हम चार लोग पीछे के आँगन में बहुत देर तक जैसे पथ्थर बन कर खड़े रहे. दोपहर का सूरज अभी भी तेज़ चमक रहा था लेकिन हमारे बीच की हवा बहुत भरी और घानी थी.
मेरी माँ के चेहरे पर अभी भी मोटा सफ़ेद वीर्य लगा हुआ था कुछ उसके होंठों और थोड़ी पर सूख रहा था और थोड़ा सा उसके गाल पर चमक रहा था. उसकी गहरी गुलाबी हिजाब थोड़ी टेढ़ी हो गयी थी.
गजेंद्र उसके पीछे खड़ा था उसकी सफ़ेद कमीज आधी खुली हुई थी उसका लुंड अभी भी उसकी सफ़ेद निस्केर के अंदर आधा खड़ा सा दिखाई दे रहा था.
दादी ज़ैनब ने हम तीनो को उस धीरे धीरे समझ वाली मुस्कराहट के साथ देखा जो उसके चेहरे पर तब से लगी हुई थी जब से उसने खिड़की से झाँका था.
और मैं ज़मीन पर थोड़ा अजीब पोज़ में बैठा हुआ था मेरी अपनी निस्केर अभी भी उभरी हुई थी मेरा मोबाइल मेरे कांपते हाथ में था.
माँ सबसे पहले बोली उसकी आवाज़ बहुत छोटी और कांपती हुई थी.
अम्मी आप यहाँ हैं.
दादी ज़ैनब धीरे से सर हिलायी उसकी आँखें अपनी बेटी के वीर्य से भरे चेहरे से गजेंद्र की तरफ फिर मेरी तरफ गयीं. मैं कुछ ताज़े आम लाने आयी थी. मुझे नहीं पता था तुम्हारे यहाँ कोई मेहमान होगा.
मेहमान शब्द हवा में एक भरी मतलब के साथ लटका रहा.
हम सबने थोड़े से अजीब शब्दों में सलाम किया.
माँ जल्दी से दादी का हाथ पकड़ लिया. अंदर चलो अम्मी बहार बहुत गर्मी है. उसने फिर मुझे या गजेंद्र की तरफ देखा नहीं.
उसने सिर्फ मुड़कर दादी को घर की तरफ ले जाना शुरू किया अभी भी उसका हाथ मज़बूती से पकडे हुए. दोनों औरतें चल कर दूर हो गयीं मुझे और गजेंद्र को पीछे के आँगन में अकेला छोड़ कर.
कुछ पल के लिए हम दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा. गजेंद्र एक साधा सफ़ेद कमीज पहने हुए था जो ऊपर के बटन खुले हुए थे और एक सफ़ेद निस्केर जो उसके मोठे लुंड की मोती लाइन को बिलकुल नहीं छुपा प् रही थी.
मैं वहां अपने हाथ में मोबाइल लिए खड़ा था अपने आप को बिलकुल खुला महसूस कर रहा था हालांकि मेरी निस्केर ऊपर थी.
गजेंद्र ने मुझे देखा. उसका चेहरा गंभीर था. उसने अपना मुँह खोला जैसे वह कुछ बहुत ज़रूरी बात कहने वाला था कुछ निजी शायद कोई बड़ा राज़. उसकी आँखें सीढ़ी मेरी आँखों में उतर गयीं.
मुझे महसूस हो रहा था की वह मुझे कुछ बड़ी बात बताना वाला था जो यह समझाता की वह यहाँ क्यों आया था मेरी माँ इतनी क्यों बदल गयी थी शायद मेरे बाप के बारे में भी कुछ.
लेकिन उसके कुछ कहने से पहले हमने फिर क़दमों की आवाज़ सुनी.
दादी ज़ैनब घर से वापस आती हुई आयी गजेंद्र की फोल्ड की हुई पतलून अपने दोनों हाथों में लिए हुए. वह अंदर सिर्फ एक मिनट से भी काम देर के लिए गयी थी.
उसने दोनों हाथों से वह पतलून उसके सामने बढ़ा दी लेकिन उसकी आँखें उसके चेहरे पर नहीं थी.
वह नीचे की तरफ थी साफ़ साफ़ उसकी सफ़ेद निस्केर के आगे वाले हिस्से पर देख रही थी जहां उसका लुंड अभी भी एक बहुत बड़ा उभार बना रहा था.
यह लो उसने धीरे से कहा यह तुम अंदर भूल आये थे.
गजेंद्र ने वह पतलून उसके हाथ से ले ली.
जब उसने पतलून को खोला तोह हम दोनों ने सामने की तरफ सफ़ेद धब्बे देखे मोठे सूखे हुए उसके अपने वीर्य के धब्बे जो पहले तब निकल आये थे जब मेरी माँ उसके लुंड को अपने मुँह में चूस रही थी.
वह धब्बे देखने से छुपे नहीं जा सकते थे.
दादी ज़ैनब ने भी वह धब्बे देखे. उन्हें देख कर आँख चुराने की बजाये उसने एक छोटी सी हंसी जैसी आवाज़ निकाली.
लगता है किसी ने काफी गन्दगी फैला दी उसने कहा उसकी आवाज़ हलकी और मज़ेदार थी.
दादी ने उसका नाम पुछा और गजेंद्र ने जवाब दिया की वह मेरी माँ का दोस्त है.
वह दोहरे मतलब की बात कर रही थी लेकिन हम सबको उसका असली मतलब समझ आ गया था. तुम्हे अपने कपड़ों के साथ और सावधान रहना चाहिए बीटा सफ़ेद कपडा सब कुछ साफ़ साफ़ दिखा देता है.
गजेंद्र एक पल के लिए रुक गया. वह साफ़ तौर पर हैरान था.
वह सोच रहा था मैं उसकी आँखों में देख सकता था की क्या मेरी दादी को असल में अंदर क्या हुआ था यह पता था. क्या उसने सब कुछ अपनी आँखों से देखा था. क्या उसने यह समझ लिया था की उसकी पतलून पर लगे धब्बे उसकी अपनी बेटी के मुँह को उसके लुंड से छोड़ने की वजह से आये थे.
मैं उनके बीच थोड़ा अजीब तरीके से खड़ा था यह नहीं समझ प् रहा था की अपनी नज़र कहाँ लगाऊं. तनाव इतना ज़्यादा था की मैं मुश्किल से सांस ले प् रहा था.
