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वही काम्य, अपने चेहरे के इतने पास मेरा बदसूरत चेहरा देख नज़रे हटा देती है पर जैसे hi उसको अपने टैंगो के बीच कुछ चुभने लगता है वो मुझे सवालो भरी नज़रो से देखने लगती है. मैं, भी अब्ब काम्य को देखते हुए उसकी गांड के दोनों भागो को पकड़ कर हलके से मसलता हु साथ hi साथ उससे थोड़ा ऊपर की तरफ करता हु जिससे काम्य थोड़ा ऊपर हो जाती है क्युकी काम्य राधे से छोटी थी, अब मैं, उसकी आँखों में देखते हुए उसके होंठो की तरफ अपने काळा सूखे और मोठे मोठे होंठो को बढ़ने लगता हु लेकिन काम्य, के लिए ये बिलकुल अनएक्सपेक्टेड था क्युकी उसने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था की उसके पति के मरने के इतने सालो बाद वह भी 43 साल के उम्र में कोई गैर मर्द जो उसके उम्र के आस पास hi है उसे इस तरह से चूमने की कोशिश करेगा,
इधर मेरे काले होंठ जैसे hi नज़दीक आते है वैसे hi काम्य अपने मुँह दूसरी तरफ फेर लेती है जिसकी वजह से मेरे होंठ एक बार उसके गालो को चूमते है और वो फिर एक दम से मेरी पकड़ से निकल कर दूर कड़ी हो कर लुम्बी लुम्बी सांसे लेने लगती है इस बिच ना तो वो कुछ बोली और न hi मैने, थोड़ी देर बाद वह सांसो को कण्ट्रोल करने के बाद काम्य को बहुत तेज की प्यास लगती है क्युकी इतने सालो बाद कोई मर्द उसके बदन को छुआ था जिसकी वजह से उसकी बदन में जैसे आग लग गई थी और उसी की प्यास बुझाने के लिए वो अपने फ्रिज से पानी का बोतल निकल कर पिने लगती है गट्ट.. गत्तत्त.. गट्ट.. गट्ट.. कुछ इस तरह से वह आवाज़ सुनाई पड़ती है, इधर किचन की हलकी रौशनी खिड़की के बहार से आ रही थी जिसकी रौशनी में काम्य जो एक हलकी कलर की साड़ी और डीप ब्लाउज़ पहनी हुई थी,
और ब्लाउज डीप होने से उसकी गोरी पीठ को देख मैं पंत के ऊपर से अपने लुंड को जोर से मसलता हु साथ hi उसकी पतली कमर जहा से उसकी साड़ी हटी हुई थी वह पर देख कर मैं हलकी सी ाठी भरता हु, काम्य का ब्लाउज भी सिर्फ एक डोरी पर टिका हुआ था जो उतरने के लिए माय बेताब हो रहा था और इसी बेताबी में मैं, अब ज्यादा वक़्त गवाए बिना काम्य को पीछे से एक बार फिर से पकड़ कर उसकी गर्दन पर चूमने लगता हु मेरे दोबरा हमले से काम्य, की हांथो से बोतल छुट्टे छुट्टे बची लेकिन खुद को और बोतल को सँभालते हुए आईये.. छोडो.. मुझे? क्या कर रहे हो आठ.. छोडो.. आह्हः.. इधर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता और मैं अब अपना कला लौड़ा जो इस वक़्त पंत के अंदर था उसे जोरो से काम्य के पीछे से उसकी साड़ी के ऊपर से गांड पर रगड़ते हुए, मैं, आह्ह्ह्ह.. क्या खुसबू आ रही..
