Meri Pakiza Ammijaan Ka Bhrashtikaran - Page 6 - SexBaba
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Meri Pakiza Ammijaan Ka Bhrashtikaran

गजेंद्र ने फ़ोन उठाया और लाउडस्पीकर पर रख दिया जबकि अम्मी के मुँह की गीली लाया वाली आवाज़ें पूरे कमरे में गूँज रही थी. “Hello, हुसैन भाई,” उसने कहा, उसकी आवाज़ ज़्यादातर संभाली हुई थी लेकिन एक छोटी सी रुकावट थी जो सिर्फ मैं, अपने छुपे हुए जगह से खिड़की के बहार, पूरी तरह समझ सकता था.

अम्मी उसको एक असली प्रोफेशनल माहिर रंडी जैसी चूस रही थी — गहरे, उत्तेजित और बहुत hi माहिर तरीके से. उसका सर परफेक्ट लाया में हिल रहा था, गाल अंदर को खींचे हुए, जीभ उसके मोठे लुंड के नीचे वाले हिस्से पर ज़ोर ज़ोर से काम करते हुए जबकि एक हाथ नीचे की तरफ हिलता था और दूसरा उसके अंडो को नरमी से पकड़ कर मसलता था.

उसने उसको गले तक पूरा अंदर ले लिया, थोड़ा सा गैगिंग की आवाज़ आती थी जो सेंसेशन को और तेज़ कर देती थी बिना रुकावट के, लार उसकी थोड़ी से चमकती हुई लम्बी लड़ियों में टपक रही थी.

उसने उसकी तरफ ऊपर देखा वासना से भरी बेचैन आँखों से — बड़ी, पूरी तरह समर्पित और इच्छा से जलती हुई — जैसे उसका लुंड दुनिया में सबसे ज़रूरी चीज़ थी.

वह ऐसा क्यों कर रही थी? क्यूंकि वह अपने नए रोले में पूरी तरह समर्पित हो चुकी थी. अपने पति के साथ धोखा करने का हराम एहसास जबकि वह फ़ोन पर बात कर रहा था, पकडे जाने का खतरा और गजेंद्र के लिए उसकी गहरी वासना ने उसको एक असली माहिर बना दिया था.

वह उसको पूरी तरह खुश करना चाहती थी, उसको अपना कण्ट्रोल खोने देना चाहती थी और इसकी उत्तेजना ने उसको सब कुछ देने पर मजबूर कर दिया — कोई रोक नहीं, कोई शर्म बाकी नहीं थी.

गजेंद्र ने अपनी सिसकियों को ज़ोर से कण्ट्रोल करने की कोशिश की. उसके मुँह की गरम गीली चूस, जिस तरह उसकी जीभ हिलती और घूमती थी, उसके गले की टाइट पकड़ — यह सब उसके शरीर में सुख की तेज़ लहार भेज रहा था.

उसके कमर के हिस्से अनायासे हिल रहे थे लेकिन उसने होंठ काट लिए, धीरे धीरे सांस ली और अपनी आवाज़ को नार्मल रखने की कोशिश की. फिर भी छोटी छोटी सिसकियाँ शब्दों के बीच निकल जाती थी.

उसके चेहरे पर कन्फूसिओं साफ़ दीखता था: वह अपनी बीवी के पति से नार्मल बात करने की कोशिश कर रहा था जिसकी अम्मी अभी उसके लुंड पर मुँह रखे हुए थी, जबकि वही अम्मी उसकी तरफ पुरे भूखे समर्पण से देख रही थी.

हर बार जब अम्मी उसको और गहरा ले लेती या ज़ोर से चूसती उसकी आवाज़ रुक जाती या पहात जाती.

अब्बा की आवाज़ स्पीकर से साफ़ आयी, परेशां और थोड़ी बेचैन. “गजेंद्र भाई, शाहिदा कहाँ है? उसने कहा था की जब तुम काम ख़तम कर लोगे तोह मुझे कॉल करेगी लेकिन देर हो रही है. क्या वह अभी भी तुम्हारे साथ है?”

गजेंद्र का हाथ अम्मी के सर पर थोड़ा और टाइट हो गया जब उसने उसके लुंड के सर पर जीभ घुमाई. “वह… यहाँ है भाई. वह मुझे… फाइल्स में मदद कर रही है. अभी वह… नीचे वाली फाइल्स… ोुह्ह्ह!!! को ठीक से… टाइट जगहों पर काम कर रही है.”

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उसने “टाइट” शब्द पर रुकावट महसूस की क्यूंकि उसी पल अम्मी ने उसको फिर से गले तक गहरा ले लिया था, उसकी नाक उसके पेट से लगी हुई थी. गीली “ग्लुक” की आवाज़ इतनी ज़ोर से थी की मैं भी बहार से साफ़ सुन सका.

अब्बा को यह इन्युएन्दो बिलकुल समझ नहीं आया. वह सिर्फ रहत महसूस कर रहा था लेकिन अभी भी परेशां था. “ओह अच्छा. लेकिन इतना टाइम क्यों लग रहा है? यह किस तरह की फाइल्स हैं? क्या वह जल्दी घर आ सकती है? मैं परेशां हो रहा हूँ.”

गजेंद्र ने जवाब देने की कोशिश की जबकि अम्मी अब दोनों हाथ इस्तेमाल कर रही थी — एक गीले लुंड को हिलाते हुए दूसरा नीचे की तरफ ट्विस्ट करते हुए — उसका सर और तेज़ हिला रहा था.

“फाइल्स… बहुत मोती हैं भाई. उससे… उन्हें ध्यान से… दोनों हाथों से… सब कुछ ठीक से ओर्गनइजे करना पड़ता है. वह… बहुत अच्छे से काम कर रही है.” उसकी आवाज़ फिर से पहात गयी जब अम्मी ने उसके आसपास गले के मसल्स से उसके लुंड को निचोड़ दिया.

मैं खिड़की से देख रहा था, मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था. मेरी अपनी अम्मी घुटनो के बल बैठी थी, दुसरे आदमी के लुंड को एकदम प्रोफेशनल माहिर तरीके से चूस रही थी जबकि उसका पति उससे बात कर रहा था.

वह इतनी खोयी हुई थी — आँखें गजेंद्र के चेहरे पर लगी हुई, वासना और ज़रुरत से भरी. मुझे इमोशंस का तूफ़ान महसूस हो रहा था: शॉक, अब्बा के साथ जो वह कर रही थी उसके लिए घिन लेकिन साथ hi एक शर्मनाक तेज़ उत्तेजना जो मेरे लुंड को दर्द भरा थ्रोब दे रहा था.

यह मेरी अम्मी थी — वही औरत जो मुझे देर से घर आने पर डांटती थी, जो हिजाब पहनती थी और ,,., पढ़ती थी — अब गजेंद्र के लिए एक पूरी रंडी जैसी बेहवे कर रही थी.

मुझे यकीन नहीं हो रहा था फिर भी मैं देखना नहीं रोक प् रहा था. मेरा हाथ पहले से hi मेरी पंत में घुस चूका था, धीरे धीरे हिल रहा था जबकि शर्म और उत्तेजना अंदर लड़ रहे थे.

अब्बा और सवाल पूछता रहा. “क्या वह ठीक है? उसकी आवाज़ पहले अजीब सी थी. क्या तुम दोनों अकेला हो? वह अभी एक्साक्ट्ली क्या कर रही है?”

गजेंद्र ने नीचे अम्मी की तरफ देखा जो अभी उसको फिर से पूरा अंदर ले चुकी थी, उसकी आँखें पानी से भरी लेकिन अभी भी उसकी तरफ उसी भूखी एक्सप्रेशन से देख रही थी.

“वह… अभी ज़मीन पर है… नीचे वाली फाइल्स को हैंडल कर रही है… उसमें बहुत म्हणत कर रही है. वह दोनों हाथ इस्तेमाल कर रही है… ताकि सब कुछ… ठीक से सॉर्टेड हो जाए.”

वह ज़ोर से सांस ले रहा था, हर बार जब अम्मी की जीभ उसके सर के सेंसिटिव हिस्से पर दबती सिसकियों को छुपाने की कोशिश कर रहा था.

अम्मी ने फाइनली उससे फ़ोन ले लिया. उसने चूसना बिलकुल नहीं रोका — उसने उसके लुंड के सर को मुँह में रखा, चूसती और चाटती रही जबकि वह बात करती थी, उसके शब्द tut-te हुए और सांस भरे हुए थे.

“Hello… हुसैन… हाँ मैं यहाँ हूँ… काम में मदद कर रही हूँ… यह… बहुत डिमांडिंग है…”

उसने रोक कर उसको गहरा ले लिया, एक गीली “स्लुर्प” की आवाज़ फ़ोन पर साफ़ सुनाई दी, फिर बोली, “मैं… पेपर्स को सॉर्ट कर रही हूँ… टाइम लग रहा है क्यूंकि… बहुत सारे हैं…”

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अब्बा और भी परेशां लगा. “शाहिदा, तेरी आवाज़ कुछ ठीक नहीं लग रही. क्या थक गयी है? यह अजीब सी आवाज़ क्या है? लगता है जैसे… चूसने या गीली चीज़ की. क्या वहां सब ठीक है?”

अम्मी ने सिर्फ इतना टाइम के लिए मुँह हटाया की साफ़ जवाब दे सके फिर तुरंत वापस चूसने लगी, उसका सर फिर से हिलने लगा.

“यह ठीक है… बस पेपर्स… सरसरा रहे हैं… मैं ठीक हूँ…”

फिर से एक गीला “ग्लुक” की आवाज़ आयी जब उसने उसको गहरा ले लिया. वह जान बूझ कर कभी कभी जवाब देर से देती थी, चूसने की आवाज़ें सन्नाटे को भरने देती थी, जैसे खतरे ने उसको और भी उत्तेजित कर दिया हो.

गजेंद्र, थोड़ा टाइम अपने आप को सँभालने के लिए, चुपके से कमरे से बहार निकल गया पानी पिने. अम्मी घुटनो के बल hi रही, फ़ोन अभी भी एक हाथ में. उसने अपनी थोड़ी और मुँह से लार को हाथ के पीछे से पोछा, उसको अपने लाल चेहरे पर फैला दिया.

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यह नज़ारा बहुत hi गन्दा और बेहया था — उसका लिपस्टिक फैला हुआ, लार उसकी गर्दन से उसकी ड्रेस के आगे तक टपक रहा था, उसकी आँखें वासना से धुंधली. उस पल ने मुझे ज़ोर से मारा.

अपनी अपनी अम्मी को दुसरे आदमी के लुंड को इतने गहरे से चूसने के सबूत को साफ़ करते हुए देख कर मेरे अंदर कुछ टूट गया.

मैंने और तेज़ हिलना शुरू कर दिया, मेरा हाथ तेज़ चल रहा था, शर्म तेज़ जल रही थी लेकिन उत्तेजना उससे भी ज़्यादा स्ट्रांग थी. यह इतना बेइज़्ज़त करने वाला, इतना रंडी जैसा था और मुझे नफरत थी की यह मुझे कितना छोड़ रहा था.

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अब्बा की कन्फ्यूज्ड आवाज़ स्पीकर से आती रही. “शाहिदा? मैंने अजीब सी आवाज़ें सुनी… जैसे चूसने या गले में अटकने वाली. वहां क्या हो रहा है? क्या गजेंद्र भाई ठीक हैं? यह आवाज़ कैसी है?”

तभी गजेंद्र वापस आ गया. उसने कोई बात नहीं की. उसने सीधा अम्मी के सर को दोनों हाथों से पकड़ लिया, उसका चेहरा अपनी तरफ घुमा दिया और अपना लुंड उसके मुँह में ज़ोर से घुसा दिया.

उसने उसके गले को ज़ोर ज़ोर से और तेज़ छोड़ना शुरू कर दिया, उसके सर को मज़बूती से पकडे हुए जबकि उसके कमर के हिस्से आगे की तरफ झटके मार रहे थे.

अम्मी के हाथ उसकी जाँघों पर जा फटे, उसने उन्हें मज़बूती से पकड़ लिया ताकि संभल सके जब वह उसके मुँह का इस्तेमाल कर रहा था. उसकी आँखें पानी से भर गयी, हर झटके के साथ लार उड़ता जा रहा था लेकिन उसने कोई रोक नहीं लगायी — वह सब ले रही थी, उसका शरीर ज़ोर के झटकों से हिल रहा था.

आवाज़ें बहुत ज़ोर और गन्दी थी. “Gluck-gluck-gluck!” बार बार गूँज रही थी जब उसका लुंड उसके गले में ज़ोर से लग रहा था.

गीली “slurp-slurp” की आवाज़ें गले अटकने वाली “gack-gack” आवाज़ों के साथ मिल रही थी हर बार जब वह और गहरा जाता.

लार इधर उधर छींटे मार रहा था और लम्बी लड़ियों में टपक रहा था. फ़ोन रफ़ हरकत के दौरान टेबल से गिर गया था और उनके पास ज़मीन पर मुँह ऊपर करके पड़ा था, अभी भी लाउडस्पीकर पर. अब्बा की आवाज़ साफ़ आती रही, और परेशानी बढ़ती जा रही थी.

