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CHAPTER 25
अब से मैं अपनी माँ को गजेंद्र की रंडी मानता हूँ, पापा की बीवी नहीं. वह इम्पुरिटी
से पूरी तरह धूस गयी है.
सुबह हो गयी. रास्ते से गुजरने वाले लोग हमारे घर को देखते तो सोचते— यहाँ नेक लोग रहते हैं, रोज़ाना तिलावत,
हलाल खाना साथ बाँट कर, घर वाले kitab-e-muqaddas की तालीम से बंधे हुए.
लेकिन अंदर, ओह अंदर तो यह गन्दगी का ब्रॉथेल बन चूका था, छुपे गुनाहों का अड्डा जो हर कोने को मैला कर चूका
था. हवा भारी थी रात के दबौचेरी के निशानों से: शादी के कमरे के बिस्तर पर पसीने से भीगी चादरों की
मुस्की बू जहाँ अम्मी ने गजेंद्र के सामने अपने आप को समर्पित कर दिया था, शरीर के फ्लुइड्स की तेज़, तीखी बू और
गजेंद्र के अम्मी की गांड में जाने से निकली मिटटी जैसी टट्टी की गन्दी बू— अम्मी की टट्टी, जल्दी साफ़ न होने की वजह
से स्मीयर हुई हुई.
मैं उस सुबह थका हुआ उठा, जिस्म भारी रात के बेचैन ख्वाबों से जो मैंने देखे थे. पतली चादर के नीचे हिलते
हुए महसूस हुआ मेरे लुंड के ird-gird सूखी मणि की कृसत्य लेयर, छिपके हुए देखने के वक़्त अपनी शर्मनाक निकलने
की चिपचिपी याद.
मुँह बनाते हुए उठा, आँखें रगड़ कर धुप से बचाया. जल्दी से ब्लैक शार्ट और सादा t-shirt पहना, कपडा जिस्म पर
ठंडा लगा, उम्मीद थी नया कपडा गुनाह को धोने देगा, लेकिन वह बू की तरह चिपका रहा. नंगे पाऊँ हॉलवे में
चलते हुए पहले नज़र पड़ी अब्बू पर जो सोफे पर अभी सो रहे थे, सीना ऊपर नीचे हो रहा था गहरी, ghair-tabee
साँसों में.
रात को अम्मी ने जो दवाई चाय में डाली थी वह उस पर भारी थी, उसे मजबूर be-hoshi में रखे हुए ताकि वह
गजेंद्र के साथ अपना अफेयर बिना रुकावट के कर सके. अब्बू का चेहरा सुकून भरा था, बच्चे जैसा, be-khabar की
उनकी बीवी ने यह सब प्लान किया था उनके शादी के बिस्तर पर धोका देने के लिए.
क्यूरियस और बेचैन होकर मैं शादी के कमरे के दरवाज़े की तरफ धीरे से गया, जो थोड़ा खुला था. अंदर झाँक कर
देखा गजेंद्र अभी गहरी नींद में बिस्तर पर पड़ा था, चौड़ी सीना नंगा, एक बाज़ू फैला हुआ जैसे यह जगह उसकी हो
जो असल में अब्बू की थी. कमरा बिखर गया था: तकिये इधर उधर, हवा में उनके मिलान की गर्मी.
लेकिन अम्मी कहाँ थी? दिल तेज़ धड़का. वह बिस्तर पर नहीं, अटैच्ड बाथरूम में भी नज़र नहीं आयी. पीछे हटा कर
मैंने घर में उसकी तलाश शुरू की, धीमे क़दमों से.
पूरा घर पसीने और रात की उस ख़ास, चिपकी हुई टट्टी की बू से भरा था— अम्मी की टट्टी, जब गजेंद्र ने उसकी गांड
मारी थी, जल्दी में पूरी साफ़ न होने की वजह से. यह बू कॉरिडोर में फैली हुई थी, याद दिलाती कितना नीचे गिर
चुके थे हम.
जब मैं घर के पीछे छोटे एक्सरसाइज एरिया में घुमा— योग मत और कुछ डम्ब्बेल्स वाला छोटा सा— वहां उसको
देखा. अम्मी वाइट शार्ट में थी जो टांगों से चिपकी हुई, मैचिंग वाइट टॉप जो कर्व्स पर कासी हुई, और हैरान करने
वाला— वाइट वैल सर पर लपेटा हुआ, जैसे दीनदारी और प्रोवोकेशन को मिला रही हो.
वह अपनी रूटीन में थी, स्ट्रेचिंग और हलके स्क्वाट्स, जिस्म की फ्लुइडिटी से गांड हर हरकत में थोड़ा हिल रही थी. माथा
पर पसीना, सांस स्टेडी, फॉर्म पर फोकस. उस तरह देख कर एक पल ख़ुशी हुई— वह ज़िंदा लग रही थी, खुद का ख्याल
रख रही— लेकिन फिर खतरा याद आया.
गजेंद्र अभी घर में था, अब्बू लिविंग रूम में द्रुग्गेड; वह कैसे फ़िक्र नहीं करती? वह हमारे घर को बर्बाद
करने को तैयार लग रही थी, इतने रेवेलिंग कपड़ों में जिस्म दिखा कर जब खतरा पास था. यह be-dari मुझे गरम कर
गयी, शॉर्ट्स में अनवांटेड हलचल जब मैं उसकी be-dari की तारीफ कर रहा था. वह डर्टी क्यों नहीं? अब्बू के अचानक
जागने से, पड़ोसियों के खिड़की से देखने से?
मैं धीरे पास गया, गाला साफ़ कर के आवाज़ दी. “अस्सलामु अलैकुम, अम्मी. इतनी सुबह एक्सरसाइज कर रही हो. अच्छा लग
रहा है.”
वह सीढ़ी हुई, हाथ की पीठ से माथा पोंछा, चेहरे पर मुस्कराहट. “व अलैकुम अस्सलाम, बीटा. हाँ, सोचा दिन
शुरू होने से पहले जल्दी सेशन कर लून. एनर्जी देती है. तू ने नींद कैसी ली?”
“ठीक थी, शायद. थोड़ी बेचैन. अब्बू अभी सोफे पर सो रहे हैं. वह ठीक हैं? फज्र के लिए तो उठ जाते हैं.”
अम्मी का चेहरा नहीं बदला, लेकिन आँखें एक पल झुकी. “ओह, वह ठीक हैं. शायद कल से थक गए. हॉस्पिटल से
रिकवरी में वक़्त लगता है न? रात भर पथ्थर की तरह सोये रहे. थोड़ा और आराम करने दो.”
फिर हम और बातें करने लगे, हलके टॉपिक्स पर. “तो नाश्ता क्या है?” मैंने दीवार के सहारे पुछा.
वह धीमे से हनासी, पाऊँ छूने झुकी. “सोचा अंडा और पराठा. या फिर हल्का कुछ, आज गर्मी है. तू क्या
चाहता
है?”
“अंडे अच्छे लगेंगे. वैसे, जाबिर से बात हुई लटल्य? सोचा कॉल कर लून.”
“नहीं रिसेंटली, लेकिन कर लेना. दोस्ती ज़रूरी है. और पढाई कैसी चल रही? तू इस बारे में चुप रहता है.”
बाद में वर्कआउट ख़तम कर अम्मी बाथरूम में नहाने गयी. बहार निकली तो leopard-print जुंपसुइट पहना था
जो हर
चउरवे पर कैसा हुआ, बोल्ड पैटर्न हिप्स और बस्ट को हाईलाइट कर रहा था, बिलकुल मॉडेस्ट नहीं.
कपडा स्लीक, चमकदार, हलके ज्वेलरी के साथ, मॉडर्न और कॉंफिडेंट लग रही थी. उसने पहले गजेंद्र के लिए
नाश्ता
बनाया, ट्रे में चाय, टोस्ट और फल ले कर बैडरूम में गयी जहाँ वह जाग रहा था. अब्बू की तरफ देखा भी
नहीं
उठाने या खाना देने के लिए; गजेंद्र उसका फोकस था, प्रायोरिटी साफ़ बदल गयी.
इसका मतलब वह पूरी तरह उसकी लवर बन चुकी थी, शौहर को बिना पछतावे के साइड कर दिया, घर के अंदर
आने वाले
को घर का सर पर रख दिया. यह हमारे फॅमिली के डायनामिक्स का पूरा उल्टा था— अब्बू प्रोवाइडर थे, अब बाद में,
जबकि
बहार वाला पहला.
फिर भी अब वह बहुत केयरफुल थी, इधर उधर देखती प्राइवेसी के लिए, हरकतें प्लान किया हुआ फसाड बनाये
रखने के
लिए.
उनकी बात धीमे से आयी जब वह ट्रे रखती थी. “गुड मॉर्निंग, गजेंद्र. तेरे लिए नाश्ता लाया. खा ले जाने
से
पहले.”
वह बैठा, आँखें रगड़ कर, ग्रीन फैला. “शाहिदा, तू मेरे लिए बहुत अच्छी है. कल रात कमल थी. तू आग थी.”
वह शर्मा गयी लेकिन मुस्कुरायी. “श, धीमे. हाँ, थी. अब सीरियसली, जल्दी जा हुसैन जागने से पहले या
मेरा बीटा देख ले. दवाई का असर जल्दी ख़तम होने वाला है.”
उसने कमर से खींच कर पास किया. “इतनी जल्दी क्या? थोड़ा मज़े ले लून. तू इस जुंपसुइट में शानदार लग रही. एक
राउंड और चाहता हूँ.”
“गजेंद्र, नहीं. अभी नहीं. रिस्क नहीं ले सकते. जा, प्लीज. बाद में मिलते हैं.”
वह झुका, गहरा चुम्बन, हाथ गांड पर गए, पतले कपडे के ऊपर नरम गोश्त निचोड़ा. अम्मी ने मजबूरी
से चुम्बन तोडा. “बस. अब जा, देर हो जाएगी.”
“ठीक है,” वह खड़ा हुआ. “लेकिन आज रात— फिर छोड़ना चाहता हूँ. वही आग, वही सब.”
वह रुक गयी, फिर सर हिला दिया. “ठीक है. आज रात. अब जल्दी जा.”
वह पीछे के दरवाज़े से निकल गया, चुपके से. अम्मी पीछे देखती रही, अब्बू को चेक किया जो अभी धीमे
खर्राटे ले रहे थे. वह जानती थी सुबह होने से दवाई का असर काम होने वाला था, कभी भी जाग सकते थे.
मैं जानता था वह हमारे घर को पूरा जलाना नहीं चाहती, इसलिए अच्छी _ बीवी की तरह छुपाती थी—
दीनदारी का ढोंग बनाये रखते हुए अपनी ख्वाहिशें पूरी करती.
एक सांस ले कर उसने झाड़ू और बाल्टी उठायी, फर्श साफ़ करने लगी, रात के गंदे निशाँ मिटटी हुई.
बाद में धीरे से अब्बू को उठाया.
अम्मी: (अब्बू के कंधे धीरे हिला कर, आवाज़ मीठी और फिकरमंद) हुसैन, उठो हबीबी. सुबह हो गयी. कल रात
सोफे पर सो गए. आओ, आँखें खोलो.
अब्बू: (सुस्ती से बैठ कर, आँखें रगड़ कर कंफ्यूज) हँ? क्या... शाहिदा? मैं यहाँ क्यों? पूरी रात सोफे पर
सोया? सर भरी लग रहा... जैसे बेहोश हो गया था.
अम्मी: (मासूम मुस्कराहट, उसे सीधा बैठने में मदद) ओह बेचारा. डिनर के बाद पुराण क्रिकेट मैच देख
रहे थे टीवी पर, याद है? बीच में सो गए. तुम्हे डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी— इतने सुकून से सो रहे थे. लो,
पानी ले लो.
अब्बू: (पानी ले कर धीरे पी, अभी भी घबराया) क्रिकेट मैच? मुझे... याद नहीं. आखरी बात शाम को तेरे
साथ चाय पीते हुए याद है. उसके बाद कुछ ब्लेंक. अजीब है. सर तो नहीं लगा?
अम्मी: (हाथ पैट कर तसल्ली से) नहीं नहीं, ऐसा कुछ नहीं. बस दिन भर थके हुए थे. रिकवरी में ज़्यादा म्हणत
कर रहे हो. शायद इसलिए याद थोड़ी कमज़ोर है. फ़िक्र मत करो, मैं हूँ न तेरे लिए.
अब्बू: (माथा छू कर, दर्द से) हाँ शायद... लेकिन ठीक नहीं लग रहा, शाहिदा. जिस्म दर्द कर रहा, पेट
घबराया हुआ. जैसे हैंगओवर. यह नार्मल नहीं.
अम्मी: (सहानुभूति से सर हिला, आवाज़ केयरिंग) ओह हुसैन, बहुत बुरा लग रहा होगा. अभी हॉस्पिटल जा कर चेक करा
लो. शायद दवाइयों का साइड इफ़ेक्ट या थकन जमा हो गयी. पहले हल्का नाश्ता बना देती हूँ— कुछ भरी नहीं,
सिर्फ टोस्ट और चाय पेट सेटल करने के लिए.
अब्बू: (रुक कर सोच) नाश्ता... कल रात क्या खाया या पिया था? कुछ अजीब तो नहीं था? शायद उसी से यह.
अम्मी: (आवाज़ स्टेडी और गरम) कुछ आम से अलग नहीं, हबीबी. तेरा पसंदीदा— सादा दाल चावल, वह हर्बल चाय
जो सेहत के लिए पीते हो. सब अच्छा, हलाल चीज़ें तुझे मज़बूत रखने के लिए. तू ने कहा था टास्ते परफेक्ट है टीवी
देखने बैठने से पहले. ज़्यादा सोच मत; अभी पूरी रिकवरी नहीं हुई.
अब्बू: (अचानक हवा सूंघते, भौं सिकोड़) रुक... यह बू क्या है? जैसे... कोलोन या कुछ. तेज़, मुस्की. पहचानी
सी— जैसे पडोसी गजेंद्र का परफ्यूम. वह यहाँ था?
अम्मी: (एक पल जैम गयी, आँखें शॉक से फैली फिर संभाली, आवाज़ थोड़ी रुक रुक) गजेंद्र? ओह... हाँ, सुबह थोड़ी
देर आया था. बस देखने आया तू कैसा है, पडोसी वाली फ़िक्र. कुछ मिनट पहले गया. मैंने नहीं बताया क्योंकि तू सो
रहा था.