दादी ने वहां रोक नहीं लगाया. जब तक गजेंद्र अभी भी धब्बे वाली पतलून पकडे हुए था वह उसको घूरती रही उसकी खुली हुई सफ़ेद कमीज के बटनों से उसके चौड़े सीने की तरफ उसकी सफ़ेद निस्केर में बने उभार की तरफ और उसकी मज़बूत बाहों की तरफ.
वह जान बूझ कर मस्ती भरी हरकतें कर रही थी. उसकी आँखें खेलती हुई थी और लगभग भूखी सी लग रही थी.
हर दो चार सेकंड में वह फिर से उसके निस्केर वाले हिस्से की तरफ झाँक लेती और फिर जल्दी से उसके चेहरे पर छोटी सी मुस्कराहट के साथ नज़र दाल लेती.
मैंने अपने मैं में सोचा उसने उसका बड़ा लुंड देखा था इसलिए वह ऐसा कर रही थी. उसने देखा था जब वह मोटा लम्बा लुंड मेरी माँ के मुँह के अंदर था तब कैसा दीखता था. क्या बिगड़ी हुई दादी है यह.
यह विचार मुझे बहुत अजीब महसूस करवा रहा था घिन भी आ रही थी और साथ hi एक अजीब सी उत्तेजना भी हो रही थी.
हमारा परिवार पहले से hi बहुत गिर चूका था. अब तोह मेरी दादी भी उसी आदमी के साथ खुले आम मस्ती कर रही थी जिसने उसकी बेटी के चेहरे पर अपना वीर्य निकाल दिया था.
एक और बात जो सब कुछ और ख़राब कर रही थी दादी गजेंद्र के बहुत करीब कड़ी रही.
उसने पतलून देने के बाद पीछे नहीं हटना था वह वही कड़ी रही उसकी सफ़ेद डिज़ाइन वाली ड्रेस हवा में हलके से लेहराः रही थी उसकी आँखें अभी भी उस मस्ती वाली चमक से भरी हुई थी.
गजेंद्र आखिर में बोल पाया उसकी आवाज़ थोड़ी कड़क थी. शुक्रिया आंटी.
दादी ने और बड़ी मुस्कराहट दी. मुझे शुक्रिया देने की कोई ज़रुरत नहीं बीटा मुझे पता है मर्द लोग कभी कभी कैसे होते हैं हमेशा चीज़ें पीछे छोड़ जाते हैं.
उसने यह दोहरे मतलब के साथ कहा उसकी आँखें एक बार फिर उस पतलून पर लगे वीर्य के धब्बों की तरफ चली गयीं जो अब गजेंद्र पकडे हुए था.
हम तीनो के बीच का अजीब पल और लम्बा होता गया. मुझे नहीं पता था अपने हाथ कहाँ रखूं.
गजेंद्र मुझपर बार बार नज़र दाल रहा था जैसे वह अभी भी मुझे कुछ ज़रूरी बात बताना चाहता था लेकिन दादी के वहां खड़े होने की वजह से नहीं बोल प् रहा था.
दादी गजेंद्र को ऐसे देख रही थी जैसे वह याद कर रही थी की उसका लुंड उसकी बेटी के मुँह में कैसे अंदर बहार हो रहा था.
फिर दादी ने फिर से बात शुरू की उसकी आवाज़ मीठी लेकिन उसी मस्ती वाली ध्वनि के साथ.
अंदर आओ और दोनों चाय पि लो मैंने ताज़े आम भी लाये हैं तुम्हे सब कुछ होने के बाद प्यास लगी होगी.
वह पूरी तरह बेशरम औरत जैसी हरकतें कर रही थी. जिस तरह उसने प्यास शब्द कहा और जिस तरह उसने उसकी निस्केर की तरफ देखा उससे यह साफ़ था की वह सिर्फ चाय के बारे में नहीं सोच रही थी.
वह ऐसा इसलिए कर रही थी क्यूंकि उसने उसका बड़ा लुंड देखा था और उसने उसके अंदर कुछ पुराणी भूख को जगा दिया था वही भूख जो कई साल पहले सूरज नाम के आदमी ने उसमें पैदा की थी.
मैं लगभग सुन सकता था मेरी माँ अभी घर के अंदर क्या सोच रही होगी.
वह शायद खिड़की से हमें देख रही थी उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था इस दर से की उसकी अपनी माँ सब कुछ खोल कर रख देगी या बात को और भी ज़्यादा उलझा देगी.
माँ ने आज पहले hi बहुत बड़ा खतरा उठा लिया था अब उसकी दादी उसी आदमी के साथ खुले आम मस्ती कर रही थी.
लेकिन गजेंद्र ने नरमी से अपना सर हिलाया.
शुक्रिया आंटी लेकिन अब मुझे जाना hi होगा असल में मैं जाने वाला hi था जब यह सब हो गया मेरे ऑफिस में कुछ काम पड़ा है.
उसने यह शांत आवाज़ में कहा लेकिन मैं समझ सकता था की वह जल्दी से यहाँ से निकलना चाहता था.
एक और बात उसने धब्बे वाली पतलून को ऐसे फोल्ड किया था की सफ़ेद धब्बे किसी को दिखे नहीं लेकिन हम सब जानते थे की वह धब्बे वहां हैं.
इस पीछे के आँगन में कोई भी यह नहीं जानता था की असल में कौन कितना जानता है.
दादी अब माँ और गजेंद्र के रिश्ते के बारे में जानती थी उसने अपनी आँखों से सब देखा था. माँ जानती थी की उसकी दादी ने सब कुछ देखा है. मैं सबके बारे में बहुत ज़्यादा जानता था.
गजेंद्र नहीं जानता था की दादी ने असल में कितना कुछ देखा था और वह कितना मज़ा ले रही थी इस बात का.
और दादी नहीं जानती थी की मैं पूरा टाइम बहार से hi देख रहा था. राज़ अब एक के ऊपर एक इस तरह जमा हुए थे जैसे कोई खतरनाक खेल चल रहा हो.
घर के अंदर मैं बैठने वाले कमरे की खिड़की से मेरी माँ को देख सकता था. वह बहुत जल्दी जल्दी और घबराहट के साथ हर तरफ हिल रही थी.
मैं बिलकुल जानता था की वह क्या साफ़ कर रही थी वह जगहें जहां गजेंद्र का वीर्य पहले उसके मुँह और शरीर से ज़मीन पर गिर पड़ा था.
वह बहुत तेज़ तेज़ पोछ रही थी उसका सर नीचे था सबूत को जल्दी से मिटाने की कोशिश में थी पहले किसी और के देख लेने से पहले. इसलिए वह इतनी बेचैनी से साफ़ कर रही थी.