“शाहिदा? गजेंद्र भाई? यह कैसी आवाज़ है? लगता है जैसे कोई गले में अटक रहा हो! शाहिदा, मुझे जवाब दो! तू इतनी खामोश क्यों है? क्या हो रहा है?”

गजेंद्र उसके मुँह को ज़ोर से छोड़ता रहा, उसके सर पर मज़बूत पकड़, उसका इस्तेमाल करते हुए जैसे वह सिर्फ इसी के लिए बानी थी. अम्मी के हाथ उसकी जाँघों पर hi रहे, कभी और टाइट पकड़ते, कभी ऊपर की तरफ सरकते जैसे उसको और गहरा अंदर खींचना चाहती हो.

वह अब पूरी तरह खोयी हुई थी — अब कोई बात नहीं, सिर्फ उसका लुंड बार बार उसके गले के अंदर जाता रहा. गीली लाया वाली ग्लुकिंग और स्लुर्पिंग की आवाज़ें कमरे में भर गयी और सीधा अब्बा के कानों तक पहुंची.

अब्बा पूछता रहा, उसकी आवाज़ परेशानी और घबराहट से और तेज़ होती गयी.

“Hello? क्या कोई सुन रहा है? यह कैसी आवाज़ है? लगता है जैसे… मुझे नहीं पता… गीली आवाज़ें या कुछ टूट रहा हो. शाहिदा, क्या तू ज़ख़्मी है? गजेंद्र भाई, प्लीज जवाब दो!”

गजेंद्र की सांस तेज़ और बेहाल हो गयी. उसने ज़ोर से सिसकी भरी — गहरी, रोक नहीं पायी “फूऊक! आआह्ह्ह!” जब वह ज़ोर से झाड़ गया, अम्मी के सर को पूरा नीचे पकडे हुए अपना गरम वीर्य सीधा उसके गले के अंदर निकाल दिया.

अब्बा ने तुरंत फ़ोन पर रियेक्ट किया. “गजेंद्र भाई? क्या तू ठीक है? तू दर्द में था क्या! क्या हुआ? शाहिदा, मुझे बोल!”

अम्मी ने सब कुछ निगलने की कोशिश की लेकिन कुछ मोटा वीर्य मुँह के कोने से बहार निकल आया और फ़ोन के स्क्रीन पर गिर पड़ा.

उसने मुँह हटाया, खांसी और सांस फूलते हुए, मोती लार और वीर्य की लड़ियाँ उसके होंठों से उसके लुंड तक लटकती हुई थी. उसने ज़ोर से खांसी, उसका शरीर हिल रहा था जब वह अपना गाला साफ़ करने की कोशिश कर रही थी.

अब्बा की आवाज़ अब बिलकुल घबराई हुई थी. “शाहिदा? क्या चल रहा है? मैंने सुना ग्रोएन और अब खांसी! क्या तू ज़ख़्मी है? मुझे बता क्या हुआ!”

अम्मी ने कांपते हाथों से फ़ोन उठाया, अभी भी खांसी और सांस फूलते हुए.

“H-Hussein… सब ठीक है… मैं बस… पानी गले में अटक गया… जब हम काम ख़तम कर रहे थे… काम बहुत तेज़ हो गया… लेकिन अब हम ख़तम कर चुके हैं…” वह अभी भी ज़ोर ज़ोर से सांस ले रही थी, उसकी आवाज़ फटी हुई और टूटी हुई थी.

उसने जल्दी से फ़ोन काट दिया पहले hi के अब्बा और सवाल पूछ सके.

गजेंद्र बिस्तर पर लेट गया, ज़ोर ज़ोर से सांस लेते हुए और बहुत hi संतुष्ट दीखता था. अम्मी ने फिर से अपना मुँह पोछा, फिर दोनों धीरे धीरे हंसने लगे.

“तेरा पति कितना बड़ा बेवक़ूफ़ है,” गजेंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा. “उसने सच में यह माना की तू पानी गले में अटकने से खांसी कर रही थी जब मैं अपना वीर्य तेरे मुँह के अंदर और गले के नीचे निकाल रहा था. कितना परफेक्ट बेवक़ूफ़ पति है.”

अम्मी मुस्कुरायी, अभी भी थोड़ी सांस फूली हुई. “उससे कुछ पता नहीं. वह हर बात मानता है. वह इतना अँधा है.”

बाद में अम्मी बिस्तर पर लेती हुई थी उसकी टांगें चौड़ी फैली हुई थी और दोनों एक दूसरे को चूमने लगे.

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कुछ देर बाद वह दोनों बिलकुल नंगे थे सिर्फ खुली हुई पीली ब्लाउज के अलावा जो कुछ भी नहीं छुपा रही थी.

गजेंद्र, वह भी पूरा नंगा, उसकी जाँघों के बीच घुटनो के बल बैठ गया और धीरे धीरे भूखे अंदाज़ में उसकी छूट चाटने लगा.

उसकी जीभ लम्बी और चौड़ी लपटों में उसकी गीली छूट के होंठों पर चलती रही, उसकी उत्तेजना का स्वाद लेते हुए फिर उसके सूजे हुए क्लीट पर ध्यान देता.

उसने उसको नरमी से अपने मुँह में ले लिया, जीभ से उसपर थपथपाते हुए जबकि दो उँगलियाँ अंदर घुसती हुई और सही जगह ढूंढने के लिए मुड़ती हुई थी.

अम्मी की कमर बिस्तर से ऊपर उठ गयी जब वह उसकी छूट को चाट रहा था, उसकी थोड़ी उसके रास से चमक रही थी. उसकी जीभ और चूसने की गीली आवाज़ें उसकी सिसकियों के साथ मिल रही थी.

“आअह्ह्ह… ोुह्ह्ह्ह हाँ… मेरी छूट चाट… मममफ… तेरी जीभ बहुत अच्छी लग रही है… आअह्ह्ह वही… मत रुक… ोुह्ह्ह्ह मैं तेरी रंडी हूँ…”

“तेरा स्वाद बहुत मीठा है,” गजेंद्र उसके ऊपर से बोलै, और गहरा चाटने लगा. “मेरे लिए कितनी गीली हो गयी है.”

वह ऊपर चढ़ गया, अपने लुंड के सर को उसके एंट्री पॉइंट पर रगड़ने लगा. अम्मी उसकी तरफ बेचैन आँखों से देख रही थी.

“प्लीज… अंदर दाल दो… अपनी रंडी को छोड़… मुझे तेरा बड़ा लुंड अंदर चाहिए… आअह्ह्ह हाँ… मुझे भर दो…”

उसने धीरे से अंदर धकेला, फिर ज़ोर से झटका मारा.

अम्मी सुख से चिल्लाई जब उसने गहरे और ताकतवर झटकों से उसको छोड़ना शुरू कर दिया.

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बिस्तर हर झटके के साथ ज़ोर से सरसरा रहा था. उसकी सिसकियाँ और तेज़ और बेचैन होती गयी.

“आअह्ह्ह! कितना गहरा… हाँ… मुझे और ज़ोर से छोड़… ोुह्ह्ह्ह मैं तेरी रंडी हूँ… आअह्ह्ह!”

सुख के चरम पर पहुँच कर उसने पीली ब्लाउज के आगे वाले हिस्से को पकड़ लिया और उसको ज़ोर से पहाड़ दिया, कपडा उसके बेचैन हाथों के नीचे आसानी से पहात गया.

वह पूरी तरह आज़ाद महसूस करना चाहती थी, अपने आप को बिलकुल खोल देना चाहती थी जबकि तेज़ सुख उसपर छ रहा था.

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बाहरी मैं और नहीं सह सका. अपनी अम्मी को रंडी जैसी भीख मांगते हुए और ज़ोर से छोड़ते हुए देख कर मैंने तुरंत अपना लुंड बहार निकाल लिया और हिलना शुरू कर दिया.

शर्म मेरे अंदर जल रही थी — मैं सबसे बुरा बीटा था, अपनी hi अम्मी को इस तरह इस्तेमाल होते हुए देख कर मुठ मार रहा था — लेकिन मैं रुक नहीं प् रहा था.

मेरा हाथ तेज़ से तेज़ होता गया जब मैंने गजेंद्र को उसके अंदर ज़ोर से धकेलते हुए देखा.

जैसे hi मैं झड़ने वाला था, पीछे से एक हाथ अचानक मेरे कंधे पर आ गिरा.

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डर इतना तेज़ और वरपॉवरिंग था. मेरा शरीर हिल उठा और मैं वही ज़ोर से झाड़ गया, वीर्य की लड़ियाँ बहार निकलती हुई जब मैं घबराहट में घुमा और देखा की यह कौन था.

एक आदमी वहां छाओं में खड़ा था, उसका हाथ अभी भी मेरे कंधे पर था.

यह आदमी कौन है? वह यहाँ क्या कर रहा है?

अगला हिस्सा में पता चलेगा
 
यह क़ादिर दादा जी थे!!

क़ादिर दादा जी: बीटा… तू इस अँधेरे में ऐसे क्या कर रहा है खड़ा?

मैं ज़ोर से चौंक गया, मेरा दिल सीने में ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. मैंने कांपते हाथों से जल्दी से अपनी पंत की ज़िप बंद की और घूम गया.

मैं: दादा जी! आपने मुझे बहुत डरा दिया… मुझे आपकी आहात नहीं आयी.

क़ादिर दादा जी: मैंने तुझे सड़क से देखा था. यहाँ खड़ा घर के अंदर देख रहा था. तेरी पंत खुली हुई थी. रात के वक़्त लोगों के घर में झाँक क्यों रहा है तू?

मैं: झाँक रहा था? नहीं नहीं… मैं झाँक नहीं रहा था. मैं बस चल रहा था और एक मिनट के लिए रुक गया. बस यही.

क़ादिर दादा जी: मुझसे झूठ मत बोल बीटा. मैंने सब कुछ देखा. तू खिड़की से अंदर देख रहा था. और तेरा हाथ… तेरी पंत के अंदर था. यह ठीक नहीं है. झांकना गलत है. यह शर्म की बात है.

मैं: मैं कसम खाता हूँ मैं ऐसा कुछ नहीं कर रहा था. गर्मी थी इसलिए मैंने पंत खोल दी थी ठंडा होने के लिए. मैं अंदर नहीं देख रहा था. मैं बस यहाँ खड़ा था.

क़ादिर दादा जी: इस रात के वक़्त? और यह घर क्यों? तेरा अपना घर तोह यहाँ से दूर है. मुझे सच सच बता.

मैं एक पल के लिए चुप रहा, ज़मीन की तरफ देखते हुए.

मैं: मैं… मैं बस गुज़र रहा था. मुझे नहीं पता था की इतनी देर हो गयी है.

क़ादिर दादा जी: (हाथ में लाल गुलाब का गुलदस्ता उठाते हुए) वैसे देख यह. मैं यह तेरी दादी ज़ैनब के लिए लाया हूँ. लाल गुलाब. उन्हें यह बहुत पसंद हैं. इतने सालों की शादी के बाद भी मैं उनके लिए फूल लाता हूँ. मैं उन्हें बहुत प्यार करता हूँ. मैं हमेशा उनके प्रति वफादार रहा हूँ. कभी किसी दूसरी औरत की तरफ देखा भी नहीं.

मैं: यह… यह बहुत अच्छा है दादा जी.

क़ादिर दादा जी: तोह बता, तू असल में वहां क्यों खड़ा था? अपने दादी से सच बोल.

मैं: मैंने तोह बताया… मैं बस चल रहा था. और कुछ नहीं.

क़ादिर दादा जी: तेरा चेहरा लाल है. तेरी आवाज़ काँप रही है. तू सोचता है मैं बेवक़ूफ़ हूँ?

अचानक गजेंद्र के घर के अंदर से एक ज़ोर की लम्बी सिसकी आयी. वह साफ़ अम्मी की आवाज़ थी, सुख से भरी हुई.

क़ादिर दादा जी: क्या सुना तूने?

मैं: (मेरा पूरा शरीर ठंडा पद गया) क्या सुना? चलो बस चलते हैं दादा जी.

क़ादिर दादा जी: नहीं. सुन…

एक और ज़ोर की चीख आयी, इस बार और तेज़, उसके बाद भरी भरी सिसकियाँ, थम्प की आवाज़ें और बिस्तर के दीवार से टकराने की आवाज़.

क़ादिर दादा जी: यह टीवी नहीं है. यह असली औरत की आवाज़ है. कोई बेशरम औरत अभी उस घर में छोड़वा रही है. जिस तरह वह चीख रही है… “आअह्ह्ह… हाँ… और ज़ोर से…” बिलकुल साफ़ सुनाई दे रहा है.

मैं: दादा जी प्लीज… यह हमारा काम नहीं है. चलो.

क़ादिर दादा जी: हमारा काम नहीं? जब वह इतनी ज़ोर से कर रहे हैं की पूरी गली सुन रही है तोह यह सबका काम बन जाता है.

मैं: शायद… शायद वह शादी शुदा हैं या कुछ.

हम चलना शुरू कर देते हैं.

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क़ादिर दादा जी: शादी शुदा? आजकल औरतों पर विश्वास नहीं कर सकते.

