नहीं लेकिन मुझे बुरा लग जायेगा

आदित्य: क्या माँ आप भी न, मुझे तू कोई परेशानी नहीं की मैं अपनी माँ को घूमने लाया हु. वैसे भी हमारे रिश्ते का किसी को क्या पता चलेगा जब तक हम किसी को बताएँगे नहीं

संध्या: जब तुम मुझे माँ कहोगे तू पता नहीं चल जायेगा और मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा की तुम्हे मेरी वजह से कुछ सुन्ना पड़े.

आदित्य: कौन क्या कुछ कहेगा, हमें इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपनी ख़ुशी का ख्याल करना चाहिए.

संध्या: एक काम करते हैं, तुम मुझे दोस्त बनाकर ले जाया करना.

आदित्य: मतलब आप मेरी गर्लफ्रेंड बनकर जाएँगे

संध्या: (अपनी आँखों में आश्चर्य लेट हुए) गर्लफ्रेंड नहीं दोस्त

आदित्य: माँ वही तू कह रहा हु, आप लड़की हैं मतलब गर्ल और दोस्त का मतलब फ्रेंड तू हो गया न 'गर्लफ्रेंड'

संध्या: गर्लफ्रेंड नहीं

आदित्य: तू माँ hi ठीक है

संध्या: (काफी देर तक सोचने के बाद नज़रों को झुकाये हुए) गर्लफ्रेंड hi सही रहेगा.

आदित्य: (अपनी माँ के हाथों को अपने हाथों में लेकर) गर्लफ्रेंड बनकर आप को कैसा लग रहा है

संध्या: (शरमाते हुए) पता नहीं मैं बन भी पाऊँगी या नहीं

आदित्य: (संध्या की ठोढ़ी के नीचे उंगली रखकर उसे ऊपर उठा कर उसकी आँखों में झंकार) इसमें बनना क्या है, अब से आप मेरी गर्लफ्रेंड हो और अच्छा नहीं लगे तू माँ तू हो hi

संध्या: कोशिश करुँगी की अब तुम्हारी गर्लफ्रेंड बन जॉन, लेकिन एक समस्या है की तुम मुझे बुलाओगे कैसे

आदित्य: माँ, जैसे आप कहोगी वैसे hi बुलाऊंगा.

संध्या: गर्लफ्रेंड को माँ कहकर बुलाओगे तू हमरा रिश्ता किसी को बिना बताये भी पता चल जायेगा.

आदित्य: मुझे दोनों बातों में कोई प्रॉब्लम नहीं है, चाहे माँ हो या गर्लफ्रेंड. पहले तू आप बताओ की àआप को क्या अच्छा लगेग माँ या गर्लफ्रेंड

संध्या: (आदित्य की आँखों में झांकते हुए) गर्लफ्रेंड

और फिर यह कहकर संध्या ने शर्म से अपनी पलके झुका ली. आदित्य ने दोनों हाथों को चुम कर कहा

"आप बिलकुल भी चिंता न करें, संध्या डार्लिंग"

संध्या: (एकदम से अपनी पालकोंको उठाकर गुस्से में) नाम से बुलाएगा और साथ में डार्लिंग भी

आदित्य: (मायूस होते हुए) अगर बुरा लग रहा है तू सिर्फ और सिर्फ माँ

संध्या: (मुस्कुराते हुए) संध्या चलेगा, लेकिन इनके सामने नहीं

आदित्य: (मुस्कराते हुए) ठीक है संध्या डार्लिंग

दोनों hi खिलखियकार हंस पड़े तू आदित्य ने पूछा "संध्या डार्लिंग क्या लेना पसंद करोगी" संध्या ने कहा "कोल्ड ड्रिंक्स, लेकिन शर्त यह होगी की हम दोनों एक hi बोतल से पिएंगे"

आदित्य जाकर एक कोल्डड्रिंक की बोतल ले आया और संध्या के मुंह से लगा दिया तू उसने एक सिप ले ली. जब सिप लिया तू संध्या के हाथों पर लगी लिपस्टिक बोतल पर आ गयी. अब संध्या ने बोतल आदित्य को पीने के लिए दी तू आदित्य ने सिप तू लिया लेकिन साथ में बोतल पर लगी हुई लिपस्टिक को भी चाट गया. अब फिर से बोतल को संध्या के मुंह से लगाया तू उसने सिप लिया और दुबारा से बोतल पर लिपस्टिक के निशान आ गौए जो की आदित्य ने सिप के साथ साथ जानभूझकर उन निशानों को फिर से चाट लिया और यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक बोतल खली नहीं होगी. संध्या ने आदित्य द्वारा लिपस्टिक को छत्ते हुए देख लिया था और उसके दिल में हलचल होने लगी थी. बोतल तू ख़तम हो गयी थी लेकिन ऐसा लग रहा था की उनकी पयास अभी तक बरक़रार थी और इस खेल को जारी रखना चाहते थे, लेकिन दोनों hi एक दूसरे से नज़रे चुरा रहे थे.