दादी आखिर में थोड़ा सा पीछे हटी लेकिन उससे पहले उसने गजेंद्र को एक आखरी लम्बी नज़र दे दी.
अगली बार मिलेंगे उसने धीरे से कहा अनजान मत रहना.
गजेंद्र ने सर हिलाया और अपनी पतलून अपनी सफ़ेद निस्केर के ऊपर पेहेनना शुरू कर दिया. वह अब बिलकुल जल्दी में था.
तभी मेरी माँ जल्दी से पीछे के आँगन में वापस आयी. वह सीधा दादी के पास पहुंची और उसका हाथ फिर से पकड़ लिया नरमी से लेकिन मज़बूती के साथ.
अम्मी अंदर चलो बहार बहुत गर्मी है आपको ऐसे सूरज में खड़े नहीं होना चाहिए.
माँ साफ़ तौर पर दादी को गजेंद्र से अलग करने की कोशिश में थी.
शायद वह कुछ छुपाना चाहती थी शायद इस बात से दर रही थी की उसकी माँ और भी ज़्यादा बातें खोल देगी या शायद वह दादी को यहाँ से दूर ले जाना चाहती थी पहले hi चीज़ें और बिगड़ जाएँ.
जब माँ दादी को घर की तरफ ले जाने लगी दोनों ने मुद कर गजेंद्र को हाथ हिलाया.
अपना ख्याल रखना बीटा दादी ने आवाज़ दी उसकी आवाज़ अभी भी मस्ती वाली थी.
माँ ने जल्दी कहा गाडी चलते वक़्त सावधानी से चलना गजेंद्र भाई.
लेकिन जैसे hi वह चल रही थी माँ ने दादी के कान के पास झुक कर एक धीमी लेकिन जल्दी वाली आवाज़ में कहा जो मैं अभी भी सुन प् रहा था.
अम्मी प्लीज दुसरे मर्दों के सामने ऐसी हरकतें मत करना ख़ास कर इसके सामने यह ठीक नहीं है तुम बात को और मुश्किल बना रही हो.
दादी सिर्फ मुस्कुरायी और माँ के हाथ पर हाथ रख दिया. उसने कोई वादा नहीं किया.
माँ ने अंदर जाने से पहले एक आखरी बार मेरी तरफ देखा.
ज़ैद अब अंदर आ जाओ उसने कहा उसकी आवाज़ थकी हुई लेकिन मज़बूत थी. गर्मी में बहार मत खड़े रहो.
मैं गजेंद्र के साथ एक सेकंड और खड़ा रहा.
वह अभी भी ऐसा लग रहा था जैसे वह मुझे कुछ ज़रूरी बात बताना चाहता था लेकिन वह मौका बीत चूका था. दादी ने बीच में आ कर रोक दिया था और अब माँ मुझे अंदर बुला रही थी.
गजेंद्र ने मुझे एक छोटा सा सर हिलाया उसका चेहरा कुछ समझ नहीं आ रहा था.
हम बाद में बात करेंगे उसने धीरे से कहा.
फिर वह मुद गया और अपनी गाडी की तरफ चल पड़ा अभी भी अपनी धब्बे वाली पतलून अपने हाथ में लिए हुए.
मैंने उसको जाते हुए देखा फिर धीरे से घर के अंदर चला गया मेरा दिमाग उन सब बातों से घूम रहा था जो अभी कुछ hi देर पहले पीछे के आँगन में हुई थी.
राज़ अब छुपे नहीं थे अब वह सिर्फ अलग अलग लोगों के पास थे.
उसी शाम को सूरज डूबने के बाद और पूरा घर एक अजीब सी ख़ामोशी में डूबने के बाद मेरी माँ ने लम्बा स्नान लिया. मैंने पानी को आधे घंटे तक बहते हुए सुना.
जब वह फाइनली बहार आयी तोह उसने अपनी आम रेशम की लाल निस्केर पेहेन ली थी जो उसकी कमर और जाँघों पर चिपक रही थी एक मैचिंग गहरी लाल रेशम की कमीज जो ऊपर से थोड़ी खुली हुई थी और उसकी आम गहरी गुलाबी हिजाब को ठीक से पिन किया हुआ था.
वह ताज़ा और साफ़ लग रही थी जैसे कोई आम माँ घर पर एक शांत शाम के लिए तैयार हो रही हो. उसकी साबुन और शैम्पू की मीठी खुशबू पूरे कॉरिडोर में फ़ैल रही थी.
उसने रसोई घर में कुछ देर स्नैक्स बनाने में बिताया छोटी थालियों में समोसा पकोड़े और काटे हुए फल.
वह शांत हरकतों से काम कर रही थी थोड़ी सी गन गुनती हुई जैसे पहले कुछ भी अजीब नहीं हुआ था.
उसके बाद उसने बिस्कुट की एक छोटी थाली और ठन्डे दूध का एक गिलास मेरे सोने के कमरे में ले आयी.
मैं अपने बिस्तर पर बैठा था अपने मोबाइल को बिना कुछ देखे स्क्रॉल कर रहा था अभी भी दोपहर की साड़ी बातें अपने दिमाग में घुमा रहा था.
जब उसने धीरे से नॉक किया और अंदर आयी उसने थाली और गिलास को मेरे पढ़ने वाली मेज़ पर एक नरमी भरी मुस्कराहट के साथ रख दिया.
कुछ खा लो बीटा उसने कहा उसकी आवाज़ नरमी से भरी हुई थी और माँ जैसी थी. आज तुमने ठीक से दोपहर का खाना नहीं किया यह बिस्कुट वही हैं जो तुम्हे पसंद हैं.
उस पल में उसने मुझे माँ जैसा hi महसूस करवाया. हालांकि वह कुछ hi घंटे पहले घुटनो के बल बैठ कर दुसरे आदमी के लुंड को चूस रही थी, हालांकि उसका चेहरा उसके वीर्य से भरा हुआ था, और हालांकि उसकी अपनी माँ ने उसको इस काम में पकड़ लिया था, फिर भी वह मेरे कमरे में आयी जैसे कोई ममता वाली माँ आती है.
एक और बात जो मुझे छू गयी वह यह थी की उसने मुझे किस तरह देखा — न शर्म से, न दर से, बल्कि उसी धीमी और सुरक्षित ममता से जैसा वह हमेशा करती थी.