हम और कुछ कदम चलते हैं. पीछे से सिसकियाँ अभी भी हलकी हलकी आ रही थी.

क़ादिर दादा जी: बीटा, आज कल का दुनिया बहुत गन्दगी से भरा है. ख़ास कर हमारी _ औरतें. वह बहुत बेशरम हो गयी हैं. कोई शर्म नहीं बची.

मैं: हर औरत ऐसी नहीं होती दादा जी.

क़ादिर दादा जी: बहुत सी होती हैं. उस औरत को देख अंदर. वह चाहे जो भी हो, किसी की बेटी है, शायद किसी की बीवी है. और वह वहां रंडी की तरह छोड़वा रही है चीख चीख कर. अपने लिए कोई इज़्ज़त नहीं, अपने परिवार के लिए कोई इज़्ज़त नहीं.

मैं: दादा जी… क्या हम कुछ और बात कर सकते हैं प्लीज?

क़ादिर दादा जी: क्यों? क्यूंकि सच सुन्ना मुश्किल है? तू जवान है. तुझे जानना चाहिए की चीज़ें कितनी ख़राब हो गयी हैं.

मैं: (आवाज़ धीमी) शायद मर्द भी दोषी है.

क़ादिर दादा जी: दोनों दोषी हैं. लेकिन औरत… वही तोह परिवार की इज़्ज़त की रखवाली करती है. जब वह अपनी टांगें आसानी से फैला देती है तोह पूरे परिवार की इज़्ज़त चली जाती है.

जब हम कार्नर घूम रहे थे तोह एक हलकी सी सिसकी फिर से हम तक पहुंची.

क़ादिर दादा जी: सुनी? अभी भी चल रहा है. उस औरत में कोई शर्म नहीं बची. वह मज़ा ले रही है. जैसे कोई जानवर चीख रही हो.

मैंने उससे बातें पूछना शुरू किया. “दादा जी, आपके दिन कैसे गुज़र रहे हैं? दुकान कैसे चल रही है? कोई नए ग्राहक या परेशानी?”

वह सब्र से जवाब देते रहे, मुझे लम्बी घंटों की बात बताते, वफादार ग्राहक जो अभी भी क्वालिटी की वजह से आते हैं, और अपनी उम्र में भी रूटीन कैसे पसंद आती है.

बातें कई मिनट तक चलती रही जब हम सड़क के लाइट्स के नीचे चल रहे थे, हमारी परछाइयाँ ज़मीन पर लम्बी लम्बी पद रही थी.

कुछ देर बाद मैंने धीरे से बात को दादी ज़ैनब की तरफ मोड़ दिया. “दादा जी, दादी आज कल कैसी हैं? वह ठीक तोह हैं न? आपने एक बार बताया था की वह थोड़ी अलग अलग बेहवे कर रही हैं.”

क़ादिर दादा जी ने सांस भरी, उनके कदम थोड़े धीमे पद गए. “हाँ बीटा. वह कुछ टाइम से अजीब बेहवे कर रही हैं. वह पहले जैसा नियमित ,,., नहीं पढ़ती. कभी कभी ,,., छोड़ देती हैं या जल्दी जल्दी बिना ध्यान के पढ़ लेती हैं.”

मुझे असली वजह पता थी. दादी ज़ैनब सूरज नाम के बुड्ढे से छोड़वा रही थी — बिलकुल वैसे hi जैसे मेरी अम्मी गजेंद्र से चुद रही थी.

वह शायद छुप छुप कर उससे मिल रही थी, हर हद्द पार कर रही थी जैसे अम्मी ने की थी. लेकिन क़ादिर दादा जी को कुछ पता नहीं था. वह अभी भी उन्हें उसी वफादार बीवी की तरह देखते थे जो उन्होंने कई दशकों से देखा था.

मैंने और सवाल किये ताकि उन्हें और बात निकाल सकू बिना शक पैदा किये. “वह बहार जाती हैं तोह क्या कहती हैं? वापस आने पर खुश दिखती हैं या चुप रहती हैं?”

क़ादिर दादा जी ने एक पल सोचा. “वह कहती हैं की अपनी सहेलियों से चाय पीने जाती हैं या सब्ज़ी खरीदने. लेकिन कभी कभी वापस आती हैं तोह अलग खुशबू आती है — जैसे नया परफ्यूम या कुछ. और वह परिवार के बारे में बात करना काम कर देती हैं या तुझे और तेरे अब्बा के बारे में उतना नहीं पूछती जितना पहले करती थी. मैं उनसे इसके बारे में बात करता हूँ लेकिन वह कहती हैं की मैं बेकार में परेशां हो रहा हूँ और सब ठीक है. थोड़ा दुःख होता है बीटा. लगता है वह मुझसे दूर जा रही हैं.”

हम इस तरह बहुत देर तक बातें करते हुए चलते रहे. मैंने पुछा की क्या उनकी खाने पिने की रूटीन बदली है, क्या वह कुछ बातों से बच रही हैं या नयी दिलचस्पियॉँ हैं.

क़ादिर दादा जी हर बार छोटी छोटी बातें बताते — कभी कभी शाम की चाय उसके साथ नहीं पीते, कभी कमरे में फ़ोन पर ज़्यादा टाइम बिताती हैं, कभी परिवार के गेट टुगेदर में काम दिलचस्पी दिखाती हैं.

हर जवाब उस बात को कन्फर्म कर रहा था जो मुझे पहले से शक था, लेकिन मैं अपना चेहरा नार्मल रखता हुआ सिर्फ सर हिलता रहा.

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क़ादिर दादा जी ने फिर अपना पुराण मोबाइल पॉकेट से निकाला. “मुझे उनको कॉल करना चाहिए की हम आ रहे हैं. वह इंतज़ार कर रही होंगी या परेशां. उन्होंने नंबर डायल किया.

फ़ोन बहुत देर तक बजा लेकिन जवाब नहीं आया. वह थोड़ा घूरते हुए इंतज़ार करते रहे, फिर कॉल काट दिया और फिर से तरय किया. फिर भी जवाब नहीं. उन्होंने छोटी सी सांस भरके फ़ोन पॉकेट में रख दिया.

हम चलते हुए मेरा दिमाग तेज़ चल रहा था. हाँ वह फ़ोन नहीं उठाएंगी. वह शायद अभी सूरज के साथ होगी, बिलकुल वैसे hi कर रही होगी जैसे अम्मी गजेंद्र के साथ कर रही थी — सिसकियाँ भर रही होगी, छोड़वा रही होगी, बाकी सब भूल रही होगी.

बिचारे दादा जी को कुछ पता नहीं. वह घर की तरफ जा रहे हैं यह सोच कर की उनकी बीवी बस आराम कर रही होगी या नार्मल काम में बिजी होगी, जबकि वह उनके साथ सबसे बड़ा धोखा कर रही है.

यह hi पैटर्न हमारे परिवार में रिपीट हो रहा है. अब्बा को अम्मी के बारे में पता नहीं, और दादा जी को दादी के बारे में पता नहीं. मुझे सब कुछ पता होने के बावजूद यह देख कर बुरा लग रहा था की वह दोनों अँधेरे में हैं.

हम आखिर में क़ादिर दादा जी के घर पहुँच गए. वह एक साधारण सिंगल फ्लोर का घर था, रंग उतरा हुआ नीला, छोटा सा आगे का बगीचा कुछ फूलों के पौधों और नीम का पेड़ के साथ, और एक लोहे का गेट जो धकेलने पर चिर चिर करता था.

दरवाज़े तक का रास्ता पॉट में लगे पौधों से लाइन्ड था और एक तरफ की खिड़की से हलकी रौशनी आ रही थी. हम दोनों जानते थे की दादी ज़ैनब अंदर हैं — उनके जुटे दरवाज़े के पास थे और घर में अंदर से रहने वाली महसूस होती थी बहार से भी.

जब हम गेट के पास खड़े थे, क़ादिर दादा जी उनके प्यार के बारे में बात करने लगे. उनकी आवाज़ नरम हो गयी, भावुक. “बीटा, इतने सालों की शादी के बाद भी मेरी दादी के लिए मेरा प्यार एक बूँद भी काम नहीं हुआ. वह मेरे बच्चों की माँ हैं, वह औरत हैं जो मुश्किल वक़्त में मेरे साथ कड़ी रही जब दूकान चल नहीं रही थी और पैसे की तंगी थी.”

मैं मुस्कुराया जब वह आगे बोलते रहे.

“मैं अभी भी उस दिन को याद करता हूँ जब हमारी शादी हुई थी — वह बहुत शर्मीली और सुन्दर थी. दशकों में हमने परिवार को साथ मिलकर पला, बीमारी और नुक्सान सही, छोटी छोटी खुशियों को मनाया. अब भी जब सुबह उन्हें देखता हूँ मेरा दिल उसी गरम महसूस को महसूस करता है जो जवानी में करता था. वह मेरी ज़िन्दगी हैं बीटा. मैं हर रोज़ ,.' का शुक्र ऐडा करता हूँ की उन्होंने मुझे उन्हें दिया.”

क़ादिर दादा जी सच में अच्छे महसूस कर रहे थे की वह दादी ज़ैनब से कितना प्यार करते हैं.

उन्होंने आगे कहा, “अगर वह आज कल थोड़ी अजीब बेहवे कर रही हैं तोह भी मुझे पता है हमारा रिश्ता मज़बूत है. मैं अभी भी शाम को उनका हाथ पकड़ता हूँ जब हम साथ बैठते हैं और वह उतना hi सुकून देता है जितना दशकों पहले देता था. वह मेरे लिए सब कुछ हैं.”

उनकी बात सुन कर मेरा सीना भरी महसूस होने लगा. क्या होता अगर उन्हें सच पता चल जाता. वह औरत जिससे वह इतना गहरा और पवित्र प्यार करते हैं शायद अभी उस बैडरूम में सूरज के साथ होगी, ऐसी चीज़ें कर रही होगी जो उन्हें देख कर उनका दुनिया टूट जायेगी.

वह इतने भोला और विश्वास करने वाले हैं, बिलकुल अब्बा की तरह. हमारा परिवार राज़ों और धोखों से भरा है और वह बिलकुल अँधेरे में हैं, फिर भी पूरे दिल से उन्हें प्यार करते हुए.

मुझे उनके लिए बहुत अफ़सोस हुआ — सच में अफ़सोस. उन्हें इससे बेहतर के लायक था.

हम आगे वाले दरवाज़े तक पहुंचे.

क़ादिर दादा जी ने हैंडल पकड़ कर तरय किया लेकिन अंदर से बंद था. उन्होंने दो तीन बार दरवाज़ा खटखटाया फिर पीछे हैट गए. “दरवाज़ा अंदर से बंद है बीटा. शायद वह सो गयी होंगी. थोड़ी देर हो गयी है. जाकर बैडरूम की खिड़की पर खटखटाना — अगर वह अंदर आराम कर रही होंगी तोह शायद सुन लेगी.”

बातें नेचुरल तौर पर चलती रही. “दादा जी, क्या आपको पक्का पता है वह घर पर हैं? क्या अगर वह बहार गयी होंगी?”

“नहीं बीटा, उनका सामान अंदर है — मैं खिड़की से उनकी ओढ़नी कुर्सी पर देखता हूँ. वह शायद छोटी सी नींद ले रही होंगी या दिन भर के बाद आराम कर रही होंगी. बैडरूम की खिड़की पर धीरे से खटखटाना, उन्हें मत डराना. वह दरवाज़ा खोल देंगी.”

मैंने सर हिलाया और घर के साइड की तरफ बैडरूम की खिड़की की तरफ चला गया.

बगीचा शांत था, शाम की हवा में पत्तों की हलकी हलकी सरसराहट थी. जैसे hi मैं खिड़की के करीब पहुंचा मैंने अंदर से सिसकियों की आवाज़ें सुनी.

“आअह्ह्ह… ोुह्ह्ह्ह…”

आवाज़ें साफ़ और पहचानी थी — धीमी, लाया वाली औरत की सुख भरी सिसकियाँ, साथ में हलकी हलकी बिस्तर की चिर चिर और गीली थप थप की आवाज़ें जो मेरे पेट को मुठिया देती थी.

मैं वहां रुक गया, मेरा दिल एक सेकंड के लिए रुक गया.

डर एक लहार की तरह मुझपर गिरा. मैंने दुआ की की यह दादी ज़ैनब न हो. मैंने बेचैनी से दुआ की क्यूंकि वह हमारे परिवार की इज़्ज़त वाली बुज़ुर्ग हैं, वही जो हमेशा ,,.,, परंपरा और शांत इज़्ज़त का मिसाल रही हैं.

उन्होंने मुझे ,,., सिखाई थी, छोटी छोटी गलतियों पर नरमी से डांटा था और मुश्किल वक़्त में परिवार को संभाला था. अगर यह उनकी आवाज़ थी तोह यह सब कुछ टूट जाएगा जो मैं उनके बारे में सोचता था और क़ादिर दादा जी को इतना दर्द होगा जो उन्होंने दशकों से उन्हें उसी प्यार से देखा था.

उन्हें इस धोखे का पता चलने का ख्याल उनकी दुनिया की बुनियाद को टूटने वाला था और मैं यह सोच नहीं सकता था की मैं उस पल का गवाह बनूँ जिसमें सब टूट जाए.