अभी खेल को और जारी रखते मोहनलाल और रुचिका आते हुए दिखाई दिए तू दोनों hi सीधे होकर बैठ गए. उनके आने पर आदित्य ने पूछा "कैसा लगा महल, अभी दो जगह और हैं घूमने की"

मोहनलाल: अच्छा था, लेकिन अब ऐसा करते हैं की अब वापिस चलते हैं क्योंकि संध्या और रुचिका दोनों hi थक गयी हैं

सबने मोहनलाल की बात मानते हुए वापिस जाने का फैसला किया और कैब वाले को बुला लिया और उसे वापिस चलने के लिए कहा और कैब में उसी तरह बैठ गए जैसे आये थे. वापिस जाते हुए आदित्य और संध्या मन hi मन में खुश हो रहे थे की उनका एक नया रिश्ता कायम हो रहा था और आगे की सम्भावनों के बारे में सोच कर मगन हो रहे थे. रुचिका और मोहनलाल के शरीर आपस में अचे से स्पर्श कर रहे थे और मन hi मन ख़ुशी का अनुभव कर रहे थे. इन्ही विचारो में खोये हुए सभी घर पंहुच गए और कैब वाले को पैसे देकर घर के अंदर आ गए.
 
अपडेट 6



सबने मोहनलाल की बात मानते हुए वापिस जाने का फैसला किया और कैब वाले को बुला लिया और उसे वापिस चलने के लिए कहा और कैब में उसी तरह बैठ गए जैसे आये थे. वापिस जाते हुए आदित्य और संध्या मन hi मन में खुश हो रहे थे की उनका एक नया रिश्ता कायम हो रहा था और आगे की सम्भावनों के बारे में सोच कर मगन हो रहे थे. रुचिका और मोहनलाल के शरीर आपस में अचे से स्पर्श कर रहे थे और मन hi मन ख़ुशी का अनुभव कर रहे थे. इन्ही विचारो में खोये हुए सभी घर पंहुच गए और कैब वाले को पैसे देकर घर के अंदर आ गए.

घर में आने के बाद सब थके हुए थे लेकिन जोश सबका बुलंद था. सब ड्राइंग रूम में आकर बैठ गए और चाय पीने की इच्छा जताई तू संध्या किचन में जाने लगी तू

आदित्य बोलै "आज चाय मैं बना देता हु"

रुचिका: तुझे चाय बनानी आती है

आदित्य: चिंता न करो कामचलाऊ तू बना hi लूंगा और अपनी प्यारी दी को निराश नहीं करूँगा

रुचिका: रहने दे, हम बिना चाय के hi रह लेंगे

संध्या: अरे क्योँ लड़ रहे हो, मैं बना रही हु न

आदित्य: मैं भी आ रहा हु और आज तू आप मुझे चाय बनाना सीखा hi देना

संध्या: मैं बना दूंगी, तुम सब आराम करो

आदित्य: नहीं, अब तू मैं सीख कर hi रहुगा और दी से भी अच्छी बना कर दिखाऊंगा

यह कहकर वो भी किचन में चला गया तू मोहनलाल ने रुचिका से कहा "क्योँ तंग कर रही थी उसे"

रुचिका: (कुटिल मुस्कान से) अगर उसे तंग नहीं करती तू आप के साथ अकेले में टाइम कान्हा मिलता

मोहनलाल: (मुस्कुराते हुए) समझदार हो गयी हो

रुचिका: आपकी सहभत का असर है

मोहनलाल ने रुचिका को अपने पास बैठकर उसके कंधे पर अपना हाथ रख कर उसे अपने आगोश में ले लिया और फिर धीरे से उसके कंधे को सहलाते हुए अपने हाथ को उसके गाल पर लेजाकर उसे सहलाने लगे जिससे रुचिका को मदहोशी चने लगी.