जैसे वह अपने अंदर उस हिस्से को संभाले रखना चाहती थी जो अभी भी सिर्फ मेरी माँ थी, जबकि उसकी ज़िन्दगी का बाकी हिस्सा बिलकुल अलग हो चूका था. इसने पूरी स्थिति को और भी उलझा हुआ और परेशां करने वाला बना दिया.
मैंने धीरे से उसका शुक्रिया ऐडा किया. वह कुछ पल वहां कड़ी रही, फिर मेरे बिस्तर के किनारे पर बैठ गयी.
ज़ैद… उसने शुरू किया, उसकी आवाज़ संभाली हुई थी. क्या तुम पहले पीछे के आँगन में पूरा टाइम थे? जब… जब यह सब हुआ?
मैंने उसकी तरफ देखा और अपना सर हिलाया. नहीं अम्मी. मैं दूकान से वापस आ रहा था जब मुझे आवाज़ें सुनाई दी. मैं ज़्यादा देर नहीं रुका.
उसने कुछ सेकण्ड्स तक मेरे चेहरे को घूरा. मैं समझ सकता था की वह मुझपर पूरी तरह विश्वास नहीं कर रही, लेकिन उसने तुरंत कुछ नहीं कहा.
तुमने… कुछ देखा? उसने अगला सवाल किया. उसकी आवाज़ धीमी थी, लगभग हिचकिचाती हुई.
मैंने बिलकुल जानता था की उसका मतलब क्या था. वह पूछ रही थी की क्या मैंने उसको गजेंद्र के साथ देखा था, क्या मैंने उसको घुटनो के बल देखा था, क्या मैंने दादी को देखने वाली देखा था. लेकिन मैंने फिर से इंकार कर दिया.
नहीं अम्मी. मैंने कुछ नहीं देखा.
मैंने इसलिए झूठ बोलै क्यूंकि सच को आवाज़ देकर बोलना सब कुछ उस तरीके से असली बना देता जिसके लिए मैं तैयार नहीं था.
यह मानना की मैंने अपनी माँ को उस हालत में देखा था, की मैंने उसको दुसरे आदमी के लुंड को चूसते हुए देखा था और फिर उसकी अपनी माँ के पकडे जाने को देखा था, हम दोनों के बीच कुछ ऐसा तोड़ देता जिसे शायद ठीक नहीं किया जा सकता.
एक हिस्सा मेरा उसकी शर्म और बढ़ाना नहीं चाहता था. और एक और, अँधेरा हिस्सा मेरा नहीं चाहता था की वह जाने की मैं उससे उत्तेजित हो गया था. इसलिए मैंने झूठ बोलै, और वह अभी के लिए उस झूठ को मान गयी.
उसने छोटा सा सर हिलाया, फिर उठ कर कड़ी हो गयी. ठीक है. अपने बिस्कुट खाओ. मैं बैठने वाले कमरे में अम्मी के साथ हूँ.
वह मेरे कमरे से निकल गयी और वापस जाकर दादी ज़ैनब के साथ बैठ गयी.
दोनों सोफे पर बैठ कर टीवी पर कोई पुराण ड्रामा देख रही थी, आवाज़ धीमी राखी हुई थी.
मेरे बैडरूम के थोड़े से खुले दरवाज़े से मैं टीवी की आवाज़ें और उनकी कभी कभी धीमी बातें सुन सकता था.
मेरी माँ का दिमाग वहां बैठते हुए भी तेज़ चल रहा था. वह सोच रही थी की क्या दादी ने असल में सब कुछ साफ़ साफ़ देखा था — जिस तरह वह गजेंद्र के लुंड को चूस रही थी, उसके चेहरे पर वीर्य, और जिस तरह वह अपने hi घर में पूरी रंडी जैसी हरकतें कर रही थी.
माँ (बैठने वाले कमरे की छोटी मेज़ पर चाय के दो कप और बिस्कुट की थाली रख कर): लो अम्मी. मैंने आपके लिए चाय बनायीं है. और कुछ बिस्कुट भी.
वह अपनी माँ के सामने वाले सोफे पर बैठ जाती है, नार्मल दिखने की कोशिश करती हुई. उसका चेहरा अभी भी थोड़ा लाल है और वह अपनी ओढ़नी को बार बार ठीक कर रही है.
दादी ज़ैनब (चाय का कप उठा कर): शुक्रिया बीटा. चाय की खुशबू अच्छी आ रही है.
वह थोड़ा सा चूसक्ति है और बैठने वाले कमरे को शांत नज़र से देखती है.
माँ: आपको यहाँ कैसा लग रहा है अम्मी? घर… क्या यह आपके लिए ठीक है?
दादी ज़ैनब: अच्छा है. शांत. तुम्हारे ससुर का घर भी ठीक है, लेकिन यह ज़्यादा खुला खुला लगता है. मुझे पीछे का आँगन भी पसंद आया.
माँ (थोड़ी सी मुस्कराहट के साथ): मुझे ख़ुशी हुई की आपको पसंद आया. मैं सोच रही थी की कल अगर आप चाहें तोह बहार ले जाऊं.
दादी ज़ैनब: देखेंगे. हर चीज़ का प्लान करने की ज़रुरत नहीं. मुझे ऐसे hi बैठना भी अच्छा लग रहा है.
वह फिर से चाय चूसक्ति है और बिस्कुट का छोटा टुकड़ा खाती है. थोड़ी देर के लिए एक आराम भरा सन्नाटा छ जाता है.
माँ: अम्मी… सूरज कैसा है? आपने उनको पिछले हफ्ते मिला था न? उन्होंने मुझे मैसेज किया था की वह आपको मिलने आये थे.
दादी ज़ैनब: सूरज ठीक है. उसने तुम्हारे बारे में बहुत पुछा. उसने कहा की तुम आजकल उनको ज़्यादा कॉल नहीं करती.
माँ (थोड़ी सी शर्मिंदगी के साथ): मुझे पता है… मैं बिजी थी. मैं आज रात उनको कॉल कर लुंगी.
दादी ज़ैनब: तुम्हे करना चाहिए. अच्छे दोस्त ज़रूरी होते हैं. वह पूछ रहा था की घर पर सब ठीक तोह है न.
माँ: सब ठीक है अम्मी. बस नार्मल बातें हैं.
माँ अपनी चाय चूसक्ति है. दादी कुछ सेकण्ड्स तक उसको चुपचाप देखती रहती है.
दादी ज़ैनब: तुमने कहा था की तुम्हे इतनी जल्दी आने की उम्मीद नहीं थी.