मैंने उस सिसकी की आवाज़ का स्रोत ढूंढने के लिए और गहरा देखा. मेरा दिल इतना ज़ोर से धड़क रहा था की कानों में सुनाई दे रहा था जब मैं घर के साइड की दीवार के साथ साथ चुपके से बढ़ रहा था, छाओं में छुपे हुए.

सिसकियाँ हर कदम के साथ साफ़ होती गयी — “आअह्ह्ह… ोुह्ह्ह्ह…” — साथ में बिस्तर की चिर चिर और गीली थप थप की आवाज़ें जो मेरे पेट को मुठिया देती थी.

मैं अपनी जगह करेफुल्ली बदलता रहा, पर्दे और खिड़कियों के अलग अलग गैप्स से झांकता हुआ, अंदर की हलकी रौशनी में मेरी आँखें ढल रही थी. आवाज़ें घर के साइड वाले बैडरूम से आ रही थी.

मैं दीवार के साथ और आगे बढ़ा, सांस रोक कर, ध्यान से उस एक्सएक्ट जगह को ढूंढने की कोशिश करते हुए. रात की हवा मेरी चमड़ी पर ठंडी थी लेकिन तनाव की वजह से मेरे माथे पर पसीना आ रहा था.

मैंने एक छोटा सा गैप धुंध लिया जहां पर्दा पूरा नहीं बंद था और धीरे से झुक गया, हाथों से विन्डौसिलल को पकड़ कर खुद को सँभालते हुए.

फिर मैंने झाँका और देखा की वह सूरज पर सवार थी.

मैं चौंक गया क्यूंकि यह नज़ारा इतना अनजाना और शॉकिंग था की मेरी सांस गले में अटक गयी. वहां मेरी दादी पूरी तरह नंगी थी, उसका शरीर सूरज की गॉड में ऊपर नीचे हो रहा था बेचैनी के साथ.

उसकी चमड़ी पसीने से चमक रही थी, उसके बड़े स्तन हर हरकत के साथ उछाल रहे थे, उसका चेहरा तेज़ सुख का एक्सप्रेशन दिखता हुआ आँखें आधी बंद और मुँह खुला हुआ.

सूरज बिस्तर पर बैठा था, ऊपर सिर्फ सफ़ेद बनियान पहने हुए, उसकी जीन्स अभी भी पहनी हुई थी लेकिन ज़िप खुली हुई, उसका लुंड बहार निकला हुआ और उसके अंदर गहरा धंसा हुआ.

उसकी पूरी नंगी हालत और उसके आधे कपड़ों का कंट्रास्ट इस नज़ारे को और भी कच्चा, जल्दी भरा और हराम बना रहा था. मैं एक पल के लिए रुक गया, यह प्रोसेस नहीं कर प् रहा था की यह सच में हो रहा था.

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सूरज पूरा नंगा नहीं था कई संभावित कारणों से जो उनके छुपे हुए चक्कर के सन्दर्भ में समझ आते थे. एक मज़बूत सम्भावना यह थी की वह जल्दी और खतरे भरे मिलान में लगे हुए थे क्यूंकि उन्हें दर था की दादा क़ादिर कभी भी अनजाने में घर वापस आ सकते हैं.

जीन्स पहने रहने से जल्दी से छुपने की सुविधा थी — वह सिर्फ ज़िप बंद कर के ऐसे दिख सकते थे जैसे बस बात कर रहे हों या बैठ कर बात कर रहे हों अगर कोई आ जाए, पूरा नंगा होने और कपडे पेहेन्ने का टाइम बच जाता था.

दादी ज़ैनब की बड़ी गांड ज़ोर ज़ोर से हिल रही थी क्यूंकि वह सूरज के लुंड पर ऊपर नीचे तेज़ हरकतों से चढ़ रही थी. नीचे से ऊपर की तरफ धक्का और ऊपर से नीचे की तरफ गिरने की ताकत के कारण उसकी चमड़ी हर टकराव पर हिलती और झिलती जा रही थी.

गुरुत्वाकर्षण और उसके शरीर की लाया वाली हरकत ने यह हिलना साफ़ और तेज़ बना दिया था, यह उस बात का निशाँ था की वह कितनी गहरी वासना में खोई हुई थी और कितनी सक्रियता से हिस्सा ले रही थी.

मैं बहुत देर तक नहीं देखा और तुरंत वापस दौड़ा ताकि क़ादिर को देखने से रोक सकूँ. मुझे पता था की वह दादी से कितना प्यार करते थे — हर बार जब वह उनके बारे में बात करते उनके चेहरे पर लिखा होता था — और यह देख कर वह बिलकुल टूट जाते.

मैं उन्हें इतनी बड़ी मुसीबत देखने नहीं दे सकता था. यह उनके दिल को तोड़ देता, और मुझे उन्हें इस दर्द से बचने की बेचैन ज़रुरत महसूस हो रही थी, भले hi मुझे खुद यह राज़ उठाना पड़े.

उस पल उनकी निर्दोषता को बचाना मुझे सबसे ज़रूरी लग रहा था.

मैं आगे वाले दरवाज़े की तरफ दौड़ा लेकिन वह खुला पड़ा था. मुझे सोच आ रहा था की दादा अंदर कैसे आये — शायद उनके पास स्पेयर चाबी थी जो वह हमेशा इमरजेंसी के लिए रखते थे, या सूरज के आने पर दादी ने घबराहट में दरवाज़ा बंद करना भूल गयी थी.

या शायद उन्होंने पहले की खटखट पर कोई जवाब न मिलने पर धीरे से धक्का देकर खोल दिया हो. खुला दरवाज़ा मेरी उलझन और जल्दी को और बढ़ा रहा था जब मैं अंदर घुस गया.

मैं धीरे से उनका नाम ले कर उन्हें ढूंढने लगा लेकिन नहीं मिला. “दादा क़ादिर? दादा?” मैं धीमी आवाज़ में बोलता हुआ घर के अंदर चलता रहा, मेरी आवाज़ इतनी धीमी थी की बैडरूम में किसी को पता न चले. मैंने बैठने वाले कमरे और कॉरिडोर देखे लेकिन उनका कोई निशाँ नहीं था.

घर बिलकुल सन्नाटा महसूस हो रहा था सिर्फ बैडरूम से आने वाली आवाज़ों के अलावा.

मैं बैडरूम की तरफ दौड़ा, घबराहट में क्यूंकि मुझे सबसे बुरा दर था — की उन्होंने पहले hi देख लिया हो या अभी देखने वाले हों.

मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था, हाथों की हथेलियां पसीने से भर गयी थी और दिमाग में दर भरे ख्याल दौड़ रहे थे की मैं क्या देखने वाला हूँ और इस मुसीबत को कैसे रोक सकता हूँ.

मैंने सिसकियों की आवाज़ सुनी, वह बहुत ज़ोर से थी. वह ज़ोर से इसलिए थी क्यूंकि दादी ज़ैनब और सूरज अपनी वासना में पूरी तरह खोए हुए थे, यह समझ कर की घर में और कोई नहीं है.

उन्हें चुप रहने की कोई ज़रुरत नहीं थी और उनके सुख की ताकत ने उन्हें रोक नहीं पायी.

आवाज़ें घर के अंदर फ़ैल रही थी, खुले बैडरूम के दरवाज़े या जगह की ध्वनि के कारण, हवा में गहरी और रोक नहीं पायी सिसकियों से भर रही थी.

मैंने दादा क़ादिर को दरवाज़े पर खड़े हुए देखा, उनके हाथ में उनके लिए लाया हुआ प्यार का फूल गिर पड़ा.

वह दरवाज़े पर पथ्थर बन कर खड़े थे, उनका चेहरा सफ़ेद और हैरान, छोटा सा फूलों का गुलदस्ता उनके हाथों से छूट कर ज़मीन पर हलके से गिर पड़ा.

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मैं सुन हो गया. वह रोने लगे. अपनी बीवी को नंगी और दुसरे आदमी पर चढ़ कर चुड़ते हुए देख कर और उसके धोखे का एहसास उनके लिए बहुत ज़्यादा था.

उनके चेहरे पर आंसू बह रहे थे जबकि प्यार और भरोसे के साल एक पल में टूट गए. मुझे भी सुन महसूस हो रहा था, हिल नहीं प् रहा था या बोल नहीं प् रहा था, उस पल की भयानकता ने मुझे बिलकुल जकड लिया था जब उनकी दुनिया टूट टी हुई देख रहा था.

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मुझे लगा यह सपना है लेकिन आखिर दादा क़ादिर को सब कुछ पता चल गया.

यह अजीब लग रहा था, जैसे किसी बुरा सपने में हो जिसमें मैं जाग नहीं प् रहा था, लेकिन हक़ीक़त साफ़ थी — दादा को अब अपनी बीवी के बारे में सच पता चल गया था.

दादी ज़ैनब अब कड़ी होकर चुद रही थी, सूरज उसके पीछे. उसकी बड़ी गांड हर ज़ोर के धक्के के साथ हिल रही थी जब वह पीछे से उसकी छूट छोड़ रहा था, उसके हाथ उसकी कमर को मज़बूती से पकडे हुए उसको अपनी तरफ खिंच रहा था.

उसकी ज़ोर ज़ोर की सिसकियाँ हवा में भर रही थी — “आअह्ह्ह… ोुह्ह्ह्ह सूरज… हाँ… मुझे और ज़ोर से छोड़… आअह्ह्ह!” वह ज़ोर से मोअन कर रही थी क्यूंकि खड़े होकर छोड़ने की स्थिति से उसके अंदर के सेंसिटिव हिस्से पर हर धक्के से गहरा असर पद रहा था.

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सुख इतना ज़्यादा था और पकडे जाने का खतरा उसमें और उत्तेजना भर रहा था जिस से वह और भी ज़ोर से आवाज़ निकाल रही थी. वह वासना में खोई हुई थी, उसका शरीर अपने आप लाया के साथ रेस्पोंद कर रहा था बिना किसी रोक के.

सूरज और दादी ज़ैनब दादा क़ादिर की निंदा कर रहे थे. वह उसकी सिसकियों के बीच धीमी, मज़ाक उड़ाती हुई आवाज़ में बात कर रहे थे. सूरज बोल रहा था “तेरा पति बहुत कमज़ोर और बुद्धा हो गया है, वह तुझे मेरे तरह छोड़ नहीं सकता. वह मेरे सामने कुछ नहीं है.”

दादी ने जवाब दिया “क़ादिर अब बेकार हो गया है. वह मुझे अब संतुष्ट नहीं कर सकता. सिर्फ तू hi मुझे ऐसा महसूस करवाता है.”

दादी ज़ैनब ने अपने पति क़ादिर की बुराई की.

उसने उसके बारे में बुरी बातें कही, उसको नामर्द और बोर बोलती हुई, कह रही थी की वह उसको अब न शारीरिक तौर पर न मानसिक तौर पर जो चाहिए वह दे नहीं सकता. उससे यह नहीं पता था की उसका पति उसके पीछे खड़ा सब कुछ देख रहा था.

क़ादिर गहरे ज़ख्म से चोट खाया. उनका चेहरा दर्द से बिगड़ गया, आंसू बहते हुए, उनका शरीर हिल रहा था जब उन्होंने अपनी बीवी को अपने मज़ाक उड़ाते हुए और दुसरे आदमी से सुख लेते हुए सुना.

यह शब्द तलवारों की तरह काट रहे थे, उसके धोखे की गहराई और उसके लिए इज़्ज़त न होने को साबित कर रहे थे कई सालों के रिश्ते के बाद.

वह बिलकुल टूटा हुआ लग रहा था, उनके कंधे झुक गए थे, जैसे ज़मीन उनके पैरों के नीचे से निकल गयी हो.

दादी ज़ैनब सिसकियों के साथ सूरज को चूमती रही जब वह उसकी छूट छोड़ रहा था, उसकी कमर को मज़बूती से पकडे हुए.

सूरज ने उसके कान में धीरे से बुरी बातें कही की वह उसके पति से कितना बेहतर है और अब वह उसकी हो चुकी है. “तेरा बुद्धा पति तुझे ऐसा नहीं कर सकता. तू अब मेरी रंडी है ज़ैनब.”

सूरज ने बताया की उनका चक्कर छह महीने से चल रहा था. “हम यह छह महीने से कर रहे हैं, तेरे बुड्ढे के घर पर सोते वक़्त छुप छुप कर. तू अब मेरी है ज़ैनब.”

यह क़ादिर को और ज़्यादा झटका लगा क्यूंकि चक्कर के लम्बी मुद्दत का एहसास था की यह कोई छोटी गलती नहीं बल्कि छह महीने का सोचा समझा धोखा था.

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यह दिखा रहा था की वह कितने लम्बे टाइम से उससे झूठ बोल रही थी, धोखे की गहराई कितनी थी, जिस से दर्द और गहरा और भरोसा बिलकुल टूट गया. उनका चेहरा और भी ज़्यादा टूटा हुआ दिखा जब धोखे की पूरी हक़ीक़त अंदर उतर गयी.