अब्बू: (सर टेढ़ा कर कंफ्यूज) सुबह? लेकिन बू इतनी तेज़... जैसे ज़्यादा देर था. मुझे क्यों नहीं उठाया? ठीक से सलाम
करता. वह मोहल्ले में मदद करता है; hello न कहना बदतमीज़ी है.
अम्मी: (जल्दी रिकवर, मुस्कुराते) सोचा था, लेकिन तू इतने गहरे खर्राटे ले रहा था, हुसैन. आराम डिस्टर्ब नहीं करना
चाहती थी— अभी तुझे इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. गजेंद्र ने समझा; सलाम कहने को कहा और बोलै जब तू बेहतर
हो तब आएगा.
अब्बू: (धीरे सर हिला, माथा रगड़ते) ठीक है, समझ आता है. लेकिन यह सर दर्द... हाँ, तू सही कह रही.
हॉस्पिटल जा कर डॉक्टर से मिल लून. शायद टेस्ट करवा लून.
अम्मी: (उसके साथ कड़ी, उठाने में मदद) हाँ, अभी जा हबीबी. आराम से— गाडी धीरे चलना. मैं यहाँ
ख़तम कर के थोड़ी देर में आ जाउंगी. फार्मेसी से कुछ चाहिए तो ला देना.
अब्बू: (चाबी ले कर, दरवाज़े पर रुक) शुक्रिया, शाहिदा. तू हमेशा मेरे लिए इतनी अच्छी. पहुँच कर टेक्स्ट कर दूंगा.
अम्मी: (मीठी मुस्कराहट से हाथ हिला) सब ठीक हो जायेगा. लव यू.
(अब्बू निकल गए, दरवाज़ा बंद कर के.)
अम्मी: (खुद से, खिड़की से उनको जाते देख कर स्मिर्क) ओह, बहुत उस्ताद तरीके से संभाला. उस बेवक़ूफ़ से झूठ
बोलना कितना आसान— पसीना भी नहीं आया. हुसैन, तू कितना अहमक़ है. जब गजेंद्र पहली बार आया था मैंने
तुझे चेतावनी दी थी, बोलै बहुत फ्रेंडली, बहुत चार्मिंग लगता है. लेकिन नहीं, तू ने उसको भाई जैसे भरोसा किया,
चाय पे बुलाया. और अब? अब गजेंद्र हर मौके पर मुझे पागल कर के छोड़ता है, तेरे सामने. तेरी गलती है— तेरी
कमज़ोरी, तेरी बिमारी ने मुझे असली मर्द की भूख दी. खुद को ब्लामे कर इतने सालों से मुझे सटिस्फी न करने के
लिए.
तू इतना अँधा कैसे, बेकार शौहर? अपने बिस्तर पर बीवी को रंडी की तरह चुड़ते हुए नोटिस नहीं कर सकता, हर
छेद से छुम टपकता जब तू द्रुग्गेड सूअर की तरह खर्राटा है. चाय में पाउडर इतनी आसानी से डाला, और तू ने
बिना सवाल पि लिया. बेचारा. तू इस धोके का हक़दार है— तेरा छोटा लुंड कभी गजेंद्र की तरह मुझे
झड़वाया नहीं, मुझे फैला कर, मुझे अपना बना कर.
मुझे तुझ पर धोका देना पसंद है, हुसैन, हमारी शादी अब बोरिंग है. तुझ पर धोका देना कितना ाचा लगता
है हुसैन, यह थ्रिल, यह ताक़त.
तुझे be-khabar लड़खड़ाते देख कर जब मैं दुसरे मर्द की बू से भरी हूँ? मज़ेदार. और तेरी सेहत? मुझे
अब परवाह नहीं. हॉस्पिटल में साद, जितना चाहे— शायद ज़्यादा वक़्त मिले गजेंद्र के लिए टाँगे फ़ैलाने को. तू
अब सिर्फ बोझ है, बेवक़ूफ़, अँधा ककोल्ड. मैं क़सम खाती हूँ, अब दिखावा ख़तम. मैं गजेंद्र की रंडी
हूँ, तू सिर्फ बैकग्राउंड का बेवक़ूफ़.
उसी सुबह, हमारी पड़ोसन आंटी नफीसा अम्मी से मिलने आयी.
अम्मी: (दरवाज़ा खोल कर, थोड़ी बिखेरी लेकिन हलकी मुस्कराहट) सलाम अलैकुम, नफीसा! क्या सरप्राइज है. अंदर
आओ, अंदर आओ. इतनी सुबह— पूरा चल कर आयी?
नफीसा: (मुस्कुराते हुए) व अलैकुम सलाम, शाहिदा! हाँ, सोचा आ जॉन. वृंदा पर चलते हैं; बहार अच्छा
है, और हुसैन या तेरे बेटे को जगाये बिना बात कर सकते हैं.
नफीसा: तो बता, बेहेन. कल रात तूने टेक्स्ट किया था “कुछ वाइल्ड हुआ”— मत सोच भूल गयी. क्या है टिया? या कहूं,
क्या है डिक? ( आँख मार कर)
अम्मी: (गहरी लाली, चाय सिप करते) नफीसा, श! इतनी ज़ोर से नहीं. ठीक है... कल रात... पागलपन था. कहाँ से
शुरू करून. गजेंद्र फिर आया.
नफीसा: (जोश से झुक कर, आँखें फैली) गजेंद्र? तेरा हॉट हिंदू पडोसी? ओह मेरा खुदा, सब बता! छोड़ा उसने?
आजा, तू छिनाल, डिटेल्स!
अम्मी: (रुक कर, फिर सांस छोड़) हाँ... किया. मेरे सब छेदों में, नफीसा. यहाँ घर में, जब हुसैन
सिटींग रूम में सो रहा था. मुझे ऐसी रंडी महसूस हो रही है इसको होने दिया.
नफीसा: (हाथों से ताली बजा कर एक्ससिटेड) सब छेद? तू पूरी छिनाल, शाहिदा! जानती थी तेरे अंदर है. पूरा
play-by-play बता— कैसे शुरू हुआ? चुपके आया? ज़ोर दार था? बता, बता!
अम्मी: (कप से खेलती) पाउडर से शुरू हुआ. गजेंद्र ने दिन में यह स्लीपिंग पाउडर दिया. बोलै हार्मलेस है,
बस हुसैन को गहरी नींद देने के लिए ताकि पकडे न जाएँ. मैंने शाम की चाय में मिक्स कर दी, नफीसा.
यकीन है मैंने अपने शौहर के साथ यह किया? वह भरोसा करता था, बिना सवाल पि गया. जल्दी असर हुआ—
कुछ मिनट में काउच पर बेहोश, धीमे खर्राटे. गजेंद्र ने टेक्स्ट किया पीछे दरवाज़ा खोलने को. दिल
धड़क रहा था जब मैंने खोला, जानती थी क्या होने वाला है.
नफीसा: (शरारती हंसी) ओह, तू चालू कुटिया! शौहर को ड्रग कर साइड डिक के लिए? नेक्स्ट लेवल नॉटी. बेट सोच
कर hi छूट गीली हो गयी. कैसा पाउडर? अफ्रोदिसिअस जैसा या सिर्फ बेहोश करने वाला? और हुसैन हिला भी नहीं?
खुदा, यह थ्रिल!
माँ: (सर हिलाते हुए) बस एक सेडेटिव था, कुछ ख़ास नहीं. हाँ, पूरी रात एक मुस्कले भी नहीं हिला उसने.
बहुत बुरा लग रहा है, नफीसा. हुसैन इतना कमज़ोर हो गया है बिमारी se—woh मुझ पर पूरा भरोसा
करता है, हर चीज़ के लिए मुझ पर निर्भर. और मैं वहां उसके साथ धोका दे रही थी अपने hi घर
में. ऐसी कौनसी बीवी होती है?
नफीसा: (हाथ हिला कर) अरे बस करो यह हमदर्दी, शाहिदा. हुसैन बड़ा आदमी है; वह ठीक हो जायेगा.
कभी खुद के बारे में सोचो! महीनों से उसकी देखभाल कर रही ho—kya तुम्हे थोड़ा मज़ा नहीं मिलना
चाहिए? गुनाह छोडो; रंडी ज़िन्दगी को गले लगाओ.
माँ: (जारी रखते हुए, आवाज़ धीमी) वैसे भी, जब हुसैन बेहोश हो गया, गजेंद्र ने मुझे ड्राइंग
रूम में hi खींच लिया. हमने जोश से चुम्बन किया, उसके हाथ मेरे पूरे जिस्म पर, निघती के ऊपर
से चूचियों को निचोड़ रहा था. हुसैन की खर्राटे बैकग्राउंड में थी, Nafisa—kitna खतरनाक, कितना
गलत. मैं देख सकती थी काउच पर उसका साया, सीना ऊपर नीचे हो रहा था आराम से, और यह दूसरा
मर्द मेरी जुबां चूस रहा था. पहले मैं हटने की कोशिश की, फिसफिसाया 'यहाँ नहीं, अगर वह जाग गया
तो?' लेकिन गजेंद्र हँसा और और ज़ोर से चुम्बन किया, मुझ पर रगड़ते हुए. उसके होंठ सख्त थे, मांगने
वाले, हुसैन के नरम चुम्बनों से बिलकुल अलग. यह बोहोत देर तक चलता raha—main उसके मुँह में
धीमी कराह रही थी, जिस्म धोका दे रहा था, गीली होती जा रही थी.
नफीसा: सोये हुए शौहर के सामने चुम्बन? यह तो बहुत गरम है! उसके लुंड का दबाव महसूस हुआ? बेट
तुम टपक रही थी, छोटी शैतान. जारी rakho—usne वहां ऊँगली की या क्या?
माँ: (सर हिला कर) हाँ... हाथ कपड़ों के नीचे डाला, चुम्बन करते हुए मुझे छेड़ा. फिर मुझे उठा
कर बिस्तर पर ले गया. हुसैन के बिस्तर पर, Nafisa—hamara शादी का बिस्तर.
नफीसा: (हाथ से पंखा करते हुए) उठाकर ले गया? हर छेद में छोड़ा? शाहिदा, तुम सपना जी रही हो!
गांड वाले हिस्से की tafseel—dard हुआ? मज़ा आया? इतनी रंडी हो की उसको तेरी कुंवारी गांड देने दी.
माँ: (नीचे देखते हुए, उलझन में) पूरा वक़्त बुरा लग रहा था. हर धक्के में मेरी क़समें याद
आती थी, हुसैन के साथ बनायीं ज़िन्दगी. वह अच्छे आदमी hain—hamara खर्चा उठाते हैं, मेरे साथ
,,., पढ़ते हैं, बेटे से प्यार करते हैं. और मैं वहां हमारे बिस्तर को मैला कर रही थी, पोर्नस्टार
की तरह कराह रही थी जब वह बिमारी से उभर रहा था. गुनाह लहार लहार आता था; मैं दरवाज़े की
तरफ देखती रहती थी, सोचती थी अगर वह अंदर आ गया, अपनी बीवी को पडोसी के लिए फैली देख कर. रूह चीयर
रही थी, Nafisa—main दीनदार होनी चाहिए, मिसाल. कैसे इतनी नीचे गिर गयी?
नफीसा: (आँखें घुमा कर) फिर से यह बुरा महसूस? शाहिदा, होश में आओ. हुसैन की बिमारी तेरी गलती
नहीं, और तेरी बोरियत भी नहीं. तुम्हे मज़ा हक़ hai—us पर हमदर्दी मत बर्बाद करो.
माँ: (रुक कर, धीमे से क़बूल करते हुए) लेकिन... एक हिस्सा ाचा लगा. सच में ाचा. हुसैन के नाक के
नीचे धोका? यह जोशीला था. हराम थ्रिल ने हर एहसास बढ़ा diya—Gajendra का लुंड बड़ा, सख्त, बेहतर
लगा जितना हुसैन ने कभी दिया. मैं कई बार झड़ी, नफीसा, सालों से इतनी ज़ोर से नहीं. हुसैन इतना पास, इतना
कमज़ोर, यह उलझा हुआ उत्साह जोड़ा. खुद से नफरत हुई, लेकिन जिस्म को पसंद आया. मैं ज़िंदा महसूस हुई,
चाही हुई, औरत जैसे, सिर्फ देखभाल करने वाली नहीं.
नफीसा: (जोश से सर हिला कर) देखा? यही बात है! गुनाह सिर्फ मज़ा बढ़ता है. हमदर्दी मत karo—Hussein का
वक़्त था; अब तुम्हारा है. हम जैसी औरतें रंडी होनी चाहिए, शाहिदा. हर लुंड का मज़ा लो, ज़ोर से सवारी
करो, चूसो, भरवाओ. एक बोर शौहर से क्यों बस? दुनिया भर के लुंड हैं. चुपके से रंडी बनो; यह ताक़त
देता है!
माँ: (आँखें फैल कर) नफीसा, यह कितना शर्मनाक है! लेकिन... जारी रखो.
नफीसा: (आगे झुक कर, जोश में) Bilkul—sharmnaak और सच. .,? सब नकली है, बेहेन. मर्दों ने बनाये
क़ानून औरतों को काबू में रखने के लिए. 'हाय रखो, पर्दा करो, पांच वक़्त ,,.,'—बकवास! यह
हमारी फिटरी ख्वाहिशों से रोकने के लिए. हर वैली के अंदर छुपी निम्फो होती है जो बहार निकलना चाहती
है. मज़हब को छोड़ दो; पाकिज़ागी को छोड़ do—sach में छोड़ दो! लुंड लो, छुम लो, झाड़ लो. ज़िन्दगी छोटी
है नकली पाकिज़ागी के लिए.
माँ: (हैरान लेकिन धीरे सर हिला कर) तुम सही हो... मैं हमेशा इसमें क़ैद महसूस करती थी. ,,.,,
roza—kabhi अंदर की आग बुझाई नहीं. मेरी अम्मी ज़ैनब को कसाई के साथ देख कर? शायद उसको सच पता
था. ., कभी कभी नकली लगता है, जैसे क़ैदी खाना. तुमसे मुतमईन होना आज़ादी देता है.