माँ: हाँ… मैंने सोचा था की आप अगले हफ्ते hi आएँगी. इसलिए जब मैंने दरवाज़े पर आपको देखा तोह थोड़ी हैरान हो गयी थी.
दादी ज़ैनब: मुझे टिकट जल्दी मिल गए इसलिए मैंने सोचा आज hi क्यों न आ जाएँ. तुम्हारे बाप ने भी कहा की अभी जाओ.
दादी अपना कप नीचे रखती है और अपनी बेटी को ज़्यादा ध्यान से देखती है.
दादी ज़ैनब: शाहिदा… जब मैं आयी थी, मैंने तुम्हारे चेहरे पर कुछ देखा था.
माँ (जल्दी से अपना गाल छूटे हुए): मेरे चेहरे पर? क्या?
दादी ज़ैनब: कुछ सफ़ेद सी चीज़. होंठों के पास और थोड़ी सी गाल पर भी. वह चमक रही थी.
माँ (सोचने का नाटक करती हुई): सफ़ेद चीज़? शायद वह सुबह लगाया हुआ फेस क्रीम था. कभी कभी मैं उसको साफ़ करना भूल जाती हूँ.
दादी ज़ैनब: फेस क्रीम? वह क्रीम जैसा नहीं लग रहा था. वह मोटा था.
माँ: शायद चाय बनाते वक़्त दूध गिर गया हो. मैं जल्दी में थी.
दादी ज़ैनब: दूध चेहरे पर ऐसे नहीं रुकता बीटा. और वह सिर्फ मुँह के पास नहीं था. थोड़ा सा तुम्हारी हिजाब पर भी था.
माँ (जल्दी से अपनी हिजाब को साफ़ करती हुई हालांकि अब कुछ नहीं था): शायद मैंने गलती से हाथ लगा दिया हो. दोपहर में मैं थोड़ा दही भी खा रही थी.
दादी ज़ैनब: दही? तुम हिजाब पेहेन कर दही खा रही थी?
माँ: हाँ… कभी कभी मैं ऐसे hi खा लेती हूँ. मैं जल्दी में थी.
माँ के हाथ थोड़े से काँप रहे हैं जब वह अपना कप पकडे हुए है. दादी यह देखती है लेकिन अभी कुछ नहीं कहती.
दादी ज़ैनब: शाहिदा… अगर तुम्हे कुछ बताना है तोह बता सकती हो. मैं तुम्हारी माँ हूँ. मैं तुम्हारा फैसला नहीं करुँगी.
माँ (अपने कप की तरफ देखते हुए): बताने वाली कोई बात नहीं है अम्मी. सब नार्मल है.
दादी ज़ैनब: नार्मल? फिर तुम टॉवल में क्यों थी जब तुम्हारा पति वापस आया? और गजेंद्र यहाँ पसीना पसीना क्यों बैठा था?
माँ (जल्दी से): मैंने तोह बताया था… मैं स्नान कर रही थी. और गजेंद्र हुसैन से मिलने आया था. हम बस बात कर रहे थे.
दादी ज़ैनब: बात कर रहे थे? सोने के कमरे में?
माँ: नहीं… हम बैठने वाले कमरे में hi थे. शायद आपने गलत देखा.
दादी ज़ैनब (थोड़ा झुक कर): बीटा… मैंने साफ़ साफ़ देखा. तुम घुटनो के बल बैठी थी. और तुम्हारे चेहरे पर सफ़ेद चीज़ लगी हुई थी. मैं अंधी नहीं हूँ.
माँ (आवाज़ थोड़ी कांपती हुई): अम्मी… प्लीज. आप गलत समझ रही हैं. मैं बस कुछ साफ़ कर रही थी.
दादी ज़ैनब: साफ़ कर रही थी? अपने मुँह से?
दादी की आवाज़ शांत है लेकिन उसमें एक अजीब सी, लगभग मस्ती वाली ध्वनि आ गयी है.
दादी ज़ैनब: शाहिदा… वह सफ़ेद चीज़… बिलकुल एक मर्द के… जैसी लग रही थी.
माँ (उसको बीच में रोकती हुई, चेहरा लाल होता हुआ): अम्मी! ऐसी बातें मत कीजिये प्लीज. ऐसा कुछ नहीं था.
दादी ज़ैनब: फिर बताओ वह क्या था. मैं सुन रही हूँ.
माँ (हिचकते हुए): वह… वह कुछ लोशन था. मैं आपके आने से पहले अपने चेहरे पर लोशन लगा रही थी.
दादी ज़ैनब: चेहरे पर लोशन लगते वक़्त ज़मीन पर घुटनो के बल? मूह खोले हुए?
माँ (सर हिलाते हुए): मैं घुटनो के बल नहीं थी. आपने गलत देखा. मैं बस कुछ उठाने के लिए झुक रही थी.
दादी ज़ैनब: शाहिदा… मैं वहां कुछ देर कड़ी रही. मैंने सब कुछ देखा. जिस तरह तुम अपना सर हिला रही थी… आवाज़ें भी आ रही थी.
माँ (आवाज़ phat-ti हुई): अम्मी… रुक जाओ. प्लीज. आप कुछ सोच रही हैं.
दादी ज़ैनब: मैं कुछ नहीं सोच रही. मुझे पता है मैंने क्या देखा. तुम उसके लुंड को भूखी औरत की तरह चूस रही थी.
माँ (अपना चाय का कप गिरने वाली हालत में, हाथ साफ़ साफ़ काँप रहे हैं): नहीं! मैं ऐसा नहीं कर रही थी! आप गलत समझ रही हैं अम्मी. मैं अपनी ज़िन्दगी की कसम खाती हूँ.
दादी ज़ैनब: फिर तुम्हारी आवाज़ इतनी काँप क्यों रही है? तुम मुझसे आँख क्यों नहीं मिला प् रही हो?
माँ: क्यूंकि आप अपनी बेटी के बारे में इतनी शर्मनाक बातें बोल रही हैं! मैं कैसे नार्मल रह सकती हूँ?
दादी ज़ैनब (धीरे लेकिन मज़बूती से): क्यूंकि मैंने अपनी आँखों से देखा है बीटा. तुम इंकार करती रहो, लेकिन मुझे पता है मैंने क्या देखा. तुम अपने पति के घर में गजेंद्र के लुंड को चूस रही थी.
माँ अपना चेहरा दोनों हाथों से छुपाती है, उसका शरीर काँप रहा है. दादी चुपचाप उसको देखती रहती है, इंतज़ार करती हुई.