दादी मोअन करते हुए गलती से अपना सर घुमाई और क़ादिर को देख लिया. उसकी आँखें हैरान और भयानकता से फैल गयी जब उसने समझा की उसका पति वहां खड़ा सब देख रहा था. उसने अपनी काली पैटर्न वाली ब्लाउज जल्दी से पेहेन ली.

वह शॉकेड थी, उसका शरीर सख्त हो गया लेकिन कई चीज़ें हुई. वह सांस रोक कर बोली लेकिन सिर्फ एक सिसकी निकल गयी.

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सूरज अभी क़ादिर को नहीं देखा था, वह धक्के मारता रहा. वह क़ादिर की तरफ दोष, दर और अभी भी वासना भरी आँखों से देखती रही, उसका चेहरा और लाल हो गया.

उसने अपनी बड़ी गांड को सूरज के लुंड पर धकेलती रही जबकि वह क़ादिर को देख रही थी: उलझन और सुख के ज़ोर के वजह से उसकी कमर अपने आप सूरज के लुंड पर पीछे धकेलती रही जबकि वह अपने पति को शॉकेड चेहरे से देख रही थी.

शारीरिक सुख इतना तेज़ था की तुरंत रुक नहीं प् रही थी, उसका शरीर अपने आप इंस्टिंक्ट से रियेक्ट कर रहा था जबकि उसका दिमाग इस बात से घूम रहा था.

वह हरकत जारी रखे, अपनी गांड को मज़बूती से उसकी तरफ धकेलती हुई जबकि उसकी आँखें क़ादिर के टूटे हुए चेहरे पर लगी हुई थी.

उसी पल दादा क़ादिर बेहोश हो कर गिर पड़े. सब कुछ का झटका — काम देखना, बुराई सुन्ना, छह महीने के चक्कर का पता चलना और पत्नी को देख कर भी जारी रखना — उनके दिल और दिमाग के लिए बहुत ज़्यादा था.

उनका शरीर हार मान गया और वह ज़मीन पर बेहोश गिर पड़े.

मैं घर से बहुत तेज़ दौड़ा. मेरे पेअर मुझे दरवाज़े के बहार और सड़क पर जितनी तेज़ ले जा सकते थे ले जा रहे थे, मेरा दिल दर, दोष और गहरी उदासी से धड़क रहा था.

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मैं पीछे मुद कर नहीं देखा, घर की आवाज़ें पीछे छूती जा रही थी जब मैं रात में गायब हो गया.

मुझे कितना बुरा लग रहा था: पहले रोक नहीं पाने के दोष से परेशां, दादा के लिए जो अभी अपनी दुनिया टूटी हुई देख कर उदास, और परिवार के आगे क्या होगा इसके दर से भरा.

सारे राज़ों का बोझ — मेरी अम्मी का चक्कर, अब दादी का भी — मुझे कुचल रहा था और मुझे एहसास था की मैं इस दर्द के लिए ज़िम्मेदार हूँ भले hi मैं उन्हें बचने की कोशिश कर रहा था.

मुझे नहीं पता की मैं जाने के बाद वहां क्या हुआ. मुझे नहीं पता की दादा उठा या नहीं, उनके बीच क्या बात हुई, कोई झगड़ा हुआ या नहीं, या दादी और सूरज का क्या हुआ.

फिर जब मैं जाने वाला था, मैंने दरवाज़ा खोला और मुझे लूबना मिली, मेरी दोस्त जाबिर की अम्मी बहार कड़ी थी.

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मैं लूबना आंटी का हाथ सोच समझ के बिना पकड़ लिया और उन्हें घर के पीछे के आँगन की तरफ खींच लाया. मेरे पेअर अभी भी अंदर जो कुछ मैंने ग्रैंडपा क़ादिर, ग्रंड्मा ज़ैनब और सूरज के साथ देखा था उससे हिल रहे थे. रात की हवा मेरी चमड़ी पर ठंडी थी लेकिन मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था.

लूबना आंटी — जाबिर की अम्मी — मुझे बढ़ती हुई परेशानी के साथ देखती रही जब हम घर के साइड से गुज़रते हुए शांत और अँधेरे पीछे के आँगन में पहुंचे जहां पेड़ और पुराण बर्ड फीडर था.

“ज़ैद, तुझे क्या हुआ है?” उन्होंने धीमी और परेशां आवाज़ में पुछा. “तू बहुत पीला पद गया है. तू घर से ऐसे क्यों भगा? मुझे बता क्या हुआ.”

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मैं तुरंत जवाब नहीं दिया. मेरा दिमाग अभी भी ग्रंड्मा ज़ैनब के नंगे शरीर और सूरज पर चढ़ कर बैठने की तस्वीर से भरा हुआ था, फिर बाद में पीछे से छोड़ते हुए जब ग्रैंडपा देख कर बेहोश हो गए. लूबना आंटी का हाथ मेरे हाथ में गरम महसूस हो रहा था.

वह एक साधारण गहरी नारंगी साड़ी पहने हुए थी जो अभी भी उनके शरीर के भरी भरकम उभार को साफ़ दिखा रही थी — मोती और भरी स्तन जो कपडे के अंदर डाब रहे थे और मोती गोल गांड जो हर कदम के साथ हिल रही थी. मैं हमेशा उनके लिए वासना महसूस करता था.

कई सालों से मैंने देखा था की उनके बड़े स्तन कैसे चलते वक़्त उछालते हैं और उनकी मोती गांड कपड़ों में कैसे भर जाती है.

वह मेरी बेस्ट फ्रेंड की अम्मी थी इसलिए उनके बारे में ऐसे विचार करने पर मुझे बुरा लगता था लेकिन वह बहुत गरम थी.

उनके मातुरे नरम शरीर और यह बात की वह बिलकुल off-limits थी ने अट्रैक्शन को और मज़बूत बना दिया था. मैं खुद से नफरत करता था लेकिन हर बार उन्हें देख कर मेरी नज़र नहीं हैट पाती.

वह एक पेड़ के नीचे रुक गयी और पूरी तरह मेरी तरफ मुद गयी. “ज़ैद, मुझसे बात कर. तू इतना परेशां क्यों है? क्या तेरे ग्रैंडपारेन्ट्स के साथ कुछ हुआ? प्लीज मुझे बता.”

मैंने ज़ोर से थूक निगलि. “आंटी… बहुत बुरी बात है. सच में बहुत बुरी.”

“क्या हुआ? तू मुझे डरा रहा है.”

“मैंने कुछ ऐसा देखा जो मुझे नहीं देखना चाहिए था.”

“तू ने क्या देखा?” उनकी आँखें मेरे चेहरे पर ढूंढ रही थी. वह अभी भी सिर्फ परेशां और कन्फ्यूज्ड दिखती थी, और कुछ नहीं.

मैंने सांस ली और फैसला किया की सच बता दूंगा. “ग्रंड्मा ज़ैनब अंदर सूरज के साथ है. वह… साथ हैं. बिलकुल सच में साथ. ग्रैंडपा उनके पास पहुँच गए थे.”

लूबना आंटी की आँखें बड़ी हो गयी. “क्या? नहीं. यह हो hi नहीं सकता. ग्रंड्मा ज़ैनब? तेरी दादी?”

“हाँ. मैंने अपनी आँखों से देखा. वह ग्रैंडपा के साथ धोखा कर रही हैं सूरज के साथ. वह कई महीनो से यह कर रही हैं.”

वह शॉक में मुझे देखती रही, उनका मुँह थोड़ा खुला था. “तू सीरियस है? मज़ाक तोह नहीं कर रहा?”

“मैं सीरियस हूँ. मेरे साथ आओ. मैं दिखाऊंगा.”

मैं उन्हें ध्यान से घर के साइड से ले गया जब तक हम उसी खिड़की के पास पहुंचे जहाँ से मैं पहले झाँका था.

पर्दा अभी भी थोड़ा खुला हुआ था. हम दोनों झुक गए. अंदर सूरज अभी भी ग्रंड्मा ज़ैनब को छोड़ रहा था.

वह अब बिस्तर के किनारे झुकी हुई थी, बिलकुल नंगी, उनकी मोती गांड हर बार हिल रही थी जब वह पीछे से उसमें धकेल रहा था.

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उन्हें ग्रैंडपा क़ादिर की कोई परवाह नहीं थी — वह अभी भी ज़मीन पर पड़े हुए थे जहाँ बेहोश हो कर गिर गए थे.

ग्रंड्मा सूरज के लुंड पर अपनी गांड पीछे की तरफ धकेल रही थी, ज़ोर ज़ोर से सिसकियाँ लेती हुई, हाथों से बेडशीट पकडे हुए. जैसे ग्रैंडपा का बेहोश होना उन्हें बिलकुल पता hi नहीं था.

लूबना आंटी ने धीमी सी सिसकी भरी और मुँह पर हाथ रख लिया. “ओह माय गॉड… यह सच है. वह सच में… उसके साथ है. और तेरा ग्रैंडपा वहां ज़मीन पर पड़ा है…”

मैं लूबना आंटी के बिलकुल पीछे खड़ा था. इस पोजीशन से उनकी अपनी मोती गांड साफ़ दिखाई दे रही थी.

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उनकी सलवार का कपडा उनकी गोल गांड पर टाइट खिंच रहा था. मैंने हलके से अपना राइट हाथ उनकी गांड के उभार पर रखा इतना हल्का की उन्हें महसूस नहीं हुआ.

मैंने हमेशा उनकी गांड को बहुत पसंद किया था, वह नरम मोती शेप, वह चलते वक़्त हिलने का अंदाज़, वह हाथों के नीचे महसूस होने का एहसास. उनकी इतनी करीब, इतनी मोती और नरम दिखती गांड देख कर मेरा पेट के नीचे गरम जोश भरने लगा.

मेरा लुंड हिलने लगा हालांकि घर के अंदर शॉकिंग सन जारी था.

हम वहां लम्बी देर तक खड़े रहे, दोनों देखते हुए. फिर लूबना आंटी थोड़ा मेरी तरफ मुद गयी, अभी भी शॉकेड थी.

“ज़ैद, यह… मुझे पता नहीं क्या कहूँ. तेरी दादी… और वह आदमी… और तेरा बेचारा ग्रैंडपा…”

“मुझे पता है,” मैंने धीरे से कहा. “मैंने ग्रैंडपा को रोकने की कोशिश की थी लेकिन मैं देर कर चूका था.”

उन्होंने धीरे से सर हिलाया. “यह कितने टाइम से चल रहा है?”

“छह महीने, सूरज ने जो कहा उसके मुताबिक.”

“छह महीने…” उन्होंने फिर खिड़की से अंदर देखा, उनका चेहरा परेशां था. “यह तेरी फॅमिली को बर्बाद कर देगा.”

जब वह अभी भी खिड़की की तरफ मुद कर बात कर रही थी, मैं एक पल के लिए कण्ट्रोल खो बैठा.

मेरा हाथ अपने आप बढ़ गया और मैंने उनकी मोती गांड को पूरा महती में पकड़ लिया. वह गोश्त मेरे हाथ के नीचे नरम और भरी था. वह चौंक कर घूम गयी, आँखें शॉक से बड़ी हो गयी.

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“ज़ैद! तू क्या कर रहा है?!”

मैंने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया लेकिन उसकी मोती गांड का महसूस मेरे हाथ पर अभी भी बना हुआ था. “माफ़ करना… मैं… मुझे नहीं पता क्यों मैंने ऐसा किया.”

उसने मुझे घूरती हुई तेज़ सांस ले रही थी. “तूने मेरी… कैसे कर सकता है? मैं तेरे दोस्त की अम्मी हूँ!”

“मुझे पता है. माफ़ करना. यह बस… हो गया.”

“यह कोई बहाना नहीं है. तू मुझे ऐसे नहीं छू सकता.”

वह मुझे डांटती रही, उसकी आवाज़ धीमी लेकिन मज़बूत थी, मुझे बता रही थी की यह कितना गलत था, वह कितनी निराश थी, मुझे सीमाओं का सम्मान करना चाहिए.

मैं सुन रहा था लेकिन मेरी नज़र बार बार उसके शरीर पर जा रही थी. जब वह बात करती रही मैं आगे झुका और उसके होंठों पर एक बार चुम लिया — तेज़, सख्त, फिर पीछे हैट गया.

वह जैम सी गयी, आँखें बड़ी हो गयी. हम दोनों कुछ सेकण्ड्स तक पूरी ख़ामोशी में एक दूसरे को देखते रहे. सिर्फ दूर से सोने के कमरे की सिसकियाँ और रात के हलके कीड़े की आवाज़ें सुनाई दे रही थी.

मैंने उसको फिर से चूमा. इस बार मैं तुरंत नहीं हैट गया. मेरे होंठ उसके होंठों पर डाब गए और कुछ पल के सख्त हैरानी के बाद वह पीछे नहीं हटी.

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उसका मुँह मेरे नीचे नरम था. मेरे हाथ फिर से उसकी मोती गांड पर पहुँच गए, दोनों हाथ अब उसके नरम भरी गांड के टुकड़ों को पकड़ कर मॉल रहे थे.

उसके गोश्त मेरे उँगलियों के नीचे डाब रहा था, गरम और मुलायम. मुझे उस तरह बहुत पसंद था की वह मेरे हाथों में भर रही थी, वह तरह जो छोटी लड़कियों के शरीर से बिलकुल अलग थी — मोटा, नरम, ज़्यादा पक्का. उस नरमी ने शर्म और उत्तेजना को मिला कर कुछ बहुत तेज़ बना दिया था.