है तेरी जिस्म से मेरी जान.. ुम्हहा.. काम्य, छू.. छोडो.. मुझे.. आठ.. नहीं तो मैं चिल्ला दूंगी.. छोड़ मुझे.. मैं, मन में (तिलक वाला घर है साली ने चिल्लाया तो सब यहाँ आ जायेंगे तब मेरी खैर नहीं होगी साथ hi रिश्ते जो नयी नयी बन रही है वो भी ख़राब हो सकते है), इतना सोच कर माय काम्य को छोड़ देता हु और मेरी पकड़ से छूटते hi.. काम्य, मेरी तरफ घूम कर.. तुम पागल हो गए हो क्या राधे? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे ऐसे छूने की. इतने देर से संत रहने के बाद आखिर कार काम्य को गुस्सा फोट पड़ता है और मैं, उसको भड़कता देख अपनी पुराणी ट्रिक जो मैं अक्सर औरतो पे आजमाता हु वही ट्रिक अपनाने की सोची और काम्य को देखते हुए, आपकी खूबसूरती में इतना खो सा गया की माय क्या कर रहा हु ये मुझे भी नहीं पता काम्य जी?,
इधर मेरे काले होंठ जैसे hi नज़दीक आते है वैसे hi काम्य अपने मुँह दूसरी तरफ फेर लेती है जिसकी वजह से मेरे होंठ एक बार उसके गालो को चूमते है और वो फिर एक दम से मेरी पकड़ से निकल कर दूर कड़ी हो कर लुम्बी लुम्बी सांसे लेने लगती है इस बिच ना तो वो कुछ बोली और न hi मैने, थोड़ी देर बाद वह सांसो को कण्ट्रोल करने के बाद काम्य को बहुत तेज की प्यास लगती है क्युकी इतने सालो बाद कोई मर्द उसके बदन को छुआ था जिसकी वजह से उसकी बदन में जैसे आग लग गई थी और उसी की प्यास बुझाने के लिए वो अपने फ्रिज से पानी का बोतल निकल कर पिने लगती है गट्ट.. गत्तत्त.. गट्ट.. गट्ट.. कुछ इस तरह से वह आवाज़ सुनाई पड़ती है, इधर किचन की हलकी रौशनी खिड़की के बहार से आ रही थी जिसकी रौशनी में काम्य जो एक हलकी कलर की साड़ी और डीप ब्लाउज़ पहनी हुई थी,
और ब्लाउज डीप होने से उसकी गोरी पीठ को देख मैं पंत के ऊपर से अपने लुंड को जोर से मसलता हु साथ hi उसकी पतली कमर जहा से उसकी साड़ी हटी हुई थी वह पर देख कर मैं हलकी सी ाठी भरता हु, काम्य का ब्लाउज भी सिर्फ एक डोरी पर टिका हुआ था जो उतरने के लिए माय बेताब हो रहा था और इसी बेताबी में मैं, अब ज्यादा वक़्त गवाए बिना काम्य को पीछे से एक बार फिर से पकड़ कर उसकी गर्दन पर चूमने लगता हु मेरे दोबरा हमले से काम्य, की हांथो से बोतल छुट्टे छुट्टे बची लेकिन खुद को और बोतल को सँभालते हुए आईये.. छोडो.. मुझे? क्या कर रहे हो आठ.. छोडो.. आह्हः.. इधर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता और मैं अब अपना कला लौड़ा जो इस वक़्त पंत के अंदर था उसे जोरो से काम्य के पीछे से उसकी साड़ी के ऊपर से गांड पर रगड़ते हुए, मैं, आह्ह्ह्ह.. क्या खुसबू आ रही..
है तेरी जिस्म से मेरी जान.. ुम्हहा.. काम्य, छू.. छोडो.. मुझे.. आठ.. नहीं तो मैं चिल्ला दूंगी.. छोड़ मुझे.. मैं, मन में (तिलक वाला घर है साली ने चिल्लाया तो सब यहाँ आ जायेंगे तब मेरी खैर नहीं होगी साथ hi रिश्ते जो नयी नयी बन रही है वो भी ख़राब हो सकते है), इतना सोच कर माय काम्य को छोड़ देता हु और मेरी पकड़ से छूटते hi.. काम्य, मेरी तरफ घूम कर.. तुम पागल हो गए हो क्या राधे? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे ऐसे छूने की. इतने देर से संत रहने के बाद आखिर कार काम्य को गुस्सा फोट पड़ता है और मैं, उसको भड़कता देख अपनी पुराणी ट्रिक जो मैं अक्सर औरतो पे आजमाता हु वही ट्रिक अपनाने की सोची और काम्य को देखते हुए, आपकी खूबसूरती में इतना खो सा गया की माय क्या कर रहा हु ये मुझे भी नहीं पता काम्य जी?,