दादी ज़ैनब (अपनी बेटी को चेहरा छुपाते और कांपते हुए देखते हुए): शाहिदा… अपना चेहरा छुपाना बंद करो. मुझे देखो.
माँ धीरे धीरे अपने हाथ नीचे करती है. उसकी आँखें लाल और गीली हैं. दादी सोफे पर पीछे लेट जाती है, उसका चेहरा गहरे से कुछ नरम होता हुआ… और थोड़ा सा मस्ती भरा.
दादी ज़ैनब: मैं तुमसे सच कहूँगी बीटा. जब मैंने तुम्हे घुटनो के बल… उसके लुंड को खिड़की से चूसते हुए देखा… मैं तुरंत नहीं गयी.
माँ (आवाज़ छोटी): अम्मी…
दादी ज़ैनब: मैं वहां कड़ी रही और देखती रही. कुछ देर के लिए. मैं नज़र नहीं हटा पायी.
माँ (हैरान): आपने… देखा?
दादी ज़ैनब: हाँ. मैंने देखा की तुम उसको कितना अंदर ले रही थी. जिस तरह तुम उसके लुंड के आसपास सिसकी ले रही थी. तुम बिलकुल मज़्ज़े में लग रही थी.
माँ (चेहरा फिर से लाल): अम्मी… ऐसी बात मत कीजिये प्लीज.
दादी ज़ैनब (छोटी सी मस्ती भरी मुस्कराहट के साथ): क्यों नहीं? मैं बस वही बता रही हूँ जो मैंने देखा. तुम उसको ऐसे चूस रही थी जैसे तुम्हे बहुत दिनों से ठीक से न छोड़वाया गया हो.
माँ (नीचे देखते हुए, आवाज़ कांपती हुई): मैं… मैं नहीं जानती क्या कहूँ.
दादी ज़ैनब: तुम्हे कुछ कहने की ज़रुरत नहीं. मैंने पहले hi सब कुछ देख लिया. जिस तरह तुम अपना सर हिला रही थी… जिस तरह तुम अपनी जीभ से काम ले रही थी… यह साफ़ था की तुम्हे यह पसंद आ रहा था.
थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छ जाता है. माँ अपनी ओढ़नी से खेलती रहती है, अपनी माँ की आँखों से नज़र नहीं मिला पाती.
दादी ज़ैनब: यह नार्मल है शाहिदा.
माँ (जल्दी से ऊपर देखते हुए): नार्मल? यह कैसे नार्मल हो सकता है?
दादी ज़ैनब: बहुत सी शादी शुदा औरतें ऐसा करती हैं. उनकी ज़रूरतें होती हैं. उनके पति हमेशा उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाते. इसलिए वह कोई और ढूंढ लेती हैं. और गजेंद्र का लुंड बड़ा है जो तुम्हे अच्छे से संतुष्ट करता है.
माँ: लेकिन मैं आपकी बेटी हूँ… और आपने मुझे ऐसी शर्मनाक चीज़ करते हुए देखा.
दादी ज़ैनब: मैंने अपनी बेटी को पहली बार एक असली औरत की तरह बेहवे करते हुए देखा. न की उस अच्छी, शांत बीवी की तरह जैसा तुम सबके सामने दिखती हो.
माँ (बचावत के अंदाज़ में): मैं नाटक नहीं कर रही.
दादी ज़ैनब (आगे झुक कर, आवाज़ धीमी): हाँ तुम कर रही हो. मेरे सामने, अपने पति के सामने, समाज के सामने… तुम एक अच्छी, ..,. _ बीवी का नाटक करती हो. लेकिन आज मैंने असली तुम्हे देखा. तुम एक रंडी हो शाहिदा. एक लुंड की भूखी रंडी.
माँ (धीमी सी सिसकारी के साथ): अम्मी!
दादी ज़ैनब (थोड़ी सी मुस्कराहट के साथ): क्या? मैं बस वही कह रही हूँ जो मैंने देखा. तुम दुसरे आदमी के लुंड को ऐसे चूस रही थी जैसे उसके लिए भूखी हो. यह कोई शांत बीवी का व्यवहार नहीं है.
माँ (आवाज़ कांपती हुई): मैं… मैं अपने आप को रोक नहीं पायी. गजेंद्र… वह मुझे ऐसे महसूस करवाता है जो हुसैन कभी नहीं कर पाटा.
दादी ज़ैनब: बताओ मुझे.
माँ: वह… वह मुझे बहुत अच्छे से छोड़ता है. मेरी हर जगह. मेरे मुँह में… मेरी छूट में… मेरी गांड में भी. वह मुझे ऐसे फैलता है जैसा मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया.
दादी ज़ैनब: और तुम्हे यह पसंद है?
माँ (धीरे धीरे सर हिलाते हुए, आँखें नीचे): मुझे बहुत पसंद है. मैं उसके लुंड के बारे में सोचती रहती हूँ. जब मैं ,,., पढ़ रही होती हूँ… तब भी मैं उसके बारे में सोचती हूँ.
दादी ज़ैनब: तोह तुम असल में एक रंडी हो.
माँ (आंसू गिरते हुए): हाँ… मैं हूँ. मैं उसके लिए एक रंडी बन गयी हूँ. मुझे पता है यह गलत है. मुझे पता है यह हराम है. लेकिन मैं रुक नहीं पाती.
दादी ज़ैनब: और फिर भी तुम अपने पति और बेटे के सामने एक अच्छी बीवी बनने का नाटक करती हो?
माँ: मुझे करना पड़ता है. और क्या कर सकती हूँ?
दादी ज़ैनब: अब तुम्हे शर्म आ रही है क्यूंकि मैंने तुम्हे पकड़ लिया. लेकिन अंदर से तुम यह सब करना चाहती हो.
माँ: हाँ… लेकिन मुझे बहुत शर्म आती है.
दादी ज़ैनब: शर्म इसलिए है क्यूंकि तुम अभी भी दो अलग अलग इंसान बनने की कोशिश कर रही हो. एक अच्छी बीवी और एक रंडी.
दादी ज़ैनब: शाहिदा… मैंने भी तुम्हारे बाप के साथ धोखा किया था.
माँ (ऊपर देखते हुए, हैरान): क्या?
दादी ज़ैनब: पिछले तीन महीने से. सूरज के साथ. वह कॅशे की दूकान चलता है हमारे घर के पास.
माँ (दांग रह जाती हुई): सूरज…?