हम दोनों सांस लेने के लिए अलग हुए. लूबना आंटी के गाल लाल हो गए थे.

“ज़ैद… यह गलत है,” उसने धीरे से कहा.

“मुझे पता है. मुझे जाबिर के लिए बुरा लगता है. वह मेरा दोस्त है. मैं… मैंने एक बार उसकी गर्लफ्रेंड प्रिय के साथ भी सोने की गलती कर ली थी. उसके लिए भी माफ़ करना. लेकिन जब मैं तेरे पास होता हूँ तोह मेरा दिमाग ठीक से नहीं चलता.”

उसने मुझे एक उलझे हुए चेहरे से देखा. “तूने प्रिय के साथ सोने की गलती की थी?”

“हाँ. यह गलती थी. बिलकुल इस जैसे. मैं बार बार ऐसी चीज़ें करता रहता हूँ जो मुझे नहीं करनी चाहिए.”

मैंने उसको फिर से चूमा, इस बार नरम और कुछ सेकण्ड्स बाद रुक गया. हम दोनों फिर से एक दूसरे को देखते रहे. हमारे बीच की हवा भरी हुई महसूस हो रही थी.

फिर मैंने उसको फिर से चूमना शुरू किया और इस बार वह भी रेस्पोंद करने लगी.

उसके होंठ मेरे होंठों के साथ हिलने लगे. उसका एक हाथ मेरे सीने पर आया, बिलकुल दूर नहीं धकेल रहा था.

मुझे बिलकुल पता नहीं था की वह क्यों रेस्पोंद कर रही थी — शायद जो हमने अभी देखा था उसका शॉक, शायद अकेलापन, शायद कुछ ऐसा जो उसने बहुत दिन से महसूस किया था लेकिन कभी माना नहीं था. जो भी वजह हो, वह मुझे वापस चुम रही थी.

बहुत देर बाद मैं हैट गया, अपना मोबाइल निकाला और उसको अपना नंबर दे दिया. “अगर कभी बात करना हो… इन सब के बारे में.”

मैं मुदा और चल पड़ा, उसको पीछे के आँगन में हैरान कड़ी छोड़ कर, उसके होंठ अभी भी थोड़े से खुले हुए, उसका हाथ उस जगह पर जहाँ मैंने उसकी गांड पकड़ी थी.

अगले दिन हम पिकनिक पर गए. मैं, अम्मी, गजेंद्र और अब्बा. यह पिकनिक गजेंद्र ने प्लान किया था, उसने कहा की रीसेंट परिवार के तनाव के बाद ताज़ा हवा सबके लिए अच्छी रहेगी.

अब्बा इतना बेवक़ूफ़ था. उससे अभी भी कुछ पता नहीं था की उसकी बीवी एक पूरी रंडी बन चुकी थी. वह मुस्कुराता हुआ गाडी पैक करने में मदद कर रहा था, परिवार के साथ टाइम बिताने की बातें कर रहा था.

उससे बिलकुल ख्याल नहीं था की अम्मी ने उसके साथ फ़ोन पर बात करते हुए hi गजेंद्र का लुंड चूस लिया था, उसने उसके लिए अपनी शादी की अंगूठी फ़ेंक दी थी, उसने अपने hi बिस्तर पर और होटलों में उससे छोड़ने दिया था.

अब्बा कूलर और बैग्स उठाये मुस्कुराते हुए, बिलकुल अँधा था इस बात से की उसके साथ चल रही औरत ने अपना शरीर और वफादारी दूसरे आदमी को दे दी थी.

उसका विश्वास पूरा और बेइज़्ज़ती भरा था. वह अम्मी की हर बात मानता था, हर बहाना एक्सेप्ट करता था और कभी शक नहीं किया की गजेंद्र को दी गयी “मदद” असल में शारीरिक थी.

उससे देख कर मेरे सीने में कुछ ठंडा जैम गया. वह पिकनिक पर पति और बाप बन कर जा रहा था जबकि अम्मी और गजेंद्र के बीच असली रिश्ता उसकी नाक के नीचे hi जारी था.

जब हम पिकनिक स्पॉट पहुंचे — नदी के पास शांत जगह जहाँ पेड़ों का घेरा था — मैं, अब्बा और गजेंद्र ने तीन टेंट्स लगाने शुरू किये.

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एक अब्बा और अम्मी के लिए, एक मेरे लिए और एक गजेंद्र के लिए. हम ने ज़मीन में खूंटे थोक दिए, कपडे टाइट किये और स्लीपिंग बैग्स ठीक किये.

अब्बा ख़ुशी ख़ुशी काम कर रहा था, मज़ाक कर रहा था की कितने दिन बाद तारों के नीचे सोना हुआ है. गजेंद्र मुस्कुराता हुआ मदद कर रहा था, कभी कभी जब अब्बा नहीं देख रहा था उसकी नज़र अम्मी पर पद जाती थी.

बाद में जब मैं अम्मी के टेंट के पास था मैंने सुना वह मेकअप लगा रही थी. उसका फ़ोन बजा. वह दादी ज़ैनब का था. मैं चुप रहा और सुनता रहा.

दादी की आवाज़ स्पीकर से आयी, थोड़ी सांस फूली हुई और लगभग हंसने जैसी. “शाहिदा, तू यकीन नहीं करेगी कल रात क्या हुआ.”

अम्मी की आवाज़ सावधानी वाली थी. “अम्मी? क्या हुआ? आप कहाँ हैं?”

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“मैं हॉस्पिटल में क़ादिर के साथ हूँ. वह बेहोश हो गया. उसने मुझे और सूरज को पकड़ लिया.”

लम्बी ख़ामोशी रही. फिर अम्मी ने कहा, “क्या?”

दादी ने फिर से हंसी दी, धीमी और गन्दी. “उसने सब कुछ देख लिया. मैं सूरज के ऊपर बैठी हुई थी, फिर सूरज मुझे पीछे से छोड़ रहा था. क़ादिर कुछ फूल पकडे हुए वहां खड़ा रह गया. फिर वह गिर पड़ा. डॉक्टर कहते हैं उसको जो कुछ उसने देखा उसकी याद बिलकुल नहीं. किसी शॉक की वजह से. अब वह आराम कर रहा है.”

अम्मी कुछ देर चुप रही. फिर उसकी आवाज़ धीमी और लगभग प्रशंसा से भरी आयी. “आप एक पूरी रंडी हैं अम्मी. आपको सावधान रहना चाहिए.”

“मुझे पता है. लेकिन इतना अच्छा लगा. और अब वह हॉस्पिटल में है और उसको कुछ याद नहीं. उसके लिए जैसे कुछ हुआ hi नहीं.”

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अम्मी ने सांस छोड़ी. “यह सब मुझे आपसे मिला है. यह… ज़रुरत. यह रंडी जैसा व्यवहार. आपको देख कर मैं समझ जाती हूँ की मैं गजेंद्र के साथ क्यों नहीं रुक पाती. यह हमारे खून में है. आपने मुझे बिना माने hi सीखा दिया.”

दादी की आवाज़ नरमी से एक साजिश वाली सी हो गयी. “तोह अब तुम क्या कर रही हो?”

“हम पिकनिक पर हैं. मैं, हुसैन, ज़ैद और गजेंद्र. गजेंद्र ने प्लान किया था. हुसैन को अभी भी कुछ पता नहीं. मैं गजेंद्र से इतनी बड़ी छह रही हूँ की वह मुझे चोदे. आज रात, अगर मैं निकल पायी. हुसैन इतना भरोसा करता है की हसी आती है. वह सोचता है हम बस एक नार्मल परिवार हैं जो बहार दिन गुज़ार रहे हैं.”

वह दोनों उसी रंडी जैसी, समझने वाली टोन में बात करती रही — दादी बताती रही की सूरज कितना अच्छा लगता है, अम्मी मानती रही की वह गजेंद्र के लुंड के लिए कितनी तरस रही है, दोनों अपने पतियों को इंसान नहीं बल्कि रुकावट की तरह ट्रीट कर रही थी.

मैं कॉल ख़तम होने तक सुनता रहा, मेरा पेट ulat-pulat हो रहा था.

रात को हम बोनफिरे के आसपास बैठ गए. आग की लातें हमारे बीच char-char और phat-phat कर रही थी.

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अब्बा काम और तारों के बारे में बात कर रहा था. अम्मी मुस्कुराती और सर हिलती रही. गजेंद्र आग को शांत, संतुष्ट एक्सप्रेशन से देख रहा था. मेरा फ़ोन बज्ज हुआ. यह लूबना आंटी थी. उसने मुझे मैसेज किया.

मैं स्क्रीन को देख कर हैरान रह गया. अम्मी ने मुझे टेंस और बेचैन देखते हुए नोटिस किया. उसने एएब्रो उठायी.

मैंने जल्दी से यह बहाना बनाया की मुझे कॉल लेना है और आग की रौशनी से दूर जंगल की तरफ चला गया.

मुझे अपने दोस्त की माँ के साथ फ़्लर्ट करने में कोई ख़ास बुरा नहीं लग रहा था.

सीमा पहले hi पिछली रात पार हो चुकी थी जब मैंने उसको चूमा था और उसकी गांड पकड़ी थी.

एक बार यह हो गया, तोह गिल्ट बस पीछे की आवाज़ बन गया. मुझे उसके नरम शरीर और उस तरीके की और ज़रुरत थी जिस तरह उसने मुझे वापस चूमने शुरू कर दिया था.

हम बात करने लगे. बातचीत बहुत देर तक चलती रही.

लूबना: मुझे अभी भी यह ठीक नहीं लगता की तुमने मुझे कल रात चूमा.

मैं: मुझे पता है. माफ़ कर दो. मैं कण्ट्रोल खो बैठा.

लूबना: तुम जाबिर के दोस्त हो. यह कॉम्प्लिकेटेड है.

मैं: मुझे पता है. लेकिन मैं इसके बारे में सोचना नहीं रोक प् रहा.

लूबना: मुझे कुछ महसूस हुआ. मुझे नहीं पता क्या. लेकिन वह था.

मैं: मुझे भी महसूस हुआ.

लूबना: हमें यह आगे नहीं बढ़ाना चाहिए.

मैं: मुझे पता है नहीं बढ़ाना चाहिए. लेकिन मैं चाहता हूँ.

मेस्सगेस चलते रहे. उसने माना की वह किश के बारे में सोच रही थी.

मैंने उससे कहा की मैं उसके शरीर को अपने दिमाग से नहीं हटा प् रहा. फिर, बिना मेरे मांगे, उसने अपनी एक फोटो भेज दी जिसमें वह टाइट ब्लाउज पहने हुए थी जो उसके भारी स्तनों की शेप साफ़ दिखा रही थी.

कपडा उन भरी गोलों पर तन गया था, नेकलिने इतनी नीचे थी की ऊपर के नरम गोल हिस्से दिख रहे थे.

फोटो देखते hi मेरे अंदर एक ठंडी पक्की बात बैठ गयी: साड़ी औरतें रंडी होती हैं चाहे कुछ भी हो. मेरी अपनी अम्मी गजेंद्र के लिए एक पूरी रंडी बन चुकी थी जबकि अब्बा के लिए परफेक्ट बीवी का नाटक करती थी.

मेरी दादी सूरज को छे महीने से छोड़ रही थी और उसके पति के उनको देखते हुए गिर पड़ने पर भी उससे फरक नहीं पड़ा.

और अब लूबना आंटी — मेरे बेस्ट फ्रेंड की इज़्ज़तदार माँ — मुझे अपने शरीर की फोटो भेज रही थी बाद इसके के मैंने उसकी गांड पकड़ी थी और उसको चूमा था.

पैटर्न बिलकुल वही था. शर्मिंदा कपड़ों और परिवार के रोल्स के नीचे, उन सबमें वही भूख थी.

जैसे hi दरवाज़ा थोड़ा सा भी खुला, रंडी निकल आयी. इससे फरक नहीं पड़ता की वह कितनी '., कितनी shaadi-shuda या कितनी “अच्छी” दिखती थी. ज़रुरत हमेशा वहां थी, इंतज़ार करती हुई.

मैं उसके भारी स्तनों की फोटो को देखते हुए तुरंत मुठ मारने लगा.

मैंने सोचा उसकी मोती गांड मेरे हाथों के नीचे कैसी लगी थी, कितनी नरम और भरी थी, कैसे उसने मुझे वापस चूमने शुरू कर दिया था.

मैंने सोचा वह कहीं अकेली बैठी हुई मेरे लिए वह फोटो खींच रही होगी. मेरा हाथ तेज़ होता गया.

उसके बड़े बूब्स की इमेज और उसकी गांड की याद उन सब चीज़ों के साथ मिल गयी जो मैंने देखि थी — अम्मी घुटनो के बल, दादी सूरज के ऊपर — जब तक मैं घास पर ज़ोर से झाड़ गया, सांस फूलती हुई.

बाद में मुझे फिर बुरा लगा. वह अभी भी जाबिर की माँ थी. मैंने एक और सीमा पार कर ली थी.