उधर आदित्य किचन में जाकर संध्या के पास खड़ा होकर उसे चाय बनाते हुए देखने लगा तू संध्या ने कहा "मैंने कहा न जा मैं चाय बना दूंगी"

आदित्य: मैं चाय बनाने नहीं बल्कि अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने आया हु

संध्या: (मुस्कराते हुए) अभी तू मैं माँ हु गर्लफ्रेंड नहीं

आदित्य: अब तू आप गर्लफ्रेंड पहले हो, कभी कभी माँ बन सकती हो.

संध्या: मसखरी करता है

आदित्य: नहीं गर्लफ्रेंड के साथ वक़्त बिता कर उसके करीब होकर उसको खुश करना चाहता हु.

संध्या: सच में मुझे बहुत अच्छा लग रहा है तुम्हारा इस तरह मेरे पास आना, लेकिन दर भी लग रहा है की उनको पता न चल जाये

आदित्य: आप डरो नहीं, वो तू यही सोचानेगे की माँ बीटा किचन में हैं न की गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड. वैसे जो मज़ा चुप चुप के मिलाने में है वो सबके सामने कान्हा

संध्या: बात तू तुम सही कह रहे हो

आदित्य: अब आप ये बताओ की सबसे पहले आप अपने बॉयफ्रेंड के साथ पहली बार कान्हा घूमना चाहेंगी

संध्या: यह तू बॉयफ्रेंड को सोचना है की वो अपनी गर्लफ्रेंड को कान्हा घुमा कर खुश कर सकता है.

आदित्य: ठीक है तू आप अभी चाय के बाद तैयार रहना

संध्या: आज hi, लेकिन कैसे

आदित्य: आप बस देखती जाओ

इधर ये दोनों किचन में थे और उधर रुचिका मोहनलाल से कह रही थी की "आगे क्या होगा"

मोहनलाल: भरोसा है मुझ पर

रुचिका: (मोहनलाल के बाज़ू को कास कर पकड़कर उसके कंधे पर अपना सर रखते हुए) अपने से जयादा

मोहनलाल: फिर तुम कल चलने की तयारी करो

रुचिका: कल hi

मोहनलाल: हाँ कल hi

रुचिका का मुंह खुला का खुला रह गया और अपना सर उठाकर आश्चर्य से मोहनलाल को देख रही थी, और उसके कुछ भी कहने से पहले संध्या और आदित्य चाय और कुछ कहने को लेकर आ गए और संध्या ने जब मोहनलाल और रुचिका को इस तरह बैठे देखा तू

संध्या: लगता है आप दोनों की लड़ाई ख़तम हो गयी है

मोहनलाल: यार तुम भी न, हमारी लड़ाई हो या न हो लेकिन तुम तू करा कर hi रहोगी, ये तू मेरे से पूछने आयी थी की मैं अभी टूर पर तू नहीं जा रहा और जब इससे बताया की जा रहा हु तू भावुक हो गई

तब तक संध्या ने नाश्ता प्लेटो में डालकर सब को चाय और नाश्ता दिया

चाय और स्नैक्स का आनंद लेते हुए मोहनलाल बोले "मज़ा आ गया, बहुत hi अच्छी चाय बानी है और मन करता हैं की रोज रोज ऐसी चाय पियून, लेकिन मेरी ऐसी खुशकिस्मती कान्हा. अब देखो न मुझे कल hi टूर पर जाना है"

संध्या: कल hi! अब कान्हा जाना हैं

मोहनलाल: तुम्हे बताया तो था न की एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में मुझे कोई 15-20 दिन के लिए जाना पड़ेगा.

संध्या: लेकिन अभी तू बेटी घर आयी है और आप जा रहे हैं

मोहनलाल: मैं कोई ख़ुशी से थोड़ी जा रहा हु अगर नहीं गया तू काम से काम दस लाख का नुक्सान हो जायेगा.

संध्या: लेकिन बेटी तू बोर हो जाएगी न

मोहनलाल: तुम और आदित्य हो न, इसके लिए और मुझे उम्मीद है की तुम दोनों के साथ ये बोर भी नहीं होगी और मुझसे भी लड़ाई का कोई खतरा नहीं है

आदित्य: पापा मैं तू कॉलेज जाऊंगा तू मैं कान्हा वक़्त दे पाउँगा

रुचिका: (उदास होते हुए) मेरे लिए किसी के पास वक़्त नहीं है, इससे अच्छा मैं हॉस्टल वापिस चली जाती hi और वंही पर कोई जॉब धुंध लुंगी

मोहनलाल: तुम जॉब करोगी

रुचिका: क्योँ नहीं, ब किया है.