माँ: (चाय की चुस्की लेते हुए, यादों में खो कर) ओह नफीसा, कल रात गजेंद्र के लुंड के साथ... मुझे
इतना पसंद आया. कुछ भी नहीं था ऐसा पहले. वह मोटा, धड़कता हिंदू लुंड मुझे हुसैन के छोटे
से बिलकुल अलग तरह फैला रहा था. पहले मेरी छूट में धक्का मारा, हमारे शादी के चादर पर सब
पहाड़ diya—jo हुसैन के साथ सिर्फ नाटक था. फिर मुझे पलट कर गांड में गहरा धक्का, जब तक मैं
रहम मांगती रही, लेकिन अंदर से और चाहती रही.
नफीसा: (मुस्कुराते हुए, पास आकर) तू गन्दी कुटिया, शाहिदा! हराम लुंड को प्रो की तरह पसंद कर रही.
जारी rakho—us पर सवारी की? नाम ले कर चीखी?
माँ: (लाल होते हुए लेकिन जोश से) हाँ, रिवर्स काउगर्ल पर सवारी की, कमर ज़ोर से नीचे धकेल कर उसके
बॉल्स मेरे पर थपकते थे. मैं अपनी क्लीट पर ऊँगली करती रही जब वह मुझे अपनी _ रंडी कहता
रहा, और इतनी ज़ोर से झड़ी की नज़र धुंधला गयी. मैंने उसको अपने चेहरे पर लुंड से थप्पड़ मरने दिया
फिर choosa—geela, गन्दा, थूक थोड़ी पर बह रहा था.
नफीसा: (हँसते हुए) तू गन्दी रंडी! यह है असली जज़्बा. रंडी बनने का एहसास कितना ाचा लगता है, न?
माँ: (जोश से सर हिला कर) हाँ, नफीसा. रंडी बनने का एहसास बहुत ाचा hai—azaadi देता है, नशा देता
है. सालों से परफेक्ट बीवी बनने का नाटक, लेकिन अब? पूरी रंडी बन कर, सब कुछ धोका दे कर, बिजली सी
दौड़ती है जिस्म में. Be-izzati, gunah—yeh नशा है. अभी तेरे सामने सोच कर हाथ लगा रही हूँ. कोई
नकली हाय नहीं; अंदर की रंडी को गले लगाना ताक़त देता है, ज़िन्दगी देता है, ख्वाहिशों पर क़ब्ज़ा देता
है. यह ,,., या घर के खाने से बेहतर hai—kacchi, गहरी ख़ुशी.
नफीसा: (जीत की मुस्कराहट) देखा? मैंने पहले कहा था, तू शक्की रंडी. याद है पिछली बात? मैंने
कहा सब औरतें अंदर से रंडी होती हैं, और तुझे निकलना चाहिए. मैं सही nikli—dekho अब तू इक़रार
कर रही है जैसे नयी रंडी. शुरू से जानती थी तू टूटेगी; वह दीनदार नाटक सिर्फ दिखावा था. मैंने
धीरे से धकेला, लेकिन सही थी. तू सबूत है मेरा मश्वरा काम करता hai—gunah छोडो, लुंड पकड़ो.
सालों से दोस्तों से कह रही हूँ: असली आज़ादी का मज़ा चखो तो वापस नहीं जाते. मेरी पीठ पर थपकी
दे दो, हाँ?
माँ: (मुस्कुराते हुए, बुरा न मानते) तुम सही थी, नफीसा. तुम बिलकुल सही थी की रंडी पैन इतना ाचा है.
पहले लड़ी, लेकिन अब? गजेंद्र के लिए टांगें फैलाना, हुसैन को दवा देना, बेटे से jhooth—sab कितना
मीठा गलत है, और कितना ाचा लगता है. रंडी होना मतलब बोर रूटीन ख़तम; जोश, खतरा, रूह
हिलने वाली झाड़. तुमने आँखें खोली की सिर्फ हार मान कर कितना मज़ा है, इस्तेमाल होना, बुरा भला
कहलाना और हर पल पसंद करना. रंडी पैन लानत नहीं, छुपा बरकत है. तुम्हारी वजह से मैं
लटक गयी हूँ.
नफीसा: (मुस्कुराते हुए) बिलकुल सही, तू सदी हुई रंडी. जारी रखो iqraar—hubby बेहोश था जब तू चुद
रही थी, कैसा लगा?
माँ: ऐसा पहले कभी महसूस नहीं हुआ, नफीसा. पूरे छेदों में छोड़ना जब हुसैन दवा खा कर
पड़ा था? कोई और जोश नहीं. मेरी छूट गजेंद्र के लुंड के ird-gird जकड़ी जब धोका सोचा, गांड में
जलन maza-dard के साथ जब हुसैन ने कभी छुआ नहीं. उसका माल निगलना मतलब धोका की मोहर लग
गयी.
नफीसा: (अँधेरे से हँसते हुए) तू कितनी सदी है, Shahida—bimaar शौहर को दवा दे कर लुंड के लिए?
पसंद आया, तू गन्दी छूट.
माँ: जानती हूँ... और लगता है नार्मल कभी वापस नहीं जाउंगी. वह मासूम बीवी और अम्मी? वह
हमेशा के लिए चली गयी.
नफीसा: (सर हिला कर) क़बूल कर lo—tu पूरी रंडी है.
माँ: (गहरी सांस ले कर) हाँ... मैं क़बूल करती हूँ की मैं रंडी हूँ. धोका देने वाली, लुंड की
भूखी रंडी जो शौहर को दवा देती है और पडोसी से चुदवाती है. अब इंकार नहीं.
नफीसा: (हाथों की हलकी ताली) मुबारक हो, शाहिदा! क़बूल कर लिया की तू रंडी है जैसे सब _
auratein—akhirkaar! वैल के नीचे सब एक जैसे: दीनदार दिखावा करते हुए लुंड के ख्वाब. मस्जिद
में, हमारे सर्किल में dekha—behenen चुपके निकलती हैं, इशारे, धोका. तू अब सच्ची है. और
मैं? मैंने बोहोत पहले क़बूल कर लिया मैं रंडी हूँ. पहले अफेयर के बाद गले लगा लिया. कोई नकली
,,., नहीं; थ्रिल के लिए जीती हूँ. अनजान लोगों का चूसना, चेहरे पर maal—yeh मेरा सच है.
गुनाह छोड़ा, ज़िन्दगी बेहतर. रंडी पैन मुझे जवान रखता है, मुतमईन. हर _ औरत को
क़बूल करना चाहिए; यह हमारी छुपी फितरत है.
माँ: (सोचते हुए) नफीसा... क्या अब भी उम्मीद है मैं अच्छी बीवी और अम्मी बन सकती हूँ? पहले
जैसा हो सकता है?
नफीसा: (सख्त सर हिला कर) नहीं, Shahida—tu कभी अच्छी नहीं बनेगी. क्यों? तूने हद्द बोहोत पार कर
ली. धोके का मज़ा नशा है; हमेशा वापस खींचेगा. हुसैन का भरोसा टूट गया, चाहे उसको
पता न चले. अम्मी होने के नाते बीटा बदली औरत देख रहा hai—door, राज़ भरी. अच्छे के लिए
पाकिज़ागी चाहिए जो अब तेरे पास नहीं. तू अंदर से सदी हो गयी है.
माँ: (मुतमईन होते हुए) हाँ... तुम सही हो. लेकिन नफीसा, तू खुद कितनी रंडी है!
नफीसा: (फख्र से हँसते हुए) बिलकुल हाँ, मैं रंडी हूँ और खुश हूँ! सबसे बेहतर faisla—randi
ज़िन्दगी गले लगाना मतलब बेइंतेहा झाड़, कोई पछतावा नहीं.
माँ: (चाय की चुस्की लेते हुए, वृंदा में इधर उधर देखते हुए) नफीसा, कल रात की एक बात बतानी
है... कितनी शर्मनाक है, मैं मर जाउंगी. जब गजेंद्र मेरी गांड में धक्के मार रहा था...
नफीसा: (मुस्कुराते हुए पास झुक कर, कप नीचे रखते हुए) बोल न, तू गन्दी रंडी! क्या हुआ? उसने
तेरी टाइट _ गांड अच्छे से फैलाई? चलो, मत roko—apni गन्दी दोस्त को साड़ी शर्मनाक
तफ्सील बता.
माँ: (गहरी लाली, एक हाथ से चेहरा छुपाते हुए) W,.'i, नफीसा... मैंने उसके लुंड पर टट्टी कर
दी. वही, जब वह ज़ोर ज़ोर से अंदर बहार कर रहा था. बस... निकल आयी. बहुत शर्मिंदगी हुई;
ज़मीन मुझे निगल जाये.
नफीसा: (ज़ोर से हँसते हुए, घुटने पर थप्पड़ मरते हुए) तू ने उसके लुंड पर टट्टी की? ओह मेरा
खुदा, शाहिदा, यह तो मज़ेदार है! तू गन्दी, टट्टी करने वाली randi—bet वह चॉकलेट की तरह
उस पर फ़ैल गया. हाहाहा!
माँ: (खुद है पड़ती लेकिन फिर भी सीरियस) हसना बंद कर! बहुत शर्मनाक था. लेकिन हाँ... बाद
में सोच कर थोड़ा हसी आयी. गजेंद्र ने बहार निकला, नीचे देखा गन्दगी को और हसने लगा. बोलै,
'देख तेरी हालत, दीनदार वैली, जानवर की तरह टट्टी कर रही जब मैं तेरी गन्दी गांड मार रहा
हूँ.' नॉनस्टॉप मज़ाक उदय, मेरी रानों पर पोंछा और बोलै 'मेरी टट्टी वाली छोटी रंडी.' मैं
कितनी बेवक़ूफ़ लगी
नफीसा: (अभी भी हँसते हुए, आँख से आंसू पोंछते हुए) हाहाहा, 'शिट्टी लिटिल slut'—yeh तोह सोना
है! लेकिन सच बता, और बता. कैसे हुआ? क्या तेरी गांड ने बस पहात कर निकाल दिया या क्या? मुझे
पूरा गन्दा play-by-play चाहिए, तू पूपी रंडी.
अम्मी: (सांस छोड़ कर, खुल कर) ठीक है... इसलिए की मैं अपनी गांड पर बिलकुल काबू नहीं रख
पायी. तू जानती है कितनी टाइट हूँ पीछे se—Hussein ने कभी छुआ भी नहीं, जैसे कुंवारी
ज़मीन. हर धक्के से मेरा अंदर का सब कुछ ढीला होने लगा; बू दोनों को लगी, वह मिटटी जैसी
टट्टी की खुशबू हमारे पसीने के साथ मिल गयी. मैं घबरा गयी, बार बार माफ़ी मांगती रही,
लेकिन वह हँसता रहा, कहता रहा यह उसको और गरम कर देता है. मैं कण्ट्रोल नहीं कर पायी क्योंकि
गांड चुदाई ने अंदर सब कुछ हिला दिया था.
नफीसा: (समझदार अंदाज़ से सर हिलाती, आवाज़ तसल्ली भरी लेकिन गन्दी) ओह शाहिदा, यह बिलकुल नार्मल
है, तू बेवक़ूफ़ टट्टी करने वाली रंडी. अनल में सबके साथ होता hai—teri गांड सिर्फ टट्टी के लिए
नहीं बानी; मज़ा के लिए भी है, लेकिन कभी कभी दोनों मिल जाते हैं. खुद को मत मार; यह बायोलॉजी
है, गुनाह नहीं. अरे, शायद उसको और ज़्यादा पसंद आया, तू गन्दी लड़की.
अम्मी: (थोड़ा घूर कर) लेकिन .,... हमारा मज़हब औरतों को गांड में मज़ा लेने से मन
करता है न? यह हराम है, मन किया हुआ. हमें उस हिस्से को पाक रखना चाहिए, सिर्फ ज़रुरत के लिए.
नफीसा: (नाक चढ़ाते, हाथ हवा में हिलाते) ., और उसके बकवास क़ानून को छोड़, शाहिदा.
यह नकली मज़हब औरतों को मज़ा लेने से रोकता hai—khaas कर गांड में. सोच: कहते हैं अनल
हराम है क्योंकि 'दर्द' या 'be-izzati', लेकिन bakwaas—kyonki यह बहुत ज़्यादा ाचा लगता है, बहुत
आज़ादी देता है हम रंडियों को. ., औरतों को सिर्फ बच्चे पैदा करने और छूट में हलाल चुदाई
के लिए बर्तन समझता है, मिशनरी स्टाइल, लाइट्स ऑफ. कोई मज़ा नहीं, कोई तजुर्बा नहीं, कोई लुंड पर
टट्टी नहीं जब चुद रही हो. क्यों अपने आप को गांड की ख़ुशी से रोकती है? गन्दगी को गले लगा; अगर
टट्टी हो जाये तोह kar—yeh सफर का हिस्सा है.
अम्मी: (सर हिलाती) मैं बहुत शर्मिंदा थी. अभी भी सोचती हूँ तोह चेहरा जलने लगता है.
नफीसा: (बेशरम मुस्कराहट) शर्मिंदा? अरे, अनल में टट्टी होना नार्मल है, तू पूपी राजकुमारी.
अंदर सब हिल जाता hai—kabhi कभी नेचुरल लुबे बन जाती है! और लड़की, यह मर्दों को सटिस्फी करने
का सबसे बेहतर तरीका है. वह रॉ, गन्दी तरफ पसंद करते हैं; दीखता है तू पूरी तरह
समर्पित है, जिस्म को उनके लिए पागल होने दे रही है.
अम्मी: (कन्फ्यूज्ड, सर टेढ़ा) रुक, लुंड पर टट्टी करने से मर्द को ख़ुशी क्यों? यह तोह घिनौनी बात है.
नफीसा: (ज़ोर से हँसते, दोनों साथ हंसती) हाहाहा, ओह शाहिदा, तू कितनी मासूम है! हाँ, उनके लिए यह
गरम hai—teri टट्टी का गरम, नरम कोट उनके लुंड पर? जैसे गरम, मन किया हुआ झप्पी. तेरी
गरम, नरम टट्टी ने गजेंद्र के लुंड को और गरम कर दिया, सच में और फीगुरतिवल्य. मर्दों को
यह be-izzati का खेल पसंद है; महसूस होता है उन्होंने तुझे सबसे बेसिक, गन्दी हालत में तोड़ दिया.