दादी ज़ैनब: हाँ. हम रेगुलरली मिलते हैं. कभी उसकी दूकान बंद होने के बाद, कभी उसके दोस्त के खली फ्लैट में.
माँ (अभी भी समझ नहीं पाती हुई): आप… और सूरज?
दादी ज़ैनब: हाँ. वह मुझसे काफी छोटा है. लेकिन वह एक औरत को कैसे संतुष्ट करना है यह जानता है.
माँ (आवाज़ धीमी): अम्मी… मुझे पहले से पता था.
दादी ज़ैनब (हैरान): तुम्हे पता था?
माँ: मैंने एक बार देखा था. जब मैं पिछले महीने आयी थी. मैंने तुम्हे और सूरज को उसकी दूकान के पीछे चूमते हुए देखा. मैं चिल्लाने वाली थी लेकिन… मैं चुप रही.
दादी ज़ैनब: तुमने हमें देखा?
माँ: हाँ. मैंने कुछ नहीं कहा क्यूंकि… मुझे नहीं पता था मैं कैसे रियेक्ट करून.
दादी ज़ैनब: और तुमने तुम्हारे बाप को नहीं बताया?
माँ: नहीं. मैं नहीं बता पायी.
दादी ज़ैनब: अच्छा किया. क्यूंकि जो मैं सूरज के साथ रखती हूँ वह सिर्फ मेरे लिए है. बिलकुल जैसे जो तुम गजेंद्र के साथ रखती हो वह सिर्फ तुम्हारे लिए होना चाहिए.
माँ (हैरान): आप… आप चाहती हैं की मैं गजेंद्र के साथ जारी रखूँ?
दादी ज़ैनब: हाँ. छुप कर. सावधानी से. लेकिन हाँ. मत रोकना.
माँ: लेकिन… ज़ैद और हुसैन…
दादी ज़ैनब: उनको पता नहीं चलना चाहिए. कभी भी. जो उनको पता नहीं चलता उनको दुःख नहीं होता. तुम बहार से एक अच्छी बीवी और माँ बन सकती हो, और अंदर से गजेंद्र से जो तुम्हे चाहिए वह ले सकती हो.
माँ: अम्मी… मुझे यकीन नहीं हो रहा की आप यह कह रही हैं.
दादी ज़ैनब: क्यों नहीं? मैं खुद यही कर रही हूँ. शादी शुदा औरतों को उनके पति जो दे सकते हैं उससे ज़्यादा चाहिए होता है. ख़ास कर जब पति कमज़ोर या बीमार हो जैसे हुसैन.
माँ: लेकिन यह गलत है…
दादी ज़ैनब: यह सिर्फ तब गलत है जब पकड़ी जाओ. अगर तुम समझदार रहोगी तोह कोई कभी नहीं जान पायेगा. तुम गजेंद्र से मिलती रह सकती हो. उससे जब चाहे अपने लुंड से तुम्हे छोड़ने दो. अगर तुम्हे बच्चे होने का दर हो तोह सुरक्षा का उपाय कर लेना. लेकिन मत रोकना.
माँ: आप सच में चाहती हैं की मैं जारी रखूँ?
दादी ज़ैनब: मुझे पता है तुम्हे जारी रखना चाहिए. क्यूंकि मैंने देखा था की तुम्हे कितना मज़ा आ रहा था. तुम जैसे औरत को एक आदमी चाहिए जो उसको ठीक से छोड़ सके. गजेंद्र वह आदमी है. तुम उसकी रंडी हो.
माँ: और आप… आप सूरज से भी मिलती रहेंगी?
दादी ज़ैनब: हाँ बिलकुल. वह कभी कभी घर आता है जब तुम्हारा बाप नहीं होता. हम मेरे सोने के कमरे में करते हैं.
माँ (धीरे से): तोह हम दोनों एक hi चीज़ कर रहे हैं.
दादी ज़ैनब: हाँ. हम दोनों रंडी हैं बीटा. फरक सिर्फ इतना है की मैंने इसे मान लिया है. तुम अभी भी इससे लड़ रही हो.
माँ सन्नाटे में बैठी रहती है, अपनी माँ को घूरती हुई. दादी आगे बढ़ कर उसका हाथ नरमी से पकड़ लेती है.
दादी ज़ैनब: अब इससे मत लड़ो शाहिदा. इसका मज़ा लो. गजेंद्र को जितना चाहे तुम्हे छोड़ने दो. बस सावधान रहना. और कभी अपने पति या बेटे को पता मत लगने देना.
मेरे कमरे से यह बात सुन कर मैं बिलकुल हैरान रह गया. मेरी अपनी दादी मेरी माँ को उसके गजेंद्र के साथ चक्कर को जारी रखने के लिए उकसा रही थी — और सिर्फ जारी रखने के लिए नहीं, बल्कि उसमें और भी बेशरम होने के लिए.
उस पल मुझे यह समझ आ गया की दादी ज़ैनब मेरी माँ से भी ज़्यादा बड़ी रंडी बन चुकी थी.
उनके पास सूरज के साथ अपना रिश्ता छुपाने के सालों का अनुभव था. उन्होंने उसके लिए सूअर का मांस भी खाया था.
वह कई महीनो से मेरे दादा जी के साथ धोखा कर रही थी और अब तक पकड़ी नहीं गयी थी.
मेरी माँ ने शायद यह सब व्यवहार अपनी माँ को छोटी उम्र में देख कर hi सीखा था.
एक और बात जो इस बात को और साफ़ कर देती थी: दादी उस विश्वास के साथ बात कर रही थी जैसे वह पहले से hi बहुत गन्दी गन्दी चीज़ें कर चुकी हो और उनका मज़ा ले चुकी हो.
दादी ने फिर एक ऐसी बात कही जिस से मेरी माँ की आँखें खुल गयी.
उसे अभी बुलाओ शाहिदा. अभी उसको आने को बोलो. तुमने पहले सिर्फ उसका लुंड चूसा था. यह काफी नहीं है. तुम्हे उससे पूरी तरह से छुड़वाना चाहिए. इतना बड़ा लुंड तुम्हारे अंदर जाने के लायक है, सिर्फ तुम्हारे मुँह में नहीं.
माँ हैरान रह गयी. उसका दिमाग बिलकुल उलझा हुआ था.
एक हिस्सा उसका गहरी शर्म महसूस कर रहा था की उसकी अपनी माँ ने उसको उस हालत में देखा था और अब उसको और ज़्यादा करने के लिए दबाव दाल रही थी.