मोहनलाल: अगर तुम चाहो तू जिस कंपनी ने कॉन्ट्रैक्ट दिया है वंहा पर तुम्हारी जॉब लगवा देता हु और सैलरी भी अच्छी खासी होगी

रुचिका: (गुस्सा दिखते हुए) मैं अपने बुते पर जॉब धुंध लुंगी

मोहनलाल: मैं कान्हा मन कर रहा हु, लेकिन फ़िलहाल के लिए करके देखलो, कुछ एक्सपीरियंस भी मिल जायेगा और कमाई भी हो जाएगी

आदित्य: पापा ठीक कह रहे हैं

रुचिका: हाँ तुम तू मुझे यंहा से भागना चाहोगे, क्योँकि मेरे आने से तुम्हारी आज़ादी में खलल जो पद गया है.

आदित्य रुचिका की बात सुनकर भावुक हो गया और उठाकर रुचिका के पास आकर उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर कहने लगा "दी, मैं कितना भी आपकी नज़रों में बुरा सही, लेकिन मैं सपने में भी आपका बुरा नहीं छह सकता. मैं तू आपके भले के लिए कह रहा था, लेकिन आपको अगर जॉब नहीं करनी तू àआपकी मर्जी और दूसरी बात आपके आने से मैं कितना खुश हु वो मैं बता नहीं सकता.

रुचिका: मैं सब जानती हु, तू मुझे अपनी शरारतो से सततता था और मैंने थोड़ा सा छेड़ दिया तू भावुक हो गया. मुझे यह भी पता है की तुम हमेशा मेरा भला hi चाहते हो. (फिर उससे अपनी बांहो में ले लिया और एक दूसरे के प्रति अपनी एकजुटता दिखने लगे)

मोहनलाल: (रुचिका से मुखातिब होते हुए) फिर क्या डीडे किया

रुचिका: ऑफर तू बुरा नहीं हैं, लेकिन मैं आज hi आयी हूँ और कल आप जाने के लिए कह रहे हैं, अभी तू मैं माँ से ढंग से मिली भी नहीं

मोहनलाल: कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है

संध्या: वैसे देख तेरी मर्जी है, जॉब करनी है तू बहार जाना hi पड़ेगा और मैं तू काफी वक़्त से अकेले hi जिंदगी काट रही हु

रुचिका: मैं तब तक नहीं जाउंगी, जब तक आप की सहमति नहीं होगी.

संध्या: मैंने तू बहुत पहले hi अपने आप को तैयार कर लिया था तभी तुझे इनके साथ भेजा था ताकि कुछ एक्सपीरियंस मिल सके, इसलिए अगर मौका मिल रहा है तू जाना चाहिए.

फिर सब अपनी अपनी जगह खुश थे लेकिन चेरों पर सबने एक तरह की उदासी ूढ़ि हुई थी. आदित्य ने इस उदासी को तोड़ते हुए कहा "दी जॉब की ख़ुशी में पार्टी तू बनती है"

रुचिका: लेकिन अभी जॉब मिली कान्हा है, फिर भी तुझे आज पार्टी जरूर मिलेगी

आदित्य: दी ऐसी बात है तू आप पार्टी बाद में दे देना, आज तू पार्टी मेरी तरफ से

संध्या: नहीं, मेरी बेटी आयी है पार्टी मैं दूंगी तुम बस मुझे मार्किट ले चलो और मैं अपनी पसंद की चीजे लाऊंगी.

आदित्य: वैसे आप मुझे लिस्ट दे दो तू मैं ले आऊंगा बाकि आपकी मर्जी

संध्या: नहीं मैं अपनी पसंद से hi लेकर आउंगी, तुम नहीं ले जाना चाहते तू बात दूसरी है

आदित्य: चलो फिर अभी चलते हैं

इतना कहकर दोनों घर से निकल गए और आदित्य ने बाइक निकल ली और अपनी माँ को बैठने के लिए कहा. संध्या ने कहा "गिराओगे तू नहीं"

आदित्य: अपनी गर्लफ्रेंड को बड़े hi प्यार से लेकर जाऊंगा

संध्या: (बाइक पर बैठते हुए) बड़ी चालाकी से ले hi आया मुझे

आदित्य: (बाइक चलते हुए) क्योँ आपको आना पसंद नहीं है

संध्या: अगर पसंद नहीं होता तू आती क्या?