अम्मी: (हैरान, आँखें फैली, थोड़ा हंसती) नफीसा! इतनी बेशरम कैसे बात करती है? जैसे यह कोई
इरोटिक दावत ho—garam टट्टी, गरम लुंड... यह गन्दा, गुनाह भरा है.
नफीसा: (कंधे उछालते, चाय पीते) क्या? मैं सच बोल रही हूँ, तू प्रदीश टट्टी करने वाली. ज़िन्दगी
शर्म के लिए छोटी hai—gandi बात कर, और गन्दा चुद. वैसे, गैंडों की बात करते हुए... मर. रवि
आज पहली बार मेरी गांड मारेगा. वह बूढ़ा परवर्ट महीनों से मांग रहा था.
अम्मी: (सांस रूकती, चाय गिरने वाली) क्या? मर. रवि? तू उसको तेरी गांड देने वाली है? नफीसा, यह
पागलपन है!
नफीसा: (गन्दी आँख मार कर) हाँ रे रंडी, तू जल रही है. उसका मोटा लुंड है; बेट टट्टी भी करवा
देगा. महीनों से पीछे पड़ा था, कहता था मेरी छूट अब ढीली हो gayi—tight पीछे वाली एक्शन
चाहता है.
अम्मी: (अभी भी हैरान) लेकिन पहले क्यों नहीं दिया मर. रवि को तेरी गांड? तू कहती थी उसने माँगा था.
नफीसा: (पीछे टिक कर, मुस्कुराती) हाँ माँगा tha—office में गांड पकड़ कर, फिसफिसाया था मेरी
टट्टी वाली छेद को मारने के बारे में. लेकिन मैं तैयार नहीं थी; पहले खिलोने से ढीली की. नहीं
चाहती थी तू जैसी जल्दी टट्टी कर दूँ उस पर, हाहाहा! अब तैयार hoon—faila कर उसको बर्बाद होने
दूँगी. बेट मेस पसंद आएगा.
अम्मी: (हंसती, लेकिन दिलचस्पी) तू यकीन नहीं होता. इतनी बेशरम... खिलोने, टट्टी की बात. अगर बहार
कोई सुन ले तोह?
नफीसा: (ज़ोर से हंसती) सुन ले, तू फिसफिसाती रंडी! पडोसी जान लें तू टट्टी करने वाली अनल रानी है. अरे,
अगली बार मेरे साथ रवि के साथ aa—double गांड, डबल टट्टी.
अम्मी: (मज़ाक में नफीसा के हाथ पर थप्पड़) बस कर!
थोड़ी देर बाद दोनों शॉपिंग करने चली. “मार्किट चलते हैं,” अम्मी ने कहा. “कुछ कपडे चाहिए.”
मैं चुपके पीछे गया, दूर रहकर जब वह भीड़ भरी सड़कों से गुज़री. अम्मी ने वाइट फूलों
वाली शर्ट पहनी थी जो नीचे बटन थी, थोड़ा से क्लीवेज दिखा रही, टाइट वाइट जीन्स जो टांगों
और गांड को चिपका रही थी.
यह मुस्लिम औरत के लिबास का तरीका नहीं tha—hamara मज़हब हाय मांगता है, ढीले कपडे जो
जिस्म की शकल छुपाएं, नज़रों से बचाये, वैल ठीक से बिना ध्यान खींचे. ऐसी जीन्स कर्व्स को
उभार देती थी, शर्ट के फूल फलिर्टाटिओउस, हाय के उसूलों का खुला उल्लंघन जो औरत की इज़्ज़त बचते
हैं. मैं समझता था यह गजेंद्र का असर है, उसकी बातें और हाथ उसके ईमान को खा रहे थे,
आबय से यह कपड़ों में बदल दिया जो चिल्लाते थे 'हासिल करो'. अम्मी खुद को रंडी महसूस कर
रही थी, मैं समझ सकता था उसके बार बार हेम खींचने से.
उनकी बात उनके लिबास पर गयी. “शाहिदा, यह शर्ट और jeans—wah, कितनी मॉडर्न लग रही है,” नफीसा
ने कहा, हैरान लेकिन तारीफ़ करते. “कभी ऐसे नहीं देखा. आबय कहाँ गए?”
अम्मी हलके से हंसती. “हाँ, थोड़ा अलग है. गजेंद्र को पसंद है, और सच में आज़ादी महसूस
होती है. क्यों हमेशा छुपाना?”
नफीसा की आँखें फैली. “गजेंद्र? ओह, तू सच में चल पड़ी. मुबारक हो, बेहेन. तू सेक्सी महसूस
करने लायक है. मैं भी सोच रही hoon—mazhab ज़रूरी है, लेकिन हम औरतें हैं, ज़रूरतें हैं.”
नफीसा हमेशा अम्मी को गुनाह की तरफ ले जाती थी, धीमा लेकिन जारी असर, इबादत में कमी को
आज़ादी के नाम पर बढ़ावा देती. वह लिबास पर और बात की. “तेरी आबय बहुत शानदार लग रही,
नफीसा,” अम्मी ने कहा. “लेकिन कल से? कुछ बोल्ड तरय कर.”
नफीसा मुस्कुरायी. “सही है. कल से मैं भी रंडी की तरह पहनूंगी. टाइट ड्रेस, शायद. तू मुझसे
जल्दी रंडी बन gayi—dekh, अभी स्त्रौत कर रही है.”
दोनों हंसती. “चल चैलेंज: हम कपट करेंगे कौन बेहतर रंडी बनती है,” अम्मी ने बेशर्मी
से कहा.
शॉपिंग के बाद अम्मी हॉस्पिटल अब्बू से मिलने चली, लेकिन फ़ोन बजा. उसने नफीसा को दिखाया:
गजेंद्र का मैसेज अम्मी को.
अम्मी: (फ़ोन निकाल कर, स्क्रीन देख कर, गहरी लाली) ओह खुदा... गजेंद्र है. यह मैसेज देख:
"अभी आ जा, तू हॉर्नी वैली रंडी. मेरा लुंड सख्त है तेरी छेदों को फिर फ़ैलाने के ख्याल से.
हॉस्पिटल chhod—teri छूट को तेरे limp-dick शौहर से ज़्यादा मेरी ज़रुरत है."
नफीसा: (झुक कर पढ़ती, फिर ज़ोर से हंसती) अरे वह, शाहिदा! कितना सीधा. "तेरी छेदों को फैलाना"?
लड़की, उसने तुझे अपनी पर्सनल छोड़ने वाली चीज़ समझ लिया. हॉस्पिटल chhod—ja ले उस लुंड को. हुसैन
शायद खर्राटे ले रहा है; तुझे मिस नहीं करेगा.
अम्मी: (सोचती, फ़ोन पॉकेट में डालती लेकिन लालच दीखता) नफीसा, तू बहुत बुरी है! तेरी बातों ने
मुझे इतनी रंडी बना दिया. एक महीना पहले सपने में भी नहीं सोचती. अब सिर्फ मैसेज पढ़ कर
गीली हो रही हूँ. लेकिन हुसैन इंतज़ार कर रहा है हॉस्पिटल में... वह मेरा शौहर है, खुदा के
लिए.
नफीसा: (ससिलय हाथ हिलती) मुझे ब्लामे? प्लीज, तू रंडी बनने को तैयार थी. मैंने सिर्फ मैच जलाया.
और हुसैन को chhod—maza ड्यूटी से ज़्यादा, बेहेन. सोच गजेंद्र का मोटा हिंदू लुंड तुझमे धक्के
मारे उसके बजाये बोरिंग बिस्तर के पास बैठ कर हाथ पकड़ रही हो जैसे कोई नूं. तेरी क्लीट को
सिम्पथी फ़क से बेहतर चाहिए.
अम्मी: (होंठ काट कर, चल धीमी) तू सही कहती है... सोच कर ाचा लग रहा. गजेंद्र के लुंड का
मज़ा गुनाह जैसा है, Nafisa—namkeen, धड़कता, हुसैन के बेकार छोटे से बहुत बेहतर जो
महीनों से काम नहीं दे रहा. लेकिन अगर कोई मुझे चुपके जाते देख ले? मैं डाइलेमा में हूँ
—फ़र्ज़ या लुंड?
नफीसा: (मज़ाक में अम्मी का हाथ पकड़) डाइलेमा तेरी गांड! लुंड ले ले, शाहिदा. मज़ा सब कुछ
hai—farz किसने देखा? यह समाज का बकवास है जो हमारी टांगें बंद रखता है. हुसैन बोरिंग
है; उसको हॉस्पिटल में सदा होने दे जब तू सही से चुद रही हो. तू इतना ज़ोर से झाड़ेगी की उसका नाम
भूल जाएगी.
अम्मी: (हंसती हुए) ठीक है... तू मुझे सीधा दोज़ख ले जा रही, लेकिन अब बहुत उत्सुक हूँ. हुसैन
कितना लोसर hai—hamesha सेहत की शिकायत, कभी सटिस्फी नहीं किया. गजेंद्र मुझे रंडी की तरह
ट्रीट करता है. हॉस्पिटल छोड़; मैं जा रही हूँ be-hosh होने तक छुड़वाने.
नफीसा: (ताली बजाती) यह मेरी लड़की! गुनाह पूरा. वैसे, मैं भी अपनी मारने जा रही हूँ. मर.
रवि अपने घर पर इंतज़ार कर रहा; पहले मैसेज किया था "उस टाइट _ गांड को तैयार
कर" क्योंकि हफ्ते से अनल के लिए दबा रहा था. मैंने आखिरकार हाँ kaha—bola यस, बस मुझे
चीखने दे.
अम्मी: (आँखें फैली, फिर गन्दी मुस्कराहट) मुबारक, तू रंडी! बेट उसका लुंड मोटा hai—anal के
लिए दबा रहा मतलब उस वर्जिन छेद को क्लेम करने को मर रहा. तू मुझसे बहादुर; जब गजेंद्र
ने पहली बार लिया था मैं डर गयी थी.
नफीसा: (बैग से छोटी बोतल निकाल कर दिखती) बहादुरी nahi—horniness है. देख, लुबे भी लायी!
नारियल का तेल, एक्स्ट्रा स्लिपरी. सोचा क्यों नहीं? ज़िन्दगी छोटी है; उसको मेरी गांड बर्बाद करने
दे. उसका मोटा, नसें भरा monster—darr लग रहा है फिट नहीं होगा बिना पहाड़ के.
अम्मी: (हंसती, मुबारक) जा, नफीसा! पूरी अनल रंडी बनने पर मुबारक. रवि शायद इतना फैलाएगा
की दिनों तक ठीक से चल नहीं पायेगी. लेकिन यकीन कर, अंदर जाने के बाद दर्द ख़ुशी में
बदल जाता hai—jaise अंदर से मालिक बन जाये.
नफीसा: (मुस्कुराती, तेल पॉकेट में) शुक्रिया, रंडी बेहेन! लेकिन सच बता, गजेंद्र के लुंड को गांड
में कैसे हैंडल किया? वह तोह बहुत बड़ा होगा. टिप्स? मैं थोड़ा डर rahi—Ravi छोटा नहीं, और
ेर में फटी गांड एक्सप्लेन नहीं करना.
अम्मी: (राज़दार अंदाज़ से) ठीक है, प्रो रंडी से टिप्स: पहले relax—gehri सांस, जैसे टट्टी निकालते
हुए बहार धकेल. बहुत तेल लगा; उसके लुंड और छेद पर इतना की टपकने लगे. धीरे shuru—rim
तैसे करने दे, शायद पहले ऊँगली से ढीला कर. जब अंदर आये, गरम कुटिया की तरह कराह; जितनी
गन्दी बात उतना गरम. और जब balls-deep हो तोह jakad—woh जल्दी झाड़ेगा और तुझे भी कमल लगेगा.
नफीसा: (ज़ोर से हंसती) ओह मेरा खुदा, Shahida—yeh सबसे रंडी इंस्ट्रक्शंस हैं! "जैसे टट्टी निकालते
बहार धकेल"? तू गन्दी गुरु है. बेट अब तुझे ass-fucking में पीएचडी मिल गया. हम दोनों दोज़ख जा
रहे, लेकिन काम से काम झड़ते हुए जायेंगे.
अम्मी: (ज़ोर से हंसती, आंसू पोंछती) हाँ! कपट करते hain—kaun बेहतर रंडी? मैं आज
गजेंद्र का लुंड हर छेद में लूंगी; तू रवि से गांड बर्बाद करा. जीतने वाली को अगले शॉपिंग
में ब्रग्गिंग राइट्स.
नफीसा: (high-five) डील! मैं अनल रानी banungi—teri से ज़्यादा चीखूंगी. शुभकामना तेरी छूट
बर्बाद होने की, तू चीटिंग रंडी. बाद में डिटेल्स टेक्स्ट करना.
अम्मी: (अलविदा हाथ हिलती जब अलग होती) तू भी, तू गन्दी कुटिया. मज़ा कर अपनी टट्टी वाली छेद
फैलवाने में. Salaam—ya जो भी, मज़हब को छोड़. मिलते हैं!
नफीसा: (वापस हाथ हिलती, मुस्कुराती) सलाम को chhod—lund का झंडा! अलविदा, रंडी!
अलग होने के बाद मैं अम्मी के पीछे गया. वह लुक्सुरिओउस होटल में दाखिल हुई, जैसे मार्बल
लॉबी वाला और डिस्क्रीट स्टाफ, गजेंद्र के मैसेज के मुताबिक़. मैं पीछे चुपके गया,
रिसेप्शनिस्ट से कसुआलय पुछा, “वाइट जीन्स वाली औरत कहाँ गयी?”
“रूम 512,” उसने बताया. मैं लिफ्ट के पीछे गया, छाया में छुप कर. कॉरिडोर में अम्मी
धीरे चल रही थी, इधर उधर देखती जैसे नज़रों से बच रही हो, अपनी गलती जानती हुई. उसने
नॉक किया; गजेंद्र ने खोला.
दोनों ने जोश से चुम्बन kiya—main उनकी बातें नहीं सुन सका.
उसने दरवाज़ा लॉक किया. मैं अपने कमरे में दौड़ कर गया, जल्दी अंदर, सोचा कैसे झाँक
सकता hoon—shayad शेयर्ड बालकनी या पतली दीवार.