दूसरा हिस्सा उसमें एक खतरनाक उत्तेजना की चिंगारी महसूस कर रहा था की गजेंद्र को वापस बुला कर उससे पूरी तरह से छुड़वाने का ख्याल.
लेकिन ज़्यादातर वह परेशां महसूस कर रही थी. इतने साल से छुपे हुए सारे राज़ अचानक खुल कर सामने आ गए थे — दादी को पता चल गया था, शायद मुझे भी पता था, और बाप के साथ खतरा अभी भी हवा में लटक रहा था.
वह नहीं समझ प् रही थी की इन सबको कैसे संभाले.
दादी ने आगे कहा, मैं आज रात सूरज के घर वापस जा रही हूँ. मुझे भी छुड़वाना है. आज तुम्हे देख कर मुझे याद आ गया की मुझे अंदर एक असली मर्द की कितनी ज़रुरत है. सूरज हमेशा जानता है की मुझे कैसे संभालना है.
माँ ने कोई झगड़ा नहीं किया. उसने सिर्फ धीरे धीरे सर हिलाया, उसकी आवाज़ धीमी थी. ठीक है अम्मी… जो आपको करना है करो.
दादी ने संतुष्ट हो कर सर हिलाया और उठ कर कड़ी हो गयी. अच्छा. अब गजेंद्र को कॉल करो. टाइम मत बर्बाद करो.
कुछ देर बाद, जब दादी सूरज के घर जाने के लिए निकल चुकी थी, मेरी माँ ने कॉल किया.
गजेंद्र आधे घंटे के अंदर hi हमारे घर आ गया.
वह पीछे के दरवाज़े से चुपके से अंदर आया, अभी भी वही सफ़ेद कमीज और सफ़ेद निस्केर पहने हुए था जो उसने पहले पहनी थी, हालांकि उसने अपनी पतलून बदल ली थी.
माँ उससे बैठने वाले कमरे में मिली. वह घबराई हुई लग रही थी लेकिन मज़बूत भी.
तुम वापस आ गए, उसने धीरे से कहा.
मैं तुम्हारा मैसेज का इंतज़ार कर रहा था, गजेंद्र ने जवाब दिया.
उसने घर के आसपास देखा, फिर धीमी आवाज़ में पुछा, तुम्हारी माँ… उसको पता है न? जिस तरह वह पहले मुझे देख रही थी… मुझे लगता है उसने सब कुछ देख लिया था.
माँ इस बारे में बात नहीं करना चाहती थी. उस दिन जो सारे राज़ खुल कर सामने आ गए थे — दादी के पकड़ने, शायद मेरे देखने, बाप के साथ खतरे, और अब दादी के खुले आम उकसाने — ने उसको बिलकुल परेशां कर दिया था.
वह इनमें से किसी बात पर बात नहीं करना चाहती थी. वह सिर्फ सोचना बंद करना चाहती थी.
जवाब देने की बजाये वह अचानक आगे बढ़ी और उसपर चढ़ गयी.
उसके हाथ उसके गले के आसपास लपेट गए, और उसने उसको ज़ोर से, बेचैनी के साथ चुम लिया.
गजेंद्र सिर्फ एक सेकंड के लिए हैरान हुआ फिर उसने तुरंत समझ लिया की उसको क्या चाहिए. उसने भी उसको वापस चूमा, उसके हाथ उसकी कमर को उसकी रेशम की लाल निस्केर के ऊपर से पकड़ लेते हुए.
वह जानता था की उसको क्या चाहिए बिना उसके कुछ बोले. उसने उसको थोड़ा सा ऊपर उठाया और उसको पीछे की तरफ रसोई घर के काउंटर की तरफ ले गया. जैसे hi उसकी पीठ काउंटर के किनारे से लगी, उसने उसके कपडे उतारने शुरू कर दिए.
उसने उसकी रेशम की लाल कमीज के बटन धीरे धीरे खोले, उसके स्तन दिखते हुए.
उसने उसकी रेशम की लाल निस्केर का ज़िप नीचे किया और उन्हें ज़मीन पर गिरने दिया. उसकी गहरी गुलाबी हिजाब वहां लगी रही — यह हमेशा इन पलों में उसके सर पर hi रहती थी.
लेकिन उससे आगे बढ़ने से पहले, गजेंद्र थोड़ा पीछे हटा और उसकी तरफ देखा.
अभी नहीं, उसने कहा, उसकी आवाज़ कड़क थी. पहले मैं तुम्हारा मुँह चाहता हूँ. घुटनो के बल बैठो.
माँ ने कोई झगड़ा नहीं किया. वह तुरंत वहां रसोई घर की ज़मीन पर घुटनो के बल बैठ गयी. मेरी माँ को यह भी परवाह नहीं थी की मैं घर में hi था. क्या वह यह जान्ने के लिए तैयार थी की वह अपने पति के साथ धोखा कर रही है?
उसने उसकी निस्केर की तरफ हाथ बढ़ाया, उसके साथ उसकी अंडरवियर को नीचे खींच लिया, और उसके अभी से खड़े लुंड को अपने हाथों में ले लिया.
उसने एक बार उसकी तरफ ऊपर देखा, फिर अपना मुँह खोला और उसको अंदर ले लिया.
उसने उसको उसी पूरी तरह से चूसा जैसे उसने पहले दिखाया था — गहरे, मुलायम धक्के, उसकी जीभ नीचे वाले हिस्से पर काम करती हुई, एक हाथ नीचे की तरफ हिलता हुआ जबकि दूसरा हाथ उसके अंडो को नरमी से पकडे हुए था.
गीली आवाज़ें शांत रसोई घर में गूँज रही थी. वह हर बार अपना सर हिलाते हुए उसको और गहरा ले रही थी, उसकी हिजाब थोड़ी सी हिल रही थी इस हरकत के साथ.
गजेंद्र सिसकी भरा और अपना एक हाथ उसके सर पर रख दिया, धीरे से उसकी हरकत को संभालते हुए.
जैसे hi वह एक अच्छी तरह से चलती हुई लाया में आ रही थी, उसको पूरी ध्यान से चूसती हुई, घर का आगे वाला दरवाज़ा अचानक खुल गया.
मेरे बाप की आवाज़ अंदर से आयी.
शाहिदा? मैं आ गया हूँ.…
दरवाज़े के बंद होने की आवाज़ पूरे घर में गूँज गयी.
अगला हिस्सा में देखते हैं की आगे क्या हुआ.