उसका अगला मैसेज जल्दी आ गया: रिप्लाई करने में इतना टाइम क्यों लग रहा है? क्या तुम ठीक हो?

मैंने हाथ पोछा, शार्ट जवाब टाइप किया की मैं ठीक हूँ, फिर फ़ोन रख दिया और टेंट्स की तरफ वापस चल पड़ा.

जब मैं काम्प्सिते पहुंचा, अब्बा पहले से hi अपने स्लीपिंग बैग में सो रहा था, उस टेंट में जो वह अम्मी के साथ शेयर कर रहा था.

उसकी सांस गहरी और भारी थी. अम्मी और गजेंद्र मरते हुए आग के पास करीब बैठ कर धीमी आवाज़ में बात कर रहे थे.

मैंने तुरंत समझ लिया की उन्होंने अब्बा को नशा दिया है. यह hi एक एक्सप्लनेशन थी इस बात की की वह खाने के बाद इतनी जल्दी और इतने पूरे तरीके से सो गया.

गजेंद्र ने ज़रूर उसके खाने या पीने में कुछ मिला दिया होगा ताकि अम्मी रात के लिए आज़ाद हो जाए. अब्बा का उन दोनों पर अभी भी भरोसा इसको आसान बना रहा था.

मैं अपने टेंट में गया और लेट गया.

कुछ देर बाद मैं बहार सॉफ्ट हरकतों की आवाज़ से उठ गया.

मैं उठ कर बाहर देखा. कैंप खली था. अम्मी और गजेंद्र गायब थे.

मैं टेंट से चुपके से निकल गया और उनके सिल्होउएटेस को चांदनी में नदी की तरफ जाते हुए देखा. मैं दूर से ट्रीज के बीच छुपते हुए उनके पीछे गया.

पानी के पास उन्होंने रुक कर घास पर ब्लैंकेट बिछाया और चूमने लगे. अम्मी गजेंद्र के ऊपर थी. उनके शरीर पेड़ों के नीचे दबे हुए थे, नदी की आवाज़ उनकी धीमी आवाज़ों को धक् रही थी.

अगला हिस्सा में पता चलेगा की आगे क्या हुआ

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मुझे इस कहानी को आगे बढ़ने से पहले सीधा उन लोगों से बात करनी है जो यह पढ़ रहे हैं.

अपनी hi अम्मी को किसी दुसरे आदमी से चुड़ते हुए देखना मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी और सबसे बेहतर चीज़ बन चूका है. मैं इस बात को पूरी तरह से कहता हूँ.

इसमें कोई भी अत्युक्ति नहीं है. पहली बार जब मैंने उसको गजेंद्र के लिए घुटनो के बल बैठते देखा, पहली बार जब मैंने उसकी वह सिसकियाँ सुनी जो मेरे अब्बा के लिए नहीं थी.

पहली बार जब मैंने किसी दुसरे आदमी का लुंड उसी शरीर के अंदर गायब होते देखा जिसने एक समय मुझे पेट में रखा था, उस पल ने मेरे अंदर कुछ ऐसा बदल दिया जो अब कभी वापस नहीं जाएगा.

यह किसी भी सफलता, किसी भी दोस्ती, किसी भी आम सुख से कई गुना बेहतर है जो मैंने कभी महसूस किया.

वह शर्म, वह खतरा, उसका चेहरा जब बदलता है जब उसका इस्तेमाल हो रहा होता है, यह जानना की वही मुँह जो मेरे अब्बा को रात को गूडनिघत का किश देता है अभी किसी और के लुंड के आसपास फैला हुआ tha—yeh सब एक ऐसी भूख को खिलाता है जिससे कोई और चीज़ नहीं छू सकती.

अगर तुमने कभी यह महसूस नहीं किया तोह मैं पूरी ताकत से तुम्हे यह कहना चाहता हूँ की किसी तरह से इसको पाओ. अपनी अम्मी को, या किसी की अम्मी को, उस आदमी से चुड़ते हुए देखो जिसको उसको छूने का कोई हक़ नहीं है.

उस बिजली जैसी झटके को महसूस करो जब तुम जानते हो की तुम परिवार की तस्वीर के टूटने को देख रहे हो जबकि तुम्हारा अपना लुंड हाथ में धड़क रहा होता है. वह गिल्ट इस सुख का हिस्सा है.

पकडे जाने का दर इस सुख का हिस्सा है. यह जानना की तुम इतने पाप जमा कर रहे हो जिनका कभी तोबा नहीं करोगे, यह भी इस सुख का हिस्सा है.

एक बार इसका स्वाद ले लो तोह आम सेक्स बिलकुल फीका और खली लगता है. यह असली चीज़ है. यह जीने का सबसे ऊँचा रूप है जो मैंने पाया है. मैं चाहता हूँ की दुसरे लोग भी वही महसूस करें जो मैं महसूस करता हूँ, क्यूंकि इसको अकेला उठाना लगभग बहुत ज़्यादा हो जाता है.

अब वापस उस रात की तरफ जो नदी के पास हुई थी.

गजेंद्र ने उसको इतना ज़ोर से चूमा की उसके ज़ोर से अम्मी पीछे कम्बल पर गिर गयी. उसके मुँह ने उसके होंठों को कुचल दिया, जीभ उसके होंठों के अंदर ज़ोर से घुस गयी, दांत हलकी सी रगड़ते हुए जैसे वह उसको कच्ची भूख से अपना बना रहा हो.

उसके एक हाथ ने उसके सर के पीछे बालों में उँगलियाँ फंसा ली, उसको जगह पर पकडे हुए, जबकि दूसरा हाथ उसकी कमर के नीचे दबाता रहा, उसके शरीर को अपने से चिपकाए हुए.

वह किश बहुत देर तक चलता रहा, गीला और गहरा, उनके मुहों के मिलने की आवाज़ थोड़ी दूर नदी के धीमे बहने के साथ मिल रही थी.

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जब उसने आखिर में मुँह हटाया तोह उनके होंठों के बीच एक पतली लार की लड़ी एक सेकंड के लिए लटकी फिर टूट गयी.

अम्मी का सीना तेज़ तेज़ ऊपर नीचे हो रहा था. उसकी आँखें धीमी चांदनी में बड़ी बड़ी थी.

“गजेंद्र… मुझे दर लग रहा है,” उसने कहा, उसकी आवाज़ धीमी और कांपती हुई. “सच में बहुत दर. हम बिलकुल खुले में हैं. कोई भी यहाँ से गुज़र सकता है. हुसैन टेंट में सिर्फ थोड़ी दूर है. अगर वह उठ गया तोह? अगर वह मुझे ढूंढने आया तोह?”

गजेंद्र ने अपना वज़न बदला ताकि वह उसके ऊपर झुक सके, एक हाथ अभी भी उसकी गर्दन के किनारे पर.

“मुझे देखो,” उसने कहा, उसकी आवाज़ मज़बूत लेकिन सख्त नहीं. “हुसैन नहीं उठेगा. जो गोलियां मैंने उसके खाने में मिली थी वह उसको कई घंटों तक सोये रखेगी. टेंट इतने दूर हैं की आम आवाज़ें उस तक नहीं पहुंचेगी. पेड़ों से रास्ते का नज़र नहीं आता. यहाँ सिर्फ हम हैं.”

“लेकिन अगर कोई और रात में घूम रहा हो? कोई कैंपिंग वाला, या किसी दुसरे ग्रुप का कोई?”

“तोह हम उनको देखने से पहले hi सुन लेंगे. हर मुमकिन खतरे के बारे में सोचना बंद करो और मुझपर ध्यान दो.”

अम्मी ने थूक निगला. “मैं सोचना नहीं रोक पाती. हर बार जब हम यह करते हैं मुझे लगता है की मैं सब कुछ डाव पर लगा रही हूँ. अपनी शादी, अपना परिवार, अपनी इज़्ज़त. यहाँ तोह और भी बुरा लगता है क्यूंकि कोई दरवाज़ा नहीं है बंद करने को.”

“तुम मेरे साथ इसलिए आयी क्यूंकि तुम्हे यह चाहिए था,” गजेंद्र ने जवाब दिया. “जब हम टेंट से निकल रहे थे तभी तुम गीली थी. यह मत दिखाओ की दर उससे ज़्यादा स्ट्रांग है जो तुम्हे अभी चाहिए.”

“मुझे अभी भी दर लग रहा है.”

“तोह दर को मैं संभालता हूँ.” उसने अपना हाथ उसकी तरफ से नीचे सरकाया, उसकी कमर के गोल हिस्से पर, और उसकी सफ़ेद पतलून के कमर बंद को खिंचा. “यह उतार दो. मैं तुम्हे ठीक से देखना चाहता हूँ.”

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अम्मी ने बाएं दाएं नज़र डाली, उसकी आँखें अँधेरी पेड़ों की लाइन, काम्प्सिते की तरफ जाने वाले धीमे रास्ते, और पानी के किनारे गहरी छायों को जांच रही थी. उसने कई सेकण्ड्स तक हिचकिचाया, फिर धीरे धीरे पतलून को अपनी कमर और जाँघों से नीचे धकेल दिया.

उससे उन्हें पूरी तरह उतारने के लिए अपनी कमर कम्बल से ऊपर उठानी पड़ी.

जब कपडा आखिर में उसके तकनो से निकल गया तोह उसने पतलून एक तरफ रख दी और सिर्फ अपनी सफ़ेद पंतय में रह गयी. पतला कपडा बीच में पहले से hi उसकी उत्तेजना से गीला और गहरा हो चूका था. वह हर कुछ सेकण्ड्स में अपना सर घूमती रही, बार बार आसपास चेक करती रही.

“क्या कोई है?” उसने धीरे से कहा. “मुझे लगता रहता है जैसे कोई देख रहा हो.”

“कोई नहीं देख रहा,” गजेंद्र ने कहा. “सिर्फ मैं. आगे बढ़ो.”

अम्मी की उँगलियाँ सफ़ेद पंतय के किनारों में फँस गयी.

मैं एक पेड़ के पीछे छुपा हुआ था और मैं पहले से hi अपनी पंत का ज़िप खोल रहा था ताकि फिर से देखना शुरू कर सकूं. मुझे अपने आप से बहुत शर्म आ रही थी लेकिन मुझे परवाह नहीं थी.

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उसने रुक कर ज़ोर से सांस ली. “यह इतना शर्मनाक लग रहा है. हम बहार हैं, लगभग कुछ पहने बिना, रात की हवा मेरी त्वचा पर, जानते हुए की मेरा पति पास में सो रहा है. कौन सी औरत ऐसा करती है?”

“वह जो इसकी ज़रुरत महसूस करती है,” गजेंद्र ने जवाब दिया. “उतार दो. तुम गन्दी रंडी.”

उसने पंतय धीरे धीरे नीचे सरकायी. कपडा उसकी जाँघों के बीच थोड़ी देर चिपका रहा फिर उसने उसको आज़ाद कर दिया.

उसने छोटे से सफ़ेद कपडे को एक हाथ में पकड़ा, उसको देखती रही, फिर उसको कम्बल के किनारे घास में फ़ेंक दिया.

“मुझे यकीन नहीं हो रहा की मैंने यह कर दिया,” उसने कहा, उसकी आवाज़ शर्म से भरी. “मैंने अपनी पंतय मिटटी में फ़ेंक दी जैसे उसका कोई मतलब hi नहीं था. मैं एक शादी शुदा औरत हूँ. एक अम्मी. और मैं यहाँ नदी के किनारे किसी दुसरे आदमी के लिए नंगी हूँ.”

गजेंद्र ने टाइम बर्बाद नहीं किया. उसने उसकी कमर को मज़बूती से पकड़ा और उसको घुमाया ताकि वह उससे दूर मुँह करे, फिर उसको कम्बल पर हाथ और घुटनो के बल धकेल दिया. पोजीशन के अचानक बदलने से उसने सिसकी भरी.

“Gajendra—ruko—tum क्या कर रहे हो?”

“अब मैं चाहता हूँ की तुम झुक जाओ,” उसने कहा, पहले से hi उसके पीछे पोजीशन लेते हुए. “मैं अब और इंतज़ार नहीं करना चाहता.”

अम्मी की सफ़ेद पतलून और ब्लाउज दोनों पहले की रफ़ हरकतों से फाड़े हुए the—blouse की एक आस्तीन कंधे से फटी हुई थी, कपडा ढीला लटक रहा था, और पतलून का कमर बंद पहात चूका था.

गजेंद्र की अपनी पतलून और कमीज भी ऐसी hi हालत में थी: कमीज के कई बटन गायब, एक तरफ लम्बी पहाड़, और पतलून का ज़िप ज़ोर से खोला हुआ और टूटा हुआ. यह बिगड़े कपडे इस बात को मुश्किल बना देते की अगर अब्बा उठ जाए और उन्हें ढूंढने आये तोह उन्हें बड़ी दिक्कत होगी.

उन्हें यह कहानी बनाना पड़ेगी की वह पानी में गिर गए या कपडा किसी दाल से अटक गया, लेकिन सच फाड़े हुए किनारों में साफ़ tha—woh इतने बेचैन और इतने रफ़ थे की कपड़ों को ठीक रखने की उन्हें परवाह नहीं थी. टेंट तक बिना ध्यान खींचे वापस जाना मुश्किल होगा.