अब से मैं अपनी माँ को गजेंद्र की रंडी मानता हूँ, पापा की बीवी नहीं. वह इम्पुरिटी
से पूरी तरह धूस गयी है.
सुबह हो गयी. रास्ते से गुजरने वाले लोग हमारे घर को देखते तो सोचते— यहाँ नेक लोग रहते हैं, रोज़ाना तिलावत,
हलाल खाना साथ बाँट कर, घर वाले kitab-e-muqaddas की तालीम से बंधे हुए.
लेकिन अंदर, ओह अंदर तो यह गन्दगी का ब्रॉथेल बन चूका था, छुपे गुनाहों का अड्डा जो हर कोने को मैला कर चूका
था. हवा भारी थी रात के दबौचेरी के निशानों से: शादी के कमरे के बिस्तर पर पसीने से भीगी चादरों की
मुस्की बू जहाँ अम्मी ने गजेंद्र के सामने अपने आप को समर्पित कर दिया था, शरीर के फ्लुइड्स की तेज़, तीखी बू और
गजेंद्र के अम्मी की गांड में जाने से निकली मिटटी जैसी टट्टी की गन्दी बू— अम्मी की टट्टी, जल्दी साफ़ न होने की वजह
से स्मीयर हुई हुई.
मैं उस सुबह थका हुआ उठा, जिस्म भारी रात के बेचैन ख्वाबों से जो मैंने देखे थे. पतली चादर के नीचे हिलते
हुए महसूस हुआ मेरे लुंड के ird-gird सूखी मणि की कृसत्य लेयर, छिपके हुए देखने के वक़्त अपनी शर्मनाक निकलने
की चिपचिपी याद.
मुँह बनाते हुए उठा, आँखें रगड़ कर धुप से बचाया. जल्दी से ब्लैक शार्ट और सादा t-shirt पहना, कपडा जिस्म पर
ठंडा लगा, उम्मीद थी नया कपडा गुनाह को धोने देगा, लेकिन वह बू की तरह चिपका रहा. नंगे पाऊँ हॉलवे में
चलते हुए पहले नज़र पड़ी अब्बू पर जो सोफे पर अभी सो रहे थे, सीना ऊपर नीचे हो रहा था गहरी, ghair-tabee
साँसों में.
रात को अम्मी ने जो दवाई चाय में डाली थी वह उस पर भारी थी, उसे मजबूर be-hoshi में रखे हुए ताकि वह
गजेंद्र के साथ अपना अफेयर बिना रुकावट के कर सके. अब्बू का चेहरा सुकून भरा था, बच्चे जैसा, be-khabar की
उनकी बीवी ने यह सब प्लान किया था उनके शादी के बिस्तर पर धोका देने के लिए.
क्यूरियस और बेचैन होकर मैं शादी के कमरे के दरवाज़े की तरफ धीरे से गया, जो थोड़ा खुला था. अंदर झाँक कर
देखा गजेंद्र अभी गहरी नींद में बिस्तर पर पड़ा था, चौड़ी सीना नंगा, एक बाज़ू फैला हुआ जैसे यह जगह उसकी हो
जो असल में अब्बू की थी. कमरा बिखर गया था: तकिये इधर उधर, हवा में उनके मिलान की गर्मी.
लेकिन अम्मी कहाँ थी? दिल तेज़ धड़का. वह बिस्तर पर नहीं, अटैच्ड बाथरूम में भी नज़र नहीं आयी. पीछे हटा कर
मैंने घर में उसकी तलाश शुरू की, धीमे क़दमों से.
पूरा घर पसीने और रात की उस ख़ास, चिपकी हुई टट्टी की बू से भरा था— अम्मी की टट्टी, जब गजेंद्र ने उसकी गांड
मारी थी, जल्दी में पूरी साफ़ न होने की वजह से. यह बू कॉरिडोर में फैली हुई थी, याद दिलाती कितना नीचे गिर
चुके थे हम.
जब मैं घर के पीछे छोटे एक्सरसाइज एरिया में घुमा— योग मत और कुछ डम्ब्बेल्स वाला छोटा सा— वहां उसको
देखा. अम्मी वाइट शार्ट में थी जो टांगों से चिपकी हुई, मैचिंग वाइट टॉप जो कर्व्स पर कासी हुई, और हैरान करने
वाला— वाइट वैल सर पर लपेटा हुआ, जैसे दीनदारी और प्रोवोकेशन को मिला रही हो.
वह अपनी रूटीन में थी, स्ट्रेचिंग और हलके स्क्वाट्स, जिस्म की फ्लुइडिटी से गांड हर हरकत में थोड़ा हिल रही थी. माथा
पर पसीना, सांस स्टेडी, फॉर्म पर फोकस. उस तरह देख कर एक पल ख़ुशी हुई— वह ज़िंदा लग रही थी, खुद का ख्याल
रख रही— लेकिन फिर खतरा याद आया.
गजेंद्र अभी घर में था, अब्बू लिविंग रूम में द्रुग्गेड; वह कैसे फ़िक्र नहीं करती? वह हमारे घर को बर्बाद
करने को तैयार लग रही थी, इतने रेवेलिंग कपड़ों में जिस्म दिखा कर जब खतरा पास था. यह be-dari मुझे गरम कर
गयी, शॉर्ट्स में अनवांटेड हलचल जब मैं उसकी be-dari की तारीफ कर रहा था. वह डर्टी क्यों नहीं? अब्बू के अचानक
जागने से, पड़ोसियों के खिड़की से देखने से?
मैं धीरे पास गया, गाला साफ़ कर के आवाज़ दी. “अस्सलामु अलैकुम, अम्मी. इतनी सुबह एक्सरसाइज कर रही हो. अच्छा लग
रहा है.”
वह सीढ़ी हुई, हाथ की पीठ से माथा पोंछा, चेहरे पर मुस्कराहट. “व अलैकुम अस्सलाम, बीटा. हाँ, सोचा दिन
शुरू होने से पहले जल्दी सेशन कर लून. एनर्जी देती है. तू ने नींद कैसी ली?”
“ठीक थी, शायद. थोड़ी बेचैन. अब्बू अभी सोफे पर सो रहे हैं. वह ठीक हैं? फज्र के लिए तो उठ जाते हैं.”
अम्मी का चेहरा नहीं बदला, लेकिन आँखें एक पल झुकी. “ओह, वह ठीक हैं. शायद कल से थक गए. हॉस्पिटल से
रिकवरी में वक़्त लगता है न? रात भर पथ्थर की तरह सोये रहे. थोड़ा और आराम करने दो.”
फिर हम और बातें करने लगे, हलके टॉपिक्स पर. “तो नाश्ता क्या है?” मैंने दीवार के सहारे पुछा.
वह धीमे से हनासी, पाऊँ छूने झुकी. “सोचा अंडा और पराठा. या फिर हल्का कुछ, आज गर्मी है. तू क्या
चाहता
है?”
“अंडे अच्छे लगेंगे. वैसे, जाबिर से बात हुई लटल्य? सोचा कॉल कर लून.”
“नहीं रिसेंटली, लेकिन कर लेना. दोस्ती ज़रूरी है. और पढाई कैसी चल रही? तू इस बारे में चुप रहता है.”
बाद में वर्कआउट ख़तम कर अम्मी बाथरूम में नहाने गयी. बहार निकली तो leopard-print जुंपसुइट पहना था
जो हर
चउरवे पर कैसा हुआ, बोल्ड पैटर्न हिप्स और बस्ट को हाईलाइट कर रहा था, बिलकुल मॉडेस्ट नहीं.
कपडा स्लीक, चमकदार, हलके ज्वेलरी के साथ, मॉडर्न और कॉंफिडेंट लग रही थी. उसने पहले गजेंद्र के लिए
नाश्ता
बनाया, ट्रे में चाय, टोस्ट और फल ले कर बैडरूम में गयी जहाँ वह जाग रहा था. अब्बू की तरफ देखा भी
नहीं
उठाने या खाना देने के लिए; गजेंद्र उसका फोकस था, प्रायोरिटी साफ़ बदल गयी.
इसका मतलब वह पूरी तरह उसकी लवर बन चुकी थी, शौहर को बिना पछतावे के साइड कर दिया, घर के अंदर
आने वाले
को घर का सर पर रख दिया. यह हमारे फॅमिली के डायनामिक्स का पूरा उल्टा था— अब्बू प्रोवाइडर थे, अब बाद में,
जबकि
बहार वाला पहला.
फिर भी अब वह बहुत केयरफुल थी, इधर उधर देखती प्राइवेसी के लिए, हरकतें प्लान किया हुआ फसाड बनाये
रखने के
लिए.
उनकी बात धीमे से आयी जब वह ट्रे रखती थी. “गुड मॉर्निंग, गजेंद्र. तेरे लिए नाश्ता लाया. खा ले जाने
से
पहले.”
वह बैठा, आँखें रगड़ कर, ग्रीन फैला. “शाहिदा, तू मेरे लिए बहुत अच्छी है. कल रात कमल थी. तू आग थी.”
वह शर्मा गयी लेकिन मुस्कुरायी. “श, धीमे. हाँ, थी. अब सीरियसली, जल्दी जा हुसैन जागने से पहले या
मेरा बीटा देख ले. दवाई का असर जल्दी ख़तम होने वाला है.”
उसने कमर से खींच कर पास किया. “इतनी जल्दी क्या? थोड़ा मज़े ले लून. तू इस जुंपसुइट में शानदार लग रही. एक
राउंड और चाहता हूँ.”
“गजेंद्र, नहीं. अभी नहीं. रिस्क नहीं ले सकते. जा, प्लीज. बाद में मिलते हैं.”
वह झुका, गहरा चुम्बन, हाथ गांड पर गए, पतले कपडे के ऊपर नरम गोश्त निचोड़ा. अम्मी ने मजबूरी
से चुम्बन तोडा. “बस. अब जा, देर हो जाएगी.”
“ठीक है,” वह खड़ा हुआ. “लेकिन आज रात— फिर छोड़ना चाहता हूँ. वही आग, वही सब.”
वह रुक गयी, फिर सर हिला दिया. “ठीक है. आज रात. अब जल्दी जा.”
वह पीछे के दरवाज़े से निकल गया, चुपके से. अम्मी पीछे देखती रही, अब्बू को चेक किया जो अभी धीमे
खर्राटे ले रहे थे. वह जानती थी सुबह होने से दवाई का असर काम होने वाला था, कभी भी जाग सकते थे.
मैं जानता था वह हमारे घर को पूरा जलाना नहीं चाहती, इसलिए अच्छी _ बीवी की तरह छुपाती थी—
दीनदारी का ढोंग बनाये रखते हुए अपनी ख्वाहिशें पूरी करती.
एक सांस ले कर उसने झाड़ू और बाल्टी उठायी, फर्श साफ़ करने लगी, रात के गंदे निशाँ मिटटी हुई.
बाद में धीरे से अब्बू को उठाया.
अम्मी: (अब्बू के कंधे धीरे हिला कर, आवाज़ मीठी और फिकरमंद) हुसैन, उठो हबीबी. सुबह हो गयी. कल रात
सोफे पर सो गए. आओ, आँखें खोलो.
अब्बू: (सुस्ती से बैठ कर, आँखें रगड़ कर कंफ्यूज) हँ? क्या... शाहिदा? मैं यहाँ क्यों? पूरी रात सोफे पर
सोया? सर भरी लग रहा... जैसे बेहोश हो गया था.
अम्मी: (मासूम मुस्कराहट, उसे सीधा बैठने में मदद) ओह बेचारा. डिनर के बाद पुराण क्रिकेट मैच देख
रहे थे टीवी पर, याद है? बीच में सो गए. तुम्हे डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी— इतने सुकून से सो रहे थे. लो,
पानी ले लो.
अब्बू: (पानी ले कर धीरे पी, अभी भी घबराया) क्रिकेट मैच? मुझे... याद नहीं. आखरी बात शाम को तेरे
साथ चाय पीते हुए याद है. उसके बाद कुछ ब्लेंक. अजीब है. सर तो नहीं लगा?
अम्मी: (हाथ पैट कर तसल्ली से) नहीं नहीं, ऐसा कुछ नहीं. बस दिन भर थके हुए थे. रिकवरी में ज़्यादा म्हणत
कर रहे हो. शायद इसलिए याद थोड़ी कमज़ोर है. फ़िक्र मत करो, मैं हूँ न तेरे लिए.
अब्बू: (माथा छू कर, दर्द से) हाँ शायद... लेकिन ठीक नहीं लग रहा, शाहिदा. जिस्म दर्द कर रहा, पेट
घबराया हुआ. जैसे हैंगओवर. यह नार्मल नहीं.
अम्मी: (सहानुभूति से सर हिला, आवाज़ केयरिंग) ओह हुसैन, बहुत बुरा लग रहा होगा. अभी हॉस्पिटल जा कर चेक करा
लो. शायद दवाइयों का साइड इफ़ेक्ट या थकन जमा हो गयी. पहले हल्का नाश्ता बना देती हूँ— कुछ भरी नहीं,
सिर्फ टोस्ट और चाय पेट सेटल करने के लिए.
अब्बू: (रुक कर सोच) नाश्ता... कल रात क्या खाया या पिया था? कुछ अजीब तो नहीं था? शायद उसी से यह.
अम्मी: (आवाज़ स्टेडी और गरम) कुछ आम से अलग नहीं, हबीबी. तेरा पसंदीदा— सादा दाल चावल, वह हर्बल चाय
जो सेहत के लिए पीते हो. सब अच्छा, हलाल चीज़ें तुझे मज़बूत रखने के लिए. तू ने कहा था टास्ते परफेक्ट है टीवी
देखने बैठने से पहले. ज़्यादा सोच मत; अभी पूरी रिकवरी नहीं हुई.
अब्बू: (अचानक हवा सूंघते, भौं सिकोड़) रुक... यह बू क्या है? जैसे... कोलोन या कुछ. तेज़, मुस्की. पहचानी
सी— जैसे पडोसी गजेंद्र का परफ्यूम. वह यहाँ था?
अम्मी: (एक पल जैम गयी, आँखें शॉक से फैली फिर संभाली, आवाज़ थोड़ी रुक रुक) गजेंद्र? ओह... हाँ, सुबह थोड़ी
देर आया था. बस देखने आया तू कैसा है, पडोसी वाली फ़िक्र. कुछ मिनट पहले गया. मैंने नहीं बताया क्योंकि तू सो
रहा था.