आदित्य: आप ठीक कह रही हो माँ

संध्या: माँ! तुम अपनी माँ को घूमने ले जा रहे हो की गर्लफ्रेंड को

आदित्य: लाया तू गर्लफ्रेंड को था लेकिन गलती से वो माँ निकली

सांध्य: क्या मतलब

आदित्य: आप जिस तरह से बैठी हो उस तरह से तू माँ hi बैठती है, न की गर्लफ्रेंड

संध्या: अब मुझे क्या पता की गर्लफ्रेंड कैसे बैठती है.

आदित्य: आजकल की गर्लफ्रेंड तू टांगों को बाइक के दोनों तरफ करके अपने बॉयफ्रेंड को कसकर पकड़ कर बैठती हैं

संध्या: लेकिन मैंने तो साड़ी पहनी हुई है तू ऐसे कैसे बैठ सकती हु

आदित्य: (बाइक रोककर माँ की तरफ मुड़कर उसकी आँखों में झांकते हुए) मतलब आपको वैसे बैठने में कोई परेशानी नहीं है और अगर साड़ी नहीं पहनी होतीं तू वैसे बैठ जाती

संध्या: (पलके झुकाते हुए) हाँ

आदित्य: (मन hi मन मुस्कराते हुए) कोई बात नहीं, अभी के लिए पुराने ज़माने की गर्लफ्रेंड की तरह आगे होकर मेरे कंधे पर हाथ रखकर बैठ जाओ.

संध्या: (आगे होकर उसके कंधे पर हाथ रखा और ऐसा करने से उसकी चूचियों आदित्य की कमर को छू रही थी तू उसके चेहरे पर शर्म और ख़ुशी के भाव थे) अब ठीक है

आदित्य: थैंक्स संध्या डार्लिंग

संध्या: बड़ी जल्दी माँ से संध्या डार्लिंग

आदित्य: आपको अच्छा नहीं लगा

संध्या: कुछ अजीब सा लग रहा है और अच्छा भी

आदित्य: अगर ज़िन्दगी को एन्जॉय जर्ना है तू बस जो भी पल ख़ुशी का मिले समेत लो

संध्या: क्या खूब मजबूरियां थी मेरी भी

अपनी ख़ुशी को छोड़ दिया उससे खुश देखने के लिए

आदित्य: क्या बात है, बहुत खूब आप तू शायरी भी करती हो तू एक मेरी तरफ से भी

तेरी ख़ुशी में hi है ख़ुशी मेरी

तेरे गम में तुझसे जयादा है हिस्सा मेरा

उसकी बात सुनकर

संध्या भावुक हो गयी और अपने हाथों को आगे ले जाकर आदित्य को पीछे से जकड लिया, जिससे संध्या एक डैम से आधी से जयादा आदित्य पर लड़ गयी और उसकी चूचियों ने आदित्य की कमर पर धंस कर उसके दिल में खलबली मचा दी और उसने एकदम से बाइक रोक दी, जिससे संध्या खिसक कर और आगे चली गई, अब तू ऐसा लग रहा था की उसकी चूचियां आदित्य की सख्त कमर से कुचल hi गयी हो. संध्या आदित्य की बात सुनकर इतनी खुश हो गयी की उसे कोई होश hi न रहा और वंही उसके सीने पर हाथ चलते हुए उसकी गर्दन और गाल को चूमने लगी.

आदित्य तू भौंचक रह गया और उसके दिल पर पहली बार संध्या की खूबसूरती ने एक लड़की वाली फीलिंग के साथ दस्तक दी और उसने भी जोश में अपने चेरे को घुमाकर माँ के गलो को चुम लिया, जिससे संध्या शर्मा गयी और आदित्य पर पकड़ को ढीला करके थोड़ा पीछे होकर बैठ गयी.

आदित्य ने अपने हाथ से उसके हाथ को पकड़ कर अपने कंधे पर रख लिया और बिना कोई बात किये बाइक को आगे बढ़ा दिया और इस बार dhéere dhéere चलने लगा. दोनों के दिल में प्यार की पहली चिंगारी लग चुकी थी जो अब इतनी आसानी से भुजने वाली नहीं लग रही थी.
 
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