अम्मी पहले से hi गीली थी. जब गजेंद्र ने उसकी उँगलियाँ उसकी जाँघों के बीच चलायी, उसकी छूट के होंठ गीले और खुले हुए थे, धीमी रौशनी में भी उसकी उत्तेजना से चमक रहे थे. उसने अपने अंगूठे और ऊँगली से उन्हें थोड़ा फैलाया, गीलेपन को उनके बीच तानते हुए देखता रहा.

“तुम बिलकुल भीगी हुई हो,” उसने कहा. “तुम पूरी शाम इसके बारे में सोचती रही हो.”

“हाँ,” अम्मी ने माना, उसकी आवाज़ सिर्फ धीमी सी. “जब हम आग के आसपास बैठे थे तब भी मैं महसूस कर रही थी. हर बार जब तुम मुझे देखते थे मैं और गीली होती जाती थी. मैं खुद से नफरत करती थी इसके लिए, लेकिन मेरा शरीर नहीं सुनता था.”

“अच्छा. क्यूंकि मैं इंतज़ार नहीं कर रहा.”

उसने अपने आप को लाइन किया और एक hi ज़ोर और फाॅर्स वाले झटके में अपना लुंड उसके अंदर धकेल दिया. अचानक फैलने से अम्मी chillayi—ek तेज़, ऊँची आवाज़ जो शांत रात को काट गयी. “आआअह्ह्ह ऊह्ह्ह्ह गजेबेंद्राआ!!!! ऊह्ह्ह्ह सशीट ोुह्ह्ह्हह्ह्ह्ह”

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“चुप!” गजेंद्र ने सिसकारी भरी, एक हाथ उसके मुँह पर दबाते हुए. “क्या तू चाहती है की पूरा काम्प्सिते तुझे सुन ले? चिल्लाना बंद कर वर्ण मैं और बुरा करूँगा.”

अम्मी की आवाज़ उसके हाथ के नीचे दबती हुई निकली. “आअह्ह्ह ऊह्ह्ह्हह्ह दर्द हो रहा hai—bahut गहरा hai—please धीरे करो—”

“सांस ले और ले. तू ने hi माँगा था.”

उसने पहले धीरे धीरे छोड़ना शुरू किया, लम्बे गहरे झटके जो हर धक्के के साथ उसको ब्लैंकेट पर आगे धकेलते थे.

उसके लुंड के अंदर बहार निकलने की गीली आवाज़ शांत रात में साफ़ सुनाई दे रही थी. अम्मी की उँगलियाँ ब्लैंकेट के कपडे में घुस गयी थी.

झटकों के बीच वह अपना सर उठती रही और इधर उधर देखती rahi—baayein तरफ पेड़ों की तरफ, दाएं तरफ रस्ते की तरफ, कंधे के ऊपर peeche—kyunki पकडे जाने का दर उसके अंदर से पूरी तरह नहीं गया था जबकि वह भर रही थी.

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कुछ देर बाद गजेंद्र ने रफ़्तार बढ़ा दी. उसके कमर के हिस्से आगे की तरफ और ज़ोर से और तेज़ झटके मारने लगे, उसके शरीर के उसकी गांड से टकराने की आवाज़ तेज़ होती गयी. उसने एक हाथ नीचे ले जाकर उसके स्तनों को दबाया, निप्पल्स को पिंच किया, फिर उसकी कमर को पीछे खिंच कर हर झटके से मिलाया.

अम्मी की दबती हुई सिसकियाँ उसके हाथ के किनारों से निकल रही थी. वह हार्ड झटकों के बीच भी बाएं दाएं देखती रही, आँखें बड़ी, क्यूंकि किसी के सुनने या देखने का खतरा हर सेंसेशन को और तेज़ और खतरनाक बना रहा था.

मेरे पेड़ों के बीच छुपे हुए जगह से मैं पहले से hi मुठ मार रहा था. मेरा हाथ अपने लुंड पर धीरे धीरे हिल रहा था जब मैं अपनी hi अम्मी को हाथ और घुटनो के बल देख रहा था, खुले आसमान के नीचे नदी के किनारे दुसरे आदमी का लुंड लेते हुए.

मुझे पता था यह गलत है. मुझे पता था हर सेकंड इसमें उन पापों की लिस्ट बढ़ा रहा है जिन से मैंने कभी तौबा नहीं ki—usko देखना, उसके इस्तेमाल होने के नज़ारे से अपने आप को छूना, चुप रहना जब वह बेइज़्ज़त हो रही थी, अपने अब्बा के धोखे में सुख पाना.

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पाप बड़े थे और बिना रुकावट के जमा होते जा रहे थे: वासना, बेइज़्ज़ती, छुपकर देखना, उसको इस हालत में देख कर जो अँधेरा सुख मिल रहा था.

मुझे पता था यह गलत है, लेकिन मुझे परवाह नहीं थी, क्यूंकि पाप इतना अच्छा लग रहा था.

उसके शरीर को लिए जाने का नज़ारा, उसके चिल्लाने से रोकने की कोशिश की आवाज़, यह जानना की अब्बा सिर्फ थोड़ी दूर सोये हुए hain—sab कुछ सुख को और तेज़ और गहरा बना रहा था. मैं हिलता रहा, आँखें सन पर अटकी हुई, एक सेकंड के लिए भी नज़र नहीं हटाई.

गजेंद्र ने एक पल के लिए धीरे किया और उसकी टांगों के बीच नीचे देखा. “तेरी छूट अभी भी कितनी टाइट है,” उसने कहा, उसकी आवाज़ कड़क थी. “आज रात जो कुछ किया उसके बाद भी हर बार जब मैं अंदर धकेलता हूँ तोह यह मुझे पकड़ लेती है.”

अम्मी की सांस उनवेन थी. “क्यूंकि मैं डर्टी हूँ. मेरा पूरा शरीर टाइट है.”

“नहीं. क्यूंकि तू इसी के लिए बानी है. टाइट और गीली एक साथ. मैं महसूस कर रहा हूँ यह मुझे अंदर खिंच रही है.”

वह भी उसी तरह क्लीयरिंग के आसपास देख रहा था जैसे वह, छाओं चेक करते हुए और किसी अजीब आवाज़ के लिए सुनते हुए, जबकि वह धक्का मारता रहा. यह शेयर्ड विजिलेंस उनके बीच के चरगेद माहौल को और बढ़ा रहा था.

फिर उसकी आवाज़ बदल गयी. “अपनी गांड के चीख फैलाओ मैं तेरी गांड छोड़ना चाहता हूँ.”

अम्मी का शरीर सख्त हो गया. “नहीं. गजेंद्र, नहीं. मैं चिल्लाऊंगी. यह बहुत ज़्यादा है. यहाँ नहीं. इस तरह नहीं.”

“तू लेगी.”

“Please—mat करो. मैं बहुत ज़ोर से आवाज़ निकालूंगी. कोई सुन लेगा. अगर तुम वह किये तोह मैं चुप नहीं रह पाऊँगी.”

उसने नहीं सुना. उसने धीमी लेकिन कड़क आवाज़ में उसको गलियां देनी शुरू कर दी, उसको रंडी, गन्दी शादी शुदा रंडी, वह औरत जो अपने पति के सोये हुए सिर्फ मीटर्स दूर होने पर भी दुसरे आदमी के लिए टांगें फैलाती है.

उसने उसकी गांड पर इतना ज़ोर से थप्पड़ मारा की साफ़ लाल निशान पद गया, फिर दूसरी तरफ भी. “तू पहले से hi मेरा छेद है. यह वाला अब अगली बारी है.”

उसने उसको ब्लैंकेट पर पेट के बल लिटाया, उसका चेहरा एक तरफ, एक गाल कपडे से दबाया हुआ.

अम्मी toot-ti हुई आवाज़ में भीख मांगने लगी. “प्लीज मत करो. मेरी गांड नहीं. मैं बहुत ज़ोर से आवाज़ निकालूंगी. प्लीज, Gajendra—please—”

उसने सीधा उसकी गांड के छेद पर थूक दिया. गीली आवाज़ शांत रात में साफ़ थी. “खोल.”

“मैं नहीं कर sakti—main डर्टी hoon—please—”

उसने अपने लुंड के सर को टाइट मुस्कले के रिंग पर दबाया. अम्मी ने ज़ोर से कास लिया, उसका शरीर इन्स्टिंक्टिवे इंकार में जैम गया.

उसने कास लिया क्यूंकि दर्द और दर ने उसके शरीर को अपने आप को बचने की कोशिश करवाई, क्यूंकि उसको लगा यह इतना रिस्की है, क्यूंकि चिल्लाने और सुनने का ख्याल उसको इस काम से ज़्यादा डरा रहा था.

गजेंद्र का कण्ट्रोल टूट गया. “मुझसे मत लड़ो.” उसने फिर से धक्का मारा, इस बार और ज़ोर से, और लुंड का सर टाइट रिंग से अंदर घुसा. अम्मी की चीख तेज़ और ऊंची निकली, उसकी पहली आवाज़ों से भी ज़ोर की.

चीख पेड़ों से होते हुए दूर तक गयी. मैं हैरान था की आवाज़ कितनी दूर तक पहुंची.

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मैं परेशां था क्यूंकि काम्प्सिते उतना दूर नहीं था, क्यूंकि अब्बा आवाज़ से जग सकते थे, क्यूंकि रात को रस्ते पर चल रहा कोई भी नदी के किनारे एक औरत की चीख सुन कर जांचने आता.

गजेंद्र नहीं रुका. उसने और गहरा धक्का दिया जब तक उसका लुंड उसकी गांड में पूरा डाब नहीं गया.

अम्मी का शरीर उसके नीचे हिल रहा था. उसने उसकी गांड को स्टेडी गहरे झटकों से छोड़ना शुरू किया, टाइट रिंग हर बार बहार निकलते और अंदर जाते वक़्त उसको मज़बूती से पकड़ रहा था.

“यह छेद अब मेरा है,” उसने कहा, उसकी आवाज़ सुख से कड़क थी. “वह छेद जहां से तू सहित करती है अब मेरा है. मुझे यह जानना बहुत पसंद है. मुझे यह सोचना पसंद है की तेरी फारत और यह जगह जहां से तू सहित निकालती है, और अब मेरा लुंड इसके अंदर है.”

अम्मी की आवाज़ पहात गयी. “प्लीज ऐसे मत bolo—please—mujhe इतना गन्दा महसूस होता hai—please उस बारे में बात बंद करो—”

“तू गन्दी है. तू एक शादी शुदा औरत है जिसके शितोले में दुसरे आदमी का लुंड है. बोल.”

“मैं नहीं—”

उसने उसको और ज़ोर से छोड़ा, उसके झटकों की ताकत से उसका शरीर ब्लैंकेट पर आगे हिल रहा था. “बोल.”

“मैं… गन्दी हूँ… प्लीज उस बारे में बात बंद करो—”

“तू मेरे लुंड पर सहित नहीं करेगी. समझ गयी?”

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अम्मी ने उससे कोई वादा नहीं किया. वह सिर्फ सिसकी भर रही थी और अपना चेहरा ब्लैंकेट में और ज़ोर से दबती रही, उन आवाज़ों को दबाने की कोशिश में जो हर गहरे झटके के साथ निकल रही थी.

मैं पहले से hi झाड़ रहा था. मेरा हाथ तेज़ होता गया जब मैं अपनी अम्मी की गांड को इस्तेमाल होते हुए देख रहा था.

दूसरा ओर्गास्म पहले से भी तेज़ आया, मेरा शरीर हिल रहा था जब मैं अँधेरे में झुक कर बैठा रहा, गजेंद्र के लुंड के बार बार उसके अंदर गायब होने के नज़ारे से नज़र नहीं हटा प् रहा था.

फिर मुझे क़दमों की आवाज़ सुनाई दी.

मैं जैम गया, दिल पसलियों से टकरा रहा था. एक पल के लिए मुझे लगा यह फिर से ग्रैंडपा क़ादिर हैं, पिछली रात का कोई असंभव इको.

लेकिन आवाज़ अलग थी: भारी बूट्स ज़मीन पर, टोर्च के स्विच ों होने की नरमी मैटेलिक क्लिक. गजेंद्र और अम्मी ने भी सुन लिया.

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गजेंद्र का शरीर टाइट हो गया; वह पहले से hi अम्मी की गांड के अंदर गहरा झाड़ चूका था, उसका लुंड अभी भी उसके अंदर दबाया हुआ था जब सफ़ेद वीर्य बेस के आसपास से निकल कर ब्लैंकेट पर टपकने लगा.

मेरे छुपे हुए जगह से मैंने टोर्च की बीम पेड़ों से होते हुए kaat-ti देखि. यह मेरा अब्बा नहीं था क्यूंकि अब्बा अभी भी अपने टेंट में सोये हुए थे.

एक आदमी उस एरिया में घूम रहा था, तेज़ रौशनी ज़मीन और पानी पर बाएं दाएं स्वीप कर रही थी. बीम सीधा ब्लैंकेट पर गिरी.

यह आदमी कौन है??

अगला हिस्सा में पता चलेगा क्या हुआ.
 
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