अब्बू: (सर टेढ़ा कर कंफ्यूज) सुबह? लेकिन बू इतनी तेज़... जैसे ज़्यादा देर था. मुझे क्यों नहीं उठाया? ठीक से सलाम
करता. वह मोहल्ले में मदद करता है; hello न कहना बदतमीज़ी है.
अम्मी: (जल्दी रिकवर, मुस्कुराते) सोचा था, लेकिन तू इतने गहरे खर्राटे ले रहा था, हुसैन. आराम डिस्टर्ब नहीं करना
चाहती थी— अभी तुझे इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. गजेंद्र ने समझा; सलाम कहने को कहा और बोलै जब तू बेहतर
हो तब आएगा.
अब्बू: (धीरे सर हिला, माथा रगड़ते) ठीक है, समझ आता है. लेकिन यह सर दर्द... हाँ, तू सही कह रही.
हॉस्पिटल जा कर डॉक्टर से मिल लून. शायद टेस्ट करवा लून.
अम्मी: (उसके साथ कड़ी, उठाने में मदद) हाँ, अभी जा हबीबी. आराम से— गाडी धीरे चलना. मैं यहाँ
ख़तम कर के थोड़ी देर में आ जाउंगी. फार्मेसी से कुछ चाहिए तो ला देना.
अब्बू: (चाबी ले कर, दरवाज़े पर रुक) शुक्रिया, शाहिदा. तू हमेशा मेरे लिए इतनी अच्छी. पहुँच कर टेक्स्ट कर दूंगा.
अम्मी: (मीठी मुस्कराहट से हाथ हिला) सब ठीक हो जायेगा. लव यू.
(अब्बू निकल गए, दरवाज़ा बंद कर के.)
अम्मी: (खुद से, खिड़की से उनको जाते देख कर स्मिर्क) ओह, बहुत उस्ताद तरीके से संभाला. उस बेवक़ूफ़ से झूठ
बोलना कितना आसान— पसीना भी नहीं आया. हुसैन, तू कितना अहमक़ है. जब गजेंद्र पहली बार आया था मैंने
तुझे चेतावनी दी थी, बोलै बहुत फ्रेंडली, बहुत चार्मिंग लगता है. लेकिन नहीं, तू ने उसको भाई जैसे भरोसा किया,
चाय पे बुलाया. और अब? अब गजेंद्र हर मौके पर मुझे पागल कर के छोड़ता है, तेरे सामने. तेरी गलती है— तेरी
कमज़ोरी, तेरी बिमारी ने मुझे असली मर्द की भूख दी. खुद को ब्लामे कर इतने सालों से मुझे सटिस्फी न करने के
लिए.
तू इतना अँधा कैसे, बेकार शौहर? अपने बिस्तर पर बीवी को रंडी की तरह चुड़ते हुए नोटिस नहीं कर सकता, हर
छेद से छुम टपकता जब तू द्रुग्गेड सूअर की तरह खर्राटा है. चाय में पाउडर इतनी आसानी से डाला, और तू ने
बिना सवाल पि लिया. बेचारा. तू इस धोके का हक़दार है— तेरा छोटा लुंड कभी गजेंद्र की तरह मुझे
झड़वाया नहीं, मुझे फैला कर, मुझे अपना बना कर.
मुझे तुझ पर धोका देना पसंद है, हुसैन, हमारी शादी अब बोरिंग है. तुझ पर धोका देना कितना ाचा लगता
है हुसैन, यह थ्रिल, यह ताक़त.
तुझे be-khabar लड़खड़ाते देख कर जब मैं दुसरे मर्द की बू से भरी हूँ? मज़ेदार. और तेरी सेहत? मुझे
अब परवाह नहीं. हॉस्पिटल में साद, जितना चाहे— शायद ज़्यादा वक़्त मिले गजेंद्र के लिए टाँगे फ़ैलाने को. तू
अब सिर्फ बोझ है, बेवक़ूफ़, अँधा ककोल्ड. मैं क़सम खाती हूँ, अब दिखावा ख़तम. मैं गजेंद्र की रंडी
हूँ, तू सिर्फ बैकग्राउंड का बेवक़ूफ़.
उसी सुबह, हमारी पड़ोसन आंटी नफीसा अम्मी से मिलने आयी.
अम्मी: (दरवाज़ा खोल कर, थोड़ी बिखेरी लेकिन हलकी मुस्कराहट) सलाम अलैकुम, नफीसा! क्या सरप्राइज है. अंदर
आओ, अंदर आओ. इतनी सुबह— पूरा चल कर आयी?
नफीसा: (मुस्कुराते हुए) व अलैकुम सलाम, शाहिदा! हाँ, सोचा आ जॉन. वृंदा पर चलते हैं; बहार अच्छा
है, और हुसैन या तेरे बेटे को जगाये बिना बात कर सकते हैं.
नफीसा: तो बता, बेहेन. कल रात तूने टेक्स्ट किया था “कुछ वाइल्ड हुआ”— मत सोच भूल गयी. क्या है टिया? या कहूं,
क्या है डिक? ( आँख मार कर)
अम्मी: (गहरी लाली, चाय सिप करते) नफीसा, श! इतनी ज़ोर से नहीं. ठीक है... कल रात... पागलपन था. कहाँ से
शुरू करून. गजेंद्र फिर आया.
नफीसा: (जोश से झुक कर, आँखें फैली) गजेंद्र? तेरा हॉट हिंदू पडोसी? ओह मेरा खुदा, सब बता! छोड़ा उसने?
आजा, तू छिनाल, डिटेल्स!
अम्मी: (रुक कर, फिर सांस छोड़) हाँ... किया. मेरे सब छेदों में, नफीसा. यहाँ घर में, जब हुसैन
सिटींग रूम में सो रहा था. मुझे ऐसी रंडी महसूस हो रही है इसको होने दिया.
नफीसा: (हाथों से ताली बजा कर एक्ससिटेड) सब छेद? तू पूरी छिनाल, शाहिदा! जानती थी तेरे अंदर है. पूरा
play-by-play बता— कैसे शुरू हुआ? चुपके आया? ज़ोर दार था? बता, बता!
अम्मी: (कप से खेलती) पाउडर से शुरू हुआ. गजेंद्र ने दिन में यह स्लीपिंग पाउडर दिया. बोलै हार्मलेस है,
बस हुसैन को गहरी नींद देने के लिए ताकि पकडे न जाएँ. मैंने शाम की चाय में मिक्स कर दी, नफीसा.
यकीन है मैंने अपने शौहर के साथ यह किया? वह भरोसा करता था, बिना सवाल पि गया. जल्दी असर हुआ—
कुछ मिनट में काउच पर बेहोश, धीमे खर्राटे. गजेंद्र ने टेक्स्ट किया पीछे दरवाज़ा खोलने को. दिल
धड़क रहा था जब मैंने खोला, जानती थी क्या होने वाला है.
नफीसा: (शरारती हंसी) ओह, तू चालू कुटिया! शौहर को ड्रग कर साइड डिक के लिए? नेक्स्ट लेवल नॉटी. बेट सोच
कर hi छूट गीली हो गयी. कैसा पाउडर? अफ्रोदिसिअस जैसा या सिर्फ बेहोश करने वाला? और हुसैन हिला भी नहीं?
खुदा, यह थ्रिल!
माँ: (सर हिलाते हुए) बस एक सेडेटिव था, कुछ ख़ास नहीं. हाँ, पूरी रात एक मुस्कले भी नहीं हिला उसने.
बहुत बुरा लग रहा है, नफीसा. हुसैन इतना कमज़ोर हो गया है बिमारी se—woh मुझ पर पूरा भरोसा
करता है, हर चीज़ के लिए मुझ पर निर्भर. और मैं वहां उसके साथ धोका दे रही थी अपने hi घर
में. ऐसी कौनसी बीवी होती है?
नफीसा: (हाथ हिला कर) अरे बस करो यह हमदर्दी, शाहिदा. हुसैन बड़ा आदमी है; वह ठीक हो जायेगा.
कभी खुद के बारे में सोचो! महीनों से उसकी देखभाल कर रही ho—kya तुम्हे थोड़ा मज़ा नहीं मिलना
चाहिए? गुनाह छोडो; रंडी ज़िन्दगी को गले लगाओ.
माँ: (जारी रखते हुए, आवाज़ धीमी) वैसे भी, जब हुसैन बेहोश हो गया, गजेंद्र ने मुझे ड्राइंग
रूम में hi खींच लिया. हमने जोश से चुम्बन किया, उसके हाथ मेरे पूरे जिस्म पर, निघती के ऊपर
से चूचियों को निचोड़ रहा था. हुसैन की खर्राटे बैकग्राउंड में थी, Nafisa—kitna खतरनाक, कितना
गलत. मैं देख सकती थी काउच पर उसका साया, सीना ऊपर नीचे हो रहा था आराम से, और यह दूसरा
मर्द मेरी जुबां चूस रहा था. पहले मैं हटने की कोशिश की, फिसफिसाया 'यहाँ नहीं, अगर वह जाग गया
तो?' लेकिन गजेंद्र हँसा और और ज़ोर से चुम्बन किया, मुझ पर रगड़ते हुए. उसके होंठ सख्त थे, मांगने
वाले, हुसैन के नरम चुम्बनों से बिलकुल अलग. यह बोहोत देर तक चलता raha—main उसके मुँह में
धीमी कराह रही थी, जिस्म धोका दे रहा था, गीली होती जा रही थी.
नफीसा: सोये हुए शौहर के सामने चुम्बन? यह तो बहुत गरम है! उसके लुंड का दबाव महसूस हुआ? बेट
तुम टपक रही थी, छोटी शैतान. जारी rakho—usne वहां ऊँगली की या क्या?
माँ: (सर हिला कर) हाँ... हाथ कपड़ों के नीचे डाला, चुम्बन करते हुए मुझे छेड़ा. फिर मुझे उठा
कर बिस्तर पर ले गया. हुसैन के बिस्तर पर, Nafisa—hamara शादी का बिस्तर.
नफीसा: (हाथ से पंखा करते हुए) उठाकर ले गया? हर छेद में छोड़ा? शाहिदा, तुम सपना जी रही हो!
गांड वाले हिस्से की tafseel—dard हुआ? मज़ा आया? इतनी रंडी हो की उसको तेरी कुंवारी गांड देने दी.
माँ: (नीचे देखते हुए, उलझन में) पूरा वक़्त बुरा लग रहा था. हर धक्के में मेरी क़समें याद
आती थी, हुसैन के साथ बनायीं ज़िन्दगी. वह अच्छे आदमी hain—hamara खर्चा उठाते हैं, मेरे साथ
,,., पढ़ते हैं, बेटे से प्यार करते हैं. और मैं वहां हमारे बिस्तर को मैला कर रही थी, पोर्नस्टार
की तरह कराह रही थी जब वह बिमारी से उभर रहा था. गुनाह लहार लहार आता था; मैं दरवाज़े की
तरफ देखती रहती थी, सोचती थी अगर वह अंदर आ गया, अपनी बीवी को पडोसी के लिए फैली देख कर. रूह चीयर
रही थी, Nafisa—main दीनदार होनी चाहिए, मिसाल. कैसे इतनी नीचे गिर गयी?
नफीसा: (आँखें घुमा कर) फिर से यह बुरा महसूस? शाहिदा, होश में आओ. हुसैन की बिमारी तेरी गलती
नहीं, और तेरी बोरियत भी नहीं. तुम्हे मज़ा हक़ hai—us पर हमदर्दी मत बर्बाद करो.
माँ: (रुक कर, धीमे से क़बूल करते हुए) लेकिन... एक हिस्सा ाचा लगा. सच में ाचा. हुसैन के नाक के
नीचे धोका? यह जोशीला था. हराम थ्रिल ने हर एहसास बढ़ा diya—Gajendra का लुंड बड़ा, सख्त, बेहतर
लगा जितना हुसैन ने कभी दिया. मैं कई बार झड़ी, नफीसा, सालों से इतनी ज़ोर से नहीं. हुसैन इतना पास, इतना
कमज़ोर, यह उलझा हुआ उत्साह जोड़ा. खुद से नफरत हुई, लेकिन जिस्म को पसंद आया. मैं ज़िंदा महसूस हुई,
चाही हुई, औरत जैसे, सिर्फ देखभाल करने वाली नहीं.
नफीसा: (जोश से सर हिला कर) देखा? यही बात है! गुनाह सिर्फ मज़ा बढ़ता है. हमदर्दी मत karo—Hussein का
वक़्त था; अब तुम्हारा है. हम जैसी औरतें रंडी होनी चाहिए, शाहिदा. हर लुंड का मज़ा लो, ज़ोर से सवारी
करो, चूसो, भरवाओ. एक बोर शौहर से क्यों बस? दुनिया भर के लुंड हैं. चुपके से रंडी बनो; यह ताक़त
देता है!
माँ: (आँखें फैल कर) नफीसा, यह कितना शर्मनाक है! लेकिन... जारी रखो.
नफीसा: (आगे झुक कर, जोश में) Bilkul—sharmnaak और सच. .,? सब नकली है, बेहेन. मर्दों ने बनाये
क़ानून औरतों को काबू में रखने के लिए. 'हाय रखो, पर्दा करो, पांच वक़्त ,,.,'—बकवास! यह
हमारी फिटरी ख्वाहिशों से रोकने के लिए. हर वैली के अंदर छुपी निम्फो होती है जो बहार निकलना चाहती
है. मज़हब को छोड़ दो; पाकिज़ागी को छोड़ do—sach में छोड़ दो! लुंड लो, छुम लो, झाड़ लो. ज़िन्दगी छोटी
है नकली पाकिज़ागी के लिए.
माँ: (हैरान लेकिन धीरे सर हिला कर) तुम सही हो... मैं हमेशा इसमें क़ैद महसूस करती थी. ,,.,,
roza—kabhi अंदर की आग बुझाई नहीं. मेरी अम्मी ज़ैनब को कसाई के साथ देख कर? शायद उसको सच पता
था. ., कभी कभी नकली लगता है, जैसे क़ैदी खाना. तुमसे मुतमईन होना आज़ादी देता है.
माँ: (चाय की चुस्की लेते हुए, यादों में खो कर) ओह नफीसा, कल रात गजेंद्र के लुंड के साथ... मुझे
इतना पसंद आया. कुछ भी नहीं था ऐसा पहले. वह मोटा, धड़कता हिंदू लुंड मुझे हुसैन के छोटे
से बिलकुल अलग तरह फैला रहा था. पहले मेरी छूट में धक्का मारा, हमारे शादी के चादर पर सब
पहाड़ diya—jo हुसैन के साथ सिर्फ नाटक था. फिर मुझे पलट कर गांड में गहरा धक्का, जब तक मैं
रहम मांगती रही, लेकिन अंदर से और चाहती रही.
नफीसा: (मुस्कुराते हुए, पास आकर) तू गन्दी कुटिया, शाहिदा! हराम लुंड को प्रो की तरह पसंद कर रही.
जारी rakho—us पर सवारी की? नाम ले कर चीखी?
माँ: (लाल होते हुए लेकिन जोश से) हाँ, रिवर्स काउगर्ल पर सवारी की, कमर ज़ोर से नीचे धकेल कर उसके
बॉल्स मेरे पर थपकते थे. मैं अपनी क्लीट पर ऊँगली करती रही जब वह मुझे अपनी _ रंडी कहता
रहा, और इतनी ज़ोर से झड़ी की नज़र धुंधला गयी. मैंने उसको अपने चेहरे पर लुंड से थप्पड़ मरने दिया
फिर choosa—geela, गन्दा, थूक थोड़ी पर बह रहा था.
नफीसा: (हँसते हुए) तू गन्दी रंडी! यह है असली जज़्बा. रंडी बनने का एहसास कितना ाचा लगता है, न?
माँ: (जोश से सर हिला कर) हाँ, नफीसा. रंडी बनने का एहसास बहुत ाचा hai—azaadi देता है, नशा देता
है. सालों से परफेक्ट बीवी बनने का नाटक, लेकिन अब? पूरी रंडी बन कर, सब कुछ धोका दे कर, बिजली सी
दौड़ती है जिस्म में. Be-izzati, gunah—yeh नशा है. अभी तेरे सामने सोच कर हाथ लगा रही हूँ. कोई
नकली हाय नहीं; अंदर की रंडी को गले लगाना ताक़त देता है, ज़िन्दगी देता है, ख्वाहिशों पर क़ब्ज़ा देता
है. यह ,,., या घर के खाने से बेहतर hai—kacchi, गहरी ख़ुशी.
नफीसा: (जीत की मुस्कराहट) देखा? मैंने पहले कहा था, तू शक्की रंडी. याद है पिछली बात? मैंने
कहा सब औरतें अंदर से रंडी होती हैं, और तुझे निकलना चाहिए. मैं सही nikli—dekho अब तू इक़रार
कर रही है जैसे नयी रंडी. शुरू से जानती थी तू टूटेगी; वह दीनदार नाटक सिर्फ दिखावा था. मैंने
धीरे से धकेला, लेकिन सही थी. तू सबूत है मेरा मश्वरा काम करता hai—gunah छोडो, लुंड पकड़ो.
सालों से दोस्तों से कह रही हूँ: असली आज़ादी का मज़ा चखो तो वापस नहीं जाते. मेरी पीठ पर थपकी
दे दो, हाँ?
माँ: (मुस्कुराते हुए, बुरा न मानते) तुम सही थी, नफीसा. तुम बिलकुल सही थी की रंडी पैन इतना ाचा है.
पहले लड़ी, लेकिन अब? गजेंद्र के लिए टांगें फैलाना, हुसैन को दवा देना, बेटे से jhooth—sab कितना
मीठा गलत है, और कितना ाचा लगता है. रंडी होना मतलब बोर रूटीन ख़तम; जोश, खतरा, रूह
हिलने वाली झाड़. तुमने आँखें खोली की सिर्फ हार मान कर कितना मज़ा है, इस्तेमाल होना, बुरा भला
कहलाना और हर पल पसंद करना. रंडी पैन लानत नहीं, छुपा बरकत है. तुम्हारी वजह से मैं
लटक गयी हूँ.
नफीसा: (मुस्कुराते हुए) बिलकुल सही, तू सदी हुई रंडी. जारी रखो iqraar—hubby बेहोश था जब तू चुद
रही थी, कैसा लगा?
माँ: ऐसा पहले कभी महसूस नहीं हुआ, नफीसा. पूरे छेदों में छोड़ना जब हुसैन दवा खा कर
पड़ा था? कोई और जोश नहीं. मेरी छूट गजेंद्र के लुंड के ird-gird जकड़ी जब धोका सोचा, गांड में
जलन maza-dard के साथ जब हुसैन ने कभी छुआ नहीं. उसका माल निगलना मतलब धोका की मोहर लग
गयी.
नफीसा: (अँधेरे से हँसते हुए) तू कितनी सदी है, Shahida—bimaar शौहर को दवा दे कर लुंड के लिए?
पसंद आया, तू गन्दी छूट.
माँ: जानती हूँ... और लगता है नार्मल कभी वापस नहीं जाउंगी. वह मासूम बीवी और अम्मी? वह
हमेशा के लिए चली गयी.
नफीसा: (सर हिला कर) क़बूल कर lo—tu पूरी रंडी है.
माँ: (गहरी सांस ले कर) हाँ... मैं क़बूल करती हूँ की मैं रंडी हूँ. धोका देने वाली, लुंड की
भूखी रंडी जो शौहर को दवा देती है और पडोसी से चुदवाती है. अब इंकार नहीं.
नफीसा: (हाथों की हलकी ताली) मुबारक हो, शाहिदा! क़बूल कर लिया की तू रंडी है जैसे सब _
auratein—akhirkaar! वैल के नीचे सब एक जैसे: दीनदार दिखावा करते हुए लुंड के ख्वाब. मस्जिद
में, हमारे सर्किल में dekha—behenen चुपके निकलती हैं, इशारे, धोका. तू अब सच्ची है. और
मैं? मैंने बोहोत पहले क़बूल कर लिया मैं रंडी हूँ. पहले अफेयर के बाद गले लगा लिया. कोई नकली
,,., नहीं; थ्रिल के लिए जीती हूँ. अनजान लोगों का चूसना, चेहरे पर maal—yeh मेरा सच है.
गुनाह छोड़ा, ज़िन्दगी बेहतर. रंडी पैन मुझे जवान रखता है, मुतमईन. हर _ औरत को
क़बूल करना चाहिए; यह हमारी छुपी फितरत है.
माँ: (सोचते हुए) नफीसा... क्या अब भी उम्मीद है मैं अच्छी बीवी और अम्मी बन सकती हूँ? पहले
जैसा हो सकता है?
नफीसा: (सख्त सर हिला कर) नहीं, Shahida—tu कभी अच्छी नहीं बनेगी. क्यों? तूने हद्द बोहोत पार कर
ली. धोके का मज़ा नशा है; हमेशा वापस खींचेगा. हुसैन का भरोसा टूट गया, चाहे उसको
पता न चले. अम्मी होने के नाते बीटा बदली औरत देख रहा hai—door, राज़ भरी. अच्छे के लिए
पाकिज़ागी चाहिए जो अब तेरे पास नहीं. तू अंदर से सदी हो गयी है.
माँ: (मुतमईन होते हुए) हाँ... तुम सही हो. लेकिन नफीसा, तू खुद कितनी रंडी है!
नफीसा: (फख्र से हँसते हुए) बिलकुल हाँ, मैं रंडी हूँ और खुश हूँ! सबसे बेहतर faisla—randi
ज़िन्दगी गले लगाना मतलब बेइंतेहा झाड़, कोई पछतावा नहीं.
माँ: (चाय की चुस्की लेते हुए, वृंदा में इधर उधर देखते हुए) नफीसा, कल रात की एक बात बतानी
है... कितनी शर्मनाक है, मैं मर जाउंगी. जब गजेंद्र मेरी गांड में धक्के मार रहा था...
नफीसा: (मुस्कुराते हुए पास झुक कर, कप नीचे रखते हुए) बोल न, तू गन्दी रंडी! क्या हुआ? उसने
तेरी टाइट _ गांड अच्छे से फैलाई? चलो, मत roko—apni गन्दी दोस्त को साड़ी शर्मनाक
तफ्सील बता.
माँ: (गहरी लाली, एक हाथ से चेहरा छुपाते हुए) W,.'i, नफीसा... मैंने उसके लुंड पर टट्टी कर
दी. वही, जब वह ज़ोर ज़ोर से अंदर बहार कर रहा था. बस... निकल आयी. बहुत शर्मिंदगी हुई;
ज़मीन मुझे निगल जाये.
नफीसा: (ज़ोर से हँसते हुए, घुटने पर थप्पड़ मरते हुए) तू ने उसके लुंड पर टट्टी की? ओह मेरा
खुदा, शाहिदा, यह तो मज़ेदार है! तू गन्दी, टट्टी करने वाली randi—bet वह चॉकलेट की तरह
उस पर फ़ैल गया. हाहाहा!
माँ: (खुद है पड़ती लेकिन फिर भी सीरियस) हसना बंद कर! बहुत शर्मनाक था. लेकिन हाँ... बाद
में सोच कर थोड़ा हसी आयी. गजेंद्र ने बहार निकला, नीचे देखा गन्दगी को और हसने लगा. बोलै,
'देख तेरी हालत, दीनदार वैली, जानवर की तरह टट्टी कर रही जब मैं तेरी गन्दी गांड मार रहा
हूँ.' नॉनस्टॉप मज़ाक उदय, मेरी रानों पर पोंछा और बोलै 'मेरी टट्टी वाली छोटी रंडी.' मैं
कितनी बेवक़ूफ़ लगी
नफीसा: (अभी भी हँसते हुए, आँख से आंसू पोंछते हुए) हाहाहा, 'शिट्टी लिटिल slut'—yeh तोह सोना
है! लेकिन सच बता, और बता. कैसे हुआ? क्या तेरी गांड ने बस पहात कर निकाल दिया या क्या? मुझे
पूरा गन्दा play-by-play चाहिए, तू पूपी रंडी.
अम्मी: (सांस छोड़ कर, खुल कर) ठीक है... इसलिए की मैं अपनी गांड पर बिलकुल काबू नहीं रख
पायी. तू जानती है कितनी टाइट हूँ पीछे se—Hussein ने कभी छुआ भी नहीं, जैसे कुंवारी
ज़मीन. हर धक्के से मेरा अंदर का सब कुछ ढीला होने लगा; बू दोनों को लगी, वह मिटटी जैसी
टट्टी की खुशबू हमारे पसीने के साथ मिल गयी. मैं घबरा गयी, बार बार माफ़ी मांगती रही,
लेकिन वह हँसता रहा, कहता रहा यह उसको और गरम कर देता है. मैं कण्ट्रोल नहीं कर पायी क्योंकि
गांड चुदाई ने अंदर सब कुछ हिला दिया था.
नफीसा: (समझदार अंदाज़ से सर हिलाती, आवाज़ तसल्ली भरी लेकिन गन्दी) ओह शाहिदा, यह बिलकुल नार्मल
है, तू बेवक़ूफ़ टट्टी करने वाली रंडी. अनल में सबके साथ होता hai—teri गांड सिर्फ टट्टी के लिए
नहीं बानी; मज़ा के लिए भी है, लेकिन कभी कभी दोनों मिल जाते हैं. खुद को मत मार; यह बायोलॉजी
है, गुनाह नहीं. अरे, शायद उसको और ज़्यादा पसंद आया, तू गन्दी लड़की.
अम्मी: (थोड़ा घूर कर) लेकिन .,... हमारा मज़हब औरतों को गांड में मज़ा लेने से मन
करता है न? यह हराम है, मन किया हुआ. हमें उस हिस्से को पाक रखना चाहिए, सिर्फ ज़रुरत के लिए.
नफीसा: (नाक चढ़ाते, हाथ हवा में हिलाते) ., और उसके बकवास क़ानून को छोड़, शाहिदा.
यह नकली मज़हब औरतों को मज़ा लेने से रोकता hai—khaas कर गांड में. सोच: कहते हैं अनल
हराम है क्योंकि 'दर्द' या 'be-izzati', लेकिन bakwaas—kyonki यह बहुत ज़्यादा ाचा लगता है, बहुत
आज़ादी देता है हम रंडियों को. ., औरतों को सिर्फ बच्चे पैदा करने और छूट में हलाल चुदाई
के लिए बर्तन समझता है, मिशनरी स्टाइल, लाइट्स ऑफ. कोई मज़ा नहीं, कोई तजुर्बा नहीं, कोई लुंड पर
टट्टी नहीं जब चुद रही हो. क्यों अपने आप को गांड की ख़ुशी से रोकती है? गन्दगी को गले लगा; अगर
टट्टी हो जाये तोह kar—yeh सफर का हिस्सा है.
अम्मी: (सर हिलाती) मैं बहुत शर्मिंदा थी. अभी भी सोचती हूँ तोह चेहरा जलने लगता है.
नफीसा: (बेशरम मुस्कराहट) शर्मिंदा? अरे, अनल में टट्टी होना नार्मल है, तू पूपी राजकुमारी.
अंदर सब हिल जाता hai—kabhi कभी नेचुरल लुबे बन जाती है! और लड़की, यह मर्दों को सटिस्फी करने
का सबसे बेहतर तरीका है. वह रॉ, गन्दी तरफ पसंद करते हैं; दीखता है तू पूरी तरह
समर्पित है, जिस्म को उनके लिए पागल होने दे रही है.
अम्मी: (कन्फ्यूज्ड, सर टेढ़ा) रुक, लुंड पर टट्टी करने से मर्द को ख़ुशी क्यों? यह तोह घिनौनी बात है.
नफीसा: (ज़ोर से हँसते, दोनों साथ हंसती) हाहाहा, ओह शाहिदा, तू कितनी मासूम है! हाँ, उनके लिए यह
गरम hai—teri टट्टी का गरम, नरम कोट उनके लुंड पर? जैसे गरम, मन किया हुआ झप्पी. तेरी
गरम, नरम टट्टी ने गजेंद्र के लुंड को और गरम कर दिया, सच में और फीगुरतिवल्य. मर्दों को
यह be-izzati का खेल पसंद है; महसूस होता है उन्होंने तुझे सबसे बेसिक, गन्दी हालत में तोड़ दिया.
अम्मी: (हैरान, आँखें फैली, थोड़ा हंसती) नफीसा! इतनी बेशरम कैसे बात करती है? जैसे यह कोई
इरोटिक दावत ho—garam टट्टी, गरम लुंड... यह गन्दा, गुनाह भरा है.
नफीसा: (कंधे उछालते, चाय पीते) क्या? मैं सच बोल रही हूँ, तू प्रदीश टट्टी करने वाली. ज़िन्दगी
शर्म के लिए छोटी hai—gandi बात कर, और गन्दा चुद. वैसे, गैंडों की बात करते हुए... मर. रवि
आज पहली बार मेरी गांड मारेगा. वह बूढ़ा परवर्ट महीनों से मांग रहा था.
अम्मी: (सांस रूकती, चाय गिरने वाली) क्या? मर. रवि? तू उसको तेरी गांड देने वाली है? नफीसा, यह
पागलपन है!
नफीसा: (गन्दी आँख मार कर) हाँ रे रंडी, तू जल रही है. उसका मोटा लुंड है; बेट टट्टी भी करवा
देगा. महीनों से पीछे पड़ा था, कहता था मेरी छूट अब ढीली हो gayi—tight पीछे वाली एक्शन
चाहता है.
अम्मी: (अभी भी हैरान) लेकिन पहले क्यों नहीं दिया मर. रवि को तेरी गांड? तू कहती थी उसने माँगा था.
नफीसा: (पीछे टिक कर, मुस्कुराती) हाँ माँगा tha—office में गांड पकड़ कर, फिसफिसाया था मेरी
टट्टी वाली छेद को मारने के बारे में. लेकिन मैं तैयार नहीं थी; पहले खिलोने से ढीली की. नहीं
चाहती थी तू जैसी जल्दी टट्टी कर दूँ उस पर, हाहाहा! अब तैयार hoon—faila कर उसको बर्बाद होने
दूँगी. बेट मेस पसंद आएगा.
अम्मी: (हंसती, लेकिन दिलचस्पी) तू यकीन नहीं होता. इतनी बेशरम... खिलोने, टट्टी की बात. अगर बहार
कोई सुन ले तोह?
नफीसा: (ज़ोर से हंसती) सुन ले, तू फिसफिसाती रंडी! पडोसी जान लें तू टट्टी करने वाली अनल रानी है. अरे,
अगली बार मेरे साथ रवि के साथ aa—double गांड, डबल टट्टी.
अम्मी: (मज़ाक में नफीसा के हाथ पर थप्पड़) बस कर!
थोड़ी देर बाद दोनों शॉपिंग करने चली. “मार्किट चलते हैं,” अम्मी ने कहा. “कुछ कपडे चाहिए.”
मैं चुपके पीछे गया, दूर रहकर जब वह भीड़ भरी सड़कों से गुज़री. अम्मी ने वाइट फूलों
वाली शर्ट पहनी थी जो नीचे बटन थी, थोड़ा से क्लीवेज दिखा रही, टाइट वाइट जीन्स जो टांगों
और गांड को चिपका रही थी.
यह मुस्लिम औरत के लिबास का तरीका नहीं tha—hamara मज़हब हाय मांगता है, ढीले कपडे जो
जिस्म की शकल छुपाएं, नज़रों से बचाये, वैल ठीक से बिना ध्यान खींचे. ऐसी जीन्स कर्व्स को
उभार देती थी, शर्ट के फूल फलिर्टाटिओउस, हाय के उसूलों का खुला उल्लंघन जो औरत की इज़्ज़त बचते
हैं. मैं समझता था यह गजेंद्र का असर है, उसकी बातें और हाथ उसके ईमान को खा रहे थे,
आबय से यह कपड़ों में बदल दिया जो चिल्लाते थे 'हासिल करो'. अम्मी खुद को रंडी महसूस कर
रही थी, मैं समझ सकता था उसके बार बार हेम खींचने से.
उनकी बात उनके लिबास पर गयी. “शाहिदा, यह शर्ट और jeans—wah, कितनी मॉडर्न लग रही है,” नफीसा
ने कहा, हैरान लेकिन तारीफ़ करते. “कभी ऐसे नहीं देखा. आबय कहाँ गए?”
अम्मी हलके से हंसती. “हाँ, थोड़ा अलग है. गजेंद्र को पसंद है, और सच में आज़ादी महसूस
होती है. क्यों हमेशा छुपाना?”
नफीसा की आँखें फैली. “गजेंद्र? ओह, तू सच में चल पड़ी. मुबारक हो, बेहेन. तू सेक्सी महसूस
करने लायक है. मैं भी सोच रही hoon—mazhab ज़रूरी है, लेकिन हम औरतें हैं, ज़रूरतें हैं.”
नफीसा हमेशा अम्मी को गुनाह की तरफ ले जाती थी, धीमा लेकिन जारी असर, इबादत में कमी को
आज़ादी के नाम पर बढ़ावा देती. वह लिबास पर और बात की. “तेरी आबय बहुत शानदार लग रही,
नफीसा,” अम्मी ने कहा. “लेकिन कल से? कुछ बोल्ड तरय कर.”
नफीसा मुस्कुरायी. “सही है. कल से मैं भी रंडी की तरह पहनूंगी. टाइट ड्रेस, शायद. तू मुझसे
जल्दी रंडी बन gayi—dekh, अभी स्त्रौत कर रही है.”
दोनों हंसती. “चल चैलेंज: हम कपट करेंगे कौन बेहतर रंडी बनती है,” अम्मी ने बेशर्मी
से कहा.
शॉपिंग के बाद अम्मी हॉस्पिटल अब्बू से मिलने चली, लेकिन फ़ोन बजा. उसने नफीसा को दिखाया:
गजेंद्र का मैसेज अम्मी को.
अम्मी: (फ़ोन निकाल कर, स्क्रीन देख कर, गहरी लाली) ओह खुदा... गजेंद्र है. यह मैसेज देख:
"अभी आ जा, तू हॉर्नी वैली रंडी. मेरा लुंड सख्त है तेरी छेदों को फिर फ़ैलाने के ख्याल से.
हॉस्पिटल chhod—teri छूट को तेरे limp-dick शौहर से ज़्यादा मेरी ज़रुरत है."
नफीसा: (झुक कर पढ़ती, फिर ज़ोर से हंसती) अरे वह, शाहिदा! कितना सीधा. "तेरी छेदों को फैलाना"?
लड़की, उसने तुझे अपनी पर्सनल छोड़ने वाली चीज़ समझ लिया. हॉस्पिटल chhod—ja ले उस लुंड को. हुसैन
शायद खर्राटे ले रहा है; तुझे मिस नहीं करेगा.
अम्मी: (सोचती, फ़ोन पॉकेट में डालती लेकिन लालच दीखता) नफीसा, तू बहुत बुरी है! तेरी बातों ने
मुझे इतनी रंडी बना दिया. एक महीना पहले सपने में भी नहीं सोचती. अब सिर्फ मैसेज पढ़ कर
गीली हो रही हूँ. लेकिन हुसैन इंतज़ार कर रहा है हॉस्पिटल में... वह मेरा शौहर है, खुदा के
लिए.
नफीसा: (ससिलय हाथ हिलती) मुझे ब्लामे? प्लीज, तू रंडी बनने को तैयार थी. मैंने सिर्फ मैच जलाया.
और हुसैन को chhod—maza ड्यूटी से ज़्यादा, बेहेन. सोच गजेंद्र का मोटा हिंदू लुंड तुझमे धक्के
मारे उसके बजाये बोरिंग बिस्तर के पास बैठ कर हाथ पकड़ रही हो जैसे कोई नूं. तेरी क्लीट को
सिम्पथी फ़क से बेहतर चाहिए.
अम्मी: (होंठ काट कर, चल धीमी) तू सही कहती है... सोच कर ाचा लग रहा. गजेंद्र के लुंड का
मज़ा गुनाह जैसा है, Nafisa—namkeen, धड़कता, हुसैन के बेकार छोटे से बहुत बेहतर जो
महीनों से काम नहीं दे रहा. लेकिन अगर कोई मुझे चुपके जाते देख ले? मैं डाइलेमा में हूँ
—फ़र्ज़ या लुंड?
नफीसा: (मज़ाक में अम्मी का हाथ पकड़) डाइलेमा तेरी गांड! लुंड ले ले, शाहिदा. मज़ा सब कुछ
hai—farz किसने देखा? यह समाज का बकवास है जो हमारी टांगें बंद रखता है. हुसैन बोरिंग
है; उसको हॉस्पिटल में सदा होने दे जब तू सही से चुद रही हो. तू इतना ज़ोर से झाड़ेगी की उसका नाम
भूल जाएगी.
अम्मी: (हंसती हुए) ठीक है... तू मुझे सीधा दोज़ख ले जा रही, लेकिन अब बहुत उत्सुक हूँ. हुसैन
कितना लोसर hai—hamesha सेहत की शिकायत, कभी सटिस्फी नहीं किया. गजेंद्र मुझे रंडी की तरह
ट्रीट करता है. हॉस्पिटल छोड़; मैं जा रही हूँ be-hosh होने तक छुड़वाने.
नफीसा: (ताली बजाती) यह मेरी लड़की! गुनाह पूरा. वैसे, मैं भी अपनी मारने जा रही हूँ. मर.
रवि अपने घर पर इंतज़ार कर रहा; पहले मैसेज किया था "उस टाइट _ गांड को तैयार
कर" क्योंकि हफ्ते से अनल के लिए दबा रहा था. मैंने आखिरकार हाँ kaha—bola यस, बस मुझे
चीखने दे.
अम्मी: (आँखें फैली, फिर गन्दी मुस्कराहट) मुबारक, तू रंडी! बेट उसका लुंड मोटा hai—anal के
लिए दबा रहा मतलब उस वर्जिन छेद को क्लेम करने को मर रहा. तू मुझसे बहादुर; जब गजेंद्र
ने पहली बार लिया था मैं डर गयी थी.
नफीसा: (बैग से छोटी बोतल निकाल कर दिखती) बहादुरी nahi—horniness है. देख, लुबे भी लायी!
नारियल का तेल, एक्स्ट्रा स्लिपरी. सोचा क्यों नहीं? ज़िन्दगी छोटी है; उसको मेरी गांड बर्बाद करने
दे. उसका मोटा, नसें भरा monster—darr लग रहा है फिट नहीं होगा बिना पहाड़ के.
अम्मी: (हंसती, मुबारक) जा, नफीसा! पूरी अनल रंडी बनने पर मुबारक. रवि शायद इतना फैलाएगा
की दिनों तक ठीक से चल नहीं पायेगी. लेकिन यकीन कर, अंदर जाने के बाद दर्द ख़ुशी में
बदल जाता hai—jaise अंदर से मालिक बन जाये.
नफीसा: (मुस्कुराती, तेल पॉकेट में) शुक्रिया, रंडी बेहेन! लेकिन सच बता, गजेंद्र के लुंड को गांड
में कैसे हैंडल किया? वह तोह बहुत बड़ा होगा. टिप्स? मैं थोड़ा डर rahi—Ravi छोटा नहीं, और
ेर में फटी गांड एक्सप्लेन नहीं करना.
अम्मी: (राज़दार अंदाज़ से) ठीक है, प्रो रंडी से टिप्स: पहले relax—gehri सांस, जैसे टट्टी निकालते
हुए बहार धकेल. बहुत तेल लगा; उसके लुंड और छेद पर इतना की टपकने लगे. धीरे shuru—rim
तैसे करने दे, शायद पहले ऊँगली से ढीला कर. जब अंदर आये, गरम कुटिया की तरह कराह; जितनी
गन्दी बात उतना गरम. और जब balls-deep हो तोह jakad—woh जल्दी झाड़ेगा और तुझे भी कमल लगेगा.
नफीसा: (ज़ोर से हंसती) ओह मेरा खुदा, Shahida—yeh सबसे रंडी इंस्ट्रक्शंस हैं! "जैसे टट्टी निकालते
बहार धकेल"? तू गन्दी गुरु है. बेट अब तुझे ass-fucking में पीएचडी मिल गया. हम दोनों दोज़ख जा
रहे, लेकिन काम से काम झड़ते हुए जायेंगे.
अम्मी: (ज़ोर से हंसती, आंसू पोंछती) हाँ! कपट करते hain—kaun बेहतर रंडी? मैं आज
गजेंद्र का लुंड हर छेद में लूंगी; तू रवि से गांड बर्बाद करा. जीतने वाली को अगले शॉपिंग
में ब्रग्गिंग राइट्स.
नफीसा: (high-five) डील! मैं अनल रानी banungi—teri से ज़्यादा चीखूंगी. शुभकामना तेरी छूट
बर्बाद होने की, तू चीटिंग रंडी. बाद में डिटेल्स टेक्स्ट करना.
अम्मी: (अलविदा हाथ हिलती जब अलग होती) तू भी, तू गन्दी कुटिया. मज़ा कर अपनी टट्टी वाली छेद
फैलवाने में. Salaam—ya जो भी, मज़हब को छोड़. मिलते हैं!
नफीसा: (वापस हाथ हिलती, मुस्कुराती) सलाम को chhod—lund का झंडा! अलविदा, रंडी!
अलग होने के बाद मैं अम्मी के पीछे गया. वह लुक्सुरिओउस होटल में दाखिल हुई, जैसे मार्बल
लॉबी वाला और डिस्क्रीट स्टाफ, गजेंद्र के मैसेज के मुताबिक़. मैं पीछे चुपके गया,
रिसेप्शनिस्ट से कसुआलय पुछा, “वाइट जीन्स वाली औरत कहाँ गयी?”
“रूम 512,” उसने बताया. मैं लिफ्ट के पीछे गया, छाया में छुप कर. कॉरिडोर में अम्मी
धीरे चल रही थी, इधर उधर देखती जैसे नज़रों से बच रही हो, अपनी गलती जानती हुई. उसने
नॉक किया; गजेंद्र ने खोला.
दोनों ने जोश से चुम्बन kiya—main उनकी बातें नहीं सुन सका.
उसने दरवाज़ा लॉक किया. मैं अपने कमरे में दौड़ कर गया, जल्दी अंदर, सोचा कैसे झाँक
सकता hoon—shayad शेयर्ड बालकनी या पतली दीवार.